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Interview: ‘पंचायत चुनावों ने की गाँवों की हत्या, नए लेखकों ने रखा लव जिहाद जैसे विषय को साहित्य से अछूता’

पिछले कुछ समय में कुछ लेखकों ने लव जिहाद जैसे महत्तवपूर्ण विषयों को अछूतों की तरह छाँट दिया है। वे इस पर बात ही नहीं करना चाहते। ऐसे लेखकों के लिए वे तल्ख होते हुए ये भी कहते हैं कि अगर आप अपने समय के मुद्दों पर चुप रह जाते हैं, तो आप कुछ भी हों, लेकिन साहित्यकार नहीं हो सकते।

ऑपइंडिया ने बीते दिनों युवा साहित्यकारों की श्रृंखला पर काम करना शुरू किया है। इसका उद्देश्य डिजीटल प्लैटफॉर्म पर संजीदगी से उन नए लेखकों को एक मंच देना है। जिन्होंने सोशल मीडिया के जरिए अपनी पहचान बनाई और खुद को बतौर साहित्यकार उभारा। इस कड़ी में सबसे पहला हिस्सा सर्वेश तिवारी ‘श्रीमुख’ बने। जिनकी अभी हाल ही में पहली किताब ‘परत’ आई है।

ऑपइंडिया संपादक अजीत भारती से बात करते हुए सर्वेश ने बड़ी शालीनता से सभी सवालों के जवाब दिए। बिहार के गोपालगंज से आने वाले परत के लेखक ने बताया कि कैसे उनके बाबा द्वारा तोहफे में दिए प्रेमचंद्र के पहले उपन्यास ‘सेवा सदन’ ने उनकी रूचि साहित्य में जगाई और बाद में उन्हें उनके एक शिक्षक ने उनका इस दिशा में मार्गदर्शन किया।

“पिछले 30 साल लेखकों के नाम अंधकार में रहे। हम मान चुके थे कि जो प्रेमचंद्र ने लिखा वही साहित्य है।”

वर्तमान में एक प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक के तौर पर कार्यरत सर्वेश तिवारी ने अपने स्कूल की शिक्षा को महत्तवपूर्ण बताया। साथ ही आधुनिक हिंदी के लेखकों को लेकर कहा कि जब वे छात्र थे उस समय प्रेमचंद्र, रेणु जैसे चुनिंदा लेखक ही थे जिन्हें वे जानते थे, उन्हें मालूम ही नहीं था कि उनकी पीढ़ी में कौन लोग लिख रहे हैं। वे पिछले 30-40 सालों को नए लेखक के लिए अंधकार का समय मानते हैं। साथ ही कहते हैं कि सोशल मीडिया के आ जाने के बाद मालूम हुआ कि उनकी पीढ़ी के कौन लोग लिख रहे हैं। उनके मुताबिक स्कूली समय में वे और उनके साथी मान चुके थे कि साहित्य लिखना बंद हो चुका है और जो चीजें प्रेमचंद्र ने लिखीं, वही सब सिर्फ़ साहित्य है।

सर्वेश तिवारी की पहली किताब ग्रामीण राजनीति और प्रेम के नाम पर किए जा रहे छल पर आधारित है। वे कहते हैं कि अभी तक गाँव को शहर में बैठकर लिखा जाता रहा। लेकिन वास्तविकता में गाँव बहुत बदल चुके हैं। वे ‘परत’ को परिभाषित करते हुए कहते हैं कि उन्होंने गाँव में बैठकर गाँव को लिखा है। जोकि इस किताब की खासियत है।

वे ग्रामीण राजनीति पर बातचीत करते हुए कहते हैं कि उन्होंने पंचायत चुनावों के कारण गाँवों की हत्या होते देखी हैं। भाई-भाई को लड़ते देखा है। इसलिए उनका मानना हैं कि गाँव टूटे हैं और बदले हैं।

अपनी किताब की विषय सामग्री पर बात करते हुए सर्वेश खुद को साहित्यकार कहने वाले लोगों पर भी टिप्पणी करते हैं। वे मानते हैं कि पिछले कुछ समय में कुछ लेखकों ने लव जिहाद जैसे महत्तवपूर्ण विषयों को अछूतों की तरह छाँट दिया है। वे इस पर बात ही नहीं करना चाहते। ऐसे लेखकों के लिए वे तल्ख होते हुए ये भी कहते हैं कि अगर आप अपने समय के मुद्दों पर चुप रह जाते हैं, तो आप कुछ भी हों, लेकिन साहित्यकार नहीं हो सकते।

इस बातचीत में सर्वेश बौद्धिक लोगों द्वारा कई मुद्दों पर चुप्पी साधने को लेकर भी निराशा जताते हैं। साथ ही दावा करते हैं कि चाहे कोई भी वर्ग हो वो उनकी किताब की चाहकर भी नकारात्मक आलोचना नहीं कर सकता, क्योंकि उन्होंने अपनी किताब में सिर्फ़ सच्चाई लिखी है। वे कहते हैं कि किताब में मौजूद कहानियों को पाठक अपने से जोड़कर महसूस कर पाएगा और उसे ये भी लगेगा कि अगर वो इन मुद्दों पर लिखता तो वैसा ही लिखता जैसे श्रीमुख ने उन्हें पेश किया।

श्रीमुख अपनी किताब के बेस्टसेलर होने के पीछे फेसबुक को बड़ी वजह बताते हैं। वे कहते हैं कि बिना फेसबुक के बिहार के एक सुदूर क्षेत्र में पढ़ाने वाले शिक्षक को कोई नहीं पूछता। वे इस बातचीत में किताब बनने की पूरी प्रक्रिया पर बात करते हैं और बताते हैं कि कैसे उनका लेखन देखकर प्रकाशक द्वारा उन्हें खुद संपर्क किया गया।

साहित्यकार श्रृंखला में युवा साहित्यकार सर्वेश तिवारी ‘श्रीमुख’ से बातचीत यहाँ सुनें।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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