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आतंक से लड़ने के नाम पर 50 हज़ार निर्दोषों को मार चुकी है पाकिस्तानी फ़ौज

पाक सेना ने वजीरीस्तान क्षेत्र में मानवाधिकार के हनन और यातना व आतंकी झड़पों के कारण मारे जाने वाले निर्दोष नागरिकों का आंकड़ा कभी पेश नहीं किया। इन मामलों के सबूत जुटाने वालों को भी पाक सेना मार देती है।

पाकिस्तान में आतंकवाद से निपटने के नाम पर आम नागरिकों के मानवाधिकारों के हनन की ख़बर सामने आती रहती हैं। अमेरिका में 9/11 आतंकी हमले के बाद शुरू हुए ‘वॉर ऑन टैरर’ के दौरान हज़ारों निर्दोष नागरिक मारे जा चुके हैं। पाकिस्तान के सैनिकों और विद्रोहियों के आपसी युद्ध में यातना देने और मारने के सबूत अब धीरे-धीरे सामने आ रहे हैं।

ख़बर के अनुसार, इस बात की पुष्टि सरकारी आंकड़े तो नहीं करते, लेकिन स्वतंत्र शोध संगठनों, स्थानीय अधिकारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के आँकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि 2002 से अब तक कम से कम 50 हज़ार लोग के इस लड़ाई में मारे गए हैं और 50 लाख से अधिक के बेघर होकर इधर-उधर भटकने को मजबूर हुए हैं।

एक ब्रिटिश मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, 20 जनवरी, 2014 की शुरुआत में अफ़गान सीमा के क़रीबी उत्तरी वजीरिस्तान के कबीलाई क्षेत्र के हमजोनी एरिया में रात को हुए हवाई हमले में पाकिस्तानी तालिबान के सबसे बड़े कमांडर अदनान राशीद और उसके पाँच परिजनों के मारे जाने का दावा पाक सेना ने किया।

पाकिस्तानी एयरफोर्स का पूर्व तकनीशियन रशीद उस समय चर्चा में आया था, जब उसने एक स्कूली लड़की मलाला यूसुफ़जई को पत्र लिखा था। नोबेल पुरस्कार विजेता मलाला को 2012 में एक तालिबानी हमलावर ने सिर में गोली मार दी थी। पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ पर हमला की कोशिश के आरोप में जेल में बंद रह चुके रशीद ने पत्र में मलाला को गोली मारने का कारण समझाने की कोशिश की थी।

ख़बर में यह भी कहा गया है कि एक ही साल बाद रशीद ने एक वीडियो में पेश होकर पाकिस्तानी सेना के दावे को झूठा करार दिया था। उस समय यह बात सामने आई थी कि पाकिस्तानी सेना के विमान ने रशीद के ठिकाने के बजाय दो घर छोड़कर एक निर्दोष परिवार पर बम गिरा दिया था। इस परिवार में जिन लोगों की मृत्यु हुई थी उनमें एक तीन साल की बच्ची भी थी। पाक सेना ने अब तक अपनी इस ग़लती को नहीं स्वीकार किया।

पाक सेना ने वजीरीस्तान क्षेत्र में मानवाधिकार के हनन और यातना व आतंकी झड़पों के कारण मारे जाने वाले निर्दोष नागरिकों का आंकड़ा कभी पेश नहीं किया। सामाजिक कार्यकर्ताओं ने तो यहाँ तक दावा किया कि इन मामलों के सबूत जुटाने वालों को भी पाक सेना मार देती है। पश्तून तहाफुज मूवमेंट (पीटीएम) के 13 कार्यकर्ताओं की 26 मई को हुई मौत इसका उदाहरण है। इनकी मौत उस समय हुई थी, जब शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे संगठन के लोगों पर सेना की तरफ से हमले का आरोप लगाकर सीधी फायरिंग कर दी थी। साथ ही पीटीएम के दोनों संस्थापकों को भी गिरफ़्तार कर लिया गया था।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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