आज देश के पूर्व उप-प्रधानमंत्री और महान दलित नेता बाबू जगजीवन राम की पुण्यतिथि है। भारतीय राजनीति के इतिहास में ‘बाबूजी’ के नाम से मशहूर जगजीवन राम एक ऐसे अद्वितीय और कद्दावर नेता थे, जिन्होंने लगभग आधी सदी तक देश की मुख्यधारा की राजनीति और नीति-निर्धारण में केंद्रीय भूमिका निभाई। लेकिन यह भारतीय इतिहास की एक बड़ी विडंबना है कि दलित अधिकारों और सामाजिक समरसता के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर देने वाले इस नेता को न तो कॉन्ग्रेस ने वह ऐतिहासिक स्थान दिया जिसके वे हकदार थे, और न ही देश के वामपंथी (लेफ्ट) विचारकों ने उन्हें कभी खुलकर अपनाया।
आइए बाबू जगजीवन राम की पुण्यतिथि पर समझते हैं कि छुआछूत और सामाजिक असमानता के खिलाफ लड़ाई में बाबूजी और डॉ. आंबेडकर के रास्तों में क्या बुनियादी अंतर था और क्यों बाबूजी को इतिहास में वह स्थान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे।
छुआछूत बनाम जाति के मामले में दोनों नेताओं की वैचारिक समझ का अंतर
बाबू जगजीवन राम और डॉ. भीमराव आंबेडकर दोनों का अंतिम लक्ष्य एक ही था दलितों और शोषितों को समाज में समानता, सम्मान और अधिकार दिलाना। लेकिन इस बीमारी के कारणों और उसके इलाज को लेकर दोनों की समझ में गहरा अंतर था। बाबू जगजीवन राम छुआछूत को हिंदू समाज की एक विकृति या सामाजिक समस्या मानते थे। उनका मानना था कि समय के साथ हिंदू समाज में कुछ कुरीतियाँ और पाप प्रवेश कर गए हैं, जिन्हें दूर किया जा सकता है।
इसके विपरीत डॉ. आंबेडकर जाति प्रथा को केवल एक सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि हिंदू धर्म के धार्मिक ग्रंथों और उसके सामाजिक ढाँचे का अभिन्न हिस्सा मानते थे। आंबेडकर का मानना था कि जब तक इस ढाँचे को पूरी तरह चुनौती नहीं दी जाएगी, तब तक सामाजिक न्याय संभव नहीं है।
इसी वैचारिक अंतर के कारण दोनों के कार्य करने के तरीकों में भी भिन्नता आई। बाबूजी का दृढ़ विश्वास था कि हिंदू समाज के भीतर रहकर ही इस सामाजिक बुराई के खिलाफ लड़ना सबसे प्रभावी तरीका है। वे गाँधी-नेहरू विचारधारा से प्रभावित थे और मानते थे कि व्यापक समाज को साथ लिए बिना स्थाई बदलाव नहीं आ सकता। वहीं आंबेडकर का मानना था कि हिंदू सामाजिक व्यवस्था के भीतर दलितों को कभी भी पूर्ण समानता नहीं मिल सकती, इसलिए वे कानून, संविधान और स्वतंत्र आंदोलनों के जरिए व्यवस्था परिवर्तन के पैरोकार थे।
धर्म परिवर्तन पर था अलग दृष्टिकोण, ‘सनातन पहचान’ बनाम ‘बौद्ध धम्म’ का रास्ता
दोनों नेताओं के बीच सबसे बड़ा और स्पष्ट वैचारिक टकराव धार्मिक पहचान और धर्म परिवर्तन के मुद्दे पर था। सोशल मीडिया पर अक्सर जगजीवन राम के ऐतिहासिक भाषणों और बयानों से जुड़ी कतरनें चर्चा का विषय बनती हैं, जो वास्तव में उनके गहरे धार्मिक और राष्ट्रीय स्वाभिमान को रेखांकित करती हैं। अकादमिक शोध पत्रों से जुड़े ऐतिहासिक दस्तावेजों में इस वैचारिक संघर्ष के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं।
Reassessing Religion and Politics in the Life of Jagjivan Rām नाम के रिसर्च पेपर में दर्ज विवरणों के अनुसार, बाबू जगजीवन राम ने 1931 में पटना में ‘अछूतोद्धार सभा’ के एक सम्मेलन में (जहाँ मुख्य अतिथि डॉ. राजेंद्र प्रसाद थे) एक बेहद कड़ा और ऐतिहासिक भाषण दिया था। जगजीवन राम ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि सवर्ण हिंदुओं द्वारा दलितों को मांस छोड़ने, शराब छोड़ने और पवित्र जीवन जीने के उपदेश देने का समय अब चला गया है। अब दलितों को उपदेश नहीं, बल्कि उचित व्यवहार और ठोस कार्रवाई की जरूरत है।
जगजीवन राम ने कहा था कि मोहम्मद अली जिन्ना मुसलमानों के लिए अलग देश की माँग कर रहे हैं और डॉ. आंबेडकर अलग निर्वाचन क्षेत्र के लिए आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन मैं किसी भी प्रकार के धार्मिक धर्मांतरण के खिलाफ हूँ। हम अछूत हिंदू हैं, हम हिंदू पैदा हुए हैं, हिंदू रहेंगे और हिंदू ही मरेंगे। हमने इस राष्ट्र का निर्माण किया है; हम राष्ट्र द्वारा निर्मित नहीं हुए हैं, यह राष्ट्र हमारा है।

इंटरनेशनल जर्नल ऑफ रिसर्च पब्लिकेशन एंड रिव्यूज में प्रकाशित प्रगति पटेल के शोधपत्र – ‘एंपॉवरमेंट ऑफ द बैकवर्ड क्लासेस: कॉन्ट्रिब्यूशन ऑफ बाबू जगजीवन राम’ को पढ़ें तो उसमें साफ लिखा है कि जगजीवन राम का मानना था कि किसी दूसरे धर्म में चले जाना जातिवाद की बीमारी से मुक्ति पाने का सही तरीका नहीं है, क्योंकि जातिगत भेदभाव का जाल कमोबेश हर धर्म में फैल चुका है। उनका मानना था कि अपने मूल धर्म को छोड़ना एक तरह से समस्या से भागने जैसी कायरता है; बहादुरी इसमें है कि आप समाज के भीतर रहकर बुराइयों से लड़ें और उसे सुधारें।
मुख्यधारा की राजनीति बनाम स्वतंत्र दलित नेतृत्व वाली राजनीति का रास्ता
बाबू जगजीवन राम और डॉ आंबेडकर को राजनीतिक रणनीति के मामले में देखें, तो इसमें भी दोनों दिग्गजों के रास्ते पूरी तरह अलग थे। बाबू जगजीवन राम चाहते थे कि दलित समाज देश की मुख्यधारा की राजनीति का हिस्सा बने। इसी सोच के तहत वे भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस में शामिल हुए और अखिल भारतीय शोषित वर्ग लीग (All India Depressed Classes League) के माध्यम से दलित युवाओं को संगठित किया। उनका मानना था कि सत्ता और शासन के शीर्ष पर बैठकर देश की मुख्यधारा के साथ मिलकर नीतियाँ बनाने से दलितों का अधिक भला होगा।
इसके विपरीत डॉ. आंबेडकर एक स्वतंत्र दलित राजनीतिक नेतृत्व और स्वतंत्र राजनीतिक दलों के गठन के पैरोकार थे। उनका मानना था कि मुख्यधारा के दलों में शामिल होकर दलित नेता अपनी स्वतंत्र आवाज खो देते हैं और सवर्ण नेतृत्व के अधीन हो जाते हैं।
बाबूजी का अनूठा ‘रेलवे प्रयोग’, मानसिकता बदलने की एक अनूठी सोशल इंजीनियरिंग
बाबू जगजीवन राम केवल बातों के बैरिस्टर नहीं थे, वे एक बेहद कुशल और व्यावहारिक प्रशासक थे। जब वे देश के रेल मंत्री बने, तो उन्होंने छुआछूत की मानसिकता पर चोट करने के लिए एक ऐसा क्रांतिकारी और व्यावहारिक कदम उठाया जो भारतीय प्रशासनिक इतिहास में अमर है। आमतौर पर आरक्षण या सकारात्मक भेदभाव को केवल सरकारी नौकरियों या उच्च पदों तक सीमित देखा जाता है, लेकिन बाबूजी ने इंसानी स्वभाव और मनोविज्ञान को ध्यान में रखकर एक अनोखा आरक्षण लागू किया। उन्होंने रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों को मुफ्त पानी पिलाने (Watermen) के पदों पर बड़े पैमाने पर दलितों की भर्ती करने का आदेश दिया।
यह एक बेहद गहरा और रणनीतिक कदम था। भारत की झुलसा देने वाली तपती गर्मी में जब कोई सवर्ण यात्री प्यास से व्याकुल होता, तो उसके सामने दो ही रास्ते होते या तो वह छुआछूत के अपने अहंकार को छोड़कर उस दलित कर्मचारी के हाथ से पानी पी ले और अपनी जान बचाए या फिर प्यासा तड़पता रहे।
इस प्रयोग ने सवर्ण समाज की उस मानसिकता पर सीधा प्रहार किया जो दलितों को छूने तक से कतराती थी। जब लोगों ने प्यास के मारे तड़पते हुए दलितों के हाथों से पानी पीना शुरू किया, तो सदियों पुरानी छुआछूत की मानसिक दीवारें अपने आप ढहने लगीं। यह एक क्रांतिकारी कदम था, लेकिन इसमें आंबेडकर के दृष्टिकोण की तरह कोई कटुता या शत्रुता नहीं थी। यह समाज को बिना तोड़े, उसकी बुनियादी इंसानी जरूरत के जरिए सुधारने का एक बेजोड़ तरीका था।
संत परंपरा और ‘बेगमपुरा’ की परिकल्पना जैसी आध्यात्मिक ताकत
वामपंथी और आधुनिक सेक्युलर विचारक अक्सर बाबू जगजीवन राम को केवल एक धर्मनिरपेक्ष राजनेता के रूप में देखते हैं, लेकिन अकादमिक शोध बताते हैं कि बाबूजी के राजनीतिक विचार उनकी गहरी धार्मिक और आध्यात्मिक जड़ों से जुड़े थे। बाबूजी का परिवार ‘शिव नारायणी’ संत परंपरा से जुड़ा था और वे स्वयं मध्यकालीन दलित संत गुरु रविदास के बहुत बड़े भक्त और अनुयायी थे।
साल 1980 में आई अपनी पुस्तक ‘Caste Challenge in India’ में बाबूजी ने लिखा था कि भारत में बुद्ध से लेकर कबीर, नानक, रविदास, एकनाथ, तुकाराम और महात्मा गाँधी जैसे संतों ने हमेशा भगवान के सामने सभी मनुष्यों की समानता की बात की। बाबूजी का मानना था कि जातिवाद को खत्म करने के लिए तीनतरफा हमले की जरूरत है, जिसमें कानून, आर्थिक विकास और आरक्षण शामिल हैं।
साल 1986 में अपने निधन से कुछ समय पहले उन्होंने ‘रविदास’ पत्रिका में एक बेहद प्रभावशाली लेख लिखा था, जिसका शीर्षक था- “ईश्वर के अंशधरों के प्रतीक के रूप में गुरु रविदास”। इस लेख में उन्होंने गुरु रविदास के प्रसिद्ध पद ‘बेगमपुरा’ (गम से रहित शहर) का जिक्र किया था।
‘बेगमपुरा’ एक ऐसे आदर्श समाज की परिकल्पना है जहाँ कोई दुःख, चिंता या डर न हो, कोई टैक्स या भेदभाव न हो और सभी लोग बराबर हों तथा किसी को भी कहीं भी आने-जाने से न रोका जाए।
जगजीवन राम ने कबीर, नामदेव और रविदास के दोहों का हवाला देते हुए यह साबित किया कि भारतीय अध्यात्म और संत परंपरा में पहले से ही ऊँच-नीच और धार्मिक कट्टरता के खिलाफ बेहद मजबूत विद्रोह मौजूद रहा है। वे इसी उदारवादी, समतावादी और समावेशी हिंदू संत परंपरा के बल पर समाज को बदलना चाहते थे, न कि पश्चिमी सिद्धांतों या धर्म-विरोधी विचारों के सहारे।
कॉन्ग्रेस और लेफ्ट ने क्यों नहीं दिया बाबूजी को उनका हक?
इतने विशाल व्यक्तित्व, दूरदर्शी सोच और देश के सबसे लंबे समय तक कैबिनेट मंत्री रहने वाले नेता को इतिहास में वह गौरवशाली स्थान क्यों नहीं मिला जो डॉ. आंबेडकर या अन्य नेताओं को मिला?
इसके पीछे साफ तौर पर राजनीतिक और वैचारिक कारण थे। पहली वजह कॉन्ग्रेस की बेरुखी थी, जो उनके इंदिरा गाँधी से विद्रोह के बाद पैदा हुई। बाबू जगजीवन राम दशकों तक कॉन्ग्रेस के संकटमोचक रहे। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय वे देश के रक्षा मंत्री थे, जब भारत ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की और बांग्लादेश का निर्माण हुआ। लेकिन 1977 में आपातकाल के बाद बाबूजी ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए इंदिरा गाँधी के खिलाफ विद्रोह कर दिया। उन्होंने कॉन्ग्रेस छोड़कर ‘कॉन्ग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’ बनाई और जनता पार्टी की सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई। कॉन्ग्रेस इस विद्रोह को कभी पचा नहीं पाई, जिसके कारण बाद के वर्षों में कॉन्ग्रेस के इतिहास और प्रचार-प्रसार से बाबूजी के योगदान को धीरे-धीरे हाशिए पर धकेल दिया गया।
दूसरी वजह लेफ्ट यानी वामपंथ द्वारा उनकी उपेक्षा की जानी थी, जिसका कारण उनका हिंदू धर्म से नफरत न करना था। भारत के वामपंथी और प्रगतिशील विचारकों ने हमेशा उसी दलित विमर्श को बढ़ावा दिया जो हिंदू धर्म, उसके ग्रंथों और उसकी संस्कृति के प्रति आक्रामक या पूरी तरह शत्रुतापूर्ण रुख रखता था।
चूँकि बाबू जगजीवन राम गर्व से खुद को हिंदू कहते थे, कबीर-रविदास की परंपरा पर गर्व करते थे और हिंदू समाज के भीतर से सुधार के पैरोकार थे, इसलिए लेफ्ट ने उन्हें कभी अपना प्रतीक पुरुष नहीं माना. वामपंथी बुद्धिजीवियों के लिए बाबूजी का यह रुख उनकी वैचारिक लाइन में फिट नहीं बैठता था।
हिंदू धर्म से नफरत न करने के चलते भुला दिए गए बाबू जगजीवन राम?
आज जब हम बाबू जगजीवन राम को उनकी पुण्यतिथि पर याद करते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता कि डॉ. आंबेडकर और बाबूजी के बीच का अंतर किसी वैमनस्य का नहीं, बल्कि दो महान मस्तिष्कियों के बीच का अकादमिक और रणनीतिक मतभेद था। दोनों ही नेता अपने समाज को न्याय दिलाना चाहते थे। आंबेडकर का रास्ता संवैधानिक, कानूनी और अंततः धर्मांतरण का था, तो बाबूजी का रास्ता व्यावहारिक प्रशासन, मुख्यधारा की राजनीति और देश की मूल संत-संस्कृति के भीतर रहकर हृदय-परिवर्तन कराने का था।
बाबूजी को केवल इसलिए भुला दिया जाना कि वे हिंदू धर्म से नफरत नहीं करते थे या उन्होंने एक समय पर राजनीतिक सत्ता को चुनौती दी थी, इस महान राष्ट्र नायक के साथ सरासर अन्याय है। समय आ गया है कि देश के इस सच्चे, निडर और व्यावहारिक सपूत को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर इतिहास की पाठ्यपुस्तकों और जनमानस में उनका वास्तविक और उचित स्थान दिया जाए।


