कैंसर से जूझ रहे मरीज और उनके परिवार हर दिन इस उम्मीद में रहते हैं कि शायद कोई दवा उनकी जिंदगी बचा ले। पर जब वही दवा हर महीने हजारों रुपए की हो और उसे सस्ती कीमत पर उपलब्ध कराने की कानूनी लड़ाई भी वर्षों तक आगे न बढ़े, तो मरीज के पास समय कम पड़ ही जाता है।
‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की रिपोर्ट के मुताबिक, केरल हाई कोर्ट में स्तन कैंसर की जीवनरक्षक दवा रिबोसिक्लिब को सस्ती कीमत पर उपलब्ध कराने के लिए दायर मामला 21 जनवरी 2023 के बाद से सुनवाई के लिए 57 बार लिस्ट हो चुका है लेकिन अब तक इसकी आखिरी सुनवाई नहीं हो पाई है। इस बीच मामले को अदालत तक लेकर जाने वाली मरीज की केस के शुरुआती दौर में ही मौत हो गई।
दवाओं तक लोगों की पहुँच के लिए काम करने वाले ‘वर्किंग ग्रुप ऑन एक्सेस टू मेडिसिन्स’ ने अब भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा है। समूह ने अनुरोध किया है कि मामले की जल्द सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएँ ताकि उन मरीजों को न्याय मिल सके जिन्हें यह दवा तुरंत चाहिए।
याचिकाकर्ता की मौत के बाद भी केरल हाई कोर्ट ने मामले को बंद नहीं किया। इसके जनहित को देखते हुए अदालत ने इसे स्वतः संज्ञान वाले मामले के रूप में जारी रखने का फैसला किया। कार्य समूह का कहना है कि याचिकाकर्ता की मौत यह दिखाती है कि जीवनरक्षक दवाओं से जुड़े मामलों में न्यायिक देरी की मानवीय कीमत कितनी भयावह हो सकती है।
महँगी दवाओं के कारण इलाज से दूर हो रहे मरीज
यह समूह मरीजों के अधिकारों के लिए काम करने वाले लोगों, मरीज समूहों, सामाजिक संगठनों, शिक्षाविदों और वकीलों से मिलकर बना है। समूह ने मुख्य न्यायाधीश को भेजे पत्र में स्तन कैंसर से जुड़े आँकड़े और दवाओं की कीमतों का भी उल्लेख किया है।
स्तन कैंसर भारत की महिलाओं में पाए जाने वाले सबसे आम कैंसरों में से एक है। ग्लोबल कैंसर ऑब्जर्वेटरी की 2022 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में स्तन कैंसर के 1.9 लाख से अधिक नए मामले सामने आए थे और लगभग 98,300 मरीजों की मौत हुई थी।
सस्ती जेनेरिक दवा के लिए माँगा था सरकारी लाइसेंस
केरल हाई कोर्ट में जून 2022 में दाखिल याचिका में पेटेंट अधिनियम की धारा 100 के तहत रिबोसिक्लिब के लिए ‘सरकारी उपयोग लाइसेंस’ जारी करने की माँग की गई थी। ऐसा लाइसेंस जारी होने पर दवा का जेनेरिक संस्करण देश में ही तैयार किया जा सकता था और मरीजों को यह कम कीमत पर मिल सकती थी।
कार्य समूह के अनुसार, जेनेरिक दवाओं की कीमत मूल कंपनी की दवा के मुकाबले अक्सर 90 से 95 प्रतिशत तक कम होती है। इससे महँगी दवाओं को उन मरीजों तक पहुँचाया जा सकता है जो मूल दवा की कीमत नहीं चुका सकते।
सरकार ने रिबोसिक्लिब की प्रभावशीलता को स्वीकार किया था लेकिन सरकारी उपयोग लाइसेंस जारी करने से इनकार कर दिया। सरकार ने कहा था कि स्तन कैंसर को राष्ट्रीय आपात स्थिति नहीं माना जा सकता है।
मुख्य न्यायाधीश को भेजे गए पत्र में बताया गया है कि मामले से जुड़े प्रत्येक पक्ष को सुना जा चुका है और अदालत ने जिन रिपोर्टों की माँग की थी, वे सभी जमा की जा चुकी हैं। सभी कानूनी दलीलें और दस्तावेज भी पूरे हो चुके हैं। इसके बावजूद जीवनरक्षक दवाओं तक पहुँच सुनिश्चित करने की सरकार की जिम्मेदारी से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल अब तक अनसुलझे हैं।

