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FIFA विश्वकप के बीच जानाें ब्राजील के महान फुटबॉलर ‘माने गारिंचा’ की कहानी, जिसने अपंगता को मात दे दुनिया को मुस्कुराना सिखाया: लोगों ने कहा – ‘पीपुल्स जॉय’

गारिंचा ने ब्राजील को 1958 और 1962 में विश्व कप जिताया। वे एक ही विश्व कप में गोल्डन बॉल, गोल्डन बूट और खिताब जीतने वाले पहले खिलाड़ी बने। वे जब तक खेले, ब्राजील केवल एक मैच हारा।

मैं कंडोलिया मैदान के पास एक दुकान से चाय लेकर पी रहा था। दुकान के चारों तरफ पाँच-दस मीटर तक अदरक इलायची की महक थी। मेरे सामने इक टूटी हुई कुर्सी पड़ी थी जिसने न जाने कितनी बरसातें और न जाने कितनी बर्फबारी झेली थी। मैं अपनी चाय लिए उस कुर्सी पर जाकर पसर गया। मौसम एकदम साफ था। हाँ, बारिश के बाद ठंड जरूर बड़ गई थी। जब ठंड के मारे सारा बदन काँप रहा हो तो अदरक इलायची की चाय से ज्यादा सुकून कुछ भी नहीं देता।

चारों तरफ खूबसूरत पहाड़ थे। पीछे कंडोलिया मंदिर की तरफ से चिड़ियों और मंदिर की घंटियों का कोरस साफ सुनाई दे रहा था। बगल से ही इक सर्पीली सड़क नीचे मुख्य बाजार की ओर जा रही थी। नीचे मुख्य बाजार की ओर देखने पर, कोटद्वार, श्रीनगर और रुद्रप्रयाग को जाने वाली बसें और मुसाफिर साफ दिख रहे थे।

सुबह के छह बज रहे थे। सब्जी वाले अपने ठेले लगाने लगे थे और घर घर अखबार डालने वाले अपनी एटलस साइकिल ले अपने मिशन पर निकल चुके थे। पिछली रात, यही कोई दो बजे के आसपास, पुलिस कॉलोनी की तरफ बाघ आया था। चाय की दुकान पर सब वही बात कर रहे थे।

“बल भैजी, मैंने तो ये बी सुना की ध्यानी मास्टर ने बाघ को खुला चैलेंज दे दिया की बेट्टे फिर नी आणा तू यहाँ बतारा हूँ हाँ।”

मैदान में अब फुटबॉल खेलने वाले बच्चों का जमावड़ा होने लगा था। कई नन्हें मैसी-नेमार कोच के आने से पहले मैदान में बॉल को लेकर हँसते-खेलते जादुई करतब कर रहे थे। कोच के आते ही उन्हें मैदान के चक्कर लगाने पड़ते हैं और फिर बोरिंग एक्सरसाइज करनी पड़ती है। यह मैं पिछली तीन सुबहों से रोज मुस्कुराते हुए देख रहा हूँ। हालाँकि मैं इस बात से पूर्णतः सहमत हूँ कि कोच साब की बोरिंग एक्सरसाइज से जिसने भी दिल लगा लिया, उसका जीवन संवर जाता है परन्तु मेरा यह भी मानना है कि यह हमारे भीतर छुपा जादू ही है जो हमारे जीवन में रंग भरता है।

हमारा संपूर्ण जीवन भी कंडोलिया मैदान में चल रहे फुटबॉल सा ही तो है। हमारे चारों तरफ नटखट चीड़-देवदार हैं जो हमें अपनी ओर बुला रहे होते हैं। चिड़ियों के मीठे गीत हैं। बर्फ़ से लकदक पहाड़ियाँ हैं, जिनसे कभी भी मन नहीं भरता। पास ही चाय की दुकान पर हैं हर ठंडी सुबह थड़क रहे रोचक किस्से कहानियाँ। लेकिन हम इन सब को पीछे छोड़ एक बोरिंग रुटीन को गले लगा लेते हैं।

मुझे बार बार पौड़ी लौटना बेहद पसंद है। मैं जब भी कभी शहरों की दौड़ भाग में खुद को खोता हुआ पाता हूँ तो पौड़ी का एक चक्कर लगा आता हूँ।

यहाँ आकर ठंडी सुबहों में कंडोलिया मैदान के पास चाय लिए बैठे दूर श्रीनगर-सुमाड़ी की दिशा में दिखते, मफलर पहने, शांत खड़े पहाड़ों और मैदान में खेलते नन्हें बच्चों को घंटो देखते रहता हूँ। ऐसा करते हुए पता ही नहीं चलता कब चेहरे से खो गई मुस्कान, इक रंगीन लिफाफे में, वापस अपने पते पर लौट आती है।

कुछ जगहें और कुछ लोग होते हैं ना, जो आपको कुछ पलों के लिए ही सही, आपकी सारी परेशानियों से दूर ले जाते हैं- कंडोलिया के इस मैदान से कुछ ऐसा ही रिश्ता है मेरा। खैर अब तो बरसों हो गए कंडोलिया का मैदान देखे। मगर क्या आप जानते हैं, कभी ब्राजील की भूमि में एक ऐसा खिलाड़ी भी हुआ था जिसे आम जनमानस ने ‘पीपुल्स जॉय’ कहा था। जब भी वह शख्स मैदान पर उतरता, तमाम लोग अपने दर्द भूल कर कुछ पल मुस्कुराने लगते थे। आज बात करते हैं ‘पीपुल्स जॉय’ की।

28 अक्टूबर, 1933 के दिन ब्राज़ील के रियो डी जनेरियो राज्य के सुदूर दक्षिण में स्थित एक छोटे से गांव पाऊ ग्रान्डे में जन्मा था एक लड़का: मैनुएल फ्रांसिस्को दोस सांतोस ।

बालक मैनुएल का जब जन्म हुआ तो उसकी बाईं टाँग उसकी दाईं टाँग से 6 सेमी बड़ी थी और उसकी बाईं टाँग बाहर की दिशा में तो दाईं टाँग अंदर की दिशा में मुड़ी हुई थी। इसके चलते डॉक्टरों को उस नन्हे बच्चे को पैदा होते ही अपंग घोषित कर देना पड़ा था।

क्यूँकि वह लड़का, जिसे सब माने-माने कहा करते, अपने हमउम्र बच्चों से कद काठी में छोटा था तो उसकी बहन ने उसका नाम गारिंचा (एक नन्हीं सी भूरी चिड़िया) रख दिया। और ऐसे मैनुएल हो गया माने गारिंचा।

गारिंचा सड़कों और गलियों में फुटबॉल खेलता था। वह रियो की सड़कों का राजकुमार था। उसको फुटबॉल का प्रोफेशनल खिलाड़ी कभी नहीं बनना था। वो तो ताउम्र यूँ ही रियो की सड़कों पर ड्रिब्लिंग करते रहना चाहता था।

आपको यह जानकर हैरानी होगी की जब गारिंचा ने अपना बोटाफोगो क्लब से एक खिलाड़ी के तौर पर आधिकारिक करार किया तो उनकी उम्र बीस वर्ष थी और वो न सिर्फ शादीशुदा थे बल्कि उनकी संतानें भी थीं। उन्होंने अपने पहले ही ट्रेनिंग सेशन में उन दिनों ब्राज़ीली डिफेंस की दीवार कहे जाने वाले ‘निल्टन सांतोस’ को अपनी बेमिसाल ड्रिब्लिंग के आगे लाचार कर दिया था। पूरा बोटाफोगो क्लब यह देखकर आश्चर्यचकित था।

वेल्स नैशनल टीम के मशहूर डिफेंडर मेल होपकिंस ने 1958 विश्व कप में ब्राज़ील के खिलाफ हुए मुकाबले के बाद कहा था,”गारिंचा हमारी टीम की डिफेंस के लिए पेले से ज्यादा खतरनाक था। उसका सामना करना किसी चक्रवात के दौरान सड़क पर निकलने जैसा था।”

गारिंचा, जिन्हें फ्रेंच अखबारों ने विश्व द्वारा देखा सबसे खतरनाक राइट विंगर घोषित किया था, ने ब्राज़ीली टीम के साथ लगातार दो विश्व-कप ट्रॉफियाँ जीतीं। 1958 और फिर 1962 के विश्व कप की जीत में गारिंचा की बड़ी भूमिका थी। 1962 के विश्व कप में अपने करिश्माई विज़न और जादुई ड्रिब्लिंग के दम पर सारी दुनिया को अपना दिवाना बना लेने वाले गारिंचा वह पहले खिलाड़ी बने जिन्होंने विश्व कप के एक ही संस्करण में गोल्डन बॉल, गोल्डन बूट और विश्व-कप का खिताब जीता।

जब वह खेल रहे होते थे तो स्टेडियम में मौजूद सभी दर्शकों की नजरें बस उन पर ही बनी रहती थीं। गेंद उनकी किसी माशूका की तरह बस उन्हीं के इर्दगिर्द मंडराती रहती।

वो अपना बॉडी पोस्चर यूँ बना लेते की लगता गेंद को फार-पोस्ट की ओर मारेंगे। विपक्षी डिफेंडर उस दिशा में कूद पड़ता और वो फेंट करके गेंद को नियर-पोस्ट की ओर बढ़ा देते।

विपक्षी टीम के पास उनकी कलाबाजियाँ देखने के अलावा कोई चारा नहीं होता था। उनके अंतिम मैच तक ऐसी कोई टीम नहीं थी जो उनका काट ढूँढ सकी हो। आप गूगल करेंगे तो आपको मालूम पड़ेगा की जबतक गारिंचा प्लेइंग इलेवन में रहे, ब्राज़ील ने सिर्फ एक बार ही कोई मैच हारा। यह ब्राज़ील के लिए उनका आखिरी मैच था। वो दो, तीन खिलाड़ियों नहीं बल्कि अकेले विपक्षियों की पूरी टीम को छका कर गोल स्कोर किया करते। और ऐसा वो लगभग हर मैच में करते। फुटबॉल के प्रशंसकों की एक बड़ी संख्या उन्हें पेले से बढ़कर मानती थी।

दो विश्वयुद्ध देख चुकी मायूस और उदास दुनिया में नन्हें गारिंचा लोगों को खुशियाँ देते थे। गेंद जब जब उनके पास आती, खेल प्रशंसक उत्साह से चीखने लगते। गारिंचा ने उनकी उदास शामों को खुशनुमा गीत दिए। एक अपंग लड़के गारिंचा की मैदान की दाईं फ्लैंक से लगातार विपक्षी खेमे में की गई ट्रेडमार्क घुसपैठों ने एकबार फिर आम नागरिकों को यकीन दिलाया था कि आम जिंदगी में भी चमत्कार होते हैं।

अमूमन जो लोग भूखमरी और गरीबी से जूझ रहे होते थे, वो मैच के बाद खुश होकर गारिंचा के नाम के नारे लगाते हुए घरों को लौटते। कई दफा तो गारिंचा अपनी ट्रेनिंग खत्म होते ही स्टेडियम परिसर की दीवार फांद बाहर चले जाते और सड़कों पर मजदूरों और फैक्ट्री वर्कर्स के संग घंटों लैटिन अमेरिकी संगीत का आनंद लेते और फुटबॉल खेलते रहते।

लोगों ने उन्हें यूँ ही नहीं ‘ऐलेग्रिया दो पोवो’ अर्थात पीपुल्स’ जॉय कहा था। वो वाकई सही मायनों में इस दुनिया में खुशियों का पैगाम लेकर आए थे।

यही इस खेल की खूबसूरती है। यह आम जनमानस की हथेलियों पर खुशियाँ धर देता है और उन्हें कुछ पल अपने तमाम दुख दर्द भूल कर मुस्कुराने की वजहें देता है।

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गौरव बडोला
गौरव बडोला
दिन में दिहाड़ी करता हूं, रात को कोरे कागज़ पर अपने ख्वाबों की दुनिया बुनता हूं। फुटबॉल और साहित्य को जीता हूं।

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