सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (31 अक्टूबर 2025) को दिल्ली दंगे के ‘बड़ी साजिश’ मामले में उमर खालिद, शरजील इमाम और गुलफिशा फातिमा की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई की। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकीलों कपिल सिब्बल, सिद्धार्थ दवे और अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि आरोपितों को बिना ट्रायल के पाँच साल से ज्यादा जेल में रखा गया है, जबकि उनके खिलाफ हिंसा का कोई ठोस सबूत नहीं है।
दिल्ली पुलिस ने जमानत याचिकाओं का कड़ा विरोध करते हुए 177 पन्नों का हलफनामा दायर किया, जिसमें आरोप लगाया गया है कि यह ‘सत्ता परिवर्तन ऑपरेशन’ और सांप्रदायिक दंगे भड़काने की एक बड़ी साजिश थी। कोर्ट ने अब सुनवाई सोमवार (3 नवंबर 2025) को तय की है, जब अन्य आरोपितों और दिल्ली पुलिस की ओर से भी पक्ष सुना जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं के वकीलों की दलीलें
जानकारी के अनुसार, आरोपित ️गुलफिशा फातिमा के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने इस बात पर जोर दिया कि गुलफिशा फातिमा 5 साल 5 महीने से विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में हैं और अभी तक आरोप तय नहीं हुए हैं। सिंघवी ने कहा कि ट्रायल में असाधारण देरी हुई है, जिससे न्याय प्रणाली विकृत होती है।
सिंघवी ने आगे बताया कि फातिमा इस मामले में हिरासत में अकेली महिला आरोपित हैं, जबकि इसी मामले की अन्य दो महिला आरोपितों (देवांगना कलिता और नताशा नरवाल) को पहले ही जमानत मिल चुकी है। सिंघवी ने तर्क दिया कि फातिमा से जुड़े एंटी-CAA विरोध स्थलों पर कोई हिंसा नहीं हुई और हिंसा से फातिमा को जोड़ने वाला कोई सबूत नहीं है। सिंघवी ने कहा कि WhatsApp ग्रुप बनाने को आपराधिक गतिविधि नहीं माना जा सकता।
वहीं, आरोपित उमर खालिद के वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी कि दंगों के समय उमर खालिद दिल्ली में मौजूद नहीं थे, इसलिए उन्हें हिंसा की साजिश से नहीं जोड़ा जा सकता। सिब्बल ने पुलिस के इस आरोप का खंडन किया कि खालिद ट्रायल में देरी कर रहे हैं और बताया कि ट्रायल कोर्ट में जज के छुट्टी पर रहने या स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर की अनुपलब्धता जैसे कई कारणों से सुनवाई नहीं हो पाई। उमर खालिद पर अमरावती में दिए गए एक भाषण का आरोप है, जिसके बारे में सिब्बल ने कहा कि उसमें गाँधीवादी सिद्धांतों का आह्वान किया गया था और इसे भड़काऊ नहीं माना जा सकता।
इसके अलावा, आरोपित शरजील इमाम के वकील सिद्धार्थ दवे ने कोर्ट को बताया कि शरजील इमाम दंगों से एक महीना पहले, यानी जनवरी 2020 से ही हिरासत में हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि जब वह पहले से ही हिरासत में थे, तो दंगों की साजिश रचने में उनकी क्या भूमिका हो सकती है। वकील सिद्धार्थ ने कहा कि अभियोजन पक्ष को जाँच पूरी करने में 3 साल लग गए और वे अभी भी सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल कर रहे हैं, जिससे ट्रायल में देरी हुई। आरोपित शरजील के वकील ने स्वीकार किया कि इमाम ने CAA विरोधी प्रदर्शनों के लिए ‘चक्का जाम’ का आह्वान किया था, लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि इमाम ने हिंसा का कोई आह्वान नहीं किया था।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश
जानकारी के मुताबिक, जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने शुक्रवार (31 अक्टूबर 2025) को सभी याचिकाकर्ताओं के वकीलों की दलीलें सुनीं। अब यह मामला सोमवार (3 नवंबर 2025) को अन्य सह-आरोपितों (मीरां हैदर, मोहम्मद सलीम खान और शिफा उर रहमान) के वकीलों की दलीलें सुनने और दिल्ली पुलिस का पक्ष जानने के लिए सूचीबद्ध किया गया है।
क्या-क्या हुआ?
यह मामला 2020 में दिल्ली दंगों की कथित ‘बड़ी साजिश’ से संबंधित है, जिसमें 53 लोगों की मौत हुई थी और सैकड़ों घायल हुए थे। आरोपितों पर UAPA और भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। याचिकाकर्ताओं ने दिल्ली हाई कोर्ट के 2 सितंबर के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उनकी जमानत याचिकाएँ खारिज कर दी गई थीं।
उमर खालिद को सितंबर 2020 में गिरफ्तार किया गया था। शरजील इमाम जनवरी 2020 से हिरासत में हैं, जबकि गुलफिशा फातिमा अप्रैल 2020 से जेल में हैं। कई आरोपित 5 साल से अधिक समय से हिरासत में हैं।
वहीं, दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर किया है। पुलिस ने दावा किया है कि उनके पास साजिश के ‘अकाट्य दस्तावेजी और तकनीकी सबूत’ हैं, जो ‘सत्ता परिवर्तन ऑपरेशन’ और देशव्यापी दंगे भड़काने की योजना की ओर इशारा करते हैं।

