मानसून के आते ही भारत के मानचित्र पर हर साल दो बेहद अलग और परेशान करने वाली तस्वीरें एक साथ उभरती हैं। एक तरफ असम में ब्रह्मपुत्र, बिहार और उत्तर प्रदेश में कोसी, गंडक और गंगा नदियाँ अपने किनारों को तोड़ती हुई लाखों जिंदगियों को बेघर कर देती हैं, तो दूसरी तरफ महाराष्ट्र का मराठवाड़ा, राजस्थान का थार, गुजरात का कच्छ और मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड पानी की एक-एक बूँद के लिए तरसता दिखाई देता है। जब देश के एक हिस्से में लोग नावों पर राशन का इंतजार कर रहे होते हैं, ठीक उसी वक्त दूसरे हिस्से में पानी के सरकारी टैंकरों के पीछे लंबी कतारें लगी होती हैं।
बाढ़ और सूखे की इसी दोहरी त्रासदी को खत्म करने के लिए भारत सरकार ने ‘राष्ट्रीय जल ग्रिड’ (National Water Grid) यानी ‘नदी जोड़ो परियोजना’ (Interlinking of Rivers – ILR) को 21वीं सदी का सबसे बड़ा ढाँचागत संकल्प बनाया है।
इस विशाल परिकल्पना की पहली व्यावहारिक प्रयोगशाला बनी है-‘केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट’ (Ken-Betwa Link Project – KBLP)। लेकिन जुलाई 2026 की मीडिया रिपोर्ट्स यह साफ बता रही हैं कि कागजी नक्शों पर नदियाँ जोड़ना जितना सीधा नजर आता है, धरातल पर इंसानों, जंगलों और नदियों की प्रकृति को जोड़ना उतना ही मुश्किल काम है।

बीते कुछ समय से बुंदेलखंड के छतरपुर और पन्ना जिलों में बने ‘दौधन बाँध’ (Daudhan Dam) के डूब क्षेत्र को लेकर भड़का जनाक्रोश इस योजना की सबसे कमजोर कड़ी को उजागर करता है। दौधन गाँव के आसपास रहने वाले जनजातीय लोग और स्थानीय ग्रामीण पिछले कई महीनों तक सड़कों पर रहे।
आरोप हैं कि बाँध निर्माण के कारण विस्थापित होने वाले हजारों परिवारों को पुनर्वास (Rehabilitation) और मुआवजे (Compensation) के नाम पर केवल खोखले आश्वासन मिले हैं। स्थानीय स्तर पर मुआवजे के वितरण में भ्रष्टाचार (Compensation Scam) और जमीनों के गलत मूल्यांकन की खबरों ने ग्रामीणों के भीतर भारी असंतोष भर दिया है।
इसके अलावा पन्ना टाइगर रिजर्व (Panna Tiger Reserve) के कोर एरिया में बसे दौधन, खरयानी और पचमढ़ी जैसे गाँवों के जनजातीय लोग अपनी पुश्तैनी जमीन छोड़ने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि जल सुरक्षा का यह पूरा खाका उनके वजूद की कीमत पर तैयार किया जा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स से यह बात सामने आई है कि राहत और पुनर्वास की राजनीति ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना को एक जटिल राजनीतिक और सामाजिक दलदल में धकेल दिया है।
पर्यावरणविदों का तर्क है कि पन्ना के घने जंगलों का डूबना, लाखों पेड़ों की कटाई और बाघों के प्राकृतिक आवास का नष्ट होना एक ऐसी भरपाई है जिसकी कीमत कोई भी नहर चुका नहीं सकती। वहीं दूसरी ओर केंद्र और राज्य सरकारों का दृढ़ विश्वास है कि यदि बुंदेलखंड के 62 लाख से अधिक लोगों को स्थाई पेयजल और सिंचाई का पानी देना है, तो इस तरह के कड़े और बड़े फैसले लेना वक्त की सबसे बड़ी जरूरत है।
यही वह ऐतिहासिक मोड़ है जहाँ भारत की नदी जोड़ो योजना खड़ी है। क्या यह योजना भारत में सूखे और बाढ़ के स्थायी समाधान की जल क्रांति (Water Revolution) बनेगी, या फिर यह सामाजिक विस्थापन, नौकरशाही की लापरवाही और पर्यावरणीय तबाही का नया जरिया बनकर रह जाएगी?

इस सवाल को गहराई से समझने के लिए हमें सबसे पहले यह जानना होगा कि आखिर भारत को अपनी नदियों को आपस में जोड़ने की जरूरत क्यों पड़ी और इस योजना का ऐतिहासिक ढाँचा किस तरह तैयार हुआ।
आखिर क्यों पड़ी नदियों को जोड़ने की जरूरत?
भारत के भूगोल (Geography) और मौसम की प्रकृति को अगर बारीकी से समझा जाए, तो एक बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि हमारे देश में पानी की कुल मात्रा में कोई प्राकृतिक कमी नहीं है। असली समस्या पानी के प्रबंधन (Water Management) और उसके असमान वितरण की है।
भारत में मानसूनी बारिश की अपनी एक अलग विशिष्टता (Peculiarity) है। पूरे साल में जितनी बारिश होती है, उसका लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा केवल जून से सितंबर के चार महीनों में गिरता है। इसका सीधा मतलब यह है कि साल के 12 महीनों के इस्तेमाल के लिए पानी हमें केवल 100 से 120 दिनों के भीतर ही प्राप्त होता है। जब इतना विशाल जलप्रवाह बहुत छोटे समय में नदियों में उमड़ता है, तो नदी बेसिनों की धारण क्षमता (Carrying Capacity) जवाब दे जाती है।

नदियाँ जब पहाड़ों से मैदानों की ओर आती हैं, तो अपने साथ करोड़ों टन मिट्टी और गाद (silt) बहाकर लाती हैं। यह गाद धीरे-धीरे नदियों की तलहटी में जमा होती जाती है, जिससे नदियों का पेट छिला हो जाता है। ऐसे में जब मानसून के दौरान अचानक अत्यधिक बारिश होती है, तो पानी नदी के पाटों को तोड़कर आसपास के सैकड़ों गाँवों और शहरों को डुबो देता है। बिहार में कोसी नदी को इसीलिए ‘बिहार का शोक’ (Sorrow of Bihar) कहा जाता है, क्योंकि वह हर साल अपना मार्ग बदलकर तबाही मचाती रही है।
दूसरी ओर देश का दूसरा पहलू बिल्कुल उलट है। पश्चिमी भारत का राजस्थान और गुजरात, मध्य और दक्षिणी भारत के पठारी क्षेत्र जैसे महाराष्ट्र का विदर्भ व मराठवाड़ा, कर्नाटक का उत्तरी क्षेत्र, आंध्र प्रदेश का रायलसीमा और मध्य प्रदेश-उत्तर प्रदेश का साझा बुंदेलखंड इलाका वर्षा-छाया क्षेत्र (Rain Shadow Zone) या कम बारिश वाले इलाकों में आते हैं। यहाँ यदि मानसून किसी एक साल थोड़ा भी कमजोर रह जाए या समय पर न पहुँचे, तो भूजल स्तर (Groundwater Level) सैकड़ों फीट नीचे चला जाता है।
कुओं का सूखना, हैंडपंपों का हवा देना, फसलों का जल जाना और मवेशियों का दाने-पानी के अभाव में मर जाना इन इलाकों की रोजमर्रा की नियति बन जाता है। यहाँ का किसान कर्ज के बोझ तले दबकर पलायन (Migration) करने पर मजबूर हो जाता है।

जब देश का एक हिस्सा पानी की अधिकता से डूब रहा हो और दूसरा हिस्सा बूँद-बूँद को तरस रहा हो, तो यह प्राकृतिक असंतुलन देश के आर्थिक और सामाजिक विकास में सबसे बड़ी रुकावट बनकर सामने आता है। इसी प्राकृतिक विषमता (natural inequality) को संतुलित करने के लिए ‘अधिशेष बेसिन’ (Surplus Basin) से पानी को उठाकर ‘कमी वाले बेसिन’ (Deficit Basin) तक पहुँचाने की सोच ने जन्म लिया।
समुद्र में बह जाता है अरबों घनमीटर मीठा पानी: आँकड़ों में जल बर्बादी
भारत के जल संसाधनों का हाइड्रोलॉजिकल डेटा (Hydrological Data) एक बहुत ही चौंकाने वाली सच्चाई उजागर करता है। केंद्रीय जल आयोग (Central Water Commission – CWC) के आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, भारत में हर साल बारिश और बर्फबारी के रूप में औसतन करीब 4,000 अरब घनमीटर (Billion Cubic Meters – BCM) पानी प्राप्त होता है।
हालाँकि इस 4,000 BCM पानी में से वाष्पीकरण (Evaporation), जमीन में प्राकृतिक रूप से रिसने और दुर्गम भौगोलिक सीमाओं के कारण हम केवल 1,123 BCM पानी का ही उपयोग करने की स्थिति में होते हैं। इस Usable Water (उपयोग योग्य पानी) में से भी लगभग 690 BCM सतही जल (Surface Water) के रूप में उपलब्ध है और 433 BCM भूजल (Groundwater) के रूप में।
मानसूनी नदियों का सबसे बड़ा कड़वा सच यह है कि हर साल लगभग 1,500 से 2,000 अरब घनमीटर मीठा पानी बिना किसी मानवीय, कृषि या औद्योगिक उपयोग के उफनती नदियों के जरिए बहकर समुद्र के खारे पानी में मिल जाता है। जल विशेषज्ञों का मानना है कि समुद्र में मिलने वाला यह पानी बर्बादी नहीं बल्कि नदी के प्राकृतिक पारितंत्र (Estuary Ecosystem) को बनाए रखने के लिए कुछ हद तक जरूरी है, लेकिन इसका एक बड़ा हिस्सा रोककर जरूरतमंद इलाकों में भेजा जा सकता है।

यदि इस बेकार बह जाने वाले मानसूनी जल का केवल 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा भी सही वैज्ञानिक तकनीकों, जलाशयों (Reservoirs) और लिंक नहरों (Link Canals) के जरिए मोड़ लिया जाए, तो देश में न केवल 3.5 करोड़ हेक्टेयर अतिरिक्त कृषि भूमि को पानी दिया जा सकता है, बल्कि देश के हर शहर और गाँव को 24 घंटे पीने का साफ पानी मुहैया कराया जा सकता है।
क्या भारत में सचमुच पानी की कमी है या समस्या उसके वितरण की है?
नीतिगत और वैज्ञानिक धरातल पर अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि क्या भारत सचमुच एक ऐसा देश बनता जा रहा है जहाँ पानी खत्म हो रहा है? इसका तकनीकी जवाब है-नहीं। भारत में पानी की कुल मात्रा घटी नहीं है, बल्कि हमारी जनसंख्या विस्फोट, शहरीकरण (Urbanization) और जल के कुप्रबंधन (Mismanagement) की वजह से प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता (Per Capita Water Availability) में भारी गिरावट आई है।
साल 1951 में भारत में प्रति व्यक्ति वार्षिक जल उपलब्धता लगभग 5,177 घनमीटर थी। वर्ष 2011 की जनगणना तक यह घटकर 1,545 घनमीटर रह गई और वर्तमान में इसके 1,400 घनमीटर से भी नीचे आने का अनुमान है। अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार, जब किसी देश में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 1,700 घनमीटर से कम हो जाती है, तो उसे ‘वाटर स्ट्रेस्ड’ (Water-Stressed) यानी जल तनावग्रस्त स्थिति माना जाता है। यदि यह आँकड़ा 1,000 घनमीटर से नीचे चला जाए, तो उसे ‘वाटर स्कैर्स’ (Water-Scarce) यानी भीषण जल संकट माना जाता है।

असली चुनौती प्रति व्यक्ति घटते आँकड़ों से भी ज्यादा स्थानगत (Spatial) और समयगत (Temporal) असंतुलन की है, जिसमें-
मौजूदा जगह का असंतुलन (Spatial Imbalance): ब्रह्मपुत्र और गंगा नदी बेसिन में देश के कुल जल संसाधनों का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा मौजूद है, जबकि उनका भूमि क्षेत्र देश के कुल क्षेत्रफल का केवल एक-तिहाई है। इसके विपरीत, दक्षिण और पश्चिम की नदियाँ (जैसे कृष्णा, कावेरी, साबरमती) देश के बड़े भूभाग को सींचती हैं लेकिन उनमें जल प्रवाह काफी कम है।
भंडारण क्षमता का अभाव (Lack of Water Storage): विकसित देशों की तुलना में भारत अपनी नदियों के पानी को सहेजने यानी स्टोरेज कैपेसिटी (Storage Capacity) के मामले में बहुत पीछे है। अमेरिका अपनी नदियों का प्रति व्यक्ति औसतन 5,960 घनमीटर और ऑस्ट्रेलिया 4,730 घनमीटर पानी बड़े बांधों में स्टोर कर सकता है। इसके मुकाबले भारत की प्रति व्यक्ति जल भंडारण क्षमता केवल 225 घनमीटर के आसपास है।
इसलिए समस्या यह नहीं है कि भारत के पास पानी नहीं है; समस्या यह है कि हमारे पास पानी को सही जगह पर रोकने, उसे जरूरत वाले इलाकों तक भेजने और उसका कुशलतापूर्वक उपयोग करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एकीकृत तंत्र (Integrated Grid) का अभाव रहा है।
आजादी के बाद से कैसे बढ़ा नदी जोड़ने का विचार
नदियों को आपस में जोड़ने की अवधारणा कोई आधुनिक विचार नहीं है। इसका एक लंबा और दिलचस्प इतिहास रहा है जो औपनिवेशिक काल से शुरू होकर आधुनिक भारत तक फैला हुआ है।
सर आर्थर कॉटन की शुरुआती सोच (19वीं सदी): 19वीं सदी के मध्य में प्रसिद्ध ब्रिटिश सिंचाई इंजीनियर सर आर्थर कॉटन (Sir Arthur Cotton) ने सबसे पहले दक्षिण भारत की प्रमुख नदियों को जोड़ने का विचार रखा था। सर आर्थर कॉटन ने ही गोदावरी और कृष्णा नदियों पर एनिकिट (Barrages) का निर्माण कराया था।
उनका प्राथमिक उद्देश्य सिंचाई से ज्यादा नौवहन यानी जलमार्ग (Navigation) विकसित करना था। उस समय भारत में रेलवे नेटवर्क का विकास शुरुआती चरण में था और ईस्ट इंडिया कंपनी के माल को देश के आंतरिक हिस्सों से बंदरगाहों तक ढोने के लिए नदियों को जोड़कर एक जलमार्ग नेटवर्क बनाना सबसे सस्ता विकल्प माना गया था। हालाँकि अंग्रेजों का ध्यान मुख्य रूप से औपनिवेशिक लाभ पर था, इसलिए यह योजना कभी व्यापक रूप से लागू नहीं हो सकी।
आजादी के बाद की विशाल नदी घाटी परियोजनाएँ: 1947 में आजादी के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती देश की विशाल आबादी के लिए खाद्यान्न सुरक्षा (Food Security) सुनिश्चित करना और बार-बार पड़ने वाले अकाल (Famines) से निपटना था। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बहुउद्देशीय बांधों (Multipurpose Dams) को ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ कहा।
1950 और 1960 के दशकों में भाखड़ा-नांगल (सतलुज नदी), हीराकूद (महानदी), दामोदर घाटी परियोजना (DVC) और नागार्जुन सागर जैसी विशाल परियोजनाओं पर काम शुरू हुआ। इन परियोजनाओं ने यह साबित कर दिया कि नदियों पर बड़े बाँध बनाकर बाढ़ नियंत्रण, बिजली उत्पादन और बड़े पैमाने पर नहरों के जरिए सिंचाई संभव है। लेकिन ये सभी परियोजनाएँ एक ही नदी या उसके बेसिन तक सीमित थीं। एक बेसिन से दूसरे बेसिन में बड़े पैमाने पर पानी ले जाने का विचार अभी भी शुरुआती चरण में ही था।
डॉ. KL राव से लेकर Garlands Canal तक: दो ऐतिहासिक प्रयासों के बारे में जानना जरूरी
डॉ. के.एल. राव का ‘नेशनल वाटर ग्रिड’ (1970 का दशक): भारत के महान सिविल इंजीनियर और तत्कालीन केंद्रीय सिंचाई और विद्युत मंत्री डॉ. के.एल. राव (Dr. K.L. Rao) ने वर्ष 1972 में ‘नेशनल वाटर ग्रिड’ (National Water Grid) का एक बेहद साहसी और दूरगामी प्रस्ताव देश के सामने रखा। डॉ. राव को भारतीय जल प्रबंधन का पितामह भी कहा जाता है।
डॉ. के.एल. राव की योजना का सबसे मुख्य आकर्षण था- ‘गंगा-कावेरी लिंक’ (Ganga-Cauvery Link)।
- डॉ. राव का प्रस्ताव था कि मानसून के दौरान जब गंगा नदी में पटना के पास (सोनभद्र के संगम स्थल के निकट) भारी मात्रा में अतिरिक्त पानी बहता है, तब वहाँ से लगभग 60,000 क्यूसेक पानी को पंपों के जरिए लिफ्ट (Lift) किया जाए।
- इस पानी को लिफ्ट करके दक्षिण की ओर बढ़ाया जाना था। इसे विंध्याचल और सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं को पार कराते हुए नर्मदा, तापी, गोदावरी, कृष्णा और पेनार नदियों से जोड़ते हुए अंत में तमिलनाडु की कावेरी नदी तक पहुँचाया जाना था।
- यह नहर लगभग 2,640 किलोमीटर लंबी होनी थी। इसमें पानी को लगभग 550 मीटर (1,800 फीट) की ऊँचाई तक लिफ्ट करने के लिए भारी मात्रा में बिजली की आवश्यकता थी।
योजना क्यों खारिज हुई? केंद्रीय जल आयोग (CWC) और अंतरराष्ट्रीय जल विशेषज्ञों ने जब डॉ. राव की इस योजना का गहन तकनीकी और आर्थिक अध्ययन किया, तो पाया कि-
- इस योजना में जितनी बिजली पानी को लिफ्ट करने में खर्च होगी (लगभग 5,000 से 7,000 मेगावाट), उतनी बिजली उस समय पूरे देश में आसानी से उपलब्ध नहीं थी।
- योजना की वित्तीय लागत (financial cost) उस समय के भारत के कुल राष्ट्रीय बजट से भी अधिक बैठती थी।
- उत्तर भारत से दक्षिण भारत तक पानी ले जाने में रास्ते के राज्यों के बीच गंभीर जल विवाद (water disputes) खड़े होने की पूरी आशंका थी।
इन्हीं कारणों से सरकार ने इसे व्यावहारिक (Feasible) न मानकर ठंडे बस्ते में डाल दिया।
कैप्टन दस्तूर का ‘गारलैंड केनाल सिस्टम’ (1977): डॉ. के.एल. राव के प्रस्ताव के कुछ ही साल बाद 1977 में एक एयरलाइंस पायलट और इंजीनियर कैप्टन दिनशॉ जे. दस्तूर (Captain Dinshaw J. Dastur) ने ‘गारलैंड केनाल सिस्टम‘ (Garland Canal System) का एक और काल्पनिक और जटिल विचार पेश किया।
हिमालयन गारलैंड केनाल (Himalayan Garland Canal): यह नहर हिमालय की तलहटी में रवी नदी से शुरू होकर ब्रह्मपुत्र और उससे आगे तक लगभग 4,200 किलोमीटर लंबी बननी थी।
सेंट्रल एंड साउर्दर्न गारलैंड केनाल (Central and Southern Garland Canal): यह नहर मध्य और दक्षिण भारत के पठार को एक घेरे (garland) की तरह चारों तरफ से लपेटते हुए बनाई जानी थी, जिसकी लंबाई करीब 9,300 किलोमीटर होती।
इन दोनों नहरों को आपस में विशाल पाइपलाइनों के जरिए जोड़ा जाना था और बीच-बीच में सैकड़ों छोटे-बड़े कृत्रिम जलाशय (lakes) बनाकर पूरे देश के पानी को नियंत्रित किया जाना था।

ये योजना क्यों खारिज हुई?: भारत सरकार द्वारा गठित विशेषज्ञ समितियों ने इस योजना का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया और इसे पूरी तरह से ‘काल्पनिक और अव्यावहारिक’ (Unrealistic and Impracticable) करार दिया। विशेषज्ञों का मानना था कि भारत की भौगोलिक संरचना, विभिन्न ऊँचाइयों और भू-गर्भीय चट्टानों के बीच इतनी लंबी समतल नहरें बनाना इंजीनियरिंग के दृष्टिकोण से नामुमकिन है।
हालाँकि डॉ. के.एल. राव और कैप्टन दस्तूर के इन दो प्रस्तावों ने भारत सरकार और नीति निर्माताओं को यह अहसास करा दिया कि इस विषय पर एक वैज्ञानिक, व्यावहारिक और चरणबद्ध (phased approach) राष्ट्रीय नीति की सख्त जरूरत है।
National Perspective Plan (NPP) 1980 की नींव
डॉ. राव और कैप्टन दस्तूर के प्रस्तावों के खारिज होने के बाद भारत सरकार के तत्कालीन सिंचाई मंत्रालय (जो आज जल शक्ति मंत्रालय के नाम से जाना जाता है) ने अगस्त 1980 में एक ऐतिहासिक दस्तावेज तैयार किया। इसे ‘नेशनल पर्सपेक्टिव प्लान फॉर वॉटर रिसोर्सेज डेवलपमेंट’ (National Perspective Plan – NPP) नाम दिया गया।
NPP का मुख्य दर्शन यह था कि नदियों के प्राकृतिक प्रवाह और उनके पारिस्थितिक संतुलन (Ecological Balance) से भारी छेड़छाड़ किए बिना, केवल उसी पानी का अंतर-बेसिन स्थानांतरण (Inter-Basin Transfer) किया जाए जो संबंधित नदी बेसिन की अपनी सभी वर्तमान और भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के बाद ‘अधिशेष’ (Surplus) बचे।
NPP के तहत अंतर-बेसिन जल स्थानांतरण के लिए चार मुख्य सिद्धांत तय किए गए-
बेसिन की प्राथमिक प्राथमिकता: जिस नदी बेसिन से पानी लिया जा रहा है, उसकी पेयजल, कृषि, औद्योगिक और पर्यावरण संबंधी जरूरतों को प्राथमिकता दी जाएगी।
केवल अधिशेष जल का स्थानांतरण: पानी केवल तभी स्थानांतरित किया जाएगा जब गहन हाइड्रोलॉजिकल अध्ययनों से यह साबित हो जाए कि बेसिन में जल वास्तव में सरप्लस है।
ग्रेविटी फ्लो को प्राथमिकता: जहाँ तक संभव हो, पानी को गुरुत्वाकर्षण (Gravity Glow) के जरिए बहाकर ले जाया जाए ताकि लिफ्ट पंपिंग में भारी बिजली और ऊर्जा का खर्च न हो।
सहमति और संतुलन: संबंधित राज्यों के हितों की रक्षा की जाएगी और पर्यावरण को कम से कम नुकसान पहुँचाया जाएगा।
भारत में प्रस्तावित 30 नदी जोड़ो परियोजनाओं के बारे में जानिए
राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी (NWDA) द्वारा तैयार किए गए 30 नदियों को जोड़ने का खाका भारत के भूगोल को हमेशा के लिए बदलने की क्षमता रखता है।
इन 30 प्रस्तावों को दो प्रमुख भागों में बाँटा गया है, जिसमें प्रायद्वीपीय घटक और हिमालयी घटक शामिल हैं। प्रायद्वीपीय घटक के तहत कुल 16 प्रस्तावित लिंक हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य महानदी और गोदावरी के अधिशेष जल को कृष्णा, कावेरी और पम्बा जैसी दक्षिण की कमी वाली नदियों में भेजना तथा मध्य भारत के अंतर-बेसिन जल संकट को दूर करना है। इसमें महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, केन, बेतवा, तापी, नर्मदा और दमनगंगा जैसी मुख्य नदियाँ शामिल हैं।

वहीं हिमालयी घटक के तहत कुल 14 प्रस्तावित लिंक हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य नेपाल और पूर्वोत्तर भारत से बहने वाली ब्रह्मपुत्र, कोसी और गंडक जैसी नदियों के विशाल मानसूनी जल को गंगा, यमुना, राजस्थान और पश्चिम भारत तक पहुँचाना है। इसमें ब्रह्मपुत्र, मानस, संकोश, तिस्ता, कोसी, घाघरा, गंडक, गंगा और यमुना जैसी मुख्य नदियाँ शामिल हैं। इन सारे प्रोटेक्ट्स के बारे में रिपोर्ट के तीसरे पार्ट में विस्तार से समझाया गया है।

सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक हस्तक्षेप से खुला रास्ता
नदी जोड़ो योजना कई दशकों तक राजनीतिक अनिच्छा, अंतर-राज्यीय विवादों और नौकरशाही की फाइलों में दबी रही। लेकिन इस सुस्ती को तोड़ने में भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) ने सबसे निर्णायक भूमिका निभाई।
साल 2002 का आदेश और तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. कलाम की सोच: साल 2002 में सीनियर एडवोकेट रंजीत कुमार द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को कड़ा निर्देश दिया। उसी दौरान भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में नदी जोड़ो परियोजना को ‘भारत के जल संकट और गरीबी उन्मूलन का सबसे सशक्त हथियार’ बताया था।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह एक टास्क फोर्स (Task Force on Interlinking of Rivers) का गठन करे और वर्ष 2016 तक सभी 30 लिंकों को पूरा करने के लिए एक समयबद्ध (Time-Bound) कार्ययोजना बनाए। इसके बाद तत्कालीन वाजपेयी सरकार ने पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश प्रभु की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय टास्क फोर्स का गठन किया।
साल 2012 के ऐतिहासिक फैसले के बाद ‘विशेष समिति’ का गठन: वर्ष 2012 में (Networking of Rivers Case में) जस्टिस फकीर मोहम्मद इब्राहिम कलीफुल्ला और जस्टिस स्वतंत्र कुमार की पीठ ने अपना ऐतिहासिक निर्णय सुनाया। अदालत ने माना कि जल सुरक्षा देश के जीवन के अधिकार (Right to Life – Article 21) से सीधी जुड़ी हुई है।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश देते हुए कहा कि केंद्र सरकार तुरंत स्पेशल कमेटी फॉर इंटरलिंकिंग ऑफ रिवर्स (Special Committee for ILR) का गठन करे। केंद्रीय जल शक्ति मंत्री इस समिति के अध्यक्ष होंगे। इसमें राज्यों के सिंचाई/जल संसाधन मंत्री, विभिन्न संबंधित मंत्रालयों (पर्यावरण, वित्त, कानून) के सचिव, NWDA के महानिदेशक और विषय विशेषज्ञ शामिल होंगे।
यह समिति राज्यों के बीच राजनीतिक सहमति बनाने, पर्यावरणीय Clearances (मंजूरियों) में आ रही अड़चनों को दूर करने और परियोजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन की हर महीने निगरानी करने के लिए जिम्मेदार होगी।
सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े और निरंतर रुख का ही नतीजा था कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारों (विशेषकर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश) को बातचीत की मेज पर आना पड़ा। इसी कानूनी दबाव और राजनीतिक इच्छाशक्ति के मिलन से ‘केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट’ का रास्ता साफ हुआ, जो इस पूरी महा-योजना का पहला जमीनी प्रयोग बना।
क्यों 21वीं सदी में पानी ही सबसे बड़ा रणनीतिक संसाधन (Strategic Asset) बनने वाला है?
बीसवीं सदी की वैश्विक भू-राजनीति (Geopolitics) मुख्य रूप से कच्चे तेल (Crude oil) और ऊर्जा संसाधनों पर नियंत्रण को लेकर घूमती रही। खाड़ी युद्धों से लेकर वैश्विक महाशक्तियों के कूटनीतिक गठबंधनों तक, सब कुछ ‘ब्लैक गोल्ड’ यानी तेल के इर्द-गिर्द तय होता था। लेकिन 21वीं सदी में तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। आज विशेषज्ञ एक स्वर में मान रहे हैं कि 21वीं सदी का सबसे बड़ा रणनीतिक संसाधन तेल नहीं, बल्कि ‘ब्लू गोल्ड’ यानी पीने योग्य मीठा पानी (Freshwater) है।
भारत के संदर्भ में जल सुरक्षा (Water Security) का मामला क्यों जीवन-मरण का प्रश्न बन चुका है, इसे कुछ खास बिंदुओं से जरिए समझा जा सकता है-
जलवायु परिवर्तन और अनिश्चित मौसम चक्र (Climate Change Impact): ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालय के ग्लेशियर अभूतपूर्व गति से पिघल रहे हैं। शुरुआती वर्षों में इससे हिमालयी नदियों में विनाशकारी बाढ़ आएगी, और बाद के दशकों में ग्लेशियरों का आकार छोटा होने पर ये बारहमासी नदियाँ मौसमी (Seasonal) नदियों में बदल सकती हैं। दूसरी ओर मानसूनी बारिश का ढर्रा (pattern) बिगड़ चुका है, कम समय में अत्यधिक बारिश (Cloudbursts/Heavy Rainfall Svents) और लंबे समय तक सूखा रहना अब नया सामान्य (New Normal) बन गया है। इस अनिश्चितता से निपटने का एकमात्र तरीका विशाल भंडारण और कुशल जल स्थानांतरण नेटवर्क ही है।
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा पर खतरा (Food Security Danger): भारत की 140 करोड़ से अधिक आबादी के पेट भरने के लिए कृषि उत्पादन को निरंतर बढ़ाना अनिवार्य है। भारत की कृषि आज भी 50 प्रतिशत से अधिक मानसूनी बारिश पर निर्भर है। यदि भूजल स्तर इसी तरह गिरता रहा (जिसका भारत दुनिया में सबसे बड़ा उपभोक्ता है), तो देश के अन्न भंडार कहे जाने वाले पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कृषि संकट गहरा जाएगा। नदी जोड़ो योजना के माध्यम से अतिरिक्त 3.5 करोड़ हेक्टेयर जमीन को सुनिश्चित सिंचाई देकर ही भारत अपनी भावी पीढ़ियों के खाद्यान्न की रक्षा कर सकता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता (National Security & Social Stability): पानी का संकट केवल खेतों तक सीमित नहीं रहता। जब शहरों में नल सूखते हैं (जैसे चेन्नई में ‘डेमो ज़ीरो’ की स्थिति आई थी या बेंगलुरु में हालिया जल संकट), तो सामाजिक अशांति, हिंसा और कानून-व्यवस्था का संकट पैदा होता है। इसके अलावा राज्यों के बीच पानी को लेकर विवाद (जैसे कावेरी विवाद, सतलुज-यमुना लिंक विवाद) देश की आंतरिक एकता और संघीय ढाँचे (Federal Structure) के लिए गंभीर चुनौती बनते हैं। एक पारदर्शी और वैज्ञानिक राष्ट्रीय जल ग्रिड राज्यों के बीच जल-संघर्षों को कम कर सकता है।
औद्योगिक और आर्थिक आत्मनिर्भरता (Economic Growth): भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर और उससे आगे की अर्थव्यवस्था बनाने के लिए विनिर्माण (Manufacturing), ऊर्जा उत्पादन (विशेषकर ग्रीन हाइड्रोजन और सेमीकंडक्टर चिप्स) और शहरीकरण के लिए अरबों गैलन पानी की आवश्यकता होगी। जल उपलब्धता के बिना कोई भी औद्योगिक कॉरिडोर (Industrial Corridor) सफल नहीं हो सकता।
आगे क्या?
नदी जोड़ो योजना की विशाल सैद्धांतिक और कानूनी पृष्ठभूमि को समझने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या यह योजना कागजी नक्शों से बाहर निकलकर धरातल पर वाकई में वैसी ही काम करती है जैसा वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने सोचा था?
इस सवाल का जवाब हमें भारत की सबसे पहली और ऐतिहासिक अंतर-बेसिन जल स्थानांतरण पहल ‘केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट’ (Ken-Betwa Link Project – KBLP) में मिलता है। केन-बेतवा प्रोजेक्ट केवल दो नदियों को जोड़ने की एक इंजीनियरिंग परियोजना नहीं है, बल्कि यह बुंदेलखंड के लाखों प्यासे लोगों की उम्मीदों, पन्ना के घने जंगलों, विस्थापित हो रहे आदिवासियों के दर्द और दौधन बांध के मुआवजे में हो रहे घोटालों की एक बेहद पेचीदा और नाटकीय कहानी है।
Part II में पढ़िए: नदी जोड़ो योजना की इसी दूरदर्शी सोच को धरातल पर उतारने के लिए देश की पहली ऐतिहासिक पहल ‘केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट’ (Ken-Betwa Link Project – KBLP) की शुरुआत हुई। अगले भाग में विस्तार से जानिए कि केन-बेतवा प्रोजेक्ट क्या है, यह तकनीक और इंजीनियरिंग के स्तर पर कैसे काम करेगा, दौधन बाँध निर्माण से प्रभावित पन्ना टाइगर रिजर्व के आदिवासियों और ग्रामीणों के विस्थापन का सच क्या है, मुआवजे के घोटालों की जमीनी हकीकत क्या है और क्या यह प्रोजेक्ट वाकई सूखाग्रस्त बुंदेलखंड की तस्वीर और तकदीर बदलने में कामयाब हो पाएगा…
Part III में पढ़िए: भारत की अन्य प्रमुख नदी जोड़ो परियोजनाएँ, हिमालयी और प्रायद्वीपीय लिंकों का विस्तृत तकनीकी विश्लेषण, हिमाचल-पंजाब-राजस्थान और जम्मू-कश्मीर से जुड़े आधिकारिक प्रस्ताव, दुनिया भर के सबसे बड़े जल स्थानांतरण प्रयोग (जैसे चीन का South–North Water Transfer, अमेरिका का California Water Project, पाकिस्तान का Indus Basin System, स्पेन का Tagus-Segura Transfer और ऑस्ट्रेलिया की Snowy Mountains Scheme) और उनसे भारत के लिए सबक। साथ ही पढ़िए-पर्यावरणीय चुनौतियाँ, विशेषज्ञों का पक्ष-विपक्ष, जलवायु परिवर्तन का असर। इसमें आपको इन सवालों के भी जवाब मिलेंगे कि क्या यह महायोजना भारत की जल क्रांति बनेगी और करोड़ों भारतीयों के जल की जरूरत को पूरा कर पाएगी?


