हिंदुओं को बाँटने की कॉन्ग्रेस की एक और साजिश संसद में दिखी है। महाराष्ट्र के नंदुरबार से कॉन्ग्रेस के सांसद गोवाल कागदा पडवी ने लोकसभा में जनजातीय समुदाय को हिंदू धर्म से अलग मानकर उन्हें एक स्वतंत्र धर्म की मान्यता देने की माँग की है। उन्होंने तर्क दिया कि 1931 की ब्रिटिश जनगणना में आदिवासियों को अलग वर्ग में गिना गया था और उनकी संस्कृति किसी स्थापित धर्म में समाहित नहीं होती।
पडवी का कहना था कि अलग धर्म कोड मिलने से आदिवासियों की सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रहेगी और उनकी परंपराओं को संरक्षित किया जा सकेगा। हालाँकि, उनके इस बयान के सामने आते ही सोशल मीडिया पर तीखी बहस शुरू हो गई।
1931 की जनगणना के दौरान जब देश ब्रिटिश शासन में था, तब आदिवासी वर्ग को अलग श्रेणी में गिना गया था। ये श्रेणी सभी प्रमुख धर्मों के साथ बराबरी से सूचीबद्ध थी।
— Congress (@INCIndia) December 3, 2025
ये कहा गया था कि आदिवासियों की विशिष्ट सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान किसी अन्य धर्म के साथ समाहित नहीं होती है।… pic.twitter.com/MTEUN2UoII
कई यूजर्स ने सवाल उठाया कि 1931 की ब्रिटिश नीति फूट डालो और राज करो पर आधारित थी, ऐसे में आज उसके आधार पर देश को फिर से विभाजित करने की माँग क्यों की जा रही है।
कई लोगों ने ऐतिहासिक उदाहरण देते हुए कहा कि जनजातीय परंपराएँ हिंदू समाज से सदियों से जुड़ी हुई हैं और प्रकृति पूजा स्वयं हिंदू परंपरा का मूल हिस्सा है। कुछ यूजर्स ने यह भी आशंका जताई कि अलग धर्म कोड देने से जनजातीय समाज के आरक्षण अधिकार प्रभावित हो सकते हैं और धर्मांतरण का खतरा बढ़ सकता है। अंत में, इस विवाद पर बीजेपी नेताओं ने कहा कि कॉन्ग्रेस का यह बयान समाज को बांटने वाला है और देश की एकता के खिलाफ है।

