‘निकाह-हलाला की आड़ में गैंगरेप गंभीर अपराध’: इलाहाबाद HC ने आसिम-हकीम-शहनवाज समेत 9 के खिलाफ FIR रद्द करने से किया इनकार, जानें- महिला से ज्यादती का क्या है पूरा मामला

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने निकाह हलाला की आड़ में महिला के साथ रेप के मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि अगर किसी मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) या पॉक्सो (POCSO) कानून के तहत अपराध बनता है, तो पर्सनल लॉ या मजहबी लॉ का सहारा लेकर जाँच या कार्रवाई नहीं रोकी जा सकती। कोर्ट ने साफ कहा कि आपराधिक कानून हमेशा व्यक्तिगत कानून से ऊपर रहेगा।

जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की बेंच ने इस मामले में दर्ज एफआईआर (FIR) रद्द करने की माँग वाली चारों याचिकाएँ खारिज कर दीं। कोर्ट ने कहा कि एफआईआर में लगाए गए आरोप गंभीर हैं और उनकी पूरी जाँच होनी चाहिए। इस स्तर पर कोर्ट यह नहीं देख सकती कि आरोप सही हैं या गलत, बल्कि सिर्फ यह देखती है कि क्या जाँच लायक मामला बनता है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने कहा कि अगर निकाह या किसी भी मजहबी प्रक्रिया के नाम पर कोई अपराध किया जाता है, तो उस पर आपराधिक कानून ही लागू होगा। व्यक्तिगत कानून का हवाला देकर ऐसे मामलों में राहत नहीं मिल सकती।

कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर निकाह हलाला के नाम पर किसी नाबालिग लड़की के साथ यौन संबंध बनाए जाते हैं, तो उस पर पॉक्सो कानून लागू होगा। सुप्रीम कोर्ट के 2017 के ‘इंडिपेंडेंट थॉट बनाम भारत संघ‘ फैसले का जिक्र करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि 18 साल से कम उम्र की लड़की के साथ यौन संबंध को किसी भी व्यक्तिगत कानून के आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता।

कोर्ट ने किस मामले पर सुनाया फैसला?

एफआईआर के मुताबिक, शिकायतकर्ता का अप्रैल 2015 में करीब 15 साल की उम्र में अजहर नवाज से निकाह कराया गया था। जनवरी 2016 में अजहर नवाज ने उसे तीन तलाक दे दिया। महिला का आरोप है कि दोबारा अजहर नवाज से निकाह कराने के लिए उसे मौलाना कय्यूम के साथ निकाह हलाला करने के लिए मजबूर किया गया। इसके बाद 2017 में उसका फिर से अजहर नवाज से निकाह करा दिया गया। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड के मुताबिक पहली बार हलाला के समय महिला नाबालिग थी।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, एफआईआर में आगे कहा गया है कि 2021 में फिर से तलाक होने के बाद अजहर नवाज दोबारा उसके साथ रहना चाहता था। इस दौरान उसके भाई शहनवाज चौधरी और रिश्तेदार हकीम निशात ने कहा कि दो बार तलाक होने की वजह से अब दो बार हलाला करना पड़ेगा। महिला का आरोप है कि फरवरी 2025 में इसी बहाने शहनवाज चौधरी और हकीम निशात ने उसे और उसकी बेटी को जान से मारने की धमकी देकर उसके साथ रेप किया।

महिला ने यह भी आरोप लगाया कि मौलाना नदीम ने आकिल, शहनवाज चौधरी, हकीम निशात और अजहर नवाज की मदद से एक फर्जी निकाह कराया, ताकि उसे यह भरोसा दिलाया जा सके कि अब उसका दोबारा अजहर नवाज से वैध निकाह हो गया है। इसके बाद उससे फिर वैवाहिक संबंध बनाने के लिए कहा गया।

इस मामले में अमरोहा जिले के सैदनगली थाने में 9 दिसंबर 2025 को तैय्यब, शहनवाज चौधरी, हकीम निशात, आसिम और मुर्तजा उर्फ कारी मुर्तजा समेत 9 आरोपितों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता (BNS), मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 एवं पॉक्सो अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत लगभग 10 साल तक चले रेप के गंभीर आरोप लगाए गए।

अब आरोपितों ने कोर्ट में इस एफआईआर को रद्द करने की माँग करते हुए कहा कि निकाह हलाला मुस्लिम पर्सनल लॉ में मान्य है। उनका यह भी कहना था कि 2016 में तीन तलाक कानूनी रूप से मान्य था। उन्होंने दावा किया कि यह मामला बेटी की कस्टडी और संपत्ति के विवाद के चलते दर्ज कराया गया है। कुछ आरोपितों ने यह भी कहा कि उनकी भूमिका बहुत छोटी थी।

हाई कोर्ट ने FIR रद्द करने से क्यों किया इनकार?

हाई कोर्ट ने कहा कि इस समय आरोपों की सच्चाई पर फैसला नहीं दिया जा सकता। एफआईआर और महिला के बयान से पहली नजर (Prime Facie) में गंभीर अपराध का मामला बनता है। रिकॉर्ड से यह भी संकेत मिलता है कि पहले हलाला के दौरान, जब महिला नाबालिग थी, उसके साथ वैधानिक रेप (statutory rape) हुआ। वहीं दूसरी बार कथित हलाला के दौरान गैंगरेप के आरोप लगाए गए हैं।

कोर्ट ने कहा कि इन आरोपों की सच्चाई पुलिस जाँच और मुकदमे के दौरान ही सामने आएगी। इसलिए एफआईआर रद्द नहीं की जा सकती।

फैसले में हाई कोर्ट ने संविधान के मूल्यों का भी किया जिक्र

फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में सामने आए आरोप समाज की ऐसी तस्वीर पेश करते हैं, जो संविधान में दिए गए समानता, निजता और व्यक्तिगत गरिमा जैसे मूल्यों से काफी दूर है। कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया (Prima Facie) सामने आए तथ्य अंतरात्मा को झकझोर देने वाले हैं।

कोर्ट ने कहा, “हमारे समाज के एक ऐसे हिस्से की तस्वीर जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 में शामिल समानता, निजता और व्यक्तिगत गरिमा जैसे संवैधानिक मूल्यों और आकांक्षाओं से बहुत दूर है।”

साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि जिन आरोपितों ने अपनी भूमिका सीमित होने का दावा किया है, उनकी भूमिका क्या थी और उन्होंने अपराध में कोई साजिश या मदद की थी या नहीं, इसका फैसला जाँच के बाद ही होगा। इसी के साथ हाईकोर्ट ने चारों याचिकाएँ खारिज कर दीं और पुलिस को मामले की जाँच कानून के मुताबिक आगे बढ़ाने की अनुमति दे दी।