- भारतीय लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन वैध है?
- क्या भारतीय नागरिक विरोध-प्रदर्शन कर सकते हैं?
- क्या भीड़ एक जगह इकट्ठा होकर अपनी बात रख सकती है?
- भारतीय संविधान में नागरिकों को अपनी राय प्रकट करने की आजादी है?
NEET की परीक्षा देने वाले विद्यार्थी 10वीं कक्षा तक नागरिक शास्त्र की पढ़ाई करते हैं। यह ऐच्छिक विषय नहीं है, अनिवार्य होता है। इसमें मोटा-मोटी तौर पर नागरिकों के कर्तव्य-अधिकार, लोकतंत्र की परिभाषा, सरकार के कर्तव्य-अधिकार, सरकारी अंगों की मूलभूत बातें आदि-इत्यादि पढ़ाई जाती है। ऊपर के तमाम प्रश्नों का उत्तर पढ़ाई करके 10वीं पास किया कोई भी विद्यार्थी ‘हाँ’ में देगा।
इसी ‘हाँ’ के कारण NEET पेपर लीक मामले को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध-प्रदर्शन शुरू हुए। शुरुआती दिनों में जमीन पर संख्या दहाई से लेकर सैकड़ा तक रही होगी। लेकिन ऑनलाइन हलचल थी, इसको नकारा नहीं जा सकता। CJP मतलब कॉकरोच जनता पार्टी ने ऑनलाइन मुजस्समा गढ़ने में सफलता तो पाई थी। कुछ दिन ऐसे ही चला। विरोध-प्रदर्शन के दिन तो बढ़ रहे थे लेकिन जमीनी जोश थमा हुआ सा था। फिर एंट्री होती है सोनम वांगचुक की।
जंतर-मंतर की कॉन्क्रिट-तारकोल वाली जमीन को इसी सोनम वांगचुक की उपस्थिति से खाद-पानी मिलनी शुरू होती है। इस शख्स के जुड़ने से पहले क्या दिल्ली, क्या लखनऊ और जयपुर – हर जगह कॉकरोच जनता पार्टी के साथ कॉकरोच और पार्टी तो थी, नदारद थी तो जनता। भ्रम ही सही लेकिन सोनम वांगचुक की कायदे से गढ़ी गई छवि का फायदा कॉकरोच पार्टी को मिला। इस शख्स के आमरण अनशन ने विरोध-प्रदर्शन में जान फूँक दी। जैसे-जैसे दिन बीतते गए, जनता इससे खुद को कनेक्ट करती गई।
अब आते हैं मूल प्रश्न पर। आखिर यह विरोध-प्रदर्शन किया क्यों गया? क्योंकि NEET की परीक्षा का प्रश्न-पत्र लीक हो गया था। जिन विद्यार्थियों के पेपर अच्छे गए होंगे, निश्चित तौर पर वो और उनके सगे-संबंधी गुस्से में होंगे। मेरा तो मानना है कि सिर्फ सगे-संबंधी ही क्यों? तंत्र में अगर खामी है तो गुस्सा पूरे लोक को होना चाहिए, उससे जुड़े सवाल भी सामूहिक लोक स्तर पर पूछे जाने चाहिए। नागरिक शास्त्र की किताबों में भी यही पढ़ाया गया है। संविधान में ऐसा करने की आजादी भी दी गई है।
कॉकरोच पार्टी ने बिल्कुल सही किया। विद्यार्थियों के लिए सरकारी तंत्र सही से काम करे, सोनम वांगचुक ने कॉकरोच मंच से आमरण अनशन करके कुछ भी गलत नहीं किया। भारतीय नागरिकों को विरोध-प्रदर्शन करने के लिए किसी दूसरे देश से सीखने की आवश्यकता नहीं। सविनय अवज्ञा आंदोलन, असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह, दांडी मार्च – तमाम ऐसे उदाहरण हमारी ही धरा पर पुष्पित-पल्लवित हुए हैं।
जब किसी ने कुछ गलत ही नहीं किया, तो गलती हुई कहाँ? विरोध-प्रदर्शन NEET के परीक्षार्थियों के हित में की जा रही थी, फिर हिंसा-पत्थरबाजी-महिलाओं से बदसलूकी-अश्लील गालियाँ-नारेबाजी की खबरें क्यों?
कॉकरोच मंच पर आमरण अनशन कर रहे सोनम वांगचुक के रहते हुए विरोध-प्रदर्शन नियंत्रित था, दिशा-निर्देशित था। लेकिन उनके बिगड़ते स्वास्थ्य को देखते हुए जब उन्हें अस्पताल ले जाया गया तो चीजें धीरे-धीरे भीड़तंत्र में बदल गई। फिर शुरू हुआ भीड़ के राजनीतिकरण की प्रक्रिया। कॉकरोचों को पता ही नहीं चला कि कब उनके नीचे की जमीन पर बैटिंग कोई और कर रहा है, और वो भी उस खेल में शामिल हो गए।
सोनम वांगचुक को अस्पताल में एकांत मिला। वो सोच-समझ पा रहे थे। राजनीतिक कुचक्र से दूर थे। इसके विपरीत कॉकरोच जिस शोरगुल को अपनी जीत समझ रहे थे, वही उनका सबसे बड़ा मेंटल ब्लॉक था। दोनों की सोच का अंतर आप नीचे देख सकते हैं:
- वांगचुक ने NEET परीक्षा-तंत्र को लीक-प्रूफ बनाने, पेपर लीक की घटना के कारण आत्महत्या किए बच्चों को उचित मुआवजा देने, जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण विरोध कर रहे छात्र-छात्राओं के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई या FIR नहीं आदि के आश्वासन पर अपना अनशन तोड़ा। उनको मनाने के लिए सिर्फ सरकार नहीं बल्कि अलग-अलग राजनीतिक दलों के लगभग 65 सांसद गए थे। यह है भारत का लोकतंत्र और इसमें विश्वास करने वालों की कहानी।
- कॉकरोच जिसकी न कोई पार्टी है, न जनता का साथ है – उनका स्टैंड बहुत क्लियर है – शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा। सरकार NEET परीक्षार्थियों के हित के लिए चाहे जो भी फैसले ले, उन फैसलों पर आपके अगुआ रहे वांगचुक की सहमति भी आ गई है – लेकिन शिक्षा मंत्री का इस्तीफा लेकर रहेंगे। यह तंत्र को सही करने की माँग के बजाय जिद की बैटिंग है, जिसकी पिच तैयार की है राहुल गाँधी ने, आम आदमी पार्टी ने, अखिलेश यादव ने… और उन सबने, जिसे भारतीय लोकतंत्र पर विश्वास नहीं।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद घाटे में कौन रहेगा? राहुल गाँधी या केजरीवाल? समाजवादी पार्टी या कॉन्ग्रेस? या कॉकरोच पार्टी? सरकार का एक तंत्र इस विषय पर काम कर रहा होगा कि आने वाले समय में राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा को कैसे और लीकप्रूफ/व्यवस्थित बनाया जाए। लेकिन उसी समय सरकार का दूसरा तंत्र इस पर काम कर रहा होगा कि विरोध-प्रदर्शन के नाम पर किन-किन ने हिंसा की। जरा सोचिए, लंबे कानूनी पचड़ों में कौन फँसेगा?
1. लोकतंत्र सही से काम करे, इसके लिए मैं शांतिप्रिय और अहिंसक भीड़ जमा करूँगा, प्रेशर ग्रुप बनाऊँगा… ऐसा करके मैं शत-प्रतिशत सही भी हूँ।
2. लोकतंत्र को जो मैं कहूँ, वही करना होगा… मैं भीड़ भी जमा करूँगा, वो हिंसा करे या महिलाओं से बदसलूकी – मैं अपनी बात मनवा कर रहूँगा।
ऊपर के दोनों वाक्यों में धागे भर का फर्क है। धागे के इधर और उधर का फर्क हम सबको पता है।


