हिंदू कोई धर्म नहीं, ‘अपमानजनक’ फारसी शब्द: बॉम्बे HC के पूर्व जज कोलसे पाटिल का हिंदू विरोधी बयान, पहले भी CAA विरोधी रैली में मुसलमानों को हिंसा के लिए उकसाया

कर्नाटक के बीदर जिले के बसवकल्याण में सूफियों के एक सम्मेलन में बॉम्बे हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज बीजी कोलसे पाटिल ने फिर से विवाद खड़ा कर दिया। MLC सलीम अहमद द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम का उद्घाटन पर्यावरण मंत्री ईश्वर खंड्रे ने किया था। उम्मीद थी कि इस कार्यक्र में जहाँ माहौल आध्यात्मिक होना चाहिए था, वहीं पूर्व जज ने मंच का इस्तेमाल हिंदू धर्म पर तीखे हमले के लिए किया।

कोलसे पाटिल ने दावा किया कि हिंदू धर्म कोई धर्म नहीं बल्कि एक फारसी शब्द है जिसे ब्राह्मणों ने समाज को ‘गुलाम बनाने’ के लिए इस्तेमाल किया। उनकी इस टिप्पणी पर तुरंत ही विवाद शुरू हो गया। हालाँकि, यह पहली बार नहीं है जब उन्होंने ऐसा बयान दिया हो।

इसी भाषण में उन्होंने RSS पर भी निशाना साधा और आरोप लगाया कि देश में होने वाले हर दंगे के पीछे RSS ही है, यहाँ तक कि 1984 के सिख दंगे के लिए भी उन्होंने संघ को जिम्मेदार बताया। उन्होंने कहा कि आम लोग ‘डर’ की वजह से आरएसएस के खिलाफ आवाज नहीं उठाते।

कोलसे पाटिल लंबे समय से अपने बयानों के कारण सुर्खियों में रहे हैं। वे लगातार ऐसे भाषण देते रहे हैं जिनमें वे हिंदुओं खास तौर पर ब्राह्मणों को इतिहास का दोषी ठहराते हैं और RSS को हर विवाद का मूल कारण बताते हैं। 2016 में भी उन्होंने कहा था कि हिंदुत्व एक ‘छलावा’ है, वास्तव में यह सिर्फ ‘ब्राह्मणवाद’ है और भारत को आगे बढ़ना है तो RSS को हराना जरूरी है। समय के साथ यह तीखा और भड़काऊ अंदाज ही उनकी पहचान बन गया है।

RSS पर उनके आरोप कई बार ऐसे रहे हैं जो किसी भी ठोस तथ्य पर आधारित नहीं होते। उन्होंने यह तक दावा कर दिया कि RSS को पाकिस्तान की ISI से फंडिंग मिली है और संगठन के वरिष्ठ नेताओं पर भारत को अस्थिर करने की साजिश रचने तक का इल्जाम लगाया। ये बयान उन्होंने किसी गुमनाम मंच पर नहीं बल्कि उन सार्वजनिक आयोजनों में दिए जहाँ कट्टरपंथी इस्लामिक समूह मौजूद थे, जिससे उनके इरादों पर सवाल और गहरे हो जाते हैं।

उनका सबसे विवादित बयान CAA के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों के दौरान आया था। जनवरी 2020 में जमात-ए-इस्लामी हिंद द्वारा आयोजित एक प्रदर्शन में उनका एक वीडियो सामने आया जिसमें वे मुसलमानों की भीड़ को ‘सड़कों पर उतरने’ के लिए उकसाते दिख रहे थे और इसे ही मोदी सरकार को हराने का रास्ता बता रहे थे। यह वीडियो उस समय खूब चर्चा में रहा था।

कोलसे पाटिल ने मुस्लिम समुदाय को उकसाते हुए कहा था कि उन्हें तय करना होगा कि वे ‘गलकर मरें या लड़कर मरें’। यह सीधे तौर पर अशांति भड़काने की कोशिश थी। इतना ही नहीं, उन्होंने भारत के निर्वाचित नेतृत्व पर भी अपमानजनक हमला किया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व गृह मंत्री अमित शाह को ‘कुत्ता’ कहकर संबोधित किया। यह बयानबाजी उनके तथाकथित ‘एक्टिविज्म’ के मुखौटे को पूरी तरह हटा देती है और उनके भीतर भरे जहर को सामने लाती है।

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर उनकी दुष्प्रचार मुहिम भी उतनी ही खतरनाक रही। उन्होंने झूठ फैलाया कि यह कानून केवल उन हिंदुओं को बचाने के लिए बनाया गया है जो असम के NRC में बाहर रह गए थ और दावा किया कि मुसलमानों को ‘डिटेंशन सेंटरों’ में डाला जा रहा है। यह भाषण उस समय दिया गया जब देश में जगह-जगह पर दंगे हो रहे थे। इससे साफ दिखता है कि वे सिर्फ बयानबाजी नहीं कर रहे थे बल्कि अराजकता की आग को हवा दे रहे थे।

कोलसे पाटिल का नाम 2017 के कुख्यात एल्गार परिषद कार्यक्रम से भी जुड़ा रहा है, जिसके बाद भीमा कोरेगाँव में हिंसा भड़की थी। जाँच एजेंसियों ने रिपोर्ट में बताया था कि यह कार्यक्रम ‘अर्बन नक्सल’ नेटवर्क के लिए एक मंच की तरह इस्तेमाल हुआ और इसका मकसद राज्य को अस्थिर करना था। पाटिल को इस आयोजन का प्रमुख सूत्रधार और विचारधारा का प्रेरक बताया गया। जिन लोगों को प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार किया गया उनसे भी उनकी नजदीकी दिखी थी।

कोलसे पाटिल के विवाद सिर्फ राजनीतिक भाषणों तक सीमित नहीं हैं। राष्ट्रीय नायकों पर उनकी टिप्पणियाँ भी समय-समय पर कानूनी कार्रवाई का कारण बनी हैं। इसी साल जनवरी में पुणे पुलिस ने उन पर वीर सावरकर के बारे में झूठ और बेबुनियाद आरोप फैलाने के चलते मामला दर्ज किया। पाटिल ने दावा किया था कि सावरकर को इंग्लैंड में बलात्कार के मामले में सजा हुई थी और यह भी कहा कि सावरकर ने भारत की आजादी का विरोध किया था। ये बातें ऐतिहासिक ना होकर झूठी और मनगढ़ंत हैं, जो सिर्फ स्वतंत्रता संग्राम के एक सम्मानित नायक की छवि खराब करने के लिए कोलसे पाटिल ने फैलाई थीं।

उनके विवादित व्यवहार में एक और गंभीर आरोप तब जुड़ गया जब एक महिला पत्रकार ने उन पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। पत्रकार का कहना है कि इंटरव्यू के लिए उनके घर पहुंचने पर पाटिल ने उनके पहनावे पर आपत्तिजनक टिप्पणी की और ‘दोस्ती’ करने से जुड़ी अनुचित बातें कहीं। यह आचरण उस व्यक्ति के लिए बेहद शर्मनाक है जिसने कभी अदालत में न्याय और गरिमा के मामलों पर फैसले दिए थे।

बीदर का ताजा भाषण इस पूरे विवादास्पद पैटर्न को फिर से सामने लाता है। पाटिल ने एक बार फिर ब्राह्मणों को ‘कायर’ कहा और यह दोहराया कि ‘हिंदू’ शब्द अपमानजनक है। उन्होंने मंच से लोगों और मजहबी नेताओं को हिंदू पहचान पर हमला करने के लिए उकसाया। उनके इस रुख ने भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जड़ों का अपमान किया और समुदायों के बीच अविश्वास व टकराव को बढ़ाने का काम किया।

हालाँकि, उनके समर्थक उन्हें जातीय वर्चस्व के खिलाफ लड़ने वाला ‘आंदोलनकारी’ दिखाने की कोशिश करते हैं लेकिन उनका लगातार इस तरह का व्यवहार इससे बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करता है। उनके बयानों में बार-बार हिंदू विरोधी घृणा, झूठ फैलाने, कट्टरपंथी ताकतों को वैधता देने और भीड़ को उकसाने की प्रवृत्ति दिखती है। यह भाषण असहमति का स्वर नहीं है, यह भारत की सामाजिक एकता और संवैधानिक व्यवस्था पर सोचा-समझा हमला है।