दुनिया के प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भले ही पाकिस्तान भारत से चार पायदान ऊपर दिखाई देता हो, लेकिन जमीन पर तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आती है। बलूचिस्तान में पत्रकारों की हत्याएँ, जबरन गायब किए जाने के आरोप, POK में मीडिया पर कार्रवाई और अब विदेशी पत्रकारों के लिए सख्त एनओसी व्यवस्था ने पाकिस्तान की प्रेस की आजादी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इसी बीच बलूचिस्तान के जाफराबाद जिले में स्थानीय पत्रकार नजर मुहम्मद कनरानी की हालिया गोली मारकर हत्या कर दी, जिसके बाद बहस और तेज हो गई है कि पाकिस्तान में पत्रकारों की सुरक्षा और स्वतंत्र रिपोर्टिंग कितनी गंभीर चुनौती बन चुकी है।
अब इस्लामाबाद, लाहौर और कराची को छोड़कर पाकिस्तान के किसी भी दूसरे हिस्से में रिपोर्टिंग करने से पहले विदेशी पत्रकारों को सरकार से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) लेना होगा।
ऐसे समय में यह फैसला आया है जब पाकिस्तान पहले से ही बलूचिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) में मानवाधिकार उल्लंघन, इंटरनेट बंदी, प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई और पत्रकारों पर हमलों को लेकर अंतरराष्ट्रीय आलोचना झेल रहा है।
आलोचकों का कहना है कि यह कदम सुरक्षा के नाम पर नहीं, बल्कि उन इलाकों की सच्चाई दुनिया से छिपाने के लिए उठाया गया है।
विदेशी पत्रकारों के लिए क्या बदले नए नियम?
पाकिस्तान के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने फॉरेन मीडिया फैसिलिटेशन गुइडेलीनेस 2026 जारी की हैं। इन नियमों के तहत अब विदेशी मीडिया संस्थानों, पत्रकारों, फ्रीलांसरों, डॉक्यूमेंट्री बनाने वालों, प्रोडक्शन हाउस, फिक्सर, अनुवादकों और विदेशी मीडिया के लिए काम करने वाले पाकिस्तानी नागरिकों तक को सरकारी पंजीकरण कराना होगा।
सबसे बड़ा बदलाव यह है कि विदेशी पत्रकार अब केवल इस्लामाबाद, लाहौर और कराची में बिना अतिरिक्त अनुमति के काम कर सकेंगे। यदि उन्हें बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा, सिंध के दूरदराज इलाकों या पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में जाना है तो पहले सरकार से NOC लेना होगा।
यह नियम केवल न्यूज रिपोर्टिंग तक सीमित नहीं है। किसी भी तरह की वीडियो शूटिंग, डॉक्यूमेंट्री, सोशल मीडिया कंटेंट या किसी विशेष इलाके में जाकर जानकारी जुटाने के लिए भी सरकारी मंजूरी जरूरी होगी। यहाँ तक कि विदेशी पत्रकार यदि एबटाबाद या मुरी घूमने भी जाना चाहें तो उन्हें पहले सरकार से अनुमति लेनी पड़ेगी।
नई व्यवस्था में दो तरह की मान्यताएँ भी तय की गई हैं। एक स्थायी वार्षिक मान्यता, जो पाकिस्तान में लगातार काम करने वाले विदेशी पत्रकारों के लिए होगी, जबकि दूसरी तीन महीने तक की अस्थायी मान्यता होगी, जो बाहर से आने वाले पत्रकारों को दी जाएगी।
सबसे विवादित बात यह है कि सरकार किसी भी समय किसी पत्रकार की मान्यता रद्द कर सकती है यदि उसे लगे कि उसकी रिपोर्टिंग पाकिस्तान की विचारधारा, संप्रभुता, सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के खिलाफ है। इन शब्दों की स्पष्ट कानूनी परिभाषा भी नहीं दी गई है, जिससे अधिकारियों को व्यापक अधिकार मिल जाते हैं।
बलूचिस्तान में पत्रकारिता बन चुकी है जान जोखिम में डालने जैसा काम
पाकिस्तान का बलूचिस्तान लंबे समय से हिंसा, जबरन गायब किए जाने, सुरक्षा बलों की कार्रवाई और अलगाववादी संगठनों की गतिविधियों का केंद्र रहा है। यहाँ पत्रकारों के लिए सच्चाई सामने लाना किसी युद्ध क्षेत्र में काम करने से कम नहीं माना जाता।
बलूचिस्तान यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (BUJ) के अनुसार साल 2008 से 2026 के बीच 42 पत्रकारों की हत्या हो चुकी है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन मामलों में किसी भी आरोपित को सजा नहीं मिली।
कई पत्रकारों ने अपनी पहचान छिपाकर बताया कि उन्हें लगातार धमकियाँ मिलती रहती हैं। एक पत्रकार ने बताया कि उसे फोन पर कहा गया, “अगर तुम पत्रकारिता में नए हो तो शायद तुम्हें ताबूत की जरूरत पड़ेगी। बता दो, हम पहले ही भेज देते हैं।”
ऐसी धमकियों के बाद कई पत्रकार पुलिस तक भी नहीं जाते क्योंकि उन्हें भरोसा नहीं कि उनकी सुरक्षा होगी। कई मामलों में पत्रकारों की हत्या के बाद FIR तक दर्ज नहीं हुई।
पत्रकार अब्दुल लतीफ बलोच का मामला इसका बड़ा उदाहरण है। मई 2025 में कुछ हथियारबंद लोग आधी रात उनके घर पहुँचे। परिवार ने उन्हें बाहर जाने से रोका, लेकिन हमलावरों ने वहीं गोलियाँ चलाकर उनकी हत्या कर दी। एक साल से ज्यादा समय गुजरने के बाद भी इस मामले में कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
बलूचिस्तान के कई जिलों में पत्रकारों को केवल सुरक्षा बलों या सरकार से ही नहीं, बल्कि उग्रवादी संगठनों और स्थानीय प्रभावशाली लोगों से भी खतरा रहता है। ऐसे माहौल में स्वतंत्र पत्रकारिता लगभग असंभव हो जाती है।
जबरन गायब करना, इंटरनेट बंदी और सेंसरशिप से दबाई जा रही आवाजें
बलूचिस्तान में लोगों को जबरन उठाकर गायब कर देना सालों से सबसे बड़ा मानवाधिकार मुद्दा रहा है। मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि कई नागरिकों को सुरक्षा एजेंसियाँ हिरासत में ले जाती हैं और परिवारों को महीनों या वर्षों तक उनकी कोई जानकारी नहीं मिलती।
कुछ लोग लंबे समय बाद गंभीर शारीरिक यातना के निशानों के साथ वापस लौटते हैं, जबकि कई लोगों के शव सुनसान इलाकों में मिलते हैं। इन शवों पर गोली और यातना के निशान होने के आरोप भी बार-बार सामने आते रहे हैं।
इन्हीं मुद्दों को उठाने वाली डॉक्टर महरंग बलोच और उनकी संस्था बलोच यकजेहती कमेटी (BYC) अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रही हैं। उन्होंने जबरन गायब किए गए लोगों और मानवाधिकार उल्लंघनों के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन आयोजित किए।
उनके परिवार पर भी पहले हमला हुआ था और उनके पिता की मौत भी ऐसे ही एक मामले से जुड़ी बताई जाती है। अब उन्हें भी कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है, जिसे लेकर लगातार सवाल उठा रहे हैं।
सेंसरशिप केवल धमकियों तक सीमित नहीं है। कई इलाकों में सालों से इंटरनेट सेवाएँ बंद हैं। पंजगुर में मोबाइल इंटरनेट लंबे समय से प्रभावित रहा, जबकि डेरा बुगती में भी 3जी और 4जी सेवाएँ लंबे समय तक बंद रहने की खबरें सामने आती रही हैं। इंटरनेट बंद होने का सबसे बड़ा असर पत्रकारों पर पड़ता है क्योंकि वे अपनी रिपोर्ट समय पर भेज ही नहीं पाते।
कई स्थानीय मीडिया संस्थान सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर हैं। ऐसे में सरकार के खिलाफ खबरें प्रकाशित करना उनके लिए आर्थिक जोखिम भी बन जाता है। यही कारण है कि कई पत्रकार केवल सरकारी प्रेस विज्ञप्तियाँ प्रकाशित करने तक सीमित रहने को मजबूर हो जाते हैं।
POK में विरोध प्रदर्शनों के बाद बढ़ी सख्ती, दुनिया उठा रही सवाल
विश्लेषकों का मानना है कि विदेशी मीडिया पर नई पाबंदियों का समय बेहद महत्वपूर्ण है। हाल के महीनों में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) में चुनाव, प्रदर्शन और सुरक्षा बलों की कार्रवाई को लेकर कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने रिपोर्ट प्रकाशित की थीं।
मानवाधिकार संगठनों ने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग किया गया, कई जगह इंटरनेट सेवाएँ बंद की गईं और पत्रकारों की रिपोर्टिंग में बाधाएँ डाली गईं। इन्हीं घटनाओं के बाद पाकिस्तान ने विदेशी मीडिया की गतिविधियों पर और ज्यादा नियंत्रण स्थापित कर दिया।
कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कार्रवाई भी हुई। पाकिस्तान ने कुछ रिपोर्टों को एंटी-स्टेट प्रोपेगेंडा और येलो जर्नलिज्म बताते हुए उनके प्रसारण पर रोक लगाने जैसे कदम उठाए।
एमनेस्टी इंटरनेशनल, कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (CPJ) और रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने बार-बार पाकिस्तान से प्रेस की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने, पत्रकारों की सुरक्षा बढ़ाने और मानवाधिकार उल्लंघनों की निष्पक्ष जाँच कराने की माँग की है।
रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स का कहना है कि पाकिस्तान दुनिया के उन देशों में शामिल है जहाँ स्वतंत्र पत्रकारिता करना सबसे अधिक जोखिम भरा है। संगठन के अनुसार जो पत्रकार सेना या सुरक्षा प्रतिष्ठान की आधिकारिक लाइन से अलग रिपोर्टिंग करते हैं, उन्हें निगरानी, हिरासत, धमकी और हमलों का सामना करना पड़ सकता है।
इसी वजह से विशेषज्ञ मानते हैं कि विदेशी पत्रकारों के लिए नई NOC व्यवस्था केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि यह उन इलाकों तक स्वतंत्र मीडिया की पहुँच सीमित करने वाला कदम भी साबित हो सकता है, जहाँ पहले से मानवाधिकार और प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर सवाल उठते रहे हैं।
पाकिस्तान सरकार इन नियमों को प्रशासनिक व्यवस्था और सुरक्षा के लिए जरूरी बता रही है, लेकिन जिस समय इन्हें लागू किया गया है और जिस तरह विदेशी पत्रकारों की गतिविधियों को सरकारी अनुमति से जोड़ दिया गया है, उससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह बहस तेज हो गई है कि क्या पाकिस्तान संवेदनशील क्षेत्रों की वास्तविक स्थिति दुनिया से छिपाने की कोशिश कर रहा है।
देश की स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता का दम भरने वाले यूट्यूबर रवीश कुमार एक बार फिर अपने पुराने और चुनिंदा एजेंडे के साथ कैमरे के सामने प्रकट हो गए है। मंगलवार (4 अगस्त) को ही ऑपइंडिया ने एक रवीश कुमार को लेकर आर्टिकल प्रकाशित किया था। इस लेख में ऑपइंडिया ने सीधे तौर पर सवाल उठाया था कि झारखंड में छात्रों का भविष्य दांव पर लगा है, जेपीएससी (JPSC) और जेएसएससी (JSSC) पेपर लीक को लेकर युवा सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन खुद को निष्पक्ष कहने वाले रवीश कुमार झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार और कॉन्ग्रेस से सवाल पूछने से क्यों बच रहे हैं?
अपनी घिरती साख को बचाने और सफाई देने के लिए, रवीश कुमार यूट्यूब पर लगभग 30 मिनट का एक वीडियो अपलोड करते हैं। इस वीडियो का टाइटल रखा गया था ‘झारखंड JPSC: पेपर लीक, अनशन और गोदी मीडिया से सवाल’।
लेकिन जब इस पूरे वीडियो को देखे और ध्यान से सुने, तो यह साफ हो जाता है कि झारखंड पेपर लीक केवल एक बहाना था, असली मकसद अपनी राजनीति चमकाना था… हेमंत सोरेन सरकार को बचाना और केंद्र की मोदी सरकार व बीजेपी पर निशाना साधना था। रवीश कुमार ने इस वीडियो के जरिए अपनी झेंप मिटाने की पूरी कोशिश की, लेकिन उनका यह प्रयास पूरी तरह से एकतरफा और प्रोपेगेंडा से भरा नजर आया।
रवीश कुमार की वीडियो में झारखंड का मुद्दा कम, मोदी से नफरत ज्यादा
रवीश कुमार ने अपने इस 30 मिनट के लंबे भाषण में झारखंड के छात्रों के दर्द को भुनाने की कोशिश तो की, लेकिन उनका पूरा जोर हेमंत सोरेन सरकार की खिंचाई करने के बजाय पुरानी बीजेपी सरकारों को घेरने पर रहा। जहाँ एक ओर झारखंड में जेएमएम (JMM) और कॉन्ग्रेस गठबंधन की सरकार है और उन्हीं के राज में पेपर लीक की घटनाएँ हो रही हैं, वहीं रवीश कुमार यह कहते नजर आए कि बीजेपी के पिछले शासनकाल से सबक लेना चाहिए था। यानी गलती चाहे मौजूदा सरकार की हो, लेकिन ज्ञान हमेशा बीजेपी के खिलाफ ही दिया जाएगा।
नीट (NEET) परीक्षा विवाद के दौरान केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के लिए ताबड़तोड़ वीडियो, रील और ट्वीट बनाने वाले रवीश कुमार झारखंड मामले में पूरी तरह से चुप्पी साध गए। झारखंड में जिस तरह से परीक्षाएँ बर्बाद हो रही हैं, वहाँ किसी मंत्री के इस्तीफे की माँग उनके मुँह से एक बार भी नहीं निकली। इसके बजाय वे यह ज्ञान बाँटते नजर आए कि सरकार को ‘कैसे काम करना चाहिए’।
इस पूरे मामले में रवीश कुमार का दोहरा रवैया साफ झलकता है। जब केंद्र में बीजेपी की सरकार होती है, तो वे हर छोटी-बड़ी बात पर इस्तीफे की माँग करते हैं, मंत्रियों के खिलाफ मुहिम चलाते हैं और युवाओं को भड़काने का कोई मौका नहीं छोड़ते। लेकिन जब झारखंड में उनकी पसंद की INDI गठबंधन वाली सरकार है, तो वे मंत्रियों से सवाल पूछने की बजाय सिर्फ यह सलाह देते हैं कि ‘सिस्टम को कैसे सुधारा जाना चाहिए’। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि उनके लिए छात्र और शिक्षा कभी मुद्दा नहीं रहे, बल्कि उनका एकमात्र लक्ष्य हर हाल में बीजेपी और केंद्र सरकार को घेरना है।
पुराना राग: पीके जोशी पर निशाना और कॉन्ग्रेस से दूरी
झारखंड के छात्रों के अनशन और प्रदर्शन पर बात करते-करते अचानक रवीश कुमार का रुख केंद्र सरकार की तरफ मुड़ जाता है। वे विषयांतर करते हुए पीके जोशी (PK Joshi) का जिक्र करने लगते हैं। रवीश कुमार ने बड़े विस्तार से बताया कि कैसे पीके जोशी मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग के चेयरमैन रहे और बाद में यूपीएससी (UPSC) और एनटीए (NTA) से जुड़े। उन्होंने यह साबित करने की कोशिश की कि इन नियुक्तियों के पीछे RSS या बीजेपी का हाथ था।
जब झारखंड में कॉन्ग्रेस और झामुमो (झारखंड मुक्ति मोर्चा) की सरकार है, तो रवीश कुमार ने अपनी Video में सीधे तौर पर हेमंत सोरेन या राहुल गाँधी से तीखे सवाल क्यों नहीं पूछे? वे यह कहते नजर आए कि राहुल गाँधी तो कोटा और देहरादून में रैलियाँ कर रहे हैं, लेकिन झारखंड के छात्रों को भी उनसे सवाल पूछना चाहिए। यानी उन्होंने खुद सीधे सवाल पूछने के बजाय गेंद दूसरों के पाले में डाल दी।
इसके अलावा, जब आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह से झारखंड पेपर लीक पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने झारखंड पर बात करने से बचते हुए मध्य प्रदेश और गुजरात की बात की। रवीश कुमार ने भी इस बात को ऐसे घुमाया कि जैसे केवल बीजेपी शासित राज्यों में ही सब कुछ गलत हो रहा है।
रवीश कुमार का यह अंदाज साबित करता है कि वे जानबूझकर कॉन्ग्रेस और उसके सहयोगियों को बचाने का ठेका लेकर बैठे हैं। झारखंड में जब युवा सड़कों पर हैं, तो वहाँ की सरकार से जवाब माँगने के बजाय वे मध्य प्रदेश, गुजरात और संघ परिवार की पुरानी नियुक्तियों का कच्चा-चिट्ठा खोलने बैठ जाते हैं। संजय सिंह जैसे नेताओं के बयानों का बचाव करते हुए वे यह भूल जाते हैं कि जनता सब देख रही है कि कैसे एक सोची-समझी रणनीति के तहत अपने राजनीतिक आकाओं को बचाने के लिए मुख्य मुद्दों से ध्यान भटकाया जा रहा है।
बार-बार… हर बार, ‘गोदी मीडिया’ का रोना रोकर खुद को बेबस बताते
रवीश कुमार हर बार की तरह इस वीडियो में भी अपनी पुरानी आदत से बाज नहीं आए और बार-बार ‘गोदी मीडिया’ का जाप करने लगे। एक तरफ वे कहते हैं कि वे हर राज्य के पेपर लीक और छात्र आंदोलन को कवर नहीं कर सकते, क्योंकि वे एक अकेले यूट्यूबर हैं और उनकी अपनी सीमाएँ हैं। लेकिन दूसरी तरफ, वे यह उपदेश देना नहीं भूलते कि मुख्यधारा की मीडिया को हर राज्य की खबर दिखानी चाहिए।
रवीश कुमार चाहे जितना भी कहें कि वे सभी मुद्दों को कवर नहीं कर सकते, लेकिन सच यह है कि सीजेपी (CJP) और तथाकथित छात्र प्रदर्शनों को उन्होंने अपने स्टूडियो में बैठकर बहुत शानदार और लंबी कवरेज दी है। सीजेपी का एक भी ऐसा मुद्दा नहीं होगा जिसे रवीश कुमार ने अपनी प्लेलिस्ट या वीडियो में छोड़ा हो। जब एजेंडे की बात आती है, तो संसाधन अपने-आप मिल जाते हैं, लेकिन जब विपक्ष की सरकारों से सवाल पूछने की बारी आती है, तो यूट्यूबर होने की लाचारी याद आ जाती है। इसके अलावा, रवीश कुमार ने गाजा-फिलिस्तीन वाले मुद्दे पर भी खूब रोटियाँ सेंकी थी, तब इनका ‘अकेले यूट्यूबर’ वाला बहाना नहीं चला था।
रवीश कुमार का यह रोना कि ‘हम अकेले यूट्यूबर हैं और सब कुछ कवर नहीं कर सकते’, पूरी तरह से एक बहानेबाजी है। जब देश में कहीं भी ऐसा मुद्दा मिल जाए जिसे घुमा-फिराकर केंद्र सरकार के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सके, तब उनकी लाचारी गायब हो जाती है और वे लंबी-लंबी वीडियो बनाने लगते हैं। लेकिन जब झारखंड जैसी जगहों पर कॉन्ग्रेस समर्थित सरकार कटघरे में होती है, तो वे अपनी सीमाएँ गिनाने लगते हैं। यह दोहरी मानसिकता उनकी पत्रकारिता की पोल खोलने के लिए काफी है।
इसके अलावा, जब CJP का प्रदर्शन चल रहा था और प्रधानमंत्री ने इंस्टाग्राम पर युवाओं से वादा किया था, कि पेपर लीक से जुड़े अपराधियों और माफियाओं को सख्त सजा दी जाएगी और फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन किया जाएगा, जिससे इंसाफ जल्दी मिले। लेकिन… लेकिन… रवीश कुमार ने हेमंत सोरेन को इस बात के लिए सराहा कि उन्होंने कार्रवाई का भरोसा दिलाया है। पीएम मोदी के लिए अगर ये एक शब्द अच्छे बोल देंगे तो शायद इनको मिलने वाली ‘मदद’ कही बंद ना हो जाए।
छात्र आंदोलन का फर्जी तुलना और धर्म का तड़का
प्रोपेगेंडाई पत्रकार रवीश कुमार की जब आप वीडियो सुनते-सुनते आगे बढ़ेगे तब उनका विषय फिर झारखंड पेपर लीक से भटकर धर्म को टारगेट करने पर अटक जाएगा। रवीश कुमार ने अपनी वीडियो में यह तारीफ की कि झारखंड के छात्रों ने शांतिपूर्ण आंदोलन किया और हेमंत सोरेन सरकार ने उनके साथ ‘दिल्ली पुलिस जैसी बर्बरता’ नहीं की। लेकिन वे यह बताना भूल गए कि दिल्ली के जंतर-मंतर या अन्य जगहों पर जो तथाकथित प्रदर्शन हुए थे, उनमें वे लोग शामिल हुए थे, जिनका पढ़ाई-लिखाई से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं होता, केवल अपना चेहरा चमकाने के लिए और PM मोदी को गाली देने के लिए उस प्रदर्शन में आ खड़े होते हैं। CJP के प्रदर्शन में NEET छात्र कम, रीलबाज ज्यादा घूमते नजर आए थे। इसके अलावा, CJP प्रदर्शन में यदि किसी छात्र से पेपर लीक मुद्दे को लेकर या NEET की फुल-फॉर्म भी पूछ ली जाए, तो उनका मुँह नीला पड़ जाता था। जबकि झारखंड पेपर लीक मामले में असल पीड़ित और जेपीएससी/परीक्षा देने वाले छात्र मौजूद है, जो रीलबाजी करने नहीं आए है, अपने हक की लड़ाई लड़ने आए है और CJP के एजेंडे की तरह PM मोदी को गाली देने नहीं आए है।
बात जब झारखंड के प्रशासनिक सिस्टम और पेपर लीक की हो रही थी, तो अचानक बीच में रवीश कुमार ने धर्म और मुसलमानों की राजनीति का जिक्र छेड़ दिया। उन्होंने यह कहना शुरू कर दिया कि हिंदी प्रदेशों के छात्र चुनाव के समय धर्म और मुसलमानों की नफरत में अपने असली मुद्दों (रोजगार और पेपर लीक) को भूल जाते हैं। सवाल यह उठता है कि झारखंड के पेपर लीक में अचानक धर्म और मजहब का यह तड़का लगाने की क्या जरूरत थी? साफ है कि प्रोपेगेंडा पत्रकारों को हर मुद्दे को अंततः सांप्रदायिक रंग देकर अपनी वैचारिक रोटी सेकनी होती है।
रवीश कुमार की यह आदत बन चुकी है कि वे हर गंभीर मुद्दे में जबरन धर्म और राजनीति का एंगल ले आते हैं। झारखंड के युवा न्याय माँग रहे हैं, लेकिन रवीश कुमार को उसमें भी हिंदी प्रदेशों के छात्रों को यह ताना मारने का मौका मिल जाता है कि वे चुनाव के दौरान धर्म के नाम पर वोट देते हैं। इस तरह की बयानबाजी से साफ जाहिर होता है कि वे छात्रों के हमदर्द कम और एक खास वैचारिक एजेंडे के प्रचारक ज्यादा हैं, जो हर बात को अपनी राजनीतिक चश्मे से ही देखते हैं।
पिछली सदी तक किसी देश की ताकत उसकी सेना, हथियारों के जखीरे और तेल के भंडार से तय होती थी। लेकिन AI के दौर में युद्ध और ताकत का पैमाना बदल रहा है। अब किसी देश की शक्ति सिर्फ सैनिकों और लड़ाकू विमानों में नहीं बल्कि उसके डेटा, क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर और AI को चलाने वाली कंप्यूटिंग क्षमता में भी छिपी है।
हालिया ईरान-अमेरिका संघर्ष ने इस बदलती तस्वीर की एक झलक दिखा दी। इस बार निशाने पर सिर्फ सैन्य अड्डे, तेल रिफाइनरियाँ या बंदरगाह नहीं थे, बल्कि वे विशाल डेटा सेंटर्स भी थे जिन पर Amazon, Google, Microsoft जैसी टेक कंपनियों की क्लाउड सेवाएँ टिकी हैं।
यह घटनाक्रम एक बड़े बदलाव का संकेत है कि भविष्य के युद्ध में डेटा सेंटर भी एयरबेस या मिसाइल लॉन्च साइट जितना अहम लक्ष्य हो सकता है। ईरान भी लंबे समय से जानता है कि पारंपरिक सैन्य ताकत में अमेरिका से सीधी टक्कर मुश्किल है। इसलिए उसकी रणनीति कम लागत में दुश्मन को ज्यादा से ज्यादा आर्थिक, तकनीकी और मनोवैज्ञानिक नुकसान पहुँचाने की रही है।
पहले यह रणनीति तेल उत्पादन, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार पर दबाव बनाने तक सीमित थी, लेकिन अब इसमें AI डेटा सेंटर्स को भी शामिल कर लिया गया है। यही कारण है कि विशेषज्ञ इसे आधुनिक युद्ध का एक नया अध्याय मान रहे हैं।
इस रणनीति की चर्चा 2026 में तब तेज हुई, जब 30 अप्रैल 2026 को मिडिल ईस्ट में स्थित एक प्रमुख AI डेटा सेंटर पर हमला हुआ। इसके बाद 21 जुलाई 2026 को ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने 29 क्षेत्रीय टेक कंपनियों और AI इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े ठिकानों की एक सूची जारी की है।
इन घटनाओं ने पहली बार यह संकेत दिया कि ईरान अब केवल सैन्य ठिकानों या तेल प्रतिष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि AI डेटा सेंटर्स को भी अपनी रणनीति का हिस्सा बना रहा है।
क्या होता है डेटा सेंटर और AI की दुनिया में इनकी भूमिका इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?
जब हम Google पर सर्च करते हैं, ChatGPT से सवाल पूछते हैं, Amazon से खरीदारी करते हैं, बैंकिंग ऐप चलाते हैं या किसी कंपनी का क्लाउड सर्वर इस्तेमाल करते हैं, तो इसके पीछे दुनिया भर में बने हजारों डेटा सेंटर काम करते हैं।
साधारण भाषा में डेटा सेंटर हाई-टेक इमारतें हैं, जहाँ लाखों सर्वर, स्टोरेज सिस्टम, नेटवर्किंग उपकरण, बैकअप बिजली और तापमान नियंत्रित करने की व्यवस्था होती है। इंटरनेट की लगभग हर डिजिटल सेवा इन्हीं पर निर्भर है।
AI के दौर में इनकी अहमियत और बढ़ गई है। ChatGPT जैसे AI मॉडल, इमेज जनरेशन, सैन्य AI, ड्रोन कंट्रोल, सैटेलाइट डेटा और रियल-टाइम इंटेलिजेंस के लिए भारी कंप्यूटिंग क्षमता चाहिए, जो NVIDIA जैसे निर्माताओं के हाई-एंड GPU और बड़े क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर से मिलती है।
यानी डेटा सेंटर अब सिर्फ इंटरनेट चलाने वाली इमारतें नहीं हैं। वे डिजिटल अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य क्षमता की रीढ़ बन चुके हैं। किसी बड़े डेटा सेंटर को नुकसान पहुँचने पर बैंकिंग, सरकारी नेटवर्क, उद्योग, AI मॉडल, क्लाउड सेवाएँ और मिलिट्री कम्युनिकेशन तक प्रभावित हो सकते हैं।
इसीलिए डेटा सेंटर आधुनिक युद्ध का नया रणनीतिक लक्ष्य बन रहे हैं। अब सवाल है कि ईरान ने इन्हें निशाना क्यों बनाया और इसके पीछे उसकी असली रणनीति क्या है?
ईरान ने AI डेटा सेंटर्स को ही क्यों चुना? समझिए उसकी असमान ताकत वाले युद्ध की रणनीति
ईरान और अमेरिका की सैन्य ताकत में बड़ा अंतर है। अमेरिका के पास आधुनिक वायुसेना, नौसेना, लंबी दूरी की मिसाइलें, निगरानी प्रणालियाँ और दुनिया भर में सैन्य ठिकाने हैं जबकि ईरान के संसाधन सीमित हैं। ऐसे में ईरान की रणनीति सीधे मुकाबले के बजाय अमेरिका की कमजोर कड़ियों को निशाना बनाने की रही है। इसे असमान ताकत वाले देशों की युद्ध रणनीति कहा जाता है।
पिछले दो दशकों में ईरान ने तेल रिफाइनरियों, समुद्री व्यापार मार्गों और ऊर्जा ढाँचे पर दबाव बनाने की कोशिश की है। अब AI के दौर में उसकी नजर डेटा सेंटर्स पर है।
मध्य पूर्व में अमेरिका और उसके सहयोगी तेजी से AI इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित कर रहे हैं। ईरान का मानना है कि इन पर असर डालने से सिर्फ क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि अमेरिकी टेक कंपनियों की क्लाउड सेवाएँ, AI रिसर्च और उसकी तकनीकी बढ़त भी प्रभावित हो सकती है।
डेटा सेंटर पर हमला बैंकिंग, सरकारी एजेंसियों, रक्षा संस्थानों और डिजिटल सेवाओं तक असर डाल सकता है। इसलिए यह रणनीति सैन्य नुकसान के साथ आर्थिक और मनोवैज्ञानिक दबाव भी बना सकती है।
जब एक ही डेटा सेंटर पर चलते हैं बैंक, अस्पताल और सेना, तब पैदा होती है चुनौती
AI डेटा सेंटर्स को लेकर सबसे बड़ी बहस इस बात पर है कि आखिर इन्हें सैन्य लक्ष्य माना जाना चाहिए या नहीं। पहली नजर में ये सामान्य व्यावसायिक इमारतें दिखाई देती हैं, जहाँ सर्वर लगे होते हैं और इंटरनेट सेवाएँ संचालित होती हैं। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक मुस्किल होता है।
आज अमेजन वेब सर्विसेज (AWS), माइक्रोसॉफ्ट एज्योर, गूगल क्लाउड और ओरेकल जैसी क्लाउड कंपनियाँ केवल निजी कंपनियों को ही सर्वर उपलब्ध नहीं करातीं।
इन्हीं प्लेटफॉर्म्स पर कई सरकारी एजेंसियाँ, रक्षा मंत्रालय, खुफिया संगठन और सुरक्षा संस्थान भी अपने डिजिटल सिस्टम संचालित करते हैं। इसका मतलब यह है कि एक ही डेटा सेंटर के भीतर किसी कंपनी का ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म भी चल सकता है, किसी अस्पताल का डिजिटल रिकॉर्ड भी सुरक्षित हो सकता है और उसी समय किसी सैन्य एजेंसी का संवेदनशील डेटा भी स्टोर हो सकता है।
यही स्थिति ड्यूल यूज इन्फ्रास्ट्रक्चर कहलाती है। यानी एक ऐसा ढाँचा, जिसका इस्तेमाल नागरिक और सैन्य दोनों उद्देश्यों के लिए किया जाता है। इसी कारण ईरान ने दावा किया कि AWS जैसे डेटा सेंटर्स अमेरिकी सैन्य गतिविधियों का हिस्सा हैं।
उसका कहना था कि जब कोई क्लाउड कंपनी अमेरिकी रक्षा परियोजनाओं को सेवाएँ देती है, तो उसका इंफ्रास्ट्रक्चर केवल व्यावसायिक नहीं रह जाता। हालाँकि अंतरराष्ट्रीय कानून के जानकार इस विषय पर अलग-अलग राय रखते हैं, क्योंकि किसी डेटा सेंटर पर हमला करने से बड़ी संख्या में नागरिक सेवाएँ भी प्रभावित हो सकती हैं।
यही आधुनिक युद्ध की सबसे बड़ी दुविधा है। पहले किसी एयरबेस और अस्पताल में स्पष्ट अंतर होता था, लेकिन अब डिजिटल दुनिया में वही सर्वर नागरिक और सैन्य दोनों कामों के लिए इस्तेमाल हो सकता है। ऐसे में यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि किसी डेटा सेंटर को पूरी तरह नागरिक माना जाए या सैन्य।
AWS, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और अमेरिकी रक्षा तंत्र का क्या संबंध है?
CNN की रिपोर्ट के अनुसार, बहरीन में मौजूद AWS इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर भी ईरान ने सवाल उठाए क्योंकि उसका दावा था कि यह केवल व्यावसायिक क्लाउड नेटवर्क नहीं बल्कि अमेरिकी रक्षा परियोजनाओं से भी जुड़ा हुआ है। इसी वजह से AWS जैसे डेटा सेंटर्स आधुनिक युद्ध में ‘Dual-Use Infrastructure’ की बहस के केंद्र में आ गए हैं।
ईरान ने जिन डेटा सेंटर्स को निशाना बनाया, उनमें सबसे अधिक चर्चा अमेजन वेब सर्विसेज यानी AWS की हुई। अमेरिका ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी रक्षा और खुफिया एजेंसियों के डिजिटल सिस्टम को आधुनिक बनाने के लिए जॉइंट वार फाइटिंग क्लाउड कैपेबिलिटी(JWCC) नामक परियोजना शुरू की।
अरबों डॉलर की इस परियोजना का उद्देश्य रक्षा विभाग, सैन्य कमांड और अलग-अलग सरकारी एजेंसियों को सुरक्षित क्लाउड नेटवर्क उपलब्ध कराना है। इस परियोजना में AWS के अलावा माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और ओरेकल जैसी कंपनियाँ भी शामिल हैं।
यानी जिन क्लाउड प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल दुनिया भर की कंपनियाँ अपनी वेबसाइट और एप्लिकेशन चलाने के लिए करती हैं, वही प्लेटफॉर्म अमेरिकी रक्षा नेटवर्क का भी हिस्सा हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि आधुनिक युद्ध में निजी टेक कंपनियों और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच की दूरी पहले जैसी नहीं रही।
इसी कड़ी में पलान्टिर जैसी कंपनियों का नाम भी सामने आता है। पलान्टिर ऐसे AI प्लेटफॉर्म विकसित करती है, जिनका इस्तेमाल युद्ध क्षेत्र का विश्लेषण, उपग्रह चित्रों की जाँच, खुफिया सूचनाओं को जोड़ने और सैन्य निर्णय लेने में किया जाता है।
यही कारण है कि AI कंपनियाँ अब केवल तकनीकी उद्योग का हिस्सा नहीं मानी जातीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की रणनीति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी हैं।
कंप्यूट पावर क्यों बन गई रणनीतिक ताकत?
आज दुनिया में AI की सबसे बड़ी होड़ केवल बेहतर एल्गोरिद्म बनाने की नहीं है, बल्कि अधिक कंप्यूटिंग क्षमता हासिल करने की है। किसी बड़े AI मॉडल को तैयार करने के लिए लाखों GPU, भारी मात्रा में बिजली, विशाल स्टोरेज और अत्यधिक तेज नेटवर्किंग की आवश्यकता होती है। यही पूरी व्यवस्था डेटा सेंटर्स में मौजूद रहती है।
यदि किसी देश के डेटा सेंटर्स पर हमला होता है, तो इसका असर केवल उस इमारत तक सीमित नहीं रहता। AI मॉडल की ट्रेनिंग धीमी हो सकती है, क्लाउड सेवाओं में बाधा आ सकता है, रक्षा एजेंसियों की डेटा प्रोसेसिंग प्रभावित हो सकती है और बड़ी टेक कंपनियों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
इसलिए आज कंप्यूट पावर को कई विशेषज्ञ उसी तरह देख रहे हैं, जैसे पिछली सदी में तेल को देखा जाता था। इसी कारण अमेरिका, चीन और खाड़ी देशों के बीच AI इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर कॉम्पिटिशन लगातार तेज हो रही है। जो देश अधिक कंप्यूटिंग क्षमता, बेहतर चिप्स और सुरक्षित डेटा सेंटर्स विकसित करेगा, वही भविष्य की तकनीकी दौड़ में बढ़त हासिल करेगा।
खाड़ी देशों का AI सपना और क्यों बढ़ गया सुरक्षा का सबसे बड़ा खतरा
मिडिल ईस्ट के सऊदी अरब, UAE, कतर, बहरीन, ओमान और कुवैत अब सिर्फ तेल और गैस पर निर्भर नहीं रहना चाहते। उन्हें समझ आ गया है कि आने वाले समय में AI, क्लाउड कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर, डेटा सेंटर और हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग आर्थिक ताकत के नए आधार होंगे। इसलिए इन देशों ने इन क्षेत्रों में बड़े निवेश शुरू किए हैं।
सऊदी अरब अपने Vision 2030 के तहत AI और डिजिटल इकोनॉमी पर भारी निवेश कर रहा है। UAE खुद को दुनिया का बड़ा AI हब बनाने की कोशिश कर रहा है। करीब 500 अरब डॉलर की एक परियोजना के तहत मिडिल ईस्ट में दुनिया के सबसे बड़े AI डेटा सेंटर नेटवर्क में से एक बनाने की योजना है। UAE और ट्रंप प्रशासन के बीच हुए समझौते का भी यही लक्ष्य है।
खाड़ी देशों ने अमेरिका के साथ AI क्षेत्र में करीब 2 ट्रिलियन डॉलर निवेश की प्रतिबद्धता जताई है। सऊदी अरब अपने 1 ट्रिलियन डॉलर के सरकारी निवेश कोष का बड़ा हिस्सा AI और क्लाउड कंप्यूटिंग में लगाने की तैयारी कर रहा है। इसी रणनीति में Stargate AI Data Center Project भी शामिल है, जिसमें OpenAI, Oracle, Nvidia और Cisco जैसी कंपनियाँ साझेदार हैं।
इन समझौतों ने AI को सीधे जियोपॉलिटिक्स से जोड़ दिया है। ईरान के लिए यही कमजोरी है। डेटा सेंटर पर हमला केवल इमारत को नुकसान नहीं बल्कि खाड़ी देशों की भविष्य की डिजिटल अर्थव्यवस्था और बड़े निवेश पर दबाव बनाने का तरीका भी हो सकता है।
बहरीन में AWS डेटा सेंटर पर हुए हमले को पूरी दुनिया के लिए क्यों माना जा रहा है चेतावनी?
ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के दौरान बहरीन स्थित अमेजन वेब सर्विस (AWS) डेटा सेंटर पर हुए हमले ने पूरी टेक इंडस्ट्री का ध्यान अपनी ओर खींचा। AWS दुनिया का सबसे बड़ा क्लाउड सर्विस प्रोवाइडर है और लाखों कंपनियाँ अपनी वेबसाइट, एप्लिकेशन, बैंकिंग सिस्टम, क्लाउड स्टोरेज और AI सेवाओं के लिए इसी प्लेटफॉर्म पर निर्भर हैं।
यदि किसी सामान्य फैक्ट्री पर हमला होता है, तो उसका असर मुख्य रूप से उसी उद्योग तक सीमित रहता है। लेकिन किसी बड़े क्लाउड डेटा सेंटर पर हमला हजारों कंपनियों और करोड़ों उपयोगकर्ताओं को एक साथ प्रभावित कर सकता है।
क्लाउड सर्वर इंटरप्ट होने से वेबसाइट बंद हो सकती हैं, डिजिटल भुगतान प्रभावित हो सकते हैं, ऑनलाइन सेवाओं में रुकावट आ सकता है और AI मॉडल तक अस्थायी रूप से प्रभावित हो सकते हैं। यही वजह है कि इस तरह की घटनाओं को केवल सैन्य नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक सुरक्षा का मुद्दा भी माना जा रहा है।
ईरान ने दावा किया कि AWS अमेरिकी रक्षा और खुफिया नेटवर्क को क्लाउड सेवाएँ उपलब्ध कराता है, इसलिए वह उसकी नजर में एक वैध सैन्य लक्ष्य है। हालाँकि इस दावे को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस जारी है लेकिन इस घटना ने इतना जरूर साबित कर दिया कि भविष्य में निजी टेक कंपनियाँ भी किसी क्षेत्रीय संघर्ष से पूरी तरह अलग नहीं रह पाएँगी।
डेटा सेंटर्स की सुरक्षा क्यों बन गई है सबसे बड़ी चुनौती?
सामान्य धारणा यह है कि डेटा सेंटर अत्यधिक सुरक्षित होते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि उनकी सुरक्षा मुख्य रूप से साइबर हमलों को ध्यान में रखकर तैयार की जाती है। फायरवॉल, एन्क्रिप्शन, मल्टी-लेयर नेटवर्क सुरक्षा और लगातार निगरानी जैसी व्यवस्थाएँ हैकिंग और डिजिटल हमलों से बचाने के लिए बनाई जाती हैं।
लेकिन मिसाइल, ड्रोन और अन्य हमलों के सामने स्थिति पूरी तरह बदल जाती है। डेटा सेंटर विशाल वेयरहाउस जैसे भवन होते हैं, जिनमें हजारों सर्वर रैक, बिजली की व्यवस्था, कूलिंग सिस्टम और नेटवर्किंग उपकरण लगे होते हैं। इन इमारतों को पूरी तरह सैन्य बंकर की तरह सुरक्षित बनाना व्यावहारिक भी नहीं है और आर्थिक रूप से भी बेहद महंगा साबित हो सकता है।
इसी वजह से टेक कंपनियाँ बैकअप व्यवस्था की रणनीति अपनाती हैं। इसका मतलब यह है कि एक ही डेटा की अलग-अलग कॉपी देशों या शहरों में मौजूद अन्य डेटा सेंटर्स में भी रखी जाती हैं।
यदि एक सेंटर प्रभावित हो जाए, तो दूसरा सेंटर सेवाएँ जारी रख सके। हालाँकि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी क्षेत्र में लगातार कई डेटा सेंटर्स पर हमले हों, तो केवल बैकअप व्यवस्था भी पर्याप्त साबित नहीं होगी।
यही कारण है कि अब डेटा सेंटर सुरक्षा में केवल साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ ही नहीं बल्कि रक्षा रणनीतिकार, बीमा कंपनियाँ और राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियाँ भी सक्रिय भूमिका निभाने लगी हैं।
क्या दुनिया सामान्य युद्ध से आगे बढ़कर कंप्यूट युद्ध के दौर में प्रवेश कर चुकी है?
बीसवीं सदी के अधिकांश बड़े संघर्ष ऊर्जा संसाधनों, तेल आपूर्ति और समुद्री व्यापार मार्गों के इर्द-गिर्द घूमते रहे। तेल पर नियंत्रण का अर्थ आर्थिक और राजनीतिक शक्ति पर नियंत्रण माना जाता था। लेकिन इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में यह परिभाषा बदलती दिखाई दे रही है।
आज AI, क्लाउड कंप्यूटिंग और डेटा प्रोसेसिंग किसी भी विकसित अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुके हैं। जिस देश के पास अधिक कंप्यूटिंग क्षमता, बेहतर AI मॉडल, आधुनिक सेमीकंडक्टर और सुरक्षित डेटा सेंटर्स होंगे, वह न केवल तकनीकी बल्कि आर्थिक और सामरिक बढ़त भी हासिल करेगा।
इसीलिए अब विशेषज्ञ कंप्यूट युद्ध को नए दौर का रणनीतिक संसाधन मान रहे हैं। जिस तरह कभी तेल के भंडार किसी देश की ताकत का प्रतीक थे, उसी तरह भविष्य में AI इंफ्रास्ट्रक्चर और डेटा सेंटर्स किसी देश की वास्तविक तकनीकी शक्ति का पैमाना बन सकते हैं।
ईरान द्वारा डेटा सेंटर्स को निशाना बनाए जाने की रणनीति इसी बदलाव की ओर संकेत करती है। यह केवल वर्तमान संघर्ष की कहानी नहीं है बल्कि आने वाले दशकों के युद्धों की दिशा भी दिखाती है।
प्रधानमंत्री मोदी के वीडियो को फेसबुक से कुछ दिनों के लिए हटाए जाने पर संसदीय समिति ने मेटा के मालिक मार्क जुकरबर्ग को 3 दिन में माफ माँगने को कहा है। समिति ने कहा है कि अगर जुकरबर्ग माफी तय वक्त में नहीं माँगते हैं तो फेसबुक अपनी सेफ हार्बर सुरक्षा रद्द किया जा सकता है।
दरअसल अब मेटा, गुगल जैसे प्लेटफॉम सिर्फ मध्यस्थ ही भूमिका में ही नहीं रहे हैं, ये इससे आगे बढ़ कर कंटेंट को रोकने, बढ़ावा देने जैसे काम भी करने लगे हैं। ऐसे में इनकी जवाबदेही भी बढ़ जाती है।
पीएम मोदी के वीडियो का मामला
सूचना और आईटी समिति ने चेतावनी दी है कि अगर 3 दिनों के अंदर उसकी बात पर अमल नहीं किया गया तो फेसबुक की सेफ हार्बर सुरक्षा को रद्द करने पर सरकार विचार कर सकती है। इससे फेसबुक के अधिकारियों को आपराधिक अभियोजन का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि ऐसा करने पर कंपनी के अधिकारियों पर एफआईआर दर्ज किया जा सकता है।
यह विवाद पीएम मोदी के 23 जुलाई 2026 के देर रात जारी किए गए वीडियो को लेकर शुरू हुआ है। इसे पीएम मोदी ने इंस्टाग्राम पर पोस्ट किया था और बाद में फेसबुक पर इसे शेयर किया गया। ये वीडियो सेल्फी शैली में बनाई गई थी। इसे फेसबुक पर 5 घंटे के लिए ‘गायब’ कर दिया गया था।
इस मामले में बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे की अध्यक्षता में सूचना और आईटी समिति बनाई गई जिसने मेटा, एक्स, गुगल और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के अधिकारियों के साथ बैठक की। इसमें मेटा के अधिकारियों ने माना की ये तकनीकी गड़बड़ी की वजह से पीएम मोदी का वीडियो प्लेटफॉर्म से कुछ देर के लिए हट गया था। अधिकारियों ने इसके लिए खेद जताया, लेकिन समिति और सरकार ने खेद जताने को नाकाफी माना।
सूचना प्रौद्योगिकी और संचार समिति ने पीएम के वीडियो को हटाए जाने को ‘लोकतंत्र पर हमला’ करार दिया और कहा है कि मेटा इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करे। इसके अलावा जुकरबर्ग खुद माफी माँगें और वह भी 3 दिनों के भीतर।
सेफ हार्बर क्या है?
सेफ हार्बर सुरक्षा एक ऐसा कानूनी संरक्षण है, जिसके तहत इंटरनेट प्लेटफॉर्म (Intermediaries) अपने यूजर्स द्वारा पोस्ट किए गए कंटेंट या उनकी गतिविधियों के लिए स्वतः जिम्मेदार नहीं माने जाते। भारत में यह सुरक्षा आईटी एक्ट 2000 की धारा 79 के तहत दी गई है।
इसका मतलब यह नहीं कि प्लेटफॉर्म कानून से ऊपर हैं, बल्कि इसका मतलब है कि यदि वे केवल प्लेटफॉर्म हैं और कानून का पालन करते हैं, तो उन्हें हर यूजर के हर काम के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यानी सेफ हार्बर कानूनी रूप से वेबसाइटों और प्लेटफॉर्म्स को कानूनी दायित्वों से बचाती है, ताकि यूजर के साझा किए गए कंटेंट के लिए उसे उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सके।
दरअसल यह ऑनलाइन नेविगेशन को प्रोत्साहित करने के लिए इंटरनेट के शुरुआती सालों में शुरू किया गया था, जिससे प्लेटफॉर्म्स बेवजह की कानूनी पचड़ों से बच सकें। इस ख्याल से सेफ हार्बर सुरक्षा काफी अहम है, क्योंकि इसकी वजह से साइटों पर यूजर के द्वारा पोस्ट की गई सामग्री के मामले में आपराधिक कार्रवाई नहीं हो सकती।
अमेरिका में सेफ हार्बर को संचार अधिनियम 1934 की धारा 230 के तहत शामिल किया गया। इसे 1996 में नए प्रावधान के साथ जोड़ा गया, जबकि भारत में इसे सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 की धारा 79 के तहत जोड़ा गया है।
इसके मुताबिक, यदि कंपनियाँ भारत सरकार और कोर्ट के तय नियमों का पालन करती हैं, तो यूजर के गैरकानूनी पोस्ट के लिए उन्हें उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता और उन पर कोई केस नहीं होता है। हालाँकि भारत नए आईटी अधिनियम 2021 के संशोधन के जरिए आपत्तिजनक और डीपफेक कंटेंट को हटाने को लेकर सख्त है और इसके लिए 36 घंटे का वक्त मुकर्र की जाती है।
प्रकाशक और मध्यस्थ में क्या अंतर है?
पब्लिशर यानी प्रकाशक वह होता है जो कंटेंट का चयन करता है, उसका संपादन करता है और उसका प्रकाशन करता है। जैसे कोई न्यूज चैनल या अखबार अपनी खबरें खुद बनाते हैं, संपादन करते हैं और दिखाते या छापते हैं। ऐसे स्थिति में उस कंटेंट के लिए वह खुद जिम्मेदार है। इसलिए झूठी खबर छपती या दिखाई जाती है तो उसकी जिम्मेदारी पब्लिशर की होती है।
वहीं Intermediary यानी मध्यस्थ की भूमिका अलग होती है। वह केवल प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराता है, जैसे- इंस्टाग्राम, फेसबुक, गुगल, एक्स, यूट्यूब, टेलीग्राम आदि के प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल यूजर करते हैं यानी मध्यस्थ कंटेंट बनाते नहीं हैं, बल्कि यूजर्स द्वारा अपलोड किए गए कंटेंट को होस्ट करते हैं। इसी कारण इन्हें सेफ हार्बर मिलता है।
अब सवाल ये उठता है कि कंपनियाँ जब एग्लोरिदम के जरिए खास कंटेंट को तवज्जो देती है उसे आगे बढ़ाती है और पैसे कमाती है तो उनकी भूमिका सिर्फ मध्यस्थ की रहती है या वह प्रकाशक की तरह हो जाती है।
भारत में क्या नियम हैं?
भारत में सेफ हार्बर को हटाया भी जा सकता है। यदि कोई प्लेटफॉर्म गैरकानूनी गतिविधि की जानकारी मिलने के बाद भी कार्रवाई नहीं करता है, तो उसका सेफ हार्बर सुरक्षा हटाया जा सकता है। कोर्ट या सरकार के आदेश का पालन नहीं करता या साइबर अपराध को बढ़ावा देता है तो उसका सेफ हार्बर सुरक्षा खत्म किया जा सकता है।
इसका निर्णय सरकार या कोर्ट के आदेश पर हो सकता है। इसके अलावा अगर कोई प्लेटफॉर्म खुद कंटेंट को इस तरह नियंत्रित करने लगे और पैसे कमाने लगे जैसा पब्लिशर करते हैं, तो उसकी सेफ हार्बर सुरक्षा खत्म की जा सकती है। ऐसे में उस प्लेटफॉर्म की ‘कानूनी सुरक्षा कवच’ खत्म हो सकती है।
भारत में आईटी रूल्स 2021 के तहत बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को कई जिम्मेदारियाँ दी गई हैं। प्लेटफॉर्म्स को गवर्नेंस अफसर नियुक्त करना जरूरी है। अगर कोई शिकायत की गई है तो उसे समय पर निपटाना जरूरी है। कानून लागू करने वाली एजेंसियों के साथ सहयोग करते हुए अगर जरूरत पड़े तो कंटेंट हटाना जरूरी है। बड़े साइबर क्राइम से जुड़ी जानकारी देना भी जरूरी है।
सिर्फ इसलिए नहीं कि अपराध इंस्टाग्राम, फेसबुक या दूसरे प्लेटफॉर्म पर शुरू हुआ। इसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता। जैसे किसी व्यक्ति ने इंस्टाग्राम पर दोस्ती की और बाद में ऑफलाइन जाकर धोखाधड़ी की, तो प्राथमिक जिम्मेदारी आरोपित की ही होगी। लेकिन यदि शिकायत मिलने के बाद भी प्लेटफॉर्म कार्रवाई न करे, फर्जी अकाउंट बार-बार चलने दे। कोर्ट के आदेश की अनदेखी करे, तो उसके खिलाफ कानूनी एक्शन हो सकता है।
ये पहला मौका नहीं है जब भारत सरकार और किसी डिजिटल प्लेटफॉर्म के बीच विवाद हुआ हो। इससे पहले भी एक्स, व्हाट्सएप, गुगल और मेटा के साथ कई बार विवाद हुए हैं। आपत्तिजनक कंटेंट हटाने के आदेश से लेकर फेक न्यूज, राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में भी कई बार विवाद सामने आए। शाहीन बाग से लेकर किसान आंदोलन में कंटेंट पर सवाल उठे। सरकार द्वारा आईटी नियमों का पालन करने को लेकर कई विवाद सामने आए।
प्रधानमंत्री मोदी के कथित एआई जनरेटेड और मॉर्फ्ड वीडियो सोशल मीडिया पर फैलाए जाने के मामले में जुलाई 2026 में हैदराबाद साइबर क्राइम पुलिस ने मेटा इंडिया के हेड अरुण श्रीनिवास और कई सोशल मीडिया यूजर्स के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। पुलिस अब यह जाँच कर रही है कि ऐसे डीपफेक और भ्रामक कंटेंट को रोकने के लिए मेटा ने क्या किया। प्लेटफॉर्म के पास कंटेंट मॉडरेशन सिस्टम क्यों मौजूद नहीं था।
इसी तरह केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी के मामले में भी हुआ। उनके परिवार पर E-20 पेट्रोल की वजह से लाभान्वित होने वाला डीपफेक एआई जेनरेटेड वीडियो बनाए गए। इसको लेकर उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने गडकरी को मेटा, एक्स गुगल समेत उन सभी प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ मुकदमा दायर करने की अनुमति दी। साथ ही इन प्लेटफॉर्म्स को सभी ऐसे लिंक हटाने का आदेश दिया।
कई मामलों में कंपनियों ने अदालत का रुख किया, जबकि सरकार ने कहा कि भारत में काम करने के लिए यहां के कानूनों का पालन करना सभी प्लेटफॉर्म के लिए जरूरी है।
सेफ हार्बर को लेकर दुनियाभर में कई विवाद
दुनिया भर में सेफ हार्बर को लेकर विवाद बढ़े हैं। अमेरिकी कानून के तहत सेक्शन 230 के तहत इंटरनेट कंपनियों को सेफ हार्बर सुरक्षा देता है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में मेटा, गुगल और एक्स पर फेक न्यूज फैलने देने, चुनावों को प्रभावित करने वाले कंटेंट को नहीं रोकने और हेट स्पीच मामले में पर्याप्त कार्रवाई नहीं करने के आरोप लगे। इसकी वजह से रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों ने अलग-अलग कारणों से सेक्शन 230 में बदलाव की माँग की।
यूरोपियन यूनियन ने डिजिटल सर्विस एक्ट लागू किया था। इसके जरिए बड़े प्लेटफॉर्म को एल्गोरिद्म में पारदर्शिता रखना, गलत कंटेंट को फटाफट हटाना, बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करना जैसे जिम्मेदारियाँ दी गई थी, यानी सेफ हार्बर के साथ-साथ उनकी जिम्मेदारियाँ भी काफी हैं।
अमेरिका और यूरोपीय संघ के बीच सेफ हार्बर समझौते के तहत डेटा ट्रांसफर को कंट्रोल करने का विवाद भी सामने आया। दरअसल यूरोपीय देशों की आपत्ति थी अमेरिकी एजेंसियाँ आसानी से यूरोप के नागरिकों के डेटा तक पहुँच सकती है यानी उनकी जासूसी हो सकती है। इस पर यूरोपीय संघ की कोर्ट में केस भी दर्ज हुए और इस दौरान कोर्ट ने भी माना कि अमेरिकी कानून यूरोप के नागरिकों की निजी जानकारियों के दुरुपयोग से सुरक्षा प्रदान नहीं करती हैं। इन विवादों के बाद 2015 में यूरोप ने सेफ हार्बर समझौते को रद्द कर दिया था।
ऑस्ट्रेलिया ने मेटा और गुगल से कहा कि यदि वे न्यूज कंटेंट से कमाई करते हैं, तो मीडिया संस्थानों को इसके लिए भुगतान करें। इसके बाद मेटा ने कुछ समय के लिए फेसबुक पर न्यूज शेयरिंग बंद कर दी थी। ये विवाद इसलिए सामने आया क्योंकि जब प्लेटफॉर्म मध्यस्थ की भूमिका में है तो वह प्रकाशक की तरह कंटेंट से कमाई कैसे कर सकता है।
इसके बाद ऑस्ट्रेलिया ने न्यूज कंटेंट के एवज में स्थानीय मीडिया संस्थान को भुगतान करने या डिजिटल विज्ञापन पर 2.5 फीसदी टेक्स चुकाने का प्रस्ताव दिया। कंपनियों को इससे बचने के लिए कम से कम 6 स्थानीय पब्लिशर के साथ बिजनेस समझौते करने होंगे। ये नियम उन प्लेटफॉर्म पर लागू होगा, जिसकी सालाना आय 250 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर से अधिक है।
कनाडा ने ऑनलाइन न्यूज एक्ट 2023 लागू कर दिया। 22 जून 2023 को लागू होने के बाद मेटा ने फेसबुक और इंस्टाग्राम पर न्यूज उपलब्ध कराना काफी हद तक बंद कर दिया। दरअसल इस कानून के माध्यम से मेटा, गुगल जैसे प्लेटफॉर्म को शेयर किए जाने वाले न्यूज कंटेंट के लिए मीडिया आउटलेट्स को भुगतान करना अनिवार्य कर दिया गया।
इसके बाद इन प्लेटफॉर्म्स ने न्यूज कंटेंट शेयर करना ही बंद कर दिया। हालाँकि गुगल ने कनाडाई सरकार से समझौता कर पैसे देने की बात मानी, जिसके बाद गुगल पर प्रतिबंध टल गया, लेकिन मेटा पर कनाडा में बैन लगा हुआ है।
ऐसे में पूरी दुनिया इस सवाल से जूझ रही है कि इन प्लेटफॉर्म्स को सेफ हार्बर मिलना चाहिए या नहीं। अब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अपने एल्गोरिद्म और कंटेंट रिकमेंडेशन की वजह से सिर्फ मध्यस्थ की भूमिका में ही नहीं रहीं हैं। ये इससे कहीं आगे बढ़ कर पब्लिशर की भूमिका भी निभाने लगी हैं।
अगर ये सिर्फ मध्यस्थ रहें तो उन्हें सेफ हार्बर मिलना चाहिए। लेकिन जब कौन-सा कंटेंट दिखेगा, किसे दिखेगा, किसे बढ़ावा मिलेगा और किससे कमाई होगी जैसी चीजें जुड़ जाती है, तो उनकी जिम्मेदारी भी बढ़नी चाहिए। पीएम मोदी के वीडियो का कुछ घंटों के लिए फेसबुक से हटना-हटाना भी इस तरह का ही मामला है।
लाल किला ब्लास्ट के बाद चर्चा में आए अल-फलाह समूह से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आरोपित जवाद अहमद सिद्दीकी को दिल्ली की साकेत कोर्ट से झटका लगा है। कोर्ट ने उनके द्वारा दाखिल की गईं दो अलग-अलग अर्जियाँ खारिज कर दी हैं।
पहली अर्जी में सिद्दीकी ने अपने कुछ ऐसे दस्तावेजों को अदालत के रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति माँगी थी जिन्हें उन्होंने ‘बेहद विश्वसनीय’ और ‘निर्विवाद प्रकृति’ का बताया था। जावेद का कहना था कि इन दस्तावेजों को देखना न्यायसंगत निर्णय के लिए अत्यंत आवश्यक है। दूसरी अर्जी में उन्होंने ED से जाँच के दौरान जुटाए गए उन दस्तावेजों की सूची देने की माँग की थी जिन पर एजेंसी अपने मामले के लिए भरोसा नहीं (unrelied documents) कर रही है।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश शीतल चौधरी प्रधान ने 4 अगस्त 2026 को दिए 48 पन्नों के आदेश में दोनों अर्जियों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जिस चरण पर मामला अभी लंबित है, वहाँ अदालत को मुख्य रूप से ED की अभियोजन शिकायत और उसके साथ पेश की गई सामग्री को देखना है और यह तय करना है कि आरोपित के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं।
समझिए, मामला किस स्टेज पर है
यह मामला PMLA की धारा 3 और 4 के तहत चल रहा है। ED ने PMLA की धारा 44(1)(b) के तहत शिकायत दाखिल की है। लेकिन अभी अदालत ने इस शिकायत पर संज्ञान (cognizance) नहीं लिया है। आसान शब्दों में कहें तो, अभी यह तय होना बाकी है कि ED की शिकायत और उसके साथ रखी गई सामग्री को देखकर अदालत आरोपित के खिलाफ आगे की आपराधिक प्रक्रिया शुरू करने लायक मामला पाती है या नहीं।
मौजूदा 4 अगस्त 2026 का आदेश मुख्य रूप से इस बात पर है कि संज्ञान लेने से पहले आरोपित को किस तरह और कितनी सीमा तक सुना जा सकता है। कोर्ट का यह भी कहना कि संज्ञान के सवाल पर ED की ओर से दलीलें पहले ही पूरी हो चुकी थीं और आरोपित की ओर से दलीलें होनी बाकी थीं। इसी बीच ये दोनों अर्जियाँ दाखिल की गईं और इन्हें पहले तय करना जरूरी था।
सिद्दीकी पर प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत करीब 415 करोड़ रुपए के मामले को लेकर केस चल रहा है। उनके संस्थान पर 2025 के नवंबर में हुए लाल किला विस्फोट के आरोपितों को शरण देने का भी आरोप है।
जवाद अहमद सिद्दीकी ने क्या की थी माँग?
सिद्दीकी की दोनों अर्जियों का आधार BNS की धारा 223(1) में मौजूद उस प्रावधान को लेकर था जिसके तहत आरोपित को सुने बिना अदालत किसी अपराध का संज्ञान नहीं ले सकती।
पहली अर्जी में सिद्दीकी ने अदालत से कहा कि उनके कारोबार से जुड़े कुछ दस्तावेज ऐसे हैं जो ऑफिशियल स्रोतों से आए हैं। इनमें अलग-अलग भारतीय सरकारी प्राधिकरणों और बैंकों से जुड़े दस्तावेज शामिल होने की बात कही गई है। सिद्दीकी ने इन्हें ‘बेहद विश्वसनीय’ (sterling quality) और ‘निर्विवाद प्रकृति’ (unimpeachable character) वाला बताया और कोर्ट से उन्हें रिकॉर्ड पर लेने को कहा था।
सिद्दीकी का कहना था कि इन दस्तावेजों को देखने से अदालत को ED के आरोपों में मौजूद कथित विरोधाभासों को समझने में मदद मिलेगी और इससे संज्ञान से पहले होने वाली सुनवाई अधिक प्रभावी और सार्थक बनेगी।
सिद्दीकी की दूसरी माँग थी कि ED को निर्देश दिया जाए कि वह unrelied documents यानी ऐसे दस्तावेजों की सूची दे, जिन्हें जाँच एजेंसी ने जाँच के दौरान हासिल तो किया है लेकिन अपने मामले में उन पर भरोसा नहीं किया है।
दूसरी अर्जी में सिद्दीकी ने BNSS की धारा 436 के तहत मामले से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी सवालों को उच्च न्यायालय के पास भेजने की माँग की थी। उनका मुख्य तर्क था कि धारा 223(1) का पहला ‘परंतुक’ नया प्रावधान है जो आरोपित को संज्ञान लेने से पहले सुनवाई का अधिकार देता है लेकिन इस सुनवाई की ‘सीमा, स्वरूप और दायरा’ अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
कोर्ट के आदेश में कहा गया है, “इस मामले के रिकॉर्ड से सामने आए तथ्यों को देखते हुए जनहित, कानून और संविधान से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण सवाल उठते हैं। इन सवालों का सीधा संबंध इस बात से है कि मामले का संज्ञान लेने से पहले के चरण में प्रस्तावित आरोपी को किस तरह और कितनी सीमा तक सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए।”
इसमें आगे कह गया है, “क्योंकि ये मुद्दे जटिल प्रकृति के हैं और अब तक देश के किसी भी उच्च न्यायालय या माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इन पर निर्णय नहीं दिया गया है, इसलिए यह बेहद महत्वपूर्ण है कि संज्ञान से पहले होने वाली सुनवाई से पहले किसी संवैधानिक न्यायालय द्वारा इन सवालों का समाधान किया जाए। या कम से कम, जब यह माननीय न्यायालय आवेदक को सुनवाई का अवसर दे तब इन महत्वपूर्ण सवालों को ध्यान में रखा जाए।”
क्या हैं रिलाइड, अनरिलाइड और स्टर्लिंग दस्तावेज?
जब कोई जाँच एजेंसी छापे मारकर या तलाशी के दौरान भारी मात्रा में दस्तावेज, डिवाइस, बैंक रिकॉर्ड आदि जब्त करती है तो उनमें से सिर्फ कुछ को ही वह अपनी शिकायत/चार्जशीट के साथ अदालत में पेश करती है और इन्हें ‘रिलाइड डॉक्यूमेंट्स’ (relied upon documents) कहा जाता है यानी जिन पर अभियोजन भरोसा कर रहा है।
बाकी बचे दस्तावेज जिन्हें एजेंसी शिकायत के साथ पेश नहीं करती ‘अनरिलाइड डॉक्यूमेंट्स’ (unrelied upon documents) कहलाते हैं। अभियुक्त पक्ष का हमेशा यह तर्क रहता है कि इन ‘अनरिलाइड’ दस्तावेजों में ऐसी चीजें भी हो सकती हैं जो अभियुक्त के बचाव में मददगार हों और इसीलिए कम-से-कम उनकी एक सूची अभियुक्त को मिलनी चाहिए।
वहीं, ‘स्टर्लिंग क्वालिटी दस्तावेज’ से अभियुक्त का मतलब उन दस्तावेजों से था, जो खुद अभियुक्त के पास मौजूद हैं और जिन्हें वह खुद कोर्ट के सामने रखना चाहता था।
जवाद अहमद सिद्दीकी ने दीं क्या दलीलें?
ऑपइंडिया के पास मौजूद कोर्ट के आदेश के मुताबिक, बचाव पक्ष ने शुरुआत में यह दावा किया कि सिद्दीकी पूरी तरह निराधार, द्वेषपूर्ण और असंगत कारणों से गंभीर उत्पीड़न व प्रताड़ना झेल रहे हैं और उन्हें भरोसा है कि आगे की कार्यवाही में वे मामले की खोखली बुनियाद उजागर कर देंगे।
इस अर्जी के माध्यम से एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल भी उठाया गया है कि अदालत द्वारा अपराध का संज्ञान लेने से पहले आरोपी को दी जाने वाली सुनवाई का स्वरूप, संदर्भ, दायरा और सीमा आखिर क्या होगी।
कोर्ट के आदेश का एक हिस्सा
सिद्दीकी की ओर से तर्क दिया गया कि आरोपित को सुनवाई का अवसर दिए बिना दंडाधिकारी किसी अपराध का संज्ञान नहीं ले सकता। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट और देश के विभिन्न उच्च न्यायालय इस प्रावधान की व्याख्या कर चुके हैं और अब यह स्थापित कानूनी स्थिति है कि सुनवाई का अवसर केवल औपचारिकता नहीं हो सकता। आरोपित को अपना पक्ष रखने के लिए प्रभावी, उद्देश्यपूर्ण और सार्थक अवसर मिलना चाहिए।
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि जब कानून आरोपित को सुनवाई का अवसर देता है तो इसका अर्थ केवल इतना नहीं हो सकता कि आरोपित को अदालत में उपस्थित होने दिया जाए और उसकी बात सुन ली जाए। उसका कहना था कि न्याय के हित में अदालत को ऐसी प्रक्रिया अपनानी चाहिए जिससे आरोपी को वास्तविक और प्रभावी तरीके से अपना पक्ष रखने का अवसर मिले।
दलील दी गई कि जब तक अभियुक्त को यह पता नहीं होगा कि कितनी और किस तरह की सामग्री जाँच एजेंसी ने रोक रखी है, तब तक वह अपना बचाव ठीक से तैयार नहीं कर सकता। यह भी कहा गया कि इन रोकी गई सामग्रियों में ऐसे सबूत भी हो सकते हैं जो अभियुक्त के पक्ष में हों और आरोपों को सीधे प्रभावित या कमजोर कर सकते हों। अभियोजन को यह छूट नहीं दी जा सकती कि वह केवल अभियुक्त को दोषी साबित करने वाली सामग्री चुने और बचाव में मदद करने वाली सामग्री को अपने पास दबाकर रखे।
ED ने कहा- कार्यवाही को लंबा खींचने की कोशिश
ED ने अदालत में सिद्दीकी की माँगों का कड़ा विरोध किया। ED ने इस पूरी अर्जी को कार्यवाही में जानबूझकर देरी कराने की एक सोची-समझी कोशिश करार दिया। ED के अनुसार, आरोपित अदालत को ऐसी जाँच करने के लिए मजबूर करना चाहता है जो संज्ञान से पहले की सुनवाई के दायरे से बिल्कुल बाहर है।
ED का तर्क था कि संज्ञान लेने और प्रोसेस (समन) जारी करने के चरण में कोर्ट को सिर्फ इतना देखना होता है कि शिकायत और अभियोजन द्वारा साथ में दाखिल सामग्री के आधार पर प्रथम दृष्टया (prima facie) मामला बनता है या नहीं। इस स्तर पर अभियुक्त को यह अधिकार नहीं है कि वह अपनी बचाव सामग्री पर विचार की माँग करे।
कोर्ट के आदेश का एक हिस्सा
ED ने कोर्ट को यह भी बताया कि 27 मार्च 2026 को इसी मामले में अनरिलाइड डॉक्यूमेंट्स को लेकर सिद्दीकी की माँग पर विस्तृत आदेश आ चुका है। उस आदेश में अदालत ने कहा था कि संज्ञान से पहले के चरण पर अनरिलाइड डॉक्यूमेंट्स की सूची देना जरूरी नहीं है। कोर्ट ने यह भी माना था कि उस समय जाँच जारी थी और ऐसी सूची देने से चल रही जाँच पर असर पड़ सकता है। इसी आधार पर वह आवेदन खारिज कर दिया गया था।
ED ने कहा कि इस मामले को हाई कोर्ट रेफर करने की कोई जरूरत नहीं है। ED ने धारा 436 की इस माँग को भी गलत और समय से पहले बताया। एजेंसी का कहना था कि सिद्दीकी जिन सवालों को हाई कोर्ट भेजना चाहते हैं, वे इस मामले में cognizance तय करने के लिए जरूरी नहीं हैं। वे व्यापक कानूनी सवाल हैं और अभी की सीमित सुनवाई से उनका सीधा संबंध नहीं है।
कोर्ट के आदेश में ED के दलीलों को लेकर कह गया है, “यह आवेदन कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है और इसका एकमात्र उद्देश्य मामले का संज्ञान लेने पर होने वाले विचार में देरी करना है। इसके लिए कार्यवाही को ऐसे दूसरे मुद्दों की ओर मोड़ा जा रहा है, जिनका इस न्यायालय द्वारा संज्ञान लेने से पहले के चरण में की जाने वाली सीमित कार्यवाही से कोई संबंध नहीं है।”
ED ने कहा कि BNSS की धारा 223(1) के प्रावधान के तहत होने वाली सुनवाई का दायरा सीमित है। इस सुनवाई का उद्देश्य मामले के गुण-दोष की विस्तार से जाँच करना, तथ्यों से जुड़े विवादित सवालों पर फैसला करना, बचाव पक्ष की दलीलों की जाँच करना या कानूनी सवालों पर अंतिम निर्णय देना नहीं है।
ED ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 228 किसी अधीनस्थ न्यायालय को यह अधिकार नहीं देता कि वह इस प्रावधान का इस्तेमाल करे या माननीय उच्च न्यायालय को इसके तहत अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने का निर्देश दे। अनुच्छेद 228 के तहत अधिकार का इस्तेमाल करने की शक्ति केवल माननीय उच्च न्यायालय में निहित है। इसका इस्तेमाल पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि उच्च न्यायालय इस बात से संतुष्ट है या नहीं कि कोई महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल मौजूद है, जिसका फैसला किया जाना जरूरी है।
ED के मुताबिक, BNSS की धारा 436 के तहत मामले को भेजने या भारत के संविधान के अनुच्छेद 228 को लागू करने का कोई आधार नहीं बनता है। अनुच्छेद 228 अधीनस्थ न्यायालय को यह अधिकार नहीं देता कि वह किसी मामले को उच्च न्यायालय के पास भेजे या उच्च न्यायालय को उसके तहत अपनी संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल करने का निर्देश दे।
कोर्ट ने अपने आदेश में क्या कहा?
न्यायाधीश शीतल चौधरी प्रधान ने अपने आदेश में कहा है, “आरोपित की ओर से unrelied documents की सूची देने की जो माँग की गई है, उस पर कोर्ट द्वारा 27 मार्च के विस्तृत आदेश में पहले ही फैसला किया जा चुका है। आरोपित को ऐसे दस्तावेज कब और किस चरण में दिए जाने चाहिए इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दे दिया है। आरोपित द्वारा की गई यह माँग बिना किसी कानूनी आधार के है और स्वीकार करने योग्य नहीं है।”
आदेश में आगे कहा गया है, “संज्ञान लेने के चरण में न्यायालय को केवल शिकायतकर्ता द्वारा पेश की गई सामग्री को ही देखना होता है। इसका उद्देश्य केवल यह पता लगाना है कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं, जिसके आधार पर आरोपित को अदालत में बुलाने की प्रक्रिया जारी की जा सके। आरोपित के पास मौजूद दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति देने की माँग में कोई कानूनी आधार नहीं है।”
सिद्दीकी की दोनों अर्जियों को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा, “BNSS की धारा 436(2) में कहा गया है कि किसी मामले की सुनवाई कर रही सेशन कोर्ट, यदि उसे उचित लगे और वह मामला उपधारा (1) के तहत नहीं आता हो, तो उस मामले की सुनवाई के दौरान उठने वाले किसी भी कानूनी सवाल को उच्च न्यायालय के फैसले के लिए भेज सकती है। लेकिन वर्तमान मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में आरोपित द्वारा सामने रखे गए कानून से जुड़े कथित सवाल न तो अमान्य हैं और न ही प्रभावहीन।”
कोर्ट ने कहा, “इन प्रावधानों की व्याख्या उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसलों में पहले ही की जा चुकी है। इसलिए वर्तमान न्यायालय द्वारा इन सवालों पर माननीय उच्च न्यायालय से राय लेने के लिए मामला भेजने की जरूरत नहीं है। इसलिए, आरोपित की ओर से दाखिल इस आवेदन में भी कोई कानूनी आधार नहीं है।”
जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और PDP प्रमुख महबूबा मुफ्ती का भारत विरोधी और राष्ट्र विरोधी रवैया किसी से छिपा नहीं है। वे अक्सर ऐसे कृत्यों में लिप्त नजर आती हैं जिससे देश की भावनाओं को ठेस पहुँचे। 5 अगस्त के दिन को वे हमेशा से ‘काला दिवस’ के रूप में मनाती आई हैं और अनुच्छेद 370 को वापस लिए जाने के विरोध में प्रदर्शन करती रही हैं।
लेकिन इस बार उन्होंने विरोध के नाम पर जो हरकत की, उसने देशवासियों का खून खौला दिया। श्रीनगर में अपनी पार्टी ऑफिस के बाहर प्रदर्शन के दौरान महबूबा मुफ्ती ने भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को उल्टा पकड़ रखा था। उनके इस शर्मनाक कृत्य का Video सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गया और उनकी मानसिकता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए।
महबूबा मुफ्ती के इस कृत्य को महज एक गलती नहीं माना जा सकता है क्योंकि उनका पुराना ट्रैक रिकॉर्ड हमेशा से भारत विरोधी बयानों से भरा रहा है। चाहे भारतीय वायु सेना की एयर स्ट्राइक पर सवाल उठाना हो, एयर इंडिया के ‘जय हिंद‘ बोलने वाले सर्कुलर पर तंज कसना हो या फिर देश के राष्ट्रीय प्रतीकों का अनादर करना हो, उन्होंने हर मौके पर अपनी ओछी मानसिकता का परिचय दिया है।
आपको बता दें कि आज ही के दिन 5 अगस्त को मोदी सरकार ने अनुच्छेद 370 को हटाया था और ये देश के लिए एक इतिहास रचने जैसा था, जिससे करोड़ों देशवासियों को इस काले कानून से राहत मिली थी। लेकिन कुछ वामपंथी और कट्टरपंथी विचारधारा के लोगों को ये बात हजम नहीं हुई थी, उन्होंने बड़े लेवल पर इसका विरोध किया था। कश्मीर में महबूबा मुफ्ती, उमर अब्दुल्ला आदि पार्टी के लोगों ने जमकर बवाल मचाया था। लेकिन कश्मीर की जमीन पर कितने नागरिकों को 370 हटाए जाने से खुशी मिली थी, उससे महबूबा मुफ्ता को कोई लेना-देना नहीं था।
आज भी वहीं रवैया देखने को मिल रहा है। अनुच्छेद 370 हटाए जाने पर महबूबा मुफ्ती इसे काला कानून बताती है। इसके अलावा, महबूबा मुफ्ती का एक वीडियो भी आपको देखने को मिलेगा, जिसमें वे तिरंगे को उल्टा पकड़कर विरोध प्रदर्शन करती नजर आ रही है। इससे यह साफ साबित करता है कि उनके दिल में देश के सम्मान के प्रति कितनी नफरत और लापरवाही भरी पड़ी है।
People should learn to hold theTricolour with the utmost respect and never violate the Flag Code of India. It is disappointing to see a senior political leader like #MehboobaMufti holding the #NationalFlag upside down. Public figures have a responsibility to set the right example pic.twitter.com/M1hPHmthyT
हमारे देश के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का अपमान करना एक बेहद गंभीर और गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में आता है। भारत के संविधान और कानूनों के तहत राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान को बनाए रखने के लिए बेहद सख्त नियम तय किए गए हैं। राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 के तहत कोई भी व्यक्ति यदि राष्ट्रीय ध्वज या संविधान का अपमान करता है, उसे विकृत करता है, जलाता है या जानबूझकर उसका अनादर करता है, तो उसे सख्त सजा दी जाती है। इस कानून की धारा 2 के तहत दोषी पाए जाने पर तीन साल तक की कैद या भारी जुर्माना अथवा दोनों से दंडित किए जाने का प्रावधान है।
भारतीय ध्वज संहिता, 2002 के अनुसार भी तिरंगे को फहराने, इस्तेमाल करने और इसके आकार-प्रकार को लेकर कड़े नियम बनाए गए हैं। इसके मुताबिक तिरंगे का आकार हमेशा आयताकार होना चाहिए और इसकी लंबाई-चौड़ाई का अनुपात 3:2 होना चाहिए। तिरंगे को कभी भी कटा-फटा, गंदा या उल्टा नहीं फहराया जा सकता है। इसके अलावा ध्वज पर कुछ भी लिखना, इसे जमीन पर छूने देना या इसे किसी अन्य रूप में इस्तेमाल करना भी कानूनी अपराध है। महबूबा मुफ्ती ने जो तिरंगे को उल्टा पकड़ा है, वे सीधे तौर पर राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम के नियमों का खुला उल्लंघन है और इस पर कानूनी कार्रवाई की माँग सोशल मीडिया पर लगातार जोर पकड़ रही है।
सोशल मीडिया पर महबूबा मुफ्ती के खिलाफ जनता का गुस्सा
इस पूरी घटना के सामने आने के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर जनता का गुस्सा फूट पड़ा है और लोग महबूबा मुफ्ती को जमकर खरी-खोटा सुना रहे हैं। कुछ लोग महबूबा मुफ्ती को तिरंगा पकड़ना सीखा रहे हैं, तो कुछ लोग इसे भारत विरोधी कारनामा बता रहे हैं। इसके अलावा, अन्य लोगों ने महबूबा मुफ्ती को ‘सजा होनी चाहिए’ जैसी माँग उठाई है।
यूजर सुरभि तिवारी ने तीखा तंज कसते हुए लिखा, “मैडम महबूबा मुफ्ती (@MehboobaMufti) पहले झंडा सीधा तो पकड़ना सीख लीजिए…”
अन्य यूजर पॉलिटिकल कीड़ा ने लिखा, “एक बार जो राष्ट्रविरोधी होता है, वह हमेशा राष्ट्रविरोधी ही रहता है। पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती को भारतीय झंडा उल्टा पकड़े हुए देखा गया है। भारत के खिलाफ जहर उगलने के उनके पुराने ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए, यह कोई गलती नहीं बल्कि भारत का मजाक उड़ाने का एक जानबूझकर किया गया प्रयास है।”
Once an anti-national, always an anti-national.
PDP chief Mehbooba Mufti is seen holding the Indian flag upside down.
Given her track record of spewing venom against India, this isn't a mistake but a deliberate attempt to mock India pic.twitter.com/M6UuIWZl6z
इसके अलावा, एक यूजर शोभित अग्रवाल ने लिखा, “ध्यान से देखिए ये वो ही महबूबा मुफ्ती है जो कुछ दिन पहले जंतर मंतर पर छात्रों के आंदोलन के नाम पर कश्मीर में धारा 370 हटने का विरोध कर रही थी। ये वो ही महबूबा मुफ्ती है जिनको भारत के राष्ट्रीय ध्वज तक का ज्ञान नहीं। राष्ट्रीय ध्वज का अपमान कर महबूबा मुफ्ती ने फिर साबित किया है कि मानसिकता सदैव भारत विरोधी थी, भारत विरोधी है और हमेशा रहेगी भी।”
ध्यान से देखिए ये वो ही महबूबा मुफ्ती है जो कुछ दिन पहले जंतर मंतर पर छात्रों के आंदोलन के नाम पर कश्मीर में धारा 370 हटने का विरोध कर रही थी। ये वो ही महबूबा मुफ्ती है जिनको भारत के राष्ट्रीय ध्वज तक का ज्ञान नही। राष्ट्रीय ध्वज का अपमान कर महबूबा मुफ्ती ने फिर साबित किया है कि…
यूजर स्मृति शर्मा ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, “लोगों को तिरंगे को अत्यधिक सम्मान के साथ पकड़ना सीखना चाहिए और भारत के ध्वज संहिता का कभी उल्लंघन नहीं करना चाहिए। महबूबा मुफ्ती जैसी वरिष्ठ राजनीतिक नेता को राष्ट्रीय ध्वज उल्टा पकड़े हुए देखना बेहद निराशाजनक है। सार्वजनिक हस्तियों की जिम्मेदारी होती है कि वे सही उदाहरण पेश करें।”
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5 अगस्त का ऐतिहासिक दिन और मोदी सरकार द्वारा आर्टिकल 370 की समाप्ति
अब जान लेते है कि जिस 5 अगस्त को महबूबा मुफ्ती ‘काला दिन’ बताती है, उस दिन क्या हुआ था। दरअसल, केंद्र की मोदी सरकार ने 5 अगस्त 2019 को एक बेहद ऐतिहासिक और साहसिक कदम उठाते हुए जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 और 35A को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया था। आर्टिकल 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर पूरी तरह भारत के बाकी राज्यों की तरह संविधान के दायरे में आ गया था। दशकों से जिस स्पेशल स्टेटस की आड़ में कुछ राजनीतिक दल अपनी रोटियाँ सेकते रहे थे और अलगाववाद को बढ़ावा देते रहे थे, मोदी सरकार ने उस दीवार को हमेशा के लिए गिरा दिया था। इस ऐतिहासिक फैसले को लिए अब पूरे 7 साल हो चुके हैं और यह निर्णय देश की अखंडता और संप्रभुता के लिए मील का पत्थर साबित हुआ है।
आर्टिकल 370 हटने के बाद से जम्मू-कश्मीर की तस्वीर पूरी तरह से बदल चुकी है। जिस घाटी में कभी आतंकवाद और अलगाववाद का बोलबाला था, आज वहाँ शांति और विकास की बयार बह रही है। लेकिन ये सब महबूबा मुफ्ती को क्यों ही पसंद आएगी। मोदी सरकार के इस मास्टरस्ट्रोक ने यह साबित कर दिया कि देशहित में कड़े फैसले कैसे लिए जाते हैं। महबूबा मुफ्ती जैसे नेता जो इस ऐतिहासिक बदलाव को पचा नहीं पा रहे हैं, वे आज भी ओछी राजनीति करने पर आमादा हैं, जबकि आम कश्मीरी जनता विकास के रास्ते पर आगे बढ़ चुकी है।
आर्टिकल 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में आए बड़े बदलाव
अनुच्छेद 370 के खात्मे के बाद से जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बहुत अच्छी हो गई है। घाटी में पत्थरबाजी, हड़ताल और आतंकी घटनाएं अब ना के बराबर होती हैं। इससे आम लोगों का जीवन पूरी तरह से सुरक्षित और सामान्य हो गया है।
इलाके में विकास की रफ्तार तेज हुई है। उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक और दुनिया के सबसे ऊँचे चिनाव रेल पुल जैसी बड़ी परियोजनाओं से यहाँ की कनेक्टिविटी मजबूत हुई है। साथ ही, दूर-दराज के गाँवों को भी पक्की सड़कों के जरिए मुख्य शहरों से जोड़ा जा रहा है।
अब देश के सारे कानून सीधे तौर पर जम्मू-कश्मीर में भी लागू होते हैं। इससे महिलाओं, दलितों, एससी और एसटी वर्गों को उनके हक और आरक्षण का पूरा लाभ मिलने लगा है। समाज के हर वर्ग को आगे बढ़ने का बराबर मौका मिल रहा है।
घाटी में देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों की संख्या में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है। इससे होटल, टैक्सी और हस्तशिल्प (हैंडीक्राफ्ट) जैसे स्थानीय कारोबारों को नई ताकत मिली है। इन सभी बदलावों से आम लोगों की कमाई और प्रति व्यक्ति आय में भी अच्छी खासी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
इटली के फ्लोरेंस शहर में आयोजित 46वीं COSPAR (अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति) की साइंटिफिक असेंबली में 3 अगस्त 2026 को भारत के लिए गौरवान्वित करने वाला क्षण आया जब हमारे देश की जानी-मानी खगोल वैज्ञानिक (Astrophysicist) प्रोफेसर अन्नपूर्णी सुब्रमण्यम को वैश्विक मंच पर अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
उन्हें विकासशील देशों में अंतरिक्ष विज्ञान को बढ़ावा देने और शानदार काम करने के लिए ‘विक्रम साराभाई मेडल 2026’ दिया गया। यह सम्मान पाकर उन्होंने अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में भारत का नाम एक बार फिर रौशन किया।
अपने ट्वीट में उन्होंने इस सम्मान को पाने की खुशी भी जाहिर की और तस्वीरें भी साझा की।
ISRO और COSPAR द्वारा संयुक्त रूप से दिया जाने वाला यह पदक हासिल करने वाली वह पहली भारतीय महिला वैज्ञानिक और दुनिया की केवल तीसरी महिला वैज्ञानिक बनी हैं।
रिपोर्ट्स बताती हैं कि उन्हें स्टेलर फिजिक्स, ब्लू स्ट्रैगलर स्टार्स, एस्ट्रोसैट मिशन और खगोलीय उपकरणों के विकास में योगदान देने के कारण वैश्विक मंच पर यह सम्मान मिला।
भारत में किन लोगों को मिला है ये सम्मान
भारत में अन्नपूर्णी सुब्रमण्यम के अलावा अब तक यह सम्मान तीन ही लोगों को मिला है। इनमें सबसे पहला नाम प्रोफेसर यूआर राव (1996) का है। 1990 में इस मेडल की स्थापना के बाद इसरो के पूर्व अध्यक्ष और प्रख्यात अंतरिक्ष वैज्ञानिक प्रोफेसर पहले भारतीय थे जिन्हें ये मेडल मिला।
इसके बाद 2014 में गुरबक्ष सिंह लखीना को ये सम्मान स्पेस प्लाज्मा और स्पेस वेदर फिजिक्स के क्षेत्र में योगदान के लिए यह मेडल मिला था। साल 2024 में यह सम्मान डॉक्टर अनिल भारद्वाज को उन्हें अंतरिक्ष विज्ञान और ग्रह अन्वेषण के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए दिया गया था।
डॉ अन्नपूर्णी सुब्रमण्यम का परिचय
डॉ अन्नपूर्णी सुब्रमण्यम का जन्म केरल के पलक्कड़ जिले के एक सुसंस्कृत परिवार में हुआ था। विज्ञान के प्रति गहरे आकर्षण के कारण उन्होंने विक्टोरिया कॉलेज, पलक्कड़ से फिजिक्स में स्नातक की पढ़ाई पूरी की।
इसके बाद उन्होंने भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (IIA), बेंगलुरु का रुख किया, जहाँ से 1996 में ‘स्टार क्लस्टर और तारकीय विकास’ विषय पर अपनी पीएचडी की उपाधि प्राप्त की।
विज्ञान के प्रति उनकी लगन जितनी गहरी है, उतनी ही रुचि उनकी कला में भी है। वह स्वयं एक अत्यंत कुशल कर्नाटक संगीत वायलिन वादक हैं। इसके अलावा उनकी व्यावसायिक और वैज्ञानिक यात्रा अत्यंत प्रेरणादायक रही है।
1990 के दशक में IIA में एक रिसर्च फेलो के रूप में प्रवेश करने वाली अन्नपूर्णी ने अपनी प्रतिभा के बल पर प्रोफेसर और अंततः संस्थान के 50 से अधिक वर्षों के इतिहास में पहली महिला निदेशक बनने का गौरव प्राप्त किया।
प्रोफेसर सुब्रमण्यम की उपलब्धियाँ
अपने शोध में उन्होंने मुख्य रूप से तारागुच्छों, मैगेलैनिक क्लाउड्स और हमारी आकाशगंगा की जटिल संरचनाओं का अध्ययन किया।
पुराने तारा समूहों में पाए जाने वाले असामान्य रूप से गर्म और युवा दिखाई देने वाले ‘ब्लू स्ट्रैगलर स्टार्स’ के रहस्य को सुलझाने में उनके शोध पत्रों ने वैश्विक स्तर पर नया दृष्टिकोण दिया।
राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष मिशनों में भी उनकी भूमिका निर्णायक रही। भारत की पहली समर्पित अंतरिक्ष वेधशाला AstroSat (2015) के मुख्य पेलोड ‘अल्ट्रावॉयलेट इमेजिंग टेलीस्कोप’ (UVIT) को सटीक बनाने में उन्होंने बतौर ‘कैलिब्रेशन वैज्ञानिक’ केंद्रीय भूमिका निभाई, जिसके कारण बाद में वैज्ञानिकों को तारों की उत्पत्ति को पराबैंगनी प्रकाश में समझने में सफलता मिली।
इसके अतिरिक्त, वह बहु-अरब डॉलर की अंतर्राष्ट्रीय ‘थर्टी मीटर टेलीस्कोप’ (TMT) परियोजना में भारत के वैज्ञानिक दल का नेतृत्व कर रही हैं।
वर्ष 2024 में भारत सरकार द्वारा उन्हें अंतरिक्ष विज्ञान में असाधारण योगदान के लिए सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मानों में से एक ‘विज्ञान श्री’ से सम्मानित किया गया था।
वह ‘इण्डियन एकेडमी ऑफ साइंसेज’ (IAS) की फेलो और ‘इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन’ (IAU) की सक्रिय सदस्य हैं।
‘माँ ने कहा था सूरज पर करूँ अध्य्यन’
साल 2024 में एक इंटरव्यू में एक बार उन्होंने बचपन का किस्सा सुनाते हुए बताया था कि कैसे बचपन से ही तारों से भरे आसमान के प्रति उनके आकर्षण ने उन्हें खगोल वैज्ञानिक बनने की प्रेरणा दी।
शुरुआत में उनके माता-पिता दूरदराज की प्रयोगशालाओं में अकेले काम करने को लेकर चिंतित थे, यहाँ तक कि उनकी माँ ने मजाकिया अंदाज में उनसे सूरज का अध्ययन करने को कहा था ताकि उन्हें रात में काम न करना पड़े।
हालाँकि अन्नपूर्णी तारों का रहस्य खोजने में खुद को समर्पित कर चुकी थीं। उनके लिए खगोल विज्ञान केवल पढ़ाई नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के अनोखे रहस्यों का जवाब तलाशने का जरिया बन गया था।
क्यों भारत के लिए खास है ये सम्मान
गौरतलब हो कि एक भारतीय महिला होने के नाते डॉ अन्नपूर्णी सुब्रमण्यम की यह उपलब्धि केवल व्यक्तिगत सफलताओं का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि यह विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित के क्षेत्रों में बनी लैंगिक रूढ़िवादिता को चकनाचूर करने वाली मिसाल है।
केरल के एक छोटे शहर से शुरू होकर दुनिया के सबसे बड़े खगोलीय मंचों और वेधशालाओं तक पहुँचने का उनका यह सफर भारत की लाखों युवा बेटियों को यह विश्वास दिलाता है कि यदि संकल्प दृढ़ हो, तो पलक्कड़ से निकलकर इटली में वैश्विक सम्मान पाने की यात्रा असंभव नहीं है।
COSPAR क्या है?
COSPAR का पूरा नाम ‘कमेटी ऑन स्पेस रिसर्च’ (Committee on Space Research) है। यह दुनिया भर के वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं का एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन है, जिसकी स्थापना 1958 में अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान परिषद (ISC) द्वारा की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य दुनिया में शांतिपूर्ण अंतरिक्ष अनुसंधान और वैज्ञानिक जानकारियों के आदान-प्रदान को बढ़ावा देना है।
संगठन हर दो साल में अपने अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान दुनिया भर के उन वैज्ञानिकों को सम्मानित करता है, जिन्होंने अंतरिक्ष तकनीक, नई खगोलीय खोजों और विभिन्न देशों के बीच वैज्ञानिक सहयोग में असाधारण योगदान दिया हो।
The medal is awarded jointly by ISRO and Committee on Space Research (COSPAR) every 2 yrs, in honour of Vikram Sarabhai. The award recognises her work on stellar populations, blue straggler stars, UVIT/AstroSat, future telescopes & HDSR.@IndiaDST@fiddlingstars@ISRO@CosparHQpic.twitter.com/JFkTNnxCR1
इसी कॉस्पर सम्मानों की श्रृंखला में ‘विक्रम साराभाई मेडल’ एक प्रमुख और बेहद खास अंतरराष्ट्रीय पदक है। यह सम्मान कॉस्पर और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ISRO द्वारा संयुक्त रूप से प्रदान किया जाता है।
भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ विक्रम साराभाई की याद में शुरू किया गया यह पदक विशेष रूप से उन वैज्ञानिकों को दिया जाता है, जिन्होंने विकासशील देशों में अंतरिक्ष विज्ञान और अनुसंधान को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने में क्रांतिकारी भूमिका निभाई हो।
कर्नाटक की बेल्थांगडी (Belthangady) की एक अदालत ने सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के राष्ट्रीय महासचिव रियाज फरंगीपेट (Riyaz Farangipete) को जेल की सजा सुनाई है।
कोर्ट ने यह फैसला जुलाई 2015 के एक भड़काऊ भाषण के मामले में रियाज को दोषी करार देते हुए दिया। हेट स्पीच मामले में उसे 6 महीने के कारावास और 10,000 रुपए के जुर्माने की सजा सुनाई गई है।
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि रियाज का वह भाषण दो समुदायों के बीच शांति भंग करने की क्षमता रखता था और ऐसे कृत्यों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इसके बाद मजिस्ट्रेट रामलिंगप्पा ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A के तहत दोषी पाए जाने पर सजा का आदेश सुनाया और फिर जेल की काटने के लिए फरंगीपेट को न्यायिक हिरासत में भेज दिया।
गाय काटने पर दिया था विवादित बयान
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस की चार्जशीट में बताया गया है कि जुलाई 2015 में पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) के एक विरोध प्रदर्शन के दौरान रियाज ने भड़काऊ बयान देते हुए कहा था कि यदि गाय के नाम पर मुसलमानों पर हमले बंद नहीं हुए, तो PFI कार्यकर्ता सार्वजनिक रूप से गाय काटेंगे और बीफ बेचेंगे।
उसने चुनौती देते हुए कहा था कि आगामी बकरीद पर बेल्थांगडी बस स्टैंड के सामने बीफ बेचा जाएगा और इसे रोकने जो भी आएगा, कार्यकर्ताओं द्वारा उसे करारा जवाब दिया जाएगा।
पुलिस ने इसी भाषण को धार्मिक भावनाओं भड़काने और दो समुदायों के बीच शत्रुता पैदा करने वाला मानते हुए आईपीसी की धारा 153A और 295A के तहत चार्जशीट दाखिल की थी।
कौन है रियाज फरंगीपेट (Riyaz Farangipete)
बता दें कि रियाज कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले में अपने आपको राजनेता बताते हुए सक्रिय है। उसे सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) में राष्ट्रीय महासचिव का पद मिला हुआ है। वही SDPI जिसको व्यापक रूप से भारत में प्रतिबंधित संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) की राजनीतिक शाखा माना जाता रहा है।
सरकार ने सितंबर 2022 में गैर-कानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत पीएफआई पर 5 साल का बैन लगाया था। मगर, SDPI के राजनैतिक पार्टी होने के मुखौटे के कारण ये प्रतिबंध से अलग रहा।
आज SDPI खुद को एक स्वतंत्र राजनीतिक दल बताता है, लेकिन जाँच एजेंसियों के अनुसार पूर्व PFI कैडर गतिविधियाँ चलाने के लिए SDPI में शामिल होते रहे हैं।
CAA-NRC विरोध प्रदर्शनों में लोगों को भड़काने में था रियाज का हाथ
दिसंबर 2019 में मेंगलुरु में जब नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के खिलाफ हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए थे, उस समय रियाज फरंगीपेट और एक अन्य SDPI नेता पर धारा 144 लागू होने के बावजूद व्हाट्सएप संदेशों के जरिए लोगों को भड़काने का आरोप लगा था।
बाद में पुलिस ने उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत देशद्रोह (धारा 124A) और धर्म के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने का मामला दर्ज किया गया था।
प्रधानमंत्री की रैली से पहले रची साजिश
सितंबर 2022 में, राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने मेंगलुरु के बाहरी इलाके बीसी रोड स्थित रियाज के आवास पर छापा मारा था। यह छापेमारी जुलाई 2022 में बिहार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक रैली के बीच गड़बड़ी पैदा करने की साजिश से जुड़े एक मामले में की गई थी।
चूँकि रियाज उस समय SDPI का बिहार प्रभारी था, इसलिए NIA ने उससे घंटों पूछताछ की और कुछ दस्तावेज व मोबाइल फोन जब्त किए थे। रियाज ने बाद में इस मामले को भाजपा सरकार के इशारे पर दर्ज किया गया ‘फर्जी मामला’ बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की थी।
पाकिस्तानी नारे लगाने वालों का करता है बचाव
जनवरी 2021 में, दक्षिण कन्नड़ में पंचायत चुनावों की मतगणना के दौरान कुछ SDPI सदस्यों पर पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाने का आरोप लगा था। रियाज ने उस समय इन सदस्यों बचाव करते हुए पुलिस को चेतावनी दी थी कि अगर गिरफ्तार सदस्यों को नहीं छोड़ा गया तो वे लोग हंगामा करेंगे। बाद में जब कार्रवाई नहीं रुकी तो पार्टी सदस्यों ने दावा किया था कि वीडियो के साथ छेड़छाड़ की गई थी और यह मुसलमानों को फँसाने के लिए ‘संघ परिवार’ की साजिश थी।
SIR पर फैलाता है भ्रम
18 जुलाई 2026 को SDPI अकॉउंट से साझा वीडियो में रियाज, SIR की प्रक्रिया पर भ्रम फैलाता भी देखा गया। वीडियो में उसने बताया कि इस प्रक्रिया पर ज्यादा विश्वास नहीं करना है क्योंकि भाजपा इसका इस्तेमाल चुनाव जीतने के लिए कर रही है। उसने वीडियो में ये फैलाया कि बिहार से लेकर बंगाल तक में वोटर्स के नाम को काटा गया है और भाजपा वाले लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव नहीं जीत रहे।
SDPI से जुड़े लोगों के कारनामे
बता दें कि रियाज का मामला अकेला नहीं है, SDPI और उससे कट्टरपंथी लगातार कई गंभीर कानूनी विवादों, सांप्रदायिक तनाव भड़काने और देश विरोधी गतिविधियों के आरोपों में घिरे रहे हैं।
SDPI को प्रतिबंधित संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) की राजनीतिक शाखा माना जाता है, जिसके कैडरों पर असम सहित देश भर में देशविरोधी गतिविधियों के तहत पुलिस और NIA की कार्रवाइयाँ होती रही हैं। 2023 में असम पुलिस ने 2 संदिग्धों को गिरफ्तार किया था। बाद में पता चला कि ये पीएफआई बैन होने के बाद SDPI से जुड़े थे।
पार्टी पर हिंसा और गंभीर अपराधों के आरोपितों को राजनीतिक संरक्षण देने का आरोप है। इसका उदाहरण कर्नाटक में BJYM नेता प्रवीण नेट्टारू की निर्मम हत्या के आरोपित शफी बेल्लारे को जेल में रहने के बावजूद विधानसभा चुनाव का टिकट देना है।
इसके अतिरिक्त, तमिलनाडु के प्रसिद्ध मुरुगन मंदिर परिसर के पास कुर्बानी की कोशिश कर सांप्रदायिक तनाव पैदा करने की साजिश में भी SDPI का नाम आया था। बाद में हिंदू संगठनों के विरोध के बाद पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा और इसे धार्मिक सौहार्द बिगाड़ने और उकसावे की साजिश माना गया।
इसी तरह हिंदू माँ-बेटी के धर्मांतरण के मामलों में पूर्व SDPI सदस्यों पर FIR, और ज्ञानवापी फैसले पर वाराणसी के जज के खिलाफ कर्नाटक में अपमानजनक पोस्ट करने जैसे मामले SDPI की करतूतों को नमूना हैं।
तमिलनाडु की राजनीति हमेशा से बहुत तीखी और खतरनाक लड़ाइयों के लिए जानी जाती रही है। यहाँ पार्टियों के बीच का झगड़ा कई बार सारी हदें पार कर जाता है। राजनीति का यह गंदा रूप कई बार महिलाओं को सीधे तौर पर निशाना बना चुका है। करीब 36 साल पहले, 25 मार्च 1989 को तमिलनाडु विधानसभा में एक ऐसी घटना हुई थी, जिसे आज भी राज्य के राजनीतिक इतिहास के सबसे बड़े विवादों में गिना जाता है। उस दिन तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष जे जयललिता फटी हुई साड़ी, बिखरे बाल और चोट के निशानों के साथ विधानसभा से बाहर निकली थीं।
अब एक बार फिर तमिलनाडु की राजनीति में एक महिला का नाम चर्चा में है। इस बार विवाद अभिनेत्री तृषा कृष्णन से जुड़ा है। डीएमके के वरिष्ठ नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन के एक कथित दोहरे अर्थ वाले बयान को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया। विपक्ष ने आरोप लगाया कि यह टिप्पणी तृषा कृष्णन को निशाना बनाकर की गई थी।
दोनों घटनाएँ पूरी तरह अलग हैं। एक मामला विधानसभा के अंदर कथित शारीरिक हमले से जुड़ा था, जबकि दूसरा एक राजनीतिक मंच से दिए गए बयान को लेकर है। लेकिन दोनों मामलों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि तमिलनाडु की राजनीति में महिलाओं का नाम बार-बार विवादों में क्यों आता है।
वह काला दिन जिसने बदल दिया जयललिता का जीवन
यह कहानी 25 मार्च 1989 की है जो विधानसभा के इतिहास का सबसे काला दिन माना जाता है। उस समय जे जयललिता की उम्र 41 साल थी और वह विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष थीं। बजट सत्र के दौरान उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री एम करुणानिधि की सरकार पर जमकर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे।
इन आरोपों के बाद सदन के भीतर अचानक भयंकर हंगामा शुरू हो गया। एआईएडीएमके (AIADMK) और डीएमके विधायकों के बीच हाथापाई और तीखी झड़प होने लगी। इस पूरी अराजकता के दौरान जयललिता पर गंभीर शारीरिक हमले किए गए।
जयललिता ने बाद में खुद यह आरोप लगाया कि उन पर सदन के अंदर हमले किए गए थे। उनके अनुसार, विधायकों ने उनकी तरफ चीजें फेंकी थीं। जब पार्टी के दूसरे विधायक उन्हें सुरक्षित बाहर ले जा रहे थे, तब एक DMK मंत्री ने उनकी साड़ी खींच दी थी।
घटना के बाद जब जयललिता विधानसभा के मुख्य दरवाजे से बाहर आईं, तो उनका हाल बहुत बुरा था। उनकी साड़ी जगह-जगह से फटी हुई थी और उनके बाल पूरी तरह बिखरे हुए थे। उनकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे और शरीर पर चोट के निशान साफ दिख रहे थे।
यह दिल दहला देने वाला दृश्य पूरे देश की मीडिया की बड़ी सुर्खियाँ बन गया। तमिलनाडु की राजनीति में यह तस्वीर आज भी सबसे बड़ी और यादगार तस्वीरों में गिनी जाती है। इस अपमान के बाद जयललिता ने वहीं सबके सामने एक बहुत बड़ी कसम खाई थी।
उन्होंने गुस्से में ऐलान किया था कि वह विधानसभा के अंदर अब दोबारा कभी कदम नहीं रखेंगी। उन्होंने कहा था कि वह सदन में तभी लौटेंगी जब वह खुद इस राज्य की मुख्यमंत्री बनेंगी। अपनी इस जिद को उन्होंने सच करके भी दिखाया।
सिर्फ दो साल में पूरा किया अपना संकल्प
जयललिता ने हार नहीं मानी और जनता के बीच जाकर इस अपमान का बदला लेने की ठानी। जनता का भारी समर्थन उनके साथ आ खड़ा हुआ। इसका नतीजा यह हुआ कि सिर्फ दो साल बाद यानी 1991 में चुनाव हुए।
उन्होंने अपनी पार्टी एआईएडीएमके (AIADMK) को बहुत बड़ी और प्रचंड जीत दिलाई। इसके बाद उन्होंने राज्य की मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालकर अपना संकल्प पूरा कर लिया। वह दिन उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा और निर्णायक मोड़ साबित हुआ था।
1989 की घटना पर दोनों पक्षों के अलग-अलग दावे
उस ऐतिहासिक दिन क्या हुआ था, इसको लेकर दोनों पार्टियों के अपने-अपने दावे रहे हैं। जयललिता जिंदगी भर यही कहती रहीं कि उनके साथ विधानसभा के अंदर बहुत बड़ी बदसलूकी और मारपीट की गई थी।
दूसरी तरफ, मुख्यमंत्री एम करुणानिधि और उनकी पार्टी ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया था। उनका कहना था कि उनके विधायक पूरी तरह शांत बैठे थे। उन्होंने उल्टा विरोधी पार्टी के विधायक केए सेंगोट्टैयन पर गंभीर आरोप लगाए थे।
करुणानिधि का दावा था कि एआईएडीएमके विधायक ने ही उन पर हमला किया था और उनका चश्मा तोड़ दिया था। चाहे जो भी सच रहा हो, लेकिन उस दिन की घटना ने हमेशा के लिए इतिहास में अपनी एक अलग और डरावनी जगह बना ली है।
तृषा कृष्णन और उदयनिधि स्टालिन का नया विवाद
अब आते हैं आज के समय के ताजा विवाद पर जो कावेरी नदी के पानी के बँटवारे को लेकर शुरू हुआ था। डीएमके पार्टी ने एक बड़ा विरोध प्रदर्शन रखा था, जिसमें पार्टी के बड़े नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन भी शामिल थे।
इस रैली के दौरान उदयनिधि स्टालिन ने सरकार पर निशाना साधते हुए कुछ ऐसा कहा जिससे नया बवंडर खड़ा हो गया। उन्होंने अपने भाषण में कहा कि भीड़ में मौजूद कुछ लोग लगातार मशहूर अभिनेत्री तृषा कृष्णन का नाम ले रहे हैं।
राजनीतिक विरोधियों और सोशल मीडिया के लोगों ने इस बात को तुरंत पकड़ लिया। लोगों का मानना था कि यह बयान मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय और अभिनेत्री तृषा के बीच चल रही पर्सनल चर्चाओं पर एक गंदा तंज था।
सफाई के बाद भी नहीं थमा विवाद
जब इस बयान पर चारों तरफ हंगामा मचने लगा, तो उदयनिधि स्टालिन ने तुरंत अपनी सफाई पेश की। उन्होंने कहा कि उनका मतलब कावेरी नदी से था, किसी और चीज से नहीं। लेकिन उनकी यह सफाई आग को बुझा नहीं पाई।
उनकी इस टिप्पणी की राजनीतिक गलियारों में बहुत तीखी आलोचना हुई। सत्तारूढ़ TVK पार्टी ने इसे महिलाओं का खुला अपमान बताया और नेशनल कमीशन फॉर वुमन यानी राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) में इसकी लिखित शिकायत दर्ज कराई।
तमिलनाडु की भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने भी इस बयान को बेहद अश्लील और घटिया बताया। उन्होंने माँग की कि इस तरह की भाषा बोलने वाले नेता के खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।
महिलाओं को लेकर पहले भी विवादों में रहे हैं उदयनिधि
तृषा कृष्णन को लेकर हुआ यह विवाद कोई पहला मौका नहीं है जब उदयनिधि स्टालिन महिलाओं पर दिए गए बयानों से फंसे हों। इससे पहले भी वह कई बार ऐसे बयानों के कारण आलोचना झेल चुके हैं।
कुछ समय पहले जब वह मुख्यमंत्री जोसेफ विजय पर हमला बोल रहे थे, तब उन्होंने विजय की पत्नी संगीता सोर्नालिंगम का नाम भी बीच में घसीट लिया था। उन्होंने उनके निजी जीवन से जुड़ी खबरों को अपने राजनीतिक भाषण का मुख्य हिस्सा बनाया था।
उस समय भी विपक्ष ने उन पर यह गंभीर आरोप लगाया था कि वह अपनी राजनीतिक लड़ाई जीतने के लिए परिवार की महिलाओं को बीच में लेकर आते हैं। इससे पहले 2021 के विधानसभा चुनाव के दौरान भी ऐसा ही देखने को मिला था।
शशिकला का नाम लेकर भी उठाए थे सवाल
2021 के चुनाव प्रचार के दौरान उदयनिधि स्टालिन ने तत्कालीन मुख्यमंत्री एडप्पडी के पलानीस्वामी पर जमकर निशाना साधा था। उस भाषण में उन्होंने वी के शशिकला का नाम जबरदस्ती बीच में घसीट लिया था।
उन्होंने शशिकला का नाम लेकर उनकी राजनीतिक साख और विश्वसनीयता पर कई तरह के सवाल खड़े किए थे। इन सभी पुराने मामलों को देखकर विपक्ष हमेशा यही कहता आया है कि डीएमके नेता राजनीति में महिलाओं का इस्तेमाल सिर्फ अपनी दुश्मनी निकालने के लिए करते हैं।
विपक्षी पार्टियों का साफ आरोप है कि राजनीतिक विरोधियों को नीचा दिखाने के लिए उनके घरों की महिलाओं को निशाना बनाना इस पार्टी की पुरानी आदत बन चुकी है।
अतीत और वर्तमान: परिस्थितियों में अंतर लेकिन सोच वही
अगर हम 1989 की जयललिता वाली घटना और आज के तृषा कृष्णन विवाद को देखें, तो दोनों की परिस्थितियाँ बिल्कुल अलग हैं। एक मामला सीधे तौर पर विधानसभा के अंदर हुए शारीरिक हमले और बदसलूकी से जुड़ा हुआ था।
जबकि दूसरा मामला किसी राजनीतिक मंच से सार्वजनिक रूप से दिए गए विवादित बयान और छींटाकशी का है। दोनों घटनाओं के तरीके भले ही अलग हों, लेकिन इन दोनों ने एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
यह सवाल यह है कि तमिलनाडु की राजनीति में हमेशा महिलाओं को ही क्यों निशाना बनाया जाता है? राजनीति के इस गंदे खेल में महिलाओं को बार-बार बीच में क्यों घसीटा जाता है?
जयललिता के लिए 25 मार्च 1989 का वह दिन बहुत बड़ा झटका था, लेकिन वही उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट भी बन गया था। फटी साड़ी में बाहर आती उनकी तस्वीरों ने उन्हें एक कमज़ोर महिला की जगह एक बहुत बड़ी आयरन लेडी बना दिया था।
आज का तृषा कृष्णन विवाद भी राजनीतिक भाषा और जनप्रतिनिधियों की मर्यादा पर एक गहरी चोट है। नेता अपनी कुर्सी और फायदे के लिए यह भूल जाते हैं कि सार्वजनिक मंचों से महिलाओं के खिलाफ कैसी भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है।
यह वक्त ही बताएगा कि तृषा कृष्णन से जुड़ा यह विवाद आने वाले समय में पूरी तरह खत्म होगा या यह भी राज्य की राजनीति का एक नया और बड़ा अध्याय बनकर रह जाएगा। लेकिन इस पूरे मामले से एक बात बहुत साफ हो जाती है कि 1989 की उस खौफनाक घटना के लगभग चार दशक बीत जाने के बाद भी हालात में कोई सुधार नहीं हुआ है। आज भी तमिलनाडु की राजनीति में महिलाओं को राजनीतिक हमलों का आसान शिकार बनाया जा रहा है।
जब तक नेता अपनी घटिया राजनीति से बाहर आकर महिलाओं का सम्मान करना नहीं सीखेंगे, तब तक ऐसे विवाद बार-बार उठते रहेंगे। जनता अब इन सब चीजों को बहुत गौर से देख रही है और आने वाले चुनावों में इसका जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार बैठी है।
दुनिया के नक्शे पर युद्ध और कूटनीति के समीकरण बेहद उलझे हुए हैं। इस बीच मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल (Amnesty International) ने गुरुवार (30 जुलाई 2026) को एक रिपोर्ट जारी कर दावा किया कि भारत में बने रक्षा उपकरणों और सैन्य घटकों (Defense Components) का इस्तेमाल इजराइल द्वारा गाजा में जारी सैन्य कार्रवाइयों में किया जा रहा है।
एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट की हेडलाइन है- MADE IN INDIA: THE SUPPLY OF WEAPONS AND AMMUNITION TO ISRAEL (मेड इन इंडिया: इजरायल को हथियारों और गोला-बारूद की आपूर्ति)।
इस रिपोर्ट में एमनेस्टी ने आरोप लगाया है कि 7 अक्टूबर 2023 को गाजा में संघर्ष शुरू होने के बाद से लेकर अब तक भारत की कई सरकारी और निजी कंपनियों ने इजरायल को बड़े पैमाने पर सैन्य सामग्री, गोला-बारूद, ड्रोन के पुर्जे और छोटे हथियारों के कलपुर्जे निर्यात किए हैं। एमनेस्टी का कहना है कि यह आपूर्ति अंतरराष्ट्रीय कानून और जेनोसाइड कन्वेंशन (Genocide Convention) का उल्लंघन कर सकती है।
एमनेस्टी ने तर्क दिया है कि भारत द्वारा की जा रही यह आपूर्ति अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून और 1948 के जेनोसाइड कन्वेंशन (नरसंहार रोकथाम समझौते) के तहत भारत के अंतरराष्ट्रीय कानूनी दायित्वों के विपरीत हो सकती है।
एमनेस्टी इंटरनेशनल की महासचिव एग्नेस कैलामार्ड ने कहा, “हमारी जाँच से पता चलता है कि गाजा में कथित जनसंहार को लेकर दुनिया भर में लगातार सामने आ रही तस्वीरों के बावजूद भारत ने इजरायली सेना और रक्षा क्षेत्र का समर्थन जारी रखा।”
कैलामार्ड ने कहा, “अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की ओर से जारी अंतरिम आदेशों में गजा में फिलिस्तीनियों के खिलाफ संभावित जनसंहार के जोखिम को स्वीकार किया गया है। ऐसे में भारतीय अधिकारी यकीन के साथ यह नहीं कह सकते कि उन्हें यह जानकारी नहीं थी कि इजरायल को हथियारों के हस्तांतरण की अनुमति देना और उसे आसान बनाना अंतरराष्ट्रीय कानून के गंभीर उल्लंघनों में योगदान का बड़ा जोखिम पैदा करता है।”
अपने ट्वीट में अन्य जानकारियाँ देते हुए उन्होंने लिखा, “हम भारत सरकार से इजरायल को हथियारों, गोला-बारूद और पुर्जों के निर्यात को तुरंत रोकने का आह्वान करते हैं। इसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इसके अधिकार क्षेत्र में कार्यरत कंपनियाँ अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अपराधों में योगदान न दें।”
New @amnesty research reveals that #India continued to supply arms to #Israel despite the substantial risk they could be used in its ongoing genocide against Palestinians in the occupied Gaza Strip.
India manufactures and supplies arms transferred to Israel through its ownership…
हालाँकि जब इस पूरी रिपोर्ट का गहराई से अध्ययन किया जाता है, तो इसके पीछे मानवाधिकारों की वास्तविक चिंता से अधिक अंतरराष्ट्रीय एनजीओ इकोसिस्टम का राजनीतिक एजेंडा और रणनीतिक पूर्वाग्रह दिखाई देता है।
भारत सरकार और स्वतंत्र सामरिक विश्लेषकों का हमेशा से यह स्पष्ट और व्यावहारिक दृष्टिकोण रहा है कि संप्रभु राष्ट्रों के बीच होने वाला रक्षा व्यापार अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों और राष्ट्रीय कानूनों के कड़े ढाँचे में संचालित होता है। किसी भी निर्यातक देश का नियंत्रण केवल सामग्री की सुपुर्दगी और अनुबंध की शर्तों तक ही सीमित रह सकता है, कोई भी विक्रेता देश यह तय नहीं कर सकता कि खरीदार देश अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा, रणनीतिक स्वायत्तता और आपातकालीन परिस्थितियों के अनुसार उन उपकरणों का प्रयोग कब, कहाँ और किस प्रकार करेगा। देश के जाने-माने रक्षा विशेषज्ञों ने भी एमनेस्टी की रिपोर्ट को खारिज किया है और कहा है कि ये भारत के मामले में सही रिपोर्ट नहीं है, क्योंकि ये पूर्वाग्रहों से ग्रस्त है।
इस रिपोर्ट में हम एमनेस्टी के दावों, भारत सरकार और भारतीय डिफेंस सेक्टर के व्यावहारिक पक्ष, विशेषज्ञों की राय, भारत-इजरायल के गहरे और ऐतिहासिक संबंधों, भारत की बढ़ती ‘आत्मनिर्भरता’ से पश्चिमी देशों और एनजीओ की घबराहट, विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर द्वारा यूरोप में पश्चिमी मीडिया के सामने ही पश्चिमी देशों के डबल स्टैंडर्ड की पोल खोलने और अंतरराष्ट्रीय संस्था सिपरी (SIPRI) की हथियारों पर जारी होने वाली रिपोर्ट का भी विश्लेषण करेंगे।
एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट: क्यों इसके विश्लेषण की जरूरत?
एमनेस्टी इंटरनेशनल की इस रिपोर्ट में 7 अक्टूबर 2023 से 30 नवंबर 2025 के बीच भारत से इजरायल भेजे गए कुल 2,596 शिपमेंट्स (कंसाइनमेंट) के डेटा का विश्लेषण किया गया है। एमनेस्टी का दावा है कि भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की उपक्रमों (DPSUs) और निजी कंपनियों ने इजरायल की रक्षा कंपनियों (जैसे एलबिट सिस्टम्स, इजरायल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज और आईडब्ल्यूआई) को सैन्य पुर्जों की सप्लाई जारी रखी है।
एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट मुख्य रूप से भारत से इजरायल भेजे गए शिपमेंट्स के कस्टम डेटा और सीमा शुल्क दस्तावेजों के विश्लेषण पर आधारित होने का दावा करती है।
एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट(फोटो साभार: amnesty. org)
एमनेस्टी के आँकड़ों के मुताबिक, भारत की निजी कंपनी ‘कल्याणी स्ट्रैटेजिक सिस्टम्स’ (जो भारत फोर्ज की सहायक इकाई है) ने इजरायल मिलिट्री इंडस्ट्रीज को 155 मिलीमीटर आर्टिलरी शेल्स (तोप के गोलों) के लिए लगभग 9,600 बॉडी और केसिंग की आपूर्ति की है। इसके साथ ही, भारत सरकार के स्वामित्व वाली रक्षा उपक्रम ‘म्यूनिशंस इंडिया लिमिटेड’ (MIL) पर 1,000 पूरी तरह से तैयार 155MM के हाई-एक्सप्लोसिव तोप के गोलों को एलबिट सिस्टम्स के जरिए इजरायल भेजने का आरोप लगाया गया है।
छोटे हथियारों के क्षेत्र में रिपोर्ट यह आरोप लगाती है कि अडानी समूह और इजरायल वेपन इंडस्ट्रीज (IWI) के बीच ग्वालियर में स्थापित संयुक्त उद्यम ‘पीएलआर सिस्टम्स’ ने नेगेव लाइट मशीन गन और तवोर असॉल्ट राइफलों के लिए 33,000 से अधिक बोल्ट कैरियर्स और 10,000 से अधिक मैगजीन फीडिंग ट्रे निर्यात किए हैं। इसके अलावा बेंगलुरु स्थित निजी कंपनी ‘इंडो-एमआईएम’ पर इजरायली कंपनी आईडब्ल्यूआई को छोटे हथियारों के 59,000 से अधिक ऑटोमैटिक सीयर्स और ट्रिगर मैकेनिज्म घटकों की आपूर्ति का दावा किया गया है।
एमनेस्टी का कहना है कि इसके अतिरिक्त हैदराबाद स्थित ‘अल्फा एल्सैक’ (जो एलबिट सिस्टम्स के साथ संयुक्त उद्यम है) ने ड्रोन के लिए मिसाइल वारहेड्स और ऑप्टिकल सेंसर्स की आपूर्ति की है, जबकि ‘प्रीमियर एक्सप्लोसिव्स’ ने रॉकेट मोटर्स और सॉलिड प्रोपेलेंट घटकों को निर्यात किया है। सरकारी कंपनी ‘इंडिया ऑप्टेल लिमिटेड’ पर नाइट-विजन और सेमीकंडक्टर पार्ट्स भेजने का आरोप लगाया गया है।
इस तरह से उसका कहना है कि भारतीय कंपनियों ने सैन्य-ग्रेड हथियारों के लिए 3,90,516 से अधिक कलपुर्जे (जैसे राइफल के बोल्ट कैरियर्स, ऑटोमैटिक सीयर्स, ट्रिगर मैकेनिज्म, मैगजीन फीडिंग ट्रे आदि) इजरायल की आईडब्ल्यूआई (IWI) कंपनी को भेजे।
साभार: Amnesty International Report
एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इस रिपोर्ट में इस बात पर फोकस किया है कि भारत से इजरायल भेजे गए सामान का इस्तेमाल गाजा में इजरायली सैन्य अभियानों में हो रहा है, इसलिए भारत अंतरराष्ट्रीय जेनेवा कन्वेंशन के कॉमन आर्टिकल 1 और जेनोसाइड कन्वेंशन के तहत अपनी नैतिक और कानूनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकता।
एमनेस्टी के कानूनी और मानवाधिकार तर्क
जेनोसाइड कन्वेंशन (Genocide Convention): एमनेस्टी का कहना है कि 1948 के नरसंहार रोकथाम समझौते के तहत भारत का यह कानूनी कर्तव्य है कि वह किसी भी ऐसे देश को हथियार न दे जहाँ उनका इस्तेमाल संभावित नरसंहार में हो सकता हो। इसकी आड़ में वो भारत से इजरायल से सभी डिफेंस लिंक तोड़ने के लिए कहा है।
जेनेवा कन्वेंशन (Geneva Conventions): कॉमन आर्टिकल 1 के तहत राज्यों की जिम्मेदारी है कि वे अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का सम्मान करवाएँ।
आर्म्स ट्रेड ट्रीटी (ATT): एमनेस्टी ने इस बात पर जोर दिया कि भारत ने आर्म्स ट्रेड ट्रीटी पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, इसलिए उसे तुरंत इसमें शामिल होना चाहिए। इस ट्रीटी पर दुनिया के 118 देशों ने हस्ताक्षर किए हैं, 25 देशों ने हस्ताक्षर तो किए हैं, लेकिन अभी तक शामिल नहीं हुए हैं। इसमें अमेरिका, UAE, इजरायल, तुर्की, यूक्रेन जैसे देश हैं। वहीं भारत समेत 52 देशों ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। भारत के अलावा इस लिस्ट में पाकिस्तान, रूस, कुवैत, आर्मीनिया, अजरबैजान, ईरान, इराक जैसे देश हैं।
एमनेस्टी इंटरनेशनल को भारत से इतनी परेशानी क्यों है?
एमनेस्टी इंटरनेशनल का भारत की सुरक्षा नीति या अंदरूनी मामलों पर सवाल उठाना कोई नई बात नहीं है। भारत सरकार और इस संगठन के बीच यह तनातनी सालों पुरानी है। इसकी मुख्य वजह भारत के कड़े कानून और विदेशी एनजीओ (NGOs) की भारत के मामलों में दखल देने की आदत है।
विदेशी पैसों के गोलमाल पर कानूनी शिकंजा: सितंबर 2020 में भारत के गृह मंत्रालय और ईडी (ED) ने एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के बैंक खाते बंद (सीज) कर दिए थे। जाँच में पता चला कि विदेशी फंडिंग से जुड़े नियमों (FCRA) से बचने के लिए एमनेस्टी ने गलत रास्ता अपनाया था। उन्होंने ब्रिटेन से ‘बिजनेस में निवेश’ (FDI) के नाम पर करोड़ों रुपए भारत मंगवाए। बाद में इस पैसे का इस्तेमाल एनजीओ के कामों और राजनीतिक अभियानों में किया गया।
जब सरकार ने इस धोखाधड़ी पर कानूनी कार्रवाई की, तो एमनेस्टी ने भारत में अपना काम बंद कर दिया और उल्टा खुद को ही पीड़ित बताने लगा। यही नहीं, वो अब भी कोशिश कर रहा है कि FRCA कानून के तहत NGO लॉबी को छूट मिले।
पश्चिमी देशों की सोच और भारत की आत्मनिर्भरता: पश्चिमी देशों के पैसों से चलने वाले ये अंतरराष्ट्रीय एनजीओ अक्सर भारत जैसे विकासशील देशों की तरक्की और सुरक्षा को गलत नजरिए से देखते हैं।
जब पश्चिमी देश (जैसे अमेरिका, ब्रिटेन या जर्मनी) इजरायल या अन्य युद्धग्रस्त क्षेत्रों को खरबों डॉलर के भारी हथियार, लड़ाकू विमान और बम भेजते हैं, तब एमनेस्टी की रिपोर्टों पर पश्चिमी सरकारें बहुत ध्यान नहीं देतीं। लेकिन जैसे ही भारत जैसा विकासशील देश अपनी रक्षा क्षमता बढ़ाता है और वैश्विक रक्षा बाजार में एक बड़े निर्यातक के रूप में उभरता है, ये संस्थाएँ भारत की संप्रभुता और व्यापार पर सवाल खड़ा करना शुरू कर देती हैं। हालाँकि भारत ने भी बाकी देशों जैसा ही रूख अपनाया है और एमनेस्टी की रिपोर्ट पर अपना साफ जवाब दे दिया है।
भारत के फैसलों का लगातार विरोध: एमनेस्टी इंटरनेशनल ने हमेशा भारत के अहम फैसलों पर एकतरफा रुख अपनाया है, चाहे वो जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाना हो, नागरिकता कानून (CAA) हो या नक्सलवाद के खिलाफ सरकार की कार्रवाई। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने हमेशा भारत विरोधी रुख अपनाया है।
इसलिए जब एमनेस्टी भारत के रक्षा निर्यात (हथियारो के व्यापार) पर सवाल उठाता है, तो यह सिर्फ किसी युद्ध की चिंता नहीं है। यह भारत को आर्थिक और सामरिक रूप से आगे बढ़ने से रोकने की एक सोची-समझी कोशिश लगती है।
यह रिपोर्ट भारत सरकार और PM मोदी की छवि खराब करने की नाकाम कोशिश: मेजर जनरल (रि) आरपीएस भदौरिया
एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए सेंटर फॉर लैंड वारफेयर स्टडीज (CLAWS) के एडीजी (ADG) मेजर जनरल (रिटायर्ड) आरपीएस भदौरिया (VSM) ने इसे भारत को बदनाम करने की एक और साज़िश (conspiracy) करार दिया है। ऑपइंडिया के साथ बातचीत में उन्होंने स्पष्ट किया कि यह पूरी रिपोर्ट वस्तुनिष्ठ विश्लेषण से परे है और इसका मुख्य उद्देश्य भारत सरकार तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धूमिल करना है।
मेजर जनरल भदौरिया ने कहा, “यह रिपोर्ट भारत सरकार को बदनाम करने और पीएम मोदी की छवि को नुकसान पहुँचाने का एक प्रयास है। हालाँकि यह भारत विरोधी नैरेटिव (Narrative) भी पहले की तरह पूरी तरह से विफल होगा, क्योंकि भारत की जनता अब इन दुर्भावनापूर्ण मंसूबों को अच्छी तरह समझ चुकी है।” उन्होंने कहा कि एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी संस्थाएँ लंबे समय से भारत के सुरक्षा मामलों और रक्षा नीति पर इस तरह की पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग करती आई हैं। ये भी उसी कड़ी का एक हिस्सा भर है।
एमनेस्टी की रिपोर्ट पर भारत ने क्या जवाब दिया, ये काफी अहम
इसराइल को हथियारों के एक्सपोर्ट पर एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट को लेकर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल से अगले ही दिन यानी 31 जुलाई 2026 को नियमित प्रेस ब्रीफिंग में सवाल पूछा गया। उन्होंने भारत सरकार की तरफ से आधिकारिक प्रतिक्रिया दी। रणधीर जायसवाल ने कहा, “भारत के पास स्ट्रेटेजिक ट्रेड कंट्रोल पर एक मजबूत कानूनी और रेगुलेटरी फ्रेमवर्क है और वह अपने राष्ट्रीय क़ानूनों और अपनी अंतरराष्ट्रीय ज़िम्मेदारियों के मुताबिक़ अलग-अलग देशों को डुअल-यूज़ आइटम और टेक्नोलॉजी का एक्सपोर्ट करता है।”
#WATCH | Delhi: On Amnesty Report, MEA Spokesperson Randhir Jaiswal says, "India has a robust legal and regulatory framework on strategic trade controls and carries out its export of dual-use items and technologies to various countries in accordance with its national laws and… pic.twitter.com/LwMctZK2M4
इस पूरे मुद्दे पर भारत का आधिकारिक दृष्टिकोण और अंतरराष्ट्रीय रक्षा व्यापार के जमीनी नियम बिल्कुल स्पष्ट हैं।
सामान की खरीद और बिक्री की सीमाएँ: रक्षा व्यापार का सबसे बुनियादी और स्थापित अंतरराष्ट्रीय नियम यह है कि हथियार बेचने वाला देश (Seller) केवल समझौते के तहत माल की आपूर्ति करता है। वह खरीदार देश (Buyer) की अपनी सेना या युद्ध नीतियों पर दबाव नहीं बना सकता, अलबत्ता वो अमेरिका जैसा देश न हो और पाकिस्तान जैसा खरीददार न हो।
दरअसल, जब दो संप्रभु देश रक्षा सामग्री या कलपुर्जों का व्यापार करते हैं, तो उस सामग्री का अंतिम उपयोग (End Use) खरीदार देश अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा जरूरतों, रक्षा रणनीतियों और युद्ध परिस्थितियों के अनुसार तय करता है। भारत किसी देश के आंतरिक सैन्य अभियानों का माइक्रो मैनेजमेंट नहीं कर सकता यानि अगर दुनिया का कोई भी देश दूसरे देश से कोई रक्षा उपकरण खरीदता है, तो बेचने वाला देश उसके बाद यह तय नहीं कर सकता कि उस हथियार का ट्रिगर कहाँ दबेगा। व्यापार की सीमाएँ खरीद, गुणवत्ता और डिलीवरी तक ही सीमित होती हैं।
भारत-इजरायल के संबंध: जहाँ तक भारत और इजरायल के संबंधों का प्रश्न है, दोनों देशों के बीच 1992 से पूर्ण राजनयिक संबंध हैं और दोनों के संबंध किसी तीसरे देश के खिलाफ नहीं बल्कि पारस्परिक सुरक्षा आवश्यकताओं पर आधारित हैं।
दुनिया को ये नहीं भूलना चाहिए कि जब साल 1999 के कारगिल युद्ध के कठिन समय में जब भारतीय सेना को द्रास और बटालिक की चोटियों पर छिपे घुसपैठियों को हटाने के लिए लेजर-गाइडेड बमों, सटीक मोर्टार और गोला-बारूद की सख्त जरूरत थी, तब कई पश्चिमी देशों ने भारत को आपूर्ति देने से मना कर दिया था। उस समय इजरायल ने भारत को तत्काल आवश्यक रक्षा सामग्री उपलब्ध कराई थी।
आज भारत और इजरायल केवल खरीदार और विक्रेता नहीं हैं। दोनों देश बराक-8 वायु रक्षा मिसाइल प्रणाली, हर्मीस 900 मध्यम-ऊँचाई वाले ड्रोन और एडवांस्ड रडार प्रणालियों का सह-विकास और संयुक्त विनिर्माण करते हैं। इन संयुक्त उपक्रमों के तहत भारतीय कारखानों में बनने वाले कलपुर्जे इजरायली प्रणालियों में असेंबल होने के लिए जाते हैं, जो सालों पुराने वैध द्विपक्षीय समझौतों का परिणाम हैं। किसी चालू युद्ध के कारण भारत अपने लंबे समय से चले आ रहे रणनीतिक और औद्योगिक समझौतों को अचानक नहीं तोड़ सकता। ऐसा भारत ही नहीं, दुनिया का कोई भी देश नहीं कर सकता, जबकि वो अभी अपने पैरों पर खड़ा हो रहा हो।
‘आत्मनिर्भर भारत’ से पश्चिमी इकोसिस्टम और एनजीओ को चिंता क्यों?
भारत ने पिछले एक दशक में रक्षा क्षेत्र में जो बदलाव देखे हैं, वे अभूतपूर्व हैं। कभी दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक (Importer) रहने वाला भारत आज एक प्रमुख रक्षा निर्यातक (Exporter) बनने की राह पर है।
भारत का रक्षा निर्यात का रिकॉर्ड: वित्तीय वर्ष 2024-2025 में भारत का डिफेंस एक्सपोर्ट ₹23,622 करोड़ (लगभग 2.84 बिलियन डॉलर) के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुँचा तो वहीं 2025-2026 में भारत का डिफेंस एक्सपोर्ट 62.66% बढ़कर ₹38,424 करोड़ तक पहुँच गया है।
इस एक साल में भारत का डिफेंस एक्सपोर्ट ₹14,802 करोड़ तक बढ़ा, जबकि 2021-22 ये कुल आँकड़ा ही महज ₹12814 करोड़ ही था। यानी भारत ने एक साल में जितनी बढ़त हासिल की, 5 साल पहले उससे भी कम हथियार वो बेचता था। ये भारत सरकार की आत्मनिर्भरता बड़ी मिशाल है।
Under the inspiring leadership of PM Shri @narendramodi, India is scripting an impressive defence exports success story!
India defence exports have touched a new all time high with a record ₹38,424 crore in FY 2025-26. It marks a robust 62.66% growth over the previous fiscal.… pic.twitter.com/eAAh1PYX7e
बीते एक दशक में भारत सरकार ने रक्षा क्षेत्र में ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ अभियानों के तहत व्यापक संरचनात्मक सुधार किए हैं। कभी दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश भारत आज अपनी जरूरतों को खुद पूरा करने के साथ-साथ डिफेंस सेक्टर में निर्यात कर रहा है।
भारत आज सिर्फ हथियारों के कलपुर्जे ही नहीं, बल्कि पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर, ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलें, तेजस लड़ाकू विमान के पार्ट्स, 155 मिलीमीटर एडवांस्ड टौड आर्टिलरी गन (ATAGS), डोर्नियर विमान और आधुनिक गश्ती पोत निर्यात कर रहा है।
पश्चिमी एनजीओ और इकोसिस्टम को चिंता क्यों है?
पश्चिमी रक्षा उद्योग के एकाधिकार को चुनौती: वैश्विक रक्षा बाजार में हमेशा से अमेरिका, फ्रांस, रूस और यूरोपीय देशों का दबदबा रहा है। भारत का एक बड़े रक्षा विनिर्माता के रूप में उभरना पश्चिमी रक्षा लॉबी और उनकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए आर्थिक खतरा है।
ग्लोबल साउथ (Global South) के लिए नया विकल्प: अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और लैटिन अमेरिका के देश अब महँगे पश्चिमी हथियारों के बजाय भारत से सस्ते, टिकाऊ और उच्च गुणवत्ता वाले हथियार खरीद रहे हैं।
रणनीतिक ब्लैकमेलिंग का अंत: जब भारत पूरी तरह आयात पर निर्भर था, तब पश्चिमी देश मानवाधिकारों या नीतियों का हवाला देकर भारत को हथियार देने या पुर्जे भेजने से रोक देते थे। अब जब ‘आत्मनिर्भर भारत’ के अपने कारखाने घरेलू और वैश्विक माँग को पूरा करने में सक्षम हो गए हैं, तो पश्चिमी शक्तियों का वह पुराना दबावकारी तंत्र बेकार साबित हो रहा है यानी भारत ने इस रणनीतिक ब्लैकमेलिंग को खत्म कर दिया है।
इसीलिए एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी संस्थाएँ भारत की इस बढ़ती ‘आत्मनिर्भरता’ को एक ‘चिंताजनक स्थिति’ या ‘अंतरराष्ट्रीय अपराधों में संलिप्तता’ के रूप में दिखाना चाहती हैं, ताकि भारतीय रक्षा कंपनियों पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का दबाव बनाया जा सके।
एस. जयशंकर खोल चुके हैं पश्चिमी देशों के दोहरे रवैये की पोल
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जब भी पश्चिमी देशों या उनके इकोसिस्टम ने भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और रक्षा-ऊर्जा प्राथमिकताओं पर उंगली उठाई है, भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने उसका करारा जवाब दिया।
यूरोप दौरे के दौरान जब पश्चिमी मीडिया और राजनेताओं ने रूस से तेल और हथियार खरीदने पर भारत को घेरने की कोशिश की, तो जयशंकर ने पश्चिमी दोहरे मापदंडों (Double Standards) को बेनकाब करते हुए ऐतिहासिक बयान दिया, “यूरोप की यह मानसिकता रही है कि यूरोप की समस्याएँ दुनिया की समस्याएँ हैं, लेकिन दुनिया की समस्याएँ यूरोप की समस्याएँ नहीं हैं। यूरोप खुद रूस से भारी मात्रा में ऊर्जा, गैस और उर्वरक खरीद रहा है, लेकिन जब भारत अपनी 1.4 अरब आबादी की ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूस से रियायती दर पर तेल खरीदता है, तो हमें उपदेश दिए जाते हैं। यूरोप को अपने यह दोहरे मापदंड तुरंत बंद करने चाहिए।”
विदेश मंत्री का यह बयान रक्षा व्यापार के क्षेत्र में भी उतना ही सटीक बैठता है। जो यूरोपीय देश और पश्चिमी मानवाधिकार संगठन भारत पर इजरायल को कलपुर्जे बेचने के लिए सवाल उठा रहे हैं, वे इस बात को पूरी तरह नजरअंदाज कर देते हैं कि खुद पश्चिमी देश इजरायल के सैन्य तंत्र की रीढ़ बने हुए हैं। इसके बावजूद वो भारत जैसे विकासशील देशों से यह अपेक्षा करते हैं कि वे अपने राष्ट्रीय हितों और वैध द्विपक्षीय समझौतों को उनके निर्देशों पर कुर्बान कर दें।
डॉ. जयशंकर के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत का हर कदम ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) और अपने राष्ट्रीय हितों से संचालित होगा, न कि किसी पश्चिमी देश या एनजीओ की दी गई सीख से।
हालाँकि एमनेस्टी ने गाजा युद्ध और इजरायल से जुड़ी ऐसी ही रिपोर्ट्स अमेरिका (अप्रैल 2024), स्लोवेनिया (अगस्त 2025), जर्मनी (नवंबर 2025) और फ्रांस (अक्टूबर 2025) पर भी जारी की थी।
इजरायल को हथियार देने वाले प्रमुख देशों में भारत बहुत पीछे
एमनेस्टी की रिपोर्ट भारत पर ध्यान केंद्रित करती है, लेकिन असली आँकड़ों को देखने पर सच्चाई कुछ और ही निकलकर सामने आती है। इजरायल के कुल हथियार आयात में भारत का हिस्सा 1% से भी कम है। इजरायल को रक्षा सामग्री और भारी हथियारों की आपूर्ति करने वाले असली और बड़े खिलाड़ियों के बारे में तो पूरी दुनिया को पता है।
संयुक्त राज्य अमेरिका (USA): इजरायल के कुल प्रमुख हथियार आयात का लगभग 69% हिस्सा अकेले अमेरिका से आता है। अमेरिका इजरायल को F-35 लाइटनिंग II स्टेल्थ लड़ाकू विमान, F-15I और F-16I स्ट्राइक फाइटर जेट्स, गाइडेड मिसाइलें, MK-84 2,000-पाउंड भारी विनाशकारी बम, और जेडीएएम (JDAM) प्रिसिजन किट्स की आपूर्ति करता है। इसके अलावा, अमेरिका हर साल इजरायल को लगभग 3.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर की सीधी विदेशी सैन्य सहायता (FMF) प्रदान करता है।
जर्मनी (Germany): इजरायल के प्रमुख हथियारों के कुल आयात में जर्मनी की हिस्सेदारी लगभग 30% है। जर्मनी इजरायल की नौसेना को अत्याधुनिक ‘डॉल्फ़िन’ श्रेणी की डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां (जो परमाणु मिसाइलें ले जाने में सक्षम हैं), Saar 6-श्रेणी के कोरवेट युद्धपोत, और इजरायल के मुख्य युद्धक टैंक ‘मरकावा’ के लिए शक्तिशाली डीजल इंजन और ट्रांसमिशन सिस्टम की आपूर्ति करता है।
इटली, ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देश: इजरायल के शेष 1% हथियार आयात में इटली (जो नौसैनिक तोपों और प्रशिक्षण विमानों के पुर्जे देता है), ब्रिटेन, फ्रांस, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। ब्रिटेन F-35 लड़ाकू विमानों के कलपुर्जों, रडार और एवियोनिक्स सिस्टम के निर्माण में सीधे शामिल है।
सिपरी के डाटा पर आधारित (फोटो साभार : AI ChatGPT)
इन आँकड़ों को देखने के बाद ये साफ हो जाता है कि जो पश्चिमी देश 99% भारी और विनाशकारी हथियार इजरायल को भेज रहे हैं, उनके ही एनजीओ भारत द्वारा भेजे जा रहे कुछ हजार बोल्ट कैरियर्स, केसिंग और अन्य कलपुर्जों को बड़ा मुद्दा बनाकर वैश्विक मंच पर भारत की घेराबंदी करने की कोशिश कर रहे हैं।
सिपरी (SIPRI) की रिपोर्ट पर भी ध्यान देना जरूरी
स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में स्थित ‘स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट’ (SIPRI) दुनिया भर में हथियारों के हस्तांतरण, सैन्य खर्च और निरस्त्रीकरण का सबसे विश्वसनीय और वैज्ञानिक डेटा एकत्र करने वाली संस्था मानी जाती है। सिपरी की लेटेस्ट सालाना रिपोर्ट ‘ट्रेंड्स इन इंटरनेशनल आर्म्स ट्रांसफर्स‘ का गहरा विश्लेषण कर वैश्विक रक्षा व्यापार के असली आँकड़ों और भारत की स्थिति को निष्पक्ष रहकर समझा जा सकता है-
ट्रेंड्स इन इंटरनेशनल आर्म्स ट्रांसफर्स के आँकड़े: सिपरी के आँकड़ों के मुताबिक, दुनिया भर में होने वाले कुल हथियार निर्यात का 75% से अधिक हिस्सा केवल 5 प्रमुख देशों के नियंत्रण में है। अमेरिका 42% वैश्विक शेयर के साथ शीर्ष पर है, जिसके बाद फ्रांस (11%), रूस (11%), चीन (5.8%) और जर्मनी (5.6%) का स्थान है।
सिपरी के डाटा पर आधारित (फोटो साभार : AI ChatGPT)
इजरायल के हथियारों की खरीद पर सिपरी का डेटा: सिपरी के डेटाबेस के अनुसार, इजरायल द्वारा खरीदे जाने वाले ‘प्रमुख पारंपरिक हथियारों’ (Major Conventional Weapons) जैसे लड़ाकू विमान, नौसैनिक जहाज, टैंक, वायु रक्षा प्रणालियाँ और भारी तोपखाने में भारत की हिस्सेदारी नगण्य यानी शून्य दर्ज की गई है। सिपरी स्पष्ट रूप से दर्ज करता है कि इजरायल के 99% बड़े हथियार अमेरिका (69%) और जर्मनी (30%) से आते हैं। इसका ग्राफ ऊपर दिया जा चुका है।
इसके अलावा भारत द्वारा किए जाने वाले रक्षा निर्यात को सिपरी की परिभाषा के तहत मुख्य हथियारों की श्रेणी में नहीं रखा जाता, क्योंकि भारत प्राथमिक रूप से कंपोनेंट, सब-असेंबली, और कच्ची सामग्री (Raw Material Casings) की आपूर्ति करता है, जो द्विपक्षीय औद्योगिक समझौतों का हिस्सा हैं।
सिपरी रिपोर्ट से क्या पता चलता है?: सिपरी के आँकड़े साबित करते हैं कि वैश्विक हथियार व्यापार कुछ चुनिंदा शक्तिशाली देशों के हाथों में केंद्रित है। युद्ध और संघर्ष के क्षेत्रों में सबसे ज्यादा हथियार पश्चिमी देशों से आते हैं। भारत अभी इस बाजार में एक नया और तेजी से उभरता हुआ खिलाड़ी है, जिसकी प्राथमिकता अपनी रक्षा जरूरतों को पूरा करना और मित्र देशों को सुरक्षा उपकरण मुहैया कराना है।
रक्षा विशेषक्ष मे.ज.(रि) दुष्यंत सिंह ने एमनेस्टी की रिपोर्ट को किया खारिज, बताया पूर्वाग्रह से ग्रसित
सेंटर फॉर लैंड वारफेयर स्टडीज (CLAWS) के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) दुष्यंत सिंह (PVSM, AVSM) ने एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट को सिरे से खारिज करते हुए इसे संगठन के पुराने पूर्वाग्रह का हिस्सा करार दिया है। ऑपइंडिया के एसोसिएट एडिटर श्रवण शुक्ला से विशेष बातचीत में उन्होंने स्पष्ट किया कि एमनेस्टी हमेशा से भारत-विरोधी रुख अपनाता रहा है। चाहे जम्मू-कश्मीर की स्थिति हो या पूर्वोत्तर का क्षेत्र, संगठन सुरक्षा बलों पर होने वाले हमलों और उनके सामने मौजूद चुनौतियों को नजरअंदाज कर केवल एकतरफा रिपोर्टिंग करता आया है।
लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) दुष्यंत सिंह(पीवीएसएम, एवीएसएम)
इजरायल के साथ भारत के रक्षा संबंधों पर बात करते हुए लेफ्टिनेंट जनरल सिंह ने कहा कि साल 1992 में पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित होने के बाद से दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय सहयोग लगातार मजबूत हुआ है। भारत अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक जरूरतों के लिए रक्षा उपकरण प्राप्त करता है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय नियमों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि रक्षा व्यापार पूर्णतः वैध समझौतों के तहत होता है। किसी भी उपकरण या पार्ट का ‘एंड यूज़’ (अंतिम उपयोग) क्या और कैसे होगा, इसकी जिम्मेदारी खरीदने वाले देश की होती है, न कि निर्यात करने वाले देश की। भारत में निर्मित या निर्यात होने वाले कलपुर्जे और डुअल-यूज़ (दोहरे उपयोग वाली) तकनीक अंतरराष्ट्रीय कानूनों के दायरे में ही स्थानांतरित होती है।
गाजा युद्ध के संदर्भ में भारत पर उठ रहे सवालों को खारिज करते हुए उन्होंने अमेरिका और पश्चिमी देशों के आँकड़ों का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि इजरायल को सैन्य सहायता देने में मुख्य भूमिका अमेरिका की है। अमेरिका अभी के समय में इजरायल को $6.6 अरब डॉलर का सैन्य पैकेज दे रहा है, जिसमें $3.8 अरब डॉलर के 30 अपाचे अटैक हेलीकॉप्टर, F-15 लड़ाकू विमान, असॉल्ट वाहन और अन्य आधुनिक हथियार शामिल हैं। इसके अलावा अरबों डॉलर की विदेशी सैन्य बिक्री (FMS) और सैन्य सहायता ग्रान्ट अमेरिका द्वारा दी जाती है।
इसके विपरीत इजरायल को होने वाली कुल रक्षा आपूर्ति में भारत की हिस्सेदारी एक प्रतिशत से भी कम है और वह मुख्य रूप से कंपोनेंट तथा डुअल-यूज इलेक्ट्रॉनिक्स तक सीमित है।
लेफ्टिनेंट जनरल (रि) दुष्यंत सिंह ने कहा कि भारत की विदेश नीति पूरी तरह स्वतंत्र और रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित है। भारत के संबंध इजरायल, फिलिस्तीन, अमेरिका, रूस और ईरान सभी के साथ स्वतंत्र औरअपने राष्ट्रीय हितों के अनुकूल हैं। भारत हमेशा से वैश्विक शांति और संवाद के जरिए विवादों के समाधान का समर्थक रहा है। ऐसे में एमनेस्टी की रिपोर्ट वस्तुनिष्ठ विश्लेषण न होकर महज एक पूर्वनिर्धारित नैरेटिव गढ़ने का प्रयास है।
एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट सिर्फ नरेटिव वॉर का हिस्सा
एमनेस्टी की रिपोर्ट को अगर तटस्थ नजरिए से देखें, तो मानवाधिकारों की चिंता करना किसी भी अंतरराष्ट्रीय संस्था का काम हो सकता है। लेकिन जब यह चिंता चुनिंदा (selective) हो जाती है, तो उस संगठन की साख पर सवाल उठना लाजमी है।
चूँकि भारत एक संप्रभु राष्ट्र है और अपने रणनीतिक हितों के आधार पर किसी भी देश के साथ रक्षा व्यापार करने के लिए स्वतंत्र है, जब तक कि वह संयुक्त राष्ट्र के आधिकारिक प्रतिबंधों का उल्लंघन न कर रहा हो (और इजराइल पर यूएन का कोई हथियार प्रतिबंध नहीं है)।
ऐसे में पक्षपात भरे निगेटिव नैरेटिव से सिर्फ भारत के छोटे से एक्सपोर्ट हिस्से को लेकर बड़ा विवाद खड़ा करना और उन देशों पर नरमी बरतना जो इजराइल को 95% से ज्यादा आक्रामक हथियार दे रहे हैं, एमनेस्टी के पूर्वाग्रह को दर्शाता है।
बहरहाल, भारत की स्पष्ट नीति रही है कि भारत ने न तो कभी युद्ध का समर्थन किया है और न ही वह किसी मानवीय त्रासदी का पक्षधर है। भारत अपनी रक्षा कूटनीति, राष्ट्रीय हित और मानवाधिकार सहायता के बीच संतुलन बनाना अच्छी तरह जानता है।
यहाँ ये भी बताना अहम है कि वैश्विक राजनीति में जब कोई देश ‘आत्मनिर्भर’ और मजबूत बनता है, तो उस पर अंतरराष्ट्रीय दबाव और नैरेटिव वॉर (Narrative War) के हमले बढ़ते हैं। ऐसे में एमनेस्टी की यह रिपोर्ट भी उसी भू-राजनीतिक (Geopolitics) खींचतान का एक हिस्सा नजर आती है।