केरल हाई कोर्ट ने जनप्रतिनिधियों की शपथ को लेकर एक फैसला सुनाया। कोर्ट ने साफ कहा है कि चुने हुए नेता शपथ लेते समय कानून में तय शब्दों के बाहर नहीं जा सकते। यानी शपथ सिर्फ ‘ईश्वर’ के नाम पर ली जा सकती है या फिर ‘सत्यनिष्ठा’ की प्रतिज्ञा की जा सकती है।
शपथ में किसी देवी-देवता, भारत माता, राजनीतिक शहीद या किसी नेता का नाम जोड़ना पूरी तरह अवैध है। केरल हाई कोर्ट ने ऐसे सभी नेताओं को 4 हफ्ते के भीतर दोबारा सही तरीके से शपथ लेने का आदेश दिया है।
क्या है पूरा मामला और क्यों हुआ विवाद?
यह पूरा मामला तिरुवनंतपुरम नगर निगम के 20 पार्षदों और पलक्कड़ के एक पंचायत सदस्य से जुड़ा है। इन पार्षदों ने शपथ लेते समय अलग-अलग हिंदू देवी-देवताओं, ‘भारत माता’, गुरुदेव और अपने राजनीतिक दल के शहीदों के नाम लिए थे।
वहीं एक पंचायत सदस्य ने पूर्व नेता उम्मन चांडी के नाम पर शपथ ले ली थी। मामला अदालत पहुँचा तो हाई कोर्ट ने इस तरह की शपथ को कानूनन गलत माना। हालाँकि, कोर्ट ने साफ किया कि सिर्फ इस गलती की वजह से उनकी कुर्सी (जनादेश) नहीं जाएगी।
कानून में क्या हैं नियम और कोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति पीवी कुन्हीकृष्णन ने अपने फैसले में कहा कि नगरपालिका और पंचायत राज एक्ट के तहत शपथ के सिर्फ 2 ही तरीके हैं। पहला तरीका ईश्वर के नाम पर और दूसरा तरीका बिना ईश्वर के नाम के सत्यनिष्ठा की कसम खाना है। कोर्ट ने कहा कि शपथ कोई मामूली औपचारिकता नहीं है, बल्कि जनता के प्रति एक गंभीर वादा है।
अदालत ने राहत देते हुए इन पार्षदों पर कोई जुर्माना नहीं लगाया है क्योंकि उन्होंने जानबूझकर ऐसा नहीं किया था। तिरुवनंतपुरम के पार्षदों द्वारा अब तक किए गए काम सुरक्षित रहेंगे, लेकिन पंचायत सदस्य के पिछले काम अमान्य माने जाएँगे।

