लोकसभा में बुधवार (11 मार्च 2026) को स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष द्वारा लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर तीखी बहस हुई। गृहमंत्री अमित शाह ने बहस का जवाब देते हुए विपक्ष पर जमकर हमला बोला। उन्होंने कहा कि स्पीकर किसी एक दल के नहीं, बल्कि पूरे सदन के होते हैं और उनकी निष्ठा पर सवाल उठाना संसदीय राजनीति के लिए अफसोसजनक है। हालाँकि लोकसभा में ये प्रस्ताव ध्वनिमत से गिर गया और वोटिंग कराने की नौबत नहीं आई।
लोकसभा में अमित शाह ने विपक्ष को चुनौती देते हुए कहा कि अगर हिम्मत है तो प्रधानमंत्री के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाएँ, लेकिन स्पीकर के खिलाफ ऐसा करना ठीक नहीं। उन्होंने 1975 की इमरजेंसी का जिक्र कर कॉन्ग्रेस पर तंज कसा कि विपक्ष की आवाज दबाने का काम तो उस समय किया गया था, जब पूरे विपक्ष को जेल में डाल दिया गया था।
गृहमंत्री अमित शाह ने कहा, “स्पीकर के खिलाफ जो अविश्वास प्रस्ताव आया है, कोई सामान्य घटना नहीं है। करीब 4 दशक बाद एक बार फिर लोकसभा अध्यक्ष के सामने अविश्वास प्रस्ताव आया है। संसदीय राजनीति और ये सदन दोनों के लिए ये अफसोसजनक घटना है। स्पीकर किसी दल के नहीं होते हैं, सदन के होते हैं। एक प्रकार से सदन के सभी सदस्यों के अधिकार के वे संरक्षक भी होते हैं।” उन्होंने जोर दिया कि सदन आपसी विश्वास से चलता है और पक्ष-विपक्ष दोनों के लिए स्पीकर अभिरक्षक होते हैं।
गृहमंत्री ने विपक्ष को नियमों की याद दिलाते हुए कहा कि सदन कोई मेला नहीं है जहाँ जो मन किया वो किया। सदन नियम के अनुसार चलता है और आपको भी नियम के हिसाब से चलना होगा। अगर आप नियम का उल्लंघन करोगे तो स्पीकर के पास अधिकार है कि वो आपको बाहर जाने कहेंगे, नहीं तो निकाल दिए जाओगे। अमित शाह ने कहा, “ये इमरजेंसी नहीं है भैया, अधिकार दिया है, विशेषाधिकार नहीं। आप संसद में मनमानी नहीं कर सकते हैं।”
गृहमंत्री शाह ने विपक्ष की आलोचना करते हुए कहा कि जब आप अध्यक्ष की निष्ठा पर सवाल करते हैं तो आप अजीब प्रकार की स्थिति का निर्माण कर देते हैं। जिसको मध्यस्थता करनी है, जिसका संरक्षण लोकसभा के कार्यकाल की समाप्ति तक आपको माँगना है, उसकी निष्ठा पर ही आप सवाल कर देते हैं? ये हमारी उच्च परंपराओं के निर्वहन में करने के लिए बहुत अफसोसजनक घटना है। उन्होंने भाजपा और एनडीए का जिक्र कर कहा कि हम भी विपक्ष में रहे हैं लेकिन तीन बार लोकसभा स्पीकर पर अविश्वास प्रस्ताव आया, भाजपा और NDA कभी विपक्ष में रहते हुए स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया।
गृहमंत्री ने स्पीकर के कर्तव्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि स्पीकर का प्रथम कर्तव्य व्यवस्था और शिष्टाचार बनाए रखना है। कोई भी व्यक्ति खड़े होकर अपने मन से कुछ भी बोलेगा तो स्पीकर को उसे बैठाना पड़ेगा क्योंकि विषय तय होते हैं। शशि थरूर, बालू साहब जैसे कितने वरिष्ठ सदस्य हैं, वहाँ मुझे समझ नहीं आता कि वे क्यों नहीं सिखाते इन्हें। इतना सिखा दें तो समस्या का वहीं समाधान हो जाए। उन्होंने नियम 380 का हवाला देते हुए कहा कि स्पीकर को अधिकार है कि असंसदीय शब्दों और टिप्पणियों को कार्रवाई से हटाना होगा।
गृहमंत्री ने कॉन्ग्रेस पर हमला बोलते हुए कहा कि असंसदीय शब्दों का लिस्ट जबसे सदन अस्तित्व में आया है तब से बनता चला आया है। विपक्ष को संविधान ने अधिकार दिया है लेकिन विशेषाधिकार नहीं दिया है। इसीलिए जनता भी संरक्षण नहीं दे रही है, इसीलिए पार्टी छोटी से छोटी होती जा रही है। पीएम के खिलाफ हटाने का प्रस्ताव लाएँ, कोई नहीं रोक सकता। लेकिन लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ जब ये प्रस्ताव लाया गया है तो ये अफ़सोसजनक बात है।
शाह ने कहा कि इससे पहले भी तीन स्पीकरों के खिलाफ प्रस्ताव लाया गया लेकिन वो चेयर पर बैठे रहे, एकमात्र स्पीकर ओम बिरला ही थे जो मोरल ग्राउंड पर चेयर पर नहीं बैठे। पीएम को हटाना है तो साधारण बहुमत चाहिए और अगर स्पीकर को हटाना है तो इफेक्टिव मेजोरिटी चाहिए। ये संविधान ने स्पीकर की इंपोर्टेंस के तहत व्यवस्था दी है। उन्होंने विपक्ष के प्रस्ताव की कमियाँ गिनाते हुए कहा कि जो प्रस्ताव लाया गया था उसमें तारीख गलत थी, संकल्प गलत था, दूसरा नोटिस विपक्ष ने लाया..दूसरे नोटिस में सिर्फ गौरव गोगोई के ओरिजिनल साइन थे, बाकी सदस्यों को साइन फोटो कापी थे, ये नियम के विपरीत है..लोकसभा के नियम से सदन चलेगा न कि किसी पार्टी के नियम से।
शाह ने हाई मोरल ग्राउंड का जिक्र कर कहा कि हमारे स्पीकर ने दो बार विपक्ष की गलती होने के बावजूद उनके नोटिस को रिजेक्ट नहीं किया..माइक गिरिराज जी का बंद कर दिया जब वो पप्पू यादव के संबंध में बोल रहे थे..माइक बंद होना ही चाहिए। विपक्ष खुद के प्रस्ताव के लिए भी गंभीर नहीं है क्योंकि जब उनका प्रस्ताव आना था तो उसे बिखेर देने का काम किया। उन्होंने कहा कि असाधारण परिस्थितियों में ही हटाया जा सकता है स्पीकर, रोजमर्रा की चीज नहीं।
गृहमंत्री ने कहा कि स्पीकर पर अविश्वास देश की बदनामी है। आज राजनीतिक आरोप एक भी नहीं करूंगा। जो आरोप किए गए हैं, उनका जवाब कसकर दूंगा। स्पीकर के फैसले में सर्वोच्च अदालत भी दखल नहीं दे सकती। यह प्रोटेक्शन उनको संविधान ने दिया है। स्पीकर का कर्तव्य है कि व्यवस्था को बनाए रखना। दूसरा कर्तव्य सभी को मौका देना। शिष्टाचार ये है कि सदन नियमों के अनुसार चले। कोई भी खड़ा हो जाता है और मुंसफी से कुछ भी बोलेगा। स्पीकर को बिठा देना पड़ेगा। अब अविश्वास प्रस्ताव पर खड़ा हुआ हूं, माओवाद पर लेक्चर नहीं दे सकता। शशि थरूर, बालू जैसे वरिष्ठ सदस्य हैं। क्यों नहीं सिखाते। सिखा दें तो समस्या यहीं समाप्त हो जाए।
शाह ने स्पीकर की निष्ठा पर सवाल की निंदा करते हुए कहा कि स्पीकर सभी के होते हैं। स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव अफसोसजनक है। स्पीकर जब चुने गए थे, तब पक्ष और प्रतिपक्ष, दोनों नेता उनको चेयर तक लेकर गए थे। स्पीकर सभी सदस्यों के हितों के संरक्षक होते हैं, यह संसदीय राजनीति के लिए अफसोसजनक पल है। स्पीकर की निष्ठा पर विपक्ष ने सवाल उठाए। पाताल से गहरी पहुँची लोकतंत्र की साख पर विपक्ष ने सवालिया निशान लगाए हैं। हमारी जो स्पिरिट है, जो सदन का इतिहास है, वह आपसी विश्वास से चलता है। स्पीकर कस्टोडियन होता है। लोकसभा कैसे चलानी है, उसे लेकर इसी लोकसभा ने नियम बनाए हैं। हम अपने अधिकार के लिए बात कर सकते हैं, लेकिन नियमों के विपरीत बोलने का किसी को अधिकार नहीं है। लोकसभा के नियमों को नजरअंदाज करोगे, तब स्पीकर का पवित्र दायित्व है कि रोके, टोके और निकाल बाहर करे। ये नियम हमने नहीं बनाए। स्पीकर की निष्ठा पर जिस तरह से सवाल किए गए, वह निंदनीय है। हमारे लोकतंत्र में अनेक बार परिवर्तन आए हैं। हम ज्यादातर विपक्ष में ही बैठे हैं, लेकिन कभी स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाए। हमने स्पीकर से कानूनी अधिकारों के संरक्षण की माँग भी की है। अब तक तीन प्रस्ताव आए। 1954 में मावलंकर के खिलाफ सोशलिस्ट पार्टी, दूसरा प्रस्ताव समाजवादी पार्टी और तीसरा प्रस्ताव कॉन्ग्रेस लेकर आई थी। आज कॉन्ग्रेस लेकर आई है, सबने समर्थन किया है। मेरी पार्टी की मान्यता है कि स्पीकर की निष्ठा पर कभी भी शंका नहीं करनी चाहिए।
यह प्रस्ताव कॉन्ग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद ने पेश किया था, जिसे 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिला। प्रस्ताव को सदन में पेश करने की अनुमति भाजपा सांसद जगदंबिका पाल ने दी, वो उस समय पीठासीन थे। उन्होंने बताया कि इस प्रस्ताव पर चर्चा के लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया गया। विपक्ष की ओर से कुल 118 सांसदों ने इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए हैं। उनका आरोप है कि लोकसभा स्पीकर ने अपने पद की निष्पक्षता बनाए रखने के बजाय कई मामलों में सत्तापक्ष के पक्ष में रुख अपनाया है।

