महाराष्ट्र सरकार ने अपनी प्रमुख मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहिन योजना के तहत अब तक का सबसे बड़ा लाभार्थी सत्यापन अभियान चलाया है। इस अभियान के बाद सरकार ने योजना से 92 लाख से अधिक लाभार्थियों के नाम हटा दिए हैं, जिससे योजना के कुल लाभार्थियों की संख्या में लगभग 38 प्रतिशत की कमी आ गई है।
यह बड़े पैमाने पर की गई कार्रवाई राज्यभर में चलाए गए सत्यापन अभियान के बाद हुई। जाँच में पता चला कि लाखों लाभार्थियों ने योजना के लिए जरूरी eKYC और अन्य अनिवार्य सत्यापन प्रक्रिया पूरी नहीं की, जबकि कई लोग योजना के तय पात्रता मानकों पर खरे नहीं उतरे। इस पूरी प्रक्रिया का राज्य की वित्तीय स्थिति पर भी बड़ा असर पड़ने वाला है।
इसी बीच भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने अपनी रिपोर्ट में वर्ष 2024-25 के दौरान इस योजना में 3,541 करोड़ रुपए के अतिरिक्त खर्च और वित्तीय प्रबंधन में कई कमियों की ओर ध्यान दिलाया था। वहीं अब 92 लाख से अधिक लाभार्थियों के नाम हटाए जाने के बाद सरकार पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ भी काफी कम होने की उम्मीद है।
अगर हटाए गए सभी लाभार्थियों को हर महीने मिलने वाली 1,500 रुपए की सहायता राशि आगे भी जारी रहती, तो सरकार को हर साल भारी खर्च उठाना पड़ता। लेकिन अब इन लाभार्थियों के हटने से राज्य सरकार की वार्षिक वित्तीय देनदारी में 16,500 करोड़ रुपए से अधिक की कमी आने का अनुमान है।
आइए अब विस्तार से समझते हैं कि यह फैसला क्यों लिया गया, किन कारणों से इतने बड़े पैमाने पर लाभार्थियों के नाम हटाए गए और इसका महाराष्ट्र की आर्थिक स्थिति पर क्या असर पड़ेगा।
क्या है लाडकी बहिन योजना
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले जून 2024 में मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहिन योजना को मंजूरी दी गई थी। महायुति सरकार ने इस योजना को महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत और आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से अपनी प्रमुख कल्याणकारी योजनाओं में शामिल किया था।
इस योजना के तहत ऐसे परिवारों की 21 से 65 वर्ष की पात्र महिलाओं को हर महीने 1,500 रुपए की आर्थिक सहायता सीधे उनके बैंक खाते में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के माध्यम से दी जाती है, जिनकी परिवार की वार्षिक आय 2.5 लाख रुपए से कम है। हालाँकि सरकारी कर्मचारी, आयकरदाता और कुछ अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ लेने वाले लोगों को इस योजना का लाभ नहीं दिया जाता।
योजना शुरू होने के बाद इसमें तेजी से लाभार्थियों की संख्या बढ़ी और इसके लिए बजट तथा अनुपूरक प्रावधानों के जरिए 60,000 करोड़ रुपए से अधिक का प्रावधान किया गया। एक समय इस योजना का लाभ करीब 2.43 करोड़ महिलाओं को मिल रहा था। लेकिन हाल ही में हुए सत्यापन अभियान के बाद लाभार्थियों की संख्या घटकर लगभग 1.5 करोड़ रह गई है।
महाराष्ट्र ने 92 लाख से ज्यादा लाभार्थियों को क्यों हटाया?
यह सत्यापन अभियान सितंबर 2025 में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य अपात्र लाभार्थियों की पहचान करना और यह सुनिश्चित करना था कि योजना का लाभ केवल वास्तविक पात्र महिलाओं को ही मिलता रहे। जाँच में सामने आया कि सबसे ज्यादा नाम किसी धोखाधड़ी के कारण नहीं हटाए गए, बल्कि इसलिए हटाए गए क्योंकि लाभार्थियों ने सरकार द्वारा अनिवार्य की गई इलेक्ट्रॉनिक नो योर कस्टमर (eKYC) प्रक्रिया पूरी नहीं की थी।
आँकड़ों के अनुसार, करीब 62 लाख लाभार्थियों, यानी कुल हटाए गए लोगों में लगभग 67 प्रतिशत, के नाम केवल eKYC पूरा न करने की वजह से सूची से हटा दिए गए।
इसके अलावा कई अन्य लाभार्थी योजना के नियमों के अनुसार अपात्र पाए गए।
करीब 16 लाख महिलाओं के परिवारों की वार्षिक आय योजना में तय 2.5 लाख रुपए की सीमा से अधिक निकली। वहीं सत्यापन के दौरान 4.42 लाख लाभार्थियों ने बताया कि वे स्वयं या उनके परिवार का कोई सदस्य सरकारी कर्मचारी है, जिसके कारण वे योजना के लिए पात्र नहीं थे।
जाँच में यह भी पता चला कि करीब 3.6 लाख महिलाएँ पहले से ही संजय गाँधी निराधार योजना का लाभ ले रही थीं। वहीं लगभग 2.5 लाख मामलों में एक ही परिवार के दो से अधिक सदस्य योजना का लाभ ले रहे थे, जो योजना के नियमों के खिलाफ है।
इसके अलावा करीब 1.8 लाख लाभार्थियों की उम्र 65 वर्ष से अधिक पाई गई, जबकि 1.7 लाख मामलों को जिला स्तर पर किए गए सत्यापन के दौरान संदिग्ध मानते हुए हटाया गया। जाँच में यह भी सामने आया कि करीब 29 हजार पुरुष और लगभग 8 हजार सरकारी कर्मचारी भी गलत तरीके से इस योजना का लाभ ले रहे थे, जबकि वे इसके लिए पात्र नहीं थे।
eKYC की प्रक्रिया इतनी देर से क्यों हुई?
इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए महाराष्ट्र की महिला एवं बाल विकास मंत्री अदिति तटकरे ने कहा कि योजना शुरू होने के तुरंत बाद सरकार eKYC प्रक्रिया शुरू नहीं कर सकी, क्योंकि इसके कुछ ही समय बाद राज्य में विधानसभा चुनाव की घोषणा हो गई थी और आदर्श आचार संहिता लागू हो गई थी।
अदिति तटकरे के अनुसार, योजना जून 2024 में शुरू की गई थी, जबकि इसकी पहली दो किस्तें अगस्त 2024 में एक साथ जारी की गई थीं। लेकिन अनिवार्य सत्यापन शुरू होने से पहले ही राज्य चुनावी प्रक्रिया में चला गया, जिसके कारण eKYC लागू करने में देरी हुई। नई सरकार के गठन के बाद अगस्त 2025 में सरकार ने राज्यभर में eKYC सत्यापन अभियान शुरू किया।
उन्होंने कहा कि लाभार्थियों को कई बार बताया गया था कि यदि वे eKYC पूरा नहीं करेंगे तो उनकी सहायता राशि बंद कर दी जाएगी। सरकार ने उन्हें प्रक्रिया पूरी करने के लिए कई अवसर दिए और इसकी समयसीमा बढ़ाकर 31 दिसंबर 2025 तक कर दी थी। मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार ने किसी भी लाभार्थी का नाम मनमाने तरीके से नहीं हटाया।
उनके अनुसार, जिन लोगों ने योजना में पंजीकरण कराया था और जो पात्र थे, उन्हें अनिवार्य सत्यापन प्रक्रिया पूरी होने तक लगातार योजना का लाभ मिलता रहा।

हटाए गए लाभार्थियों को पहले कितना भुगतान हुआ था?
सत्यापन अभियान से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, जिन लाभार्थियों के नाम बाद में योजना से हटाए गए, उन्हें भुगतान बंद होने से पहले कुल मिलाकर लगभग 14,000 करोड़ रुपए की सहायता राशि दी जा चुकी थी। अधिकारियों का अनुमान है कि जिन लाभार्थियों का भुगतान रोका गया, उन्हें औसतन करीब 10 महीने तक योजना का लाभ मिला।
हालाँकि सभी के लिए भुगतान बंद करने की कोई एक तय तारीख नहीं थी। सत्यापन के दौरान अलग-अलग चरणों में लाभार्थियों की जाँच हुई और उनकी पात्रता का पुनर्मूल्यांकन किया गया। इसी वजह से कुछ लोगों को दूसरों की तुलना में अधिक समय तक योजना का लाभ मिलता रहा, जबकि बाद में उन्हें अपात्र पाए जाने पर उनका भुगतान रोक दिया गया।
CAG रिपोर्ट में असल में क्या कहा गया था?
इसी दौरान जब लाभार्थियों का सत्यापन अभियान चल रहा था, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने भी लाडकी बहिन योजना के वित्तीय प्रबंधन को लेकर गंभीर सवाल उठाए। वित्त वर्ष 2024-25 की राज्य वित्त ऑडिट रिपोर्ट में CAG ने बताया कि महिला एवं बाल विकास विभाग ने 29,693.09 करोड़ रुपए के स्वीकृत बजट के मुकाबले 33,237.24 करोड़ रुपए खर्च किए।
इस तरह विभाग ने 3,541.16 करोड़ रुपए का अतिरिक्त व्यय किया। ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया कि इस अतिरिक्त खर्च के लिए कोई स्पष्ट या ठोस कारण नहीं बताया गया। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि जनवरी से मार्च 2025 के बीच 15,586 करोड़ रुपए को वर्चुअल पर्सनल डिपॉजिट अकाउंट (VPDA) में स्थानांतरित कर दिया गया, जबकि उस समय इन पैसों की तत्काल आवश्यकता नहीं थी।
CAG ने इसे गंभीर वित्तीय अनियमितता बताते हुए कहा कि बिना वास्तविक खर्च की जरूरत के सरकारी खजाने से धन निकालकर VPDA में जमा करना उचित वित्तीय प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है। कुल मिलाकर CAG ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि योजना के क्रियान्वयन के दौरान बजट का अनुमान लगाने, खर्च पर नियंत्रण रखने और वित्तीय प्रबंधन में कई महत्वपूर्ण कमियाँ रहीं।
ऑडिट रिपोर्ट में सरकार को सलाह दी गई कि भविष्य में इस तरह की बड़ी डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) योजनाओं के लिए बजट बनाते समय संभावित लाभार्थियों की संख्या का अधिक वास्तविक और सटीक आँकलन किया जाए।
लाभार्थियों के नाम हटाने का मामला CAG की जाँच-पड़ताल से कैसे जुड़ा है?
लाभार्थियों के सत्यापन अभियान और CAG की ऑडिट रिपोर्ट का अक्सर एक साथ जिक्र किया जा रहा है, लेकिन दोनों अलग-अलग मुद्दों से जुड़े हैं। CAG द्वारा बताई गई 3,541 करोड़ रुपए की राशि वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान स्वीकृत बजट से अधिक किए गए खर्च को दर्शाती है।
यह निष्कर्ष योजना के वित्तीय प्रबंधन और बजट के उपयोग से जुड़ा है, न कि इस बात से कि व्यक्तिगत लाभार्थी पात्र थे या नहीं। वहीं 92 लाख से अधिक लाभार्थियों के नाम हटाए जाने का असर सरकार के भविष्य के खर्च पर पड़ेगा। योजना के तहत प्रत्येक लाभार्थी को हर महीने 1,500 रुपए दिए जाते हैं।
ऐसे में 92 लाख लाभार्थियों के हटने से सरकार की सालाना भुगतान देनदारी में लगभग 16,560 करोड़ रुपए की कमी आएगी। सरल शब्दों में कहें तो यदि लाभार्थियों की संख्या आगे भी इसी स्तर पर बनी रहती है, तो इस सत्यापन अभियान के कारण सरकार को हर साल 16,500 करोड़ रुपए से अधिक की बचत हो सकती है।
यही वजह है कि 3,541 करोड़ रुपए और 16,560 करोड़ रुपए के आँकड़ों की सीधे तुलना नहीं की जा सकती। 3,541 करोड़ रुपए वह अतिरिक्त खर्च है, जो पहले ही किया जा चुका था और बाद में लाभार्थियों के नाम हटाने से उसे वापस नहीं पाया जा सकता। दूसरी ओर 16,560 करोड़ रुपए सरकार की संभावित वार्षिक बचत का अनुमान है, क्योंकि अब हटाए गए लाभार्थियों को हर महीने सहायता राशि नहीं देनी पड़ेगी।
हालाँकि लाभार्थियों के इस सत्यापन अभियान से CAG की उस प्रमुख चिंता का कुछ हद तक समाधान जरूर होता है, जिसमें कहा गया था कि भविष्य में ऐसी योजनाओं का बजट वास्तविक पात्र लाभार्थियों की संख्या के आधार पर तैयार किया जाना चाहिए, न कि बढ़ा-चढ़ाकर दर्ज की गई लाभार्थी संख्या के आधार पर।
(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)


