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100 नाराज़ ≠ 100 वोट: भारतीय राजनीति में सिर्फ़ ‘नाराज़गी’ का फ़ैक्टर कभी निर्णायक क्यों नहीं रहा

BJP के लिए सबसे बड़ा ख़तरा क्या है सवर्णों की नाराज़गी, SC/ST Act, आरक्षण की राजनीति या जातीय असंतोष? यदि आपका उत्तर केवल ‘CASTE’ है, तो संभव है कि आप भारतीय चुनावी राजनीति के उस बिंदु को देख ही नहीं रहे, जहाँ से असली कहानी शुरू होती है।

राजनीति को केवल भावनाओं की भाषा में पढ़ना सुविधाजनक है। फलाँ समुदाय नाराज़ है, फलाँ वर्ग क्षुब्ध है, फलाँ जाति को प्रतिनिधित्व नहीं मिला, फलाँ कानून से असंतोष है और फिर मान लिया जाता है कि नाराज़गी अपने आप वोट में बदल जाएगी। मगर चुनावी राजनीति इतनी सरल मशीन नहीं है कि उसमें ‘नाराज़गी’ डालिए और दूसरी तरफ़ सत्ता परिवर्तन की पर्ची निकल आए।

सत्ता का प्रश्न भावनाओं से कम और उन भावनाओं के राजनीतिक संगठन से अधिक तय होता है। यही वह बुनियादी अंतर है जिसे समझे बिना BJP और उसके सामाजिक आधार की वर्तमान राजनीति को समझना कठिन है।

सवर्ण समाज का एक हिस्सा BJP से नाराज़ है। SC/ST Act को लेकर असंतोष है, आरक्षण की राजनीति को लेकर शिकायतें हैं, प्रतिनिधित्व को लेकर प्रश्न हैं, जातीय गणित में लगातार हो रहे बदलावों से बेचैनी है और BJP द्वारा दलित, पिछड़े, अति-पिछड़े तथा आदिवासी समुदायों की ओर बढ़ाए जा रहे राजनीतिक हाथ को लेकर स्वाभाविक रूप से एक वर्ग में यह प्रश्न भी है कि इस बदलते समीकरण में उसका अपना स्थान क्या रह जाएगा।

लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि सवर्ण BJP से नाराज़ हैं या नहीं। असली सवाल यह है कि उस नाराज़गी का राजनीतिक गंतव्य क्या है? यहीं से चुनावी राजनीति का वह अध्याय शुरू होता है जिसे सोशल मीडिया की नाराज़ पोस्टें अक्सर बीच रास्ते में छोड़ देती हैं।

राजनीति में एक पुराना मेकियावेलियन सत्य है; जनता का आपसे नाराज़ होना अपने आप में सत्ता के लिए घातक नहीं है; घातक तब होता है जब वह नाराज़गी संगठित होकर आपको सत्ता से हटाने की क्षमता हासिल कर ले।

लोकतंत्र में हर सत्तारूढ़ दल से लोग नाराज़ रहते हैं। प्रश्न यह नहीं कि नाराज़ कौन है। प्रश्न यह है कि नाराज़ होकर कौन किसके साथ जा रहा है। और BJP की राजनीति को यदि इसी कसौटी पर देखा जाए, तो सवर्ण असंतोष का प्रश्न कुछ अलग रूप में सामने आता है। 

BJP का हिसाब ‘कितने नाराज़ हैं’ का नहीं, ‘किधर जाएँगे’ का है

BJP के लिए सवर्ण अब भी उसके राजनीतिक ढाँचे की एक महत्वपूर्ण और अपेक्षाकृत स्थिर धुरी हैं। इसलिए उसकी रणनीति का अर्थ यह कतई नहीं कि वह सोचती है, ‘सवर्णों को नाराज़ होने दो, वे कहीं नहीं जाएँगे।’

राजनीतिक दल इतने मूर्ख नहीं होते। अधिक यथार्थवादी गणित यह है कि ‘उन्हें इतना नाराज़ मत होने दो कि वे सामूहिक रूप से किसी वैकल्पिक राजनीतिक शक्ति के पीछे खड़े हो जाएँ।’

यही अंतर है असंतोष और राजनीतिक संकट के बीच। किसी समाज में असंतोष बहुत गहरा हो सकता है, लेकिन यदि वह सामाजिक समूहों, उप-जातियों, क्षेत्रों, स्थानीय नेतृत्व और अलग-अलग राजनीतिक प्राथमिकताओं में बँटा हुआ है, तो वह सत्ता परिवर्तन की संगठित शक्ति नहीं बन पाता। भारतीय समाज की जातीय संरचना इस मामले में BJP को एक दिलचस्प राजनीतिक लाभ देती है।

सवर्ण कोई एक राजनीतिक वर्ग नहीं हैं।

ब्राह्मण की राजनीतिक प्राथमिकताएँ हर जगह राजपूत की प्राथमिकताओं से मेल नहीं खातीं। बनिया का आर्थिक हित और राजनीतिक व्यवहार कई बार दूसरे समूहों से अलग हो सकता है। क्षेत्र, स्थानीय उम्मीदवार, परिवार, पंचायत, संसदीय क्षेत्र और राज्य की राजनीति इस समीकरण को और जटिल बना देते हैं। कोई BJP के साथ है, कोई कांग्रेस के साथ, कोई क्षेत्रीय दल के साथ और कोई स्थानीय उम्मीदवार को ही अपनी राजनीति का केंद्र मानता है।

अर्थात जिस असंतोष को सोशल मीडिया पर एक सामूहिक ‘सवर्ण आक्रोश’ के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, ज़मीनी राजनीति में वह आवश्यक नहीं कि एक ही दिशा में बह रहा हो। और यहीं BJP की संरचनात्मक बढ़त दिखाई देती है। उसे यह आवश्यक नहीं कि हर सवर्ण उससे प्रसन्न हो। उसे केवल इतना सुनिश्चित करना है कि सवर्णों की नाराज़गी एक संगठित Anti-BJP electoral bloc में परिवर्तित न हो।

यह चुनावी राजनीति का बड़ा फर्क है।

100 नाराज़ वोट और 100 संगठित वोट, दोनों एक चीज़ नहीं

इसे एक बहुत साधारण उदाहरण से समझिए। मान लीजिए किसी चुनाव क्षेत्र में 100 सवर्ण मतदाता BJP से नाराज़ हैं। उनमें से 30 कांग्रेस की ओर चले जाते हैं, 20 किसी क्षेत्रीय दल की ओर, 10 स्वतंत्र उम्मीदवार के साथ चले जाते हैं, कुछ मतदान ही नहीं करते और शेष अंततः BJP को ही वोट कर देते हैं।

तो BJP के लिए राजनीतिक नुकसान हुआ, लेकिन वह आवश्यक रूप से सत्ता के लिए अस्तित्वगत संकट नहीं बना। लेकिन वही 100 मतदाता यदि किसी एक राजनीतिक विकल्प के पीछे एकजुट हो जाएँ और उनके साथ दूसरे सामाजिक समूहों का असंतोष भी जुड़ जाए, तब परिस्थिति पूरी तरह बदल जाती है।

इसलिए चुनावी राजनीति में नाराज़गी की मात्रा से अधिक महत्वपूर्ण उसकी संगठनात्मक दिशा होती है। और यही वह बात है जिसे अक्सर ‘वोट बैंक’, ‘जातीय ध्रुवीकरण’ और ‘एंटी-इनकम्बेंसी’ जैसे आसान शब्दों के नीचे दबा दिया जाता है। 

BJP का असली भय: असंतोष नहीं, उसका एकजुट होना

यहीं पहुँचकर BJP के सामने वास्तविक चुनौती दिखाई देती है। BJP के लिए सबसे बड़ा खतरा सवर्णों की नाराज़गी नहीं है। खतरा है,  जातीय असंतोष का राजनीतिक Consolidation, विपक्षी मतों का एकीकरण और BJP के पुराने हिंदू सामाजिक गठबंधन का क्षरण।

यह फर्क मामूली नहीं है। यही चुनावी सत्ता की पूरी संरचना बदल सकता है।

2024 के लोकसभा चुनाव ने कम-से-कम इतना संकेत अवश्य दिया कि BJP का ऊपरी जातियों में आधार काफी हद तक उसके साथ बना रहा, लेकिन अनेक क्षेत्रों में SC और कुछ OBC समूहों के राजनीतिक झुकाव में बदलाव ने BJP के पुराने सामाजिक समीकरण को चुनौती दी।

इसका अर्थ यह नहीं कि BJP का सामाजिक आधार ध्वस्त हो गया। बल्कि इससे एक और गंभीर प्रश्न पैदा हुआ कि क्या अलग-अलग जातियों की अलग-अलग नाराज़गियाँ कभी एक साझा राजनीतिक असंतोष में बदल सकती हैं?

क्योंकि सत्ता के लिए खतरा तब पैदा होता है जब अलग-अलग असंतोष एक-दूसरे से जुड़ने लगें। एक जाति आरक्षण को लेकर असंतुष्ट हो, दूसरी प्रतिनिधित्व को लेकर, तीसरी आर्थिक परिस्थितियों को लेकर, चौथी स्थानीय सत्ता-संरचना को लेकर; तो ये अलग-अलग शिकायतें हैं।

लेकिन यदि कोई राजनीतिक शक्ति इन्हें एक साझा कथा, साझा शत्रु और साझा चुनावी विकल्प में बदल दे, तब ये शिकायतें राजनीतिक शक्ति बन जाती हैं। शिकायत स्वयं शक्ति नहीं है; शिकायत का राजनीतिक संगठन उसे शक्ति में बदलता है।

और BJP की रणनीति को समझने की कुंजी यहीं है।

BJP ने अपना सामाजिक गठबंधन बदला है, लेकिन छोड़ा नहीं

BJP एक तरफ़ अपने पारंपरिक सवर्ण आधार को पूरी तरह छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। दूसरी तरफ़ वह लगातार Ambedkar, दलित राजनीति, OBC नेतृत्व, EBC mobilisation और आदिवासी राजनीति की ओर बढ़ रही है। यह कुछ लोगों को विरोधाभास अवश्य प्रतीत हो रहा होगा, लेकिन यह तो BJP की राजनीतिक रणनीति का मूल तत्व है।

पुरानी BJP का सामाजिक समीकरण मोटे तौर पर Upper Caste + Hindutva के फ्रेम में समझा जाता था।

लेकिन आज की BJP का लक्ष्य उससे कहीं बड़ा है।

उसका राजनीतिक प्रोजेक्ट है, Upper Caste + OBC + EBC + Dalit + Tribal + Welfare Beneficiaries + Hindutva

अर्थात एक ऐसा विस्तृत हिंदू चुनावी गठबंधन, जिसमें प्रत्येक सामाजिक समूह को हर नीति से संतुष्ट करना आवश्यक नहीं है। राजनीति में सर्वसम्मति की आवश्यकता नहीं होती। पर्याप्त बहुमत की आवश्यकता होती है।

यही कारण है कि BJP के लिए यह आवश्यक नहीं कि सवर्ण आरक्षण से प्रसन्न हों, दलित हर नीति से प्रसन्न हों, OBC नेतृत्व से हर पिछड़ा समूह प्रसन्न हो या Welfare politics से हर वर्ग समान रूप से संतुष्ट हो। उसके लिए निर्णायक प्रश्न यह है कि क्या इन समूहों में से कोई बड़ा सामाजिक समूह एकजुट होकर विपक्ष के साथ जा रहा है? यदि नहीं, तो असंतोष प्रबंधनीय है। और यदि हाँ, तो वही असंतोष सत्ता के लिए गंभीर संकट बन सकता है।

‘हम BJP से नाराज़ हैं’ और ‘हम BJP को हराएँगे’ में बहुत बड़ा अंतर है

यही वह वाक्य है जिसके बीच भारतीय चुनावी राजनीति का एक बड़ा हिस्सा छिपा हुआ है। ‘हम BJP से नाराज़ हैं।’ और ‘हम BJP को हराने के लिए किसी दूसरे राजनीतिक विकल्प के साथ खड़े हैं।’

इन दोनों वाक्यों को एक समझ लेना राजनीतिक विश्लेषण की सबसे सामान्य भूलों में से एक है। पहला एक भावनात्मक कथन है। दूसरा एक संगठित राजनीतिक निर्णय।

पहले में असंतोष है। दूसरे में राजनीतिक दिशा। पहले में शिकायत है। दूसरे में शक्ति-संचय। और चुनाव अंततः इसी दूसरे प्रश्न पर फैसला करते हैं।

इसीलिए सोशल मीडिया की टाइमलाइन पर दिखाई देने वाला आक्रोश और मतदान केंद्र पर पड़ने वाला वोट कई बार दो बिल्कुल अलग राजनीतिक वास्तविकताएँ होते हैं। सोशल मीडिया पर क्रांति की घोषणा करना और बूथ पर एकजुट होकर वोट डालना, भारतीय लोकतंत्र में अभी तक दो अलग-अलग संस्थाएँ हैं।

तो BJP के सामने असली अस्तित्व का संकट क्या है?

यदि प्रश्न को बिल्कुल साफ़ शब्दों में रखा जाए तो मेरा उत्तर होगा, जाति अपने आप में BJP का Existential threat नहीं है। सवर्णों की नाराज़गी भी अपने आप में Existential threat नहीं है।

असली खतरा तब पैदा होता है जब जातीय असंतोष का राजनीतिक Consolidation + विपक्षी वोट का एकीकरण + BJP के पुराने हिंदू सामाजिक गठबंधन का टूटना, ये सब एक साथ घटित होने लगे।

और यह केवल सैद्धांतिक संभावना नहीं है। भारतीय चुनावों का इतिहास बताता है कि सत्ता परिवर्तन अक्सर किसी एक वर्ग की नाराज़गी से नहीं, बल्कि विभिन्न असंतोषों के एक साझा राजनीतिक गठबंधन में बदल जाने से होता है। 

तीन शर्तें पूरी हुईं तो कहानी बदल सकती है

BJP के लिए वास्तविक ख़तरा तब आकार लेगा जब तीन प्रक्रियाएँ एक साथ चलें।

1. सवर्णों की नाराज़गी वास्तविक वोट के नुकसान में बदल जाए

इसके लिए केवल यह पर्याप्त नहीं कि सवर्ण BJP से शिकायत करें। उन्हें वास्तव में BJP से मतदान स्तर पर दूर जाना होगा।

2. SC, OBC और EBC जैसे समूहों में BJP के विरुद्ध बड़ा राजनीतिक Consolidation हो

अलग-अलग जातियों की अलग-अलग शिकायतें यदि अलग-अलग राजनीतिक दिशाओं में जाती रहेंगी, तो BJP के लिए उनका प्रबंधन अपेक्षाकृत आसान रहेगा।

लेकिन यदि उनमें एक साझा राजनीतिक ध्रुवीकरण पैदा होता है, तो स्थिति गंभीर होगी।

3. विपक्ष उस असंतोष को एक ही राजनीतिक विकल्प के पीछे समेट दे

यही शायद सबसे कठिन शर्त है।

क्योंकि BJP के विरुद्ध असंतोष पैदा करना और उस असंतोष को एक साझा चुनावी विकल्प में बदल देना, दो अलग राजनीतिक कार्य हैं। विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती यही है।

जाति, आरक्षण और SC/ST Act, क्या ये 2029 तय कर देंगे?

SC/ST Act, आरक्षण, Caste census, सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय की राजनीति जैसे मुद्दे निश्चित रूप से सवर्णों में असंतोष पैदा कर सकते हैं। इन प्रश्नों को खारिज करना भी राजनीतिक मूर्खता होगी।

लेकिन यह मान लेना कि यही मुद्दे अकेले 2029 का चुनाव तय कर देंगे, उससे भी बड़ी राजनीतिक भूल होगी। क्योंकि चुनाव किसी एक मुद्दे पर नहीं लड़े जाते। राजनीतिक नेतृत्व का प्रभाव है। हिंदुत्व का प्रभाव है। अर्थव्यवस्था का प्रश्न है।

कल्याणकारी योजनाएँ हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा है। स्थानीय उम्मीदवार है। जातीय प्रतिनिधित्व है। विपक्ष का चेहरा और उसकी विश्वसनीयता है। स्थानीय स्तर की सत्ता-संरचना है। और अंततः Anti-incumbency भी है।

इन सभी का योग मिलकर वोट में बदलता है। राजनीति कोई एक-चर वाला समीकरण नहीं है।

भारतीय चुनाव में ‘एक मुद्दा’ अक्सर केवल सोशल मीडिया का मुद्दा होता है; बूथ पर पहुँचते-पहुँचते वह दर्जनों अन्य हितों, पहचान और राजनीतिक गणित से होकर गुजर चुका होता है। 

BJP की असली चिंता क्या है?

इसलिए यदि BJP की राजनीति को ठंडे दिमाग़ से पढ़ा जाए, तो संभवतः उसकी चिंता यह नहीं है कि ‘क्या हर जाति हमसे खुश है?’

क्योंकि कोई भी सत्तारूढ़ दल हर सामाजिक समूह को हर समय खुश नहीं रख सकता। उसकी वास्तविक चिंता इससे कहीं अधिक ठंडी और व्यावहारिक है, ‘क्या अलग-अलग समूहों की नाराज़गी एक-दूसरे से जुड़कर हमारे खिलाफ़ एक व्यापक चुनावी गठबंधन बना सकती है?’

यदि उत्तर ‘नहीं’ है, तो असंतोष मौजूद रहते हुए भी सत्ता-समीकरण उसके पक्ष में रह सकता है। यदि उत्तर ‘हाँ’ हो जाता है, तब वही छोटी-छोटी दरारें मिलकर दीवार में दरार पैदा कर सकती हैं। और राजनीति में दीवार तब नहीं गिरती जब उसमें एक दरार दिखाई दे।

दीवार तब गिरती है जब अलग-अलग दरारें एक-दूसरे से जुड़ जाती हैं। यही BJP के सामाजिक गठबंधन की असली परीक्षा है। इसलिए सोशल मीडिया पर सवर्णों की नाराज़गी के बढ़ते शोर को देखकर यह निष्कर्ष निकाल लेना कि BJP किसी बड़े संकट में है, शायद जल्दबाज़ी होगी। और इसके उलट यह मान लेना कि सवर्ण हमेशा BJP के साथ रहेंगे, उससे भी बड़ी भूल होगी।

राजनीतिक दलों का भाग्य स्थायी भावनाओं से नहीं, बदलते हितों और बदलते गठबंधनों से तय होता है। आज BJP का आत्मविश्वास संभवतः इसी गणित से निकल रहा है कि उसके विरुद्ध असंतोष मौजूद होने के बावजूद वह असंतोष अभी तक पर्याप्त रूप से एकीकृत राजनीतिक शक्ति में परिवर्तित नहीं हुआ है।

और विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती भी यही है। उसे केवल लोगों को BJP से नाराज़ नहीं करना है। उसे यह सिद्ध करना है कि उस नाराज़गी का एक विश्वसनीय राजनीतिक घर भी है। अंततः चुनाव में प्रश्न यह नहीं होता कि कितने लोग आपसे नाराज़ हैं। प्रश्न यह होता है कि कितने नाराज़ लोग एक ही दिशा में चलने को तैयार हैं।

और शायद BJP आज सबसे अधिक इसी गणित पर भरोसा कर रही है। क्योंकि चुनावी राजनीति में नाराज़ होना आसान है; नाराज़ वोट को एक जगह पहुँचा देना, यही असली राजनीति है। 

12 वर्ष पहले गोरखनाथ पीठ के पीठाधीश्वर, फिर देश के सबसे बड़े सूबे के CM: जनता तक पहुँच और समस्याओं पर तत्काल प्रतिक्रिया – UP में विकास और धार्मिक विरासत साथ-साथ बढ़ा रहे योगी आदित्यनाथ

उत्तर प्रदेश की राजनीति में योगी आदित्यनाथ की कहानी सिर्फ एक मुख्यमंत्री के सत्ता में आने की कहानी नहीं है। यह कहानी एक ऐसी धार्मिक-सामाजिक परंपरा से निकलकर शासन के सबसे बड़े मंच तक पहुँचने की है, जिसने पूर्वी उत्तर प्रदेश में लंबे समय तक शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवा और सामाजिक गतिविधियों के जरिए अपनी मौजूदगी बनाई।

एक तरफ गोरखनाथ मठ की परंपरा थी, दूसरी तरफ राजनीति। एक तरफ भगवा वस्त्र में पीठाधीश्वर की जिम्मेदारी थी, दूसरी तरफ करोड़ों लोगों वाले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी। ऐसे में योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक जीवन को समझने के लिए सिर्फ 19 मार्च 2017 (जिस दिन उन्होंने पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली) से शुरुआत करना पर्याप्त नहीं है।

गोरखपुर में स्थित गोरखनाथ मंदिर

राजनीतिक जीवन में आने पहले भी उनकी प्रशासनिक शैली और राजनीतिक सोच की कई जड़ें गोरखनाथ पीठ में दिखाई देती हैं। वहाँ जनता से सीधा संपर्क, संस्थाओं को चलाना, शिक्षा और स्वास्थ्य के जरिए समाज तक पहुँचना और समस्याओं पर तत्काल प्रतिक्रिया देना उनके सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बन चुका था।

फिर यही अनुभव लखनऊ पहुँचा। फर्क सिर्फ इतना था कि गोरखनाथ में जिम्मेदारी कुछ संस्थाओं और एक बड़े सामाजिक क्षेत्र की थी, जबकि मुख्यमंत्री बनने के बाद पूरा उत्तर प्रदेश ही उनका कार्यक्षेत्र बन गया।

युवावस्था में ही गोरखनाथ पीठ से जुड़े

5 जून 1972 को उत्तराखंड में जन्मे अजय सिंह बिष्ट बाद दीक्षा लेने के बाद योगी आदित्यनाथ के नाम से पहचाने गए। विज्ञान से स्नातक करने वाले अजय सिंह बिष्ट युवावस्था में ही गोरखनाथ पीठ से जुड़े और महंत अवैद्यनाथ के शिष्य बने। 15 फरवरी 1994 को महज 22 वर्ष की उम्र में उन्हें गोरक्षपीठ का उत्तराधिकारी घोषित किया गया।

यह कोई सामान्य धार्मिक पद नहीं था। गोरखनाथ पीठ पूर्वी उत्तर प्रदेश में केवल पूजा-पाठ का केंद्र नहीं रही। समय के साथ यहाँ शिक्षा, चिकित्सा, सामाजिक सेवा और धार्मिक गतिविधियों से जुड़े संस्थान विकसित हुए। महंत दिग्विजयनाथ और बाद में महंत अवैद्यनाथ ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया।

योगी आदित्यनाथ इसी परंपरा के उत्तराधिकारी बने। इसके बाद उनके सामने दो जिम्मेदारियाँ थीं। पहली, अपने गुरु और पीठ की विरासत को आगे बढ़ाना। दूसरी, उस विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाना। उन्होंने इसके लिए सिर्फ धार्मिक आयोजनों का रास्ता नहीं चुना। शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सेवा और संगठनात्मक गतिविधियों का विस्तार भी उनकी सार्वजनिक भूमिका का हिस्सा बना।

सितंबर 2014 में महंत अवैद्यनाथ के ब्रह्मलीन होने के बाद योगी आदित्यनाथ औपचारिक रूप से 12 सितंबर 2014 को गोरक्षपीठाधीश्वर बने। यानी मुख्यमंत्री बनने से लगभग तीन साल पहले ही वह एक बड़े संस्थान के प्रमुख और हजारों लोगों के रोजमर्रा के संपर्क में रहने वाले सार्वजनिक व्यक्तित्व को निभाते आए थे।

पीठ में गुरु गोरक्षनाथ की पूजा अर्चना करते CM योगी

विरासत संभालने का मतलब सिर्फ गद्दी संभालना नहीं था

गोरखनाथ पीठ की विरासत को समझने का एक महत्वपूर्ण पहलू उसका संस्थागत ढाँचा है। गोरखनाथ मंदिर से जुड़े शिक्षा और चिकित्सा संस्थान लंबे समय से संचालित होते रहे हैं। पीठ की गतिविधियों में अस्पताल, स्कूल, कॉलेज और सामाजिक सेवा संस्थाएँ शामिल रही हैं।

योगी आदित्यनाथ के सामने चुनौती यह थी कि इस विरासत को केवल पुरानी परम्पराओं तक सीमित न रखा जाए। उन्होंने संगठनात्मक विस्तार और बड़े सार्वजनिक आयोजनों के माध्यम से इसे पूर्वी उत्तर प्रदेश के बाहर भी व्यापक पहचान दिलाई। इसी दौर में योगी की पहचान एक ऐसे नेता के तौर पर बनी, जो अपने धार्मिक-सांस्कृतिक विचारों को सार्वजनिक जीवन में खुलकर रखते थे।

1998 में वह पहली बार गोरखपुर से लोकसभा सांसद चुने गए। उस समय उनकी उम्र महज 26 वर्ष थी। इसके बाद 1999, 2004, 2009 और 2014 में भी उन्होंने गोरखपुर से लोकसभा चुनाव जीता।

लगातार पाँच बार सांसद रहना केवल चुनाव जीतने का रिकॉर्ड नहीं था बल्कि ऐतिहासिक उपलब्धि थी। इस दौरान उनका गोरखपुर से राजनीतिक और सामाजिक संपर्क लगातार मजबूत होता गया और देश-प्रदेश के स्तर पर भी उनकी राजनीति ऊपर उठती गई। यही वह दौर था, जिसमें एक पीठाधीश्वर धीरे-धीरे राष्ट्रीय राजनीति के खिलाड़ी के रूप में स्थापित हुआ।

गोरक्षनाथ पीठ में आरती करते पीठाधीश्वर CM योगी आदित्यनाथ

गोरखपुर ने योगी को क्या सिखाया?

मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली को समझने के लिए गोरखपुर के अनुभव को देखना जरूरी है। एक धार्मिक संस्था चलाना और सरकार चलाना एक जैसा काम नहीं है लेकिन दोनों जगह एक चीज समान है, वह है लोगों की समस्याओं से सीधा सामना।

गोरखनाथ पीठ के अस्पताल में आने वाला मरीज, स्कूल में पढ़ने वाला छात्र, रोजगार या आर्थिक मदद की उम्मीद लेकर आने वाला व्यक्ति और धार्मिक आयोजन में पहुँचने वाला श्रद्धालु, सभी अलग-अलग तरह की अपेक्षाएँ लेकर आते हैं।

यही प्रत्यक्ष जनसंपर्क योगी के सार्वजनिक जीवन की शैली का हिस्सा बना। एक इंटरव्यू में योगी आदित्यनाथ ने खुद बताया कि मठ का काम सार्वजनिक सेवा से जुड़ा रहा है और वहाँ से उन्हें प्रशासन की सीख मिली।

गोरखपुर में उन्होंने जिन संस्थाओं और परियोजनाओं को आगे बढ़ाया, उनका असर भी धीरे-धीरे दिखाई देने लगा। AIIMS, खाद कारखाना, सड़कें, रामगढ़ ताल का विकास, चिड़ियाघर, मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर और शहर की कनेक्टिविटी जैसी परियोजनाओं ने गोरखपुर की पुरानी पहचान को बदलना शुरू किया।

2017: जब गोरखपुर का सांसद बना उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री

19 मार्च 2017 उत्तर प्रदेश की राजनीति के लिए ऐतिहासिक दिनों में गिना जाएगा। इसी दिन योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। यह अपने आप में असाधारण राजनीतिक घटना थी।

एक ऐसा व्यक्ति, जो राजनीति का पर्याय बन चुके सफेद कपड़ों की जगह भगवा पहनता था, वह देश के सबसे बड़े राज्य की सरकार का मुखिया बन गया। लेकिन योगी के पास एक चीज थी, जो अक्सर राजनीतिक जीवन में वर्षों बाद आती है, वह थी जमीनी संगठन और प्रत्यक्ष जनसंपर्क का लंबा अनुभव।

उनके सामने उत्तर प्रदेश की समस्याओं की लंबी सूची थी। कानून-व्यवस्था की चुनौती, खराब सड़कें, बिजली, किसानों की समस्या, बेरोजगारी, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, शिक्षा की गुणवत्ता, निवेश की कमी और क्षेत्रीय असमानता। सरकार ने शुरुआत में ही कानून-व्यवस्था को प्राथमिकता दी।

योगी सरकार की प्रशासनिक शैली का एक प्रमुख शब्द बना, ‘जीरो टॉलरेंस’। समर्थकों के लिए यह अपराधियों के खिलाफ कड़ा प्रशासन था जबकि आलोचकों ने कई बार सरकार की पुलिस और कानून-व्यवस्था संबंधी नीतियों पर सवाल भी उठाए। लेकिन सरकार ने कानून-व्यवस्था को राजनीतिक एजेंडे के केंद्र में रखा।

‘बीमारू’ की छवि से बाहर निकलने की कोशिश

उत्तर प्रदेश लंबे समय तक देश की आर्थिक क्षमता और वास्तविक विकास के बीच के अंतर का उदाहरण माना जाता रहा। योगी सरकार ने इस तस्वीर को बदलने के लिए सबसे पहले कनेक्टिविटी पर जोर दिया। एक्सप्रेसवे इसका सबसे बड़ा उदाहरण बने।

पूर्वांचल एक्सप्रेसवे ने लखनऊ को पूर्वी उत्तर प्रदेश से जोड़ने का काम किया। बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे ने अपेक्षाकृत पिछड़े क्षेत्र को बेहतर कनेक्टिविटी दी। गंगा एक्सप्रेसवे जैसी परियोजनाओं ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वी हिस्से तक एक लंबा आर्थिक कॉरिडोर बनाने की संभावना पैदा की।

यह सिर्फ सड़क बनाने की कहानी नहीं है। एक अच्छी सड़क के साथ ट्रांसपोर्ट आता है और ट्रांसपोर्ट के साथ बाजार जुड़ते हैं। बाजार जुड़ने पर उद्योगों के लिए जगह बनती है। उद्योग आने पर रोजगार पैदा होता है। यही वजह है कि योगी सरकार एक्सप्रेसवे को केवल यात्रा आसान करने वाली सड़क के तौर पर नहीं, बल्कि औद्योगिक विकास के कॉरिडोर के रूप में प्रस्तुत करती रही है।

एयरपोर्ट के मामले में बदली तस्वीर

2017 के समय उत्तर प्रदेश में सीमित संख्या में ही एयरपोर्ट नियमित हवाई सेवाओं से जुड़े थे। इसके बाद प्रयागराज, कानपुर, बरेली, कुशीनगर, अयोध्या, अलीगढ़, आजमगढ़, श्रावस्ती, चित्रकूट और मुरादाबाद जैसे शहरों तक हवाई कनेक्टिविटी बढ़ी

आज उत्तर प्रदेश का एयर कनेक्टिविटी नेटवर्क पहले की तुलना में काफी बड़ा है। अयोध्या में अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट और जेवर में नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट जैसी परियोजनाएँ इस बदलाव की बड़ी मिसाल हैं।

जेवर सिर्फ एक एयरपोर्ट नहीं है। इसके आसपास बनने वाले औद्योगिक, लॉजिस्टिक और शहरी ढाँचे को मिलाकर देखा जाए तो यह पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की आर्थिक तस्वीर बदलने की क्षमता रखने वाली परियोजना है। यानी सरकार का मॉडल केवल ‘एयरपोर्ट बनाओ’ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एयरपोर्ट के आसपास आर्थिक गतिविधियों का इकोसिस्टम तैयार करने पर भी जोर रहा।

शहरों में मेट्रो, गाँवों में सड़क और बिजली

योगी सरकार की विकास कहानी का एक बड़ा हिस्सा बड़े शहरों से जुड़ा है लेकिन इसका दूसरा हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों में दिखाई देता है। सड़क निर्माण, बिजली कनेक्शन, आवास, शौचालय, नल से जल और ग्रामीण कनेक्टिविटी जैसी योजनाओं ने गाँवों में बुनियादी सुविधाओं को बढ़ाया।

यहाँ केंद्र और राज्य सरकार की योजनाएँ साथ-साथ काम करती हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना, सौभाग्य, जल जीवन मिशन और उज्ज्वला जैसी केंद्रीय योजनाओं का क्रियान्वयन राज्य मशीनरी के जरिए हुआ।

स्वास्थ्य में सबसे बड़ा बदलाव कहाँ दिखाई देता है?

उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में स्वास्थ्य व्यवस्था को बदलना सबसे कठिन कामों में से एक है। योगी सरकार ने मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ाने, नए संस्थान बनाने और पुराने अस्पतालों के विस्तार पर जोर दिया। गोरखपुर का AIIMS इसका प्रतीक बन गया।

जिस शहर की पहचान कभी जापानी इंसेफेलाइटिस जैसी बीमारी के संकट से होती थी, उसी शहर में आधुनिक चिकित्सा संस्थान का विकसित होना राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण बदलाव था। पूर्वांचल के दूसरे हिस्सों में भी मेडिकल कॉलेजों का विस्तार हुआ। सरकारी आँकड़ों के अनुसार राज्य में मेडिकल कॉलेजों का नेटवर्क पिछले वर्षों में काफी बढ़ा है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव सिर्फ बड़े अस्पताल बनाना नहीं है। मेडिकल शिक्षा के विस्तार का अर्थ डॉक्टरों और विशेषज्ञों की संख्या बढ़ाना भी है। यही कारण है कि मेडिकल कॉलेजों के विस्तार को लंबे समय में उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जा सकता है।

शिक्षा में ‘इमारत’ से आगे की चुनौती

शिक्षा के क्षेत्र में योगी सरकार के सामने दोहरी चुनौती थी। एक तरफ सरकारी स्कूलों का इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारना, दूसरी तरफ शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाना। ऑपरेशन कायाकल्प जैसे कार्यक्रमों के जरिए सरकारी स्कूलों में भवन, शौचालय, फर्नीचर, बिजली, पेयजल और अन्य सुविधाओं पर काम हुआ।

मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना जैसी पहल के जरिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को मुफ्त कोचिंग उपलब्ध कराने की कोशिश की गई। यहाँ सरकार की सोच यह रही कि प्रतिभा केवल बड़े शहरों के महँगे कोचिंग संस्थानों तक सीमित न रहे।

अभी भी शिक्षा की गुणवत्ता, सरकारी स्कूलों में शिक्षक उपलब्धता और उच्च शिक्षा तक पहुँच जैसी चुनौतियाँ पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं लेकिन स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर और संस्थागत विस्तार में बदलाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

निवेश के लिए बदला माहौल

किसी भी राज्य में उद्योग तभी आता है, जब कारोबारी को तीन चीजों पर भरोसा हो। सड़क, बिजली की उपलब्धता, कानून-व्यवस्था ठीक रहेगी या नहीं। योगी सरकार ने इन तीनों को निवेश नीति से जोड़ने की कोशिश की।

इन्वेस्टर्स समिट, नई औद्योगिक नीतियाँ, डिफेंस कॉरिडोर, डेटा सेंटर, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग, फिल्म सिटी और एक्सप्रेसवे आधारित औद्योगिक कॉरिडोर इसी रणनीति का हिस्सा हैं। इससे बड़े पैमाने पर निवेश प्रस्ताव जमीन पर उतरे हैं और हजारों उद्योग स्थापित हुए हैं।

2026 में मुख्यमंत्री ने भी कहा कि राज्य में लगभग ₹15 लाख करोड़ के प्रोजेक्ट ग्राउंडेड हो चुके हैं और करीब ₹6 लाख करोड़ की परियोजनाएँ चल रही हैं। इन आँकड़ों से एक बात जरूर स्पष्ट होती है कि उत्तर प्रदेश ने निवेश आकर्षित करने को अपनी प्रशासनिक प्राथमिकताओं में प्रमुख स्थान दिया है।

कानून-व्यवस्था और प्रशासन: योगी मॉडल की सबसे चर्चित पहचान

योगी सरकार की सबसे ज्यादा चर्चा शायद सड़क या एयरपोर्ट की वजह से नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था की वजह से हुई। सरकार ने अपराधियों और माफिया के खिलाफ सख्त कार्रवाई को अपनी पहचान बनाया।

अवैध संपत्तियों पर कार्रवाई, गैंगस्टर एक्ट का इस्तेमाल और पुलिस को खुली कार्रवाई का संदेश, ये सब योगी सरकार के प्रशासनिक मॉडल का हिस्सा रहे। इस मॉडल पर राजनीतिक विवाद भी हुए। विपक्ष ने कई बार ऐसी कार्रवाइयों को लेकर सवाल उठाए और पुलिस एनकाउंटर तथा प्रशासनिक कार्रवाई की आलोचना की। विपक्ष द्व्रारा यह लेकिन किया गया सिर्फ राजनीति के लिए और सरकार ने समय-समय पर इनको अपनी नीति बता कर स्पष्ट भी किया।

सरकार का तर्क रहा कि अपराध के खिलाफ सख्त रुख ने व्यापारियों, महिलाओं और आम नागरिकों में सुरक्षा की भावना बढ़ाई है। इसका सीधा असर निवेश के माहौल पर पड़ने का दावा भी सरकार करती रही है।

धार्मिक विरासत से शासन तक एक समान सूत्र

अब सवाल आता है कि गोरखनाथ पीठ और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शासन के बीच आखिर संबंध क्या है? जवाब है, ‘संस्था के जरिए सेवा’। गोरखनाथ पीठ में मंदिर के साथ अस्पताल और शिक्षण संस्थान हैं। मुख्यमंत्री के रूप में योगी के सामने पूरा राज्य है, जहाँ सरकार स्कूल, अस्पताल, सड़क, पुलिस, बिजली और पानी के जरिए जनता तक पहुँचती है।

गोरखपुर में एक संस्था के स्तर पर जो मॉडल था, लखनऊ में वही सोच बहुत बड़े पैमाने पर दिखाई देती है। फर्क सिर्फ स्केल का है। मठ में हजारों लोग आते थे, मुख्यमंत्री के तौर पर करोड़ों लोगों की जिम्मेदारी सामने है।

मठ में अस्पताल चलाना एक जिम्मेदारी थी तो मुख्यमंत्री के तौर पर पूरे राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था सुधारना चुनौती है। वहीं, मठ में शिक्षा संस्थानों का संचालन था तो सरकार में लाखों बच्चों की शिक्षा व्यवस्था है। इसीलिए योगी की यात्रा को केवल ‘संत से मुख्यमंत्री’ की यात्रा कहना अधूरा है। यह ‘एक संस्था के प्रशासक से पूरे राज्य के प्रशासक’ बनने की यात्रा भी है।

विरासत का विस्तार धार्मिक सीमाओं से बाहर

योगी आदित्यनाथ की पहचान निश्चित रूप से हिंदुत्व और गोरखनाथ पीठ से जुड़ी रही है। अयोध्या, काशी, मथुरा, धार्मिक पर्यटन और सांस्कृतिक स्थलों के विकास पर उनकी सरकार ने विशेष जोर दिया। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के बाद वहाँ तेजी से विकसित हुआ इंफ्रास्ट्रक्चर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

लेकिन योगी सरकार की प्रशासनिक कहानी सिर्फ धार्मिक परियोजनाओं तक सीमित नहीं है। उसी समय बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे बन रहा है, पूर्वांचल में मेडिकल कॉलेज खुल रहे हैं। जेवर में एयरपोर्ट तैयार हो रहा है तो वहीं नोएडा और लखनऊ में औद्योगिक और शहरी परियोजनाएँ आगे बढ़ रही हैं। यानी उनकी राजनीति का सांस्कृतिक पक्ष जितना स्पष्ट है, प्रशासन का विकास पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है।

2017 से 2026: सबसे बड़ा बदलाव क्या है?

अगर पूरे बदलाव को एक लाइन में समझना हो तो कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश की विकास नीति में ‘घोषणा’ से ‘कनेक्टेड सिस्टम’ की ओर बढ़ने की कोशिश हुई है। एक्सप्रेसवे को उद्योग से जोड़ा गया। एयरपोर्ट को लॉजिस्टिक्स से जोड़ा गया।

शहरों को मेट्रो से जोड़ा गया और मेडिकल कॉलेजों को मेडिकल एजुकेशन से। कानून-व्यवस्था को निवेश से जोड़ा गया तो धार्मिक पर्यटन को इंफ्रास्ट्रक्चर से। यही वह बदलाव है, जो योगी सरकार को केवल सड़क और भवन बनाने वाली सरकार से अलग प्रशासनिक मॉडल के रूप में पेश करता है।

गोरखनाथ से लखनऊ तक की कहानी

इस पूरी यात्रा में एक चीज लगातार दिखाई देती है, वह है संस्थागत कामकाज पर जोर। गोरखनाथ पीठ की विरासत को उन्होंने केवल धार्मिक पहचान के रूप में नहीं संभाला, बल्कि उससे जुड़ी संस्थाओं और सामाजिक पहुँच को विस्तार दिया।

मुख्यमंत्री बनने के बाद उसी अनुभव को बड़े पैमाने पर लागू करने की कोशिश की। यही कारण है कि योगी आदित्यनाथ की कहानी को सिर्फ भगवा वस्त्र से सत्ता तक पहुँचने की कहानी के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है।

यह एक ऐसे व्यक्ति की यात्रा है, जिसने पहले एक पीठ की जिम्मेदारी संभाली, फिर संसद में राजनीतिक पहचान बनाई और अंततः देश के सबसे बड़े राज्य की प्रशासनिक मशीनरी को संभाला। गोरखनाथ में जिम्मेदारी एक संस्था की थी। वहीं लखनऊ में जिम्मेदारी 24 करोड़ से अधिक लोगों की है।

शायद यही योगी आदित्यनाथ की पूरी राजनीतिक यात्रा को समझने की सबसे सरल कुंजी है। पीठाधीश्वर के रूप में उन्होंने एक विरासत को संभाला और बढ़ाया; मुख्यमंत्री के रूप में उसी अनुभव को पूरे उत्तर प्रदेश के पैमाने पर लागू करने की कोशिश की।

इस यात्रा का मूल्यांकन इतिहास अंततः विकास, रोजगार, कानून-व्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य और आम आदमी के जीवन में आए वास्तविक बदलाव से करेगा। हालाँकि इतना जरूर कहा जा सकता है कि 1994 में गोरखनाथ पीठ से शुरू हुई वह यात्रा, आज उत्तर प्रदेश की राजनीति और प्रशासन की सबसे प्रभावशाली कहानियों में शामिल हो चुकी है।

अखिलेश सरकार में हुए 62+ हत्याओं को याद करा रहा ‘न भूले थे, न भूले हैं, न भूलेंगे’ पोस्टर: मुजफ्फरनगर दंगों की बरसी पर छलका पीड़ितों का दर्द

मुजफ्फरनगर दंगों की बरसी पर उत्तर प्रदेश के कई शहरों में ‘न भूले थे, न भूले हैं, न भूलेंगे’ लिखे पोस्टर लगा गए हैं। इन पोस्टर्स ने 2013 की उस भयावह हिंसा की याद फिर ताजा कर दी है। लखनऊ, मुजफ्फरनगर, अलीगढ़, सहारनपुर और शामली समेत कई शहरों में ये पोस्टर नजर आए। न भूले थे, न भूले हैं, न भूलेंगे’ यह सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 2013 में हुई उस हिंसा की याद है, जिसने हजारों परिवारों की जिंदगी बदल दी थी।

मुजफ्फरनगर दंगों को याद करते हुए सबसे पहले तारीखों को समझना जरूरी है। अक्सर 7 सितंबर 2013 को दंगों की शुरुआत के तौर पर याद किया जाता है, लेकिन तनाव और सांप्रदायिक घटनाओं का सिलसिला इससे पहले, 27 अगस्त 2013 को कवाल की घटना से शुरू हो चुका था।

7 सितंबर को नंगला मंदौड़ में बड़ी महापंचायत हुई और उसके बाद हिंसा ने व्यापक रूप ले लिया। 27 अगस्त से 16 सितंबर के बीच मुजफ्फरनगर, शामली, बागपत, मेरठ और सहारनपुर में कुल 128 सांप्रदायिक घटनाएँ दर्ज की गईं, जिनमें 99 अकेले मुजफ्फरनगर में थीं। यानी कहानी किसी एक दिन की नहीं थी। करीब तीन हफ्तों तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश का बड़ा हिस्सा तनाव, हिंसा, आगजनी, पलायन और पुलिस-प्रशासन की चुनौती से गुजरता रहा।

कवाल से शुरू हुआ सिलसिला, दो FIR ने खड़ा किया बड़ा सवाल

27 अगस्त 2013 को जानसठ थाना क्षेत्र के गाँव कवाल में तीन युवकों की मौत हुई। मरने वालों में शाहनवाज पुत्र सलीम और सचिन तथा गौरव शामिल थे। इसी घटना के बाद इलाके में तनाव बढ़ता गया।

इस मामले में उसी दिन दो अलग-अलग FIR दर्ज हुईं। पहली FIR गौरव के पिता रविंद्र कुमार ने करीब 2:45 बजे दर्ज कराई थी। इसमें घटना को मोटरसाइकिल और साइकिल की टक्कर के बाद हुए विवाद और मारपीट से जोड़ा गया था। दूसरी FIR रात करीब 9:30 बजे शाहनवाज के पिता सलीम ने दर्ज कराई।

दोनों FIR में अंतर साफ दिखाई देता है। खास तौर पर छेड़छाड़ का जिक्र दोनों शुरुआती FIR में नहीं था, जबकि बाद की पंचायतों में ‘बहू-बेटी बचाओ’ जैसे नारे इस मामले के साथ जुड़ गए। यहीं से वह कहानी शुरू हुई, जिसने बाद में पूरे इलाके को हिंसा की आग में धकेल दिया।

कवाल की घटना के बाद पुलिस ने कई लोगों को हिरासत में लिया। न्यायमूर्ति विष्णु सहाय आयोग के रिकॉर्ड के मुताबिक ऐसे लोगों की संख्या 14 तक बताई गई, जिन्हें बाद में FIR में नाम न होने या पर्याप्त संदेह नहीं मिलने के आधार पर छोड़ दिया गया। आयोग ने बाद में इस शुरुआती पुलिस कार्रवाई को हिंसा बढ़ने के प्रमुख कारणों में गिना। यहीं से प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठने शुरू हुए।

28 अगस्त से बढ़ता तनाव, 30 अगस्त को बड़ी सभा

28 अगस्त को कवाल से लौटती भीड़ ने गाँव में घरों और दुकानों को नुकसान पहुंचाया। झोपड़ियों और ईंट भट्ठों में आग लगाए जाने की रिपोर्ट भी सामने आई। अगले दिन यानी 29 अगस्त को कवाल और उसके दो किलोमीटर के दायरे में धारा 144 लागू की गई। उसी दिन पथराव हुआ और रैपिड एक्शन फोर्स तैनात की गई लेकिन तनाव यहीं नहीं रुका।

30 अगस्त को मुजफ्फरनगर के शहीद चौक पर नमाज के बाद बड़ी सभा हुई। इस सभा को लेकर कोतवाली मुजफ्फरनगर में FIR दर्ज हुई। इस FIR में बहुजन समाज पार्टी से जुड़े कुछ नेताओं के नाम सामने आए। जाँच में समाने आया कि समाजवादी पार्टी के नेता राशिद सिद्दीकी ने सभा में भीड़ को उकसाने वाला भाषण दिया था। यानी तनाव अब गाँवों से निकलकर राजनीतिक और सार्वजनिक मंचों तक पहुंच चुका था।

31 अगस्त को नंगला मंदौड़ और सिखेड़ा क्षेत्र में एक और बड़ी पंचायत हुई। इसके बाद हिंसा की घटनाएँ बढ़ती गईं। प्रशासन के सामने चुनौती साफ थी लेकिन हालात लगातार नियंत्रण से बाहर होते जा रहे थे।

7 सितंबर की महापंचायत बनी बड़ा मोड़

7 सितंबर 2013 को नंगला मंदौड़ इंटर कॉलेज के मैदान में महापंचायत हुई। सरकारी अनुमान के मुताबिक इसमें करीब 15 से 20 हजार लोग थे, जबकि आयोग और प्रशासनिक आकलन में संख्या लगभग 40 से 45 हजार बताई गई।

महापंचायत में नरेश टिकैत, राकेश टिकैत, संगीत सोम, सुरेश राणा, कुंवर भारतेंदु सिंह, सोहनवीर सिंह, कपिल देव अग्रवाल, साध्वी प्राची समेत कई नेताओं की मौजूदगी रही।  

इस पंचायत के खिलाफ सिखेड़ा थाने में उसी दिन FIR दर्ज की गई। 40 लोगों को नामजद किया गया और सैकड़ों को अज्ञात के रूप में दर्ज किया गया। आयोग ने माना कि महापंचायत को प्रभावी तरीके से नहीं रोका गया। पुलिस अधिकारियों के आकलन और कार्रवाई पर भी सवाल उठाए गए।

गाँव-गाँव में फैल गई हिंसा

महापंचायत से लौटती भीड़ पर जौली नहर पट्टी और पुरबालियान मार्ग पर मुसलमानों ने हमला कर दिया। इस हमले में दोनों पक्षों से कई मौतें हुईं और कई लोग घायल हो गए।

8 सितंबर के बाद हिंसा मुजफ्फरनगर शहर तक सीमित नहीं रही बल्कि शामली और आसपास के ग्रामीण इलाकों तक आग पहुंच गई। इसके बाद मुजफ्फरनगर, शामली और मेरठ में कर्फ्यू लगाया गया। कुटबा-कुटबी, फुगाना, लिसाढ़, लांक, बहावड़ी, कतर और काकड़ा समेत कई गांवों से हमले, आगजनी, लूट और लोगों के पलायन की घटनाएं दर्ज हुईं।

प्रशासन के हाथ पाँव फूले तो सेना ने संभाला मोर्चा

शहर में आगजनी के बाद हालात बिगड़ते चले गए और प्रशासन इसे रोकने में विफल रहा जिसके बाद सेना बुलानी पड़ी। अखबारों की उस समय की रिपोर्टों में सुरक्षा बलों की तैनाती और कई गांवों को सेना द्वारा अपने नियंत्रण में लिए जाने की तस्वीरें भी दर्ज हैं।

9 सितंबर तक सेना ने कई गाँवों में मोर्चा संभाल लिया था। यानी जिस कानून-व्यवस्था को राज्य पुलिस और स्थानीय प्रशासन को संभालना था, वहाँ हालात इतने बिगड़ गए कि सेना की मदद लेनी पड़ी।

मौतों का आंकड़ा बढ़ता गया, परिवार उजड़ते गए

हिंसा के शुरुआती दिनों में सरकारी आंकड़ों में मौतों की संख्या लगातार बदलती रही। अक्टूबर 2013 में अखिलेश यादव सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि 6 अक्टूबर तक 46 मुस्लिम और 16 हिंदू मारे गए थे। मुजफ्फरनगर में 37 मुस्लिम और 15 हिंदू मौतों की जानकारी दी गई थी। 14 अक्टूबर तक कुल मौतों का आंकड़ा 63 पहुंच गया था। बाद के सरकारी और आयोग के आंकड़े 62 से 65 के बीच रहे।

हिंसा के बाद राहत शिविरों की तस्वीर ने त्रासदी की दूसरी परत सामने रखी। बड़ी संख्या में हिंदू परिवार अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए। यानी दंगों की कहानी सिर्फ मारे गए लोगों की संख्या तक सीमित नहीं थी। जिन लोगों ने अपनी दुकानें, घर, खेत और वर्षों की जमा पूंजी छोड़ी, उनके लिए भी 2013 एक ऐसी तारीख बन गई, जो कैलेंडर से मिटने वाली नहीं थी।

अखिलेश सरकार पर क्यों उठे सवाल?

मुजफ्फरनगर हिंसा के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी सरकार लगातार विपक्ष के निशाने पर रही। बीजेपी ने राज्यपाल के हस्तक्षेप की माँग करते हुए सरकार को बर्खास्त करने तक की माँग उठाई। कॉन्ग्रेस ने भी सरकार की कार्यशैली और कथित ढिलाई पर सवाल उठाए। 9 सितंबर के अखबारों में अखिलेश सरकार को उनके मुख्यमंत्री कार्यकाल की सबसे बड़ी चुनौती का सामना करते हुए बताया गया था।

अगले दिनों में अखिलेश यादव की सरकार पर जिम्मेदारी से बचने और हालात का ठीकरा विपक्षी दलों पर फोड़ने के आरोप लगा। आयोग ने मुख्य रूप से गलत आकलन, स्थानीय पुलिस की शिथिलता और प्रशासनिक स्तर पर लिए गए फैसलों को जिम्मेदार माना। डीएम और एसएसपी के तबादले तथा कुछ आरोपितों को हिरासत से छोड़े जाने से जाट समुदाय में पक्षपात का संदेश जाने की बात भी आयोग ने दर्ज की।

जाँच आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि प्रशासन ने हालात को संभालने में गलतियाँ कीं, पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठे और शुरुआती फैसलों ने अविश्वास को बढ़ाया।

उकसाने वाले भाषण और वीडियो ने भी बढ़ाया तनाव

दंगों के दौरान भड़काऊ भाषणों और वीडियो के प्रसार ने हालात को और खराब किया। 1 सितंबर के बाद शहीद चौक और नंगला मंदौड़ की सभाओं में दिए गए भाषणों से हालात बिगड़े जिसे सपा सरकार रोकने में नाकाम साबित हुई। नतीजा ये रहा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश कई दिनों तक जलता रहा। आयोग ने भी इसे तनाव बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण कारण माना।

अखिलेश सरकार के आदेश पर इस मामले में संगीत सोम पर आरोप लगाया गया लेकिन दंगों की जांच के लिए गठित SIT को वीडियो मामले में पर्याप्त सबूत नहीं मिले। विशेष अदालत ने भी इस रिपोर्ट को स्वीकारा।  

13 साल बाद भी खत्म नहीं हुई कानूनी कहानी

मुजफ्फरनगर दंगों के बाद 24 सितंबर 2013 को विशेष जाँच प्रकोष्ठ बनाया गया। सुप्रीम कोर्ट को 2014 में बताया गया कि यह प्रकोष्ठ 566 मामलों की जाँच कर रहा था, इनमें 533 मामले मुजफ्फरनगर से जुड़े थे।

लेकिन मुकदमों की लंबी यात्रा में बड़ी संख्या में आरोपी बरी भी हुए। 2017 से 2019 के बीच जिन 41 मामलों में फैसले आए, उनमें 40 में सभी आरोपी बरी हो गए। गवाहों के मुकरने, अदालत में गवाही के लिए उपस्थित न होने और तलाशी से जुड़े सबूतों पर निर्भरता जैसी वजहें सामने आईं।

कवाल के दोहरे हत्याकांड में 2019 में सात आरोपियों को दोषी ठहराया गया और उम्रकैद की सजा सुनाई गई। यानी 2013 की हिंसा की कानूनी कहानी भी उतनी ही उलझी हुई रही, जितनी उसकी राजनीतिक कहानी।

आज फिर वही सवाल सामने हैं

13 साल बाद जब शहरों की दीवारों पर लिखा है, ‘न भूले थे, न भूले हैं, न भूलेंगे’, तो उसके पीछे सिर्फ पुरानी राजनीतिक लड़ाई नहीं है। यह उन परिवारों की याद भी है जिन्होंने हिंसा देखी, घर छोड़े और राहत शिविरों में दिन काटे।

मुजफ्फरनगर दंगों ने यह सवाल हमेशा के लिए छोड़ दिया कि अगर शुरुआती तनाव के संकेतों को गंभीरता से लिया जाता, अगर कवाल के बाद प्रशासन ज्यादा प्रभावी ढंग से कार्रवाई करता, अगर पुलिस-प्रशासन हालात को समय रहते नियंत्रित कर लेता, तो क्या हिंसा इतनी दूर तक पहुंचती?

हैशटैग लगाओ, दुनिया बदलो… कितना आसान है न? क्या सोशल मीडिया लोकतंत्र को बर्बाद कर रहा है?

सदियों से इंसान एक ही खूबसूरत लेकिन शायद असंभव सपने के पीछे भागता आया है, एक ऐसे समाज का सपना, जहाँ सब कुछ आदर्श हो। प्राचीन दार्शनिकों की कल्पनाओं से लेकर प्रबुद्धता काल के बड़े-बड़े विचारों और बीसवीं सदी के खतरनाक सामाजिक प्रयोगों तक, इंसान बार-बार इस भ्रम में पड़ता रहा है कि समाज से हर तरह का तनाव, संघर्ष और दुख हमेशा के लिए खत्म किया जा सकता है।

आज इसी पुराने सपने को डिजिटल दुनिया ने एक नया ठिकाना दे दिया है।

सोशल मीडिया और उससे जुड़े डिजिटल एक्टिविस्ट सिर्फ दुनिया की कमियाँ नहीं गिनाते। कई बार वे एक ऐसी दुनिया का सपना भी बेचते हैं, जहाँ सब कुछ बिल्कुल सही हो, पूरी तरह न्याय हो, हर किसी के साथ बराबरी हो और हर व्यक्ति नैतिक रूप से सही हो।

लेकिन समस्या ये है कि ऐसी पूर्ण दुनिया कोई भी सरकार नहीं बना सकती। चाहे सरकार कितनी भी अमीर हो, कितनी भी सक्षम हो या कितनी भी दूरदर्शी क्यों न हो। यही आधुनिक Perfectionism यानी पूर्णतावाद असल में खतरनाक हो सकता है। क्योंकि ये धीरे-धीरे लोकतंत्र की नींव को ही कमजोर कर सकता है।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी सच्चाई यही है कि इंसान परफेक्ट नहीं है। इसलिए लोकतंत्र ऐसा सिस्टम है जो लोगों के मतभेदों और कमियों के बावजूद उन्हें साथ लेकर चलने की कोशिश करता है। ये कोई परफेक्ट या तेज़ सिस्टम नहीं है। बल्कि ये जानबूझकर ऐसा बनाया गया है कि बड़े से बड़ा मतभेद भी गृहयुद्ध में न बदले।

लेकिन जब सोशल मीडिया लोगों को ये उम्मीद दिलाने लगे कि हर नीति बिल्कुल सही होनी चाहिए, हर संस्था पूरी तरह ईमानदार होनी चाहिए और हर समस्या का तुरंत समाधान हो जाना चाहिए, तब लोकतंत्र की सामान्य कमियाँ भी लोगों को असहनीय लगने लगती हैं।

फिर सरकार की कोई गलती सिर्फ एक गलती नहीं रह जाती। उसे पूरे सिस्टम के भ्रष्ट होने का सबूत मान लिया जाता है। और फिर मांग उठती है कि पूरे सिस्टम को ही जड़ से बदल दिया जाए। यानी जिस शासन व्यवस्था को इंसान की कमियों और मतभेदों को संभालने के लिए बनाया गया था, उसी के खिलाफ़ अब एक ऐसी ‘पूर्णता’ की उम्मीद को हथियार बनाया जा रहा है, जिसे हासिल करना असल में संभव ही नहीं है।

आज के डिजिटल दौर के इस खतरे को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाकर इतिहास को देखना होगा। हमें समझना होगा कि समय-समय पर बड़ी-बड़ी आदर्शवादी कल्पनाएँ कैसे टूटती रही हैं, पश्चिमी और यूरोपीय सभ्यताओं में बार-बार कौन-सी कमजोरियाँ सामने आती रही हैं, और सबसे जरूरी बात- आज के सोशल मीडिया का पूरा ढांचा किस तरह लोकतंत्र के लिए एक नए तरह का संकट पैदा कर रहा है।

भ्रम की कहानी: काल्पनिक आदर्श समाज बार-बार क्यों असफल हुए?

‘यूटोपिया’ शब्द 1516 में सर थॉमस मोर ने बनाया था। यह ग्रीक भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना था- ‘अच्छी जगह’ और ‘ऐसी जगह जो कहीं है ही नहीं’। यानी मोर अपने समय में ही समझ गए थे कि एक बिल्कुल परफेक्ट समाज, असल में, शायद सिर्फ कल्पना में ही हो सकता है।

लेकिन इसके बावजूद इंसान ने सदियों तक इस कल्पना को हकीकत बनाने की कोशिश की। और जब-जब ऐसा करने की कोशिश हुई, नतीजे अक्सर बेहद विनाशकारी रहे।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण हमें अठारहवीं सदी के आखिर में फ्रांसीसी क्रांति के दौरान देखने को मिलता है। क्रांतिकारी इस विचार से प्रभावित थे कि अगर समाज की पुरानी व्यवस्थाओं को पूरी तरह बदल दिया जाए, तो इंसान और उसका स्वभाव भी बदला जा सकता है। इसलिए उन्होंने सदियों पुरानी परंपराओं, धर्म और संस्थाओं को तेजी से खत्म करने की कोशिश की।

शुरुआत में नारा था- स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व। लेकिन कुछ ही समय में यही क्रांति ‘आतंक के शासन’ में बदल गई। रोबेस्पिएर और उसके साथियों का मानना था कि एक आदर्श गणराज्य बनाने के लिए ‘सद्गुण’ के साथ ‘आतंक’ का इस्तेमाल भी जरूरी है। समस्या यही थी, जब आप एक ऐसा समाज बनाना चाहते हैं जहाँ कोई भ्रष्टाचार या असहमति हो ही नहीं, तो जो भी आपके आदर्श से असहमत होगा, वह आपको दुश्मन नजर आने लगेगा।

और फिर वही हुआ। जिस क्रांति ने एक बेहतर समाज का सपना दिखाया था, उसी ने अपने ही लोगों को गिलोटिन पर चढ़ाना शुरू कर दिया।

यही वह बात थी जिसकी ओर ब्रिटिश विचारक एडमंड बर्क ने इशारा किया था, जब इंसान खुद को ईश्वर की तरह समाज को पूरी तरह गढ़ने वाला समझने लगता है, तो उसके फैसले कई बार राक्षसी रूप ले लेते हैं। उन्नीसवीं सदी में भी ऐसे आदर्श समाज बनाने की कोशिशें जारी रहीं। हालांकि इस बार उनका रूप थोड़ा नरम था।

ब्रिटेन और अमेरिका में रॉबर्ट ओवेन और फ्रांस में चार्ल्स फूरियर जैसे विचारकों ने औद्योगिक क्रांति से पैदा हुई गरीबी और असमानता का समाधान एक नए तरह के समाज में खोजने की कोशिश की। उन्होंने ऐसे समुदाय बनाने की कोशिश की जहाँ प्रतिस्पर्धा, लालच और सामाजिक ऊँच-नीच को खत्म किया जा सके।

रॉबर्ट ओवेन ने अमेरिका के इंडियाना में न्यू हार्मनी नाम की एक ऐसी ही सामुदायिक व्यवस्था बनाई। लेकिन कुछ ही सालों में वह टूट गई। आपसी वैचारिक मतभेद, खराब प्रबंधन और सबसे बड़ी बात, इंसानी स्वभाव का किसी तय खांचे में फिट न होना; इसके पीछे बड़ी वजहें थीं।

चार्ल्स फूरियर ने भी ऐसे सहकारी समुदायों की कल्पना की थी जिन्हें उन्होंने ‘फैलनस्टेरी’ कहा। उनका मानना था कि अगर समाज को सही तरीके से व्यवस्थित कर दिया जाए, तो काम भी इंसान के लिए आनंद का अनुभव बन सकता है। लेकिन ये प्रयोग भी बड़े स्तर पर सफल नहीं हो सके।

इन सभी उदाहरणों में एक बात कॉमन थी। इन विचारों में इंसान को एक जटिल और स्वतंत्र प्राणी मानने के बजाय ऐसी चीज़ समझ लिया गया जिसे किसी भी मनचाहे साँचे में ढाला जा सकता है। और जब असली दुनिया उस कल्पना के मुताबिक नहीं चलती, तो समस्या विचार में नहीं, इंसानों में खोजी जाती है।

फिर दबाव बढ़ाया जाता है। नियम और सख्त किए जाते हैं। विरोध को दबाया जाता है। और आखिरकार आदर्श समाज बनाने की कोशिश, लोगों को मजबूर करने की कोशिश बन जाती है।

बीसवीं सदी में यह प्रवृत्ति अपने सबसे खतरनाक रूप में दिखाई दी। यूरोप के अधिनायकवादी शासन, खासकर सोवियत साम्यवाद और नाज़ीवाद, दोनों ने समाज को एक बिल्कुल नए आदर्श के मुताबिक ढालने का दावा किया।

मार्क्सवाद-लेनिनवाद ने एक ऐसे वर्गहीन और अंततः राज्यहीन समाज का सपना दिखाया जिसमें पुराने ‘बुर्जुआ’ ढाँचे का पूरी तरह अंत हो जाएगा। लेकिन इस सपने को लागू करने की कोशिशों में जबरन सामूहिकीकरण, अकाल, गुलाग और राजनीतिक सफाए जैसी भयावह घटनाएँ हुईं, जिनमें करोड़ों लोगों की जान गई।

दूसरी तरफ नाज़ीवाद ने नस्ल और राष्ट्र के पुनरुत्थान का सपना दिखाया। उसका अंत होलोकॉस्ट के औद्योगिक पैमाने पर किए गए नरसंहार और पूरे यूरोप को तबाह करने वाले युद्ध में हुआ। इतिहास से एक बात बहुत साफ दिखाई देती है- जब कोई समाज पूर्णता हासिल करने के नाम पर इंसानी स्वभाव और उसकी सीमाओं को नज़रअंदाज़ करता है, तो वह अक्सर सुधार के बजाय विनाश की तरफ बढ़ने लगता है।

ये आदर्शवादी प्रयोग सिर्फ संयोग से असफल नहीं हुए। उनके भीतर ही एक बुनियादी समस्या थी, उन्होंने इंसान को वैसा स्वीकार नहीं किया जैसा वह वास्तव में है। इंसान जटिल है। उसमें स्वार्थ भी है और परोपकार भी, अच्छाई भी है और बुराई भी, तर्क भी है और भावनाएँ भी। और शायद इसी वजह से एक परफेक्ट समाज बनाने की कोशिश, बार-बार एक ही गलती करती है, वह इंसान को बदलने से पहले इंसान को समझना भूल जाती है।

यूरोप का अनुभव: उत्थान, पतन और हमेशा टिके रहने का भ्रम

अगर हम यूरोप के इतिहास को देखें, तो आधुनिक ‘आदर्श समाज’ की कल्पनाओं को लेकर सावधान रहने की वजह और साफ दिखाई देती है। यूरोपीय सभ्यता का इतिहास लंबे समय से एक जैसे चक्रों से गुजरता रहा है, बड़े सपने, बड़ी महत्वाकांक्षाएँ, ताकत और विस्तार… और फिर किसी न किसी मोड़ पर भारी गिरावट।

रोमन साम्राज्य हो, पवित्र रोमन साम्राज्य, पुनर्जागरण के दौर के अलग-अलग यूरोपीय राजतंत्र या उन्नीसवीं सदी की साम्राज्यवादी ताकतें, इन सभी को कभी न कभी लगा कि उनकी व्यवस्था लंबे समय तक चलती रहेगी।

लेकिन इतिहास ने बार-बार दिखाया कि कोई भी व्यवस्था हमेशा के लिए नहीं चलती। संस्थाएँ कितनी भी मजबूत और विकसित क्यों न हों, बाहरी संकट, अंदर का भ्रष्टाचार और जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास धीरे-धीरे उन्हें कमजोर कर सकते हैं। बीसवीं सदी में यूरोप ने इसका सबसे भयानक उदाहरण देखा। दो विश्व युद्धों ने यूरोप को बुरी तरह तबाह कर दिया और दुनिया में उसकी पुरानी ताकत और पकड़ लगभग खत्म हो गई। जिस यूरोप को अपनी तकनीकी और सभ्यतागत श्रेष्ठता पर बहुत भरोसा था, वही यूरोप अनजाने में ऐसी तबाही की तरफ बढ़ गया जिसकी कीमत करोड़ों लोगों ने चुकाई।

लेकिन 1945 के बाद यूरोप ने फिर खुद को खड़ा किया। युद्ध के खंडहरों से एक नई व्यवस्था निकली; कल्याणकारी राज्य, मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाएँ और बाद में यूरोपीय संघ जैसी व्यवस्थाएँ।

यह मॉडल पूरी दुनिया के लिए एक उदाहरण बन गया। विचार ये था कि पूंजीवाद से पैदा होने वाली असमानताओं और समस्याओं को सामाजिक सुरक्षा के जरिए कम किया जाए और साथ ही फासीवाद और साम्यवाद जैसी चरम विचारधाराओं को दोबारा मजबूत होने से रोका जाए।

लेकिन आज यूरोप और बड़े पैमाने पर पश्चिमी लोकतांत्रिक दुनिया फिर से कई तरह के दबावों का सामना कर रही है।

अर्थव्यवस्था की धीमी रफ्तार, घटती आबादी, यूरोपीय एकीकरण को लेकर मतभेद और अपनी सभ्यता को लेकर बढ़ता आत्मविश्वास का संकट, इन सबने युद्ध के बाद बनी उस व्यवस्था को फिर सवालों के घेरे में ला दिया है।

यहीं से एक पुराना विचार फिर सुनाई देने लगता है कि यूरोपीय समाज धीरे-धीरे पतन की ओर बढ़ता है।

लेकिन पतन का मतलब हमेशा कोई अचानक आने वाली हॉलीवुड फिल्म जैसी तबाही नहीं होता।

कई बार सभ्यताएँ धीरे-धीरे कमजोर होती हैं। उनका सामाजिक मेल-जोल कम होने लगता है, लोग अलग-अलग वैचारिक खेमों में बंटने लगते हैं और वे साझा कहानियाँ और मूल्य कमजोर पड़ने लगते हैं जो कभी पूरे समाज को एक साथ जोड़ते थे।

आज इन मुश्किलों का सामना करने के लिए व्यावहारिक और धीरे-धीरे होने वाले सुधारों की जरूरत है।

लेकिन इसके बजाय सार्वजनिक बहस में डिजिटल आदर्शवाद का असर बढ़ता जा रहा है।

सोशल मीडिया पर जटिल समस्याओं के आसान समाधान पेश किए जाते हैं।

खरबों डॉलर की अर्थव्यवस्था हो, अलग-अलग विचारों और पहचानों वाला समाज हो या कोई गहरा सामाजिक संकट; इन सबका समाधान कभी-कभी ऐसे बताया जाता है मानो बस कुछ लोगों को ‘गलत’ घोषित कर दो, सही हैशटैग चला दो या अपनी संस्थाओं की नैतिकता पर लगातार सवाल उठाते रहो… और फिर समाज अपने आप एक आदर्श स्थिति में पहुँच जाएगा।

यानी असली दुनिया की जटिल समस्याओं के लिए भी डिजिटल दुनिया एक बेहद सरल जवाब देती है, सही लोगों को दोष दो, सही नारा लगाओ और मान लो कि समस्या हल हो गई।

सोशल मीडिया और नया यूटोपियनवाद

पहले के दौर में जब लोग एक आदर्श समाज बनाने का सपना देखते थे, तो उसके पीछे कोई बड़ा नेता, कोई क्रांतिकारी संगठन या कोई राजनीतिक आंदोलन होता था।

आज ऐसा नहीं है।

आज का नया यूटोपियनवाद सिलिकॉन वैली के सर्वर और सोशल मीडिया के एल्गोरिदम से चलता है और दुनिया भर में फैले डिजिटल एक्टिविस्टों के नेटवर्क के जरिए फैलता है।

सोशल मीडिया का पूरा ढांचा लोकतांत्रिक व्यवस्था के उस तरीके से काफी अलग है, जिसमें धीरे-धीरे बातचीत, समझौते और सहमति से फैसले लिए जाते हैं।

सोशल मीडिया कंपनियों का कारोबार इस बात पर टिका है कि लोग ज्यादा से ज्यादा समय प्लेटफॉर्म पर बिताएँ और ज्यादा से ज्यादा प्रतिक्रिया दें। और लोगों को सबसे ज्यादा प्रतिक्रिया किस चीज़ पर होती है? भावनाओं पर; खासकर गुस्से, नैतिक आक्रोश और किसी मुद्दे पर सामूहिक रूप से भड़कने पर।

इसलिए सोशल मीडिया पर राजनीति भी धीरे-धीरे सरल और ज्यादा आक्रामक होती चली गई है।

जटिल नीतिगत बहसों को अक्सर ‘अच्छाई बनाम बुराई’ की लड़ाई में बदल दिया जाता है। आपको बस ये तय करना होता है कि कौन सही है और कौन गलत।

बीच की कोई जगह नहीं।

इसी माहौल में डिजिटल एक्टिविस्ट खुद को नैतिकता के नए पहरेदार की तरह पेश करने लगते हैं।

वे समाज से ऐसी वैचारिक और नैतिक पूर्णता की उम्मीद करने लगते हैं, जिसे कोई इंसान तो क्या, कोई सरकार भी कभी पूरी तरह हासिल नहीं कर सकती।

X, TikTok और Instagram जैसे प्लेटफॉर्मों पर अक्सर ऐसी मांगें तेजी से फैलती हैं जो बेहद कठोर और चरम (बोलचाल की भाषा में इसे ‘एक्ट्रिमिस्ट’ कहा जाने लगा है) होती हैं।

बारीकियों और संदर्भ की कोई खास जगह नहीं बचती। अगर आप थोड़ा संतुलित रुख अपनाते हैं, तो आपको गलत व्यवस्था का समर्थक मान लिया जाता है। अगर आप समझौता करते हैं, तो आपको अपने ही विचारों से विश्वासघात करने वाला बता दिया जाता है।

अब जरा सोचिए कि इसका असर सरकार और नीतियों पर कैसे पड़ता है।

एक लोकतांत्रिक सरकार के लिए कानून बनाना कोई आसान काम नहीं है। सरकार को अलग-अलग लोगों और समूहों के हितों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। बजट सीमित होता है, संसाधन सीमित होते हैं और हर फैसले के कुछ फायदे तो कुछ नुकसान होते हैं।

मान लीजिए सरकार को परिवहन व्यवस्था सुधारनी है, स्वास्थ्य सेवा बेहतर करनी है या प्रवासन की समस्या संभालनी है। उसे कई अलग-अलग हितों के बीच संतुलन बनाना पड़ेगा। और कई बार उसे ऐसी कमियाँ भी स्वीकार करनी पड़ेंगी जिन्हें तुरंत दूर करना संभव नहीं है।

लेकिन सोशल मीडिया की राजनीति इस पूरी प्रक्रिया को ‘पूर्णता’ के पैमाने पर परखती है।

कोई कानून पूरी तरह आदर्श नहीं है, तो वह भ्रष्टाचार का सबूत है।

किसी सरकारी संस्था में कमी है, तो मान लिया जाता है कि यह जानबूझकर की गई गड़बड़ी है।

किसी नीति में समझौता हुआ है, तो उसे कमजोरी या विश्वासघात समझ लिया जाता है।

और यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण अंतर है।

डिजिटल एक्टिविस्टों को सरकार चलाने की जिम्मेदारी नहीं उठानी पड़ती। उन्हें देश का बजट संतुलित नहीं करना होता, सीमाओं की सुरक्षा नहीं करनी होती, दूसरी सरकारों से बातचीत नहीं करनी होती और न ही हर दिन ऐसे फैसले लेने पड़ते हैं जिनमें किसी न किसी पक्ष को निराश होना ही है।

इसलिए वे वैचारिक रूप से पूरी तरह ‘शुद्ध’ रहने का दावा कर सकते हैं।

यहीं से समस्या शुरू होती है।

जब लोगों को इंटरनेट पर हर मुद्दे का एकदम साफ, नैतिक और आदर्श जवाब दिखाई देता है, तो लोकतंत्र की असली प्रक्रिया, जो धीमी है, उलझी हुई है और जिसमें लगातार समझौते करने पड़ते हैं, बहुत निराशाजनक लगने लगती है।

और यही अंतर धीरे-धीरे बढ़ता जाता है।

इंटरनेट हमें जिस दुनिया की उम्मीद दिखाता है और राजनीति जिस दुनिया में वास्तव में काम करती है, उनके बीच की दूरी जितनी बढ़ती जाती है, लोकतंत्र पर लोगों का भरोसा उतना ही कमजोर होता जाता है।

बारीक समझ का अंत और लोकतंत्र की कमजोरी

लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वह किसी ‘परफेक्ट समाज’ का सपना बेचने के बजाय इस बात को स्वीकार करता है कि इंसान और समाज दोनों अपूर्ण हैं।

दार्शनिक कार्ल पॉपर ने अपनी किताब The Open Society and Its Enemies में इसी तरह के विचारों के खिलाफ तर्क दिया था। वे इस सोच के विरोधी थे कि इतिहास किसी तय दिशा में आगे बढ़ रहा है और हम पूरे समाज को एक झटके में नए सिरे से बना सकते हैं।

इसके बजाय पॉपर ने ‘क्रमिक सामाजिक बदलाव’ (Piecemeal social engineering) की बात की।

मतलब ये कि समाज की किसी खास समस्या; जैसे- गरीबी, बीमारी या अन्याय को पहचानो, उसका धीरे-धीरे समाधान निकालो और फिर देखो कि उस समाधान से कोई नई समस्या तो पैदा नहीं हो गई। अगर हुई है, तो उसे भी धीरे-धीरे ठीक करो।

यही लोकतंत्र की असली ताकत है।

लोकतंत्र इसलिए काम करता है क्योंकि वह धरती पर स्वर्ग बनाने का वादा नहीं करता। वह हमें इससे कहीं ज्यादा व्यावहारिक चीज़ देता है; बिना हिंसा के सरकार बदलने का रास्ता, लोगों के अधिकारों की रक्षा और ऐसा मंच जहाँ अलग-अलग हितों और विचारों के बीच कानून और बातचीत के जरिए रास्ता निकाला जा सके।

लेकिन सोशल मीडिया इस लोकतांत्रिक संस्कृति को कई तरीकों से कमजोर कर रहा है।

1. साझा सच्चाई पर भरोसा कम होना

लोकतंत्र के लिए जरूरी है कि लोग कम से कम कुछ बुनियादी तथ्यों पर सहमत हों। लेकिन सोशल मीडिया के एल्गोरिदम हर व्यक्ति को उसकी पसंद के हिसाब से अलग-अलग जानकारी दिखाते हैं।

नतीजा ये है कि लोग सिर्फ नीतियों पर एक-दूसरे से असहमत नहीं हैं। कई बार दोनों पक्षों के पास दुनिया को देखने के लिए बिल्कुल अलग-अलग ‘तथ्य’ होते हैं।

जब समाज के पास सच को परखने का कोई साझा आधार ही नहीं बचता, तो लोकतांत्रिक बहस धीरे-धीरे विचारों की बहस न रहकर गुटों की लड़ाई बन जाती है।

2. कैंसल करने और डर का माहौल

सोशल मीडिया पर लगातार आलोचना या ‘कैंसल’ होने का डर लोगों को खुलकर बोलने से रोक सकता है।

राजनेता, शिक्षक, पत्रकार और आम लोग भी कई बार सिर्फ इसलिए अपनी बात कहने से बचते हैं कि कहीं सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ अभियान न शुरू हो जाए।

और जब लोग अपनी बात कहने से डरने लगें, तो खुली बहस कैसे होगी?

3. राजनीति का बहुत तेजी से अस्थिर होना

सोशल मीडिया को तेजी चाहिए। नया मुद्दा, नया विवाद, नया ट्रेंड और कुछ ही घंटों में पूरा ध्यान उस पर चला जाता है।

इसका असर राजनीति पर भी पड़ता है। लंबे समय की योजनाओं और मुश्किल समस्याओं पर लगातार काम करने के बजाय सरकारों पर भी हर नए ट्रेंडिंग मुद्दे पर तुरंत प्रतिक्रिया देने का दबाव बढ़ता जाता है।

नतीजा ये होता है कि सरकारें कई बार किसी समस्या को जड़ से हल करने के बजाय एक ट्रेंडिंग मुद्दे से दूसरे ट्रेंडिंग मुद्दे की तरफ भागती रहती हैं।

और जब ये तीनों चीजें एक साथ आती हैं, तो लोकतंत्र का सबसे जरूरी हिस्सा, मध्यमार्ग और संतुलन, कमजोर पड़ने लगता है।

जो लोग बातचीत, समझौते और धीरे-धीरे बदलाव की बात करते हैं, उनकी आवाज़ अक्सर उन ज्यादा उग्र लोगों के बीच दब जाती है जो मानते हैं कि मौजूदा व्यवस्था को पूरी तरह तोड़कर ही एक नई और बेहतर दुनिया बनाई जा सकती है।

यही लोकतंत्र के लिए असली खतरा है; जब सुधार की जगह क्रांति, समझौते की जगह पूर्णता और बातचीत की जगह वैचारिक युद्ध हावी होने लगे।

राजनीतिक यथार्थवाद को फिर से समझना

अगर राहुल गांधी ये चेतावनी दे रहे हैं कि लोकतंत्र खतरे में है, तो उनकी बात को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। सोशल मीडिया जिस तरह आज काम करता है, वह लोकतंत्र की सोच और उसकी संस्थाओं के लिए सचमुच एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

डिजिटल दुनिया लोगों को लगातार एक ऐसी ‘आदर्श व्यवस्था’ की तस्वीर दिखाती रहती है, जो असल जिंदगी में संभव ही नहीं है। इससे लोग अपनी सरकार, संस्थाओं और पूरी राजनीतिक व्यवस्था से हमेशा असंतुष्ट रहने लगते हैं।

राजनीति भी धीरे-धीरे ऐसी हो जाती है जहाँ हर विवाद पर तुरंत प्रतिक्रिया चाहिए, हर समस्या का तुरंत समाधान चाहिए और हर समाधान बस एक नए सोशल मीडिया कैंपेन की दूरी पर दिखाई देने लगता है।

इस डिजिटल दौर में लोकतंत्र को बचाए रखने के लिए हमें अपनी सोच और अपनी संस्थाओं, दोनों में कुछ बदलाव करने होंगे।

सबसे पहले हमें इंटरनेट से पैदा होने वाली इन अवास्तविक उम्मीदों को थोड़ा कम करना होगा और राजनीतिक यथार्थवाद को फिर से समझना होगा।

इसके लिए नागरिकों में जागरूकता जरूरी है। लोगों को ये समझना होगा कि सोशल मीडिया पर दिखने वाला हर आक्रोश स्वाभाविक नहीं होता, कई बार एल्गोरिदम ही उसे बढ़ा रहे होते हैं।

हमें अपने नेताओं से भी ये उम्मीद करनी होगी कि वे हर ट्रेंडिंग मुद्दे के पीछे भागने के बजाय लंबी अवधि की समस्याओं पर ध्यान दें।

और सिर्फ सोशल मीडिया पर बहस करने के बजाय लोगों को स्थानीय समुदायों, सामाजिक संगठनों और लोकतांत्रिक संस्थाओं के वास्तविक काम में भी हिस्सा लेना होगा।

इतिहास हमें एक और महत्वपूर्ण बात सिखाता है।

समाज सिर्फ बाहरी दुश्मनों के हमले से नहीं टूटते। कई बार वे तब भी कमजोर पड़ने लगते हैं जब उनके अपने लोग ही अपनी व्यवस्था पर भरोसा खो देते हैं।

डिजिटल आदर्शवाद हमें एक ऐसी दुनिया का सपना दिखाता है जिसमें सब कुछ परफेक्ट हो। लेकिन इतिहास बार-बार बता चुका है कि ऐसा समाज बनाना लगभग हमेशा एक भ्रम ही साबित हुआ है।

इसलिए आज लोकतंत्र की असली रक्षा इस बात में नहीं है कि हम उसे परफेक्ट बनाने की कोशिश करें।

उसकी असली रक्षा इस बात में है कि हम उसकी कमियों को स्वीकार करें, उसकी गलतियों को सुधारते रहें और फिर भी उस व्यवस्था पर भरोसा बनाए रखें।

क्योंकि एक ऐसा समाज जो स्वतंत्र है, जटिल है और अपनी गलतियों को सुधारने की क्षमता रखता है, वह किसी भी सोशल मीडिया पर दिखाए जाने वाले ‘परफेक्ट समाज’ के सपने से कहीं ज्यादा कीमती है।

बेचे जाने और लीज पर देने का अंतर भूल बैठे हैं अखिलेश यादव, JPNIC ‘बिक गया’ या सिर्फ लीज पर गया? सपा प्रमुख के दावे और CAG की रिपोर्ट के बीच का सच

लखनऊ के गोमतीनगर में खड़ा जयप्रकाश नारायण इंटरनेशनल सेंटर, यानी JPNIC एक बार फिर सुर्खियों में है। करीब एक दशक पहले शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट आज तक ठीक से जनता के काम नहीं आ पाया और अब योगी सरकार ने तय किया है कि इसका बचा-खुचा निर्माण और आगे का संचालन निजी हाथों में सौंप दिया जाए। सरकार की दलील सीधी है, परिसर भी पूरा हो जाएगा, और रखरखाव का बोझ भी खजाने पर नहीं पड़ेगा।

बस यही ऐलान होते ही अखिलेश यादव मैदान में कूद पड़े। उनका कहना है कि योगी सरकार JPNIC को ‘बेच’ रही है, निजीकरण के नाम पर सरकारी संपत्ति ठिकाने लगाई जा रही है।

तो सवाल उठता है कि क्या वाकई JPNIC बिक गया? क्या इसकी मिल्कियत किसी कंपनी के नाम हो गई? जिस प्रोजेक्ट को लेकर आज इतना हंगामा है, उसके निर्माण में खर्च को लेकर खुद CAG ने क्या पाया था? इन सबका जवाब जानने के लिए कहानी को शुरू से पकड़ना होगा।

पहले जानिए, JPNIC है क्या चीज

गोमतीनगर की करीब 18-20 एकड़ ज़मीन पर बना यह एक बड़ा सा बहुउद्देशीय परिसर है, जिसे शुरू से ही एक आधुनिक कन्वेंशन और सांस्कृतिक केंद्र के तौर पर सोचा गया था। नक्शे में एक स्टेट लेवल कन्वेंशन सेंटर, करीब 2,000 लोगों के बैठने लायक हॉल, ऑडिटोरियम, स्पोर्ट्स कोर्ट, ओलंपिक साइज का स्विमिंग पूल, होटल, पार्किंग और जयप्रकाश नारायण से जुड़ा एक म्यूजियम ब्लॉक, सब कुछ शामिल था। मतलब सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि आयोजनों, सम्मेलनों और खेल गतिविधियों के लिए बना एक पूरा कॉम्प्लेक्स।

इसकी नींव 2013 में अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री रहते पड़ी थी। तब लागत आंकी गई थी ₹265.59 करोड़ लेकिन जैसे-जैसे साल बीतते गए, यह आंकड़ा भी बढ़ता गया और नवंबर 2016 आते-आते संशोधित लागत पहुँच गई ₹864.99 करोड़ तक। CAG की ऑडिट रिपोर्ट में भी यही दो आँकड़े दर्ज हैं, शुरुआती 265.59 करोड़ और संशोधित 864.99 करोड़।

यहीं से यह कहानी सिर्फ ‘एक अधूरी इमारत’ की नहीं रह जाती, यह सार्वजनिक पैसे के हिसाब-किताब और जवाबदेही की कहानी बन जाती है।

लखनऊ के गोमती नगर में स्थित जयप्रकाश नारायण इंटरनेशनल सेंटर। फोटो साभार- X

लागत तीन गुने से भी ज्यादा कैसे बढ़ी

निर्माण की जिम्मेदारी लखनऊ विकास प्राधिकरण यानी LDA को दी गई थी। मार्च 2013 में जब लागत ₹265.59 करोड़ तय हुई, उसके कुछ ही महीनों बाद मई 2013 में LDA ने काम एक ठेकेदार को सौंप दिया ₹149.60 करोड़ में जो अनुमानित लागत से करीब 12.35 फीसदी ज्यादा था।

फिर धीरे-धीरे प्रोजेक्ट में बदलाव जुड़ते गए। जैसे, शुरुआती डिज़ाइन में हेलिपैड का कोई ज़िक्र नहीं था। बाद में नेशनल बिल्डिंग कोड की शर्तों के चलते छत पर हेलिपैड जोड़ना पड़ा, और इसके लिए नींव में 600 मिमी की जगह 1,000 मिमी वाले पाइल इस्तेमाल करने पड़े। अब यह बदलाव अपने आप में कोई असामान्य बात नहीं, निर्माण के दौरान ऐसे फेरबदल होते रहते हैं। असली सवाल इस काम पर चुकाई गई दर को लेकर उठा।

और यहीं CAG ने उंगली उठाई

ऑडिट में सामने आया कि 1,000 मिमी पाइल के काम के लिए ठेकेदार को ₹8,773.69 प्रति मीटर की दर से भुगतान हुआ, जबकि CAG के मुताबिक 2013 की लागू दर के हिसाब से यह सिर्फ ₹8,201.40 प्रति मीटर बनती थी। कुल 24,680 मीटर के इस काम पर यह छोटा-सा अंतर जुड़कर करीब ₹1.41 करोड़ का ‘अनुचित लाभ’ ठेकेदार की जेब में गया और उतनी ही रकम का घाटा सरकारी खजाने को हुआ। रिपोर्ट में इसे साफ शब्दों में ‘undue benefit’ कहा गया है।

यह कोई विपक्ष का लगाया आरोप नहीं बल्कि खुद देश के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की ऑडिट रिपोर्ट में दर्ज है।

योगी सरकार ने गड़बड़ियों की जाँच कराई

2017 में सरकार बदली और योगी आदित्यनाथ ने JPNIC के खर्चों पर आई रिपोर्ट के आधार पर जाँच कराई जिससे काम रुक गया। इसके बाद बरसों तक यह विशाल परिसर लगभग सुनसान पड़ा रहा। आखिरकार 2025 में सरकार ने फैसला लिया कि इसे फिर से LDA के जिम्मे किया जाए, ताकि अधूरा काम पूरा हो सके और कोई संचालन मॉडल तय हो।

अब हुआ क्या

अगस्त 2026 में योगी कैबिनेट ने JPNIC को निजी क्षेत्र के जरिए चलवाने के प्रस्ताव पर मुहर लगा दी। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक खुली निविदा प्रक्रिया के बाद वृंदावन बॉटलर्स प्राइवेट लिमिटेड और रॉकवुड होटल्स एंड रिजॉर्ट्स के एक संयुक्त उपक्रम को चुना गया।

अब यहीं पर ध्यान देने वाली बात है कि ‘बेचना’ और ‘लीज पर देकर चलवाना’, दोनों एक चीज नहीं हैं। सरकार ने न तो JPNIC की जमीन बेची है, न ही इसकी सरकारी मिल्कियत किसी कंपनी के नाम की है। जो व्यवस्था बनी है वह लीज और सहभागिता की है और कंपनी को संचालन का अधिकार मिलेगा, मालिकाना हक सरकार के पास ही रहेगा। जैसे कि म्यूजियम ब्लॉक, जो LDA के नियंत्रण में ही रहने वाला है।

तो अखिलेश यादव का यह कहना कि JPNIC ‘बेच दिया गया’ सरासर उनकी सरकार के विरोध और खुद असफल होने की कुंठा का प्रतीक है। यह बिक्री नहीं लंबी अवधि की लीज पर निजी संचालन की व्यवस्था है।

निजी कंपनी को बदले में करना क्या होगा

अब इस फैसले का वह हिस्सा जो अक्सर नारेबाजी में दब जाता है। JPNIC अभी भी पूरी तरह तैयार नहीं है, इसमें इंटीरियर, इलेक्ट्रिकल सिस्टम, फायर सेफ्टी जैसे कई काम बाकी हैं, जिन पर करीब ₹200 से ₹250 करोड़ और खर्च होने का अंदाजा है और यह खर्च सरकार नहीं, निजी ऑपरेटर अपनी जेब से उठाएगा।

इसके अलावा कंपनी को LDA को शुरुआत में ₹10.11 करोड़ का अपफ्रंट प्रीमियम और ₹25 करोड़ रुपये की परफॉर्मेंस गारंटी देनी होगी। संचालन शुरू होते ही हर साल ₹6 करोड़ का भुगतान होगा, जिसमें हर वर्ष 5 फीसदी की बढ़ोतरी भी जुड़ी है।

यानी सालों से अधूरा पड़ा जो परिसर सरकार खुद पूरा नहीं करवा पाई, उसे अब पूरा करने, चलाने और संभालने के लिए निजी पैसा लगाया जा रहा है।

पहले लगे 821.74 करोड़ का क्या होगा

एक और अहम पहलू है जो अक्सर बहस में छूट जाता है। सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि इस प्रोजेक्ट पर अब तक करीब ₹821.74 करोड़ जारी हो चुके हैं। यह रकम सरकार ने LDA को दी थी और अब इसे एक ‘ट्रांसफर्ड लोन’ माना जा रहा है, जिसे LDA को अगले 30 सालों में वापस चुकाना होगा।

मतलब सरकार का मौजूदा मॉडल सिर्फ ‘कंपनी को सौंप दो’ तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें पहले खर्च हो चुके पैसे की वसूली, बाकी निर्माण, आगे के संचालन का खर्च और JPNIC को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाना, ये सारी चीज़ें एक साथ जुड़ी हैं।

अखिलेश को नहीं पता बेच देने और लीज पर देने फर्क

विपक्ष का काम ही है सवाल पूछना और इस मायने में अखिलेश यादव का सरकार पर निशाना साधना कोई अटपटी बात नहीं। लेकिन जब आरोप ‘संपत्ति बेचने’ जैसा गंभीर हो, तो तथ्य और राजनीतिक भाषा में फर्क करना ज़रूरी हो जाता है।

तथ्य यह है कि JPNIC की शुरुआत खुद अखिलेश सरकार के दौर में हुई। तथ्य यह भी है कि इसकी लागत 265 करोड़ से बढ़कर CAG के रिकॉर्ड के मुताबिक 865 करोड़ तक पहुँच गई। तथ्य यह भी कि CAG ने पाइल के काम में दर के हेरफेर से 1.41 करोड़ के नुकसान की आपत्ति दर्ज की।

यह भी सच है कि 2017 के बाद जाँच बैठी, काम बरसों रुका रहा और आखिरकार 2025-26 में सरकार ने इसे LDA के जरिए फिर से पटरी पर लाने और निजी भागीदारी से संचालित करने का रास्ता चुना जिसके एवज में उसे प्रीमियम, गारंटी और नियमित लीज आय मिलेगी।

इन सारी बातों को जोड़कर देखें, तो सीधे ‘JPNIC बेच दिया गया’ कह देना पूरे मामले को बहुत ज्यादा सरल बना देना है।

’97 हजार करोड़’ वाली रिपोर्ट का JPNIC से क्या नाता है

अखिलेश सरकार के दौर के वित्तीय रिकॉर्ड को लेकर 2018 में एक और CAG रिपोर्ट सामने आई थी, जिसका ज़िक्र अक्सर राजनीतिक बहसों में होता है। 2014 से मार्च 2017 के बीच उत्तर प्रदेश के विभिन्न विभागों से जुड़े ₹97,906.27 करोड़ के उपयोगिता प्रमाणपत्र लंबित थे और CAG ने कहा था कि इससे धन के दुरुपयोग का जोखिम पैदा होता है।

असली सवाल बेचने का नहीं, इस्तेमाल में लाने का है

पिछले करीब दस साल से JPNIC उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक अधूरे वादे की तरह खड़ा रहा है और सैकड़ों करोड़ खर्च होने के बावजूद जनता को इसका कोई फायदा नहीं मिला। अब सरकार इसका संचालन मॉडल बदलने जा रही है।

बहस सिर्फ इस एक लाइन पर टिकी है कि ‘JPNIC बेच दिया गया’, तो मौजूदा तथ्यों के आधार पर यह दावा टिकता नहीं दिखता। मामला बिक्री का नहीं, लंबी लीज और निजी भागीदारी से चलाए जाने का है।

इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिस प्रोजेक्ट की लागत 265 करोड़ से बढ़कर 865 करोड़ तक पहुँच गई, जिसके निर्माण में CAG ने ठेकेदार को दिए गए 1.41 करोड़ के अनुचित फायदे पर आपत्ति जताई और जो सालों तक अधूरा पड़ा रहा, उसी को अब पूरा कराने के लिए सरकार निजी पैसे का सहारा ले रही है।

UP में तेजी से बढ़ रही है ‘गो-इकोनॉमी’, दूध के साथ-साथ गोमूत्र भी बन रहा है रोजगार का साधन: शैम्पू, साबुन और ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर सबमें हो रहा इस्तेमाल

गाय, गोबर और गौमूत्र का उपहास उड़ाना हमारे देश में एक आम बात बन चुकी है। जब भी इनकी उपयोगिता पर बात होती है, तो अक्सर इसे गंभीरता से लेने के बजाय इसका मजाक बनाया जाता है। लेकिन जमीनी हकीकत इस संकीर्ण सोच से परे एक बेहद उम्मीद जगाने वाले ‘इकोनॉमिक मॉडल’ को दर्शाती है।

आज उत्तर प्रदेश में देसी गायों के गोबर और गौमूत्र का इस्तेमाल करके करीब 200 तरह के प्रोडक्ट्स तैयार किए जा रहे हैं, जिनकी इंटरनेशनल मार्केट में भारी डिमांड है। इसमें शैम्पू, साबुन और अर्क से लेकर ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर तक शामिल हैं। जिस चीज को बेकार मानकर बहा दिया जाता था, आज वही किसानों के लिए अतिरिक्त नकद आय का एक मजबूत जरिया बन चुकी है।

बाजार में बिकने वाला महंगा ऑर्गेनिक फूड इसी प्राकृतिक खाद और गौमूत्र से बने जैविक पेस्टिसाइड्स के दम पर उगता है, जो मिट्टी को जहर-मुक्त और उपजाऊ बनाने का काम करते हैं।

इसका एक प्रत्यक्ष और सफल मॉडल उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में देखा जा सकता है। वहाँ FPO यानी फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन के ज़रिए 15 गाँवों के स्थानीय संग्रह केंद्रों से रोज 500 लीटर गौमूत्र 10 रुपए प्रति लीटर के हिसाब से खरीदा जा रहा है।

इसके भंडारण के लिए गाँवों में 200 लीटर क्षमता वाले टैंक लगाए गए हैं। इस पूरी व्यवस्था से गाँव की लगभग 300 महिलाएँ जुड़ी हुई हैं, जिन्हें प्रति लीटर 2 रुपए का कमीशन मिलने के साथ-साथ FPO में शेयरहोल्डर भी बनाया गया है।

इस पूरे मॉडल ने किसान के पास मौजूद गाय को एक ‘थ्री-इन-वन’ इकोनॉमिक इंजन में बदल दिया है। किसान को दूध से सीधी कमाई होती है, गोबर से खेत के लिए मुफ्त खाद मिलने के कारण रासायनिक खाद का खर्च शून्य हो जाता है, और गौमूत्र की बिक्री से प्रति लीटर नकद मुनाफा मिलता है।

बुलंदशहर के 15 गाँवों से शुरू हुआ यह प्रयोग अगर पूरे राज्य में लागू होता है, तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था का कायाकल्प कर सकता है। ऐसे में सवाल उन लोगों से है जो गाय, गोबर और गौमूत्र का नाम सुनते ही मजाक बनाने लगते हैं- जब यही व्यवस्था किसान का खर्च घटाकर उसकी आय बढ़ा रही है और रोजगार के नए साधन बना रही है, तो उपहास किस बात का है?

स्पष्ट है कि समस्या गोबर या गौमूत्र में नहीं, बल्कि उस सोच में है जो किसी संसाधन की उपयोगिता समझे बिना उसका मजाक उड़ाने लगती है।

मुस्लिमों को रिझाने में 2017 में औंधे मुँह गिरे थे अखिलेश, आरक्षण का वादा किया लेकिन घोषणापत्र खाली रहा: 2027 के चुनावी रण में क्या फिर से अखिलेश करेंगे मुस्लिम आरक्षण पर बात?

2017 के यूपी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले अखिलेश यादव ने मुस्लिम आरक्षण का वही कार्ड फिर उठाया था, जो समाजवादी पार्टी की राजनीति में बरसों से रचा-बसा रहा है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि इसके बावजूद 2017 में सपा 224 सीटों से लुढ़ककर सिर्फ 47 सीटों पर आ सिमटी थी।

यूपी की राजनीति में चुनाव नजदीक आते ही कुछ पुराने मुद्दे धूल झाड़कर फिर सामने आ जाते हैं और मुस्लिम आरक्षण भी उन्हीं में से एक है। 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा था कि उनकी सरकार मुस्लिमों को आरक्षण देने का वादा तो कर चुकी है, मगर कानूनी अड़चनें आड़े आ रही हैं।

अखिलेश ने संविधान में संशोधन की जरूरत बताकर भरोसा दिलाया था कि मिल-बैठकर कोई रास्ता निकाला जाएगा। साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि सरकारी योजनाओं में मुस्लिम आबादी को 20 फीसदी हिस्सेदारी दी जाएगी। यह कोई अचानक आया बयान नहीं था, इसकी जड़ें सपा की पुरानी चुनावी राजनीति में काफी गहरे तक जमी हैं।

2012 में चला था 18 फीसदी आरक्षण का दांव

इससे पहले 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने मुस्लिमों को आरक्षण देने का वादा किया था। पार्टी के घोषणापत्र में पिछड़े मुस्लिमों के लिए आरक्षण के साथ-साथ मुस्लिम बहुल इलाकों में कॉलेज खोलने और गरीब परिवारों के बच्चों की फीस में राहत देने जैसे वादे भी शामिल थे।

आगे चलकर इस वादे को अक्सर ‘18 फीसदी मुस्लिम आरक्षण’ कहकर ही राजनीतिक बहस में घसीटा जाता रहा। 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले खुद मुलायम सिंह यादव ने भी दोहराया था कि पार्टी मुस्लिमों को उनकी आबादी के हिसाब से आरक्षण देने के अपने वादे पर कायम है। लेकिन इस कहानी का एक दूसरा पहलू भी है, जो अक्सर नजरअंदाज हो जाता है।

आजम खान विधानसभा में अपने वादे से मुकरे

अगस्त 2016 में उसी सपा सरकार में मंत्री रहे आजम खान ने विधानसभा में यह कहकर सबको चौंका दिया था कि पार्टी ने कभी 18 फीसदी आरक्षण का वादा किया ही नहीं था और संविधान बदले बिना ऐसा आरक्षण देना मुमकिन नहीं। यानी खुद सपा के भीतर भी इस वादे की व्याख्या पर एकमत नहीं था।

फिर मई 2016 में अखिलेश यादव ने खुद इस वादे को दोहराया। कानूनी अड़चनों का हवाला देते हुए उन्होंने संविधान संशोधन की जरूरत बताई और कहा कि उनकी पार्टी 20 फीसदी आबादी के हक के लिए लड़ती रहेगी। यहीं से मुस्लिम आरक्षण सिर्फ सामाजिक न्याय का मसला न रहकर, यूपी की चुनावी राजनीति में वोट के गणित का सवाल बन जाता है।

यूपी में मुस्लिम आबादी आखिर कितनी है?

2011 की जनगणना के मुताबिक उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी करीब 3 करोड़ 84 लाख है, यानी कुल आबादी का 19.26 फीसदी। राज्य सरकार के दस्तावेजों में भी यही आँकड़ा दर्ज है, जबकि हिंदू आबादी करीब 79.73 फीसदी बताई जाती है।

इसका मतलब लगभग हर पाँचवाँ शख्स मुस्लिम है। यही वजह है कि यूपी की चुनावी राजनीति में किसी भी बड़ी पार्टी के लिए मुस्लिम मतदाताओं को नजरअंदाज करना आसान नहीं रहा।

समाजवादी पार्टी के लिए तो यह गणित और भी अहम है क्योंकि लंबे अरसे से उसकी राजनीति को MY यानी मुस्लिम-यादव समीकरण से जोड़कर देखा जाता रहा है। 2022 के चुनावी विश्लेषणों में भी मुस्लिम और यादव समुदाय को सपा का पारंपरिक कोर वोटबैंक माना गया था।

लेकिन 2017 में यही कार्ड चला क्यों नहीं?

2012 में सपा ने 403 में से 224 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। मगर 5 साल बाद 2017 में तस्वीर पूरी तरह पलट गई। भाजपा 312 सीटों के साथ बहुमत में आई, जबकि सपा महज 47 सीटों पर सिमट गई। उसका वोट शेयर घटकर 21.82 फीसदी रह गया, यानी कुल मिलाकर 177 सीटों का भारी नुकसान।

2017 में अखिलेश यादव ने पार्टी की छवि विकास, एक्सप्रेसवे, मेट्रो, लैपटॉप और युवा राजनीति से जोड़ने की कोशिश की थी। कांग्रेस के साथ हुए गठबंधन को भी राजनीतिक विश्लेषक अक्सर मुस्लिम वोटों के बिखराव रोकने की रणनीति से जोड़कर देखते रहे। इस गठबंधन के पीछे का मकसद करीब 20 फीसदी मुस्लिम वोट को एकजुट रखना भी था।

हालाँकि 2017 के सपा घोषणापत्र में 2012 जैसी साफ-साफ मुस्लिम आरक्षण की राजनीति उतनी उभरकर सामने नहीं आई थी। अखिलेश के नए घोषणापत्र से मुस्लिम केंद्रित मुद्दे काफी हद तक गायब हो गए थे। जहाँ 2012 में साफ तौर पर 18 फीसदी आरक्षण का वादा था, वहीं 2017 में ऐसे किसी वादे को उतनी तवज्जो नहीं दी गई।

मुलायम से अखिलेश तक, MY राजनीति की विरासत

समाजवादी पार्टी की मुस्लिम राजनीति को ठीक से समझना है तो मुलायम सिंह यादव के दौर तक जाना जरूरी है। 1990 में अयोध्या में कारसेवकों पर हुई पुलिस फायरिंग के वक्त मुलायम सिंह यादव यूपी के मुख्यमंत्री थे। आगे चलकर उन्होंने कई बार इस फैसले का बचाव भी किया। 2013 में उन्होंने कहा था कि गोली चलवाने का उन्हें अफसोस है, लेकिन उस वक्त देश की एकता और मंदिर-मस्जिद विवाद का सवाल इतना बड़ा था कि उनके पास और कोई चारा नहीं बचा था।

2016 में तो उन्होंने इससे भी आगे जाकर कह दिया था कि बाबरी मस्जिद को बचाने के लिए गोली चलाना जरूरी था और इससे ज्यादा जानें भी जातीं तो भी वह पीछे नहीं हटते। बाद की राजनीतिक व्याख्याओं में इस फैसले को अक्सर मुलायम की मुस्लिम राजनीति और MY समीकरण की नींव से जोड़ा गया।

आरक्षण की असली संवैधानिक पेचीदगी क्या है?

अखिलेश यादव ने 2016 में संविधान संशोधन की बात यूँ ही नहीं की थी। दरअसल, भारत का संविधान धर्म को आरक्षण का आधार नहीं मानता। आरक्षण सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन जैसे संवैधानिक आधारों पर ही दिया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के मशहूर इंद्रा साहनी फैसले में आरक्षण की सामान्य सीमा को 50 फीसदी के दायरे में रखने का सिद्धांत भी काफी अहम माना जाता है, और केंद्र सरकार भी संसद में इसी न्यायिक व्यवस्था का हवाला देती रही है।

मतलब मुस्लिम समुदाय के भीतर जो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े समूह हैं, उन्हें OBC व्यवस्था के तहत आरक्षण मिलना एक बात है, जबकि पूरे मुस्लिम समुदाय को सिर्फ धर्म के आधार पर अलग कोटा दे देना बिल्कुल अलग संवैधानिक सवाल है। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में भी मुस्लिम OBC समूहों और अलग-अलग राज्यों की आरक्षण व्यवस्थाओं का जिक्र मिलता है।

दिलचस्प यह भी है कि मार्च 2025 में अखिलेश यादव ने कर्नाटक में मुस्लिम आरक्षण को लेकर छिड़ी बहस के दौरान साफ कह दिया था कि धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं होना चाहिए, बल्कि यह पिछड़ों, दलितों और वंचित वर्गों को मिलना चाहिए। यानी 2016 के अखिलेश और 2025 के अखिलेश के रुख में काफी फर्क नजर आता है।

योगी सरकार में मुसलमानों को क्या मिला?

योगी सरकार के 2026-27 के बजट में अल्पसंख्यक कल्याण के लिए ₹2,058 करोड़ रखे गए हैं। प्रधानमंत्री जन विकास कार्यक्रम के तहत अल्पसंख्यक बहुल 21 जिलों में बहुक्षेत्रीय विकास के लिए ₹500 करोड़ का प्रावधान है, वहीं अल्पसंख्यक छात्रों की पूर्वदशम और दशमोत्तर छात्रवृत्ति के लिए ₹391 करोड़ तय किए गए हैं।

राज्य के अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के तहत छात्रवृत्ति, फीस प्रतिपूर्ति, गरीब अल्पसंख्यक परिवारों की बेटियों की शादी के लिए अनुदान, शिक्षा ऋण, बेरोजगार युवाओं के लिए टर्म लोन के साथ-साथ अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में स्कूल, स्वास्थ्य, पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं जुटाने वाली योजनाएं भी चल रही हैं।

अब निगाहें 2027 पर

उत्तर प्रदेश की मौजूदा 403 सीटों वाली विधानसभा का कार्यकाल 2027 में पूरा होना है और अभी चुनाव की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। ऐसे में 2027 में अखिलेश यादव का मुस्लिमों को आरक्षण का ऊंट किस करवट बैठेगा ये देखना दिलचस्प होगा। उनके हालिया बयानों से तस्वीर थोड़ी ज़्यादा उलझी हुई नजर आती है।

2025 में वह धर्म आधारित आरक्षण से दूरी बना चुके हैं। 2026 में उनकी राजनीति में PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का फॉर्मूला ज़्यादा उभरता दिख रहा है। यानी पुराना MY फॉर्मूला अब PDA के बड़े और व्यापक फ्रेम में पेश किया जा रहा है। लेकिन असली सवाल यही है कि क्या सिर्फ सामाजिक समीकरण और आरक्षण की राजनीति 2027 में काफी होगी?

2017 के नतीजे यह साफ बता चुके हैं कि सिर्फ किसी एक वोटबैंक को साधना सत्ता की गारंटी नहीं देता। 2012 में 224 सीटें जीतने वाली सपा 2017 में 47 सीटों तक सिमट गई थी। 2022 में भी भाजपा ने सरकार बनाई और सपा को विपक्ष में ही बैठना पड़ा।

अब असल सवाल तो यह होगा कि क्या अखिलेश यादव मुस्लिम आरक्षण या PDA जैसे सामाजिक समीकरणों के साथ-साथ रोजगार, कानून-व्यवस्था, निवेश, उद्योग, किसान, महिला सुरक्षा और बुनियादी ढांचे जैसा एक ठोस एजेंडा भी पेश कर पाते हैं जो सिर्फ किसी एक वोटबैंक तक सीमित न रहकर पूरे उत्तर प्रदेश को अपनी बात कह सके।

क्योंकि चुनाव आते-आते पुराना कार्ड फिर से निकाला जा सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि मतदाता हर बार वही खेल उसी तरह खेलें और शायद यही 2017 की सबसे बड़ी सीख थी।

अंग्रेजों की गोलियाँ खाकर भी पेड़ पर फहराया तिरंगा, कहानी गुलाब सिंह लोधी और ‘झंडेवाला पार्क’ की: बलिदान दिवस पर CM योगी ने दी श्रद्धांजलि

लखनऊ में सीएम योगी आदित्यनाथ 23 अगस्त 2026 को अमर बलिदानी गुलाब सिंह लोधी की प्रतिमा पर पहुँचे। उनके बलिदान दिवस पर सीएम ने उनकी प्रतिमा पर पुष्प चढ़ाए और उन्हें याद किया। करीब 9 दशक पहले यही गुलाब सिंह लोधी थे, जिन्होंने अंग्रेजी बन्दूकों की परवाह किए बिना लखनऊ के अमीनाबाद पार्क में तिरंगा फहरा दिया था। बदले में अंग्रेजों ने उन्हें गोलियों से भून डाला, मगर उनके हाथों में लहराता झंडा उस वक्त अंग्रेज हुकूमत को सीधी चुनौती दे चुका था।

गुलाब सिंह लोधी की कहानी महज एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की कहानी भर नहीं है, ये उस दौर की झलक है जब गाँव-गाँव से उठे मामूली किसान-मजदूर भी अंग्रेजों के खिलाफ अपनी जान दाँव पर लगाने से पीछे नहीं हटते थे। इतिहास की किताबों में बड़े-बड़े नाम तो दर्ज हैं, पर गुलाब सिंह लोधी जैसे कई सेनानी ऐसे भी रहे, जिनकी कहानी स्थानीय यादों में तो रही, मगर राष्ट्रीय पटल पर उन्हें वो जगह कभी नहीं मिली, जिसके वो हकदार थे।

उन्नाव की माटी से निकला था ये वीर

साल 1903 में एक साधारण किसान परिवार में जन्मे गुलाब सिंह लोधी उन्नाव जिले के फतेहपुर चौरासी इलाके के चंद्रिकाखेड़ा गाँव के रहने वाले थे। पिता का नाम था ठाकुर रामरतन सिंह लोधी।

उनका बचपन ऐसे समय में बीता, जब अंग्रेजी राज के खिलाफ गुस्सा हर तरफ पनप रहा था। असहयोग आँदोलन, सत्याग्रह, स्वदेशी की हवा गाँवों तक पहुँच चुकी थी। अंग्रेजों की सख्ती और क्रूरता के खिलाफ माहौल पूरे देश में बन रहा था, और गुलाब सिंह लोधी भी इसी हवा में साँस ले रहे थे।

जब तिरंगा अंग्रेजों के लिए खतरा बन गया

गुलाब सिंह लोधी का नाम सबसे ज्यादा जुड़ा है लखनऊ के झंडा सत्याग्रह से। उस दौर में तिरंगा फहराना अपने आप में बगावत मानी जाती थी। अंग्रेज सरकार झंडे से जुड़े आंदोलनों को बेहद संजीदगी से लेती थी, और ऐसे किसी भी जमावड़े को रोकने के लिए पुलिस-फौज उतार देती थी।

उसी दौर में उन्नाव से सत्याग्रहियों के कई जत्थे लखनऊ की तरफ कूच कर गए। मकसद था तिरंगा फहराना, अंग्रेजी सत्ता के मुँह पर राष्ट्रीय स्वाभिमान का तमाचा जड़ना मगर अंग्रेज फौज ने रास्ता रोक दिया। कई सत्याग्रही वहीं रुक गए, आगे नहीं बढ़ सके।

गुलाब सिंह लोधी के बलिदान दिवस के मौक पर सीएम योगी आदित्यनाथ लखनऊ के अमीनाबाद स्थित झँडेवाला पार्क पहुँचे

गुलाब सिंह लोधी रुकने वालों में नहीं थे

वे सैनिकों की नजर बचाकर किसी तरह अमीनाबाद पार्क में घुस गए। साथ में था सिर्फ एक पैना (पतली लाठी, छड़ी), वही ‘औजार’ जिससे किसान बैलों को हाँकते हैं। इसी में उन्होंने तिरंगा बाँध रखा था। इरादा एक ही था – जैसे भी हो, पार्क तक पहुँच कर झंडा फहराना।

यहीं उनकी सूझबूझ भी सामने आती है। पहरे के बीच से निकल कर वे एक पेड़ पर चढ़ गए, और फिर वहीं से तिरंगा लहरा दिया। एक किसान का बेटा, अंग्रेजी हुकूमत के सामने खुले आसमान तले भारत का झंडा फहरा रहा था।

तिरंगा फहरते ही चल गईं गोलियाँ

झंडा लहराते ही अंग्रेज सैनिकों की नजर गुलाब सिंह लोधी पर पड़ गई। हुक्म मिला- गोली चलाओ। कई बंदूकों से एक साथ फायरिंग हुई, गोलियाँ उनके बदन में धँस गईं, जिससे वे गंभीर हालत में पेड़ से नीचे गिर पड़े और 23 अगस्त 1935 को उन्होंने आखिरी साँस ली।

32 साल की उम्र में जब एक आम आदमी अपने परिवार और भविष्य के सपने बुनता है, उस उम्र में गुलाब सिंह लोधी ने देश की आजादी को अपनी जिंदगी से ऊपर रख दिया।

जिस पार्क में उन्होंने अंग्रेजी गोलियों के सामने झंडा फहराया, अमीनाबाद का वही पार्क आगे चलकर ‘झंडेवाला पार्क‘ के नाम से मशहूर हो गया और आजादी की लड़ाई का एक अहम ठिकाना बन गया।

गुलाब सिंह लोधी का बलिदान खास क्यों?

भारत की आजादी की लड़ाई सिर्फ दिल्ली-मुंबई-कोलकाता के बड़े नेताओं की कहानी नहीं है। इसकी असली जान थी वो लाखों-करोड़ों गुमनाम भारतीय, जिन्होंने अंग्रेजों के सामने खड़े होने की हिम्मत जुटाई। गुलाब सिंह लोधी इसी जनसैलाब का चेहरा हैं।

न कोई बड़ा राजनीतिक खानदान, न सत्ता, न फौजी ताकत, न हथियार। उनके पास बस एक झंडा था, आजादी का सपना था, और अंग्रेजों के आगे न झुकने का जज्बा। उनकी कहानी बताती है कि आजादी की लड़ाई में किसान समाज और गाँव का कितना बड़ा हाथ था। उन्नाव के एक गाँव से चलकर लखनऊ के अमीनाबाद पार्क तक पहुँचना, और वहाँ तिरंगा फहरा देना, ये अपने आप में उस दौर के ग्रामीण भारत की राजनीतिक चेतना की मिसाल है।

इतिहास में कम जगह, पर लोगों के दिलों में जिंदा

इतनी बड़ी घटना के बावजूद गुलाब सिंह लोधी का नाम राष्ट्रीय स्तर पर वो पहचान नहीं बना पाया, जो कई और सेनानियों को मिली।

फिर भी उन्नाव और लखनऊ में उनकी यादें आज भी जिंदा हैं। फतेहपुर चौरासी में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और पुलिस प्रशिक्षण केंद्र उनके नाम पर हैं। उनके पैतृक गाँव चंद्रिकाखेड़ा में उनकी प्रतिमा लगी है।

सीएम योगी ने लोधी के गाँव में प्रतिमा का किया अनावरण

13 मार्च 2024 को सीएम योगी आदित्यनाथ खुद चंद्रिकाखेड़ा पहुँचे थे और गुलाब सिंह लोधी की प्रतिमा का अनावरण किया था। उस मौके पर उन्होंने याद दिलाया था कि कैसे 1935 में उन्नाव से लखनऊ जाकर इस किसान बेटे ने तिरंगा फहराया और देश के लिए बलिदान दिया।

यानी जो कहानी कभी सिर्फ एक गाँव की याद बनकर रह सकती थी, उसे स्मारकों और सरकारी कार्यक्रमों के जरिए नई पीढ़ी तक पहुँचाने की कोशिश हुई।

आज भी तिरंगे में बसी है उनकी कहानी

गुलाब सिंह लोधी की शहादत की सबसे गहरी तस्वीर यही है कि एक साधारण गाँव का लड़का, अंग्रेजी बंदूकों के सामने पेड़ पर चढ़कर तिरंगा फहरा रहा है। ये सिर्फ 1935 की एक घटना नहीं रह गई। ये इस बात की गवाही बन गई कि उस दौर में तिरंगा कोई साधारण कपड़ा नहीं, बल्कि गुलामी के खिलाफ भारतीय स्वाभिमान का ऐलान था।

आज जब देश आजादी के इतने दशकों बाद आगे बढ़ रहा है, तो गुलाब सिंह लोधी जैसे सेनानियों को याद करना इसलिए जरूरी है क्योंकि आजादी हमें यूँ ही नहीं मिल गई थी, इसके पीछे बलिदानों की एक लंबी, दर्दनाक फेहरिस्त है।

23 अगस्त का दिन गुलाब सिंह लोधी की सिर्फ बरसी नहीं, बल्कि उस जज्बे की याद है जिसके आगे अंग्रेजों की बंदूकें भी छोटी पड़ गई थीं। अमीनाबाद में लहराया गया वो तिरंगा भले ही 1935 की बात हो, लेकिन उसकी गूँज आज भी सुनी जा सकती है।

यही वजह रही कि सीएम योगी आदित्यनाथ आज उनके बलिदान दिवस पर उनकी प्रतिमा पर पुष्प चढ़ाने पहुँचे। गुलाब सिंह लोधी का नाम उस पीढ़ी के साथ हमेशा दर्ज रहेगा, जिसने तिरंगे को झुकने नहीं दिया और इसके लिए अपनी जान तक दे दी।

जिस चुनाव आयोग को राहुल गाँधी विदेश तक कोसते रहे, ट्रंप ने उसी की तारीफ की: कॉन्ग्रेस को लगी मिर्ची

जरा सोचिए, हमारे देश के चिर युवा नेता यानी राहुल गाँधी जब भी विदेश जाते हैं, तो अक्सर विदेशी मंचों पर जाकर यह नैरेटिव सेट करने की कोशिश करते हैं कि भारत में लोकतंत्र खतरे में है, चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं है और संस्थाएँ बिक चुकी हैं। लेकिन अब एक ऐसा मोड़ आया है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। जिस पश्चिमी दुनिया से हमारे देश के कुछ नेता सर्टिफिकेट माँगते फिरते हैं, आज उसी पश्चिमी दुनिया का सबसे ताकतवर देश, यानी अमेरिका, भारत की चुनाव प्रणाली की मिसाल दे रहा है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के चुनाव आयोग, हमारे वोटर आईडी सिस्टम और हमारी मतदान प्रक्रिया की खुलकर तारीफ की है। दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र कहे जाने वाले अमेरिका के राष्ट्रपति अब भारत के चुनाव सिस्टम से सीख लेने की बात कर रहे हैं। हमें अमेरिका के सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है लेकिन ये उनके लिए है जिनको चीन के इंफ्रा और अमेरिका के लोकतंत्र में ही जान नजर आती है।

लेकिन विडंबना देखिए, जिस चुनाव आयोग और व्यवस्था की तारीफ व्हाइट हाउस और अमेरिकी राष्ट्रपति कर रहे हैं, हमारे अपने देश का विपक्ष उसी व्यवस्था को हर चुनाव के बाद कटघरे में खड़ा करने की आदत नहीं छोड़ पा रहा है। ट्रंप की तारीफ के बाद कॉन्ग्रेस को फिर मिर्ची लगी है और व्यंग्य कसते हुए बयान दे डाला है।

डोनाल्ड ट्रंप ने क्या कहा और Save America Act क्या है?

आइए सबसे पहले जानते हैं कि आखिर हुआ क्या है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर एक लंबी पोस्ट लिखी। इस पोस्ट में उन्होंने भारत के चुनाव सिस्टम की जमकर तारीफ की और अपने देश के सामने भारत का मॉडल रखा।

ट्रंप ने लिखा कि भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अमेरिकी प्रशासन से एक सीधा सवाल पूछा था, कि आखिर अमेरिका में बिना वैध फोटो पहचान पत्र के चुनाव कैसे हो सकते हैं? अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने दुनिया के सामने भारत के 2024 के आम चुनाव के आँकड़े भी रखे। उन्होंने कहा कि भारत के पिछले चुनाव में करीब 65 करोड़ मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। इनमें से 1 प्रतिशत से भी कम लोगों ने डाक यानी मेल-इन वोटिंग का सहारा लिया। और सबसे बड़ी बात, वोट डालने वाले हर एक नागरिक के पास अपनी वैध फोटो पहचान पत्र (Voter ID) होना अनिवार्य था।

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने इसी व्यवस्था का हवाला देते हुए अमेरिका में ‘SAVE America Act’ को तुरंत पास करने की माँग की। इस कानून का सीधा मकसद यह है कि अमेरिका में वोट डालने के लिए नागरिकता का पक्का सबूत अनिवार्य किया जाए, हर वोटर के लिए फोटो आईडी जरूरी हो और मेल-इन वोटिंग यानी डाक से वोटिंग के फर्जीवाड़े को रोका जा सके।

इतना ही नहीं, भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने भी ट्रंप के इस बयान का समर्थन किया और कहा कि भारत का चुनाव मॉडल पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल है। सोचिए, 65 करोड़ लोग लाइन में लगकर, पहचान पत्र दिखाकर वोट डालते हैं और एक भी फर्जीवाड़े की गुंजाइश नहीं बचती, यही ताकत आज पूरी दुनिया देख रही है।

भारत में विपक्ष का दोहरा रवैया- ‘जीते तो जनता, हारे तो EVM’

अब सिक्के का दूसरा पहलू देखिए। एक तरफ अमेरिका जैसा देश हमारी व्यवस्था की तारीफ कर रहा है, और दूसरी तरफ हमारे अपने देश के भीतर की सियासत को देखिए। भारत में विपक्ष की राजनीति का एक सीधा-सा नियम बन चुका है… अगर किसी राज्य में चुनाव जीत गए, सरकार बन गई, तो कहते हैं- ‘यह जनता का फैसला है, लोकतंत्र की जीत है।’ लेकिन जहाँ चुनाव हारे, जहाँ पार्टी का जनाधार खिसका, वहाँ अगले ही दिन सुबह प्रेस कॉन्फ्रेंस शुरू हो जाती है कि ‘EVM हैक हो गया’, ‘चुनाव आयोग बिक गया’ और ‘वोट चोरी हो गई।’

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने तो कई बार प्रेस कॉन्फ्रेंस करके ऐसे दावे किए जैसे कोई बहुत बड़ा ‘हाइड्रोजन बम‘ फूटने वाला हो। बड़े-बड़े खुलासे करने की बातें कही गईं, वोटर लिस्ट से नाम गायब होने के आरोप लगाए गए। लेकिन जब चुनाव आयोग या अदालत ने उनसे पूछा कि भाई, अगर आपके पास गड़बड़ी के कोई सबूत हैं तो टेबल पर रखिए, तो हर बार नतीजा सिफर यानि शून्य निकला। आरोप तो खूब लगे, लेकिन ठोस सबूत के नाम पर सिर्फ हवा-हवाई बातें सामने आईं।

बात सिर्फ देश के भीतर तक सीमित नहीं रही। राहुल गाँधी विदेशों में, चाहे अमेरिका हो या यूरोप, वहाँ की यूनिवर्सिटी और मंचों पर जाकर भी भारतीय चुनाव व्यवस्था और लोकतंत्र पर सवाल उठाते रहे हैं। सवाल यह उठता है कि जिस देश की जनता आपको चुनकर संसद भेजती है, उसी देश की लोकतांत्रिक साख को विदेश में जाकर गिराने से किसका फायदा होता है?

यही हाल पश्चिम बंगाल में भी देखने को मिला, जहाँ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी ने मतदाता सूची और चुनाव प्रक्रिया को लेकर सीधे सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाजा खटखटाया। लोकतंत्र में सवाल पूछना, पारदर्शिता माँगना हर किसी का हक है लेकिन बिना किसी सबूत के सिर्फ अपनी हार का गुस्सा संवैधानिक संस्थाओं पर निकालना कहाँ तक जायज है?

चुनाव आयोग की तारीफ पर कॉन्ग्रेस को लगी मिर्ची

जब डोनाल्ड ट्रंप का यह बयान आया, तो सामान्य समझ यह कहती थी कि देश के हर दल को गर्व होना चाहिए कि हमारी चुनाव व्यवस्था का लोहा पूरी दुनिया मान रही है। लेकिन इस पर भी कॉन्ग्रेस को मिर्ची लगना लाजमी था। कॉन्ग्रेस की तरफ से जो बयान आया, उसने एक बार फिर साबित कर दिया कि वे आत्ममंथन के मूड में बिल्कुल नहीं हैं।

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया पर ट्रंप को टैग करते हुए तंज कसा। उन्होंने लिखा, “प्रिय डोनाल्ड ट्रंप, आप ज्ञानेश कुमार को अपने साथ अमेरिका ले जाइए और उन्हें वहीं रखिए। हम अगली ही फ्लाइट से अपनी EVM मशीनें भी अमेरिका भेज देंगे। आपने हमारे साथ जो भी बर्ताव किया है, उसके बदले में हम कम से कम इतना तो आपके लिए कर ही सकते हैं।”

जरा सोचिए, यह बयान क्या दिखाता है? क्या यह बयान किसी संवैधानिक संस्था के प्रति सम्मान दिखाता है? या फिर यह सिर्फ इस बात की झुंझलाहट है कि जिस विदेशी धरती पर जाकर आप भारत की बदनामी कर रहे थे, उसी धरती का सबसे बड़ा नेता आज भारत के चुनाव आयोग का मुरीद बन बैठा है?

असली बात क्या है और इससे क्या समझना चाहिए?

यहाँ समझने वाली सबसे बड़ी बात यह है कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का असली मतलब यह होता है कि जब जनादेश आपके खिलाफ जाए, तब भी आप जनता के फैसले और व्यवस्था का सम्मान करें। अगर वाकई कहीं कोई गड़बड़ी है, तो उसके लिए देश में कानून है, अदालतें हैं, चुनाव आयोग का मंच है। तथ्यों के साथ जाइए और साबित कीजिए।

लेकिन सिर्फ अपनी राजनीतिक हार को छुपाने के लिए पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर देना और ‘वोट चोरी’ का नैरेटिव फैलाना किसी भी तरह से देशहित में नहीं हो सकता। आज अमेरिका जैसा देश यह मान रहा है कि भारत की 65 करोड़ लोगों वाली फोटो आईडी आधारित चुनाव व्यवस्था दुनिया के लिए एक बेंचमार्क है। ट्रंप का यह बयान इस बात का सबूत है कि हमारी चुनावी मशीनरी कितनी मजबूत, सुरक्षित और पारदर्शी है।

बंगाल मे शुभेंदु सरकार के 100 दिन पूरे: जानिए ममता राज जाने से राज्य में क्या-क्या हुए परिवर्तन

बंगाल का वो दौर आपको याद होगा जब पूरे राज्य में तुष्टिकरण का बोलबाला था। ऐसे चौराहे थे, जिन्हें एक खास समुदाय अपनी बपौती मान बैठा था, वो सड़कें- जहाँ नियमों को ताक पर रखकर नमाज पढ़ना आम बात बन चुकी थी, और वो लाचार व्यवस्था, जहाँ देश की सीमाओं की सुरक्षा के लिए BSF जवानों को भी ज़मीन का एक टुकड़ा पाने के लिए संघर्ष करना पड़।

जनता बेबस थी- चाहकर भी वे न तो केंद्र सरकार की ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ का लाभ ले पा रही थी और न ही ‘आयुष्मान भारत’ के तहत अस्पतालों में इलाज करा पाती थी। ऐसा लगता था जैसे बंगाल देश की मुख्यधारा से पूरी तरह कट चुका हो, लेकिन क्या आप यकीन करेंगे कि जिस बंगाल में कभी बदलाव असंभव सा लगता था, मात्र 100 दिनों में बदलाव साफ़ और सीधा दिखने लगा है।

दरअसल, बदलाव की असली शुरुआत हुई 9 मई 2026 को! कोलकाता का वो ऐतिहासिक ‘ब्रिगेड परेड ग्राउंड’… जहाँ शुभेंदु अधिकारी, दिलीप घोष और अग्निमित्रा पॉल जैसे दिग्गजों के मंच से एक साथ शपथ ली, तो पूरे बंगाल में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ और पश्चिम बंगाल की जनता में वापस से एक उम्मीद सी जगी कि अब शायद नया निजाम हमारे लिए कुछ बेहतर करेगा!

यह वही सपना था, जिसे पूर्व की टीएमसी सरकार ने दशकों तक सिर्फ चुनाव जीतने के लिए चूरन की तरह बाँटा… लेकिन जब धरातल पर काम करने की बारी आई, तो वे अपनी तुष्टिकरण और वोटबैंक की राजनीति में ही उलझे रहे।

पर इस बार माहौल कुछ अलग था! 9 मई के बाद बंगाल के इतिहास में पहली बार लोग बेखौफ होकर भगवा लहरा रहे थे, एक दूसरे को रंग गुलाल लगाकर मानो असली आजादी का जश्न मना रहे थे तो कुछ मंदिरों की घंटियाँ बजाकर अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व महसूस कर रहे थे। मंदिरों से गूँजती घंटियों की आवाज अब किसी को चुभ नहीं रही थी, बल्कि जनता के चेहरों पर बंगाल की बदलती तस्वीर साफ दिख रही थी और इन्हीं कुछ तस्वीरों को देखते 100 दिन बीत गए।

अब जब बंगाल में भाजपा सरकार के 100 दिन पूरे हो चुके हैं। तो आइए जानते हैं कि इन 100 दिनों के भीतर बंगाल की तस्वीर कितनी बदली है?

बंगाल में BSF को मिली भूमि

आपको याद होगा कि बंगाल में सालों तक बांग्लादेश की सीमा पर तार लगाने के लिए गृह मंत्रालय राज्य सरकार से ज़मीन माँगता रहा, लेकिन ममता सरकार ने अपने तुष्टिकरण के चक्कर में इसे लटकाए रखा और फिर खुली सीमा का फायदा उठाकर बांग्लादेशी घुसपैठिए अपनी मनमर्जी से भारत आते-जाते रहे, लेकिन राज्य में भाजपा सरकार बनने के महज दो हफ्तों के भीतर ही सीएम शुभेंदु अधिकारी ने इस पर सबसे बड़ा फैसला लिया और कहा, “हम सीमा पर बाड़ लगाने के लिए BSF को 27 किलोमीटर ज़मीन सौंपने जा रहे हैं।”

यह सिर्फ एक प्रशासनिक ऐलान नहीं था बल्कि इस आधिकारिक घोषणा का असर कुछ ऐसा हुआ कि आज विभिन्न सीमावर्ती जिलों में प्रक्रिया तेज़ करते हुए 1100 एकड़ से अधिक भूमि BSF को सौंपी जा चुकी है। इसका परिणाम ये है कि देश की सीमाएँ अब सुरक्षित होने वाली हैं। जिन बॉर्डर्स से अपनी मनमर्जी से बांग्लादेशी आते-जाते थे, वो अब सील हो रहे हैं।

आयुष्मान भारत की बंगाल में शुरुआत

इसी तरह केंद्र की क्रांतिकारी ‘आयुष्मान भारत योजना’, जिसे ममता बनर्जी ने सिर्फ़ राजनीतिक द्वेष के कारण राज्य में लागू नहीं किया था उसे शुभेंदु सरकार ने 16 अगस्त को पूरे राज्य में लागू कर दिया। इसके चलते आज बंगाल के लगभग 1 करोड़ 43 लाख परिवार यानी 6 करोड़ लोगों को हर साल 5 लाख रुपये तक के मुफ़्त कैशलेस इलाज का लाभ मिल सकेगा। यहां तक कि अब बंगाल के 1,240 निजी और 627 सरकारी अस्पतालों के साथ-साथ, राज्य के नागरिक देशभर के 38 हज़ार से अधिक सूचीबद्ध अस्पतालों में मुफ़्त इलाज का लाभ उठा सकेंगे।

आवास योजना

ममता सरकार ने सिर्फ़ केंद्र सरकार से बैर के चलते राज्य के गरीब लोगों को आवास जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित रखा था। यही नहीं प्रधानमंत्री आवास योजना को लेकर भी ममता सरकार में जमकर धांधली और भ्रष्टाचार की बातें सामने आईं थीं। मगर, शुभेंदु सरकार ने सत्ता में आते ही इस पूरे सिस्टम का शुद्धिकरण किया।

राज्य में इसे पारदर्शी बनाते हुए ‘पश्चिम बंगाल आवास योजना’ का रूप दिया गया। हाल ही में एक कार्यक्रम के जरिए राज्य के 10.20 लाख से अधिक ग्रामीण परिवारों के खातों में सीधे ₹6122.27 करोड़ की राशि भेजी गई है। इतना ही नहीं, पिछली टीएमसी सरकार द्वारा तैयार की गई 30 लाख लोगों की संदेहास्पद सूची की जाँच की गई तो उसमें 12 लाख से अधिक अयोग्य और फर्जी नाम सामने आए जिन्हें शुद्धिकरण के तहत हटाया गया।

सरकार का संदेश साफ है- बिना किसी धर्म, जाति या राजनीतिक भेदभाव के, योजना का शत-प्रतिशत लाभ केवल असली ज़रूरतमंदों को ही मिलना चाहिए। इसी का परिणाम है कि वर्तमान में 18 लाख से अधिक पात्र परिवारों के मकानों का निर्माण कार्य युद्ध स्तर पर जारी है।

अन्नपूर्णा योजना

चुनाव के दौरान भाजपा का प्रमुख वादा था कि सरकार बनने पर महिलाओं के लिए ‘अन्नपूर्णा योजना’ लागू की जाएगी। सरकार ने पहले ही चरण में इसे ज़मीन पर उतारा। आज इस योजना के तहत राज्य की पात्र महिलाओं को ₹3,000 प्रति माह की सीधी वित्तीय सहायता दिए जाने का काम शुरू हो गया है।

रिपोर्ट्स के अनुसार करीब 1.45 करोड़ पात्र महिलाओं को इस योजना के तहत 3,000 रुपए मिलेंगे।

तो ये वह कुछ जनकल्याणकारी योजनाएँ थीं जिनसे ममता सरकार ने राजनीतिक द्वेष व मुस्लिम तुष्टीकरण के चलते बंगाल की जनता को आज तक वंचित रखा था।

अब बात करते हैं पश्चिम बंगाल के विकास और कानून व्यवस्था की…

मेट्रो का सुलझा मुद्दा

शुभेंदु सरकार आने से पहले बंगाल में कोलकाता मेट्रो की ऑरेंज लाइन से जुड़ा एक 62 मीटर का एक गैप भरने का काम प्रशासनिक अड़चनों के कारण रुका हुआ था।

ममता सरकार तो ट्रैफिक का हवाला देते हुए इसके खिलाफ कोर्ट तक चली गई थी कि ये नहीं हो सकता। लेकिन नई सरकार बनते ही जो अनुमति मिलने का काम सालों से अटका था, वह चंद दिनों में हल हो गया और फिर 15 मई को रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने पुष्टि की कि कोलकाता पुलिस की अनुमति समेत तमाम एनओसी (NOC) जारी कर दी गई हैं।

जूट मीलें दोबारा शुरू

इसी तरह टीएमसी शासन में तालाबंदी का शिकार हुई ऐतिहासिक जूट मिलों को दोबारा शुरू किया गया। सुनने में भले ये सामान्य लगे लेकिन श्रम विभाग की त्वरित कार्रवाई के चलते जो 14 जूट मिलें फिर से चालू हुई हैं उनसे हज़ारों मज़दूरों को अपने ही राज्य में रोजगार मिल सकेगा।

कानून व्यवस्था और डिटेक्ट-डिलीट-डिपोर्ट

इसके बाद शुभेंदु सरकार के आने के बाद सबसे बड़ा असर अगर देखें तो राज्य की कानून-व्यवस्था पर साफ दिखाई देता है। उपद्रवियों और सिंडिकेट राज पर नकेल कसने के लिए ‘पश्चिम बंगाल सार्वजनिक सुरक्षा और असामाजिक गतिविधि नियंत्रण विधेयक, 2026’ लागू किया गया।

‘डिटेक्ट, डिलीट, डिपोर्ट’ नीति का असर जगह-जगह दिखा। याद करिए सत्ता परिवर्तन होते ही बांग्लादेशी सीमाओं पर भारत छोड़ने वाले घुसपैठियों की लंबी कतारें देखी गईं थीं। टीएमसी के नेता जहाँ राज्य में किसी भी घुसपैठिए की होने की बात को नकारते थे, वहीं उस कतार में समान बटोरे लोग खुद स्वीकार कर रहे थे कि वो घुसपैठिए हैं…

सालों से संरक्षण पा रहे अवैध घुसपैठियों के नेटवर्क पर जब शिकंजा कसा, तो सिंडिकेट चलाने वाले सहाबुद्दीन मंडल जैसे अपराधियों का पर्दाफाश हुआ, जो बांग्लादेश से भारत में घुसपैठ कराने में मुख्य रूप से शामिल था।

सड़कों पर किसी समुदाय की मनमानी नहीं बल्कि कानून का राज दिखना शुरू हुआ- लोग ये देखकर हैरान थे कि आखिर जिस रेड रोड पर नमाज़ के नाम पर घटों तक यातायात ठप कर दिया जाता था और जिसे पूर्व मुख्यमंत्री खुद बढ़ावा देती थीं, 2026 की ईद पर वही ‘रेड रोड’ कैसे पूरी तरह सुचारू नजर आया। वहाँ नमाज के नाम पर कोई शक्ति प्रदर्शन नहीं, कोई आम जनता के लिए असुविधा नहीं थी।

क्या पड़ा बंगाल पर असर

कट-मनी वसूलने वाले टीएमसी नेताओं से हिसाब माँगना हो, बंद पड़े स्कूलों को खुलवाना हो और मंदिरों को पुनर्जीवित करना हो, या फिर उद्योगों के लिए भयमुक्त माहौल बनाना हो… इन 100 दिनों में सबसे बड़ा बदलाव यह आया है कि बंगाल की जनता को अब बिना डरे सच बोलने का साहस मिल गया है। जो बदलाव कभी नामुमकिन कहे जाते थे, वे अब धरातल पर हकीकत बन चुके हैं।

मजहब देखकर वित्तीय सहायता देने का दौर पश्चिम बंगाल से अब जा चुका है और बंगाल के विकास की कहानी बेहतर इन्फ्रा, उच्च शिक्षा, स्वास्थ्य व्यवस्था, महिला कल्याण, युवाओं के लिए रोजगार देखकर तय होनी शुरू हो गई है।