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धोलावीरा: हजारों साल से खुद को पढ़े जाने का इंतजार करते वो 10 चिह्न, कहानी दुनिया के ‘सबसे प्राचीन’ साइनबोर्ड की

धोलावीरा हड़प्पा सभ्यता का दक्षिणी केंद्र था और करीब 3000 से 1500 ईसा पूर्व के बीच बसा हुआ था। यह दक्षिण एशिया के सबसे बेहतर तरीके से संरक्षित शहरी बसावटों में से एक है।

हममें से अधिकतर लोगों से अगर पूछा जाए कि पढ़ाई में सबसे ज्यादा बोरियत किस विषय से होती है तो जवाब अक्सर इतिहास ही होगा। उसकी उबाऊ तारीखें, नाम और घटनाएँ हमें थका देती हैं। लेकिन इसी इतिहास का एक दूसरा चेहरा भी है। वही इतिहास जब किसी कहानी की तरह सामने आता है तो लगता है कि हम भी उस वक्त में, उस दौर में वहाँ जी रहे होते।

कहीं वह किसी घने जंगल में छिपा मिलता है, कहीं पहाड़ों के बीच, कहीं किसी मंदिर की दीवार पर और कहीं जमीन की कई परतों के नीचे दबा हुआ। मिट्टी हटती है, कोई पुरानी चीज सामने आती है और अचानक ऐसा लगता है कि हजारों साल पुरानी दुनिया हमारे सामने फिर साँस ले रही है।

इतिहास के ऐसे किस्से हमें केवल यह नहीं बताते कि हमारे पूर्वज कैसे रहते थे। वे हमें यह भी दिखाते हैं कि प्राचीन सभ्याएँ कैसे बनीं, कैसे बड़ी हुईं, कितनी समझदार और व्यवस्थित थीं और फिर एक दिन समय की धूल में खो गईं। इन कहानियों में शहर हैं, लोग हैं, रहस्य है और ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब आज भी पूरी तरह नहीं मिला।

आज हम ऐसे ही एक किस्से की बात करेंगे। यह कहानी गुजरात के कच्छ के रण में बसे धोलावीरा की है। यहाँ करीब 4500 साल पहले एक समृद्ध शहर खड़ा था। इसी शहर के भव्य उत्तरी दरवाजे पर लगा था दुनिया का सबसे प्राचीन ज्ञात साइनबोर्ड… सफेद जिप्सम से बने दस बड़े चिन्हों वाला एक ऐसा बोर्ड, जो वो सभ्यता खत्म होने के हजारों साल बाद तक मिट्टी में दबा रहा और फिर एक दिन इतिहास बनकर हमारे सामने आया। हालाँकि, इस पर क्या लिखा है यह अभी तक कोई नहीं पढ़ पाया है।

उत्तरी दरवाजे के कमरे में मिली असाधारण खोज

धोलावीरा का यह प्रसिद्ध साइनबोर्ड शहर के किले जैसे ऊँचे हिस्से के उत्तरी प्रवेश द्वार से मिला था। धोलावीरा की खुदाई का नेतृत्व करने वाले पुरातत्वविद् आरएस बिष्ट की रिपोर्ट के अनुसार, दस बड़े चिह्न उत्तरी दरवाजे के पश्चिमी कक्ष में गिरे हुए मिले थे। जिस स्थिति में वे पाए गए, उससे पुरातत्वविदों ने अनुमान लगाया कि वे पहले एक लकड़ी के बोर्ड में जड़े हुए थे।

यह बोर्ड संभवतः उत्तरी दरवाजे के बीच से गुजरने वाले मुख्य रास्ते के ऊपर लगाया गया था। यानी यह किसी बंद कमरे में रखा गया धार्मिक या निजी लेख नहीं था। इसकी जगह ऐसी थी जहाँ से शहर में आने-जाने वाले लोग इसे देख सकते थे। इसी सार्वजनिक स्थिति और चिन्हों के विशाल आकार के कारण इसे ‘धोलावीरा साइनबोर्ड’ कहा जाता है।

उत्तरी दरवाजे का मुख्य रास्ता करीब 3.5 मीटर चौड़ा था। खुदाई में मिले चिह्नों और लकड़ी के फ्रेम की छाप की लंबाई भी लगभग इतनी ही थी। इससे इस संभावना को बल मिला कि बोर्ड उसी दरवाजे के ऊपर उसकी चौड़ाई के अनुरूप लगाया गया था। बिष्ट ने लिखा कि यह बोर्ड दरवाजे के सामने वाले हिस्से पर इतनी ऊँचाई पर रहा होगा कि उसके सफेद चमकीले अक्षर दूर से दिखाई देते हों।

पत्थर के नहीं, जिप्सम के टुकड़ों से बनाए गए थे चिह्न

इस खोज को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि चिह्न किसी सपाट पत्थर पर लिखे या खोदे नहीं गए थे। उन्हें सफेद जिप्सम के अलग-अलग आकार वाले टुकड़ों को जोड़कर तैयार किया गया था। इन छोटे टुकड़ों को मोजेक की तरह सजाकर दस विशाल चिह्न बनाए गए और फिर लकड़ी के एक लंबे तख्ते में जड़ा गया था।

जिप्सम का सफेद रंग गहरे रंग की लकड़ी के ऊपर बहुत स्पष्ट दिखाई देता होगा। धोलावीरा का उत्तरी दरवाजा शहर की सबसे प्रभावशाली संरचनाओं में से एक था और ऊँची जगह पर बना हुआ था। इसलिए यहाँ लगाया गया चमकीला बोर्ड केवल सजावट नहीं बल्कि जानबूझकर दूर से पढ़े या पहचाने जाने के लिए बनाया गया सार्वजनिक प्रदर्शन हो सकता है।

बोर्ड पर हड़प्पा लिपि के दस चिन्ह थे। अलग-अलग अध्ययनों और पुरातात्विक विवरणों में प्रत्येक चिह्न की ऊँचाई लगभग 36 से 37 सेंटीमीटर बताई गई है। पूरा बोर्ड लगभग तीन से साढ़े तीन मीटर तक लंबा रहा होगा। इसके एक चिह्न को चार बार दोहराया गया है। इतने बड़े आकार में मिले हड़प्पाई अक्षरों का यह सबसे असाधारण उदाहरण माना जाता है।

धोलावीरा में मिले चिह्नों की ड्राइंग

लकड़ी गायब हुई, लेकिन चिह्न बचे रहे

संभवतः किसी समय यह बोर्ड दरवाजे से टूटकर नीचे गिरा और उसका सामने वाला हिस्सा जमीन की ओर हो गया। लकड़ी धीरे-धीरे नष्ट हो गई, लेकिन जिप्सम के भारी टुकड़े उसी क्रम में मिट्टी में दबे रह गए। इसलिए पुरातत्वविदों को लकड़ी का पूरा बोर्ड नहीं मिला, बल्कि उसके चिन्ह, उनका क्रम और फ्रेम की छाप मिली।

यही कारण है कि आज दिखाई देने वाला ‘साइनबोर्ड’ वास्तव में हजारों साल पुरानी वस्तु का पुरातात्विक पुनर्निर्माण है। पुरातत्वविदों ने चिन्हों की स्थिति, फ्रेम के निशान, दरवाजे की चौड़ाई और उस स्थान की वास्तुकला को देखकर यह समझने की कोशिश की कि मूल बोर्ड कैसा रहा होगा और कहाँ लगा था।

यूनेस्को के लिए तैयार धोलावीरा के नामांकन दस्तावेज में भी दस बड़े जिप्सम चिन्हों वाले साइनबोर्ड को स्थल की महत्वपूर्ण पुरावस्तुओं में शामिल किया गया है। धोलावीरा से इसके अतिरिक्त सैकड़ों मुहरें और मुहरों की छाप, हजारों मनके, पत्थर के वास्तुशिल्प भाग, धातु की वस्तुएँ और बड़ी संख्या में मानकीकृत बाट भी मिले हैं।

सिंधु लिपि: जिसे आज तक कोई पढ़ नहीं सका

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि धोलावीरा के इस साइनबोर्ड पर आखिर लिखा क्या था। इसका साफ जवाब है कि आज तक किसी को ठीक-ठीक पता नहीं चल सका। जिस लिपि में ये चिह्न लिखे गए हैं, उसे सिंधु लिपि कहा जाता है और इसे अभी तक पूरी तरह पढ़ा नहीं जा सका है।

इस लिपि में करीब 400 मूल चिह्न माने जाते हैं। इनके कई अलग-अलग रूप भी मिले हैं। आम तौर पर इसे दाएँ से बाएँ लिखा जाता था। सिंधु लिपि के चिह्न सैकड़ों मुहरों, मिट्टी के बर्तनों और तांबे की पट्टिकाओं पर मिले हैं। लेकिन धोलावीरा का साइनबोर्ड इसलिए खास है क्योंकि इसके चिह्न बहुत बड़े हैं और यह इस लिपि के सबसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक लेखों में गिना जाता है।

दुनिया भर के शोधकर्ताओं ने इसे समझने की कई कोशिशें की हैं। कुछ का मानना है कि इस पर किसी शासक, संस्था या शहर का नाम लिखा होगा, जैसे आज किसी इमारत या शहर के प्रवेश द्वार पर नाम लिखा होता है। कुछ विद्वान इसे धार्मिक अनुष्ठानों और यज्ञ से जुड़ा सूचना-पट्ट मानते हैं जबकि कुछ इसे कारीगरों, धातु के काम या व्यापार से जुड़ी घोषणा बताते हैं।

लेकिन इनमें से कोई भी बात पूरी तरह साबित नहीं हो सकी है। इसलिए धोलावीरा का यह साइनबोर्ड आज भी उतना ही रहस्यमय है, जितना खुदाई के समय था। हम उसके चिह्न देख सकते हैं लेकिन उनका असली मतलब अब भी इतिहास की सबसे बड़ी पहेलियों में से एक बना हुआ है।

आज कहाँ है यह ऐतिहासिक धरोहर?

आज धोलावीरा साइनबोर्ड नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय (National Museum) के संग्रह में सुरक्षित रखा गया है। हालांकि संरक्षण संबंधी चिंताओं के चलते इसे फिलहाल सार्वजनिक प्रदर्शनी में नहीं रखा गया है। यह अब भी शोध का विषय बना हुआ है क्योंकि सिंधु या हड़प्पा लिपि में मिले अब तक के सबसे लंबे चिह्न-समूहों में से एक होने के कारण यह भाषाविदों और पुरातत्वविदों के लिए बेहद कीमती है।

हाल ही में संस्कृति मंत्रालय ने भी अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर इस सिंधु-सरस्वती अभिलेख से जुड़ी तस्वीरें साझा करते हुए धोलावीरा साइनबोर्ड को हड़प्पा सभ्यता की सबसे उल्लेखनीय खोजों में गिनाया और इसे दुनिया का सबसे पुराना ज्ञात सार्वजनिक साइनबोर्ड बताया है।

धोलावीरा सिर्फ साइनबोर्ड तक सीमित नहीं

यह जानना भी जरूरी है कि धोलावीरा की पहचान सिर्फ इस साइनबोर्ड तक सीमित नहीं है। गुजरात पर्यटन विभाग की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, यह शहर अपनी अत्यंत उन्नत जल-प्रबंधन प्रणाली के लिए भी प्रसिद्ध है। यहाँ पत्थर काटकर बनाए गए बड़े जलाशय, वर्षा जल संचयन प्रणाली और चट्टान काटकर बनाए गए कुएं मिले हैं, जो उस दौर की इंजीनियरिंग क्षमता को दर्शाते हैं।

शहर तीन हिस्सों में बंँटा था- किला (citadel), मध्य नगर और निचला नगर और यहाँ छह अलग-अलग प्रकार की समाधियाँ भी मिली हैं, जो हड़प्पा सभ्यता में मृत्यु को लेकर एक अनोखी सोच दर्शाती हैं।

धोलावीरा है कहाँ और क्यों है खास?

धोलावीरा गुजरात के कच्छ जिले में, कच्छ के महान रण (Great Rann of Kutch) के भीतर स्थित खादिर द्वीप पर बसा एक हड़प्पाकालीन नगर है। यूनेस्को के अनुसार, यह हड़प्पा सभ्यता का दक्षिणी केंद्र था और करीब 3000 से 1500 ईसा पूर्व के बीच बसा हुआ था। यह दक्षिण एशिया के सबसे बेहतर तरीके से संरक्षित शहरी बसावटों में से एक है, जिसमें एक किलेबंद नगर और एक कब्रिस्तान दोनों शामिल हैं।

27 जुलाई 2021 को यूनेस्को ने धोलावीरा को विश्व धरोहर स्थल (World Heritage Site) घोषित किया था। यह भारत का 40वाँ और गुजरात का चौथा यूनेस्को स्थल बना, साथ ही यह सिंधु घाटी सभ्यता का भारत में स्थित पहला यूनेस्को स्थल भी है।

यहाँ 2 मौसमी नदियों मानसर और मनहर से पानी मिलता था, जो इस सूखे इलाके में बेहद दुर्लभ संसाधन था। धोलावीरा की खोज का श्रेय ASI के पुरातत्वविद् जे.पी. जोशी को जाता है, जिन्होंने 1967-68 में इस स्थल का पता लगाया था। हालाँकि, व्यवस्थित खुदाई 1990 के बाद ही शुरू हो सकी।

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शिव
शिव
7 वर्षों से खबरों की तलाश में भटकता पत्रकार...

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