न्यूयॉर्क की सड़कों पर इन दिनों बड़ी संख्या में Gen Z युवा जुट रहे हैं। पहली नजर में ऐसा लग सकता है कि वे किसी प्रदर्शन या नए ट्रेंड का हिस्सा हैं, लेकिन इसकी वजह चौंकाने वाली है।
यही वह पीढ़ी है, जिसने स्मार्टफोन और सोशल मीडिया को अपनी दुनिया बना लिया था, लेकिन अब वही युवा कुछ समय के लिए मोबाइल से दूरी बनाने की अपील कर रहे हैं। वे लोगों से कह रहे हैं कि स्क्रीन छोड़िए, सामने बैठे इंसानों से बात कीजिए।
दरअसल न्यूयॉर्क में आयोजित हो रहा ‘समर ऑफ लड’ (Summer of Ludd) फेस्टिवल तकनीक के विरोध का नहीं, बल्कि डिजिटल जिंदगी और वास्तविक दुनिया के बीच खोते संतुलन को फिर से पाने की कोशिश बनकर उभर रहा है।
आखिर क्या है समर ऑफ लड?
न्यूयॉर्क के ईस्ट विलेज और टॉम्पकिन्स स्क्वायर पार्क में आयोजित होने वाला समर ऑफ लड आठ दिन तक चलने वाला ऑफलाइन फेस्टिवल है। इस साल यह फेस्टिवल 28 जून से 8 जुलाई तक चला। इसकी सबसे खास बात यह है कि यहाँ आने वाले लोगों से पूरे कार्यक्रम के दौरान मोबाइल फोन का इस्तेमाल न करने की अपील की जाती है। किसी भी कार्यक्रम में फोटो खींचने, वीडियो बनाने या रिकॉर्डिंग करने की अनुमति नहीं होती।
आज जब किसी भी कार्यक्रम का प्रचार सोशल मीडिया पर होता है, तब इस फेस्टिवल ने बिल्कुल अलग रास्ता चुना है। इसके पोस्टर और कार्यक्रम की जानकारी इंटरनेट पर नहीं, बल्कि इलाके में लगाए गए पोस्टरों, पर्चों और छोटी-छोटी पुस्तिकाओं के जरिए लोगों तक पहुँचाई जाती है।
आयोजकों का मानना है कि अगर उद्देश्य लोगों को स्क्रीन से बाहर निकालना है, तो शुरुआत भी ऑफलाइन तरीके से ही होनी चाहिए। फेस्टिवल में कई तरह की गतिविधियाँ आयोजित होती हैं।
इनमें नाटक, ऑफलाइन डेटिंग सेशन, कपड़ों की मरम्मत सीखने की कार्यशालाएँ, जीन (Zines) बनाना, शॉर्टवेव रेडियो सीखना, सामुदायिक चर्चाएँ और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डेटा सेंटर और निगरानी तकनीकों (Surveillance) पर खुली बहस शामिल है।
इन गतिविधियों का मकसद लोगों को यह एहसास कराना है कि मनोरंजन, सीखने और रिश्ते बनाने के लिए सिर्फ इंटरनेट ही एकमात्र रास्ता नहीं है।
Gen Z क्यों बन रही है इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत?
इस फेस्टिवल की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसमें सबसे ज्यादा भागीदारी Gen Z की है। यह वही पीढ़ी है जिसने बचपन से स्मार्टफोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया के बीच अपनी जिंदगी बिताई है।
कुछ साल पहले तक यही माना जाता था कि युवा पीढ़ी तकनीक के बिना रह ही नहीं सकती। लेकिन अब तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है। कई युवा खुलकर कह रहे हैं कि लगातार मोबाइल पर बने रहने से उनकी एकाग्रता कम हुई है, मानसिक थकान बढ़ी है और वास्तविक रिश्तों पर असर पड़ा है।
अमेरिका में हुए एक सर्वे के अनुसार, लगभग आधे किशोर मानते हैं कि सोशल मीडिया उनकी उम्र के लोगों के लिए नुकसानदायक साबित हो रहा है। यह आंकड़ा पिछले कुछ वर्षों की तुलना में काफी बढ़ा है। इससे यह संकेत मिलता है कि युवा अब डिजिटल दुनिया के फायदों के साथ-साथ उसके नुकसान को भी समझने लगे हैं।
यही कारण है कि बड़ी संख्या में युवा अब कुछ समय के लिए डिजिटल दुनिया से दूरी बनाकर वास्तविक दुनिया में लोगों से मिलने, बातचीत करने और नई चीजें सीखने की कोशिश कर रहे हैं।
यह तकनीक विरोध नहीं, संतुलित तकनीक की माँग है
कई लोगों को लग सकता है कि यह आंदोलन तकनीक के खिलाफ है, लेकिन आयोजक इस धारणा को गलत बताते हैं। उनका कहना है कि स्मार्टफोन, इंटरनेट या AI ने लोगों की जिंदगी आसान बनाई है और वे इसका विरोध नहीं कर रहे हैं। उनका असली सवाल यह है कि क्या इंसान अब अपनी तकनीक का मालिक है या धीरे-धीरे उसका गुलाम बनता जा रहा है।
आज सोशल मीडिया के एल्गोरिदम तय करते हैं कि हम क्या देखें, किस तरह की खबरें पढ़ें और किस तरह के वीडियो हमारे सामने आएँ। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म हमारे व्यवहार, पसंद और आदतों का लगातार डेटा इकट्ठा करते हैं। ऐसे में आयोजकों का कहना है कि जरूरत तकनीक को खत्म करने की नहीं, बल्कि उस पर इंसानों का नियंत्रण बनाए रखने की है।
उनके मुताबिक, तकनीक हमारी जिंदगी को आसान बनाए, लेकिन हमारे फैसले, समय और रिश्तों पर पूरी तरह हावी न हो।
युवाओं को आखिर किस बात की सबसे ज्यादा चिंता है?
फेस्टिवल में शामिल होने वाले कई लोगों ने अपनी चिंताओं को खुलकर साझा किया। किसी ने कहा कि घंटों तक बिना वजह सोशल मीडिया स्क्रॉल करना अब आदत बन चुका है। किसी ने माना कि हर समय ऑनलाइन रहने की वजह से मानसिक दबाव बढ़ गया है। कुछ लोगों ने अकेलेपन, तनाव और लगातार तुलना करने की संस्कृति को भी बड़ी समस्या बताया।
इसके अलावा AI और निगरानी तकनीकों को लेकर भी युवाओं में चिंता दिखाई देती है। उनका मानना है कि आज इंटरनेट पर की गई लगभग हर गतिविधि रिकॉर्ड होती है। कंपनियाँ लोगों की पसंद और व्यवहार का डेटा इकट्ठा करती हैं और उसी के आधार पर उन्हें विज्ञापन और कंटेंट दिखाया जाता है।
युवाओं का कहना है कि सुविधा के नाम पर निजी जिंदगी धीरे-धीरे सार्वजनिक होती जा रही है। यही वजह है कि वे अब डिजिटल दुनिया और निजी जीवन के बीच संतुलन चाहते हैं।
‘Ludd’ नाम के पीछे क्या है कहानी?
इस फेस्टिवल का नाम 19वीं सदी के Luddites आंदोलन से लिया गया है। औद्योगिक क्रांति के दौरान इंग्लैंड में जब नई मशीनें फैक्ट्रियों में आने लगीं, तब कई कारीगरों और मजदूरों को डर था कि मशीनें उनके रोजगार छीन लेंगी। इसी वजह से उन्होंने उन मशीनों का विरोध किया। इतिहास में उन्हें Luddites के नाम से जाना गया।
हालाँकि आज का समर ऑफ लड आंदोलन उस दौर से काफी अलग है। यहाँ कोई मशीन तोड़ने या तकनीक खत्म करने की बात नहीं हो रही है। आयोजकों का कहना है कि वे सिर्फ लोगों को यह याद दिलाना चाहते हैं कि तकनीक का उद्देश्य इंसानों की मदद करना है, उन पर हावी होना नहीं। यानी पुराने आंदोलन में सवाल रोजगार का था, जबकि आज का सवाल इंसानी समय, ध्यान और स्वतंत्रता का है।
विशेषज्ञ इस आंदोलन को कैसे देखते हैं?
तकनीक विशेषज्ञ मानते हैं कि इस तरह की पहल लोगों को अपनी डिजिटल आदतों पर दोबारा सोचने का मौका देती है। हालाँकि वे यह भी कहते हैं कि आज की दुनिया में स्मार्टफोन और इंटरनेट से पूरी तरह दूरी बनाना लगभग असंभव है। बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ, नौकरी, यात्रा, सरकारी सुविधाएँ और रोजमर्रा के कई जरूरी काम अब डिजिटल माध्यमों पर निर्भर हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि चुनौती तकनीक छोड़ने की नहीं, बल्कि उसके संतुलित इस्तेमाल की है। कुछ विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि अधिकांश लोग मोबाइल और सोशल मीडिया के नुकसान को समझते हैं, लेकिन फिर भी उन्हें छोड़ नहीं पाते। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि उनका सामाजिक और पेशेवर जीवन इन्हीं प्लेटफॉर्म पर निर्भर हो चुका है।
यानी बदलाव आसान नहीं होगा, लेकिन इस तरह के आंदोलन कम से कम लोगों को सोचने पर मजबूर जरूर करते हैं।
क्या यह डिजिटल डिटॉक्स का नया ट्रेंड बन सकता है?
पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के कई देशों में डिजिटल डिटॉक्स यानी कुछ समय के लिए मोबाइल और सोशल मीडिया से दूरी बनाने का चलन तेजी से बढ़ा है।
कई लोग अब छुट्टियों में मोबाइल बंद रखते हैं। कुछ लोग सोशल मीडिया से कुछ दिनों का ब्रेक लेते हैं। कुछ लोग स्मार्टफोन की जगह साधारण फीचर फोन का इस्तेमाल शुरू कर रहे हैं। ऑफलाइन बुक क्लब, रनिंग क्लब, सामुदायिक कार्यक्रम और बिना मोबाइल वाले मिलन समारोह भी लोकप्रिय हो रहे हैं।
ऐसे में समर ऑफ लड को केवल एक स्थानीय फेस्टिवल नहीं, बल्कि इसी बदलती सोच का हिस्सा माना जा रहा है। यह बताता है कि अब लोग तकनीक को पूरी तरह छोड़ना नहीं चाहते, बल्कि उसके साथ एक स्वस्थ रिश्ता बनाना चाहते हैं।
क्या यह आंदोलन सफल होगा?
यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि न्यूयॉर्क का यह छोटा-सा फेस्टिवल आगे चलकर दुनिया भर में बड़ा सामाजिक आंदोलन बनेगा या नहीं। लेकिन इतना जरूर है कि इसने एक ऐसी बहस छेड़ दी है, जिससे आज लगभग हर स्मार्टफोन उपयोगकर्ता जुड़ा हुआ है।
क्या लगातार स्क्रीन पर बिताया गया समय हमारी मानसिक सेहत को प्रभावित कर रहा है? क्या सोशल मीडिया हमारे रिश्तों को बदल रहा है? क्या AI और एल्गोरिदम हमारे फैसलों पर असर डाल रहे हैं? और सबसे बड़ा सवाल, क्या इंसान अब भी अपनी डिजिटल जिंदगी का मालिक है?
इन सवालों के जवाब हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकते हैं, लेकिन यह फेस्टिवल लोगों को कम से कम इतना सोचने पर मजबूर जरूर करता है कि तकनीक हमारी जिंदगी का हिस्सा रहे, लेकिन हमारी पूरी जिंदगी न बन जाए।


