जस्टिस यशवंत वर्मा जाँच समिति की रिपोर्ट में तीनों आरोपों में दोषी, संसद में पेश हुई रिपोर्ट: क्या आम आदमी की तरह चलेगा मुकदमा?

तीन सदस्यीय जाँच समिति ने पूर्व जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जाँच के बाद अपनी रिपोर्ट में उन्हें उन पर लगाए गए तीनों ‘आरोपों के आधार’ (Articles of Charge) में दोषी पाया है। यह मामला उनके सरकारी आवास से बिना हिसाब-किताब वाली नकदी मिलने के बाद सामने आया था।

समिति की रिपोर्ट बुधवार (12 अगस्त 2026) को संसद के दोनों सदनों में पेश की गई। समिति ने इस साल मई में अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंप दी थी।

दो खंडों में तैयार की गई इस रिपोर्ट में जाँच के दौरान जुटाए गए सभी मौखिक और दस्तावेजी सबूत शामिल हैं। इसे लोकसभा और राज्यसभा में संबंधित महासचिवों ने अलग-अलग पेश किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि पूर्व जस्टिस यशवंत वर्मा अपने आवास पर मिली करेंसी नोटों की मौजूदगी, उनके स्रोत या उनके मालिकाना हक को लेकर संतोषजनक जवाब नहीं दे सके।

समिति ने कहा, “आरोप संख्या-1 साबित होता है। 30, तुगलक क्रिसेंट स्थित सरकारी आवास परिसर के स्टोररूम में बड़ी मात्रा में ऐसे ₹500 के नोट मिले, जिनका कोई संतोषजनक हिसाब नहीं दिया गया। जज इन नोटों की मौजूदगी, स्रोत या मालिकाना हक को लेकर संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सके।”

समिति ने पूर्व जस्टिस वर्मा के खिलाफ लगाए गए आरोप-2 को भी साबित पाया। यह आरोप मामले से जुड़े महत्वपूर्ण सबूतों को सुरक्षित रखने में विफल रहने से संबंधित था। समिति ने कहा कि महत्वपूर्ण सबूतों को सुरक्षित या संरक्षित नहीं किया गया और कानूनी तरीके से स्टोररूम को सील करने और उसकी जाँच करने से पहले ही वहाँ मौजूद सबूतों की स्थिति बदल दी गई थी।

समिति ने कहा, “यह निष्कर्ष सबूतों को सुरक्षित रखने में विफलता, परिसर से जुड़े कर्मचारियों द्वारा वहाँ की स्थिति में बदलाव किए जाने पर सहमति और इसके कारण महत्वपूर्ण सबूतों के नष्ट होने पर आधारित है। यह इस बात पर आधारित नहीं है कि जज ने खुद किसी सामान या सबूत को वहाँ से हटाया था।”

तीसरे आरोप को लेकर समिति ने कहा कि पूर्व जस्टिस वर्मा ने ‘इन परिस्थितियों में अपेक्षित स्पष्टता, पारदर्शिता और संस्थागत जिम्मेदारी नहीं दिखाई’। समिति ने आगे कहा कि ‘कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई पर विचार किया जा सकता है’।

समिति ने यह भी कहा कि मामले से जुड़े महत्वपूर्ण सबूतों को सही तरीके से सुरक्षित नहीं रखा गया। बाद में जो बाकी नकदी गायब हो गई, उसके बारे में भी पूर्व जस्टिस वर्मा कोई स्पष्टीकरण नहीं दे सके।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में पूर्व जस्टिस वर्मा के खिलाफ FIR दर्ज करने और कोर्ट की निगरानी में जाँच कराने की माँग वाली याचिका खारिज कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह याचिका ‘सस्ती लोकप्रियता’ हासिल करने के लिए दायर की गई थी।

अब जाँच समिति की रिपोर्ट में लगाए गए निष्कर्षों के बाद यह सवाल उठ रहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व जस्टिस वर्मा के खिलाफ आपराधिक जाँच की अनुमति क्यों नहीं दी। खासकर तब, जब उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया है। सवाल यह भी है कि इस्तीफा देने के बाद पूर्व जस्टिस वर्मा पर आम व्यक्ति की तरह अदालत में मुकदमा क्यों नहीं चलना चाहिए?

पूर्व जस्टिस वर्मा ने उनके खिलाफ इन-हाउस जाँच शुरू होने के बाद अप्रैल में इस्तीफा दे दिया था। नकदी मिलने के मामले में उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों की जाँच के लिए लोकसभा द्वारा गठित जजेज इन्क्वायरी कमेटी की कार्यवाही से भी उन्होंने खुद को अलग कर लिया था।

दिलचस्प बात यह है कि इस्तीफा देकर जस्टिस यशवंत वर्मा ने संसद में महाभियोग की प्रक्रिया से बचते हुए अपने रिटायरमेंट लाभ सुनिश्चित कर लिए। पूर्व जस्टिस वर्मा के खिलाफ आरोप 14 मार्च 2025 को सामने आए थे। उस समय नई दिल्ली के तुगलक क्रिसेंट स्थित उनके सरकारी बंगले के एक स्टोररूम में आग लगने के बाद वहाँ बड़ी मात्रा में नकदी मिली थी।

उस समय जस्टिस वर्मा दिल्ली हाईकोर्ट के जज थे। आग बुझाने पहुँचे दमकलकर्मियों और पुलिस अधिकारियों ने बताया था कि उन्होंने स्टोररूम में ₹500 के नोटों की गड्डियाँ देखीं। इनमें कुछ नोट जल रहे थे, कुछ आधे जले हुए थे और कुछ फर्श पर बिखरे पड़े थे।

इस घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट ने एक इन-हाउस जाँच पैनल बनाया था। पैनल ने अपनी जाँच में पाया कि वहाँ वास्तव में नकदी मिली थी और जस्टिस वर्मा का उस स्टोररूम पर ‘गुप्त या सक्रिय नियंत्रण’ (covert or active control) था।

जस्टिस वर्मा ने शुरुआत में मई 2025 में अपने इस्तीफे की माँग को ठुकरा दिया था। इसके बाद भारत के मुख्य न्यायाधीश ने उन्हें पद से हटाने की सिफारिश की। अगस्त 2025 में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 140 से अधिक सांसदों के हस्ताक्षर वाले महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया था। इसके बाद आरोपों की जाँच के लिए तीन सदस्यीय जाँच समिति का गठन किया गया।