US में केस खत्म करने के बदले कोई डील नहीं: गौतम अडानी ने अदालत में शपथपत्र देकर खारिज की सभी अटकलें

अडानी समूह के चेयरमैन गौतम अडानी ने अमेरिका में उनके खिलाफ दायर आपराधिक मामले को वापस लेने के पीछे किसी भी तरह के गुप्त समझौते, वादे या लेन-देन की अटकलों को सिरे से खारिज कर दिया है।

अमेरिका के न्यूयॉर्क के ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट की जिला अदालत में दायर शपथपत्र में अडानी ने स्पष्ट कहा कि उन्हें ऐसी किसी भी बात की जानकारी नहीं है, जिसमें अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) द्वारा आरोप वापस लेने के बदले किसी प्रकार का वादा, प्रस्ताव, समझौता या किसी तरह का लाभ दिया गया हो।

अदालत ने यह शपथपत्र इसलिए माँगा था ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि मामले को वापस लेने का फैसला पूरी तरह निष्पक्ष और बिना किसी छिपे हुए समझौते के लिया गया है।

जज के आदेश पर दायर किया गया शपथपत्र

यह शपथपत्र 8 जुलाई को अमेरिकी जिला न्यायाधीश निकोलस गराउफिस के आदेश के बाद दाखिल किया गया। न्यायाधीश ने गौतम अडानी से शपथपूर्वक यह स्पष्ट करने को कहा था कि क्या उन्हें किसी ऐसे वादे, प्रस्ताव, समझौते या किसी मूल्य के आदान-प्रदान की जानकारी है, जिसका संबंध न्याय विभाग द्वारा मुकदमा वापस लेने से हो।

अदालत ने यह स्पष्टीकरण इसलिए माँगा क्योंकि वह न्याय विभाग की उस याचिका पर फैसला करने जा रही है, जिसमें मामले को विद प्रेजुडिस यानी स्थायी रूप से समाप्त करने की माँग की गई है। अदालत यह सुनिश्चित करना चाहती है कि मुकदमा वापस लेने के पीछे कोई छिपा हुआ समझौता या अनुचित कारण न हो।

क्या था पूरा मामला?

यह आपराधिक अभियोग नवंबर 2024 में तत्कालीन बाइडेन प्रशासन के अंतिम दिनों में दायर किया गया था। इसमें गौतम अडानी समेत आठ लोगों पर भारतीय अधिकारियों को लगभग 25 करोड़ अमेरिकी डॉलर  की रिश्वत देकर बिजली आपूर्ति से जुड़े ठेके हासिल करने का आरोप लगाया गया था।

इसके अलावा आरोप था कि अडानी समूह ने अमेरिकी बाजारों से पूंजी जुटाने के दौरान निवेशकों को गुमराह किया। हालाँकि अडानी समूह ने शुरुआत से ही इन सभी आरोपों को निराधार और तथ्यों से परे बताया तथा लगातार इनका खंडन करता रहा।

इन आरोपों के सार्वजनिक होने के बाद अडानी समूह की सूचीबद्ध कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट आई थी। केवल चार कारोबारी सत्रों में समूह के बाजार पूंजीकरण में करीब 2.85 लाख करोड़ रुपए की कमी दर्ज की गई, जिससे लाखों निवेशकों पर असर पड़ा।

10 अरब डॉलर के निवेश और केस वापस लेने के दावे पर क्या बोले अडानी?

गौतम अडानी ने अपने शपथपत्र में यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका में 10 अरब डॉलर निवेश करने की अडानी समूह की योजना का इस मामले को वापस लेने से कोई संबंध नहीं है।

उन्होंने कहा कि यह निवेश योजना 13 नवंबर 2024 को सार्वजनिक रूप से घोषित कर दी गई थी, जबकि अभियोग बाद में सामने आया। अडानी समूह की ओर से कानूनी फर्म सुलिवन एंड क्रॉमवेल LLP ने अमेरिकी न्याय विभाग और सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) के अधिकारियों से बातचीत की थी। इस दौरान एक श्वेतपत्र और विशेषज्ञों की रिपोर्ट भी सौंपी गई थी।

कानूनी टीम ने यह जरूर कहा था कि यदि अमेरिकी अधिकारी उचित समझें तो प्रस्तावित निवेश किसी व्यापक समाधान का हिस्सा बन सकता है, लेकिन अमेरिकी न्याय विभाग ने स्पष्ट कर दिया था कि निवेश योजनाओं का मामले को वापस लेने के फैसले पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। अडानी ने शपथपत्र में दोहराया कि निवेश प्रस्ताव ने न्याय विभाग के अंतिम निर्णय में कोई भूमिका नहीं निभाई।

न्याय विभाग ने भी मीडिया रिपोर्टों को बताया था गलत

इससे पहले 4 जुलाई को अमेरिकी न्याय विभाग ने भी उन मीडिया रिपोर्टों का खंडन किया था, जिनमें दावा किया गया था कि अडानी समूह के निवेश प्रस्ताव के कारण मामला वापस लिया गया।

न्याय विभाग के प्रधान एसोसिएट डिप्टी अटॉर्नी जनरल आर ट्रेंट मैककॉटर ने अदालत में दायर दस्तावेज में कहा था कि मुकदमा वापस लेने का फैसला उन्होंने स्वतंत्र रूप से लिया और यह निर्णय किसी निवेश प्रस्ताव से प्रभावित नहीं था। उन्होंने कहा कि यदि निवेश का कोई उल्लेख भी नहीं होता, तब भी वह यही फैसला लेते।

उन्होंने मुकदमा वापस लेने के पीछे कई कानूनी और साक्ष्य संबंधी कारण गिनाए। उनके अनुसार कथित घटनाएं मुख्य रूप से भारत में हुई थीं, निवेशकों के किसी प्रत्यक्ष नुकसान की पहचान नहीं हुई थी और इन मामलों की जाँच भारतीय एजेंसियाँ पहले से कर रही थीं।

इसके अलावा उन्होंने कहा कि फॉरेन करप्ट प्रैक्टिसेज एक्ट (FCPA) के तहत लगाए गए आरोप वर्तमान ट्रंप प्रशासन की प्रवर्तन प्राथमिकताओं से मेल नहीं खाते, क्योंकि सरकार का ध्यान राष्ट्रीय सुरक्षा, अमेरिकी कंपनियों और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक संगठनों से जुड़े मामलों पर अधिक है।

अब अदालत के अंतिम फैसले का इंतजार

हालांकि न्यायाधीश निकोलस गराउफिस ने यह भी कहा था कि मैककॉटर के हलफनामे में पहली बार किसी संभावित समझौते की संभावना का उल्लेख सामने आया, इसलिए गौतम अडानी से शपथपत्र के माध्यम से स्पष्ट जवाब लेना आवश्यक हो गया।

अब अडानी का शपथपत्र अदालत के रिकॉर्ड का हिस्सा बन चुका है। इसके बाद अदालत न्याय विभाग की उस याचिका पर फैसला करेगी, जिसमें मामले को स्थायी रूप से समाप्त करने की माँग की गई है। यदि अदालत इस याचिका को स्वीकार कर लेती है, तो यह बहुचर्चित मामला हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा।

इस घटनाक्रम को लंबे समय से चर्चा में रहे इस अंतरराष्ट्रीय मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है। अडानी समूह लगातार यही कहता रहा है कि उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों का कोई आधार नहीं था और उसने अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा मामला वापस लेने के फैसले का स्वागत किया है।