Wednesday, July 17, 2024
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यह केवल धर्म नहीं, राम सिर्फ भगवान नहीं, यह हर्ष मात्र भक्ति नहीं

क्या संभव है कि इतनी विविधताओं वाले समाज को धर्म की एक परंपरा, जिसे श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय 'रामानंदी' कहते हैं, एक सूत्र में पिरो दे? जब सबके अपने-अपने अराध्य हैं तो सब राम की आराधना में क्यों रत हैं? जब सबकी अपनी पूजा पद्धति है तो सब राममय क्यों हुए पड़े हैं?

मेरी बेटी के अंग्रेजीदां स्कूल में सप्ताह भर से ऐसी गतिविधियाँ चल रही हैं जो राम और अयोध्या को समर्पित हैं। कभी रामचरितमानस पर आधारित सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता हो रही तो कभी बच्चों से कहा जाता है कि वे घर से दीया-बाती लेकर आएँ। स्कूल में सामूहिक दीपोत्सव हो रहा है।

नोएडा की एक एक्सपोर्ट कंपनी में काम कर रहे पप्पू कुमार गुप्ता की तनख्वाह 18 हजार रुपए मासिक है। 22 जनवरी 2024 को वे और उनके सहकर्मी मिलकर 101 किलो लड्डू बनवा रहे हैं। इसे वे आम लोगों के बीच वितरित करेंगे। इसके लिए पप्पू गुप्ता और उनके जैसे ही आय वाले कर्मचारी आपस में पैसा इकट्ठा कर रहे हैं। कोई 500 दे रहा तो कोई 2000।

मेरे घर में काम करने वाली शबाना सफाई करते समय गुनगुनाती रहती है ‘राम आएँगे तो अंगना सजाऊँगी’। रामेश्वर यादव दूध और घी बेचकर अपने परिवार का गुजारा करते हैं। लेकिन आज उन्होंने गाँव के हर घर में घी बाँटा है और सबसे आग्रह किया है कि 22 जनवरी को वे इसी घी से दीये जलाएँ।

बाजार जाता हूँ तो फल-फूल बेचने वाले से लेकर किताब-कपड़ों के दुकानदार तक राम की चर्चा कर रहे हैं। घर से कार्यालय जाता हूँ तो रास्ते में कहीं कोई हनुमान/राम का ध्वज बेचता मिल जाता है। कोई टकराता है तो अयोध्या, राम और 22 जनवरी की बात किए बिना आगे नहीं बढ़ता।

इसमें मुझे क्यों नहीं दिख रहा राम का सिर्फ ईश्वरत्व?

मैं जानता हूँ कि भारत उत्सवों का देश है। भारत धार्मिक राष्ट्र है। इसके सामाजिक ढाँचे के मूल में धर्म है। मैंने बचपन से हर माघ में कांवड़ लेकर टोली के साथ देवघर जाते पिता को देखा है। घर की महिलाओं को रोज मिट्टी से महादेव बनाते देखा है। फिर उस महादेव की पूजा करते हुए घंटेभर मंत्रोच्चार करते लाल कक्का को भी देखा है। मैंने मंदिर बनने और ईश्वर की प्राण-प्रतिष्ठा से पैदा हुए धार्मिक वातावरण को बचपन में ही अपने गाँव में जीया है। फिर भी आज कल जो कुछ देख रहा हूँ वह मुझे सिर्फ धर्म नहीं लगता। यह मुझे सिर्फ भक्ति भी नहीं लगती। इसमें मुझे राम का सिर्फ ईश्वरत्व नहीं दिखता।

वैसे भी इस उत्सवी और धार्मिक राष्ट्र भारत में केवल सनातन की ही बात करें तो कई धार्मिक परंपराएँ साथ चलती हैं। हर इलाके की अपनी धार्मिक मान्यताएँ हैं। अपने ईश्वर हैं। इन सभी मान्यताओं का अपना संपूर्ण संसार है। सकल विधान है। धार्मिक स्वतंत्रता इतनी है कि एक ही घर में पिता महादेव को पूज रहे हैं तो पुत्र दुर्गा को। उसी घर की महिला पीपल में ईश्वर देखती हैं। प्रकृति की पूजा करती हैं।

क्या संभव है कि इतनी विविधताओं वाले समाज को धर्म की एक परंपरा, जिसे श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ‘रामानंदी’ कहते हैं, एक सूत्र में पिरो दे? जब सबके अपने-अपने अराध्य हैं तो सब राम की आराधना में क्यों रत हैं? जब सबकी अपनी पूजा पद्धति है तो सब राममय क्यों हुए पड़े हैं?

ऐसा भी नहीं है कि राम परम ब्रह्म हैं और सारे ईश्वर उनके बाद पंक्ति में आते हैं। यदि राम को सिर्फ ईश्वर ही मान लें तो वे विष्णु के सिर्फ एक अवतार भर हैं। उनसे पहले भी विष्णु के अवतार हुए और उनके बाद भी। यदि इसे किसी सम्राट के प्रताप का ही द्योतक भर मान लें तब भी राम ही जिस कुल में पैदा हुए, उसमें उनसे पहले मनु आए जिससे हम मानव कहलाए। भागीरथ आए जो माँ गंगा को धरती पर लेकर आए। रघु आए जिसके कारण राम की एक पहचान रघुकुल नंदन के तौर पर हुई। वह कुल, रघुकुल कहलाया। राम के आने के बाद भी उसे रामकुल नहीं कहा गया।

यदि यह मान लूँ कि यह वातावरण उन संघर्षों और बलिदानों के कारण उत्पन्न हुआ है जो रामजन्मभूमि को प्राप्त करने के लिए हुआ है तो भी मुझे अपने अराध्य और मिट्टी के लिए संघर्ष और बलिदान के ऐसे कई प्रतिमान इतिहास में विद्यमान मिलते हैं। यदि इसे एक आंदोलन से पैदा हुई ऊर्जा मान लूँ तो मैंने वो दस्तावेज देखे हैं जो बताते हैं कि काशी, मथुरा और अयोध्या की मुक्ति के आंदोलन की पटकथा एक साथ लिखी गई थी।

कई दिनों से इन उधेड़बुनों में फँसे मेरे मस्तिष्क को राम के, ‘सबके राम’ होने का जवाब उनकी उस यात्रा में मिलता है, जिसमें न कोई चमत्कार है और न कोई ईश्वरत्व। मुझे इसका जवाब हमारी उन सामाजिक और धार्मिक परंपराओं में मिलता है, जिनमें राम आराध्य भले नहीं हैं, लेकिन उनका अस्तित्व सहर्ष स्वीकार है।

कुछ साल पहले दक्षिण भारत की यात्रा पर गया था। रामेश्वरम में कई स्थानीय लोग मिले जो खुलकर बता रहे थे कि रावण उनका राजा था, जिसकी राम ने हत्या कर दी। उनके हृदय में विभीषण को लेकर कोई सम्मान नहीं था। पर वे भी राम के अस्तित्व को नकार नहीं रहे थे, जबकि इस देश में हम जानते हैं कि राजनीतिक लाभ के लिए देश के सर्वाेच्च अदालत में राम के अस्त्तिव को ही नकार देने की कोशिश हुई है।

कुछ साल पहले जांजगीर के एक गाँव में जाना हुआ था। वहाँ जो भी मिला सबके शरीर पर राम दिखे। उनलोगों ने जो कुछ बताया था (जैसा मुझे स्मरण है) उसके अनुसार करीब सवा सौ साल पहले उनके किसी पूर्वज को मंदिर में जाने से रोक दिया गया था। इसके बाद उनके बीच ‘राम राम’ से शरीर को गुदवाने की परंपरा शुरू हुई। इनलोगों ने राम के अस्तित्व को नहीं नकारा, बल्कि राम में ही अपना अस्तित्व साकार कर लिया। ये लोग आज भी मृतकों के शव को जलाते नहीं हैं। मुझे बताया गया था कि जिस शरीर पर राम विद्यमान हैं, उसे कैसे जलाया जाए।

रामनामी संप्रदाय के लोगों के इस समर्पण से आज के वे ‘जय भीम-जय मीम’ वाले भी सीख सकते हैं जो तुच्छ राजनीति और सस्ती लोकप्रियता के बहकावे में राम और सीता को लेकर अश्लील बातें करते हैं। जांजगीर आज के उस छत्तीसगढ़ प्रदेश का हिस्सा है जहाँ के अलग-अलग धार्मिक परंपराओं के लोग भी खुद को राम के ननिहाल का बताकर उनके साथ जुड़ जाते हैं।

यह केवल राम का ईश्वरत्व नहीं

जिस दौर में अपने अलावा हर किसी के अस्तित्व को खारिज करने की सनक हो, मजहब के नाम पर ‘सर तन से जुदा’ कर देने का उन्माद हो, उस दौर में केवल ईश्वरत्व का होना समाज में इतना सहिष्णु हर्ष नहीं भर सकता है। किसी देश के शासक को खुद को राम कहलाने पर गौरवान्वित नहीं कर सकता है। दुनिया के सबसे बड़े इस्लामी मुल्क को अपनी रामलीलालों के मंचन पर गौरव की अनुभूति नहीं करा सकता है। हर सभ्यता-संस्कृति को राम से जुड़ जाने का आनंद नहीं दे सकता है। जैसे मिस्र की सभ्यता ‘रामसेस’ या मेसोपोटामिया अथवा सुमेरियन सभ्यता ‘राम सिन’ से खुद को जुड़ा पाकर आनंदित होती है।

राम का यह प्रभाव अवतार होने के कारण नहीं है। अराध्य होने के कारण नहीं है। किसी मायाजाल या चमत्कार से नहीं है। यह उस यात्रा की उपज है जो अयोध्या में राम के जन्म से लेकर जल समाधि लेने तक की है। इसी उपज का फल है कि राम में हर किसी को अपना अंश दिखता है। उन पर हर कोई अपना अधिकार मानता है।

राम राज को आज भी किसी भी व्यवस्था का लक्ष्य माना जाता है। उसकी सफलता मानी जाती है। यही कारण है कि राम का नाम आज भी हर्ष पैदा करता है, जबकि हम जानते हैं कि राम राज्य में भी काल की गति पर विराम नहीं लगा था। शोक के पल उस राज्य में भी आते रहे होंगे। पर शोक के उन काल में भी राम का होना शोकाकुल समाज को मुक्ति का प्रकाश प्रदान करता रहता होगा। सृजन की ऊर्जा से भरता रहता होगा।

राम हैं इसलिए हर सवाल निष्प्रभावी हैं

जिस समाज में धार्मिकता कूट-कूटकर भरी हुई हो उस समाज को आज शंकराचार्य की गद्दी पर आसीन धर्माचार्यों के सवाल व्याकुल नहीं कर रहे हैं। जबकि यही समाज यह भी जानता है कि श्री रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने प्राण-प्रतिष्ठा समारोह के लिए सार्वजानिक तौर पर जो मापदंड सुनिश्चित किए थे, उनका पूरी तरह पालन नहीं हुआ है। इस समाज ने प्राण-प्रतिष्ठा से पहले विग्रह की नेत्र ढके बिना तस्वीरों को वायरल होते देखा है। इत्यादि, इत्यादि…

यदि यह केवल राम के ईश्वर भर होने का मामला होता है, यह केवल एक मंदिर का बनना भर होता है, यह केवल धार्मिकता मात्र होता, यह केवल अपने अराध्य को लेकर केवल भक्ति का भाव होता तो आज शंकराचार्यों की आपत्ति से लेकर ट्रस्ट की ओर से हुई चूकों का क्रंदन सर्वव्यापी होता। पर हम देख हैं वे भाव जिसमें कोई वृद्ध अक्षत निमंत्रण मिलने पर फूट-फूटकर रोने लगते हैं। कोई वृद्ध महिला वाहन पर राम की तस्वीर वाले पोस्टर देख बीच रास्ते अपने चप्पल उतार कर भाव विह्वल होकर उस तस्वीर को आलिंगन करने लगती है। किसी सैयदा बतूल जेहरा का गाया राम भजन वायरल हो जाता है।

इन सबमें कहीं भी वह धार्मिकता नहीं है जो आपको ईश्वर से अपनी दरिद्रता दूर करने की प्रार्थना के भाव से भरती है। कोई छात्र यह नहीं माँग रहा कि राम जी इस बार अच्छे नंबर से पास करवा देना। कार्यालयों में प्राण-प्रतिष्ठा पर आयोजन हो रहे हैं पर कोई व्यापारी यह नहीं कह रहा प्रभु मेरे कारोबार को उन्नति देना। धन-धान्य से भर देना। कोई अपने लिए संतान की कामना नहीं किए जा रहा। कोई ‘पत्नीं मनोरमां देहि’ की इच्छा लिए अयोध्या नहीं जा रहा…

यह राममय वातावरण जगत कल्याण के भाव से संचालित है। निज का भाव गौण है। यही भाव राम को ‘सबके राम’ बनाता है। यह व्यवस्था को बताता है कि हर्ष का भाव स्थायी नहीं है। शोक के क्षण भी आएँगे। पर समाज को सृजन की उस उर्जा से आलोकित करते रहना उसका परम दायित्व है जो राम का प्रभाव पैदा करता है। 2024 के आम चुनावों से ठीक पहले भारतीय समाज ने अपनी राजनीतिक व्यवस्था को इस दायित्व से बाँध दिया है। इस दायित्व को पूरा करना कोई विकल्प नहीं है। दायित्व से डिगने वाले मिट जाएँगे। राम राज का लक्ष्य अडिग रहेगा।

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अजीत झा
अजीत झा
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