सुप्रीम कोर्ट ने सहमति से बने रिश्तों में बाद में रेप केस दर्ज होने के मामले में अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कानून के दुरुपयोग पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा है कि यदि कोई महिला पहले से शादीशुदा है और वह किसी अन्य पुरुष के साथ सहमति से शारीरिक संबंध बनाती है, तो वह बाद में झूठे विवाह के वादे के आधार पर रेप का मामला दर्ज नहीं करा सकती।
कोर्ट ने इसे आपसी सहमति से बने रिश्ते के बिगड़ने का मामला बताया और आरोपित वकील के खिलाफ दर्ज FIR और आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले से जुड़ा था, जहाँ फरवरी 2025 में एक महिला अधिवक्ता ने अपने ही पेशे से जुड़े एक वकील पर झूठे विवाह के वादे पर रेप करने का आरोप लगाते हुए FIR दर्ज कराई थी। महिला की उम्र 33 वर्ष थी और वह पहले से शादीशुदा थी तथा एक नाबालिग बच्चे की माँ भी थी।
उस समय उसके तलाक की कार्यवाही लंबित थी और उसकी शादी कानूनी रूप से कायम थी। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने मार्च 2025 में इस मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद आरोपित ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियाँ
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5 के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति का जीवनसाथी जीवित है तो दूसरा विवाह कानूनी रूप से संभव नहीं है। ऐसे में शादीशुदा महिला द्वारा विवाह का वादा कानूनन न तो लागू किया जा सकता है और न ही उस पर भरोसा कर दुष्कर्म का आरोप लगाया जा सकता है।
कोर्ट ने साफ कहा कि यह सहमति से बना रिश्ता था, जो बाद में कड़वाहट में बदल गया। कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल विवाह के वादे पर शारीरिक संबंध बनने से हर मामले में रेप नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आज के समय में टूटे हुए रिश्तों को आपराधिक मामलों में बदलने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। ऐसे मामलों में अदालतों को बेहद सतर्क रहना होगा ताकि वास्तविक दुष्कर्म के मामलों और सहमति से बने रिश्तों के विवादों के बीच साफ अंतर किया जा सके।
कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि शिकायतकर्ता स्वयं एक वकील थीं, उन्हें कानून की जानकारी थी और उन्हें भोली या बहकाई गई महिला नहीं माना जा सकता। रिकॉर्ड की जाँच के बाद कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि IPC की धारा 376(2)(n) के तहत कोई अपराध नहीं बनता।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने FIR और उससे जुड़ी सभी आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द करते हुए हाई कोर्ट के आदेश को पलट दिया।

