असम सरकार ने निजी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों की फीस पर नियंत्रण लाने के लिए बुधवार (26 नवंबर 2025) को विधानसभा में एक संशोधन विधेयक पेश किया। इस विधेयक का नाम असम नॉन-गवर्नमेंट एजुकेशनल इंस्टिट्यूशंस (रेगुलेशन ऑफ फीस) (अमेंडमेंट) बिल, 2025 है। इसका उद्देश्य राज्य के लगभग 200 से अधिक अल्पसंख्यक संचालित स्कूलों को फीस नियमन के दायरे में लाना है, जो अब तक इससे बाहर थे।
क्यों लाया गया यह बिल?
विधानसभा के शीतकालीन सत्र में शिक्षा मंत्री रणोज पेगू ने यह बिल पेश करते हुए कहा कि अल्पसंख्यक स्कूल संविधान के अनुच्छेद 30(1) के तहत चलते हैं, इसलिए अब तक उन्हें फीस निर्धारण प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं थी।
इसी कारण कई स्कूल बिना किसी औचित्य के हर साल फीस बढ़ा रहे थे और कई बार ऐसे खर्चों के नाम पर फीस ली जा रही थी जिनका शिक्षा से कोई संबंध नहीं था। सरकार का मानना है कि इस बदलाव से फीस निर्धारित करने की प्रक्रिया पारदर्शी होगी और छात्रों व अभिभावकों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा।
बिल का प्रभाव और नियम
इस संशोधन के बाद सभी निजी स्कूलों, अल्पसंख्यक स्कूलों सहित सभी को अनिवार्य रूप से रजिस्ट्रेशन, फीस स्वीकृति और समय-समय पर नवीनीकरण कराना होगा। अब सभी निजी संस्थान एक ही नियामक व्यवस्था के तहत आएँगे।
साथ ही बिल में यह भी प्रावधान है कि ग्रामीण पंचायत क्षेत्रों में चलने वाले निजी स्कूलों को शहरी स्कूलों की तुलना में 25% कम एडमिशन फीस लेनी होगी क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में संचालन और रखरखाव की लागत कम होती है। सरकार का मानना है कि इससे ग्रामीण परिवारों को महत्वपूर्ण राहत मिलेगी।
सरकार की मंशा
इस फैसले को 23 नवंबर 2025 की कैबिनेट बैठक में मंजूरी मिली थी। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा था कि निजी स्कूलों की फीस पहले से ही कानून के तहत नियंत्रित है, लेकिन अल्पसंख्यक संस्थान इससे बाहर थे। अब उन्हें भी इसी व्यवस्था में शामिल किया जाएगा। उन्होंने इसे शिक्षा व्यवस्था में ‘समानता और जवाबदेही’ सुनिश्चित करने वाला कदम बताया।
विरोध और विवाद
यह संशोधन खासकर ईसाई मिशनरी स्कूलों को सबसे अधिक प्रभावित करेगा क्योंकि राज्य में अल्पसंख्यक संचालित स्कूलों में उनकी संख्या सबसे ज्यादा है। इस फैसले के खिलाफ असम क्रिश्चियन फोरम (ACF) ने 25 नवंबर 2025 को बयान जारी किया।
उन्होंने कहा कि यह फैसला उन्हें आहत और भयभीत महसूस कराता है क्योंकि इससे सरकार को फीस तय करने, भुगतान की निगरानी करने और स्कूल प्रबंधन में हस्तक्षेप का अधिकार मिल जाएगा। ACF का कहना है कि उचित फीस तय करने की स्वतंत्रता खत्म होने से स्कूलों के लिए शिक्षकों का वेतन, रखरखाव और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को दी जाने वाली छात्रवृत्तियाँ जारी रखना मुश्किल हो सकता है।
कुल मिलाकर, सरकार इस बिल को शिक्षा क्षेत्र में पारदर्शिता और समानता लाने की दिशा में बड़ा कदम बता रही है, जबकि अल्पसंख्यक समुदाय इसे अपने अधिकारों और संस्थागत स्वायत्तता पर हस्तक्षेप मान रहा है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि विधानसभा में यह बिल पारित होने के बाद व्यावहारिक रूप से इसका असर क्या होगा।

