IIT कानपुर के डायरेक्टर प्रोफेसर मणिंद्र अग्रवाल ने केंद्र सरकार के प्रस्तावित विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (VBSA) विधेयक 2025 का संस्थान द्वारा विरोध किए जाने के दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने कहा कि ‘द हिंदू’ की एक रिपोर्ट में उनके बयान को भ्रामक तरीके से पेश किया गया, जिससे गलत संदेश गया।
प्रोफेसर अग्रवाल ने अपने आधिकारिक एक्स अकाउंट पर पोस्ट साझा करते हुए स्पष्ट किया कि IIT कानपुर ने इस प्रस्तावित विधेयक का विरोध नहीं किया है। उन्होंने बताया कि संसदीय समिति के समक्ष अपनी प्रेजेंटेशन के दौरान उन्होंने इस विधेयक का स्वागत किया था और इसके प्रति सकारात्मक रुख व्यक्त किया था।
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— Manindra Agrawal (@agrawalmanindra) July 11, 2026
A misleading headline by @the_hindu. IIT Kanpur did NOT oppose the bill. In fact, in my presentation, I welcomed the bill as it addresses certain longstanding issues and protects the autonomy of IITs/IIMs. I also made a couple of suggestions including one…
प्रोफेसर मणिंद्र अग्रवाल ने लिखा, ” द हिंदू ने भ्रामक हेडलाइन पब्लिश की है। IIT कानपुर ने इस विधेयक का विरोध नहीं किया है। बल्कि संसदीय समिति के समक्ष अपनी प्रेजेंटेशन में मैंने इस विधेयक का स्वागत किया था, क्योंकि यह लंबे समय से चली आ रही कुछ समस्याओं का समाधान करता है और IIT व IIM की स्वायत्ता की रक्षा करता है।”
प्रोफेसर ने आगे कहा कि उन्होंने विधेयक का विरोध नहीं किया, बल्कि इसमें कुछ सुधार के सुझाव दिए थे। इनमें IIT की स्वायत्तता को और अधिक प्रभावी ढंग से सुरक्षित रखने से जुड़ी सिफारिशें भी शामिल थीं। उन्होंने कहा, “मैंने कुछ सुझाव दिए थे, जिनमें एक सुझाव IIT की स्वायत्तता को और बेहतर तरीके से सुनिश्चित करने से संबंधित था। इसे विधेयक का विरोध बताना तथ्यों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना है।”

बता दें कि प्रोफेसर अग्रवाल ने यह सफाई द हिंदू के 11 जुलाई 2026 को ‘IIT, IIMs push back against VBSA norms’ हेडलाइन के साथ प्रकाशित इस रिपोर्ट पर दी है। रिपोर्ट में दावा किया गया था कि IIT और IIM समेत कई राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों ने प्रस्तावित VBSA विधेयक 2025 के कुछ प्रावधानों पर चिंता जताई है और कुछ धाराओं से छूट देने की माँग की है।
क्या हैं VBSA के नियम?
विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (VBSA) विधेयक 2025 का उद्देश्य देश की उच्च शिक्षा नियामक व्यवस्था में व्यापक बदलाव लाना है। इस प्रस्तावित कानून के तहत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) जैसी मौजूदा नियामक संस्थाओं की जगह VBSA नाम का एकीकृत शीर्ष संस्था गठित करने का प्रस्ताव है।
प्रस्ताव के अनुसार, यह नई संस्था अपने अधीन गठित विभिन्न परिषदों के माध्यम से देशभर के उच्च शिक्षण संस्थानों के विनियमन, मान्यता और शैक्षणिक मानकों की निगरानी करेगी।
केंद्र सरकार का कहना है कि इस विधेयक से उच्च शिक्षा की नियामक व्यवस्था अधिक सरल और समन्वित होगी, जिससे तमाम संस्थाओं के बीच बेहतर तालमेल स्थापित किया जा सकेगा। हालाँकि, कई विश्वविद्यालयों और राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों ने आशंका जताई है कि विधेयक के कुछ प्रावधान संस्थानों की स्वायत्तता को प्रभावित कर सकते हैं और निर्णय लेने की प्रक्रिया का ज्यादा केंद्रीकरण हो सकता है।
फिलहाल इस प्रस्तावित विधेयक की समीक्षा भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सांसद डी पुरंदेश्वरी की अध्यक्षता वाली संयुक्त संसदीय समिति (JPC) कर रही है।

