दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार (23 अप्रैल 2026) को एक बड़ा फैसला सुनाते हुए अरविंद केजरीवाल और पत्रकार रवीश कुमार समेत कई नेताओं द्वारा साझा किए गए अदालती कार्यवाही के वीडियो को सोशल मीडिया से हटाने का निर्देश दिया है।
कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि बिना अनुमति के कार्यवाही रिकॉर्ड करना और उसे प्रचारित करना नियमों का उल्लंघन है। अदालत ने मेटा (फेसबुक-इंस्टाग्राम), गूगल (यूट्यूब) और X (ट्विटर) को उन सभी लिंक (URLs) को हटाने का आदेश दिया है जिनमें 13 अप्रैल की सुनवाई की अवैध रिकॉर्डिंग मौजूद है।
कोर्ट की कार्यवाही का राजनीतिक इस्तेमाल गलत
जस्टिस वी कामेश्वर राव और जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की बेंच ने वकील वैभव सिंह की जनहित याचिका पर यह आदेश दिया। याचिका में आरोप लगाया गया था कि जब अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत में खुद अपनी दलीलें दी थीं, उस हिस्से को अवैध रूप से रिकॉर्ड किया गया। इसके बाद इसे एक सोची-समझी साजिश के तहत सोशल मीडिया पर फैलाया गया ताकि न्यायपालिका की छवि खराब की जा सके और राजनीतिक एजेंडा साधा जा सके।
सोशल मीडिया कंपनियों को कड़ी चेतावनी
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने गूगल और मेटा से पूछा कि क्या वे उन लोगों की पहचान कर सकते हैं जिन्होंने सबसे पहले यह वीडियो अपलोड किया था। मेटा के वकील ने कहा कि वे आईपी (IP) एड्रेस और मोबाइल नंबर जैसी जानकारी दे सकते हैं।
कोर्ट ने साफ लहजे में कहा कि आईटी नियमों के तहत यह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारी है कि वे कानून का उल्लंघन करने वाली सामग्री को खुद रोकें। कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ता भविष्य में भी ऐसे किसी वीडियो का लिंक देता है, तो उसे तुरंत हटा दिया जाए।
क्या है पूरा विवाद और ‘हाइ कोर्ट रूल्स’?
दरअसल, दिल्ली हाई कोर्ट के वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग रूल्स (2025) के अनुसार, बिना अनुमति के अदालत की कार्यवाही रिकॉर्ड करना या उसे प्रकाशित करना दंडनीय अपराध है। याचिकाकर्ता का दावा है कि केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के नेताओं के साथ-साथ रवीश कुमार ने भी इस वीडियो को साझा कर ‘कोर्ट की अवमानना’ की है।
मामला 13 अप्रैल का है, जब केजरीवाल ने जज से केस से हटने की माँग की थी। अब कोर्ट ने केंद्र सरकार और अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर 6 जुलाई तक जवाब माँगा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका की गरिमा को इस तरह दांव पर नहीं लगाया जा सकता।

