Tuesday, September 29, 2020
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ड्रग्स सिंडिकेट की एक्टिव मेंबर… तस्करी, डिलीवरी से लेकर घर में स्टोरेज तक: रिया के खिलाफ कोर्ट में NCB

ड्रग्स मामले में गिरफ्तार हुई रिया चक्रवर्ती की जमानत याचिका पर आज (सितंबर 29, 2020) बॉम्बे हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। इस दौरान एनसीबी ने भी हाईकोर्ट में अपना हलफनामा पेश किया।

एनसीबी ने रिया की जमानत याचिका का विरोध करते हुए कहा कि रिया चक्रवर्ती ने ही सुशांत के लिए ड्रग्स खरीदे। साथ ही हलफनामे में यह साफ कहा गया कि रिया और उनके भाई शौविक चक्रवर्ती ड्रग सिंडिकेट के एक्टिव मेंबर हैं।

जानकारी के मुताबिक, इस हलफनामे में एनसीबी ने बताया कि अभिनेत्री के वॉट्सऐप चैट, मोबाइल, लैपटॉप और हार्ड डिस्क से निकाले गए रिकॉर्ड बताते हैं कि वह ना केवल लगातार इसका सौदा करती थीं, बल्कि इस अवैध कारोबार को फाइनेंस भी करती थीं।

एजेंसी ने कोर्ट में रिया की याचिका पर कहा, “यदि पूरे परिदृश्य को देखें तो मौजूदा आवदेक (रिया चक्रवर्ती) ने यह जानते हुए कि सुशांत सिंह राजपूत ड्रग्स ले रहे हैं, उन्होंने इसे प्रश्रय दिया। मौजूदा आवेदक ने उपने घर में ड्रग्स को स्टोर किया और सुशांत सिंह राजपूत को भी देती रहीं।”

एनसीबी का दावा है कि उनके पास रिया के ख़िलाफ़ पर्याप्त सबूत हैं, जिनसे साबित होता है कि अभिनेत्री ड्रग तस्करी में शामिल थीं और ड्रग की डिलीवरी करती थीं। इसके अलावा वह ड्रग के लिए पेमेंट भी क्रेडिट कार्ड, कैश और पेमेंट गेटवे के जरिए करती थीं।

रिया और शौविक पर मामला दर्ज

बता दें कि एजेंसी ने कुछ समय पहले एनडीपीएस की धारा 27ए के कहत रिया के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया था। इसके बाद रिया और उनके भाई ने इस मामले में उपरोक्त धारा लगाने का विरोध किया।

वहीं, उनके वकील सतीष मनशिंगे ने दलील पेश की कि उनके मुवक्किल के मामले में यह धाराएँ नहीं लगाई जा सकतीं, क्योंकि उन्होंने कभी-कभार ही मादक पदार्थ खरीदे और उनका सेवन भी सुशांत सिंह राजपूत ने ही किया।

मानशिंदे का कहना था कि एनसीबी ने इस मामले में अब तक केवल 59 ग्राम मादक पदार्थ बरामद किए हैं और यह मात्रा इतनी नहीं है कि माना जा सके कि मादक पदार्थों का कारोबार चल रहा था।

गौरतलब है कि एक ओर जहाँ रिया के वकील की दलीलें हैं, वहीं दूसरी ओर एनसीबी का हलफनामा है। इसमें यह बात साफ लिखी है कि रिया हाई सोसायटी पर्सनैलिटी के लिए ड्रग डिलीवरी से जुड़ी थीं और वह ड्रग सिंडिकेट की एक सक्रिय सदस्य हैं। उन्हें इसी केस में एनसीबी ने पिछले दिनों गिरफ्तार किया था और मुंबई की भायखला जेल में रखा हुआ था। उनकी न्यायिक हिरासत की अवधि 6 अक्टूबर को पूरी होगी।

RSS से जुड़े ब्राह्मण ने दिया था अंग्रेजों का साथ, एक मुस्लिम वकील लड़ा था भगत सिंह के पक्ष में – Fact Check

शहीद भगत सिंह को लेकर वामपंथियों और कॉन्ग्रेस आईटी सेल द्वारा कई तरह के फर्जी दावे, दुष्प्रचार और फेक न्यूज़ कई मौकों पर फैलाई गई हैं। इस बार यह दिन शहीद भगत सिंह की जयंती का तय किया गया और इसी बहाने भगत सिंह और आरएसएस को लेकर कुछ फेक न्यूज़ चलाई गईं।

‘RSS के ब्राह्मण ने अंग्रेजों के साथ मिलकर भगत सिंह को दिलाई थी फाँसी’

सोशल मीडिया से लेकर व्हाट्सएप ग्रुप्स तक में कई ग्राफिक पोस्टर्स और ‘फ़ॉर्वर्डेड’ संदेशों में यह दावा किया जाता है कि भगत सिंह को फ़ाँसी दिलाने के लिए अंग्रेजों की ओर से जिस ‘ब्राह्मण’ वकील ने मुकदमा लड़ा था, उनका नाम राय बहादुर सूर्यनारायण शर्मा था और वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक हेडगेवार के घनिष्ट मित्र और आरएसएस के सदस्य भी थे।

‘ब्राह्मण’ राय बहादुर सूर्यनारायण सिंह के नाम पर ट्विटर पर यह संदेश कई लोगों ने बड़े स्तर पर शेयर किया है। इन संदेशों का पहला उद्देश्य यह साबित करना है कि सरदार भगत सिंह का केस एक ‘मुस्लिम’ वकील ने लड़ा था, जबकि एक ब्राह्मण वकील, आरएसएस से जुड़ा व्यक्ति, कथित तौर पर ब्रिटिश सरकार की ओर से यह केस लड़ रहा था और भगत सिंह को फाँसी दिलाना चाहता था।

इन दावों को इन स्क्रीनशॉट्स में देख सकते हैं –

व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ भी झूठे दावों के पोस्टर्स से भरी हुई हैं

क्या है वास्तविकता

इन तमाम संदेशों में पहला झूठ और भ्रामक दावा सरदार भगत सिंह के वकील को लेकर किया गया है। वास्तव में आसिफ अली ने सरदार भगत सिंह नहीं बल्कि बटुकेश्वर दत्त के वकील की भूमिका निभाई थी। जबकि सरदार भगत सिंह ने अपना केस एक कानूनी सलाहकार की मदद से स्वयं ही लड़ा था।

भगत सिंह द्वारा लिखी गई और 1929-1930 की अवधि के दौरान जेल अधिकारियों या विशेष न्यायाधिकरण या पंजाब उच्च न्यायालय को भेजे गए पत्रों और याचिकाओं में, भगत सिंह ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के मुकदमों के दौरान अभियुक्तों को किसी भी बचाव से इनकार करते हुए उन्हें फ़ाँसी देने की माँग की थी।

सरदार भगत सिंह पर कई किताबें लिखने वाले प्रोफेसर मालविंदरजीत सिंह वारिच ने भी इस दावे का खंडन करते हुए कहा था कि सत्यनारायण शर्मा नाम का कोई वकील भगत सिंह के खिलाफ अंग्रेजों के लिए पेश नहीं हुआ था।

क्विंट में प्रकाशित रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

‘अंडरस्टैंडिंग भगत सिंह’ और ‘भगत सिंह और उनके साथियां के दस्तावेज़’ लिखने वाले जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर चमन लाल ने भी इस बात को स्पष्ट रूप से लिखा है कि भगत सिंह के मामले में अंग्रेजों की ओर से कोई भी भारतीय काउंसल नहीं थे और यह एक झूठा दावा है, जो लम्बे समय से चला आ रहा है।

उल्लेखनीय है कि सरदार भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने अप्रैल 08, 1929 को अपना विरोध प्रकट करने के लिए केंद्रीय विधान सभा में बम फेंका था। उन्होंने अपनी माँगों को स्पष्ट करने के लिए कुछ हस्तलिखित पत्र भी फेंके थे।

यह एक कम तीव्रता वाला बम था, जो विधान सभा के किसी भी सदस्य को मारने या चोट पहुँचाने के लिए नहीं था। जैसे ही विस्फोट हुआ, भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त वहाँ खड़े हो गए और बाद में खुद पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।

निष्कर्ष

आसिफ अली ने नहीं बल्कि, भगत सिंह ने अपना केस स्वयं ही एक कानूनी सलाहकार की मदद से मिलकर लड़ा था। आसिफ अली बटुलेश्वर दत्त के वकील थे। भगत सिंह के खिलाफ भारत का कोई भी व्यक्ति ब्रिटिश सरकार की ओर से वकील नहीं था और ‘ब्राह्मण, आरएसएस वाले सत्यनारायण शर्मा’ का भगत सिंह के खिलाफ केस लड़ना झूठा दावा है।

अनुराग कश्यप रेप मामले में बुरे फँसे, भूख हड़ताल की धमकी के बाद मुंबई पुलिस जल्द भेजेगी समन

मुंबई पुलिस जल्द ही बॉलीवुड निर्देशक अनुराग कश्यप को पूछताछ के लिए समन भेजेगी। अनुराग कश्यप पर अभिनेत्री पायल घोष ने बलात्कार का आरोप लगाया है। पायल घोष ने अनुराग कश्यप के खिलाफ मुंबई के वर्सोवा पुलिस थाने में यौन शोषण और रेप का केस दर्ज कराया है। 

अनुराग कश्यप के खिलाफ आईपीसी की धारा 376, 354, 341 और 342 के तहत एफआईआर दर्ज है, लेकिन इस पर अभी तक मुंबई पुलिस की तरफ से कोई एक्शन नहीं लिया गया है। जिस पर पायल ने कई मौकों पर नाराजगी भी जताई है। पायल का ये भी कहना है कि अगर जल्द ही अनुराग कश्यप की गिरफ्तारी नहीं हुई तो वे भूख हड़ताल पर चली जाएँगी।

पायल घोष की लड़ाई में केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले आवाज उठा रहे हैं। अठावले ने मुंबई पुलिस से अनुराग कश्यप को गिरफ्तार करने की माँग की है। उन्हेंने कहा कि अगर मुंबई पुलिस जल्द ही अनुराग कश्यप को गिरफ्तार नहीं करती वो धरने पर बैठेंगे।

सोमवार (सितंबर 28, 2020) को RPI नेता रामदास अठावले और पायल घोष के बीच मुलाकात हुई। इसके बाद दोनों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। रामदास अठावले ने पायल का समर्थन करते हुए कहा था कि वे इस मामले में केंद्रीय मंत्री अमित शाह को लेटर लिखेंगे। रामदास अठावले ने पायल घोष की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी ली है। 

अभिनेत्री ने पिछले हफ्ते फिल्मकार अनुराग कश्यप के खिलाफ वसोर्वा पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज कराई है। एफआईआर में कश्यप के खिलाफ आरोपों में दुष्कर्म, गलत इरादे से रोकने और महिला का अपमान करना शामिल है। आरोप है कि 2014 में उनके साथ यौन शोषण का प्रयास किया गया। हालाँकि अनुराग ने अपने ऊपर लगाए गए आरोपों का खंडन किया है।

गौरतलब है कि पायल घोष ने कहा था, “मैं अनुराग से बात करने के अगले दिन उनसे मिलने गई। वह शराब पी रहा था। मिलने के बाद वह मुझे दूसरे कमरे में ले गया। वहाँ उसने अपनी ज़िप खोली और मेरी सलवार कमीज खोलकर मेरी योनि (vagina) के अंदर अपने c**k (penis) को जबरदस्ती डालने की कोशिश की।

उन्होंने मुझसे इस तरह बात की जैसे फिल्म इंडस्ट्री में शारीरिक संबंध बनाना गलत नहीं था। उन्होंने कहा कि हुमा कुरैशी, ऋचा चड्डा और मही गिल जैसी अभिनेत्रियाँ हमेशा उनसे फोन पर संपर्क में रहती हैं।” आगे अनुराग कश्यप, पायल घोष से कहता है, “जब भी मैं उन्हें बुलाता हूँ, वह दौड़कर आती है और मेरा c**k (penis) चूसती हैं।”

इसके बाद पायल घोष ने मीडिया के साथ आपबीती साझा करते हुए बताया था कि अनुराग कश्यप ने उन्हें आपत्तिजनक वीड‍ियो दिखाए थे। साथ ही उन्होंने दावा किया कि अनुराग के 200 से अधिक लड़कियों से संबंध थे और अब यह संख्या 500 से ज्यादा हो सकती है।

15 अक्टूबर को वृन्दावन पहुँच रहे सभी 13 अखाड़ों के संत: मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि की मुक्ति आंदोलन पर होगा फैसला

मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि की लड़ाई की शुरुआत हो चुकी है और अब ये और तेज़ होने वाली है। कम से कम ‘अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद’ की सक्रियता को देख कर तो ऐसा ही लगता है। वृन्दावन में इसके लिए 15 अक्टूबर को सभी 13 अखाड़ों की बैठक बुलाई गई है। कोर्ट में श्री कृष्ण जन्मभूमि की मुक्ति और शाही ईदगाह मस्जिद को हटाने के लिए जो याचिका दायर हुई है, उस मामले में अखाड़ा परिषद पक्षकार बनेगा या नहीं – इस पर निर्णय लिया जाएगा।

‘अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद’ के अध्यक्ष महेंद्र गिरी ने कहा कि अखाड़ा परिषद आज से नहीं, बल्कि काफी पहले से ही भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि की मुक्ति और वहाँ औरंगजेब द्वारा बनवाए गए शाही ईदगाह मस्जिद को हटाए जाने की माँग करती आ रही है। उन्होंने कहा कि अखाड़ा परिषद इस मामले में कोर्ट में पक्षकार बनेगा या नहीं, इसका निर्णय 15 अक्टूबर को होने वाली बैठक में ही लिया जाएगा।

अखाड़ा परिषद के सभी पदाधिकारी वृन्दावन में सिर्फ बैठक के लिए ही नहीं आ रहे हैं, बल्कि वो सभी मथुरा श्रीकृष्ण जन्मभूमि का भ्रमण भी करेंगे और पूरी स्थिति की समीक्षा करेंगे। बकौल महेंद्र गिरी, न सिर्फ मथुरा बल्कि काशी में स्थित भगवान विश्वनाथ के स्थल को भी मुक्त कर ज्ञानवापी मस्जिद हटाए जाने के लिए अखाड़ा परिषद काफी पहले से अभियान चलाता आ रहा है। अब सभी की नजरें इस बैठक पर टिकी हैं।

उधर मथुरा पर हिन्दुओं की सक्रियता को देखते हुए भड़के हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने पूछा है कि श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ और शाही ईदगाह ट्रस्ट के बीच विवाद का जब वर्ष 1968 में फैसला हो गया था तो इसे फिर से दोबारा जीवित करने की क्या जरूरत है? उन्होंने ‘उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991’ का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे किसी भी धार्मिक स्थल पर परिवर्तन की मनाही है, इसीलिए ये कैसे हो सकता है?

ज्ञात हो कि भगवान श्रीकृष्ण विराजमान की तरफ से याचिका कटरा केशव देव खेवट, मौजा मथुरा बाजार शहर की ओर से और उनकी अंतरंग सखी के रूप में अधिवक्ता रंजना अग्निहोत्री, विष्णु शंकर जैन, हरिशंकर जैन और तीन अन्य ने दाखिल किया है। 1935 में इलाहबाद हाईकोर्ट ने वाराणसी के राजा को उस जमीन के क़ानूनी अधिकार सौंप दिए थे। 1951 में वहाँ मंदिर बनाने का संकप लिया गया और 1958 में ‘श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ’ का गठन हुआ।

इधर ‘अखिल भारतीय तीर्थ पुरोहित महासभा’ ने उन लोगों की आलोचना की है, जो 17वीं शताब्दी की मस्जिद को हटाने की माँग लेकर कोर्ट पहुँचे हुए हैं। संगठन ने कहा कि मथुरा के शांति-सद्भाव को बिगाड़ने के लिए इस तरह से मुद्दे उठाए जा रहे हैं। महासभा के अध्यक्ष और वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता महेश पाठक ने दावा किया है कि इस मामले में 20वीं सदी में ही समझौता हो चुका है, इसीलिए मथुरा में मंदिर-मस्जिद का कोई विवाद ही नहीं है।

शाम तक कोई पोस्ट न आए तो समझना गेम ओवर: सुशांत सिंह पर वीडियो बनाने वाले यूट्यूबर को मुंबई पुलिस ने ‘उठाया’

हरियाणा के एक यूट्यूबर और मॉडल साहिल चौधरी को मुंबई पुलिस ने कथिततौर पर सोमवार को हिरासत में लिया। साहिल के इंस्टाग्राम पोस्ट के अनुसार, उन्होंने बताया कि सुशांत सिंह राजपूत पर वीडियो बनाने के लिए 28 सितंबर को बिना किसी नोटिस या वारंट के मुंबई पुलिस ने उन्हें उठा लिया। उन्होंने कहा कि अगर कल शाम तक उनका कोई पोस्ट नहीं आया तो इसका मतलब है कि उनका गेम ‘ओवर’ हो गया।

पोस्ट के अनुसार, क्राइम ब्रांच के 3 अधिकारी उन्हें लेने आए थे हालाँकि उनके साथ फ्लाइट में बस एक कॉन्सटेबल गया। उन्होंने आगे पोस्ट में लिखा कि उन्हें नहीं मालूम कि मुंबई पुलिस उनके साथ क्या करने वाली हैं, लेकिन फिर भी लड़ते रहना है। वह लिखते हैं, “यहाँ नहीं रुकूँगा अभी और कुर्बानियाँ देनी पड़ेंगी अगर सिस्टम को ठीक करना है।”

बता दें कि सुशांत की मौत के बाद साहिल चौधरी ने अभिनेता के मामले पर कई वीडियोज बनाई हैं। साथ ही राजनेताओं और बॉलीवुड हस्तियों को उसके लिए जिम्मेदार ठहराया। एक वीडियो में तो उन्होंने इस पूरे मामले में शिवसेना का भी हाथ बताया था। साथ ही प्रत्यक्ष रूप से सीएम ठाकरे और उनके बेटे आदित्य ठाकरे पर इल्जाम मढ़ा था।

गौरतलब है कि साहिल चौधरी की गिरफ्तारी के बाद से सोशल मीडिया पर उनके समर्थन में हैशटैग चलाया जा रहा है। साथ ही उन्हें रिहा करने की माँग हो रही हैं। 29 सितंबर को #ReleaseSaahilChoudhary जब अचानक ट्रेंड होना शुरू हुआ तो कई नेटीजन्स इस विषय पर गृह मंत्री से हस्तक्षेप करने की माँग करने लगे।

अर्चना भारद्वाज लिखती हैं, “अब मुझे पता चला कि कंगना ने मुंबई की पीओके से क्यों तुलना की थी। क्या मुंबई पुलिस में कोई शर्म बाकी बची है”

अनुराग लिखते हैं, “साहिल चौधरी को कहीं और ले जाया गया। वह बांद्रा के कुर्ला कॉम्प्लेक्स में अपने पिता के साथ थे। अभी उनकी लोकेशन किसी परिजन को नहीं मालूम। मदद कीजिए।”

यहाँ स्पष्ट कर दें कि ऑपइंडिया साहिल चौधरी के दावों को प्रमाणित नहीं करता। मगर, साहिल के बारे में पहले से मौजूद जानकारी के अनुसार, वह इससे पहले साल 2018 में मी टू मूवमेंट के कारण चर्चा में आए थे। उन्होंने डिजाइनर सदन पांडे और रोहित वर्मा पर यौन शोषण का आरोप लगाया था।

उन्होंने पांडे को लेकर बताया था कि उसने अपने फ्लैट पर साहिल को बॉक्सर उतारने को कहे जबकि वर्मा ने जबरदस्ती उन्हें किस करने की कोशिश की। हालाँकि, इन दोनों डिजाइनरों ने बाद में अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज किया था।

योग, सरदार पटेल, राम मंदिर और अब किसान… कॉन्ग्रेसियों के फर्जी विरोध पर फूटा PM मोदी का गुस्सा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तराखंड में नमामि गंगे प्रोजेक्ट्स का उद्घाटन करने के बाद अपने सम्बोधन में केंद्र सरकार द्वारा लाए गए कृषि क़ानूनों को लेकर कॉन्ग्रेस को आईना दिखाया और जनता को समझाया कि कैसे वो हर उस चीज का विरोध करते हैं, जिसे जनता की भलाई के लिए लाया जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस दौरान राम मंदिर और योग दिवस को भी याद किया, जिसका कॉन्ग्रेस ने विरोध किया था।

पीएम मोदी ने कहा कि भारत की पहल पर जब पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मना रही थी, तो भारत में ही बैठे ये लोग उसका विरोध कर रहे थे। उन्होंने याद दिलाया कि जब सरदार पटेल की सबसे ऊँची प्रतिमा का अनावरण हो रहा था, तब भी ये लोग इसका विरोध कर रहे थे। पीएम नरेंद्र मोदी ने बताया कि आज तक इनका कोई बड़ा नेता स्टैच्यू ऑफ यूनिटी नहीं गया है। सरदार वल्लभभाई पटेल कॉन्ग्रेस के ही नेता थे।

कॉन्ग्रेस पार्टी अक्सर योग दिवस का मजाक बनाती रही है। जिस चीज ने दुनिया भर में भारत को नई पहचान दी, पार्टी उसका विरोध करती है। राहुल गाँधी ने सेना की ‘डॉग यूनिट’ के एक कार्यक्रम की तस्वीर शेयर कर के इसे ‘न्यू इंडिया’ बताते हुए न सिर्फ योग का बल्कि सेना का भी मजाक उड़ाया था। तभी पूर्व-सांसद और अभिनेता परेश रावल ने कहा था कि ये कुत्ते राहुल गाँधी से ज़्यादा समझदार हैं। सेना के डॉग्स के योगासन का मजाक बनाने वाले राहुल गाँधी की खूब किरकिरी हुई थी।

इसी तरह कॉन्ग्रेस ने अपनी ही पार्टी के नेता सरदार वल्लभभाई पटेल की ‘स्टेचू ऑफ यूनिटी’ का विरोध किया, जिसके कारण न सिर्फ भारत का मान बढ़ा बल्कि केवडिया और उसके आसपास के क्षेत्रों में विकास के साथ-साथ रोजगार के नए अवसर आए। कॉन्ग्रेस पार्टी ने इस स्टेचू के निर्माण को ‘चुनावी नौटंकी’ और ‘राजद्रोह’ करार दिया था। राहुल गाँधी ने दावा कर दिया था कि सरदार पटेल के बनाए सभी संस्थाओं को मोदी सरकार बर्बाद कर रही है।

पीएम मोदी ने मंगलवार (सितम्बर 29, 2020) को कहा कि पिछले महीने ही अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण के लिए भूमिपूजन किया गया है। ये लोग पहले सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर का विरोध कर रहे थे, फिर भूमिपूजन का विरोध करने लगे। उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से कृषि कानूनों के अजीबोगरीब विरोध के परिप्रेक्ष्य में कहा कि हर बदलती हुई तारीख के साथ विरोध के लिए विरोध करने वाले ये लोग अप्रासंगिक होते जा रहे हैं।

कॉन्ग्रेस पार्टी कृषि कानूनों के विरोध के लिए एक ट्रैक्टर को 20 सितम्बर को अम्बाला में जला रही है तो फिर 28 सितम्बर को उसी ट्रैक्टर को दिल्ली के इंडिया गेट के पास राजपथ पर जला कर सुर्खियाँ बटोर रही है। पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह धरना दे रहे हैं। सोनिया गाँधी राज्यों को क़ानून बना कर केंद्र के क़ानूनों को बाईपास करने के ‘फर्जी’ निर्देश दे रही है। जबकि अधिकतर किसानों ने भ्रम और झूठ फैलाए जाने के बावजूद इन क़ानूनों का स्वागत किया है।

राम मंदिर मुद्दे की याद दिलाना भी आज के परिप्रेक्ष्य में सही है क्योंकि इसी कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने 2009 में सुप्रीम कोर्ट में एफिडेविट देकर कहा था कि भगवान श्रीराम का कोई अस्तित्व नहीं है। वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता और अधिवक्ता कपिल सिब्बल तो राम मंदिर की सुनवाई टालने के लिए सारे प्रयास करते रहे। वहीं दिसंबर 2017 में पीएम नरेंद्र मोदी ने उनसे पूछा था कि कॉन्ग्रेस बाबरी मस्जिद चाहती है या राम मंदिर?

इसी कॉन्ग्रेस ने जब राम मंदिर के शिलान्यास के बाद जनता के मूड को भाँपा तो वो राम मंदिर के खिलाफ टिप्पणी करने से बचने लगी। कोई पार्टी नेता इसके लिए राजीव गाँधी को क्रेडिट देने लगा। प्रियंका गाँधी बयान जारी कर के इसका समर्थन करने लगीं। छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल रामायण कॉरिडोर बनाने लगे। कमलनाथ हनुमान चालीसा पढ़ने लगे। तभी तो आज पीएम ने कहा – ये विरोध के लिए विरोध करते हैं।

प्रधानमंत्री ने याद दिलाया कि चार साल पहले का यही तो वो समय था, जब देश के जाँबाजों ने सर्जिकल स्ट्राइक करते हुए आतंक के अड्डों को तबाह कर दिया था। लेकिन ये लोग अपने जाँबाजों से ही सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत माँग रहे थे। सर्जिकल स्ट्राइक का भी विरोध करके, ये लोग देश के सामने अपनी मंशा, साफ कर चुके हैं। देखा जाए तो एक तरह से सारे विपक्षी दलों ने सर्जिकल स्ट्राइक का विरोध किया था।

नवम्बर 2016 में मोदी सरकार ने भारतीय सेना को सर्जिकल स्ट्राइक के लिए हरी झंडी दिखा कर इतिहास को बदल दिया। पहली बार भारत ने पाकिस्तान के कब्जे वाले इलाक़े में घुस कर आतंकियों को मारा लेकिन राहुल गाँधी इसे ‘खून की दलाली’ बताते हुए कहते रहे कि सरकार ‘सैनिकों के खून’ के पीछे छिप रही है। कॉन्ग्रेस पार्टी के लोग सबूत माँगने में लगे थे। कइयों ने तो पाकिस्तान वाला सुर अलापना शुरू कर दिया था।

पीएम मोदी ने कहा कि देश ने देखा है कि कैसे डिजिटल भारत अभियान ने, जनधन बैंक खातों ने लोगों की कितनी मदद की है। जब यही काम हमारी सरकार ने शुरू किए थे, तो ये लोग इनका विरोध कर रहे थे। देश के गरीब का बैंक खाता खुल जाए, वो भी डिजिटल लेन-देन करे, इसका इन लोगों ने हमेशा विरोध किया। उन्होंने कहा कि आज जब केंद्र सरकार, किसानों को उनके अधिकार दे रही है, तो भी ये लोग विरोध पर उतर आए हैं।

बकौल पीएम मोदी, ये लोग चाहते हैं कि देश का किसान खुले बाजार में अपनी उपज नहीं बेच पाए। जिन सामानों की, उपकरणों की किसान पूजा करता है, उन्हें आग लगाकर ये लोग अब किसानों को अपमानित कर रहे हैं। बता दें कि किसानों को सरकार के साथ-साथ प्राइवेट कंपनियों को अपनी उपज बेचने के लिए मिली आज़ादी का विरोध समझ से परे है। इसके लिए सीएए विरोध जैसा माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है।

अमित शाह बता चुके हैं कि जिस पार्टी ने अपनी सरकार रहते अनाजों की खरीद में भी अक्षमता दिखाई लेकिन मोदी सरकार ने इस मामले में रिकॉर्ड बनाया, इसके बावजूद वो किसानों को भ्रमित करने में लगे हुए हैं। एमएसपी के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं हुई है, उलटा उसे बढ़ाया गया है। बावजूद इसके किसानों को भाजपा के खिलाफ ऐसे ही भड़काया जा रहा है, जैसे लॉकडाउन में मजदूरों को भड़काया गया था।

पीएम मोदी ने ये भी याद दिलाया कि भारतीय वायुसेना के पास राफेल विमान आये और उसकी ताकत बढ़ी, ये उसका भी विरोध करते रहे। उन्होंने कहा कि वायुसेना कहती रही कि हमें आधुनिक लड़ाकू विमान चाहिए, लेकिन ये लोग उनकी बात को अनसुना करते रहे। हमारी सरकार ने सीधे फ्रांस सरकार से राफेल लड़ाकू विमान का समझौता कर लिया तो, इन्हें फिर दिक्कत हुई। आज अम्बाला से लद्दाख तक वायुसेना का परचम लहरा रहा है।

राफेल मुद्दे पर ज्यादा कुछ याद दिलाने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि पूरा 2019 का लोकसभा चुनाव ही इसी पर लड़ा गया था। जहाँ एक तरफ कॉन्ग्रेस पोषित मीडिया संस्थानों द्वारा एक के बाद एक झूठ फैलाया जा रहा था, वहीं दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट और कैग से क्लीन-चिट मिलने के बावजूद राफेल को लेकर झूठ फैलाया गया। वही कॉन्ग्रेस अब राफेल का नाम नहीं लेती क्योंकि जब 5 राफेल की पहली खेप भारत आए तो जनता के उत्साह ने सब साफ़ कर दिया। 2019 का लोकसभा चुनाव हारे, सो अलग।

क्यों लग रहा है COVID-19 वैक्सीन में समय? जानिए क्या है ‘ड्रग डेवलपमेन्ट प्रोसेस’ और नई दवा के सृजन से लेकर बाजार में आने तक की चुनौतियाँ

मानव जीवन को हिलाकर रख देने वाले नोवल कोरोना वायरस (COVID-19) के आगमन के साथ ही समूचा विश्व यह जानने को आतुर हो गया था कि सबसे पहले इस COVID-19 वायरस से लड़ने या इसे ख़त्म करने की दवा/टीका की रेस में कौन सा देश, कौन सी फार्मा कंपनी या रिसर्च सेंटर बाजी मार ले जाएगा?

जनवरी, 2020 से अब तक कई देशों की नामी कंपनियों ने कोरोना वायरस का तोड़ निकालने के दावे तो किए हैं, लेकिन कोई भी अभी तक सौ प्रतिशत असरदार दवा को खोज निकालने या बना पाने का दावा नहीं कर सका है।

इस चर्चा ने हाल ही में सभी का ध्यान आकर्षित किया, जब टीका बनाने में अग्रणी रहने का दावा करने वाली एक फार्मा कंपनी का ट्रायल (क्लीनिकल) रोकने का निर्णय लिया गया। इस वैक्सीन के फेज – 2 परीक्षण के दौरान एक प्रतिभागी में ‘ट्रांसवर्स मायलाइटिस (तंत्रिकीय विकार, जिसमें मेरुरज्जु के पूरे एक खंड में सूजन हो जाती है) रिपोर्ट किया गया।

‘ट्रांसवर्स मायलाइटिस’ उक्त वैक्सीन से हुआ है या नहीं, इसकी विस्तृत जानकारी जुटाने के लिए कंपनी ने कुछ समय के लिए क्लीनिकल ट्रायल को रोकने का फैसला लिया। हालाँकि, इसके एक सप्ताह बाद ही इस ट्रायल को जारी रखने की अनुमति हेल्थ केयर रेगुलेटरी संस्थाओं द्वारा इस कंपनी को दे दी गई थी।

एक नई दवा के निर्माण की चुनौतियाँ: अंतरराष्ट्रीय रेगुलेटरी संस्थाओं की निगरानी, आम जन तक दवाओं के पहुँचने के तकनीकी पहलू

मुख्यतः, एक नई दवा/टीके के शोध और निर्माण में चार प्रमुख पड़ाव होते हैं, जिन्हें यहाँ तदनुसार वर्गीकृत किया गया है:

स्टेप 1: खोज और निर्माण 

खोज : सामान्यतः, शोधकर्ता नई दवा अथवा वैक्सीन की खोज में निम्न बिंदुओं पर ध्यान देते हैं –

  • बीमारी के सभी पहलुओं की जानकारी अथवा नए लक्षण, जिनसे दवा द्वारा बीमारी को रोकने अथवा उसके प्रकोप को कम करने पर काम किया जा सके।
  • दवा के मॉलिक्यूल पर कई तरह के परीक्षण, जिससे कि बीमारी जिसके लिए दवा का निर्माण किया जा रहा है, उसमें दवा से होने वाले फायदों को सुनिश्चित किया जा सके।
  • वर्तमान (दवा पर की जा रही शोध के समय) में किसी बीमारी के लिए उपलब्ध अन्य टीके और उनकी उपयोगिता।
  • उन्नत टेक्नोलॉजी जिसके माध्यम से शोध की जा रही दवा को शरीर के किसी विशेष हिस्से (मॉलिक्युलर स्तर) पर टारगेट करवाया जा सके, अथवा जेनेटिक मैटेरियल में बदलाव करवाया जा सके।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि टेस्टिंग के इस चरण की शुरुवात में हजारों कम्पाउंड से उम्मीद होती है कि टेस्टिंग में वे सफल साबित होंगे। लेकिन इस स्क्रीनिंग में सीमित कम्पाउंड अथवा मॉलिक्यूल ही उपयोगी साबित होते हैं और आगे के परीक्षण के लिए चुने जाते हैं।

निर्माण : किसी भी मॉलिक्यूल के टेस्टिंग में उपयोगी साबित होने के बाद शोधकर्ता अन्य एक्सपेरिमेंट करना शुरू करते हैं, यह जानने के लिए कि: 

  • यह मॉलिक्यूल शरीर में किस तरह से एब्जॉर्ब, डिस्ट्रीब्यूट, मेटाबोलाइज और निष्काषित होता है।
  • मॉलिक्यूल के संभावित फायदे और बीमारी में कारगर होने की विधि (मैकेनिज्म ऑफ़ एक्शन)।
  • संभावित कारगर खुराक (डोज) और रुट (दवा देने का माध्यम- टेबलेट/कैप्सूल/इंजेक्शन इत्यादि)
  • संभावित नुकसान (साइड इफेक्ट या टॉक्सिसिटी)
  • अलग-अलग पॉपुलेशन जिसमें उम्र, लिंग, जातीयता (एथनिसिटी) इत्यादि शामिल हैं, पर मॉलिक्यूल के संभावित असर
  • अन्य दवाओं के साथ मॉलिक्यूल का असर (ड्रग इंटरैक्शन)
  • अन्य उपलब्ध दवाओं की तुलना में मॉलिक्यूल से बीमारी में होने वाले फायदे

स्टेप 2: प्री-क्लीनिकल रिसर्च

मानव परीक्षण से पहले शोधकर्ता यह जानना चाहते हैं कि जो मॉलिक्यूल टेस्टिंग में है, क्या उससे किसी भी प्रकार के नुकसान (टॉक्सिसिटी) होनी संभव हैं? प्री-क्लीनिकल रिसर्च दो तरह से संचालित की जाती है।

  • इन- विट्रो: सजीव शरीर में न होकर किसी वैज्ञानिक उपकरण (जैसे कि टेस्ट ट्यूब या पेट्री डिश) में होने वाली जैविक प्रक्रिया
  • इन-विवो: लैटिन में इन-विवो का अर्थ है ‘सजीव शरीर में’। दवा निर्माण में मुख्य रूप से इन-विवो स्टडी सजीव कोशिका, ऊतक या प्राणी (जानवर) में संचालित की जाती है।

प्री-क्लीनिकल रिसर्च की संरचना बहुत क्लिष्ठ या बड़ी नहीं होती है लेकिन यह डोजिंग और टॉक्सिसिटी पर जरूरी जानकारी प्रदान करती है। प्री-क्लीनिकल रिसर्च सुनिश्चित करती है कि मॉलिक्यूल मानव शरीर में परीक्षण के लिए सुरक्षित है।

स्टेप 3: क्लीनिकल रिसर्च

क्लीनिकल रिसर्च में मानव शरीर पर मॉलिक्यूल के ट्रायल किए जाते हैं। ध्यान देने योग्य बात है कि यही वह चरण भी है, जिसकी शुरुआत से पहले ही मॉलिक्यूल पर काम कर रही फार्मा कंपनियाँ (स्पॉन्सर) ‘इंवेस्टीगेशनल न्यू ड्रग एप्लिकेशन’ के लिए रेगुलेटरी एजेंसी जैसे कि अमेरिका की ‘फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन’ अथवा यूरोप की ‘ईएमए’ को आवेदन के लिए बाध्य होती हैं।

इस आवेदन में स्पॉन्सर को आवेदन की तिथि तक, मॉलिक्यूल से सम्बंधित सभी जानकारियाँ (पूरी पारदर्शिता के साथ) इन एजेंसियों से साझा करनी होती हैं। इसमें स्पॉन्सर चाहे तो ‘एफडीए या ईएमए’ से रिसर्च में सहयोग की माँग भी कर सकता है। बिना रेगुलेटरी एजेंसी की अनुमति के कोई भी स्पॉन्सर किसी भी दवा या टीके को बाजार में नहीं उतार सकता है।

क्लीनिकल रिसर्च में शोधकर्ता एक सेट स्टडी प्लान या ‘प्रोटोकॉल’ के तहत कार्य करते हैं जिसके कि चार प्रमुख पड़ाव हैं।

फेज 1:

  • स्टडी प्रतिभागी: 20-100 स्वस्थ प्रतिभागी अथवा प्रतिभागी जो उक्त बीमारी से ग्रसित हों।
  • स्टडी का अनुमानित समय: कुछ महीने
  • उद्देश्य: सेफटी और दवा/टीके की खुराक (डोज)
  • इस फेज से 70% दवाएँ/मॉलिक्यूल फेज 2 में प्रवेश कर पाती हैं।

फेज 2:

  • स्टडी प्रतिभागी: कई सौ प्रतिभागी, जो उक्त बीमारी से ग्रसित हों
  • स्टडी का अनुमानित समय: कुछ महीने से दो वर्ष 
  • उद्देश्य: प्रभावकारिता और साइड इफेक्ट
  • इस फेज से लगभग 33% दवाएँ/मॉलिक्यूल फेज 3 में प्रवेश कर पाती हैं।

फेज 3:

  • स्टडी प्रतिभागी: 300-3,000 प्रतिभागी, जो उक्त बीमारी से ग्रसित हों
  • स्टडी का अनुमानित समय: 1 वर्ष से 4 वर्ष 
  • उद्देश्य: प्रभावकारिता और साइड इफेक्ट की जाँच
  • यहाँ से 25-30% दवाएँ/मॉलिक्यूल फेज 4 में प्रवेश कर पाती हैं।

फेज 4:

  • स्टडी प्रतिभागी: कई हजार प्रतिभागी, जो उक्त बीमारी से ग्रसित हों
  • उद्देश्य: प्रभावकारिता और सुरक्षित इस्तेमाल

आईएनडी एप्लिकेशन के प्रथम औपचारिक आवेदन के 30 दिनों के भीतर रेगुलेटरी संस्था को अपना रिव्यू करना होता है। संतुष्टि पर रेगुलेटरी एजेंसी क्लीनिकल ट्रायल को अनुमति दे सकती है अथवा कुछ स्पष्टीकरण की माँग के साथ ट्रायल होल्ड भी करवा सकती है।

एजेंसी से अनुमति मिलने के पश्चात क्लीनिकल ट्रायल और रेगुलेटरी सँस्था को उसके रिजल्ट समयानुसार बताने का यह क्रम, ट्रायल के पूरे होने अथवा स्पॉन्सर द्वारा दवा/वैक्सीन की मार्केटिंग के आवेदन तक चलता रहता है।

यह स्पॉन्सर और क्लीनिकल रिसर्चर की जिम्मेदारी है कि वे रेगुलेटरी एजेंसी को बिना किसी हेराफेरी के, पारदर्शिता के साथ ट्रायल रिजल्ट दिखाए। साथ ही ट्रायल के प्रतिभागियों के स्वास्थ्य,अधिकारों और रेगुलेटरी एजेंसी के नियमों के तहत वित्तीय सहयोग को भी सुनिश्चित करें। सर्वविदित है कि रेगुलेटरी एजेंसी ट्रायल प्रतिभागियों के हितों के प्रति हमेशा से ही बेहद गंभीर रही हैं। 

स्टेप 4: रेगुलेटरी एजेंसी रिव्यू

उपरोक्त वर्णित तीन स्टेप्स के सफलतापूर्वक संपन्न हो जाने के बाद और हर स्टेप के बाकायदा डॉक्युमेंटेशन और साक्ष्यों के होने पर यदि फार्मा/रिसर्च कंपनी (स्पॉन्सर) को लगता है कि उक्त मॉलिक्यूल किसी बीमारी को ठीक करने में सक्षम और सुरक्षित है, तो वह रेगुलेटरी एजेंसी के समक्ष दवा अथवा वैक्सीन की ‘मार्केटिंग’ के लिये आवेदन कर सकता है।

एजेंसी द्वारा सभी उपलब्ध दस्तावेजों और साक्ष्यों की गहन पड़ताल के उपरान्त ही दवा अथवा वैक्सीन के मार्केटिंग की अनुमति दी जाती है। एजेंसी यदि रिसर्च के तरीकों या परिणामों से संतुष्ट न हो तो स्पॉन्सर को इनमें संशोधन करने का सुझाव दे सकती है अथवा और अधिक जानकारी माँगने का अधिकार रखती है। स्पॉन्सर की जिम्मेदारी होती है कि रेगुलेटरी एजेंसी द्वारा उठाये गये प्रश्नों का विस्तार से उत्तर दे और किसी भी तरह की खामी का पूर्ण निवारण भी करे।

स्टेप 5: मार्केटिंग के उपरांत ड्रग सेफ्टी मॉनिटरिंग

किसी भी दवा/वैक्सीन के क्लीनिकल रिसर्च के बाद भी यह दावा नहीं किया जा सकता कि उसकी सभी क्षमताओं अथवा संभावित हानिकारक तत्वों के बारे में पूर्ण जानकारी हासिल की जा चुकी है। इसका एक मुख्य कारण है कि क्लीनिकल रिसर्च एक सीमित जनसँख्या, सीमित प्रकार के लोगों और सीमित समय में संचालित की जाती हैं।

इसलिए, मार्केटिंग की इजाजत मिलने के बाद भी किसी दवा/वैक्सीन की हमेशा ही (दवा की मार्केटिंग के बाद आजीवन) कुशल मेडिकल प्रोफेशनल्स द्वारा दवा के अन्य किसी भी हानिकारक प्रभाव को जाँचने और रोकने के प्रयास किए जाते हैं। इसमें दवा के पहले से ही ज्ञात नुकसानदेह कारकों की फ्रीक्वेंसी और सीवियरटी की भी निगरानी की जाती है।

साथ ही, एक अन्य पहलू यह भी है कि किसी अन्य बीमारी के लिए दवा की उपयोगिता अथवा किसी अन्य संभावित उपयोगिता जो कि अभी तक ज्ञात न हो, को जानने का प्रयास भी इस दौरान मेडिकल प्रोफेशनल करते रहते हैं।

पुनः, यह दवा निर्माता कंपनी की जिम्मेदारी है कि किसी भी प्रकार की नई जानकारी (लाभ अथवा हानिप्रद) को अपने रेगुलेटरी डॉक्युमेंट्स के माध्यम से उपयोगकर्ता और हेल्थ केयर प्रोफेशनल्स को समय पर मुहैया करवाते रहें।

इस आर्टिकल को पढ़ने के उपरान्त आप अंदाजा लगा सकते हैं कि एक नई दवा के मूल सृजन से लेकर बनाने और बाजार तक उतारने तक कितने तकनीकी और महत्वपूर्ण पड़ाव हैं। किन चुनौतियों से एक स्पॉन्सर या दवा निर्माता को गुजरना होता है और किस प्रकार इस पूरी प्रक्रिया के हर एक चरण में अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन सुनिश्चित करना होता है।

उम्मीद करते हैं कि जल्द ही आम-जन मानस के लिए कोविड-19 का सफल और असरदार टीका उपलब्ध हो सकेगा और जन-जीवन पहले की तरह ही सामान्य हो सकेगा।

उत्तराखंड को 6 बड़ी योजनाओं की सौगात, PM मोदी ने कहा – ‘अब पैसा न पानी की तरह बहता है, न पानी में बहता है’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज ‘नमामि गंगे मिशन’ के तहत उत्तराखंड में 6 मेगा परियोजनाओं का वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से उद्घाटन किया। परियोजनाओं में 68 एमएलडी एसटीपी का निर्माण, हरिद्वार में जगजीतपुर में मौजूदा 27 एमएलडी का उन्नयन, हरिद्वार में सराय में 18 एमएलडी एसटीपी का निर्माण, ऋषिकेश में लक्कड़घाट पर 26 एमएलडी एसटीपी का उद्घाटन शामिल है।

इस अवसर पर पीएम मोदी ने कहा कि जल जीवन मिशन से हर घर तक शुद्ध जल पहुँचाया जाएगा। उन्होंने बताया कि गंगा हमारी सांस्कृतिक वैभव, आस्था और विरासत का प्रतीक है। गंगा देश की आधी आबादी को समृद्ध करती है। पहले भी गंगा की सफाई को लेकर बड़े अभियान चलाए, लेकिन उनमें जनभागीदारी नहीं थी। अगर वही तरीके अपनाते तो गंगा साफ ना होती और उसकी हालत आज भी उतनी ही बुरी होती।

पीएम मोदी ने बताया कि उनकी सरकार ने नमामि गंगे मिशन को सिर्फ गंगा की साफ-सफाई तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे देश का सबसे बड़ा और विस्तृत नदी संरक्षण कार्यक्रम बनाया। साफ पानी को लेकर पीएम ने कहा कि अब उत्तराखंड में 1 रुपए में पानी का कनेक्शन मिल रहा है। पीएम मोदी बोले कि पहले दिल्ली में फैसले होते थे, लेकिन जल जीवन मिशन से अब गाँव में ही फैसला हो रहा है।

पीएम मोदी ने कहा कि अब गंगा में गंदे पानी को गिरने से रोका जा रहा है। ये प्लांट भविष्य को देखते हुए बनाए गए, साथ ही गंगा के किनारे बसे 100 शहरों और 5000 गाँवों को खुले में शौच से मुक्त किया। गंगा के साथ सहायक नदियों को साफ किया जा रहा है। पीएम ने कहा कि नमामि गंगे के तहत 30 हजार करोड़ से अधिक योजनाओं का काम चल रहा है।

वह कहते हैं कि आज सरकार के इस चौतरफा काम का परिणाम हम सब देख रहे हैं। आज नमामि गंगे परियोजना के तहत 30 हजार करोड़ रुपए की परियोजनाओं पर काम चल रहा है या पूरा हो चुका है। उत्तराखंड में तो स्थिति ये थी कि गंगोत्री, बद्रीनाथ, केदारनाथ से हरिद्वार तक 130 से अधिक नाले गंगा में गिरते थे। आज इन नालों में से अधिकतर को रोक दिया गया है।

पीएम मोदी ने बताया कि अब उत्तराखंड में गंगा म्यूजियम के बनने से वहाँ का आकर्षण और अधिक बढ़ जाएगा। वो म्यूजियम हरिद्वार आने वाले पर्यटकों के लिए, गंगा से जुड़ी विरासत को समझने का एक माध्यम बनने वाला है।

उन्होंने ऋषिकेश से सटे मुनि की रेती का चंद्रेश्वर नगर नाला का जिक्र करते हुए कहा कि इसके कारण यहाँ गंगा के दर्शन के लिए आने वाले और राफ्टिंग करने वाले साथियों को बहुत परेशानी होती थी। लेकिन अब से यहाँ देश का पहला चार मंजिला सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट शुरू हो चुका है। हरिद्वार में भी ऐसे 20 से अधिक नालों को बंद किया जा चुका है।

पीएम मोदी के मुताबिक नमामि गंगे अभियान को अब नए स्तर पर ले जाया जा रहा है। गंगा की स्वच्छता के अलावा अब गंगा से सटे पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और पर्यावरण के विकास पर भी फोकस है। सरकार द्वारा उत्तराखंड के साथ ही सभी राज्य के लोगों को जैविक खेती से जोड़ने की योजना बनाई गई है।

प्रधानमंत्री कहते हैं, “आज पैसा न पानी की तरह बहता है, न पानी में बहता है। पैसे की पाई-पाई पानी पर लगाई जाती है। हमारे यहाँ तो हालत ये थी कि पानी जैसा महत्वपूर्ण विषय, अनेकों मंत्रालयों और विभागों में बँटा हुआ था। इन मंत्रालयों में, विभागों में न कोई तालमेल था और न ही समान लक्ष्य के लिए काम करने का कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश। नतीजा ये हुआ कि देश में सिंचाई हो या फिर पीने के पानी से जुड़ी समस्या, ये निरंतर विकराल होती गईं।”

प्रधानमंत्री ने सभी को संबोधित करते हुए देश में पानी से जुड़ी चुनौतियों के लिए बने जल शक्ति मंत्रालय का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पानी से जुड़ी चुनौतियों के साथ यह मंत्रालय आज हर घर पानी पहुँचाने के मिशन में लगा है। जलजीवन मिशन की ही देन है कि हर दिन करीब 1 लाख परिवारों को शुद्ध पेयजल की सुविधा से जोड़ा जा रहा है।

सिर्फ 1 साल में ही देश के 2 करोड़ परिवारों तक पीने का पानी पहुँचाया जा चुका है। इसके अलावा उत्तराखंड सरकार ने साल 2022 तक हर घर जल पहुँचाने का लक्ष्य रखा है। कोरोना काल के बीच भी उत्तराखंड में बीते 4-5 महीने में करीब 50 हजार घरों में पानी के कनेक्शन भी दिए गए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के किसानों, श्रमिकों और देश के स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे पर भी बात की। साथ ही उन लोगों पर भी निशाना साधा जो उनकी नीतियों का विरोध कर रहे हैं। उन्होंने डिजिटल भारत अभियान का, जनधन बैंक खातों का जिक्र करते हुए बताया कि इससे देश के लोगों की बहुत मदद हुई। मगर, कुछ लोगों ने इसका भी हमेशा विरोध किया।

उन्होंने याद दिलाया कि देश के जांबांजों ने सर्जिकल स्ट्राइक करते हुए आतंक के अड्डों को तबाह कर दिया था। लेकिन विरोध करने वाले लोग अपने जांबाजों से सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत माँगने लगे। उन्होंने कहा सर्जिकल स्ट्राइक का भी विरोध करके, ये लोग देश के सामने अपनी मंशा साफ कर चुके हैं। इसलिए विरोध करने वाले न किसानों के साथ हैं और न वीर जवानों के साथ। सरकार सैनिकों को लाभ देने के लिए जब वन रैंक वन पेंशन का लाभ देने लगी थी, तब भी सवाल उठे थे।

उन्होंने विरोधियों की नीयत की ओर इशारा करते हुए कहा कि ऐसे लोग नहीं चाहते कि देश का किसान खुले बाजार में अपनी उपज बेच पाए। जिन उपकरणों की किसान पूजा करता है, उन्हें आग लगाकर ये लोग अब किसानों को अपमानित कर रहे हैं।

पीएम मोदी वायुसेना को सशक्त करने वाले राफेल का उदहारण दिया। साथ ही राम मंदिर भूमि पूजन से पहले सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई में विरोधियों का पक्ष लोगों को याद दिलवाया और कहा बदलती हुई तारीख के साथ विरोध के लिए विरोध करने वाले ये लोग अप्रासंगिक होते जा रहे हैं।

AIIMS ने सौंपी सुशांत मामले में CBI को रिपोर्ट: दूसरे साक्ष्यों से अब होगा मिलान, बहनों से भी पूछताछ संभव

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में एम्स ने अपनी जाँच रिपोर्ट सीबीआई को सौंप दी है। सोमवार (सितंबर 29, 2020) की शाम को एक विस्तृत बैठक में एम्स की फॉरेंसिक टीम ने अपनी निर्णायक निष्कर्ष की रिपोर्ट जाँच एजेंसी को सौंपी।

इससे पहले सीबीआई के अनुरोध पर सुशांत की पोस्टमॉर्टम और विसरा रिपोर्ट के गहन अध्य्यन के लिए डॉ सुधीर गुप्ता की अध्यक्षता वाली समिति का गठन हुआ था। अब रिपोर्ट मिलने के बाद सीबीआई उस रिपोर्ट का विश्लेषण कर रही है। दूसरे साक्ष्यों से रिपोर्ट का मिलान करने के बाद ही सीबीआई अपनी जाँच को आगे बढ़ाएगी।

गौरतलब है कि अभिनेता की विसरा जाँच में सैंपल का परीक्षण करने के लिए एम्फ़ैटेमिन, कैनबिस, ओपियोड, कोकीन, हेरोइन आदि ड्रग का भी टेस्ट किया गया है। इन ड्रग के सैंपल टेस्ट से यह पता चल जाएगा कि क्या सुशांत सिंह राजपूत ने वास्तव में इनमें से किसी भी ड्रग्स का सेवन किया है या नहीं।

एम्स के फॉरेंसिक मेडिकल बोर्ड के चेयरमैन सुधीर गुप्ता ने कहा है कि सुशांत सिंह राजपूत के मौत के मामले में AIIMS और CBI की सहमति है लेकिन और विचार-विमर्श की जरूरत है। तार्किक कानूनी निष्कर्ष के लिए कुछ कानूनी पहलुओं पर गौर करने की जरूरत है।

बता दें कि सुशांत सिंह राजपूत के फैमिली के वकील विकास सिंह ने इससे पहले कहा था कि सुशांत का मामला अब सीबीआई के लिए बड़ी प्राथमिकता नहीं रह गया है। लेकिन अब जब एम्स की रिपोर्ट सीबीआई को सौंपी जा चुकी है तो जाँच एजेंसी एक बार एक्शन में दिखेगी और एक्टर की मौत से जुड़े कई राज खुलेंगे।

सीबीआई का कहना है कि वे हर एंगल से मामले की जाँच कर रही है और सुशांत की मौत की जाँच प्रोफेशनल तरीके से हो रही है यानी सभी पहलुओं की बारीकी से जाँच की जा रही है। इस बीच हो सकता है इस मामले में सीबीआई अब सुशांत के परिवार और उनकी बहनों से भी पूछताछ करे।

गौरतलब है कि बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत 14 जून को मुंबई के बांद्रा में स्थित अपने घर में मृत पाए गए थे। सुशांत सिंह के अंतिम पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में पता चला था कि उनके शरीर पर किसी भी तरह के चोट निशान नहीं मिले।

हालाँकि, बाद में सुशांत के परिवार की ओर से एफआईआर कराए जाने के बाद से मामले ने तूल पकड़ लिया और अब इसकी तीन एजेंसियाँ जाँच कर रही हैं-ईडी, सीबीआई और एनसीबी।

सीबीआई जहाँ मामले में हत्या एंगल की जाँच कर रही है, वहीं ईडी सुशांत के अकॉउंट से रुपयों की हेरफेर पर पड़ताल कर रही है। उधर, एनसीबी ने इस केस में ड्रग केस को संभालने के बाद से कई ड्रग तस्करों समेत बॉलीवुड हस्तियों को शिकंजे में ले लिया है।

‘अमेरिका कर सकता है चीन पर हमला, हमारी सेना लड़ेगी’ – चीनी मुखपत्र के एडिटर ने ट्वीट कर बताया

अपनी नापाक हरकतों से LAC पर जमीन हथियाने की नाकाम कोशिश करने वाले चीन को अमेरिका का डर सता रहा है। इस बात का खुलासा हुआ है चीन के सरकारी मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स के एडिटर के ट्वीट से। ग्लोबल टाइम्स के एडिटर ने ट्वीट कर कहा है कि ट्रंप प्रशासन साउथ चाइना सी में चीन के द्वीप पर हमला कर सकता है।

ग्लोबल टाइम्स के एडिटर Hu Xijin ने कहा, “मुझे मिली जानकारी के अनुसार, अमेरिकी चुनाव में दोबारा जीत हासिल करने के लिए अमेरिका का ट्रंप प्रशासन साउथ चाइना सी में MQ-9 Reaper drones के जरिए चीन के द्वीप पर हमला कर सकता है। अगर ऐसा होता है तो चीनी PLA निश्चित रूप से जमकर लड़ाई लड़ेगी और युद्ध शुरू करने वालों को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।”

इससे पहले ग्‍लोबल टाइम्‍स के एडिटर हू शिजिन ने अमेरिका और ताइवान को धमकाते हुए कहा था कि चीन अलगाव रोधी कानून एक ऐसा टाइगर है, जिसके दाँत भी हैं। दरअसल, ग्‍लोबल टाइम्‍स के एडिटर एक अमेरिकी जर्नल में ताइवान में अमेरिकी सेना के भेजने के सुझाव पर भड़के हुए थे।

हू शिजिन ने ट्वीट करके लिखा था, “मैं अमेरिका और ताइवान में इस तरह की सोच रखने वाले लोगों को निश्चित रूप से चेतावनी देना चाहता हूँ। एक बार अगर वे ताइवान में अमेरिकी सेना के वापस लौटने का फैसला करते हैं तो चीनी सेना निश्चित रूप से अपने क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए एक न्‍याय युद्ध शुरू कर देगी। चीन का अलगाव रोधी कानून एक ऐसा टाइगर है, जिसके दाँत भी हैं।”

उल्लेखनीय है कि अमेरिका और चीन के बीच टकराव बढ़ने की शुरुआत सोमवार सुबह से हुई, जब बीजिंग ने वॉशिंगटन के इन आरोपों को लेकर पलटवार किया कि वह वैश्विक पर्यावरण क्षति का एक प्रमुख कारण है। साथ ही वह इस दौरान दक्षिण चीन सागर का सैन्यीकरण नहीं करने के अपने वादे पर भी पलट गया है।

यहाँ बता दें कि पिछले हफ्ते अमेरिका के विदेश विभाग ने एक दस्तावेज जारी किया था। इस दस्तावेज में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से वायु, जल और मृदा के प्रदूषण, अवैध कटाई और वन्यजीवों की तस्करी के मुद्दों पर चीन के रिकॉर्ड का हवाला दिया गया था।

दस्तावेज में कहा गया था, “चीनी लोगों ने इन कार्रवाइयों के सबसे खराब पर्यावरणीय प्रभावों का सामना किया है। साथ ही बीजिंग ने वैश्विक संसाधनों का लगातार दोहन करके और पर्यावरण के लिए अपनी इच्छाशक्ति की अवहेलना करके वैश्विक अर्थव्यवस्था और वैश्विक स्वास्थ्य को भी खतरे में डाला है।”

विभाग के प्रवक्ता मॉर्गन ओर्टेगस ने रविवार को एक बयान में कहा था कि चीन ने दक्षिण चीन सागर के स्प्रैटली द्वीपों का ‘‘लापरवाह और आक्रामक सैन्यीकरण’’ किया है। उन्होंने कहा कि चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी अपनी बातों या प्रतिबद्धताओं का सम्मान नहीं करती है।

इस पर चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता वांग वेनबिन ने इस पर सोमवार को पलटवार करते हुए सवाल किया कि अमेरिका जलवायु परिवर्तन को लेकर पेरिस समझौते से क्यों पीछे हट रहा है। उन्होंने अमेरिका को ‘अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण सहयोग का सबसे बड़ा विध्वंसक’ करार दिया।

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