लाल किले के पास नवंबर 2025 में हुए कार ब्लास्ट के पीछे अलकायदा इन द इंडियन सबकॉन्टिनेंट (AQIS) का हाथ था। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की अलकायदा और इस्लामिक स्टेट पर प्रतिबंधों की निगरानी करने वाली टीम की 10 अगस्त को जारी रिपोर्ट में इस हमले को आधिकारिक तौर पर AQIS से जोड़ा गया है। नवंबर 2025 में हुए इस कार धमाके में 11 लोगों की मौत हुई थी और कई अन्य घायल हुए थे। धमाके से आसपास की संपत्ति को भी काफी नुकसान पहुँचा था।
UN की रिपोर्ट में बताया गया है कि AQIS अब पहले की तरह बिखरा हुआ संगठन नहीं रह गया है। उसने खुद को एक क्षेत्रीय आतंकी संगठन के रूप में विकसित किया है। संगठन ने अपने लिए लॉजिस्टिक्स और वित्तीय नेटवर्क तैयार किए हैं और अब बड़े संगठित समूहों के बजाय छोटे और अलग-अलग सेल के जरिए काम कर रहा है। रिपोर्ट में यह भी चिंता जताई गई है कि AQIS बांग्लादेश का इस्तेमाल वहाँ अपने आतंकी सेल स्थापित करने के लिए करने की कोशिश कर सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, AQIS का नेतृत्व अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में बना हुआ है। उसके नेताओं को वहाँ तजकीरा यानी राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी किए जाने की बात सामने आई है। इससे तालिबान और AQIS के बीच करीबी सहयोग की ओर संकेत मिलता है।
भारत में लाल किले के पास हुए धमाके की जाँच राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने की थी। मई 2026 में NIA ने इस मामले में 10 आरोपितों के खिलाफ लगभग 7,500 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की थी। बाद में एजेंसी ने 3 और आरोपितों के खिलाफ पूरक चार्जशीट दाखिल की।
NIA के अनुसार, चार्जशीट में शामिल सभी 10 आरोपित जिनमें मुख्य हमलावर डॉ. उमर उन नबी भी शामिल था, अंसार गजवात-उल-हिंद (AGuH) से जुड़े थे। AGuH को AQIS का एक धड़ा बताया गया है। उमर उन नबी की धमाके में मौत हो गई थी। वह जम्मू-कश्मीर के पुलवामा का रहने वाला था और हरियाणा के फरीदाबाद स्थित अल-फलाह यूनिवर्सिटी में मेडिसिन का असिस्टेंट प्रोफेसर रह चुका था।
NIA ने बताया कि AQIS और उसके सभी रूपों को जून 2018 में गृह मंत्रालय ने आतंकी संगठन के रूप में अधिसूचित किया था। मामले में चार्जशीट गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967, भारतीय न्याय संहिता, 2023, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम, 1908, शस्त्र अधिनियम, 1959 और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान से रोकने वाले कानून के तहत दाखिल की गई।
इस मामले में नामजद अन्य आरोपितों में आमिर राशिद मीर, जसिर बिलाल वानी, डॉ. मुजम्मिल शकील, डॉ. आदिल अहमद राथर, डॉ. शाहीन सईद, मुफ्ती इरफान अहमद वागे, सोयाब, डॉ. बिलाल नसीर मल्ला और यासिर अहमद डार शामिल हैं। उमर उन नबी की मौत के कारण उसके खिलाफ आरोपों को समाप्त करने का प्रस्ताव रखा गया है।
NIA की जाँच जम्मू-कश्मीर, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और दिल्ली-NCR तक फैली थी। एजेंसी ने इस दौरान 588 लोगों के बयान दर्ज किए, 395 से ज्यादा दस्तावेज जुटाए और 200 से अधिक जब्त सामग्री को सबूत के तौर पर शामिल किया।
जाँच में सामने आया कि मामले में शामिल कुछ लोग मेडिकल क्षेत्र से जुड़े थे और वे AQIS तथा AGuH की कट्टरपंथी विचारधारा से प्रभावित थे। NIA के मुताबिक आरोपितों ने 2022 में श्रीनगर में एक गुप्त बैठक की थी। इससे पहले उन्होंने तुर्की के रास्ते अफगानिस्तान जाने और हिजरत करने की कोशिश की थी, जो सफल नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने AGuH को फिर से संगठित करते हुए इसे ‘AGuH Interim’ नाम दिया।
NIA के अनुसार, इसी संगठन के तहत ‘ऑपरेशन हेवेनली हिंद’ शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य भारत की लोकतांत्रिक सरकार को हटाकर शरिया आधारित शासन लागू करना था। जाँच में पता चला कि इस योजना के तहत नए लोगों को संगठन से जोड़ा गया, हिंसक जिहादी विचारधारा का प्रचार किया गया, हथियार और गोला-बारूद जमा किए गए तथा बाजार में उपलब्ध रसायनों से विस्फोटक तैयार किए गए।
जाँच एजेंसी के अनुसार आरोपितों ने अलग-अलग तरह के आईईडी तैयार किए और उनका परीक्षण भी किया था। लाल किले के पास हुए धमाके में जिस विस्फोटक का इस्तेमाल किया गया था, वह ट्राइएसीटोन ट्राइपेरॉक्साइड (TATP) था। NIA का कहना है कि आरोपितों ने इसके लिए जरूरी सामग्री गुप्त रूप से जुटाई और विस्फोटक मिश्रण को तैयार करने के लिए प्रयोग किए थे।
UN की नई रिपोर्ट ने इस मामले को व्यापक आतंकी नेटवर्क के संदर्भ में भी रखा है। रिपोर्ट के अनुसार AQIS ने पाकिस्तान में इत्तेहाद-उल-मुजाहिदीन पाकिस्तान (IMP) की रीढ़ के तौर पर काम किया है। इस संगठन को पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा में कई हमलों के लिए जिम्मेदार बताया गया है। इनमें 9 मई को एक सुरक्षा चौकी के पास आत्मघाती हमला और वाहन में लगाए गए आईईडी का विस्फोट भी शामिल है, जिसमें 21 लोगों की मौत हुई थी।
UN की निगरानी टीम ने अलकायदा और इस्लामिक स्टेट की रासायनिक और जैविक हथियारों में बढ़ती दिलचस्पी पर भी चिंता जताई है। दोनों आतंकी संगठन कई वर्षों से ऐसे हथियार विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं। हालाँकि अब तक तकनीकी मुश्किलों के कारण उन्हें इसमें सफलता नहीं मिली है। रिपोर्ट के मुताबिक, इन हथियारों को बनाने से जुड़ी जानकारियाँ ऑनलाइन आतंकी समुदायों में बड़े स्तर पर साझा की जा रही हैं।

