लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक यानी 131वें संविधान संशोधन बिल पर वोटिंग हुई। बिल के पक्ष में 278 वोट पड़े जबकि विरोध में 211 वोट पड़े। बिल दो तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका और सदन के फ्लोर पर गिर गया। एनडीए ने इस मामले पर मीटिंग बुलाई है।
Lok Sabha Speaker Om Birla says, "The Constitution (131st Amendment) Amendment Bill did not pass as it did not achieve a 2/3 majority during voting in the House." https://t.co/ucLnUltYnj pic.twitter.com/xcBUJ3RhAv
— ANI (@ANI) April 17, 2026
उद्धव गुट की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने एक्स पर लिखा कि भारत की उन महिलाओं के लिए यह दुखद दिन है जो संसद या विधानसभा में जाने की उम्मीद कर रही थीं।
Sad day for India’s women who hoped to find themselves in the parliament or assembly. pic.twitter.com/Ln95uAPrvy
— Priyanka Chaturvedi🇮🇳 (@priyankac19) April 17, 2026
गृह मंत्री अमित शाह ने सदन को संबोधित करते हुए कहा कि महिलाओं के आरक्षण के लिए जिससे लड़ना पड़े लड़ेंगे लेकिन उनका हक दिलाकर रहेंगे। उन्होंने विपक्ष पर आरोप लगाते हुए कहा कि कांग्रेस और विपक्ष हमेशा हमारे द्वारा लाए गए सभी बिल और कानून का विरोध किया। उन्होंने कहा हमने 370 हटाया इन्होंने विरोध किया राम मंदिर बनाया इन्होंने विरोध किया तीन तलाक हटाया इन्होंने विरोध किया सर्जिकल स्ट्राइक किया इन्होंने विरोध किया।
अमित शाह ने आगे कहा कि हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2029 तक महिला सशक्तिकरण का वादा पूरा करने जा रहे हैं। मैं वादा करता हूँ कि 2029 का लोकसभा चुनाव महिला आरक्षण के साथ ही पूरा होगा।
संख्या बल में कैसे पीछे रह गई एनडीए सरकार?
लोकसभा में एनडीए के पास 293 सांसद हैं जबकि विपक्ष के पास 233 सांसद हैं। संवैधानिक संशोधन के लिए उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो तिहाई बहुमत जरूरी है। अगर सभी 540 सदस्य उपस्थित रहें तो 360 वोट चाहिए थे। एनडीए को विपक्षी दलों का समर्थन या उनकी अनुपस्थिति चाहिए थी। समाजवादी पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस और डीएमके जैसे दलों की भूमिका निर्णायक हो सकती थी। हालाँकि इन दलों ने ऐसा नहीं किया और बिल लोकसभा में गिर गया।
बता दें कि लोकसभा में पास नहीं होने की स्थिति में अब ये बिल राज्यसभा में पेश नहीं किया जाएगा। राज्यसभा में भी दो तिहाई बहुमत की जरूरत पड़ेगी, जहाँ सरकार के पास संख्याबल नहीं है। इस मुद्दे पर सर्वदलीय एकजुटता की जरूरत थी, लेकिन सरकार की तमाम दलीलों के बावजूद विपक्षी दल इस बिल पर सरकार के साथ नहीं आए।

