भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में तीन चूरन सबसे अधिक चटाया जाता है;
वामपंथ
समाजवाद
क्रांति
हम भारतीयों का सौभाग्य देखिए कि तीनों ही चूरन असफल रहे हैं। कभी भी हमारी व्यवस्था का स्थायी आधार नहीं बन पाए। इसका सबसे बड़ा कारण भारत की वह जनता है, जिसके पास मत देने का अधिकार है। बौद्धिक बहसों में इसी जनता के बुद्धि और विवेक पर ‘विद्वतजन’ संदेह करते हैं, क्योंकि वह चूरन का हैवी डोज लेती ही नहीं।
राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी के उभार और बीजेपी के राजनीतिक विस्तार के बाद तो अलग-अलग मुखौटों में इस चूरन का डेली डोज बाँटा जा रहा है। नया मुखौटा है- कॉकरोच जनता पार्टी (CJP- Cockroach Janata Party)।
आंदोलनजीवी ऐसे हर चूरन के सफल होने के दो आधार अतीत से लाते हैं। पहला, जेपी की संपूर्ण क्रांति और दूसरा अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन। अव्वल तो जेपी ने जब आंदोलन किया था, तब लोकतंत्र पर ही सीधा हमला हुआ था। वोट देने वाली जनता के अधिकारों को ही कुचल दिया गया था। इसी तरह अन्ना हजारे का आंदोलन जब हुआ, तब कॉन्ग्रेस के नेतृत्व में चल रही केंद्र सरकार का इकबाल वोट देने वाली जनता की नजरों में पूरी तरह समाप्त हो चुका था। यही कारण है कि इन दोनों आंदोलनों को भले तात्कालिक समर्थन मिला और सत्ता परिवर्तन भी हुआ, पर वह हमारी व्यवस्था का स्थायी आधार नहीं बन सकी।
उलटे इसके राजनीतिक परिणामों ने वोट देने वाली जनता को पहले की तुलना में अधिक सावधान बना दिया है। अब वह केवल यह सुनकर उत्साहित नहीं हो रहा है कि कोई नया समूह पुरानी राजनीति को समाप्त करने का दावा कर रहा है। वह पूछ रहा है कि सत्ता परिवर्तन के बाद क्या होगा?
यह सत्य है कि कॉकरोच जनता पार्टी ने 6 जून 2026 को जंतर-मंतर पर शिक्षा से जुड़े जिन मुद्दों को लेकर कथित प्रदर्शन किया है, उसको लेकर लोगों की नाराजगी बीजेपी की सरकार से है। कुछ स्थानीय प्रशासनिक समस्याओं और कई सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों को लेकर भी असंतोष है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह स्वभाविक है। विशेषकर तब जब कोई पार्टी 12 सालों से लगातार देश की सत्ता में बनी हुई हो। जब देश के 22 राज्यों की सत्ता उस पार्टी या उसके सहयोगियों के हाथों में हो।
पर मूल प्रश्न यह नहीं है कि नाराजगी है या नहीं? प्रश्न यह है कि क्या यह नाराजगी इतनी व्यापक और संगठित है कि वह सत्ता परिवर्तन का आधार बन सके? अभी ऐसा कोई संकेत स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देता। यदि 2019 के आम चुनावों में बीजेपी की ताकत घटने को इसका संकेत मान लिया जाए तो इसका दूसरा पक्ष यह है कि उसके बाद हुए राज्यों के चुनावों में बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए ने चौंकाया है। जिस महाराष्ट्र और हरियाणा में उसकी पराजय तय बताई जा रही थी, वहाँ धमक के साथ वह सत्ता में लौटी। जिस बिहार में नीतीश कुमार की सरकार को बीमार-लाचार बताया जा रहा था, वहाँ राजद किसी तरह विपक्ष की हैसियत बचा पाई। जिस ममता बनर्जी के किले को अभेद्य बताया जा रहा था, उसे ताश के पत्तों की तरह बीजेपी ने ढाह दिया।
जाहिर है कि वोट देने वाली जनता में एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो चाय की गुमटी से लेकर सोशल मीडिया की गलियों तक आज सरकार की आलोचना करता दिख रहा है। पर वह विकल्प को लेकर आश्वस्त नहीं है। वह सरकार की किसी नीति को लेकर मुखर असहमति दर्ज करा रहा है, पर इसका अर्थ यह नहीं है कि वह पूरी व्यवस्था बदल देना चाहता है।
ध्यान रखिएगा भारतीय लोकतंत्र में कोई सरकार केवल इसलिए नहीं हारती कि लोग नाराज हैं। वे तब हारती हैं जब कोई अधिक विश्वसनीय विकल्प दिखाई देता है। विरोध पर्याप्त नहीं होता। विश्वसनीय विकल्प भी चाहिए होता है। यदि नाराजगी से ही सरकारें जाती तो बिहार में लालू यादव का जंगलराज डेढ़ दशक का नहीं होता। पश्चिम बंगाल में वामपंथी आतंक साढ़े तीन दशक और फिर टीएमसी का आतंक समाप्त होते डेढ़ दशक नहीं लगते। कॉन्ग्रेस के एकछत्र शासन को समाप्त करने के लिए कभी जेपी, कभी वीपी, कभी अटल बिहारी तो कभी नरेंद्र मोदी का चेहरा नहीं लगता।
जब केवल व्यवस्था विरोध ही आधार हो तो उस प्रयोग की एकमात्र राजनीतिक पूँजी असंतोष होता है। विश्वास नहीं। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था का अनुभव बताता है कि बिना विश्वास के असंतोष और सत्ता परिवर्तन के बीच बहुत लंबी दूरी होती है।
हमारी राजनीतिक व्यवस्था में केवल विरोध पर कोई दल नहीं टिकता। उन्हें समाज के सामने एक व्यापक आख्यान प्रस्तुत करना पड़ता है। उसे विश्वसनीय तरीके से जमीन पर उतारना पड़ता है। कॉन्ग्रेस ने ऐसा ही आख्यान अपने प्रोपेगेंडा तंत्र के बल पर देश को आजादी दिलाने की बुनी। इसके बल पर ही लंबे समय तक राजनीति में उसका आधिपत्य रहा।
आज जो राजनीति में बीजेपी का वर्चस्व दिख रहा है, वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और विकास के विश्वसनीय आख्यान के इर्द-गिर्द खड़ी है। इसी तरह राज्यों में समाजवादियों ने जो छिटपुट सफलता हासिल की वह ‘सामाजिक न्याय’ के आख्यान में लपेटकर परोसी गई, तभी संभव हो पाया।
इन आख्यानों से किसी की सहमति या असहमति हो सकती है। लेकिन ये आख्यान केवल विरोध पर आधारित नहीं थे। इनके पास विश्वास की जमीनी पूँजी भी थी और एक बड़ा जन समूह उससे जुड़ भी रहा था।
2014 के बाद अलग-अलग मुखौटों में तात्कालिक असंतोष को भुनाने के जो भी प्रयास हुए हैं, वे जनता के सामने न तो व्यापक आख्यान प्रस्तुत कर पाएँ हैं और न ही बेहतर व्यवस्था चलाने की क्षमता का विश्वास पैदा कर पाए हैं। यहीं कारण है कि कुछ राज्यों में विपक्ष को कभी-कभार सफलता मिल जाती है, 2019 के आम चुनाव जैसे कुछ झटके बीजेपी को भी लगते हैं, पर दूर-दूर तक उसकी राजनीतिक व्यवस्था का विकल्प बन जाने की कोई गंभीर संभावना नहीं दिखाई देती है।
संगठन, विचार, नेतृत्व और विश्वसनीयता की कसौटी पर बीजेपी का मूल्य जनता की दृष्टि में आज भी उसके विरोधियों से कहीं अधिक है। लोकतंत्र में राजनीतिक विकल्प बनने के यही चार स्तम्भ हैं।
कॉकरोच जनता पार्टी जैसे प्रयोग तो इस अर्थ में और भी हास्यास्पद हैं कि उसका आधार उस सोशल मीडिया पर टिका है, जो भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक जमीन है ही नहीं। सोशल मीडिया में भले ट्रेंड बने, पर व्यवस्था जमीन पर ही खड़ी होती है। सोशल मीडिया में भले रील से क्रांति की मुनादी हो, पर सफल होने के लिए उसे भी जमीन ही चाहिए।
पोस्ट-रील-फॉलोवर से सोशल मीडिया में कंटेंट की बाढ़ लाना अलग बात है। ‘सनस्क्रीन’ लगाकर दिल्ली के उस जंतर-मंतर पर कथित प्रदर्शन कर लेना भी अलग बात है, जो मीडिया और यूट्यूबर्स के कैमरों से घिरी होती है। लेकिन जमीन पर जनता के असंतोष को झेलकर उसे अपने पक्ष में वोट के लिए प्रेरित कर लेना, 45 डिग्री के तापमान में सुदूर देहातों में कैमरे और ताली बजाने वाली भीड़ के बिना घर-घर जाकर अपनी पार्टी-नेता के किसी विचार के लिए समर्थन जुटाना बिल्कुल अलग बात है।
ये जो बाद वाली अलग बात है- वही भारतीय लोकतंत्र का अंतिम तत्व है, क्योंकि सत्ता परिवर्तन सोशल मीडिया की टाइमलाइन पर नहीं, मतदाता सूची में दर्ज नामों से निश्चित होता है।
आज कॉकरोच हैं, कल पेंगुइन होंगे, परसों कुछ और। भारत में क्रांति का चूरन बेचने वाले हमेशा मिलेंगे। खरीदार भी खूब दिखेंगे। पर वास्तविक धरातल पर क्रांति शायद ही कभी स्थायी तौर पर गोदाम से बाहर निकल पाए। क्योंकि व्यवस्था बदलने की शक्ति उस जनता के हाथ में है जो टीवी स्टूडियो, कंस्टीट्यूशन क्लब की कथित बौद्धिक बहसों और सोशल मीडिया स्पेस की बकलोली से बहुत दूर रहती है, लेकिन चुनाव के दिन मतदान केंद्र तक अवश्य पहुँचती है।
यह जनता असंतुष्ट होने पर भी केवल विरोध नहीं देखती, विकल्प भी देखती है। उसे केवल व्यवस्था की कमियाँ नहीं लुभाती, वह संभावित विकल्प की क्षमताओं को भी तौलती है। वह भले हैशटैग नहीं बनाती है, पर व्यवस्था वही बनाती है।
पंजाब की ऐतिहासिक और धार्मिक धरती अमृतसर से एक बार फिर तनाव और संवेदनशीलता की तस्वीरें सामने आई हैं। ऑपरेशन ब्लू स्टार की 42वीं बरसी के मौके पर शुक्रवार को अमृतसर के पवित्र स्वर्ण मंदिर (हरिमंदिर साहिब) परिसर में एक बार फिर ‘खालिस्तान जिंदाबाद’ के नारे गूँज उठे। श्री अकाल तख्त साहिब के नजदीक बड़ी संख्या में कट्टरपंथी और उनके समर्थक इकट्ठा हुए, जिन्होंने हाथों में प्रतिबंधित संगठन और जरनैल सिंह भिंडरावाले के पोस्टर लहराए।
हर साल 6 जून की यह तारीख भारतीय राजनीति, सिख समुदाय और देश की आंतरिक सुरक्षा के इतिहास में बेहद संवेदनशील मानी जाती है। इसी दिन साल 1984 में भारतीय सेना ने स्वर्ण मंदिर परिसर को भारी हथियारों से लैस आतंकियों के चंगुल से मुक्त कराया था। इस कार्रवाई के दौरान आतंकी जरनैल सिंह भिंडरावाले को सेना ने ढेर कर दिया था। यही वजह है कि हर साल इस दिन भिंडरावाले और ऑपरेशन में मारे गए लोगों की याद में विशेष अरदास की जाती है, जिसकी आड़ में कट्टरपंथी तत्व हंगामा और नारेबाजी करते हैं।
इस बेहद संवेदनशील और तनावपूर्ण मौके को देखते हुए पंजाब पुलिस, खुफिया एजेंसियाँ और अर्धसैनिक बल पूरी तरह से अलर्ट मोड पर रहे। स्वर्ण मंदिर के आसपास के पूरे इलाके की सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद की गई थी। हालाँकि परिसर के भीतर नारेबाजी और पोस्टरबाजी के कारण माहौल में भारी तनाव देखा गया, लेकिन प्रशासन और सुरक्षाबलों की मुस्तैदी के कारण स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में बनी रही।
इंदिरा गाँधी और कॉन्ग्रेस ने पंजाब में खड़ा किया था भिंडरावाले नाम का भस्मासुर
इतिहास के पन्नों को पलटें तो जरनैल सिंह भिंडरावाले एक ऐसा नाम है जिसने पूरे पंजाब को आतंकवाद की आग में झोंक दिया था। शुरुआत में भिंडरावाले को खुद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और कॉन्ग्रेस सरकार ने अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकने और अकाली दल के प्रभाव को कम करने के लिए बढ़ावा दिया था। लेकिन बाद में वही भिंडरावाले भस्मासुर बन गया और उसने पंजाब में सिखों के लिए एक अलग देश ‘खालिस्तान’ की हिंसक मांग शुरू कर दी।
भिंडरावाले का प्रभाव 1978 के बाद तेजी से बढ़ा और उसने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव का समर्थन करते हुए उग्रवाद का रास्ता चुन लिया। उसके इशारे पर पंजाब में हिंदुओं और निरंकारियों की सरेआम हत्याएँ होने लगीं। जब कानून का शिकंजा कसने लगा, तो भिंडरावाले ने अपने सैकड़ों हथियारबंद आतंकियों के साथ सिखों के सबसे पवित्र स्थल स्वर्ण मंदिर परिसर पर अवैध कब्जा कर लिया और उसे एक अभेद्य किले तथा आतंकी मुख्यालय में तब्दील कर दिया।
आतंकियों से सिखों के पवित्र स्थान को मुक्त कराने के लिए सेना ने चलाया था ऑपरेशन ब्लू स्टार
जब पंजाब में कानून-व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गई और आतंकवाद चरम पर पहुँच गया, तब इंदिरा गाँधी सरकार के आदेश पर भारतीय सेना को ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार‘ चलाना पड़ा। 1 जून से 8 जून 1984 के बीच चले इस भीषण सैन्य अभियान का मुख्य उद्देश्य स्वर्ण मंदिर परिसर को जरनैल सिंह भिंडरावाले और उसके घातक हथियारों से लैस समर्थकों से मुक्त कराना था। भारी गोलीबारी के बीच 6 जून 1984 को सेना ने भिंडरावाले को मार गिराया।
श्री अकाल तख्त साहिब को पहुँचा था नुकसान
इस सैन्य कार्रवाई के दौरान सिखों के सर्वोच्च धार्मिक स्थल ‘श्री अकाल तख्त साहिब’ को भारी नुकसान पहुँचा था, जिसे सिख समुदाय का एक बड़ा वर्ग आज भी अपनी धार्मिक भावनाओं पर गहरी चोट और बेअदबी के रूप में देखता है। यही कारण है कि 42 साल बीत जाने के बाद भी यह मुद्दा भावनात्मक और राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील बना हुआ है और इसके जख्म आज भी ताज़ा हैं। इस ऑपरेशन के बाद देश का माहौल बिगड़ गया था और इसके प्रतिशोध में ही इंदिरा गाँधी की उनके सिख अंगरक्षकों ने हत्या कर दी थी, जिसके बाद देश में सिख विरोधी दंगे भड़क उठे थे।
इस बरसी के मौके पर स्वर्ण मंदिर परिसर में मौजूद प्रदर्शनकारियों ने भारतीय राज्य के खिलाफ अपनी भड़ास निकाली। एक कट्टरपंथी संगठन के नेता ने वहाँ मौजूद भीड़ के सामने बयान देते हुए कहा, “1984 की सैन्य कार्रवाई ने पूरे सिख समुदाय को एक ऐसी गहरी पीड़ा दी है जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। हमारे पवित्र अकाल तख्त पर हमला करके हमारी धार्मिक पहचान को कुचलने की कोशिश की गई थी। हम अपनी स्वायत्तता और हक की लड़ाई को हमेशा जिंदा रखेंगे और शहीदों की कुर्बानी बेकार नहीं जाने देंगे।”
ऑपरेशन ब्लू स्टार की बरसी के समय हर साल हंगामा करते हैं खालिस्तानी कट्टरपंथी
दूसरी तरफ देश की सुरक्षा एजेंसियाँ और भारत सरकार इसे देश की अखंडता, एकता और संप्रभुता से जुड़ा मामला मानती हैं। उनके लिए भिंडरावाले एक खूँखार आतंकी था जिसने देश को बाँटने की साजिश रची थी, जबकि अलगाववादी और कट्टरपंथी संगठनों के लिए वह आज भी एक बड़ा प्रतीक बना हुआ है। यही विरोधाभास हर साल 6 जून को स्वर्ण मंदिर परिसर में टकराव और हंगामे की स्थिति पैदा करता है।
प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि लोकतांत्रिक देश में शांतिपूर्ण अरदास की अनुमति है, लेकिन देश विरोधी गतिविधियों और कानून हाथ में लेने वालों पर सख्त नजर रखी जा रही है। सोशल मीडिया पर भी इस बार नारेबाजी और पोस्टरों के कई वीडियो तेजी से वायरल हुए, जिस पर साइबर सेल लगातार नजर बनाए हुए है ताकि पंजाब का भाईचारे वाला माहौल दोबारा न बिगड़ सके।
सिक्योरिटी एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) ने 3 जून 2026 को बेंगलुरु स्थित जेम्स एंड ज्वेलरी कंपनी राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड (REL), उसके प्रमोटर, चेयरमैन और प्रबंध निदेशक राजेश मेहता के खिलाफ एकपक्षीय अंतरिम आदेश जारी किया।
इसके तहत कंपनी और मेहता को प्रतिभूति बाजार (Securities market) तक पहुँच से प्रतिबंधित कर दिया गया। इसका सीधा मतलब है कि अगले आदेश तक राजेश मेहता REL के शेयरों की खरीद-बिक्री या किसी भी प्रकार का लेनदेन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नहीं कर सकेंगे।
राजेश एक्सपोर्ट्स की 99% आय फर्जी: राजेश मेहता की गोल्ड एक्सपोर्ट कंपनी के खिलाफ SEBI ने क्यों शुरू की कार्रवाई?
SEBI ने राजेश मेहता और राजेश एक्सपोर्ट्स पर वित्त वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच लगभग 15.15 लाख करोड़ रुपए के राजस्व को गलत तरीके से दिखाने या बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का आरोप लगाया है। सरल शब्दों में कहें तो कंपनी और उसकी सहयोगी इकाइयों द्वारा इस अवधि में दिखाई गई आय का लगभग 99.8 प्रतिशत हिस्सा वास्तविक नहीं था।
SEBI के 109 पन्नों के आदेश में कहा गया है कि कंपनी का समेकित वित्तीय प्रदर्शन लगभग पूरी तरह उसकी विदेशी सहायक कंपनियों, विशेष रूप से वैलकैम्बी एसए (Valcambi SA), पर निर्भर बताया गया है। इसके बावजूद कंपनी ने लगातार इन कंपनियों के वित्तीय विवरण सार्वजनिक नहीं किए।
इतना ही नहीं बार-बार समन भेजे जाने के बावजूद कंपनी ने जाँच अधिकारियों को विक्रेताओं, ग्राहकों और अन्य आवश्यक वित्तीय जानकारियों का विवरण भी उपलब्ध नहीं कराया। SEBI के अनुसार, राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड ने अपनी सहायक (Subsidiaries) और स्टेप-डाउन सहायक कंपनियों के वित्तीय विवरण जाँच एजेंसी को उपलब्ध नहीं कराए।
इनमें वित्त वर्ष 2023-24 और 2024-25 के लिए REL Singapore, वित्त वर्ष 2020-21 से 2024-25 तक के लिए Bab Al Rayan Jewellery LLC, वर्ष 2024 के लिए GGR तथा उसके 2020 से 2024 तक के स्टैंडअलोन वित्तीय विवरण, वर्ष 2020 से 2024 तक के लिए Valcambi USA Inc और वित्त वर्ष 2022-23 से 2024-25 तक के लिए ACC Energy के स्टैंडअलोन वित्तीय विवरण शामिल हैं। SEBI का कहना है कि इन दस्तावेजों के अभाव में कंपनी के वित्तीय दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना मुश्किल हो गया।
SEBI के आदेश में कहा गया कि जाँच के दौरान राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड अपनी सहायक कंपनियों से जुड़े कई महत्वपूर्ण रिकॉर्ड उपलब्ध कराने में विफल रही। इनमें बिक्री रजिस्टर, खरीद रजिस्टर, ग्राहकों के अनुसार बकाया रकम (डेब्टर्स) का विवरण, विक्रेताओं के अनुसार देनदारियों (क्रेडिटर्स) का ब्योरा, तथा संबंधित पक्षों (Related Parties) और उनसे हुए लेनदेन की सूची शामिल थी। SEBI का कहना है कि इन दस्तावेजों के अभाव में कंपनी की सहायक कंपनियों के वित्तीय लेनदेन और दावों की जाँच करना मुश्किल हो गया।
SEBI ने कहा कि कई बार ईमेल और समन भेजने के बावजूद राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड (REL) ने माँगी गई जानकारी उपलब्ध नहीं कराई। इससे जाँच प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न हुई और SEBI के लिए कंपनी के समेकित वित्तीय विवरणों (Consolidated Financial Statements) की सत्यता की जाँच करना मुश्किल हो गया।
SEBI के अनुसार, यह SEBI अधिनियम, 1992 की धारा 11(2)(ia) और 11C(3) का उल्लंघन है। इसके अलावा कंपनी ने अपनी सहायक और स्टेप-डाउन सहायक कंपनियों के ऑडिट किए गए वित्तीय विवरण अपनी वेबसाइट पर अपलोड नहीं किए।
SEBI का कहना है कि इससे सूचीबद्ध कंपनियों से जुड़े LODR नियमों के रेगुलेशन 46(2)(s) और कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 136(1) का भी उल्लंघन हुआ।
राजेश एक्सपोर्ट्स की जाँच में SEBI को क्या निष्कर्ष मिले?
SEBI द्वारा राजेश एक्सपोर्ट्स, वैलकैम्बी और उसकी अन्य सहायक कंपनियों के वित्तीय रिकॉर्ड की जाँच में पाया गया कि कंपनी ने समेकित स्तर (Consolidated Level) पर लाखों करोड़ रुपए का राजस्व दिखाया था, लेकिन स्टैंडअलोन स्तर पर उसकी आय इसका केवल एक छोटा हिस्सा थी।
वित्त वर्ष 2020-21 में राजेश एक्सपोर्ट्स का समेकित राजस्व 2,58,306 करोड़ रुपए बताया गया था, जबकि उसका स्टैंडअलोन रेवेन्यु सिर्फ 2,060 करोड़ रुपए था। 2020-21 से 2025-26 के बीच समेकित और स्टैंडअलोन दोनों तरह की आय बढ़ी, लेकिन दोनों के बीच का बड़ा अंतर लगातार बना रहा।
वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी का समेकित राजस्व 7,78,716 करोड़ रुपए तक पहुँच गया, जबकि उसका स्टैंडअलोन राजस्व केवल 9,189 करोड़ रुपए था।
राजेश एक्सपोर्ट्स (REL) का कहना था कि उसके समेकित और स्टैंडअलोन रेवेन्यु के बीच इतना बड़ा अंतर इसलिए है क्योंकि उसकी अधिकांश आय उसकी विदेशी सहायक कंपनियों से आती है। इनमें वैलकैम्बी एसए (Valcambi SA) प्रमुख है, जिसे कंपनी अपनी मुख्य परिचालन इकाई बताती है।
हालाँकि उपलब्ध आँकड़ों से पता चलता है कि GGR समेत REL से जुड़ी कई अन्य कंपनियाँ या तो केवल होल्डिंग कंपनियाँ हैं, जिनका कोई वास्तविक कारोबार नहीं है, या फिर उन्होंने अभी तक अपना संचालन शुरू ही नहीं किया है।
REL और उसकी सहायक कंपनियों के वित्तीय रिकॉर्ड की जाँच के आधार पर SEBI के प्रारंभिक निष्कर्ष बताते हैं कि कंपनी के समेकित राजस्व का लगभग 97 से 99 प्रतिशत हिस्सा विदेशी सहायक और स्टेप-डाउन सहायक कंपनियों से जुड़ा हुआ बताया गया।
हालाँकि बार-बार समन भेजे जाने के बावजूद कंपनी इन राजस्व दावों के समर्थन में सत्यापित किए जा सकने वाले दस्तावेज उपलब्ध नहीं करा सकी। SEBI ने यह भी कहा कि REL Singapore और कंपनी की अन्य कई सहायक इकाइयों की वास्तविक कारोबारी गतिविधियाँ बहुत कम थीं या लगभग नहीं थीं।
SEBI के अनुसार, कंपनी की मुख्य परिचालन इकाई के रूप में पेश की गई Valcambi SA ने अपने ऑडिट किए गए वित्तीय विवरणों में केवल बहुत मामूली स्टैंडअलोन आय दिखाई थी, जो मुख्य रूप से प्रोसेसिंग शुल्क और वैल्यू एडिशन से जुड़ी थी।
नियामक ने यह भी कहा कि GGR द्वारा समेकित स्तर पर दिखाई गई भारी-भरकम लेकिन अनऑडिटेड आय का समर्थन न तो उसके ऑडिट किए गए स्टैंडअलोन वित्तीय विवरणों से होता है और न ही उपलब्ध लेनदेन रिकॉर्ड या सामान्य अकाउंटिंग सिद्धांतों से। SEBI ने जोर देकर कहा कि समस्या केवल कुछ जानकारी उपलब्ध न होने की नहीं है।
असली मुद्दा यह है कि कंपनी द्वारा समेकित स्तर पर दिखाई गई आय को लंबे समय तक बार-बार माँगे जाने और पर्याप्त अवसर दिए जाने के बावजूद सत्यापित नहीं किया जा सका। SEBI के आदेश में कहा गया है कि कंपनी ने लेनदेन से जुड़े रिकॉर्ड, ग्राहकों का विवरण, विक्रेताओं की पुष्टि, चालान, स्टॉक संबंधी रिकॉर्ड और अन्य मूल साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराए।
वहीं जिस विदेशी इकाई को मुख्य कारोबारी इकाई बताया गया, उसने भी बहुत कम स्टैंडअलोन आय दिखाई। इसके अलावा अन्य सहायक कंपनियों की ओर से भी कोई ठोस कारोबारी गतिविधि साबित नहीं की जा सकी। ऐसे में कंपनी द्वारा घोषित समेकित राजस्व के आँकड़े व्यावसायिक रूप से अविश्वसनीय प्रतीत होते हैं।
SEBI की जाँच में यह भी सामने आया कि वित्त वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच कंपनी ने अपनी सहायक कंपनियों से जुड़ी लगभग 15,15,385 करोड़ रुपए की आय को कथित तौर पर गलत तरीके से प्रस्तुत किया। यह राशि कंपनी द्वारा दिखाई गई कुल आय का करीब 99.80 प्रतिशत हिस्सा है।
SEBI का कहना है कि पहली नजर में ऐसा लगता है कि कंपनी की इन गतिविधियों ने निवेशकों और शेयर बाजार के सामने राजेश एक्सपोर्ट्स के कारोबार के आकार, उसकी वित्तीय स्थिति और आर्थिक मजबूती की एक बढ़ी-चढ़ी और भ्रामक तस्वीर पेश करने में मदद की।
राजस्व को बढ़ाकर दिखाने के आरोपों के अलावा SEBI ने कंपनी से जुड़े कुछ संदिग्ध लेनदेन की भी जाँच की। जाँच के दौरान पाया गया कि राजेश एक्सपोर्ट्स ने Affluence Shares and Stocks Pvt Ltd के साथ 11,487 करोड़ रुपए की बिक्री और 11,488 करोड़ रुपए की खरीद दिखाई थी।
हालाँकि इस कंपनी ने राजेश एक्सपोर्ट्स के साथ किसी भी प्रकार के कारोबारी संबंध होने से इनकार किया और कहा कि उसका लेनदेन सीधे कंपनी के बजाय व्यक्तिगत रूप से राजेश मेहता के साथ था। SEBI की जाँच में यह भी सामने आया कि कंपनी का पैसा पहले राजेश मेहता से जुड़ी संस्थाओं तक पहुँचाया गया और फिर वहां से उनके निजी खातों में भेजा गया।
हालाँकि इन लेनदेन को कंपनी के खातों में दर्ज किया गया था, लेकिन कुछ धनराशि का इस्तेमाल बोर्ड की मंजूरी और संबंधित पक्षों (Related Party Transactions) से जुड़े आवश्यक खुलासों के बिना व्यक्तिगत डेरिवेटिव ट्रेडिंग में किया गया। बाद में इस धन का कुछ हिस्सा वापस भी लौटा दिया गया।
SEBI के आदेश में कई अन्य संदिग्ध पहलुओं का भी उल्लेख किया गया है। इनमें अफ्रीका में सोने की खदान से जुड़े एक निवेश का मामला भी शामिल है, जिसमें लगभग 10.35 करोड़ रुपए लगाए गए थे। जाँच के दौरान इस निवेश से जुड़े पर्याप्त दस्तावेज, मूल्यांकन रिपोर्ट और ग्राहकों, विक्रेताओं तथा सहायक कंपनियों के वित्तीय रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं मिले।
गौरतलब है कि राजेश एक्सपोर्ट्स के खिलाफ जाँच मार्च 2024 में शुरू हुई थी। यह जाँच एक शेयरधारक की शिकायत के बाद शुरू की गई, जिसमें दो साल से अधिक समय से बकाया पड़े असामान्य रूप से बड़े व्यापारिक देयों (Trade Receivables) पर सवाल उठाए गए थे।
अब SEBI ने राजेश एक्सपोर्ट्स और उसके प्रबंध निदेशक राजेश मेहता को प्रतिभूति बाजार में कारोबार करने से रोक दिया है। हालाँकि राजेश एक्सपोर्ट्स ने अपने ऊपर लगाए गए सभी आरोपों को खारिज किया है, लेकिन SEBI की कार्रवाई का असर कंपनी और उसके निवेशकों पर साफ दिखाई दिया।
4 जून को कंपनी का शेयर 5 प्रतिशत के लोअर सर्किट पर पहुंच गया और करीब 104 रुपए पर कारोबार करता दिखा। पिछले तीन वर्षों में कंपनी के शेयर की कीमत 80 प्रतिशत से अधिक गिर चुकी है। इसका असर भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) पर भी पड़ा है, जिसके पास राजेश एक्सपोर्ट्स में 10.8 प्रतिशत हिस्सेदारी है।
इस हिस्सेदारी का मूल्य करीब 334 करोड़ रुपए बताया जाता है। रिपोर्टों के अनुसार, 2023 से अब तक निवेशकों को कुल मिलाकर लगभग 12,700 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है, जिससे करीब 1.94 लाख शेयरधारक प्रभावित हुए हैं।
सफलता की मिसाल से लेकर SEBI की जाँच तक: कौन हैं राजेश मेहता?
20 जून 1964 को बेंगलुरु में जन्मे राजेश जसवंत राय मेहता खुद के दम पर सफल हुए कारोबारी माने जाते हैं। उनका परिवार मूल रूप से गुजरात के मोरबी का रहने वाला जैन परिवार है। राजेश मेहता का सपना डॉक्टर बनने का था और उन्होंने नेशनल कॉलेज में पढ़ाई भी की लेकिन वे अपनी उच्च शिक्षा पूरी नहीं कर सके।
इसके बाद उन्होंने पारिवारिक कारोबार में हाथ बँटाना शुरू किया। वर्ष 1985 में उन्होंने अपने भाई प्रशांत मेहता के साथ मिलकर चाँदी के व्यापार की एक कंपनी शुरू की। इसके लिए शुरुआती पूँजी उनके दूसरे भाई बिपिन मेहता से उधार ली गई थी। मेहता बंधु चेन्नई से आभूषण खरीदते थे और उन्हें गुजरात व दक्षिण भारत के विभिन्न बाजारों में मुनाफे के साथ बेचते थे।
धीरे-धीरे राजेश मेहता ने आभूषणों का एक बड़ा थोक कारोबार खड़ा कर लिया। उन्होंने भारतीय पारंपरिक डिजाइनों को अलग-अलग बाजारों तक पहुँचाने में भी भूमिका निभाई और ‘राजेश आर्ट ज्वेलर्स’ के नाम से कारोबार संचालित किया। वर्ष 1989 में राजेश मेहता ने बेंगलुरु के एक गैरेज में केवल 10 कर्मचारियों के साथ राजेश एक्सपोर्ट्स की स्थापना की।
रिपोर्टों के अनुसार, यह भारत की शुरुआती संगठित स्वर्ण आभूषण निर्माण इकाइयों में से एक थी। कंपनी का मुख्य कारोबार संयुक्त अरब अमीरात (UAE), ब्रिटेन, ओमान, कुवैत, अमेरिका और यूरोप को सोने के आभूषणों का निर्यात करना था। 1992 तक कंपनी का कारोबार लगभग 2 करोड़ रुपए तक पहुँच गया था।
इसके बाद इसमें तेजी से वृद्धि हुई और 1998 तक इसका टर्नओवर करीब 120 करोड़ रुपए हो गया। 1994 तक राजेश एक्सपोर्ट्स भारत की सबसे बड़ी स्वर्ण आभूषण निर्यातक और थोक विक्रेता कंपनियों में शामिल हो चुकी थी। वर्ष 1995 में कंपनी ने अपना IPO लाया, जिससे लगभग 10 करोड़ रुपए जुटाए गए।
इसके बाद कंपनी ने सोने के पूरे कारोबार में विस्तार किया, जिसमें रिफाइनिंग, निर्माण और खुदरा बिक्री शामिल थी। राजेश एक्सपोर्ट्स ‘शुभ ज्वेलर्स’ नाम से रिटेल ज्वेलरी चेन भी संचालित करती है। कंपनी की वेबसाइट के अनुसार, राजेश एक्सपोर्ट्स दुनिया में उत्पादित होने वाले लगभग 35 प्रतिशत सोने को प्रोसेस करने का दावा करती है।
वर्ष 2015 में राजेश एक्सपोर्ट्स ने स्विट्जरलैंड की कंपनी वैलकैम्बी एसए (Valcambi SA) का लगभग 40 करोड़ डॉलर (400 मिलियन डॉलर) के नकद सौदे में अधिग्रहण करके बाजार विशेषज्ञों को चौंका दिया था। उस समय वैलकैम्बी दुनिया की सबसे बड़ी गोल्ड रिफाइनिंग कंपनी मानी जाती थी।
हालाँकि अधिग्रहण के बाद वैलकैम्बी भी विवादों में घिर गई। कंपनी पर दुबई से आने वाले कथित ‘डर्टी गोल्ड’ (संदिग्ध स्रोतों से प्राप्त सोना) को प्रोसेस करने के आरोप लगे थे। इन विवादों के बीच ऐसी खबरें भी सामने आईं कि वैलकैम्बी ने स्विस गोल्ड एसोसिएशन की सदस्यता छोड़ दी थी।
एक समय राजेश एक्सपोर्ट्स का नाम फॉर्च्यून 500 कंपनियों की सूची में शामिल था। राजस्व के आधार पर इसे भारत की सबसे बड़ी सूचीबद्ध कंपनियों में गिना जाता था। हालाँकि अब SEBI की जाँच में आरोप लगाया गया है कि हाल के वर्षों में कंपनी द्वारा दिखाए गए राजस्व का बड़ा हिस्सा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया था और वास्तविक नहीं था।
राजेश मेहता को अपने कारोबारी जीवन में कई पुरस्कार और सम्मान मिले। उन्हें ‘उद्योग श्री’, कर्नाटक सरकार का ‘ज्वेलर ऑफ द ईयर’ पुरस्कार, चीन में ‘आउटस्टैंडिंग बिजनेसमैन’ सम्मान और फोर्ब्स की 2017 की भारत के सबसे अमीर लोगों की सूची में भी जगह मिली थी। राजेश एक्सपोर्ट्स को कई सरकारी योजनाओं का लाभ भी मिला।
वर्ष 2022 में कंपनी एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल (ACC) बैटरी स्टोरेज के लिए घोषित 18,100 करोड़ रुपए की PLI योजना के लाभार्थियों में शामिल थी। हालाँकि राजेश एक्सपोर्ट्स 2024 में SEBI की जाँच के दायरे में आई, लेकिन उससे पहले भी कई विश्लेषक और निवेशक कंपनी की असाधारण रूप से ऊँची आय, बड़े नकद भंडार और उसकी सहायक कंपनियों से जुड़ी सीमित पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाते रहे थे।
कुछ लोगों ने तो राजेश एक्सपोर्ट्स की स्थिति की तुलना गीतांजलि जेम्स के पतन से भी की, जिसे भारत के सबसे चर्चित ज्वेलरी निर्यात घोटालों में से एक माना जाता है।
(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर पंजाब के ‘शिक्षा क्षेत्र में नंबर-1’ बनने की काफी चर्चा हो रही है। स्कूल शिक्षा में शीर्ष स्थान मिलने के बाद इस बात पर राजनीतिक बहस शुरू हो गई है कि इसका श्रेय किसे मिलना चाहिए।
आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार इसे अपनी शिक्षा सुधार नीतियों का नतीजा बता रही है। पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने कहा कि भगवंत मान सरकार के दौरान पंजाब 27वें स्थान से पहले नंबर पर पहुँचा है।
हालाँकि, कॉन्ग्रेस विधायक और पंजाब के पूर्व शिक्षा मंत्री परगट सिंह ने इस दावे पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि पंजाब में शिक्षा सुधार की शुरुआत पिछली कॉन्ग्रेस सरकार के समय ही हो गई थी और 2022 में AAP के सत्ता में आने से पहले हुए बड़े शिक्षा सर्वे में इसके संकेत दिखने लगे थे।
यह विवाद दिल्ली की उस पुरानी बहस की याद दिलाता है, जब कॉन्ग्रेस नेताओं ने AAP पर आरोप लगाया था कि उसने शिक्षा क्षेत्र में उन सुधारों का श्रेय लिया, जिसकी नींव शीला दीक्षित सरकार के दौरान रखी गई थी। अब पंजाब में भी यही सवाल उठ रहा है कि शिक्षा जैसे लंबे समय के सुधार का असली श्रेय किसे मिलना चाहिए।
क्या है AAP का दावा?
यह विवाद तब शुरू हुआ जब पंजाब सरकार ने हालिया रैंकिंग में अपने प्रदर्शन को लेकर हुए दावा किया कि राज्य स्कूल शिक्षा में देश में नंबर-1 बना है। अरविंद केजरीवाल, मुख्यमंत्री भगवंत मान और अन्य AAP नेताओं ने इस उपलब्धि का श्रेय 2022 में पार्टी के सत्ता में आने के बाद किए गए शिक्षा सुधारों को दिया।
सरकार का कहना है कि स्कूल्स ऑफ एमिनेंस, फिनलैंड और सिंगापुर जैसे देशों में शिक्षकों की ट्रेनिंग, शिक्षकों और स्टाफ की भर्ती, स्मार्ट क्लासरूम का विस्तार और स्कूलों के बुनियादी ढाँचे में सुधार जैसे कदमों से सरकारी स्कूलों में बड़ा बदलाव आया है।
AAP का दावा है कि इन पहलों की वजह से पंजाब की शिक्षा व्यवस्था मजबूत हुई और राज्य शिक्षा रैंकिंग में शीर्ष स्थान तक पहुँचा है। केजरीवाल ने यह भी कहा कि पहले पंजाब शिक्षा रैंकिंग में निचले पायदान पर था लेकिन अब नंबर-1 बन गया है जिसे AAP सरकार के शिक्षा मॉडल की सफलता के तौर पर पेश किया जा रहा है।
रियलिटी चेक: क्या पंजाब की शिक्षा में सुधार AAP के आने से पहले शुरू हो गया था?
AAP पंजाब के शिक्षा क्षेत्र में सुधार का श्रेय अपनी सरकार को दे रही है लेकिन घटनाक्रम की टाइमलाइन बताती है कि राज्य में सुधार की शुरुआत पार्टी के सत्ता में आने से पहले ही हो चुकी थी। AAP सरकार ने मार्च 2022 में पंजाब में सत्ता संभाली थी लेकिन जिन अहम सर्वे और रिपोर्टों का हवाला दिया जा रहा है, उनमें से कुछ का डेटा 2022 से पहले का है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इस उपलब्धि का पूरा श्रेय AAP सरकार को मिलना चाहिए या फिर वह पहले से किए गए काम का फायदा उठा रही है?
उदाहरण के तौर पर, नेशनल अचीवमेंट सर्वे (NAS) 2021 जो देशभर में छात्रों की पढ़ाई और सीखने के स्तर को मापता है, AAP सरकार बनने से कई महीने पहले किया गया था। इस सर्वे में पंजाब का प्रदर्शन अच्छा रहा था और राज्य बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों में शामिल था। इसी तरह कॉन्ग्रेस नेताओं ने पहले की परफॉर्मेंस ग्रेडिंग इंडेक्स (PGI) रिपोर्टों का हवाला देते हुए दावा किया है कि पंजाब में शिक्षा क्षेत्र में सुधार के संकेत सरकार बदलने से पहले ही दिखने लगे थे।
हालाँकि इसका यह मतलब नहीं है कि मौजूदा सरकार की कोई भूमिका नहीं रही। सत्ता में आने के बाद AAP सरकार ने स्कूल्स ऑफ एमिनेंस शुरू किए, शिक्षकों के लिए ट्रेनिंग कार्यक्रम चलाए, भर्ती अभियान शुरू किए और स्कूलों के बुनियादी ढाँचे को बेहतर बनाने पर काम किया। लेकिन शिक्षा क्षेत्र में सुधार आमतौर पर लंबे समय में असर दिखाते हैं और इनके नतीजे सामने आने में कई साल लग सकते हैं। ऐसे में किसी एक सरकार को पूरे सुधार का श्रेय देना आसान नहीं होता।
इसलिए टाइमलाइन से यह संकेत जरूर मिलता है कि पंजाब की शिक्षा में सुधार की प्रक्रिया AAP के सत्ता में आने से पहले ही शुरू हो चुकी थी। हालाँकि, मौजूदा सरकार ने अपने स्तर पर कई नई पहलें जारी रखीं और सुधारों को आगे बढ़ाने की कोशिश की।
एक और महत्वपूर्ण बात जो अक्सर राजनीतिक बहस में छूट जाती है, वह यह है कि पंजाब को भारत का कुल मिलाकर शिक्षा में नंबर-1 राज्य घोषित नहीं किया गया है। AAP सरकार जिस रैंकिंग का हवाला दे रही है, वह केवल स्कूल शिक्षा के संकेतकों और छात्रों के सीखने के परिणामों (learning outcomes) से जुड़ी है। इसमें पूरे शिक्षा क्षेत्र को नहीं मापा गया है, जिसमें उच्च शिक्षा, विश्वविद्यालय, रिसर्च आउटपुट, शिक्षकों की गुणवत्ता, रोजगार क्षमता और अन्य कई मानक शामिल होते हैं। इसलिए यह कहना कि पंजाब पूरे शिक्षा क्षेत्र में भारत का नंबर-1 राज्य बन गया है, पूरी तरह गलत है। ऐसे दावों का प्रचार लोगों के बीच भ्रम फैला सकता है लेकिन सच को लंबे समय तक छिपाए नहीं रहा जा सकता है।
दिल्ली जैसा विवाद: बेहतर शिक्षा का श्रेय किसे?
पंजाब में शिक्षा को लेकर छिड़ी बहस नई नहीं है। इससे पहले दिल्ली में भी ऐसा ही विवाद हुआ था। AAP सरकार ने शिक्षा मॉडल को अपनी बड़ी उपलब्धि बताया लेकिन कॉन्ग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि पार्टी उन सुधारों का श्रेय ले रही है जिसकी नींव पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित सरकार के दौरान रखी गई थी।
शीला दीक्षित के 15 साल के कार्यकाल में स्कूलों के बुनियादी ढाँचे, नई कक्षाओं, सुविधाओं और शिक्षा बजट पर काफी काम हुआ था। वहीं सत्ता में आने के बाद AAP ने शिक्षक प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम सुधार और स्कूलों के आधुनिकीकरण जैसे कई नए कदम उठाए।
कॉन्ग्रेस का कहना था कि AAP जिन सुधारों का प्रचार कर रही है, वे पहले से किए गए निवेश का नतीजा थे। हालाँकि AAP ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उसने अपनी नीतियों और सुधारों से शिक्षा व्यवस्था को बदला है। इसके बाद यह बहस शुरू हो गई कि शिक्षा में सफलता का असली श्रेय उस सरकार को मिलना चाहिए जिसने सुधार शुरू किए या उस सरकार को जिसने उन्हें आगे बढ़ाया और बड़े स्तर पर लागू किया।
अब पंजाब में भी कॉन्ग्रेस इसी तरह के आरोप लगा रही है तो इससे यह बहस फिर से तेज हो गई है कि शिक्षा जैसे लंबे समय में दिखने वाले सुधारों का असली श्रेय किसे मिलना चाहिए।
निष्कर्ष
पंजाब की हालिया शिक्षा रैंकिंग ने निश्चित तौर पर AAP सरकार के इस दावे को मजबूत किया है कि उसके शिक्षा सुधारों का असर दिख रहा है। लेकिन इस उपलब्धि को लेकर पैदा हुआ राजनीतिक विवाद एक बड़ा सवाल खड़ा करता है कि ऐसे सुधारों का श्रेय किसे मिलना चाहिए, जिनका असर दिखने में कई साल लगते हैं?
टाइमलाइन यह संकेत देती है कि पंजाब में शिक्षा सुधार की शुरुआत 2022 में AAP सरकार आने के तुरंत बाद नहीं हुई थी। सरकार बदलने से पहले हुए सर्वे और मूल्यांकन के आँकड़े बताते हैं कि राज्य में सुधार के संकेत पहले ही दिखाई देने लगे थे। हालाँकि, मौजूदा सरकार ने भी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए अपनी तरफ से कई नई पहलें शुरू की हैं।
यह विवाद दिल्ली की उस पुरानी बहस जैसा भी नजर आता है जब कॉन्ग्रेस नेताओं ने AAP पर आरोप लगाया था कि वह उन सुधारों का श्रेय ले रही है जिसकी नींव शीला दीक्षित सरकार के दौरान रखी गई थी। चाहे कोई इस तुलना से सहमत हो या नहीं लेकिन दोनों मामले यह दिखाते हैं कि शिक्षा सुधार आमतौर पर कई सरकारों के प्रयासों का नतीजा होते हैं।
यह भी समझना जरूरी है कि पंजाब का हालिया प्रदर्शन मुख्य रूप से स्कूल शिक्षा और छात्रों के सीखने के परिणामों से जुड़ा है। इसलिए यह दावा करना गलत होगा कि पंजाब पूरे शिक्षा क्षेत्र में भारत का नंबर-1 राज्य बन गया है। ऐसा दावा करने के लिए उच्च शिक्षा संस्थानों, विश्वविद्यालयों, रिसर्च, रोजगार क्षमता और शिक्षा से जुड़े अन्य मानकों की भी तुलना जरूरी होती है।
(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)
ना केवल तमिलनाडु बल्कि पूरे दक्षिण में बीजेपी के सबसे चर्चित चेहरों में शामिल के. अन्नामलाई ने पार्टी छोड़ दी है। अन्नामलाई ने ‘वी द लीडर्स’ नाम से अपनी पार्टी का गठन किया है और वो अब तमिलनाडु में जन आंदोलन करेंगे और चुनाव भी लड़ेंगे। अन्नामलाई के जाने के बाद सोशल मीडिया पर यह बात तैरने लगी है कि बीजेपी बीच सफर में अपने नेताओं या अपने सहयोगियों को छोड़ देती हैं।
हालाँकि, इस बात में कितनी सच्चाई है ये हम इस लेख में जानेंगे। पहली शुरुआत BJP और अन्नामलाई से ही करते हैं। चाहते तो अन्नामलाई तमिलनाडु में बैठ इस्तीफा दे देते लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
बीजेपी ने उन्हें साथ रखने की लगातार कोशिशें कीं, पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन से लेकर गृह मंत्री अमित शाह ने उनसे बातचीत की उनकी शिकायतों को समझा और साथ देने की भी बात कही। लेकिन बात नहीं बनी और इसमें अन्नामलाई की भी अपनी वजह रही होंगी।
वो बीजेपी ही थी जिसने अन्नामलाई को तमिलनाडु में पार्टी का नेतृत्व करने का मौका दिया और पूरी ताकत उनके पीछे लगा दी। सार्वजनिक मंचों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर बीजेपी के तमाम बड़े नेता जिस अपनेपन के साथ अन्नामलाई को संबोधित करते उससे साफ नजर आता था कि वो अन्नामलाई में एक भविष्य का नेता देखते हैं लेकिन ये साथ लंबा नहीं चला तो इसके लिए बीजेपी ही जिम्मेदार नहीं।
यह आरोप कि बीजेपी अपने सहयोगियों को खत्म कर देती है, उन्हें धीरे-धीरे कमजोर कर देती है और अंततः उनकी राजनीतिक जमीन अपने कब्जे में ले लेती है। यह आरोप इतना दोहराया गया है कि कई लोगों ने इसे लगभग सत्य मान लिया। लेकिन क्या वास्तव में तस्वीर इतनी सीधी है? क्या हर राज्य में BJP ने अपने सहयोगियों को किनारे लगाया या कई मामलों में उसने राजनीतिक लाभ की स्थिति में होते हुए भी सहयोगियों को नेतृत्व, सम्मान और जगह दी?
अगर भारतीय राजनीति को सिर्फ आरोपों से नहीं बल्कि उदाहरणों और घटनाओं के क्रम से समझा जाए, तो एक दूसरा पक्ष भी साफ दिखाई देता है कि BJP की गठबंधन राजनीति का एक बड़ा आधार सहयोगियों को साथ लेकर चलने की रणनीति रही है। यह रणनीति हमेशा सफल रही हो, ऐसा नहीं है। मतभेद भी हुए, रिश्ते टूटे भी लेकिन यह कहना कि BJP का स्वभाव ही सहयोगियों को खत्म करना है, तथ्यों के सामने अधूरा तर्क नजर आता है।
सबसे पहले बिहार को देखिए। नीतीश कुमार की जेडीयू और BJP के बीच लंबे समय से संबंध है। नीतीश लंबे वक्त तक बीजेपी के साथ राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं। 2020 विधानसभा चुनाव में BJP ने 74 सीटें जीतीं जबकि जेडीयू 43 सीटों पर सिमट गई। BJP स्पष्ट रूप से बड़ी पार्टी बन चुकी थी। सामान्य राजनीतिक गणित कहता कि मुख्यमंत्री BJP का होना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही बने। BJP ने अपने बड़े जनादेश के बावजूद गठबंधन धर्म को प्राथमिकता दी और सहयोगी दल के नेता को शीर्ष पद पर बनाए रखा। यह कोई छोटी राजनीतिक घटना नहीं थी। भारतीय राजनीति में सत्ता अक्सर संख्या के हिसाब से चलती है लेकिन यहाँ BJP ने संख्या से ऊपर गठबंधन को रखा।
बाद में 2022 में जेडीयू ने खुद NDA छोड़ा और महागठबंधन में चली गई यानी रिश्ता टूटने की शुरुआत BJP की ओर से नहीं हुई। अब दोनों दल साथ हैं और जेडीयू का राजनीतिक स्पेस आज भी उनता ही मजबूत है।
बिहार की बात सिर्फ जेडीयू तक सीमित नहीं है। भाजपा ने जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) को लगातार राजनीतिक स्पेस दिया। मुकेश सहनी की VIP पार्टी को भी गठबंधन में जगह दी गई, चिराग पासवान की लोजपा (रामविलास) लगातार NDA में है और राजनीतिक महत्व बना हुआ है।
ये वे दल थे जिनकी अपनी सीटें सीमित थीं लेकिन BJP ने उन्हें राजनीतिक प्रासंगिकता दी। अगर उद्देश्य केवल सहयोगियों को खत्म करना होता, तो छोटे दलों को सीटें देकर अपने वोट बैंक का हिस्सा साझा करने की मजबूरी BJP क्यों स्वीकार करती?
महाराष्ट्र का उदाहरण भी कम दिलचस्प नहीं है। भाजपा और शिवसेना का रिश्ता कोई 5-10 साल का नहीं था बल्कि यह लगभग तीन दशक तक चला। 1980 के दशक के अंत से दोनों दल साथ आए और महाराष्ट्र की राजनीति में एक वैचारिक साझेदारी बनी।
2019 विधानसभा चुनाव में दोनों ने साथ चुनाव लड़ा और बहुमत हासिल किया। भाजपा 105 सीटों पर और शिवसेना 56 सीटों पर जीती। लेकिन सरकार गठन के समय मुख्यमंत्री पद को लेकर विवाद हुआ और उद्धव ठाकरे ने कॉन्ग्रेस और NCP के साथ सरकार बनाने का फैसला किया। यहाँ भी यह गठबंधन तोड़ने की पहल भाजपा की तरफ से नहीं की गई थी।
हाँ, बाद के वर्षों में शिवसेना में विभाजन हुआ और एकनाथ शिंदे गुट भाजपा के साथ आया। आलोचक इसे भाजपा की रणनीति कह सकते हैं लेकिन उतना ही बड़ा तथ्य यह भी है कि भाजपा चाहती तो मुख्यमंत्री पद अपने पास रख सकती थी, फिर भी शिंदे को मुख्यमंत्री बनाया गया। महाराष्ट्र में सबसे बड़ी ताकत होने के बावजूद सहयोगी चेहरे को आगे रखना भाजपा की गठबंधन शैली का हिस्सा था।
पंजाब में शिरोमणि अकाली दल भाजपा का सबसे पुराना सहयोगी था। दोनों का रिश्ता दो दशक से अधिक समय तक चला। कृषि कानूनों के मुद्दे पर मतभेद बढ़े और 2020 में अकाली दल ने एनडीए छोड़ने का फैसला किया। यह अलग बात है कि किसान आंदोलन के दबाव और पंजाब की राजनीति ने अकाली दल को यह निर्णय लेने पर मजबूर किया, लेकिन तथ्य यह है कि गठबंधन से बाहर निकलने की घोषणा अकाली दल की ओर से हुई थी। भाजपा ने अपने सबसे पुराने सहयोगी को बाहर नहीं किया बल्कि सहयोगी ने खुद रास्ता अलग चुना।
उत्तर प्रदेश में भाजपा की राजनीति को देखें तो यहाँ भी सहयोगियों को साथ रखने का एक मॉडल दिखता है। अपना दल (एस) की अनुप्रिया पटेल हों या निषाद पार्टी के संजय निषाद दोनों दलों को भाजपा ने केवल चुनावी समय की जरूरत नहीं माना।
मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व दिया गया, सीटों में भागीदारी दी गई और सामाजिक समीकरणों में उन्हें जगह मिली। भाजपा समझती रही कि उत्तर प्रदेश जैसी विशाल राजनीति केवल अकेले नहीं लड़ी जा सकती, सामाजिक आधार का विस्तार सहयोगियों के साथ ही संभव है।
पूर्वोत्तर में भाजपा की गठबंधन नीति शायद सबसे अधिक स्पष्ट दिखाई देती है। नागालैंड में भाजपा ने नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (NDPP) के साथ चुनाव लड़ा और क्षेत्रीय नेतृत्व को स्वीकार किया। असम में असम गण परिषद (AGP) को साथ रखा गया।
मेघालय और मणिपुर में भी क्षेत्रीय दलों के साथ साझा सत्ता मॉडल अपनाया गया। भाजपा चाहती तो अपनी राष्ट्रीय ताकत के आधार पर ‘बड़े भाई’ की राजनीति कर सकती थी लेकिन पूर्वोत्तर में उसने स्थानीय नेतृत्व और क्षेत्रीय आकांक्षाओं के साथ समन्वय का रास्ता चुना। यही कारण है कि एनडीए का विस्तार पूर्वोत्तर में सबसे तेज हुआ।
आंध्र प्रदेश इसका नया उदाहरण है। 2024 के बाद जब चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी एनडीए के लिए अहम सहयोगी बनकर उभरी, तब भाजपा ने न केवल उन्हें महत्व दिया बल्कि गठबंधन को स्थिर बनाए रखने की कोशिश की। राष्ट्रीय स्तर पर बहुमत के समीकरण में सहयोगियों की अहमियत को भाजपा ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया। यह वही राजनीति है जिसमें ‘एकला चलो’ के बजाय ‘साथ लेकर चलो’ का संकेत दिखता है।
दिलचस्प बात यह है कि भाजपा पर सबसे ज्यादा आरोप वही लोग लगाते हैं जो कॉन्ग्रेस की गठबंधन राजनीति को भूल जाते हैं, इतिहास में ऐसे तमाम उदाहरण भरे पड़े हैं। हाल ही में तमिलनाडु में भी ऐसा ही दिखा। कॉन्ग्रेस वर्षों तक DMK के साथ रही लेकिन राजनीतिक समीकरण बदलते ही रिश्तों में दूर बढ़। कॉन्ग्रेस ने DMK की पीठ में छुरा घोंप दिया और विजय की TVK के साथ हाथ मिला लिया।
यह भी सच है कि गठबंधन राजनीति हमेशा बराबरी का रिश्ता नहीं होती। बड़ी पार्टी स्वाभाविक रूप से प्रभावशाली होती है। भाजपा भी अपवाद नहीं। कई सहयोगी कमजोर भी पड़े, कुछ दलों का जनाधार भाजपा के विस्तार से प्रभावित भी हुआ। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह भाजपा की ‘साजिश’ थी या भारतीय राजनीति का स्वाभाविक परिणाम।
इतना जरूर दिखता है कि भाजपा ने कई बार राजनीतिक लाभ की स्थिति में होते हुए भी सहयोगियों को नेतृत्व दिया, मुख्यमंत्री पद छोड़ा, सीटें साझा कीं और छोटे दलों को राष्ट्रीय राजनीति में जगह दी। बिहार में नीतीश कुमार, महाराष्ट्र में शिंदे, उत्तर प्रदेश में अपना दल और निषाद पार्टी और भी तमाम उदाहरण केवल संयोग नहीं लगते।
इसलिए जब यह कहा जाता है कि भाजपा सहयोगियों को ‘खा जाती’ है, तब शायद यह भी पूछना चाहिए कि अगर ऐसा ही होता तो इतने क्षेत्रीय दल बार-बार उसके साथ क्यों लौटते?
दुनिया की सियासत आजकल इतनी तेज रफ्तार से भाग रही है कि पलक झपकते ही पुराने समीकरण ध्वस्त हो जाते हैं और नए गठजोड़ आकार ले लेते हैं। आज पूरी दुनिया का ध्यान मिडिल ईस्ट के तनाव, ईरान और इजरायल के बीच छिड़ी जंग और पश्चिमी देशों की अंदरूनी उठापटक पर टिका हुआ है। लेकिन इसी वैश्विक शोर-शराबे के बीच भारत के पूर्वी छोर पर एक ऐसी खामोश मगर बेहद आक्रामक और रणनीतिक बिसात बिछाई जा रही है, जो आने वाले समय में पूरे एशिया की भूगोल और अर्थव्यवस्था को हमेशा के लिए बदलकर रख देगी।
अभी कुछ दिन पहले ही म्यांमार के राष्ट्रपति अपने पहले आधिकारिक विदेश दौरे पर किसी और देश जाने के बजाय सीधे भारत की धरती पर कदम रखते हैं। नई दिल्ली के गलियारों में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और म्यांमार के शीर्ष नेतृत्व के बीच आमने-सामने की बातचीत हुई, तो कई ऐसे मुद्दों पर जमी हुई बर्फ पिघली जो सालों से ठंडे बस्ते में अटके पड़े थे। इस रणनीतिक और कूटनीतिक मुलाकात ने भारत की ‘लुक ईस्ट’ और ‘एक्ट ईस्ट’ पॉलिसी में एक नया बारूद भरने का काम किया है, जिसकी गूंज बीजिंग से लेकर इस्लामाबाद तक सुनाई दे रही है।
इस पूरी भू-राजनीतिक हलचल के केंद्र में एक ऐसा महा-प्रोजेक्ट है, जो चीन के सबसे महात्वाकांक्षी और प्रचारित प्रोजेक्ट यानी चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के घमंड को चूर-चूर करने का दम रखता है। हम बात कर रहे हैं इंडिया-म्यांमार-थाईलैंड हाईवे की, जिसे संक्षेप में आईएमटी हाईवे भी कहा जाता है। यह सिर्फ कोलकाता से बैंकॉक को जोड़ने वाली कोई साधारण पक्की सड़क नहीं है, बल्कि यह भारत का वो ब्रह्मास्त्र है जो दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के विशाल बाजारों में भारत की आर्थिक धाक जमाने की नीव रखने जा रहा है।
क्या है IMT हाईवे और इसका पूरा मास्टरप्लान?
अगर आप भारत का नक्शा ध्यान से देखें, तो हमारे पूर्वोत्तर के राज्य चारों तरफ से जमीन से घिरे हुए हैं और उनके पास अपना कोई स्वतंत्र समुद्र तट नहीं है। अब तक की स्थिति यह रही है कि अगर पूर्वोत्तर के राज्यों से कोई सामान विदेश भेजना हो या देश के बाकी हिस्सों में लाना हो, तो उसे ‘चिकन नेक’ कहे जाने वाले बेहद संकरे सिलीगुड़ी कॉरिडोर से घुमाकर कोलकाता बंदरगाह तक लाना पड़ता है। इसके बाद ही उसे पानी के जहाज के जरिए दुनिया भर में भेजा जाता है, जिससे समय और पैसा दोनों पानी की तरह बहते हैं।
लेकिन प्रकृति ने भारत को पूर्व की तरफ एक और ऐसा रास्ता दिया है जो सीधे तौर पर अंतरराष्ट्रीय बाजारों का द्वार खोलता है। मणिपुर की सीमा सीधे म्यांमार से लगती है और म्यांमार की भौगोलिक सीमाएँ आगे बढ़कर सीधे थाईलैंड को छूती हैं। भारत ने इसी भूगोल का रणनीतिक फायदा उठाने के लिए आज से लगभग चौबीस साल पहले यानी साल 2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में एक ऐतिहासिक और दूरदर्शी प्लान तैयार किया था, जिसे आज हम कोलकाता-बैंकॉक एक्सप्रेसवे के नाम से भी जानते हैं।
कोलकाता से बैंकॉक का सफर कार से पूरा करने का रूट मैप
यह अंतरराष्ट्रीय हाईवे कुल 1,360 किलोमीटर लंबा है और इसका पूरा खाका इस तरह तैयार किया गया है कि यह भारत के पूर्वोत्तर को दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रवेश द्वार बना दे। यह पूरा रूट कोलकाता से शुरू होकर पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी, असम के गुवाहाटी और नागालैंड के कोहिमा शहर से गुजरता हुआ मणिपुर के सीमावर्ती और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण कस्बे मोरेह तक पहुँचता है। भारत के अंदर-अंदर ही इस हाईवे की कनेक्टिविटी का दायरा लगभग 2,800 किलोमीटर तक फैल जाता है।
जैसे ही कोई वाहन मणिपुर के मोरेह की अंतरराष्ट्रीय सीमा को पार करता है, वह म्यांमार के तामू शहर में एंट्री कर जाता है। इसके बाद यह हाईवे म्यांमार के कालेवा, मांडले, और म्यावाडी जैसे प्रमुख व्यापारिक शहरों, दुर्गम पहाड़ों और घने जंगलों से गुजरता है। म्यांमार की सीमा खत्म होते ही यह सड़क सीधे थाईलैंड के माए सोट शहर में दाखिल होती है और वहां से थाईलैंड के बेहतरीन रोड नेटवर्क के जरिए सीधे राजधानी बैंकॉक को जोड़ देती है।
सबसे दिलचस्प और रणनीतिक बात यह है कि भारत का इरादा सिर्फ थाईलैंड की सीमा पर जाकर रुकने का बिल्कुल नहीं है। भारत सरकार की आने वाले समय की योजना इस हाईवे को और आगे विस्तार देने की है, जिसके तहत इसे कंबोडिया, लाओस और अंततः वियतनाम तक ले जाने का एक बड़ा मेगा प्लान तैयार किया जा चुका है। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि भविष्य में आप कोलकाता या गुवाहाटी से अपनी गाड़ी में बैठकर सीधे वियतनाम के समुद्र तट तक का सफर सड़क मार्ग से तय कर सकेंगे।
फोटो साभार: AI ChatGPT
चीन के CPEC को कैसे पटखनी देगा यह हाईवे?
जब भी दुनिया में कनेक्टिविटी, इंफ्रास्ट्रक्चर या नए व्यापारिक रास्तों की बात होती है, तो वैश्विक मीडिया में चीन के ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ और पाकिस्तान में बन रहे सीपीईसी का बहुत ढोल पीटा जाता है। चीन ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से जबरन रास्ता निकालकर अरब सागर के ग्वादर पोर्ट तक एक बड़ा कॉरिडोर खड़ा कर लिया है ताकि वह अपने शिनजियांग प्रांत को सीधे समुद्र से जोड़ सके। चीन इसी तर्ज पर म्यांमार और बांग्लादेश में भी भारी निवेश करके भारत को तीनों तरफ से घेरने की गहरी साजिश रच रहा था।
लेकिन भारत का यह त्रिपक्षीय हाईवे चीन के इसी चक्रव्यूह को तार-तार करने का सबसे अचूक और ठोस कूटनीतिक जवाब बनकर उभरा है। चीन का सीपीईसी प्रोजेक्ट पूरी तरह से कर्ज के बोझ और तानाशाही शर्तों पर टिका हुआ है, जिसने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह वेंटिलेटर पर ला खड़ा किया है। इसके विपरीत, भारत का यह हाईवे एक ‘साझा समृद्धि’ और समान विकास के मॉडल पर आधारित है, जहां भारत म्यांमार को वित्तीय और तकनीकी मदद दे रहा है, न कि उसे किसी कर्ज के जाल में फंसा रहा है।
इसके अलावा चीन का सीपीईसी जिस इलाके से गुजरता है, वह अत्यधिक अशांत, आतंकी हमलों से ग्रस्त और स्थानीय विद्रोह का सामना कर रहा है, जिससे उसका भविष्य हमेशा अधर में लटका रहता है। इसके उलट, भारत-म्यांमार-थाईलैंड रूट एक प्राकृतिक, ऐतिहासिक और बेहद सुरक्षित व्यापारिक गलियारा साबित होने जा रहा है। यह दक्षिण-पूर्व एशिया की लगभग सत्तर हजार करोड़ डॉलर की संयुक्त अर्थव्यवस्था को सीधे भारत के एक अरब से ज्यादा आबादी वाले विशाल बाजार से जोड़कर चीन के आर्थिक वर्चस्व को सीधी चुनौती देगा।
बांग्लादेश आउट… कैसे पलटी शतरंज की बाजी?
इस पूरे क्षेत्र की भू-राजनीति में एक बहुत बड़ा और अप्रत्याशित मोड़ बांग्लादेश को लेकर आया है, जिसने भारत की रणनीति को और अधिक आक्रामक बना दिया है। शेख हसीना के शासनकाल के दौरान बांग्लादेश इस पूरे कनेक्टिविटी प्लान में बहुत गहरी दिलचस्पी दिखा रहा था और चाहता था कि वह त्रिपुरा के रास्ते इस नेटवर्क का हिस्सा बन जाए ताकि ढाका का व्यापार भी बढ़ सके। लेकिन बांग्लादेश में अचानक हुए तख्तापलट के बाद वहां जो नई कार्यवाहक सरकार बनी है, उसके तेवर थोड़े बदले-बदले और असहयोग वाले नजर आ रहे हैं।
बांग्लादेश के कुछ नए रणनीतिकारों को शायद यह गलतफहमी हो गई थी कि भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के पास अंतरराष्ट्रीय व्यापार करने या समुद्र तक पहुँचने के लिए बांग्लादेश के अलावा कोई दूसरा भौगोलिक विकल्प ही नहीं है। वे इसी गुमान में बैठे थे कि भारत को अपनी जरूरतों के लिए हर हाल में उनके सामने झुकना ही पड़ेगा। लेकिन भारत ने म्यांमार के साथ अपनी बातचीत को तेज करके और इस हाईवे को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता बनाकर बांग्लादेश की इस गलतफहमी को पूरी तरह दूर कर दिया है।
देसी अंदाज में कहें तों बांग्लादेश सोच रहा था कि उनके बिना भारत का पत्ता भी नहीं हिलेगा, लेकिन भारत ने पूरब से म्यांमार का पत्ता खोलकर बांग्लादेश का झुनझुना बजा दिया।
भारत की इस कूटनीतिक चाल ने साफ कर दिया है कि आधुनिक विदेश नीति में किसी एक रास्ते या किसी एक पड़ोसी पर पूरी तरह निर्भर रहना आत्मघाती हो सकता है। अगर बांग्लादेश की नई सरकार अपने रुख को लेकर संशय में है या भारत विरोधी ताकतों को बढ़ावा देती है, तो भारत के पास म्यांमार के रास्ते थाईलैंड और पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में सीधे दाखिल होने का एक परमानेंट और बेहद मजबूत विकल्प तैयार है। अब यह पूरी तरह बांग्लादेश को तय करना है कि वह इस महाद्वीपीय विकास की रफ्तार में शामिल होना चाहता है या किनारे बैठकर पछताना चाहता है।
आखिर क्यों लग रहे 26 साल? पेच कहाँ फंसा था?
अब स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि अगर इस हाईवे का खाका साल 2002 में ही खींच लिया गया था, तो इसे पूरा होने में आखिर ढाई दशक का लंबा वक्त क्यों लग गया। इस असाधारण देरी के पीछे कोई एक प्रशासनिक कारण नहीं था, बल्कि इसके पीछे म्यांमार की जटिल आंतरिक राजनीति, बेहद कठिन भूगोल और कई अंतरराष्ट्रीय रोड़े जिम्मेदार थे, जिन्होंने इस प्रोजेक्ट की रफ्तार पर बार-बार ब्रेक लगाने का काम किया।
म्यांमार का गृहयुद्ध और तख्तापलट: इस देरी की सबसे बड़ी और मुख्य वजह म्यांमार की आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता और वहां का गृहयुद्ध रहा है। साल 2021 में म्यांमार की सेना ने लोकतांत्रिक सरकार का तख्तापलट कर दिया, जिसके बाद म्यांमार के चिन और सागाइंग जैसे प्रांतों में सेना और स्थानीय अलग-अलग जातीय विद्रोही गुटों के बीच भयंकर सशस्त्र संघर्ष छिड़ गया। चूंकि इस हाईवे का एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा इन्हीं अशांत इलाकों से होकर गुजरता है, इसलिए वहां काम कर रहे इंजीनियरों और मजदूरों की सुरक्षा के चलते काम बार-बार ठप होता रहा।
खतरनाक पहाड़ी और जंगली रास्ता: म्यांमार का भूगोल भी इस प्रोजेक्ट के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती साबित हुआ। म्यांमार के हिस्से में आने वाला कालेवा से यागी तक का जो एक सौ बीस किलोमीटर का खंड है, वह बेहद ऊंचे पहाड़ों, घने जंगलों और भूस्खलन वाले क्षेत्रों से भरा हुआ है। ऐसे दुर्गम और टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर एक आधुनिक और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप पक्की सड़क का निर्माण करना दुनिया के बेहतरीन इंजीनियरों के लिए भी किसी बड़े इम्तिहान से कम नहीं था।
जर्जर बुनियादी ढाँचा: एक और बड़ी तकनीकी बाधा यह थी कि म्यांमार के इस रूट पर अंग्रेजों के जमाने के लगभग सत्तर पुराने और जर्जर लोहे के पुल थे, जो आज के भारी-भरकम ट्रकों और कंटेनरों का वजन संभालने में पूरी तरह अक्षम थे। भारत ने इस समस्या को भांपते हुए म्यांमार को करीब एक हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की वित्तीय मदद दी ताकि इन सभी पुराने पुलों को तोड़कर उनकी जगह आधुनिक कंक्रीट के मजबूत पुल बनाए जा सकें, जिससे व्यापार में कोई बाधा न आए।
अब कैसे आएगी प्रोजेक्ट में रफ्तार?
हालाँकि अब म्यांमार के हालात में धीरे-धीरे एक सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है और वहां का सैन्य नेतृत्व भी इस बात को समझ चुका है कि विकास के बिना सत्ता को संभालना नामुमकिन है। म्यांमार के राष्ट्रपति का अपने पहले विदेश दौरे के लिए भारत को चुनना और प्रधानमंत्री मोदी के साथ इस प्रोजेक्ट को फास्ट ट्रैक पर डालने का संकल्प लेना यह साबित करता है कि अब दोनों देश इस हाईवे को हर हाल में पूरा करने के लिए कटिबद्ध हैं। इस समय इस पूरे हाईवे का लगभग सत्तर प्रतिशत से ज्यादा काम मुकम्मल हो चुका है और बाकी बचे काम को निपटाकर इसे अगले दो से तीन साल के भीतर पूरी तरह चालू करने का लक्ष्य रखा गया है।
परदे के पीछे का खेल: जापान की एंट्री और भारत की ‘सॉफ्ट पावर’
इस पूरे खेल के पीछे एक और बहुत बड़ी वैश्विक महाशक्ति भारत के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी है, और वह देश है जापान। जापान इस पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में भारत का सबसे भरोसेमंद और रणनीतिक पार्टनर बनकर उभरा है। जापान म्यांमार के भीतर कई बड़े रेलवे प्रोजेक्ट्स, पुलों के निर्माण और सड़कों के आधुनिकीकरण में भारी-भरकम निवेश कर रहा है, क्योंकि जापान का भी सीधा रणनीतिक मकसद हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की विस्तारवादी नीति और आर्थिक दादागिरी को मजबूती से रोकना है।
म्यांमार की मजबूरी और भारत की व्यावहारिक कूटनीति
दुनिया के कई पश्चिमी और यूरोपीय देशों ने म्यांमार में सैन्य शासन होने की वजह से उससे अपने सभी कूटनीतिक और व्यापारिक रिश्ते पूरी तरह तोड़ लिए हैं और उस पर कई तरह के कड़े प्रतिबंध लगा दिए हैं। लेकिन भारत ने यहां अपनी व्यावहारिक और यथार्थवादी कूटनीति का परिचय देते हुए म्यांमार की सरकार से बातचीत का रास्ता हमेशा खुला रखा। भारत इस बात को अच्छी तरह जानता है कि पड़ोसियों को बदला नहीं जा सकता और उनसे मुंह मोड़ना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए घातक हो सकता है।
भारत के कूटनीतिक विचारकों का मानना है कि किसी देश से पूरी तरह संबंध तोड़ लेने से वहां कभी भी लोकतंत्र की बहाली नहीं होती, बल्कि ऐसा करने से वहां एक बड़ा राजनीतिक और आर्थिक शून्य पैदा हो जाता है। अगर भारत म्यांमार से दूरी बना लेता, तो चीन तुरंत उस खाली जगह पर कब्जा कर लेता और म्यांमार की जमीन का इस्तेमाल भारत के खिलाफ करने लगता। इसलिए भारत ने म्यांमार की सेना और वहां के स्थानीय विद्रोही गुटों के बीच एक बेहद बारीक और चतुर संतुलन बनाकर अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखा है।
कालादान मल्टीमॉडल प्रोजेक्ट से ‘चिकन नेक’ की टेंशन खत्म
इस हाईवे के समानांतर भारत म्यांमार के ही भीतर एक और अत्यंत महत्वपूर्ण और गेम-चेंजर प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है, जिसे कलादान मल्टीमॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट कहा जाता है। यह प्रोजेक्ट भी भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के लिए एक जीवनरेखा साबित होने जा रहा है क्योंकि यह कोलकाता बंदरगाह को समुद्र के रास्ते म्यांमार के सितवे बंदरगाह से जोड़ता है। सितवे बंदरगाह को पूरी तरह भारत ने ही विकसित और फंड किया है ताकि चीन के बढ़ते समुद्री प्रभाव को बंगाल की खाड़ी में काउंटर किया जा सके।
सितवे बंदरगाह पर माल उतरने के बाद उसे कलादान नदी के जरिए अंतर्देशीय जलमार्ग से पलेटवा नामक स्थान तक ले जाया जाएगा, और फिर वहां से एक नए सड़क नेटवर्क के जरिए माल सीधे हमारे मिजोरम राज्य की सीमा में प्रवेश कर जाएगा। यह पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर नेटवर्क तैयार होने के बाद भारत की सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर निर्भरता हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी, और युद्ध जैसी किसी भी आपातकालीन स्थिति में भी हमारे पूर्वोत्तर राज्य पूरी तरह सुरक्षित और दुनिया से जुड़े रहेंगे।
इस हाईवे के पूरा होने से भारत के हाथ लगेगी कौन-कौन सी लॉटरी?
$7000 करोड़ डॉलर की इकोनॉमी और नौकरियाँ: आर्थिक विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस रूट के पूरी तरह एक्टिव होते ही भारत और आसियान देशों के बीच व्यापार में 20 से 30 फीसदी का उछाल आएगा। इससे लगभग 2 करोड़ नए रोजगार पैदा होंगे और उत्तर-पूर्व के राज्यों में विकास की बाढ़ आ जाएगी। आर्थिक विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस रूट के पूरी तरह एक्टिव होते ही भारत और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के बीच का द्विपक्षीय व्यापार कई गुना बढ़ जाएगा।
पूर्वोत्तर बनेगा ‘ग्लोबल ट्रेड हब’: मणिपुर, नागालैंड, मिजोरम और असम जैसे राज्य जो आजादी के बाद से भौगोलिक दूरी और बुनियादी ढाँचे की कमी के कारण देश की मुख्यधारा के आर्थिक विकास से थोड़े अलग-अलग से पड़े थे, वे अचानक से अंतरराष्ट्रीय व्यापार के सबसे बड़े और जीवंत हब बनकर उभरेंगे। इन राज्यों की सीमाओं पर बड़े-बड़े लॉजिस्टिक्स पार्क, अत्याधुनिक कोल्ड स्टोरेज, अंतरराष्ट्रीय होटल और मैन्युफैक्चरिंग फैक्ट्रियां स्थापित होंगी, जो वहां के युवाओं के पलायन को हमेशा के लिए रोक देंगी।
बौद्ध पर्यटन (Buddhist Tourism) को महा-बूस्ट: म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया, लाओस और वियतनाम… ये सभी मुख्य रूप से बौद्ध संस्कृति वाले देश हैं। इन देशों के करोड़ों लोग हर साल बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर जैसे पवित्र बौद्ध स्थलों के दर्शन करना चाहते हैं। इस हाईवे के बनने से बौद्ध सर्किट का ऐसा विकास होगा कि भारत के टूरिज्म सेक्टर की किस्मत बदल जाएगी। इस सड़क मार्ग के सुलभ होते ही इन देशों से लाखों की संख्या में तीर्थयात्री और पर्यटक सीधे अपनी गाड़ियों या बसों से भारत आ सकेंगे, जिससे हमारे सांस्कृतिक संबंध और मजबूत होंगे। खुद म्यांमार के राष्ट्रपति ने अपने इस दौरे में बोधगया जाकर इस बात के संकेत दे दिए हैं।
यूरोप जैसा सफर (IMT मोटर वाहन समझौता): वर्तमान में तीनों देश एक बेहद खास और ऐतिहासिक मोटर वाहन समझौते पर भी काम कर रहे हैं, जो इस हाईवे की सफलता की असली चाबी है। इस समझौते के लागू होते ही तीनों देशों के वाणिज्यिक और निजी वाहनों को सीमाओं पर किसी जटिल कागजी कार्रवाई, लंबी कस्टडी या बार-बार सामान उतारने की जरूरत नहीं पड़ेगी। गाड़ियां एक देश से दूसरे देश में इस तरह आ-जा सकेंगी जैसे यूरोपीय संघ के भीतर गाड़ियां बिना किसी बाधा के एक देश से दूसरे देश की सीमा पार कर जाती हैं।
पूरब का नया सुल्तान बनेगा भारत
देर से ही सही लेकिन भारत का यह पूर्वी कूटनीतिक दाँव अब पूरी तरह से सटीक और अचूक बैठ चुका है। म्यांमार के ऊँचे पहाड़ों को चीरकर, घने जंगलों के बीच से रास्ता बनाते हुए और चीन के तमाम मंसूबों को धूल चटाते हुए बन रहा यह हाईवे सिर्फ डामर और गिट्टी से बनी कोई सड़क नहीं है। यह नए भारत की उभरती हुई वैश्विक कूटनीति, उसके फौलादी इरादों और दुनिया की एक बड़ी आर्थिक महाशक्ति बनने की जिद का एक अटूट और जीता-जागता प्रतीक है।
बांग्लादेश अपनी राजनीतिक अस्थिरता और गलतफहमियों के दौर से गुजरता रहे या चीन अपनी तमाम आर्थिक और सैन्य ताकत के दम पर भारत को घेरने की साजिशें रचता रहे, भारत ने पूरब का वो अभेद्य रास्ता खोल दिया है जिसकी अंतिम मंजिल सीधे वैश्विक नेतृत्व की कुर्सी पर जाकर ही खत्म होती है। अब बस कुछ सालों का और इंतजार है, जिसके बाद इस ऐतिहासिक हाईवे पर भारत की प्रगति, समृद्धि और सामरिक शक्ति का पहिया पूरी दुनिया के सामने दहाड़ते हुए दौड़ने लगेगा।
कई वर्षों से ऑपइंडिया यह बात उठाता रहा है कि खुद को ‘मुक्त ज्ञानकोश’ (free encyclopedia) कहने वाला विकिपीडिया न तो पूरी तरह निष्पक्ष है और न ही पूरी तरह स्वतंत्र। विकिपीडिया भारत और हिंदुओं के खिलाफ पक्षपात करने वाले संपादकों (Editors) को मंच देता है जो लोगों और संस्थाओं के बारे में भ्रामक और एकतरफा जानकारी डालते हैं। अब नैचुरल पॉइंट ऑफ व्यू (NPOV) मीडिया की नई शोध रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कुछ हिंदू विरोधी संपादक अमेरिका स्थित ‘हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन’ (HAF) के खिलाफ विकिपीडिया पर प्रोपेगेंडा फैला रहे हैं।
कुछ विकिपीडिया संपादकों ने हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन की कई गतिविधियों को ‘हिंदुत्व’ से जोड़ने की कोशिश की। इसका उद्देश्य यह नैरेटिव बनाना है कि HAF एक हिंदू समर्थक राजनीतिक एजेंडा को आगे बढ़ाने वाला संगठन है।
HAF के विकिपीडिया पेज के अनुसार, यह हिंदू अधिकार संगठन ‘हिंदू अधिकारों’ के नाम पर हिंदुत्व को नए रूप में प्रस्तुत कर रहा है। इसमें कहा गया है कि संगठन अमेरिका में हिंदुओं पर होने वाले अत्याचारों का मुद्दा उठाता है, योग जैसी हिंदू परंपराओं के सांस्कृतिक दुरुपयोग का विरोध करता है और ऐसे कानूनों का विरोध करता है जिनका इस्तेमाल कथित जातिगत भेदभाव के नाम पर हिंदुओं को निशाना बनाने के लिए किया जाता है।
विकिपीडिया पर HAF के पेज पर लिखा है, “यह संगठन दावा करता है कि उसका काम अमेरिका में हिंदुओं के अधिकारों की रक्षा करना, विदेशों में हिंदुओं पर होने वाले अत्याचारों की ओर ध्यान दिलाना, योग के सांस्कृतिक दुरुपयोग का विरोध करना और जाति आधारित भेदभाव को रोकने वाले कानूनों का विरोध करना है। हालाँकि, इन प्रयासों को हिंदुत्व को ‘हिंदू अधिकार’ के रूप में पेश करने की कोशिश माना जाता है ताकि इसे अमेरिका की मुख्यधारा की बहुसांस्कृतिक (Multiculturalism) राजनीति में आसानी से स्वीकार किया जा सके।”
3 जून को प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में एशले रिंड्सबर्ग के नेतृत्व वाले NPOV Media ने दावा किया कि कुछ गिने-चुने गुमनाम संपादकों ने HAF के विकिपीडिया पेज के 80% से अधिक हिस्से को नियंत्रित किया हुआ है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि HAF के विकिपीडिया पेज पर दिखाई देने वाली लगभग 80% पक्षपातपूर्ण जानकारी के पीछे केवल चार एडिटर्स की भूमिका है। ये एडिटर्स TrangaBellam, Kautilya3, Llightex और Shahinshah121 हैं। इसके अलावा Vanamonde93 नाम का एक हिंदू विरोधी एडिटर भी इन लोगों का समर्थन करता है।
NPOV की रिपोर्ट ‘Wikipedia’s India War’ में कहा गया है, “HAF की छवि बदलने की कोशिश 2021 की शुरुआत में शुरू हुई थी। उसी समय विकिपीडिया के कुछ अत्यधिक सक्रिय एडिटर्स ने HAF, उसके आलोचकों और उससे जुड़े संगठनों के चारों ओर आपस में जुड़े पृष्ठों का एक तंत्र तैयार करना शुरू किया। इनमें TrangaBellam, Kautilya3, Llightex और Shahinshah121 शामिल हैं। वहीं, वेबसाइट के सबसे प्रभावशाली प्रशासकों में शामिल Vanamonde93 कई बार ऐसे हस्तक्षेप करता दिखाई दिया जिससे इस समूह को लाभ होता नजर आया।”
यह भी याद रखने वाली बात है कि वर्ष 2021 में ही हिंदू विरोधी ‘इतिहासकार’ ऑड्रे ट्रुश्के (Audrey Truschke) ने HAF के खिलाफ बड़ा ऑनलाइन अभियान शुरू किया था। उन्होंने HAF पर अमेरिका में ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ को बढ़ावा देने का आरोप लगाया था। मई 2021 में HAF ने ट्रुश्के के खिलाफ मुकदमा भी दायर किया था।
इसी दौरान HAF के विकिपीडिया पृष्ठ पर कथित रूप से कई हिंदू विरोधी एडिटर्स द्वारा नकारात्मक और पक्षपातपूर्ण जानकारी जोड़ी जा रही थी। साथ ही संगठन के खिलाफ नए-नए लेख और सामग्री भी लगातार जोड़ी जा रही थी।
NPOV की रिसर्च में यह भी सामने आया है कि HAF द्वारा ऑड्रे ट्रुश्के, जॉर्ज सोरोस से फंडेड ‘हिंदूज फोर ह्यूमन राइट्स’ (Hindus for Human Rights) और इस्लामी संगठन इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल के खिलाफ मुकदमा दायर करने से लगभग दो महीने पहले ‘TrangaBellam’ ने ट्रुश्के का विकिपीडिया पेज बनाया था। आज भी उस पृष्ठ पर सबसे अधिक योगदान (57% से अधिक) उसी एडिटर का है।
एक ओर HAF के विकिपीडिया पेज पर संगठन के खिलाफ कथित रूप से पक्षपातपूर्ण जानकारी डाली जा रही थी तो वहीं दूसरी ओर ट्रुश्के के विकिपीडिया पेज पर उनके खुद को पीड़ित बताने वाले दावों को प्रमुखता दी जा रही थी। ट्रुश्के X पर अपने पोस्ट में लगातार यह दावा करती रही हैं कि उन्हें ‘हिंदू राष्ट्रवादियों’ से धमकियाँ मिल रही हैं।
दिलचस्प बात यह रही कि विकिपीडिया के संपादकों ने ट्रुश्के द्वारा लिखे गए वाशिंगटन पोस्ट के एक ओपिनियन पोस्ट को इस दावे के ‘स्रोत’ के रूप में इस्तेमाल किया कि ट्रुश्के को ‘हिंदुत्व से जुड़े लोगों’ द्वारा परेशान किया जा रहा था। दूसरा स्रोत ‘हिंदुत्व उत्पीड़न फील्ड मैनुअल’ था जिसे साउथ एशिया स्कॉलर एक्टिविस्ट कलेक्टिव (SASAC) ने तैयार किया था। इस ग्रुप के सह-संस्थापक खुद ट्रुश्के थीं।
यानी ट्रुश्के ने दावा किया कि HAF जैसे हिंदू अधिकार संगठनों द्वारा उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने अपने लेखों और ‘मैनुअल’ में भी यही बातें दोहराईं। इसके बाद विकिपीडिया संपादकों ने उन्हीं दावों को उठाकर उनके विकिपीडिया पेज पर जोड़ दिया। TrangaBellam और अन्य हिंदू विरोधी एडिटर्स ने मूल रूप से ऐसा माहौल तैयार किया कि पेज पढ़ने वाले लोग या तो इन दावों के स्रोत को नजरअंदाज कर दें या यह मान लें कि अगर ट्रुश्के कह रही हैं कि हिंदू उन्हें परेशान कर रहे हैं तो यह सच ही होगा।
NPOV रिपोर्ट के अनुसार, “कुछ ही हफ्तों में Truschke के विकिपीडिया पेज की शुरुआती पंक्तियों में ही लिखा गया कि ‘ट्रुश्के अक्सर हिंदुत्व समर्थकों द्वारा परेशान की जाती रही हैं जो उन पर हिंदू धर्म के प्रति पक्षपातपूर्ण सोच और आपत्तिजनक बयान देने का आरोप लगाते हैं जबकि विद्वान इन आरोपों को खारिज करते हैं।” विकिपीडिया पर ट्रुश्के को हिंदू ‘चरमपंथियों’ द्वारा परेशान किए जाने वाला विवरण 10 जुलाई 2021 को TrangaBellam द्वारा जोड़ा गया था।
रिपोर्ट में आगे बताया गया कि कुछ ही दिनों बाद TrangaBellam ने HAF के पेज पर अपना पहला और सबसे महत्वपूर्ण बदलाव किया। TrangaBellam ने दावा जोड़ा कि HAF द्वारा दायर मुकदमा अकादमिक स्वतंत्रता पर हमला था। इस एडिटर ने HAF के विकिपीडिया पेज पर HAF के खिलाफ कई दावे जोड़े और मंच के नियमों का उल्लंघन करते हुए Hindus for Human Rights की वेबसाइट का हवाला दिया जबकि यह संस्था HAF द्वारा दायर मुकदमे में पक्षकार थी।
TrangaBellam के अलावा Shahinshah121 नाम के एक एडिटर ने ट्रुश्के की नई SASAC वेबसाइट के कई लिंक जोड़े और HAF के पृष्ठ को संपादित करते हुए यह दावे भी जोड़े कि संगठन के कुछ सदस्यों में मुस्लिम विरोधी भावना मौजूद है। इससे पहले 8 जुलाई 2021 को Shahinshah121 ने ट्रुश्के के SASAC के लिए विकिपीडिया पेज बनाने की कोशिश की थी। यह प्रयास SASAC का डोमेन पंजीकृत होने के केवल दो दिन बाद किया गया था। Shahinshah121 ने ऐसे तीन और असफल प्रयास किए।
Shahinshah121 ने HAF के पेज पर 24 बदलाव किए और उसके बाद सबसे अधिक एडिटिड पेज ‘हिंदुत्व’ पर 6 बदलाव किए। इस संपादक के कुल बदलावों का लगभग आधा हिस्सा HAF के पेज पर था जबकि दूसरे नंबर पर ‘हिंदुत्व’ का पेज था। बाकी कामों में Shahinshah121 ने केवल एक-एक बदलाव किए। NPOV विश्लेषण के अनुसार, TrangaBellam, Shahinshah121 और इस समूह के अन्य एडिटर द्वारा किए गए बदलावों ने यह नैरेटिव स्थापित किया कि HAF, RSS से जुड़ा और BJP समर्थक ‘हिंदुत्ववादी चरमपंथी’ संगठन है जो खुद को केवल हिंदू अधिकारों के लिए काम करने वाला संगठन बताता है।
रिपोर्ट में 2025 की एक घटना का जिक्र करते हुए बताया गया कि विकिपीडिया एडिटर्स ने अस्पष्ट पत्रों और सामान्य समाचार रिपोर्टों के आधार पर यह संकेत देने की कोशिश की कि HAF अमेरिकी न्याय विभाग की निगरानी में था। HAF के विकिपीडिया पेज पर लिखा गया, ‘2025 में HAF का नाम न्याय विभाग में की गई एक शिकायत में शामिल किया गया, जिसमें आरोप लगाया गया कि HAF भारत की BJP के बिना पंजीकरण वाले विदेशी एजेंट की तरह काम करता है।”
हालाँकि, असल में खालिस्तान समर्थक ‘फ्रेमोंट गुरुद्वारा साहिब’ ने अमेरिकी न्याय विभाग के माध्यम से एक लॉ फर्म को एक पत्र भेजा था जिसमें ‘विदेशी एजेंट’ वाले दावे किए गए थे। इस घटना को मदर जोन्स, बाज न्यूज और ब्रिटेन के द गार्जियन जैसे प्रोपेगेंडा मीडिया संस्थानों ने भी प्रकाशित किया था।
Shahinshah121 ने इस घटना का जिक्र HAF के विकिपीडिया पेज पर किया लेकिन यह जानकारी नहीं जोड़ी कि अमेरिकी न्याय विभाग ने HAF के खिलाफ किसी जाँच की घोषणा नहीं की थी।
HAF के विकिपीडिया पेज को इस तरह बदलने वाला एक और प्रमुख हिंदू विरोधी एडिटर Kautilya 3 था, जिसने हिंदू अधिकार संगठन को एक भ्रामक राष्ट्रवादी चरमपंथी संगठन की तरह दिखाने के लिए कई महत्वपूर्ण बदलाव किए।
Kautilya3 द्वारा HAF के विकिपीडिया पेज पर लिखा गया, “इस संगठन की नींव हिंदू राष्ट्रवादी संगठन विश्व हिंदू परिषद अमेरिका और उसकी छात्र शाखा हिंदू छात्र परिषद से जुड़ी हुई हैं। इसके आलोचकों के अनुसार, HAF ने ‘हिंदू अधिकारों’ की भाषा में हिंदू राष्ट्रवादी एजेंडे को दोबारा प्रस्तुत किया है ताकि वह अमेरिकी मुख्यधारा की राजनीति में आसानी से फिट हो सके।”
HAF पृष्ठ पर योगदान देने के अलावा Kautilya 3 ने ‘भारतीय अमेरिकी मुस्लिम परिषद’ के विकिपीडिया पेज पर 25.3% लेखन योगदान दिया है। इसके साथ ही, अमेरिका में जातिगत भेदभाव (caste discrimination in the US) वाले विकिपीडिया पृष्ठ का 41.4 प्रतिशत योगदान भी Kautilya 3 के पास है।
Kautilya 3 ब्रिटेन का विकिपीडिया एडिटर उदय रेड्डी है जिसके खिलाफ 2024 में मणिपुर पुलिस ने विभिन्न समुदायों के बीच दुश्मनी फैलाने और मैतेई समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने के आरोप में मामला दर्ज किया था।
2024 में ऑपइंडिया ने एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें बताया गया था कि विकिपीडिया विचारधारा मुक्त और समर्थित हस्तक्षेप से मुक्त ज्ञानकोश नहीं है जैसा कि विकिमीडिया फाउंडेशन का दावा है कि यह दुनिया भर में हजारों स्वतंत्र और उत्साही स्वयंसेवकों की सहायता सेवा है। ऑपइंडिया ने बताया था कि विकिपीडिया के ‘NPOV’ (तटस्थ दृष्टिकोण) दिशा-निर्देशों का मतलब यह नहीं है कि किसी भी लेख में हर तरह के विचारों को समान स्थान मिलेगा।
TrangaBellam, Shahinshah121 और Kautilya 3 के अलावा, हिंदू विरोधी विकिपीडिया एडिटर्स के इस समूह में Vanamonde93 नाम का एक एडिटर भी शामिल है। अन्य हिंदू विरोधी विकिपीडिया बदलावों के अलावा, इसने HAF के पेज पर भी महत्वपूर्ण बदलाव किए थे। खास बात यह है कि Vanamonde93 विकिपीडिया के उन केवल 32 प्रशासकों में शामिल है, जिनके पास एक साथ जाँचकर्ता (checkuser) और निरीक्षणकर्ता (oversighter) दोनों अधिकार मौजूद हैं।
NPOV रिपोर्ट के अनुसार, “16 सितंबर को Vanamonde93 ने एक ऐसा बदलाव किया जो देखने में छोटा था लेकिन उसका असर दूरगामी था। इस एडिटर ने पेज के एक सेक्शन का शीर्षक ‘Alleged Hindu Nationalist Ties’ (कथित हिंदू राष्ट्रवादी संबंध) से बदलकर केवल ‘Hindu nationalist ties’ (हिंदू राष्ट्रवादी संबंध) कर दिया। केवल एक मिनट में यह दावा आरोप से बदलकर स्थापित तथ्य की तरह दिखने लगा।”
साल 2018 में ट्रुश्के ने एक ट्वीट किया था जिसमें उन्होंने भगवान राम को ‘misogynist pig’ (स्त्री द्वेषी सुअर) कहा था। उन्होंने वाल्मीकि रामायण के एक हिस्से का अपने तरीके से अनुवाद करते हुए दावा किया था कि अग्निपरीक्षा वाले प्रसंग में माता सीता ने भगवान राम को ‘misogynist pig’ कहा था।
विवाद बढ़ने के बाद ट्रुश्के ने सफाई दी थी कि उन्होंने केवल बर्कले के संस्कृत विद्वान रॉबर्ट गोल्डमैन द्वारा किए गए अनुवाद का हवाला दिया था। हालाँकि, गोल्डमैन ने ट्रुश्के के इस वर्णन को खारिज करते हुए कड़ा बयान जारी किया था। उन्होंने कहा था, “ट्रुश्के ने ‘किसी भी तरह से हमारे अनुवाद का हवाला नहीं दिया’, और उनकी भाषा ‘अत्यंत अनुचित’ थी।”
सितंबर 2021 में Vanamonde93 ने इस विवाद से जुड़े हिस्से में बदलाव किया। NPOV रिपोर्ट के अनुसार, “उन्होंने गोल्डमैन की प्रतिक्रिया से जुड़े संदर्भ हटा दिए जिसमें ‘चौंकाने वाली और बेहद अनुचित’ भाषा वाला हिस्सा और पूरे विवाद का संदर्भ शामिल था। अपने बदलाव के सारांश में उसने लिखा:- ‘BLP में बिना स्रोत बताए विवादास्पद दावों के लिए यह स्रोत किसी भी तरह से स्वीकार्य कैसे हो सकता है’?”
हाल ही में 23 फरवरी 2026 को Vanamonde93 ने HAF के पेज पर कई बदलाव किए। इस दौरान उसने HAF की कार्यकारी निदेशक सुहाग शुक्ला का वह सार्वजनिक बयान हटा दिया जो ट्रुश्के, H4HR और IAMC के खिलाफ मुकदमे को लेकर दिया गया था। बदलाव के लिए विकिपीडिया की प्राथमिक स्रोतों (primary sources) से जुड़ी नीति का हवाला दिया गया।
NPOV रिपोर्ट में कहा गया, “जनवरी 2021 में Kautilya3 ने इसी नियम का इस्तेमाल करते हुए HAF की सफाई को हटा दिया था। अपने ही मुकदमे पर HAF का खुद का बयान स्वीकार नहीं किया गया लेकिन मुकदमे को अकादमिक स्वतंत्रता पर हमला बताने वाले कार्यकर्ता स्रोत और राय लेख बने रहे।”
NPOV Media की रिपोर्ट में एक अन्य विकिपीडिया एडिटर Llightex की करतूतों का भी खुलासा हुआ है। Llightex ने सुनीता विश्वनाथ के नेतृत्व वाले हिंदू विरोधी संगठन, हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स (H4HR) का पेज बनाया था और पहले वहीं काम करता था। Llightex ने केवल H4HR का ही नहीं बल्कि IAMC के पेज को भी एडिट किया। HAF मुकदमे के दौरान सुनीता विश्वनाथ का अलग विकिपीडिया पेज भी बनाया गया। मुकदमा खत्म होने के बाद Llightex ने HAF के पृष्ठ में भी बदलाव किए जिससे हिंदू अधिकार संगठन को और अधिक नकारात्मक रूप में दिखाया गया।
HAF की कार्यकारी निदेशक ने विकिपीडिया पेज में बदलाव को बताया ‘अंदरूनी साजिश’
HAF की कार्यकारी निदेशक सुहाग शुक्ला ने HAF के विकिपीडिया पेज में की गई एडिटिंग और बदलावों को ‘अंदरूनी साजिश’ बताया है। NPOV Media की रिपोर्ट सामने आने के बाद प्रतिक्रिया देते हुए सुहाग शुक्ला ने कहा कि संगठन के विकिपीडिया पेज को खराब करने और उसकी पहचान बदलने का काम ‘भीतर’ से किया गया।
सुहाग शुक्ला ने X पर लिखा, “यह एक ‘अंदरूनी काम’ था। हमने पिछले 5 वर्षों से अपने विकिपिडया पृष्ठ को पूरी तरह खराब होते देखा है जिससे संगठन की असली पहचान ही बदल गई। एशले रिंड्सबर्ग और NPOV Media की यह जाँच उस चीज का पर्दाफाश करती है जो HAF पर 4 एडिटर्स के एक समूह द्वारा सुनियोजित हमला लगता है, जिनमें से दो का संबंध ट्रुश्के और ‘हिंदूज फोर ह्यूमन राइट्स’ जैसे संगठन से जुड़ा दिखाई देता है।”
HAF के विकिपीडिया पृष्ठ को खराब करने में चार एडिटर्स की भूमिका को लेकर शुक्ला ने लिखा, “Trangabellam, Kautilya3, Lightex और Shainshah121 HAF के विकिपीडिया पेज की 80% सामग्री के लिए जिम्मेदार हैं। ये लोग कौन हैं? Trangabellam ने ट्रुश्के का विकिपीडिया पृष्ठ बनाया, उसे प्रोटेक्ट किया और उसे आकार दिया जबकि HAF के पेज पर बिना प्रमाण वाले आरोप जोड़े। Lightex ने खुद स्वीकार किया कि वह पहले ‘हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स” के साथ काम कर चुका है, उस समूह का विकिपीडिया पृष्ठ बनाया (जो विकिपीडिया के अपने नियमों के खिलाफ था) और फिर HAF के पृष्ठ को बदलते हुए उसे ‘अति राष्ट्रवादी संगठन’के रूप में दिखाने की कोशिश की।”
शुक्ला ने आगे लिखा, “Shahinshah121 ने HAF के खिलाफ यह आरोप जोड़े कि यह ‘हिंदुत्व’ से जुड़ा है और ‘विदेशी एजेंट के रूप में काम करने के मामले में अमेरिकी न्याय विभाग की जाँच के दायरे में है।’ साथ ही, साउथ एशियन स्कॉलर्स कलेक्टिव बनने के कुछ ही घंटों के भीतर ट्रुश्के के इस समूह को बढ़ावा दिया गया। HAF पेज के दूसरे सबसे सक्रिय संपादक Kautilya3 ने उन सभी जानकारियों को हटा दिया जो आरोपों पर HAF का पक्ष दिखाती थीं जिनमें यह बात भी शामिल थी कि ‘HAF का विभिन्न विदेशी संगठनों से कोई संबंध नहीं है’। इसके बाद उसने जोड़ा कि ‘HAF ने अमेरिकी मुख्यधारा की राजनीति के अनुरूप खुद को ढालने के लिए हिंदू राष्ट्रवादी एजेंडे को हिंदू अधिकारों की भाषा में दोबारा पेश किया है’।”
It was an inside job!
We’ve watched our @Wikipedia page completely defaced & vandalized for 5 years that rendered @HinduAmerican unrecognizable.
Wikipedia निष्पक्ष नहीं बल्कि पक्षपातपूर्ण है: OpIndia की रिसर्च में क्या सामने आया?
साल 2024 में ऑपइंडिया ने एक विस्तृत दस्तावेज जारी किया था जिसमें बताया गया था कि विकिपीडिया वैसा मुक्त और संपादकीय हस्तक्षेप से मुक्त ज्ञानकोश नहीं है, जैसा विकिमीडिया फाउंडेशन दावा करता है। विकिमीडिया फाउंडेशन का कहना रहा है कि विकिपीडिया दुनिया भर के हजारों निःशुल्क और उत्साही स्वयंसेवकों के योगदान से चलता है।
ऑपइंडिया की शोध रिपोर्ट में सामने आया कि विकिपीडिया की संरचना ही ऐसी है जिसमें कुछ गिने-चुने लोगों को अत्यधिक अधिकार दिए गए हैं। इन लोगों को ‘administrators’ कहा जाता है। पूरी दुनिया में केवल 435 सक्रिय administrators हैं जिनके पास एडिटर्स को प्रतिबंधित करने, स्रोतों को ब्लैकलिस्ट करने, योगदानकर्ताओं को रोकने और किसी लेख में क्या बदलाव किए जाएँ या हटाए जाएँ, यह तय करने की शक्ति होती है।
ऑपइंडिया द्वारा यह दस्तावेज जारी किए जाने के कुछ समय बाद फेसबुक ने भी इस रिपोर्ट को प्रतिबंधित कर दिया। फेसबुक पर पहले भी अमेरिका में चुनावी हस्तक्षेप और एक खास विचारधारा के राजनीतिक हितों को आगे बढ़ाने के आरोप लगते रहे हैं।
विकिपीडिया एक ऐसा बिचौलिया होने का दावा करता है जो बिना किसी कंटेंट दखल और एडिटोरियल लाइन के लोगों की समझ पर निर्भर करता है, ‘भरोसेमंद सोर्स’ पर आधारित है और न्यूट्रल नज़रिया बनाए रखता है। हालांकि, यह सच से बहुत दूर है, जैसा कि ऑपइंडिया रिसर्च में साबित हुआ है। विकिपीडिया पब्लिशर्स के सभी स्टैंडर्ड को पूरा करता है। वे मौजूदा और ऐतिहासिक घटनाओं पर जानकारी इकट्ठा करते हैं, वे अपने एडिटर्स और एडमिनिस्ट्रेटर्स को पेमेंट करते हैं और इंटरनेट पर आम लोग उन्हें आसानी से एक्सेस कर सकते हैं।
ऑपइंडिया की एडिटर-इन-चीफ नूपुर जे शर्मा के द्वारा किए गए रिसर्च पेपर के नतीजों से पता चलता है कि भारत में ऑफिस या मौजूदगी न होने के बावजूद, विकिपीडिया देश में अपने बिजनेस और सोच के फायदे के लिए भारत विरोधी सोच वाली संस्थाओं और लोगों को फंडिंग कर रहा है और यहाँ तक कि इस्लामिस्ट और खालिस्तानियों से भी जुड़ा है। विकिपीडिया न सिर्फ भारत से डोनेशन के रूप में फंड इकट्ठा करता है बल्कि भारत में लाखों डॉलर खर्च भी करता है और पूरी तरह से एकतरफा और सख्त एडिटोरियल लाइन पर चलता है जबकि यह सब एक बिचौलिया होने का दावा करता है पब्लिशर नहीं ताकि भारतीय कानून के सामने किसी भी जवाबदेही से बच सके।
विकिपीडिया को पब्लिशर घोषित करने के अलावा, ऑपइंडिया ने यह भी सिफारिश की कि विकिपीडिया के फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन की जाँच की जाए। ऑपइंडिया का ‘भारत पर विकिपीडिया का युद्ध’ (Wikipedia’s War on India) डोजियर यहाँ पढ़ा जा सकता है।
विकिपीडिया के सह-संस्थापक जिम्मी वेल्स ने एक बार कहा था कि विकिपीडिया का उद्देश्य ‘मानव ज्ञान के पूरे संग्रह को सभी लोगों के लिए उपलब्ध कराना’ है। लेकिन आज यह उद्देश्य शर्तों वाला दिखाई देता है क्योंकि ज्ञान को तभी जगह मिलती है, जब वह किसी खास राजनीतिक विचारधारा के अनुरूप हो। ‘Neutral Point of View’ यानी निष्पक्ष दृष्टिकोण का नियम भी कमजोर पड़ गया है क्योंकि निष्पक्षता अब इस बात पर निर्भर दिखती है कि चर्चा में किन स्रोतों को शामिल होने की अनुमति मिलती है।
जैसा कि ऑपइंडिया के डॉसियर में कहा गया, “यदि विश्वसनीय स्रोतों का समूह ही वैचारिक पक्षपात से प्रभावित हो, तो ‘न्यूट्रल पॉइंट ऑफ व्यू’ सिर्फ एक जरूरत रह जाती है जिसमें वामपंथी विचारधारा के अलग-अलग रूपों को प्रमुखता मिलती है।”
हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन के पेज से लेकर बंगाल फाइल्स, द कश्मीर फाइल्स, द केरल स्टोरी, धुरंधर, ऑपइंडिया और हाल में बने कॉकरोच जनता पार्टी जैसे ऑनलाइन अभियान तक विकिपीडिया ऐसे हिंदू विरोधी और भारत विरोधी इस्लामो-वामपंथी समूहों को मंच दे रहा है जो अपनी वैचारिक सोच के आधार पर व्यक्तियों और संस्थाओं के पेज बना रहे हैं, बदल रहे हैं या उन्हें एक खास रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं जबकि विकिपीडिया खुद को बिना संपादकीय हस्तक्षेप वाला ज्ञानकोश बताता है।
(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)
बीते कुछ समय से देश की राजनीति में एक अजीब सा डर का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। कॉन्ग्रेस पार्टी और विशेषकर राहुल गाँधी लगातार जनता के बीच जाकर यह नैरेटिव सेट करने में जुटे हैं कि देश में ‘इमरजेंसी’ (आपातकाल) आने वाली है, लोकतंत्र खतरे में है और संविधान को कुचला जा रहा है।
राहुल गाँधी सार्वजनिक मंचों से, प्रेस कॉन्फ्रेंस में और अपनी रैलियों में बार-बार देश की जनता को यह कहकर डरा रहे हैं कि भारत एक बार फिर 1975 के काले दौर की तरफ बढ़ रहा है। लेकिन यहाँ सबसे बड़ा और गंभीर सवाल यह उठता है कि क्या सचमुच आज के भारत में इमरजेंसी लगाना संभव है? या फिर राहुल गाँधी और उनकी पार्टी सिर्फ एक कोरी अफवाह फैलाकर, देश के भीतर अशांति और अविश्वास का माहौल पैदा करना चाहती है?
जब हम भारतीय संविधान, वर्तमान आर्थिक स्थिति और देश की न्यायपालिका के कड़े नियमों को देखते हैं, तो राहुल गाँधी का यह दावा पूरी तरह से खोखला, अतार्किक और हास्यास्पद नजर आता है। आज के मजबूत और डिजिटल भारत में किसी भी सरकार के लिए मनमाने ढंग से आपातकाल लागू करना नामुमकिन है।
अगर ऐसा हो तो फिर राहुल गाँधी ऐसा क्यों कर रहे हैं? क्या वो देश की जनता को भड़काकर, विदेशी ताकतों के इशारे पर भारत को गृहयुद्ध की तरफ ढकेलने की साजिश रच रहे हैं? क्या अपने राजनीतिक फायदे के लिए देश में अराजकता फैलाना सीधे-सीधे देश के साथ गद्दारी नहीं है? आइए इस पूरे विषय को संवैधानिक प्रक्रिया, इतिहास और वर्तमान वैश्विक और राष्ट्रीय हालातों के चश्मे से विस्तार से समझते हैं।
कितने प्रकार की होती है इमरजेंसी और क्या हैं संवैधानिक रास्ते?
सबसे पहला और बुनियादी सवाल तो यह है कि राहुल गाँधी जिस इमरजेंसी का डर दिखा रहे हैं, वो आखिर कौन सी इमरजेंसी है? हमारे भारतीय संविधान में आपातकाल से जुड़े बेहद स्पष्ट और कड़े प्रावधान दिए गए हैं। अगर हम राज्यों में लगने वाले राष्ट्रपति शासन (स्टेट इमरजेंसी) को थोड़ी देर के लिए अलग रख दें, तो देश के स्तर पर मुख्य रूप से दो अलग-अलग प्रकार की इमरजेंसी का जिक्र संविधान में मिलता है। संविधान निर्माताओं ने इसके लिए बकायदा कानून तय किए हैं, जो इस प्रकार हैं:
आर्थिक आपातकाल (अनुच्छेद 360): संविधान की धारा यानी अनुच्छेद 360 के तहत देश में आर्थिक आपातकाल (Financial Emergency) लगाने का प्रावधान है। यह आपातकाल तब लगाया जाता है जब देश की वित्तीय स्थिरता, साख या आर्थिक ढांचा पूरी तरह से तबाह होने की कगार पर पहुँच जाए।
राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352): संविधान का अनुच्छेद 352 राष्ट्रीय आपातकाल (National Emergency) से जुड़ा है। यह आपातकाल बेहद असाधारण और गंभीर परिस्थितियों में ही लगाया जा सकता है। इसके तहत देश की सुरक्षा और संप्रभुता सर्वोपरि होती है।
इन दोनों धाराओं के अलावा राज्यों में संवैधानिक तंत्र विफल होने पर अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगाया जाता है, जिसे आम बोलचाल में स्टेट इमरजेंसी कहा जाता है। लेकिन राहुल गाँधी जिस देशव्यापी आपातकाल का हौव्वा खड़ा कर रहे हैं, उसके लिए केवल अनुच्छेद 352 या 360 का ही सहारा लिया जा सकता है।
अब चलिए देखते हैं कि क्या आज इन दोनों में से किसी भी धारा को लागू करने की 1% भी गुंजाइश देश में बची है?
क्या देश में आर्थिक इमरजेंसी संभव है?
आर्थिक आपातकाल यानी अनुच्छेद 360 को लागू करने के लिए देश की वित्तीय स्थिति का पूरी तरह से वेंटिलेटर पर होना जरूरी है। इसका इस्तेमाल तब किया जा सकता है जब देश की तिजोरी (ट्रेजरी) खाली हो जाए, सरकार के पास अपने कर्मचारियों को सैलरी देने के पैसे न बचें, देश में अनाज और भुखमरी का संकट आ जाए, या देश पूरी तरह दिवालिया हो जाए। ऐसी भयावह स्थिति में ही देश की रक्षा और संतुलन बनाए रखने के लिए ट्रेजरी पर बैन लगाया जाता है और राष्ट्रपति आर्थिक आपातकाल की घोषणा कर सकते हैं।
वैसे, फिलहाल भारत के इतिहास को उठाकर देखिए। भारत ने अपने जीवनकाल में बड़े से बड़े आर्थिक संकटों का सामना किया है। साल 1991 का वो दौर याद कीजिए, जब भारत की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि देश को अपना सोना तक विदेशी बैंकों में गिरवी रखना पड़ा था।
खाड़ी युद्ध (Gulf War) की वजह से दुनिया भर में तेल का संकट था, भारत को पेट्रोल-डीजल नहीं मिल पा रहा था, देश में विदेशी मुद्रा का भारी अकाल था और अनाज की किल्लत थी। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने भारत को आसानी से पैसा देने से मना कर दिया था। भारत की खराब से खराब और सबसे दयनीय हालत में भी देश के कर्णधारों ने कभी अनुच्छेद 360 यानी आर्थिक आपातकाल का इस्तेमाल नहीं किया।
आज जब हम 2026 के भारत को देखते हैं, तो स्थिति 1991 के बिल्कुल विपरीत और स्वर्णिम है। आज भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया के लिए एक मिसाल बनी हुई है। भारत पूरी दुनिया में इकलौता ऐसा देश बनकर उभरा है, जिसके पास ऐतिहासिक रूप से बेहद मजबूत और विशाल विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) मौजूद है। दुनिया की तमाम बड़ी और प्रतिष्ठित रेटिंग एजेंसियाँ, वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ चीख-चीखकर कह रहे हैं कि भारत में आर्थिक समस्या दूर-दूर तक नहीं दिखती। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है।
ऐसे दौर में राहुल गाँधी का यह कहना कि देश में आर्थिक तानाशाही या संकट आने वाला है, समझ से परे है। क्या आज देश में ट्रेजरी बैन होने जा रही है? क्या सरकारी कर्मचारियों की सैलरी रुकने वाली है? क्या देश में अनाज की कमी है? जवाब है- बिल्कुल नहीं। जब देश आर्थिक रूप से महाशक्ति बनने की राह पर है, तो आर्थिक आपातकाल का डर दिखाना देश की जनता की बुद्धिमत्ता का अपमान करना है।
अनुच्छेद 352: क्या कॉन्ग्रेस देश को गृहयुद्ध की तरफ ढकेल रही है?
अब बात करते हैं दूसरी बड़ी धारा की, जिसके दम पर देशव्यापी इमरजेंसी लगाई जा सकती है वह है अनुच्छेद 352। संविधान के अनुसार, राष्ट्रपति इस धारा का उपयोग केवल दो ही सूरतों में कर सकते हैं: या तो भारत पर किसी विदेशी शत्रु ने आक्रमण कर दिया हो (बाहरी युद्ध), या फिर देश के भीतर सशस्त्र विद्रोह यानी गृहयुद्ध (Civil War) जैसी स्थिति पैदा हो गई हो, जिससे देश की सुरक्षा पूरी तरह खतरे में आ गई हो।
यहाँ राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस से देश की जनता को बहुत सीधे और कड़े सवाल पूछने की जरूरत है। राहुल गाँधी जिस इमरजेंसी का जिक्र करके देश के युवाओं, अल्पसंख्यकों और आम नागरिकों को डरा रहे हैं, क्या उनके पास ऐसी कोई गुप्त सूचना है कि भारत पर कोई विदेशी ताकत हमला करने वाली है? क्या चीन या पाकिस्तान भारत पर कोई बड़ा आक्रमण करने जा रहे हैं, जिसकी जानकारी सिर्फ राहुल गाँधी को है? अगर नहीं, तो फिर वह किस आधार पर आपातकाल का भय पैदा कर रहे हैं?
अगर विदेशी आक्रमण की कोई आशंका नहीं है, तो इसका दूसरा सीधा और खतरनाक मतलब यह निकलता है कि क्या राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस खुद देश के भीतर गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं? क्या वे देश की जनता को भड़काकर, समाज में जाति, धर्म और वर्ग के नाम पर ऐसी नफरत फैलाना चाहते हैं जिससे कानून-व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो जाए? क्या वे चाहते हैं कि देश में दंगे हों, हिंसा हो और सरकार के हाथ से नियंत्रण पूरी तरह निकल जाए, ताकि सरकार मजबूर होकर आपातकाल की घोषणा कर दे?
अगर ऐसा है, तो यह बेहद गंभीर और चिंताजनक मामला है। जिस तरह हमारे पड़ोसी देशों जैसे बांग्लादेश, श्रीलंका या पाकिस्तान में जनता को उकसाकर, सड़कों पर हिंसा करवाकर तख्तापलट और अराजकता का माहौल पैदा किया गया, क्या ठीक वैसा ही टूलकिट भारत में भी लागू करने की कोशिश की जा रही है?
राहुल गाँधी अक्सर विदेशी दौरों पर जाकर भारत के लोकतंत्र को कमतर आँकते हैं और विदेशी ताकतों से हस्तक्षेप की गुहार लगाते दिखते हैं। देश में झूठ का ऐसा नैरेटिव फैलाना जो लोगों को सरकार और संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ हिंसक होने के लिए उकसाए, देशद्रोह की श्रेणी में आता है। अगर कॉन्ग्रेस और उनके नेता जानबूझकर देश को गृहयुद्ध की आग में झोंकने की कोशिश कर रहे हैं, तो वक्त आ गया है कि उनके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए और उनकी गद्दारी का पर्दाफाश किया जाए।
साल 1978 का संविधान संशोधन: अब मनमानी मुमकिन नहीं
राहुल गाँधी शायद यह भूल जाते हैं कि आज का भारत 1975 का भारत नहीं है, जब उनकी दादी इंदिरा गाँधी ने आधी रात को बिना कैबिनेट की लिखित मंजूरी के सिर्फ अपनी सत्ता बचाने के लिए पूरे देश को जेलखाना बना दिया था। 1975 में इंदिरा गाँधी ने आंतरिक अशांति के नाम पर जो आपातकाल लगाया था, उसकी कड़वी यादें आज भी देश के जेहन में ताजा हैं। लेकिन उस काले दौर के बाद देश के संविधान को और अधिक अभेद्य और मजबूत बनाया गया।
साल 1978 में संविधान में 44वाँ संशोधन (44th Constitutional Amendment) किया गया। इस संशोधन ने सरकार की मनमानी शक्तियों पर हमेशा के लिए लगाम लगा दी। इस कानून के तहत यह अनिवार्य कर दिया गया कि-
आपातकाल लगाने के लिए केवल प्रधानमंत्री की सलाह काफी नहीं होगी, बल्कि पूरी कैबिनेट की ‘लिखित मंजूरी’ राष्ट्रपति को देनी होगी।
‘आंतरिक अशांति’ शब्द को हटाकर उसकी जगह ‘सशस्त्र विद्रोह’ (Armed Rebellion) शब्द जोड़ा गया, ताकि कोई भी सरकार राजनीतिक विरोध को दबाने के लिए इमरजेंसी न लगा सके।
सबसे महत्वपूर्ण बात अगर सरकार संसद से आपातकाल को मंजूरी दिलवा भी देती है, तो भी हमारी न्यायपालिका यानी सुप्रीम कोर्ट के पास उसका ज्यूडिशियल रिव्यू (Judicial Review – न्यायिक पुनरावलोकन) करने का पूरा अधिकार होगा।
इंदिरा गाँधी के समय न्यायपालिका के हाथ बंधे हुए थे, लेकिन आज ऐसा नहीं है। अगर आज की तारीख में कोई भी सरकार मनमाने ढंग से आर्थिक या राष्ट्रीय आपातकाल लगाने की हिमाकत करती है, तो न्यायपालिका तुरंत उसका रिव्यू करेगी। कोर्ट में सरकार को देश के सारे आर्थिक आँकड़े, खुफिया रिपोर्ट और पुख्ता सबूत सामने रखने होंगे कि आपातकाल क्यों लगाया गया।
चूँकि आज देश में आपातकाल लगाने की 0.1% आशंका या आधार भी मौजूद नहीं है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ऐसी किसी भी कोशिश को एक मिनट में असंवैधानिक घोषित कर खारिज कर देगा। आज के समय में देश में आपातकाल लगाना कानूनी और संवैधानिक रूप से लगभग असंभव हो चुका है।
अनुच्छेद 356 का इतिहास और कॉन्ग्रेस का दोहरा चरित्र
आपातकाल और लोकतंत्र की दुहाई देने वाली कॉन्ग्रेस पार्टी का अपना इतिहास लोकतांत्रिक मूल्यों का गला घोटने से भरा पड़ा है। अतीत में केंद्र की कॉन्ग्रेस सरकारों ने संविधान की धारा 356 (राष्ट्रपति शासन) का सबसे ज्यादा और सबसे गंदे तरीके से दुरुपयोग किया। जब भी केंद्र में कॉन्ग्रेस की सरकार होती थी और किसी राज्य में विपक्षी दल की सरकार बनती थी, तो गवर्नर के माध्यम से बहुत ही आसानी से चुनी हुई राज्य सरकारों को गिरा दिया जाता था और वहाँ इमरजेंसी (राष्ट्रपति शासन) थोप दी जाती थी।
इतिहास गवाह है कि कॉन्ग्रेस ने देश भर में करीब 90 से 100 बार अलग-अलग राज्यों की चुनी हुई लोकप्रिय सरकारों को ताश के पत्तों की तरह बिखेर दिया। अकेले इंदिरा गाँधी के कार्यकाल में दर्जनों बार इस धारा का दुरुपयोग हुआ। लेकिन आज के दौर में क्या यह संभव है?
एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994): इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद अब अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग भी पूरी तरह से बंद हो चुका है। अब अगर केंद्र सरकार किसी एक राज्य में भी दुर्भावना से धारा 356 का इस्तेमाल करती है, तो ज्यूडिशियल रिव्यू के सामने केंद्र को मुँह की खानी पड़ती है। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार अवैध रूप से गिराई गई राज्य सरकारों को दोबारा बहाल करके यह साबित किया है कि अब केंद्र की तानाशाही नहीं चलेगी।
जब आज एक छोटे से राज्य में भी धारा 356 लगाना इतना मुश्किल और कानूनी पेचीदगियों से भरा है, तो फिर राहुल गाँधी पूरे देश में धारा 352 और 360 के तहत बड़ी इमरजेंसी लगने का डर कैसे दिखा सकते हैं? यह जानते हुए भी कि कानूनी तौर पर यह असंभव है, वे लगातार झूठ क्यों बोल रहे हैं?
क्या राहुल गाँधी के खिलाफ कानूनी एक्शन का समय आ गया है?
पूरे मामले का लब्बोलुआब यह है कि संवैधानिक, आर्थिक और कानूनी रूप से आज के भारत में किसी भी प्रकार की इमरजेंसी का दूर-दूर तक कोई वजूद या अंदेशा नहीं है। भारत आर्थिक रूप से समृद्ध है, देश की सीमाएँ सुरक्षित हैं और न्यायपालिका पूरी तरह स्वतंत्र और सतर्क है। ऐसे में राहुल गाँधी का इमरजेंसी वाला राग सिर्फ और सिर्फ एक राजनीतिक एजेंडा है, जिसका मकसद देश के भीतर असंतोष पैदा करना और वैश्विक मंच पर भारत की छवि को खराब करना है।
राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस पार्टी अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन को वापस पाने के लिए देश की जनता को एक काल्पनिक डर का शिकार बना रही है। जब आप बिना किसी ठोस आधार के जनता को लगातार यह विश्वास दिलाने की कोशिश करते हैं कि उनके अधिकार छीने जा रहे हैं, तो आप अनजाने में या जानबूझकर उन्हें अराजकता की तरफ धकेल रहे होते हैं। यह ठीक वैसा ही खतरनाक खेल है जैसा हमारे पड़ोसी देशों में देखा गया, जहाँ अफवाहों और प्रायोजित आंदोलनों के दम पर पूरे देश को बर्बाद कर दिया गया।
अपने ही देश की सेना, न्यायपालिका, चुनाव आयोग और संसद पर अविश्वास जताना और जनता को विद्रोह के लिए उकसाने का प्रयास करना देशहित के खिलाफ है। यदि राहुल गाँधी के पास अपने दावों को साबित करने के लिए कोई संवैधानिक या तार्किक आधार नहीं है, तो देश की सुरक्षा एजेंसियों और कानूनी संस्थाओं को इस गंभीर झूठ का संज्ञान लेना चाहिए।
देश को गुमराह करने, समाज को बाँटने और भारत को गृहयुद्ध की तरफ ढकेलने की इस खतरनाक राजनीतिक गद्दारी के खिलाफ अब सख्त कानूनी कार्रवाई की जानी बेहद जरूरी है, ताकि भविष्य में कोई भी नेता अपने निजी स्वार्थ के लिए देश की शांति और सुरक्षा से खिलवाड़ न कर सके।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर 6 जून 2026 को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर सोशल मीडिया पर काफी चर्चा हो रही है। पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने अमेरिका से भारत लौटकर यहाँ प्रदर्शन करने की घोषणा की है।
लेकिन विवाद इस बात को लेकर खड़ा हो गया है कि प्रदर्शन की घोषणा के बावजूद पार्टी ने दिल्ली पुलिस को पहले से लिखित सूचना नहीं दी और न ही अनुमति लेने की प्रक्रिया पूरी की। CJP का कहना है कि जंतर-मंतर एक निश्चित विरोध स्थल है, इसलिए वहाँ प्रदर्शन के लिए अलग से अनुमति की जरूरत नहीं होनी चाहिए।
Important announcement:
CJP Founder @abhijeet_dipke will return to India on June 6 for a peaceful protest at Jantar Mantar, Delhi, demanding the resignation of the Education Minister. pic.twitter.com/x9M1v38Pwu
— Cockroach is Back (@Cockroachisback) June 1, 2026
CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जारी एक वीडियो में समर्थकों से अपील की थी कि वे उनके भारत पहुँचने पर दिल्ली एयरपोर्ट पर जुटें और वहाँ से संसद मार्ग थाने तक मार्च करते हुए जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करें।
दिपके ने इसे ‘शांतिपूर्ण’ और ‘संवैधानिक’ विरोध बताया था। हालाँकि इसी घोषणा के साथ यह सवाल भी उठने लगा कि क्या प्रस्तावित प्रदर्शन के लिए कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया है और क्या दिल्ली पुलिस को इसकी पूर्व सूचना दी गई है।
यहीं से सवाल उठता है कि आखिर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने का वास्तविक नियम क्या है? क्या कोई भी संगठन सीधे पहुँचकर धरना या प्रदर्शन शुरू कर सकता है या फिर इसके लिए पहले से पुलिस की मंजूरी जरूरी होती है? इस पूरे विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट के फैसले और दिल्ली पुलिस के नियमों को समझना जरूरी हो जाता है।
जंतर-मंतर क्यों बना देश का प्रमुख प्रदर्शन स्थल?
दिल्ली का जंतर-मंतर कई दशकों से देशभर के आंदोलनों, धरनों और विरोध प्रदर्शनों का केंद्र रहा है। संसद और केंद्रीय मंत्रालयों के नजदीक होने के कारण विभिन्न संगठन अपनी माँगों को सरकार तक पहुँचाने के लिए यहाँ जुटते रहे हैं।
हालाँकि समय के साथ स्थानीय निवासियों ने शोर, यातायात बाधा और सुरक्षा संबंधी समस्याओं की शिकायतें उठाईं। इसके बाद राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने 2017 में यहाँ प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस फैसले को चुनौती देते हुए मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
जुलाई 2018 में मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) के तहत नागरिकों का मौलिक अधिकार है। लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है और इस पर सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा तथा अन्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ, जुलाई 2018 के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला
यह मामला तब शुरू हुआ था जब 2017 में मजदूर किसान शक्ति संगठन ने दिल्ली पुलिस द्वारा धारा 144 के तहत लगाए गए प्रतिबंधों और NGT के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें जंतर-मंतर रोड पर प्रदर्शनों पर लगभग पूर्ण रोक लगा दी गई थी। स्थानीय निवासियों ने शोर, ट्रैफिक जाम और अन्य असुविधाओं की शिकायतें की थीं, जिसके बाद यह विवाद अदालत तक पहुँचा था।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। साथ ही यह भी कहा कि प्रदर्शनकारियों के अधिकार और स्थानीय लोगों के जीवन एवं शांति के अधिकार के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। अदालत ने दिल्ली पुलिस को प्रदर्शनों के लिए विस्तृत दिशानिर्देश तैयार करने का निर्देश दिया और यह भी कहा कि ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिसमें प्रदर्शन से पहले पुलिस को लिखित रूप से सूचित किया जाए।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए क्या प्रक्रिया है?
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद दिल्ली पुलिस ने 2018 में जंतर-मंतर और अन्य निर्धारित स्थानों पर प्रदर्शन के लिए दिशानिर्देश लागू किए।
इन दिशानिर्देशों के अनुसार:
प्रदर्शन या सार्वजनिक कार्यक्रम के लिए पहले से लिखित आवेदन देना होता है।
आवेदन नई दिल्ली जिला पुलिस के संबंधित अधिकारी को दिया जाता है।
प्रस्तावित कार्यक्रम से कम से कम 7 दिन पहले आवेदन देना आवश्यक होता है।
पुलिस, ट्रैफिक विभाग, विशेष शाखा और अन्य एजेंसियाँ सुरक्षा एवं कानून-व्यवस्था के पहलुओं की समीक्षा करती हैं।
स्थान की उपलब्धता और सुरक्षा मूल्यांकन के बाद ही अनुमति दी जाती है।
एक से अधिक आवेदन होने पर प्राथमिकता पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर तय की जा सकती है।
सुरक्षा कारणों, VIP मूवमेंट या अन्य आपात परिस्थितियों में अनुमति बाद में भी रद्द की जा सकती है।
दिल्ली पुलिस लंबे समय से यह कहती रही है कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए पूर्व अनुमति और पूर्व सूचना आवश्यक है। इसलिए पूर्व अनुमति की व्यवस्था कोई नया नियम नहीं बल्कि कई वर्षों से लागू कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है।
अभिजीत दिपके और आम आदमी पार्टी से जुड़ाव
अभिजीत दिपके का नाम पहले भी राजनीतिक अभियानों से जुड़ता रहा है। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार वह 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान आम आदमी पार्टी (AAP) के सोशल मीडिया और डिजिटल प्रचार तंत्र से जुड़े रहे थे।
उन्हें उन लोगों में गिना जाता था जो सोशल मीडिया कंटेंट, मीम्स, वीडियो और डिजिटल कैंपेन तैयार करने में भूमिका निभाते थे। दिपके का नाम AAP की चुनावी वॉर-रूम और सोशल मीडिया समन्वय गतिविधियों से भी जोड़ा जाता रहा है।
इंटरव्यू में उन्होंने युवाओं और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं तक पहुँचने की रणनीतियों पर भी चर्चा की थी। सोशल मीडिया पर उनके राजनीतिक विचार भी समय-समय पर सामने आते रहे हैं। यही कारण है कि आलोचकों का कहना है कि दिल्ली में प्रदर्शनों से जुड़े नियमों और अनुमति प्रक्रिया से दिपके पूरी तरह अनजान नहीं हो सकते।
दिलचस्प बात यह भी है कि वर्ष 2020 में AAP की नेता आतिशी समेत अन्य नेताओं ने प्रदर्शन संबंधी अनुमति के मुद्दे पर दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया था। उस दौरान दिल्ली पुलिस ने अदालत में दाखिल हलफनामे में 2018 के उन्हीं दिशानिर्देशों का हवाला दिया था, जिनके तहत जंतर-मंतर समेत संवेदनशील स्थानों पर प्रदर्शन के लिए पूर्व लिखित आवेदन आवश्यक बताया गया था।
क्या कॉकरोच जनता पार्टी ने इन नियमों का पालन किया?
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कॉकरोच जनता पार्टी ने 6 जून 2026 के प्रदर्शन की घोषणा तो कर दी लेकिन प्रदर्शन से पहले आवश्यक अनुमति लेने की प्रक्रिया पूरी नहीं की थी।
विवाद तब और बढ़ गया जब बुधवार (3 जून 2026) को पत्रकार अजीत अंजुम को दिए एक इंटरव्यू में अभिजीत दिपके ने स्वयं स्वीकार किया कि उन्होंने प्रदर्शन के लिए पुलिस से अनुमति नहीं ली है। जब उनसे पूछा गया कि क्या आवश्यक अनुमति प्राप्त कर ली गई है, तो उन्होंने सीधे ‘नहीं’ में जवाब दिया।
CJP 6 जून को सिर्फ़ ड्रामा करना चाहता है, प्रोटेस्ट नहीं
अंजुम- क्या आपने प्रोटेस्ट करने के लिए पुलिस से परमिशन ली है?
दीपके- नहीं
अंजुम- पहले से परमिशन लेना और यह बताना कि कितने लोग होंगे, प्रोटेस्ट का समय वगैरह, यह एक प्रोसेस है।
बातचीत के दौरान जब उन्हें बताया गया कि आयोजकों को आमतौर पर पहले से आवेदन देकर प्रतिभागियों की संख्या, समय और अन्य विवरण उपलब्ध कराने होते हैं, तब दिपके ने कहा कि वह प्रदर्शन वाले दिन ही पुलिस स्टेशन जाकर अनुमति माँगेंगे।
जब उनसे पूछा गया कि पहले से आवेदन क्यों नहीं किया गया, तो उनका जवाब था, “हम अपने तरीके से काम करना चाहते हैं और उसी पर कायम रहेंगे।” एक अन्य सवाल पर उन्होंने कहा कि यदि जरूरत पड़ी तो वह अनुमति मिलने तक पुलिस स्टेशन में इंतजार करेंगे।
इन बयानों के बाद सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई कि यदि प्रदर्शन को शांतिपूर्ण और संवैधानिक बताया जा रहा है, तो स्थापित कानूनी प्रक्रिया का पालन क्यों नहीं किया जा रहा।
CJP प्रवक्ताओं ने भी उठाए अनुमति व्यवस्था पर सवाल
3 जून 2026 को आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में CJP के प्रवक्ताओं ने पूर्व अनुमति की आवश्यकता पर भी सवाल उठाए। पार्टी प्रवक्ता सौरव दास ने कहा कि यदि प्रदर्शन के लिए पहले से आवेदन करना पड़े, अनुमति न मिले और फिर अदालतों का दरवाजा खटखटाना पड़े, तो ऐसी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि जंतर-मंतर पर कुछ घंटों के लिए नारे लगाकर वापस लौट जाना लोकतांत्रिक विरोध की प्रभावी संस्कृति नहीं हो सकती। इन बयानों के बाद यह चर्चा और तेज हो गई कि पार्टी मौजूदा कानूनी ढाँचे के भीतर प्रदर्शन करना चाहती है या उसी ढाँचे को चुनौती देना उसकी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है।
क्या सिर्फ निश्चित विरोध स्थल होने से अनुमति की जरूरत खत्म हो जाती है?
नहीं। यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है। जंतर-मंतर को प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थान माना जाता है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि कोई भी संगठन बिना सूचना और बिना अनुमति के वहाँ कार्यक्रम कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं अपने फैसले में कहा था कि प्रदर्शन को नियंत्रित और विनियमित तरीके से आयोजित किया जाना चाहिए तथा पुलिस पूर्व अनुमति संबंधी व्यवस्था बना सकती है। यानी जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का अधिकार है लेकिन वह नियमों और प्रशासनिक प्रक्रिया के अधीन है।
अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी
लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन एक महत्वपूर्ण अधिकार है और सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे मौलिक अधिकार माना है। लेकिन अदालत ने साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि यह अधिकार असीमित नहीं है। सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा और आम लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए कुछ नियमों का पालन करना आवश्यक है।
कॉकरोच जनता पार्टी का मामला इसी वजह से चर्चा में है। सवाल उनके प्रदर्शन के मुद्दे से ज्यादा उस प्रक्रिया को लेकर उठ रहा है, जिसका पालन किसी भी संगठन को करना होता है।
भारत में हिंदुओं के धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थलों पर मुस्लिम समुदाय के कुछ तत्वों द्वारा नमाज पढ़ने और फिर धीरे-धीरे उन स्थानों पर अपना कब्जा करना एक चिंताजनक पैटर्न है। यह शुरुआत बहुत ही सामान्य और मामूली दिखती है। कभी हल्की बूंदाबांदी से बचने के लिए, तो कभी थकान मिटाने के बहाने किसी मंदिर के परिसर में कदम रखा जाता है। इसके बाद वहाँ चुपचाप नमाज या इबादत अदा की जाती है।
जैसे ही ये करतूत सोशल मीडिया पर आती है या स्थानीय हिंदू इसका विरोध करते हैं, वैसे ही देश का एक खास वर्ग, जिसे हम ‘लिबरल हिंदू’ कहते हैं, वह छाती पीटना शुरू कर देता है। ये लिबरल जोर-जोर से रोना रोते हैं कि ‘अगर किसी ने भगवान के घर में अल्लाह की इबादत कर भी ली, तो क्या पहाड़ टूट पड़ा? ईश्वर तो एक ही है।’
लेकिन इतिहास और वर्तमान की घटनाएँ चीख-चीखकर गवाही देती हैं कि यह कोई मासूम इबादत नहीं, बल्कि एक बेहद सोची-समझी क्रोनोलॉजी है। इन्हीं लिबरल हिंदुओं के कुतर्कों से ऐसी कट्टरपंथी सोच को सबसे ज्यादा बल मिलता है। इसके बाद मामला सिर्फ नमाज तक सीमित नहीं रहता। कुछ ही वर्षों में वह पूरा स्थल मलिहाबाद के कंस किले या धार की भोजशाला जैसे विवादों में फँस जाता है। अंत में स्थिति यह हो जाती है कि हिंदुओं को अपनी ही प्राचीन जगहों के लिए दशकों तक लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है।
सबसे विडंबना की बात तो यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में गाली भी वही हिंदू खाते हैं जो अपने संवैधानिक और धार्मिक अधिकारों की बात करते हैं। समाज का लिबरल ताना-बाना उन दंगाइयों से कभी सवाल नहीं पूछता जिन्होंने चुपके से या बलपूर्वक उस जगह पर कब्जा किया हो।
बुलंदशहर : हनुमान मंदिर में नमाज
इस पूरे विवाद को समझने के लिए सबसे पहले हमें उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर की ताजा घटना को देखना होगा। यहाँ एक प्राचीन हनुमान मंदिर परिसर को साजिश के तहत नमाज स्थल में बदलने की धृष्टता की गई। 31 मई को मकान निर्माण के दौरान मुस्लिम राजमिस्त्री असर मोहम्मद और उसके साथियों की नीयत अचानक बदल गई। दोपहर में जैसे ही मौका मिला, वे सीधे हनुमान मंदिर के भीतर घुस गए।
बूंदाबांदी का बहाना बनाया गया। मजबूरी का ढोंग रचा गया। इस पूरे मौके का फायदा उठाकर असर मोहम्मद ने पवित्र मंदिर परिसर के भीतर नमाज पढ़ डाली। उसका साथी नजर मोहम्मद इस पूरे दुस्साहस के दौरान सुरक्षा कवच बनकर वहीं मुस्तैद खड़ा रहा। यह साफ तौर पर हिंदुओं की धार्मिक सहिष्णुता की पीठ में छुरा घोंपने और आस्था के केंद्र पर कब्ज़े की आक्रामक शुरुआत थी।
Video Viral होते ही स्थिति की गंभीरता को देखते हुए पुलिस प्रशासन भारी फोर्स को तुरंत मौके पर तैनात करना पड़ा। पुलिस ने इस साजिश को भांपते हुए त्वरित कार्रवाई की। मुख्य कट्टरपंथी असर मोहम्मद, नजर मोहम्मद और उन्हें सह देने वाले मकान मालिक राजकुमार के खिलाफ गंभीर धाराओं में FIR दर्ज की गई। मुख्य आरोपित असर मोहम्मद को तुरंत चालान कर सलाखों के पीछे धकेला गया।
लिबरल हिंदुओं के आत्मघाती तर्क: कट्टरपंथ को ऑक्सीजन देने वाली सोच
जब भी बुलंदशहर जैसी घटनाएँ देश के किसी कोने में होती हैं, तो सेक्युलर और लिबरल की फौज सोशल मीडिया पर सक्रिय हो जाती है। इनके तर्क इतने खोखले और आत्मघाती होते हैं कि वे सीधे तौर पर बहुसंख्यक समाज की सांस्कृतिक चेतना को सुन्न कर देते हैं। आइए इन लिबरलों के प्रमुख तर्कों को समझते हैं।
‘ईश्वर और अल्लाह में कोई भेद नहीं है’: लिबरल हिंदुओं का सबसे पहला और पसंदीदा तर्क यही होता है। वे कहते हैं कि मंदिर भी भगवान का घर है, इसलिए वहाँ अगर किसी ने सच्चे दिल से अपने अल्लाह को याद कर लिया, तो इससे मंदिर अपवित्र नहीं हो जाता। वे इसे ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ का सबसे सुंदर उदाहरण बताकर पेश करने लगते हैं।
‘जगह की कमी या मजबूरी का बहाना’: बुलंदशहर मामले में भी यही तर्क दिया गया कि बाहर बारिश हो रही थी, इसलिए मुस्लिम मजदूर मंदिर के अंदर चले गए। लिबरल इस पर भावुक होकर लिखते हैं कि ‘क्या एक प्यासे को पानी और एक नमाजी को दो गज जमीन देना भी अपराध है?’ वे इसे पूरी तरह एक मानवीय दृष्टिकोण से जोड़कर असली खतरे से ध्यान भटका देते हैं।
विरोध करने वाले हिंदुओं को ‘कट्टरपंथी’ बताना: जो हिंदू समाज इस तरह की अनधिकृत नमाज का विरोध करता है और कानून की शरण लेता है, उसे ये लिबरल तुरंत ‘नफरती चिंटू’, ‘सांप्रदायिक’ या ‘कट्टरपंथी’ का टैग दे देते हैं। उनके अनुसार, विरोध करने वाले लोग देश का माहौल खराब कर रहे हैं, न कि वे लोग जो मंदिर की मर्यादा भंग कर रहे हैं।
इन्हीं आत्मघाती और कायरतापूर्ण तर्कों के कारण कब्जा करने वाली ताकतों के हौसले बुलंद होते हैं। वे जान जाते हैं कि हिंदू समाज का एक बड़ा हिस्सा खुद ही उनके इस अतिक्रमण का बचाव करने के लिए खड़ा हो जाएगा।
हमारा विरोध बेवजह नहीं: क्यों अब सचेत और आक्रामक होने लगा है हिंदू समाज?
हिंदू समाज का यह विरोध किसी नफरत या बेवजह के डर पर आधारित नहीं है। इसके पीछे सैकड़ों वर्षों का कड़वा अनुभव और वर्तमान में लगातार सामने आ रहे धोखे हैं। हिंदू समाज अब अच्छी तरह समझ चुका है कि हर ऐसी ‘मासूम शुरुआत’ का अंत एक बहुत बड़े विवाद और उनके पवित्र स्थल के छिन जाने के रूप में होता है।
जब इतिहास में बार-बार एक ही तरह का धोखा हुआ हो, तो आने वाली पीढ़ियों का सचेत होना स्वाभाविक है। हिंदुओं ने देखा है कि कैसे उनके सीधेपन और उदारता का नाजायज फायदा उठाया गया। आज का हिंदू समाज यह भली-भांति जानता है कि यदि आज बुलंदशहर के हनुमान मंदिर में नमाज पढ़ने पर चुप्पी साध ली गई, तो कल उसी मंदिर के गर्भगृह पर दूसरा पक्ष अपना दावा ठोक देगा। यह डर काल्पनिक नहीं है, बल्कि इसके पीछे मलिहाबाद और धार जैसे दर्जनों जीवित और सुलगते हुए उदाहरण मौजूद हैं।
मलिहाबाद का कंस किला विवाद: तीन साल की ‘इबादत’ ने कैसे छीन लिया पासी समाज का हक
इस पूरी रणनीति का सबसे सटीक उदाहरण उत्तर प्रदेश के लखनऊ स्थित मलिहाबाद का है। यहाँ कांसमंडी इलाके में ऐतिहासिक ‘राजपासी राजा कंस का किला’ स्थित है। यह किला पासी समाज के गौरवशाली इतिहास का प्रतीक है और उनके लिए एक अत्यंत पवित्र एवं आस्था का केंद्र है। लेकिन यहाँ जो कुछ हुआ, वह आँखें खोलने वाला है।
लगभग तीन साल पहले, बहराइच जिले से मौलाना जमील अहमद नाम का एक व्यक्ति यहाँ आया और इस ऐतिहासिक किले के एक हिस्से में रहने लगा। शुरुआत में उसने बहुत ही सामान्य तरीके से किले के परिसर की सफाई करने की अनुमति माँगी। इसके बाद उसने वहाँ चुपचाप नमाज अदा करना शुरू कर दिया। स्थानीय हिंदुओं ने उदारता दिखाते हुए तब इसका विरोध नहीं किया। लेकिन धीरे-धीरे मौलाना जमील ने इस ऐतिहासिक धरोहर को पूरी तरह मुस्लिम गतिविधियों का केंद्र बना दिया।
28 मार्च 2026 को यह विवाद तब पूरी तरह फूट पड़ा जब ‘लाखन आर्मी’ नामक संगठन ने मलिहाबाद थाने में एक औपचारिक शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में बेहद चौंकाने वाले खुलासे किए गए। मौलाना जमील अहमद ने राजा कंस के किले पर अवैध तरीके से कब्जा कर लिया था और वहाँ ‘सुलेमानिया स्कूल’ नाम से एक अवैध मदरसा संचालित करना शुरू कर दिया था। इस मदरसे में नबीपनाह गाँव के करीब 20 हिंदू बच्चों को लाया जाता था। शिक्षा की आड़ में उन बच्चों का ब्रेनवॉश किया जा रहा था और उनका धर्म परिवर्तन कराने का एक बड़ा केंद्र विकसित किया जा रहा था। लाखन आर्मी ने पुलिस से इस अवैध कब्जे को तुरंत हटाने की माँग की।
इसके बाद स्थिति और खराब हो गई। 26 मई 2026 को कांसमंडी कला स्थल पर बने इस कथित विवादित ढांचे को लेकर तनाव इतना गहरा गया कि प्रशासन को भारी पुलिस बल तैनात करना पड़ा। पासी समाज ने बड़े मंगल के मौके पर इस कंस किले के परिसर में सुंदरकांड का पाठ करने का एलान किया था। लेकिन प्रशासन ने कानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए हिंदुओं को सुंदरकांड पढ़ने की इजाजत नहीं दी। पासी समाज के अध्यक्ष को उनके घर में ही नजरबंद कर दिया गया और अन्य समर्थकों को किले के आसपास भी फटकने नहीं दिया गया।
यहाँ तक कि बकरीद की नमाज पर भी रोक लगानी पड़ी। पुलिस ने पासी समाज के 15 बड़े नेताओं को नोटिस थमाकर सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी। अब स्थिति यह है कि जिस पासी समाज का वह किला था, उसी समाज के लोगों को वहाँ जाने से रोका जा रहा है, और यह सब सिर्फ तीन साल पहले शुरू हुई एक ‘मासूम नमाज’ के कारण हुआ है।
धार का भोजशाला विवाद: खिलजी और दिलावर के आक्रमण से लेकर आज तक की कानूनी लड़ाई
ठीक ऐसा ही एक और ऐतिहासिक और दर्दनाक उदाहरण मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ‘भोजशाला’ का है। भोजशाला मूल रूप से 11वीं शताब्दी में राजा भोज द्वारा निर्मित एक अत्यंत भव्य और पवित्र वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर और एक महान संस्कृत विश्वविद्यालय था। यह सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए परम पूजनीय और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है।
लेकिन अलाउद्दीन खिलजी और दिलावर खान जैसे क्रूर मुस्लिम आक्रमणकारियों ने इस पवित्र परिसर को बेरहमी से रौंदा। उन्होंने मंदिर के वैभव को नष्ट करने का पूरा प्रयास किया, लेकिन वे इसके सनातन धार्मिक निशानों को पूरी तरह नहीं मिटा सके। बाद में मुस्लिम पक्ष ने इस पूरे परिसर पर अपना दावा ठोक दिया और इसे ‘कमाल मौलाना मस्जिद’ कहना शुरू कर दिया।
यह विवाद आधुनिक भारत में भी हिंदुओं के लिए नासूर बना रहा। 21 मई 2022 को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ द्वारा दायर एक महत्वपूर्ण याचिका को स्वीकार किया। इस याचिका में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के 7 अप्रैल 2003 के उस विवादित आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत ASI ने हर शुक्रवार को मुस्लिमों को इस प्राचीन मंदिर परिसर के भीतर नमाज पढ़ने की अनुमति दे दी थी।
हिंदू संगठनों ने इसका कड़ा विरोध करते हुए कोर्ट के सामने पुख्ता ऐतिहासिक प्रमाण प्रस्तुत किए। हिंदुओं की माँग है कि भोजशाला परिसर में देवी सरस्वती की मूल मूर्ति को फिर से स्थापित किया जाए। साथ ही पूरे परिसर की आधुनिक वीडियोग्राफी कराई जाए और केंद्र सरकार से यहाँ बनी प्राचीन कलाकृतियों और मूर्तियों की ‘रेडियो कार्बन डेटिंग’ जाँच कराई जाए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। फिर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए भोजशाला को वाग्देवी मंदिर माना और हिंदुओं को पूजा करने का अधिकार मिला। लेकिन एक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद।
सीताराम गोयल का ऐतिहासिक दस्तावेज: मंदिरों को ध्वस्त कर बनाई गईं 1800 से अधिक मस्जिदें
यह तर्क कि ‘मुस्लिम शासकों या कट्टरपंथियों ने कभी मंदिरों पर कब्जा नहीं किया’, पूरी तरह से झूठा और इतिहास विरोधी है। साल 1990 में प्रख्यात इतिहासकार सीताराम गोयल ने अरुण शौरी, हर्ष नारायण, जय दुबाशी और राम स्वरूप जैसे विद्वानों के साथ मिलकर एक अत्यंत प्रामाणिक और शोध-आधारित किताब प्रकाशित की थी, जिसका नाम है-‘हिंदू टेंपल्स: व्हाट हैपन्ड टू देम’ (Hindu Temples: What Happened To Them)।
इस किताब के 2 सेक्शन में मुस्लिम आक्रमणकारियों और शासकों द्वारा किए गए ऐतिहासिक अत्याचारों का पूरा कच्चा चिट्ठा खोला गया। सीताराम गोयल ने देश भर में 1800 से अधिक ऐसे विशिष्ट स्थानों, मस्जिदों, मजारों और विवादित ढांचों की पहचान की, जिन्हें या तो सीधे तौर पर हिंदू, जैन और बौद्ध मंदिरों को ध्वस्त करके बनाया गया या फिर उन मंदिरों को तोड़ने के बाद निकले मलबे, खंभों और कलाकृतियों का इस्तेमाल करके खड़ा किया गया।
इस किताब के दूसरे भाग, ‘द इस्लामिक एविडेंस’ (The Islamic Evidence) में तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकारों और मुगल काल के आधिकारिक दस्तावेजों का हवाला देते हुए इस बात के अकाट्य प्रमाण दिए गए हैं कि कैसे हिंदू आस्था के केंद्रों को मिटाकर उन पर इस्लामिक विजय के प्रतीक खड़े किए गए। इस किताब में दी गई राज्यवार सूची आज के हिंदुओं को जागरूक करने के लिए काफी है।
सीताराम गोयल की किताब के आँकड़े भारत के अलग-अलग राज्यों की एक कड़वी कहानी बयाँ करते हैं। सबसे पहले उत्तर प्रदेश की बात करते हैं। यहाँ ऐसी 299 जगहें हैं जहाँ मंदिरों को नुकसान पहुँचाया गया। वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद इसका बड़ा उदाहरण है। यह प्राचीन विश्वेश्वर मंदिर को तोड़कर बनी है। लखनऊ की टीले वाली मस्जिद भी पहले लक्ष्मण टीला मंदिर थी। मेरठ की जामी मस्जिद को एक बौद्ध विहार पर बनाया गया। अयोध्या का राम मंदिर विवाद भी इसी का हिस्सा रहा है।
उत्तर प्रदेश के इन विवादों पर बड़े बयान भी सामने आए। 31 जुलाई 2023 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने साफ कहा था कि ज्ञानवापी को मस्जिद कहना गलत है। उसके भीतर आज भी त्रिशूल और हिंदू धर्म के निशान मौजूद हैं। ASI के सर्वे में वहाँ शिवलिंग भी मिला है। वहीं दूसरी तरफ 6 अगस्त 2020 को राम मंदिर भूमि पूजन के अगले ही दिन ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष साजिद रशीदी ने एक विवादित बयान दिया। उन्होंने धमकी दी थी कि मंदिर को दोबारा तोड़कर वहाँ फिर से बाबरी मस्जिद बनाई जाएगी। इसके लिए उन्होंने तुर्की के हागिया सोफिया का उदाहरण दिया था।
अब बात करते हैं दक्षिण और पश्चिम भारत के राज्यों की। कर्नाटक में ऐसी 192 जगहें हैं। वहाँ के प्राचीन हिंदू शहर बीदर और बीजापुर को पूरी तरह मुस्लिम राजधानियों में बदल दिया गया। वहाँ की सोला खंबा मस्जिद और जामी मस्जिद पूरी तरह हिंदू मंदिरों के मलबे से बनी हैं। तमिलनाडु में 175 ऐसी जगहें हैं। तिरुचिरापल्ली में नाथर शाह वाली की दरगाह एक शिव मंदिर को तोड़कर बनाई गई थी। वहाँ मंदिर के पवित्र शिवलिंग का उपयोग दरगाह में दीपक रखने के आधार के रूप में किया गया।
गुजरात और राजस्थान में भी यही सब हुआ। गुजरात में ऐसी 170 जगहें हैं। प्राचीन मंदिरों को नष्ट करके अहमदाबाद शहर को मुस्लिम स्वरूप दिया गया। अहमद शाह की जामी मस्जिद इसका सीधा उदाहरण है। द्वारका और सोमनाथ में भी कई मस्जिदें मंदिर के स्थानों पर बनी हैं। राजस्थान में भी 170 ऐसी जगहें हैं। अजमेर को नष्ट करके वहाँ 1199 में ‘अढ़ाई-दिन-का-झोंपरा’ और मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह बनाई गई। जालोर की तोपखाना मस्जिद में पार्श्वनाथ जैन मंदिर के पत्थर और सामग्री लगी है।
मध्य भारत और बाकी राज्यों की स्थिति भी अलग नहीं है। मध्य प्रदेश में 151 ऐसी जगहें हैं। भोपाल की जामी मस्जिद प्राचीन सभामंडल मंदिर के स्थान पर बनी है। महाराष्ट्र में 143 जगहें हैं। मुंबई की प्रसिद्ध मैना हज्जम की मज़ार महालक्ष्मी मंदिर को तोड़कर बनी है। आंध्र प्रदेश में 142 जगहें हैं। वहाँ की जामी मस्जिद वेणुगोपालस्वामी मंदिर को नष्ट करके बनाई गई थी। पश्चिम बंगाल में 102 जगहें हैं जहाँ हिंदू राजधानी को नष्ट करके मुस्लिम शहर बसाए गए।
कम संख्या वाले राज्यों में भी यही तरीका अपनाया गया। बिहार में 77 जगहें हैं जहाँ जैन और हिंदू मंदिरों को मजार में बदला गया। हरियाणा में भी 77 जगहें हैं। हिसार का निर्माण फिरोज शाह तुगलक ने प्राचीन अग्रोहा शहर के मंदिरों के मलबे से किया था। दिल्ली में 72 ऐसी जगहें हैं। कुतुब मीनार परिसर और कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद को 27 भव्य हिंदू और जैन मंदिरों को तोड़कर बनाया गया। ओडिशा में 12 और पंजाब में 14 ऐसी जगहें हैं जहाँ मंदिरों के स्थान पर मस्जिदें बनीं। असम, केरल और लक्षद्वीप में 2-2 ऐसी जगहें हैं। लक्षद्वीप की स्थिति यह है कि आज वहाँ की आबादी लगभग 100 प्रतिशत मुस्लिम हो चुकी है। दीव और हिमाचल प्रदेश में भी 1-1 ऐसा ऐतिहासिक उदाहरण मिलता है जहाँ प्राचीन मंदिरों की सामग्री से मस्जिद या गेट बनाए गए।
भरूच की जामा मस्जिद का विवाद: इतिहास के पन्नों से निकलता सच
सीताराम गोयल की इसी किताब में दर्ज गुजरात के भरूच जिले की ‘जामा मस्जिद’ का मामला है। 7 जनवरी 2026 को भरूच शहर की यह ऐतिहासिक जामा मस्जिद फिर से विवादों में आई थी। ‘अखिल भारतीय संत समिति’ के संतों ने आरोप लगाया कि यह मस्जिद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में होने के बावजूद यहाँ धड़ल्ले से अवैध निर्माण किया जा रहा है और पुरातत्व विभाग के कड़े नियमों की सरेआम धज्जियाँ उड़ाई जा रही।
संतों ने इन गंभीर आरोपों के साथ मस्जिद के बाहर एक बड़ा धरना प्रदर्शन किया था। स्थिति इतनी तनावपूर्ण थी कि पुलिस और जिला प्रशासन को बीच-बचाव करने के लिए आना पड़ा। प्रशासन ने संतों को उचित कार्रवाई का भरोसा देते हुए दो महीने का समय माँगा, जिसके बाद संतों ने अपना धरना समाप्त किया।
इस धरने के बाद इतिहासकार सीताराम गोयल की किताब का वह हिस्सा दोबारा चर्चा में आया, जिसमें स्पष्ट लिखा था कि भरूच की इस जामा मस्जिद का निर्माण साल 1321 में वहाँ स्थित अत्यंत प्राचीन हिंदू और जैन मंदिरों को तोड़कर किया गया था। मस्जिद के भीतर आज भी जो खंभे और स्तंभ खड़े हैं, वे चीख-चीखकर अपने जैन और हिंदू मूल के होने की गवाही दे रहे हैं।
क्या मंशा सच में इबादत की होती है? मूर्तियों और मंदिरों पर हमलों का कड़वा सच
जो लिबरल और सेक्युलर बुद्धिजीवी यह दलील देते हैं कि ‘मुस्लिमों की मंशा केवल इबादत की होती है और वे हिंदू पूजा स्थलों को भी उसी सम्मान से देखते हैं’… उन्हें पिछले कुछ सालों में देश के विभिन्न हिस्सों में हुए इन हमलों और मूर्तियों के खंडित किए जाने की घटनाओं का जवाब देना चाहिए।
अहमदाबाद के पिराना मंदिर पर मुस्लिम भीड़ का हमला (8 मई 2024)- अहमदाबाद के पिराना स्थित ऐतिहासिक ‘प्रेरणा पीठ निष्कलंकी मंदिर’ पर अचानक एक हिंसक मुस्लिम भीड़ धावा बोल देती है। विश्व हिंदू परिषद इस हमला का Video भी जारी करती है। इस वीडियो में जालीदार टोपी पहने सैकड़ों मुस्लिम हाथों में लकड़ी और लोहे के डंडे लेकर मंदिर परिसर में घुसते है।
वहाँ कट्टरपंथी भीड़ तोड़फोड़ करती है। फिर इस जगह पर मुस्लिम पक्ष दावा करती है कि यहाँ पहले दरगाह थी, जबकि यहाँ हमेशा से हिंदुओं का मंदिर ही था। इस बात की अफवाह भी उठाई जाती है कि मंदिर प्रशासन ने वहाँ से कुछ प्राचीन कब्रें हटाई थी। इसके बाद स्थानीय मुस्लिमों की भीड़ जमा होकर हमला और हिंसा फैलाती है। इस हमले में भीड़ मंदिर के गर्भगृह के भीतर स्थापित हिंदू देवी-देवताओं की कई पवित्र मूर्तियों को तोड़ देती है।
मुरादाबाद में देवी की प्रतिमा को पैरों से ठोकर मारी (23 सितंबर 2023)- उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में घृणास्पद घटना होती है। गाँव के रहने वाले सुरेश कुमार 21 सितंबर को वहाँ बन रहे एक नए देवी मंदिर पर मजदूरी का काम करते हैं। शाम के समय वहाँ गफूर का बेटा सद्दाम अपने दो साथियों नियाज़ी और अबरार के साथ पहुँचता है। सद्दाम मंदिर के गेट और पाइप के बारे में पूछताछ कर विवाद शुरू करता है। जब सुरेश इसका विरोध करता है तो सद्दाम हिंदुओं को गंदी-गंदी गालियाँ बकना शुरू करता है।
इसके बाद सद्दाम निर्माणाधीन मंदिर के अंदर घुसकर वहाँ स्थापित की जाने वाली देवी की पवित्र मूर्ति पर अपने पैरों से ठोकर मारता है और धमकी देता है कि ‘इस मूर्ति को उठाकर अपने हिंदुओं के मोहल्ले में ले जाओ, वरना तुम्हारा अंजाम बहुत बुरा होगा।’ बाद में पुलिस सद्दाम को गिरफ्तार करती है।
बिहार के दरभंगा में दुर्गा मंदिर पर पथराव (23 जुलाई 2023)- बिहार के दरभंगा में मोहर्रम का झंडा लगाने को लेकर दो समुदायों में विवाद होता है। कट्टरपंथियों की भीड़ जानबूझकर एक प्राचीन माँ दुर्गा मंदिर के ठीक सामने मोहर्रम का मजहबी झंडा लगाती है। मंदिर में मौजूद हिंदू श्रद्धालु जब इसका शांतिपूर्वक विरोध करते हैं तो कुछ मुस्लिम पक्ष के लोग मजहबी नारे लगाना शुरू करते हैं। देखते ही देखते इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ दुर्गा मंदिर को निशाना बनाते हुए पत्थरबाजी शुरू करती है। इस पथराव में दुर्गा माता का मंदिर पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाता है और कई श्रद्धालु इस हमले में घायल हो जाते है। पुलिस को स्थिति नियंत्रण में लेने के लिए भारी लाठीचार्ज करना पड़ा।
बरेली में काँवड़ियों पर मस्जिद से पथराव (23 जुलाई 2023)- उसी दिन बरेली जिले में पवित्र सावन महीने में अपनी धार्मिक यात्रा पर जा रहे काँवड़ यात्रियों के एक जत्था अचानक हमला करता है। ‘हिंदू जागरण मंच’ के अनुसार, जब काँवड़िए बालखंडी नाथ मंदिर के पास से गुजरते हैं तो वहाँ स्थित एक बड़ी मस्जिद के अंदर से काँवड़ियों पर पथराव किया जाता है। मस्जिद की छतों से बड़े-बड़े पत्थर फेंके जाते हैं, जिससे कई काँवड़िए लूल-लहान होते हैं। हमलावर जानबूझकर मस्जिद के भीतर से काँवड़ यात्रा को निशाना बनाते हैं।
दिल्ली के चाँदनी चौक में मंदिर के भीतर तोड़फोड़-आगजनी (2 जुलाई 2019)- दिल्ली के चाँदनी चौक इलाके में अचानक आधी रात को एक मामूली विवाद के बाद सैकड़ों इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ हंगामे पर उतर आती है। इस्लामी भीड़ चाँदनी चौक में स्थित एक प्राचीन हिंदू मंदिर का दरवाजा तोड़कर अंदर घुसती है। कट्टरपंथी मंदिर के अंदर स्थापित भगवान की पवित्र मूर्तियों को पूरी तरह नष्ट करते हैं।
मंदिर के पर्दों और धार्मिक सामग्रियों को आग के हवाले कर दिया। मूर्तियों की सुरक्षा के लिए लगाए गए मोटे कांच के शील्ड भी ईंटों से तोड़ देते हैं और पूरे मंदिर परिसर में जूते चप्पल और ईंटें फैला देते हैं। हमलावर लगातार ‘नारा-ए-तकबीर, अल्लाह-हू-अकबर’ के मजहबी नारे लगाती है। पुलिस बल के हस्तक्षेप करने पर इस्लामी भीड़ पुलिसकर्मियों पर भी पथराव करती है।
इबादत के ढोंग में कब्जे की साजिश
इन सभी घटनाओं को देखकर एक बात तो साफ हो जाती है कि हिंदुओं के पवित्र स्थानों पर नमाज अदा करना कोई भूल नहीं, बल्कि एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा है। अगर इन लोगों के मन में अल्लाह की इबाबत ही करना होता, तो ये हिंदू मंदिरों पर कब्जा नहीं करते। साफ है कि इनका असली मकसद दूसरे धर्म के प्रतीकों को मिटाना है। वे इन पवित्र जगहों पर अपने मजहब का ठप्पा लगाना चाहते हैं। हमारे देश के लिबरल हिंदू इसे बहुत बड़ी उदारता समझते हैं। लेकिन कट्टरपंथी इसे हिंदुओं की कमजोरी और कायरता मानते हैं।
इतिहास गवाह है कि जो समाज जागरूक नहीं रहता, उसका अस्तित्व मिट जाता है। बुलंदशहर की घटना पर आज का हिंदू समाज तुरंत एक्शन ले रहा है। वे पुलिस में FIR दर्ज कराकर मामले को तुरंत खत्म करना चाहता है। आज की जरा सी लापरवाही कल एक बड़े विवाद को जन्म दे सकती है। पुराने मामलों में हमने मलिहाबाद और भोजशाला जैसी अंतहीन कानूनी लड़ाई देखी है, जिसमें अपनी ही जमीन पर हक साबित करने के लिए हिंदुओं की पीढ़ियाँ कोर्ट के चक्कर काटती रही हैं। इसलिए अब ऐसे मामलों पर विश्वास करने से अच्छा है कि तुरंत इनकी मंशा समझकर साजिश को खत्म किया जाए।