गुजरात के छोटा उदेपुर जिले में द्वारका शारदापीठ द्वारा संचालित श्री आनंदवर्धन आश्रम के उद्घाटन के दौरान 25 जनजातीय एवं वनवासी लोगों ने स्वेच्छा से ईसाई धर्म को छोड़कर सनातन अपनाने का संकल्प लिया। आयोजन में द्वारकाशारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी सदानन्द सरस्वती महाराज भी उपस्थित रहे।
शारदापीठ का कहना है कि यह पहल जनजातीय क्षेत्रों में सांस्कृतिक जागरूकता, धार्मिक परंपराओं के संरक्षण और सेवा कार्यों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से चलाए जा रहे ‘स्वधर्मानयन’ अभियान का हिस्सा है। छोटा उदेपुर जिले के वासणा (कोषिन्द्रा) गाँव में स्थापित श्री आनंदवर्धन आश्रम का उद्घाटन धार्मिक अनुष्ठानों के बीच किया गया।
इस अवसर पर घर वापसी करने वाले लोगों ने गंगाजल ग्रहण कर भगवान श्रीराम का मंत्र स्वीकार किया और सनातन परंपराओं का पालन करने का संकल्प व्यक्त किया। आयोजन से जुड़े लोगों के अनुसार यह निर्णय स्वेच्छा से लिया गया। उन्होंने बताया कि कार्यक्रम का उद्देश्य किसी पर दबाव डालना नहीं, बल्कि इच्छुक लोगों को उनकी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना है।
जनजातीय क्षेत्रों में सांस्कृतिक जागरण का केंद्र बनेगा नया आश्रम
द्वारका शारदापीठ के अनुसार, श्री आनंदवर्धन आश्रम केवल धार्मिक गतिविधियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसे जनजातीय समाज के बीच शिक्षा, संस्कार, सामाजिक समरसता और सेवा कार्यों का केंद्र बनाया जाएगा। आश्रम के माध्यम से वैदिक परंपराओं, भारतीय संस्कृति और नैतिक जीवन मूल्यों से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाएँगे।
इसके अलावा बच्चों के संस्कार वर्ग, संस्कृत शिक्षा, योग प्रशिक्षण, महिला सशक्तिकरण, चिकित्सा शिविर और अन्य सामाजिक गतिविधियाँ भी संचालित करने की योजना है।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी सदानन्द सरस्वती महाराज ने कहा कि वे पिछले कई वर्षों से गुजरात के जनजातीय और वनवासी क्षेत्रों में ‘स्वधर्मानयन यात्रा’ के माध्यम से लोगों को सनातन धर्म और भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति जागरूक कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि वासणा में स्थापित नया आश्रम इस अभियान को स्थायी आधार देगा और यहाँ से गाँव-गाँव तक जनजागरण कार्यक्रम चलाए जाएँगे। उनके अनुसार, किसी भी समाज की पहचान उसकी संस्कृति, परंपराओं और जीवन मूल्यों से होती है, इसलिए नई पीढ़ी को अपने धर्म, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत की जानकारी होना आवश्यक है।
शारदापीठ का कहना है कि भविष्य में गुजरात समेत अन्य जनजातीय क्षेत्रों में भी इस अभियान को सेवा, संस्कार और सामाजिक जागरूकता के साथ आगे बढ़ाया जाएगा।

