हमें इंसानी इतिहास की एक बहुत साफ-सुथरी और सुविधाजनक कहानी सुनाई गई है। आज की एक सोच के मुताबिक, अतीत की पूरी कहानी पुरुषों के दबदबे और महिलाओं को दबाकर रखने की रही है, मानो पुरुषों ने मिलकर एक सोची-समझी व्यवस्था बनाई हो, जिसका मकसद महिलाओं को हमेशा नीचे रखना था।
यानी, एक्टिविस्टों के हिसाब से देखें, तो अतीत कुछ और नहीं बल्कि पुरुषों की दादागिरी का एक लंबा रिकॉर्ड भर है, एक सोची-समझी, ऑर्गेनाइज्ड साजिश, ताकि महिलाओं को दबाकर रखा जा सके। यह कहानी राजनीतिक बहस के लिए काफी आसान और असरदार हो सकती है। लेकिन जैसे ही हम अपने पूर्वजों की असली जिंदगी और उनकी चुनौतियों को समझने की कोशिश करते हैं, यह तस्वीर इतनी सीधी नहीं रह जाती।
इंसान ने अपने इतिहास का करीब 99 प्रतिशत हिस्सा ऐसी दुनिया में बिताया, जहाँ आज जैसी सुविधाएँ नहीं थीं। न आधुनिक दवाइयाँ थीं, न मशीनें, न सुरक्षित घर और न ही हर वक्त उपलब्ध खाना। भूख, बीमारी, जंगली जानवर, हिंसा और मौसम जैसी चुनौतियों के बीच इंसान को हर दिन सिर्फ एक चीज के लिए संघर्ष करना पड़ता था, ज़िंदा रहने के लिए।
ऐसे में पुराने समाजों में पुरुषों और महिलाओं की अलग-अलग भूमिकाएँ सिर्फ मनमाने नियम नहीं थीं। वे उस समय की जरूरतों और परिस्थितियों से धीरे-धीरे विकसित हुई थीं। जो व्यवस्था उस कठिन दुनिया में परिवार और समुदाय को जिंदा रखने में मदद करती थी, वही आगे चलकर समाज की सामान्य व्यवस्था बनती गई।
यानी, इन भूमिकाओं को सिर्फ किसी साजिश या महिलाओं को दबाने की योजना के तौर पर देखना पूरी कहानी नहीं बताता। इनके पीछे इंसानी समाज के सामने खड़ी एक बहुत बुनियादी चुनौती भी थी, मुश्किल से मुश्किल हालात में कैसे जिंदा रहा जाए और अगली पीढ़ी को कैसे बचाया जाए।
सबसे पहले सवाल था, ज़िंदा कैसे रहें?
इंसानी इतिहास के एक बहुत बड़े हिस्से में, हमारी प्रजाति फूड चेन के शीर्ष पर नहीं थी। हम ज़ीरो-सम गेम के बेहद कमज़ोर खिलाड़ी थे। ज़िंदगी छोटी, दर्दनाक और अनिश्चित थी। हमारे पूर्वजों के सिर पर हमेशा बड़े शिकारियों, संसाधनों की कमी, भयानक मौसम और इलाके पर कब्ज़े के लिए कबीलों के बीच होने वाली जंग का खतरा मंडराता रहता था।
ऐसे माहौल में किसी भी समाज के सामने सबसे पहली चुनौती थी, ज़िंदा रहना। भूख, बीमारी, हिंसा और बाहरी खतरों के बीच समाज के लिए यह जरूरी था कि हर जरूरी काम किसी न किसी तरह पूरा हो। कामयाबी का इकलौता पैमाना यही था कि आप अपनी नस्ल को आगे बढ़ते रहें।
इसलिए पुरुषों और महिलाओं से अलग-अलग तरह की जिम्मेदारियाँ निभाने की उम्मीद की जाती थी। यह काम का बँटवारा सिर्फ किसी पर अधिकार जमाने के लिए नहीं था, बल्कि उस समय की जरूरतों से पैदा हुआ था। कौन शिकार करेगा, कौन बच्चों की देखभाल करेगा, कौन बस्ती की सुरक्षा करेगा और कौन रोजमर्रा के संसाधनों को संभालेगा, इन सब कामों का बँटवारा समाज की जरूरत और उस समय की परिस्थितियों के हिसाब से होता गया।
एवोल्यूशनरी ट्रेड-ऑफ और काम का बंटवारा
मानव इतिहास और इंसानी व्यवहार को समझने वाली रिसर्च हमें बताती है कि समाज में पुरुषों और महिलाओं के बीच काम का बँटवारा आखिर क्यों हुआ। इसकी एक बड़ी वजह थी दोनों के शरीर और शारीरिक क्षमताओं में मौजूद प्राकृतिक अंतर। समय के साथ समाज की अलग-अलग भूमिकाएँ इन्हीं प्राकृतिक अंतर और उस समय की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित होती गईं। सेक्सुअल डाइमॉर्फिज्म; यानी, महिला और पुरुष के बीच का शारीरिक अंतर, वह बुनियादी ढांचा था जिस पर ये रोल टिके थे।
औसतन पुरुषों का शरीर इस तरह बना है कि वे ज्यादा भारी वजन उठा सकें, ज्यादा शारीरिक ताकत लगा सकें और खतरनाक परिस्थितियों का सामना कर सकें। हजारों सालों तक इंसानी समाज में इन्हीं क्षमताओं का इस्तेमाल शिकार करने, खाना जुटाने और अपने परिवार या समूह की सुरक्षा करने में होता रहा। इंसानी इतिहास,एवोल्यूशनरी साइकोलॉजी पर हुई रिसर्च; जैसे मार्टिन डैली और मार्गो विल्सन का काम, यह दिखाता है कि पुरुष आम तौर पर ऐसे कामों में ज्यादा शामिल रहे हैं जिनमें शारीरिक खतरा ज्यादा था। बड़े और खतरनाक जानवरों का शिकार करना हो या किसी बाहरी खतरे से अपने समूह की रक्षा करनी हो, इन कामों में शारीरिक ताकत और जोखिम उठाने की क्षमता बेहद काम आती थी।
माहौल के इस दबाव का सीधा और लॉजिकल जवाब था, स्पेशलाइजेशन (विशेषज्ञता) का मॉडल। आबादी के एक हिस्से ने शिकार, लड़ाई, कंस्ट्रक्शन और पहरेदारी के जरिए बाहर की खतरनाक दुनिया का सामना करने की ज़िम्मेदारी ली। वहीं दूसरे हिस्से ने बच्चों को पालने, बस्ती के अंदर के संसाधनों को संभालने और कल्चर को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने जैसे बेहद ज़रूरी कामों पर ध्यान दिया।
डेमोग्राफिक ज़रूरत: “बायोलॉजिकल बॉटलनेक” और जंग
काम के इस बँटवारे को समझने के लिए एक और जरूरी बात समझनी होगी, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है, बायोलॉजिकल बॉटलनेक।
सीधे शब्दों में कहें तो, इंसानों की आबादी बढ़ने की रफ्तार इस बात पर भी निर्भर करती है कि कितनी महिलाएँ एक समय में बच्चे पैदा कर सकती हैं। यही प्राकृतिक सीमा समाज की संरचना और पुरुषों-महिलाओं की भूमिकाओं को समझने में अहम भूमिका निभाती है।
किसी भी आबादी के बच्चे पैदा करने की क्षमता बुनियादी तौर पर महिलाओं की संख्या से तय होती है। एक अकेला पुरुष कई महिलाओं को प्रेग्नेंट कर सकता है, लेकिन एक महिला अपने पूरे जीवनकाल में सीमित संख्या में ही बच्चों को जन्म दे सकती है। इसलिए, महिलाओं की संख्या का कम होना या खत्म होना, पुरुषों के नुकसान की तुलना में किसी आबादी के वजूद के लिए बहुत ज्यादा अचानक और जानलेवा झटका होता है।
इसी जनसंख्या से जुड़ी कमजोरी की वजह से इतिहास में युद्धों के दौरान महिलाओं को अक्सर निशाना बनाया गया। सदियों से चले आ रहे संघर्षों में, चाहे वे इस्लाम के शुरुआती विस्तार के दौर के युद्ध हों, मध्यकालीन धार्मिक संघर्ष हों या आज के समय में 7 अक्टूबर को इज़रायल पर हुआ हमला, महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा और दूसरी तरह की क्रूरता के मामले सामने आते रहे हैं।
यह हिंसा कई बार सिर्फ लोगों को डराने या तत्काल नुकसान पहुँचाने तक सीमित नहीं रही। महिलाओं पर हमला किसी समुदाय के परिवार, आने वाली पीढ़ी और सामाजिक ढाँचे को कमजोर करने का एक तरीका भी बन सकता था। यानी निशाना सिर्फ आज के लोगों पर नहीं, बल्कि उस समुदाय के भविष्य पर भी पड़ता था।
नतीजा यह हुआ कि पुराने समय में समाज ने अपनी सुरक्षा के लिए कुछ सख्त नियम और व्यवस्थाएँ बनाई थीं। इन्हें सिर्फ लोगों को दबाने या नियंत्रित करने के तरीके के तौर पर देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता। उस दौर में इनका एक मकसद परिवार, समुदाय और आने वाली पीढ़ी को बाहरी खतरों से बचाना भी था।
इसी व्यवस्था में पुरुषों से ज्यादा जोखिम उठाने की उम्मीद की जाती थी। युद्ध हो, शिकार हो या किसी खतरे का सामना करना, पुरुषों को अक्सर आगे भेजा जाता था। इसकी एक वजह यह भी थी कि एक समुदाय के भविष्य के लिए महिलाओं की संख्या और उनकी सुरक्षा का बहुत महत्व था।
सरल शब्दों में कहें तो, पुराने समाजों में पुरुषों से यह अपेक्षा की जाती थी कि वे बाहर के खतरे का सामना करें, ताकि परिवार और समुदाय का बाकी हिस्सा सुरक्षित रह सके।
‘मोनोलिथिक्स पैट्रियार्की’: क्या हर समाज में पितृसत्ता एक जैसी थी?
लेकिन यह मान लेना भी सही नहीं होगा कि हर दौर में और हर समाज में पुरुषों का दबदबा एक जैसा ही रहा है। अलग-अलग जगहों और अलग-अलग समय के समाजों को देखें, तो पुरुषों और महिलाओं की भूमिकाएँ काफी अलग रही हैं। कहीं पुरुषों की भूमिका ज्यादा प्रभावशाली रही, तो कहीं महिलाओं की। यानी दुनिया के हर समाज में जेंडर रोल एक ही तरह के नहीं थे।
वाइकिंग्स का उदाहरण लीजिए। वैसे तो वे अपनी युद्ध कला के लिए जाने जाते हैं, लेकिन प्रॉपर्टी के मालिकाना हक और तलाक के मामले में उनका लीगल और सोशल सिस्टम काफी बराबरी वाला और समतावादी था। महिलाएं खेतों और संपत्तियों को संभालती थीं, उनके पास आर्थिक ताकत थी, और वे वैसी लाचार नहीं थीं जैसा कि आज की फिल्मों या कहानियों में दिखाया जाता है।
इसी तरह, भारत की शुरुआती वैदिक सभ्यता में महिलाओं का समाज में बहुत सम्मानजनक स्थान था, जहाँ उन्हें शिक्षा और धार्मिक अनुष्ठानों का पूरा अधिकार था। वैदिक साहित्य में गार्गी और मैत्रेयी जैसी महिलाओं के उदाहरण मिलते हैं, जो दार्शनिक चर्चाओं और बौद्धिक विमर्श में सक्रिय थीं।
कई समाजों में उनकी व्यवस्था वहाँ की परिस्थितियों के हिसाब से बनी थी, जैसे लगातार होने वाले युद्ध या ऐसा खेती का काम जिसमें बहुत ज्यादा शारीरिक मेहनत की जरूरत होती थी।
इसलिए पुराने समाजों को सिर्फ आज की जेंडर पॉलिटिक्स के नजरिए से देखना सही नहीं होगा। उस समय की परिस्थितियाँ आज से बहुत अलग थीं, और उन्हें समझने के लिए उस दौर की जरूरतों और हालात को भी ध्यान में रखना होगा।
अतीत की विरासत को नए नजरिए से समझना
इंसानी इतिहास के इतने लंबे सफर में बने ये जेंडर रोल किसी को गुलाम बनाने के लिए रातों-रात तैयार की गई कोई साजिश नहीं थे। वे उस दौर की जरूरतों और हालात से पैदा हुए थे। पुरुषों और महिलाओं ने अलग-अलग तरह के जोखिम और जिम्मेदारियाँ उठाईं, लेकिन दोनों की भूमिका इंसानी समाज को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी थी।
इसलिए पुराने समाजों को सिर्फ उत्पीड़न की एक कहानी के रूप में देखना शायद अधूरी तस्वीर होगी। हमारे पूर्वजों के सामने आज की दुनिया से बिल्कुल अलग चुनौतियाँ थीं, भूख, बीमारी, हिंसा, युद्ध और जीवित रहने की लगातार लड़ाई।
आज हम जिस सुरक्षित और सुविधाजनक दुनिया में रहते हैं, वह अचानक नहीं बनी। इसके पीछे पीढ़ियों की मेहनत, संघर्ष और त्याग है। और इतिहास में इस कीमत का एक बड़ा हिस्सा उन पुरुषों ने भी चुकाया, जो शिकार, युद्ध, भारी मेहनत और दूसरे खतरनाक कामों में सबसे आगे रहे।
इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आज भी हमें वही पुराने जेंडर रोल अपनाकर चलना चाहिए। पिछले कुछ सौ सालों में टेक्नोलॉजी, खेती और समाज में इतना बड़ा बदलाव आया है कि पुराने समय में काम बाँटने की जो जरूरत थी, वह आज पहले जैसी नहीं रही।
आज हमारे पास मशीनें, आधुनिक तकनीक और दूसरी सुविधाएँ हैं, जिनकी वजह से किसी काम के लिए सिर्फ पुरुष या महिला होना जरूरी नहीं रह गया है। अब समाज में यह ज्यादा मायने रखता है कि किसी इंसान में उस काम को करने की योग्यता और क्षमता है या नहीं।
लेकिन इतिहास को ईमानदारी से समझने के लिए यह जानना भी जरूरी है कि पुराने समय में समाज ऐसे क्यों बने थे। इंसानियत की कहानी सिर्फ अत्याचार और शोषण की कहानी नहीं है। यह उन लोगों की कहानी भी है, जिन्होंने बेहद मुश्किल हालात में जिंदा रहने और अपनी अगली पीढ़ी को बचाने के लिए मिलकर संघर्ष किया।
इसका अर्थ यह नहीं कि महिलाओं ने कम कठिनाई झेली। अलग-अलग समाजों में दोनों ने ही अलग-अलग तरह के जोखिम और बोझ उठाए। इस संघर्ष में पुरुषों और महिलाओं ने हमेशा एक जैसे काम नहीं किए, लेकिन उनकी जिम्मेदारियाँ कई जगह एक-दूसरे की पूरक थीं। अपने अतीत को सही तरीके से समझना इसलिए जरूरी है, क्योंकि तभी हम यह तय कर सकते हैं कि अतीत से क्या सीखना है और भविष्य में क्या बदलना है।


