सर्वदलीय बैठक में TMC के बागियों को बुलाने पर विपक्ष का पहले बायकॉट, कुछ ही मिनटों में लौटे: रिजीजू बोले- NCPI सांसदों को नियमों के हिसाब से मिली जगह

मानसून कालीन सत्र से पहले रविवार (19 जुलाई 2026) को बुलाए सर्वदलीय बैठक में हाईवोल्टेज ड्रामा देखा गया। विपक्षी सांसदों ने पहले टीएमसी के बागी सांसदों जो एनसीपीआई में शामिल हो चुके हैं, उन्हें बुलाने का विरोध किया और बैठक का बायकॉट किया। हालाँकि कुछ देर बाद वे लोग वापस लौट आए और वॉकआउट को सांकेतिक विरोध बताया। बैठक 3 घंटे चली।

सर्वदलीय बैठक में सरकार ने साफ कहा कि वह सभी मुद्दों पर चर्चा करने के लिए तैयार हैं। सांसदों को बुलाने के मुद्दे पर उन्होंने कहा है कि ये नियम के मुताबिक ही है।

बैठक के बाद केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने कहा, “कल से संसद का मानसून सत्र शुरू होगा। आज सरकार ने सर्वदलीय बैठक बुलाई है। हम सभी दलों से आग्रह करते हैं कि मानसून सत्र को अच्छी तरह से चलाने में सभी सहयोग करें। सरकार जो बिल लेकर आएगी उसमें सभी विपक्षी दल और सत्ता दल के सदस्य अच्छे से हिस्सा लें। संसद जितने अच्छे से चलेगा देश का उतना ही भला होगा। अगर विरोध भी करना है, तो बातों से ही विरोध करें, हंगामा न करें।”

विपक्ष को सभी मुद्दों पर जोरदार बहस करने के लिए आमंत्रित करते हुए उन्होंने कहा, “हम संसदीय लोकतंत्र में रहते हैं जोरदार बहस करें। कोई पार्टी या कोई सदस्य जो भी बात रखना चाहता है, वह पार्लियामेंट में रख सकता है। लेकिन बहस करें, हंगामा न करें”

हंगामा से देश को होने वाले नुकसान की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि पहले भी हंगामा होने से संसद को चलाने में दिक्कत आई थी। हंगामा करने से कोई राजनीतिक लाभ नहीं मिलता है, ये साबित हो चुका है। उन्होंने सभी पार्टी के सांसदों से अनुरोध करते हुए कहा कि संसद को ठीक तरीके से चलने दें, देश का पैसा बर्बाद न करें। विरोध करना है तो बातों से करे हम अपनी तरह से पूरा योगदान देंगे। विपक्ष को सुनने के लिए सरकार तैयार है।

इससे पहले TMC नेता महुआ मोइत्रा ने कहा कि स्पीकर ने अभी विलय को मंजूरी नहीं दी है, जबकि टीएमसी ने अयोग्यता की 20 याचिकाएँ दायर की हैं जो अभी भी लंबित है। ऐसे में बागियों को दूसरे पार्टी में शामिल करना ही गैरकानूनी है। इस पर संसदीय कार्यमंत्री ने कहा कि नियमों के मुताबिक सांसदों को जगह दी गई है।

दरअसल पिछले बजट सत्र में जमकर हंगामा हुआ था और लोकसभा में मात्र 13 घंटे और राज्यसभा में मात्र 16.5 घंटे चर्चा हुई। बाकी समय हंगाम और विपक्ष के बायकॉट की भेंट चढ़ गई। इसकी वजह से 77 फीसदी बिल बगैर बहस के ही पारित कर दिया गया। यह न सिर्फ पैसे की बर्बादी है बल्कि सांसदों को देशहित में जिन मुद्दों पर चर्चा करने के लिए देश की जनता ने भेजा है, उसपर अपनी राय रखे बगैर वे सदन से चले गए। ये हर तरह से देश के लिए नुकसानदायक रहा।