सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (17 अक्टूबर 2025) को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने अहमदाबाद की 400 साल पुरानी मंसा मस्जिद कॉम्प्लेक्स के एक हिस्से को तोड़ने की गुजरात हाई कोर्ट की अनुमति को बरकरार रखा है। यह हिस्सा सड़क चौड़ीकरण परियोजना के लिए तोड़ा जाएगा। कोर्ट ने साफ किया कि यह कदम जनहित में उठाया गया है और इससे धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन नहीं होता।
मुख्य इमारत सुरक्षित, कॉम्प्लेक्स का हिस्सा टूटेगा
जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने कहा कि मस्जिद की मुख्य इमारत को नहीं छुआ जाएगा। केवल खाली पड़ी जमीन का एक छोटा हिस्सा और पास का प्लेटफॉर्म ही तोड़ा जाएगा। कोर्ट ने यह भी बताया कि इस परियोजना में केवल मस्जिद ही नहीं, बल्कि एक मंदिर, एक व्यावसायिक प्रतिष्ठान और एक मकान को भी तोड़ने का प्रस्ताव है। पीठ ने कहा कि जब पूरा शहर इससे लाभान्वित होगा, तो यह एक वास्तविक जनहित का मामला है।
वक्फ संपत्ति का मुद्दा खुला रखा
मंसा मस्जिद ट्रस्ट की वकील वारिशा फरासत ने दलील दी थी कि यह एक 400 साल पुरानी विरासत इमारत है और इसे नहीं तोड़ा जाना चाहिए। वकील ने कहा कि यह वक्फ संपत्ति है और नगर निगम का आदेश मनमाना है। हालाँकि, कोर्ट ने इन तर्कों को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने यह मुद्दा खुला रखा कि जमीन वक्फ संपत्ति है या नहीं।
कोर्ट ने कहा कि मुआवजे के निर्धारण के दौरान इस पर विचार किया जा सकता है। पीठ ने यह भी कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतंत्रता) इस मामले में लागू नहीं होता, क्योंकि विवाद संपत्ति और मुआवजे से जुड़ा है, न कि धार्मिक अधिकार से।

