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रवीश कुमार तुम ही पत्रकारों की पिटाई के जिम्मेदार हो, खुद ‘गोदी’ में बैठ करते रहे पत्रकारिता… अब चला रहे ‘गोदी मीडिया’ वाला प्रोपेगेंडा

मोदी सरकार के प्रति अपनी नफरत में रवीश इतने अंधे हो गए हैं कि उन्हें देश का हित-अहित दिखना बंद हो गया है। प्रधानमंत्री को दी जाने वाली गालियाँ उनके लिए 'अभिव्यक्ति की आजादी' बन जाती हैं, और पत्रकारों पर होने वाले जानलेवा हमले 'जनता का गुस्सा'।

कहावत है कि जब इंसान के सिर पर अहंकार का चश्मा चढ़ जाता है, तो उसे दूसरों का दर्द और अपनी भड़ास के बीच का अंतर दिखना बंद हो जाता है। खुद को लोकतंत्र का आखिरी पहरेदार और देश का सबसे बड़ा निष्पक्ष पत्रकार बताने वाला रवीश कुमार आज इसी मोड़ पर आकर खड़ा हो गया है।

वर्षों से ‘गोदी मीडिया-गोदी मीडिया’ का राग अलापकर खुद को दूध का धुला साबित करने वाले प्रोपेगेंडाई पत्रकार रवीश कुमार अब इस खोखले नैरेटिव के पीछे अपनी नफरती सोच को बिल्कुल छिपा नहीं पाए। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन के दौरान जब सड़कों पर गुंडों और उपद्रवियों ने महिला और पुरुष पत्रकारों को निशाना बनाया, दौड़ा-दौड़ाकर पीटा और उनके कपड़े तक फाड़ दिए, तब रवीश कुमार का ‘न्यायप्रिय’ जमीर पूरी तरह से सो गया।

उनकी यह चुप्पी और उसके बाद आया उकसाने वाला बयान साबित करता है कि उनके लिए साथी पत्रकारों की सुरक्षा कोई मायने नहीं रखती, बल्कि अपनी राजनीतिक खुन्नस निकालना और मोदी सरकार को किसी भी कीमत पर कटघरे में खड़ा करना ही उनका एकमात्र एजेंडा बन चुका है।

सड़क पर लहूलुहान होते पत्रकार और स्टूडियो में बैठ नफरत को जायज ठहराते रवीश

राजधानी की सड़कों पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का प्रदर्शन चल रहा था। प्रदर्शनकारियों का चोला ओढ़कर आए उपद्रवियों ने वहाँ मौजूद रिपोर्टरों और कैमरामैनों पर हमला कर दिया। 10 से 15 पत्रकारों के साथ सरेआम मारपीट और बदसलूकी की गई। हद तो तब हो गई जब खुद रवीश कुमार के पूर्व साथी रवीश रंजन शुक्ला को निशाना बनाया गया। कई युवा पत्रकारों के कपड़े फाड़े गए, उनके माइक तोड़ दिए गए और महिला पत्रकारों के साथ ऐसी अभद्रता की गई जिसे देखकर किसी भी संवेदनशील इंसान का सर शर्म से झुक जाए।

उपद्रवियों ने केवल मीडिया पर ही नहीं, बल्कि शांति व्यवस्था बनाए रखने में जुटी पुलिस पर भी पथराव किया। प्रधानमंत्री को खुलेआम गंदी-गंदी गालियाँ दी गईं और देश विरोधी माहौल बनाने का प्रयास किया गया। लेकिन इन सब गंभीर और शर्मनाक घटनाओं पर रवीश कुमार के मुँह से एक शब्द नहीं निकला।

पुलिस पर हमले पर मौन, पत्रकारों के लहूलुहान होने पर मौन, देश के प्रधानमंत्री को दी गई भद्दी गालियों पर मौन और देश की अखंडता को चुनौती देने वाली विदेशी ताकतों की घुसपैठ पर भी पूरी तरह मौन… इस पूरे घटनाक्रम में प्रोपेगेंडाई पत्रकार रवीश कुमार की भूमिका किसी मूकदर्शक की नहीं, बल्कि उस सोच के समर्थक की रही जो हिंसा को जायज ठहराती है। उन्होंने हिंसा की निंदा करने का महज एक औपचारिकता भरा ‘बैलेंसिंग एक्ट’ किया, लेकिन उसकी अगली ही लाइन में पत्रकारों पर हो रहे हमलों और मॉब लिंचिंग जैसी मानसिकता को सही ठहराने का कुतर्क गढ़ दिया।

‘गोदी मीडिया लोकतंत्र का हत्यारा है’: हिंसा का समर्थन

22 जुलाई को अपने आधिकारिक X (ट्विटर) हैंडल पर रवीश कुमार ने जो लिखा, वह सिर्फ एक विचार नहीं बल्कि सड़क पर घूम रही हिंसक भीड़ को उकसाने वाला एक खुला फरमान था। उन्होंने लिखा, “मूल बात क्या है? मूल बात है कि गोदी मीडिया लोकतंत्र का हत्यारा है। आप अगर-मगर के सहारे इससे नहीं बच सकते। कुछ अच्छे लोग हमेशा हैं, रहेंगे। उन्हें निशाना मत बनाइये, हिंसा और हुड़दंग नहीं होनी चाहिए। तब भी गोदी मीडिया की सच्चाई नहीं बदल जाएगी। जनता को हर दिन जागना होगा। आज इस मीडिया पर आप गर्व नहीं कर सकते। इसके न्यूज़ रूम के लोग भी शर्म से सहमे रहते हैं। अभी भी ज़रूरत है कि देश की हर पंचायत में पोस्टर लगना चाहिए कि गोदी मीडिया लोकतंत्र का हत्यारा है। हर पार्टी के दफ्तर के बाहर यह पोस्टर लिखा होना चाहिए। एयरपोर्ट पर स्पेस ख़रीद कर यह नारा लिखा जाना चाहिए। लोगों को अपनी कार के पीछे लिखना चाहिए। इस गोदी मीडिया ने लोकतंत्र के हर कोने में सड़न पैदा कर दी है। इसके कारण कुर्सी पर बैठा हर शख़्स ख़ुद को ख़ुदा समझ बैठा है। सांसद तक लूटे जा रहे हैं। विपक्षी पार्टियाँ लूट ली जा रही हैं। वोट का अधिकार छीना गया है। इसी मीडिया के सामने। इसलिए मूल बात है कि गोदी मीडिया लोकतंत्र का हत्यारा है।”

जरा इस बयान की भाषा और समय को समझिए। जब जमीन पर रिपोर्टिंग कर रहे युवा पत्रकारों को भीड़ पीट रही थी, तब रवीश कुमार लोगों से कह रहे थे कि पंचायतों से लेकर एयरपोर्ट्स तक और गाड़ियों के पीछे पोस्टर लगाओ कि ‘गोदी मीडिया लोकतंत्र का हत्यारा है’। क्या यह बयान उस उग्र भीड़ को थपकी देने जैसा नहीं है? जब आप किसी समूह को सरेआम ‘हत्यारा’ घोषित कर देंगे, तो सड़क पर उतरी उग्र भीड़ उस समूह के प्रतिनिधियों को सामने पाकर क्या करेगी? जाहिर है, वह उन पर हमला ही करेगी। रवीश कुमार यही चाहते हैं। वे एसी स्टूडियो में बैठकर नफरत का ऐसा माहौल बना रहे हैं जिससे ग्राउंड पर काम करने वाले रिपोर्टरों की लिंचिंग सुनिश्चित हो सके।

रवीश कुमार की नजर में निष्पक्षता की परिभाषा पूरी तरह सड़ चुकी है। उनके तय पैमानों के मुताबिक ‘सच्चा और ईमानदार पत्रकार’ सिर्फ वही है, जो उनके एजेंडे, उनकी राजनीतिक सोच और उनकी कुंठा का समर्थन करे।

अगर कोई ग्राउंड रिपोर्टर किसी आंदोलन या प्रदर्शन के भीतर छिपे हिंसक तत्वों को बेनकाब करता है, अगर कोई पत्रकार पुलिस पर पथराव करने वाले उपद्रवियों की फुटेज दिखाता है, या कोई मीडियाकर्मी भीड़ द्वारा खुद उस पर किए गए हमले की सच्चाई देश के सामने लाता है, तो रवीश कुमार जी के हिसाब से वह ‘गोदी मीडिया’ का दलाल बन जाता है। और चूँकि रवीश ने उसे ‘लोकतंत्र का हत्यारा’ घोषित कर दिया है, इसलिए सड़क पर घूम रही हिंसक भीड़ को उस पर हमला करने का नैतिक अधिकार मिल जाता है। यह सोच पत्रकारिता की नहीं, बल्कि चरमपंथी मानसिकता की प्रतीक है।

पत्रकार बिरादरी का फूटा गुस्सा: ‘आप उस हिंसक भीड़ के मसीहा हैं’

प्रोपेगेंडाई पत्रकार रवीश कुमार के इस गैर-जिम्मेदाराना, भड़काऊ और दोहरा चरित्र उजागर करने वाले रवैये से पूरी पत्रकार बिरादरी में गहरा आक्रोश फैल गया है। वरिष्ठ पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर रवीश कुमार को आईना दिखाते हुए उनकी नफरती पत्रकारिता की धज्जियाँ उड़ाई हैं।

वरिष्ठ पत्रकार सैयद सुहैल ने रवीश कुमार को टैग करते हुए सीधे शब्दों में लिखा, “पत्रकारों के खिलाफ इस भीड़ को हिंसा के लिए आप सालों से उकसा रहे हैं। मुबारक हो आप उस भीड़ के मसीहा हैं… जो सड़क पर पत्रकारों को पीट रही है। एन्जॉय कीजिये यही आप चाहते थे.. खुद की ईमानदारी की झूठी दुकान चलाने के लिए आपने पत्रकारों के खिलाफ लोगों को भड़काया है।”

वहीं, वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश शर्मा ने पत्रकारिता के गिरते स्तर और रवीश जैसे लोगों द्वारा फैलाई जा रही नफरत पर दुख जताते हुए लिखा, “मैंने पत्रकारिता में एकजुटता का वह दौर भी देखा है जब देश के किसी हिस्से में पत्रकारों पर हमला होने पर विरोध में सब साथ आ जाते थे। आशुतोष जी पर बीएसपी नेताओं के हमले के विरोध में प्रेस क्लब से नॉर्थ ब्लॉक तक मार्च किया गया था जिसमें प्रिंट और टीवी के उस समय के सारे दिग्गज संपादक शामिल थे। कुछ रिपोर्टर को एंट्री न मिलने पर सारे रिपोर्टर प्रेस कॉन्फ्रेंस का बायकॉट कर देते थे। यह एकजुटता थी। अब वह दौर है जब पत्रकार ही भीड़ को पत्रकारों की लिंचिंग के लिए उकसा रहे हैं।”

ABP न्यूज की वरिष्ठ पत्रकार चित्रा त्रिपाठी ने भी रवीश कुमार को आड़े हाथों लिया है। उन्होंने X पर रवीश के एक पोस्ट पर जवाब देते हुए लिखा, “ये व्यक्ति पत्रकारों के खिलाफ भीड़ को ‘लिचिंग’ के लिए भड़का रहा है। एक पॉलिटिकल पार्टी की राजनीतिक यात्रा में हिस्सा लेकर अपनी पत्रकारिता बेच देने वाला शख्स पत्रकारिता सिखाने में लगा हुआ है।”

चित्रा जिस यात्रा की बात कर रही हैं वो राहुल गाँधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ है। खुद को न्यूट्रल दिखाने को ढोंग करने वाले रवीश कुमार की असलियत बार-बार अलग-अलग रूप में सामने आती रही है। दिवंगत पत्रकार रोहित सरदाना की वो टिप्पणी भी याद करिए जो उन्होंने रवीश कुमार के लिए की थी।

रोहित ने कहा था, “वैसे भी कोई उसे देखता नहीं है और वह अपनी मनमानी करता रहता है और खुद को संतुष्ट करने के लिए दूसरे चैनलों को गोदी मीडिया कहता है।” उन्होंने कहा था, “अगर आप ध्यान से देखेंगे तो पाएँगे कि वह खुद किसी की गोद में बैठा है और दूसरे मीडिया को गोदी मीडिया कहकर अपनी ही नीची भावना को दूसरों पर थोप रहा है।”

पत्रकारों की ये टिप्पणियाँ यह साबित करने के लिए काफी हैं कि रवीश कुमार ने अपनी खोखली वाहवाही और निजी खुन्नस के चक्कर में पूरी पत्रकार बिरादरी की सुरक्षा को दाँव पर लगा दिया है।

यूट्यूब पर अपने आलीशान और AC स्टूडियो में बैठकर घंटों लंबे वीडियो ज्ञान देने वाले रवीश कुमार को अब ज़मीनी हकीकत का कोई अहसास नहीं रह गया है। वे भूल चुके हैं कि कड़कती धूप, बारिश और उग्र भीड़ के बीच जाकर रिपोर्टिंग करना क्या होता है। स्टूडियो के ठंडे और सुरक्षित माहौल में बैठकर प्रोपेगेंडा गढ़ना बहुत आसान होता है, लेकिन जब कोई युवा रिपोर्टर हाथ में माइक लेकर किसी उग्र भीड़ के बीच खड़ा होता है, तो उसकी जान हर पल जोखिम में होती है।

रवीश कुमार आज अहंकार की उस पराकाष्ठा पर हैं, जहाँ वे अपने से छोटे पत्रकारों, समकालीनों और अपने पुराने सहयोगियों के अस्तित्व और उनकी सुरक्षा को पूरी तरह नकार देते हैं। अपनी ‘महानता’ और ‘ईमानदारी’ का झूठा मुखौटा पहने रखने के लिए वे अपने ही साथियों की बलि चढ़ाने से भी नहीं हिचकते।

देश विरोधी एजेंडे और मौन का कड़वा सच

यह पहला मौका नहीं है जब रवीश कुमार का ऐसा संदिग्ध और चुनिंदा रुख सामने आया है। जब भी देश में किसी आंदोलन की आड़ में अराजकता फैलाई जाती है, जब भी विदेशी ताकतें भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने की कोशिश करती हैं, या जब भी देश की संवैधानिक संस्थाओं पर हमले होते हैं- रवीश कुमार हमेशा देशविरोधी या उपद्रवी तत्वों की ढाल बनकर खड़े हो जाते हैं।

मोदी सरकार के प्रति अपनी नफरत में वे इतने अंधे हो चुके हैं कि उन्हें देश का हित-अहित दिखना बंद हो गया है। प्रधानमंत्री को दी जाने वाली गालियाँ उनके लिए ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ बन जाती हैं, और पत्रकारों पर होने वाले जानलेवा हमले ‘जनता का गुस्सा’। रवीश कुमार की यह मौकापरस्ती सिर्फ एक व्यक्ति का पतन नहीं है, बल्कि यह उस विचार का पतन है जो खुद को ‘पत्रकारिता’ कहकर जनता को गुमराह करता रहा है।

अगर रवीश कुमार में जरा सी भी पत्रकारिता की नैतिकता, बची हुई इंसानियत या आत्मसम्मान बाकी है, तो उन्हें अपने भीतर झांकना चाहिए। उन्हें यह समझना होगा कि नफरत की जिस फसल को वे इतने सालों से सींच रहे हैं, उसकी जद में कल कोई भी आ सकता है। दूसरों को लोकतंत्र का हत्यारा बताने से पहले रवीश को यह मान लेना चाहिए कि साथी पत्रकारों के खून से सने उपद्रवियों के हाथों को नैतिक समर्थन देकर वे खुद पत्रकारिता के सबसे बड़े हत्यारे बन चुके हैं।

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