‘सिर्फ अल्लाह की इबादत करेंगे’: बंगाल के मदरसों में ‘वंदे मातरम’ अनिवार्य करने पर कट्टरपंथियों को लगी मिर्ची

पश्चिम बंगाल की शुभेंदु सरकार ने राज्य के सभी मदरसों में ‘वंदे मातरम्’ गाना अनिवार्य कर दिया है। सरकार के इस आदेश के बाद मुस्लिम संगठनों ने मोर्चा खोल दिया है और इसे मजहबी मामलों में दखल बताया है। शुभेंदु सरकार ने एक बड़ा आदेश जारी किया, जिसमें कहा गया कि अब से बंगाल के सभी मान्यता प्राप्त और सहायता प्राप्त मदरसों में क्लास शुरू होने से पहले ‘वंदे मातरम्’ गाना होगा।

राज्य के मदरसा शिक्षा मंत्री खुदीराम टुडू ने कहा कि जब संथाली और अन्य स्कूलों में यह नियम है, तो मदरसों में क्यों नहीं? सरकार ने पुराने सभी नियमों को रद्द करते हुए इसे तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया है।

मदरसे नहीं मानेंगे यह आदेश

AJUP के चेयरमैन हुमायूँ कबीर ने इस पर सख्त ऐतराज जताया है। उन्होंने कहा कि मदरसों के लोग इस बात से कभी सहमत नहीं होंगे। हुमायूँ कबीर का तर्क है कि सरकार इन मदरसों को चलाने में कोई आर्थिक मदद नहीं दे रही है। मुस्लिम समाज अपने चंदे के पैसे से इन मदरसों को चला रहा है। गरीब बच्चों को कुरान की तालीम दी जा रही है। ऐसे में सरकार अपना एजेंडा उन पर नहीं थोप सकती।

आस्था और वतन के बीच का सवाल

कोलकाता खिलाफत कमेटी के प्रमुख मोहम्मद अशरफ अली कासमी ने भी विरोध दर्ज कराया है। उन्होंने कहा कि हम इस देश में रहते हैं और इससे प्यार करते हैं। लेकिन हम देश की इबादत नहीं कर सकते। इस्लाम के अनुसार मुसलमान सिर्फ अल्लाह की इबादत करता है। वंदे मातरम् की कुछ लाइनें उनके धर्म के बुनियादी उसूलों के खिलाफ हैं। उन्होंने सरकार से इस फैसले को वापस लेने की गुजारिश की है।

‘विकास पर ध्यान दे सरकार, मजहब पर नहीं’

मुस्लिम संगठनों का कहना है कि सरकार का काम रोजगार देना और विकास करना है। सरकार को स्वास्थ्य, सड़क और कानून व्यवस्था पर ध्यान देना चाहिए। किसी के धार्मिक मामलों में दखल देना सरकार का काम नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि मुस्लिम समुदाय के साथ भेदभाव किया जा रहा है। हॉकरों पर बुलडोजर चलाने और पुलिसिया कार्रवाई को लेकर भी नाराजगी जाहिर की गई है।

कोर्ट जाने की तैयारी

हुमायूँ कबीर ने साफ किया कि अगर जरूरत पड़ी तो वे अदालत का दरवाजा खटखटाएँगे। उन्होंने कहा कि न्यायिक व्यवस्था सबके लिए है। चाहे हिंदू हो या मुस्लिम, सबको अपने धर्म का पालन करने का हक है। मुस्लिम मौलानाओं का कहना है कि यह उनकी मजहबी स्वतंत्रता का उल्लंघन है। वे इस आदेश के खिलाफ सड़कों पर उतरने और विरोध प्रदर्शन करने की चेतावनी भी दे रहे हैं।