नाबालिग के 7 महीने के गर्भ को गिराने की सुप्रीम कोर्ट ने दी अनुमति: कहा- गोद देना विकल्प, माँ बनने पर मजबूर नहीं किया जा सकता

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (24 अप्रैल 2026) को एक बहुत ही संवेदनशील मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी भी महिला को उसकी मर्जी के खिलाफ गर्भधारण जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने साफ किया कि सिर्फ इस आधार पर कि जन्म के बाद बच्चे को गोद दिया जा सकता है, किसी महिला को अनचाहे गर्भ को ढोने के लिए बाध्य करना गलत है। अदालत ने एक 15 साल की नाबालिग लड़की को सात महीने से अधिक का गर्भ गिराने की अनुमति दे दी है, जो एक नाबालिग के साथ आपसी सहमति से बने संबंधों के कारण गर्भवती हुई थी।

महिला की पसंद सबसे ऊपर

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयाँ की बेंच ने कहा कि यहाँ सबसे जरूरी गर्भवती महिला की पसंद है, न कि पैदा होने वाले बच्चे का भविष्य। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह कहना बहुत आसान है कि अगर महिला बच्चा नहीं पालना चाहती तो वह उसे गोद दे दे, लेकिन एक अनचाहे बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर करना महिला के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है। कोर्ट के मुताबिक, जबरन माँ बनाना महिला के अधिकारों को खत्म करने जैसा है।

नाबालिग की मानसिक स्थिति और सुरक्षा की चिंता

सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि इस गर्भावस्था की वजह से 15 साल की बच्ची गहरे मानसिक तनाव में थी। उसने खुदकुशी की कोशिश भी की थी और उसकी पढ़ाई भी प्रभावित हो रही थी।

कोर्ट ने चिंता जताई कि अगर अदालतें ऐसे मामलों में अनुमति नहीं देंगी, तो लोग अवैध और असुरक्षित तरीकों से गर्भपात कराने को मजबूर होंगे, जो महिला की जान के लिए और भी बड़ा खतरा बन सकता है। कोर्ट ने कहा कि नाबालिग की भलाई और उसकी गरिमा को कानूनी नियमों से ऊपर रखना जरूरी है।

सरकार का पक्ष और कोर्ट की दलील

सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि इस देरी से गर्भपात कराने में माँ और बच्चे दोनों की जान को खतरा हो सकता है। उन्होंने सुझाव दिया था कि सरकार बच्ची की आर्थिक मदद करेगी और बच्चे को गोद दिलाने का इंतजाम भी कर दिया जाएगा।

हालाँकि, जस्टिस नागरत्ना ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि हम महिलाओं को आर्थिक मदद या गोद देने जैसे विकल्पों पर निर्भर रहने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। अंत में, कोर्ट ने एम्स (AIIMS) दिल्ली को निर्देश दिया कि सभी जरूरी डॉक्टरी सुरक्षा के साथ नाबालिग का गर्भपात कराया जाए। कोर्ट ने दोहराया कि अपने शरीर के बारे में फैसला लेना हर महिला का मौलिक अधिकार है।