क्या था ‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’? जिस पर PM मोदी ने कॉन्ग्रेस को सुनाई खरी-खोटी: कहा- अपनी विफलता का कलंक हिंदू आबादी के नाम पर लगाया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार (10 जून 2026) को NDA दल की बैठक में एक बार फिर ‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ की बात की। पीएम मोदी ने कहा कि कॉन्ग्रेस की सरकार ने धीमे विकास को बड़ी चतुराई से ‘हिंदू ग्रोथ रेट’ नाम दिया था।

पीएम ने कहा, “कॉन्ग्रेस ने देश को लाचारगी, बेचारगी और हीन भावना की गर्त में गिरा दिया था। देश को यही एहसास कराया जाता था कि भारत में विकास धीरे-धीरे होता है, भारत में तेज विकास संभव ही नहीं है। बड़ी चतुराई से धीमे विकास को ‘हिंदू ग्रोथ रेट’ नाम दिया था।”

उन्होंने आगे कहा, “यानी कार्यशैली कॉन्ग्रेस की, दायित्व कॉन्ग्रेस का, विफलता कॉन्ग्रेस की लेकिन कलंक देश की बड़ी हिंदू आबादी के नाम लगाया गया। जबकि असल में इस कुसंस्कृति का नाम होना चाहिए था- ‘कॉन्ग्रेस ग्रोथ रेट’। इस ‘कॉन्ग्रेस ग्रोथ रेट’ में ना गवर्नेंस थी, ना नीति, ना नियत और ना ही निर्णय।”

‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ क्या है?

भारत का 6000+ साल का शानदार सभ्यता का इतिहास रहा है और इस लंबे समय के दौरान, भारत गर्व से ग्लोबल इकॉनमी में सबसे ऊपर रहा है। इस बात को अमेरिकी इतिहासकार विल डुरंट की किताब ‘द केस फॉर इंडिया’ में बहुत अच्छे से दिखाया गया है।

सत्रहवीं सदी तक, भारत की GDP दुनिया की GDP की एक-तिहाई थी। इस्लामी हमलावरों की 800 साल की लूट भी इस महान देश के रिसोर्स को खत्म नहीं कर पाई। अंग्रेजों के आने के बाद ही असली दौलत का नुकसान शुरू हुआ, और भारत में साल दर साल लगातार अकाल पड़ने लगे।

हिंदू रेट ऑफ़ ग्रोथ शब्द 1978 में एक तथाकथित इकोनॉमिस्ट राज कृष्ण ने 1950 से 1980 के दशक तक 3.5 परसेंट GDP ग्रोथ रेट के लिए किया था। यह सोच अपने आप में गलत है क्योंकि इस समय और उसके बाद भी इकोनॉमी में हिंदुओं का मुख्य योगदान था।

भारत में सभी धर्मों के लोग रहते हैं, इकोनॉमिक प्लानर्स ने ग्रोथ का भार हिंदुओं पर डाल दिया और इसलिए ‘हिंदू रेट ऑफ़ ग्रोथ’ शब्द बना कि उन्होंने जो कुछ भी करने का दावा किया, उसके बावजूद ग्रोथ लगभग स्थिर थी और वह भी लगभग 3.5% पर। हिंदू कोई पॉलिसी मेकर नहीं थी ऐसे में अर्थव्यवस्था की विकास को हिन्दू से जोड़ना सरासर हिन्दू धर्म और संस्कृति का उपहास उड़ाना था

आजादी के बाद कई दशकों तक कॉन्ग्रेस की सरकार की नीतियाँ देश के विकास की रफ्तार तय कर रही थी। बुनियादी सुविधाओं की कमी, तेज गति से बढ़ रही जनसंख्या और गरीबी मुख्य दिक्कतें थी, इसकी जिम्मेदारी सरकार की थी, न कि भारत की सभ्यता और संस्कृति इसके लिए जिम्मेदार थी।