‘हमारे लिए वो एक इंस्पिरेशन है, वो एक रेवोल्यूशनरी है, एक बड़ा स्कॉलर है। एक ऐसा इंसान है जिसने अपनी आजादी, अपनी जिंदगी बहुत कुछ कुर्बान किया’… ये बयान है, आरफा खानम शेरवानी का। आपको लगेगा किसी स्वतंत्रता के किसी बड़े नायक की चर्चा हो रही है लेकिन ठहरिए… जहाँ यह भाषणबाजी हो रही थी वो मौका था- उमर खालिद के जन्मदिन का और दिल्ली के प्रेस क्लब में वामपंथियों का मजमा लगा था।
मंगलवार (11 अगस्त 2026) को प्रेस क्लब में उमर खालिद की किताब ‘फ्रैक्चर्ड कम्युनिटीज़: आदिवासी हिस्ट्रीज एंड द पॉलिटिक्स ऑफ पावर’ पर चर्चा हुई, चर्चा क्या, वामपंथियों का प्रोपेगेंडा ही फैलाया जा रहा था। इसमें अपूर्वानंद झा, प्रोफेसर प्रभु महापात्रा, आरफा खानुम शेरवानी और ‘द वायर’ के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन समेत कई वामपंथी मौजूद थे और हर कोई उमर की शान में कसीदे ही पढ़ रहा था।
और सबसे ज्यादा जोश में, जैसा की उम्मीद ही थी, आरफा ही नजर आई। आरफा के भाषण से अगर उमर का नाम हटाकर उसे सुनें तो लगेगा कि किसी बड़े स्वतंत्रता सेनानी को याद किया जा रहा है, किसी क्रांतिकारी का गुणगान किया जा रहा है। लेकिन उमर खालिद कौन? दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगों का आरोपित, उमर खालिद कौन? जो 6 साल से जेल में UAPA के तहत बंद है, उमर खालिद कौन? जिसे पर लगे आरोप इतने गंभीर हैं कि देश की अदालतें जमानत तक देना मुनासिब नहीं समझ रही हैं। वही उमर खालिद, आरफा जैसे इन वामपंथियों का पोस्टर ब्वॉय है।
सिर्फ इतना ही नहीं, यही आरफा उमर को एक त्यौहार की तरह मानाना चाहती है, उसकी ‘शान’ में गजल पढ़ रही है। आरफा अपने भाषण में आगे कहती हैं, “एक तरह से त्यौहार के तौर पर, हर कुछ दिन बाद उमर को मनाने का एक त्यौहार, एक कार्निवल के तौर पर… उमर की आजादी का, उमर की स्कॉलरशिप का, उमर की कुर्बानी का, उमर के जज्बे का, उमर के इंकलाब… का जश्न मनाने के लिए हम सब यहाँ पर मौजूद हैं। ये काम उमर के दोस्त करते हैं, मैं बहुत-बहुत शुक्रिया उमर के दोस्तों का अदा करना चाहती हूँ।”
आरफा ने अमीर कजलबाश की गजल के जो शेर पढ़े, उनका मोटा-मोटी मानी यही है कि अगर आवाज को जबरदस्ती दबाया जाता है, तो वह दबती नहीं है बल्कि एक भयानक तूफान या क्रांति का रूप लेकर वापस आती है। यानी, वही कहानी जो वो उनका वामपंथी ‘ईकोसिस्टम’ वर्षों से गढ़ रहा है।
HAPPY BIRTHDAY UMAR
— Arfa Khanum Sherwani (@khanumarfa) August 11, 2026
It is his 6th Birthday in jail
मक़तल में दबाना जो चाहा, फिर ज़ुल्म का क़िस्सा जाग उठा,
हम ज़ख़्म छुपा कर बैठ गए,तो ख़ून का दरिया जाग उठा।
हम दिल का फ़साना कह न सके,और आख़िर-ए-शब तक रो न सके,
जब ख़ामोशी ने दम तोड़ा,इक महश़र-ए-बरपा जाग उठा
अमीर कज़लबाश pic.twitter.com/cU0sbEVcGd
आरफा ने जो प्रोपेगेंडा किया सो किया, जो रोना रोया सो रोया लेकिन उन्होंने अदालतों को भी नहीं छोड़ा। वो कहती हैं, “अगर उमर गुनहगार है तो उसे फाँसी पर चढ़ा दीजिए। भारत के कानून के तहत उमर के ऊपर जो धाराएँ हैं, उसमें जितनी सबसे सख्त जो सजा हो उमर को वो दीजिए। लेकिन सिर्फ मेरी एक इल्तजा, एक गुजारिश, एक सिर्फ अपील ये होगी हमारे जज साहिबान से कि आप एक बार उसका केस शुरू कर दीजिए। अब तो ये हो गया है कि हमारी जो उच्च अदालतें हैं, वो भी दबाव में काम कर रही हैं।”
उमर को जेल से बाहर निकाले जाने को लेकर आरफा कहती हैं, “एक राजनीतिक फैसला है। अगर ये कानूनी फैसला होता तो हम कहते कि भई 4 वकीलों को बिठा लीजिए और जिरह कर लेते हैं, गवाह-सबूत पेश करते हैं और उसके बाद देख लेते हैं। मैं तो कहती हूँ कि अगर उमर गुनहगार है तो उसे फाँसी पर चढ़ा दीजिए। भारत के कानून के तहत उमर के ऊपर जो धाराएँ हैं उसमें जितनी सबसे सख्त जो सजा हो उमर को वो दीजिए। लेकिन सिर्फ मेरी एक इल्तजा, एक गुजारिश, एक सिर्फ अपील ये होगी हमारे जज साहिबान से कि आप एक बार उसका केस शुरू कर दीजिए।”
Senior journalist Arfa Khanum Sherwani has called for the trial of former JNU student Umar Khalid to begin, saying that his continued detention without the case moving forward raises serious questions about the legal process.
— The Observer Post (@TheObserverPost) August 11, 2026
Speaking to The Observer Post on the sidelines of a… pic.twitter.com/32Z0kB4CVi
सुनने में आपको लगेगा कि भई बात तो सही है लेकिन असली बात वो है जो इसके पीछे छिपी है। ऑपइंडिया ने पहले भी बताया था कि कैसे यह सारा खेल उमर खालिद और उसके वकीलों द्वारा खेला जा रहा है। उमर खालिद मामले में कोर्ट द्वारा देर की ही नहीं जा रही, ये सारा विलंब याचिका डालने और फिर उसे वापस लेने में चक्कर में हो रहा है।
दरअसल, सत्र न्यायालय मे 8 माह के भीतर ही खालिद की याचिका खारिज की थी, फिर हाईकोर्ट ने 6 महीने में। इसके बाद वो जब सुप्रीम कोर्ट गया तो 14 में से 7 बार मामला उसके वकील के कारण स्थगित हुआ। उमर खालिद के मामले में सुनवाई के लिए कपिल सिब्बल ‘फोरम शॉपिंग’ के जरिए अपनी किस्मत आजमा रहे थे। (फोरम शॉपिंग तब होती है जब कोई पक्ष किसी ऐसे न्यायालय या न्याय क्षेत्र को चुनता है जिसके बारे में उन्हें लगता है कि वह उनके पक्ष में फैसले दे सकते हैं।)
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने खुद एक इंटरव्यू में कहा था कि उमर खालिद को जो बेल नहीं मिली है उसकी वजह कोई और नहीं बल्कि खुद उमर खालिद और उनके वकील हैं जिन्होंने कोर्ट में बेल याचिकाएँ लंबित रहने के दौरान ही कम से कम 7 बार मामले में एडजर्न कराया। यानी जिस बात को आरफा अदालत पर डाल कर अपने ‘हीरो’ को बचाने की जुगत लगा रही हैं वो प्रोपेगेंडा पहले ही फेल हो चुका है। अब आगे बढ़ते हैं।
उमर खालिद इन वामपंथियों का अकेला पोस्टर ब्यॉय नहीं है। बस आपको ‘टुकड़े-टुकड़े’ वाली मानसिकता लानी है, देश का विरोध करना है ये आपकी जय-जयकार… या यूँ कहें कि आपको ‘लाल सलाम’ करने लगेंगे। इन्ही आरफा का एक चहेता था- AAP का पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन। वही, ताहिर जिसको दिल्ली दंगों के दौरान IB कर्मी अंकित शर्मा की हत्या के मामले में कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनाई है।
आपको शायद ना याद हो लेकिन यह ताहिर हुसैन भी कभी, आरफा जैसों का पोस्टर ब्वॉय था। आरफा खानम ने ताहिर हुसैन का इंटरव्यू तक किया था। यह तब किया गया जब दिल्ली पुलिस ताहिर हुसैन की तलाश कर रही थी। आरफा ने दंगाई ताहिर को कानून का पालन करने वाला नागरिक दिखाने की कोशिश की। उसने X पर इस इंटरव्यू को शेयर करते हुए लिखा था, “कोर्ट द्वारा आत्मसमर्पण याचिका रद्द कर दी गई है। ताहिर हुसैन को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।” ताहिर हुसैन ने ‘द वायर’ से कहा था, “मुझे अपनी न्यायिक व्यवस्था पर पूरा भरोसा है। कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने जा रहा हूँ।”
Surrender plea rejected by the court.
— Arfa Khanum Sherwani (@khanumarfa) March 5, 2020
Tahir Hussain is arrested by Delhi Police.
“Have full faith in the justice system of my country…Am surrendering before the court today.”
Tahir Hussain told this to @thewire_in this morning
Watch full interview herehttps://t.co/ldXjssoJwa
इसी ताहिर हुसैन ने न्यायिक हिरासत के दौरान अपना गुनाह कबूला था। उसने खुलासा करते हुए बताया था कि वो CAA के समर्थकों को सबक सिखाना चाहता था। ये बात सिर्फ ताहिर हुसैन और उमर खालिद तक की सीमित नहीं है, ऐसे दर्जनों नाम आपको मिल जाएँगे।
सवाल अब सिर्फ उमर खालिद के जन्मदिन पर हुई बयानबाजी का नहीं है। सवाल उस पूरे वैचारिक कारोबार का है जिसमें अदालत का फैसला आने से पहले ही किसी आरोपित को ‘क्रांतिकारी’ बना दिया जाता है। लोकतंत्र में किसी को कानूनी अधिकार मिलना चाहिए, इस पर शायद ही किसी को आपत्ति हो सकती है। लेकिन कानूनी प्रक्रिया की आड़ में किसी आरोपित का महिमामंडन करना ईमानदार बहस नहीं बल्कि प्रोपेगेंडा का हिस्सा ही होता है।
अदालत पर सवाल उठाना आसान है लेकिन क्या अपनी तरफ की पूरी कहानी भी जनता के सामने रखी जाएगी? क्या यह बताया जाएगा कि मामले की सुनवाई में देरी किन परिस्थितियों में हुई, किस पक्ष की ओर से कितनी बार स्थगन माँगा गया और अदालतों में अब तक क्या-क्या हुआ? या फिर हर बार एक ही सुविधाजनक कहानी सुनाई जाएगी।
इससे भी बड़ा सवाल उस ‘पोस्टर बॉय’ संस्कृति का है, जिसमें राजनीतिक विचारधारा के हिसाब का ‘किरदार’ मिलते ही पूरा इकोसिस्टम उसके लिए शब्दों का ऐसा महल खड़ा कर देता है कि आरोप, मुकदमा और पीड़ितों की चर्चा पीछे छूट जाती है। कभी ‘क्रांतिकारी’, कभी ‘प्रतिरोध की आवाज’, कभी ‘कुर्बानी’… शब्द बदलते रहते हैं लेकिन पैटर्न वही रहता है। किसी के खिलाफ आरोप हैं तो अदालत तय करेगी कि वह दोषी है या नहीं, लेकिन अदालत के फैसले से पहले उसे वैचारिक शहीद बना देना किस तरह का निष्पक्ष विमर्श है?


