भारत में ‘नदी जोड़ो अभियान’ (Interlinking of Rivers – ILR) की जब भी बात होती है, तो चर्चा का केंद्र अक्सर केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट (Ken-Betwa Link Project – KBLP) ही रहता है, क्योंकि यह धरातल (Ground Level) पर उतरने वाला देश का पहला मॉडल प्रोजेक्ट है। लेकिन राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी (National Water Development Agency – NWDA) की वास्तविक योजना का दायरा सिर्फ मध्य भारत के बुंदेलखंड तक सीमित नहीं है।
NWDA का अंतिम और व्यापक लक्ष्य पूरे देश के हाइड्रोलॉजिकल मानचित्र (Hydrological Map) को पुनर्गठित करना और भारत की तमाम बड़ी-छोटी नदियों को एक साझा ‘राष्ट्रीय जल ग्रिड’ (National Water Grid) के जरिए आपस में जोड़ना है।
इस महा-योजना के तहत संपूर्ण भारत में कुल 30 अंतर-बेसिन जल स्थानांतरण (Inter-basin Water Transfer) लिंक प्रस्तावित किए गए हैं। इन 30 विशाल परियोजनाओं का मूल दर्शन यह है कि मानसून के 100 से 120 दिनों के दौरान जिन नदियों का अरबों-खरबों लीटर मीठा पानी विनाशकारी बाढ़ लाता हुआ उफान के साथ समुद्र में बेकार बह जाता है, उसे रोककर और मोड़कर देश के उन दूर-दराज के इलाकों तक पहुँचाया जाए जो साल के आठ महीने बूँद-बूँद पानी के लिए तरसते हैं।
इस पूरे खाके को भारत की भौगोलिक और भू-गर्भीय बनावट के आधार पर दो स्पष्ट घटकों में विभाजित किया गया है – 1- प्रायद्वीपीय घटक (Peninsular Component – 16 रिवर लिंक प्रोजेक्ट) और 2- हिमालयी घटक (Himalayan Component – 14 रिवर लिंक प्रोजेक्ट)।

जहाँ एक तरफ चीन का साउथ-नॉर्थ वाटर ट्रांसफर प्रोजेक्ट (South-North Water Transfer Project) और अमेरिका का कैलिफोर्निया स्टेट वाटर प्रोजेक्ट (California State Water Project) यह साबित कर चुके हैं कि बड़े पैमाने पर जल अंतरण से महाद्वीपीय स्तर के जल संकट को खत्म किया जा सकता है, वहीं भारत के सामने भौगोलिक विषमताओं के साथ-साथ राज्यों के आपसी जल विवाद (Inter-State Water Disputes), विशाल जन-विस्थापन और नाजुक पारिस्थितिकी (Fragile Ecology) की अद्वितीय चुनौतियाँ मौजूद हैं।
नदी जोड़ो परियोजना पर आधारित रिपोर्ट के तीसरे और आखिरी हिस्से में हम भारत की बाकी सभी प्रमुख परियोजनाओं, सिंधु जल संधि के बाद उत्तर-पश्चिम भारत में चल रहे आधिकारिक प्रस्तावों, दुनिया के 5 सबसे बड़े वॉटर ट्रांसफर मॉडलों, पर्यावरणीय संकटों और इस अंतिम निष्कर्ष का गहन विश्लेषण करेंगे कि क्या यह योजना भारत की भावी ‘जल क्रांति’ बनेगी या फिर यह देश के इतिहास की सबसे कठिन और संवेदनशील राष्ट्रीय परियोजना साबित होने जा रही है।
नदी जोड़ो परियोजना के प्रायद्वीपीय घटक: 16 प्रस्तावित रिवर लिंक प्रोजेक्ट
भारत की महत्वाकांक्षी नदी जोड़ो परियोजना के प्रायद्वीपीय घटक मुख्य रूप से मध्य और दक्षिण भारत की नदियों तथा पश्चिमी घाट (Western Ghats) से निकलने वाली जलधाराओं पर केंद्रित है। इस घटक के तहत कुल 16 अंतर-बेसिन लिंक प्रस्तावित हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य ओडिशा और आंध्र प्रदेश की महानदी व गोदावरी जैसी विशाल नदियों के मानसूनी ‘अधिशेष’ (Surplus) जल को उठाकर दक्षिण भारत की जल-संकटग्रस्त नदियों कृष्णा, पेनार, कावेरी, वैगई और गुंडार तक पहुँचाना है।
दक्षिण भारत के प्रमुख रिवर लिंक प्रोजेक्ट
इसमें महानदी – गोदावरी – कृष्णा – पेनार – कावेरी – वैगई – गुंडार ग्रिड (दक्षिण भारत की रीढ़) प्रमुख है। यह दक्षिण भारत को एक सूत्र में पिरोने वाला सबसे बड़ा वॉटर ग्रिड है। इसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित लिंक शामिल हैं-
महानदी (मणिभद्र) – गोदावरी (दौलेश्वरम) लिंक: ओडिशा की महानदी में मानसून के दौरान भारी तबाही मचाने वाले पानी को बैराज और 800 किमी से अधिक लंबी नहरों के माध्यम से गोदावरी नदी में स्थानांतरित करना।
गोदावरी (इंचमपल्ली/पोलावरम) – कृष्णा (नागार्जुनसागर/विजयावाड़ा) लिंक: गोदावरी के विशाल जलप्रवाह को आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के रास्ते कृष्णा नदी में डालना।
कृष्णा (अल्मट्टी/श्रीशैलम/नागार्जुनसागर) – पेनार (सोमशिला) लिंक: कृष्णा के पानी को रायलसीमा और कर्नाटक के शुष्क क्षेत्रों से होते हुए पेनार नदी तक ले जाना।
पेनार (सोमशिला) – कावेरी (ग्रैंड एनिकिट) लिंक: आंध्र प्रदेश से पानी को तमिलनाडु के कावेरी बेसिन तक पहुँचाना।
कावेरी (कटालई) – वैगई – गुंडार लिंक: कावेरी के पानी को तमिलनाडु के सबसे दक्षिणी और सूखे जिलों (मदुरै, रामनाथपुरम) तक पहुँचाना।
अगर यह ग्रिड पूरा बन जाता है, तो तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के बीच पिछले सौ सालों से चले आ रहे कावेरी और कृष्णा जल विवादों (Water Disputes) को काफी हद तक कम कर सकता है, क्योंकि दक्षिण के राज्यों को उत्तर की नदियों से अतिरिक्त जल मिलने लगेगा।
मध्य भारत के रिवर लिंक प्रोजेक्ट (Priority Links of Central India)
पारबती – कालीसिंध – चंबल लिंक (Parbati-Kalisindh-Chambal Link): मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र और राजस्थान के हाड़ौती व चंबल क्षेत्र (कोटा, बूंदी, झालावाड़) को सिंचाई और पेयजल आपूर्ति देने के लिए केन-बेतवा के साथ ही इस लिंक को प्राथमिकता में रखा गया है।
दमनगंगा – पिंजाल लिंक (Damanganga-Pinjal Link): गुजरात और महाराष्ट्र की सीमा पर बहने वाली दमनगंगा नदी के पानी को मोड़कर वैतरणा और पिंजाल नदियों के रास्ते मुंबई महानगर (Mumbai Metropolitan Region) तक पहुँचाना। इसका मुख्य उद्देश्य भारत की वित्तीय राजधानी मुंबई की वर्ष 2050 तक की पेयजल मांग को पूरा करना है।
पार – तापी – नर्मदा लिंक (Par-Tapi-Narmada Link): दक्षिण गुजरात के पश्चिमी घाट से निकलने वाली नदियों (पार, तापी) का पानी मोड़कर नर्मदा के मुख्य केनाल नेटवर्क में डालना, जिससे उत्तर गुजरात, सौराष्ट्र और कच्छ के अति-शुष्क इलाकों तक पानी पहुँचाया जा सके। हालाँकि स्थानीय ST समुदायों के कड़े विरोध के कारण वर्तमान में इस पर काम रुका हुआ है।
पश्चिमी घाट की नदियों का पानी पूर्व की ओर मोड़ना (West Flowing Rivers Transfer)
नेत्रावती – हेमावती लिंक: कर्नाटक में पश्चिमी घाट से होकर अरब सागर में गिरने वाली नेत्रावती नदी के पानी को मोड़कर कावेरी की सहायक हेमावती नदी में डालना ताकि बंगलुरु और दक्षिणी कर्नाटक के किसानों को पानी मिल सके।
बेदती – वरदा लिंक: कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ और धारवाड़ जिलों में जल संकट दूर करना।
पम्बा – अचनकोविल – वैप्पार लिंक: केरल की पम्बा और अचनकोविल नदियों का पानी तमिलनाडु के सूखे वैप्पार बेसिन में ले जाना (जिसका केरल सरकार लगातार विरोध कर रही है)।
हिमालयी घटक (Himalayan Component) का विश्लेषण
हिमालयी घटक पूरे अंतर-बेसिन जल स्थानांतरण का सबसे विशाल, तकनीकी रूप से अत्यंत जटिल और इंजीनियरिंग की दृष्टि से चुनौतीपूर्ण हिस्सा है। इसके तहत कुल 14 लिंक प्रस्तावित किए गए हैं। इसका मुख्य हिस्सा नेपाल, भूटान और पूर्वोत्तर भारत (असम, अरुणाचल) से बहकर आने वाली बारहमासी (Perennial) और उफनती नदियों के जल को नियंत्रित करना और उसे देश के पश्चिमी और दक्षिणी हिस्सों तक ले जाना है।

मानस – संकोश – तिस्ता – गंगा (M-S-T-G) लिंक
ये प्रोजेक्ट राष्ट्रीय जल ग्रिड की रीढ़ है। यह पूरी नदी जोड़ो योजना का सबसे बड़ा, सबसे महँगा और सबसे दूरगामी प्रस्ताव है।
इस प्रोजेक्ट में भूटान और पूर्वोत्तर भारत की जिन मानस और संकोश नदियों में अत्यधिक पानी उपलब्ध है। उन नदियों के पानी को असम में एक विशाल बैराज बनाकर रोका जाएगा और लगभग 700 किलोमीटर से अधिक लंबी एक ‘सुपर केनाल’ (Super Canal) के जरिए पश्चिम बंगाल की तिस्ता नदी से होते हुए बिहार के पास गंगा नदी (फरक्का बैराज के ऊपर) में डाला जाएगा।
इस एक लिंक से प्रति वर्ष लगभग 43,000 मिलियन घनमीटर (MCM) पानी स्थानांतरित करने की योजना है, जो भारत की कई छोटी नदियों के कुल वार्षिक प्रवाह से भी अधिक है।
यह नहर उत्तर पूर्व भारत को मुख्य भारत से जोड़ने वाले ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ (Chicken’s Neck) से होकर गुजरेगी, जिससे पूर्वोत्तर में नौवहन (Navigation) और सुरक्षा बलों की लॉजिस्टिक्स क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी।
गंगा और उसकी सहायक नदियों का लिंक नेटवर्क
कोसी – घाघरा लिंक (Kosi-Ghaghara Link): नेपाल से निकलकर बिहार में तबाही मचाने वाली ‘बिहार का शोक’ कही जाने वाली कोसी नदी पर विशाल छत्र बाँध बनाकर उसके पानी को उत्तर प्रदेश की घाघरा (सरयू) नदी में ले जाना।
गंडक – गंगा लिंक (Gandak-Ganga Link): गंडक नदी का पानी मोड़कर मध्य गंगा बेसिन को मजबूती देना।
घाघरा – यमुना और शारदा – यमुना लिंक (Ghaghara-Yamuna & Sarda-Yamuna Links): नेपाल-उत्तराखंड सीमा की शारदा (महाकाली) और घाघरा नदियों के पानी को विशाल नहरों के जरिए हरियाणा और दिल्ली के ऊपर यमुना नदी में डालना। इससे यमुना का विलुप्त होता प्रवाह पुनः जीवित होगा और दिल्ली-NCR का पेयजल संकट स्थायी रूप से हल होगा।
उत्तर-पश्चिम भारत का लिंक ग्रिड
यमुना – राजस्थान लिंक: यमुना नदी से पानी निकालकर राजस्थान के चुरू, झुंझुनूं और बीकानेर जिलों तक सिंचाई नहर ले जाना।
राजस्थान – साबरमती लिंक: राजस्थान के पानी को गुजरात की साबरमती नदी तक बढ़ाकर पश्चिमी भारत के पूरे रेगिस्तानी बेल्ट को सींचना।

हिमाचल-पंजाब-राजस्थान और जम्मू-कश्मीर से जुड़े आधिकारिक प्रस्ताव (सिंधु जल संधि के संदर्भ में)
उत्तर-पश्चिमी भारत में नदियों का प्रबंधन केवल एक कृषि या पेयजल का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति (International Fiplomacy) का एक अत्यंत संवेदनशील विषय रहा है।
साल 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई ‘सिंधु जल संधि’ (Indus Waters Treaty – IWT) के तहत नदियों का विभाजन किया गया था, जिसमें-
पूर्वी नदियाँ (Eastern Rivers): रावी, व्यास और सतलुज के पूरे पानी पर भारत का पूर्ण और अनन्य (exclusive) अधिकार दिया गया।
पश्चिमी नदियाँ (Western Rivers): सिंधु, झेलम और चेनाब का अधिकांश पानी पाकिस्तान के इस्तेमाल के लिए आवंटित किया गया, हालाँकि भारत को इन पर ‘रन-ऑफ-द-रिवर’ (run-of-the-river) जलविद्युत परियोजनाएँ बनाने का सीमित अधिकार मिला।
पूर्वी नदियों (रावी, व्यास, सतलुज) का पूरा अधिकार भारत के पास होने के बावजूद, दशकों तक पर्याप्त बाँधों, बैराजों और नहर नेटवर्क के अभाव में भारत के हिस्से का औसतन 2 से 3 मिलियन एकड़ फीट (MAF) मीठा पानी बिना इस्तेमाल हुए रावी नदी के जरिए बहकर पाकिस्तान चला जाता था।
बीते कुछ समय में खासकर पहलगाम हमले के बाद भारत सरकार ने एक तरफ ऑपरेशन सिंदूर चलाया, तो दूसरी तरफ सिंधु जल समझौते को होल्ड कर दिया। इसके बाद केंद्र सरकार ने आधिकारिक नीति बनाकर इस एक-एक बूँद पानी को भारत के भीतर ही रोकने और सहेजने के लिए तीन प्रमुख ढाँचागत परियोजनाओं पर काम पूरा किया है-
शाहपुरकंडी बाँध परियोजना (Shahpurkandi Dam Project – Punjab): ये प्रोजेक्ट पंजाब के पठानकोट जिले में रावी नदी पर स्थित है। शाहपुरकंडी बाँध परियोजना मशहूर थेन (रणजीत सागर) बाँध के Downstream में है।
इस बाँध का निर्माण पूरा होने से रावी नदी का वह पानी जो बहकर पाकिस्तान चला जाता था, उसे पूरी तरह रोक लिया गया है। इस सहेजे गए पानी से पंजाब की 32,000 हेक्टेयर के साथ ही जम्मू-कश्मीर के कठुआ और सांबा जिलों की 1,150 हेक्टेयर कृषि भूमि को तत्काल सिंचाई का पानी मिलने लगा है।
उझ बहुउद्देशीय परियोजना (Ujh Multipurpose Project – Jammu & Kashmir): ये परियोजना जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में रावी की प्रमुख सहायक नदी ‘उझ’ पर चल रही है। ₹9,167 करोड़ की अनुमानित लागत वाली इस परियोजना में लगभग 781 MCM पानी का विशाल भंडारण बनाया जा रहा है। इससे जम्मू-कश्मीर के कठुआ, सांबा और जम्मू जिलों की 31,380 हेक्टेयर भूमि सिंचित होगी और 186 मेगावाट जलविद्युत पैदा होगी।
रावी-व्यास-सतलुज लिंक और राजस्थान नहर (Indira Gandhi Canal): रावी और व्यास नदियों से सहेजे गए पानी को हरीके बैराज (Harike Barrage) के जरिए इंदिरा गाँधी नहर (Indira Gandhi Canal) में मोड़ा जा रहा है। इससे राजस्थान के थार रेगिस्तान (जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, श्रीगंगानगर) तक पानी का प्रवाह तेज हुआ है, जिससे भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित बंजर रेगिस्तान का एक बड़ा हिस्सा हरे-भरे खेतों में तब्दील हो चुका है।
इसके अलावा भी भारत सरकार कई अहम प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है। बहरहाल, ये तो रही भारत में स्थित प्रमुख नदी जोड़ो परियोजना से जुड़े प्रोजेक्ट की बात। अब बात करते हैं विदेशों में इस तरह के काम कहाँ और कैसे हो रहे हैं।
दुनिया के 5 सबसे बड़े सफल वॉटर ट्रांसफर मॉडल (Global Case Studies)
अंतर-बेसिन जल स्थानांतरण (Inter-Basin Water Transfer) कोई नया या केवल भारत का अनोखा प्रयोग नहीं है। दुनिया के कई देशों ने अपनी भौगोलिक विषमताओं, सूखे और औद्योगिक जरूरतों से निपटने के लिए विशाल इंजीनियरिंग ढाँचे खड़े किए हैं। हम दुनिया के 5 ऐसे ही प्रोजेक्ट्स के बारे में संक्षेप में बता रहे हैं।

भारत के लिए इन वैश्विक उदाहरणों को समझना बेहद जरूरी है-
चीन का South-North Water Transfer Project (Nan Shui Bei Diao): चीन का दक्षिणी हिस्सा (यांग्त्ज़ी नदी बेसिन) पानी से समृद्ध है, जबकि उसका उत्तरी हिस्सा (पीली नदी बेसिन, जहाँ बीजिंग और तियानजिन जैसे औद्योगिक शहर स्थित हैं) भयंकर जल संकट का सामना कर रहा था।
यह दुनिया की इतिहास का सबसे बड़ा जल स्थानांतरण प्रोजेक्ट है। इसमें 3 प्रमुख नहर मार्ग (Eastern, Central, and Western Routes) शामिल हैं, जिनकी कुल लंबाई 4,350 किलोमीटर से अधिक है।

इस परियोजना की लागत 62 अरब डॉलर से अधिक रही है और यह हर साल दक्षिणी नदियों से लगभग 44.8 अरब घनमीटर (BCM) पानी उत्तर की ओर स्थानांतरित करती है। इस प्रोजेक्ट ने चीन की राजधानी बीजिंग की प्यास बुझाई और उत्तर चीन के घटते भूजल स्तर को पूरी तरह रोक दिया।
अमेरिका का California State Water Project (CSWP): दरअसल, अमेरिका का कैलिफोर्निया राज्य दो विरोधाभासी हिस्सों में बँटा है। उत्तरी कैलिफोर्निया में 70% बारिश और बर्फबारी होती है, जबकि 80% पानी की माँग (कृषि और लॉस एंजिल्स जैसे शहर) दक्षिणी कैलिफोर्निया में है।
1960 के दशक में शुरू हुए इस प्रोजेक्ट के तहत 1,129 किलोमीटर लंबा ‘कैलिफोर्निया एक्वाडक्ट’ (California Aqueduct), 34 बड़े बाँध, 20 लिफ्ट पंपिंग स्टेशन और दर्जनों पावर हाउस बनाए गए। इसमें पानी को ‘तहचपी पहाड़ियों’ (Tehachapi Mountains) के ऊपर 593 मीटर की विशाल ऊँचाई तक लिफ्ट किया जाता है।

इस परियोजना ने दक्षिणी कैलिफोर्निया को दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे समृद्ध फल व सब्जी उत्पादक कृषि बेल्ट बना दिया।
पाकिस्तान का Indus Basin Irrigation System (IBIS): साल 1960 की सिंधु जल संधि के बाद जब पूर्वी नदियाँ भारत को मिल गईं, तो पाकिस्तान के पंजाब और सिंध प्रांतों में सिंचाई व्यवस्था ध्वस्त होने का खतरा पैदा हो गया।
ऐसे में विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय वित्त पोषण की मदद से पाकिस्तान ने ‘इंडस बेसिन प्रोजेक्ट‘ शुरू किया। इसके तहत दुनिया के दो विशाल मिट्टी से भरे बाँध तरबेला बाँध (सिंधु नदी पर) और मंगला बाँध (झेलम नदी पर) बनाए गए।
पाकिस्तान ने सिंधु और झेलम के पानी को पूर्व की ओर बहने वाली चेनाब, रावी और सतलुज के मैदानों तक पहुँचाने के लिए 8 विशाल अंतर-नदी लिंक नहरें (link canals) बनाईं। यह आज दुनिया का सबसे बड़ा एकीकृत नहरी सिंचाई तंत्र है। हालाँकि पाकिस्तान इसे बड़े सिस्टम का सही से उपयोग नहीं कर पाता है और इसके इस्तेमाल में तमाम कमियाँ सामने आई हैं।
स्पेन का Tagus-Segura Water Transfer प्रोजेक्ट: स्पेन का उत्तर-पश्चिमी भाग (तागुस नदी) काफी गीला और पहाड़ी है, जबकि दक्षिण-पूर्वी भाग (सेगुरा नदी बेसिन) अत्यधिक शुष्क और अर्द्ध-रेगिस्तानी है। ऐसे में साल 1979 में पूरी हुई 286 किलोमीटर लंबी इस नहर प्रणाली में पानी को टनल और एक्वाडक्ट्स के जरिए विलिना पर्वत श्रृंखला को पार कराते हुए सेगुरा बेसिन में भेजा गया।
इस प्रोजेक्ट ने स्पेन के दक्षिणी भाग मुर्सिया और अलिकांते को ‘यूरोप का फल और सब्जी का कटोरा’ (Orchard of Europe) बना दिया।
ऑस्ट्रेलिया की Snowy Mountains Scheme: ऑस्ट्रेलिया के बर्फीले पहाड़ों से निकलने वाली ‘स्नोवी नदी’ का मीठा पानी पूर्व की ओर बहकर प्रशांत महासागर में बेकार गिर जाता था, जबकि ऑस्ट्रेलिया का पश्चिमी अंदरूनी इलाका (मरे-डार्लिंग बेसिन) सूखे से त्रस्त रहता था।
ऐसे में साल 1949 से 1974 के बीच बने इस विशाल इंजीनियरिंग चमत्कार में पहाड़ों के आर-पार 145 किलोमीटर लंबी भूमिगत सुरंगें (tunnels), 16 बड़े बाँध और 7 हाइड्रो पावर स्टेशन बनाए गए।

इसने स्नोवी नदी के पानी को मोड़कर मरे-डार्लिंग बेसिन में भेज दिया, जिससे ऑस्ट्रेलिया में लाखों एकड़ नए गेहूँ और कपास के खेतों को जीवनदान मिला और भारी मात्रा में जलविद्युत पैदा हुई। इसके अलावा भी ऑस्ट्रेलिया के अलग-अलग हिस्सों में कई प्रोजेक्ट चल रहे हैं। इसमें डेन्यूब नदी का प्रोजेक्ट कई देशों में फैला हुआ है।
भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय मॉडलों से क्या सीख है?
दुनिया के इन 5 बड़े जल स्थानांतरण मॉडलों का गहन अध्ययन करने पर भारत के नीति निर्माताओं, जल वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के लिए 5 बेहद स्पष्ट और व्यावहारिक सबक निकलकर सामने आते हैं-
राजनीतिक सहमति और पारदर्शी कानून (Political Consensus): अमेरिका के कैलिफोर्निया और स्पेन के मॉडलों से यह साफ दिखता है कि जब तक पानी देने वाले क्षेत्र (Donor Basin) और पानी लेने वाले क्षेत्र (Recipient Basin) के बीच कानूनी और वित्तीय लाभ का पारदर्शी बँटवारा नहीं होता, तब तक विवाद खत्म नहीं होते। स्पेन में आज भी तागुस और सेगुरा बेसिन के बीच राजनीतिक खींचतान चलती रहती है। भारत को अंतर-राज्यीय जल विवादों को सुलझाने के लिए एक मजबूत, संवैधानिक और सर्वमान्य राष्ट्रीय प्राधिकरण की आवश्यकता है।
दीर्घकालिक वित्तीय और तकनीकी धैर्य (Financial & Engineering Patience): चीन का साउथ-नॉर्थ प्रोजेक्ट हो या ऑस्ट्रेलिया की स्नोवी माउंटेन स्कीम, इन परियोजनाओं को पूरा होने में 20 से 50 साल का लंबा समय लगा। भारत को यह समझना होगा कि 30 लिंकों को एक साथ रातों-रात पूरा नहीं किया जा सकता। इसके लिए चरणबद्ध दृष्टिकोण (Phasing Approach) और लगातार बजट आवंटन की सख्त जरूरत है।
डाउनस्ट्रीम इकोसिस्टम की रक्षा (Ecology First): स्पेन और पाकिस्तान के अनुभवों ने दुनिया को सिखाया कि जब किसी नदी का 50% से अधिक पानी मोड़ा जाता है, तो नदी के निचले हिस्से (Downstream) का इकोसिस्टम मर जाता है, जिससे समुद्री खारापन (Salinity Intrusion) खेतों में घुसने लगता है। भारत को किसी भी नदी से केवल उतना ही ‘सरप्लस’ पानी उठाना चाहिए जिससे नदी का अपना न्यूनतम पर्यावरण प्रवाह (E-Flow / Environmental Flow) कभी बाधित न हो।
आधुनिक लिफ्टिंग और टनल तकनीक (Modern Engineering): अमेरिका ने तहचपी पहाड़ियों के ऊपर पानी लिफ्ट करने के लिए जो विशाल लिफ्ट पंप बनाए, वे इंजीनियरिंग का अद्भुत नमूना हैं। भारत के हिमालयी और प्रायद्वीपीय घटकों में पश्चिमी घाट और विंध्याचल जैसी पर्वत श्रृंखलाएँ आती हैं। भारत को पानी लिफ्ट करने और सुरंगें बनाने के लिए आधुनिक पर्यावरण-अनुकूल टनल बोरिंग मशीनों (TBM) का सहारा लेना होगा।
बहु-उद्देशीय लाभ (Multipurpose Utility): ऑस्ट्रेलिया की योजना केवल सिंचाई के लिए नहीं थी, उसने पूरे देश को सस्ती जलविद्युत (Hydro Electricity) दी, जिससे प्रोजेक्ट की लागत तेजी से वसूल हुई। भारत के सभी 30 लिंकों में जलविद्युत और अंतर्देशीय जलमार्ग (Inland Waterways) को अनिवार्य रूप से जोड़ा जाना चाहिए।
पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और विशेषज्ञों के पक्ष-विपक्ष
नदी जोड़ो योजना भारत के इतिहास की सबसे ज्यादा बहस वाली नीतियों में से एक है। देश के वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री, नौकरशाह और पर्यावरणविद दो स्पष्ट और परस्पर विरोधी धड़ों में बँटे हुए हैं। एक तरफ सरकार का समर्थन है, तो दूसरी तरफ विपक्षी खासकर एनजीओ लॉबी इन प्रोजेक्ट्स में टाँग अड़ाने की लगातार कोशिश कर रही है। हमने अपने 3 भाग के इस खास सीरीज के दूसरे पार्ट में इसके बारे में विस्तार से समझाया भी है।
समर्थकों और नीति निर्माताओं के तर्क (The Pro-Interlinking View)
खाद्य और जल सुरक्षा (Food & Water Security): वर्ष 2050 तक भारत की जनसंख्या लगभग 160 से 170 करोड़ पहुँचने का अनुमान है। इस विशाल आबादी का पेट भरने के लिए भारत को 450 मिलियन टन खाद्यान्न की आवश्यकता होगी। 30 लिंकों से पैदा होने वाली 3.5 करोड़ हेक्टेयर अतिरिक्त सिंचाई क्षमता ही देश को भुखमरी से बचा सकती है।
बाढ़ और सूखे का स्थायी उन्मूलन (Flood & Drought Mitigation): असम, बिहार और पूर्वी यूपी में हर साल बाढ़ से औसतन ₹20,000 करोड़ का ढाँचागत नुकसान होता है। बाढ़ के पानी को रोककर सूखे मराठवाड़ा, बुंदेलखंड और थार में भेजने से एक ही झटके में दोनों राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान हो जाएगा।
हरित ऊर्जा उत्पादन (Clean Energy): प्रस्तावित 30 लिंकों से लगभग 34,000 मेगावाट (34 GW) जलविद्युत पैदा होगी। यह हरित बिजली भारत को अपने कार्बन उत्सर्जन कम करने और थर्मल पावर प्लांटों पर निर्भरता घटाने में मदद करेगी।
सस्ता जलमार्ग (Inland Navigation): लिंक नहरों के बड़े नेटवर्क को राष्ट्रीय जलमार्गों (National Waterways) के रूप में विकसित किया जा सकता है, जिससे ट्रकों और ट्रेनों की तुलना में माल ढुलाई (Freight Transport) 80% सस्ती हो जाएगी।
आलोचकों और पर्यावरणविदों के तर्क (The Anti-Interlinking View)
विशाल वन विनाश और जैव विविधत का नुकसान: केन-बेतवा में पन्ना टाइगर रिजर्व का 5,803 हेक्टेयर जंगल डूब रहा है। यदि सभी 30 लिंक बनते हैं, तो देश के लाखों हेक्टेयर घने जंगल, वन्यजीव अभयारण्य और अति-दुर्लभ जैव विविधता (biodiversity) पानी में समा जाएगी।
लाखों ग्रामीणों का विस्थापन: एक अनुमान के अनुसार, 30 लिंकों के जलाशयों और नहरों के निर्माण से 15 से 20 लाख लोग बेघर होंगे, जिनमें से अधिकांश समाज के सबसे वंचित ST समुदाय हैं। भारत में विस्थापन का इतिहास (जैसे नर्मदा बचाओ आंदोलन) यह दिखाता है कि पुनर्वास नीतियाँ (Rehabilitation Policies) हमेशा कागजों तक सीमित रह जाती हैं।
नदियों के प्राकृतिक चरित्र का विनाश: जल पुरुष राजेंद्र सिंह का मानना है कि ‘नदी केवल पानी का बहता हुआ पाइप नहीं है’। नदी एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र (Living Ecosystem) है। जब हम किसी नदी का पानी खींचते हैं, तो उसके मुहाने (Estuary) पर समुद्र का खारा पानी चढ़ जाता है, जिससे तटीय भूमि बंजर हो जाती है।
ग्लोबल वार्मिंग और मानसून में अनिश्चितता (Climate Change Challenge): जलवायु परिवर्तन के कारण मानसूनी बारिश का पैटर्न बहुत तेजी से बदल रहा है। आज जिस नदी बेसिन को NWDA ‘अधिशेष’ (Surplus) मान रहा है, हो सकता है कि अगले 30 वर्षों में ग्लोबल वार्मिंग और ग्लेशियरों के पिघलने के कारण वह बेसिन खुद ‘कमी वाला’ (Deficit) बन जाए। ऐसे में ₹10 लाख करोड़ से अधिक के ये विशाल कंक्रीट के ढाँचे बेकार साबित हो सकते हैं।
पारंपरिक जल संरक्षण की उपेक्षा: आलोचकों का मानना है कि विशाल बाँधों पर लाखों करोड़ खर्च करने के बजाय यदि भारत अपने 5 लाख से अधिक पारंपरिक तालाबों, बावड़ियों, चेक डैमों और वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) को पुनर्जीवित करे, तो 10% लागत में भारत की प्यास बुझाई जा सकती है।
भविष्य की राह (The Way Forward)
भारत अपनी जल चुनौतियों को अनदेखा नहीं कर सकता, लेकिन वह आँखें मूँदकर विशाल कंक्रीट के विनाशकारी ढाँचे भी नहीं खड़ा कर सकता। भारत को ‘इंजीनियरिंग और पारिस्थिकी’ (Engineering + Ecology) के बीच एक बहुत ही सूक्ष्म और संतुलित मध्यमार्ग अपनाना होगा।
ऑपइंडिया की तरफ से नदी जोड़ो परियोजना के लिए 5 मुख्य रणनीतिक सुझाव
राज्य के भीतर वाले लिंकों को प्राथमिकता (Prioritize Intra-State Links First): अंतर-राज्यीय (Inter-State) विवादों में उलझने के बजाय, सरकार को पहले उन लिंकों पर काम करना चाहिए जो एक ही राज्य की सीमाओं के भीतर आते हैं (जैसे बिहार में कोसी-मेची लिंक या तमिलनाडु में कावेरी-वैगई लिंक)। इनमें न तो कानूनी अड़चनें हैं और न ही अंतर-राज्यीय विवाद। हालाँकि केन-बेतवा प्रोजेक्ट में इस तरह की कोई रुकावट नहीं है और इसे भारत सरकार प्राथमिकता में रखकर पूरा कर रही है।
विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन के साथ एकीकरण: नदी जोड़ो योजना को देश के ‘अमृत सरोवर अभियान’, महात्मा गांधी नरेगा के तहत बनने वाले चेक डैमों और पारंपरिक जोहड़ों-बावड़ियों के पुनरुद्धार के साथ अनिवार्य रूप से जोड़ा जाना चाहिए। बड़े बाँध केवल बैकअप होने चाहिए, पहली सुरक्षा रेखा स्थानीय जल संचयन होना चाहिए।
कृषि में जल-दक्षता (Water Use Efficiency in Agriculture): भारत का 80% से अधिक पानी केवल खेती में खर्च होता है। यदि भारत बाढ़-सिंचाई (Flood Irrigation) को छोड़कर ‘ड्रिप इरिगेशन’ (Drip irrigation) और ‘स्प्रिंकलर’ (Sprinkler) जैसी सूक्ष्म-सिंचाई तकनीकों को अनिवार्य कर दे, तो हम बिना किसी नए बाँध के करोड़ों एकड़ अतिरिक्त भूमि सींच सकते हैं।
स्वतंत्र वैज्ञानिक और सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन: किसी भी लिंक को हरी झंडी देने से पहले आईआईटी (IITs), भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) और स्वतंत्र पर्यावरण संस्थाओं से जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का निष्पक्ष अध्ययन कराया जाना चाहिए। हालाँकि भारत सरकार सभी प्रोजेक्ट्स के लिए ऐसी मूल्कांकन की नीति अपनाती रही है।
पारदर्शी और मानवीय पुनर्वास कानून: दौधन बाँध की तरह परियोजना शुरू होने से पहले विस्थापितों को खेती योग्य भूमि, स्थायी रोजगार और सम्मानजनक नागरिक सुविधाएँ देना अनिवार्य किया जाए। इस दिशा में भी भारत सरकार उल्लेखनीय काम कर रही है।

क्या यह भारत की जल क्रांति बनेगी या सबसे कठिन चुनौती?
21वीं सदी के मध्य में खड़ा भारत आज एक बहुत बड़े ऐतिहासिक और नैतिक चौराहे पर आ चुका है। एक तरफ हमारे सामने 140 करोड़ से अधिक प्यासे नागरिकों की बुनियादी जरूरतें, सुखते हुए कुएँ, दम तोड़ते शहर और मानसून की दया पर टिकी भारत की विशाल ग्रामीण अर्थव्यवस्था है। दूसरी तरफ हमारी जीवनदायिनी नदियाँ, पन्ना जैसे घने जंगल, संकटग्रस्त वन्यजीव और अपनी पुश्तैनी जमीनों से बेघर होते हुए हमारे अपने आदिवासी भाई-बहन हैं।
राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी (NWDA) की यह विशाल ‘नदी जोड़ो योजना’ (Interlinking of Rivers) निस्संदेह स्वतंत्र भारत के इतिहास की सबसे साहसी, सबसे दूरदर्शी और सबसे विशाल इंजीनियरिंग परिकल्पना है। यदि इसे केवल एक ‘कंक्रीट का बाँध और नहर बनाने का प्रोजेक्ट’ मानकर लागू किया गया, तो यह योजना नौकरशाही की लापरवाही, मुआवजे के घोटालों, अंतहीन अंतर-राज्यीय अदालती मुकदमों और भयानक पर्यावरणीय तबाही का नया जरिया बनकर रह जाएगी।
इसके विपरीत यदि भारत सरकार और राज्य सरकारें इसे दलगत राजनीति से ऊपर उठाकर, चीन और अमेरिका के तकनीकी अनुभवों से सबक लेते हुए, कड़े पर्यावरणीय मानकों, आधुनिक तकनीक, पारदर्शी सामाजिक पुनर्वास और मानवीय संवेदनाओं के साथ चरणबद्ध तरीके से लागू करती हैं, तो यह योजना निसंदेह 21वीं सदी में भारत की सबसे बड़ी ‘राष्ट्रीय जल क्रांति’ (National Water Revolution) साबित होगी।
यह परियोजना केवल दो नदियों या दो राज्यों को जोड़ने का काम नहीं करेगी, बल्कि यह भारत के सुनहरे भविष्य, खाद्य सुरक्षा, आर्थिक समृद्धि और राष्ट्र की अखंडता को एक अटूट सूत्र में पिरोने का ऐतिहासिक काम करेगी। फैसला हमारे हाथ में है कि हम इस विशाल इंजीनियरिंग क्षमता का उपयोग कुदरत के साथ संतुलन बनाकर अपनी प्यासी धरती को हरा-भरा करने में कैसे करते हैं।
(नोट: इस सीरीज का Part I पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। Part II के लिए यहाँ क्लिक करें।)


