राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने सोमवार (23 फरवरी 2026) को कक्षा 8 की नई सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक जारी की है। इस नई किताब में पहली बार न्यायपालिका से जुड़ी चुनौतियों, खासकर भ्रष्टाचार और लंबित मामलों की समस्या को विस्तार से शामिल किया गया है। यह बदलाव राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और नए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या ढाँचे के तहत किया गया है।

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और चुनौतियाँ
नई पुस्तक के अध्याय ‘हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका’ में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि न्याय व्यवस्था को कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इसमें ‘न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार’ और ‘भारी बैकलॉग’ को प्रमुख समस्याओं के रूप में गिनाया गया है। किताब में कहा गया है कि जटिल कानूनी प्रक्रियाएँ, पर्याप्त संख्या में न्यायाधीशों की कमी और कमजोर आधारभूत ढाँचा लंबित मामलों की बड़ी वजह हैं।
आँकड़ों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में लगभग 81 हजार मामले लंबित हैं, जबकि हाईकोर्टों में करीब 62 लाख 40 हजार मामले और जिला व अधीनस्थ अदालतों में लगभग 4 करोड़ 70 लाख मामले सुनवाई की प्रतीक्षा में हैं।
पुरानी किताब से क्या बदला
पहले की किताबों में न्यायपालिका की संरचना, उसकी स्वतंत्रता और अदालतों की भूमिका के बारे में जानकारी दी जाती थी, लेकिन भ्रष्टाचार का उल्लेख नहीं था। हालाँकि पुरानी पुस्तक में यह जरूर कहा गया था कि मामलों के निपटारे में देरी आम लोगों के लिए बड़ी समस्या है और ‘न्याय में देरी, न्याय से वंचित होना है’ जैसी कहावत का जिक्र भी किया गया था। नई किताब में इन मुद्दों को अधिक स्पष्ट और विस्तार से शामिल किया गया है।
जवाबदेही और शिकायत की व्यवस्था
नई पुस्तक में यह भी बताया गया है कि न्यायाधीश आचार संहिता से बँधे होते हैं और उनके आचरण को नियंत्रित करने की आंतरिक व्यवस्था मौजूद है। शिकायत दर्ज करने के लिए ‘सेंट्रलाइज्ड पब्लिक ग्रिवांस रिड्रेस एंड मॉनिटरिंग सिस्टम’ (CPGRAMS) का उल्लेख किया गया है। किताब के अनुसार वर्ष 2017 से 2021 के बीच 1,600 से अधिक शिकायतें दर्ज की गई थीं।
इसमें यह भी बताया गया है कि गंभीर आरोपों की स्थिति में संसद महाभियोग प्रस्ताव के जरिए किसी न्यायाधीश को पद से हटा सकती है, लेकिन इसके लिए विधिवत जाँच और संबंधित न्यायाधीश को अपना पक्ष रखने का अवसर देना आवश्यक होता है।
पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) का बयान
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, पुस्तक में जुलाई 2025 में दिए गए एक बयान का भी उल्लेख है, जिसमें पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) बीआर गवई ने कहा था कि न्यायपालिका के भीतर भ्रष्टाचार और कदाचार की घटनाएँ सामने आई हैं, जो जनता के विश्वास को प्रभावित करती हैं।
उन्होंने यह भी कहा था कि पारदर्शी और त्वरित कार्रवाई के माध्यम से ही न्याय व्यवस्था में भरोसा दोबारा मजबूत किया जा सकता है और पारदर्शिता व जवाबदेही लोकतंत्र की मूल विशेषताएँ हैं।
इलेक्टोरल बॉन्ड और IT एक्ट के उदाहरण
अध्याय में छात्रों से चर्चा के लिए दो उदाहरण भी दिए गए हैं। पहला उदाहरण इलेक्टोरल बॉन्ड योजना का है, जिसे 2018 में सरकार ने राजनीतिक दलों को चंदा देने की व्यवस्था के रूप में शुरू किया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार देते हुए कहा कि मतदाताओं को यह जानने का अधिकार है कि राजनीतिक दलों को धन कौन दे रहा है।
दूसरा उदाहरण सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम में जोड़े गए एक प्रावधान का है, जिसके तहत सोशल मीडिया पोस्ट के लिए जेल की सजा का प्रावधान था। वर्ष 2015 में एक विधि छात्र द्वारा चुनौती दिए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ मानते हुए रद्द कर दिया था।

