‘रेपिस्टों के पक्ष में पाकिस्तानी कोर्ट’: नाबालिग ईसाई लड़की के अपहरण-धर्मांतरण-जबरन निकाह पर बोले लाहौर के आर्कबिशप, शरियत कोर्ट ने ठहराया था जायज

लाहौर के कैथोलिक चर्च के आर्कबिशप ने पाकिस्तान के फेडरल शरिया कोर्ट के फैसले की कड़ी निंदा की है। कोर्ट ने 13 साल की नाबालिग ईसाई लड़की मारिया बीबी की मुस्लिम शहरयार अहमद से निकाह को मान्यता दी है। बताया जा रहा है कि शहरयार अहमद ने उसका किडनैप कर लिया था।

चर्च ने कोर्ट के फैसले को ‘अन्याय’ करार देते हुए चेतावनी दी कि इस फैसले से किडनैपिंग, जबरन धर्मांतरण और बाल विवाह को सही ठहराने की कोशिश बढ़ जाएगी।

हाल ही में चर्च के आर्कबिशप बने खालिद रहमत ने अपने औपचारिक बयान में कहा है कि अपहरण और जबरन धर्म परिवर्तन से जुड़े इस मामले में कोर्ट का फैसला नाबालिग के निकाह को वैध ठहराता प्रतीत हो रहा है। इससे पूरे समुदाय को ‘काफी सदमा’ लगा है।

उन्होंने कहा कि इस फैसले से एक खतरनाक मैसेज जाएगा, जिससे पाकिस्तान में अल्पसंख्यक लड़कियों की सुरक्षा की चिंता काफी बढ़ जाएगी। उन्होंने आगे कहा कि यह फैसला कानून के खिलाफ है। उन्होंने मारिया के मामले में इंसाफ की बड़ी नाकामी बताया।

किडनैपिंग, जबरदस्ती धर्म परिवर्तन और बाल विवाह पर चिंता

रहमत ने दलील दी कि मारिया के मामले में किडनैपिंग, जबरदस्ती धर्म परिवर्तन और बिना मर्जी के गैर-कानूनी तरीके से निकाह जैसे गंभीर आरोप हैं। यह पाकिस्तान के कानून का भी उल्लंघन है। यहाँ तक कि बुनियादी मानवाधिकारों का उल्लंघन है।

पाकिस्तान में कानूनन निकाह की कम से कम उम्र 18 साल है। उन्होंने आगे कहा कि यह फैसला अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार प्रतिबद्धताओं के विरुद्ध है और ईसाई धर्म की मान्यता के भी खिलाफ है। यह फैसला अल्पसंख्यक लड़कियों के लिए ‘खतरनाक मैसेज’ है।

रहमत ने चेतावनी दी कि इससे अपराधियों को बढ़ावा मिल सकता है और देश के लीगल सिस्टम पर से भरोसा कम हो सकता है। बच्चों की सुरक्षा को नैतिक, कानूनी और राष्ट्रीय ज़िम्मेदारी बताते हुए, रहमत ने कहा कि ऐसे मामलों में चुप रहना अन्याय का साथ देने जैसा है।

फैसले की समीक्षा करने और सुरक्षा देने की माँग

आर्कबिशप ने इस मामले में ऊपरी न्यायालय और सरकारी अधिकारियों से तुरंत दखल देने की माँग की। उन्होंने शरिया कोर्ट के फैसले पर दोबारा सोचने और मामले की पारदर्शिता के साथ जाँच की माँग की। उन्होंने भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की भी माँग की। खासकर जब माइनॉरिटी लड़कियां शामिल हों।

आर्कबिशप ने किडनैपिंग, जबरदस्ती धर्म परिवर्तन और गैर-कानूनी तरीके से निकाह के कार्यक्रम में शामिल लोगों के लिए जवाबदेही तय करने की माँग की। उन्होंने पाकिस्तान में सरकारी अधिकारियों और सिविल सोसाइटी से अपील की कि वे सख्ती बरतें और जस्टिस सिस्टम में भरोसा वापस लाएँ।

फेडरल शरिया कोर्ट ने 31 मार्च 2026 को फैसला सुनाया था। 13 साल की क्रिश्चियन लड़की मारिया बीबी की मुस्लिम शहरयार अहमद से निकाह को मान्यता दे दी और लड़की के पिता की अर्जी खारिज कर दी। कोर्ट ने पिता की नाबालिग बेटी को रिहा करने की अर्जी खारिज कर दी और कहा कि लड़की ने इस्लाम अपना लिया है और वह अपने पति की कानूनी कस्टडी में है। इससे पहले, पिता की अपील को लाहौर हाई कोर्ट ने 17 अक्टूबर 2026 को खारिज कर दिया था।

कोर्ट की कार्रवाई के दौरान, मारिया कथित तौर पर कोर्ट में पेश हुई और बयान दिया कि उसने अपनी मर्जी से अहमद से शादी की है, जिसे उसके पिता ने खारिज कर दिया।