सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया कि बोलने की आजादी का अधिकार असीमित नहीं है। अदालत ने शुक्रवार (19 दिसंबर 2025) को बेंगलुरु के 24 वर्षीय चार्टर्ड अकाउंटेंसी (CA) के छात्र को अग्रिम ज़मानत देने से इनकार कर दिया, जिस पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पैरोडी अकाउंट ‘जवाहरलाल नेहरू सटायर’ के जरिए प्रधानमंत्री और उनकी माँ से जुड़ी आपत्तिजनक पोस्ट करने का आरोप है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपित राहत के लिए गुजरात हाई कोर्ट का रुख कर सकता है। अदालत ने कहा, “जो लोग बोलने की आज़ादी का गलत इस्तेमाल करते हैं, उन्हें कोर्ट द्वारा विवेकाधीन राहत नहीं दी जा सकती।”
अदालत ने अहमदाबाद पुलिस द्वारा दर्ज FIR को रद्द करने की माँग वाली याचिका को खारिज कर दिया। साथ ही, जाँच में शामिल होने के लिए अग्रिम जमानत या गिरफ्तारी से सुरक्षा देने के अनुरोध को भी मानने से इनकार कर दिया गया।
मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने की। बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ता ने जिन अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया है, उसके लिए उसमें कोई पछतावा या अफसोस नजर नहीं आता।
वकील ने बताया कि छात्र जांच में सहयोग करने को तैयार है और उसने अपनी पोस्ट पर पछतावा भी जताया है। उन्होंने अदालत से कम से कम गिरफ्तारी से सुरक्षा देने का अनुरोध किया। हालाँकि, बेंच ने दोहराया कि बोलने की आजादी के अधिकार का गलत इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति को राहत नहीं दी जा सकती।
गौरतलब है कि 7 नवंबर को अहमदाबाद के एक निवासी ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि आरोपित ने प्रधानमंत्री और उनकी माँ के खिलाफ अपमानजनक सामग्री पोस्ट की, जिससे उनकी गरिमा और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब करने की कोशिश की गई। इसके बाद पुलिस ने FIR दर्ज की और पूछताछ के लिए बेंगलुरु गई।

