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‘काफ़िर’ अब समंदर पार नहीं है.. कैसे 11वीं सदी का क्रूसेड बना नए पेंटागन की विचारधारा? डोनाल्ड ट्रंप और अमरीकी कल्चर वॉर

नवंबर 1095। फ्रांस के दिल में, क्लेरमों की सभा। पोप अर्बन द्वितीय एक भारी भीड़ के सामने खड़े हुए। पादरी, सामंत, आम लोग, सब साँस रोककर सुन रहे थे। उन्होंने एक वाक्य कहा, और इतिहास की धारा ही मुड़ गई।

यह कोई आम भाषण नहीं था, इसने लोगों की सोच बदल दी। यह एक ऐसी जागृति थी, जिसने लोगों को यह महसूस कराया कि उनकी ज़िंदगी का मतलब ही बदल गया है। यूरोप तब टुकड़ों में बँटा था। सामंत और शूरवीर आपस में ही खून बहा रहे थे। पोप ने उन बेचैन शूरवीरों से एक सौदा किया; अपने छोटे-छोटे भाईचारे के युद्ध बंद करो, और अपनी पूरी ताकत एक पवित्र मकसद पर लगा दो। यरूशलम आज़ाद करो। मसीह की कब्र मुस्लिम शासन से वापस लो। और यही तुम्हारे पापों का सबसे बड़ा प्रायश्चित होगा।

भीड़ गूँज उठी, ‘देउस वुल्ट’ (Deus vult) । यानी, ईश्वर की यही इच्छा है। पहले धर्मयुद्ध (Crusades) की शुरुआत यहीं हुई। तलवार और मोक्ष को एक कर दिया गया। सभ्यताओं की टक्कर का वह साँचा बना, जो आज भी हमारी कल्पना में घूमता है।

अब लगभग एक हज़ार साल आगे बढ़िए। वही पुराना लैटिन वाक्य मध्ययुगीन कागज़ों से निकलकर आज की राजनीति और संस्कृति के बीच आ गया है। अमेरिकी लेखक, पूर्व सैनिक और रक्षा अधिकारी पीट हेगसेथ के विचारों और उनके शरीर के टैटू में भी यही बात साफ़ दिखती है। अपनी किताब अमेरिकन क्रूसेड में वे सीधे मध्ययुग के शूरवीरों की तरफ हाथ बढ़ाते हैं। उनका तर्क है कि पश्चिमी सभ्यता अंदर और बाहर से इतनी टूट रही है कि अब उसी तरह की बिना समझौते वाली आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जागृति चाहिए।

एक मध्ययुगीन पोप और एक आज के अमेरिकी राष्ट्रवादी को साथ रखिए। दोनों के बीच एक सीधी वैचारिक डोर दिखती है। बीच में ज्ञानोदय (Enlightenment) आया, धर्म और राजनीति अलग हुए, विज्ञान की क्रांति हुई, लोकतंत्र आया, फिर भी दोनों की बुनियाद एक है। उनके लिए राजनीति, संस्कृति और अपनी पहचान बचाना सिर्फ़ सरकार या देश का मामला नहीं है। वे इसे अच्छाई और बुराई के बीच एक बहुत बड़ी, पवित्र जंग मानते हैं।

संकट का गणित: धर्मयुद्ध की माँग कहाँ से पैदा होती है?

दोनों की सोच समझने के लिए पहले यह देखना होगा कि वे समाज की खराबी या गिरावट की वजह क्या बताते हैं। न तो अर्बन द्वितीय ने और न ही हेगसेथ ने अपनी बात बिना किसी आधार के कही। दोनों ने समाज में पहले से मौजूद निराशा और बिखराव को पहचाना और उसी को आधार बनाया।

ग्यारहवीं सदी के आखिर में यूरोप अंदरूनी अव्यवस्था से जूझ रहा था। ज़मींदार और योद्धा आपस में ही लड़कर ईसाई समाज को तोड़ रहे थे। उनके आपसी ख़ूनी झगड़ों ने आम लोगों और चर्च दोनों की नाक में दम कर रखा था।

पोप को इस अंदरूनी तनाव को बाहर निकालने का एक रास्ता चाहिए था। अर्बन की असली समझदारी इसी बात में थी कि उन्होंने लोगों की सोच को एक नया मोड़ दिया। उन्होंने यूरोपीय उच्च वर्ग की आपसी हिंसा को एक सामाजिक बुराई से बदलकर एक पवित्र धर्म-कर्म बना दिया। उनका तर्क था कि बाहर ईसा मसीह के लिए लड़ना, असल में घर की समस्याओं को खत्म करने का तरीका है। उन्होंने इस धर्मयुद्ध को हमला नहीं, बल्कि अपनी रक्षा बताया, एक ऐसा कदम, जो नैतिक और धार्मिक रूप से टूट रही ईसाई दुनिया को बचाने के लिए बेहद ज़रूरी था।

हेगसेथ बिल्कुल अलग दौर में लिखते हैं, पर उनका सोचना भी काफी हद तक ऐसा ही है। उनके लिए लड़ाई का मैदान आज का अमेरिका है। यहाँ ख़तरा किसी ऐसे साम्राज्य से नहीं है जो किसी पवित्र जगह पर कब्ज़ा किए बैठा हो। ख़तरा कई मोर्चों से है: धर्मनिरपेक्षता, प्रगतिशील सोच, संस्थाओं में फैला भ्रष्टाचार और पश्चिमी संस्कृति को जान-बूझकर ख़त्म करने की कोशिश।

अपनी किताब ‘अमेरिकन क्रूसेड’ (American Crusade) में वे लिखते हैं कि धर्म, परिवार और आज़ादी की बुनियाद को देश का ही उच्च वर्ग (एलीट क्लास) तोड़ रहा है, जिसे पारंपरिक अमेरिकी जीवन-शैली से नफ़रत है।

क्लेरमों में इकट्ठा हुए योद्धाओं की तरह, हेगसेथ भी आज के आम नागरिकों से कहते हैं कि अब शांत या बेअसर रहने का रास्ता बचा ही नहीं है। उनका मानना है कि पश्चिमी दुनिया के लोग लड़ना तो नहीं चाहते, लेकिन एक हज़ार साल पहले के अपने ईसाई पूर्वजों की तरह वे आज भी ऐसी ताकतों से घिरे हैं जो उन्हें ख़त्म करना चाहती हैं। दोनों की सोच में एक ही बात साफ़ है, समझौता करने का मतलब हार है, और बिना जीते शांति की बात करना नैतिक रूप से पूरी तरह गलत है।

निशाने पर कौन: सरहद पार का दुश्मन या घर के अंदर का विरोधी?

ग्यारहवीं सदी की धर्मयुद्ध वाली सोच और आज के राष्ट्रवाद की लहर की असली चाल यह है कि वे ‘विरोधी’ को कैसे देखते हैं। हालाँकि दोनों ज़मानों में दुश्मन की परिभाषा बदल चुकी है।

पोप अर्बन द्वितीय के लिए दुश्मन साफ़ तौर पर बाहर का था, जो दूसरे देश और दूसरी सभ्यता से जुड़ा था। लेवंत (मध्य पूर्व) पर कब्ज़ा जमाए बैठी मुस्लिम ताक़तें, बंद होते तीर्थयात्रा के रास्ते और बाइज़ेंटाइन साम्राज्य की सीमाओं पर बढ़ता दबाव, भूमध्य सागर के पार एक साफ़ दिखने वाला निशाना था। नक़्शे पर यह बिल्कुल आमने-सामने की टक्कर थी, ‘ईसाई दुनिया बनाम काफ़िर’।

हेगसेथ इस पुरानी सभ्यता वाली दुश्मनी का एक रूप आज भी बनाए रखते हैं। कट्टर इस्लामवाद, दुनिया भर में बदलती आबादी और सीमाओं के कमज़ोर होने पर उनकी चेतावनियाँ इसी ओर इशारा करती हैं। यरूशलम क्रॉस और ‘काफ़िर’ (जिसका अरबी में मतलब गैर-मुस्लिम या अधर्मी होता है) जैसे शब्दों का खुलकर इस्तेमाल करना, जान-बूझकर मध्ययुगीन दौर की याद दिलाता है। यह इस बात का संकेत है कि पश्चिमी और इस्लामी दुनिया के बीच की खींचतान आज भी जारी है, और इसमें कोई ढील नहीं आने वाली।

यहाँ हेगसेथ की विचारधारा अर्बन के तरीके से एक कदम आगे निकल जाती है, क्योंकि अब लड़ाई का मैदान बदल चुका है। मध्ययुगीन पोप पूरे यूरोप को ईसाई समाज का ही एक हिस्सा मानते थे, भले ही उसमें कमियाँ थीं। उनका मकसद यूरोपीय राजाओं को एक बाहरी दुश्मन के खिलाफ एकजुट करना था। इसके उलट, हेगसेथ आज के विविधता भरे और आपस में बँटे हुए अमेरिकी समाज में रहकर बात कर रहे हैं। इसलिए वे इस धर्मयुद्ध वाली नज़र को बाहर के बजाए तेज़ी से देश के अंदर की तरफ मोड़ते हैं।

‘अमेरिकन क्रूसेड’ की असली लड़ाई किसी विदेशी ज़मीन पर नहीं, बल्कि देश के अंदर की संस्थाओं में चल रही है। यहाँ दुश्मन यूनिवर्सिटी के कमरों में है, बड़े मीडिया घरानों में है, प्रगतिशील राजनीतिक आंदोलनों में है और सरकारी तंत्र के ‘डीप स्टेट’ में छुपा बैठा है।

घर के अंदर के ही राजनीतिक और सांस्कृतिक विरोधियों को देश की नींव हिलाने वाला बताकर, हेगसेथ पुरानी धर्मयुद्ध वाली सोच को आज के ‘कल्चर वॉर’ के हिसाब से नया रूप दे देते हैं।

अब विरोधी या काफ़िर समंदर पार नहीं बैठा है, वह स्कूल बोर्ड की बैठकों में बैठा है, कंपनियों की नीतियाँ तय कर रहा है और अदालतों में फैसले गढ़ रहा है। भाषा का यह बदलाव आम लोकतांत्रिक असहमति को भी अस्तित्व बचाने की आर-पार की जंग बना देता है।

वफ़ादारी का सवाल: ईश्वर/चर्च की दुनिया या ‘फ़र्स्ट अमेरिका’?

पवित्र युद्ध की एक जैसी भाषा के पीछे एक गहरा फ़र्क भी छुपा है। असली फ़र्क इस बात का है कि इंसान की आख़िरी वफ़ादारी किसके प्रति है।

पोप अर्बन द्वितीय पूरी दुनिया के ईसाई समाज (सार्वभौमिक चर्च) के मुखिया थे। उनकी नज़र में ईसाई दुनिया भाषा, नस्ल और शुरुआती देशों की सीमाओं से बहुत ऊपर थी। फ्रांसीसी, जर्मन, नॉर्मन और इतालवी, काग़ज़ पर ये सभी रोम के एक ही धार्मिक प्रमुख के नीचे आते थे।

उस ज़माने में आज की तरह बने-बनाए देश नहीं हुआ करते थे। लोगों की वफ़ादारी सिर्फ़ ईश्वर, चर्च और अपने ज़मींदार से होती थी। पहला धर्मयुद्ध पूरे यूरोप का एक साझा मिशन इसलिए बन पाया क्योंकि उसे मंज़ूरी देने वाली ताक़त किसी राजा या उसके ताज से बहुत बड़ी और पवित्र थी।

हेगसेथ इसके उलट बेझिझक खुद को अमेरिकी राष्ट्रवादी मानते हैं। उनका यह धर्मयुद्ध अमेरिका की अपनी खास किस्मत और पहचान से जुड़ा है, एक ऐसे देश के रूप में, जिसे वे पश्चिमी आज़ादी का आखिरी सबसे बड़ा ठिकाना मानते हैं।

उनके लिए धर्म और झंडा आपस में पूरी तरह घुले-मिले हैं। ईसाई धर्म समाज को नैतिक ताकत और ऐतिहासिक पहचान देता है, लेकिन इस पहचान को बचाए रखने का इकलौता जरिया एक ताकतवर, संप्रभु और अपनी संस्कृति पर भरोसा रखने वाला अमेरिका ही है।

जहाँ अर्बन द्वितीय ने पृथ्वी के राज्यों को स्वर्गीय क्रम के नीचे रखा, वहाँ हेगसेथ अमेरिकी देशभक्ति को लगभग पवित्र दर्जा देते हैं। राष्ट्र को बचाने के लिए वही कट्टर, न झुकने वाली तपस्या चाहिए जो कभी मठवासी सैन्य आदेशों के लिए रखी जाती थी। मध्ययुगीन पोप के लिए राष्ट्र विश्वास के बाद आता था। आधुनिक राष्ट्रवादी के लिए राष्ट्र की तकदीर ही विश्वास की आखिरी कसौटी है।

किताबों की बयानबाज़ी से पेंटागन के कॉरिडोर्स तक

हेगसेथ के ये विचार केवल किताबों या भाषणों तक सीमित नहीं रहे। उनकी किताब ‘द वॉर ऑन वारियर्स’ (The War on Warriors – 2024) ने इस पूरी बहस को एक नया मोड़ दिया। इस किताब में हेगसेथ ने सीधे अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठान पर हमला बोलते हुए तर्क दिया कि “अमरीकी सेना को सामाजिक प्रयोगों और ‘वोक’ नीतियों ने अंदर से कमजोर कर दिया है, और अब इसे वापस अपने असली योद्धा-रूप (Warrior Ethos) में लौटाना होगा।”

यह वैचारिक बहस तब सीधे भू-राजनीतिक वास्तविकता बन गई जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पीट हेगसेथ को अमरीकी रक्षा मंत्री (Secretary of Defense) के पद के लिए चुना। हेगसेथ के शरीर पर उकेरे गए ‘यरूशलम क्रॉस’ और ‘देउस वुल्ट’ के टैटू, उनकी क्रूसेडर-भाषा और उनके विचार अचानक दुनिया की सबसे ताकतवर सेना के शीर्ष नेतृत्व से जुड़ गए। यही कारण है कि 1095 के क्लेरमों के भाषण और आज के अमेरिकी रक्षा तंत्र के शीर्ष तक पहुँची इस भाषा की तुलना अब केवल इतिहास का कोई दिलचस्प तथ्य नहीं रही, यह आज की वैश्विक राजनीति और आधुनिक लोकतंत्रों के भविष्य से जुड़ा एक ज्वलंत सवाल बन चुकी है।

ब्लैक-एंड-व्हाइट सोच का सम्मोहन

आज इक्कीसवीं सदी के लोग ग्यारहवीं सदी की उस कड़क और बेबाक भाषा को क्यों पकड़ रहे हैं? आख़िर धर्मयुद्ध का यह विचार शांत क्यों नहीं बैठता?

पोप अर्बन द्वितीय की सोच और हेगसेथ के राष्ट्रवाद, दोनों की असली ताक़त इंसान की एक गहरी थकान से निकलती है: सही-गलत की धुंध से ऊब जाने की थकान। आज की ज़िंदगी बहुत उलझी हुई है, बहुत तेज़ है और पैर तले ज़मीन लगातार खिसकती रहती है। विविधता भरे समाज में समझौता करना पड़ता है, हर पहलू को बारीकी से समझना पड़ता है और इस थकाऊ बात को स्वीकार करना पड़ता है कि मतभेद हमेशा रहेंगे।

धर्मयुद्ध वाली यह सोच इसी दिमागी थकान की एक लुभाने वाली दवा देती है, पूरी और साफ़ नैतिक स्पष्टता।

जब इतिहास और राजनीति को धर्मयुद्ध के चश्मे से देखा जाता है, तो सारी उलझनें और जटिलताएँ एक झटके में ग़ायब हो जाती हैं। सामने वाले अब अलग सोच रखने वाले आम नागरिक नहीं रहते, बल्कि वे सिर्फ़ बुराई के पुतले नज़र आने लगते हैं। अपने साथी अब कमियों वाले राजनीतिक सहयोगी नहीं रहते, बल्कि एक पवित्र सेना के वीर योद्धा बन जाते हैं।

फिर हर चुनाव, हर सांस्कृतिक बहस और क़ानून की हर लड़ाई सिर्फ़ सरकार चलाने का साधारण काम नहीं रहती, वह अच्छाई और बुराई, यानी रोशनी और अँधेरे के बीच आर-पार की जंग बन जाती है।

अर्बन द्वितीय ने इस मिथक के ज़रिए हिंसा और ख़ून-ख़राबे का एक लंबा दौर शुरू कर दिया, जिसने ईसाई और मुस्लिम दुनिया के रिश्तों को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया और भूमध्य सागर के पूरे इलाक़े पर गहरे निशान छोड़े।

हेगसेथ उसी धर्मयुद्ध के दौर की एक सुंदर और निखरी हुई याद का सहारा लेते हैं। उनका मक़्सद एक ऐसे राजनीतिक जनाधार को एकजुट करना है, जो ख़ुद को अकेला महसूस करता है, जो बचाव की मुद्रा में है और इस तेज़ी से बदलती दुनिया को लेकर बेहद बेचैन है।

दोनो के पीछे काम करने वाली दिमाग़ी तरक़ीब एक ही है, इतिहास को हथियार की तरह इस्तेमाल करना, ताकि कथित सभ्यतागत विनाश के डर के आगे एक अटूट एकजुटता पैदा की जा सके।

पोप अर्बन द्वितीय और पीट हेगसेथ की तुलना सिर्फ़ इतिहास का कोई दिलचस्प तथ्य (Trivia) या दो अलग-अलग दौरों को आमने-सामने रखने (Juxtaposition) तक सीमित नहीं है। यह इस बात को समझने की एक गहरी कोशिश है कि पुराने धार्मिक और युद्ध से जुड़े विचार (Archetypes) आज भी हमारी आधुनिक राजनीतिक सोच में किस तरह ज़िंदा हैं और काम कर रहे हैं।

अर्बन द्वितीय ने मध्ययुगीन योद्धाओं से कहा कि वे तलवार उठाएँ और समंदर पार जाकर एक पवित्र शहर को दोबारा हासिल करें। वहीं, पीट हेगसेथ आज के नागरिकों और सैनिकों से कहते हैं कि वे सांस्कृतिक और राजनीतिक ढाल अपनाएँ और देश के अंदर फैली बुराइयों से अपनी सोच और पहचान वाले राष्ट्र को वापस छीने।

दोनों ही मामलों में, एक हज़ार साल के अंतर के बावजूद, क्लेरमों की वही पुरानी याद एक ख़तरनाक और लुभावना वादा दोहराती है: जो टूटा है उसे जोड़ा जा सकता है, जो खोया है उसे वापस जीता जा सकता है, और जो विरोधी रास्ते में खड़े हैं उन्हें हराया जा सकता है, बस शर्त यह है कि मानने वाले एक अटूट, न झुकने वाला हौसला जुटाएँ और ऐलान कर दें कि ‘ईश्वर की यही मर्ज़ी है’ (Deus vult)


‘मेविस्तान’ बनाने का सपना, अलवर-भरतपुर में हिंसा और फिर गाँधी-नेहरू का हस्तक्षेप: जानिए मेवात के उस इतिहास की पूरी कहानी, जिसने बदल दिया इलाके का चेहरा

जनवरी की वो काली और ठंडी रात, जब हवाओं में नार-ए-तकबीर- अल्लाहू अकबर के नारे गूँज रहे थे और एक भीड़ भयानक गोलीबारी कर रही होती है। गोलीबारी करते करते लगभग आधी रात बीत जाती है और जब वो भीड़ गोलीबारी से बोर हो जाती है तो पहुँच जाती है पास के ही एक हिंदू मंदिर में और पहले मूर्तियाँ तोड़ती है और फिर वहाँ रखे हुए धर्मग्रंथों को जलाने लगती है। और फिर मंदिर पर आक्रमण कर देती है।

इसके बाद भीड़ मंदिर के पुजारी को घसीटकर ले आती है और उनके हाथ- पैर रस्सियों से बाँधकर एक पेड़ से उनको उल्टा लटका देती है। पुजारी की चीखें हवाओं में गूँजती रहती हैं साथ में गूँज रही होती है पिशाचों की डरावनी हंसी।

धर्मग्रंथ आग में जल रहे होते हैं और मंदिर के ठीक सामने पेड़ से टंगा हुआ पुजारी तिल-तिल तड़पता हुआ मरता जाता है। वो भीड़ शैतानों की तरह नाचती रहती है और हवा में गूँजता रहता है- अल्लाहू अकबर, अल्लाहू अकबर…

ये घटना भारत के उस इलाके की कोई अकेली घटना नहीं थी। लगभग 15 साल तक ये सबकुछ चला.. कई मंदिर तोड़े गए, कई पुजारियों का ऐसे ही कत्लेआम किया गया। यहाँ तक कि सरकारी कर्मचारियों और सैनिकों को भी बर्बरता से मौत के घाट उतारा गया।

साथ ही इस क़ौम पर अंधा विश्वास करने वाले उस इलाके के एक सेक्युलर हिंदू राजा को अपनी गद्दी तक छोड़नी पड़ी। हिंदू 15 साल तक सबकुछ सहते रहे लेकिन इस बार हिंदुओं ने ऐसा पलटवार किया जो जिहादियों की उम्मीदों से परे था। 

क्या आप जानते हैं कि ये पैशाचिक कृत्य भारत के किस हिस्से में हो रहा था? आपको लग रहा होगा कि ये बात आज से 30 साल पहले के कश्मीर या आजादी के समय के हैदराबाद या जूनागढ़ की है? नहीं… ये सबकुछ दिल्ली से एकदम सटे हुए क्षेत्र मेवात में हो रहा था।

अभी हमने जो घटना बताई, वो घटना है अलवर के गोविन्दगढ़ गाँव की। पर गोविन्दगढ़ गाँव में उस रात जो कुछ भी हो रहा था वो तो बस एक ट्रेलर था। अब सवाल उठता है कि कौन थे ये पैशाचिक कृत्य को करने वाले और क्या था उनका मक़सद?

ये शुरुआत थी उस खौफनाक षड्यन्त्र की जिसके तहत मेवात के मेव मुसलमान एक स्वतंत्र देश मेविस्तान बनाने के लिए जिहाद छेड़ने जा रहे थे। और ये सब करीब 15 सालों तक चला क्योंकि मेवों को लगा कि जैसे हिंदुओं के नरसंहार के नाम पर काँग्रेस को ब्लेकमेल करके मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान छीन लिया ठीक वैसा ही करके वो भी अलग मेविस्तान बना लेंगे।

लेकिन काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती। अपने इस दुस्साहस की मेव मुसलमानों को ऐसी कीमत चुकानी पड़ी जिसे वो आज तक नहीं भूल पाए हैं। जो मेव मुसलमान मेविस्तान का सपना लेकर रायफलों और तलवारों के साथ सड़कों पर कूदे थे उन्हें अपनी फटी हुई लुंगियों के साथ अलवर और भरतपुर से भागना पड़ा। 

इस वीडियो में हम बात करेंगे मेविस्तान के षड्यन्त्र की और बात करेंगे जिहादियों को सिखाए गए उस सबक की जिसके बाद अलवर रियासत के प्रधानमंत्री नारायण भास्कर खरे ने कहा था कि “अलवर में अब शांति है क्योंकि यहां एक भी मेव मुसलमान नहीं बचा है।”

ये साल 1933 की बात है, यानी की स्वतंत्रता से लगभग 14-15 साल पहले की। उस समय अलवर में जयसिंघ राजा का शासन हुआ करता था। स्वाभाविक सी बात है की किसी भी राजा को अपने प्रदेश की इकॉनमी सुयोजित तरीके से चलाने के लिए और जनता की सुख सुविधा और सुरक्षा की पूर्ति करने के लिए धन चाहिए।

और ये धन का ज़्यादातर हिस्सा व्यापर और कुछ हिस्सा टैक्स से आता है। दूसरे राजाओं की तरह राजा जय सिंह ने भी अपने प्रदेश अलवर के लिए भी यही व्यवस्था सुयोजित करी थी। टैक्स कम था या अधिक यह एक अलग विषय है लेकिन इस्लामी आक्रांताओं की तरह अलवर के राजा का टैक्स कोई जज़िया नहीं था।

मुसलमानों को जितना टैक्स चुकाना था उतना ही हिंदुओं को भी चुकाना था। राज्य के सभी लोग अपने राज्य के नियम कानून के अनुसार टैक्स देते भी थे। पर जैसे ही कौमी उन्माद मेवात के मोमिनों में बढ़ने लगा वैसे ही, चीज़ें बदलने लगी। मेवात में मुसलमानों ने राज्य को टैक्स देना ही बंद कर दिया।

टैक्स का बहाना बनाकर वो लोग एक ऐसी साजिश रचने जा रहे थे जिसका किसी को भी आभास नहीं था। ये लोग जानते थे बकाया टैक्स वसूलने के लिए राजा जयसिंघ अपने अधिकारियों को ज़रूर भेजेंगे। और इसीलिए अलवर के 70 से भी अधिक गाँवों के हजारों मेव मुसलमान कुछ ऐसा करने जा रहे थे जो जल्दी ही राजा जय सिंह के साथ-साथ वहाँ के हिंदुओं के लिए सबसे बुरा सपना साबित होने जा रहा था।

1933 में 7 जनवरी को जय सिंह राज्य का बकाया टैक्स वसूलने के लिए अपने अधिकारियों को उस इलाके में भेजते हैं। वहीँ, राजा के टैक्स अधिकारियों और सैनिकों के स्वागत के लिए मेव मुसलमान पूरी तैयारी में जुटे हुए थे। गाँवों के आसपास आर्मी स्टाइल में ट्रेंचेस खोद दिए गए थे और निगरानी के लिए एक ऊँची पहाड़ी पर ढोल-नगाड़ों के साथ कुछ लोगों को रख दिया गया था।

रायफलें, बारूद, कुल्हाड़ी, तलवारें और बरछियाँ तैयार थी। मेव जानते थे कि वो आगे क्या करने जा रहे हैं और इसलिए वो लोग अपनी औरतों और बच्चों को पहले ही गुड़गाँव, दिल्ली और आगरा में अपने रिश्तेदारों के पास भेज देते हैं। उस दिन अलवर रियासत का एक मजिस्ट्रेट 100 सैनिकों के साथ गोविंदगढ़ गाँव पहुँचता है और रियासत के खिलाफ बगावत के जुर्म में 25 मेव मुसलमानों को गिरफ्तार करता है।

गिरफ़्तारी तो जैसे तैसे हो गई लेकिन अब बारी थी गाँव से बाहर निकलने की। मजिस्ट्रेट कैदियों को लेकर जैसे ही बाहर निकलने की कोशिश करता है ठीक उसी समय चारों ओर से भीषण गोलीबारी होने लगती है। सड़कों पर पेड़ और बोल्डर गिराकर ब्लॉक कर दिया जाता है।

सैनिकों ने गोलीबारी का जवाब देना शुरू किया और शुरुआत में मेवों पर भारी भी पड़े लेकिन जल्दी ही पासा पलट गया। पास की पहाड़ी से ढोल-नगाड़े बजने लगे और देखते ही देखते आसपास के गाँवों से निकलकर हजारों मेव मुसलमानों ने गोविंदगढ़ को घेर लिया।

मजिस्ट्रेट कैदियों को लेकर गाँव के रवेन्यू ऑफिस में शरण लेता है और सैनिक आड़ लेकर दंगाइयों से भिड़ने में लग जाते हैं। रात-भर दोनों तरफ से गोलीबारी होती रही जिसमें लगभग एक दर्जन सुरक्षाकर्मी मारे गए और कई घायल हुए।

आगे बढ़ने से पहले एक नजर मेवात की जियोग्राफी पर डाल लेते हैं।

मिनी पाकिस्तान

भारत में जब टूरिज़्म सेक्टर तेजी से बढ़ रहा था तब एक गोल्डन ट्रैंगल की कल्पना की गई। इसके एक छोर पर दिल्ली, दूसरे छोर पर मथुरा, वृंदावन, आगरा और तीसरे छोर पर मौजूद है जयपुर। सोने के इस त्रिभुज के ठीक बीच में पड़ता है मेवात क्षेत्र जो हरियाणा के नूंह से लेकर राजस्थान के अलवर, डीग और भरतपुर और उत्तर प्रदेश के मथुरा के कुछ हिस्सों तक फैला हुआ है।

मिनी पाकिस्तान नाम से कुख्यात इस क्षेत्र से गुजरते हुए आपको सफेद कुर्ते और पगड़ी, लंबी दाढ़ी और नीली तहमत और लुंगी पहने हुए लंबे चौड़े मेव मुसलमान बड़ी-बड़ी आँखों से घूरते हुए नजर आ जाएँगे। हत्या, लुटपाट, चोरी-डकैती, अपहरण, बलात्कार और यहाँ तक कि आतंकवाद भी, शायद ही कोई अपराध होगा जिसका संबंध मेवात से ना निकलता हो।

याद कीजिए 31 जुलाई 2023 का वो काला दिन। मेवात के नूह जिले के मुंडका गाँव में मौजूद नालहर मंदिर में हिंदू जल चढ़ाने जा रहे थे। ठीक इसी समय मेवाती जिहादियों ने उनके ऊपर जानलेवा हमला कर दिया। चारों तरफ से पथराव होने लगा और गोलियाँ चलने लगी। इस गोलीबारी में दो होमगार्ड और शक्ति सैनी नाम का एक युवक मौके पर ही मार दिया गया।

इसके बाद जिहादियों ने अभिषेक राजपूत को गोली मारी। अभिषेक दर्द से तड़प रहा था, उसे गोली लगी थी लेकिन वो जिंदा था और मदद की गुहार लगा रहा था। सैकड़ों मेव मुसलमान उसे घेरकर खड़े थे और उसे तड़पता हुआ देखकर खुश हो रहे थे। इसके बाद भीड़ में से कुछ जिहादी अभिषेक के पास जाते हैं, उसके हाथ और गर्दन पकड़ते हैं और एक बड़े से चाकू से कलमा पढ़ते हुए उसकी गर्दन रेत देते हैं, इतने से भी मन नहीं भरा तो उन्होंने पत्थरों से अभिषेक का सिर बुरी तरह से कुचल डाला।

अभिषेक को जिस तरह से कत्ल किया गया वह हैवानियत और हिंदुओं के प्रति नफरत की पराकाष्ठा थी। लेकिन यहाँ सवाल उठता है कि क्या मेव हमेशा से ऐसे ही थे? ऐसा बिल्कुल नहीं था। मेवों का इतिहास राजपूतों से जुड़ा हुआ है। ये लोग आज भी खुद को गर्व से सूर्यवंशी और चंद्रवंशी बताते हैं।

खिलजी से लेकर बलबन हो या बाबर और औरंगजेब जैसे मुस्लिम आक्रांता… मेवों ने हमेशा उनकी नाक में दम किए रखा। मुस्लिम आक्रान्ताओं ने बड़े पैमाने पर मेव राजपूतों, जाटों, गुर्जरों और मीणाओं का कत्लेआम किया लेकिन फिर भी उन्हें हरा नहीं पाए।

तो फिर सवाल उठता है कि वो मेव जिन्होंने खतरनाक से खतरनाक मुस्लिम आक्रान्ताओं को मजा चखाया वो इतने कट्टर मुसलमान और हिंदुओं के दुश्मन कैसे बने? इसके लिए हमें ग्यारहवीं शताब्दी के इतिहास पर एक नजर डालनी होगी।

मेव मुसलमानों का इतिहास

मेवों को मुसलमान बनाने का सिलसिला लगभग 11 वीं सदी में शुरू हुआ जब लुटेरे महमूद गजनवी के भतीजे सालार मसूद ने मेवात पर आक्रमण करके बड़ी संख्या में उन्हें मुसलमान बनाया। यही कारण है कि सालार मसूद गाजी से मेव आज भी सबसे ज्यादा कनेक्ट फ़ील करते हैं। सालार मसूद को बहराइच में राजा सुहेलदेव ने बुरी मौत मारा था।

लेकिन बाद में सूफियों ने बड़ी चालाकी से उसकी कब्र को एक दरगाह बना दिया और उसे एक सूफी संत घोषित कर दिया। सूफियों की इस चालाकी के पीछे का असली कारण मेवों को रिझाना था। 13 वीं शताब्दी में ख्वाजा मोइनूद्दीन चिश्ती, 14 वीं शताब्दी में निजामुद्दीन औलिया, 16 वीं शताब्दी में शाह चोखा और शाह मूसा जैसे अनेक सूफी मुसलमानों ने मेवों को मुसलमान बनाने में बड़ी भूमिका निभाई।

सूफी मेवों के उग्र स्वभाव को जानते थे, वे मेवों की बहदुरी से परिचित थे। उन्हें पता था कि मेव जिसकी तरफ से भी लड़ेंगे बहादुरी से लड़ेंगे इसलिए यदि वे मुसलमान बन जाते हैं तो इस्लाम के लिए एक बड़ी एसेट साबित होंगे। इसलिए उन्होंने सीधे इस्लामी नियम कायदों को उनके ऊपर थोपा नहीं। 

यही कारण रहा कि मुस्लिम होते हुए भी मेव होली खेलते, जन्माष्टमी मनाते और खुद को राम और कृष्ण से जोड़ते थे। 1920 तक मेव बस नाम भर के लिए मुस्लिम थे क्योंकि उनके अधिकतर रीति रिवाज हिंदुओं से मिलते जुलते थे।

मेव मुसलमान हिंदू परंपराओं से इतने गहरे जुड़े हुए थे कि आर्य समाज के घर वापसी कार्यक्रम के दौरान बड़ी संख्या में मेव इस्लाम छोड़कर हिंदू बन गए थे।

कट्टरपंथी इस्लामी गिरोह आखिर ये कैसे सहन कर सकता था? इसलिए 1920 में दिल्ली के निजामुद्दीन से मुहम्मद इलियास कंधालवी नाम का एक देवबंदी मुसलमान मेवात पहुंचता है और यहाँ से  तबलीगी जमात नाम के एक कट्टर इस्लामी मिशन को शुरू करता है।

जमात का मकसद था मेव मुसलमानों के भीतर हिंदुओं के प्रति नफरत और घृणा भरना और उन्हें कट्टरता की तरफ मोड़ना। इलियास को इस काम में जल्दी ही सफलता मिली और उसका मिशन मेवात से निकलकर पूरे देश में फैल गया।

आज इलियास तो जिंदा नहीं है लेकिन मेव मुसलमानों को कट्टर बनाने के लिए शुरू की गई तबलीगी जमात आज लगभग 150 देशों में मुसलमानों को कट्टर बनाने के मिशन पर जुटी हुई है और लगभग 8 करोड़ मुसलमानों का इससे जुड़े होने का अनुमान है।

सूफियों ने पहले मुसलमान बनाया और फिर कट्टर बनाने का काम तबलीगी जमात ने पूरा कर दिया। इसके बाद मेव मुसलमानों ने अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया। साल था 1946, तारीख एक दिसंबर। भरतपुर में मेव मुसलमानों की एक बहुत बड़ी सभा हुई जिसमें एक मेविस्तान नाम का एक अलग देश बनाने के लिए रेजोल्यूशन पास किया गया।

इसके बाद 3 फरवरी 1947 को तिजारा में एक बहुत बड़ी मेव पंचायत बुलाई गई। इस पंचायत में तराना-ए-मेवात गाया गया और अलवर, भरतपुर, गुड़गाँव और मथुरा से लेकर दिल्ली तक के मेव मुसलमानों को मेवस्तान के लिए जिहाद छेड़ने और कुर्बानी देने को कहा गया।

इसके बाद जिहाद का उन्मादी खेल शुरू हो गया। मुहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग के साथ मिलकर गुड़गांव के मेव मुसलमानों ने दंगे शुरू कर दिए। गुड़गांव में बड़ी संख्या में हिंदुओं पर हमले के बाद ये लोग अलवर में घुस गए। देखते ही देखते अलवर के गाँव के गांव जल उठे। कितने हिंदू मारे गए इसका आँकड़ा आज तक भी सार्वजनिक नहीं है।

इसके बाद मेव मुसलमानों की इस भीड़ ने अलवर के सैनिकों पर हमले करके उनकी राइफल्स छीनना शुरू कर दिया। अलवर के प्रशासन और हिंदुओं ने अभी तक मेवों की देशद्रोही हरकतों का पलटवार करना शुरू नहीं किया था। सबको लगता था कि ये बस दो चार दिन चलेगा और फिर शांत हो जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

29 जुलाई का दिन था, एक हिंदू परिवार अपनी कार से अलवर की तरफ जा रहा था। मेवों ने इतनी गोलियाँ चलाई कि कार छलनी हो गई। पूरा परिवार निर्ममता से मार डाला गया। इसके बाद एक जैन मंदिर को लूटा गया और कई हिंदुओं को मुसलमान बनाया गया। हिंदुओं के जो भी गाँव सामने आए, जला दिए गए।

इसी दौरान पृथ्वीपुरा नाम के एक गाँव में मंदिर के अंदर एक गाय को काटा गया और जिहादियों ने वहीं पर मजे से गोमांस का भक्षण किया। हिंदुओं ने पहले तो ये अत्याचार सहन किया लेकिन जब पानी सिर से ऊपर निकल गया और अपने अस्तित्व के मिटने का ही खतरा पैदा हो गया तो उन्होंने जवाब देना शुरू कर दिया।

अलवर के प्रधानमंत्री एनबी खरे ने अपनी सेना और पुलिस को खुली छूट दे दी। इसके बाद हिंदुओं ने मेव जिहादियों को ऐसा सबक सिखाना शुरू किया जिसे उनकी आने वाली पीढ़ियाँ भी याद रखने वाली थी। ब्राह्मण, राजपूत, जाट, गुज्जर, मीणा और दलित समाज, हिंदुओं ने एकजुट होकर जिहादियों को खदेड़ना शुरू किया।

अलवर और भरतपुर के हिंदू जानते थे कि महामारी को खत्म करने के लिए वायरस को हटाना जरूरी है। इसलिए एक तरफ से सफाई अभियान शुरू किया गया। देखते ही देखते जो मेव मुसलमान एक अलग देश बनाने का सपना लेकर निकले थे, वो अपनी लुँगियाँ बचाकर भागने लगे। मेवों ने खुद ही अपने गाँव जला दिए और अलवर से भरतपुर की तरफ भागे।

भरतपुर के हिंदुओं ने अलवर से ज्यादा खातिरदारी की। इसके बाद मेविस्तान का सपना देखने वाले लाखों मेव मुसलमान गुड़गाँव, आगरा, दिल्ली और हैदराबाद मे जाकर छुपे। लगभग एक लाख से अधिक मेव मुसलमान पाकिस्तान भाग गए, वही पाकिस्तान जिसके साथ मिलकर वो अपना नया मेविस्तान बनाने का ख़्वाब सजा रहे थे।

अलवर और भरतपुर में अब चौतरफ़ा शांति थी। अलवर के प्रधानमंत्री एनबी खरे ने बताया कि अलवर में अब एक भी मुसलमान शेष नहीं बचा है और मेविस्तान की समस्या हमने समाप्त कर दी है। अलवर और भरतपुर के हिंदुओं ने एक बड़ी लड़ाई जीती थी। लेकिन यहाँ पर एंट्री होती है मुस्लिमों के प्रिय गाँधी जी और नेहरू जी की।

जो मेव मुसलमान कुछ समय पहले मेविस्तान बनाने के लिए हिंदुओं का सर्वनाश करने मैदान में उतरे थे उन्हें जब हिंदुओं ने उनकी ही भाषा में जवाब दिया तो जैसा कि हमेशा होता आया है, मेव मुसलमान अपना विक्टिम कार्ड लेकर गाँधी और नेहरू के पास पहुँचते हैं।

नेहरू-गाँधी ने पाकिस्तान से बुलाए मेव

गाँधी जी का मन इन देश तोड़ने वाले मेव मुसलमानों के लिए विचलित हो उठता है। गुड़गाँव से लगभग 80 हज़ार से अधिक मेव पाकिस्तान के लिए निकल चुके थे। गाँधी जी को जैसे ही इसकी खबर मिलती है तो वे रातभर सो नहीं पाते हैं। बेचैन और परेशान गांधी जी दौड़े-दौड़े गुड़गाँव से लगभग 45 किलोमीटर दूर घासेरा गाँव में मेवों के बीच पहुँचे।

उन्होंने यहाँ एक भाषण दिया जिसमें वे कहते हैं कि मेव मुसलमान भारत की रीढ़ की हड्डी हैं और उन्हें कोई भी ताकत पाकिस्तान नहीं भेज सकती है। गाँधी जी के दौरे के बाद अधिकतर मेवों ने पाकिस्तान जाने का प्लान ड्रॉप कर दिया। इसके बाद अपनी प्रार्थना सभा के दौरान गाँधी जी अपने गुड़गांव दौरे का जिक्र करते हैं।

जिन मेव मुसलमानों ने बस कुछ दिन पहले ही एक अलग देश मेवस्तान बनाने के लिए विद्रोह किया था और पाकिस्तान बनाने के लिए मुस्लिम लीग का पूरा साथ दिया था उनके बारे में गाँधी जी क्या कहते हैं जरा एक नजर इस पर भी डालना जरूरी है।

गाँधी जी कहते हैं कि किसी ने मुझे बताया कि मेव मुस्लिम एक क्रिमिनल ट्राइब है और उन्होंने कुछ समय पहले विद्रोह किया है। तो मैं पूछता हूँ कि क्या केवल इस वजह से उनको पाकिस्तान भेज दिया जाएगा? मेवों को लेकर कोई भी नहीं कह सकता है कि वो क्रिमिनल हैं? कौन जानता है कि यहाँ कौन क्रिमिनल है और कौन नहीं? और अगर वो क्रिमिनल हैं भी तो क्या हम उनको मार दें? आखिर उन्हें सुधारने की जिम्मेदारी किसकी है?

गाँधी जी की जिद पर नेहरू सरकार ने ‘फिर बसाओ कमेटी’ बनाई और मेवों को बसाना शुरू किया। जो मेव पाकिस्तान जाने वाले थे वो तो रुके ही लेकिन जो वहाँ चले गए थे गाँधी जी के भाषण के बाद उनमें से बड़ी संख्या में वापस लौटे और नेहरू सरकार ने उनको जमीनें देकर फिर से मेवात में बसाया।

एक तरफ तो जिन मेवों ने भारत के टुकड़े करने के षड्यन्त्र किए उन्हें पाकिस्तान से भी वापस बुलाकर बसाया गया लेकिन पाकिस्तान से लुट पिटकर जो हिंदू भारत आना चाहते थे उनके लिए गांधी जी कहते हैं कि भारत आने की क्या जरूरत है? वहीं पाकिस्तान में मर जाओ।

जो हिंदू और सिख शरणार्थी दिल्ली पहुंचे उनके साथ नेहरू सरकार ने जानवरों से भी बुरा बर्ताव किया। पाकिस्तान में तो एक झटके में मौत मिल रही थी लेकिन दिल्ली की कॉन्ग्रेस सरकार उन्हें धीरे-धीरे मार रही थी। शरणार्थियों को जानवरों की तरह रिलीफ कैम्प्स में ठूँस दिया गया था। इन रिलीफ कैम्प्स की हालत ऐसी थी मानो कंसन्ट्रेशन कैम्प्स हों।

बदहाली से तंग आकर हिंदू और सिख शरणार्थी आए दिन कांग्रेस के बड़े नेताओं के घरों के आगे जमा हो जाते थे और नारेबाजी करते थे। शरणार्थियों के विरोध के बाद नेहरू सरकार ने उन्हें सीधी चेतावनी दी कि अगर जरा भी माहौल खराब करने की कोशिस की तो उनको कान्सन्ट्रैशन कैम्प्स में फेंक दिया जाएगा।

आर्मी को पूरी छूट दे दी गई कि जहाँ भी कोई शरणार्थी माहौल खराब करने की कोशिश करता हुआ दिखे तो उसे देखते ही गोली मार दी जाए। जिन मेवों ने देश तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी उनकी मेहमानों की तरह आवभगत की जा रही थी। दिल्ली के मुसलमान नेहरू की सरकार को पलटने के लिए गोला बारूद इकट्ठा कर रहे थे।

आजादी के ठीक बाद तख्तापलट की इस साजिश के बारे में हमने अपने पिछले वीडियो में विस्तार से बताया है, वीडियो का लिंक आपको कमेन्ट बॉक्स में मिल जाएगा।

हिंदुओं ने जब जिहादियों को उनकी ही भाषा में जवाब देना शुरू किया तो नेहरू-गाँधी की जुगलबंदी ने ऐसी हर कोशिश को विफल कर दिया। नेहरू की कॉन्ग्रेस सरकार ने हिंदुओं के हथियार छीन लिए और सिखों की कृपाण पर बैन लगाया गया। जिन मेव मुसलमानों के देश तोड़ने की साजिश रची उन्हें देश की रीढ़ बताकर फिर से उन्हीं जगहों पर बसा दिया गया।

यहाँ तक कि पाकिस्तान चले गए मेवों को भी नेहरू सरकार ने वापस लाकर मेवात में बसाया। मेवात जो आज मिनी पाकिस्तान बना है ये नेहरू-गाँधी की इसी मेहरबानी की देन है। वरना 1947 में अलवर और भरतपुर के हिंदुओं ने इस समस्या का समाधान हमेशा के लिए कर दिया था।

अलवर और भरतपुर के हिंदुओं ने उस समय जिहादी हिंसा का जिस प्रकार से प्रतिरोध किया था वह आज भी हिंदू समाज के लिए एक सीख है। अलवर और भरतपुर के हिंदुओं ने सिखाया कि भागने से बेहतर है संघर्ष करो। अत्याचारों के आगे झुको मत। और इस सबसे ऊपर ये बात कि देश और धर्म के ख़िलाफ़ हथियार उठाने वालों का ऐसा हश्र करो कि पाकिस्तान तक चेक वाली लुंगियाँ उठाकर भागना पड़े।

59 करोड़ अकाउंट्स, लाखों करोड़ की कैपिटल और आखिरी व्यक्ति तक पहुँचता बैंकिंग सिस्टम… फिर क्यों जनधन योजना से सुभाष गर्ग को लगी मिर्ची?

आपको ये शख्स याद हैं? याद ही होंगे, ये हमारी देश की सेंट्रल बैंक यानी रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया के पूर्व गवर्नर हैं। दुनिया के नामी अर्थशास्त्री हैं। रघुराम राजन इनका नाम है। वैसे मैंने आपको जो इनकी पहचान बताई है आपने इसके लिए उन्हें पिछले पाँच-छह सालों में खबरों में नहीं देखा होगा।  

आपने इन्हें GDP को लेकर रोना रोते, मैन्युफैक्चरिंग को श्राप देते हुए देखा होगा, लेकिन अब इनका तख्तापलट हो गया है। इनकी जगह पर एक नए पूर्व साहब आए हैं, इनका नाम है सुभाष गर्ग। 

गर्ग साहब ने पिछले दिनों 7.8% की रफ्तार से बढ़ती जीडीपी को लेकर एक कैलकुलेशन दी थी। अब इन्होंने कहा है कि 12 साल पहले देश में शुरू की गई प्रधानमंत्री जनधन योजना फेल हो गई है।

कल उन्होंने लेफ्ट इकोसिस्टम की वेबसाइट क्विंट पर एक आर्टिकल लिखा है। हँसी की बात ये है कि जनधन योजना के फेल होने के उन्होंने जो पैरामीटर्स बताए हैं, वो कॉमेडी का स्तर बढ़ा देते हैं। 

सबसे पहले जानिए कि सुभाष गर्ग ने किस बेसिस पर कहा है कि ये योजना फेल हुई है। अपने आर्टिकल में उन्होंने कहा है कि अब लगभग 5 करोड़ ऐसे एकाउंट्स ऐसे हैं जिनमें कोई बैलेंस ही नहीं है। 

उनका दूसरा दावा है कि इस योजना में खोले गए 59 करोड़ एकाउंट्स में से 15 करोड़ एकाउंट्स इनएक्टिव हैं, तीसरा इनमें से कितने UPI यूज कर रहे ये क्लियर नहीं है और चौथा कि जिनके पास एकाउंट्स हैं वो सिर्फ़ सरकारी स्कीमों का पैसा निकालने आते हैं। 

और इन सब बातों के आधार पर गर्ग साहब ने कहा है कि स्कीम को अबोलिश कर दिया जाए क्योंकि ये एक फेलियर है। वैसे तो ऐसी कॉमेडी को इग्नोर करना चाहिए लेकिन सच्चाई सामने रखना हमारा काम है। 

पहली बात, जनधन योजना साल अगस्त 2014 में जब लॉंच हुई थी तब देश में करोड़ों एडल्ट्स के पास एक बैंक अकाउंट नहीं था। ऐसे लोग ना अपना बचाया पैसा कहीं जमा कर सकते थे, ना कोई लोन अवेल कर सकते थे। 

इससे पहले लोगों को जीरो बैलेंस अकाउंट खुलवाने के बारे में पता ही नहीं था, एक स्कीम जरूर थी जिसे BSBDA का नाम UPA सरकार ने दिया था लेकिन इसके बारे में लोगों ने सुना ही नहीं था। 

ऐसे में PMJDY ने बिना किसी बैलेंस के लोगों को खाता खोलने की सर्विस दी, जहाँ 2014 में सिर्फ़ 53% एडल्ट भारतीयों के पास एक अकाउंट था तो वहीं 2024 में नंबर 89% हो गय। 

नतीजा ये हुआ कि अब तक 59 करोड़ ऐसे एकाउंट्स इस योजना में खुल चुके हैं। अब इसमें से कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने इन खातों में कभी पैसा जमा नहीं किया वो जमा नहीं रखते, यही तो सुविधा है। गर्ग साहब जनधन योजना के अकाउंट्स में बैलेंस का ना होना बग नहीं है, फ़ीचर है। 

गर्ग साहब आगे कहते हैं कि इनमें से जिन एकाउंट्स ए पैसा है भी वो औसतन 5 हज़ार रुपए ही है। अरे भाई! जनधन अकाउंट कोई गुड़गांव के कैमेलियास में रहने वाले थोड़े खोल रहे हैं। 

गांव और क़स्बों के ग़रीब लोग खोल रहे हैं जिनके लिए 5 हज़ार की बचत भी बड़ी है। और आपको पता है कि इस 5 हज़ार की बचत ने कुल मिलाकर बैंकों को 3 लाख करोड़ से ज्यादा की फ्रेश कैपिटल दी है। 

बैंक इसका इस्तेमाल लोन देने और बिजनेस एक्सपैंड करने के लिए कर सकते हैं। यानी जनधन योजना ने ना सिर्फ़ लोगों को इम्पावर किया है बल्कि बैंक्स को भी मजबूत किया है। उनका दूसरा दावा है कि 15 करोड़ जनधन एकाउंट्स इनएक्टिव हैं, हो सकता है ऐसा ही हो। जनधन योजना का काम लोगों को एक बार बैंकिंग सिस्टम में लाना था। 

उन्हें उसी अकाउंट से बाँध कर रखना नहीं। अगर किसी ने बैंक का मुँह पहली बार जनधन योजना के सहारे देखा और बाद में और बेहतर सुविधा के लिए प्राइवेट बैंक के पास चला गया तो ये फेलियर थोड़े है। 

यही मोटिव था कि एक बार वो किसी तरह फाइनेंसियल सिस्टम में जुड़ें। इसके आगे गर्ग साहब दावा करते हैं कि जनधन अकाउंट खोलने वाले बस सरकारी योजनाओं का पैसा लेने के लिए ही ये एकाउंट्स यूज करते हैं। 

हाँ भाई तो इसमें क्या बुराई है? और सरकार कैसे करोड़ों लोगों के एकाउंट्स में पैसा डालेगी? क्या सिस्टम होगा? अगर जनधन एकाउंट्स ना होते तो सरकार डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर नहीं कर पाती। 

और अगर ये नहीं होता तो सरकारी डेटा ही कहता है कि 5 लाख करोड़ से ज़्यादा की सेविंग्स नहीं होती। ऐसे में अगर कोई जनधन एकाउंट्स का इस्तेमाल सिर्फ़ किसान सम्मान निधि या फिर प्रधानमंत्री आवास योजना की किश्त निकालने को कर रहा है तो वो पर्पज ही सोल्व कर रहा है।  

आगे सुभाष गर्ग के लॉजिक और भी फनी हो जाते हैं, वो कहते हैं कि इसका कोई डेटा नहीं है कि कितने जनधन एकाउंट्स यूजर UPI यूज कर रहे हैं। वैसे तो देश में अभी 55 करोड़ UPI यूजर्स हैं और इनमें से बड़ा नंबर उनका भी होगा जो जनधन अकाउंट से UPI यूज करते होंगे लेकिन इवन अगर ऐसा नहीं है, तो ये भी जनधन योजना का फेलियर नहीं है। 

बैंक में पैसा जमा करना, यहाँ से पैसा निकलाना, लोन के लिए एक्सेस और ATM कार्ड के लिए एक्सेस, ये सारे जनधन योजना के मैंडेट थे जो इसने पूरे किए हैं। ये कहीं भी नहीं कहा गया है कि जनधन योजना का असल मक़सद लोगों को एक प्रोडक्ट से दूसरे प्रोडक्ट की तरफ़ ले जाना था। आगे गर्ग साहब कहते हैं कि इस योजना को अबोलिश कर दिया जाना चाहिए। 

वो ये भी कहते हैं कि अब सरकार को इस योजना का प्रचार बंद कर देना चाहिए। भाई मेरे, अगर सरकार ने कोई अचीवमेंट हासिल की है तो वो तो प्रचार करेगी ही। और अगर पहले की सरकारों ने ही ये काम कर दिया होता तो मोदी सरकार को ये मौक़ा ही ना मिलता, इन फैक्ट UPA ने एक ऐसा ही प्रयास किया था। 

लेकिन UPA जहाँ 8 साल में सिर्फ़ 24 करोड़ अकाउंट खोल पाई तो वहीं मोदी सरकार ने टेक्नोलॉजी का यूज करके 50 करोड़ से ज़्यादा एकाउंट्स उसी समय में खोल दिए। अगर UPA ने ऐसी योजना लागू की होती तो वो भी प्रचार करते। अब उन्होंने नहीं की और मोदी सरकार ने एक योजना लागू की और वो प्रचार कर रहे हैं तो इसमें आख़िर गर्ग साहब को क्या समस्या है?

राजीव जी कम्प्यूटर लाए, नेहरू जी ने IIT खोली, इंदिरा जी ने पाकिस्तान तोड़ा टाइप की बातों को आज भी हवा देने वाले जब ये बातें कहते हैं तो हँसी आती है। यार! मोदी सरकार से आपको नफ़रत है ठीक है, आपको सरकार पसंद नहीं है, ठीक है। लेकिन काउंटर तो ढंग का करो, आख़िर कब तक ख़ुद को हँसी का पात्र बनवाओगे। 

गर्ग को सवाल ये पूछना चाहिए कि बैंक अकाउंट जैसी बेसिक फैसिलिटी भी करोड़ों लोगों को दशकों तक क्यों नहीं मिली थी? इसके लिए एक विशेष योजना क्यों लांच करनी पड़ी? लेकिन आजकल वो किसी भी चीज में बाल की खाल निकालते हैं, ऐसे में उनका कोई दोष भी नहीं है। 

‘संभल में वो (मुस्लिम) रहेंगे या हिंदू’: जंगी ऐप, दुबई कनेक्शन, तुर्क Vs पठान, 6 जिलों की कट्टर मुस्लिम भीड़ – ये है 2024 दंगों की एनाटॉमी

“या तो वे (मुस्लिम) रहेंगे या हिंदू संभल में रहेंगे।”
“आज पुलिस मस्जिद में प्रवेश करने वालों को नहीं बचा पाएगी।”
“जो भी मस्जिद में प्रवेश करेगा, उसे जिंदा जला दिया जाएगा।”

2024 में संभल दंगों का दंश जिन्होंने झेला, आँखों-देखी वो खौफनाक मंजर सहा, ऊपर उनके चंद बयान दर्ज हैं। ऐसे 199 लोग संभल दंगे की साजिश से पर्दा उठाने के लिए नियुक्त आयोग के समक्ष अपने-अपने बयान दर्ज करवा चुके हैं। सिर्फ 6 गवाह (जो मस्जिद इंतेजामिया समिति से संबंधित हैं) को छोड़ कर 193 गवाह इसे पूर्व-नियोजित और षड्यंत्र-रचित दंगा मानते हैं।

लेकिन क्या बहुमत का गणित ही काफी है किसी घटना को साबित करने के लिए? मतलब लोकतंत्र के गणित से ही न्यायपालिका भी चलेगी? नहीं। विधि-विरुद्ध या सिंपल शब्दों में कहें तो सरकारी तंत्र के खिलाफ जो भी षड्यंत्र रचा जाता है, वो हमेशा गुप्त रूप से रचा जाता है। न्यायिक प्रक्रिया में इसलिए इसे प्रत्यक्ष साक्ष्य से सिद्ध करना बहुत मुश्किल होता है, मतलब गवाह 1 हो या 193 – सिर्फ गवाही से काम नहीं चलेगा। गवाहों की गवाही के साथ-साथ इसे अप्रत्यक्ष साक्ष्य के पैमाने पर कसा जाता है, फिर पूरे षड्यंत्र को सिद्ध किया जाता है। कोर्ट-कचहरी की भाषा में कहें तो – परिस्थितिजन्य साक्ष्य।

  • क्या संभल दंगा स्वतःस्फूर्त था, मतलब अचानक घटित हुआ था?
  • तकनीक, सोशल मीडिया, ऐप आदि का भी प्रयोग किया गया दंगा भड़काने में?
  • क्या इस दंगे में सिर्फ स्थानीय मुस्लिम ही शामिल थे?
  • क्या लोगों के साथ-साथ राजनीति का भी रोल इन दंगों में रहा?
  • सिंपल सरकारी काम में मजहबी एंगल कैसे घुसा?
  • मजहब के अलावे पैसे और वर्चस्व की बातें क्यों आई?
  • जिस जामा मस्जिद को लेकर दंगा हुआ, उससे जुड़े लोग कौन-कौन हैं? दंगों को लेकर उनका रोल क्या-क्या रहा?
  • 6 जिलों की मुस्लिम भीड़ सर्दी के मौसम में सुबह-सुबह जामा मस्जिद तक कैसे पहुँची?
  • संभल जामा मस्जिद के पास रहने वाली हिंदू आबादी भी क्या दंगाइयों के निशाने पर थी?

परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को एक साथ गूँथने के लिए कुछ ऐसे ही सवालों के जवाब आयोग ने अपनी रिपोर्ट में दर्ज की है। और इन्हीं जवाबों को एक साथ लाकर हम जानेंगे कि आखिर 2024 का संभल दंगा हुआ तो हुआ क्यों? किसने करवाया, कैसे करवाया, दंगों से किसको फायदा होना था, उत्तर प्रदेश की पुलिस ने हिंदुओं को कैसे बचाया?

2024 संभल दंगा स्वतःस्फूर्त था?

दंगा हुआ था 24 नवंबर 2024 को। लेकिन क्यों और कैसे हुआ था, इसको समझने के लिए क्रोनोलॉजी को समझना होगा।

यह क्रोनोलॉजी लेकर जाती है हमें 19 नवंबर 2024 को। इसी तारीख को चंदौसी सिविल कोर्ट ने संभल की जामा मस्जिद के सर्वेक्षण का आदेश दिया था। विवाद का मुख्य बिंदु यह था कि क्या यह जामा मस्जिद है या हिंदुओं के दावे के अनुसार हरि हर मंदिर? इसके लिए कोर्ट ने एक एडवोकेट कमिश्नर भी नियुक्त किया था। एडवोकेट कमिश्नर रमेश सिंह राघव ने कोर्ट के आदेश के बाद डीएम संभल से पर्याप्त पुलिस बल प्रदान करने का अनुरोध किया ताकि सर्वेक्षण का कार्य बिना किसी बाधा के किया जा सके। 19 नवंबर की शाम को ही पुलिस-प्रशासनिक अधिकारियों और भारी पुलिस बल की मौजूदगी में सर्वेक्षण शुरू हुआ।

जब सब कुछ न्यायालय के आदेश पर हुआ, सर्वेक्षण से संबंधित सूचना सरकारी तंत्र को दी गई… तो सवाल यह उठता है कि आखिर 19 नवंबर को जामा मस्जिद के आस-पास मुस्लिम भीड़ इकट्ठा कैसे हो गई? और भीड़ इतनी आक्रामक कैसे हो गई कि सरकारी सर्वेक्षण को ही स्थगित करना पड़ गया?

इन सवालों के उत्तर ढूँढने में पहली कड़ी जो मिलती है, वो है – जामा मस्जिद की प्रबंध समिति के अध्यक्ष और एडवोकेट जफर अली का। हुआ यह कि सरकारी प्रोसेस के तहत कोर्ट के आदेश से संभल जामा मस्जिद की समिति को भी अवगत कराया गया। इस समिति के अध्यक्ष थे एडवोकेट जफर अली।

संभल दंगों की जाँच करने वाली आयोग की रिपोर्ट में पुलिस-प्रशासन की ओर से जो बयान दिए गए हैं, उसके अनुसार 19 नवंबर 2024 को मस्जिद समिति के अध्यक्ष जफर अली को सर्वेक्षण का नोटिस मिला शाम को 6 बज कर 4 मिनट पर। सरकारी अधिकारियों द्वारा यह नोटिस दिया गया मस्जिद पहुँचने पर। आश्चर्य की बात यह है कि इस समय तक मस्जिद के आस-पास मुस्लिम भीड़ जमा हो चुकी थी। प्रथम दृष्टया किसी को भी लग सकता है कि जिस समय जफर अली को सर्वेक्षण की सूचना मिली, उस समय अगर भीड़ जमा हो गई थी, तो शायद इस भीड़ को बुलाने में इनका हाथ नहीं रहा होगा। लेकिन ऐसा नहीं है। वो इसलिए क्योंकि रिपोर्ट में मस्जिद समिति के ही एक अन्य सदस्य की भी गवाही है, जो जफर अली को मस्जिद के सर्वेक्षण की सूचना से संबंधित है और बहुत ही अहम है। यह गवाही है – कासिम जमाल का, जो जामा मस्जिद के सदस्य भी हैं और वकील भी।

कासिम जमाल ने आयोग को बताया कि वे 19 नवंबर को सर्वेक्षण के दौरान मौजूद थे। उसी दिन दोपहर लगभग 3:30-3:45 बजे कोर्ट कार्यालय में एक फाइल से आदेश पढ़ने की कोशिश करते समय उनकी वादी के अधिवक्ता के साथ तीखी बहस भी हुई थी। सबसे मजेदार बात उन्होंने यह बताई कि मस्जिद का सर्वेक्षण शाम 6 बजे के लिए निर्धारित है, यह सूचना उन्हें जफर अली ने दी थी। इतना ही नहीं, जब वो शाम 6:00-6:15 बजे के बीच जामा मस्जिद पहुँचे, तो स्थानीय सांसद (जिया-उर-रहमान बर्क) पहले से ही वहाँ था और स्थानीय विधायक (इकबाल महमूद) का बेटा सुहेल इकबाल भी मौजूद था।

7 वर्षों से संभल जामा मस्जिद समिति के अध्यक्ष रहे जफर अली ने लेकिन अपनी ही समिति के सदस्य कासिम जमाल से अलग बयान दिया है। जफर अली के अनुसार 19 नवंबर को वे चंदौसी कोर्ट में थे, जहाँ लोग चर्चा कर रहे थे कि जामा मस्जिद से संबंधित एक मामला दायर किया गया है। वे दोपहर लगभग 4:00 बजे कोर्ट गए और कोर्ट क्लर्क से पूछताछ की, जिन्होंने उन्हें बताया कि एक मामला दायर किया गया है लेकिन उन्होंने वाद पत्र की प्रति नहीं दिखाई।

जामा मस्जिद से संबंधित दायर याचिका को अधिवक्ता शकील वारसी और अमीर हुसैन के अलावा अन्य वकील देख रहे थे। पहले जफर अली ने आयोग को यह बताया कि उन्हें बाकी अन्य अधिवक्ताओं के बारे में जानकारी नहीं है। इसके बाद जब आयोग ने पूछा कि क्या कासिम जमाल और फारूकी अधिवक्ता भी जामा मस्जिद के मामले को देखते हैं, तो उन्होंने जवाब दिया – हाँ। इसके बाद और भी मजेदार बात कही। जफर अली के अनुसार उन्हें याद ही नहीं था कि उन्होंने फारूकी और कासिम जमाल को कोर्ट कार्यालय भेजा था या नहीं, और अगर भेजा था तो वहाँ क्या-क्या हुआ था। और तो और, शाम में लगभग 4:00-5:00 बजे कासिम जमाल और फारूकी ने उन्हें सर्वेक्षण के बारे में सूचित किया था। सरकारी अधिकारी की तरफ मस्जिद के सर्वेक्षण की सूचना शाम 5:15 बजे कोतवाली संभल से आए एक फोन के जरिए मिली थी, जिसमें उन्हें सूचित किया गया था कि जामा मस्जिद का सर्वेक्षण होने वाला है और उन्हें मस्जिद पहुँचने के लिए कहा गया था – यह बात भी उन्होंने खुद अपनी गवाही में बताई है। मतलब मस्जिद पहुँचने पर शाम 6 बज कर 4 मिनट पर जो नोटिस थमाया गया था, उससे 1 घंटे पहले ही उनको पुलिस-प्रशासन की तरफ से भी सूचना मिल चुकी थी।

अब इन कड़ियों को जोड़िए। जफर अली साफ झूठ बोलते दिखेंगे। यही वो शख्स थे, जिन्होंने मस्जिद में सर्वेक्षण होने वाला है, जैसी गंभीर और कानूनी प्रक्रिया को आम सूचना में बदल दिया। इसका असर हुआ कि जब तक पुलिस-प्रशासन, सर्वे करने वाली टीम शाम 6 बज कर 4 मिनट पर मस्जिद पहुँचती, तब तक आस-पास की मुस्लिम आबादी से लेकर सांसद-विधायक तक को यह सूचना पहुँच चुकी थी। इसके बाद सूचना का राजनीतिकरण किया गया, मजहबी जामा पहना गया और भीड़ इकट्ठा करके उसे आक्रामक रूप दिया गया।

दंगे की साजिश और षड्यंत्र की क्रोनोलॉजी की बात करें तो 19 नवंबर के बाद 21 नवंबर का दिन भी महत्वपूर्ण है। इस बीच 20 नवंबर का दिन छूट जा रहा है तो इसका मतलब यह नहीं है कि इस दिन कुछ नहीं हुआ था। दरअसल 19 नवंबर को जब मस्जिद का सर्वेक्षण पूरा नहीं हो पाया तो उसके शेष सर्वे के लिए 20 नवंबर को ही कोर्ट द्वारा नियुक्त अधिवक्ता आयुक्त ने आवश्यक पुलिस बल और प्रशासनिक व्यवस्थाओं का अनुरोध करते हुए एक पत्र भेजा था। मामले की गंभीरता को देखते हुए उसी दिन संभल के एसपी ने पत्र के माध्यम से सूचित किया कि कुंदरकी विधानसभा क्षेत्र में उप-चुनाव के कारण पुलिस बल प्रदान करना संभव नहीं था। इसलिए सर्वेक्षण को बाद की तारीख के लिए निर्धारित करना उचित होगा।

इसके बाद संभल में डीएम और एसपी ने पुलिस बल के साथ पैदल गश्त की। विवादित धार्मिक स्थल के पास की कैमरों को ठीक करवाया गया और शहर काजी अलाउद्दीन, जामा मस्जिद के सदर जफर अली और जामा मस्जिद के खादिम मश्हूद अली फारूकी के वीडियो संदेशों के माध्यम से मुस्लिम समुदाय को संदेश भी दिया गया कि जिले में धारा 163 बीएनएसएस लागू है, जो पाँच से अधिक लोगों के एकत्र होने पर रोक लगाती है। उन्हें अपनी-अपनी मस्जिदों में नमाज अदा करने, अफवाहों से बचने, भ्रामक संदेशों को अग्रेषित न करने और अपने शहर की समृद्धि के लिए प्रार्थना करने का आग्रह भी किया गया। धारा 163 बीएनएसएस के निषेधाज्ञा आदेश जिले में प्रकाशित किए गए और दैनिक समाचार पत्रों में भी छपवाए गए। मतलब 20 नवंबर को सरकारी महकमा चुनाव में व्यस्त था, लेकिन संभल में शांति रहे, इसके लिए भी प्रयासरत था। लेकिन क्या दंगों की मानसिकता लिए लोग शांत थे? नहीं। इन लोगों ने 21 नवंबर को जो किया, वो आने वाले दिनों में दंगों की प्लानिंग थी।

संभल के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार ने आयोग को बताया कि 19 नवंबर को भीड़ एकत्र करके सर्वेक्षण को सफलतापूर्वक बाधित करने के बाद सांसद बर्क और मस्जिद समिति का आत्मविश्वास बढ़ गया था। इसके बाद 21 नवंबर को व्हाट्सएप ग्रुपों के माध्यम से लोगों को जामा मस्जिद में बुलाया गया। ठीक एक दिन बाद मतलब 22 नवंबर को शुक्रवार का दिन था। इस दिन बहुत भारी संख्या में भीड़ को जामा मस्जिद आकर नमाज पढ़ने का मैसेज कई व्हाट्सएप ग्रुपों में भेजा गया। यह काम सिर्फ संभल में नहीं किया गया बल्कि आस-पास के 5-6 जिलों के व्हाट्सएप ग्रुपों पर भी ऐसे मैसेज भेजे गए। इस मैसेज में लिखा था:

“संभल के सभी लोग शुक्रवार की नमाज शाही जामा मस्जिद में बड़ी संख्या में अदा करें और शाही जामा मस्जिद के पास की मस्जिदों में नहीं। केवल शाही जामा मस्जिद में नमाज अदा करें, और इस संदेश को यथासंभव साझा करें।”

‘मन्नत’ वॉट्सऐप ग्रुप और ‘संभल सांसद’ वॉट्सऐप ग्रुप में भेजे गए मैसेज जिनका रिकॉर्ड पुलिस के पास भी दर्ज है, से स्पष्ट है कि भीड़ को जुमे के नमाज के लिए क्यों बुलाया जा रहा था – शेष होने वाले सर्वेक्षण को किसी भी तरह से रोकने के लिए, चाहे उसके लिए दंगा ही क्यों न करना पड़े।

इस दिन जब जुमे की नमाज के लिए संभल जामा मस्जिद में भीड़ इकट्ठा होती है, और वो भीड़ अप्रत्याशित होती है, तो समझ में आता है कि भीड़ को क्यों बुलाया गया था, जबकि जिले में धारा 163 बीएनएसएस लागू था। नमाज के बाद मस्जिद की सीढ़ियों पर से समाजवादी पार्टी के सांसद जिया उर रहमान बर्क ने भड़काऊ नारे लगाए, मजहबी बयानबाजी की थी। इससे माहौल और भी संवेदनशील हो गया था।

समाजवादी पार्टी के सांसद जिया उर रहमान बर्क 19 नवंबर से ही एक्टिव थे। उस दिन भी शाम को सर्वे करने गई टीम अपना कार्य पूरा नहीं कर पाई थी, तो उसकी एक मुख्य वजह सांसद बर्क द्वारा इकट्ठा की गई भीड़ थी, जो मस्जिद के भीतर पहुँच कर सर्वे में बार-बार बाधा डाल रही थी। शेष सर्वे आगे कभी न हो पाए, इसके लिए उन्होंने वॉट्सऐप मैसेज, सोशल मीडिया आदि के जरिए 22 नवंबर को जुमे के दिन भीड़ जमा की। इसके बाद उन्होंने नमाज के बाद भीड़ को जो संबोधित किया, उसके कुछ मुख्य पॉइंट्स देखिए:

  • “यह मस्जिद है, मस्जिद थी, और मस्जिद रहेगी। कोई भी हमारी मस्जिद हमसे नहीं ले सकता।”
  • “जैसे अयोध्या में हमारी मस्जिद छीनी गई, वैसे ही इसे नहीं छीनने देंगे।”
  • “पुलिस कितने ही ड्रोन तैनात कर ले, मस्जिद थी, है, और रहेगी, और हमें इसे हर हाल में बचाना है।”
  • “हम पुलिस, प्रशासन या सरकार से डरने वाले नहीं हैं। हम इस देश के मालिक हैं, नौकर या गुलाम नहीं।”
  • “हम अपनी जामा मस्जिद को कानूनी रूप से बचाएँगे और इंशा अल्लाह, कयामत तक इसे सुरक्षित रखने के लिए हर जरूरी काम करेंगे।”

संभल जिले में धारा 163 बीएनएसएस लागू होने के बावजूद नमाज के लिए इतनी भीड़ का आना अपने आप में गैर-कानूनी काम था, और यह हुआ संसद में बैठ कर कानून बनाने वाले सांसद की आँखों के सामने। अब सवाल उठता है कि क्या सांसद बर्क ने नमाज के बाद मस्जिद की सीढ़ियों पर से जो बयानबाजी की, उसकी जरूरत थी? हालाँकि सांसद ने आयोग को दिए अपने बयान में बताया है कि उस दिन जुमे की नमाज के बाद उन्होंने कोई भाषण नहीं दिया था बल्कि वहाँ मौजूद मीडिया के सवालों का सिर्फ जवाब दिया था। लेकिन उनके बयान की काट जामा मस्जिद प्रबंधन समिति के अध्यक्ष जफर अली की वो गवाही है, जिसमें उन्होंने कहा – “जब सांसद बर्क नमाजियों को संबोधित कर रहे थे, तब उनको चुप करवाने की कोशिश भी की थी। कहा था, “बस, कृपया रूकें।” लेकिन सांसद बर्क ने अनसुना कर दिया, बोलना जारी रखा।”

जफर अली के अलावा मशहूद अली फारूकी, जो जामा मस्जिद प्रबंधन समिति के सदस्य और अधिवक्ता हैं, उन्होंने भी अपनी गवाही में यह लिखवाया – “22 नवंबर 2024 को जुमे की नमाज के बाद सांसद बर्क ने मस्जिद की सीढ़ियों पर से मीडिया को संबोधित किया था। मस्जिद की सीढ़ियों से राजनीतिक बयान या प्रेस कॉन्फ्रेंस अनुचित था।”

दंगा हो और मुस्लिमों की ओर से प्रभावी ढंग से हो – इसके लिए 23 नवंबर 2024 का दिन सबसे अहम था। दरअसल इस दिन 3 चीजें एक साथ हुई थीं।

पहला – संभल जिले में धारा 163 बीएनएसएस लागू होने के बावजूद नमाज के इकट्ठा की गई भीड़ के सामने सांसद बर्क ने एक दिन पहले ही भड़काऊ भाषण दिया था, जिसमें कोर्ट के आदेश से असहमति भी व्यक्त की थी। और मुस्लिम समुदाय को एकजुट होने और विवादित स्थल की रक्षा के लिए बड़ी संख्या में एकत्र होने का आह्वान भी किया था। प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से, उन्होंने जिला पुलिस और प्रशासन की भूमिका और विश्वसनीयता पर सवाल भी उठाए थे, सर्वेक्षण का कड़ा विरोध किया था। सांसद के इस कार्य के लिए 23 नवंबर को उनके खिलाफ धारा 168 बीएनएसएस के तहत नोटिस जारी किया गया था और उन्हें तामील किया गया था।

दूसरा – कुंदरकी उप-चुनाव का परिणाम घोषित हुआ था। इसी विधानसभा सीट से पहले जिया-उर-रहमान बर्क विधायक थे। जब वो सांसद बने तो यह सीट खाली हो गई थी, इसलिए यहाँ उप-चुनाव कराए गए थे। जो सीट कुछ दिन पहले तक समाजवादी पार्टी के पास थी, 23 नवंबर को ही पार्टी इस सीट को हार गई थी। मतलब यह हार समाजवादी पार्टी के साथ-साथ सांसद जिया-उर-रहमान बर्क की निजी हार भी थी। क्योंकि चुनाव परिणाम अपेक्षित नहीं थे, इसलिए सांसद बर्क ने पुलिस और प्रशासन को हार के लिए दोषी ठहराया, उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए और प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से “उत्तर प्रदेश में संविधान की हत्या” जैसे शब्दों का उपयोग किया तथा जनता को पुलिस और प्रशासन के खिलाफ भड़काया। एक तरह से कहें तो मौके का फायदा उठाते हुए हिंसा के लिए अनुकूल वातावरण बनाया गया।

तीसरा – 23 नवंबर को ही कोर्ट द्वारा नियुक्त अधिवक्ता आयुक्त ने एक नोटिस भेजा था, जिसमें कहा गया कि जामा मस्जिद का शेष सर्वेक्षण अगले दिन मतलब 24 नवंबर को सुबह 7 बजे से लगभग 11 बजे तक आयोजित किया जाएगा और सभी पक्षों से उपस्थित रहने का अनुरोध किया गया। संभल की उप-जिलाधिकारी वंदना मिश्रा ने आयोग को अपनी गवाही में बताया कि 23 नवंबर को जब कोर्ट कमिश्नर (अधिवक्ता आयुक्त) ने जफर अली को टेलीफोन के माध्यम से 24 नवंबर को निर्धारित सर्वेक्षण के बारे में सूचित किया और नोटिस लेने के लिए आने को कहा, तो उन्होंने अपनी खराब तबीयत का हवाला देकर आने से इनकार कर दिया। इसके बाद वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों पर वह, सर्किल ऑफिसर संभल के साथ, लगभग 06:30 बजे उनके निवास पर नोटिस देने गईं। उस समय वह नोटिस में उल्लिखित आयोग की कार्यवाही के समय के साथ पूरी तरह सहमत थे। पुलिस-प्रशासन यह सारी प्रक्रिया इसलिए कर रही थी ताकि वो मस्जिद प्रबंध समिति के साथ शेष सर्वे के वक्त मौजूद रहें, भीड़ को नियंत्रित करें। संभल के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क को भी सूचित किया गया था, जो उस समय बेंगलुरु में थे। संभल के विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल के साथ-साथ मस्जिद समिति के अन्य सदस्यों को भी रात में ही सूचित कर दिया गया था। डीएम संभल के आदेश के माध्यम से यह निर्देश भी दिया गया था कि 24 नवंबर को सुबह 7 बजे से सर्वेक्षण बिना किसी बाधा के आयोजित किया जाए और शांति और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए पर्याप्त पुलिस-बल तैनात किए जाएँ।

कुल मिला कर मुस्लिम पक्ष और उनके रहनुमाओं के लिए 23 नवंबर 2024 का दिन हर तरफ से खराब दिन था। ऐसे में दंगाई भावना पहले से दिल में पाल बैठा शख्स क्या करेगा? दंगों के लिए और साजिश रचेगा, प्लानिंग करेगा। और हुआ भी यही। 23 नवंबर की शाम को सर्वेक्षण की जानकारी प्राप्त होने के बाद सांसद बर्क और जामा मस्जिद समिति के अध्यक्ष जफर अली ने विभिन्न स्तरों पर योजना बनाई, कई लोगों के साथ मीटिंग की।

जामा मस्जिद के अध्यक्ष और एडवोकेट जफर अली ने सांसद जिया-उर-रहमान बर्क से 23-24 नवंबर 2024 की रात कई बार बात की। इसके बाद जफर अली ने 23 नवंबर की रात 10:01 बजे 38 सेकंड की कॉल के माध्यम से सांसद बर्क को सर्वेक्षण के बारे में सूचित किया, यह जफर अली के CDR में दर्ज है। बाद में रात 11:04 बजे सांसद बर्क ने जफर अली को कॉल-बैक किया, यह भी CDR में दर्ज है।

चूँकि सांसद बर्क संभल में मौजूद नहीं थे, ऐसे में उन्होंने जफर अली को भीड़ एकत्र करने की जिम्मेदारी सौंपी, जो अपनी स्थिति के कारण कम समय में बड़ी भीड़ जुटा सकते थे। इसमें भीड़ एकत्र करने और सर्वेक्षण को हर हाल में रोकने की योजना बनाई गई, किसी भी स्थिति से निपटने की तैयारी की गई। यह सब कुछ CDR के माध्यम से पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज है, वॉट्सऐप कॉल इंटरेक्शन भी।

सांसद बर्क के निर्देशों का पालन करते हुए जफर अली ने आधी रात को सुहेल इकबाल (जामा मस्जिद इंतजामिया कमेटी के कैशियर और संभल के विधायक के बेटे) के निवास पर अन्य कमेटी सदस्यों के साथ एक बैठक की, जिसमें सर्वेक्षण और सांसद बर्क के निर्देशों के बारे में जानकारी दी गई। इसके बाद सांसद बर्क से जफर अली को 24 नवंबर की रात 12:32 बजे और 01:48 बजे कॉल प्राप्त हुईं, जिनमें भीड़ एकत्र करने और सर्वेक्षण को हर हाल में रोकने की योजना बनाई गई, किसी भी स्थिति से निपटने की तैयारी की गई। वॉट्सऐप कॉल इंटरेक्शन भी CDR में दर्ज है।

संभल जामा मस्जिद का सर्वे शुरू होना था सुबह 7 बजे से। सभी संबंधित पक्षों के साथ-साथ पुलिस-प्रशासन को भी इसकी सूचना समय पर दे दी गई थी। पुलिस-प्रशासन को तो सुबह 6 बजे ही मस्जिद पहुँच जाने के दिशा-निर्देश थे। लेकिन जिस तेजी से सरकार का सूचना तंत्र काम कर रहा था, अफसोस उससे अधिक तेजी दंगाई मानसिकता के लोगों ने दिखाई। 24 नवंबर की सुबह, वो भी उत्तर प्रदेश का मैदानी इलाका। मतलब सर्दी ठीक-ठाक रही होगी। इसके बावजूद 23 नवंबर की शाम से 23-24 नवंबर की देर रात तक जिस तरह के फोन कॉल, वॉट्सऐप मैसेज, सोशल मीडिया आदि का प्रयोग किया गया भीड़ जुटाने के लिए – उसी का नतीजा रहा कि सर्वे करने गई टीम और पुलिस बल को सुबह-सुबह ही जामा मस्जिद के आस-पास अप्रत्याशित मुस्लिम भीड़ (4000 से 4500 तक की अनुमानित संख्या) देखने को मिली। लेकिन शुरुआत में भीड़ ने दंगा नहीं किया, बाद में यही भीड़ दंगाई कैसे बन गई, यह भी पिछली रात को रची गई साजिश का नतीजा थी। जो लोग 24 नवंबर को सर्वे के दौरान मस्जिद परिसर में थे, उन्होंने अपनी-अपनी गवाही में बताया है कि कैसे भीड़ देखते-देखते दंगा करने लगी।

अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन
हरि हर मंदिर को ध्वस्त करके उसी जगह पर जामा मस्जिद बना दी गई, इसकी सच्चाई जानने के लिए हिंदू पक्ष ने जो याचिका कोर्ट में दी थी, उसके अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन की गवाही के अनुसार सर्वे में शामिल होने वाले सभी अधिकारी और सर्वे टीम सुबह लगभग 6:45 बजे संभल की कोतवाली पुलिस स्टेशन पहुँच गए थे। इसमें अधिवक्ता आयुक्त रमेश राघव, वादी के स्थानीय वकील गोपाल शर्मा, डीजीसी (सिविल) प्रिंस शर्मा, एएसआई के वकील विष्णु शर्मा और जिला प्रशासन (जिसमें जिला मजिस्ट्रेट, एसपी संभल, सर्किल ऑफिसर संभल और एसडीएम संभल) शामिल थे। कोई लेट से आया था, तो वे थे जामा मस्जिद समिति के वकील जफर अली। वो आए ही सुबह लगभग 7:00 बजे और कहा कि दो अन्य वकील भी आ रहे हैं और थोड़ा इंतजार करने का अनुरोध किया। लगभग 20 मिनट इंतजार करने के बाद अधिवक्ता-आयुक्त ने विवादित स्थल पर जाने का फैसला किया और प्रशासन की उपस्थिति में सभी वकील पैदल विवादित स्थल पर पहुँचे। अधिवक्ता-आयुक्त की कार्यवाही सुबह लगभग 7:30 बजे शुरू हुई और 45 मिनट के भीतर परिसर के आसपास एक बड़ी भीड़ जमा हो गई। उन्होंने धार्मिक नारे लगाने शुरू कर दिए। कुछ समय बाद उन्हें क्षेत्र के चारों ओर गोलीबारी की आवाज सुनाई देने लगी।

सुबह लगभग 8:30 बजे अधिवक्ता-आयुक्त ने मस्जिद के मुतवल्ली को वजू टैंक से पानी निकालने के लिए कहा। इसके तुरंत बाद सुबह लगभग 9:00 बजे ऐसे तनावपूर्ण स्थिति में भी जफर अली बाहर गए और बताया कि वे ‘दिलबाग पान मसाला’ लेने जा रहे हैं और कुछ समय बाद वापस आएँगे। लगभग 30 मिनट बाद वे वापस आए। जैसे ही वे वापस आए, बाहर की भीड़ अत्यधिक हिंसक हो गई और उन्होंने पुलिस कर्मियों और जिला प्रशासन पर बहुतायत में पत्थरबाजी शुरू कर दी। स्थिति बिगड़ने लगी थी। क्षेत्र में पूरी तरह से अराजकता थी। इस कारण से वजू टैंक का सर्वेक्षण नहीं हो सका।

विष्णु शंकर जैन ने यह भी आयोग को बताया कि जफर अली, जो जामा मस्जिद के मुतवल्ली भी हैं, ने मस्जिद के लाउडस्पीकर से घोषणाएँ शुरू कीं और भीड़ से शांत रहने का अनुरोध किया लेकिन जितना अधिक वे अनुरोध करते, भीड़ उतनी ही अधिक हिंसक होती गई। उन्हें लगा कि यह हिंसा को तेज करने का कोई संकेत था। सुबह 9:30 बजे से लगभग 10:45 बजे तक पत्थरबाजी, गोलीबारी, आँसू गैस, नारेबाजी विवादित स्थल के आसपास हो रही थी।

अपर पुलिस अधीक्षक (उत्तरी) श्रीश्चंद
संभल के अपर पुलिस अधीक्षक (उत्तरी) श्रीश्चंद ने अपनी गवाही में बताया कि जामा मस्जिद में सुबह की नमाज सुबह 6:00 बजे होती है, इसके बाद दूसरी नमाज दोपहर लगभग 1:30 बजे होती है, जिसमें नमाजी दोपहर 12:00 बजे से आने शुरू होते हैं। इसलिए जामा मस्जिद के अध्यक्ष जफर अली की सहमति से सर्वेक्षण का समय सुबह 7:00 बजे से 10:30 बजे तक निर्धारित किया गया था। मस्जिद के आसपास की दुकानें सुबह 10:00 बजे के बाद खुलती हैं और सामान्य रूप से जामा मस्जिद के पास इतनी बड़ी भीड़ कभी एकत्र नहीं होती। सुबह लगभग 7:30 बजे मस्जिद से थोड़ी दूर बने वारसी जिम के पास हजारों लोग एकत्र हुए और ‘एकरात की मस्जिद’ (यह एक मस्जिद है, जो जामा मस्जिद से लगभग 500 मीटर की दूरी पर है) की दिशा से हजारों और आए। गिरफ्तार आरोपियों और मृतकों में असमौली और हयातनगर क्षेत्रों (जामा मस्जिद से 5 से 15 किलोमीटर दूर स्थित क्षेत्र) के व्यक्ति शामिल थे। तलाशी के दौरान मामले से संबंधित वस्तुओं के अलावा ऐसा कुछ और नहीं मिला, जो दर्शाता है कि वे खरीदारी के लिए आए थे, न ही यह कि मस्जिद में नमाज का समय था और वो नमाज के लिए आए थे। तीन-स्तरीय बैरिकेडिंग के बावजूद इतनी बड़ी भीड़ गलियों के माध्यम से चुपके से आए थे।

अपर पुलिस अधीक्षक (उत्तरी) श्रीश्चंद ने यह भी बताया कि वर्तमान संभल विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल जो जामा मस्जिद में नमाज नहीं अदा करते, शेष सर्वेक्षण के दिन 24 नवंबर 2024 को सुबह 5:00-5:30 बजे मस्जिद पहुँचे और पास में रहने वाले अधिवक्ता मशहूद अली के निवास पर गए, जहाँ उन्होंने लोगों के साथ चर्चा की। सुबह लगभग 6:30 बजे ड्यूटी की जाँच के दौरान उन्हें अधिवक्ता मशहूद अली के निवास पर कई लोगों के साथ देखा गया। वरिष्ठ अधिकारियों और उनके द्वारा उन्हें संवेदनशील मामले के कारण अपने निवास पर लौटने का अनुरोध किया गया। हालाँकि उन्होंने कहा कि वह जल्द ही चले जाएँगे लेकिन बाद में वो नहीं गए। बाद में पता चला कि उन्होंने नमाज से पहले कई लोगों से मुलाकात की और नमाज के बाद अधिवक्ता मशहूद अली के निवास से हिंसक घटना में सक्रिय भूमिका निभाई।

पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार
संभल के पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार ने आयोग को अपनी गवाही में बताया कि 24 नवंबर को सर्वेक्षण कार्यवाही नियमों के अनुसार शुरू हुई और सुचारू रूप से चल रही थी। मस्जिद की इंतजामिया कमेटी के सदस्य जिनमें सदर जफर अली शामिल थे, अंदर मौजूद थे। सुबह लगभग 08:30 बजे जफर अली ने एक पूर्व नियोजित साजिश के तहत सर्वेक्षण के दौरान मस्जिद छोड़ दी, 2-3 व्यक्तियों को इशारा किया, उनसे फुसफुसाकर बात की और उन्हें मस्जिद के पीछे की ओर भेजा। इसके तुरंत बाद एक आक्रामक भीड़ गलियों से निकलकर आई, जो अवैध हथियारों से लैस थी, चेहरे ढके हुए थे, नारे लगा रहे थे, और सीसीटीवी कैमरे तोड़ रहे थे। भीड़ ने दावा (जिन लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया था) किया कि जफर अली ने कहा था कि वजू के टैंक का पानी निकाला जा रहा है और मस्जिद की खुदाई की जा रही है, जिसने घटना को हिंसक बना दिया।

अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट प्रदीप वर्मा
संभल के अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट प्रदीप वर्मा ने आयोग को बताया कि 24 नवंबर की सुबह लगभग 8:30 बजे से जामा मस्जिद के ढलान के पास भीड़ एकत्रित होकर नारेबाजी और विरोध प्रदर्शन करने लगी। वह जिला मजिस्ट्रेट के साथ, भीड़ को शांत करने की कोशिश कर रहे थे। लगभग 10:15 बजे जामा मस्जिद के अध्यक्ष जफर अली ने लाउडस्पीकर के माध्यम से घोषणा की कि सर्वेक्षण समाप्त हो गया है। इसके बाद भीड़ तुरंत आक्रामक हो गई और हिंसक कृत्यों में संलग्न हो गई। घटना में शामिल व्यक्तियों ने अपने चेहरों/पहचान को छिपाने के लिए मास्क का उपयोग किया था। भीड़ ने जामा मस्जिद के पीछे की गलियों से पत्थरबाजी, आगजनी और गोलीबारी शुरू कर दी। परिणामस्वरूप पुलिस और प्रशासनिक कर्मियों को चोटें आईं। लगभग 11:00 बजे जानकारी मिली कि भीड़ एकता चौकी को जलाने की कोशिश कर रही थी, इसलिए वह पुलिस अधीक्षक के साथ वहाँ गए, चौकी को सुरक्षित किया और आक्रामक भीड़ को तितर-बितर किया। लगभग 11:15 बजे एकता चौकी, तुर्तीपुर तिराहा और हिंदुपुरखेड़ा क्षेत्रों में पत्थरबाजी, आगजनी और गोलीबारी की घटनाएँ शुरू हुईं, जो लगभग 2:00 बजे तक नियंत्रण में लाई गईं।

उप-जिलाधिकारी वंदना मिश्रा
संभल की उप-जिलाधिकारी वंदना मिश्रा ने बताया कि 24 नवंबर को सर्वेक्षण के दौरान, कोर्ट कमिश्नर ने वजू टैंक के मापन और उसकी वीडियोग्राफी/फोटोग्राफी और आगे के मापन के बारे में कहा कि जब तक पानी नहीं निकाला जाता, तब तक यह संभव नहीं था। कोर्ट कमिश्नर ने यह भी कहा कि वह वजू टैंक में एक छड़ी डालकर गहराई को माप सकते हैं लेकिन सदर श्री जफर अली और इंतजामिया समिति के अन्य सदस्यों ने सहमति नहीं दी। कोर्ट कमिश्नर ने तब पूछा कि वजू टैंक का पानी कब निकाला जाता है, जिस पर जफर अली ने जवाब दिया कि हर शुक्रवार को नमाज से पहले पानी निकाला और साफ किया जाता है। अंततः काफी तर्क-कुतर्क के बाद उन्होंने स्वयं पानी निकालने की सहमति दी और प्रक्रिया शुरू की।

इसी बीच जफर अली पान-मसाला खाने के बहाने मस्जिद छोड़कर मस्जिद के बाईं ओर पीछे की ओर चले गए, जहाँ भीड़ एकत्र थी और लगभग आधे घंटे से पैंतीस मिनट बाद लौटे। जफर अली के मस्जिद छोड़ने के बाद मशहूद अली और कासिम जमाल अधिवक्ता भी मस्जिद के बाईं ओर से निकले और लगभग आधे घंटे बाद लौटे। मस्जिद में लौटने पर जफर अली ने मस्जिद के लाउडस्पीकर के माध्यम से भीड़ को संबोधित किया, जिसमें कहा गया कि सब कुछ ठीक चल रहा है। उस समय भीड़ आक्रामक नारे लगा रही थी, “नारा-ए-तकबीर अल्लाह-हु-अकबर” चिल्ला रही थी। उन्होंने जफर अली से भीड़ को शांत करने का अनुरोध किया। फिर वह जामा मस्जिद की छत पर गए, भीड़ की ओर हाथ उठाया, मुस्कुराए और लौट आए। शेष सर्वेक्षण कार्यवाही की गई और सर्वेक्षण पूरा होने के बाद सुबह लगभग 10:00-10:30 बजे उन्होंने मस्जिद के लाउडस्पीकर के माध्यम से घोषणा की कि सर्वेक्षण पूरा हो गया है, चिंता की कोई बात नहीं है और लोगों को चले जाना चाहिए। हालांकि, उनके संबोधन ने भीड़ को और भड़का दिया, नारे तेज हो गए, पत्थरबाजी बढ़ गई, आगजनी और गोलीबारी की आवाजें सुनाई दीं।

अधिवक्ता गोपाल शर्मा
हरि हर मंदिर बनाम जामा मस्जिद संबंधित हिंदू पक्ष ने जो याचिका कोर्ट में दायर की थी, उसके अधिवक्ता गोपाल शर्मा की गवाही के अनुसार 24 नवंबर 2024 को वजूखाना की फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी के लिए उसमें भरा पानी निकालने पर सहमति बनी थी। इसके लिए हुए बातचीत में खुद जफर अली भी शामिल थे। इसके बाद जब पानी निकाला जा रहा था, उसी समय जफर अली मस्जिद से बाहर गए और लगभग 35 मिनट बाद लौटे। लौटने के बाद उन्होंने लाउडस्पीकर पर घोषणा की, “अल्लाह के लिए, सब कुछ ठीक चल रहा है, शांत रहें।” हालाँकि उनकी घोषणाओं के बाद भीड़ और अधिक उत्तेजित हो गई, नारे लगाने लगी और पत्थरबाजी करने लगी। बिगड़ते माहौल को देखते हुए उन्होंने जफर अली, जो उनके साथ चंदौसी कोर्ट में वकालत करते हैं, से अनुरोध किया कि वे बाहर जाकर भीड़ को शांत करें। लेकिन जफर अली ने जवाब दिया कि वे मस्जिद के भीतर से ही जो करना है, वो कर रहे हैं। अधिवक्ता गोपाल शर्मा ने आयोग को बताया कि उनके अनुसार जफर अली की घोषणाएँ उपद्रवियों को और उकसा रही थीं।

प्रिंस शर्मा, प्रतिवादी अधिवक्ता
इनकी गवाही बहुत मायने रखती है। वो इसलिए क्योंकि यह वादी (मतलब हिंदू पक्ष, जिन्होंने जामा मस्जिद के सर्वेक्षण के लिए याचिका दायर की थी) के वकील नहीं थे। ये प्रतिवादियों (जामा मस्जिद का पक्ष रखने वाले) के वकील थे, इन्हें संभल जिला मजिस्ट्रेट की ओर से आयोग की टीम में शामिल किया गया था। 24 नवंबर को सर्वेक्षण के दौरान जो दंगा हुआ, उसको लेकर इन्होंने गवाही दी:

“सर्वे शुरू होने के लगभग 35-40 मिनट बाद बाहर से हंगामे की तेज आवाजें मस्जिद के अंदर सुनाई दी। सुबह लगभग 9:30 बजे मस्जिद के हौज (वजू टैंक) से पानी निकाला गया और इसके तुरंत बाद, मस्जिद के पीछे से विस्फोटों की आवाजें सुनाई दीं, जो यह संकेत दे रही थीं कि बाहर दंगा शुरू हो गया है। बाहर से लगातार विस्फोटों की आवाजें आ रही थीं। इस घटना के पूर्व नियोजित न होने का सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि इतनी बड़ी भीड़ का इतनी दूर से और इतनी संख्या में आना संभव नहीं है। यदि भीड़ उत्तर की ओर बढ़ती तो हिंदू मोहल्ले में कई लोग मारे जाते। सर्वेक्षण के बाद जब वे जा रहे थे, पुलिस ने सुरक्षा प्रदान की और उन्हें हिंदू मोहल्ले के माध्यम से सुरक्षित निकाला, यदि उन्हें किसी अन्य मार्ग से निकाला जाता तो उनकी हत्या हो जाती।”

विष्णु कुमार शर्मा, प्रतिवादी अधिवक्ता
यह संभल जिला कोर्ट में भारत सरकार के स्थायी अधिवक्ता हैं। इन्होंने भी वादी के विपक्ष में संभल कोर्ट के समक्ष प्रतिवादी (जामा मस्जिद के पक्ष में) के अधिवक्ता के तौर पर कानूनी सेवाएँ प्रदान कीं। इन्होंने आयोग को अपनी गवाही में बताया कि सर्वे शुरू होते ही सुबह लगभग 7:30-7:45 बजे मस्जिद के बाहर से हल्की आवाजें सुनाई दीं और सुबह लगभग 8:30 बजे तक तेज आवाजें और उत्तेजक नारे सुनाई देने लगे, इसके तुरंत बाद विस्फोटों की आवाज भी सुनाई दी। धीरे-धीरे शोर तेज होता गया, जो मस्जिद के अंदर स्पष्ट रूप से सुनाई दे रहा था और विस्फोटों की आवाज बढ़ गई। मस्जिद के पीछे से काला धुआँ उठने लगा, जिससे उन्हें लगा कि बाहर पीछे की ओर दंगा शुरू हो गया है। जफर अली ने भीड़ को शांत करने की कोशिश की लेकिन इसका दूसरा प्रभाव पड़ा। दंगाई की संख्या हजारों में थी, जिसमें दूर-दराज से आए लोग भी शामिल थे, यह पुष्टि करता है कि यह घटना पूर्व नियोजित थी। कोर्ट के आदेश में बाधा डालने और उन पर हमला करने के लिए भीड़ इकट्ठा हुई थी।

प्रत्यक्षदर्शी (सार्वजनिक गवाह, सरकारी/पुलिस-प्रशासनिक लोगों से अलग) की गवाहियाँ

पुलिस-प्रशासन और वादी के अधिवक्ताओं के अलावे भी अन्य आम लोगों ने दंगों से संबंधित गवाही दिए। इन लोगों ने 24 नवंबर को हुए दंगे को अपनी आँखों से देखा है, मतलब ये प्रत्यक्षदर्शी हैं। परिस्थितजन्य साक्ष्यों को जोड़ने और एक नतीजे तक पहुँचने के लिए इनकी गवाही भी बहुत मायने रखती है।

प्रत्यक्षदर्शी तुफैल अहमद ने आयोग को बताया कि जामा मस्जिद के आसपास की सड़कों पर भारी भीड़ थी और भीड़ ने सर्वेक्षण कार्य में बाधा डालने की कोशिश की। पुलिस-प्रशासन ने बार-बार भीड़ को समझाने की कोशिश की थी लेकिन उन्होंने न तो सुना और न ही वहाँ से भागे, बल्कि उन्होंने पुलिस पर पथराव और गोलीबारी से हमला किया।

मुकेश शर्मा ने गवाही देते हुए कहा कि 24 नवंबर से पहले ही मुस्लिम दंगाइयों ने पूरी योजना के साथ वहाँ पत्थर, ईंटें और अवैध हथियार इकट्ठा कर रखा था। जब प्रशासन ने उन्हें घर जाने का अनुरोध किया तो उन्होंने पत्थरबाजी और गोलीबारी शुरू कर दी। सड़क पर खड़े वाहनों में आग लगा दी।

राहुल कुमार ने बताया कि 19 नवंबर को जब पहली बार सर्वेक्षण हुआ, उसके बाद से ही संभल में मुस्लिम समुदाय के बाहरी लोगों की आवाजाही बढ़ गई थी। इस इलाके में वे पहली बार देखे गए थे। इसके बाद 24 नवंबर को ऐसे बाहरी लोगों को उन्होंने ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में भर-भर कर संभल की ओर आते देखा।

विक्की नाम के एक गवाह ने बताया कि 24 नवंबर को वे अपने घर पर थे। उन्होंने देखा कि मुस्लिम समुदाय के लोग चारों ओर से इकट्ठा हो रहे थे, जामा मस्जिद की ओर बढ़ रहे थे। वो लोग बहुत शोर मचा रहे थे, एक-दूसरे को भड़का रहे थे। भीड़ कह रही थी कि आज पुलिस मस्जिद में प्रवेश करने वालों को नहीं बचा पाएगी।

गवाह अमन पुठिया ने आयोग को बताया कि 24 नवंबर को हरि हर मंदिर को मुस्लिम समुदाय के हजारों लोगों ने तीन ओर से घेर लिया था और सांप्रदायिक नारे लगा रहे थे। हजारों लोगों के पास पत्थर, लाठियाँ और देसी बंदूकें थीं। थोड़ी देर बाद वहाँ से भारी गोलीबारी की आवाज आई, धुएँ का एक बड़ा बादल दिखाई दिया। संभल तहसील में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय बहुत भयभीत स्थिति में है।

अभिषेक शर्मा ने कहा कि 24 नवंबर को उनके घर (जामा मस्जिद से 150 मीटर दूर) के बाहर कुछ हिंदू बहुत डरे हुए थे। जामा मस्जिद की दिशा से मजहबी नारों की आवाजें आ रही थीं और गोलीबारी भी सुनाई दे रही थी। सभी गलियाँ भरी हुई थीं; हजारों लोग “अल्लाह-हु-अकबर” के नारे लगा रहे थे। इतनी बड़ी भीड़ को सर्वेक्षण टीम के काम में बाधा डालने और उन पर घातक हमला करने के लिए योजनाबद्ध तरीके से इकट्ठा किया गया था।

आलोक भारती ने आयोग को जो गवाही दी, वो कट्टर मुस्लिम भीड़ का सबसे घिनौने मजहबी मानसिकता को दर्शाता है। उनके अनुसार 24 नवंबर को दंगे के दौरान उन्होंने अपने पड़ोस में खड़े 12-15 साल के मुस्लिम लड़कों की ललकार सुनी थी। वो गुस्से में कह रहे थे कि आज वे सर्वेक्षण नहीं होने देंगे। आज या तो वे (मुस्लिम) रहेंगे या संभल में हिंदू रहेंगे। उन्होंने यह अपनी कानों से सुना है। इन्हीं लड़कों की भीड़ ने थोड़ी देर बाद “अल्लाह-हु-अकबर” के नारे लगाना शुरू कर दिया।

सौरभ गुप्ता ने बताया कि 24 नवंबर को उन्होंने व्यक्तिगत रूप से सड़कों पर मुस्लिम युवा लड़कों को नंगी तलवारें और देसी बंदूकें लहराते देखा। यह भीड़ लगातार हिंदू मोहल्लों में प्रवेश करने की कोशिश कर रही थी। जब पुलिस ने उन्हें रोका तो उन्होंने पुलिस पर गोलीबारी कर दी। सौरभ ने आयोग से यह माँग भी रखी कि दंगे के बाद कई मदरसों की जाँच होनी चाहिए क्योंकि इससे पहले उक्त मदरसों में कई बच्चे थे और अब वे वहाँ नहीं हैं। इसमें अन्य राज्यों के बच्चे भी शामिल थे।

सोनू नाम के गवाह ने बताया कि उनके घर के आसपास के क्षेत्रों में नए मुस्लिम चेहरों की आबादी बढ़ गई। ये अपरिचित लोग 19 नवंबर के बाद पहली बार क्षेत्र में घूमते हुए दिखे। ये भीड़ में चलते थे और संभल के पत्थरबाजों को पीड़ित और शहीद के रूप में बात करते थे। सोनू ने बताया कि 24 नवंबर को जब वे सुबह 5:00-5:30 बजे खेतों की ओर टहलने गए थे तो उन्होंने ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में लोगों को शहर की ओर जाते देखा था, जिनमें से कई लोग सिंहपुर साहनी से असमौली मिल तक निर्माणाधीन सड़क से पत्थर इकट्ठा कर रहे थे।

संभल जिले के प्रत्यक्षदर्शियों (सरकारी गवाहों मतलब पुलिस-प्रशासन या सर्वे की टीम से इतर लोग) की गवाहियों से स्पष्ट रूप से संकेत मिलता है कि दंगे के दिन (24 नवंबर 2024) जिले के बाहर से लोग आए थे और उन्हें सर्वेक्षण की पूर्व जानकारी थी। इसलिए वे सर्वेक्षण टीम, पुलिस और प्रशासनिक टीम जो सर्वेक्षण की सुरक्षा के लिए आए थे, पर हमला करने और विरोध करने के लिए पूरी तैयारी के साथ इकट्ठा हो रहे थे। इस दंगाई भीड़ ने सुबह-सुबह सड़कों से ईंटें इकट्ठा की थी, ये हथियारों से भी लैस होकर आए थे। भीड़ द्वारा यह कहते सुना जाना कि सर्वेक्षण टीम को आज जिंदा नहीं जाने दिया जाएगा, उनकी मंशा को स्पष्ट करता है।

सर्वे की रिपोर्टिंग करने गए मीडियाकर्मियों की गवाहियाँ

टाइम्स नाउ नवभारत के वरिष्ठ संवाददाता गौरव श्रीवास्तव ने आयोग को अपनी गवाही भी दी, साथ ही घटना से संबंधित बिना संपादित रिकॉर्डिंग भी एक पेन ड्राइव में प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि 24 नवंबर को वो अपने कैमरामैन अंकित के साथ सुबह 5:45 बजे ही जामा मस्जिद पहुँच गए थे। सर्वेक्षण टीम सुबह लगभग 7:30 पहुँची थी। सर्वेक्षण टीम के मस्जिद में प्रवेश करने के बाद मुस्लिम भीड़ मस्जिद के तीन ओर से इकट्ठा होने लगे। भीड़ ने “नारा-ए-तकबीर, अल्लाह-हु-अकबर” जैसे मजहबी नारे लगाने शुरू कर दी थी। भीड़ में कुछ लोगों ने चेहरा ढका हुआ था, जिसमें छोटे बच्चे भी शामिल थे, जिन्होंने आँसू गैस छोड़े जाने से पहले ही अपने चेहरों को ढक लिया था। इसके बाद पत्थरबाजी हुई। भीड़ मस्जिद तक पहुँचने की कोशिश कर रही थी।

गौरव श्रीवास्तव ने बताया कि उनके अनुसार भीड़ में कोई संदेश पहुँचा, जिसके कारण वह अचानक अत्यधिक आक्रामक हो गई और पुलिस, प्रशासन और मीडिया कर्मियों को पत्थरबाजी के साथ निशाना बनाना शुरू कर दिया ताकि लाइव कवरेज रोकी जा सके। जब कुछ पुलिसकर्मियों ने पत्थरबाजी करने वाली भीड़ से कहा कि कम से कम डीएम और एसपी की उपस्थिति का सम्मान करें, तो भीड़ ने चिल्ला कर जवाब दिया कि लाइव कवरेज बंद करो क्योंकि उसके कारण कई चेहरे पहचान में आ रहे थे। इसके बाद भीड़ ने सार्वजनिक और पुलिस के वाहनों में आग लगा दी गई, जिसे उन्होंने कवर किया।

सबसे महत्वपूर्ण गौरव श्रीवास्तव की वो गवाही है, जो मस्जिद समिति के एक लड़के और उसकी माँ से संबंधित है। पूरी घटना को कवर करने के दौरान उन्होंने एक लड़के को देखा, जो भीड़ को अपनी मस्जिद समिति का आईडी कार्ड दिखा रहा था। वो चिल्ला-चिल्ला कर यह बता रहा था कि वह समिति से है और मस्जिद में कुछ भी गलत नहीं हो रहा है। इसके बावजूद भीड़ ने उस पर पत्थरों से हमला किया, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया। तभी उसकी माँ जो पास में ही थी, दौड़ते हुए उसके पास आई। जब उसने इससे संबंधित सवाल किया तो उन्होंने रोते-रोते कहा कि ये बाहरी लोग अशांति पैदा कर रहे हैं।

कवरेज सुबह से लगभग 11:30-12:00 बजे तक चली। कवरेज के दौरान उन्होंने एक लड़के को देखा जो भीड़ को अपनी मस्जिद समिति का आईडी कार्ड दिखा रहा था, यह कहते हुए कि वह समिति से है, मस्जिद में कुछ गलत नहीं हो रहा है और शांत रहें और वापस चले जाएं। भीड़ ने उस पर पत्थरों से हमला किया जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया। उसकी मां जो पास में थी, उसके पास आई और पूछने पर आंसुओं के साथ कहा कि ये बाहरी लोग अशांति पैदा कर रहे थे।

भीड़ का अचानक से जुटना, तीन तरफ से मस्जिद की ओर बढ़ना, आँसू-गैस को प्रभावशाली नहीं होने देने के लिए एक अलग ढंग से पत्थरबाजी करना, लाइव कवरेज को बंद कराने के लिए पुलिस पर दबाव डालना – इन सब से गौरव श्रीवास्तव को यह महसूस हुआ कि भीड़ स्वतः प्रेरित नहीं थी बल्कि उकसावे के कारण इकट्ठा हुई थी। उनके अनुसार संभल में बाहरी लोगों को बुलाया गया था। भीड़ की हिंसा और पत्थरों का मस्जिद की परिधि तक पहुँचना यह सुझाव देता है कि उनकी मंशा मस्जिद परिसर में प्रवेश करने, कोर्ट के आदेशानुसार सर्वेक्षण को बाधित करने और सर्वेक्षण टीम को नुकसान पहुँचाने की थी।

सर्वेक्षण के बाद भी गौरव श्रीवास्तव ने मस्जिद से सटी गलियों में रिपोर्टिंग की। उस समय कई जगहों पर उन्हें पत्थरों के ढेर मिले, जो संभवतः पत्थरबाजी से बचे हुए थे।

दैनिक भास्कर के पत्रकार सनी गुप्ता ने आयोग को बताया कि 24 नवंबर को लगभग 5000 की मुस्लिम भीड़ ने मस्जिद को तीन ओर से घेर लिया था। वे मजहबी नारे लगा रहे थे, मस्जिद की ओर बढ़ रही थी। इसके बाद उन्होंने पुलिस पर पत्थरबाजी शुरू कर दी। पुलिस ने जब आँसू गैस का उपयोग किया तो भीड़ के पीछे से गोलीबारी की आवाज सुनाई दी। इसमें कई पुलिस कर्मी घायल हुए। भीड़ मस्जिद में घुसने के लिए आमादा थी। सनी गुप्ता के अनुसार 19 नवंबर को अधूरा सर्वेक्षण, मस्जिद की सीढ़ियों से 22 नवंबर को सांसद बर्क का भाषण और 24 नवंबर को हुआ दंगा एक पूर्व नियोजित घटना का संकेत देती है।

हिंदी चैनल के जिला संवाददाता अरुण कुमार ने अपनी गवाही में बताया कि दंगे के दिन मुस्लिम भीड़ ‘एक रात की मस्जिद’ (यह एक मस्जिद का नाम है) की तरफ से आ रही थी। उनके अनुसार सर्दियों में सुबह 7:00 बजे इतनी बड़ी भीड़ का इकट्ठा होना, मजहबी नारे लगाना और पत्थर फेंकना, पुलिस पर गोली चलाना – एक पूर्व नियोजित घटना का संकेत देता है। समय पर पुलिस की कार्रवाई के बिना हिंदू-मुस्लिम दंगा या सर्वेक्षण टीम को नुकसान हो सकता था।

न्यूज 18 इंडिया के संवाददाता भीष्म सिंह देवर ने आयोग को अपनी गवाही के साथ-साथ पूरे घटना की रिकॉर्डिंग भी प्रदान की है। उन्होंने बताया कि वो जामा मस्जिद से बाहर घटना को कवर कर रहे थे। सुबह 8:15 बजे उन्हें ‘एक रात की मस्जिद’ की ओर से मुस्लिम भीड़ दिखाई दी। इस भीड़ को पुलिस ने वापस जाने का आग्रह किया था। लेकिन मुस्लिम भीड़ न वापस लौटी, न ही रुकी। मजहबी नारों के साथ भीड़ आगे बढ़ती रही, पुलिस को धक्का दिया और पत्थरबाजी शुरू कर दी। जब पुलिस ने आँसू गैस का उपयोग किया तो सबसे पहले भीड़ के पीछे से गोलीबारी की आवाज सुनाई दी। भीड़ मस्जिद में प्रवेश करने के लिए दृढ़ संकल्पित दिख रही थी। भीष्म सिंह के अनुसार दूर-दराज के क्षेत्रों से बड़ी भीड़ का इकट्ठा होना एक पूर्व नियोजित घटना का संकेत देता है।

आज तक न्यूज चैनल के स्ट्रिंगर अभिनव माथुर ने अपनी गवाही में बताया कि जब सर्वेक्षण टीम मस्जिद में प्रवेश कर गई तो वे अपने चैनल के लिए मस्जिद के बाहर रिपोर्टिंग कर रहे थे। तभी सुबह 8:15 बजे मजहबी नारे लगाती मुस्लिम भीड़ ने पुलिस के ऊपर पत्थरबाजी शुरू कर दी। पुलिस ने जब आँसू गैस का उपयोग किया तो भीड़ के पीछे से गोलीबारी की आवाज सुनाई दी। इनके अनुसार जब केवल कुछ लोगों को ही सर्वेक्षण की जानकारी (23 तारीख की शाम को सरकारी आदेश, 24 की सुबह को सर्वेक्षण का निर्देश) थी, तो ऐसे में हजारों लोग इकट्ठा कैसे हो गए? पहचान छुपाने के लिए भीड़ में कई लोग मास्क लगाए हुए थे, पत्थर फेंक रहे थे, मजहबी नारे लगा रहे थे – जो एक पूर्व नियोजित घटना का संकेत देता है।

ANI के स्ट्रिंगर धर्मेंद्र सिंह ने गवाही दी कि 24 नवंबर को जब वो रिपोर्टिंग के लिए मस्जिद पहुँचे, तो वहाँ सर्वेक्षण टीम पहले से मौजूद थी। थोड़ी देर बाद मस्जिद के पश्चिमी छोर से आ रही भीड़ ने पत्थरबाजी शुरू कर दी, गोलीबारी भी की। भीड़ ने आगजनी भी की। इन्होंने बताया कि भीड़ में कुछ अपरिचित चेहरे भी इन्हें दिखे, जिससे पता चलता है कि उन्हें पहले से बुलाया गया था, जो मुस्लिम समुदाय द्वारा पूर्व नियोजित घटना का संकेत देता है।

टीवी9 भारतवर्ष के स्ट्रिंगर मोहम्मद मुजम्मिल ने अपनी गवाही में बताया कि 24 नवंबर को वे सुबह 8 बजे कवरेज के लिए जामा मस्जिद पहुँचे, जहाँ सर्वेक्षण टीम काम कर रही थी। करीब आधे घंटे बाद सुबह 8:30 बजे उन्हें पश्चिमी छोर से शोर सुनाई दिया। उसे कवर करने वे नगरपालिका टैंक रोड पर पहुँचे, जहां भीड़ मजहबी नारे लगा रही थी, हंगामा कर रही थी। एसपी और सीओ संभल ने माइक्रोफोन का उपयोग करके भीड़ से उकसावे से बचने और शांति बनाए रखने का आग्रह किया। भीड़ ने उनकी अनदेखी की, मस्जिद की ओर बढ़ी और पत्थरबाजी शुरू कर दी। भीड़ का मकसद था कि किसी भी तरह पुलिस को आँसू गैस का उपयोग नहीं करने दिया जाए। भीड़ ने सड़क पर वाहनों को नुकसान पहुँचाया और आग लगा दी। उन्होंने कहा कि पुलिस के प्रयासों ने एक बड़ी घटना को रोका और सर्वेक्षण टीम को दूसरी राह (हिंदू बस्ती की ओर से) से सुरक्षित निकाला गया, जिससे संभावित नुकसान टल गया।

हिंदुस्तान अखबार के फोटोग्राफर ओमवीर सिंह ने आयोग को बताया कि 24 नवंबर को वो मस्जिद के बाहर से अपने संस्थान के लिए घटना को कवर कर रहे थे। सुबह लगभग 8:15 बजे पुलिस मस्जिद के पश्चिमी छोर की ओर गई क्योंकि एक बड़ी भीड़ ‘एक रात की मस्जिद’ की तरफ से आ रही थी। मुस्लिम भीड़ ने मजहबी नारे लगाते हुए पहले पुलिस को धक्का दिया और फिर पत्थरबाजी शुरू कर दी। जब पुलिस ने आँसू गैस का उपयोग किया तो भीड़ के पीछे से गोलीबारी की आवाज सुनाई दी। भीड़ मस्जिद में प्रवेश करने के लिए दृढ़ संकल्पित दिख रही थी। अगर पुलिस की कार्रवाइयाँ सफल नहीं होती तो सर्वेक्षण टीम को सुरक्षित निकालना मुश्किल था। साथ ही यह सांप्रदायिक दंगे का रूप भी ले लेता। उनका मानना है कि 24 नवंबर की घटना पूर्व नियोजित थी।

रिपब्लिक चैनल के स्ट्रिंगर प्रदीप ने आयोग को दी अपनी गवाही में बताया कि 24 नवंबर को वे सुबह 7:15 बजे ही जामा मस्जिद पहुँच गए थे। मस्जिद के बाहर से वो घटना को कवर कर रहे थे। सुबह 8:15 बजे मुस्लिम भीड़ ‘एक रात की मस्जिद’ की तरफ से आने लगी। जब पुलिस ने उन्हें वापस जाने का आग्रह किया तो मुस्लिम भीड़ ने मजहबी नारे लगाते हुए पत्थरबाजी शुरू कर दी। जैसे पुलिस ने आँसू गैस का उपयोग किया, भीड़ के पीछे से गोलीबारी की आवाज सुनाई देने लगी। उन्होंने कहा कि बहुत बड़ी भीड़ पत्थरबाजी, आगजनी में लिप्त थी और मस्जिद में प्रवेश करने की कोशिश कर रही थी। कुछ दंगाइयों ने चेहरों पर स्याही पोत रखी थी। सब मिला कर देखा जाए तो जो हुआ, वो एक पूर्व नियोजित घटना का संकेत देता है।

इन तमाम मीडियाकर्मियों ने आयोग के समक्ष न केवल गवाही दी, बल्कि डिजिटल साक्ष्य भी उपलब्ध कराए। इनकी प्रत्यक्षदर्शी गवाही (और ये निष्पक्ष भी हैं, ना तो सरकारी-तंत्र से जुड़े हैं, ना ही मंदिर-मस्जिद की तरफ से) का सार यह है कि सर्दियों में सुबह 7 बजे दूर-दराज के स्थानों से हजारों लोगों का इकट्ठा होना, मजहबी नारे लगाना, पत्थर फेंकना और मस्जिद में प्रवेश करने की कोशिश करना यह दर्शाता है कि यह एक पूर्व नियोजित घटना थी। वरना भीड़ में ऐसे अनजान व्यक्ति क्यों देखे गए, जो पहले कभी संभल में नहीं देखे गए थे। ऐसा तभी संभव है, जब उन्हें पहले से सूचित किया गया और बुलाया गया हो।

19 नवंबर से लेकर 24 नवंबर तक संभल के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क, जामा मस्जिद समिति के अध्यक्ष जफर अली, संभल विधानसभा क्षेत्र के विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल क्या-क्या कर रहे थे, कैसे उनके दिए बयान उन्हीं के साथ इस दौरान रहे लोगों के बयानों के विरोधाभासी निकले, इन सब का आकलन करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि वर्ष 2024 का संभल दंगा स्वतःस्फूर्त नहीं था बल्कि एक षड्यंत्र के तहत जानबूझ कर भीड़ इकट्ठा की गई थी। सरकारी पक्ष के लोग या मीडियाकर्मी या फिर संभल की आम जनता – जिन-जिन ने उस दंगे को अपनी आँखों से देखा, सबने अपनी गवाही में भी दंगे को पूर्व नियोजित माना। भीड़ जिस तरीके से बर्ताव कर रही थी, जैसी तैयारी के साथ आई थी – सबने यह स्वीकार किया कि इस भीड़ की मजहबी भावनाओं को भड़काया गया और दंगा करवाया गया था।

दंगा भड़काने में तकनीक, सोशल मीडिया, ऐप का भी प्रयोग

क्या आपने जंगी ऐप (Zangi Private Messenger App) का नाम सुना है? संभल दंगों में इस ऐप का भी इस्तेमाल किया गया। पता है क्यों? क्योंकि इस ऐप पर बिना फोन नंबर या ईमेल के, सिर्फ एक रैंडम 10-डिजिट नंबर से अकाउंट बन जाता है। बिना फोन नंबर के रजिस्ट्रेशन हो जाता है। सबसे बड़ी बात – ऐप खुद ही आपको एक 10-डिजिट का जंगी-नंबर देता है, जो आपकी पहचान बनता है। साथ ही इस ऐप पर की गई बातचीत का किसी भी सर्वर पर कोई डेटा नहीं होता। मतलब यह एक सर्वरलेस मॉडल पर काम करता है। आपकी चैट हिस्ट्री, फाइल्स और कॉल्स का डेटा कंपनी के सर्वर पर स्टोर नहीं होता, बल्कि सिर्फ आपके फोन में रहता है। यही कारण है कि इस ऐप पर भारत में प्रतिबंधित लगाया गया है।

इसी जंगी ऐप का दुबई से उपयोग किया गया। शारिक साठा नाम के एक गैंगस्टर ने दुबई से इस ऐप के जरिए संभल में बैठे अपने गिरोह के एक प्रमुख सदस्य गुलाम नवी को कॉन्टैक्ट किया। उसे प्रतिबंधित जंगी ऐप के माध्यम से निर्देश दिया गया कि भीड़ में सशस्त्र सदस्यों को शामिल किया जाए। उनसे 2-4 पुलिसकर्मियों के साथ-साथ अपनी तरफ के भी 2-4 लोगों (यह बहुत महत्वपूर्ण है) को मारा जाए। ऐसा करने से यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर का बन जाएगा। और इस तरह से संभल में इस गैंग का प्रभुत्व पुनः स्थापित हो जाएगा।

इन निर्देशों का पालन करते हुए गुलाम नवी ने अपने सहयोगियों मुल्ला अफरोज और वारिश को अवैध हथियार प्रदान किए। इन दोनों ने दंगे वाले दिन धुएँ और अराजकता का फायदा उठाकर पूर्व-नियोजित गोलीबारी की, जिसके परिणामस्वरूप चार लोगों की मौत हुई, एक व्यक्ति घायल हुआ और 28 पुलिस अधिकारी और कर्मी घायल हुए।

उत्तर प्रदेश पुलिस ने गुलाम नवी को 2 मोबाइल फोनों के साथ गिरफ्तार किया। इनमें से एक शारिक साठा की पत्नी रोशन जहां का था, जिसमें एक विदेशी नंबर भी था। उसकी जानकारी के आधार पर तीन पिस्तौल और एक देसी हथियार के साथ कारतूस (विदेशी/घरेलू) भी बरामद किए गए।

इसके बाद मुल्ला अफरोज को 0.32-बोर पिस्तौल और तीन जिंदा कारतूस के साथ गिरफ्तार किया गया। उसने मृतक अयान और बिलाल को गोली मारने की बात भी कबूली। घटनास्थल से बरामद तीन प्रयोग किए गए कारतूस मुल्ला अफरोज से बरामद पिस्तौल से निकले थे जैसा कि FSL आगरा की बैलिस्टिक रिपोर्ट में पुष्टि भी हुई है।

वारिश को 315-बोर देसी हथियार, दो जिंदा कारतूस, दो प्रयोग किए गए 315-बोर कारतूस और दो मोबाइल फोन के साथ गिरफ्तार किया गया। उसके एक मोबाइल में एक रिकॉर्डेड ऑडियो कॉल थी, जिसमें वारिश एक अन्य आरोपी समीर को जामा मस्जिद के पीछे हथियार लाने के लिए कह रहा था। वारिश ने मृतक नईम और मोहम्मद कैफ को गोली मारने और वसीम को घायल करने की बात भी कबूल कर ली है। उससे बरामद दो 315-बोर कारतूस (प्रयोग किए गए) उसके हथियार से ही निकले थे, इसकी पुष्टि भी FSL आगरा की रिपोर्ट ने कर दी है।

साल 2024 में संभल में हुए दंगे को भड़काने के लिए सिर्फ जंगी ऐप का इस्तेमाल किया गया था, ऐसा नहीं था। दंगों से 2 दिन पहले मतलब 22 नवंबर को शुक्रवार यानी जुमे के दिन औसतन भीड़ से कहीं ज्यादा नमाजियों की भीड़ शाही जामा मस्जिद में नमाज के लिए पहुँचती है। यह स्वाभाविक नहीं था, बल्कि सोशल मीडिया और वॉट्सऐप के जरिए इस भीड़ को साजिशन बुलाया गया था।

21 नवंबर को ‘संभल सांसद’ के नाम से बने वॉट्सऐप ग्रुप में अब्दुल्ला और कासिफ हुसैन नाम के दो व्यक्तियों ने एक मैसेज भेजा, जिसमें लिखा था:

“संभल के सभी लोग शुक्रवार की नमाज शाही जामा मस्जिद में बड़ी संख्या में अदा करें और शाही जामा मस्जिद के पास की मस्जिदों में नहीं। केवल शाही जामा मस्जिद में नमाज अदा करें, और इस संदेश को यथासंभव साझा करें।”

इसी तरह का मैसेज ‘मन्नत’ नामक एक वॉट्सऐप ग्रुप के माध्यम से किया गया ताकि शुक्रवार की नमाज के लिए शाही जामा मस्जिद में बड़ी भीड़ एकत्र हो। और यह सब तब किया जा रहा था, जब जिले में धारा 163 BNSS लागू थी, मतलब एक साथ 5 से ज्यादा लोगों का एक जगह पर जमा होना प्रतिबंधित था। नमाज के लिए मुस्लिम समुदाय के लोगों से स्पेशल अपील की गई थी कि वो अपने-अपने पास की मस्जिदों में नमाज पढ़ें, किसी स्पेशल मस्जिद में भीड़ जमा न करें।

22 नवंबर (शुक्रवार) को जब सांसद बर्क ने जामा मस्जिद में नमाज अदा करने के बाद प्रेस कॉन्फ्रेस आयोजित की और कहा – “यह मस्जिद है, मस्जिद थी, और मस्जिद रहेगी। कोई भी हमारी मस्जिद हमसे नहीं ले सकता” – तो उनके इस भड़काऊ भाषण को भी कई सारे वॉट्सऐप ग्रुपों और अन्य माध्यमों से प्रसारित किया ताकि लोगों को भड़काया जा सके। यह इसलिए किया गया ताकि सुनिश्चित हो कि यदि सर्वेक्षण फिर से शुरू हुआ तो इसे किसी भी कीमत पर रोका जाए।

23 नवंबर को जब कोर्ट कमिश्नर ने यह तय किया कि अगले दिन जामा मस्जिद का शेष सर्वे किया जाएगा, तो इसकी सूचना हर संबंधित व्यक्ति को दी गई। सूचना मिलने के बाद जामा मस्जिद समिति के अध्यक्ष जफर अली ने क्या किया? उसी रात 10:01 बजे 38 सेकंड की कॉल के माध्यम से सांसद बर्क को सर्वेक्षण के बारे में सूचित किया, यह जफर अली के CDR में दर्ज है। बाद में रात 11:04 बजे सांसद बर्क ने जफर अली को कॉल-बैक किया, यह भी CDR में दर्ज है। चूँकि सांसद बर्क संभल में मौजूद नहीं थे, ऐसे में उन्होंने जफर अली को भीड़ एकत्र करने की जिम्मेदारी सौंपी, जो अपनी स्थिति के कारण कम समय में बड़ी भीड़ जुटा सकते थे।

सांसद बर्क के निर्देशों का पालन करते हुए जफर अली ने आधी रात को सुहेल इकबाल (जामा मस्जिद इंतजामिया कमेटी के कैशियर और संभल के विधायक के बेटे) के निवास पर अन्य कमेटी सदस्यों के साथ एक बैठक की, जिसमें सर्वेक्षण और सांसद बर्क के निर्देशों के बारे में जानकारी दी गई। इसके बाद सांसद बर्क से जफर अली को 24 नवंबर की रात 12:32 बजे और 01:48 बजे कॉल प्राप्त हुईं, जिनमें भीड़ एकत्र करने और सर्वेक्षण को हर हाल में रोकने की योजना बनाई गई, किसी भी स्थिति से निपटने की तैयारी की गई। वॉट्सऐप कॉल इंटरेक्शन भी CDR में दर्ज है।

ऐप के अलावे सोशल मीडिया भी दंगों की तैयारी का एक प्लेटफॉर्म बना था। जिले में धारा 163 BNSS लागू होने के बावजूद 22 नवंबर की नमाज जामा मस्जिद में ही पढ़ी जाए – इसके लिए बड़ी संख्या में भीड़ जुटे, ऐसा पोस्टर बनाया गया, उसे पोस्ट किया गया। कोतवाली संभल के प्रभारी अनुज कुमार तोमर की गवाही के अनुसार यह काम किया था बिलाल ने 21 नवंबर को। भीड़ जुटाने के साथ-साथ इन संदेशों में अधिक से अधिक धन का योगदान करने की भी अपील की गई थी। एलआईयू मतलब लोकल इंटेलिजेंस यूनिट ने भी अपनी जो रिपोर्ट सौंपी है, उसमें इस तथ्य को हाईलाइट किया गया है।

“कोई भी हमारी मस्जिद नहीं छीन सकता। यह मस्जिद है, मस्जिद थी, और कयामत तक मस्जिद रहेगी। जैसे अयोध्या में हमारी मस्जिद छीनी गई, वैसे ही इसे नहीं छीनने देंगे। हम इसकी रक्षा करने के लिए हमेशा तैयार हैं। हम पुलिस, प्रशासन या सरकार से डरने वाले नहीं हैं। हम इस देश के मालिक हैं, नौकर या गुलाम नहीं।”

22 नवंबर को जुमे की नमाज के बाद जब सांसद जिया-उर-रहमान बर्क ने जामा मस्जिद की सीढ़ियों से उपरोक्त भड़काऊ भाषण दिया, उसे भी सोशल मीडिया हैंडलों पर खूब प्रचारित-प्रसारित किया गया।

19 नवंबर 2024 को सर्वेक्षण में सफलतापूर्वक बाधा डालने के बाद जामा मस्जिद समिति के लोग, मुस्लिम समुदाय के रहनुमा बनने की राजनीति में विधायक-सांसद, गैंगस्टर टाइप के लोग अपना प्रभुत्व जमाने के लिए और कट्टर मुस्लिम लोगों ने दंगों की तैयारी के लिए तमाम जनसंचार के साधनों का इस्तेमाल किया। आपस में बातचीत, प्लानिंग, साजिश, भड़काऊ सामग्रियों के प्रचार-प्रसार के लिए ऐप से लेकर सोशल मीडिया – हर एक चीज इनका टूल बनी थी।

संभल दंगा 2024 में क्या सिर्फ स्थानीय मुस्लिम ही थे शामिल?

इस दंगे के लिए कितनी साजिश रची गई थी, संभल के अपर पुलिस अधीक्षक (उत्तरी) श्रीश्चंद ने अपनी गवाही में सब कुछ बताया है। और ऐसा भी नहीं है कि इनकी गवाही सिर्फ इनकी अपनी सोच के आधार पर है। उत्तर प्रदेश पुलिस की स्थानीय खुफिया इकाई (LIU: Local Intelligence Unit) द्वारा दर्ज रिपोर्ट के आधार पर तथ्य रखे गए हैं।

एलआईयू को पहले बाहरी लोगों के इस दंगे में शामिल होने की जानकारी नहीं थी। लेकिन वो जानकारी गलत निकली। बाद में पता चला कि संभल के अलावे रामपुर, शाहजहाँपुर, मुरादाबाद, कानपुर देहात और अमरोहा जिलों से भी भीड़ आई थी, दंगे में सक्रिय रूप से शामिल हुई थी। मतलब कुल 6 जिलों की मुस्लिम भीड़ जमा हुई थी दंगा करने। इतना ही नहीं, संभल स्थित मस्जिदों और मदरसों में रहने वाले लोग भी दंगों में सक्रिय रूप से शामिल थे। दंगों के बाद गिरफ्तार लोगों में सराय मुस्तफा, नखासा कोतवाली पुलिस स्टेशन के अंतर्गत, हैदर और रुकनुद्दीन मस्जिद के मुअज्जम (अज़ान देने वाला व्यक्ति, इस्लाम में बहुत ही सम्मानित और महत्वपूर्ण पद) भी थे।

एलआईयू ने जब पूरी घटना की समीक्षा की तो पता चला कि जब भी संभल में दंगे होते हैं, जामा मस्जिद केंद्र में रहती है। शहरी क्षेत्र में दंगों के दौरान सिरसी रोड, चंदौसी रोड, गवाँ रोड, हसनपुर रोड और असमौली-जोया रोड के साथ लगे गाँवों से अचानक भीड़ आती है। यही भीड़ लूटपाट, तोड़फोड़ और आगजनी से संबंधित गतिविधियों में शामिल होती है।

संभल दंगा में राजनीति का क्या रोल?

दंगे के लिए मजहबी भावनाओं को भड़काया गया। इससे कट्टर इस्लामी लोग “मस्जिद छीनने नहीं देंगे” जैसी बातों में आ गए। लेकिन क्या इसके पीछे जो खेल खेला गया, वो सिर्फ मजहबी थी? स्थानीय खुफिया इकाई (एलआईयू) ने इस मामले की भी पोल-पट्टी अपनी रिपोर्ट में खोली है।

24 नवंबर को दंगे के बाद एलआईयू ने पूरे मामले की समीक्षा की। एलआईयू की टीम ने स्थिति का आकलन किया। मामले से संबंधित कई व्यक्तियों के साथ चर्चा की। गिरफ्तार आरोपितों से पूछताछ भी की गई। इसी पूछताछ से पता चला कि संभल में सांप्रदायिक घटनाओं में हमेशा चार समूह प्रभावशाली रहे हैं और सक्रिय भूमिका निभाते हैं:

  • पहला: राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ
  • दूसरा: संभल शहर में मुस्लिम समुदाय में धार्मिक उन्माद
  • तीसरा: मस्जिद समिति के सदस्यों की महत्वाकांक्षाएँ
  • चौथा: आपराधिक गिरोहों की सक्रिय भूमिका

इसमें जो पहला कारक है, वो है राजनीतिक। इसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कारण सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल ने दंगों में सक्रिय भूमिका निभाई, मुस्लिम समुदाय के लोगों को उकसाया। एलआईयू को पता चला कि सांसद और विधायक दोनों एक ही पार्टी (समाजवादी पार्टी) से होने के बावजूद प्रतिद्वन्द्वी हैं।

एलआईयू को मिली जानकारी के अनुसार लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान दोनों पक्षों ने अपने-अपने विवादों को सुलझा लिया था लेकिन वो सिर्फ सतही था। अंदरूनी रस्सा-कस्सी बनी हुई थी। जैसे ही जामा मस्जिद का मामला सामने आया, दोनों नेताओं ने अपने-अपने समर्थकों को तैयार किया। समर्थकों के दम पर और इस्लाम के नाम पर दोनों नेताओं ने मुस्लिम भीड़ को उकसाया। दोनों ओर के लोग यह साबित करने में जुट गए थे कि आम जनता उन्हें “मस्जिद का रखवाला” समझे। इसलिए खुद को मुस्लिम हितों के बड़े रक्षक के रूप में चित्रित करने का एक भी मौका नहीं छोड़ा।

एलआईयू की रिपोर्ट के अलावे संभल के अपर पुलिस अधीक्षक (उत्तरी) श्रीश्चंद ने भी आयोग को दी गवाही में दोनों नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षा पर टिप्पणी की है:

“राजनीतिक महत्वाकांक्षा के फलस्वरूप वर्तमान सांसद जिया-उर-रहमान बर्क ने दंगों में सक्रिय भूमिका निभाई। ऐसा इसलिए क्योंकि सांसद बर्क के मृत दादा शफीकुर्रहमान बर्क एवं वर्तमान विधायक इकबाल महमूद के बीच राजनीतिक प्रतिद्वन्दिता वर्षों से चली आ रही है। इसलिए मुस्लिमों का खैरख्वाँ बनने के लिए दोनों ने बढ़-चढ़ कर सक्रीय भागीदारी की। हिंसक घटना वाले दिनांक 24 नवंबर को भी इसी महत्वाकांक्षा के कारण वर्तमान सांसद बर्क एवं विधायक इकबाल महमूद का बेटा सुहेल इकबाल द्वारा घटना में सक्रिय भूमिका निभाई गयी और लोगों को उद्वेलित किया गया।”

कोर्ट का आदेश, प्रशासनिक सर्वे… फिर मजहबी एंगल कैसे घुसा?

संभल दंगों की जाँच करने को बने आयोग ने जो रिपोर्ट शासन को सौंपी है, उसमें एक अध्याय है – 7वाँ अध्याय। इसका शीर्षक है – साक्ष्य के अनुसरण में निर्धारण के बिंदू। इसमें आयोग ने कुल 9 प्रश्नों को चिह्नित किया है। इसी अध्याय में सभी प्रश्नों का विस्तार से उत्तर भी दिया गया है।

इस अध्याय के प्रश्न 6 को जरा पढ़िए – क्या 19, 22 और दिनांक 24.11.2024 की तारीखों पर कोई भीड़ किसी विशेष उद्देश्य के लिए इकट्ठी हुई थी और यदि हाँ, तो किसके उकसावे पर?

इसी प्रश्न का जो उत्तर आयोग ने दिया है, उसमें स्पष्ट है कि जो कार्य सरकारी तरीके से 2-4 घंटे में पूरा हो जाता, जिसको करने का आदेश राजनीति की कुर्सी से नहीं बल्कि न्यायालय की ओर से आया था, आखिर वो क्यों 5 दिन लंबा खींच गया और अंततः दंगों में तब्दील हो गया?

इसकी शुरुआत होती है 19 नवंबर की दोपहर से। शाही जामा मस्जिद कभी हरि हर मंदिर था, इसके सर्वेक्षण का आदेश अदालत ने दिया। इसके लिए अधिवक्ता रमेश सिंह राघव को अधिवक्ता आयुक्त भी नियुक्त कर दिया कोर्ट ने। इसके बाद इन्हीं अधिवक्ता आयुक्त ने वादी के वकीलों, आधिकारिक प्रतिवादियों, जिला प्रशासन के साथ-साथ जामा मस्जिद समिति के अध्यक्ष जफर अली (जो खुद भी एक अधिवक्ता हैं) को सूचित किया। खुद जफर अली ने भी आयोग को दी अपनी गवाही में बताया है कि शाम 5:15 बजे जब वह चंदौसी अदालत परिसर के अपने चैंबर में थे, उस समय कोतवाली संभल से उन्हें एक कॉल आया था कि जामा मस्जिद का सर्वेक्षण होना है और उन्हें मस्जिद पहुँचने का अनुरोध किया गया।

इस सूचना के बाद वो जफर अली अपने बेटे हैदर अली और दो अन्य अधिवक्ता कासिम जमाल और आफताब अहमद के साथ जामा मस्जिद जाने के लिए गाड़ी से निकले। रास्ते में उन्होंने जामा मस्जिद इंतजामिया समिति के नायक सदर लड्डन खान को सर्वेक्षण के बारे में सूचित किया और मस्जिद पहुँचने को कहा। कॉल पर लड्डन खान ने उन्हें बताया किया कि वह पहले से ही जामा मस्जिद पर मौजूद हैं। जब ये लोग जामा मस्जिद पहुँचे तो वहाँ समिति के सचिव मशहूद अली फारुकी, हाजी लड्डन और महमूद खान (कैशियर) मौजूद थे।

जफर अली के अलावे स्थानीय विधायक के बेटे सुहेल इकबाल ने भी अपनी गवाही में बताया कि 19 नवंबर को दोपहर में उसे जामा मस्जिद के सर्वेक्षण के बारे में पता चला। उसे एक अधिवक्ता (नाम नहीं बताया अधिवक्ता का) ने कॉल किया था। इसके अलावे उसने यह भी बताया कि एक पत्रकार ने भी उसे कॉल किया था और बताया था कि संभल जिले के डीएम और एसपी भी शाम को सर्वेक्षण के लिए जामा मस्जिद जा सकते हैं।

समाजवादी पार्टी के नेता और संभल के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क ने आयोग को अपनी गवाही में बताया कि मस्जिद के सर्वेक्षण की सूचना उन्हें शाम 6:30 से 7:00 बजे के बीच मिली। सर्वेक्षण की जानकारी उन्हें कोटगढ़ी के निवासी नदीम नामक व्यक्ति ने दी थी। इसी सूचना के बाद वो जामा मस्जिद पहुँचे थे।

आयोग ने इन प्रमुख व्यक्तियों की गवाही के आधार पर पाया कि जामा मस्जिद में 19 नवंबर की शाम को सर्वेक्षण होने की जानकारी सामान्य जनता तक पहुँचा दी गई थी। इतना ही नहीं, सुहेल इकबाल और जिया-उर-रहमान बर्क का भीड़ के साथ पहुँचना उस साजिश की ओर इशारा करता है कि न केवल लोग बल्कि मीडिया के लोगों को भी सर्वे की जानकारी हो गई थी। इस जानकारी को फैलाया गया मजहबी भावनाओं को भड़का कर, जिसकी शुरुआत होती है संभल की अदालत से। क्योंकि सर्वप्रथम वहीं से सर्वे के आदेश की बात लीक की गई, उसका प्रचार-प्रसार किया गया।

मजहब के अलावे गुंडई, पैसे और वर्चस्व की बातें क्यों

कट्टर इस्लामी पहलू के अलावा संभल दंगे में कुछ और भी प्रमुख कारक थे। जैसा कि ऊपर बताया गया कि एलआईयू ने अपनी समीक्षा में 4 प्रभावशाली तत्वों का नाम लिया था। एक – धार्मिक उन्माद और दूसरा – राजनीतिक महत्वाकांक्षा पर हमने आयोग की रिपोर्ट के हवाले से ऊपर विस्तार में पढ़ लिया है। एलआईयू की समीक्षा का चौथा पॉइंट है – आपराधिक गिरोहों की सक्रिय भूमिका। इसी में छिपा है पैसे और गुंडई वाले सवाल का जवाब।

शारिक साठा नाम का एक गैंगस्टर हुआ करता था संभल में। इसी के नाम से एक गिरोह भी सक्रिय था – शारिक साठा गिरोह। CM योगी की सरकार आने और यूपी पुलिस का गुंडों के लिए जीरो-टॉलरेंस पॉलिसी अपनाने के बाद साल 2020 में शारिक साठा नकली पासपोर्ट बनाकर दुबई भाग गया था। जब उसे सूचना मिली कि संभल के जामा मस्जिद का सर्वे होना है, तो इसमें उसे अपने गिरोह को संभल में फिर से सक्रिय कर, अपने प्रभुत्व को पुनः स्थापित करने का मौका दिखा। इसके बाद उसने दुबई में बैठे-बैठे जंगी ऐप के सहारे अपने गिरोह के एक प्रमुख सदस्य गुलाम नवी को कॉन्टैक्ट किया। उसको निर्देश दिया कि जामा मस्जिद पर पहुँचने वाली भीड़ में सशस्त्र सदस्यों को शामिल किया जाए। उनसे 2-4 पुलिसकर्मियों के साथ-साथ अपनी तरफ के भी 2-4 लोगों (यह बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि मस्जिद का सर्वे और मुस्लिमों की ही मौत भी – मतलब विपक्ष इस मामले को उछालेगा) को मारा जाए। ऐसा करने से यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर का बन जाएगा। और इस तरह से संभल में इस गैंग का प्रभुत्व पुनः स्थापित हो जाएगा।

शारिक साठा के सभी गुर्गे जो दंगों में शामिल थे, UP पुलिस ने सबको गिरफ्तार कर लिया। गुलाम नवी (जिससे शारिक साठा ने दुबई से संपर्क किया था) ने बताया कि उसके घर से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर शारिक साठा का घर है, जहाँ उसकी बीवी और 11-12 बच्चे रहते हैं। भल स्थित नखासा पुलिस स्टेशन के सब-इंस्पेक्टर मोहम्मद शाह फैसल ने भी अपनी गवाही में बताया कि वो शारिक साठा को जानते हैं क्योंकि उनका घर उनकी चौकी क्षेत्र में ही पड़ता है और उसकी हिस्ट्री शीट भी उनके ही पुलिस स्टेशन में दर्ज है।

गुंडई करके व्यक्तिगत प्रभाव जमाना यह बॉलीवुड के आम फिल्म के स्क्रिप्ट जैसी है। बढ़िया फिल्में इससे बेहतर स्क्रिप्ट वाली होती है। संभल में भी शारिक साठा की गुंडई से एक लेवल ऊपर देखें तो वर्चस्व की लड़ाई में वहाँ 2 गुट शामिल हैं – तुर्क बनाम पठान। और यह बात आयोग को वहाँ के आम गवाहों ने, पीड़ितों ने बताई है।

संभल जिले में मुसलमानों में दो समूह तुर्क और पठान सक्रिय हैं। कई बार उनके बीच प्रभुत्व की लड़ाई के लिए हिंसक वातावरण बनाया जाता है। संभल दंगा के दौरान भी ये देखा गया। दंगों के दौरान वसीम को लगी चोट के संबंध में उसके चाचा नसीम ने जो FIR दर्ज करवाई थी, वो अज्ञात तुर्क समुदाय के खिलाफ की गई थी। जब आयोग ने पीड़ित वसीम से तुर्क समुदाय के विरुद्ध की गई FIR की सत्यता पर सवाल किए, तो वसीम ने उसे सच बताया। FIR में लिखा था:

“24 नवंबर को हमारे घर से कुछ दूर पर स्थित जामा मस्जिद में सरकारी कर्मचारियों द्वारा सर्वे का काम किया जा रहा था। उसी समय शहर के कुछ शरारती व उपद्रवी लोगों ने जामा मस्जिद के आस-पास इकट्ठा होना शुरू कर दिया, जिसमें तुर्क बिरादरी के लोग भी थे तथा कुछ उपद्रवियों के द्वारा सर्वे कर रहे लोगों पर पथराव शुरू कर दिया गया। जब प्रशासन के लोगों ने पथराव कर रहे लोगों को समझाना चाहा तो पथराव कर रही भीड़ में से कुछ तुर्क बिरादरी के लोगों ने फायरिंग शुरू कर दी। तुर्क लोग पठान बिरादरी के लोगों पर गोलीबारी कर रहे थे। अज्ञात तुर्क बिरादरी के उपद्रवियों द्वारा जान से मारने की नीयत से की जा रही फायरिंग में से एक गोली मेरे भतीजे वसीम जो कि अपने घर के दरवाजे पर खड़ा था, उसे लगी। वो गंभीर रूप से घायल हो गया। हम उसे तुरंत डॉक्टर के पास ले गए।”

पीड़ितों की गवाही के अलावे एडिशनल एसपी श्रीश्चंद ने भी आयोग को शपथ-पत्र में उल्लिखित बयान दिया है। इनके अनुसार संभल दंगों में मारे गए कुल 4 व्यक्ति तुर्कों और पठानों के बीच क्रॉस फायरिंग के कारण मारे गए। कई पुलिस अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी और अन्य गवाहों ने भी कहा है कि उन्होंने भीड़ से गोलीबारी की आवाज सुनी और देखी।

जिस जामा मस्जिद के लिए दंगा, उससे जुड़े लोग कौन-कौन?

निम्नलिखित 4 लोग जामा मस्जिद इंतजामिया समिति से जुड़े हुए थे:

  1. अधिवक्ता जफर अली, जामा मस्जिद इंतजामिया समिति के अध्यक्ष
  2. लड्डन खान, जामा मस्जिद इंतजामिया समिति के सदस्य
  3. कासिम जमाल, जामा मस्जिद इंतजामिया समिति के अधिवक्ता
  4. मशहूद अली फारूकी, जामा मस्जिद इंतजामिया समिति के अधिवक्ता

“साक्ष्य के अनुसरण में निर्धारण के बिंदू” – आयोग की रिपोर्ट का यह 7वाँ अध्याय है। इसमें जो 8वाँ प्रश्न है, वो है – “जामा मस्जिद की इंतजामिया समिति के सदस्यों, स्थानीय सांसद और स्थानीय विधायक के पुत्र और प्रतिनिधि के बयानों का मूल्यांकन।” इस प्रश्न को आयोग ने संबंधित व्यक्तियों की गवाही पर कसा है, एक-दूसरे की गवाही से मिलान किया गया है – और नतीजा क्या निकला? जो जवाब सामने आया, उससे चार लोगों (मस्जिद समिति से जुड़े) और सांसद तथा विधायक के पुत्र की पोल-पट्टी खुलती दिखती है।

इन सबके बयान विरोधाभाषी निकले। जामा मस्जिद के सर्वेक्षण से जुड़ी सूचना के बारे में इन लोगों ने क्या-क्या बयान दिए, पढ़ा जाए:

  1. जफर अली ने बताया कि 19 नवंबर को अधिवक्ता कासिम जमाल और अधिवक्ता फारुकी ने उन्हें शाम के लगभग 4-5 बजे बताया कि सर्वेक्षण आदेश जारी हो गया है।
  2. जबकि कासिम जमाल ने अपने साक्ष्य में कहा कि जफर अली ने उन्हें सूचित किया कि जामा मस्जिद के खिलाफ मामला दायर किया गया है, इसलिए वह अदालत के कार्यालय 3:30 से 3:45 तक आ गए। इसके बाद शाम के 6 बजे जफर अली ने कॉल करके सर्वे होने की सूचना दी, साथ ही मस्जिद पहुँचने का भी निर्देश दिया।
  3. जफर अली ने यह बताया कि शाम को 5:15 बजे संभल कोतवाली थाना से उनको कॉल आया कि जामा मस्जिद का सर्वेक्षण होना है, इसलिए मस्जिद पहुँचना है।
  4. जफर अली ने दंगों के दौरान हुई मौतों के संबंध में अपने शपथ-पत्र में जो बातें कहीं, आयोग के सामने उससे बिल्कुल उलट। उनके शपथ-पत्र में कहा गया है कि पुलिस ने भीड़ पर सीधी गोलीबारी की, जिससे 4-5 लोगों की मौत हुई। शपथ-पत्र में उन्होंने लिखा है कि वह पुलिस गोलीबारी के दौरान डीएम और एसपी के साथ घटनास्थल पर मौजूद थे और पूरी घटना देखी। मतलब पुलिस ने भीड़ पर गोली चलाई, यह उनकी आँखों-देखी है। लेकिन इसी बात को उन्होंने आयोग के सामने कुछ और ही ढंग से रखी। आयोग के समक्ष, उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने इसे अपनी स्वयं की जानकारी के आधार पर नहीं लिखा बल्कि अन्यों के कहने पर शपथ-पत्र में शामिल किया। आयोग के समक्ष उन्होंने स्पष्ट किया कि वह इसके प्रत्यक्षदर्शी नहीं हैं बल्कि हिंसा समाप्त होने के बाद घटनास्थल पर मौजूद लोगों ने उन्हें घटनाओं के बारे में बताया।
  5. जफर अली 19 नवंबर को अदालत में किस वक्त कहाँ-कहाँ मौजूद थे, इसको लेकर वादी के अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन की भी गवाही महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार 19 नवंबर को पहले 12:30 बजे मामला सिविल जज के समक्ष प्रस्तुत हुआ और सुनवाई के दौरान जामा मस्जिद की ओर से अधिवक्ता कासिम जमाल मौजूद थे। उनके साथ अदालत में जफर अली भी मौजूद थे। इसके बाद दोपहर के 2 बजे जब सर्वे कमीशन और अस्थायी निषेधाज्ञा की सुनवाई हेतु मामला निर्धारित किया गया, तब भी कासिम जमाल और जफर अली, मस्जिद के अन्य अधिवक्ताओं के साथ अदालत में मौजूद थे। इनके अलावे एएसआई के विष्णु शर्मा(अधिवक्ता) और डीजीसी (सिविल) श्री प्रिंस शर्मा भी मौजूद थे।
  6. जामा मस्जिद इंतजामिया समिति के सदस्य लड्डन खान ने भी विरोधाभासी गवाही दी है। मतलब शपथ-पत्र में कुछ और जबकि आयोग के समक्ष कुछ और। लड्डन खान के शपथ-पत्र के अनुसार, टैंक/वज़ूखाने का पानी प्रशासन और एसडीएम द्वारा इसकी गहराई मापने के लिए निकाला गया। जबकि इसी लड्डन ने आयोग को गवाही दी कि वज़ूखाना का पानी एसडीएम के निर्देश पर निकाला गया और वह एसडीएम के साथ थे। उनका ही कर्मचारी उनके ही निर्देश पर पानी का टैंक खोला।
  7. जामा मस्जिद के अधिवक्ता कासिम जमाल के भी शपथ-पत्र और आयोग के समक्ष दी गई गवाही में विरोधाभास है। इनके अनुसार 19 नवंबर को जब ये शाम के 6 से 6:15 तक मस्जिद पहुँचे, तब तक सांसद बर्क, विधायक का बेटा सुहेल इकबाल और इंतजामिया समिति के बाकी सदस्य वहाँ पहले से मौजूद थे। 19 नवंबर को सर्वे होना है, यह जानकारी जफर अली को इन्होंने दी या जफर अली ने इनको – दोनों के अलग-अलग दावे हैं।
  8. जामा मस्जिद के अधिवक्ता मशहूद अली फारूकी ने भी शपथ-पत्र और आयोग के सामने दी गवाही में विरोधाभासी तथ्य प्रदान किए। इनके अनुसार जफर अली ने इनको नहीं बताया कि 19 नवंबर को जामा मस्जिद से संबंधित कोई कमीशन गठित किया गया है। जब शाम को यह घर (जामा मस्जिद के बगल में ही) पहुँचे तो वहाँ भीड़ देखी, पूछने पर पता चला कि सर्वे होना है। उसी समय जफर अली ने भी फोन पर सूचना दी। इन्होंने हालाँकि यह बताया कि मस्जिद के वजूखाने का टैंक इंतजामिया समिति के ही कर्मचारी ने खोला, पुलिस-प्रशासन ने नहीं।
  9. सांसद जिया-उर-रहमान बर्क का बयान भी बाकी गवाहों से मैच नहीं करता है। उनके खुद के बयान भी विरोधाभासी हैं। सांसद बर्क ने बताया था कि जामा मस्जिद के सर्वे होने की सूचना उनके क्षेत्र के लोगों से शाम के 6:30 से 7 बजे के बीच मिली। ऐसे में जामा मस्जिद के अधिवक्ता कासिम जमाल का वो दिया वो तथ्य विरोधाभासी हो गया कि 19 नवंबर को जब वो शाम के 6 से 6:15 तक मस्जिद पहुँचे, तब तक सांसद बर्क वहाँ पहले से मौजूद थे।
    24 नवंबर को जामा मस्जिद का शेष सर्वेक्षण होगा, इसकी जानकारी सांसद बर्क को मस्जिद समिति के अध्यक्ष जफर अली ने फोन पर दी। आयोग के सामने इस बात पर सांसद ने सहमति जताई। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि इसी सांसद बर्क ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक शपथ-पत्र दायर किया था, जिसमें कहा गया था – “24 नवंबर 2024 को जामा मस्जिद का शेष सर्वे होना है, इसकी जानकारी सांसद बर्क को नहीं थी।”
    सांसद बर्क ने आयोग को बताया कि 22 नवंबर को जुमे की नमाज से पहले या बाद में उन्होंने मस्जिद के अंदर या बाहर से कोई भाषण नहीं दिया। जबकि इसके उलट मशहूद अली फारूकी ने बताया कि जुमे की नमाज के बाद सांसद बर्क ने मस्जिद की सीढ़ियों पर से मीडिया को संबोधित किया था। अपने बयान में मशहूद अली फारूकी ने सहमति जताई कि मस्जिद की सीढ़ियों से राजनीतिक बयान या प्रेस कॉन्फ्रेंस अनुचित था।
  10. संभल के विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल ने भी शपथ-पत्र और आयोग को दी गवाही में विरोधाभासी बयान दिया। शपथ-पत्र में सुहेल ने बताया कि 19 नवंबर को सर्वे रात के 8 बजे तक चला, जबकि आयोग को दी गवाही में इसे रात के 8:30 से 9:30 तक बताया। 22 नवंबर मतलब जुमे की नमाज के दिन को लेकर इसने बताया कि यह जामा मस्जिद नहीं गया था। इसके उलट सांसद जिया-उर-रहमान बर्क ने गवाही में बताया कि नमाजियों की भीड़ में यह भी था।

जामा मस्जिद से संबंधित उपरोक्त सभी लोगों के शपथ-पत्र और आयोग के समक्ष दी गई गवाही में विरोधाभास स्पष्ट है। इन सबके विरोधाभासी बयानों को लेकर आयोग ने अपने विश्लेषण में लिखा है कि इन लोगों ने ऐसा इसलिए किया, ताकि 24 नवंबर को हुए शेष सर्वे के खिलाफ एक झूठी कहानी गढ़ी जा सके। मुस्लिम भीड़ जो मस्जिद के पास जुटी, उसके लिए एक डिफेंस तैयार किया जा सके।

दंगा संभल में, भीड़ 6 जिलों से: सर्दी में सुबह-सुबह जामा मस्जिद तक कैसे पहुँचे दंगाई

सोशल मीडिया, वॉट्सऐप, जुमे की नमाज पर मुस्लिम लोगों से मस्जिद बचाने की मजहबी अपील, दंगे से ठीक एक रात पहले फोन पर जामा मस्जिद के अध्यक्ष जफर अली और समाजवादी पार्टी के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क के बीच लगातार फोन पर बातचीत और भीड़ जुटाने की साजिश, संभल विधायक इकबाल महमूद और संभल सांसद बर्क के बीच की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण दोनों के बीच मुस्लिमों का रहनुमा बनने की होड़ में अपने-अपने समर्थकों की भीड़ जुटाना, भारत से भाग कर दुबई में रहने वाले गैंगस्टर शारिक साठा का दंगों की आड़ में फिर से संभल में अपना वर्चस्व स्थापित करने की मंशा, संभल में दो मुस्लिम समूहों तुर्क और पठान के बीच प्रभुत्व की लड़ाई – इन सभी पहलुओं ने आराम से होने वाले सरकारी सर्वेक्षण को मजहबी रंग दिया।

उपरोक्त सभी पहलुओं ने अपना-अपना काम अलग-अलग किया। लेकिन 24 नवंबर 2024 को दंगे के दिन सबका लक्ष्य रहा – संभल का जामा मस्जिद। इससे हुआ यह कि न सिर्फ संभल बल्कि आस-पास के 5 और जिलों के कट्टर मुस्लिम दंगे के लिए तैयार हो गए, धारा 163 BNSS लागू होने के बावजूद मस्जिद के पास अलग-अलग रास्तों से पहुँच गए। जिन जिलों से ये लोग आए, उनके नाम हैं – रामपुर, शाहजहाँपुर, मुरादाबाद, कानपुर देहात और अमरोहा।

इन सभी जिलों से संबंधित लोगों के व्हाट्सएप ग्रुपों में सबसे पहले जुमे की नमाज (22 नवंबर 2024) पढ़ने के लिए जामा मस्जिद बुलाया गया। फिर यहाँ से यह संदेश सबको दिया गया कि शेष होने वाले सर्वेक्षण को किसी भी तरह से रोकना है, चाहे उसके लिए दंगा ही क्यों न करना पड़े।

ऊपर संभल जिले के आम नागरिकों ने जो बयान दिया है, उससे भी यह स्पष्ट है कि दंगे के दिन जिले के बाहर से लोग आए थे और उन्हें शेष सर्वेक्षण की पूरी जानकारी थी। इसलिए भीड़ पूरी तैयारी के साथ इकट्ठा होकर आई थी। प्रत्यक्षदर्शियों ने भीड़ को सड़क से ईंट-पत्थर इकट्ठा करते, हथियारों से भी लैस होकर आते देखा है। ये लोग ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में अलग-अलग रास्ते से आए थे। ईंट-पत्थर इकट्ठा करने के लिए इन लोगों ने सिंहपुर साहनी से असमौली मिल तक निर्माणाधीन सड़क को चुना था।

इतना ही नहीं, संभल स्थित मस्जिदों और मदरसों में रहने वाले लोग भी दंगे में सक्रिय रूप से शामिल थे। गिरफ्तार लोगों में सराय मुस्तफा, नखासा कोतवाली पुलिस स्टेशन के अंतर्गत, हैदर और रुकनुद्दीन मस्जिद में मुअज्जिम थे। पूरी घटना की समीक्षा से यह भी पता चला है कि जब भी संभल में दंगे होते हैं, जामा मस्जिद केंद्र में रहती है। शहरी क्षेत्र में दंगों के दौरान सिरसी रोड, चंदौसी रोड, गवां रोड, हसनपुर रोड और असमौली-जोया रोड के साथ लगे गाँवों से अचानक भीड़ आती है, जो लूटपाट, तोड़फोड़ और आगजनी से संबंधित गतिविधियों में शामिल होती है।

संभल जामा मस्जिद के पास रहने वाली हिंदू आबादी भी क्या दंगाइयों के निशाने पर थी?

बिल्कुल। संभल जामा मस्जिद की उत्तरी दिशा में बाजार की ओर हिंदू आबादी है, जिनकी सुरक्षा के लिए पुलिस-प्रशासन को स्पष्ट निर्देश दिया गया था। अगर 24 नवंबर 2024 को हिंसा केवल पुलिस और दंगाइयों तक सीमित नहीं होता, तो यह हिंदू आबादी की तरफ बढ़ता। पुलिस की सक्रियता और हिंसक स्थिति को जामा मस्जिद की 3 दिशाओं (जिधर-जिधर मुस्लिम आबादी है) में नियंत्रित कर लेने के कारण हिंसा सांप्रदायिक दंगा में नहीं बदल पाया।

दंगाइयों की शुरुआती प्लानिंग थी मस्जिद में प्रवेश करना। इसके बाद सर्वेक्षण करने आई टीम (जिसमें सभी हिंदू ही थे) की हत्या करना। मस्जिद के मुख्य द्वार के पास से ही जो रास्ता जाता है, वो हिंदू आबादी की ओर जाता है। अगर दंगाई मस्जिद में प्रवेश कर जाते, वहाँ सर्वे टीम पर हमला कर देते तो उनका अगला निशाना हिंदू बस्ती ही थी। इसे रोकने के लिए पुलिस ने एक बफर जोन (मजबूत बैरिकेडिंग और पर्याप्त पुलिस बल की तैनाती) बनाया, जिससे दंगाइयों को हिंदू क्षेत्रों में प्रवेश करने से रोका गया। पुलिस-प्रशासन के लिए इस बफर जोन ने दो-तरफा काम किया। एक – दंगाई हिंदुओं पर हमला नहीं कर सके। दूसरा – दंगा नियंत्रित करने के साथ-साथ जब सर्वेक्षण टीम को मस्जिद से सकुशल वापस संभल थाना भेजने की बारी आई, तो यही एकमात्र रास्ता काम आया। पुलिस ने सर्वे पूरा होने के बाद पूरी टीम को शाही जामा मस्जिद से धीमरों वाली गली (हिंदू मोहल्ला) के माध्यम से सरथल चौकी तक सुरक्षित निकाला था।

“या तो वे (मुस्लिम) रहेंगे या हिंदू संभल में रहेंगे।”

पुलिस-प्रशासन ने हिंदुओं की सुरक्षा के लिए इतने कड़े इंतजाम क्यों किए थे, इसके लिए आपको ऊपर का बयान दोबारा पढ़ना होगा। आयोग ने वर्ष 1936-37 से लेकर 2024 तक संभल में हुए 15 बड़े सांप्रदायिक दंगों का भी जिक्र अपनी रिपोर्ट में किया है। OpIndia ने संभल में 1924 से लेकर 2024 तक के 16 दंगों पर रिपोर्ट बनाई है। इसके कारण हिंदुओं का पलायन, मुस्लिम आबादी का बेतहाशा बढ़ना, संभल में आतंकी गतिविधियाँ (जिसमें विदेशी कनेक्शन और अलकायदा जैसों की घुसपैठ तक शामिल) भी रिकॉर्ड में दर्ज है। इसलिए पुलिस ने सिर्फ शक के आधार पर हिंदू आबादी की सुरक्षा के लिए पुख्ता इंतजाम नहीं किए थे बल्कि इसके पीछे ठोस सबूत थे।

2024 का संभल दंगा सुनियोजित साजिश के तहत अंजाम दिया गया था। जामा मस्जिद का सर्वेक्षण सिर्फ एक ट्रिगर पॉइंट था, लेकिन यह एकमात्र पहलू था, ऐसा नहीं है। राजनीति, वर्चस्व, गैंग-वसूली, तुर्क-पठान, हिंदू-घृणा आदि तत्वों ने इस दंगे के लिए खाद-बीज का काम किया। समय रहते अगर इसे नियंत्रित नहीं किया गया होता राज्यव्यापी सांप्रदायिक दंगों में यह तब्दील हो जाता।

क्या भारत की राजनीति पहली बार पूरी तरह ‘हिन्दू-केंद्रित’ हो गई है?

इतालवी दार्शनिक एंटोनियो ग्राम्सी ने अपने ‘सांस्कृतिक आधिपत्य’ (Cultural Hegemony) के सिद्धांत में यह समझाया था कि कोई भी वैचारिक व्यवस्था या राजनीतिक सत्ता अपनी असली जीत तब दर्ज करती है, जब वह समाज के भौतिक साधनों की जगह उसकी भाषा, उसके मानस और उसकी बहसों के केंद्र पर नियंत्रण पा लेती है। जब समाज की ‘डिस्कर्सिव बाउंड्री’ (Discourse Boundaries) तय हो जाती हैं, तब विकल्प चाहे जो हों, खेल उसी निर्धारित दायरे के भीतर खेला जाता है।

कुछ ऐसा ही प्रच्छन्न लेकिन गहरा बदलाव आज भारतीय राजनीतिक और सामाजिक मानस में घटित हो रहा है।

आज राजनीतिक गलियारों से लेकर मीडिया स्टूडियो तक एक ही शोर है, ‘मोदी का पतन’ और एनडीए सरकार का कमजोर होना। चुनाव परिणामों, गठबंधन की मजबूरियों और सरकार विरोधी बयानों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा रहा है कि राजनीतिक समीकरण बदल रहे हैं। ठीक इसी बीच, आज पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर आयोजित एक ‘भजन क्लबिंग’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी की सहज उपस्थिति और मंजीरा बजाने जैसी तस्वीरें भी सामने आईं, जिन्हें कुछ लोग क्षणिक पीआर मानकर खारिज कर सकते हैं, किंतु इसके गहरे दार्शनिक और सांस्कृतिक निहितार्थ कहीं अधिक व्यापक हैं।

लेकिन इस सतही शोरगुल के बीच, विश्लेषकों की नज़र से एक ऐसा ऐतिहासिक और जमीन-स्तरीय बदलाव छूट गया है जो भारतीय राजनीति की दिशा हमेशा के लिए बदल रहा है। आज़ाद भारत के इतिहास में यह पहला अवसर है जब राजनीतिक और सामाजिक बहस का केंद्र पूरी तरह से ‘हिन्दू-केंद्रित’ हो गया है।

आज़ादी के बाद से लेकर अब तक, भारतीय राजनीति का मुख्य खाका ‘धर्मनिरपेक्षता बनाम साम्प्रदायिकता’ या ‘तुष्टीकरण बनाम बहुसंख्यकवाद’ के दायरे में घूमता रहा है। चुनावों में राजनीतिक दलों का एजेंडा अल्पसंख्यकों को साधना, सेक्युलरिज्म का चोला पहनना और तथाकथित ‘वोट बैंक’ की राजनीति करना होता था।

लेकिन आज स्थिति बिल्कुल उलट है। आज राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य से पारंपरिक अल्पसंख्यक राजनीति (Minority-Centric Politics) हाशिये पर चली गई है।

कांग्रेस का बदला रुख भी देखिए; जो कांग्रेस पार्टी कभी अल्पसंख्यकों के विशेष संरक्षण को अपनी राजनीति का मुख्य केंद्र मानती थी, वह आज ‘जितनी आबादी, उतना हक’ और जातिगत जनगणना के जरिए सामाजिक न्याय के दायरे में हिन्दू जातियों को ही आपस में साधने की होड़ में है। कांग्रेस अब खुलकर मुस्लिम तुष्टीकरण की पुरानी शैली से बचती नजर आती है।

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का ‘PDA’ (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्य़क) समीकरण भी ज़मीन पर पूरी तरह से पिछड़ों और दलित जातियों के भीतर हिन्दू पहचान और जातियों के समीकरण पर ही टिका है।

पंजाब में सत्ता में बैठी ‘आप’ (AAP) मुस्लिम मुद्दों पर खुलकर बात करने से बचती है। बुजुर्गों को मुफ्त तीर्थ यात्रा कराना और धार्मिक आयोजनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना यह साबित करता है कि राजनीति का स्पेस अब पूरी तरह सांस्कृतिक प्रतीकों से भर चुका है।

यह भारतीय राजनीति के इतिहास में पहली बार हो रहा है कि जब सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही पूरी तरह से हिन्दू समाज के भीतर के अंतर्विरोधों, जातियों, उपजातियों और अधिकारों को लेकर आपस में जूझ रहे हैं। मुस्लिम या अल्पसंख्यक कारक अब मुख्य राजनीतिक विमर्श के केंद्र में नहीं, बल्कि परिधि (Periphery) पर चला गया है।

वैचारिक एकाधिकार: अब बहस केवल ‘हिन्दू वर्सेज हिन्दू’ है

आज राजनीतिक दलों के बीच वैचारिक और सामाजिक बहस इस बात पर नहीं हो रही है कि अल्पसंख्यकों को क्या रियायतें मिलें, बल्कि इस बात पर हो रही है कि ‘बेहतर हिन्दू हितैषी’ या ‘सच्चा हिन्दू’ कौन है।

यह भारतीय राजनीति के इतिहास में पहली बार हो रहा है कि जब सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही पूरी तरह से हिन्दू समाज के भीतर के अंतर्विरोधों, जातियों, और अधिकारों को लेकर आपस में लड़ रहे हैं। मुस्लिम या अल्पसंख्यक फैक्टर अब मुख्य राजनीतिक विमर्श के केंद्र में नहीं है।

जब से भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को मुख्यधारा की राजनीति बनाया, तब से विपक्ष के लिए भी उस पिच पर खेलना अनिवार्य हो गया है। राहुल गांधी का मंदिर जाना, खुद को जनेऊधारी जताना या शिवभक्त बताना इस बात का प्रमाण है कि विपक्ष ने भी मान लिया है कि बिना हिन्दू पहचान के स्पेस को स्वीकार किए राजनीति संभव नहीं है।

सभ्यतागत पुनर्निर्माण (Civilisational Reconstruction) रातों-रात नहीं होता

राजनीतिक विश्लेषक अक्सर चुनावों के परिणामों से सभ्यतागत बदलाव को मापने की भूल करते हैं। चुनाव 5 साल के चक्र पर चलते हैं, सरकारें आती-जाती हैं, और राजनीतिक दल हारते-जीतते हैं, यह लोकतंत्र की सामान्य प्रक्रिया है।

लेकिन सभ्यताएं दशकों और सदियों में बनती हैं। कार्ल पॉपर या अर्नाल्ड टायनबी जैसे इतिहासकारों का मानना रहा है कि सभ्यताएं दशकों, सदियों और सामूहिक चेतना के आंतरिक मंथन से बनती हैं।

भारत अपनी औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकलकर अपनी प्राचीन सभ्यतागत जड़ों की ओर लौट रहा है। राम मंदिर का निर्माण, सांस्कृतिक पुनरुत्थान और लोक-संस्कृति से जुड़ाव, ये केवल चुनावी मुद्दे न होकर एक राष्ट्र के रूप में मानसिक उपनिवेशवाद से मुक्ति की प्रक्रिया हैं। इस तरह के गहरे वैचारिक और सांस्कृतिक परिवर्तन के लिए समय लगता है। इसे किसी एक चुनाव या तात्कालिक राजनीतिक हलचल से नहीं आंका जा सकता।

तो फिर, मोदी का पतन या उभार एक तात्कालिक राजनीतिक घटना हो सकती है, लेकिन असली बदलाव यह है कि भारत का राजनीतिक और सामाजिक मानस हमेशा के लिए बदल चुका है। आज की तारीख में डिबेट का सेंटर पूरी तरह से ‘हिन्दू डिस्कोर्स’ बन चुका है। चुनाव कोई भी जीते, दल कोई भी सत्ता में आए, अब भारत की राजनीति को हिन्दू और उसके सांस्कृतिक-सामाजिक सरोकारों को नजरअंदाज करके आगे बढ़ना असंभव हो गया है।


कुएँ में कूदने की जगह नहीं बची तो रोने लगीं हिंदू महिलाएँ: जानिए- 1947 में रावलपिंडी के तोहा खालसा में 90 हिंदू-सिख महिलाओं ने क्यों किया ‘जौहर’

कल्पना कीजिये उस इंडिया की, जो पार्टीशन के पहले का अनडिवाइडेड भारतवर्ष है। उस भारत का पंजाब और उस पंजाब के रावलपिंडी का एक गाँव। गाँव के ठीक बीच में मौजूद एक कुएँ के चारों तरफ कई स्त्रियाँ खड़ी थी, जिनमें ज्यादातर सिख और कुछ हिंदू थी। ये एक ऐसा दौर था जब गाँव के कुएँ और तालाब महिलाओं के लिए बेस्ट हैंगआउट प्लेस हुआ करते थे।

यहाँ वो अपने रोज के कामों के साथ-साथ अपनी सहेलियों से मिलती-जुलती थी और तरह-तरह की बातें किया करती थी। कभी सास-ससुर की शिकायतें तो कभी मायके की यादें, कभी हंसी-मजाक तो कभी सुख-दुःख की बातें और जवान लड़कियाँ, किसी कुएँ की दीवार पर बैठकर अपने विवाह के सपने बुना करती थी।

लेकिन आज यहाँ ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा था, आज का दिन कुछ और था वो यहाँ कुछ ऐसा करने जा रही थी जिसकी शायद आज कोई कल्पना भी ना कर पाए। पानी से लबालब भरे हुए उस कुएंँ में अचानक एक स्त्री छलांग लगाती है और वो डूबने लगती है। उसके फेफड़ों में पानी भरने लगता है।

दम घुटने से वो छटपटाती है, हाथ-पैर मारती है, फिर थोड़ी देर बाद पानी में हवा के बुलबुले उठने लगते हैं और वो कुएँ की गहराई में गुम हो जाती हैं। हैरानी की बात ये कि वहाँ खड़ी बाक़ी स्त्रियों ने भी उसे कूदने से नहीं रोका था। ऊपर से इतना भयंकर दृश्य देखकर भी ऊपर खड़ी अन्य स्त्रियाँ घबराती नहीं हैं बल्कि एक के बाद एक वो सब भी उस कुएँ में कूदकर डूबती जाती हैं।

अंत में वहाँ केवल तीन स्त्रियां बच जाती हैं। वो रोती हैं, बिलखती हैं, छातियाँ पीटती हुई रो रही होती हैं। क्या आप जानते हैं कि वो तीनों रो क्यों रही थी? अगर आपको लग रहा हो कि वो इसलिए रो रही होंगी कि उनकी सहेलियाँ डूबकर मर चुकी हैं तो ऐसा नहीं था, वो इसलिए रो रही थीं क्योंकि कुआँ लाशों से पूरा भर चुका था और वहाँ अब उनके डूबने लायक ना तो पानी बचा हुआ था और ना ही जगह। वो इसलिए अपनी छातियाँ पीट रही थी क्योंकि वो मर नहीं पाई थी

ये सत्य घटना है रावलपिंडी के एक गांँव तोहा खालसा की, साल था 1947, मार्च का महीना, जब देश को आजादी नहीं मिली थी, ना ही मजहब के नाम पर भारत का बँटवारा हुआ था। Horrors of partitions, जिसके बारे में हम अक्सर सुनते हैं, मुसलमानों ने उसका ट्रेलर भारत की आज़ादी और भारत के पार्टीशन के एक साल  पहले ही दिखाना शुरू कर दिया था। 

मुहम्मद अली जिन्ना की पार्टी मुस्लिम लीग को पूरे भारत के मुसलमानों ने पाकिस्तान बनाने के लिए भर-भरकर वोट दिए और जिन्ना के आदेश पर 16 अगस्त 1946 के बाद पूरे देश में मुसलमानों ने जिहाद छेड़ा हुआ था। इसलिए अगर आपको लगता है कि हिंदुओं पर हिंसा का कहर केवल पार्टीशन के बाद ही टूटा था तो ये सच नहीं है।

हिंदुओं का ये नरसंहार विभाजन से बहुत पहले शुरू हो चुका था। और उसी के चलते, रावलपिंडी के तोहा खालसा गाँव में जो होने जा रहा था वो ख़िलजी और मुग़लों के बाद जिन्ना के दौर में हिंदू और सिख महिलाओं का एक अलग तरह का जौहर था।

ये ऐसा जौहर था जो अग्निकुंडों में नहीं बल्कि जलकुंडों में किया गया था। और आप ये अंदाजा मत लगाइए कि ये केवल एक गांव की कहानी होगी बल्कि जिहादी क्रूरता के इस दौर में सैकड़ों गाँवों में हिंदू और सिख स्त्रियों ने ऐसे जौहर किए। ये घटनाएँ कोई ख़िलजी या मुग़लों के दौर की नहीं हैं बल्कि इतनी रीसेंट हैं कि इनके आईविटनेस भी अभी ज़िंदा हैं।

इतिहास की दराजों में जौहर की ऐसी हजारों कहानियाँ हैं लेकिन इस वीडियो में हम बात करेंगे रावलपिंडी के तोहा खालसा गाँव की, ये वो दौर था जब पूरे देश में मुसलमान हिंदुओं पर वैसे ही बर्बर अत्याचार कर रहे थे जैसे ख़िलजी और मुग़लों के समय हुआ करते थे।

जिहाद के इस खुले ख़ूनी खेल में मर्द तो एक झटके में काट दिए जाते थे लेकिन हिंदू स्त्रियों की ऐसी दुर्दशा की जा रही थी जिसे देखकर शैतान भी काँप उठे।

लाशों से भर गया था कुआँ

जिहादी भेड़ियों की Modus oprandi एक ही रहती थी, पहले किसी हिंदू या सिख गाँव को टारगेट और फिर हजारों की भीड़ लेकर गाँव में घुसना। फिर जो हिंदू, जहाँ मिले, उसे वहीं पर काट देना। छोटे-छोटे बच्चों को, माताओं की गोद से छीनकर आग में फेंक देना, हवा में उछलकर तलवारों और भालों से बेधना।

पहले हिंदू और सिख स्त्रियों की नग्न परेड करवाना और फिर सैकड़ों जिहादियों द्वारा बारी-बारी से उनका रेप किया जाना। अंत में तलवारों से उनकी छातियाँ, नाक और कान काट देना। उन हैवानों की हवस ऐसी थी कि गर्भवती महिलाओं तक को नहीं बख्शा जाता था। रेप करने के बाद उनका पेट चीरकर नवजातों को सड़कों पर फेंक दिया जाता था।

खैर, अब डिटेल में बात करते हैं उस घटना के बारे में, जो हमने इस वीडियो के शुरू में बताई। रावल पिंडी का गाँव तोहा खालसा। तारीख़ थी 12 मार्च, साल 1947। जिहादियों की ऐसी ही एक भीड़ रावलपिंडी के तोहा खालसा गांव को घेर लेती है।

गाँव के हिंदू और सिखों के पास दो बंदूकें थी जिनकी मदद से वे कुछ देर जिहादियों से लड़ते रहे लेकिन हजारों की भीड़ के आगे वे कब तक टिक पाते? जब उनकी गोलियाँ समाप्त हो गई तो जिहादियों से संघर्ष रोकने के लिए अपने घरों के आगे सफेद झंडे लगा दिए।

जिहादी भीड़ ने उनकी जान बक्श ने के लिए 10 हज़ार रुपए की डिमांड रखी जिसे तुरंत पूरा कर दिया गया। पैसे मिलने के बाद मुसलमानों की भीड़ ये कहते हुए लौट गई कि वो अब दोबारा नहीं आएँगे, लेकिन दूसरे ही दिन वे फिर से लौटे और अधिक भयानक और खूँखार भेड़िए बनकर।

जिहादी जानते थे कि अब गाँववालों के पास पैसा नहीं बचा है इसलिए इस बार उन्होंने पैसा नहीं माँगा बल्कि सीधे ही मार-काट मचाना शुरू कर दिया। ऐसा लग रहा था जैसे वो शैतान काफ़िरों के ख़ून से ईद मना रहे थे। जहाँ तक संभव था हिंदू और सिख पुरुष लड़े, लेकिन हजारों इस्लामी भेड़ियों के आगे वो निहत्थे कब तक टिकते।

एक-एक करके लाशें गिरने लगी, एक तरफ़ कलमा पढ़ा जा रहा था तो दूसरी तरफ़ नंगी तलवारें चमक रही थी। जिन्हें अपनी जान बचानी थी उनके लिए कलमा पढ़कर और रक्त चूता हुआ गोमांस का टुकड़ा खाकर मुसलमान बनने का ऑप्शन रखा गया था। 

जिन्हें ये मंजूर नहीं था उनके लिए नंगी तलवारें इंतजार कर रही थी। बहादुर और धर्म के पक्के हिंदू और सिख पुरुषों ने ख़ुशी से तलवारों के नीचे अपनी गर्दनें रख दी। सिरों के ढेर लग गए, ख़ून की नदियाँ बहने लगी। अब स्त्रियों की बारी थी। उन्हें बचाने वाले पुरुष जब काट दिए गए तो उन्होंने समझ लिया कि अब बचाव संभव नहीं है।

इसलिए उन्होंने वही रास्ता चुना जो कभी रानी पद्मिनी सहित लाखों हिंदू स्त्रियों ने चुना था। जिहादी हैवानों के हाथ आने से अच्छा उन्होंने ख़ुद ही अपने प्राण ले लेना उचित समझा। ख़िलजी-मुग़लों के दौर में हिंदू स्त्रियों ने अग्निकुंडों में कूदकर जौहर किया था लेकिन इस बार रास्ता थोड़ा अलग था।

जिहादियों ने डिमांड रखी थी कि अगर काफ़िर अपनी महिलाओं को उन्हें सौंप देते हैं तो वो उनकी जान बख़्श देंगे। लेकिन स्वाभिमानी हिंदू और सिख ये कैसे स्वीकार कर सकते थे? हजारों की संख्या में हिंदू और सिख स्त्रियों ने जिहादियों के हाथों नोचे जाने से बेहतर अपने ही परिवार के मर्दों से अपनी गर्दनें कटवा ली। जौहर का यह नया स्वरूप था।

जब जिहादी भीड़ गाँव में नरसंहार कर रही थी तब तोहा खालसा की 93 स्त्रियाँ गाँव के एक पुराने कुएँ पर इकट्ठा हुई। सबने थोड़ी देर आँखें बंद की और अपनों को याद किया। इसके बाद पहले एक महिला कूदी, उसके पीछे दूसरी, फिर तीसरी और देखते ही देखते पूरा कुआँ 90 स्त्रिओं की लाशों से भर गया।

इसमें केवल 3 महिलाएँ ही ज़िंदा बची और वो भी इसलिए क्योंकि कुएँ में अब डूबने लायक पानी ही नहीं बचा था।

बलात्कारियों की पैरोकार जिहादन

नेहरू-गाँधी के दौर ऐसे अनगिनत जौहर हुए। लेकिन दिल्ली के हिन्दू कॉलेज का मैगज़ीन Hindu College Gazette इसको लेकर क्या लिखता है वो सुनिए। इसकी वेबसाइट पर एक लेख मौजूद है जिसका शीर्षक है Partition and Patriarchy: The Story of Thoha Khalsa. इस लेख में लिखा हुआ है कि तोहा खालसा की स्त्रियों के सामूहिक आत्महत्याओं के पीछे का कारण समाज की Patriarchal सोच है।

हिंदू कॉलेज गैजेट का मानना है कि हिंदू और सिख महिलाओं की सामूहिक आत्महत्या के पीछे की वजह जिहादी भेड़ियों से नोचे जाने का डर नहीं बल्कि हिंदू समाज की पितृसत्ता वाली मानसिकता थी। जिहादी नरसंहारों का सच कैसे दबाया जाता है ये आर्टिकल इसका सबसे बेहतर उदाहरण है। जब हिंदू कॉलेज जैसे संस्थान का गैजेट भी जिहादी बलात्कारियों पर बात करने की जगह उनसे बचने के लिए जौहर करने वाली महिलाओं को ही कटघरे में खड़ा कर देता है तो फिर स्वरा भास्कर से और क्या उम्मीद की जा सकती है?

आज जौहर को कायरता और मुस्लिमों की बलात्कारी सोच का बेशर्मी से बचाव करने वाली स्वरा भास्कर और आरफा जैसी जिहादनों को ये वीडियो जरूर देखना चाहिए ताकि उन्हें पता चल सके कि लाखों हिंदू स्त्रियों को ऐसा ख़ौफ़नाक क़दम क्यों उठाना पड़ा था?

पर सिर्फ अरफ़ा और स्वरा ही क्यों, शायद हमारे देश की GEN-Z को भी ये एक Irrational या Act of cowardice लगे क्यूंकि वास्तव में आज जब सुसाइड इतने आम हो चुके हैं हम सुसाइड को लैक ऑफ टॉलरेंस, लैक ऑफ सोशल इंटरैक्शन या लैक ऑफ इम्पैथी मानते हैं। पर जौहर इन सब चीज़ों की वजह से उठाया हुआ कदम नहीं था।

बेशक रेप विक्टिम्स को डिग्निटी से जीने का हक है लेकिन जिहादियों ने जो किया था वो केवल रेप नहीं था। क्या आपको रोबोट फ़िल्म का वो सीन याद है जिसमे चिट्टी रोबोट एक नहाती हुई लड़की को बिना कपड़ों के ही आग से बचाकर बाहर लोगों की भीड़ के सामने ले आता है।

केवल इतने भर से ही उस लड़की को ऐसा मेंटल शॉक लगता है कि वो आग में कूदकर सुसाइड कर लेती है। ये तो केवल फ़िक्शन की बात है लेकिन अब आप जरा कल्पना कीजिए कि किसी स्त्री के पहले कपड़े फाड़े जाते हैं, फिर सरेआम उसकी नग्न परेड निकाली जाती है, फिर उसका गैंगरेप होता है और फिर उसे जानवरों की तरह बेच दिया जाता है और ये केवल इसलिए नहीं किया जाता कि वो एक महिला है, ये इसलिए किया जाता है क्योंकि वो काफ़िर है।

तब आप सोचिए कि उसकी मानसिक स्थिति क्या होगी? आत्मसम्मान जिन्हें प्यारा होगा वो ऐसा होने से पहले मरना ही पसंद करेंगे। खैर, अब आत्मसमान की उम्मीद उनसे क्या रखनी जिन्होंने तलवारों के डर से इस्लामी सलवारें पहन ली लेकिन जिहादियों के आगे ख़ुद को परोस देने वाले जब आज जौहर को कायरता बताते हैं, तब विडंबना वहीं पर सैकड़ों मौत मर जाती है।

जिनकी पूर्वज मुस्लिम आक्रांताओं के हरमों की शान बढ़ाया करती थीं वो भी आज जौहर को कायरता और पैट्रियार्की से जोड़ते हैं। तैमूर, ख़िलजी, औरंगज़ेब और जिन्ना को अब्बू मानने वाली जिहादी बलात्कारियों की पैरोकार इन जिहादनों को बताना जरूरी है कि जौहर कोई सामान्य आत्महत्या नहीं है।

ये स्वाभिमानी हिंदू स्त्रियों द्वारा एक रेगिस्तानी और हैवानी विचारधारा के मुँह पर मारा गया जोरदार तमाचा है। स्वाभिमानी हिंदू स्त्रियाँ जिन्होंने आत्मसम्मान बचाने के लिए सैकड़ों जगह ऐसे जौहर किए और एक बार नहीं बल्कि बार-बार किए। उन्होंने अपने ही पिता, पति और भाइयों के हाथों अपनी गर्दनें कटवा दी, अग्निकुंडों में राख बन गई, पानी में डूब गई, लेकिन जिहादियों के क़ब्ज़े में जाना कभी स्वीकार नहीं किया।

पितृसत्ता नहीं, मातृसत्ता की जीत

और ये कोई अचानक आया हुआ विचार नहीं था। स्वरा भास्कर आज ये चाहती हैं कि जौहर करने वाली हिंदू स्त्रियों को मृत्यु को चुनने से अच्छा ख़ुद को जिहादियों को सौंप देना चाहिए था। उस दौर में भी समाज में कई ऐसी स्वरा भास्कर मौजूद थीं जिन्होंने ख़ुद को जिहादियों को सौंप दिया था। ऐसी हजारों महिलाओं के साथ जो हुआ वो बेहद डरावना था।

मशहूर चित्रकार KC आचार्य उस समय 28 साल के थे और उन्होंने ये सब अपनी आँखों से देखा था। रावलपिंडी की इस्लामी बर्बरता को उन्होंने अपनी एक पेंटिंग में दिखाया है। ये केवल चित्र नहीं है बल्कि इतिहास के उस काले अध्याय का जीवित और चीख-चीख कर गवाही देने वाला सबूत है क्योंकि इसे बनाने वाले चित्रकार ने हैवानियत के इस नंगे नाच को अपनी आँखों के सामने देखा था।

जिहादियों ने हिंदू स्त्रियों को नग्न करके सड़कों पर उनकी परेड निकलवाई। बारी-बारी उनका गैंगरेप किया गया, उन्हें जानवरों की तरह बेचा और लूटा गया। विरोध करने वाली स्त्रियों की छतियाँ, नाक और कान काट दिए गए। उनके जननांगों को तलवारों और भालों से छिन्न-भिन्न कर दिया गया। हैवानों की हवस ऐसी थी कि हिंदू और सिख स्त्रियों की लाशों तक से बलात्कार किए गए।

तोहा खालसा की महिलाओं ने हैवानियत की इन कहानियों को सुना और देखा हुआ था। उन्होंने अपनी आँखों के आगे गैंगरेप होते हुए देखे हुए थे। उन्होंने जिहादियों को बलात्कार के बाद गर्भवती महिलाओं के पेट चीरते हुए देखा था।

इस्लमिक दरिंदगी का शिकार बनाने वाली कुछ उनकी सहेलियाँ थी, तो कोई बगल के गाँव में ब्याही हुई उनकी बहन थी या उनके मायके में रहती, कुछ दिनों में माँ बनाने वाली उनकी भाभी थी। ये सब उनके अपने सगों के साथ हो चूका था। वो जानती थी कि अगर वो जीवित रहीं तो आगे उनके साथ यही होने वाला था।

और उससे बेहतर तो कुंए में कूद जाना है या फिर जलकर मार जाना। मौत दोनों तरफ़ थी लेकिन एक तरफ़ नरक जैसी यातना के बाद मरना था दूसरी तरफ़ सम्मान की मृत्यु थी। स्वरा भास्कर आज जो कह रही है उसके पीछे की सोच हिंदू कॉलेज जैसे संस्थानों के ऐसे ही गैजेट और लेखों से आती है।

एकेडमिक जिहाद यही तो है। धीरे-धीरे एक ऐसी चर्चा को जन्म दो कि विक्टिम ही शक के घेरे में खड़ा हो जाए। जिहादी हैवानों को एकदम क्लीन चिट दे दो। उनकी कोई गलती थोड़े ही है। उनका तो अधिकार है रेप करना क्योंकि मजहब इसकी इजाजत देता है।

लेकिन सवाल है कि ये हैवानी सोच क्या केवल ख़िलजी, मुग़ल या जिन्ना तक ही सीमित है? क्या आपको नोबेल ल्यूरेट्स नादिया मुराद याद है? नादिया मुराद एक यज़ीदी महिला है जो इराक़ और सीरिया में अल्पसंख्यक हैं। ISIS के जिहादियों ने हजारों यज़ीदी स्त्रियों को कई वर्षों तक सेक्स स्लेव बनाकर रखा।

नादिया बताती हैं कि जिहादियों ने हजारों यज़ीदी मर्दों और बच्चों को मार डाला। उसके बाद वे उनकी महिलाओं को अपने साथ ले गए। छोटी-छोटी बच्चियों तक को भी नहीं बख्शा गया। ये यज़ीदी स्त्रियाँ कई सालों तक ISIS के मुस्लिम आतंकियों के लिए बनाए गए सेक्स कैंप्स में रखी गई जहाँ उनका हजारों बार गैंगरेप किया गया।

सैकड़ों यज़ीदी महिलाओं ने इन सेक्स कैंप्स में आत्महत्याएँ की। बाद में जब इन्हें सेना ने रेस्क्यू किया तो हैवानियत की ऐसी कहानियाँ बाहर आई कि रोंगटे खड़े हो जाएँ। भारत हो या इराक़ या सीरिया, ख़िलजी हो, मुग़ल हों, जिन्ना हो या ISIS, बात चौदहवीं शताब्दी की हो चाहे आज की, काफ़िरों की स्त्रियाँ इस्लाम के लिए तब भी माल-ए-गनीमत थी, आज भी हैं और आगे भी रहेंगी। क्योंकि ऐसा ‘दीन का फ़रमान’ है।

जौहर तब भी हुए थे जौहर आगे भी होंगे क्योंकि हैवान तब भी थे आज भी हैं और आगे भी रहेंगे। हैवानियत तब तक होती रहेगी जब तक समाज में स्वरा भास्कर जैसी जिहादन मंचों से बलात्कार का बचाव करने की हिम्मत करती रहेगी। हैवान तब तक सुरक्षित रहेंगे जब तक दिल्ली के हिंदू कॉलेज जैसी संस्थाओं के ऑफिशियल गैजेट्स बलात्कारियों की हिमायत करते रहेंगे।

जौहर को पैट्रियार्की से जोड़ने वालों को पता होना चाहिए कि ये असल में पैट्रियार्की नहीं थी। असल में जौहर जीत थी उस हिंदू मैट्रियार्की की जिसने जिहादी नस्लें पैदा करने से अच्छा मौत को चुना।

क्या आंतरिक मतभेद को चुनावी हेरफेर का सबूत मानना सही है?

भारतीय लोकतंत्र में चुनाव आयोग की जवाबदेही पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन दो चुनाव आयुक्तों द्वारा किसी प्रस्ताव, प्रक्रिया या प्रशासनिक निर्णय पर आपत्ति दर्ज करना अपने आप में चुनावी प्रक्रिया के अवैध या संदिग्ध होने का प्रमाण नहीं हो सकता।

23 सितंबर 2026 को ‘द इंडियन एक्सप्रेस‘ ने चुनाव आयोग को लेकर एक प्रमुख खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसका शीर्षक है। ‘14 times in 10 months, two Election Commissioners objected on record to steps taken by Commission.‘

रिपोर्ट में कहा गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में कम-से-कम 14 अवसरों पर कुछ निर्णयों और प्रक्रियाओं को लेकर आपत्तियाँ दर्ज कीं।

इनका संबंध मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाताओं के नाम जोड़ने-हटाने, फॉर्म-6, चुनावी डेटा के डिजिटल प्रबंधन और पश्चिम बंगाल में अपीलों की प्रक्रिया से बताया गया है। निश्चित रूप से ये विषय गंभीर हैं।

निर्वाचन सूची में एक भी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से हटना चिंता का विषय होना चाहिए। चुनावी डेटा की सुरक्षा और अधिकारियों की वैधानिक शक्तियों की रक्षा भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। लेकिन यहीं से एक दूसरी और उतनी ही महत्वपूर्ण बात शुरू होती है।

क्या किसी आंतरिक आपत्ति को सीधे ‘चुनाव आयोग की संवैधानिक विफलता’ या ‘चुनावी प्रक्रिया में हेरफेर’ का प्रमाण मान लिया जाए? यहीं Indian Express की रिपोर्ट के तथ्य और उससे निकाला जा रहा व्यापक निष्कर्ष अलग-अलग दिखाई देते हैं।

पहला प्रश्न: आपत्ति और अंतिम निर्णय में अंतर क्यों नहीं किया जा रहा?

किसी भी संस्थागत व्यवस्था में नीति या प्रशासनिक निर्णय बनने से पहले अधिकारियों और सदस्यों द्वारा सवाल उठाना, सुझाव देना, कानूनी आपत्ति दर्ज करना और वैकल्पिक प्रक्रिया सुझाना सामान्य बात है। निर्वाचन आयोग स्वयं तीन-सदस्यीय संवैधानिक संस्था है। संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत उसे चुनावों के पर्यवेक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी दी गई है।

2023 के Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act की धारा 18 में भी आयोग के कामकाज के लिए स्पष्ट व्यवस्था है। आयोग का काम जहाँ तक संभव हो सर्वसम्मति से किया जाना है और यदि सदस्यों में मतभेद हो तो बहुमत के आधार पर निर्णय लिया जाता है।

इसलिए असली सवाल यह नहीं होना चाहिए कि ‘कितनी आपत्तियाँ दर्ज हुईं?’ बल्कि यह होना चाहिए ‘उन आपत्तियों के बाद अंतिम निर्णय क्या हुआ?’ क्या कोई निर्णय वास्तव में कानून के विरुद्ध पाया गया? क्या किसी सक्षम न्यायिक संस्था ने उसे अवैध घोषित किया? क्या किसी अंतिम आदेश को आयोग ने वापस लिया? क्या इन आपत्तियों के कारण किसी चुनाव का परिणाम प्रभावित हुआ? या फिर ये उन आंतरिक संवाद व विचार-विमर्श का हिस्सा थीं जिनके बाद अंतिम निर्णय विधिसम्मत तरीके से लिया गया? ये सभी प्रश्न अलग-अलग हैं।

14 का आंकड़ा प्रभावशाली है, लेकिन अपने आप में निर्णायक नहीं

’10 महीनों में 14 बार आपत्ति’, यह निश्चित रूप से एक ध्यान आकर्षित करने वाला आंकड़ा है। लेकिन केवल संख्या से किसी संस्था की वैधानिकता निर्धारित नहीं होती।

यदि किसी कैबिनेट में मंत्री किसी प्रस्ताव पर आपत्ति करता है, तो वह आपत्ति सरकार के भीतर विचार-विमर्श का हिस्सा होती है। यदि न्यायालय में किसी मामले पर न्यायाधीशों के बीच मतभेद होता है, तो अंतिम निर्णय बहुमत से होता है। इसी प्रकार बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था में भी आंतरिक मतभेद का होना अपने आप में असंवैधानिकता का प्रमाण नहीं है।

इसका दूसरा पहलू भी है। यदि किसी सदस्य को लगता है कि कोई प्रक्रिया कानून के अनुरूप नहीं है, तो उसका उस पर लिखित आपत्ति दर्ज करना संस्थागत नियंत्रण और संतुलन स्थापित करने की नीति का हिस्सा भी हो सकता है।

स्वयं निर्वाचन आयोग ने 23 सितंबर को कहा कि लिखित टिप्पणियाँ, Observations, Technical Suggestions और Internal Checks and Balances उसकी नियमित कार्यप्रणाली का हिस्सा हैं। आयोग ने यह भी कहा कि अंतिम आदेश और निर्णय वैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप तथा कानूनी अधिकार के साथ जारी किए गए हैं। इसलिए आपत्ति का अस्तित्व और अंतिम निर्णय की वैधता दो अलग प्रश्न हैं।

फॉर्म-6: गंभीर सवाल है, लेकिन निष्कर्ष के लिए और प्रमाण चाहिए

इंडियन एक्सप्रेस ने फार्म- 6 में किए गए बदलाव को विशेष महत्व दिया है। रिपोर्ट के अनुसार नए मतदाता के आवेदन में SIR से संबंधित एक प्रश्न जोड़ा गया और दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस पर आपत्ति दर्ज की।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि इस बदलाव को लेकर वैधानिक अधिकार और नियमों में संशोधन की आवश्यकता का प्रश्न उठाया गया था। यदि किसी वैधानिक फॉर्म में ऐसा परिवर्तन किया गया है जिसके लिए नियमों में संशोधन आवश्यक था, तो यह निर्धारित किया जाना चाहिए कि वह परिवर्तन किस अधिकार के तहत किया गया और किसने उसे अनुमोदित किया।

लेकिन यहाँ भी दो अलग-अलग दावे हैं- पहला: फॉर्म-6 में एक प्रक्रियात्मक बदलाव हुआ। दूसरा: उस बदलाव के माध्यम से नागरिकों को जानबूझकर मताधिकार से वंचित किया गया। पहले दावे के लिए प्रशासनिक और कानूनी दस्तावेज चाहिए। दूसरे दावे के लिए उससे कहीं अधिक ठोस प्रमाण चाहिए। दोनों को एक ही मान लेना पत्रकारिता और सार्वजनिक विमर्श दोनों के लिए उचित नहीं होगा।

मतदाता डेटा का केंद्रीकरण: चिंता जायज़ है, लेकिन ‘केंद्रीकरण का मतलब हेरफेर’ नहीं होता रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ECI.Net और चुनावी डेटाबेस के प्रबंधन से जुड़ा है। दो चुनाव आयुक्तों ने कथित रूप से इस बात पर चिंता व्यक्त की कि मतदाता सूची के डिजिटल डेटा तक राज्य और स्थानीय स्तर के अधिकारियों की पहुँच प्रभावित हो रही है और डेटाबेस के केंद्रीकरण की दिशा में बदलाव हो रहा है।

यह विषय तकनीकी और संवैधानिक दोनों दृष्टियों से गंभीर है। लेकिन डिजिटल केंद्रीकरण को सीधे चुनावी हेरफेर का पर्याय बना देना भी उचित नहीं है। आज दुनिया भर में प्रशासनिक प्रणालियों का डिजिटाइजेशन और सेंट्रलाइज्ड डाटाबेस मैनेजमेंट बढ़ रहा है। इसका उद्देश्य कई बार डेटा की एकरूपता, सुरक्षा, ऑडिट ट्रायल और डुप्लीकेट रिकॉर्ड्स या आंकड़ों को नियंत्रित करना भी हो सकता है।

इसलिए वास्तविक जांच निम्नलिखित सवालों के आधार पर होनी चाहिए, किस अधिकारी के पास किस स्तर की पहुंच है? कौन डेटा में बदलाव कर सकता है? प्रत्येक बदलाव का ऑडिट ट्रायल क्या है? क्या राज्य के वैधानिक अधिकारियों की शक्तियाँ वास्तव में सीमित हुई हैं? क्या किसी अनधिकृत व्यक्ति ने डेटा में बदलाव किया? क्या किसी पात्र मतदाता का नाम इसी कारण हटाया गया? और क्या उस हटाए जाने का कोई प्रमाणित चुनावी प्रभाव पड़ा? इन प्रश्नों के उत्तर तकनीकी ऑडिट से ही मिलेंगे, केवल राजनीतिक आरोपों से नहीं।

गोवा के 97 मतदाता: हर वोट महत्वपूर्ण है, लेकिन आंकड़े का सही संदर्भ भी जरूरी है

रिपोर्ट में गोवा के 97 मतदाताओं का मामला भी सामने आया है, जिनके बारे में कहा गया कि वे संबंधित प्रक्रिया में पात्र पाए गए, लेकिन सॉफ्टवेयर व्यवस्था के कारण उनके नाम अंतिम सूची में शामिल नहीं हो सके। यह मामला निश्चित रूप से प्रश्न उठाता है।

एक भी पात्र मतदाता का वोट तकनीकी या प्रशासनिक कारण से छूटना स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं होगा कि पूरे देश की मतदाता सूची में व्यापक स्तर पर जानबूझकर हेरफेर हो रही है। इस मामले की निष्पक्ष जांच का रास्ता स्पष्ट है

कितने मतदाता प्रभावित हुए? किस स्तर पर गलती हुई? क्या इसमें सॉफ्टवेयर की प्रतिबंधित सीमा तय कर दी गई थी? क्या अधिकारियों को वैकल्पिक प्रक्रिया उपलब्ध थी? क्या बाद में सुधार किया गया? क्या जिम्मेदारी निर्धारित हुई?

यही उपर्युक्त सवालों के आधार पर साबित किए गए तथ्य तय करेंगे कि यह प्रशासनिक चूक थी, तकनीकी समस्या थी या उससे अधिक गंभीर मामला।

पश्चिम बंगाल की अपीलों का मामला भी दस्तावेजों से तय होना चाहिए

रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल में उन मतदाताओं से जुड़ी अपीलों का मुद्दा उठाया गया है जिन्हें SIR प्रक्रिया के दौरान हटाया गया या शामिल किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयुक्त संधू ने यह प्रश्न उठाया कि कुछ अपीलें किसके अधिकार से और किस प्रक्रिया के तहत दाखिल की गईं।

लेकिन यहाँ भी मूल प्रश्न होना चाहिए, किसने आदेश दिया? किस नियम के तहत दिया? किस अधिकारी ने अपील दायर की? किस रिकॉर्ड में उसका उल्लेख है? यदि दस्तावेज बताते हैं कि कोई अधिकारी अपनी वैधानिक शक्तियों के बाहर गया था, तो जवाबदेही तय होनी चाहिए। लेकिन यदि दस्तावेज वैधानिक प्रक्रिया का पालन दिखाते हैं, तो केवल यह तथ्य कि किसी आयुक्त ने उस प्रक्रिया पर प्रश्न उठाया था, उसे स्वतः अवैध नहीं बना देता।

निर्वाचन आयोग का जवाब भी काफी महत्वपूर्ण है

इस पूरे विवाद में एक तथ्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जिसे किसी भी गंभीर विश्लेषण में शामिल किया जाना चाहिए। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट सामने आने के बाद निर्वाचन आयोग ने सार्वजनिक रूप से कहा कि अलग-अलग टिप्पणियाँ, सुझाव और आपत्तियाँ बहु-सदस्यीय संस्था के सामान्य संवाद एवं विचार-विमर्श की प्रक्रिया का हिस्सा हैं।

आयोग ने कहा कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए और उसके आदेश वैधानिक प्रक्रिया तथा कानून के अनुरूप जारी हुए। आयोग का यह जवाब हर आरोप का अंतिम न्यायिक निपटारा नहीं है।

लेकिन उसी तरह इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट भी प्रत्येक आरोप का अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं है। दोनों को सार्वजनिक रिकॉर्ड पर रखकर तथ्यात्मक परीक्षण करना ही उचित लोकतांत्रिक तरीका है।

क्या संवैधानिक संस्थाओं के भीतर ‘आंतरिक मतभेद’ लोकतंत्र के लिए खतरा हैं?

यहाँ एक बुनियादी लोकतांत्रिक सिद्धांत समझना आवश्यक है। किसी संवैधानिक संस्था के भीतर मतभेद होना लोकतंत्र की विफलता का प्रमाण नहीं है। कई बार संस्थागत मतभेद ही बेहतर निर्णय की ओर ले जाते हैं।

खतरा तब पैदा होता है जब असहमति को दर्ज करने की अनुमति न हो, निर्णय लेने की प्रक्रिया कानून के बाहर चली जाए, वैधानिक अधिकारियों की शक्तियाँ मनमाने ढंग से छीनी जाएँ, डेटा में अनधिकृत परिवर्तन हो, या नागरिकों के वैधानिक अधिकार वास्तव में प्रभावित हों। इसलिए हमें ‘मतभेद हुआ’ और ‘संस्था ने कानून तोड़ा’ के बीच की रेखा स्पष्ट रखनी होगी।

पत्रकारिता का काम सवाल पूछना है, फैसला सुनाना नहीं

इंडियन एक्सप्रेस ने दस्तावेजों और अंदरूनी संवाद के आधार पर कुछ प्रश्न उठाए हैं। उन प्रश्नों का उत्तर निर्वाचन आयोग को देना चाहिए। लेकिन लोकतांत्रिक विमर्श में एक और सिद्धांत उतना ही महत्वपूर्ण है।

खोजी पत्रकारिता का निष्कर्ष भी स्वतंत्र तथ्य जांच से परे नहीं होता। किसी रिपोर्ट में किसी अधिकारी द्वारा किसी कदम को गैर-कानूनी या अनधिकृत कहा जाना उस कदम को न्यायिक रूप से अवैध सिद्ध नहीं करता।

वह संबंधित अधिकारी की दर्ज की गई राय है। उसी प्रकार आयोग द्वारा ‘सब कुछ सर्वसम्मति से हुआ’ कहना भी उन विशिष्ट प्रक्रियात्मक सवालों की स्वतंत्र जांच की आवश्यकता समाप्त नहीं करता। इसलिए सही रास्ता है: कानून के आधार पर सबूत आधारित दस्तावेज सामने रखिए और फिर तथ्य के आधार पर निष्कर्ष निकालिए।

14 आपत्तियाँ कोई फैसला नहीं

इस पूरे विवाद में सबसे अधिक सावधानी जिस चीज की आवश्यकता है, वह है हेडलाइन और सबूत के बीच अंतर करना। ‘दो चुनाव आयुक्तों ने 14 बार आपत्ति की’ यह एक रिपोर्टेड तथ्य है।

लेकिन इससे स्वतः यह सिद्ध नहीं होता कि चुनाव आयोग ने चुनावों में हेरफेर किया। यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि- मतदाता सूची जानबूझकर बदली गई। और यह भी स्वतः सिद्ध नहीं होता कि भारत की चुनावी लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता समाप्त हो गई है।

इनमें से प्रत्येक गंभीर आरोप के लिए अलग और ठोस प्रमाण चाहिए। और यही लोकतांत्रिक संस्थाओं के बारे में बहस का सही मानदंड होना चाहिए। न चुनाव आयोग के प्रति अंधविश्वास, न उसके प्रति अंध-अविश्वास सिर्फ प्रमाण।

यदि आयोग के किसी निर्णय में कानून का उल्लंघन हुआ है, तो उसे सामने लाया जाना चाहिए और सुधार होना चाहिए। यदि किसी पात्र मतदाता के अधिकार प्रभावित हुए हैं, तो उसे तत्काल ठीक किया जाना चाहिए। यदि डिजिटल प्रणाली में सुरक्षा की कमी है, तो स्वतंत्र ऑडिट होना चाहिए।

लेकिन यदि अंतिम निर्णय कानून के अनुरूप लिए गए, आंतरिक टिप्पणियाँ संवाद एवं विचार- विमर्श का हिस्सा थीं और कोई चुनावी हेरफेर प्रमाणित नहीं हुआ, तो केवल आंतरिक मतभेदों को लेकर पूरी संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता पर अंतिम फैसला सुनाना भी उचित नहीं होगा। लोकतंत्र आरोपों से नहीं, प्रमाणों से मजबूत होता है।

और अंततः यही इस पूरे विवाद की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी होनी चाहिए, 14 आपत्तियाँ एक जांच का विषय हो सकती हैं; लेकिन वे अपने आप में “चुनाव आयोग दोषी है” का फैसला नहीं हैं। यही अंतर जवाबदेह पत्रकारिता और राजनीतिक जुमलेबाजी आधारित प्रोपेगेंडा के बीच भी है।

और अंत में यह भी सत्य है कि भारत में चुनावी राजनीति का संघर्ष इनदिनों केवल भाजपा या नरेंद्र मोदी के खिलाफ राजनीतिक मुकाबले तक सीमित दिखाई नहीं देता हैं। राहुल गांधी, उद्धव ठाकरे, तेजस्वी यादव, ममता बनर्जी, पप्पू यादव, संजय राउत सहित विपक्ष के कई नेता लगातार चुनाव आयोग और उसकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं।

चुनाव आयोग की आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन किसी संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता पर लगातार ऐसे आरोप लगाना जिनके समर्थन में ठोस तथ्य प्रस्तुत न किए जाएँ, लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता के विश्वास को प्रभावित कर सकता है।

चुनाव आयोग की भूमिका किसी एक राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखने की है। जाहिर है राजनीति की हताशा में संवैधानिक संस्थाएं निशाने पर हैं।

SIR यानी Special Intensive Revision को भी इसी व्यापक संदर्भ में देखना चाहिए। मतदाता सूची में नाम, पता, मृत्यु, स्थानांतरण, दोहरी प्रविष्टि अथवा पहचान से जुड़ी विसंगतियों की जाँच लोकतांत्रिक चुनाव की सामान्य आवश्यकता है।

यदि किसी मतदाता को नोटिस मिलता है, तो उसका उद्देश्य स्वतः उसका अधिकार समाप्त करना नहीं है; प्रक्रिया में जवाब देने और निर्धारित कानूनी उपायों का प्रावधान भी है। मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में की गई SIR को वैधानिक आधार वाला और चुनावी सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से जुड़ा हुआ माना तथा प्रक्रिया में नोटिस, सुनवाई और अपील जैसे सुरक्षा उपायों को महत्वपूर्ण माना।

इसलिए वास्तविक बहस यह होनी चाहिए कि SIR पारदर्शी, निष्पक्ष और कानून के अनुरूप कैसे चले न कि हर सत्यापन को राजनीतिक प्रतिष्ठा का प्रश्न बना दिया जाए। विपक्ष को चुनाव आयोग के किसी निर्णय पर आपत्ति है तो वह तथ्य, दस्तावेज और कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से उसे चुनौती दे सकता है।

लेकिन चुनावी असहमति और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा करने के बीच एक स्पष्ट अंतर है। लोकतंत्र में सरकारें और राजनीतिक दल बदलते रहते हैं, लेकिन चुनाव की निष्पक्षता व संस्थागत विश्वसनीयता पूरे देश की साझा पूँजी है।

राम-कृष्ण-शिव भी हैं, लेकिन सबसे ऊपर स्वामीनारायण: समझिए- BAPS की शुरुआत से बड़ा बनने की पूरी कहानी

आख़िर कैसे ब्रिटेन का एक चर्च BAPS का मंदिर बन गया था और क्यों इस संगठन के मंदिरों में भगवान की प्रतिमाएं तो होती हैं लेकिन इनके अपने स्वनिर्मित भगवान की मूर्तियों के सामने बहुत छोटा रखा जाता है? और कैसे ये संगठन इतना ताक़तवर है कि अमेरिका में इसके ख़िलाफ़ मुक़दमा होता है, अदालत में बहस चलती है, दुनिया में हंगामा होता है और एक दिन बिना किसी सजा के इसे छोड़ दिया जाता है?

सितंबर 2026, फ्रांस का एफिल टॉवर एक दिन के लिए बंद होता है और अचानक चर्चा के केंद्र में आ जाते हैं भारत से पहुँचे कुछ ‘भगवाधारी संत’। वजह उनके कपड़े नहीं थे, न कोई राजनीतिक बयान। चर्चा थी उनके उन सख्त धार्मिक नियमों की, जिनके तहत BAPS के साधु महिलाओं से दूरी रखते हैं। देखते ही देखते सवाल उठने लगे कि आखिर ये साधु कौन हैं? किस परंपरा से आते हैं? और वो कौन-सी संस्था है जिसके नियम इतने कठोर हैं, लेकिन जिसका विस्तार दुनिया के सबसे बड़े शहरों तक हो चुका है? यहीं से शुरू होती है BAPS की कहानी। 

गुजरात के एक छोटे से गांव बोचासन से निकली एक संस्था, जिसने दिल्ली से लंदन, अमेरिका से अबू धाबी और पेरिस तक विशाल मंदिर खड़े किए, तो आज न हम केवल BAPS की पूरी कहानी खोलेंगे बल्कि बताएँगे कि वो कहाँ से आया, किसे सर्वोच्च भगवान मानता है, बाकी स्वामीनारायण परंपरा से अलग कैसे हुआ।

अगर BAPS से आपको कहानी नहीं समझ आ रही है तो अगर आप दिल्ली आए हों तो आपने कभी ना कभी रास्ते में या मेट्रो में जाते हुए एक विशाल मंदिर देखा होगा जिसे अक्षरधाम कहते हैं, जहाँ जाने के लिए लंबी कतारें लगती हैं और इसकी खूबसूरती को देखकर लोग अनायास ही अपने फ़ोन की गैलरी में एक और बार इस मंदिर की तस्वीर खींच लेते हैं। इसे बनाने वाली संस्था का नाम है BAPS। 

कैसे हुई BAPS की शुरुआत?

अगर आपको BAPS को समझना है, तो इसकी शुरुआत इसके पूरे नाम से करते हैं। क्योंकि इसका नाम ही इसकी पूरी कहानी अपने अंदर समेटे हुए है- BAPS यानी बोचासनवासी श्री अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था। पहली बार सुनने पर ये नाम थोड़ा लंबा और मुश्किल लग सकता है लेकिन इसे चार हिस्सों में तोड़ दीजिए- बोचासनवासी, अक्षर-पुरुषोत्तम, स्वामीनारायण और संस्था। इन चार शब्दों को समझ लिया तो आपको ये भी समझ आ जाएगा कि BAPS कहाँ से आया, किसे भगवान मानता है बाकी स्वामीनारायण संप्रदाय से अलग कैसे हुआ और कैसे दुनियाभर में पहुँच गया।

सबसे पहले ‘बोचासनवासी’- बोचासन गुजरात के आदंण जिले में एक गांव है और BAPS की अलग संस्थागत कहानी इसी गांव से 1907 में शुरू होती है लेकिन इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं कि स्वामीनारायण परंपरा भी 1907 में शुरू हुई थी। स्वामीनारायण परंपरा इससे करीब एक सदी साल पुरानी है। 1907 में हुआ ये कि शास्त्री महाराज ने बोचासन में एक मंदिर बनवाया और मंदिर के केंद्रीय गर्भगृह में भगवान स्वामीनारायण को ‘पुरुषोत्तम’ और गुणातीतानंद स्वामी  को ‘अक्षर’ के रूप में प्रतिष्ठित किया है। BAPS अपनी औपचारिक संस्थागत स्थापना 5 जून 1907 की इसी घटना से मानता है। इसीलिए नाम के पहले हिस्से में बोचासन आया और संस्था हुई बोचासनवासी।

अब नाम के दूसरे हिस्से पर आइए- ‘अक्षर पुरुषोत्तम’। असल में BAPS को दूसरे स्वामीनारायण समूहों से अलग समझने की चाबी यही दो शब्द हैं। BAPS की मान्यता है कि भगवान स्वामीनारायण सर्वोच्च परमात्मा हैं, जिन्हें वह पुरुषोत्तम, परब्रह्म और सर्वोपरी मानता है। दूसरी तरफ गुणातीतानंद स्वामी को वह अक्षरब्रह्म मानता है। इसे बिल्कुल आसान भाषा में समझें तो पुरुषोत्तम सर्वोच्च परमात्मा हैं और अक्षर वह पूर्ण और आदर्श भक्त है जो परमात्मा के सबसे निकट है। BAPS का कहना है कि मनुष्य को अपने जीवन में अक्षर जैसा बनने का प्रयास करना चाहिए और फिर पुरुषोत्तम की भक्ति करनी चाहिए। इसी विचार को वह ‘अक्षर-पुरुषोत्तम उपासना’ कहता है। संस्था की पूरी धार्मिक पहचान इसी पर टिकी है।

अब आखिरी शब्द ‘स्वामीनारायण’ की बात… सवाल उठता है कि ये भगवान स्वामीनारायण कौन थे और उनके नाम से इतनी बड़ी धार्मिक परंपरा कैसे खड़ी हुई? इसके लिए कहानी हमें 1781 में ले जाती है। भगवान स्वामीनारायण का जन्म 3 अप्रैल 1781 को अयोध्या के पास छपैया में हुआ था, ये अब गोंडा जिले में है। बचपन का नाम घनश्याम पांडे था। स्वामीनारायण परंपरा बताती है कि बहुत कम उम्र से ही उनमें वैराग्य और आध्यात्मिक रुचि दिखाई देने लगी थी और 11 वर्ष की उम्र में उन्होंने घर छोड़ दिया और नीलकंठ वर्णी के नाम से भारत की लंबी यात्रा पर निकल पड़े, उन्होंने उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक अनेक तीर्थों, आश्रमों और धार्मिक केंद्रों की यात्रा की।

कई वर्ष तक भ्रमण करने के बाद 1799 में वे गुजरात के लोज पहुँचे, जहाँ उनका संपर्क रामानंद स्वामी की परंपरा से हुआ। 1800 में रामानंद स्वामी ने उन्हें दीक्षा दी और सहजानंद स्वामी नाम दिया। इसके एक वर्ष बाद 1801 में रामानंद स्वामी ने उन्हें अपने धार्मिक समुदाय का नेतृत्व सौंप दिया।

भगवान स्वामीनारायण

मान्यता है कि रामानंद स्वामी के निधन के बाद सहजानंद स्वामी ने एक सभा में लोगों ने भी ‘स्वामिनारायण’ मंत्र का जाप करने कहा और उन्हें भी अक्षरधाम के दर्शन हुए। इसी घटना के बाद उनके लिए ‘स्वामिनारायण’ नाम और मंत्र प्रसिद्ध हुआ और उनके अनुयायी उन्हें स्वामिनारायण के नाम से पुकारने लगे। अब सहजानंद स्वामी स्वयं भगवान स्वामीनारायण के रूप में प्रतिष्ठित हो गए।

यहीं एक बहुत जरूरी फर्क भी समझना चाहिए। स्वामीनारायण संप्रदाय और BAPS एक ही चीज नहीं हैं। स्वामीनारायण संप्रदाय की जड़ भगवान स्वामीनारायण के समय में है, जबकि BAPS उसी बड़ी परंपरा के अंदर बाद में विकसित हुई एक खास शाखा है। भगवान स्वामीनारायण के जीवनकाल में ही मंदिर बनाए गए और धार्मिक व्यवस्था संगठित की गई। उनका पहला बड़ा मंदिर 1822 में अहमदाबाद के कालूपुर में बना, जहाँ नर-नारायण देव की मूर्तियाँ स्थापित की गईं। इसके बाद भुज, जूनागढ़ और कई जगहों पर मंदिर बनते गए…तो पहला स्वामीनारायण मंदिर अहमदाबाद का था और BAPS का पहला मंदिर बोचासन वाला था जो 1907 में बना।

भगवान स्वामीनारायण की शिक्षाओं को भी व्यवस्थित रूप दिया गया। उनके उपदेशों का सबसे महत्वपूर्ण संग्रह ‘वचनामृत’ माना जाता है, जिसमें उनके आध्यात्मिक संवाद और प्रवचन दर्ज हैं। 1826 में उन्होंने ‘शिक्षापत्री’ लिखी, जिसमें 212 संस्कृत श्लोकों में गृहस्थों, साधुओं और अनुयायियों के आचरण के नियम बताए गए। BAPS वचनामृत और शिक्षापत्री को अपनी धार्मिक समझ का केंद्रीय आधार मानता है। इसके अलावा गुणातीतानंद स्वामी से जुड़ी ‘स्वामिनी वातो’ भी BAPS के अंदर अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसमें गुणातीतानंद स्वामी के प्रवचन हैं।

1830 में भगवान स्वामीनारायण के देहावसान के बाद उनके बनाए संप्रदाय को आगे चलाने की जिम्मेदारी उनके द्वारा तय की गई व्यवस्था के अनुसार चली। भगवान स्वामीनारायण ने अपने जीवनकाल में संप्रदाय की देखरेख के लिए दो प्रमुख गादियाँ बनाई थीं एक अहमदाबाद में नर-नारायण देव गादी और दूसरी वडताल में लक्ष्मी-नारायण देव गादी। यहाँ ‘गादी’ का मतलब किसी धार्मिक संस्था के नेतृत्व और जिम्मेदारी का केंद्र है।

इन दोनों गादियों पर आचार्य होते थे, जो मंदिरों और संप्रदाय की धार्मिक व्यवस्था को संभालते थे और यह पद आगे आचार्य परंपरा में चलता रहा लेकिन BAPS जिस आध्यात्मिक परंपरा को मानता है, वह थोड़ी अलग है। BAPS के अनुसार भगवान स्वामीनारायण ने गुणातीतानंद स्वामी को अक्षरब्रह्म के रूप में प्रकट किया था। इसके बाद गुणातीतानंद स्वामी से भगतजी महाराज, फिर शास्त्रीजी महाराज, योगीजी महाराज, प्रमुख स्वामी महाराज और आज महंत स्वामी महाराज तक गुरु परंपरा चली आती है। ये BAPS की अपनी मान्यता है। स्वामीनारायण की दूसरी शाखाएँ इस गुरु परंपरा को इसी रूप में स्वीकार करें, यह जरूरी नहीं है। 

अब आते हैं उन व्यक्ति पर जिसके बिना BAPS की अलग कहानी शुरू ही नहीं होती- शास्त्रीजी महाराज। उनका जन्म 1865 में डुंगर भक्त के रूप में हुआ था, साधु बनने के बाद उनका नाम यज्ञपुरुषदास पड़ा। वे वडताल परंपरा के साधु थे और धार्मिक ग्रंथों के गहरे अध्ययन के कारण शास्त्रीजी महाराज कहलाए। शास्त्रीजी महाराज का मानना था कि भगवान स्वामीनारायण पुरुषोत्तम हैं और गुणातीतानंद स्वामी अक्षरब्रह्म के स्वरूप हैं।

वे चाहते थे कि इस अक्षर-पुरुषोत्तम उपासना को मंदिरों में भी उसी रूप में स्थापित किया जाए। वडताल में उनके इस विचार का विरोध बढ़ता गया और उनके लिए परिस्थितियाँ मुश्किल होती गईं। आखिरकार नवंबर 1905 में शास्त्रीजी महाराज ने वडताल छोड़ दिया। उस समय उनके साथ केवल पाँच साधु और कुछ भक्त थे। वे वडताल से अलग होकर भी इसी विचार का प्रचार करते रहे और ऐसा मंदिर बनाना चाहते थे जहाँ अक्षर और पुरुषोत्तम की उपासना मुख्य रूप से स्थापित की जा सके।

वडताल छोड़ने के बाद शास्त्रीजी महाराज ने गुजरात में घूम-घूमकर अपने विचार का प्रचार किया। इसके बाद 1907 में बोचासन में पहला मंदिर बनवाया, जहाँ मुख्य स्थान पर भगवान स्वामीनारायण को पुरुषोत्तम और गुणातीतानंद स्वामी को अक्षर के रूप में स्थापित किया गया। BAPS इसी बोचासन मंदिर की स्थापना को अपनी संस्था की औपचारिक शुरुआत मानता है और इसी से उसका पूरा नाम बोचासनवासी श्री अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था सामने आया। इस तरह 1905 में वडताल से अलग होने और 1907 में बोचासन मंदिर की स्थापना के बीच शास्त्रीजी महाराज ने एक अलग संगठन और अपनी आध्यात्मिक पहचान की नींव तैयार की।

बोचासन के बाद काम रुका नहीं। 1916 में सारंगपुर में मंदिर बना, 1934 में गोंडल और बाद में अटलादरा सहित दूसरे स्थानों पर मंदिर स्थापित हुए। लेकिन इन मंदिरों की खासियत केवल उनकी बनावट नहीं थी। BAPS के लिए मंदिर उसके सिद्धांत को दिखाई देने वाला रूप भी था। मंदिर में कौन मुख्य स्थान पर है, किस तरह मूर्तियाँ स्थापित हैं और किस गुरु परंपरा को स्मरण किया जाता है। इन सबके जरिए उसकी धार्मिक पहचान साफ दिखाई देती थी। धीरे-धीरे यह केवल कुछ मंदिरों वाला समूह नहीं रहा बल्कि अपनी अलग साधु व्यवस्था, गुरु परंपरा, सत्संग व्यवस्था और भक्त समुदाय वाला संगठन बनता गया।

अब एक आम आदमी का सबसे सीधा सवाल आता है कि क्या BAPS में हिंदू देवी-देवाताओं की पूजा होती है, अगर नहीं तो फिर किसकी? इसका सीधा जवाब है कि भगवान स्वामीनारायण को सर्वोच्च परमात्मा माना जाता है। लेकिन पूरी बात समझने के लिए अक्षर की भूमिका भी समझनी पड़ेगी। BAPS पाँच शाश्वत तत्वों की बात करता है- जीव, ईश्वर, माया, अक्षरब्रह्म और परब्रह्म। जीव सामान्य आत्माएँ हैं। ईश्वर उससे ऊँची ब्रह्मांडीय शक्तियों की श्रेणी है। माया वह शक्ति है जो जीव को संसार और अज्ञान से बाँधती है। अक्षरब्रह्म माया से परे है और परब्रह्म यानी पुरुषोत्तम इन सब से सर्वोच्च है। BAPS क्या मानता है, वो मानता है कि भगवान स्वामीनारायण वही पुरुषोत्तम हैं और गुणातीतानंद स्वामी अक्षरब्रह्म हैं। इसी के चलते BAPS में गुरु की भूमिका बहुत बड़ी हो जाती है। यहाँ गुरु केवल प्रवचन देने वाला संत नहीं है। BAPS का मानना है कि अक्षरब्रह्म गुरु के रूप में संसार में प्रकट रहता है और वही साधक को परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग दिखाता है। इसलिए वर्तमान गुरु के प्रति बहुत गहरा सम्मान और समर्पण दिखाई देता है।

BAPS बताता है कि उसकी ताकत बड़े-बड़े मंदिरों नहीं बल्कि वो जीवनशैली है जो अपने अनुयायियों से अपनाने को कहता है। मतलब साफ है- नशे से दूर रहो, मांसाहार मत करो, चोरी-धोखाधड़ी से दूर रहो, विवाह के बाहर संबंधों से बचो,नियमित पूजा करो और परिवार को भी धार्मिक मूल्यों के साथ चलाओ। खाने-पीने में भी सात्विकता पर काफी जोर है और साफ तौर पर BAPS के अनुयायियों को प्याज-लहसुन तक ना खाने को कहा जाता है।

अब यहां एक बात समझने वाली है। BAPS के हिसाब से धर्म का मतलब केवल इतना नहीं है कि आप रविवार को मंदिर गए, दर्शन किए और वापस आ गए। बात ये है कि आप रोजमर्रा की जिंदगी में कैसे इंसान हैं और यहीं से आता है BAPS का एक बहुत जरूरी शब्द ‘सेवा’ अब सेवा सुनकर आपके दिमाग में शायद दान-पैसा आए लेकिन यहाँ सेवा का मतलब उससे बड़ा है। मंदिर में जूते संभालना भी सेवा है, खाना बनाना भी सेवा है, सफाई करना भी सेवा है, बड़े कार्यक्रम में व्यवस्था संभालना भी सेवा है। कोई चिकित्सा शिविर में काम कर रहा है, कोई राहत कार्य में लगा है, कोई बच्चों को पढ़ा रहा है और कोई मंदिर निर्माण में अपना समय दे रहा है।

BAPS का बहुत बड़ा ढांचा स्वयंसेवकों के सहारे चलता है। संस्था अपने आधिकारिक आंकड़ों में 5000 से ज्यादा सत्संग केंद्र, करीब 55000 स्वयंसेवक और दस लाख से ज्यादा अनुयायियों की बात करती है। साधुओं की संख्या भी एक हजार से ज्यादा बताई गई है, ये संस्था के अपने आंकड़े हैं लेकिन इससे आपको इसके आकार का अंदाजा जरूर हो जाता है।

अब सवाल है कि इतने लोग संस्था के साथ जुड़ते कैसे हैं? अगर कोई आम व्यक्ति BAPS से जुड़ना चाहता है, तो इसके लिए कोई मुश्किल सदस्यता प्रक्रिया नहीं है। शुरुआत आम तौर पर नजदीकी BAPS मंदिर या सत्संग केंद्र जाने से होती है, जहाँ व्यक्ति नियमित सभा में बैठता है, संतों और कार्यकर्ताओं से मिलता है और धीरे-धीरे स्वामीनारायण परंपरा, अक्षर-पुरुषोत्तम उपासना और BAPS के जीवन नियमों को समझता है। इसके साथ ही साप्ताहिक सभाएँ और आयु वर्ग के हिसाब से बनी बाल, युवा व महिला सभाएँ भी आयोजित की जाती हैं। जब व्यक्ति इस परंपरा को अपनाने का फैसला करता है, तो उसे सत्संग में दीक्षित किया जाता है, जिसे परंपरा में ‘वर्तमान’ कहा जाता है और तुलसी की कंठी धारण कराई जाती है.. साथ ही आधुनिक समय में डिजिटल ऐप्स, यूट्यूब चैनल्स और ऑनलाइन सत्संग परीक्षाओं के जरिए भी नई पीढ़ी तेजी से इस वैश्विक परिवार का हिस्सा बन रही है।

बचपन से ही इस परंपरा से जुड़ाव हो सके इसका विचार बहुत पुराना है। योगीजी महाराज के समय बच्चों और युवाओं के लिए अलग-अलग गतिविधियाँ बन दी गई थी। 1950 के दशक से युवा मंडल और बाल मंडल तेजी से बढ़े, हर हफ्ते सभाएं होतीं, धार्मिक कहानियां सुनाई जातीं, भजन होते, नाटक और प्रतियोगिताएँ होतीं, सेवा के कार्यक्रम होते।

इसका असर खासकर विदेशों में बसे भारतीय परिवारों पर बहुत ज्यादा पड़ा, क्योंकि वहां मंदिर केवल भगवान के दर्शन की जगह नहीं रह गया। वो बच्चों को गुजराती या भारतीय संस्कृति से जोड़ने की जगह बन गया। परिवार मिलते हैं, बच्चे अपनी परंपरा सीखते हैं और अगली पीढ़ी भी समुदाय से जुड़ी रहती है। अब यहीं से हम उस व्यक्ति पर आते हैं जिसके दौर में BAPS दुनिया भर में बहुत तेजी से फैलता दिखाई देता है। वो हैं प्रमुख स्वामी महाराज, उनका जन्म 1921 में शांतिलाल के रूप में हुआ था। 1940 में वे साधु बने और उनका नाम नारायणस्वरूपदास रखा गया और फिर 1950 में, सिर्फ 28 साल की उम्र में, शास्त्रीजी महाराज ने उन्हें संस्था का प्रमुख बना दिया। इसीलिए आगे चलकर उन्हें प्रमुख स्वामी महाराज कहा गया।

1971 में योगीजी महाराज के निधन के बाद प्रमुख स्वामी महाराज ने आध्यात्मिक नेतृत्व संभाला। इसके बाद उन्होंने लगातार यात्राएं कीं। गांव, शहर, विदेश जहां भक्त थे, वहां पहुंचने की कोशिश की। इसी दौर में BAPS की पहचान गुजरात की संस्था से निकलकर एक वैश्विक हिंदू संगठन के रूप में बनने लगी लेकिन यहां एक दिलचस्प बात है। BAPS की विदेश वाली कहानी सीधे अमेरिका या लंदन से शुरू नहीं होती। इसकी शुरुआती मजबूत जमीन बनी थी, अफ्रीका में।

क्योंकि पहले से ही बड़ी संख्या में गुजराती व्यापारी और परिवार केन्या, युगांडा और तंजानिया जैसे देशों में बस चुके थे। इनमें स्वामीनारायण परंपरा से जुड़े लोग भी थे। नैरोबी में 1920 के दशक से सत्संग गतिविधियों का रिकॉर्ड मिलता है। 1945 में वहां एक प्रारंभिक अक्षर-पुरुषोत्तम मंदिर बना और 1955 में योगीजी महाराज अफ्रीका गए और मोम्बासा में मंदिर का उद्घाटन किया और BAPS विदेश में फैला कैसे? ये तरीका समझना बहुत जरूरी है।

मान लीजिए किसी शहर में पांच-दस गुजराती परिवार जाकर बसे। पहले वे किसी के घर पर मिलना शुरू करते। भजन होता, वचनामृत पढ़ा जाता, गुरु और भारत के साधुओं से संपर्क रखा जाता। धीरे-धीरे परिवारों की संख्या बढ़ती। फिर कोई साधु वहां जाता। उसके बाद छोटा प्रार्थना स्थल बनता और फिर जब समुदाय बड़ा हो जाता, तो स्थायी मंदिर खड़ा हो जाता।

ब्रिटेन में भी लगभग यही हुआ, 1950 के आसपास लंदन में भक्तों ने नियमित सत्संग शुरू किया। 1959 तक संस्था वहां औपचारिक रूप लेने लगी। फिर 1970 में इस्लिंगटन में एक पुराना चर्च खरीदा गया और उसे मंदिर में बदल दिया गया। इसके बाद 1972 में एक बड़ी घटना हुई। युगांडा के शासक ईदी अमीन ने एशियाई मूल के लोगों को देश छोड़ने का आदेश दिया। बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोग ब्रिटेन पहुंचे और इनमें बहुत से गुजराती परिवार थे। इससे BAPS का समुदाय भी तेजी से बढ़ा।

फिर आगे चलकर नेस्डन में बड़ी जगह ली गई और 1995 में वहां पत्थर का प्रसिद्ध BAPS मंदिर खुला। अब BAPS सिर्फ छोटे प्रवासी धार्मिक समूह के रूप में नहीं दिख रहा था। अब वह ऐसे बड़े मंदिर बना रहा था जिन्हें पूरा देश नोटिस कर रहा था।

अमेरिका में भी यही कहानी आगे बढ़ी। 1974 में न्यूयॉर्क के फ्लशिंग में शुरुआती मंदिर बना। फिर न्यू जर्सी, ह्यूस्टन, शिकागो, अटलांटा, लॉस एंजिलिस जैसे शहरों में केंद्र और मंदिर बनते गए। इसी मॉडल से बाद में गांधीनगर का अक्षरधाम, दिल्ली का अक्षरधाम, लंदन का नेस्डन मंदिर और अमेरिका का रॉबिन्सविल अक्षरधाम जैसी बड़ी पहचानें सामने आईं।

अबू धाबी का मंदिर तो इस वैश्विक विस्तार का एक और बड़ा उदाहरण है। संयुक्त अरब अमीरात के नेतृत्व ने मंदिर के लिए जमीन उपलब्ध कराई। 2015 में 13.5 एकड़ और बाद में अतिरिक्त जमीन मिलने के बाद कुल क्षेत्र करीब 27 एकड़ हुआ। फरवरी 2024 में मंदिर का उद्घाटन हुआ और फ्रांस की राजधानी पेरिस में सितंबर 2026 में यह मंदिर खुला है।

लेकिन अब एक और जरूरी हिस्सा समझिए… BAPS के साधु। बाहर से देखने पर लग सकता है कि कोई युवक घर छोड़ता है और सीधे भगवा पहनकर साधु बन जाता है। लेकिन प्रक्रिया इतनी सीधी नहीं है… पहले युवक संस्था के जीवन को करीब से समझता है। फिर पार्षद दीक्षा का चरण आता है। पार्षद आम तौर पर सफेद वस्त्र पहनते हैं और पूर्ण साधु जीवन की तैयारी करते हैं। इस दौरान सेवा, धार्मिक अध्ययन, अनुशासन और त्याग की परीक्षा होती है।

इसके बाद योग्य पार्षद को भागवती दीक्षा दी जाती है। तब वह भगवा वस्त्र धारण करके पूर्ण साधु बनता है और उसे नया साधु नाम मिलता है।

साधु बनने के बाद पांच प्रमुख व्रतों पर जोर दिया जाता है- निष्काम, निस्नेह, निस्वाद, निर्मान और निर्लोभ। आसान भाषा में समझें तो काम और यौन आकर्षण से दूरी, परिवार और सांसारिक मोह से दूरी, स्वाद पर नियंत्रण, अहंकार से दूरी और धन-संपत्ति के लोभ से दूरी और ब्रह्मचर्य के नियम यहां बहुत सख्त हैं। इसी वजह से BAPS साधुओं के महिलाओं से संपर्क को लेकर भी कड़े नियम रखता है।

swaminarayan.org में BAPS के discipline के नियम बताए गए हैं उनमें निष्काम में यह बात स्पष्ट होती है। इनमें साधुओं के लिए जीवन भर ब्रह्मचर्य का पालन करना। शादी न करना। महिलाओं से कोई संपर्क न रखना। महिलाओं को शारीरिक रूप से न छूना, उनसे न लिखना या बात न करना, उन्हें जान-बूझकर न देखना, या उनके बारे में सोचना भी नहीं… कहा गया है… यही वो हिस्सा है जिसे लेकर अभी बहस हो रही है.. संस्था इसे महिला-विरोध नहीं बल्कि संन्यास और ब्रह्मचर्य का हिस्सा मानती है… अब 

अब आते हैं उस सवाल पर जिसे सुनने को आप उत्सुक हैं और जिसे लेकर सबसे ज्यादा बहस या चर्चा हो रही है- क्या BAPS हिंदू धर्म से अलग है या उसने हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ कुछ कहा है? baps.org के WhoWeAre सेक्शन में लिखा है, “BAPS एक सामाजिक-आध्यात्मिक हिंदू संप्रदाय है, जिसकी जड़ें वेदों में हैं। इसकी स्थापना की शुरुआत भगवान स्वामीनारायण द्वारा 18वीं शताब्दी के अंतिम दौर में हुई थी।” उनके मंदिरों में राम, कृष्ण, शिव, पार्वती, गणेश और हनुमान जैसे देवताओं की मूर्तियाँ भी होती हैं और साधु प्रशिक्षण में गीता, उपनिषद और रामायण भी पढ़ते हैं। 

लेकिन कहानी इतनी नहीं है, कहानी इसके बाद शुरू होती है। मूर्तियाँ तो होती हैं लेकिन वो सब मूर्तियाँ स्वामी स्वामीनारायण से छोटी होती हैं और इसे लेकर भी बड़ी संख्या में हिंदुओं की नाराजगी रहती है और इनके literature में किस तरह हिंदू देवी देवताओं को छोटा दिखाया गया है उसकी बात करें उससे पहले एक उदाहरण सुनिए।

हमारे एक सहयोगी हैं मेघलसिंह परमार, ऑपइंडिया गुजराती में काम करते हैं, वो करीब 1-2 साल पहले गुजरात में एक BAPS के मंदिर में गए, सर्दियों के दिन थे, तो भगवान स्वामीनारायण को बाकायदा गर्म कपड़े पहनाए हुए थे लेकिन बाकी देवी-देवताओं की मूर्तियाँ सामान्य ही थीं। उन पर कोई गर्म कपड़ा नहीं था। देखने सुनने में ये बात छोटी है लेकिन आस्थावान लोगों के लिए इसका क्या महत्व है ये मुझे बताने की जरूरत नहीं है।

अब आगे बढ़ते हैं और BAPS के literature पर आते हैं। हालाँकि, समय-समय पर इनके लिटरेचर में बदलाव होते रहे हैं, तो एक ही किताब के अलग-अलग संस्करणों में आपको अलग कहानियाँ मिलेंगी और अभी गुजरात में हुए विवाद के बाद ताजा संस्करणों से लगभग सभी विवादित बातें हटा दी गई हैं, अब क्योंकि संस्थान बड़ा है, अलग-अलग वेबसाइट्स हैं तो उन्हीं से हमने कुछ पुरानी किताबों को ढूँढा है और आपको बताएँगे कि किस तरह स्वामीनारायण को सबसे बड़ा दिखाया गया है।

एक किताब है ‘नीलकंठ चरित्र’। आपको याद होगा कि स्वामीनारायण जब घर से निकले थे तब उनका नाम नीलकंठ हुआ करता था और वहीं से यह नाम आया होगा। इस किताब में जो बाते हैं वो बेहद ही गंभीर है। इसमें लिखा है कि हनुमान जी ने खुद को नीलकंठ का सेवक बताया था। एक कथा में हनुमान नीलकंठ का ‘कथित अपमान’ करने वाले साधुओं की पिटाई करते हैं, इस पर उनका परिचय पूछते हैं तो वो कहते हैं कि ‘मैं अंजना का पुत्र हनुमान हूँ और नीलकंठ का सेवक हूँ’। जानते हैं इस कथा में नीलकंठ का अपमान क्यों हुआ था? क्योंकि उन्होंने पुरुषों और महिलाओं के साथ राम कथा सुनने पर आपत्ति जताई थी कि वो साथ बैठकर कथा कैसे सुन सकते हैं। इसी कहानी में एक जगह लिखा है कि हनुमानजी को हर दिन नीलकंठ के दर्शन करने की आदत थी। 

नीलकंठ चरित्र

सिर्फ हनुमानजी को लेकर ही नहीं लिखा गया है, एक जगह लिखा है, “वे लक्ष्मणझूला पहुँचे। नीलकंठ ने गंगा के ठंडे पानी में स्नान किया और फिर मंदिर में जाकर लक्ष्मणजी की मूर्ति के सामने प्रणाम किया, उसी समय लक्ष्मणजी स्वयं अपनी मूर्ति से प्रकट हुए और नीलकंठ के चरणों में झुक गए। नीलकंठ ने उनके हाथ पकड़कर उन्हें उठाया और उन्हें भगवान श्रीराम के दिव्य स्वरूप में अपने दर्शन कराए।”

पुस्तक के एक चैप्टर में सूर्यनारायण को नीलकंठ के सामने दिखाया गया है। इस चैप्टर में लिखा है, “ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी नीलकंठ के दर्शन करने और उनकी सेवा के लिए वहाँ आए।” आगे लिखा है, “इसके बाद सूर्यनारायण ने नीलकंठ से कहा, “हे प्रभु, आप स्वयं पुरुषोत्तम नारायण हैं। आप सबसे श्रेष्ठ हैं और सभी अवतारों के भी कारण हैं। आप पूर्ण रूप से पवित्र हैं।”

भगवान शिव और माता पार्वती को लेकर इसी तरह की बातें कही गई हैं। इसमें लिखा है, “नीलकंठ स्वयं भगवान थे, फिर भी वे शालिग्राम की बहुत गहरी श्रद्धा और भक्ति से पूजा करते थे। नीलकंठ अभी यही सोच रहे थे कि शालिग्राम के लिए भोजन कहाँ से मिलेगा, तभी वहाँ एक बैल पर सवार एक पुरुष और एक स्त्री आए। दोनों का रूप संन्यासियों जैसा था।  उन्होंने उनसे पूछा, “आप कौन हैं?” तब उस स्त्री ने कहा, “ये शिवजी हैं और मैं सती हूँ। आप कई दिनों से भूखे हैं, इसलिए हम आपके लिए साथवो लेकर आए हैं।” वास्तव में वे भगवान शिव और माता पार्वती थे। नीलकंठ की सेवा करने का अवसर पाकर दोनों बहुत प्रसन्न हुए।”

एक और किताब है नाम है घनश्याम चरित्र, इसमें स्वामीनारायण के जन्म से जुड़ी कथाएँ हैं। इसमें लिखा है, “हनुमानजी बाल घनश्याम को लेकर तुरंत गाँव वापस पहुँचे और उन्हें भक्तिमाता की गोद में सौंप दिया। इसके बाद हनुमानजी ने भक्तिमाता को प्रणाम किया और कहा, ‘माता, आपका यह बालक स्वयं भगवान है और मैं उनका सेवक हूँ। जब भी आपको मेरी सहायता की जरूरत हो, मुझे याद कर लीजिएगा। मैं हमेशा आपकी सेवा के लिए उपस्थित रहूँगा’।” अब दिलचस्प बात ये भी है कि आगे के संस्करणों में कहानी तो यही है लेकिन इसमें से भगवान कहने वाला हिस्सा हटा दिया गया है। 

घनश्याम चरित्र

इस नए संस्करण में लिखा है, “जैसे-जैसे घनश्याम बोलते गए, उनके शरीर से दिव्य प्रकाश की किरणें निकलने लगीं। वहाँ बैठे सभी लोगों को समाधि की अवस्था का अनुभव हुआ। हर विद्वान को घनश्याम के रूप में अपने-अपने आराध्य देव के दर्शन होने लगे। किसी को उनमें शंकराचार्य दिखाई दिए, किसी को भगवान शिव, किसी को श्रीराम और किसी को श्रीकृष्ण के दर्शन हुए।” उन्हें भगवान श्रीराम बताने वाली ऐसी कितनी ही कहानियाँ इसमें हैं।

गुणातीतानंद स्वामी पर लिखी एक किताब है। नाम है गुणातीतानंद स्वामी- विस्तृत जीवन और कार्य। वे स्वामीनारायण के पहले आध्यात्मिक उत्तराधिकारी हैं। यह किताब गुजराती में है और इसमें एक जगह लिखा है, “महाविष्णु अपनी अनंत शक्ति मूल प्रकृति और मूल पुरुष से प्राप्त करते हैं। इस तरह ब्रह्मांड में करोड़ों भगवान माने जा सकते हैं, लेकिन उन सभी भगवानों के भी भगवान स्वामीनारायण हैं, इस विचार को इसी रूप में समझाया जाता है।”

साधु विवेकसागर दास अपने एक लेख ‘विश्वमा व्यापेली अद्भुत सृष्टि BAPS मंदिरों नी’ में लिखते हैं, “वचनामृत गढ्डा के आखिरी अध्याय 38 में भगवान स्वामीनारायण के कहे शब्दों की पुष्टि करते हुए स्वामी ने कहा कि दूसरे अवतार तो प्रणाम और पूजा के लायक हैं, लेकिन सिर्फ़ हमारे आराध्य भगवान स्वामीनारायण ही पूजा के लायक हैं।” यह लेख BAPS की वेबसाइट पर अभी भी मौजूद है।

ऐसे कहानियाँ इस पूरे literature में भरी पड़ी है। ये तो हुई literature के बाद, इसके अलावा BAPS से जुड़ा एक और विवाद है, जो खूब चर्चा में रहा।

अमेरिका के न्यू जर्सी में BAPS का बहुत बड़ा स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिर बनाया गया। लेकिन 2021 में मंदिर बनाने वाले कुछ भारतीय मजदूर अदालत पहुँच गए। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें भारत से धार्मिक काम करने वाले लोगों के वीजा पर अमेरिका बुलाया गया था, लेकिन वहाँ उनसे मंदिर बनाने का भारी काम कराया गया। मजदूरों का कहना था कि उनसे रोज करीब 12 से 13 घंटे और हफ्ते में 87 घंटे से भी ज्यादा काम कराया जाता था जबकि पैसे केवल करीब 450 डॉलर महीने मिलते थे। 

दावा किया गया कि भारत से जानबूझकर दलित, आदिवासी और दूसरे हाशिये के समुदायों से मजदूरों की भर्ती की।

कुछ मजदूरों ने यह भी कहा कि अमेरिका पहुँचने के बाद उनके पासपोर्ट अपने पास रख लिए गए, उन्हें बिना अनुमति बाहर जाने की आजादी नहीं थी और बाहरी लोगों से मिलने-जुलने पर भी रोक थी। मामला सामने आने के बाद अमेरिका की संघीय एजेंसियों ने भी जाँच शुरू की। दूसरी तरफ BAPS ने सभी गंभीर आरोपों से इनकार किया। संस्था का कहना था कि मंदिर का काम सामान्य नौकरी की तरह नहीं बल्कि धार्मिक सेवा के रूप में किया जा रहा था और बहुत से लोग अपनी इच्छा से सेवा कर रहे थे। 2023 में इस मामले में एक बड़ा बदलाव आया जब 12 मजदूरों ने अपने मुकदमे वापस ले लिए। उनके वकील ने अदालत को बताया कि मुकदमा वापस लेने के बदले उन्हें BAPS से कोई पैसा नहीं मिला और उन्होंने धार्मिक कारणों से केस आगे न बढ़ाने का फैसला किया। लेकिन बाकी मजदूर मुकदमे में बने रहे, इसलिए पूरा मामला खत्म नहीं हुआ।

सितंबर 2025 में अमेरिकी न्याय विभाग ने इस मामले से जुड़ी आपराधिक जाँच बिना किसी आपराधिक आरोप के बंद कर दी। यह BAPS के लिए बड़ी राहत थी। लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि अदालत ने मजदूरों के सभी आरोप झूठे साबित कर दिए। आपराधिक जाँच बंद हुई लेकिन मजदूरों का अलग दीवानी मुकदमा चलता रहा। 2026 तक BAPS उस मुकदमे को खारिज कराने की कोशिश कर रहा था और मजदूरों की ओर से उसका विरोध किया जा रहा है।

इस कहानी में हमने आपको BAPS की शुरुआत से लेकर उसके देश-विदेश में फैलने तक सारे मुद्दे बता दिए हैं, तो BAPS को सिर्फ उसके संगमरमर के मंदिरों से मत देखिए। इसकी असली कहानी उन विचारों में छिपी है, जिन पर इसका पूरा ढांचा खड़ा है। अक्षर-पुरुषोत्तम की उपासना, गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण, बेहद सख्त साधु जीवन, और दुनिया भर में फैला संगठन। लेकिन जितना बड़ा इसका विस्तार हुआ, उतने ही इसके साहित्य, धार्मिक दावों और न्यू जर्सी मामलों को लेकर सवाल भी उठे। किसी संगठन को समझने का सही तरीका न उसकी केवल प्रशंसा है, न केवल आलोचना। असली तस्वीर तब बनती है जब उसकी आस्था, ताकत, इतिहास और विवाद। सबको एक साथ सामने रखा जाए। और BAPS की कहानी शायद यहीं सबसे ज्यादा दिलचस्प हो जाती है।

EC में कैसे आए 3 कमिश्नर? जब राजीव गांधी से भिड़े CEC शास्त्री, तो बदल दिया गया चुनाव आयोग का पूरा गेम

आज भारत में इस बात पर हंगामा मचा हुआ है कि चुनाव आयोग के तीन कमिशनर्स में से 2 बहुत से फैसलों से सहमत नहीं होते। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट को लेकर एकदम आंदोलन की बात हो रही है। लेकिन क्या आपको पता है कि आख़िर इलेक्शन कमीशन में तीन कमिश्रनर्स हैं ही क्यों? क्या हमेशा से भारत में तीन ही कमिश्नर हुआ करते थे? 

या फिर किसी ने अपने हित साधने को इस इंडिपेंडेंट इंस्टीटूशन को सिंगल मेंबर बॉडी से ट्रिपल मेंबर बॉडी में बदल दिया? आख़िर कैसे राजीव गांधी की बातें ना मानने का ख़ामियाज़ा एक चीफ इलेक्शन कमिश्नर को अपनी पॉवर्स के पर कतरने से चुकाना पड़ा। 

और कैसे तब चीफ इलेक्शन कमिश्नर को ही आख़िरी दिन तक पता नहीं था कि उसके पर कतरे जाने वाले है। तो ये कहानी शुरू होती है साल 1950 से, लेकिन इसका मेन प्लॉट है 1980 के दशक का। दरअसल जब भारत का संविधान लिखा जा रहा था तब चुनाव को लेकर काफ़ी बहस हुई।

इसके बाद 25 जनवरी, 1950 को इलेक्शन कमीशन बनाया गया, जिसे एक कान्सटीट्युशनल बॉडी का दर्जा दिया गया। इसका जिम्मा था देश में फ्री एंड फ़ेयर चुनाव करवाना। इसको हेड करने के लिए एक चीफ इलेक्शन कमिश्नर को नियुक्त किया गया जिसके कंधों पर ये ज़िम्मेदारी थी कि वो इस इलेक्शन कमीशन को चलाएगा। 

देश के पहले चुनाव यानी 1952 के आम चुनाव सफलतापूर्वक करवाए गए और ये व्यवस्था 1984 तक चली। किसी को कोई समस्या नहीं हुई। लेकिन इसके बाद साल 1984 में राजीव गाँधी सिंपथी लहर में प्रधानमंत्री बने। 400 से अधिक सीटें उन्होंने संसद में जीत ली, उनके हाथ में ये अधिकार आ गया कि वो किसी भी तरह का संशोधन कर सकें। 

राजीव गांधी ने शाह बानो जजमेंट को पलटना हो या फिर एंटी डिफ़ेक्शन लॉ लाना, अपनी इस ताक़त का इस्तेमाल खूब किया। लेकिन उन्होंने इस ताक़त का मतलब ये भी समझ लिया कि वो चुनाव आयोग को अपने हिसाब से चला सकते हैं। 

उन्होंने चुनाव की तारीखों से लेकर उपचुनाव जैसे मामलों को अपने हिसाब से करवाने के लिए दबाव डालना शुरू किया ताकि उनकी पार्टी यानी कांग्रेस को बढ़त मिले। और उनका सीधा टकराव हुआ तब के मुख्य चुनाव आयुक्त RVS पेरी शास्त्री से। 

1 जनवरी 1986 को मुख्य चुनाव आयुक्त बने शास्त्री चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को लेकर काफ़ी गंभीर थे। राजीव गाँधी ने इसी कड़ी में साल 1987 में चुनाव आयोग पर दबाव बनाना शुरू किया। ये दबाव था हरियाणा विधानसभा और राष्ट्रपति चुनावों को लेकर। राजीव गाँधी चाहते थे कि हरियाणा विधानसभा के चुनाव राष्ट्रपति चुनाव से पहले ना हों। 

यानी वो हरियाणा विधानसभा चुनाव टालना चाहते थे। ऐसा इसलिए था क्योंकि तब हरियाणा में कांग्रेस की सरकार थी और भजनलाल मुख्यमंत्री थे, राष्ट्रपति चुनाव में विधायकों के भी वोट डलते हैं और अगर नए चुनाव हो जाते और कांग्रेस हार जाती तो शायद उनकी पोजिशन इसको लेकर कमजोर हो जाती। 

लेकिन RVS शास्त्री ने ये मानने से मना कर दिया। देश भर में राजीव गांधी के खिलाफ माहौल बन चुका था और शास्त्री ने तय समय पर यानी जून 1987 में ही हरियाणा में विधानसभा चुनाव करवाए और कांग्रेस की तगड़ी हार हुई। लोकदल-भाजपा गठबंधन यहाँ भारी मतों से जीत कर सत्ता में पहुँचा और ताऊ देवीलाल सीएम बने। 

इसके बाद RVS शास्त्री ने प्रेसिडेंशियल इलेक्शन भी तय समय पर यानी जुलाई 1987 में करवाए और इसमें कांग्रेस कैंडिडिएट R वेंकटरामन जीते। लेकिन CEC शास्त्री का दबाव में ना आना राजीव गांधी को पसंद नहीं आया और वो राजीव गांधी की आँखों में चढ़ गए! 

लेकिन ये शास्त्री और राजीव गांधी की आख़िरी लड़ाई नहीं थी। बल्कि इसके बाद कहानी और खराब हुई। साल 1988 में फरीदाबाद लोकसभा में उपचुनाव हुआ और कांग्रेस ने कहा कि यहाँ भयानक गड़बड़ी हुई और हिंसा भी हुई है। कांग्रेस ने शास्त्री से कहा कि लोकसभा में पूरा उपचुनाव दोबारा से करवाया जाए। 

शास्त्री ने इस माँग को ठुकरा दिया और उन 161 बूथों पर ही रिपोल करवाया जो हिंसा प्रभावित थे। ये दूसरा मौक़ा था जब राजीव गांधी और शास्त्री आमने सामने थे। इसके बाद असम में वोटर लिस्ट को लेकर भी तल्खी हुई। 

कहा गया कि शास्त्री असम गण परिषद का पक्ष ले रही है। बाद में AGP ने ये चुनाव भी जीत लिया। अब तक लड़ाई खुले में आ चुकी थी और शास्त्री पर रिजाइन करने तक का प्रेशर था। जब कोई रास्ता नहीं मिला तो  राजीव गाँधी ने शास्त्री को कट टू साइज करने का फैसला ले लिया। 

और ये हुआ अक्तूबर 1989 में।  9 अक्तूबर  1989 को देश के राष्ट्रपति ने एक नोटिफिकेशन जारी किया। नोटिफिकेशन ने पिछले लगभग 4 दशक से चली आ रही चुनाव आयोग की व्यवस्था को बदल दिया। सरकार ने अब चुनाव आयोग में शास्त्री के साथ 2 और लोगों को अपॉइंट कर दिया। 

इस बदलाव का किसी को अंदाजा नहीं था। ये नोटिफिकेशन सीधे तौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त की ताकतों को बाँटने का जुगाड़ थी। इसके बाद राजीव गाँधी सरकार ने तुरंत ही दो और इलेक्शन कमिश्नर SS धनोआ और वीएस सहगल को अपॉइंट कर दिया, ये नियुक्ति 16 अक्तूबर 1989 को हुई थी। 

SS धनोआ ने ख़ुद इस बदलाव के बारे में लिखा है। उन्होंने बताया है कि राजीव गाँधी ने पहले ही उन्हें इस बात के लिए राजी कर लिया था कि उन्हें सरकार में कोई पोजिशन दी जाएगी। यानी राजीव गांधी पहले ही बदलाव के लिए मन बना चुके थे और शास्त्री की ताक़त कम करना चाहते थे। 

धनोआ ने बताया है कि जब 16 अक्तूबर 1989 को वो शास्त्री के पास पहुँचे तो यहाँ पहले ही माहौल काफ़ी ख़राब था। शास्त्री के पास राजीव गांधी के कानून मामलों के सचिव आए हुए थे और उन पर ये दबाव बना रहे थे कि वो एडिशनल चुनाव आयुक्त नियुक्त करने का फैसला मान लें। 

हालांकि शास्त्री एकदम गुस्सा थे और कह रहे थे कि वो प्रधानमंत्री की ये हरकत बर्दाश्त नहीं करेंगे। इन फैक्ट धनोआ ने तो ये भी लिखा है कि शास्त्री क्या उन्हें ही अपनी इस अपॉइंटमेंट के बारे में उस दिन तक नहीं बताया गया था, उनकी कोई सलाह भी नहीं ली गई थी। 

यानी राजीव गांधी ने चुनाव आयोग के पर कतरने के लिए बिना मुख्य चुनाव आयुक्त को बताए ही नियुक्तियाँ कर दी थीं और वो लोग नियुक्त किए थे जो वो पहले से जानते थे। अब चूंकि चुनाव आयोग 1 की जगह तीन सदस्यीय हो चुका था तो सारे निर्णय भी बहुमत से होने थे। 

यानी राजीव गांधी ने अपनी मनमर्जी के लिए चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को ख़त्म कर दिया था। लेकिन ये लोकतंत्र पर राजीव गांधी सरकार का आख़िरी हमला था, ऐसा बिल्कुल मत सोचिएगा। अपने मनमर्जी के आयुक्त चुनाव आयोग में बिठाने के बाद तुरंत राजीव गाँधी ने अपना एजेंडा इम्प्लीमेंट कर दिया। 

राजीव गांधी ने 17 अक्तूबर को ख़ुद ही अगले आम चुनाव की डेट अनाउंस कर दी, जो काम चुनाव आयोग का था, वो अब प्रधानमंत्री कर रहे थे। और जो डेट भी अनाउंस की गई वो सिर्फ़ एक महीने की थी, यानी विपक्षी पार्टियों को तैयारी करने की भी सहूलियत ना मिले। 

इन सब बातों को लेकर लगातार शास्त्री और राजीव गाँधी में तनातनी होती रही। CEC शास्त्री ने हालाँकि शांत दिमाग़ से काम लिया और चुनाव उसी तारीख़ में करवाए जो पीएम ने अनाउंस किए थे, अगर ऐसा नहीं होता तो देश संकट में फँस जाता।

लेकिन इस पूरी कहानी ने दिखा दिया था कि अपनी एब्सोल्यूट मेजॉरिटी में चूर राजीव गाँधी अपनी पार्टी को फ़ायदा पहुँचाने के लिए किसी भी हद तक तैयार थे और देश संवैधानिक संस्थाओं को भी अपने हिसाब से तोड़ मरोड़ रहे थे। 

ज्यादा हँसी की बात ये है कि राजीव गांधी ख़ुद शुरुआत में चुनाव आयोग के बहु सदस्यीय होने के ख़िलाफ़ थे। 

एक साल पहले ही उन्होंने इस बात का संसद में विरोध किया था और साल भर बाद वो ये अनाउंस कर रहे थे कि सिर्फ़ एक चुनाव आयुक्त को बहुत ज़्यादा काम करना पड़ रहा है इसलिए 2 और लोगों की नियुक्ति जायज़ है। अब आपको समझना चाहिए कि तब तक मिस्टर क्लीन कहे जाने वाले गांधी की छवि बोफोर्स घोटाले के चलते धूमिल हो चुकी थी।

राजा नहीं फ़क़ीर है, देश की तक़दीर है, कह कर देश भर में वीपी सिंह प्रचार कर रहे थे और उन्होंने ही बोफोर्स को लेकर राजीव गांधी को निशाने पर ले रखा था। लेकिन यहाँ भी हार के डर से राजीव गांधी ने जनता दल को चुनाव चिह्न देने में रोड़े अटकाने शुरू किए। हालाँकि शास्त्री ने किसी तरह मसला सुलझा लिया। 

ये सब हरकतों के बावजूद भी राजीव गांधी चुनाव हार गए। उनके चुनाव हारते ही चुनाव आयोग की इस व्यवस्था पर भी नई वीपी सिंह की सरकार ने रोक लगा दी। 1990 में वापस से चुनाव आयोग को तीन की जगह एक ही सदस्यीय कर दिया गया। 

SS धनोआ इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चले गए लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने वीपी सिंह सरकार के फैसले को सही माना। इस तरह से वापस चुनाव आयोग अपने मूल स्वरूप में लौटा। चुनाव आयोग में कमिशनर्स का नंबर बढ़ाना इश्यू नहीं है, लेकिन ये काम किस नीयत से हो रहा है, वो जरूरी है। 

लेकिन कांग्रेस इस मौके पर मुँह की खाके भी बाज नहीं आई। बल्कि उसने 1991 में सत्ता में दोबारा आने के बाद वापस यही हरकत की। 1993 तक टीएन शेषन देश के CEC बन चुके थे और वो कांग्रेस को अपनी मनमर्जी नहीं करने दे रहे थे। कांग्रेस ने अपनी 4 साल पुरानी प्लेबुक वापस से दोहराई। 

उसने 1993 में शेषन के साथ ही दो और लोगों की नियुक्ति चुनाव आयोग में करके इसे वापस से मल्टी मेंबर बॉडी बना दिया। इस नियुक्ति में एक नाम मनोहर सिंह गिल का भी था जो बाद में UPA की सरकार में मंत्री बने। जाहिर है, इन नियुक्तियों के ख़िलाफ़ टीएन शेषन सुप्रीम कोर्ट चले गए। 

1995 में सुप्रीम कोर्ट की एक पाँच सदस्यीय बेंच ने सरकार का फैसला सही माना और तब से ही तीन आयुक्तों की व्यवस्था परमानेंटली लागू हुई। लेकिन इस पूरी टाइमलाइन से आपको ये जरूर क्लियर हो गया होगा कि कांग्रेस को चुनाव आयोग की कितनी इज्जत है या फिर वो इसके फार्मेशन को लेकर कितनी गंभीर है। 

आज इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट पर हंगामा हो रहा है कि तीन चुनाव आयुक्त आपस में सहमत नहीं थे। लेकिन कांग्रेस ने इसे मल्टी मेंबर बनाया ही इसलिए था कि वो अपने फैसले बहुमत से करवा ले। ऐसे में अच्छा होगा कि लोग थोड़ा पुराने समय की तरफ़ भी देखें और आज के लिए हल्ला मचाना थोड़ा कम करें। अगर किसी को समस्या है तो वो सुप्रीम कोर्ट का रास्ता अख्तियार कर सकता है। 

खून वही, बस नैरेटिव बदल गया: प्राचीन बलि से ईसाई संस्कार तक, इतिहास ने ये फर्क कैसे बनाया?

इतिहास की किताबें अक्सर एक तरफा कहानी सुनाती हैं। पश्चिमी इतिहासकारों और धर्मशास्त्रियों ने सदियों से दुनिया के अतीत को एक खास फ्रेम में फिट किया। एक तरफ प्राचीन और स्वदेशी सभ्यताएँ- एज़टेक, अफ्रीकी जनजातियाँ, भारतीय परंपराएँ, जिन्हें बर्बर, हिंसक और खून-खराबे में डूबी बताया गया। दूसरी तरफ ईसाई धर्म, जिसे सार्वभौमिक नैतिकता, मानवाधिकार और आध्यात्मिक ऊँचाई की शुरुआत माना गया।

यानी तस्वीर कुछ ऐसी बनाई गई कि पुराने जमाने के देवताओं को ब्रह्मांड का संतुलन बनाए रखने के लिए इंसानी शरीर और खून चाहिए था। इसके उलट ईसाई धर्म ने इस तरह की शारीरिक हिंसा से ऊपर उठकर ईश्वर के प्रेम को एक विशुद्ध आध्यात्मिक रूप दिया।

लेकिन अगर इस कहानी को थोड़ा करीब से देखें, खासकर गैर-पश्चिमी या उपनिवेशवाद के बाद वाले नजरिए से, तो एक दिलचस्प विरोधाभास सामने आता है। ईसाई धर्म की सभ्य और परिष्कृत दिखने वाली परंपरा के केंद्र में भी एक ऐसा अनुष्ठान मौजूद है जिसमें ईश्वर के शरीर को ग्रहण करने की अवधारणा शामिल है। ‘Eucharist’ रोटी और वाइन को मसीह के शरीर और रक्त से जोड़ने वाला प्रमुख संस्कार। यानी जिस शारीरिक धार्मिक परंपरा को ईसाई धर्म ने प्राचीन दुनिया में बर्बरता का प्रतीक बताया, उसका एक बदला हुआ रूप खुद उसके धार्मिक जीवन के केंद्र में बैठा है।

The Last Supper

बात यहीं खत्म नहीं होती। ईसाई परंपरा खुद कहती है कि यह अनुष्ठान आकाश से नहीं टपका। इसकी जड़ Last Supper में है। सूली से एक रात पहले यीशु ने शिष्यों के साथ आखिरी भोजन किया। रोटी तोड़ी और कहा, कि ‘यह मेरा शरीर है’। फिर प्याला उठाया और कहा, ‘यह मेरा रक्त है’। बाद की सदियों में यही दृश्य चर्च का सबसे बड़ा संस्कार बन गया- Eucharist। यानी जिस धर्म ने पुरानी दुनिया की बलि और खून वाली रीतों को बर्बर बताया, उसके सबसे पवित्र क्षण की भाषा भी शरीर और रक्त से ही शुरू होती है। फर्क इतना है कि अब खून वेदी पर नहीं बहता, प्याले में प्रतीक बनकर आता है। लेकिन शब्द वही हैं। कल्पना वही है। शरीर को ग्रहण करने की बात वही है। इसलिए यह सिर्फ एक धार्मिक रस्म नहीं, सभ्यता के उस दावे पर सवाल है जिसमें एक रीत को जंगली कहा गया और उसी भाषा के दूसरे रूप को सभ्यता का शिखर मान लिया गया।

भूल जाने की सुविधा

पुरानी सभ्यताओं को ‘बर्बर’ और ‘सभ्य’ के पैमाने पर तौलने की प्रक्रिया को समझने के लिए पहले यह देखना होगा कि ‘सभ्य’ होने की परिभाषा बनी कैसे। जब शुरुआती आधुनिक दौर में यूरोपीय खोजकर्ता और मिशनरी अमेरिका, अफ्रीका और दूसरी स्वदेशी सभ्यताओं तक पहुँचे, तो ‘बर्बरता’ का विचार सिर्फ वर्णन नहीं था। उसका इस्तेमाल साम्राज्यवादी शासन और दूसरे समाजों पर कब्जे को जायज ठहराने के लिए भी किया गया। 

एज़टेक सभ्यता में इंसानी दिल निकालने जैसी प्रथाओं या पूर्वजों से जुड़े जटिल अंतिम संस्कारों को उनके नैतिक पतन का सबूत बनाया गया। इन परंपराओं की आलोचना हमेशा निष्पक्ष नजरिए से नहीं हुई। ध्यान खास तौर पर उन चीजों पर गया जो देखने में सबसे भयावह थीं खून, शरीर और मांस का इस्तेमाल।

इसके पीछे एक धारणा काम कर रही थी जिसे शायद ही कभी सवालों के घेरे में रखा गया, अगर कोई सभ्यता सचमुच विकसित है, तो उसे शरीर और भौतिक दुनिया से जुड़ी इन पुरानी प्रथाओं से ऊपर उठकर विचार और आध्यात्मिकता की किसी ऊँची दुनिया तक पहुँचना चाहिए।

लेकिन इस नैतिक श्रेष्ठता की कहानी में इतिहास का एक बड़ा हिस्सा गायब हो जाता है। क्रूसेड, इंक्विजिशन और अलग-अलग धार्मिक तथा सांस्कृतिक परंपराओं को दबाने के लिए ईसाई साम्राज्यों द्वारा इस्तेमाल की गई संस्थागत हिंसा अक्सर इस तस्वीर में पीछे छूट जाती है।

और इससे भी ज्यादा असहज करने वाली बात यह है कि ईसाई धर्म ने खून और शरीर से जुड़ी इस पुरानी धार्मिक भाषा को खत्म नहीं किया। उसने उसे अपने भीतर समाहित कर लिया और उसे अपने धार्मिक अनुष्ठानों का हिस्सा बना दिया।

रोटी अब सिर्फ रोटी नहीं रही, वाइन सिर्फ पेय नहीं रहा। लेकिन प्रतीक भी उसी पुरानी भाषा से निकले हैं, जिसे कभी दूसरों पर बर्बरता का आरोप लगाने के लिए इस्तेमाल किया गया। सभ्यता की कहानी अक्सर इतनी साफ नहीं होती, जितनी हमें पढ़ाई जाती है। कभी-कभी जिसे हम दूसरों में जंगलीपन कहते हैं, वही चीज हमारे अपने केंद्र में थोड़े बदले हुए कपड़ों में बैठी मिलती है।