गाय, गोबर और गौमूत्र का उपहास उड़ाना हमारे देश में एक आम बात बन चुकी है। जब भी इनकी उपयोगिता पर बात होती है, तो अक्सर इसे गंभीरता से लेने के बजाय इसका मजाक बनाया जाता है। लेकिन जमीनी हकीकत इस संकीर्ण सोच से परे एक बेहद उम्मीद जगाने वाले ‘इकोनॉमिक मॉडल’ को दर्शाती है।
आज उत्तर प्रदेश में देसी गायों के गोबर और गौमूत्र का इस्तेमाल करके करीब 200 तरह के प्रोडक्ट्स तैयार किए जा रहे हैं, जिनकी इंटरनेशनल मार्केट में भारी डिमांड है। इसमें शैम्पू, साबुन और अर्क से लेकर ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर तक शामिल हैं। जिस चीज को बेकार मानकर बहा दिया जाता था, आज वही किसानों के लिए अतिरिक्त नकद आय का एक मजबूत जरिया बन चुकी है।
बाजार में बिकने वाला महंगा ऑर्गेनिक फूड इसी प्राकृतिक खाद और गौमूत्र से बने जैविक पेस्टिसाइड्स के दम पर उगता है, जो मिट्टी को जहर-मुक्त और उपजाऊ बनाने का काम करते हैं।
UP में तेजी से बढ़ रही है 'गो-इकोनॉमी', दूध के साथ-साथ गोमूत्र भी बन रहा है रोजगार का साधन
गोमूत्र से बन रहे हैं शैम्पू, साबुन और अर्क, ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर में भी हो रहा है उपयोग
इसका एक प्रत्यक्ष और सफल मॉडल उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में देखा जा सकता है। वहाँ FPO यानी फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन के ज़रिए 15 गाँवों के स्थानीय संग्रह केंद्रों से रोज 500 लीटर गौमूत्र 10 रुपए प्रति लीटर के हिसाब से खरीदा जा रहा है।
इसके भंडारण के लिए गाँवों में 200 लीटर क्षमता वाले टैंक लगाए गए हैं। इस पूरी व्यवस्था से गाँव की लगभग 300 महिलाएँ जुड़ी हुई हैं, जिन्हें प्रति लीटर 2 रुपए का कमीशन मिलने के साथ-साथ FPO में शेयरहोल्डर भी बनाया गया है।
इस पूरे मॉडल ने किसान के पास मौजूद गाय को एक ‘थ्री-इन-वन’ इकोनॉमिक इंजन में बदल दिया है। किसान को दूध से सीधी कमाई होती है, गोबर से खेत के लिए मुफ्त खाद मिलने के कारण रासायनिक खाद का खर्च शून्य हो जाता है, और गौमूत्र की बिक्री से प्रति लीटर नकद मुनाफा मिलता है।
बुलंदशहर के 15 गाँवों से शुरू हुआ यह प्रयोग अगर पूरे राज्य में लागू होता है, तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था का कायाकल्प कर सकता है। ऐसे में सवाल उन लोगों से है जो गाय, गोबर और गौमूत्र का नाम सुनते ही मजाक बनाने लगते हैं- जब यही व्यवस्था किसान का खर्च घटाकर उसकी आय बढ़ा रही है और रोजगार के नए साधन बना रही है, तो उपहास किस बात का है?
स्पष्ट है कि समस्या गोबर या गौमूत्र में नहीं, बल्कि उस सोच में है जो किसी संसाधन की उपयोगिता समझे बिना उसका मजाक उड़ाने लगती है।
2017 के यूपी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले अखिलेश यादव ने मुस्लिम आरक्षण का वही कार्ड फिर उठाया था, जो समाजवादी पार्टी की राजनीति में बरसों से रचा-बसा रहा है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि इसके बावजूद 2017 में सपा 224 सीटों से लुढ़ककर सिर्फ 47 सीटों पर आ सिमटी थी।
यूपी की राजनीति में चुनाव नजदीक आते ही कुछ पुराने मुद्दे धूल झाड़कर फिर सामने आ जाते हैं और मुस्लिम आरक्षण भी उन्हीं में से एक है। 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा था कि उनकी सरकार मुस्लिमों को आरक्षण देने का वादा तो कर चुकी है, मगर कानूनी अड़चनें आड़े आ रही हैं।
अखिलेश ने संविधान में संशोधन की जरूरत बताकर भरोसा दिलाया था कि मिल-बैठकर कोई रास्ता निकाला जाएगा। साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि सरकारी योजनाओं में मुस्लिम आबादी को 20 फीसदी हिस्सेदारी दी जाएगी। यह कोई अचानक आया बयान नहीं था, इसकी जड़ें सपा की पुरानी चुनावी राजनीति में काफी गहरे तक जमी हैं।
2012 में चला था 18 फीसदी आरक्षण का दांव
इससे पहले 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने मुस्लिमों को आरक्षण देने का वादा किया था। पार्टी के घोषणापत्र में पिछड़े मुस्लिमों के लिए आरक्षण के साथ-साथ मुस्लिम बहुल इलाकों में कॉलेज खोलने और गरीब परिवारों के बच्चों की फीस में राहत देने जैसे वादे भी शामिल थे।
आगे चलकर इस वादे को अक्सर ‘18 फीसदी मुस्लिम आरक्षण’ कहकर ही राजनीतिक बहस में घसीटा जाता रहा। 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले खुद मुलायम सिंह यादव ने भी दोहराया था कि पार्टी मुस्लिमों को उनकी आबादी के हिसाब से आरक्षण देने के अपने वादे पर कायम है। लेकिन इस कहानी का एक दूसरा पहलू भी है, जो अक्सर नजरअंदाज हो जाता है।
आजम खान विधानसभा में अपने वादे से मुकरे
अगस्त 2016 में उसी सपा सरकार में मंत्री रहे आजम खान ने विधानसभा में यह कहकर सबको चौंका दिया था कि पार्टी ने कभी 18 फीसदी आरक्षण का वादा किया ही नहीं था और संविधान बदले बिना ऐसा आरक्षण देना मुमकिन नहीं। यानी खुद सपा के भीतर भी इस वादे की व्याख्या पर एकमत नहीं था।
फिर मई 2016 में अखिलेश यादव ने खुद इस वादे को दोहराया। कानूनी अड़चनों का हवाला देते हुए उन्होंने संविधान संशोधन की जरूरत बताई और कहा कि उनकी पार्टी 20 फीसदी आबादी के हक के लिए लड़ती रहेगी। यहीं से मुस्लिम आरक्षण सिर्फ सामाजिक न्याय का मसला न रहकर, यूपी की चुनावी राजनीति में वोट के गणित का सवाल बन जाता है।
यूपी में मुस्लिम आबादी आखिर कितनी है?
2011 की जनगणना के मुताबिक उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी करीब 3 करोड़ 84 लाख है, यानी कुल आबादी का 19.26 फीसदी। राज्य सरकार के दस्तावेजों में भी यही आँकड़ा दर्ज है, जबकि हिंदू आबादी करीब 79.73 फीसदी बताई जाती है।
इसका मतलब लगभग हर पाँचवाँ शख्स मुस्लिम है। यही वजह है कि यूपी की चुनावी राजनीति में किसी भी बड़ी पार्टी के लिए मुस्लिम मतदाताओं को नजरअंदाज करना आसान नहीं रहा।
समाजवादी पार्टी के लिए तो यह गणित और भी अहम है क्योंकि लंबे अरसे से उसकी राजनीति को MY यानी मुस्लिम-यादव समीकरण से जोड़कर देखा जाता रहा है। 2022 के चुनावी विश्लेषणों में भी मुस्लिम और यादव समुदाय को सपा का पारंपरिक कोर वोटबैंक माना गया था।
लेकिन 2017 में यही कार्ड चला क्यों नहीं?
2012 में सपा ने 403 में से 224 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। मगर 5 साल बाद 2017 में तस्वीर पूरी तरह पलट गई। भाजपा 312 सीटों के साथ बहुमत में आई, जबकि सपा महज 47 सीटों पर सिमट गई। उसका वोट शेयर घटकर 21.82 फीसदी रह गया, यानी कुल मिलाकर 177 सीटों का भारी नुकसान।
2017 में अखिलेश यादव ने पार्टी की छवि विकास, एक्सप्रेसवे, मेट्रो, लैपटॉप और युवा राजनीति से जोड़ने की कोशिश की थी। कांग्रेस के साथ हुए गठबंधन को भी राजनीतिक विश्लेषक अक्सर मुस्लिम वोटों के बिखराव रोकने की रणनीति से जोड़कर देखते रहे। इस गठबंधन के पीछे का मकसद करीब 20 फीसदी मुस्लिम वोट को एकजुट रखना भी था।
हालाँकि 2017 के सपा घोषणापत्र में 2012 जैसी साफ-साफ मुस्लिम आरक्षण की राजनीति उतनी उभरकर सामने नहीं आई थी। अखिलेश के नए घोषणापत्र से मुस्लिम केंद्रित मुद्दे काफी हद तक गायब हो गए थे। जहाँ 2012 में साफ तौर पर 18 फीसदी आरक्षण का वादा था, वहीं 2017 में ऐसे किसी वादे को उतनी तवज्जो नहीं दी गई।
मुलायम से अखिलेश तक, MY राजनीति की विरासत
समाजवादी पार्टी की मुस्लिम राजनीति को ठीक से समझना है तो मुलायम सिंह यादव के दौर तक जाना जरूरी है। 1990 में अयोध्या में कारसेवकों पर हुई पुलिस फायरिंग के वक्त मुलायम सिंह यादव यूपी के मुख्यमंत्री थे। आगे चलकर उन्होंने कई बार इस फैसले का बचाव भी किया। 2013 में उन्होंने कहा था कि गोली चलवाने का उन्हें अफसोस है, लेकिन उस वक्त देश की एकता और मंदिर-मस्जिद विवाद का सवाल इतना बड़ा था कि उनके पास और कोई चारा नहीं बचा था।
2016 में तो उन्होंने इससे भी आगे जाकर कह दिया था कि बाबरी मस्जिद को बचाने के लिए गोली चलाना जरूरी था और इससे ज्यादा जानें भी जातीं तो भी वह पीछे नहीं हटते। बाद की राजनीतिक व्याख्याओं में इस फैसले को अक्सर मुलायम की मुस्लिम राजनीति और MY समीकरण की नींव से जोड़ा गया।
आरक्षण की असली संवैधानिक पेचीदगी क्या है?
अखिलेश यादव ने 2016 में संविधान संशोधन की बात यूँ ही नहीं की थी। दरअसल, भारत का संविधान धर्म को आरक्षण का आधार नहीं मानता। आरक्षण सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन जैसे संवैधानिक आधारों पर ही दिया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के मशहूर इंद्रा साहनी फैसले में आरक्षण की सामान्य सीमा को 50 फीसदी के दायरे में रखने का सिद्धांत भी काफी अहम माना जाता है, और केंद्र सरकार भी संसद में इसी न्यायिक व्यवस्था का हवाला देती रही है।
मतलब मुस्लिम समुदाय के भीतर जो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े समूह हैं, उन्हें OBC व्यवस्था के तहत आरक्षण मिलना एक बात है, जबकि पूरे मुस्लिम समुदाय को सिर्फ धर्म के आधार पर अलग कोटा दे देना बिल्कुल अलग संवैधानिक सवाल है। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में भी मुस्लिम OBC समूहों और अलग-अलग राज्यों की आरक्षण व्यवस्थाओं का जिक्र मिलता है।
दिलचस्प यह भी है कि मार्च 2025 में अखिलेश यादव ने कर्नाटक में मुस्लिम आरक्षण को लेकर छिड़ी बहस के दौरान साफ कह दिया था कि धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं होना चाहिए, बल्कि यह पिछड़ों, दलितों और वंचित वर्गों को मिलना चाहिए। यानी 2016 के अखिलेश और 2025 के अखिलेश के रुख में काफी फर्क नजर आता है।
योगी सरकार में मुसलमानों को क्या मिला?
योगी सरकार के 2026-27 के बजट में अल्पसंख्यक कल्याण के लिए ₹2,058 करोड़ रखे गए हैं। प्रधानमंत्री जन विकास कार्यक्रम के तहत अल्पसंख्यक बहुल 21 जिलों में बहुक्षेत्रीय विकास के लिए ₹500 करोड़ का प्रावधान है, वहीं अल्पसंख्यक छात्रों की पूर्वदशम और दशमोत्तर छात्रवृत्ति के लिए ₹391 करोड़ तय किए गए हैं।
राज्य के अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के तहत छात्रवृत्ति, फीस प्रतिपूर्ति, गरीब अल्पसंख्यक परिवारों की बेटियों की शादी के लिए अनुदान, शिक्षा ऋण, बेरोजगार युवाओं के लिए टर्म लोन के साथ-साथ अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में स्कूल, स्वास्थ्य, पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं जुटाने वाली योजनाएं भी चल रही हैं।
अब निगाहें 2027 पर
उत्तर प्रदेश की मौजूदा 403 सीटों वाली विधानसभा का कार्यकाल 2027 में पूरा होना है और अभी चुनाव की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। ऐसे में 2027 में अखिलेश यादव का मुस्लिमों को आरक्षण का ऊंट किस करवट बैठेगा ये देखना दिलचस्प होगा। उनके हालिया बयानों से तस्वीर थोड़ी ज़्यादा उलझी हुई नजर आती है।
2025 में वह धर्म आधारित आरक्षण से दूरी बना चुके हैं। 2026 में उनकी राजनीति में PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का फॉर्मूला ज़्यादा उभरता दिख रहा है। यानी पुराना MY फॉर्मूला अब PDA के बड़े और व्यापक फ्रेम में पेश किया जा रहा है। लेकिन असली सवाल यही है कि क्या सिर्फ सामाजिक समीकरण और आरक्षण की राजनीति 2027 में काफी होगी?
2017 के नतीजे यह साफ बता चुके हैं कि सिर्फ किसी एक वोटबैंक को साधना सत्ता की गारंटी नहीं देता। 2012 में 224 सीटें जीतने वाली सपा 2017 में 47 सीटों तक सिमट गई थी। 2022 में भी भाजपा ने सरकार बनाई और सपा को विपक्ष में ही बैठना पड़ा।
अब असल सवाल तो यह होगा कि क्या अखिलेश यादव मुस्लिम आरक्षण या PDA जैसे सामाजिक समीकरणों के साथ-साथ रोजगार, कानून-व्यवस्था, निवेश, उद्योग, किसान, महिला सुरक्षा और बुनियादी ढांचे जैसा एक ठोस एजेंडा भी पेश कर पाते हैं जो सिर्फ किसी एक वोटबैंक तक सीमित न रहकर पूरे उत्तर प्रदेश को अपनी बात कह सके।
क्योंकि चुनाव आते-आते पुराना कार्ड फिर से निकाला जा सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि मतदाता हर बार वही खेल उसी तरह खेलें और शायद यही 2017 की सबसे बड़ी सीख थी।
लखनऊ में सीएम योगी आदित्यनाथ 23 अगस्त 2026 को अमर बलिदानी गुलाब सिंह लोधी की प्रतिमा पर पहुँचे। उनके बलिदान दिवस पर सीएम ने उनकी प्रतिमा पर पुष्प चढ़ाए और उन्हें याद किया। करीब 9 दशक पहले यही गुलाब सिंह लोधी थे, जिन्होंने अंग्रेजी बन्दूकों की परवाह किए बिना लखनऊ के अमीनाबाद पार्क में तिरंगा फहरा दिया था। बदले में अंग्रेजों ने उन्हें गोलियों से भून डाला, मगर उनके हाथों में लहराता झंडा उस वक्त अंग्रेज हुकूमत को सीधी चुनौती दे चुका था।
गुलाब सिंह लोधी की कहानी महज एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की कहानी भर नहीं है, ये उस दौर की झलक है जब गाँव-गाँव से उठे मामूली किसान-मजदूर भी अंग्रेजों के खिलाफ अपनी जान दाँव पर लगाने से पीछे नहीं हटते थे। इतिहास की किताबों में बड़े-बड़े नाम तो दर्ज हैं, पर गुलाब सिंह लोधी जैसे कई सेनानी ऐसे भी रहे, जिनकी कहानी स्थानीय यादों में तो रही, मगर राष्ट्रीय पटल पर उन्हें वो जगह कभी नहीं मिली, जिसके वो हकदार थे।
भारत माता के महान सपूत, अमर शहीद गुलाब सिंह लोधी जी ने देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर माँ भारती की आन-बान और शान को अक्षुण्ण रखा।
आज उनके पावन बलिदान दिवस पर लखनऊ में उनकी प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी।
साल 1903 में एक साधारण किसान परिवार में जन्मे गुलाब सिंह लोधी उन्नाव जिले के फतेहपुर चौरासी इलाके के चंद्रिकाखेड़ा गाँव के रहने वाले थे। पिता का नाम था ठाकुर रामरतन सिंह लोधी।
उनका बचपन ऐसे समय में बीता, जब अंग्रेजी राज के खिलाफ गुस्सा हर तरफ पनप रहा था। असहयोग आँदोलन, सत्याग्रह, स्वदेशी की हवा गाँवों तक पहुँच चुकी थी। अंग्रेजों की सख्ती और क्रूरता के खिलाफ माहौल पूरे देश में बन रहा था, और गुलाब सिंह लोधी भी इसी हवा में साँस ले रहे थे।
जब तिरंगा अंग्रेजों के लिए खतरा बन गया
गुलाब सिंह लोधी का नाम सबसे ज्यादा जुड़ा है लखनऊ के झंडा सत्याग्रह से। उस दौर में तिरंगा फहराना अपने आप में बगावत मानी जाती थी। अंग्रेज सरकार झंडे से जुड़े आंदोलनों को बेहद संजीदगी से लेती थी, और ऐसे किसी भी जमावड़े को रोकने के लिए पुलिस-फौज उतार देती थी।
उसी दौर में उन्नाव से सत्याग्रहियों के कई जत्थे लखनऊ की तरफ कूच कर गए। मकसद था तिरंगा फहराना, अंग्रेजी सत्ता के मुँह पर राष्ट्रीय स्वाभिमान का तमाचा जड़ना मगर अंग्रेज फौज ने रास्ता रोक दिया। कई सत्याग्रही वहीं रुक गए, आगे नहीं बढ़ सके।
गुलाब सिंह लोधी के बलिदान दिवस के मौक पर सीएम योगी आदित्यनाथ लखनऊ के अमीनाबाद स्थित झँडेवाला पार्क पहुँचे
गुलाब सिंह लोधी रुकने वालों में नहीं थे
वे सैनिकों की नजर बचाकर किसी तरह अमीनाबाद पार्क में घुस गए। साथ में था सिर्फ एक पैना (पतली लाठी, छड़ी), वही ‘औजार’ जिससे किसान बैलों को हाँकते हैं। इसी में उन्होंने तिरंगा बाँध रखा था। इरादा एक ही था – जैसे भी हो, पार्क तक पहुँच कर झंडा फहराना।
यहीं उनकी सूझबूझ भी सामने आती है। पहरे के बीच से निकल कर वे एक पेड़ पर चढ़ गए, और फिर वहीं से तिरंगा लहरा दिया। एक किसान का बेटा, अंग्रेजी हुकूमत के सामने खुले आसमान तले भारत का झंडा फहरा रहा था।
तिरंगा फहरते ही चल गईं गोलियाँ
झंडा लहराते ही अंग्रेज सैनिकों की नजर गुलाब सिंह लोधी पर पड़ गई। हुक्म मिला- गोली चलाओ। कई बंदूकों से एक साथ फायरिंग हुई, गोलियाँ उनके बदन में धँस गईं, जिससे वे गंभीर हालत में पेड़ से नीचे गिर पड़े और 23 अगस्त 1935 को उन्होंने आखिरी साँस ली।
32 साल की उम्र में जब एक आम आदमी अपने परिवार और भविष्य के सपने बुनता है, उस उम्र में गुलाब सिंह लोधी ने देश की आजादी को अपनी जिंदगी से ऊपर रख दिया।
जिस पार्क में उन्होंने अंग्रेजी गोलियों के सामने झंडा फहराया, अमीनाबाद का वही पार्क आगे चलकर ‘झंडेवाला पार्क‘ के नाम से मशहूर हो गया और आजादी की लड़ाई का एक अहम ठिकाना बन गया।
गुलाब सिंह लोधी का बलिदान खास क्यों?
भारत की आजादी की लड़ाई सिर्फ दिल्ली-मुंबई-कोलकाता के बड़े नेताओं की कहानी नहीं है। इसकी असली जान थी वो लाखों-करोड़ों गुमनाम भारतीय, जिन्होंने अंग्रेजों के सामने खड़े होने की हिम्मत जुटाई। गुलाब सिंह लोधी इसी जनसैलाब का चेहरा हैं।
न कोई बड़ा राजनीतिक खानदान, न सत्ता, न फौजी ताकत, न हथियार। उनके पास बस एक झंडा था, आजादी का सपना था, और अंग्रेजों के आगे न झुकने का जज्बा। उनकी कहानी बताती है कि आजादी की लड़ाई में किसान समाज और गाँव का कितना बड़ा हाथ था। उन्नाव के एक गाँव से चलकर लखनऊ के अमीनाबाद पार्क तक पहुँचना, और वहाँ तिरंगा फहरा देना, ये अपने आप में उस दौर के ग्रामीण भारत की राजनीतिक चेतना की मिसाल है।
इतिहास में कम जगह, पर लोगों के दिलों में जिंदा
इतनी बड़ी घटना के बावजूद गुलाब सिंह लोधी का नाम राष्ट्रीय स्तर पर वो पहचान नहीं बना पाया, जो कई और सेनानियों को मिली।
फिर भी उन्नाव और लखनऊ में उनकी यादें आज भी जिंदा हैं। फतेहपुर चौरासी में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और पुलिस प्रशिक्षण केंद्र उनके नाम पर हैं। उनके पैतृक गाँव चंद्रिकाखेड़ा में उनकी प्रतिमा लगी है।
सीएम योगी ने लोधी के गाँव में प्रतिमा का किया अनावरण
13 मार्च 2024 को सीएम योगी आदित्यनाथ खुद चंद्रिकाखेड़ा पहुँचे थे और गुलाब सिंह लोधी की प्रतिमा का अनावरण किया था। उस मौके पर उन्होंने याद दिलाया था कि कैसे 1935 में उन्नाव से लखनऊ जाकर इस किसान बेटे ने तिरंगा फहराया और देश के लिए बलिदान दिया।
यानी जो कहानी कभी सिर्फ एक गाँव की याद बनकर रह सकती थी, उसे स्मारकों और सरकारी कार्यक्रमों के जरिए नई पीढ़ी तक पहुँचाने की कोशिश हुई।
गुलाब सिंह लोधी जी की स्मृतियों को जीवंत बनाए रखने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने जनपद उन्नाव में पार्क, स्वास्थ्य केंद्र एवं पुलिस प्रशिक्षण केंद्र का नामकरण महान बलिदानी के नाम पर कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की है।
गुलाब सिंह लोधी की शहादत की सबसे गहरी तस्वीर यही है कि एक साधारण गाँव का लड़का, अंग्रेजी बंदूकों के सामने पेड़ पर चढ़कर तिरंगा फहरा रहा है। ये सिर्फ 1935 की एक घटना नहीं रह गई। ये इस बात की गवाही बन गई कि उस दौर में तिरंगा कोई साधारण कपड़ा नहीं, बल्कि गुलामी के खिलाफ भारतीय स्वाभिमान का ऐलान था।
आज जब देश आजादी के इतने दशकों बाद आगे बढ़ रहा है, तो गुलाब सिंह लोधी जैसे सेनानियों को याद करना इसलिए जरूरी है क्योंकि आजादी हमें यूँ ही नहीं मिल गई थी, इसके पीछे बलिदानों की एक लंबी, दर्दनाक फेहरिस्त है।
23 अगस्त का दिन गुलाब सिंह लोधी की सिर्फ बरसी नहीं, बल्कि उस जज्बे की याद है जिसके आगे अंग्रेजों की बंदूकें भी छोटी पड़ गई थीं। अमीनाबाद में लहराया गया वो तिरंगा भले ही 1935 की बात हो, लेकिन उसकी गूँज आज भी सुनी जा सकती है।
यही वजह रही कि सीएम योगी आदित्यनाथ आज उनके बलिदान दिवस पर उनकी प्रतिमा पर पुष्प चढ़ाने पहुँचे। गुलाब सिंह लोधी का नाम उस पीढ़ी के साथ हमेशा दर्ज रहेगा, जिसने तिरंगे को झुकने नहीं दिया और इसके लिए अपनी जान तक दे दी।
जरा सोचिए, हमारे देश के चिर युवा नेता यानी राहुल गाँधी जब भी विदेश जाते हैं, तो अक्सर विदेशी मंचों पर जाकर यह नैरेटिव सेट करने की कोशिश करते हैं कि भारत में लोकतंत्र खतरे में है, चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं है और संस्थाएँ बिक चुकी हैं। लेकिन अब एक ऐसा मोड़ आया है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। जिस पश्चिमी दुनिया से हमारे देश के कुछ नेता सर्टिफिकेट माँगते फिरते हैं, आज उसी पश्चिमी दुनिया का सबसे ताकतवर देश, यानी अमेरिका, भारत की चुनाव प्रणाली की मिसाल दे रहा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के चुनाव आयोग, हमारे वोटर आईडी सिस्टम और हमारी मतदान प्रक्रिया की खुलकर तारीफ की है। दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र कहे जाने वाले अमेरिका के राष्ट्रपति अब भारत के चुनाव सिस्टम से सीख लेने की बात कर रहे हैं। हमें अमेरिका के सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है लेकिन ये उनके लिए है जिनको चीन के इंफ्रा और अमेरिका के लोकतंत्र में ही जान नजर आती है।
लेकिन विडंबना देखिए, जिस चुनाव आयोग और व्यवस्था की तारीफ व्हाइट हाउस और अमेरिकी राष्ट्रपति कर रहे हैं, हमारे अपने देश का विपक्ष उसी व्यवस्था को हर चुनाव के बाद कटघरे में खड़ा करने की आदत नहीं छोड़ पा रहा है। ट्रंप की तारीफ के बाद कॉन्ग्रेस को फिर मिर्ची लगी है और व्यंग्य कसते हुए बयान दे डाला है।
डोनाल्ड ट्रंप ने क्या कहा और Save America Act क्या है?
आइए सबसे पहले जानते हैं कि आखिर हुआ क्या है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर एक लंबी पोस्ट लिखी। इस पोस्ट में उन्होंने भारत के चुनाव सिस्टम की जमकर तारीफ की और अपने देश के सामने भारत का मॉडल रखा।
ट्रंप ने लिखा कि भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अमेरिकी प्रशासन से एक सीधा सवाल पूछा था, कि आखिर अमेरिका में बिना वैध फोटो पहचान पत्र के चुनाव कैसे हो सकते हैं? अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने दुनिया के सामने भारत के 2024 के आम चुनाव के आँकड़े भी रखे। उन्होंने कहा कि भारत के पिछले चुनाव में करीब 65 करोड़ मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। इनमें से 1 प्रतिशत से भी कम लोगों ने डाक यानी मेल-इन वोटिंग का सहारा लिया। और सबसे बड़ी बात, वोट डालने वाले हर एक नागरिक के पास अपनी वैध फोटो पहचान पत्र (Voter ID) होना अनिवार्य था।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने इसी व्यवस्था का हवाला देते हुए अमेरिका में ‘SAVE America Act’ को तुरंत पास करने की माँग की। इस कानून का सीधा मकसद यह है कि अमेरिका में वोट डालने के लिए नागरिकता का पक्का सबूत अनिवार्य किया जाए, हर वोटर के लिए फोटो आईडी जरूरी हो और मेल-इन वोटिंग यानी डाक से वोटिंग के फर्जीवाड़े को रोका जा सके।
इतना ही नहीं, भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने भी ट्रंप के इस बयान का समर्थन किया और कहा कि भारत का चुनाव मॉडल पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल है। सोचिए, 65 करोड़ लोग लाइन में लगकर, पहचान पत्र दिखाकर वोट डालते हैं और एक भी फर्जीवाड़े की गुंजाइश नहीं बचती, यही ताकत आज पूरी दुनिया देख रही है।
President Donald J. Trump is absolutely correct! 646 MILLION voters, every single one required an ID in India’s last election. Congress should pass THE SAVE AMERICA ACT! pic.twitter.com/lqQHSZvWk7
भारत में विपक्ष का दोहरा रवैया- ‘जीते तो जनता, हारे तो EVM’
अब सिक्के का दूसरा पहलू देखिए। एक तरफ अमेरिका जैसा देश हमारी व्यवस्था की तारीफ कर रहा है, और दूसरी तरफ हमारे अपने देश के भीतर की सियासत को देखिए। भारत में विपक्ष की राजनीति का एक सीधा-सा नियम बन चुका है… अगर किसी राज्य में चुनाव जीत गए, सरकार बन गई, तो कहते हैं- ‘यह जनता का फैसला है, लोकतंत्र की जीत है।’ लेकिन जहाँ चुनाव हारे, जहाँ पार्टी का जनाधार खिसका, वहाँ अगले ही दिन सुबह प्रेस कॉन्फ्रेंस शुरू हो जाती है कि ‘EVM हैक हो गया’, ‘चुनाव आयोग बिक गया’ और ‘वोट चोरी हो गई।’
कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने तो कई बार प्रेस कॉन्फ्रेंस करके ऐसे दावे किए जैसे कोई बहुत बड़ा ‘हाइड्रोजन बम‘ फूटने वाला हो। बड़े-बड़े खुलासे करने की बातें कही गईं, वोटर लिस्ट से नाम गायब होने के आरोप लगाए गए। लेकिन जब चुनाव आयोग या अदालत ने उनसे पूछा कि भाई, अगर आपके पास गड़बड़ी के कोई सबूत हैं तो टेबल पर रखिए, तो हर बार नतीजा सिफर यानि शून्य निकला। आरोप तो खूब लगे, लेकिन ठोस सबूत के नाम पर सिर्फ हवा-हवाई बातें सामने आईं।
बात सिर्फ देश के भीतर तक सीमित नहीं रही। राहुल गाँधी विदेशों में, चाहे अमेरिका हो या यूरोप, वहाँ की यूनिवर्सिटी और मंचों पर जाकर भी भारतीय चुनाव व्यवस्था और लोकतंत्र पर सवाल उठाते रहे हैं। सवाल यह उठता है कि जिस देश की जनता आपको चुनकर संसद भेजती है, उसी देश की लोकतांत्रिक साख को विदेश में जाकर गिराने से किसका फायदा होता है?
यही हाल पश्चिम बंगाल में भी देखने को मिला, जहाँ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी ने मतदाता सूची और चुनाव प्रक्रिया को लेकर सीधे सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाजा खटखटाया। लोकतंत्र में सवाल पूछना, पारदर्शिता माँगना हर किसी का हक है लेकिन बिना किसी सबूत के सिर्फ अपनी हार का गुस्सा संवैधानिक संस्थाओं पर निकालना कहाँ तक जायज है?
चुनाव आयोग की तारीफ पर कॉन्ग्रेस को लगी मिर्ची
जब डोनाल्ड ट्रंप का यह बयान आया, तो सामान्य समझ यह कहती थी कि देश के हर दल को गर्व होना चाहिए कि हमारी चुनाव व्यवस्था का लोहा पूरी दुनिया मान रही है। लेकिन इस पर भी कॉन्ग्रेस को मिर्ची लगना लाजमी था। कॉन्ग्रेस की तरफ से जो बयान आया, उसने एक बार फिर साबित कर दिया कि वे आत्ममंथन के मूड में बिल्कुल नहीं हैं।
कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया पर ट्रंप को टैग करते हुए तंज कसा। उन्होंने लिखा, “प्रिय डोनाल्ड ट्रंप, आप ज्ञानेश कुमार को अपने साथ अमेरिका ले जाइए और उन्हें वहीं रखिए। हम अगली ही फ्लाइट से अपनी EVM मशीनें भी अमेरिका भेज देंगे। आपने हमारे साथ जो भी बर्ताव किया है, उसके बदले में हम कम से कम इतना तो आपके लिए कर ही सकते हैं।”
जरा सोचिए, यह बयान क्या दिखाता है? क्या यह बयान किसी संवैधानिक संस्था के प्रति सम्मान दिखाता है? या फिर यह सिर्फ इस बात की झुंझलाहट है कि जिस विदेशी धरती पर जाकर आप भारत की बदनामी कर रहे थे, उसी धरती का सबसे बड़ा नेता आज भारत के चुनाव आयोग का मुरीद बन बैठा है?
असली बात क्या है और इससे क्या समझना चाहिए?
यहाँ समझने वाली सबसे बड़ी बात यह है कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का असली मतलब यह होता है कि जब जनादेश आपके खिलाफ जाए, तब भी आप जनता के फैसले और व्यवस्था का सम्मान करें। अगर वाकई कहीं कोई गड़बड़ी है, तो उसके लिए देश में कानून है, अदालतें हैं, चुनाव आयोग का मंच है। तथ्यों के साथ जाइए और साबित कीजिए।
लेकिन सिर्फ अपनी राजनीतिक हार को छुपाने के लिए पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर देना और ‘वोट चोरी’ का नैरेटिव फैलाना किसी भी तरह से देशहित में नहीं हो सकता। आज अमेरिका जैसा देश यह मान रहा है कि भारत की 65 करोड़ लोगों वाली फोटो आईडी आधारित चुनाव व्यवस्था दुनिया के लिए एक बेंचमार्क है। ट्रंप का यह बयान इस बात का सबूत है कि हमारी चुनावी मशीनरी कितनी मजबूत, सुरक्षित और पारदर्शी है।
बंगाल का वो दौर आपको याद होगा जब पूरे राज्य में तुष्टिकरण का बोलबाला था। ऐसे चौराहे थे, जिन्हें एक खास समुदाय अपनी बपौती मान बैठा था, वो सड़कें- जहाँ नियमों को ताक पर रखकर नमाज पढ़ना आम बात बन चुकी थी, और वो लाचार व्यवस्था, जहाँ देश की सीमाओं की सुरक्षा के लिए BSF जवानों को भी ज़मीन का एक टुकड़ा पाने के लिए संघर्ष करना पड़।
जनता बेबस थी- चाहकर भी वे न तो केंद्र सरकार की ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ का लाभ ले पा रही थी और न ही ‘आयुष्मान भारत’ के तहत अस्पतालों में इलाज करा पाती थी। ऐसा लगता था जैसे बंगाल देश की मुख्यधारा से पूरी तरह कट चुका हो, लेकिन क्या आप यकीन करेंगे कि जिस बंगाल में कभी बदलाव असंभव सा लगता था, मात्र 100 दिनों में बदलाव साफ़ और सीधा दिखने लगा है।
दरअसल, बदलाव की असली शुरुआत हुई 9 मई 2026 को! कोलकाता का वो ऐतिहासिक ‘ब्रिगेड परेड ग्राउंड’… जहाँ शुभेंदु अधिकारी, दिलीप घोष और अग्निमित्रा पॉल जैसे दिग्गजों के मंच से एक साथ शपथ ली, तो पूरे बंगाल में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ और पश्चिम बंगाल की जनता में वापस से एक उम्मीद सी जगी कि अब शायद नया निजाम हमारे लिए कुछ बेहतर करेगा!
यह वही सपना था, जिसे पूर्व की टीएमसी सरकार ने दशकों तक सिर्फ चुनाव जीतने के लिए चूरन की तरह बाँटा… लेकिन जब धरातल पर काम करने की बारी आई, तो वे अपनी तुष्टिकरण और वोटबैंक की राजनीति में ही उलझे रहे।
पर इस बार माहौल कुछ अलग था! 9 मई के बाद बंगाल के इतिहास में पहली बार लोग बेखौफ होकर भगवा लहरा रहे थे, एक दूसरे को रंग गुलाल लगाकर मानो असली आजादी का जश्न मना रहे थे तो कुछ मंदिरों की घंटियाँ बजाकर अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व महसूस कर रहे थे। मंदिरों से गूँजती घंटियों की आवाज अब किसी को चुभ नहीं रही थी, बल्कि जनता के चेहरों पर बंगाल की बदलती तस्वीर साफ दिख रही थी और इन्हीं कुछ तस्वीरों को देखते 100 दिन बीत गए।
अब जब बंगाल में भाजपा सरकार के 100 दिन पूरे हो चुके हैं। तो आइए जानते हैं कि इन 100 दिनों के भीतर बंगाल की तस्वीर कितनी बदली है?
बंगाल में BSF को मिली भूमि
आपको याद होगा कि बंगाल में सालों तक बांग्लादेश की सीमा पर तार लगाने के लिए गृह मंत्रालय राज्य सरकार से ज़मीन माँगता रहा, लेकिन ममता सरकार ने अपने तुष्टिकरण के चक्कर में इसे लटकाए रखा और फिर खुली सीमा का फायदा उठाकर बांग्लादेशी घुसपैठिए अपनी मनमर्जी से भारत आते-जाते रहे, लेकिन राज्य में भाजपा सरकार बनने के महज दो हफ्तों के भीतर ही सीएम शुभेंदु अधिकारी ने इस पर सबसे बड़ा फैसला लिया और कहा, “हम सीमा पर बाड़ लगाने के लिए BSF को 27 किलोमीटर ज़मीन सौंपने जा रहे हैं।”
यह सिर्फ एक प्रशासनिक ऐलान नहीं था बल्कि इस आधिकारिक घोषणा का असर कुछ ऐसा हुआ कि आज विभिन्न सीमावर्ती जिलों में प्रक्रिया तेज़ करते हुए 1100 एकड़ से अधिक भूमि BSF को सौंपी जा चुकी है। इसका परिणाम ये है कि देश की सीमाएँ अब सुरक्षित होने वाली हैं। जिन बॉर्डर्स से अपनी मनमर्जी से बांग्लादेशी आते-जाते थे, वो अब सील हो रहे हैं।
आयुष्मान भारत की बंगाल में शुरुआत
इसी तरह केंद्र की क्रांतिकारी ‘आयुष्मान भारत योजना’, जिसे ममता बनर्जी ने सिर्फ़ राजनीतिक द्वेष के कारण राज्य में लागू नहीं किया था उसे शुभेंदु सरकार ने 16 अगस्त को पूरे राज्य में लागू कर दिया। इसके चलते आज बंगाल के लगभग 1 करोड़ 43 लाख परिवार यानी 6 करोड़ लोगों को हर साल 5 लाख रुपये तक के मुफ़्त कैशलेस इलाज का लाभ मिल सकेगा। यहां तक कि अब बंगाल के 1,240 निजी और 627 सरकारी अस्पतालों के साथ-साथ, राज्य के नागरिक देशभर के 38 हज़ार से अधिक सूचीबद्ध अस्पतालों में मुफ़्त इलाज का लाभ उठा सकेंगे।
पश्चिम बंगाल में आयुष्मान भारत का नया अध्याय!
केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री श्रीमती अनुप्रिया पटेल ने कोलकाता में ‘आयुष्मान दिवस’ के अवसर पर अपने संबोधन में सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज के लक्ष्य को साकार करने में आयुष्मान भारत की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश… pic.twitter.com/yDEJCqPanm
ममता सरकार ने सिर्फ़ केंद्र सरकार से बैर के चलते राज्य के गरीब लोगों को आवास जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित रखा था। यही नहीं प्रधानमंत्री आवास योजना को लेकर भी ममता सरकार में जमकर धांधली और भ्रष्टाचार की बातें सामने आईं थीं। मगर, शुभेंदु सरकार ने सत्ता में आते ही इस पूरे सिस्टम का शुद्धिकरण किया।
राज्य में इसे पारदर्शी बनाते हुए ‘पश्चिम बंगाल आवास योजना’ का रूप दिया गया। हाल ही में एक कार्यक्रम के जरिए राज्य के 10.20 लाख से अधिक ग्रामीण परिवारों के खातों में सीधे ₹6122.27 करोड़ की राशि भेजी गई है। इतना ही नहीं, पिछली टीएमसी सरकार द्वारा तैयार की गई 30 लाख लोगों की संदेहास्पद सूची की जाँच की गई तो उसमें 12 लाख से अधिक अयोग्य और फर्जी नाम सामने आए जिन्हें शुद्धिकरण के तहत हटाया गया।
सरकार का संदेश साफ है- बिना किसी धर्म, जाति या राजनीतिक भेदभाव के, योजना का शत-प्रतिशत लाभ केवल असली ज़रूरतमंदों को ही मिलना चाहिए। इसी का परिणाम है कि वर्तमान में 18 लाख से अधिक पात्र परिवारों के मकानों का निर्माण कार्य युद्ध स्तर पर जारी है।
अन्नपूर्णा योजना
चुनाव के दौरान भाजपा का प्रमुख वादा था कि सरकार बनने पर महिलाओं के लिए ‘अन्नपूर्णा योजना’ लागू की जाएगी। सरकार ने पहले ही चरण में इसे ज़मीन पर उतारा। आज इस योजना के तहत राज्य की पात्र महिलाओं को ₹3,000 प्रति माह की सीधी वित्तीय सहायता दिए जाने का काम शुरू हो गया है।
रिपोर्ट्स के अनुसार करीब 1.45 करोड़ पात्र महिलाओं को इस योजना के तहत 3,000 रुपए मिलेंगे।
भाजपा जो वादा करती है उसे पूरा भी करती है 🪷
बंगाल में महिलाओं के लिए शुरू की गयी अन्नपूर्णा योजना।
ममता सरकार तो ट्रैफिक का हवाला देते हुए इसके खिलाफ कोर्ट तक चली गई थी कि ये नहीं हो सकता। लेकिन नई सरकार बनते ही जो अनुमति मिलने का काम सालों से अटका था, वह चंद दिनों में हल हो गया और फिर 15 मई को रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने पुष्टि की कि कोलकाता पुलिस की अनुमति समेत तमाम एनओसी (NOC) जारी कर दी गई हैं।
जूट मीलें दोबारा शुरू
इसी तरह टीएमसी शासन में तालाबंदी का शिकार हुई ऐतिहासिक जूट मिलों को दोबारा शुरू किया गया। सुनने में भले ये सामान्य लगे लेकिन श्रम विभाग की त्वरित कार्रवाई के चलते जो 14 जूट मिलें फिर से चालू हुई हैं उनसे हज़ारों मज़दूरों को अपने ही राज्य में रोजगार मिल सकेगा।
कानून व्यवस्था और डिटेक्ट-डिलीट-डिपोर्ट
इसके बाद शुभेंदु सरकार के आने के बाद सबसे बड़ा असर अगर देखें तो राज्य की कानून-व्यवस्था पर साफ दिखाई देता है। उपद्रवियों और सिंडिकेट राज पर नकेल कसने के लिए ‘पश्चिम बंगाल सार्वजनिक सुरक्षा और असामाजिक गतिविधि नियंत्रण विधेयक, 2026’ लागू किया गया।
‘डिटेक्ट, डिलीट, डिपोर्ट’ नीति का असर जगह-जगह दिखा। याद करिए सत्ता परिवर्तन होते ही बांग्लादेशी सीमाओं पर भारत छोड़ने वाले घुसपैठियों की लंबी कतारें देखी गईं थीं। टीएमसी के नेता जहाँ राज्य में किसी भी घुसपैठिए की होने की बात को नकारते थे, वहीं उस कतार में समान बटोरे लोग खुद स्वीकार कर रहे थे कि वो घुसपैठिए हैं…
बंगाल में 15 सालों से अटका काम 15 दिन में पूरा
जो काम ममता बनर्जी 15 सालों में नहीं कर पाईं, उसे सुवेंदु अधिकारी और भाजपा सरकार ने सिर्फ 15 दिनों में कर दिखाया है।
रेल विकास निगम लिमिटेड (RVNL) ने कोलकाता मेट्रो की ऑरेंज लाइन के तहत आने वाले और लंबे समय से लटके 'चिंगरीघाटा… pic.twitter.com/cc8emGW7xc
सालों से संरक्षण पा रहे अवैध घुसपैठियों के नेटवर्क पर जब शिकंजा कसा, तो सिंडिकेट चलाने वाले सहाबुद्दीन मंडल जैसे अपराधियों का पर्दाफाश हुआ, जो बांग्लादेश से भारत में घुसपैठ कराने में मुख्य रूप से शामिल था।
सड़कों पर किसी समुदाय की मनमानी नहीं बल्कि कानून का राज दिखना शुरू हुआ- लोग ये देखकर हैरान थे कि आखिर जिस रेड रोड पर नमाज़ के नाम पर घटों तक यातायात ठप कर दिया जाता था और जिसे पूर्व मुख्यमंत्री खुद बढ़ावा देती थीं, 2026 की ईद पर वही ‘रेड रोड’ कैसे पूरी तरह सुचारू नजर आया। वहाँ नमाज के नाम पर कोई शक्ति प्रदर्शन नहीं, कोई आम जनता के लिए असुविधा नहीं थी।
क्या पड़ा बंगाल पर असर
कट-मनी वसूलने वाले टीएमसी नेताओं से हिसाब माँगना हो, बंद पड़े स्कूलों को खुलवाना हो और मंदिरों को पुनर्जीवित करना हो, या फिर उद्योगों के लिए भयमुक्त माहौल बनाना हो… इन 100 दिनों में सबसे बड़ा बदलाव यह आया है कि बंगाल की जनता को अब बिना डरे सच बोलने का साहस मिल गया है। जो बदलाव कभी नामुमकिन कहे जाते थे, वे अब धरातल पर हकीकत बन चुके हैं।
ममता बनर्जी के 15 साल के राज में 12 गुना बढ़ाया गया था अल्पसंख्यक और मदरसों का बजट
अब शुभेंदु अधिकारी सरकार ने की 62% की कटौती; 5713 करोड़ रुपये से घटाकर 2165 करोड़ रुपये किया गया अल्पसंख्यक बजट
मुस्लिम तुष्टिकरण में कैसे बंगाल का खजाना लुटा रही थी ममता बनर्जी? समझा रहे हैं… pic.twitter.com/D8q0xbuhjH
मजहब देखकर वित्तीय सहायता देने का दौर पश्चिम बंगाल से अब जा चुका है और बंगाल के विकास की कहानी बेहतर इन्फ्रा, उच्च शिक्षा, स्वास्थ्य व्यवस्था, महिला कल्याण, युवाओं के लिए रोजगार देखकर तय होनी शुरू हो गई है।
12 अगस्त को देश के 14 राज्यों में पुलिस फोर्सेज एक साथ हरकत में आती हैं। अलग-अलग राज्यों में कार्रवाई होती है, 253 लोगों को हिरासत में लिया जाता है और 80 से ज्यादा FIR दर्ज होती हैं। इस पूरे ऑपरेशन की जानकारी 17 अगस्त को गृह मंत्री अमित शाह देते हैं और दावा करते हैं कि सुरक्षा एजेंसियों ने पाकिस्तान समर्थित ‘शहजाद भट्टी नेटवर्क’ को ध्वस्त कर दिया है।
इस कार्रवाई को सिर्फ 12 अगस्त की एक बड़ी पुलिस कार्रवाई मानना इस पूरी कहानी को छोटा करके देखना होगा। इस ऑपरेशन की तैयारी करीब डेढ़ साल से चल रही थी। जिस नेटवर्क पर शिकंजा कसा गया, उसकी जड़ें कितनी गहरी थीं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसकी कड़ियाँ कश्मीर की वादियों से लेकर मुंबई की उन गलियों तक जाती दिखाई देती हैं, जहाँ से कभी डी-कंपनी जैसी अंडरवर्ल्ड की ताकत का जन्म हुआ था। उत्तर प्रदेश के माफिया अतीक अहमद से लेकर आज सोशल मीडिया और एन्क्रिप्टेड ऐप्स की दुनिया तक इस कहानी के अलग-अलग किरदार सामने आते हैं।
शहजाद भट्टी पर बात करने से पहले यह समझना जरूरी है कि पाकिस्तान के उस आतंक के मॉडल की शुरुआत कहाँ से हुई, जिसने भारत के खिलाफ सीधी जंग के बजाय छद्म युद्ध को अपना हथियार बनाया।
जब पाकिस्तान ने सीधी जंग के बजाय छद्म युद्ध का रास्ता चुना
1947, 1965, 1971 और कारगिल के युद्धों में भारत से मिली शिकस्त के बाद पाकिस्तान की सेना और उसकी खुफिया एजेंसी ISI के सामने एक बात धीरे-धीरे साफ होती गई कि भारत को पारंपरिक युद्ध में हराना आसान नहीं है। इसके बाद भारत के खिलाफ छद्म युद्ध यानी Proxy War की रणनीति को आगे बढ़ाया गया।
पाकिस्तान के सैन्य प्रतिष्ठान ने भारत के भीतर अस्थिरता पैदा करने के लिए आतंकवाद, अलगाववाद और स्थानीय नेटवर्क का इस्तेमाल करना शुरू किया। इसी मॉडल का एक अहम हिस्सा थे- स्लीपर सेल।
जनरल जिया-उल-हक के शासन के दौर में पाकिस्तान की रणनीति और आक्रामक हुई। ‘Bleed India by a thousand cuts’ की सोच के तहत भारत को भीतर से कमजोर करने का मॉडल विकसित किया गया। इसी संदर्भ में K2 रणनीति का भी जिक्र आता है, जिसमें एक K कश्मीर और दूसरा खालिस्तान को दर्शाता था। बाद में ‘ऑपरेशन टुपैक’ के जरिए भारत में असंतोष और उग्रवाद को बढ़ावा देने की रणनीति को जमीन पर उतारने की कोशिश की गई।
पाकिस्तान ने सिर्फ सीमा पार से आतंकवादियों को भारत भेजने पर भरोसा नहीं किया। इसके साथ-साथ भारत के भीतर मौजूद युवाओं को प्रभावित करने, उन्हें कट्टरपंथ की तरफ ले जाने और जरूरत पड़ने पर उन्हें अपने नेटवर्क का हिस्सा बनाने की कोशिश भी की गई। यहीं से भारत में स्लीपर सेल के उस मॉडल को बढ़ावा मिला, जिसकी चुनौती आज भी सुरक्षा एजेंसियों के सामने बनी हुई है।
1993 मुंबई धमाके और डी-कंपनी का आतंकी नेटवर्क
भारत में स्लीपर सेल और स्थानीय आपराधिक नेटवर्क के आतंकवाद से जुड़ने का सबसे खौफनाक चेहरा 12 मार्च 1993 को सामने आया। मुंबई में सिलसिलेवार बम धमाकों ने पूरे देश को हिला दिया। इस हमले में 250 से ज्यादा लोगों की जान गई और सैकड़ों लोग घायल हुए।
इस पूरे मामले में पाकिस्तान की ISI और डी-कंपनी के बीच संबंधों की बात सामने आई। जाँच में यह आरोप सामने आया कि स्थानीय तस्करों और युवाओं को इस नेटवर्क में शामिल किया गया, कुछ लोगों को पाकिस्तान ले जाकर हथियार और विस्फोटकों की ट्रेनिंग दी गई और फिर उन्हें भारत में हमले के लिए तैयार किया गया।
इस घटना ने सुरक्षा एजेंसियों को एक बेहद अहम सबक दिया। खतरा हमेशा सीमा पार से आने वाले किसी आतंकवादी के रूप में दिखाई नहीं देगा। कई बार आतंकवाद के लिए जरूरी लोगों, संसाधनों, हथियारों और लॉजिस्टिक्स का नेटवर्क भारत के भीतर ही तैयार किया जा सकता है। यहीं से ‘स्लीपर सेल’ को समझना जरूरी हो जाता है।
आखिर स्लीपर सेल होता क्या है?
आसान भाषा में समझें तो स्लीपर सेल आतंकियों का ऐसा छिपा हुआ नेटवर्क है, जिसमें शामिल लोग हमेशा हथियार लेकर या किसी आतंकी संगठन के सदस्य के तौर पर सामने नहीं आते। वे आम लोगों की तरह सामान्य जीवन जीते रहते हैं और किसी खास समय या निर्देश का इंतजार करते हैं।
जरूरी नहीं कि स्लीपर सेल में शामिल व्यक्ति खुद किसी हमले को अंजाम दे। उसका काम किसी आतंकी संगठन के लिए ठिकाना उपलब्ध कराना, हथियार या पैसा पहुंचाना, किसी जगह की रेकी करना, नए लोगों को नेटवर्क से जोड़ना या हमलावरों तक जरूरी जानकारी पहुंचाना भी हो सकता है।
सबसे खतरनाक बात यह है कि कई बार नेटवर्क में शामिल किसी व्यक्ति को पूरे नेटवर्क की जानकारी तक नहीं होती। उसे सिर्फ उतना ही काम बताया जाता है, जितना उसके लिए जरूरी है।
यही वजह है कि ऐसे नेटवर्क को पकड़ना सुरक्षा एजेंसियों के लिए बेहद मुश्किल होता है। सीमा पार बैठा हैंडलर खुद भारत में मौजूद नहीं होता। वह भारत में मौजूद छोटे-छोटे स्थानीय संपर्कों के जरिए अपना काम करवाता है। एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति से जुड़ता है, दूसरा तीसरे से और इस तरह एक ऐसा नेटवर्क तैयार होता है जिसकी पूरी तस्वीर जांच एजेंसियों को लंबे समय तक दिखाई नहीं देती।
आतंकवाद की जाँच का सवाल बदला
भारत में जब-जब बड़े आतंकी हमले हुए, जाँच एजेंसियों के सामने सिर्फ यह सवाल नहीं रहा कि आतंकवादी भारत में आया कहाँ से। सवाल धीरे-धीरे बदल गया।
वह भारत पहुँचने के बाद किससे मिला? किसने उसे रास्ता बताया? किसने उसे रहने की जगह दी? पैसा किसने पहुँचाया? हथियार किसने उपलब्ध कराए? किसने रेकी की? और अगर हमलावर वापस चला गया तो उसके पीछे भारत में कौन बचा रह गया? यही वह सोच थी जिसने स्लीपर सेल की जाँच को आतंकवाद विरोधी कार्रवाई का अहम हिस्सा बना दिया।
समय के साथ सुरक्षा एजेंसियों को यह भी समझ आने लगा कि आतंकवाद और स्थानीय अपराध की दुनिया हमेशा एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। जहाँ अपराधियों के पास पैसा, हथियार, स्थानीय संपर्क और लॉजिस्टिक्स होते हैं, वहीं आतंकवादी नेटवर्क को भी इन्हीं चीजों की जरूरत होती है। इसी बिंदु पर आतंकवाद और अंडरवर्ल्ड के रास्ते एक-दूसरे से जुड़ने लगते हैं।
अतीक अहमद तक पहुँची स्लीपर सेल की कहानी
स्लीपर सेल की इस लंबी कहानी की एक कड़ी उत्तर प्रदेश के माफिया अतीक अहमद से भी जुड़ती है। अतीक अहमद पर 100 से ज्यादा आपराधिक मामले दर्ज थे। 2005 में बसपा विधायक राजू पाल की हत्या के मामले में उसे बाद में उम्रकैद की सजा भी सुनाई गई। फरवरी 2023 में गवाह उमेश पाल और दो पुलिसकर्मियों की हत्या के बाद उसका नाम एक बार फिर देशभर में चर्चा में आया।
उमेश पाल हत्याकांड के बाद हुई पूछताछ और सामने आए दस्तावेजों में अतीक अहमद के पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI और लश्कर-ए-तैयबा से संपर्क के दावे सामने आए। उसके रिमांड दस्तावेज में हथियारों की उस सप्लाई चेन का भी जिक्र था, जिसमें पाकिस्तान से ड्रोन के जरिए पंजाब में हथियार गिराए जाने की बात कही गई थी।
इन हथियारों को स्थानीय नेटवर्क के जरिए इकट्ठा किया जाता और फिर अलग-अलग आपराधिक तथा आतंकी नेटवर्क तक पहुंचाया जाता था। आरोपों के मुताबिक कुछ हथियार पैसे के बदले अतीक के नेटवर्क तक भी पहुंचे।
अतीक अहमद की मौत के साथ उसका अध्याय जरूर बंद हो गया, लेकिन जिस गठजोड़ की तस्वीर उसकी पूछताछ और जांच में सामने आई थी, वह खत्म नहीं हुआ। अगले कुछ वर्षों में यही गठजोड़ एक नए और ज्यादा डिजिटल रूप में दिखाई देने लगा। और इस नई कड़ी के केंद्र में एक नाम बार-बार सामने आया- शहजाद भट्टी।
कौन है शहजाद भट्टी और कैसे तैयार हुआ उसका नेटवर्क?
शहजाद भट्टी पाकिस्तान का सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और गैंगस्टर बताया जाता है। आरोप है कि उसने इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल युवाओं तक पहुंच बनाने, उन्हें प्रभावित करने और सीमा पार से आपराधिक तथा आतंकी गतिविधियों के लिए नेटवर्क तैयार करने में किया।
यानी जिस आतंक का पुराना मॉडल हथियारों, तस्करी और आमने-सामने के संपर्क पर टिका था, उसमें अब सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की एक नई परत जुड़ गई थी।
भट्टी पर आरोप है कि उसने भारत में दहशत फैलाने के लिए TTH नाम का एक नया मुखौटा संगठन खड़ा किया। इसका इस्तेमाल कथित तौर पर नार्को-टेररिज्म और हिंसक गतिविधियों को आगे बढ़ाने के लिए किया गया। उसका तरीका भी इसी नए मॉडल को दिखाता है।
शुरुआत में युवाओं को छोटे-छोटे काम दिए जाते। कुछ मामलों में 5,000 से 10,000 रुपये तक देकर सार्वजनिक जगहों की रेकी कराने या पोस्टर लगाने जैसे काम करवाए जाते। धीरे-धीरे यही संपर्क बड़े कामों में बदले जाते और आरोप है कि बाद में कुछ युवाओं को हथियार उपलब्ध कराकर टारगेट किलिंग और ग्रेनेड हमलों जैसी गतिविधियों में धकेला गया।
यानी पहले भरोसा और पैसा, फिर छोटा अपराध और उसके बाद धीरे-धीरे आतंक की दुनिया में प्रवेश।
जालंधर से सिरसा और अंबाला तक धमाकों की कड़ियाँ
शहजाद भट्टी नेटवर्क पर आरोपों की गंभीरता का अंदाजा उन मामलों से लगाया जा सकता है, जिनमें उसका नाम जाँच के दौरान सामने आया। मार्च 2025 में पंजाब के जालंधर में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर रोजर संधू के घर पर ग्रेनेड हमला हुआ। अप्रैल 2026 में एनआईए ने इस मामले में शहजाद भट्टी को फरार आरोपित के रूप में चार्जशीट किया।
इसके बाद हरियाणा के सिरसा महिला पुलिस थाने में नवंबर 2025 में हुए विस्फोट और अंबाला के बलदेव नगर पुलिस स्टेशन में जनवरी 2026 में हुए धमाके की साजिश में भी भट्टी का नाम सामने आया।
सिरसा मामले में मई 2026 में एनआईए ने शहजाद भट्टी समेत 9 आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। इसमें पाकिस्तान स्थित हैंडलर सोहेल अहमद उर्फ सोहेल बलोच का नाम भी शामिल था। आरोप सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं रहे। हिमाचल प्रदेश के नालागढ़ में बब्बर खालसा से जुड़े लोगों के साथ मिलकर ग्रेनेड हमले की साजिश रचने के आरोप भी भट्टी नेटवर्क से जुड़े।
इन घटनाओं को अलग-अलग देखने के बजाय एक साथ देखा जाए तो तस्वीर ज्यादा साफ होती है। एक ऐसा नेटवर्क सामने आता है जिसमें पाकिस्तान में बैठे हैंडलर, सोशल मीडिया संपर्क, स्थानीय अपराधी, छोटे स्तर पर काम करने वाले युवा और हथियारों की सप्लाई सब एक-दूसरे से जुड़ते दिखाई देते हैं।
12 अगस्त की कार्रवाई ने खोली नेटवर्क की परतें
ऐसे नेटवर्क पर शिकंजा कसने की तैयारी लंबे समय से चल रही थी और स्वतंत्रता दिवस से ठीक पहले 12 अगस्त को सुरक्षा एजेंसियों ने एक साथ बड़ी कार्रवाई की।
उत्तर प्रदेश में 62, हरियाणा में 52, दिल्ली में 51, पंजाब में 44 और राजस्थान में 15 संदिग्धों को हिरासत में लिया गया। कुल मिलाकर 14 राज्यों में 253 लोगों को हिरासत में लिए जाने की बात सामने आई। कार्रवाई सिर्फ गिरफ्तारी या हिरासत तक सीमित नहीं थी। जाँच के दौरान जो सामान बरामद हुआ, उसने सुरक्षा एजेंसियों के सामने मौजूद खतरे की गंभीरता को और स्पष्ट किया।
पुलिस और जाँच एजेंसियों को पाकिस्तानी हथियार फैक्ट्री की मुहर वाले ग्रेनेड, IED यानी इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस, पिस्तौल और बड़ी संख्या में जिंदा कारतूस बरामद होने की जानकारी दी गई। इसके अलावा ऐसे हाई-टेक CCTV कैमरे भी बरामद किए गए, जिनका इस्तेमाल कथित तौर पर पुलिस और सुरक्षा प्रतिष्ठानों पर नजर रखने के लिए किया जा रहा था।
यानी नेटवर्क की तैयारी सिर्फ हमला करने तक सीमित नहीं थी। निगरानी, रेकी, हथियार, विस्फोटक और स्थानीय संपर्क हर स्तर पर एक व्यवस्था तैयार किए जाने के संकेत मिले। इस कार्रवाई के बाद UAPA, आर्म्स एक्ट और NDPS एक्ट के तहत 80 से ज्यादा एफआईआर दर्ज की गईं। लेकिन सवाल अब भी बाकी है।
शहजाद भट्टी नेटवर्क खत्म भी तो स्लीपर सेल का क्या?
किसी एक नेटवर्क पर कार्रवाई हो जाना और उस मॉडल का पूरी तरह खत्म हो जाना दो अलग-अलग बातें हैं। जाँच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि ऐसे नेटवर्क में एक व्यक्ति के पकड़े जाने के बाद दूसरा व्यक्ति उसकी जगह ले सकता है। सोशल मीडिया पर एक अकाउंट बंद होने के बाद दूसरा अकाउंट बनाया जा सकता है। एक स्थानीय संपर्क के पकड़े जाने के बाद दूसरा संपर्क तैयार किया जा सकता है।
यही कारण है कि स्लीपर सेल के खिलाफ लड़ाई सिर्फ किसी एक संगठन या व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में जाँच एजेंसियों को आतंकवाद और गैंगस्टर नेटवर्क के बीच बढ़ते गठजोड़ के संकेत भी मिले हैं। 2024 में एनआईए ने अर्श डल्ला और दूसरे आरोपितों से जुड़े टेरर-गैंगस्टर नेक्सस मामले में चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में 30 ठिकानों पर छापेमारी की थी।
इसका मतलब साफ है कि आतंकी नेटवर्क के लिए अपराध की दुनिया अब हमेशा अलग दुनिया नहीं रह गई है। कई मामलों में दोनों के रास्ते एक-दूसरे से जुड़ रहे हैं।
गैंगस्टर नेटवर्क स्थानीय संपर्क और पैसा दे सकता है। आतंकी नेटवर्क हथियार और सीमा पार से हैंडलिंग उपलब्ध करा सकता है। सोशल मीडिया नए लोगों तक पहुंच बनाने का रास्ता दे सकता है और ड्रग्स का नेटवर्क पैसे का इंतजाम कर सकता है। यानी आतंक का मॉडल अब सिर्फ बंदूक और बम तक सीमित नहीं रह गया है।
अब आतंक की भर्ती मोबाइल स्क्रीन से भी हो सकती है
इस बदलते मॉडल का एक और उदाहरण दिल्ली से जुड़े आतंकी मामले में सामने आया, जहाँ उमर नाम के आरोपित पर सोशल मीडिया के जरिए लोगों से संपर्क बनाने और उन्हें जैश-ए-मोहम्मद की विचारधारा से प्रभावित करने का आरोप लगा। जांच में उसके जरिए एक बड़े स्लीपर सेल नेटवर्क को तैयार करने की कोशिश की बात सामने आई।
यही बदलाव सबसे ज्यादा चिंता पैदा करता है। एक समय था जब आतंकवादी नेटवर्क में शामिल होने के लिए किसी व्यक्ति को सीमा पार जाना पड़ता था, किसी संपर्क के जरिए किसी संगठन तक पहुंचना पड़ता था या किसी स्थानीय मॉड्यूल से मिलना पड़ता था। अब मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और एन्क्रिप्टेड ऐप्स उस दूरी को कम कर सकते हैं।
यानी जो खतरा कभी सरहद के उस पार दिखाई देता था, वह अब आपके शहर, आपकी गली और यहां तक कि आपके मोबाइल की स्क्रीन तक पहुँच सकता है। शहजाद भट्टी की कहानी को सिर्फ एक पाकिस्तानी गैंगस्टर की कहानी समझना भी सही नहीं होगा। यह उस बदलते आतंकी मॉडल की कहानी है, जिसमें कई अलग-अलग दुनिया एक-दूसरे से जुड़ रही हैं।
आतंकवाद, हथियार, ड्रग्स, गैंगस्टर नेटवर्क, पैसा, सोशल मीडिया और सीमा पार बैठे हैंडलर जब ये सभी एक ही सिस्टम का हिस्सा बनने लगते हैं तो खतरा सिर्फ किसी एक आतंकी हमले का नहीं रह जाता। यह खतरा देश की सामान्य कानून-व्यवस्था तक पहुँच जाता है।
यही वजह है कि स्लीपर सेल को पकड़ना अब सिर्फ आतंकवाद रोकने की लड़ाई नहीं है। यह उस पूरे नेटवर्क को तोड़ने की लड़ाई है जो अपराध और आतंक के बीच की दूरी को लगातार कम कर रहा है।
शहजाद भट्टी की कहानी इसी बदलते मॉडल की कहानी है। एक ऐसा मॉडल जिसमें अंडरवर्ल्ड की पुरानी लॉजिस्टिक्स, आतंकवाद की सीमा पार फंडिंग, ड्रग्स का पैसा और सोशल मीडिया की नई दुनिया एक-दूसरे से जुड़कर एक नया नेटवर्क तैयार कर रहे हैं। और शायद इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सबक यही है कि आतंक हमेशा बम या ग्रेनेड लेकर नहीं आता। कभी-कभी वह पहले सिर्फ एक फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्वतंत्रता दिवस के भाषण में इस्तेमाल किए गए शब्द ‘दिमागी नक्सल’ से वामपंथी और कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम बिलबिलाया हुआ है। हाल में इसी टिप्पणी को लेकर पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री और वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता पी चिदंबरम ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर खुद को गर्व से ‘दिमागी नक्सल’ घोषित किया। उन्होंने लिखा कि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ होने पर गर्व है।
पीएम मोदी ने अपने संबोधन में ‘दिमागी नक्सल’ और जंगल में बंदूकें थामे ‘सशस्त्र नक्सलियों’ के बीच का फर्क साफ किया था। उन्होंने बताया कि जहाँ हथियारबंद नक्सली छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में हिंसा और खूनी खेल खेलते हैं, वहीं ये ‘दिमागी नक्सल’ सत्ता के गलियारों, वातानुकूलित कमरों और शैक्षणिक संस्थानों में बैठकर उसी जनसंहारी विचारधारा को खाद-पानी देते हैं।
इनका मुख्य मकसद भारत की संप्रभुता को चोट पहुँचाना और लोकतांत्रिक व्यवस्था को ध्वस्त करना है। पीएम मोदी ने देश को इन छद्म-बुद्धिजीवियों से सतर्क रहने की चेतावनी दी, जो युवाओं के मन में जहर घोलकर उन्हें काल्पनिक ‘क्रांति’ का मोहरा बनाते हैं।
हालाँकि, देश के पूर्व गृह मंत्री का खुलकर देशद्रोही और हिंसक नक्सली विचारधारा के पक्ष में खड़े होना बेहद शर्मनाक है, लेकिन कॉन्ग्रेस के इतिहास को देखते हुए इसमें कोई हैरानी नहीं होती।
चिदंबरम की यह स्वीकारोक्ति कोई नई बात नहीं है। साल 2010 में, जब वे देश के गृह मंत्री थे, तब उन्होंने जेएनयू (JNU) के मंच से सरेआम देश विरोधी ताकतों के आगे घुटने टेकने की पेशकश की थी। उन्होंने कहा था कि सरकार नक्सलियों से बिना उनके हथियार डाले भी बातचीत करने को तैयार है। उनका तर्क था कि चूँकि नक्सली ‘सशस्त्र संघर्ष’ में भरोसा रखते हैं, इसलिए सरकार उनसे हथियार छोड़ने को नहीं कहेगी।
चौंकाने वाली बात यह है कि चिदंबरम ने यह बयान दंतेवाड़ा में हुए उस बर्बर माओवादी हमले के ठीक एक महीने बाद दिया था, जिसमें 76 सीआरपीएफ (CRPF) जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे। देश के वीर जवानों की शहादत पर मरहम लगाने के बजाय, कॉन्ग्रेसी गृह मंत्री नक्सलियों को पुचकार रहे थे और जेएनयू के वामपंथी गढ़ में इस बयान पर खूब तालियाँ पीटी गई थीं।
चिदंबरम के कार्यकाल में नक्सलवाद अपने चरम पर था, लेकिन कॉन्ग्रेस सरकार ने न केवल इस खतरे को अनदेखा किया, बल्कि तुष्टिकरण की नीति अपनाकर देश को आग में झोंकने का काम किया। चिदंबरम का नक्सली हमदर्दी का यह पुराना ट्रैक रिकॉर्ड और उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा विरोधी सोच उनके ‘दिमागी नक्सल’ होने के दावे की पूरी तरह पुष्टि करती है।
एक तरफ जहाँ उनका दिल खूनी माओवादियों के लिए पसीजता रहा है, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने और उनकी पार्टी ने सनातन और पूरे हिंदू समाज को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कॉन्ग्रेस के वोटबैंक तुष्टिकरण का सबसे घिनौना चेहरा तब सामने आया जब चिदंबरम, सुशील कुमार शिंदे और दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं ने ‘हिंदू आतंकवाद’ और ‘भगवा आतंकवाद’ जैसी काल्पनिक अवधारणाएँ गढ़ीं।
2008 के मालेगाँव बम विस्फोट मामले में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और सेवारत सैन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित को झूठे मामलों में फँसाकर जेलों में सड़ने के लिए छोड़ दिया गया, ताकि ‘हिंदू आतंक’ का झूठा नैरेटिव खड़ा किया जा सके। हालाँकि, 17 साल की लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद अदालत में कॉन्ग्रेस का यह सफेद झूठ पूरी तरह बेनकाब हो गया और पूरा मामला औंधे मुंह गिर पड़ा।
इतना ही नहीं, चिदंबरम की भारत विरोधी और विकास विरोधी मानसिकता उनके हर फैसले में साफ झलकती है। जब मोदी सरकार ने भ्रष्टाचार और काले धन पर नकेल कसने के लिए डिजिटल पेमेंट और नोटबंदी जैसी क्रांतिकारी नीतियाँ लागू कीं, तो चिदंबरम ने इसका कड़ा विरोध किया और इसे ‘घोटाला’ तक बता डाला। जबकि विभिन्न अध्ययनों और रिपोर्टों ने यह साबित किया कि कैश-आधारित फंडिंग बंद होने से आतंकवाद और नक्सलवाद की रीढ़ की हड्डी टूट गई।
चिदंबरम का भारत की रक्षा तैयारियों और सैन्य मजबूती से भी पुराना बैर रहा है। 1998 में जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने पोखरण-द्वितीय परीक्षण करके भारत को परमाणु शक्ति संपन्न बनाया, तब संसद में चिदंबरम ने इसका पुरजोर विरोध किया था।
उनका बचकाना तर्क था कि भारत को परमाणु हथियार बनाने के बजाय अपनी खोखली ‘नैतिक श्रेष्ठता’ बनाए रखनी चाहिए। भारत के आक्रामक और हिंसक पड़ोसियों को दरकिनार कर देश की सुरक्षा को दांव पर लगाने का तर्क देना यह साबित करता है कि चिदंबरम का दिमाग हमेशा से भारत विरोधी और ‘दिमागी नक्सलवादी’ सोच से ही संचालित होता रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 80वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए विकसित भारत के निर्माण के लिए ‘शक्ति की सप्तधारा’ का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि देश अब ‘रिफॉर्म एक्सप्रेस’ पर चल पड़ा है और आने वाले दिनों में ‘नेक्स्ट लेवल रिफॉर्म’ की ओर बढ़ना है। इसके लिए सरकार ही नहीं, बल्कि समाज, उद्योग, उत्पादक और किसान हर किसी को अपनी पारंपरिक व्यवस्थाओं और सोच में बदलाव करना होगा। प्रधानमंत्री ने अगले 5-7 वर्षों में ऐसी उपलब्धियाँ हासिल करने का लक्ष्य रखा है, जो पिछले 5-7 दशकों में नहीं हो सकी थीं।
पीएम मोदी ने इसके लिए देश की सात ऐसी शक्तियों को सामने रखा, जिनके सहारे भारत को नई गति और नई ऊँचाई देने की बात कही। ये सात धाराएँ हैं- मैन्युफैक्चरिंग पावर, कृषि और फूड प्रोडक्शन, टेक्नोलॉजी और इनोवेशन, गतिशक्ति, रक्षा शक्ति, ग्रीन और ब्लू इकॉनमी और भारत की सॉफ्ट पावर।
मैन्युफैक्चरिंग पावर
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत को मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बहुत आगे बढ़ाना होगा। केवल उत्पादन बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि छोटे-छोटे पुर्जों से लेकर बड़े-बड़े प्रोडक्ट तक बनाने होंगे। डिजाइन से लेकर मैन्युफैक्चरिंग तक पूरी वैल्यू चेन भारत में होनी चाहिए और भारत को ग्लोबल सप्लाई चेन का भरोसेमंद केंद्र बनना होगा।
उन्होंने मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में तीन बातों ‘कॉस्ट, क्वालिटी और स्केल’ पर विशेष जोर दिया। भारतीय फैक्ट्रियाँ कॉम्पिटिटिव हों, प्रोडक्ट्स यूजर फ्रेंडली हों और पैकेजिंग दुनिया के लोगों को आकर्षित करने वाली हो। प्रधानमंत्री ने ‘जीरो डिफेक्ट’ और ‘प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग’ को भारत की पहचान बनाने की बात कही।
उन्होंने मैन्युफैक्चरर्स, एंटरप्रेन्योर्स और एमएसएमई से कहा कि ग्लोबल मार्केट में भारत की पहचान विश्वसनीयता और गुणवत्ता के आधार पर होनी चाहिए। इसके लिए क्वालिटी से कोई समझौता नहीं होना चाहिए और हमारा मंत्र होना चाहिए- ‘क्वालिटी, क्वालिटी, क्वालिटी।’ यही भारत की ग्लोबल ब्रांड वैल्यू बनेगी।
कृषि और फूड प्रोडक्शन
PM मोदी ने ‘शक्ति की सप्तधारा’ की दूसरी शक्ति कृषि और फूड प्रोडक्शन को बताया। उन्होंने फूड प्रोसेसिंग को बढ़ाने पर जोर दिया और कहा कि अब दुनिया के बाजार भारतीय किसानों के लिए खुले हैं। एफपीए के कारण बड़ा बाजार मिल रहा है और भारत को वहाँ पहुँचने का प्रयास करना होगा।
प्रधानमंत्री ने खेत से एक्सपोर्ट मार्केट तक जाने की बात कही। उन्होंने कहा कि भारत के पारंपरिक खानपान, मिलेट्स, मसाले, फल और फूल जैसे उत्पादों में वैश्विक ब्रांड बनने की क्षमता है। किसानों को केमिकल फ्री खेती को बल देने की बात कहते हुए उन्होंने कहा कि दुनिया में इसकी माँग और बढ़ने वाली है।
PM मोदी ने कहा कि जब भारत के एग्रो प्रोडक्ट जब ग्लोबल पैरामीटर्स पर खरे उतरेंगे, तो उन्हें दुनिया के बाजारों तक आसानी से पहुँचाया जा सकेगा।
टेक्नोलॉजी और इनोवेशन
तीसरी शक्ति है टेक्नोलॉजी और इनोवेशन। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि आज का समय एआई, क्वांटम, स्पेस, रोबोटिक्स और डेटा सेंटर का है। इमर्जिंग टेक्नोलॉजी लगातार नई चुनौतियाँ दे रही है और एक नया क्षेत्र खुल चुका है।
उन्होंने साफ कहा कि भारत को दुनिया के लिए केवल एक बाजार नहीं बनना है बल्कि इनोवेशन का हब बनना है। यूपीआई और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर का उदाहरण देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत ने अपनी ताकत दुनिया को दिखा दी है।
अब डिजिटल पब्लिक टेक्नोलॉजी को दुनिया के कोने-कोने तक पहुँचाने और नेक्स्ट जनरेशन कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी में भारत को लीड करने का लक्ष्य रखना होगा। प्रधानमंत्री ने ‘मेड इन इंडिया 6G’ को हर कोने तक पहुँचाने की दिशा में तेजी से काम करने की बात कही।
गतिशक्ति
सप्तधारा की चौथी शक्ति है- गतिशक्ति। प्रधानमंत्री ने देश के भीतर सीमलेस और फास्ट कनेक्टिविटी पर जोर दिया। शहरों को हाई स्पीड रेल से जोड़ने, मॉडर्न हाईवे बनाने, इनलैंड वाटर बेस और एयरपोर्ट विकसित करने तथा मल्टीमोडल लॉजिस्टिक की व्यवस्था खड़ी करने की बात उन्होंने कही है।
उन्होंने कहा कि भारत के पोर्ट्स केवल सामान उतारने और चढ़ाने की जगह नहीं होने चाहिए। पोर्ट्स को ‘पोर्ट लेड डेवलपमेंट’ और ग्रोथ की दिशा में आगे बढ़ाना होगा।
रक्षा शक्ति
पाँचवीं शक्ति है- रक्षा शक्ति। PM मोदी ने कहा कि रक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होना अब भारत ने भी अनुभव कर लिया है और दुनिया ने भी इसका महत्व समझ लिया है। जब दुनिया अपनी-अपनी सोच रही है, तब भारत केवल दुनिया के लिए बाजार बनकर नहीं रह सकता।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत को रक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना होगा और नेक्स्ट जनरेशन डिफेंस टेक्नोलॉजी विकसित करके ग्लोबल सप्लायर बनने की दिशा में आगे बढ़ना होगा।
प्रधानमंत्री ने ड्रोन और काउंटर-ड्रोन सिस्टम विकसित करने तथा हाइपरसोनिक डिफेंस टेक्नोलॉजी में नेतृत्व लेने की बात कही। उन्होंने साइबर सुरक्षा को भी रक्षा का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बताया और कहा कि इसमें देश के युवाओं की क्षमता का उपयोग भारत और दुनिया के लिए किया जा सकता है।
ग्रीन और ब्लू इकॉनमी
छठी शक्ति है ग्रीन इकॉनमी और ब्लू इकॉनमी, जो ग्रीन जॉब्स को भी जन्म देती है। प्रधानमंत्री ने ग्रीन हाइड्रोजन, रिन्यूएबल एनर्जी, एनर्जी स्टोरेज, ग्रीन मोबिलिटी और ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग को ग्लोबल स्केल पर आगे बढ़ाने की बात कही।
उन्होंने कहा कि जब दुनिया ग्लोबल वार्मिंग की चर्चा कर रही है, तब भारत समस्याओं का समाधान खोजने का प्रयास कर रहा है। भारत के पास एक बड़े ग्रीन मूवमेंट की ताकत है।
इसके साथ ही भारत के पास ब्लू इकॉनमी के लिए भी बड़ा अवसर है। लंबी कोस्टलाइन, फिशरीज, कोस्टल टूरिज्म और ओशन टेक्नोलॉजी जैसे कई क्षेत्रों में भारत आगे बढ़ सकता है।
भारत की सॉफ्ट पावर
सप्तधारा की सातवीं शक्ति है- भारत की सॉफ्ट पावर। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत की सॉफ्ट पावर की अपनी एक बड़ी ताकत है। योग ने पूरी दुनिया को भारत के साथ जोड़ा है और दुनिया के लिए ऊर्जा तथा भारत के लिए विश्वास का कारण बनता जा रहा है।
भारत के पास आस्था के केंद्र, आयुर्वेद और होलिस्टिक हेल्थ केयर की व्यवस्था है। प्रधानमंत्री ने ‘हील इन इंडिया’ के माध्यम से भी भारत के सामर्थ्य को दुनिया तक ले जाने की बात कही।
इसके साथ ही हैंडीक्राफ्ट, संस्कृति, फिल्में, क्रिएटिव वर्ल्ड, वीएफएक्स, एनिमेशन, गेमिंग और डिजिटल कंटेंट में भारत के लिए बड़ी संभावनाएँ हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि क्रिएटिव वर्ल्ड में भारत अपना रुतबा दिखा सकता है और इसे वैश्विक सामर्थ्य के रूप में विकसित करना होगा।
उन्होंने वर्ल्ड ऑडियो विजुअल एंड एंटरटेनमेंट समिट यानी वेव समिट को भी भारत की क्रिएटिव ताकत से जोड़ते हुए कहा कि दुनिया धीरे-धीरे इसकी राह देख रही है।
भारत की विशाल वन्य संपदा और 100 से अधिक नेशनल पार्कों का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने में भारत अभी पीछे है। सॉफ्ट पावर के माध्यम से दुनिया के पर्यटकों को भारत की ओर आकर्षित करने का अवसर है।
स्पोर्ट्स और कॉन्सर्ट इकॉनमी में भी भारत के लिए बड़ी संभावनाएँ हैं। दुनिया का हर कलाकार कभी न कभी भारत की धरती पर अपना कॉन्सर्ट करना चाहता है। प्रधानमंत्री ने कहा कि इस अवसर को मोबिलाइज करने के लिए व्यवस्थाएँ खड़ी करनी होंगी।
इन सात शक्तियों से क्या बदलेगा?
‘शक्ति की सप्तधारा’ को अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पूरी बात के संदर्भ में समझें तो इसका मतलब सिर्फ सात क्षेत्रों में अलग-अलग काम करना नहीं है। असल विचार देश की अलग-अलग ताकतों को एक साथ जोड़कर विकास की ऐसी रफ्तार तैयार करना है, जिसमें किसान, उद्योग, युवा, तकनीक, रोजगार, सुरक्षा, पर्यावरण और भारत की वैश्विक पहचान सब एक-दूसरे से जुड़े हों।
प्रधानमंत्री ने जिस ‘होलिस्टिक अप्रोच’ की बात की, उसका मतलब यही है कि देश की प्रगति को अलग-अलग खाँचों में नहीं देखा जाए। एक क्षेत्र में आगे बढ़ने का फायदा दूसरे क्षेत्र को भी मिले और सभी शक्तियाँ मिलकर भारत को नई गति दें।
इसका सबसे बड़ा बदलाव यह होगा कि भारत केवल दुनिया का एक बड़ा बाजार बनकर नहीं रहेगा। प्रधानमंत्री की बात में बार-बार यह जोर दिखाई देता है कि भारत को दुनिया के लिए उत्पादन करना है, अपनी पूरी वैल्यू चेन तैयार करनी है, नई तकनीक विकसित करनी है और अपने उत्पादों को वैश्विक स्तर की गुणवत्ता के साथ दुनिया तक पहुँचाना है।
इसे आसान भाषा में समझें तो भारत में चीजें केवल असेंबल न हों बल्कि उनके छोटे-छोटे पुर्जों से लेकर डिजाइन और अंतिम उत्पाद तक की पूरी व्यवस्था भारत में तैयार हो। इससे भारतीय उद्योग की क्षमता बढ़ेगी और वैश्विक सप्लाई चेन में भारत को एक भरोसेमंद केंद्र के रूप में स्थापित करने की कोशिश होगी।
इसी का सीधा संबंध किसानों से भी जुड़ता है। अगर भारत उत्पादन करता है, फूड प्रोसेसिंग बढ़ाता है और बेहतर पैकेजिंग के साथ अपने उत्पादों को दुनिया तक पहुँचाता है तो खेत और वैश्विक बाजार के बीच की दूरी कम होगी।
भारत के मिलेट्स, मसाले, फल, फूल और पारंपरिक खानपान केवल स्थानीय उत्पाद नहीं रहेंगे बल्कि दुनिया के बाजार में भारतीय पहचान के साथ पहुँच सकते हैं। इसके लिए गुणवत्ता और वैश्विक मानकों पर खरा उतरना जरूरी होगा। यानी खेती को केवल उत्पादन से जोड़कर नहीं, बल्कि प्रोसेसिंग और एक्सपोर्ट से जोड़कर देखने की दिशा बनती है।
दूसरी तरफ, तकनीक इस पूरी व्यवस्था को गति देने वाली ताकत बन सकती है। AI, क्वांटम, रोबोटिक्स, स्पेस, डेटा सेंटर और नई कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में भारत अगर सिर्फ तकनीक का उपभोक्ता बनने के बजाय उसे विकसित करने और दुनिया तक पहुँचाने की क्षमता हासिल करता है, तो इसका असर उद्योग, शिक्षा, रक्षा, संचार और रोजगार हर क्षेत्र पर पड़ेगा।
UPI और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर का उदाहरण देकर प्रधानमंत्री ने यही दिखाया कि भारत ऐसी तकनीक बना सकता है जिसे दुनिया अपना सकती है। अब इसी क्षमता को अगली पीढ़ी की तकनीकों में ले जाने की बात है।
इसके साथ मजबूत कनेक्टिविटी जरूरी है। देश में हाई स्पीड रेल, आधुनिक हाईवे, एयरपोर्ट, इनलैंड वाटर और मल्टीमोडल लॉजिस्टिक्स की व्यवस्था मजबूत होगी तो उत्पादन को बाजार तक पहुँचाना आसान होगा।
उद्योगों की लागत कम हो सकती है, सामान तेजी से एक जगह से दूसरी जगह पहुँच सकता है और देश के अलग-अलग हिस्से बेहतर तरीके से आपस में जुड़ सकते हैं। पोर्ट्स को केवल माल चढ़ाने-उतारने की जगह न मानकर उनके आसपास विकास की नई गतिविधियाँ खड़ी करने की बात भी इसी सोच का हिस्सा है।
इस पूरी आर्थिक ताकत के साथ सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है। इसलिए रक्षा में आत्मनिर्भरता को भी इसी बड़ी तस्वीर में रखा गया है। भारत अगर ड्रोन, काउंटर-ड्रोन, हाइपरसोनिक डिफेंस और साइबर सुरक्षा जैसी अगली पीढ़ी की तकनीक खुद विकसित करता है तो इससे केवल देश की सुरक्षा मजबूत नहीं होगी बल्कि भारत के लिए दुनिया को रक्षा तकनीक और उपकरण देने का अवसर भी पैदा होगा। यानी आत्मनिर्भरता का लक्ष्य केवल अपनी जरूरत पूरी करना नहीं, बल्कि भारत को ग्लोबल सप्लायर बनाने तक ले जाना है।
इसी तरह विकास की इस पूरी प्रक्रिया में ऊर्जा और पर्यावरण को पीछे नहीं छोड़ा जाना है। ग्रीन हाइड्रोजन, रिन्यूएबल एनर्जी, एनर्जी स्टोरेज, ग्रीन मोबिलिटी और ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों को आगे बढ़ाने का मतलब भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए अभी से तैयारी करना है। इसके साथ भारत की समुद्री सीमा और समुद्र से जुड़े संसाधनों को ब्लू इकॉनमी के रूप में देखने की बात है। फिशरीज, कोस्टल टूरिज्म और ओशन टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्र आर्थिक गतिविधियों के नए रास्ते खोल सकते हैं।
और फिर आती है भारत की वह ताकत जो केवल फैक्ट्री, मशीन या तकनीक से नहीं बनती और वो है… भारत की सॉफ्ट पावर। योग, आयुर्वेद, आस्था, संस्कृति, हैंडीक्राफ्ट, फिल्में, वीएफएक्स, एनिमेशन, गेमिंग और डिजिटल कंटेंट के जरिए भारत दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बना सकता है। पर्यटन को भी इसी से जोड़कर देखा जा रहा है।
भारत के नेशनल पार्क, वन्य संपदा, संस्कृति और विरासत विदेशी पर्यटकों को आकर्षित कर सकते हैं। इसी तरह कॉन्सर्ट और स्पोर्ट्स जैसे क्षेत्रों में दुनिया के कलाकारों और दर्शकों को भारत तक लाने की संभावनाएँ हैं। इससे केवल भारत की छवि मजबूत नहीं होगी, बल्कि पर्यटन और क्रिएटिव इंडस्ट्री में आर्थिक गतिविधियाँ भी बढ़ेंगी।
इन सभी चीजों को जोड़कर देखें तो प्रधानमंत्री का संदेश यह है कि भारत की अगली विकास यात्रा किसी एक मंत्रालय, किसी एक उद्योग या किसी एक वर्ग के भरोसे पूरी नहीं होगी। एक तरफ किसान उत्पादन करेगा, दूसरी तरफ उद्योग उसे प्रोसेस और पैकेज करेगा, तकनीक गुणवत्ता और उत्पादकता बढ़ाएगी, बेहतर कनेक्टिविटी उसे देश और दुनिया के बाजार तक पहुँचाएगी, आत्मनिर्भर रक्षा भारत की सुरक्षा मजबूत करेगी और ग्रीन एनर्जी भविष्य की अर्थव्यवस्था को टिकाऊ बनाएगी। वहीं भारत की संस्कृति, पर्यटन और क्रिएटिव ताकत दुनिया में भारत के लिए आकर्षण पैदा करेगी।
युवाओं की भूमिका भी इस पूरी तस्वीर के केंद्र में है। प्रधानमंत्री ने शुरुआत में ही कहा कि उनकी शक्ति को राष्ट्र निर्माण में जोड़ा जाएगा। इसका मतलब यह है कि आने वाले समय में रोजगार और अवसर केवल पारंपरिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहने वाले हैं। मैन्युफैक्चरिंग से लेकर एआई, रक्षा तकनीक, साइबर सुरक्षा, ग्रीन एनर्जी, गेमिंग, एनीमेशन और स्पेस जैसे नए क्षेत्रों में युवाओं की क्षमता का इस्तेमाल करने की कोशिश होगी।
इसलिए ‘शक्ति की सप्तधारा’ का असली अर्थ सात अलग-अलग घोषणाओं से कहीं बड़ा है। यह भारत की आर्थिक, तकनीकी, सामरिक, पर्यावरणीय और सांस्कृतिक ताकत को एक साथ इस्तेमाल करने की सोच है जिसमें सरकार, समाज, उद्योग, उत्पादक और किसान सभी को इसमें अपनी भूमिका निभानी है।
अंततः लक्ष्य यही है कि भारत उत्पादन भी करे, दुनिया को तकनीक भी दे, अपने किसानों के उत्पादों को वैश्विक बाजार तक पहुँचाए, अपनी सुरक्षा के लिए आत्मनिर्भर बने, स्वच्छ ऊर्जा और समुद्री अर्थव्यवस्था में आगे बढ़े और अपनी संस्कृति तथा रचनात्मक शक्ति के जरिए दुनिया को आकर्षित करे।
भारत में ‘नदी जोड़ो अभियान’ (Interlinking of Rivers – ILR) की जब भी बात होती है, तो चर्चा का केंद्र अक्सर केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट (Ken-Betwa Link Project – KBLP) ही रहता है, क्योंकि यह धरातल (Ground Level) पर उतरने वाला देश का पहला मॉडल प्रोजेक्ट है। लेकिन राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी (National Water Development Agency – NWDA) की वास्तविक योजना का दायरा सिर्फ मध्य भारत के बुंदेलखंड तक सीमित नहीं है।
NWDA का अंतिम और व्यापक लक्ष्य पूरे देश के हाइड्रोलॉजिकल मानचित्र (Hydrological Map) को पुनर्गठित करना और भारत की तमाम बड़ी-छोटी नदियों को एक साझा ‘राष्ट्रीय जल ग्रिड’ (National Water Grid) के जरिए आपस में जोड़ना है।
इस महा-योजना के तहत संपूर्ण भारत में कुल 30 अंतर-बेसिन जल स्थानांतरण (Inter-basin Water Transfer) लिंक प्रस्तावित किए गए हैं। इन 30 विशाल परियोजनाओं का मूल दर्शन यह है कि मानसून के 100 से 120 दिनों के दौरान जिन नदियों का अरबों-खरबों लीटर मीठा पानी विनाशकारी बाढ़ लाता हुआ उफान के साथ समुद्र में बेकार बह जाता है, उसे रोककर और मोड़कर देश के उन दूर-दराज के इलाकों तक पहुँचाया जाए जो साल के आठ महीने बूँद-बूँद पानी के लिए तरसते हैं।
इस पूरे खाके को भारत की भौगोलिक और भू-गर्भीय बनावट के आधार पर दो स्पष्ट घटकों में विभाजित किया गया है – 1- प्रायद्वीपीय घटक (Peninsular Component – 16 रिवर लिंक प्रोजेक्ट) और 2- हिमालयी घटक (Himalayan Component – 14 रिवर लिंक प्रोजेक्ट)।
भारत के नदी जोड़ो मेगा प्रोजेक्ट की प्रतीकात्मक तस्वीर, डाटा: NWDA (फोटो साभार: AI ChatGPT)
जहाँ एक तरफ चीन का साउथ-नॉर्थ वाटर ट्रांसफर प्रोजेक्ट (South-North Water Transfer Project) और अमेरिका का कैलिफोर्निया स्टेट वाटर प्रोजेक्ट (California State Water Project) यह साबित कर चुके हैं कि बड़े पैमाने पर जल अंतरण से महाद्वीपीय स्तर के जल संकट को खत्म किया जा सकता है, वहीं भारत के सामने भौगोलिक विषमताओं के साथ-साथ राज्यों के आपसी जल विवाद (Inter-State Water Disputes), विशाल जन-विस्थापन और नाजुक पारिस्थितिकी (Fragile Ecology) की अद्वितीय चुनौतियाँ मौजूद हैं।
नदी जोड़ो परियोजना पर आधारित रिपोर्ट के तीसरे और आखिरी हिस्से में हम भारत की बाकी सभी प्रमुख परियोजनाओं, सिंधु जल संधि के बाद उत्तर-पश्चिम भारत में चल रहे आधिकारिक प्रस्तावों, दुनिया के 5 सबसे बड़े वॉटर ट्रांसफर मॉडलों, पर्यावरणीय संकटों और इस अंतिम निष्कर्ष का गहन विश्लेषण करेंगे कि क्या यह योजना भारत की भावी ‘जल क्रांति’ बनेगी या फिर यह देश के इतिहास की सबसे कठिन और संवेदनशील राष्ट्रीय परियोजना साबित होने जा रही है।
नदी जोड़ो परियोजना के प्रायद्वीपीय घटक: 16 प्रस्तावित रिवर लिंक प्रोजेक्ट
भारत की महत्वाकांक्षी नदी जोड़ो परियोजना के प्रायद्वीपीय घटक मुख्य रूप से मध्य और दक्षिण भारत की नदियों तथा पश्चिमी घाट (Western Ghats) से निकलने वाली जलधाराओं पर केंद्रित है। इस घटक के तहत कुल 16 अंतर-बेसिन लिंक प्रस्तावित हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य ओडिशा और आंध्र प्रदेश की महानदी व गोदावरी जैसी विशाल नदियों के मानसूनी ‘अधिशेष’ (Surplus) जल को उठाकर दक्षिण भारत की जल-संकटग्रस्त नदियों कृष्णा, पेनार, कावेरी, वैगई और गुंडार तक पहुँचाना है।
दक्षिण भारत के प्रमुख रिवर लिंक प्रोजेक्ट
इसमें महानदी – गोदावरी – कृष्णा – पेनार – कावेरी – वैगई – गुंडार ग्रिड (दक्षिण भारत की रीढ़) प्रमुख है। यह दक्षिण भारत को एक सूत्र में पिरोने वाला सबसे बड़ा वॉटर ग्रिड है। इसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित लिंक शामिल हैं-
महानदी (मणिभद्र) – गोदावरी (दौलेश्वरम) लिंक: ओडिशा की महानदी में मानसून के दौरान भारी तबाही मचाने वाले पानी को बैराज और 800 किमी से अधिक लंबी नहरों के माध्यम से गोदावरी नदी में स्थानांतरित करना।
गोदावरी (इंचमपल्ली/पोलावरम) – कृष्णा (नागार्जुनसागर/विजयावाड़ा) लिंक: गोदावरी के विशाल जलप्रवाह को आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के रास्ते कृष्णा नदी में डालना।
कृष्णा (अल्मट्टी/श्रीशैलम/नागार्जुनसागर) – पेनार (सोमशिला) लिंक: कृष्णा के पानी को रायलसीमा और कर्नाटक के शुष्क क्षेत्रों से होते हुए पेनार नदी तक ले जाना।
पेनार (सोमशिला) – कावेरी (ग्रैंड एनिकिट) लिंक: आंध्र प्रदेश से पानी को तमिलनाडु के कावेरी बेसिन तक पहुँचाना।
कावेरी (कटालई) – वैगई – गुंडार लिंक: कावेरी के पानी को तमिलनाडु के सबसे दक्षिणी और सूखे जिलों (मदुरै, रामनाथपुरम) तक पहुँचाना।
अगर यह ग्रिड पूरा बन जाता है, तो तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के बीच पिछले सौ सालों से चले आ रहे कावेरी और कृष्णा जल विवादों (Water Disputes) को काफी हद तक कम कर सकता है, क्योंकि दक्षिण के राज्यों को उत्तर की नदियों से अतिरिक्त जल मिलने लगेगा।
मध्य भारत के रिवर लिंक प्रोजेक्ट (Priority Links of Central India)
पारबती – कालीसिंध – चंबल लिंक (Parbati-Kalisindh-Chambal Link): मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र और राजस्थान के हाड़ौती व चंबल क्षेत्र (कोटा, बूंदी, झालावाड़) को सिंचाई और पेयजल आपूर्ति देने के लिए केन-बेतवा के साथ ही इस लिंक को प्राथमिकता में रखा गया है।
दमनगंगा – पिंजाल लिंक (Damanganga-Pinjal Link): गुजरात और महाराष्ट्र की सीमा पर बहने वाली दमनगंगा नदी के पानी को मोड़कर वैतरणा और पिंजाल नदियों के रास्ते मुंबई महानगर (Mumbai Metropolitan Region) तक पहुँचाना। इसका मुख्य उद्देश्य भारत की वित्तीय राजधानी मुंबई की वर्ष 2050 तक की पेयजल मांग को पूरा करना है।
पार – तापी – नर्मदा लिंक (Par-Tapi-Narmada Link): दक्षिण गुजरात के पश्चिमी घाट से निकलने वाली नदियों (पार, तापी) का पानी मोड़कर नर्मदा के मुख्य केनाल नेटवर्क में डालना, जिससे उत्तर गुजरात, सौराष्ट्र और कच्छ के अति-शुष्क इलाकों तक पानी पहुँचाया जा सके। हालाँकि स्थानीय ST समुदायों के कड़े विरोध के कारण वर्तमान में इस पर काम रुका हुआ है।
पश्चिमी घाट की नदियों का पानी पूर्व की ओर मोड़ना (West Flowing Rivers Transfer)
नेत्रावती – हेमावती लिंक: कर्नाटक में पश्चिमी घाट से होकर अरब सागर में गिरने वाली नेत्रावती नदी के पानी को मोड़कर कावेरी की सहायक हेमावती नदी में डालना ताकि बंगलुरु और दक्षिणी कर्नाटक के किसानों को पानी मिल सके।
बेदती – वरदा लिंक: कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ और धारवाड़ जिलों में जल संकट दूर करना।
पम्बा – अचनकोविल – वैप्पार लिंक: केरल की पम्बा और अचनकोविल नदियों का पानी तमिलनाडु के सूखे वैप्पार बेसिन में ले जाना (जिसका केरल सरकार लगातार विरोध कर रही है)।
हिमालयी घटक (Himalayan Component) का विश्लेषण
हिमालयी घटक पूरे अंतर-बेसिन जल स्थानांतरण का सबसे विशाल, तकनीकी रूप से अत्यंत जटिल और इंजीनियरिंग की दृष्टि से चुनौतीपूर्ण हिस्सा है। इसके तहत कुल 14 लिंक प्रस्तावित किए गए हैं। इसका मुख्य हिस्सा नेपाल, भूटान और पूर्वोत्तर भारत (असम, अरुणाचल) से बहकर आने वाली बारहमासी (Perennial) और उफनती नदियों के जल को नियंत्रित करना और उसे देश के पश्चिमी और दक्षिणी हिस्सों तक ले जाना है।
Fact Box, फोटो साभार: AI ChatGPT
मानस – संकोश – तिस्ता – गंगा (M-S-T-G) लिंक
ये प्रोजेक्ट राष्ट्रीय जल ग्रिड की रीढ़ है। यह पूरी नदी जोड़ो योजना का सबसे बड़ा, सबसे महँगा और सबसे दूरगामी प्रस्ताव है।
इस प्रोजेक्ट में भूटान और पूर्वोत्तर भारत की जिन मानस और संकोश नदियों में अत्यधिक पानी उपलब्ध है। उन नदियों के पानी को असम में एक विशाल बैराज बनाकर रोका जाएगा और लगभग 700 किलोमीटर से अधिक लंबी एक ‘सुपर केनाल’ (Super Canal) के जरिए पश्चिम बंगाल की तिस्ता नदी से होते हुए बिहार के पास गंगा नदी (फरक्का बैराज के ऊपर) में डाला जाएगा।
इस एक लिंक से प्रति वर्ष लगभग 43,000 मिलियन घनमीटर (MCM) पानी स्थानांतरित करने की योजना है, जो भारत की कई छोटी नदियों के कुल वार्षिक प्रवाह से भी अधिक है।
यह नहर उत्तर पूर्व भारत को मुख्य भारत से जोड़ने वाले ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ (Chicken’s Neck) से होकर गुजरेगी, जिससे पूर्वोत्तर में नौवहन (Navigation) और सुरक्षा बलों की लॉजिस्टिक्स क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी।
गंगा और उसकी सहायक नदियों का लिंक नेटवर्क
कोसी – घाघरा लिंक (Kosi-Ghaghara Link): नेपाल से निकलकर बिहार में तबाही मचाने वाली ‘बिहार का शोक’ कही जाने वाली कोसी नदी पर विशाल छत्र बाँध बनाकर उसके पानी को उत्तर प्रदेश की घाघरा (सरयू) नदी में ले जाना।
गंडक – गंगा लिंक (Gandak-Ganga Link): गंडक नदी का पानी मोड़कर मध्य गंगा बेसिन को मजबूती देना।
घाघरा – यमुना और शारदा – यमुना लिंक (Ghaghara-Yamuna & Sarda-Yamuna Links): नेपाल-उत्तराखंड सीमा की शारदा (महाकाली) और घाघरा नदियों के पानी को विशाल नहरों के जरिए हरियाणा और दिल्ली के ऊपर यमुना नदी में डालना। इससे यमुना का विलुप्त होता प्रवाह पुनः जीवित होगा और दिल्ली-NCR का पेयजल संकट स्थायी रूप से हल होगा।
उत्तर-पश्चिम भारत का लिंक ग्रिड
यमुना – राजस्थान लिंक: यमुना नदी से पानी निकालकर राजस्थान के चुरू, झुंझुनूं और बीकानेर जिलों तक सिंचाई नहर ले जाना।
राजस्थान – साबरमती लिंक: राजस्थान के पानी को गुजरात की साबरमती नदी तक बढ़ाकर पश्चिमी भारत के पूरे रेगिस्तानी बेल्ट को सींचना।
भारत की नदी जोड़ो परियोजना का विस्तृत अध्ययन चार्ट, डाटा: NWDA (फोटो साभार: AI ChatGPT)
हिमाचल-पंजाब-राजस्थान और जम्मू-कश्मीर से जुड़े आधिकारिक प्रस्ताव (सिंधु जल संधि के संदर्भ में)
उत्तर-पश्चिमी भारत में नदियों का प्रबंधन केवल एक कृषि या पेयजल का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति (International Fiplomacy) का एक अत्यंत संवेदनशील विषय रहा है।
साल 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई ‘सिंधु जल संधि’ (Indus Waters Treaty – IWT) के तहत नदियों का विभाजन किया गया था, जिसमें-
पूर्वी नदियाँ (Eastern Rivers): रावी, व्यास और सतलुज के पूरे पानी पर भारत का पूर्ण और अनन्य (exclusive) अधिकार दिया गया।
पश्चिमी नदियाँ (Western Rivers): सिंधु, झेलम और चेनाब का अधिकांश पानी पाकिस्तान के इस्तेमाल के लिए आवंटित किया गया, हालाँकि भारत को इन पर ‘रन-ऑफ-द-रिवर’ (run-of-the-river) जलविद्युत परियोजनाएँ बनाने का सीमित अधिकार मिला।
पूर्वी नदियों (रावी, व्यास, सतलुज) का पूरा अधिकार भारत के पास होने के बावजूद, दशकों तक पर्याप्त बाँधों, बैराजों और नहर नेटवर्क के अभाव में भारत के हिस्से का औसतन 2 से 3 मिलियन एकड़ फीट (MAF) मीठा पानी बिना इस्तेमाल हुए रावी नदी के जरिए बहकर पाकिस्तान चला जाता था।
बीते कुछ समय में खासकर पहलगाम हमले के बाद भारत सरकार ने एक तरफ ऑपरेशन सिंदूर चलाया, तो दूसरी तरफ सिंधु जल समझौते को होल्ड कर दिया। इसके बाद केंद्र सरकार ने आधिकारिक नीति बनाकर इस एक-एक बूँद पानी को भारत के भीतर ही रोकने और सहेजने के लिए तीन प्रमुख ढाँचागत परियोजनाओं पर काम पूरा किया है-
शाहपुरकंडी बाँध परियोजना (Shahpurkandi Dam Project – Punjab): ये प्रोजेक्ट पंजाब के पठानकोट जिले में रावी नदी पर स्थित है। शाहपुरकंडी बाँध परियोजना मशहूर थेन (रणजीत सागर) बाँध के Downstream में है।
इस बाँध का निर्माण पूरा होने से रावी नदी का वह पानी जो बहकर पाकिस्तान चला जाता था, उसे पूरी तरह रोक लिया गया है। इस सहेजे गए पानी से पंजाब की 32,000 हेक्टेयर के साथ ही जम्मू-कश्मीर के कठुआ और सांबा जिलों की 1,150 हेक्टेयर कृषि भूमि को तत्काल सिंचाई का पानी मिलने लगा है।
उझ बहुउद्देशीय परियोजना (Ujh Multipurpose Project – Jammu & Kashmir): ये परियोजना जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में रावी की प्रमुख सहायक नदी ‘उझ’ पर चल रही है। ₹9,167 करोड़ की अनुमानित लागत वाली इस परियोजना में लगभग 781 MCM पानी का विशाल भंडारण बनाया जा रहा है। इससे जम्मू-कश्मीर के कठुआ, सांबा और जम्मू जिलों की 31,380 हेक्टेयर भूमि सिंचित होगी और 186 मेगावाट जलविद्युत पैदा होगी।
रावी-व्यास-सतलुज लिंक और राजस्थान नहर (Indira Gandhi Canal): रावी और व्यास नदियों से सहेजे गए पानी को हरीके बैराज (Harike Barrage) के जरिए इंदिरा गाँधी नहर (Indira Gandhi Canal) में मोड़ा जा रहा है। इससे राजस्थान के थार रेगिस्तान (जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, श्रीगंगानगर) तक पानी का प्रवाह तेज हुआ है, जिससे भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित बंजर रेगिस्तान का एक बड़ा हिस्सा हरे-भरे खेतों में तब्दील हो चुका है।
इसके अलावा भी भारत सरकार कई अहम प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है। बहरहाल, ये तो रही भारत में स्थित प्रमुख नदी जोड़ो परियोजना से जुड़े प्रोजेक्ट की बात। अब बात करते हैं विदेशों में इस तरह के काम कहाँ और कैसे हो रहे हैं।
दुनिया के 5 सबसे बड़े सफल वॉटर ट्रांसफर मॉडल (Global Case Studies)
अंतर-बेसिन जल स्थानांतरण (Inter-Basin Water Transfer) कोई नया या केवल भारत का अनोखा प्रयोग नहीं है। दुनिया के कई देशों ने अपनी भौगोलिक विषमताओं, सूखे और औद्योगिक जरूरतों से निपटने के लिए विशाल इंजीनियरिंग ढाँचे खड़े किए हैं। हम दुनिया के 5 ऐसे ही प्रोजेक्ट्स के बारे में संक्षेप में बता रहे हैं।
डाटा ओपन सोर्स से, फोटो साभार: AI ChatGPT
भारत के लिए इन वैश्विक उदाहरणों को समझना बेहद जरूरी है-
चीन का South-North Water Transfer Project (Nan Shui Bei Diao): चीन का दक्षिणी हिस्सा (यांग्त्ज़ी नदी बेसिन) पानी से समृद्ध है, जबकि उसका उत्तरी हिस्सा (पीली नदी बेसिन, जहाँ बीजिंग और तियानजिन जैसे औद्योगिक शहर स्थित हैं) भयंकर जल संकट का सामना कर रहा था।
यह दुनिया की इतिहास का सबसे बड़ा जल स्थानांतरण प्रोजेक्ट है। इसमें 3 प्रमुख नहर मार्ग (Eastern, Central, and Western Routes) शामिल हैं, जिनकी कुल लंबाई 4,350 किलोमीटर से अधिक है।
इस परियोजना की लागत 62 अरब डॉलर से अधिक रही है और यह हर साल दक्षिणी नदियों से लगभग 44.8 अरब घनमीटर (BCM) पानी उत्तर की ओर स्थानांतरित करती है। इस प्रोजेक्ट ने चीन की राजधानी बीजिंग की प्यास बुझाई और उत्तर चीन के घटते भूजल स्तर को पूरी तरह रोक दिया।
अमेरिका का California State Water Project (CSWP): दरअसल, अमेरिका का कैलिफोर्निया राज्य दो विरोधाभासी हिस्सों में बँटा है। उत्तरी कैलिफोर्निया में 70% बारिश और बर्फबारी होती है, जबकि 80% पानी की माँग (कृषि और लॉस एंजिल्स जैसे शहर) दक्षिणी कैलिफोर्निया में है।
1960 के दशक में शुरू हुए इस प्रोजेक्ट के तहत 1,129 किलोमीटर लंबा ‘कैलिफोर्निया एक्वाडक्ट’ (California Aqueduct), 34 बड़े बाँध, 20 लिफ्ट पंपिंग स्टेशन और दर्जनों पावर हाउस बनाए गए। इसमें पानी को ‘तहचपी पहाड़ियों’ (Tehachapi Mountains) के ऊपर 593 मीटर की विशाल ऊँचाई तक लिफ्ट किया जाता है।
California State Water Project का ऑफिसियल मैप, साभार: water.ca.gov
इस परियोजना ने दक्षिणी कैलिफोर्निया को दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे समृद्ध फल व सब्जी उत्पादक कृषि बेल्ट बना दिया।
पाकिस्तान का Indus Basin Irrigation System (IBIS): साल 1960 की सिंधु जल संधि के बाद जब पूर्वी नदियाँ भारत को मिल गईं, तो पाकिस्तान के पंजाब और सिंध प्रांतों में सिंचाई व्यवस्था ध्वस्त होने का खतरा पैदा हो गया।
ऐसे में विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय वित्त पोषण की मदद से पाकिस्तान ने ‘इंडस बेसिन प्रोजेक्ट‘ शुरू किया। इसके तहत दुनिया के दो विशाल मिट्टी से भरे बाँध तरबेला बाँध (सिंधु नदी पर) और मंगला बाँध (झेलम नदी पर) बनाए गए।
पाकिस्तान ने सिंधु और झेलम के पानी को पूर्व की ओर बहने वाली चेनाब, रावी और सतलुज के मैदानों तक पहुँचाने के लिए 8 विशाल अंतर-नदी लिंक नहरें (link canals) बनाईं। यह आज दुनिया का सबसे बड़ा एकीकृत नहरी सिंचाई तंत्र है। हालाँकि पाकिस्तान इसे बड़े सिस्टम का सही से उपयोग नहीं कर पाता है और इसके इस्तेमाल में तमाम कमियाँ सामने आई हैं।
स्पेन का Tagus-Segura Water Transfer प्रोजेक्ट: स्पेन का उत्तर-पश्चिमी भाग (तागुस नदी) काफी गीला और पहाड़ी है, जबकि दक्षिण-पूर्वी भाग (सेगुरा नदी बेसिन) अत्यधिक शुष्क और अर्द्ध-रेगिस्तानी है। ऐसे में साल 1979 में पूरी हुई 286 किलोमीटर लंबी इस नहर प्रणाली में पानी को टनल और एक्वाडक्ट्स के जरिए विलिना पर्वत श्रृंखला को पार कराते हुए सेगुरा बेसिन में भेजा गया।
इस प्रोजेक्ट ने स्पेन के दक्षिणी भाग मुर्सिया और अलिकांते को ‘यूरोप का फल और सब्जी का कटोरा’ (Orchard of Europe) बना दिया।
ऑस्ट्रेलिया की Snowy Mountains Scheme: ऑस्ट्रेलिया के बर्फीले पहाड़ों से निकलने वाली ‘स्नोवी नदी’ का मीठा पानी पूर्व की ओर बहकर प्रशांत महासागर में बेकार गिर जाता था, जबकि ऑस्ट्रेलिया का पश्चिमी अंदरूनी इलाका (मरे-डार्लिंग बेसिन) सूखे से त्रस्त रहता था।
ऐसे में साल 1949 से 1974 के बीच बने इस विशाल इंजीनियरिंग चमत्कार में पहाड़ों के आर-पार 145 किलोमीटर लंबी भूमिगत सुरंगें (tunnels), 16 बड़े बाँध और 7 हाइड्रो पावर स्टेशन बनाए गए।
Snowy Mountains Scheme प्रोजेक्ट के आधिकारिक वेबसाइट से फोटो साभार
इसने स्नोवी नदी के पानी को मोड़कर मरे-डार्लिंग बेसिन में भेज दिया, जिससे ऑस्ट्रेलिया में लाखों एकड़ नए गेहूँ और कपास के खेतों को जीवनदान मिला और भारी मात्रा में जलविद्युत पैदा हुई। इसके अलावा भी ऑस्ट्रेलिया के अलग-अलग हिस्सों में कई प्रोजेक्ट चल रहे हैं। इसमें डेन्यूब नदी का प्रोजेक्ट कई देशों में फैला हुआ है।
भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय मॉडलों से क्या सीख है?
दुनिया के इन 5 बड़े जल स्थानांतरण मॉडलों का गहन अध्ययन करने पर भारत के नीति निर्माताओं, जल वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के लिए 5 बेहद स्पष्ट और व्यावहारिक सबक निकलकर सामने आते हैं-
राजनीतिक सहमति और पारदर्शी कानून (Political Consensus): अमेरिका के कैलिफोर्निया और स्पेन के मॉडलों से यह साफ दिखता है कि जब तक पानी देने वाले क्षेत्र (Donor Basin) और पानी लेने वाले क्षेत्र (Recipient Basin) के बीच कानूनी और वित्तीय लाभ का पारदर्शी बँटवारा नहीं होता, तब तक विवाद खत्म नहीं होते। स्पेन में आज भी तागुस और सेगुरा बेसिन के बीच राजनीतिक खींचतान चलती रहती है। भारत को अंतर-राज्यीय जल विवादों को सुलझाने के लिए एक मजबूत, संवैधानिक और सर्वमान्य राष्ट्रीय प्राधिकरण की आवश्यकता है।
दीर्घकालिक वित्तीय और तकनीकी धैर्य (Financial & Engineering Patience): चीन का साउथ-नॉर्थ प्रोजेक्ट हो या ऑस्ट्रेलिया की स्नोवी माउंटेन स्कीम, इन परियोजनाओं को पूरा होने में 20 से 50 साल का लंबा समय लगा। भारत को यह समझना होगा कि 30 लिंकों को एक साथ रातों-रात पूरा नहीं किया जा सकता। इसके लिए चरणबद्ध दृष्टिकोण (Phasing Approach) और लगातार बजट आवंटन की सख्त जरूरत है।
डाउनस्ट्रीम इकोसिस्टम की रक्षा (Ecology First): स्पेन और पाकिस्तान के अनुभवों ने दुनिया को सिखाया कि जब किसी नदी का 50% से अधिक पानी मोड़ा जाता है, तो नदी के निचले हिस्से (Downstream) का इकोसिस्टम मर जाता है, जिससे समुद्री खारापन (Salinity Intrusion) खेतों में घुसने लगता है। भारत को किसी भी नदी से केवल उतना ही ‘सरप्लस’ पानी उठाना चाहिए जिससे नदी का अपना न्यूनतम पर्यावरण प्रवाह (E-Flow / Environmental Flow) कभी बाधित न हो।
आधुनिक लिफ्टिंग और टनल तकनीक (Modern Engineering): अमेरिका ने तहचपी पहाड़ियों के ऊपर पानी लिफ्ट करने के लिए जो विशाल लिफ्ट पंप बनाए, वे इंजीनियरिंग का अद्भुत नमूना हैं। भारत के हिमालयी और प्रायद्वीपीय घटकों में पश्चिमी घाट और विंध्याचल जैसी पर्वत श्रृंखलाएँ आती हैं। भारत को पानी लिफ्ट करने और सुरंगें बनाने के लिए आधुनिक पर्यावरण-अनुकूल टनल बोरिंग मशीनों (TBM) का सहारा लेना होगा।
बहु-उद्देशीय लाभ (Multipurpose Utility): ऑस्ट्रेलिया की योजना केवल सिंचाई के लिए नहीं थी, उसने पूरे देश को सस्ती जलविद्युत (Hydro Electricity) दी, जिससे प्रोजेक्ट की लागत तेजी से वसूल हुई। भारत के सभी 30 लिंकों में जलविद्युत और अंतर्देशीय जलमार्ग (Inland Waterways) को अनिवार्य रूप से जोड़ा जाना चाहिए।
पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और विशेषज्ञों के पक्ष-विपक्ष
नदी जोड़ो योजना भारत के इतिहास की सबसे ज्यादा बहस वाली नीतियों में से एक है। देश के वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री, नौकरशाह और पर्यावरणविद दो स्पष्ट और परस्पर विरोधी धड़ों में बँटे हुए हैं। एक तरफ सरकार का समर्थन है, तो दूसरी तरफ विपक्षी खासकर एनजीओ लॉबी इन प्रोजेक्ट्स में टाँग अड़ाने की लगातार कोशिश कर रही है। हमने अपने 3 भाग के इस खास सीरीज के दूसरे पार्ट में इसके बारे में विस्तार से समझाया भी है।
समर्थकों और नीति निर्माताओं के तर्क (The Pro-Interlinking View)
खाद्य और जल सुरक्षा (Food & Water Security): वर्ष 2050 तक भारत की जनसंख्या लगभग 160 से 170 करोड़ पहुँचने का अनुमान है। इस विशाल आबादी का पेट भरने के लिए भारत को 450 मिलियन टन खाद्यान्न की आवश्यकता होगी। 30 लिंकों से पैदा होने वाली 3.5 करोड़ हेक्टेयर अतिरिक्त सिंचाई क्षमता ही देश को भुखमरी से बचा सकती है।
बाढ़ और सूखे का स्थायी उन्मूलन (Flood & Drought Mitigation): असम, बिहार और पूर्वी यूपी में हर साल बाढ़ से औसतन ₹20,000 करोड़ का ढाँचागत नुकसान होता है। बाढ़ के पानी को रोककर सूखे मराठवाड़ा, बुंदेलखंड और थार में भेजने से एक ही झटके में दोनों राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान हो जाएगा।
हरित ऊर्जा उत्पादन (Clean Energy): प्रस्तावित 30 लिंकों से लगभग 34,000 मेगावाट (34 GW) जलविद्युत पैदा होगी। यह हरित बिजली भारत को अपने कार्बन उत्सर्जन कम करने और थर्मल पावर प्लांटों पर निर्भरता घटाने में मदद करेगी।
सस्ता जलमार्ग (Inland Navigation): लिंक नहरों के बड़े नेटवर्क को राष्ट्रीय जलमार्गों (National Waterways) के रूप में विकसित किया जा सकता है, जिससे ट्रकों और ट्रेनों की तुलना में माल ढुलाई (Freight Transport) 80% सस्ती हो जाएगी।
आलोचकों और पर्यावरणविदों के तर्क (The Anti-Interlinking View)
विशाल वन विनाश और जैव विविधत का नुकसान: केन-बेतवा में पन्ना टाइगर रिजर्व का 5,803 हेक्टेयर जंगल डूब रहा है। यदि सभी 30 लिंक बनते हैं, तो देश के लाखों हेक्टेयर घने जंगल, वन्यजीव अभयारण्य और अति-दुर्लभ जैव विविधता (biodiversity) पानी में समा जाएगी।
लाखों ग्रामीणों का विस्थापन: एक अनुमान के अनुसार, 30 लिंकों के जलाशयों और नहरों के निर्माण से 15 से 20 लाख लोग बेघर होंगे, जिनमें से अधिकांश समाज के सबसे वंचित ST समुदाय हैं। भारत में विस्थापन का इतिहास (जैसे नर्मदा बचाओ आंदोलन) यह दिखाता है कि पुनर्वास नीतियाँ (Rehabilitation Policies) हमेशा कागजों तक सीमित रह जाती हैं।
नदियों के प्राकृतिक चरित्र का विनाश: जल पुरुष राजेंद्र सिंह का मानना है कि ‘नदी केवल पानी का बहता हुआ पाइप नहीं है’। नदी एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र (Living Ecosystem) है। जब हम किसी नदी का पानी खींचते हैं, तो उसके मुहाने (Estuary) पर समुद्र का खारा पानी चढ़ जाता है, जिससे तटीय भूमि बंजर हो जाती है।
ग्लोबल वार्मिंग और मानसून में अनिश्चितता (Climate Change Challenge): जलवायु परिवर्तन के कारण मानसूनी बारिश का पैटर्न बहुत तेजी से बदल रहा है। आज जिस नदी बेसिन को NWDA ‘अधिशेष’ (Surplus) मान रहा है, हो सकता है कि अगले 30 वर्षों में ग्लोबल वार्मिंग और ग्लेशियरों के पिघलने के कारण वह बेसिन खुद ‘कमी वाला’ (Deficit) बन जाए। ऐसे में ₹10 लाख करोड़ से अधिक के ये विशाल कंक्रीट के ढाँचे बेकार साबित हो सकते हैं।
पारंपरिक जल संरक्षण की उपेक्षा: आलोचकों का मानना है कि विशाल बाँधों पर लाखों करोड़ खर्च करने के बजाय यदि भारत अपने 5 लाख से अधिक पारंपरिक तालाबों, बावड़ियों, चेक डैमों और वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) को पुनर्जीवित करे, तो 10% लागत में भारत की प्यास बुझाई जा सकती है।
भविष्य की राह (The Way Forward)
भारत अपनी जल चुनौतियों को अनदेखा नहीं कर सकता, लेकिन वह आँखें मूँदकर विशाल कंक्रीट के विनाशकारी ढाँचे भी नहीं खड़ा कर सकता। भारत को ‘इंजीनियरिंग और पारिस्थिकी’ (Engineering + Ecology) के बीच एक बहुत ही सूक्ष्म और संतुलित मध्यमार्ग अपनाना होगा।
ऑपइंडिया की तरफ से नदी जोड़ो परियोजना के लिए 5 मुख्य रणनीतिक सुझाव
राज्य के भीतर वाले लिंकों को प्राथमिकता (Prioritize Intra-State Links First): अंतर-राज्यीय (Inter-State) विवादों में उलझने के बजाय, सरकार को पहले उन लिंकों पर काम करना चाहिए जो एक ही राज्य की सीमाओं के भीतर आते हैं (जैसे बिहार में कोसी-मेची लिंक या तमिलनाडु में कावेरी-वैगई लिंक)। इनमें न तो कानूनी अड़चनें हैं और न ही अंतर-राज्यीय विवाद। हालाँकि केन-बेतवा प्रोजेक्ट में इस तरह की कोई रुकावट नहीं है और इसे भारत सरकार प्राथमिकता में रखकर पूरा कर रही है।
विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन के साथ एकीकरण: नदी जोड़ो योजना को देश के ‘अमृत सरोवर अभियान’, महात्मा गांधी नरेगा के तहत बनने वाले चेक डैमों और पारंपरिक जोहड़ों-बावड़ियों के पुनरुद्धार के साथ अनिवार्य रूप से जोड़ा जाना चाहिए। बड़े बाँध केवल बैकअप होने चाहिए, पहली सुरक्षा रेखा स्थानीय जल संचयन होना चाहिए।
कृषि में जल-दक्षता (Water Use Efficiency in Agriculture): भारत का 80% से अधिक पानी केवल खेती में खर्च होता है। यदि भारत बाढ़-सिंचाई (Flood Irrigation) को छोड़कर ‘ड्रिप इरिगेशन’ (Drip irrigation) और ‘स्प्रिंकलर’ (Sprinkler) जैसी सूक्ष्म-सिंचाई तकनीकों को अनिवार्य कर दे, तो हम बिना किसी नए बाँध के करोड़ों एकड़ अतिरिक्त भूमि सींच सकते हैं।
स्वतंत्र वैज्ञानिक और सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन: किसी भी लिंक को हरी झंडी देने से पहले आईआईटी (IITs), भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) और स्वतंत्र पर्यावरण संस्थाओं से जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का निष्पक्ष अध्ययन कराया जाना चाहिए। हालाँकि भारत सरकार सभी प्रोजेक्ट्स के लिए ऐसी मूल्कांकन की नीति अपनाती रही है।
पारदर्शी और मानवीय पुनर्वास कानून: दौधन बाँध की तरह परियोजना शुरू होने से पहले विस्थापितों को खेती योग्य भूमि, स्थायी रोजगार और सम्मानजनक नागरिक सुविधाएँ देना अनिवार्य किया जाए। इस दिशा में भी भारत सरकार उल्लेखनीय काम कर रही है।
ओपन सोर्स डाटा पर आधारित तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT)
क्या यह भारत की जल क्रांति बनेगी या सबसे कठिन चुनौती?
21वीं सदी के मध्य में खड़ा भारत आज एक बहुत बड़े ऐतिहासिक और नैतिक चौराहे पर आ चुका है। एक तरफ हमारे सामने 140 करोड़ से अधिक प्यासे नागरिकों की बुनियादी जरूरतें, सुखते हुए कुएँ, दम तोड़ते शहर और मानसून की दया पर टिकी भारत की विशाल ग्रामीण अर्थव्यवस्था है। दूसरी तरफ हमारी जीवनदायिनी नदियाँ, पन्ना जैसे घने जंगल, संकटग्रस्त वन्यजीव और अपनी पुश्तैनी जमीनों से बेघर होते हुए हमारे अपने आदिवासी भाई-बहन हैं।
राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी (NWDA) की यह विशाल ‘नदी जोड़ो योजना’ (Interlinking of Rivers) निस्संदेह स्वतंत्र भारत के इतिहास की सबसे साहसी, सबसे दूरदर्शी और सबसे विशाल इंजीनियरिंग परिकल्पना है। यदि इसे केवल एक ‘कंक्रीट का बाँध और नहर बनाने का प्रोजेक्ट’ मानकर लागू किया गया, तो यह योजना नौकरशाही की लापरवाही, मुआवजे के घोटालों, अंतहीन अंतर-राज्यीय अदालती मुकदमों और भयानक पर्यावरणीय तबाही का नया जरिया बनकर रह जाएगी।
इसके विपरीत यदि भारत सरकार और राज्य सरकारें इसे दलगत राजनीति से ऊपर उठाकर, चीन और अमेरिका के तकनीकी अनुभवों से सबक लेते हुए, कड़े पर्यावरणीय मानकों, आधुनिक तकनीक, पारदर्शी सामाजिक पुनर्वास और मानवीय संवेदनाओं के साथ चरणबद्ध तरीके से लागू करती हैं, तो यह योजना निसंदेह 21वीं सदी में भारत की सबसे बड़ी ‘राष्ट्रीय जल क्रांति’ (National Water Revolution) साबित होगी।
यह परियोजना केवल दो नदियों या दो राज्यों को जोड़ने का काम नहीं करेगी, बल्कि यह भारत के सुनहरे भविष्य, खाद्य सुरक्षा, आर्थिक समृद्धि और राष्ट्र की अखंडता को एक अटूट सूत्र में पिरोने का ऐतिहासिक काम करेगी। फैसला हमारे हाथ में है कि हम इस विशाल इंजीनियरिंग क्षमता का उपयोग कुदरत के साथ संतुलन बनाकर अपनी प्यासी धरती को हरा-भरा करने में कैसे करते हैं।
नई दिल्ली में आयोजित रचनात्मक कॉन्ग्रेस राष्ट्रीय अधिवेशन के दौरान कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी और संदीप दीक्षित ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को लेकर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणियाँ कीं। अधिवेशन में बोलते हुए गाँधी अपने ही अंदाज में प्रधानमंत्री मोदी और भारत की विदेश नीति का मजाक उड़ा रहे थे।
अचानक गाँधी कुछ ज्यादा ही नाटकीय अंदाज में आ गए और मंच पर मौजूद संदीप दीक्षित को आवाज दी। उन्होंने अपनी बाँहें फैलाकर उन्हें गले लगाने का इशारा किया। जैसे ही दीक्षित पीछे मुड़े, गाँधी तेजी से उनकी ओर बढ़े और उन्हें एक अजीब तरीके से गले लगा लिया। गाँधी ऐसा करके प्रधानमंत्री मोदी की नकल करने की कोशिश कर रहे थे, जिन्हें विदेश यात्राओं के दौरान दूसरे देशों के राष्ट्राध्यक्ष अक्सर गले लगाकर स्वागत करते हैं।
गाँधी की इस हरकत को देखकर दर्शक हँसने लगे। इसके बाद गाँधी ने प्रधानमंत्री मोदी का मजाक उड़ाते हुए कहा कि उनके लिए विदेश नीति का मतलब ही लोगों को गले लगाना है। इसी दौरान दीक्षित ने बीच में बोलते हुए एक भद्दी और सेक्सिस्ट टिप्पणी की, “मुझे मेलोनी समझकर तो नहीं पकड़ा था?” इस आपत्तिजनक टिप्पणी के बाद गाँधी और दीक्षित दोनों जोर-जोर से हँसने लगे।
What a clown… Does he fit for the LOP post?
Someone tell him that Hugging foreigners is any day better than secretly bedding with them. pic.twitter.com/bLgIjnrZp5
कॉन्ग्रेस नेताओं ने भारत और इटली के बीच के उस गर्मजोशी भरे और मैत्रीपूर्ण रिश्ते को, जो प्रधानमंत्री मोदी और इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी के बीच बातचीत और मुलाकातों में दिखाई देता है, घटिया और सेक्सिस्ट मजाक तक सीमित कर दिया।
अपने ही सेक्सिस्ट बयानों का रिकॉर्ड रखने वाली सुप्रिया श्रीनेत भी साथ हँसीं
मंच पर मौजूद कॉन्ग्रेस नेताओं का यह व्यवहार कॉन्ग्रेस पार्टी में गहराई तक मौजूद सेक्सिज्म का एक उदाहरण था। दर्शकों के बीच बैठी कॉन्ग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत अपने नेता द्वारा एक महिला को लेकर किए गए आपत्तिजनक इशारे पर जोर-जोर से हँस रही थीं।
हालाँकि, श्रीनेत से इस तरह के व्यवहार की उम्मीद कोई हैरानी की बात नहीं थी। वह खुद बीजेपी सांसद कंगना रनौत के खिलाफ सेक्सिस्ट टिप्पणी कर चुकी हैं। एक इंस्टाग्राम पोस्ट में, जिसे बाद में डिलीट कर दिया गया था, कॉन्ग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने कंगना रनौत की एक बेहद भड़काऊ तस्वीर के साथ लिखा था, “क्या भाव चल रहा है मंडी में कोई बताएगा?”
अपने सत्यापित सोशल मीडिया अकाउंट से की गई इस आपत्तिजनक पोस्ट को लेकर भारी विरोध होने के बाद श्रीनेत ने सफाई जारी कर खुद का बचाव किया। अपने स्पष्टीकरण वाले वीडियो में उन्होंने दावा किया कि किसी ऐसे व्यक्ति ने, जिसके पास उनके अकाउंट का एक्सेस था यह पोस्ट की थी। उन्होंने यह भी कहा कि पोस्ट करने वाले व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
महिला राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के प्रति बेहद सेक्सिस्ट और अपमानजनक व्यवहार दिखाने वाली श्रीनेत अकेली कॉन्ग्रेस नेता नहीं थीं। कॉन्ग्रेस के एक अन्य पदाधिकारी एचएस अहीर ने भी कंगना रनौत के खिलाफ अभद्र टिप्पणी की थी। उन्होंने मंडी से उनकी उम्मीदवारी को लेकर ‘मंडी से र**’ जैसी बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी की थी।
कॉन्ग्रेस के भीतर की महिलाओं को भी निशाना बनाते रहे हैं पार्टी के लोग
कॉन्ग्रेस पार्टी के भीतर मौजूद यह बेलगाम सेक्सिज्म केवल पार्टी के बाहर की महिलाओं तक सीमित नहीं रहा है। पार्टी के भीतर की महिलाएँ भी इसका शिकार रही हैं। कॉन्ग्रेस की पूर्व प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी, जो लंबे समय तक पार्टी से जुड़ी रही थीं और पार्टी की एक मजबूत आवाज थीं, भी कॉन्ग्रेस में मौजूद इस सेक्सिज्म का शिकार हुई थीं।
सितंबर 2018 में मथुरा में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कॉन्ग्रेस के कुछ कार्यकर्ताओं ने चतुर्वेदी के साथ बदसलूकी की थी। पार्टी ने शुरुआत में इन कार्यकर्ताओं को निलंबित कर दिया था लेकिन अप्रैल 2019 में उन्हें फिर से पार्टी में बहाल कर दिया गया।
अपनी पार्टी के इस रुख से निराश चतुर्वेदी ने 2019 में कॉन्ग्रेस से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कहा था कि संगठन में उनकी सेवाओं को महत्व नहीं दिया गया और पार्टी में बने रहने का मतलब उनकी गरिमा और आत्मसम्मान से समझौता करना होगा।
प्रियंका चतुर्वेदी का यह मामला भी दिखाता है कि महिलाओं की गरिमा से जुड़े मुद्दे कॉन्ग्रेस के भीतर राजनीतिक हितों के आगे कैसे पीछे हो सकते हैं। जिन कार्यकर्ताओं पर उनके साथ बदसलूकी का आरोप था, उन्हें पहले निलंबित किया गया और बाद में फिर से पार्टी में शामिल कर लिया गया। इससे यह धारणा और मजबूत हुई कि जब पार्टी के हितों की बात आती है तो अनुशासनात्मक कार्रवाई भी कमजोर पड़ सकती है।
आखिरकार चतुर्वेदी ने कॉन्ग्रेस छोड़ दी और इसकी वजह के तौर पर अपनी गरिमा और आत्मसम्मान के खत्म होने की बात कही।
सेक्सिस्ट व्यवहार का एक पैटर्न और कॉन्ग्रेस नेतृत्व की चुप्पी
दिलचस्प बात यह है कि कॉन्ग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व, जिसमें राहुल गाँधी भी शामिल हैं, ने पार्टी के भीतर महिलाओं के खिलाफ हुए सेक्सिस्ट और महिला-विरोधी व्यवहार की निंदा तक नहीं की। ऐसे तत्वों के खिलाफ सख्त रुख अपनाना तो दूर की बात है।
इसलिए इस पूरे मामले को केवल किसी एक व्यक्ति की एक बार की गलती या अलग-थलग घटना कहकर खारिज करना मुश्किल है। राहुल गाँधी और संदीप दीक्षित की सार्वजनिक रूप से की गई घटिया बातचीत से लेकर महिला राजनीतिक विरोधियों और यहाँ तक कि कॉन्ग्रेस की अपनी नेताओं से जुड़े पुराने बयानों और घटनाओं तक, ऐसे बार-बार सामने आए मामले पार्टी के महिलाओं के प्रति रवैये पर असहज सवाल खड़े करते हैं।
इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की ओर से लगातार और सख्त प्रतिक्रिया न आने से ऐसे व्यवहार को सामान्य बनाने का खतरा पैदा होता है। यही वह व्यवहार है, जिसका विरोध राजनीतिक पार्टियाँ आम तौर पर करने का दावा करती हैं।
राहुल गाँधी, संदीप दीक्षित और जॉर्जिया मेलोनी से जुड़ा यह ताजा मामला इसलिए एक बड़ा सवाल खड़ा करता है: प्रधानमंत्री मोदी का राजनीतिक विरोध आखिर बार-बार महिलाओं को लेकर व्यक्तिगत, सेक्सिस्ट और अपमानजनक टिप्पणियों तक क्यों पहुँच जाता है?