नूरदीन की कब्र और उसपर जूते मारने की परंपरा… पंजाब के मुक्तसर साहिब में ऐसे होता है माघ मेला: गुरुगोबिंद सिंह से किए विश्वासघात का बदला लेते हैं सिख

पंजाब के श्री मुक्तसर साहिब में मकर संक्रांति के अवसर पर 14 जनवरी 2026 को माघी मेला पूरी श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। इस मेले की पहचान सिर्फ धार्मिक आयोजनों से नहीं, बल्कि नूरदीन की कब्र पर जूते-चप्पल मारने की अनोखी परंपरा से भी है।

श्रद्धालु इसे गुरु गोबिंद सिंह के साथ किए गए विश्वासघात का गुस्सा उतारने को करते हैं। मान्यता के अनुसार, इस परंपरा के जरिए वे गुरु के प्रति अपनी अटूट निष्ठा और सिख इतिहास की याद को जीवित रखते हैं। बैसाखी और बंदी छोड़ दिवस (दीवाली) के बाद माघी मेला सिख धर्म का तीसरा सबसे बड़ा पर्व माना जाता है, जिसमें हर साल लाखों श्रद्धालु देश-विदेश से मुक्तसर पहुँचते हैं।

नूरदीन की कब्र और जूते मारने की परंपरा

माघी मेले के दौरान श्रद्धालु गुरुद्वारों में मत्था टेकने के बाद नूरदीन की कब्र पर भी जाते हैं, जो मुख्य गुरुद्वारे से कुछ दूरी पर स्थित है। मान्यताओं के अनुसार, नूरदीन ने सिख वेश धारण कर गुरु गोबिंद सिंह पर धोखे से हमला करने की कोशिश की थी। इस विश्वासघात का गुस्सा लोग नूरदीन की कब्र पर जूते-चप्पल मारकर निकालते हैं।

कब्र पर जूते-चप्पल मारने की परंपरा सालों से चली आ रही है। सालों पहले माघी मेले के आखिरी दिन निहंग सिंह इस कब्र को बरछों से तोड़ देते हैं। यह कब्र हर साल नए सिरे से बनाई जाती है और फिर परंपरा के अनुसार तोड़ी जाती है, ताकि आने वाली पीढ़ियों में इस घटना की याद बनी रहे।

खिदराने की जंग और 40 सिखों ने लौटाई मुगलों की फौज

माघी मेला 40 सिखों की शहादत की याद में मनाया जाता है। सिख इतिहास के अनुसार, आनंदपुर साहिब की घेराबंदी के दौरान कठिन परिस्थितियों में 40 सिख गुरु गोबिंद सिंह का साथ छोड़कर घर लौट गए थे। बाद में माई भागो की प्रेरणा और आत्मग्लानि के चलते वे दोबारा युद्ध के लिए निकले।

खिदराने की ढाब में इन 40 सिखों ने मुगलों की फौज से भीषण युद्ध किया और उन्हें बुरी तरह हराते हुए प्राणों का बलिदान दे दिया। इन सिखों ने ऐसी लड़ाई लड़ी की मुगल फौज ने घुटने टेक लिए और वापस लौट गए। गुरु गोबिंद सिंह ने उन्हें ‘चाली मुक्ते’ (40 मुक्त हुए सिख योद्धा) की उपाधि दी और इस स्थान को खिदराना नहीं, बल्कि मुक्ति का धाम कहा।

माघी मेले के दौरान गुरुद्वारों में अखंड पाठ, सरोवर स्नान और नगर कीर्तन आयोजित किए जाते हैं। इसके साथ ही निहंगों की घुड़दौड़, पारंपरिक करतब और विशाल घोड़ा मंडी मेले का प्रमुख आकर्षण रहती है। देशी नस्लों के सैकड़ों घोड़े यहाँ लाए जाते हैं, जिनकी कीमत लाखों से लेकर करोड़ों रुपए तक बताई जाती है।