देश के कई राज्यों में वोटर लिस्ट को शुद्ध करने के लिए जारी SIR (Special Intensive Revision – विशेष गहन पुनरीक्षण) प्रक्रिया के बीच चुनाव आयोग ने कई अहम दावे किए हैं। चुनाव आयोग का कहना है कि यह प्रकिया कोई नई प्रक्रिया नहीं है बल्कि आजादी के कुछ समय बाद 1951 से ही यह प्रक्रिया शुरू कर दी गई थी।
1951 से तो आयोग SIR करता आया है और 2002-2004 तक कुल आठ बार यह प्रक्रिया पूरी हुई लेकिन 2004 के बाद पिछले 22 वर्षों से SIR नहीं हो पाया है। चुनाव आयोग के सूत्रों का दावा है कि कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की धमकियों और राजनीतिक दबावों के कारण SIR की प्रक्रिया लंबे समय तक रोकी गई थी।
सूत्र बताते हैं कि वर्तमान में ECI हर हाल मे मतदाता सूची को शुद्ध करने के लिए प्रतिबद्ध है। आयोग के इस कदम पर कॉन्ग्रेस ने कड़ा विरोध जताया है और इसे राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित बताया है।
चुनाव आयोग अब देशभर में मतदाता सूचियों के शुद्धिकरण की प्रक्रिया को तेज करने जा रहा है। आयोग के मुताबिक, हर 5 साल में मृत, दोहराए गए, स्थाई रूप से स्थानांतरित और गैर-नागरिक मतदाताओं को सूची से हटाना अनिवार्य है ताकि चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनी रहे।
ECI का कहना है कि लोकतंत्र की मजबूती और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए शुद्ध मतदाता सूची अनिवार्य है। आने वाले महीनों में आयोग देशभर में बड़े पैमाने पर सत्यापन और हटाने की प्रक्रिया चला सकता है।
कॉन्ग्रेस इस कदम को चुनावी छेड़छाड़ बता रही है जबकि आयोग इसे लोकतांत्रिक सुधारों की आवश्यकता मानते हुए आगे बढ़ रहा है। राज्यों के आगामी चुनावों से पहले यह मुद्दा एक बड़े राजनीतिक टकराव का रूप ले सकता है।

