अफगानिस्तान भागा कश्मीरी डॉक्टर मुजफ्फर अहमद राठर, दिल्ली ब्लास्ट से जुड़े मॉड्यूल का था मास्टरमाइंड: हजारों किलो विस्फोटक से 1993 के बाद का सबसे बड़ा हमला करने की थी तैयारी

खुफिया एजेंसियों ने खुलासा किया है कि भारत में 1993 के बाद का सबसे बड़ा आतंकी हमला करने की साजिश रचने वाले कश्मीर-आधारित मॉड्यूल का एक अहम सदस्य, पीडियाट्रिशन मुजफ्फर अहमद राठर, अगस्त में अफगानिस्तान भाग गया।

दि प्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार, मुजफ्फर को अफगानिस्तान में मौजूद जिहादियों और कश्मीर के सेल के बीच IED बनाने तथा हमले की तकनीक साझा करने की जिम्मेदारी दी गई थी।
देश छोड़ने से पहले श्रीनगर में रहने वाला मुजफ्फर, सहारनपुर से गिरफ्तार किए गए इस मॉड्यूल के कमांडर डॉक्टर अदील अहमद राठर का बड़ा भाई है।

अदील के लॉकर से जम्मू-कश्मीर पुलिस ने कलाश्निकोव राइफल और गोलियाँ बरामद की हैं। यह जाँच हरियाणा के अल-फलाह अस्पताल से जुड़े डॉक्टरों की संदिग्ध गतिविधियों के बाद शुरू हुई थी।

डॉ उमर उन नबी जिस कार में हुए विस्फोट में मारा गया, उसने मॉड्यूल की योजना का बड़ा हिस्सा उजागर कर दिया। ये वही विस्फोट है जिसने दिल्ली के लाल किला मेट्रो स्टेशन के पास 13 लोगों की जान ली।

जानकारी के मुताबिक, अफगानिस्तान भागने से पहले मुजफ्फर पहले दुबई गया था और अपने परिवार से कहा था कि वह एक सच्चे इस्लामी समाज की सेवा करना चाहता है। एजेंसियों ने यह भी बताया कि मुजफ्फर, प्रोफेसर मुजम्मिल गनी और उमर उन नबी ने मार्च 2022 में तुर्की के रास्ते अफगानिस्तान जाकर सैन्य प्रशिक्षण लेने की कोशिश की थी, जो असफल रही। यह नाकामी उनके लिए एक मनोवैज्ञानिक मोड़ साबित हुई, जिसने घरेलू जिहाद की दिशा में धकेला।

कश्मीरी डॉक्टरों का कट्टर नेटवर्क और हथियारों की सप्लाई

जाँच में सामने आया है कि श्रीनगर के मौलवी इरफान अहमद ने इन डॉक्टरों को अफगानिस्तान के कुनार इलाके के जिहादी कमांडरों से मिलवाया था। उसने नदीम मुज़फ्फर द्वारा छिपाए गए हथियार भी उपलब्ध कराए। नदीम अल-कायदा के कश्मीरी विंग अंसार गजवत-उल-हिंद से जुड़ा था।

इरफान का इस्लामिक स्टडी सर्कल उन धड़ों से प्रभावित था जो धर्म आधारित जिहादी संगठनों के विचारों से प्रेरित थे। तबलीगी जमात से प्रेरित ऐसे कई स्टडी ग्रुप हाल के सालों में बढ़े हैं, जिनमें से कुछ सदस्य कट्टरता की ओर झुक जाते हैं।

फंडिंग का बड़ा हिस्सा लखनऊ की डॉक्टर शाहीन सईद की निजी बचत से आया। 2022 की संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट ने भी पुष्टि की थी कि जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा अफगानिस्तान में ट्रेनिंग कैंप चला रहे हैं।

अदील और उसके भाई एक बेहद पढ़े-लिखे, सम्पन्न परिवार से आते हैं। बहन गौहर ने दि प्रिंट से कहा कि भाइयों के आतंकवाद में शामिल होने पर यकीन करना मुश्किल है।

कई हजार किलो विस्फोटक एकत्रित, हमले की योजना अंतिम चरण में

NIA अधिकारियों के अनुसार, 2021 के बाद अदील के दिमाग में कट्टर विचार तेजी से बढ़े, जिसके बाद उसने अपना गुप्त जिहादी समूह बनाया। शादी, हनीमून और सामान्य दिनचर्या के पीछे वह और उसका मॉड्यूल बड़े हमले की तैयारी कर रहा था।

ग्रुप को टाइमर और गाड़ियाँ मिल गई थीं, लेकिन डेटोनेटर न मिलने की वजह से उन्हें एसिड-फ्यूज वाले अस्थिर बमों पर निर्भर रहना पड़ा। 2009 के मुंबई लोकल बम धमाकों जैसे हमले की तर्ज पर इस मॉड्यूल ने 2022 से अब तक कई हजार किलो अमोनियम नाइट्रेट और दूसरे विस्फोटक रसायन जुटा लिए थे, जो बड़े पैमाने पर नुकसान पहुँचाने के लिए पर्याप्त थे।

जाँच एजेंसियों का मानना है कि मुजफ्फर के अफगानिस्तान भागने का मतलब था कि पूरी साजिश अपने आखिरी चरण में पहुँच चुकी थी और अगर समय रहते यह मॉड्यूल नहीं पकड़ा जाता, तो देश एक और बड़े आतंकी हमले का सामना कर सकता था।