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गगनयान से पहले ISRO में ‘ब्रेन ड्रेन’… 100+ वैज्ञानिक छोड़ चुके नौकरी, सरकार को बदलने पड़े इस्तीफे के नियम: भारत के स्पेस मिशनों पर संकट तो नहीं आएगा?

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) इस समय एक अभूतपूर्व मानव संसाधन संकट से जूझ रहा है। देश के इस प्रतिष्ठित अंतरिक्ष संस्थान से हाल के महीनों में कई वरिष्ठ और अनुभवी वैज्ञानिकों ने अचानक इस्तीफे दिए हैं या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) ले ली है।

इस बड़े पलायन को रोकने और देश के महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष मिशनों को समय पर पूरा करने के लिए भारत सरकार के अंतरिक्ष विभाग (DoS) ने एक बेहद सख्त कदम उठाया है।

अंतरिक्ष विभाग ने इसरो के प्रमुख केंद्रों को एक नया आंतरिक निर्देश जारी किया है, जिसके तहत अब ‘गगनयान’ जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स से जुड़े वैज्ञानिकों के इस्तीफे या VRS को सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत आसानी से स्वीकार नहीं किया जाएगा।

नया सरकारी निर्देश: अब आसानी से नहीं मिलेगा इस्तीफा

अंतरिक्ष विभाग (DoS) द्वारा 14 जुलाई को जारी किए गए आधिकारिक ज्ञापन के अनुसार, गगनयान और अन्य राष्ट्रीय महत्व के मिशनों से जुड़े ग्रुप A के वैज्ञानिक और तकनीकी कर्मियों के इस्तीफे और VRS के अनुरोधों को अब रूटीन तरीके से स्वीकार नहीं किया जाएगा।

इस नए आदेश के जरिए सरकार ने साल 2020 में किए गए एक बड़े प्रशासनिक बदलाव को पलट दिया है। पहले के नियमों के अनुसार, इसरो के विभिन्न केंद्रों के निदेशकों को यह अधिकार दिया गया था कि वे ‘साइंटिस्ट/इंजीनियर-SG’ स्तर तक के ग्रुप A कर्मचारियों के इस्तीफे और स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति को अपने स्तर पर ही मंजूरी दे सकते थे।

अब इस व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया गया है और केंद्र निदेशकों से यह शक्ति वापस ले ली गई है। नए नियमों के तहत किसी भी वैज्ञानिक का इस्तीफा या VRS का आवेदन सीधे अंतरिक्ष विभाग (DoS) को भेजा जाएगा, जिसके साथ संबंधित केंद्र के निदेशक को अपनी स्पष्ट सिफारिश भी लिखकर भेजनी होगी और इस पर अंतिम निर्णय केवल अंतरिक्ष विभाग के स्तर पर ही लिया जाएगा। इस फैसले का मुख्य उद्देश्य महत्वपूर्ण मिशनों की निरंतरता को बनाए रखना और अनुभवी प्रतिभाओं को अचानक संगठन छोड़ने से रोकना है।

कौन-कौन से प्रमुख केंद्र और वैज्ञानिक हुए प्रभावित?

हाल के महीनों में इसरो के कई महत्वपूर्ण केंद्रों से करीब 100 से 120 वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने अपनी नौकरी छोड़ी है। इस पलायन से सबसे ज्यादा प्रभावित बेंगलुरु स्थित यू आर राव सैटेलाइट सेंटर (URSC) हुआ है।

जहाँ से सबसे अधिक लगभग 80 वैज्ञानिकों ने इस्तीफा दिया है और इनमें ‘स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट’ (SpaDeX) के प्रोजेक्ट डायरेक्टर जैसे बेहद महत्वपूर्ण पदों पर तैनात वैज्ञानिक भी शामिल हैं।

इसके साथ ही तिरुवनंतपुरम के विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (VSSC) से भी लगभग 20 वैज्ञानिकों के जाने की खबर है, जिसमें सबसे बड़ा झटका तब लगा जब वरिष्ठ वैज्ञानिक विक्टर जोसेफ टी ने फरवरी में इस्तीफा दे दिया, जो गगनयान मिशन के लिए इस्तेमाल होने वाले ‘जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (LVM3)’ प्रोजेक्ट के डायरेक्टर के रूप में काम कर रहे थे।

इन दोनों प्रमुख केंद्रों के अलावा सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SDSC), लिक्विड प्रोपल्शन सिस्टम्स सेंटर (LPSC), स्पेस एप्लीकेशन सेंटर (SAC), नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC), इसरो टेलीमेट्री, ट्रैकिंग एंड कमांड नेटवर्क (ISTRAC) और मास्टर कंट्रोल फैसिलिटी (MCF) को भी यह कड़ा निर्देश भेजा गया है क्योंकि इन केंद्रों में भी इस्तीफों का असर देखा गया है।

आखिर क्यों इसरो छोड़ रहे हैं वैज्ञानिक?

हालाँकि अंतरिक्ष विभाग या इसरो ने आधिकारिक तौर पर वैज्ञानिकों के इस तरह सामूहिक रूप से जाने का कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया है, लेकिन इसके पीछे के मुख्य कारणों को भारत के तेजी से बढ़ते निजी अंतरिक्ष क्षेत्र से जोड़कर देखा जा रहा है।

भारत सरकार ने साल 2020 में अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोल दिया था और 2023 में ‘इंडियन स्पेस पॉलिसी’ लॉन्च की थी। इसके बाद से देश में अंतरिक्ष स्टार्टअप्स की बाढ़ आ गई है।

वर्तमान में भारत में 400 से अधिक पंजीकृत स्पेस स्टार्टअप्स सक्रिय हैं, जिन्होंने कुल 500 मिलियन डॉलर का भारी-भरकम निवेश आकर्षित किया है, जिसमें से लगभग 150 मिलियन डॉलर का निवेश अकेले साल 2025 में आया है।

पिक्ससेल, ध्रुव स्पेस, स्काईरूट एयरोस्पेस, अग्निकुल कॉस्मॉस और बेलाट्रिक्स एयरोस्पेस जैसी निजी कंपनियाँ इसरो के अनुभवी वैज्ञानिकों को बेहद आकर्षक वेतन पैकेज, बेहतर पद और काम करने की अधिक स्वतंत्रता की पेशकश कर रही हैं, जो वैज्ञानिकों को अपनी ओर खींच रही हैं।

संगठनात्मक चुनौतियाँ

विशेषज्ञों और पूर्व इसरो अधिकारियों का मानना है कि केवल प्रशासनिक कड़ाई या जबरन रोकने से इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। इसके लिए इसरो के भीतर करियर ग्रोथ, नेतृत्व के अवसर, काम के माहौल और वैज्ञानिकों की प्रेरणा जैसे बुनियादी मुद्दों पर ध्यान देना होगा।

गौरतलब है कि साल 2017 में सामने आई एक RTI रिपोर्ट से खुलासा हुआ था कि 5 वर्षों के भीतर करीब 300 वैज्ञानिक इसरो छोड़ चुके थे, जो यह दर्शाता है कि यह समस्या पुरानी है।

इसरो के हालिया झटके और आगामी चुनौतियाँ

यह मानव संसाधन संकट ऐसे समय में आया है जब इसरो को तकनीकी मोर्चे पर भी कुछ झटकों का सामना करना पड़ा है। इसरो के सबसे भरोसेमंद रॉकेट PSLV को पिछले एक साल में लगातार दो असफलताओं का सामना करना पड़ा है।

इनमें पहली विफलता जनवरी में PSLV-C62 के दौरान हुई, जब EOS-N1 अर्थ-ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट और वाणिज्यिक पेलोड ले जा रहा यह रॉकेट तीसरे चरण के अंत में आई गड़बड़ी के कारण अपने तय पथ से भटक गया था।

इससे पहले पिछले साल मई में PSLV-C61 मिशन भी विफल रहा था, जिसमें RISAT-1B (EOS-09) उपग्रह को ले जा रहा रॉकेट तीसरे चरण में अचानक दबाव कम होने के कारण अपनी कक्षा तक नहीं पहुँच सका और मिशन को नष्ट करना पड़ा था।

इन चुनौतियों के बावजूद इसरो आने वाले समय में देश के सबसे बड़े और ऐतिहासिक अंतरिक्ष मिशनों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। इसमें गगनयान मिशन शामिल है, जिसका लक्ष्य भारत को अंतरिक्ष में इंसान भेजने वाला दुनिया का चौथा देश बनाना है।

इसके अलावा चंद्रमा से मिट्टी और पत्थरों के नमूने वापस लाने के लिए चंद्रयान-4, भारत का अपना अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने के लिए भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (BAS), और मंगल ग्रह के लिए भारत का दूसरा खोजी मिशन मंगलयान-2 जैसे बेहद महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है।

इसरो प्रमुख और सरकार का रुख

इस सामूहिक इस्तीफे की खबरों पर चिंता को कम करते हुए इसरो के चेयरमैन वी नारायणन ने एक बयान में कहा, “हाँ, कई लोग संगठन छोड़ते हैं, लेकिन यह हर संस्थान का हिस्सा है।

सरकार के इस नए कदम का उद्देश्य केवल लोगों को रोकना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि देश के महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स पर अचानक कोई बुरा असर न पड़े। अगर कोई व्यक्ति जाता भी है, तो उसकी जगह कोई और जिम्मेदारी संभालेगा। हम इस स्थिति को पूरी तरह संभाल रहे हैं।”

वैज्ञानिकों की कमी को दूर करने के लिए सरकार ने इसरो के कार्यबल वर्क्फोर्स को मजबूत करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। अधिकारियों के अनुसार, एक कैडर रिव्यू को मंजूरी दे दी गई है और वर्तमान में संगठन में विभिन्न पदों पर लगभग 1050 रिक्तियों को भरने के लिए भर्ती प्रक्रिया तेजी से चल रही है।

अब देखना यह होगा कि सरकार के इन कड़े प्रशासनिक नियमों से वैज्ञानिकों के पलायन पर रोक लगती है या फिर इसरो को अपने टैलेंट को रोकने के लिए अपनी आंतरिक नीतियों में कुछ और बदलाव करने होंगे।

इंग्लैंड का सपना टूटा, अर्जेंटीना का जुनून जीता: जानिए मेस्सी के दो असिस्ट और 7 मिनट में पलटे मैच की पूरी कहानी

प्यारे लियो,

आज से सालों पहले जब तुम्हें बार्सिलोना की, तीस नंबरी, गहरी मरून व नीली धारियों वाली फुल बाजू की जर्सी पहने खेलते हुए देखना शुरू किया था तो पहली दफा यकीन हुआ था कि हां, सचमुच में जादू होता है।

तुम्हारा हर एक टैकल, हर एक गोल मुझे आज भी हूबहू याद है।

एक ही सीजन में छह खिताब।

तुमने क्या कुछ नहीं जीता था बार्सिलोना के साथ।

तुम जब जब भी मैदान में उतरते, विपक्षी कोच व खिलाड़ी कांपने लगते और स्टेडियम में मौजूद दर्शक खुशी से झूमने लगते। तुम खुशियों का पर्यायवाची शब्द ही तो हो गए थे। तुम जब भी खेलने मैदान पर उतरते, सब अपने अपने काम छोड़ बस तुम्हें ही खेलते हुए देखते रहते। जाने वो कैसा जादू था तुम्हारे खेल में। तुम्हें खेलते हुए देख कर हम, कुछ पलों के लिए ही सही, अपने तमाम दुख-दर्द भूल जाते थे।

लेकिन फिर, वो जर्मनी के खिलाफ 2014 विश्व कप के फाइनल में मिली हार। पूरे टूर्नामेंट में अकेले ही तुमने टीम की ज़िम्मेदारियों का बोझ ढोया था।

कितना नैराश्य, कितना दुख छा गया था उस एक हार के पश्चात।

लेकिन, अभी तो तुम्हें और भी तोड़ा जाना बाकी था। लगातार अर्जेंटीनी जर्सी पहने कोपा अमेरिका का कप हारते चले जाना। और, बार्सिलोना का वह काला अतीत। रोमा और ऐन्फील्ड की वो उदास रातें। एक ऐसा शख्स जो सब जीत चुका था, उससे सबकुछ छिनता चला जा रहा था।

तुम्हारी नैनों में अश्रु थे। लेकिन संपूर्ण जगत तुम पर हंसने लगा था। शायद यह कुछ ऐसा था कि खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे।

मगर, कहते हैं ना कि हर रात के बाद सूर्य तो उदित होता ही है। सूर्य को उदित होना ही था।

पहले लगातार कोपा अमेरिका की जीतें।

और फिर, कतर विश्व कप का वह फाइनल मुकाबला। फ्रांस बनाम अर्जेंटीना।

आखिरकार, ऊपर बैठे फुटबॉल के खुदा ने जैसे, उस रात, अपनी सबसे बेहतरीन अधूरी कविता पूरी कर ली हो।

तुम विश्व विजेता बन गए थे लियो। तुमने जग जीत लिया था।

अब इससे आगे भला क्या ही होता।

मगर नहीं, बीती रात, तुमने अर्जेंटीना को एकबार फिर विश्व कप के फाइनल में पहुंचा दिया है।

आज भी, अकेले ही तुम खेल को नियंत्रित करते हो।

जब जब गेंद तुम्हारे कदमों को चूमती है, तो मानो कुछ जादुई घटित हो रहा होता है। लोग सब कामकाज छोड़कर बस तुम्हें खेलते हुए देखते रहते हैं।

कुछ भी तो नहीं बदला।

लेकिन, एक रोज ऐसा भी होगा कि वाकई तुम इस खेल को अलविदा कह दोगे। तब, सालों पहले, जो नैराश्य तुमने देखा था, वही कुछ हमारे दिलों पर बीतेगी। तुम जिस दिन मैदान छोड़ोगे, उस रोज़ करोड़ों दिलों को धक्का सा लगेगा। हम सभी हताश हो जाएंगे।

मगर, उससे पहले एक बात है जो तुमसे कहनी है लियो।

शुक्रिया, इस खेल को चुनने के लिए। गोल स्कोर करने वाले कई खिलाड़ी आगे भी आएंगे, मगर, फिर कभी कोई दूसरा लियोनेल आंद्रेस मेस्सी नहीं आएगा। तुम्हारे जाने के साथ तमाम रोशनियां धूमिल हो उठेंगी।

तुमने हमें खुशियां दी।

तुमने हमें सिखलाया – अंतिम क्षणों तक लड़ना।

तुम थे तो इस खेल में जादू था। तुम चले जाओगे तो शायद तुम्हारे साथ इस खेल का जादू भी चला जाएगा।

शुक्रिया लियो, हमारी आम ज़िंदगियों में जादू भरने के लिए।

बीती रात, अर्जेंटीना ने फीफा विश्व कप के दूसरे सेमीफाइनल मुकाबले में इंग्लैंड को 2-1 से हरा कर फाइनल में जगह बना ली। खबर बस इतनी सी है। मगर, इस एक जीत पर, आप एक पूरी थीसीस लिख सकते हैं।

कल रात हम सभी खेलप्रेमियों ने कुछ जादुई घटित होता देखा।

बीती रात, साढ़े बारह बजे से, अटलांटा स्टेडियम में फीफा विश्व कप का दूसरा सेमीफाइनल मुकाबला खेला जाना था। एक तरफ थी अर्जेंटीना, जो स्विट्जरलैंड को हराकर यहां पहुंची थी। वहीं दूसरी ओर थी, बेहतरीन फॉर्म में चल रही इंग्लैंड। अर्जेंटीना इस विश्व कप में अपना नैसर्गिक खेल खेलती नजर नहीं आई है। मगर, फिर भी, हमेशा अंत तक लड़ने का हौसला लिए वो यहां तक पहुंच चुकी थी। ‘थ्री लायन्स’ एक संतुलित टीम लेकर इस टूर्नामेंट में उतरे थे। निश्चित ही यह एक जोरदार मुकाबला रहने वाला था।

मैच से पूर्व इंग्लिश लीजेंड जो कोल ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा था,” मेस्सी पहली दफा इंग्लैंड से टकराने जा रहा है। हम उसे चिर निद्रा में सुला देंगे। निश्चित ही, हम उसे चिर निद्रा में सुला देंगे। सौ प्रतिशत।”

ट्रॉए डीनी ने कहा था,” हम उन्हें धो डालेंगे। हम बेहद आराम से कम से कम 2-0 से यह मैच जीत जाएंगे।”

इंग्लिश खिलाड़ी अपने जीवन का सबसे बड़ा मैच खेलने जा रहे थे। वो 2018 विश्व कप में भी सेमीफाइनल में थे जहां उन्हें क्रोएशियाई टीम से 2-1 से हार कर बाहर होना पड़ा था। वो, आज, एक नया इतिहास लिखना चाहते थे। अर्जेंटीना, पिछली दफा भी, इस चरण से गुजर चुकी थी। मगर, इतने बड़े मौके पर एक अलग ही दबाव होता है।

माहौल बन चुका था। मंच सज गया था।

अल्बीसेलेस्त के कोच लियोनेल स्कालोनी ने आज एक परिवर्तन करते हुए 4-1-3-2 के बजाए 4-4-2 की फॉर्मेशन में अपनी टीम को मैदान में उतारा था। फॉरवर्ड लाइन में इस बड़े मुकाबले में एक बार फिर लियोनेल मेस्सी का साथ देने के लिए हूलियन अल्वारेज़ खड़े थे। उनके पीछे लिआन्द्रो पारेदेस़, एंजो फर्नाडेज़, एलेक्सिस मैकऐलिस्टर व गुईलियानो सिमिओनी की सेना थी। ख़राब फॉर्म से गुजर रहे रॉड्रिगो दी पॉल आज बेंच पर थे। रक्षापंक्ति में एकबार फिर मोलीना, रोमेरो, लीसान्द्रो मार्टीनेज़ व ताग्लियाफीको थे और गोलपोस्ट की रक्षा करने एमिलियानो मार्टिनेज खड़े थे।

गत विजेता अपने पिछले नॉकआउट मुकाबलों में विरोधियों के खिलाफ संघर्ष करते नजर आए थे। आज निश्चित ही उनपर जरूरत से ज्यादा दबाव था, यह साबित करने का कि आखिर क्यों वो पिछले संस्करण के विजेता हैं।

इंग्लैंड के लिए सेंट्रल फॉरवर्ड हेरी केन का साथ देने, उनके ठीक पीछे मॉर्गन रॉजर्स, ज्यूड बेलिंघम व एंथोनी गोर्डन की तेज रफ्तार वाली तिकड़ी थी। डिफेंसिव मिडफील्डर के तौर पर अनुभवी डेक्लन राइस का साथ युवा एलियट एंडरसन दे रहे थे। और, रक्षण की जिम्मेदारी थी जॉन स्टोन्स, मार्क गुएही, रीस जेम्स व जे़ड स्पेन्स के कंधों पर।

रेफरी इस्माइल ऐल्फात व्हिस्ल बजाते हैं। 4-3-2-1 की फॉर्मेशन के साथ मैदान में उतरी इंग्लिश टीम खेल के शुरुआती क्षणों से ही अटैक शुरू कर देती है। अर्जेंटीना भी जरूरी कार्रवाई कर रही थी। दोनों ही टीमें आक्रामक अंदाज में फुटबॉल खेल रही थीं। हांलांकि, खेल काफी फिजिकल हो गया था। लगातार दोनों ही ओर से काफी फाउल्स भी किए जा रहे थे।

मैच के पहले हाफ की समाप्ति पर स्कोर 0-0 से बराबरी पर था। दोनों ही टीमें गोल स्कोर करने में नाकाम रही थीं।

दूसरे हाफ का खेल शुरू होता है। पचपनवें मिनट में कप्तान हैरी केन अपने ही हाफ से एक लॉन्ग बॉल बांई फ्लैंक पर खड़े साथी खिलाड़ी की ओर बढ़ाते हैं। बांई छोर से एक शानदार क्रॉस अर्जेंटीनी गोलपोस्ट की ओर भेजा जाता है। चार से पांच अर्जेंटीनी डिफेंडर बॉक्स के भीतर मौजूद थे। मगर एंथोनी गोर्डन शानदार तरीके से गेंद को गोलपोस्ट के भीतर भेज देते हैं। देर से ही सही, मगर इंग्लैंड ने इस हाई वोल्टेज मुकाबले में आखिरकार बढ़त ले ली थी। स्टेडियम में मौजूद तमाम अर्जेंटीनी समर्थक अथाह दुख के सागर में डूबे चुके थे।

मैच आगे बढ़ता जाता है। पैंसठ मिनट का खेल हो चुका था। बढ़त अब भी इंग्लैंड के पास थी। उनका एक कदम फाइनल में था। कोच थॉमस टुकेल अपने अटैकिंग प्लेयर्स को एक एक कर बाहर बुलाने लगे थे। और, उनकी जगह तीन एक्स्ट्रा डिफेंडर मैदान में उतार दिए गए थे। थॉमस टुकेल अर्जेंटीना के खिलाफ लगभग आधा घंटा डिफेंसिव खेल खेलते हुए 1-0 की बढ़त को बनाए रखना चाहते थे।

लेकिन, उनका यह फैसला अर्जेंटीना को अटैक करने की आजादी दे देता है। कोच लियोनेल स्कालोनी तुरंत नीको गोंजालेज को इंग्लिश डिफेंस को स्ट्रेच करने व लाउतारो मार्टिनेज को मैदान के सेंट्रल इलाके से खतरा पैदा करने उतार देते हैं। रॉड्रिगो डि पॉल भी अंदर आ चुके थे।

लियोनेल मेस्सी वापस मैदान के दाईं छोर पर आ गए थे। वह लगातार विपक्षी गोलपोस्ट की दिशा में क्रॉस डाले जा रहे थे। एक के बाद एक अर्जेंटीनी टीम ने कई हमले करने शुरू कर दिए थे। कभी ऐंजो फर्नानदेज़ बॉक्स के बाहर से किक लगाते कभी मैकएलिस्टर हेडर लगाते। जॉर्डन पिकफॉर्ड लगातार बेहतरीन बचाव किए जा रहे थे। उन्होंने इंग्लैंड को किसी तरह गेम में बनाए रखा था। अचानक ही अर्जेंटीना खतरनाक हमले करती दिख रही थी। इंग्लिश टीम बस रक्षण करती दिख रही थी।

इसका फायदा अल्बीसेलेस्त को मिलता है मैच के पिच्चासीवें मिनट में। कप्तान लियोनेल मेस्सी मैदान की दाईं ओर से ड्रिबल कर आगे बढ़ते हैं और ऐसा अहसास दिलाते हैं कि वह गेंद क्रॉस के जरिए इंग्लैंड के बॉक्स में भेजेंगे। मगर वह गेंद को बढ़ा देते हैं बॉक्स से काफी बाहर खड़े ऐंजो फर्नानदेज़ की दिशा में। ऐंजो फर्नानदेज़ इंग्लिश गोलपोस्ट से लगभग चालीस मीटर की दूरी से पोस्ट की ओर एक जोरदार रॉकेट दागते हैं। इस दफा, इस जानदार किक का, लगातार ही बेहद शानदार बचाव कर रहे जॉर्डन पिकफॉर्ड के पास कोई जवाब नहीं था। स्कोर बराबर हो चुके थे। अल्बीसेलेस्त समर्थकों की खुशी का ठिकाना नहीं था। सारा अटलांटा स्टेडियम उनकी चीख से गूंज उठा था।

नब्बे मिनट का खेल पूर्ण हो चला था। सात मिनट का इंजरी टाइम रेफरी द्वारा दिया गया था। ऐंजो फर्नानदेज़ के गोल के ठीक सात मिनट बाद मेस्सी एक बार फिर बहुत तेज गति से मैदान के दाईं छोर से गेंद लेकर आगे बढ़ते हैं। अपने आगे खड़े दो इंग्लिश खिलाड़ियों को चकमा देकर वह एक सटीक क्रॉस गोलपोस्ट की दिशा में डालते हैं। लाउतारो मार्टिनेज तेज गति से आगे बढ़ते हैं। वह जोरदार हेडर लगाते हैं। पिकफॉर्ड को एक दफा फिर हवा तक नहीं लगती। गेंद जाल में समा चुकी थी। अर्जेंटीना 2-1 से बढ़त ले चुकी थी।

किसी को भी यकीन नहीं हो रहा था कि यह क्या हो गया था। सात मिनट के भीतर दो गोल। लियोनेल मेस्सी के दो असिस्ट। यह वाकई कमाल हो गया था। इंग्लैंड के खिलाफ ऐसा कर पाना लगभग नामुमकिन था। मगर अर्जेंटीना ने आज नामुमकिन को मुमकिन कर दिया था। मैच 2-1 के स्कोर पर समाप्त हो जाता है।

आज अर्जेंटीनी टीम ने इंग्लैंड को हराकर एक दफा फिर विश्व कप के फाइनल में जगह बना ली थी। इस के लिए काफी हद तक इंग्लिश कोच थॉमस टुकेल की अति रक्षात्मक रणनीति भी जिम्मेदार थी। आप आधे घंटे तक अर्जेंटीना को गेंद नहीं सौंप सकते। यह एक हाराकिरी सरीखा था। एक आत्मघाती कदम जो सालों तक उन्हें रातों में सोने न देगा।

अर्जेंटीना के खिलाफ खेलने का पहला कायदा ही यही है कि आपको मेस्सी को आगबबूला नहीं करना है। ज्यूड बेलिंघम का फुटबॉल के सबसे बड़े खिलाड़ी से बद्तमीज़ी से पेश आना उन्हें भारी पड़ गया था। उनतालीस वर्षीय लियोनेल मेस्सी के दो असिस्ट ने सात मिनट के भीतर फाइनल में लगभग पहुंच ही चुकी इंग्लैंड को घर की राह दिखा दी थी। ज्यूड बेलिंघम को शायद समझ आ गया हो कि एक अच्छे और एक महान खिलाड़ी में क्या अंतर होता है।

इंग्लैंड, एकबार फिर, विश्व कप की ट्रॉफी के बेहद करीब आकर भी ट्राफी से बहुत दूर रह गई थी। इक्कीसवीं सदी में दो ही दफा ऐसा हुआ है कि किसी टीम ने सेमीफाइनल में पहला गोल दागते हुए भी फाइनल के लिए क्वालीफाई न किया हो। पहले, सन् 2018 में क्रोएशियाई टीम के खिलाफ इंग्लैंड और आज एक बार फिर इंग्लैंड ही। इंग्लिश खिलाड़ियों का दिल टूट चुका था। यह ऐसा जख्म था जो ताउम्र नहीं भरेगा।

अर्जेंटीना के खिलाड़ियों की आंखों में आंसू थे। एमिलियानो मार्तिनेज़ फफक-फफक कर रो रहे थे। मेस्सी की आंखों में अश्रु थे। जीत दिलाने वाला गोल दागने वाले लाउतारो मार्टिनेज की आंखों में नमी थी। वह रोते-रोते कह रहे थे,” बचपन में पहली बार जब मैंने फुटबॉल बूट्स पहने थे, तब से मैंने अपने राष्ट्र के लिए यह गोल लगाने का ख्वाब देखा है।” सब भावुक हो गए थे। स्टेडियम में मौजूद पचास हजार समर्थकों की आंखें भी नम थीं। अंत तक हार ना मानने का यकीन मन में लिए अर्जेंटीनी खिलाड़ियों ने फिर एक चमत्कार कर दिखाया था। अर्जेंटीना फिर फाइनल में जगह बना चुकी थी। तमाम खिलाड़ी आगे बढ़ कर अपने समर्थकों का अभिवादन स्वीकार कर रहे थे। सभी युवा खिलाड़ी अपने प्रेरणास्रोत, अपने आईडल लियोनेल मेस्सी को हवा में उछाल रहे थे। वह सभी बेहद खुश थे। यह बेहद भावुक करने वाला पल था।

अर्जेंटीना आज से ठीक दो दिन बाद स्पेन के खिलाफ न्यू जर्सी स्टेडियम में विश्व कप का फाइनल मुकाबला खेलने उतरेगी। स्पेन यूरोपीयन चैंपियन है तो अर्जेंटीना विश्व विजेता। यहां एक अप्रेंटिस का सामना अपने माएस्ट्रो से होगा। लामीन यमाल का सामना खुद भगवान से होगा। स्पेन का काव्यात्मक शैली का खेल अर्जेंटीनी दक्षिण अमेरिकी कठोर फुटबॉल से टकराएगा। जिस बार्सिलोना की जड़ों को लियोनेल मेस्सी ने अपनी मेहनत से सींचा उसके आठ खिलाड़ी स्पेन का हिस्सा हैं। यह फाइनल कहीं न कहीं ‘ला मासिया ‘ में पला पोसा है। यह टकराव ऐतिहासिक होगी।

इस मैच में हारे जीते कोई भी, जीत अंततः फुटबॉल की होगी।

यह मैच फुटबॉल जगत के सबसे ज्यादा जगमगाते सितारे का आखिरी मैच भी हो सकता है। हम खेत खलिहानों में बिना फुटबॉल बूट्स और बिना जर्सी पहने फुटबॉल खेलने वाले लड़कों ने वैश्विक मंच पर जिस जमात के खिलाड़ियों को खेलते देख इस खेल से इश्क किया था, उस जमात के अंतिम खिलाड़ी के संभवतः इस आखिरी मुकाबले को हमें तमाम मनमुटाव मिटा कर देखना चाहिए। हमें इस मैच को उनके एक अंतिम जश्न के तौर पर देखना चाहिए।

फाइनल मुकाबले से जुड़ी बातें आगे जारी रहेंगी। बने रहिएगा साथ।

अलविदा।

यूक्रेन: युद्ध के मोर्चे पर मौतें गिनते देश में संसद क्यों कर रही पोर्न पर चर्चा

रूस-यूक्रेन युद्ध को चलते-चलते 3 साल से ज्यादा हो चुके हैं। हर दिन मिसाइल हमले, मौत और तबाही की खबरें सामने आती हैं। इसी बीच यूक्रेन की संसद (वेरखोव्ना राडा) में एक ऐसे मुद्दे पर बहस और वोटिंग हुई जिसने दुनिया का ध्यान खींच लिया। मामला था कि क्या वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बनाई गई पोर्न को अपराध की श्रेणी से बाहर किया जाए? सुनने में यह मुद्दा चौंकाने वाला लग सकता है लेकिन इसके पीछे तर्क यह है कि मौजूदा कानून का इस्तेमाल कई बार पुलिस द्वारा लोगों को परेशान करने और भ्रष्टाचार के लिए किया जा रहा है।

संसद से ‘पहली रीडिंग’ के लिए पास हुआ बिल

वेरखोव्ना राडा ने मंगलवार (14 जुलाई 2026) को एक बिल को पहली रीडिंग में पास (ड्राफ्ट लॉ नंबर 15294) किया है। यह बिल एकसाथ दो काम करता है। पहले तो ये बच्चों से जुड़ी अश्लील सामग्री के लिए सजा और सख्त करता है, दूसरी तरफ वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बनी पोर्न सामग्री को अपराध की श्रेणी से बाहर कर देता है। यह प्रस्ताव 231 वोटों से पारित हुआ, 8 सांसदों ने इसका विरोध किया और 3 अनुपस्थित रहे।

‘पहली रीडिंग’ का मतलब क्या होता है?

यूक्रेनी संसदीय व्यवस्था में कोई भी बिल कानून बनने से पहले कई पड़ावों से गुजरता है। सबसे पहले उस पर पहली रीडिंग होती है, जिसमें सांसद यह तय करते हैं कि बिल का मूल प्रस्ताव आगे विचार करने लायक है या नहीं। इसका मतलब यह नहीं होता कि बिल कानून बन गया है। इस बिल के साथ भी ऐसा ही हुआ। पहली रीडिंग में इसे आगे बढ़ाने की मंजूरी मिली।

इसी दौरान अध्यक्ष रुसलान स्तेफानचुक ने सुझाव दिया कि दूसरी रीडिंग की प्रक्रिया जल्दी पूरी की जाए और इसकी समयसीमा आधी कर दी जाए। लेकिन इस प्रस्ताव के पक्ष में केवल 177 वोट पड़े, इसलिए यह मंजूर नहीं हो सका। अब बिल सामान्य प्रक्रिया के तहत दूसरी रीडिंग में जाएगा, जहाँ इसके हर प्रावधान पर अलग-अलग चर्चा और वोटिंग होगी। अगर वहाँ भी इसे मंजूरी मिलती है, तभी यह कानून बनने की दिशा में आगे बढ़ेगा।

कहानी शुरू कहाँ से हुई?

यह मुद्दा अचानक पैदा नहीं हुआ है। यूक्रेन में पोर्न बनाना और शेयर करना दशकों से क्रिमिनल कोड के आर्टिकल 301 के तहत अपराध रहा है। इसकी पहुँच इतनी व्यापक है कि निजी तौर पर किसी को भेजी गई अंतरंग तस्वीर तक इसके दायरे में आ जाती है। यूक्रेन में इसके लिए 3 से 5 साल की जेल हो सकती है। असली मोड़ 2025 में आया जब OnlyFans पर काम करने वाली मॉडल स्वित्लाना द्वोर्निकोवा ने एक ऑनलाइन याचिका शुरू की।

उनकी याचिका को 25,000 से ज्यादा हस्ताक्षर मिले और उनका तर्क था कि कानून-व्यवस्था को असली अपराधों पर ध्यान देना चाहिए। द्वोर्निकोवा ने बताया कि उन्होंने पिछले 5 सालों में करीब 9.6 लाख डॉलर टैक्स चुकाया है और फिर भी उन्हीं पर आपराधिक मुकदमा दर्ज कर दिया गया।

जब याचिका तय संख्या (25,000) तक पहुँची तो संविधान के तहत राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की को इस पर जवाब देना अनिवार्य हो गया। जेलेंस्की ने अपने जवाब में कहा कि यूक्रेन एक कानून के राज वाला देश है और यहाँ कानून में बदलाव करने का अधिकार सिर्फ संसद के पास है, राष्ट्रपति के पास नहीं। 2022 में भी एक ऐसी ही याचिका जरूरी हस्ताक्षर संख्या तक पहुँची थी लेकिन तब जेलेंस्की ने ‘सार्वजनिक नैतिकता की रक्षा’ वाले पुराने प्रावधानों का हवाला देकर बात टाल दी थी।

पहली कोशिश नाकाम रही

राष्ट्रपति के जवाब के बाद गेंद संसद के पाले में आ गई और वहाँ पहले से ही इसे लेकर एक बिल नंबर 12191 पड़ा हुआ था। लेकिन 28 मई 2026 को संसद ने इसे पहली रीडिंग में मंजूरी नहीं दी। इसे सिर्फ 207 वोट मिले जबकि पास होने के लिए 226 वोट चाहिए थे। यह बिल क्रिमिनल कोड के आर्टिकल 301 में संशोधन का प्रस्ताव करता था। कम वोटों के चलते यह गिर गया और यूक्रेन में पोर्न को लेकर पुराना कानून जस का तस बना रहा।

पुलिस के भीतर छिपे भ्रष्टाचार ने फिर खोली बिल की राह

पहला बिल गिरने से ठीक पहले, 20 मई 2026 को यूक्रेन की सुरक्षा सेवा (SBU) और देश के अभियोजक जनरल के दफ्तर ने इवानो-फ्रांकिवस्क, टेर्नोपिल और झिटोमिर तीन क्षेत्रों में पुलिस अफसरों द्वारा ‘पोर्न ऑफिसेज’ को संरक्षण देने की एक बड़ी योजना का पर्दाफाश किया। जाँच में सामने आया कि इन ‘पोर्न ऑफिसेज’ के मालिक पुलिस के वरिष्ठ अफसरों को हर महीने 20,000 डॉलर की रिश्वत देते थे ताकि पुलिस इंटरनेट प्लेटफॉर्म पर अश्लील सामग्री बनाने-शेयर करने के इन ठिकानों पर कोई कार्रवाई न करे।

इस मामले में गिरफ्तार होने वालों में इवानो-फ्रांकिवस्क के नेशनल पुलिस मुख्य निदेशालय का प्रमुख, उनका डिप्टी, टेर्नोपिल का डिप्टी हेड और झिटोमिर का डिप्टी हेड शामिल थे जबकि गृह मंत्रालय के एक उप-मंत्री का निजी ड्राइवर इस पूरे नेटवर्क में बिचौलिये की भूमिका निभा रहा था। तलाशी में लग्जरी गाड़ियाँ, स्विस घड़ियाँ, हथियार और लगभग 2.26 करोड़ रिव्निया नकदी बरामद की गई।

इस बिल के समर्थकों का कहना है कि मामला सिर्फ पोर्नोग्राफी का नहीं बल्कि भ्रष्टाचार और राष्ट्रीय सुरक्षा का भी है। उनका तर्क है कि जब कोई काम गैरकानूनी होता है, तो उससे जुड़े लोगों से कुछ भ्रष्ट पुलिसकर्मी रिश्वत वसूल सकते हैं। इससे पुलिस व्यवस्था में भ्रष्टाचार बढ़ता है और ऐसे अधिकारी खुद भी ब्लैकमेल का शिकार बन सकते हैं।

समर्थकों का कहना है कि अगर आपसी सहमति से वयस्कों के बीच बनाई गई पोर्नोग्राफी को कानूनी दायरे में लाया जाता है, तो पुलिस के पास रिश्वत वसूलने का यह जरिया खत्म हो जाएगा। क्योंकि जो काम कानून के तहत वैध होगा, उसके लिए किसी को पुलिस से ‘बचने’ के लिए घूस देने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इन्हीं दलीलों के साथ यह विधेयक एक बार फिर संसद में पेश किया गया, ताकि उस पर आगे की प्रक्रिया पूरी की जा सके।

दूसरी कोशिश में मिली सफलता

पहला बिल पास नहीं हो सका लेकिन इसके कुछ ही दिन बाद 3 जून 2026 को यूक्रेन की संसद में बिल नंबर 15294 पेश किया गया। इसे सांसद यारोस्लाव झेलेज्न्याक लेकर आए।

झेलेज्न्याक ने बताया कि पिछला बिल गिरने के बाद उन्होंने अलग-अलग राजनीतिक दलों और सांसदों से बातचीत की। इसके बाद ऐसा मसौदा तैयार किया गया, जिस पर ज्यादा से ज्यादा दलों की सहमति बन सके।

इस नए बिल को संसद में अच्छा समर्थन मिला। इस पर विभिन्न संसदीय दलों के नेताओं और संसदीय समितियों के अध्यक्षों समेत कुल 45 सांसदों ने हस्ताक्षर किए। इसी व्यापक समर्थन का नतीजा रहा कि 14 जुलाई को यह बिल संसद की पहली रीडिंग में मंजूर हो गया और अब आगे की प्रक्रिया के लिए बढ़ गया।

कानून बनने पर क्या बदलेगा

अगर यह बिल कानून बन जाता है तो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से पोर्न सामग्री बनाना, रखना, भेजना या साझा करना अपराध नहीं रहेगा। लेकिन किसी को जबरदस्ती पोर्न बनाने के लिए मजबूर करना, बिना सहमति के निजी तस्वीरें या वीडियो फैलाना और सेक्सुअल डीपफेक बनाना पहले की तरह अपराध ही रहेगा।

बच्चों से जुड़े मामलों में कानून और सख्त किया गया है। 14 से 18 साल के नाबालिगों में अश्लील सामग्री फैलाने पर भारी जुर्माना या 5 साल तक की जेल हो सकती है। 14 साल से कम उम्र के बच्चों के मामले में सजा सात साल तक हो सकती है। वहीं बच्चों से जुड़ी अश्लील सामग्री बनाने पर 10 से 15 साल तक की जेल और बच्चों को वेश्यावृत्ति या दलाली में धकेलने पर 10 से 15 साल तक की सजा का प्रावधान रखा गया है।

बच्चों से जुड़ी अश्लील सामग्री यूक्रेन में बड़ी चिंता की वजह है। आँकड़ों के अनुसार, 2025 की पहली छमाही में यूक्रेन में पोर्नोग्राफी से जुड़े 2,300 से ज्यादा आपराधिक मामले दर्ज हुए, जिनमें 957 मामले बच्चों से जुड़ी अश्लील सामग्री के थे।

लोगों की माँग के पीछे आर्थिक तर्क

इस पूरी बहस में एक व्यावहारिक, आर्थिक पहलू भी बार-बार उठाया गया है। द्वोर्निकोवा जैसे कंटेंट क्रिएटर्स का कहना है कि वे कानूनी तौर पर टैक्स चुकाकर देश की मदद कर रहे हैं, तो उन्हें अपराधी क्यों माना जाए। आँकड़ों के मुताबिक, OnlyFans हर साल यूक्रेनी खजाने में 10 लाख डॉलर से ज्यादा टैक्स जमा करता है और अकेले 2024 में 350 यूक्रेनी मॉडलों ने 30.54 करोड़ रिव्निया की आमदनी घोषित करके 5.9 करोड़ रिव्निया टैक्स चुकाया।

विरोध भी उतना ही मुखर रहा

इस बिल को लेकर यूक्रेन में शुरुआत से ही तीखा मतभेद देखने को मिला है। देश के रूढ़िवादी और धार्मिक समूह किसी भी रूप में पोर्नोग्राफी को कानूनी मान्यता देने के खिलाफ रहे हैं। उनका कहना है कि इससे सार्वजनिक नैतिकता कमजोर होगी, मानव तस्करी जैसी गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है और युद्ध जैसे राष्ट्रीय संकट के दौर में इस तरह के कानून को प्राथमिकता देना उचित नहीं है।

हालाँकि, विरोध केवल रूढ़िवादी वर्ग तक सीमित नहीं रहा। यूक्रेनियन प्रावदा में प्रकाशित एक लेख में एक उदारवादी लेखिका ने भी विधेयक के मौजूदा स्वरूप पर आपत्ति जताई। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह पोर्नोग्राफी पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की पक्षधर नहीं हैं लेकिन उनका मानना है कि युद्ध, आर्थिक संकट और सामाजिक अस्थिरता के बीच पूरे पोर्न उद्योग को एक सामान्य व्यावसायिक गतिविधि के रूप में कानूनी मान्यता देना गंभीर सामाजिक प्रभाव डाल सकता है।

उनका सुझाव था कि जो वयस्क अपनी सहमति से निजी तौर पर ऐसी सामग्री बनाते हैं, उन्हें आपराधिक मामलों से राहत दी जा सकती है। लेकिन पूरे पोर्न उद्योग को एक सामान्य व्यवसाय के रूप में वैध बनाने के बजाय उसके लिए अलग और सीमित व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।

फिलहाल यह विधेयक कानून बनने से अभी काफी दूर है। संसद ने केवल पहली रीडिंग में इसे आगे विचार के लिए मंजूरी दी है। अब दूसरी रीडिंग में इसके हर प्रावधान पर अलग-अलग चर्चा होगी, संशोधन पेश किए जाएंगे और फिर दोबारा मतदान होगा। इसी बीच संसद अध्यक्ष का प्रक्रिया को तेज करने का प्रस्ताव भी पर्याप्त समर्थन नहीं जुटा सका, जिससे साफ है कि सांसद इस मुद्दे पर जल्दबाजी के पक्ष में नहीं हैं।

तो जो देश हर रोज मोर्चे पर मौतें गिन रहा है, वहाँ संसद अगले कुछ हफ्तों-महीनों में यह भी तय करेगी कि निजता, नैतिकता और पुलिस के भ्रष्टाचार के बीच उलझा हुआ यह सवाल आखिर कैसे सुलझे।

न नाम पर कोई पेटेंट, न गरीब परिवार और कॉन्ग्रेस सरकार में मंत्री रहे पिता: 3 Idiots के फुंसुख वांगडू नहीं, ये है CJP के मंच पर बैठे ‘एक्टिविस्ट’ सोनम वांगचुक की असली कहानी

2009 की फिल्म 3 इडियट्स का मशहूर गाना “बहती हवा सा था वो, कहाँ गया उसे ढूँढो” इन दिनों सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म इंस्टाग्राम पर खूब इस्तेमाल किया जा रहा है। कई वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोग, अभिनेता और कंटेन्ट क्रिएटर इस गाने के साथ भावुक वीडियो बनाकर लोगों से सोनम वांगचुक का समर्थन करने और उन्हें ‘असल जिंदगी’ का फुंसुख वांगडू (Phunsukh Wangdu) बताकर बचाने की अपील कर रहे हैं।

जब राजनीति और दूसरे तरीके लोगों का व्यापक समर्थन नहीं जुटा सके, तब कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने लोगों की भावनाओं को छूने की कोशिश की। सोनम वांगचुक की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल के 17वें दिन इंस्टाग्राम और एक्स जैसे सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर बड़ी संख्या में भावुक पोस्ट और रील्स शेयर की गईं। इनमें सोनम वांगचुक को ‘असल जिंदगी का फुंसुख वांगडू’ बताया गया।

इन रील्स में खास तौर पर 3 इडियट्स का गाना ‘बहती हवा सा था वो’ लगाया गया है। साथ ही लोगों से फुंसुख वांगडू को ‘बचाने’ की अपील की जा रही है और केंद्र सरकार से सोनम वांगचुक की माँगों को मानने का दबाव बवाने की कोशिश की जा रही है।

सोनम वांगचुक ने 28 जून को जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) में शामिल होकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की थी। उनकी मुख्य माँग है कि NEET-UG 2026 पेपर लीक और अन्य परीक्षा संबंधी गड़बड़ियों की जिम्मेदारी लेते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें। इसके अलावा वे लद्दाख को संवैधानिक सुरक्षा देने और वहाँ पर्यावरण संरक्षण के लिए मजबूत कदम उठाने की भी माँग कर रहे हैं।

इसी बीच ‘असल जिंदगी के फुंसुख वांगडू यानी सोनम वांगचुक को मरने मत दो’ नाम से सोशल मीडिया पर एक अभियान चलाया जा रहा है। इसका उद्देश्य पूरे देश से लोगों का समर्थन जुटाना और 20 जुलाई 2026 को संसद की ओर प्रस्तावित मार्च के लिए अधिक से अधिक लोगों को जोड़ना बताया जा रहा है।

सोशल मीडिया पर कई कंटेन्ट क्रिएटर दावा कर रहे हैं कि अविष्कारक (इनोवेटर) सोनम वांगचुक के नाम करीब 400 पेटेन्ट दर्ज हैं। साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि 3 इडियट्स के रैंचो यानी फुंसुख वांगडू की तरह सोनम वांगचुक भी बेहद गरीब परिवार से आते हैं। फिल्म में आमिर खान का किरदार, जिसे शुरुआत में सोनम वांगचुक से प्रेरित बताया गया था, एक गरीब माली के बेटे के रूप में दिखाया गया था।

कई रील्स और सोशल मीडिया पोस्ट में सेनम वांगचुक को 3 इडियट्स के फुंसुख वांगडू का असली रूप बताया जा रहा है। इस दावे को और हवा तब मिली, जब फिल्म में ‘चतुर’ का किरदार निभाने वाले अभिनेता ओमी वैद्य ने भी इस विषय पर वीडियो जारी किया।

ओमी वैद्य ने 15 जुलाई को इंस्टाग्राम पर एक वीडियो शेयर करते हुए कहा, “मैं नहीं चाहता कि फुंसुख वांगडू की मौत हो। हेलो इडियट्स, पहचाना? मैं ओमी वैद्य हूँ। 3 इडियट्स का चतुर और द ऑफिस का सादिक। आज मैं आपसे एक जरूरी बात कहना चाहता हूँ। मैं अक्सर ऐसे वीडियो नहीं बनाता, इसलिए मेरी बात ध्यान से सुनिए। क्या आप जानते हैं कि 3 इडियट्स का फुंसुख वांगडू असल में लद्दाख के इंजीनियर, इनोवेटर, शिक्षक और समाज सुधारक सोनम वांगचुक से प्रेरित बताया जाता है? मैं उनसे मिल चुका हूँ। वह वाकई एक दिलचस्प इंसान हैं।”

ओमी वैद्य ने आगे कहा, “इस समय सोनम वांगचुक लंबे समय से भूख हड़ताल पर हैं। उनका ब्लड शुगर काफी कम हो गया है। मुझे नहीं पता कि आपने इसके बारे में सुना है या नहीं। यह भी नहीं पता कि मीडिया इस खबर को दिखा रहा है या नहीं। लेकिन यह बहुत जरूरी मामला है। आप उनकी बातों से सहमत हों या नहीं, लेकिन मैं नहीं चाहता कि उनकी मौत हो।”

सोनम वांगचुक के समर्थन में बॉलीवुड के कई कलाकार भी सामने आए हैं। इनमें अनुराग कश्यप, स्वरा भास्कर, श्रेया धनवंतरी, जीनत अमान, अभय देओल, स्वानंद किरकिरे, सोनी राजदान, शबाना आजमी, रत्ना शाह, नसीरूद्दीन शाह सममेत कई अन्य शामिल हैं। इनमें से कई लोगों ने सोनम वांगचुक से अपनी भूख हड़ताल खत्म करने की अपील भी की है।

यहाँ तक कि कुछ मेनस्ट्रीम मीडिया संस्थान भी अपनी रिपोर्ट्स में सोनम वांगचुक को ‘असल जिंदगी का फुंसुख वांगडू’ बता रहे हैं।

(साभार: Youtube-Moneycontrol)

सोशल मीडिया पर कई कंटेन्ट क्रिएटर भावुक वीडियो और पोस्ट शेयर कर रहे हैं। इनमें सोनम वांगचुक को ‘असल जिंदगी का फुंसुख वांगडू’, शिक्षा सुधार की लड़ाई लड़ने वाला चेहरा और कई अन्य विशेषणों के साथ पेश किया जा रहा है। ऐसे माहौल में जरूरी है कि दावों और भावनात्मक अपीलों से अलग हटकर तथ्यों और हकीकत की जाँच की जाए।

सोशल मीडिया पर कई कंटेन्ट क्रिएटर भावुक वीडियो और पोस्ट शेयर कर रहे हैं। इनमें सोनम वांगचुक को ‘असल जिंदगी का फुंसुख वांगडू’, शिक्षा सुधार की लड़ाई लड़ने वाला चेहरा और कई अन्य विशेषणों के साथ पेश किया जा रहा है। ऐसे माहौल में जरूरी है कि दावों और भावनात्मक अपीलों से अलग हटकर तथ्यों और हकीकत की जाँच की जाए।

सोनम वांगचुक नहीं हैं फुंसुख वांगडू, न तो उनके पास 400 पेटेंट और न ही उनका पारिवारिक बैकग्राउंड गरीब

फिल्म 3 इडियट्स में फुंसुख वांगडू एक काल्पनिक किरदार है। उसे एक ऐसे प्रतिभाशाली आविष्कारक के रूप में दिखाया गया है, जिसके नाम सैकड़ों पेटेंट हैं। वह एक अलग सोच वाला स्कूल चलाता है और रटकर पढ़ाई करने वाली शिक्षा व्यवस्था को चुनौती देता है।

साल 2009 में फिल्म रिलीज होने के बाद मुख्यधारा के मीडिया और सार्वजनिक चर्चा में सोनम वांगचुक को ‘असल जिंदगी का फुंसुख वांगडू’ कहा जाने लगा। इसकी वजह यह थी कि लद्दाख में वैकल्पिक शिक्षा के क्षेत्र में उनका काम और उनकी संस्था ‘स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंट कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख’ (SECMOL) से फिल्म के रैंचो के किरदार के कुछ पहलू प्रेरित बताए गए।

सोनम वांगचुक को ‘आइस स्तूप’ तकनीक विकसित करने का श्रेय भी दिया जाता है। इस तकनीक का उद्देश्य ट्रांस-हिमालयी ऊँचाई वाले गाँवों में वसंत के मौसम में सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराना है।

हालाँकि सोशल मीडिया और कई रिपोर्ट्स में किए जा रहे दावों के विपरीत, सोनम वांगचुक खुद को ‘असल जिंदगी का फुंसुख वांगडू’ नहीं मानते। इस बात की पुष्टि खुद सोनम वांगचुक कई बार कर चुके हैं।

कई साल पहले सोनम वांगचुक ने खुद साफ कहा था कि वह ‘असल जिंदगी के फुंसुख वांगडू’ नहीं हैं। उनका कहना था कि 3 इडियट्स के निर्माताओं ने फिल्म बनाते समय उनसे कोई सलाह या अनुमति नहीं ली थी। वांगचुक ने यह भी आरोप लगाया था कि फिल्म की टीम चुपचाप उनके लद्दाख स्थित स्कूल में शूटिंग करने पहुँची थी।

वांगचुक ने यह भी कहा था कि अगर फिल्म के कुछ हिस्से उनके जीवन से प्रेरित भी हैं, तो भी उन्हें इस बात पर कोई खास गर्व नहीं है। उनका मानना था कि लोगों को उन्हें किसी फिल्म के किरदार से जोड़कर नहीं, बल्कि उनके वास्तविक काम और योगदान के लिए पहचानना चाहिए।

उन्होंने 3 इडियट्स के निर्माताओं को एक पत्र भी लिखा था। इस पत्र में उन्होंने बिना अनुमति उनके जीवन और काम से प्रेरणा लेने पर सवाल उठाए थे।

एक इंटरव्यू में सोनम वांगचुक ने कहा था, “वे लोग चुपचाप मेरे स्कूल में फिल्म की शूटिंग करने आए थे। अगर आप कहें कि फिल्म मेरे काम से प्रेरित है, तो मैं इससे इनकार नहीं करूँगा। बहुत से लोग कहते हैं कि यह फिल्म मेरे जीवन पर आधारित है, लेकिन मैं इससे सहमत नहीं हूँ। सही शब्द यह होगा कि फिल्म मेरे काम या जीवन से प्रेरित या प्रभावित हो सती है। साथ ही मैं नहीं चाहता कि इस देश के लोग किसी बात को सिर्फ इसलिए सच मान लें, क्योंकि उसे किसी फिल्म से जोड़ दिया गया है। इसलिए अगर फिल्म मुझसे प्रभावित भी है तो मुझे इस पर कोई खास गर्व नहीं है। और अगर फिल्म मुझसे प्रेरित नहीं है तो मुझे इसका भी कोई अफसोस नहीं है।”

सोनम वांगचुक ने आगे कहा था, “मैं इस बात से परेशान हो जाता हूँ कि लोग बार-बार मुझसे पूछते हैं, ‘क्या आपका स्कूल वही है जो 3 इडियट्स में दिखाया गया था? क्या आप ही फुंसुख वांगडू हैं?’ मैं साफ करना चाहता हूँ कि नहीं, मैं फुंसुख वांगडू नहीं हूँ। मैं सोनम वांगचुक हूँ। मैं फिल्मों में काम नहीं करता, बल्कि असल जिंदगी में काम करता हूँ। मैं ऐसे नवाचारों पर काम करता हूँ जो भारत से दुनिया तक पहुँचे और देश का नाम रोशन करें।”

बाद में 3 इडियट्स के निर्देशक राजकुमार हिरानी ने भी एक इंटरव्यू में कहा था कि फिल्म के रैंचो या फुंसुख वांगडू का किरदार सोनम वांगचुक से प्रेरित नहीं था। उनके अनुसार, यह किरदार एक ऐसे व्यक्ति से प्रेरित था जो फिल्म बनाने के क्षेत्र में करियर बनाना चाहता था, लेकिन उसे प्रतिष्ठित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) में एडमिशन नहीं मिल पाया था।”

इन बयानों से साफ है कि 3 इडियट्स फिल्म का फुंसुख वांगडू और सोनम वांगचुक एक ही व्यक्ति नहीं हैं।

इसी तरह सोशल मीडिया पर किया जा रहा यह दावा भी सही नहीं है कि सोनम वांगचुक के नाम 400 पेटेंट दर्ज हैं। यह दावा फिल्म के काल्पनिक किरदार से जोड़कर फैलाया जा रहा है। अब तक ऐसा कोई विश्वसनीय प्रमाण सामने नहीं आया है कि सोनम वांगचुक के नाम कोई पेटेंट दर्ज है। हालाँकि, वे ‘आइस स्तूप’, सौर ऊर्जा से गर्म होने वाली इमारतों और भारतीय सेना के लिए पोर्टेबल सोलर टेंट जैसी उपयोगी तकनीकों और नवाचारों के विकास के लिए जाने जाते हैं।

कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि सोनम वांगचुक के एक ‘टेंट डिजाइन का पेटेंट’ कराया जा रहा था। हालाँकि, इस बारे में भी कोई स्पष्ट और विश्वसनीय जानकारी उपलब्ध नहीं है। कुल मिलाकर, 3 इडियट्स फिल्म के काल्पनिक किरदार फुंसुख वांगडू की तरह सोनम वांगचुक के नाम 400 पेटेंट होने का दावा सही नहीं है।

सोशल मीडिया पर कई इंफ्लुएंसर अपने वीडियो में जिस ‘400 पेटेंट’ का दावा कर रहे हैं, वह दरअसल फिल्म के काल्पनिक किरदार फुंसुख वांगडू और सोनम वांगचुक को एक ही व्यक्ति मान लेने की वजह से फैल रहा है।

इसी तरह सोशल मीडिया पर एक और दावा भी किया जा रहा है कि जैसे फिल्म में फुंसुख वांगडू एक गरीब परिवार से था, वैसे ही सोनम वांगचुक भी बेहद साधारण या गरीब परिवार से आते हैं।

लेकिन उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह दावा भी सही नहीं है। सोनम वांगचुक, लद्दाख के वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता सोनम वांग्याल के बेटे हैं। सोनम वांग्याल वर्ष 1972 के आसपास लेह से विधायक रहे थे। इसके बाद 1975 में वे जम्मू-कश्मीर सरकार में मंत्री भी बने। इसी दौरान उनका परिवार श्रीनगर में रहने लगा था।

रिपोर्ट्स के अनुसार, भूख हड़ताल करने की प्रेरणा भी सोनम वांगचुक को अपने पिता से मिली हो सकती है। वर्ष 1984 में सोनम वांग्याल ने लद्दाख को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा दिलाने की माँग को लेकर भूख हड़ताल की थी।

(साभार: Facebook- Tshering Wangdi Lepcha)

बाद में वर्ष 1987 में सोनम वांग्याल को कथित तौर पर पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में कॉन्ग्रेस से निष्कासित कर दिया गया था।

ऐसे में सोशल मीडिया पर सोनम वांगचुक को ‘एक ऐसे जमीनी नायक के रूप में पेश करना, जो बेहद साधारण या गरीब परिवार’ से आगे बढ़े हों, उपलब्ध तथ्यों से मेल नहीं खाता। रिपोर्ट्स के अनुसार, वह आर्थिक रूप से संपन्न और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली परिवार से आते हैं।

पिछले कुछ वर्षों में सोनम वांगचुक कई विवादों को लेकर भी चर्चा में हे हैं।

पिछले वर्ष खबरें आई थीं कि इंजीनियर और जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने 135 एकड़ जमीन का कई वर्षों तक किराया नहीं चुकाया। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस जमीन की मौजूदा बाजार कीमत करीब 27 से 30 करोड़ रुपए के बीच है। यह भी कहा गया कि उपायुक्त ने लीज की शर्तों के क्लॉज 4(बी) के तहत नोटिस जारी किए थे।

रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया कि लीज समझौते के एक वर्ष के भीतर जमीन पर विश्वविद्यालय स्थापित नहीं किया गया। वहीं, हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव लर्निंग (HIAL) ने विश्वविद्यालय का दर्जा पाने के लिए आवेदन वर्ष 2022 में किया, जबकि जमीन का आवंटन इससे करीब चार साल पहले हो चुका था। इन रिपोर्ट्स के अनुसार, लीज की शर्तों का पालन न करने के बावजूद सोनम वांगचुक के नियामकीय अड़चनों (Regulatory Hurdles) का हवाला दिया।

रिपोर्ट्स के अनुसार, HIAL ने करीब तीन सालों तक लद्दाख ऑटोनॉमस हिल डेवलपमेंट काउंसिल (LAHDC) से संपर्क नहीं किया। इसके बजाए, संस्था ने सीधे लेह के उपायुक्त के माध्यम से प्रक्रिया आगे बढ़ाने की कोशिश की।

कुछ रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया कि HIAL के लिए 14 करोड़ रुपए की प्रीमियम राशि माफ करने का अनुरोध किया गया था। हालाँकि, यह प्रस्ताव LAHDC ने स्वीकार नहीं किया। इसलिए आधिकारिक रिकॉर्ड में किसी भी तरह की छूट दिए जाने का उल्लेख नहीं मिलता।

बाद में जब लद्दाख प्रशासन ने HIAL को आवंटित जमीन का आवंटन रद्द कर दिया, तब सोनम वांगचुक ने इसे केंद्र सरकार की ओर से उनके खिलाफ ‘विच हंट’ बताया।

रिपोर्ट्स के अनुसार, फरवरी 2025 में सोनम वांगचुक जलवायु परिवर्तन से जुड़े एक सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए पाकिस्तान गए थे। उस दौरान सोशल मीडिया पर कई पाकिस्तानी अकाउंट्स ने उनके समर्थन में पोस्ट भी किए थे।

इसके अलावा सोनम वांगचुक और उनकी संस्थाओं के खिलाफ विदेशी फंडिंग नियमों के कथित उल्लंघन को लेकर सीबीआई जाँच भी हुई थी। रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि HIAL के कामकाज में वित्तीय अनियमितताओं और विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) के बार-बार उल्लंघन से जुड़े मामले सामने आए थे।

रिपोर्ट्स के अनुसार, HIAL ने स्थानीय दान भी अपने FCRA खाते में जमा किए थे, जिसे FCRA 2010 की धारा 17 का उल्लंघन बताया गया। इसके अलावा यह भी दावा किया गया कि संस्था ने FCRA पंजीकरण के लिए आवेदन करने से पहले ही करीब 1.5 करोड़ रुपए की विदेशी राशि प्राप्त की थी, जो अधिनियम की धारा 11 के विपरीत है। रिपोर्ट्स में यह भी आरोप लगाया गया कि HIAL के कुल 7 बैंक खाते थे, जिनमें से 4 खातों की जानकारी घोषित नहीं की गई थी।

इसी तरह रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया कि सोनम वांगचुक के नाम 9 व्यक्तिगत बैंक खाते थे, जिनमें से 8 का खुलासा नहीं किया गया था। यह आरोप भी लगाया गया कि कॉरपोरेट क्षेत्र की आलोचना करने के बावजूद उन्हें कई निजी कंपनियों और केंद्र सरकार के सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) से कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) के तहत बड़ी राशि मिलती रही।

सोनम वांगचुक पर सितंबर 2025 में लद्दाख में हुई हिंसा भड़काने के आरोप भी लगे थे। रिपोर्ट्स के अनुसार, उस दौरान पुलिस फायरिंग में चार लोगों की मौत हुई थी। इसी वर्ष मार्च में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत सोनम वांगचुक की नजरबंदी समाप्त कर दी थी। उन्हें लद्दाख में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान गिरफ्तार किया गया था और करीब 6 महीने बाद उनकी नजरबंदी हटाई गई।

सोनम वांगचुक इससे पहले भी कई मुद्दों पर भूख हड़ताल कर चुके हैं। इनमें लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की माँग और अब केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग प्रमुख हैं।

सोशल मीडिया पर इन दिनों 3 इडियट्स और फुंसुख वांगडू से जुड़ी कहानी को तेजी से प्रचारित किया जा रहा है ताकि लोगों की सहानुभूति हासिल की जा सके और यह विषय ज्यादा से ज्यादा वायरल हो। हालाँकि, उपलब्ध बयानों और तथ्यों के अनुसार, सोनम वांगचुक का फिल्म के काल्पनिक किरदार ‘फुंसुख वांगडू’ से सीधा संबंध नहीं है। इसके बावजूद, ‘असल जिंदगी के फुंसुख वांगडू’ और ‘साधारण पृष्ठभूमि’ से निकले शिक्षा सुधारक जैसी छवि भावनात्मक रूप से लोगों को प्रभावित करती है, इसलिए सोशल मीडिया पर इसका व्यापक इस्तेमाल किया जा रहा है।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

‘जय श्री राम’ पर मौन और ‘अस्सलाम वालेकुम’ पर तुरंत जवाब… क्या सच में एंटी-हिंदू है एप्पल का सिरी?, सोशल मीडिया पर नेटीजन्स ने उठाए सवाल

आजकल सोशल मीडिया और इंटरनेट पर एक नया विवाद तेजी से फैल रहा है। यह पूरा मामला आईफोन बनाने वाली मशहूर कंपनी एप्पल (Apple) के ‘सिरी’ (Siri) से जुड़ा है। सिरी एक ऐसा सिस्टम है जिससे हम बोलकर फोन पर काम करवाते हैं। यह विवाद तब शुरू हुआ जब मध्य प्रदेश के उज्जैन के एक सामाजिक कार्यकर्ता ने मीडिया के सामने एक Video शेयर किया। इस वीडियो में दिखाया गया कि जब आईफोन के सिरी को ‘जय श्री राम’ या ‘जय श्री महाकाल’ बोला जाता है, तो वह चुप रहता है और कोई जवाब नहीं देता।

लेकिन जैसे ही उसे ‘अस्सलाम वालेकुम’ कहा जाता है, वह तुरंत सामने से ‘वालेकुम अस्लाम’ बोल पड़ता है। यह Video देखते ही देखते इंटरनेट पर वायरल हो गया और नेटीजन्स अब एप्पल कंपनी पर ‘हिंदू विरोधी’ होने के सवाल उठा रहे हैं। मध्य प्रदेश से शुरू हुई यह बात अब पूरे देश में चर्चा का विषय बन चुकी है। आईफोन इस्तेमाल करने वाले करोड़ों हिंदू लोग इस बात से नाराज हैं और उनका कहना है कि यह उनकी धार्मिक भावनाओं और भारतीय संस्कृति का अपमान है। अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या मोबाइल फोन के ये सिस्टम सच में किसी एक धर्म की तरफ झुके हुए हैं और इलैक्ट्रोनिक सामानों में भी भेदभाव किया जा रहा है?

कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद?

यह पूरा झगड़ा मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर से शुरू हुआ। वहाँ के एक सामाजिक कार्यकर्ता ने पत्रकारों को बुलाया और सबके सामने अपने आईफोन पर सिरी को चेक करके दिखाया। उन्होंने सिरी से कहा ‘जय श्री राम’ और ‘जय श्री महाकाल’। लेकिन आईफोन ने कोई जवाब नहीं दिया और सिरी चुप रहा। इसके तुरंत बाद जब उन्होंने ‘अस्सलाम वालेकुम’ बोला, तो सिरी ने बिना एक सेकंड गँवाए स्क्रीन पर ‘वालेकुम अस्लाम’ लिखा भी और बोलकर जवाब भी दिया।

इस बात पर कार्यकर्ता ने एप्पल कंपनी पर सीधा निशाना साधा। उन्होंने कहा कि यह साफ तौर पर हिंदुओं से भेदभाव है। उनका आरोप था, “आईफोन हमारी संस्कृति के खिलाफ काम कर रहा है और करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुँचा रहा है। पूरे देश में करोड़ों हिंदू शौक से आईफोन खरीदते हैं, लेकिन कंपनी हमारे साथ धोखा कर रही है। हमारा सारा डेटा इस कंपनी के पास है और यह हमारे खिलाफ एक सोची-समझी साजिश है।”

कार्यकर्ता ने इस बात पर भी गुस्सा जताया कि आज भारत में आईफोन दिखाना एक फैशन बन गया है। लोग पैसे न होने पर भी कर्ज लेकर या भारी किस्तों (EMI) पर महँगे आईफोन खरीदते हैं। इसके बावजूद यह विदेशी कंपनी हमारे भगवान के नाम का सम्मान नहीं कर रही है। इस वीडियो के सामने आने के बाद इंटरनेट पर लोग आपस में भिड़ गए हैं और हर कोई अपने-अपने आईफोन पर इसे चेक करने में लगा है।

सिरी के स्क्रीनशॉट: क्या है आईफोन की स्क्रीन का सच?

सोशल मीडिया पर इस समय लोग अपने-अपने फोन के कई स्क्रीनशॉट और स्क्रीन रिकॉर्डिंग साझा कर रहे हैं। इन स्क्रीनशॉट में जो बातें निकलकर सामने आ रही हैं, वे बेहद हैरान करने वाली हैं। आइए देखते हैं कि यूजर्स के फोन में सिरी किस तरह का बर्ताव कर रहा है। नीचे 3 तस्वीरें आपकी दिखाई दे रही होंगी। इसमें से 2 तस्वीरों में ‘जय श्री राम’ और ‘जय श्री कृष्ण’ पूछने पर Siri क्या जवाब देती हैं। वहीं, तीसरी तस्वीर में ‘अस्सलाम वालेकुम’ बोलने पर सिरी ने ‘वालेकुम अस्लाम’ लिखा दिख रहा होगा।

वहीं, सोशल मीडिया पर कुछ Video भी सामने आए है।

जेमिनी और गूगल का क्या है रुख?

जब यह विवाद बढ़ा, तो लोगों ने एप्पल के सिरी की तुलना अन्य कंपनियों के वर्चुअल असिस्टेंट्स और एआई (AI) टूल्स से करनी शुरू कर दी। यूजर्स ने गूगल के असिस्टेंट और गूगल के ही नए एआई ‘जेमिनी’ (Gemini) पर ये ही आजमाया। जब जेमिनी या गूगल असिस्टेंट को ‘जय श्री राम’ बोला गया, तो उसने सम्मान के साथ तुरंत जवाब में ‘जय श्री राम’, मैं आपकी क्या सहायता कर सकता हूँ?’ कहा।

ठीक इसी तरह, जब जेमिनी से ‘अस्सलाम वालेकुम’ कहा गया, तो उसने ‘वालेकुम अस्लाम’ कहकर अभिवादन स्वीकार किया। सोशल मीडिया पर यूजर्स का कहना है कि जब गूगल और जेमिनी जैसी अन्य बड़ी टेक कंपनियाँ भारत की भाषाई और धार्मिक विविधताओं को समझ सकती हैं, तो फिर एप्पल जैसी प्रीमियम कंपनी का सिरी इतना पिछड़ा हुआ या पक्षपाती क्यों है?

गूगल के टूल्स भारतीय यूजर्स के लहजे (एक्सेंट) और सांस्कृतिक शब्दों को बहुत जल्दी कैच करते हैं। यही कारण है कि लोग अब एप्पल को आड़े हाथों ले रहे हैं कि करोड़ों रुपए का मुनाफा भारत से कमाने के बाद भी उसने अपने वॉयस असिस्टेंट को भारतीय संस्कृति के हिसाब से अपग्रेड क्यों नहीं किया।

क्या यह वाकई ‘इस्लाम-प्रेम’ है या केवल कोडिंग का खेल?

इस पूरे बखेड़े के बीच टेक जगत के जानकारों और कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों ने अपना ज्ञान बाँटना भी शुरू कर दिया है। उनका तर्क है कि यह मामला किसी ‘इस्लाम-प्रेम’ या जानबूझकर की गई हिंदू-घृणा का नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से ‘प्री-प्रोग्राम्ड ग्रीटिंग’ (पहले से तय अभिवादन) और कोडिंग का तकनीकी मामला है।

इन जानकारों का कहना है कि सिरी जैसे वर्चुअल असिस्टेंट्स भाषा की एक डिक्शनरी (शब्दकोश) पर काम करते हैं। इनके सिस्टम में कुछ बेहद गिने-चुने और दुनिया भर में सबसे ज्यादा बोले जाने वाले सामान्य ग्रीटिंग्स जैसे- ‘Hello’, ‘Hi’, ‘Assalamualaikum’, और कुछ चुनिंदा भाषाओं में ‘Namaste’ के लिए ‘हार्ड-कोडेड’ (Hard-coded) जवाब पहले से ही प्रोग्राम कर दिए जाते हैं।

उनका तर्क है कि ‘अस्सलाम वालेकुम’ को दुनिया भर में एक सामान्य ग्रीटिंग (अभिवादन) माना जाता है, जिसका मतलब ‘आप पर शांति हो’ होता है। इसके विपरीत, ‘जय श्री राम’ या ‘हर हर महाकाल’ को टेक कंपनियाँ एक धार्मिक नारा या उद्घोष (Religious Slogan) मानती हैं, न कि एक सामान्य अभिवादन। जानकारों का कहना है कि ठीक इसी वजह से सिरी की कोडिंग लिस्ट में यह शब्द शामिल नहीं था, ठीक वैसे ही जैसे ‘गुड मॉर्निंग’ एक सामान्य ग्रीटिंग है, लेकिन ‘हर हर महादेव’ या ‘अल्लाह-हू-अकबर’ धार्मिक और मजहबी नारे हैं, जिन्हें सामान्य ग्रीटिंग्स की लिस्ट में जगह नहीं मिलती।

क्या वाकई एंटी-हिंदू है सिरी या यह टेक कंपनियों की बड़ी लापरवाही है?

अब बात करते हैं इस पूरे मामले के सबसे जरूरी पहलू पर। क्या तकनीकी जानकारों की यह ‘कोडिंग और ग्रीटिंग’ वाली दलील भारतीय समाज और करोड़ों हिंदुओं के गले उतर सकती है? बिल्कुल नहीं। जब आप भारत जैसे विशाल और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध देश में अपना व्यापार फैलाते हैं, तो आपको वहाँ की जमीनी हकीकत को समझना होगा। भारत में ‘जय श्री राम’ या ‘जय श्री महाकाल’ केवल कोई राजनीतिक या धार्मिक नारा नहीं है, बल्कि यह करोड़ों लोगों के रोजमर्रा के जीवन में एक-दूसरे से मिलने पर बोला जाने वाला सबसे बड़ा अभिवादन (Greeting) है। सुबह उठने से लेकर किसी मेहमान के घर आने तक, लोग इसी नाम से एक-दूसरे का स्वागत करते हैं।

ऐसे में यह कहना कि ‘जय श्री राम’ ग्रीटिंग नहीं है, सरासर खोखला और जमीनी हकीकत से दूर नजर आता है। अगर इसे केवल कोडिंग की भाषा में एक ‘मिसिंग वर्ड’ (छूटा हुआ शब्द) भी मान लिया जाए, तब भी यह सवाल उठता है कि भारत को अपना सबसे बड़ा बाजार मानने वाली एप्पल कंपनी इतनी बड़ी लापरवाही कैसे कर सकती है? जब गूगल का Gemini और अन्य वर्चुअल असिस्टेंट्स इन बारीकियों को समझकर सही जवाब दे सकते हैं, तो एप्पल का सिरी यहाँ क्यों फेल हो गया?

यही वह बिंदु है जहाँ सोशल मीडिया पर यूजर्स का यह आरोप बेहद मजबूत हो जाता है कि एप्पल का सिरी ‘एंटी-हिंदू’ (Anti-Hindu) मानसिकता या फिर घोर उपेक्षा से ग्रसित है। पश्चिमी देशों की बड़ी टेक कंपनियाँ अक्सर वैश्विक स्तर पर इस्लामी या पश्चिमी अभिवादनों को तो अपने सिस्टम में तुरंत जगह दे देती हैं, लेकिन जब बात हिंदू संस्कृति, उनके त्योहारों या उनके पवित्र अभिवादनों की आती है, तो उसे ‘रीजनल फ्रेज’ या ‘धार्मिक नारा’ कहकर पल्ला झाड़ लिया जाता है।

यह साफ तौर पर टेक वर्ल्ड की सांस्कृतिक असंवेदनशीलता को दर्शाता है। अगर करोड़ों भारतीय उपभोक्ता इन कंपनियों के महँगे फोन खरीदकर इन्हें अरबों डॉलर का बिजनेस दे रहे हैं, तो वे बदले में अपनी संस्कृति और आस्था का सम्मान भी चाहते हैं। इसे सिर्फ एक तकनीकी बग (Bug) कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। एप्पल ने अभी तक इस पूरे विवाद पर कोई सफाई जारी नहीं की है। जब तक एप्पल इस तकनीकी खामी को सुधारकर अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं करता, तब तक भारत के बहुसंख्यक समाज में यह नाराजगी और यह सवाल बिल्कुल वाजिब रहेगा कि आखिर टेक की दुनिया में हिंदुओं की भावनाओं को हमेशा हाशिए पर क्यों रखा जाता है?

लद्दाख में बड़ा प्रशासनिक बदलाव: अब सभी 7 जिलों में बनेगी स्वायत्त हिल काउंसिल, जानिए स्थानीय लोगों को होगा क्या-क्या फायदा?

लद्दाख प्रशासन ने केंद्र शासित प्रदेश के हर जिले में निर्वाचित स्वशासन लागू करने का फैसला किया है। इसके तहत सभी सात जिलों में एक-एक ऑटोनॉमस हिल डेवलपमेंट काउंसिल (Autonomous Hill Development Council-AHDC) का गठन किया जाएगा।

यह कदम लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद उसकी प्रशासनिक व्यवस्था में सबसे बड़े बदलावों में से एक माना जा रहा है। इससे स्थानीय समुदायों को भूमि, विकास, नौकरियों और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़े फैसलों में पहले के मुकाबले कहीं अधिक भूमिका मिलने की उम्मीद है।

अब तक केवल लेह और कारगिल में ही निर्वाचित स्वायत्त हिल विकास परिषदें थीं। लेकिन इस नए फैसले के बाद हाल ही में बनाए गए पाँच नए जिले शाम, नुब्रा, चांगथांग, ज़ांस्कर और द्रास को भी अपनी-अपनी स्वायत्त हिल विकास परिषद मिलेगी। इन परिषदों को वही कानूनी अधिकार प्राप्त होंगे, जो वर्तमान में लेह और कारगिल की परिषदों को हासिल हैं।

इस फैसले की घोषणा लद्दाख के मुख्य सचिव आशीष कुंद्रा ने की। उन्होंने इसे जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को और मजबूत बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने कहा कि सरकार यह निर्णय लद्दाख स्वायत्त हिल विकास परिषद (LAHDC) अधिनियम में पहले से उपलब्ध प्रावधानों के अनुरूप लागू कर रही है।

हर जिले की अपनी चुनी हुई हिल काउंसिल होगी

यह फैसला लद्दाख में इसी साल हुए प्रशासनिक विस्तार के बाद लिया गया है। अप्रैल 2026 में केंद्र शासित प्रदेश ने आधिकारिक तौर पर जिलों की संख्या दो से बढ़ाकर सात कर दी थी।

इसके तहत शाम, नुब्रा, चांगथांग, जांस्कर और द्रास को नए जिलों के रूप में अधिसूचित किया गया था। हालाँकि, इसके बावजूद जिला स्तर पर निर्वाचित शासन व्यवस्था केवल लेह और कारगिल तक ही सीमित रही।

नए ऐलान के साथ यह स्थिति बदल जाएगी, क्योंकि अब पूरे केंद्र शासित प्रदेश में हिल काउंसिल प्रणाली का विस्तार किया जाएगा। आवश्यक कानूनी औपचारिकताएँ पूरी होने के बाद लद्दाख के हर जिले में अपनी ऑटोनॉमस हिल डेवलपमेंट काउंसिल होगी।

प्रशासन के अनुसार, इसके लिए आवश्यक कानूनी ढाँचा पहले से ही मौजूद है। लद्दाख स्वायत्त हिल विकास परिषद (LAHDC) अधिनियम की धारा 3(1) में प्रावधान है कि सरकार राज पत्र (Official Gazette) में अधिसूचना जारी कर तय तारीख से हर जिले में एक परिषद का गठन कर सकती है।

हालाँकि नई परिषदों के कामकाज शुरू होने से पहले जहाँ आवश्यक हो वहाँ अधिनियम में जरूरी संशोधन और निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन (Delimitation) की प्रक्रिया पूरी की जानी बाकी है।

सरकार का कहना है कि इस फैसले से लोगों की लंबे समय से चली आ रही माँग पूरी हुई

प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए लद्दाख के मुख्य सचिव आशीष कुंद्रा ने कहा कि यह फैसला पूरे लद्दाख में लोकतांत्रिक संस्थाओं को और मजबूत बनाने के सरकार के संकल्प को दर्शाता है।

उन्होंने कहा, “LAHDC अधिनियम की धारा 3 की उपधारा (1) लद्दाख के हर जिले में एक लद्दाख स्वायत्त हिल विकास परिषद (LAHDC) के गठन का प्रावधान करती है। सरकार ने इस कानूनी प्रावधान का पालन करने का निर्णय लिया है।”

कुंद्रा ने यह भी कहा कि नए बनाए गए जिलों के लोगों की ओर से लंबे समय से निर्वाचित हिल काउंसिल की माँग की जा रही थी। उन्होंने कहा, “द्रास, जांस्कर, चांगथांग, नुब्रा और शाम सहित अलग-अलग क्षेत्रों से व्यापक स्तर पर ऐसी माँगें उठी हैं। कई लोगों ने LAHDC के गठन के लिए लिखित अनुरोध भी दिए हैं। यह फैसला यहाँ लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने की लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए लिया गया है।”

उन्होंने आगे बताया कि प्रशासन अपनी प्रशासनिक पुनर्गठन की अधिकांश प्रक्रिया पहले ही पूरी कर चुका है। कुंद्रा ने कहा, “आज उपराज्यपाल ने प्रत्येक जिले में लोक निर्माण विभाग (PWD), ग्रामीण कार्य विभाग (Rural Works) और जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (PHE) के लिए अलग-अलग इंजीनियरिंग विंग स्थापित करने का फैसला किया है। संबंधित अधिकारियों की तैनाती के आदेश भी जारी कर दिए गए हैं। मेरा मानना है कि हमारा प्रशासनिक पुनर्गठन अब काफी हद तक पूरा हो चुका है। कुछ पहलू अभी शेष हैं और आने वाले हफ्तों में उन पर भी बहुत जल्द काम किया जाएगा।”

नई काउंसिल को लेह और कारगिल जैसी ही शक्तियाँ मिलेंगी

प्रशासन ने इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह बताया है कि पाँचों नई स्वायत्त हिल विकास परिषदों को सीमित अधिकार नहीं दिए जाएँगे। इसके बजाय शाम, नुब्रा, चांगथांग, ज़ांस्कर और द्रास को वही अधिकार और शक्तियाँ मिलेंगी, जिनका उपयोग लेह हिल काउंसिल वर्ष 1995 से और कारगिल हिल काउंसिल वर्ष 2003 से करती आ रही हैं।

सरकार ने स्पष्ट किया है कि नए जिलों के लिए अलग या कम अधिकारों वाली कोई अलग व्यवस्था नहीं होगी। सभी सातों स्वायत्त हिल विकास परिषदें (LAHDC) लद्दाख स्वायत्त हिल विकास परिषद (LAHDC) अधिनियम के प्रावधानों के तहत समान अधिकारों के साथ कार्य करेंगी।

इससे यह सुनिश्चित होने की उम्मीद है कि लद्दाख के प्रत्येक जिले को, उसके गठन के समय की परवाह किए बिना, समान स्तर का प्रशासनिक अधिकार प्राप्त होगा।

भूमि और स्थानीय संसाधनों पर अधिक नियंत्रण

स्वायत्त हिल विकास परिषदों की सबसे महत्वपूर्ण शक्तियों में से एक उनके-अपने जिलों में भूमि के स्वामित्व और भूमि आवंटन से जुड़े मामलों पर अधिकार है। नई परिषदों के गठन के बाद शाम, नुब्रा, चांगथांग, जांस्कर और द्रास में भूमि से जुड़े फैसले बाहर से संचालित होने के बजाय संबंधित जिलों की अपनी निर्वाचित संस्थाएँ लेंगी।

लद्दाख जैसे क्षेत्र में इसे विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यहाँ भूमि का स्थानीय संस्कृति, पारंपरिक आजीविका, पर्यावरण संरक्षण और जनसांख्यिकीय चिंताओं से गहरा संबंध है।

ऐसे महत्वपूर्ण फैसलों का अधिकार जिला स्तर की निर्वाचित संस्थाओं को मिलने से स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ने की उम्मीद है। साथ ही यह भी सुनिश्चित होगा कि विकास योजनाएँ प्रत्येक क्षेत्र की जरूरतों और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप तैयार की जाएँ।

रोजगार के फैसले स्थानीय समुदायों के करीब जाने के लिए

स्वायत्त हिल विकास परिषदों की भूमिका जिला स्तर पर रोजगार से जुड़े मामलों में भी महत्वपूर्ण होगी। ये परिषदें जिला कैडर के पदों पर भर्ती और प्रमोशन की प्रक्रिया का नियमन करेंगी, जिससे संबंधित जिलों में सरकारी नौकरियों से जुड़े निर्णयों में स्थानीय निर्वाचित संस्थाओं की सीधे भागीदारी सुनिश्चित होगी।

इससे प्रशासनिक जवाबदेही मजबूत होने की उम्मीद है। साथ ही, जिलों को अपने वर्कफोर्स के प्रबंधन और स्थानीय शासन की प्राथमिकताओं के अनुरूप फैसले लेने में पहले से अधिक अधिकार और नियंत्रण मिलेगा।

प्रत्येक जिले के लिए वित्तीय शक्तियाँ

नई स्वायत्त हिल विकास परिषदों को लद्दाख स्वायत्त हिल विकास परिषद (LAHDC) अधिनियम के तहत वित्तीय अधिकार भी दिए जाएँगे। प्रत्येक परिषद का अपना काउंसिल फंड होगा और कानून के प्रावधानों के अनुसार उन्हें टैक्स और फीस एकत्र करने का अधिकार भी प्राप्त होगा।

अपने वित्तीय संसाधन होने से जिलों को स्थानीय जरूरतों के आधार पर विकास योजनाएँ तैयार करने में मदद मिलने की उम्मीद है। इससे उन्हें पूरी तरह बाहरी स्तर पर लिए जाने वाले फैसलों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

अधिकारियों का मानना है कि यह वित्तीय स्वायत्तता प्रत्येक जिले को अपनी प्राथमिकताओं की पहचान करने और उसी के अनुरूप संसाधनों का आवंटन करने में सक्षम बनाएगी।

स्थानीय जरूरतों के आधार पर विकास योजनाएँ

लद्दाख का क्षेत्रफल लगभग 60,000 वर्ग किलोमीटर है और इसमें ऐसे कई क्षेत्र शामिल हैं, जहाँ भौगोलिक परिस्थितियाँ, जलवायु और आर्थिक गतिविधियाँ एक-दूसरे से काफी अलग हैं। प्रशासन का मानना है कि एक जैसी विकास नीति सभी जिलों की जरूरतों को पूरा नहीं कर सकती।

उदाहरण के तौर पर, चांगथांग के ऊँचाई वाले पशुपालक समुदायों की चुनौतियाँ शाम के कृषि क्षेत्रों, ज़ांस्कर की दूरस्थ घाटियों, द्रास के सीमावर्ती इलाके या पर्यटन पर आधारित नुब्रा घाटी की जरूरतों से पूरी तरह अलग हैं।

हर जिले में निर्वाचित स्वायत्त हिल विकास परिषद बनने के बाद स्थानीय जनप्रतिनिधि अपने-अपने क्षेत्रों की विशेष आवश्यकताओं के अनुरूप विकास योजनाएँ तैयार कर सकेंगे। एक समान विकास मॉडल अपनाने के बजाय अब प्रत्येक जिले को यह तय करने की अधिक स्वतंत्रता होगी कि संसाधनों का निवेश कहाँ किया जाए और किन परियोजनाओं को प्राथमिकता दी जाए।

प्रमुख सार्वजनिक सेवाओं की जिम्मेदारी

विकास योजनाएँ तैयार करने के अलावा स्वायत्त हिल विकास परिषदें उन कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों की भी निगरानी करेंगी, जिनका सीधा संबंध लोगों के दैनिक जीवन से है। इनमें स्वास्थ्य सेवाएँ, शिक्षा, पर्यटन, स्थानीय बुनियादी ढाँचा और सामाजिक कल्याण योजनाओं का क्रियान्वयन शामिल है।

चूँकि लद्दाख का बड़ा हिस्सा दुर्गम भौगोलिक क्षेत्र में फैला हुआ है और यहाँ कई दूर-दराज की बस्तियाँ हैं, इसलिए सरकार का मानना है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया को लोगों के करीब लाने से सार्वजनिक सेवाओं की उपलब्धता और गुणवत्ता में सुधार होगा।

स्थानीय जनप्रतिनिधियों से यह उम्मीद की जा रही है कि वे अपने क्षेत्रों की समस्याओं और जरूरतों को बेहतर ढंग से समझेंगे तथा जिला-विशेष चुनौतियों का अधिक तेजी और प्रभावी तरीके से समाधान कर सकेंगे।

एक बड़े गवर्नेंस मॉडल पर भी चर्चा हो रही है

सभी सात जिलों में स्वायत्त हिल विकास परिषदों के गठन की घोषणा लद्दाख की भविष्य की शासन व्यवस्था को लेकर चल रही व्यापक चर्चा का हिस्सा है। केंद्र सरकार और लद्दाख के प्रतिनिधि संविधान के अनुच्छेद 371 से जुड़े एक विशेष ढाँचे के तहत केंद्र शासित प्रदेश (UT) स्तर पर एक प्रतिनिधि निकाय बनाने के प्रस्ताव पर भी काम कर रहे हैं।

प्रशासन के अनुसार, प्रस्तावित निकाय को विधायी, कार्यकारी, वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियाँ दिए जाने की संभावना है। मुख्य सचिव आशीष कुंद्रा ने कहा कि यह मॉडल देश के अन्य हिस्सों में लागू किसी भी व्यवस्था से अलग होगा।

उन्होंने कहा, “यह मॉडल अनूठा होगा और देश के किसी अन्य हिस्से में मौजूद व्यवस्था की हूबहू नकल नहीं होगा। अन्य मॉडलों की सर्वोत्तम विशेषताओं को अपनाकर उन्हें लद्दाख की जरूरतों और आकांक्षाओं के अनुरूप नया स्वरूप दिया जाएगा।”

उन्होंने यह भी बताया कि आने वाले हफ्तों में लद्दाख के प्रतिनिधि और केंद्र सरकार के अधिकारी मिलकर प्रस्तावित व्यवस्था का प्रारूप तैयार करेंगे, ताकि इस नए तंत्र को अंतिम रूप दिया जा सके।

हालाँकि केंद्र शासित प्रदेश स्तर के इस प्रतिनिधि निकाय पर अभी चर्चा जारी है और इसकी शक्तियों को परिभाषित करने से पहले संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता होगी। लेकिन सभी सात जिलों में स्वायत्त हिल विकास परिषदों के गठन का फैसला इस दिशा में पहला बड़ा कदम है, जिसकी अब आधिकारिक पुष्टि कर दी गई है।

पंचायती राज संस्थाएँ जारी रहेंगी

प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि नई व्यवस्था मौजूदा पंचायती राज संस्थाओं का स्थान नहीं लेगी। गाँव स्तर की निर्वाचित संस्थाएँ पहले की तरह काम करती रहेंगी और जिला स्तर की ऑटोनॉमस हिल डेवलपमेंट काउंसिल के साथ समानांतर रूप से कार्य करेंगी।

यदि भविष्य में प्रस्तावित केंद्र शासित प्रदेश (UT) स्तर के प्रतिनिधि निकाय का गठन होता है, तो लद्दाख में तीन स्तरों पर निर्वाचित संस्थाएँ होंगी गाँव स्तर पर पंचायतें, जिला स्तर पर स्वायत्त हिल विकास परिषदें (AHDC) और केंद्र शासित प्रदेश स्तर पर एक प्रतिनिधि निकाय। इस त्रिस्तरीय व्यवस्था का उद्देश्य गाँव स्तर से लेकर केंद्र शासित प्रदेश स्तर तक लोकतांत्रिक भागीदारी को और अधिक मजबूत बनाना है।

लद्दाख के शासन में बड़ा बदलाव

करीब तीन दशकों से लेह और कारगिल की स्वायत्त हिल विकास परिषदें लद्दाख में स्थानीय शासन की प्रमुख निर्वाचित संस्थाएँ रही हैं। अब इसी व्यवस्था को शाम, नुब्रा, चांगथांग, ज़ांस्कर और द्रास तक विस्तार देने का फैसला केंद्र शासित प्रदेश की शासन प्रणाली में एक बड़ा बदलाव लाने वाला माना जा रहा है।

इस प्रस्ताव का उद्देश्य प्रत्येक जिले को भूमि, रोजगार, वित्त, सार्वजनिक सेवाओं और विकास योजनाओं से जुड़े मामलों में अधिक अधिकार देना है, ताकि फैसले उन लोगों के अधिक करीब लिए जा सकें, जिन पर उनका सीधा प्रभाव पड़ता है।

नई परिषदों के कामकाज शुरू होने से पहले सरकार जहाँ आवश्यक होगा वहाँ लद्दाख स्वायत्त हिल विकास परिषद (LAHDC) अधिनियम में संशोधन करेगी और निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन की प्रक्रिया भी पूरी करेगी।

इन सभी औपचारिकताओं के पूरा होने के बाद लद्दाख में स्वायत्त हिल विकास परिषदों की संख्या दो से बढ़कर सात हो जाएगी और प्रत्येक जिले की अपनी निर्वाचित परिषद होगी।

सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को और मजबूत करना, स्थानीय शासन व्यवस्था में सुधार लाना और लद्दाख के हर हिस्से को अपने भविष्य को आकार देने में अधिक प्रभावी आवाज देना है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

न सांसद हैं-न विधायक फिर भी लेटरहेड पर ‘अशोक स्तंभ’: TMC प्रवक्ता साकेत गोखले ने किया ‘राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह अधिनियम’ का उल्लंघन, जानिए क्या कहते हैं नियम

तृणमूल कॉन्ग्रेस के पूर्व सांसद साकेत गोखले का केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को लिखा पत्र विवादों में आ गया है। उन्होंने पत्र में भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक से सरकार को संपर्क करने का आग्रह किया है, लेकिन पत्र के लिए जिस लेटरहेड का इस्तेमाल किया, उसमें राष्ट्रीय प्रतीक ‘अशोक स्तंभ’ बना हुआ है, साथ ही मोटे अक्षरों में ‘पूर्व सांसद’ लिखा हुआ है। नियम के मुताबिक, पूर्व सांसद को ऐसे लेटरहेड के इस्तेमाल की अनुमति नहीं है, जिसमें राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह हों।

क्या लिखा है खत में

तृणमूल कॉन्ग्रेस के पूर्व सांसद ने खत में केन्द्र सरकार से आग्रह किया है कि वह सोनम वांगचुक से संपर्क कर उनका भूख हड़ताल खत्म करवाए। वांगचुक NEET और CBSE परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के विरोध में 28 जून 2026 से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं। गोखले ने सोशल मीडिया पर अपने उस पत्र की कॉपी को साझा किया।

गोखले ने यह पत्र 15 जुलाई 2026 को लिखा है। इसमें वांगचुक के बिगड़ते स्वास्थ्य का हवाला देते हुए कहा गया है कि उनका वजन महज दो सप्ताह में 8 किलोग्राम से अधिक कम हो गया है। उन्होंने मंत्री से अपील की है कि वे कम से कम उनसे संवाद करें और देश भर के लाखों छात्रों की चिंता का समाधान करें।

(साभार-x@sakeygokhale)

साकेत गोखले ने अपने निजी स्टेशनरी पर राष्ट्रीय प्रतीक का उपयोग करके कानून का उल्लंघन किया है, क्योंकि पूर्व सांसदों और विधायकों को राष्ट्रीय प्रतीकों का इस तरह से इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं है। यह भारत के राज्य प्रतीक (उपयोग विनियमन) नियम, 2007 का सीधा उल्लंघन है, जो भारत के राज्य प्रतीक (अनुचित उपयोग निषेध) अधिनियम, 2005 (State Emblem of India – Prohibition of Improper Use Act, 2005) के तहत बनाए गए थे।

इन नियमों के नियम 10 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि न केवल पूर्व सांसद और विधायक, बल्कि पूर्व मंत्री, पूर्व न्यायाधीश और सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी भी किसी तरह से राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह का उपयोग नहीं कर सकते हैं। नियम 10 में कहा गया है, “इन नियमों के तहत अधिकृत व्यक्तियों के अलावा कोई भी व्यक्ति (जिनमें सरकार के पूर्व पदाधिकारी, जैसे पूर्व मंत्री, पूर्व सांसद, पूर्व विधानसभा सदस्य, पूर्व न्यायाधीश और सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी शामिल हैं) किसी भी प्रकार से प्रतीक चिन्ह का उपयोग नहीं करेगा।”

इस कानून में उन अधिकारियों की सूची दी गई है जो अपने स्टेशनरी पर इस प्रतीक चिन्ह का उपयोग कर सकते हैं, और इस सूची में पूर्व सांसदों और विधायकों को शामिल नहीं किया गया है। केवल संसद और विधान सभाओं या परिषदों के वर्तमान सदस्यों को ही इसका उपयोग करने की अनुमति है और वह भी आधिकारिक कार्यों के लिए। नियम में ये बताया गया है कि किस-किस काम के लिए इसका इस्तेमाल हो सकता है। साथ ही अधिनियम की अनुसूची 1 में अधिकारियों की पूरी सूची दी गई है, जो इसका इस्तेमाल कर सकते हैं।

किन लोगों को राज्य प्रतीक का उपयोग करने की अनुमति है

2007 के नियमों के अनुसार, राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ का उपयोग करने की अनुमति भारत के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल और उपराज्यपाल, भारत के मुख्य न्यायाधीश और उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय, लोकसभा और राज्यसभा, केंद्रीय मंत्रालय और विभाग, राज्य सरकारों के विभाग, भारतीय दूतावास और उच्चायोग, केंद्र एवं राज्य सरकार के वे कार्यालय जिन्हें नियमों के अंतर्गत अनुमति दी गई हो, कुछ वैधानिक निकाय और आयोग, यदि उन्हें केंद्र सरकार द्वारा अधिकृत किया गया हो। इनके लिए भी उपयोग केवल आधिकारिक कार्य, सरकारी पत्राचार, सील, दस्तावेज, भवन, वाहन आदि तक सीमित होता है।

यह प्रतिबंध इसलिए लगाया गया है ताकि किसी भी तरह से यह धारणा न बने कि कोई मैसेज आधिकारिक है या किसी संवैधानिक प्राधिकरण या सरकारी कार्यालय से आया है। गोखले ने अपने निजी लेटरहेड पर प्रतीक चिन्ह लगाकर यही भ्रम पैदा की है, जिसे कानून रोकना चाहता है।

नियम 10(1) के तहत साफ कहा गया है कि सरकार के सभी पूर्व पदाधिकारियों चाहे वह पूर्व राष्ट्रपति, पूर्व प्रधानमंत्री, पूर्व केंद्रीय मंत्री, पूर्व सांसद, पूर्व राज्यपाल या पूर्व जज हों, वे आधिकारिक स्टेशनरी या किसी भी दूसरे रूप में राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ का उपयोग नहीं कर सकते। जैसे ही कोई व्यक्ति अपने संवैधानिक पद को छोड़ता है, रिटायर होता है या उसका कार्यकाल समाप्त होता है, उसका राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह का उपयोग करने का अधिकार भी तुरंत खत्म हो जाता है।

जाना पड़ सकता है जेल

2005 के अधिनियम में आगे यह प्रावधान है कि कोई भी व्यक्ति जो बिना पूर्व अनुमति के प्रतीक चिन्ह या उसके मिलते-जुलते रूप का उपयोग करता है, जिससे यह प्रतीत होता है कि यह सरकार से संबंधित है या एक आधिकारिक दस्तावेज है, तो उसे दो साल तक की जेल की सजा हो सकती है या उस पर जुर्माना लगाया जा सकता है अथवा जुर्माना और सजा दोनों ही दिया जा सकता है।

भारत के राज्य चिह्न (अनुचित उपयोग निषेध) अधिनियम, 2005 की धारा 3 में कहा गया है, “कोई भी व्यक्ति राज्य चिह्न या उससे मिलते-जुलते चिन्ह का उपयोग इस तरह नहीं करेगा कि जिससे यह आभास हो कि यह सरकार से संबंधित है या यह केंद्र सरकार या राज्य सरकार का आधिकारिक दस्तावेज है, जब तक कि केंद्र सरकार या अधिकृत अधिकारी से पूर्व अनुमति न मिल जाए।”

धारा 7 (1) में दंड के बारे में बताया गया है, “धारा 3 के प्रावधानों का उल्लंघन करने वाला कोई भी व्यक्ति दो वर्ष तक के कारावास या पाँच हजार रुपये तक के जुर्माने या दोनों से दंडित किया जाएगा। यदि वह अपने अपराध को दोहराता है तो हर बार अपने अपराध के लिए कम से कम छह महीने से दो वर्ष तक के कारावास और पाँच हजार रुपये तक के जुर्माने से दंडित किया जाएगा।”

यह कानून किसी भी व्यापार, व्यवसाय के उद्देश्य से प्रतीक चिन्ह का उपयोग करने पर दंड का प्रावधान भी करता है। इसलिए नियम में साफ कहा गया है कि सभी के निजी काम, निजी कंपनी, एनजीओ, सोसायटी, राजनीतिक दल, निजी कॉलेज, स्कूल या यूनिवर्सिटी, निजी अस्पताल, व्यापारिक प्रतिष्ठान, यूट्यूब चैनल, वेबसाइट या मीडिया संस्थान, अधिवक्ता, डॉक्टर, इंजीनियर या दूसरे पेशेवर अपनी निजी पहचान के लिए इसका इस्तेमाल नहीं कर सकते।

हालाँकि गोखले ने लेटरहेड पर खुद को ‘पूर्व सांसद’ के रूप में सही तरीके से लिखा है, लेकिन लेटरहेड पर अशोक स्तंभ की उपस्थिति यह बताती है कि उन्होंने लेटरहेड कानून का उल्लंघन किया है। पूर्व सांसदों को अपने व्यक्तिगत या राजनीतिक पत्राचार पर राजकीय प्रतीक चिन्ह का उपयोग करने का विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है, यह प्रतिबंध सभी पूर्व सदस्यों पर समान रूप से लागू होता है।

साकेत गोखले जुलाई 2023 के उपचुनाव में तृणमूल कॉन्ग्रेस की तरफ से राज्यसभा के लिए चुने गए थे। चूँकि वे गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री लुइज़िन्हो फलेरो के इस्तीफे से खाली हुई सीट पर चुने गए थे, इसलिए उन्होंने राज्यसभा नियमों के अनुसार खाली सीट का पूरा कार्यकाल नहीं बल्कि शेष कार्यकाल पूरा किया। इसलिए गोखले की राज्यसभा सदस्यता अप्रैल 2026 में खत्म हो गई। पार्टी ने उन्हें फिर से राज्यसभा में नहीं भेजा। इसलिए वे पूर्व सांसद हैं।

भारत के लिए सिर्फ सस्ता विदेशी सामान नहीं, इससे कहीं बड़ी जीत है UK के साथ FTA: समझिए- आम भारतीय का फायदा

भारत और यूनाइटेड किंगडम (UK) के बीच मुक्त व्यापार समझौता (FTA) बुधवार (15 जुलाई 2026) से लागू हो गया है। इस समझौते के लागू होने के बाद दोनों देशों के बीच हजारों उत्पादों पर आयात शुल्क या तो तुरंत कम हो जाएगा या आने वाले वर्षों में चरणबद्ध तरीके से घटाया जाएगा। इसका असर भारत में बिकने वाली ब्रिटिश स्कॉच व्हिस्की, जिन, चॉकलेट, बिस्कुट, कॉस्मेटिक्स, प्रीमियम कारों, लग्जरी मोटरसाइकिलों, मेडिकल उपकरणों और कुछ खाद्य उत्पादों की कीमतों पर दिखाई देगा।

इस समझौते में ब्रिटिश उत्पाद तो सस्ते होंगे ही, साथ ही भारत के निर्यातकों को अब ब्रिटेन के बाजार में लगभग पूरी तरह शुल्क-मुक्त पहुँच मिलेगी। करीब 99 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर भारतीय वस्तुओं को शून्य शुल्क या रियायती शुल्क का लाभ मिलेगा। इसके दायरे में भारत से ब्रिटेन भेजे जाने वाले लगभग पूरे निर्यात मूल्य को शामिल किया गया है।

करीब एक साल बाद लागू हुआ समझौता

भारत और ब्रिटेन ने इस समझौते पर 24 जुलाई 2025 को हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद आवश्यक घरेलू प्रक्रियाएँ पूरी की गईं और अब 15 जुलाई 2026 से इसे लागू कर दिया गया है। दोनों देशों के बीच समझौते तक पहुँचने के लिए 14 दौर की बातचीत हुई थी।

भारत-UK के बीच हुए इस समझौते में 30 अध्याय हैं। यह केवल वस्तुओं पर आयात शुल्क घटाने तक सीमित नहीं है। इसमें डिजिटल व्यापार, दूरसंचार, वित्तीय सेवाएँ, बौद्धिक संपदा, नवाचार, छोटे और मध्यम उद्योग, स्थिरता, पारदर्शिता, सरकारी खरीद और पेशेवरों की अस्थायी आवाजाही जैसे विषय भी शामिल हैं।

दोनों देश इस समझौते के जरिए व्यापारिक नियमों को सरल बनाने, कंपनियों को अधिक निश्चितता देने और वस्तुओं तथा सेवाओं के द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। भारत और ब्रिटेन ने आने वाले वर्षों में कुल द्विपक्षीय व्यापार को लगभग 100 अरब डॉलर तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा है।

भारत-UK व्यापार 25 अरब डॉलर के पार

भारत और ब्रिटेन के बीच वस्तुओं का व्यापार हाल के वर्षों में बढ़ा है। वित्त वर्ष 2025-26 में दोनों देशों के बीच वस्तु व्यापार बढ़कर 25.13 अरब डॉलर हो गया। यह वित्त वर्ष 2024-25 में 23.13 अरब डॉलर और 2021-22 में 17.48 अरब डॉलर था।

हालाँकि, 2025-26 के दौरान भारत का ब्रिटेन के साथ व्यापार सरप्लस तेजी से घटा। भारत ने ब्रिटेन को 13.44 अरब डॉलर का निर्यात किया, जो पिछले वर्ष के 14.55 अरब डॉलर से कम था। इसी दौरान ब्रिटेन से भारत का आयात 8.58 अरब डॉलर से बढ़कर 11.68 अरब डॉलर हो गया। इसमें 36.11 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

इसी कारण भारत का व्यापार अधिशेष 5.97 अरब डॉलर से घटकर 1.76 अरब डॉलर रह गया। नए व्यापार समझौते से भारतीय निर्यातकों को ब्रिटेन में बेहतर अवसर मिलने और निर्यात बढ़ने की उम्मीद है।

भारत को क्या बड़ा फायदा होगा?

इस समझौते से भारत को सबसे बड़ा लाभ ब्रिटेन के बाजार में लगभग शुल्क-मुक्त पहुँच के रूप में मिलेगा। भारत के करीब 99 प्रतिशत निर्यात उत्पादों पर ब्रिटेन शुल्क समाप्त करेगा। इसका सीधा लाभ उन क्षेत्रों को मिलेगा जिनमें भारत बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार देता है।

इनमें कपड़ा, चमड़ा, जूते, समुद्री उत्पाद, खेल का सामान, खिलौने, रत्न और आभूषण, इंजीनियरिंग वस्तुएँ, ऑटो कलपुर्जे, इंजन, जैविक रसायन और दवा उद्योग प्रमुख हैं।

ब्रिटेन दुनिया के सबसे बड़े आयातक देशों में शामिल है लेकिन उसके कुल आयात में भारत की हिस्सेदारी अभी बहुत कम है। ब्रिटेन करीब 929 अरब डॉलर की वस्तुओं का आयात करता है जबकि भारत का निर्यात करीब 15.2 अरब डॉलर के आसपास रहा है। यह ब्रिटेन के कुल आयात का लगभग 1.6 प्रतिशत है।

कपड़ा क्षेत्र में भी भारत के लिए बड़ा अवसर है। ब्रिटेन हर वर्ष करीब 21 अरब डॉलर के कपड़ों का आयात करता है लेकिन इसमें भारत की हिस्सेदारी केवल लगभग 6 प्रतिशत है। ब्रिटेन के 33 अरब डॉलर के प्रसंस्कृत खाद्य आयात में भारत की हिस्सेदारी एक प्रतिशत से भी कम है।

इसी तरह ब्रिटेन करीब 31 अरब डॉलर की दवाएँ आयात करता है, जिसमें भारत की हिस्सेदारी करीब 3.2 प्रतिशत है। 36 अरब डॉलर के रसायन आयात में भारत का हिस्सा लगभग 2.6 प्रतिशत है। भारत की ऑटो कलपुर्जा बाजार में हिस्सेदारी भी सीमित है। शुल्क हटने के बाद भारतीय कंपनियाँ ब्रिटेन में उन देशों के आपूर्तिकर्ताओं से बेहतर मुकाबला कर पाएँगी जिन्हें पहले से रियायती बाजार पहुँच मिली हुई थी।

भारतीय सेवा क्षेत्र और पेशेवरों को भी लाभ

समझौता केवल वस्तुओं के कारोबार तक सीमित नहीं है। भारतीय IT कंपनियों, परामर्श संस्थाओं, इंजीनियरों, वास्तुकारों, लेखाकारों, स्वास्थ्य पेशेवरों और शिक्षा सेवा देने वाली कंपनियों को भी ब्रिटेन में बेहतर बाजार पहुँच और अधिक नियामक स्पष्टता मिलने की उम्मीद है।

समझौते में 137 सेवा उप-क्षेत्रों को शामिल किया गया है। इसके तहत IT, IT-सक्षम सेवाएँ, वित्तीय सेवाएँ, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेशेवर सेवाएँ और परामर्श क्षेत्र को लाभ मिलने की संभावना है।

व्यापारिक यात्रियों, अनुबंधित सेवा प्रदाताओं और कुछ पेशेवरों की अस्थायी आवाजाही को भी अधिक सुविधाजनक बनाने की व्यवस्था की गई है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि इसका संबंध स्थायी आव्रजन से नहीं, बल्कि अस्थायी पेशेवर आवागमन से है।

सामाजिक सुरक्षा में दोहरा भुगतान नहीं

भारत और ब्रिटेन के बीच डबल कंट्रीब्यूशन कन्वेंशन भी 15 जुलाई से लागू हो गया है। दोनों देशों में एक साथ सामाजिक सुरक्षा अंशदान नहीं देना पड़ेगा। पात्र कर्मचारी ब्रिटेन में योगदान देने के बजाय भारत की सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था में योगदान जारी रखेंगे।

इस व्यवस्था से करीब 75,000 भारतीय कर्मचारियों को लाभ मिलने की उम्मीद है। उन्हें ब्रिटेन में अल्पकालिक नियुक्ति के दौरान दोनों देशों में एक साथ योगदान करने से राहत मिलेगी। उपलब्ध विवरण के अनुसार यह राहत कुछ कर्मचारियों के लिए तीन वर्ष और व्यापक व्यवस्था के तहत पाँच वर्ष तक हो सकती है, जो पात्रता और नियुक्ति की प्रकृति पर निर्भर करेगी।

भारत में कौन-कौन से ब्रिटिश उत्पाद सस्ते हो सकते हैं?

समझौते के तहत भारत करीब 90 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर शुल्क कम या समाप्त करेगा। इनमें से करीब 85% वस्तुएँ अगले दस वर्षों में पूरी तरह शुल्क-मुक्त हो जाएँगी।

भारत में सस्ते होने वाले प्रमुख ब्रिटिश उत्पादों में स्कॉच व्हिस्की, जिन, प्रीमियम कारें, लग्जरी मोटरसाइकिलें, कॉस्मेटिक्स, चॉकलेट, मीठे बिस्कुट, मेडिकल उपकरण, इंजीनियरिंग उत्पाद और कुछ खाद्य वस्तुएँ शामिल हैं।

ब्रिटिश सरकार का अनुमान है कि समझौता लागू होते ही उसके भारत को होने वाले निर्यात पर करीब 40 करोड़ पाउंड की शुल्क बचत होगी। दस वर्ष बाद जब ज्यादातर कटौतियाँ पूरी तरह लागू हो जाएँगी, तब यह लाभ करीब 90 करोड़ पाउंड सालाना तक पहुँच सकता है।

स्कॉच व्हिस्की पर शुल्क आधा, फिर और घटेगा

ब्रिटिश स्कॉच व्हिस्की और जिन समझौते के सबसे चर्चित हिस्सों में शामिल हैं। भारत में स्कॉच व्हिस्की पर अभी तक 150 प्रतिशत सीमा शुल्क लगता था। समझौता लागू होने के बाद यह तुरंत घटकर 75 प्रतिशत हो जाएगा। इसके बाद अगले दस वर्षों में इसे चरणबद्ध रूप से घटाकर 40 प्रतिशत किया जाएगा।

इससे ब्रिटिश शराब कंपनियों को भारतीय बाजार में बड़ा अवसर मिलेगा। फिर भी खुदरा कीमतों में उतनी ही कमी नहीं आएगी, क्योंकि शराब पर राज्य उत्पाद शुल्क, वितरण खर्च और अन्य कर भी लगते हैं। स्कॉच मुख्य रूप से महँगे और प्रीमियम बाजार का उत्पाद है, इसलिए इसका व्यापक भारतीय शराब उद्योग पर सीमित प्रभाव पड़ने की संभावना जताई गई है।

ब्रिटिश कारों पर कोटा आधारित रियायत

ब्रिटेन में बनी पूरी तरह तैयार कारों पर भारत में अभी 110 प्रतिशत तक शुल्क लगता है। समझौते के तहत एक निश्चित कोटा व्यवस्था में यह शुल्क दस वर्षों में घटकर 10 प्रतिशत तक आ सकता है।

यह छूट सभी कारों पर असीमित रूप से लागू नहीं होगी। केवल तय संख्या में आयातित वाहनों को रियायती शुल्क मिलेगा। इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड वाहनों के लिए भी चरणबद्ध और कोटा आधारित व्यवस्था रखी गई है।

भारतीय इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग को सुरक्षा देने के लिए शुरुआती पाँच वर्षों में इलेक्ट्रिक वाहनों को व्यापक रियायत से बाहर रखा गया है। बाद में शुल्क कटौती धीरे-धीरे शुरू होगी। इसका उद्देश्य भारतीय वाहन कंपनियों को प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार होने का समय देना है।

कृषि क्षेत्र को रखा गया सुरक्षित

भारत ने अपने संवेदनशील कृषि और खाद्य क्षेत्रों को समझौते में पूरी तरह नहीं खोला है। डेयरी उत्पाद, सेब और चीज जैसी वस्तुओं को शुल्क रियायत से बाहर रखा गया है। चीनी, पिसा हुआ चावल, सूअर का मांस, चिकन और अंडों को भी या तो बाहर रखा गया है या उनके लिए विशेष सुरक्षा व्यवस्था की गई है।

भारत का डेयरी क्षेत्र करोड़ों छोटे किसानों और ग्रामीण परिवारों से जुड़ा है। इसलिए हाल के व्यापार समझौतों की तरह इस समझौते में भी डेयरी क्षेत्र को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाया गया है।

समझौते में छोटे और मध्यम उद्योगों, स्टार्टअप और महिला उद्यमियों के लिए भी प्रावधान हैं। व्यापार और लैंगिक समानता पर अलग अध्याय का उद्देश्य महिलाओं के स्वामित्व वाले व्यवसायों और महिला कर्मचारियों के लिए व्यापार में अवसर बढ़ाना है।

डिजिटल व्यापार अध्याय इलेक्ट्रॉनिक अनुबंध, डिजिटल प्रमाणीकरण और ऑनलाइन कारोबार की अनावश्यक बाधाएँ कम करने पर केंद्रित है। बौद्धिक संपदा अध्याय पेटेंट प्रक्रियाओं में अधिक पारदर्शिता और दक्षता लाने की बात करता है।

उत्पत्ति के नियमों में भी बदलाव किया गया है। उत्पादों के लिए अलग-अलग नियम तय किए गए हैं और निर्यातकों को स्वयं प्रमाणित करने की अनुमति दी गई है। इससे खासकर छोटे कारोबारियों के लिए समझौते का लाभ लेना आसान हो सकता है।

2040 तक व्यापार में बड़ा उछाल आने का अनुमान

ब्रिटिश सरकार के आकलन के अनुसार, लंबे समय में ब्रिटेन का भारत को निर्यात करीब 60 प्रतिशत बढ़ सकता है। इससे 2040 तक सालाना करीब 15.7 अरब पाउंड का अतिरिक्त निर्यात हो सकता है।

भारत से ब्रिटेन का आयात करीब 25 प्रतिशत बढ़ने और उसमें 9.8 अरब पाउंड की बढ़ोतरी होने का अनुमान है। कुल द्विपक्षीय व्यापार करीब 39 प्रतिशत या सालाना 25.5 अरब पाउंड तक बढ़ सकता है। ब्रिटेन का अनुमान है कि इस समझौते से उसकी अर्थव्यवस्था का आकार 2040 तक 0.13 प्रतिशत बढ़ सकता है, जो सालाना करीब 4.8 अरब पाउंड के बराबर होगा।

भारत के लिए असली अवसर सस्ती स्कॉच या ब्रिटिश कारों से कहीं बड़ा है। ब्रिटेन जैसे विशाल आयात बाजार में लगभग सभी भारतीय वस्तुओं को बिना टैक्स पहुँच मिलना कपड़ा, दवा, चमड़ा, समुद्री उत्पाद, इंजीनियरिंग और ऑटो कलपुर्जा उद्योगों के लिए नई संभावनाएँ खोल सकता है।

अंतिम बाधा: सेमीफाइनल की अग्निपरीक्षा में आज आमने-सामने होंगे अर्जेंटीना और इंग्लैंड

कल डलास की रात एक ब्लॉकबस्टर मुकाबला था – फ्रांस बनाम स्पेन। वह उन रातों में से एक थी, जिनके लिए विश्व कप चार साल तक इंतज़ार करता है। फ्रांस बनाम स्पेन। पहला सेमीफ़ाइनल। नाम भले सेमीफ़ाइनल था, लेकिन दुनिया जानती थी, यह फ़ाइनल से पहले खेला जाने वाला फ़ाइनल है।

यह दो फुटबॉल संस्कृतियों, दो पीढ़ियों और दो सपनों का आमना-सामना था। एक ओर थे विश्व विजेता किलियन एमबाप्पे; रफ़्तार, विस्फोट और निर्णायक क्षणों के खिलाड़ी। दूसरी ओर था उन्नीस बरस का लामीन यमाल, जिसकी बाईं टांग से निकलती गेंदें आज की फुटबॉल दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत पहेलियाँ बन चुकी हैं।

दिलचस्प यह भी था कि दोनों क्लब फुटबॉल में ऐसे रंग पहनते हैं जिनकी दुश्मनी आधुनिक फुटबॉल की सबसे बड़ी कहानियों में गिनी जाती है। और राष्ट्रीय टीमों की जर्सी में भी दोनों की राहें कई बार टकरा चुकी थीं। यूरो 2024 का सेमीफ़ाइनल। फिर नेशन्स लीग 2025 का सेमीफ़ाइनल। दोनों बार स्पेन जीता। दोनों बार फ्रांस अधूरा रह गया।

इसलिए डलास की यह रात हिसाब बराबर करने का मौका थी। यमाल भी इसे समझते थे।

मैच से पूर्व संध्या पर दिए साक्षात्कार में लामीन यमाल कह भी चुके थे- “प्रेशर, और हम पर? जाओ जाकर यह सवाल उनसे करो क्योंकि हम दो दफा उन्हें हरा चुके हैं। प्रेशर तो उन पर होना चाहिए।”

एक तरफ़ दिदिएर देशां की फ्रांस; जिसने पूरे टूर्नामेंट में शायद सबसे संतुलित और सबसे शक्तिशाली फुटबॉल खेली थी। दूसरी तरफ़ लुई डे ला फ़ुएन्ते की स्पेन, जहाँ ग्यारह खिलाड़ी एक ही विचार की ग्यारह परछाइयाँ लगते हैं। साथ हमला, साथ बचाव, साथ जीत। यह एक बेहद जबरदस्त मैच होने जा रहा था। और फिर वह क्षण आ गया।

दोनों ही टीमें मैदान पर उतरती हैं। सत्तर हजार दर्शकों का शोर बता रहा था कि यह कितना बड़ा मैच है और आज जीतने के क्या मायने होने जा रहे हैं। दाँव पर यह तय होना था कि विश्व फुटबॉल की अगली कहानी किसके नाम लिखी जाएगी। 

रेफरी इवान बार्टन से इशारा मिलते ही विश्व कप के पहले सेमीफाइनल मैच की शुरुआत होती है। सफेद जर्सियां पहने फ्रेंच लड़ाके पहले मिनट से ही अटैक करते दिखते हैं। छठवें मिनट में ही आद्रियान राबियो गोल की दिशा में हमला करते हैं। मगर वो टार्गेट को हिट नहीं कर पाते। लेकिन तीन मिनट पश्चात ही आद्रियान राबियो को एक ख़तरनाक फाउल करने के लिए रेफरी द्वारा येलो कार्ड दिखा दिया जाता है। मैच में इतनी जल्दी एक कार्ड मिलने के चलते अब उन्हें एक लंबे समय तक सचेत रहते हुए खेलना होगा।

अब धीरे-धीरे स्पेन अपने रंग में आने लगती है। गेंद पर अच्छी पकड़। एलेक्स बाएना गोलपोस्ट पर निशाना साधते हैं। मगर वह भी निशाने से दूर रह जाते हैं। जवाबी कार्रवाई करते हुए माइकल ओलीस़ स्पेनिश गोलकीपर की परीक्षा लेते हैं। परन्तु उन्हें भी गोल करने में सफलता नहीं मिलती।

लेकिन, मैच के बीसवें मिनट में कुछ अप्रत्याशित घटित हो जाता है। अपने ही बॉक्स में अनुभवी फ्रेंच लेफ्ट बैक लुका डीने, गेंद क्लियर करने के प्रयास में, स्पेनिश राइट विंगर लामीन यमाल को एक किक जड़ देते हैं। फलस्वरूप, रेफरी द्वारा स्पेन को पेनाल्टी दे दी जाती है।

इक्कीस नंबर की जर्सी पहने, स्पेनिश सेंट्रल फॉरवर्ड, मिकेल ओयारजाबाल आगे बढ़ते हैं। रेफरी से इशारा मिलते ही वह स्पॉट किक लेने बढ़ते हैं। एक जोरदार किक। और गोल। माइक मैगनान का दुर्ग फतह कर लिया गया था। स्पेन मैच में 1-0 से आगे हो गई थी। ‘ला रोजा’ के हजारों समर्थकों के शोर से संपूर्ण स्टेडियम गूंजायमान हो उठा था। खेल आगे बढ़ता है। इस गोल के साथ स्पेन के हौसले और भी बुलंद हो गए थे। स्पेन अब अपने पारंपरिक अंदाज में खेलने लगी थी।

हाइड्रेशन ब्रेक के बाद खेल शुरू होता है। स्पेन छोटे-छोटे पासों के साथ आगे बढ़ रही थी। मैच के तीसवें मिनट में फ्रेंच टीम को एक और झटका लगता है। उनकी रक्षापंक्ति की कमान संभाल रहे सलीबा चोटिल हो गए थे। वह दर्द से कराह रहे थे। कोच दिदिएर देशां उन्हें मैदान से बाहर बुलाते हैं और उनके स्थान पर मैक्सेन्स लेक्र्वां को मैदान में भेजते हैं। सैंतीसवें मिनट में स्पेन के लेफ्ट बैक पेड्रो पोर्रो विरोधी गोलपोस्ट की ओर एक जोरदार किक लगाते हैं। फिर एक मिनट पश्चात फैबियान रुईज़ एक जबरदस्त आक्रमण करते हैं। परन्तु दोनों ही मौकों पर स्पेन को दूसरा गोल नहीं मिल पाता।

पहला हाफ समाप्त होता है। स्पेन एक गोल से बढ़त बनाए हुए थी। रोड्री, फैबियान रुईज़ व दानी ओल्मो का स्पेनिश मिडफील्ड कमाल कर रहा था। उनको खेलते देखना आंखों को सुकून दे रहा था। इस तिकड़ी ने फ्रेंच मिडफील्ड को बिल्कुल निचोड़ कर रख दिया था। इस कारण, पूरे टूर्नामेंट में आतंक मचाने वाली फ्रेंच अटैकिंग लाइन तक गेंद पहुंच ही नहीं पा रही थी।

दूसरे हाफ का खेल शुरू होता है। पहले हाफ की शुरुआत में ही येलो कार्ड पाए आद्रियान राबियो की जगह मानू कोने मैदान में उतरते हैं। यह कोच लुई डे ला फुएन्ते का रणनीतिक कौशल ही था कि स्पेन खेल के हर विभाग में इतना बढ़िया खेल रहा था कि मैच लगभग एकतरफा लगने लगा था। दस मिनट पश्चात आक्रमण को धार प्रदान करने के लिए फ्रेंच कोच दिदिएर देशां बार्कोला के स्थान पर देसिरे दोउ को अंदर लाते हैं। मंशा थी कि अटैक को दुरुस्त किया जाए और जल्दी एक गोल दाग कर मैच में बराबरी की जाए। परन्तु हुआ क्या? एक मिनट बाद ही दानी ओल्मो से मिले पास को स्पेनिश लेफ्ट बैक पेड्रो पोर्रो शानदार तरीके से फ्रेंच गोलपोस्ट के भीतर सरका देते हैं।

स्पेन अपनी बढ़त दुगुनी कर चुका था। स्टेडियम में मौजूद चालीस हजार से अधिक स्पेनिश समर्थकों की खुशी का ठिकाना नहीं रहता। दानी ओल्मो और पेड्रो पोर्रो का तालमेल इतना शानदार था कि आप बस उसे आह भरते हुए निहार सकते थे। फ्रांस के पास अब स्पेन के खेल का कोई तोड़ नहीं था। दोनों ही टीमें लगातार विपक्षी गोलपोस्ट पर हमले करती हैं। दोनों ही टीमें गोल स्कोर करने के प्रयास करती दिखती हैं। मगर दोनों ही टीमों को इसमें सफलता नहीं मिलती। नब्बे मिनट का खेल पूर्ण हो चुका था। रेफरी द्वारा सात मिनट का इंजरी टाइम दिया जाता है। फ्रांस अंत तक अटैक करने की कोशिशें करती रहती है। आज उनका दिन नहीं था। उनकी तमाम कोशिशें आज नाकाफी साबित हो चुकी थीं।

रेफरी इवान बार्टन मैच समाप्ति की व्हिस्ल बजा देते हैं। स्पेन मैच जीत गया था। सारे स्टेडियम में ‘एस्पाना-एस्पाना’ के नारे गूंजने लगे थे। कैमरे का फोकस स्पेनिश खिलाड़ियों पर था।
पेड्री दानी ओल्मो को गले लगा रहे थे। टाइट स्पेसेज़ में क्या गजब पासेज़ निकाले थे उन्होंने। लामीन यमाल स्पेनिश समर्थकों के समीप जाकर जश्न मना रहे थे। एमबाप्पे विश्व विजेता खिलाड़ी हैं परन्तु, क्लब व राष्ट्रीय टीम के लिए, लामीन यमाल के खिलाफ पिछली ग्यारह मुलाकातों में नौ में उन्हें हार का सामना करना पड़ा है।

कप्तान रोड्री साथी खिलाड़ियों को गले लगा रहे थे। विश्व कप से पहले कहा जा रहा था कि अब उनकी उम्र और चोटों के चलते उनके पास राष्ट्रीय टीम को देने के लिए कुछ भी नहीं। आज उन्होंने मैदान में कमाल कर दिया था। उन्होंने जिस तरह खेल को डिक्टेट किया वो बेहद शानदार था। पेड्री की जगह प्लेइंग इलेवन में शामिल किए गए फैबियान रुईज़ ने कप्तान रोड्री का बखूबी साथ निभाया था। आजतक उनचास दफा उन्होंने स्पेनिश जर्सी में मैदान का रुख किया है और उन उनचास मौकों पर स्पेन कभी भी हारी नहीं है।

कभी फ्रांस का प्रतिनिधित्व करने वाले आय्म्रिक लापोर्त ने आज रक्षापंक्ति का शानदार तरीके से नेतृत्व किया था। फुलबैक्स पेड्रो पोर्रो व कुक्कुरेया ने न सिर्फ जबरदस्त रक्षण किया था बल्कि अटैक में लामीन आदि का क्या खूब साथ निभाया था। उन्नीस वर्षीय, बेबी फेस्ड असैसिन, पाउ कुबार्सी की जितनी तारीफ की जाए वो उतनी कम ही होगी। कभी चेहरे पर टांके लगवा कर अपनी टीम की खातिर मैदान में उतर गए इस उन्नीस वर्षीय लड़के ने आज, इतने बड़े मंच पर, किलियन एमबाप्पे, उस्मान डेंबेले, बार्कोला, माइकल ओलीस़ व देसीरे दोऊ को गोल मारने से वंचित रख दिया था।

इतनी छोटी उम्र में इतने बड़े मौके पर वह इन सभी बड़े खिलाड़ियों के विरुद्ध आज जिस बेखौफ अंदाज में खेला था वो वाकई देखने योग्य था। लुई डे ला फुएन्ते की स्पेन लगातार तीन सेमीफाइनल मैचों में फ्रांस को पीट चुकी है। फ्रांस का इस विश्व कप में एक खराब दिन रहा और वो विश्व कप से बाहर हो गए। अफसोस, वो बुरा दिन बीती रात था। वो टूर्नामेंट में सभी के फेवरेट्स थे। मगर आज अच्छा खेल खेलते हुए स्पेनिश टीम ने काबिले-तारीफ प्रदर्शन किया था।

पजैशन, पोजीशन व खेल को कैसे नियंत्रित करना होता है इसकी मास्टरक्लास आज स्पेन ने हम खेलप्रेमियों को दी। नौ जून, 2025 की रात, नेशन्स लीग के फाइनल मुकाबले में स्पेन पुर्तगाल से पेनाल्टी शूटआउट में हार गया था। इस दर्दनाक हार के बाद टूट चुके पेड्री ने अपने साथी खिलाड़ियों नीको विलियम्स व लामीन यमाल के साथ अपनी तिकड़ी की एक तस्वीर इंस्टाग्राम पर साझा की थी। इस तस्वीर को उन्होंने एक अजीबोगरीब नंबर कैप्शन दिया था। वह नंबर था “19 07 2026″।

तब यह कैप्शन किसी को भी समझ नहीं आया था। आज स्पेन अपने बेहतरीन प्रदर्शन के दम पर फीफा विश्व कप के फाइनल में पहुंच चुकी है। फाइनल खेले जाने की तारीख है -19.07.2026। किसी ने कहा है ना कि बहुत कुछ ग़लत होगा, सब कुछ सही होने से पहले। नौ जून, 2025 की रात नेशन्स लीग का फाइनल हार कर टूट चुके पेड्री 19.07.2026 को फीफा विश्व कप का फाइनल मुकाबला खेलने मैदान पर उतरेंगे।

अब फाइनल में स्पेन के सामने कौन होगा?

रविवार देर रात न्यूजर्सी स्टेडियम में विश्व कप के फाइनल मुकाबले में स्पेन के सामने कौन खड़ा होगा उसका फैसला आज रात होगा। आज रात भारतीय समयानुसार साढ़े बारह बजे अटलांटा स्टेडियम में इस प्रतियोगिता के दूसरे सेमीफाइनल में गत विजेता अर्जेंटीना का सामना थॉमस टुकेल की इंग्लैंड से है।

कोच थॉमस टुकेल के पास प्रत्येक पोजीशन पर एक ऐसा खिलाड़ी मौजूद है जो उनकी सिखलाई रणनीति को मैदान में हूबहू उतार दे। कप्तान हैरी केन व ज्यूड बेलिंघम तो शानदार गोल स्कोरिंग फॉर्म में हैं ही, एंथोनी गोर्डन व बुकायो साका आदि ने भी उनका बखूबी साथ निभाया है।

पहले तो राउंड ऑफ 16 में मेक्सिको के ख़िलाफ़ दो गोल मारने के पांच दिन बाद ही, ज्यूड बेलिंघम ने फिर दो बेहद अहम गोल दाग क्वार्टर फाइनल मैच में भी खेल का रुख इंग्लैंड की ओर मोड़ दिया था। तेईस वर्षीय ज्यूड बेलिंघम, कप्तान हैरी केन की भांति, अबतक इस विश्व कप में कुल छह गोल दाग चुके हैं।

इंग्लिश टीम अपने इतिहास में चौथी दफा विश्व कप का सेमीफाइनल खेलने उतरेगी। उसके पास जितना अच्छा अटैक है, उतना ही बढ़िया मिडफील्ड व डिफेंस भी है। मिडफील्ड में वर्क हॉर्स डेक्लन राइस के संग अपने जानदार खेल के चलते हाल-फिलहाल तमाम इंग्लिश क्लबों के मध्य चर्चा का विषय रहे एलियट एंडरसन हैं। वहीं डिफेंस में अनुभवी जॉन स्टोन्स के संग मार्क गुएही, जेड स्पेन्स, रीली, कोन्सा आदि मजबूत खिलाड़ी हैं।

पहले तो मेक्सिको और फिर नॉर्वे के खिलाफ मैच में इंग्लैंड ने बता दिया है कि उन्हें कभी भी कोई भी टीम कमतर आंकने की गुस्ताखी न करे। वह अंत तक लड़ते हैं। वहीं, दूसरी ओर अर्जेंटीना की टीम होगी। जो सेमीफाइनल में जगह तो बना चुकी है, परन्तु इसमें लियोनेल मेसी की जादूगरी का बहुत बड़ा योगदान रहा है।

हाल के वर्षों की अर्जेंटीना की टीम अपने ब्रदरहुड के लिए जानी जाती है। यहां कोई स्टार कल्चर देखने के लिए नहीं मिलता। वन फॉर ऑल, ऑल फॉर वन। अपनी तमाम कमियों के साथ, यह टीम अंतिम सांस तक लड़ती है।

यही इस दुनिया की रीत है। सदैव अर्जुन के समक्ष एक कर्ण दब जाता है। आज रात होने जा रहे मुकाबले में अर्जेंटीना की नजरें एक बार फिर रोसारियो से निकले अपने जादूगर लियोनेल मेसी पर टिकी हुई होंगी। लेकिन आज रात उन्हें रोसारियो से निकले एक और खिलाड़ी की कमी बेहद खलेगी। कतर विश्व कप के सेमीफाइनल के उलट उनकी बाईं फ्लैंक पर आज रात ऐंजल डी मारिया नहीं होंगे। ऐंजल डी मारिया अर्जेंटीना के लिए हमेशा बड़े मैचों के खिलाड़ी रहे हैं। मगर इस टूर्नामेंट में अबतक अर्जेंटीनी फॉरवर्ड लाइन अमूमन खामोश ही नजर आई है। न ही कोई ऐसा खिलाड़ी रहा है जिसने ड्रिबल्स से विपक्षी खेमे में खलबली मचाई हो।

इतिहास का एक अपना स्वभाव होता है। वह घटनाओं को कभी पूरी तरह पीछे नहीं छोड़ता; उन्हें स्मृतियों की तहों में सुरक्षित रखता है और अवसर मिलते ही नए संदर्भों में फिर सामने ले आता है। विश्व कप का सेमीफ़ाइनल अक्सर ऐसा ही अवसर होता है, जहाँ वर्तमान की रणनीतियाँ अतीत की विरासत से संवाद करती हैं। आज अटलांटा के मर्सिडीज-बेंज स्टेडियम में इंग्लैंड और अर्जेंटीना आमने-सामने होंगे। इतिहास की धूल से लिपटी ये दोनों टीमें जब 21 साल के अंतराल और वर्ल्ड कप के पन्नों में छठी बार आमने-सामने होंगी, तो हवा में 1966 की गौरवगाथा और 1986 के उस विवादित ‘हैंड ऑफ गॉड’ की गूँज स्पष्ट सुनाई देगी.. माराडोना का Hand of God और Goal of the Century.. 1998 का पेनल्टी शूटआउट, 2002 का बदला और अब पहली बार विश्व कप के सेमीफ़ाइनल में यह टकराव। संयोग देखिए कि 6 विश्व कप भिड़ंतों के इतिहास में यह अध्याय पहले कभी लिखा ही नहीं गया। इंग्लैंड के लिए जूड बेलिंघम जैसे मिडफ़ील्डर शतरंज की बिसात पर वह वज़ीर हैं जो खेल की दिशा बदल सकता है। हैरी केन का हर स्पर्श किसी अनुभवी तलवारबाज़ के अंतिम वार जैसा है। दूसरी ओर, 39 वर्षीय लियोनेल मेसी उस दुर्लभ धूमकेतु की तरह हैं जिसकी चमक समय के नियमों को चुनौती देती है.. जो फुटबॉल के नश्वर पन्नों पर अपना अंतिम अध्याय लिखने आए हैं। मेसी, जिन्होंने विश्व फुटबॉल की हर लकीर को अपने पैरों से छुआ है, आश्चर्यजनक रूप से, 205 अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने के बावजूद यह उनका इंग्लैंड के विरुद्ध पहला मुकाबला होगा। आज की शाम का महत्व केवल इसलिए नहीं कि विजेता फ़ाइनल में स्पेन से भिड़ेगा। महत्व इसलिए भी है कि डिफेंडिंग चैंपियन अर्जेंटीना अपने युग की निरंतरता बचाना चाहता है, जबकि 1966 के बाद पहली विश्व कप ट्रॉफ़ी की तलाश में इंग्लैंड अपनी सबसे संतुलित पीढ़ी के साथ मैदान में उतरेगा। फुटबॉल के इतिहास में कुछ मुकाबले आँकड़ों से शुरू होते हैं, लेकिन यादें बनकर समाप्त होते हैं। इंग्लैंड और अर्जेंटीना की प्रतिद्वंद्विता हमेशा उसी श्रेणी में रही है। महान टीमें ट्रॉफ़ियाँ जीतती हैं, लेकिन महान प्रतिद्वंद्विताएँ पीढ़ियाँ गढ़ती हैं। आज की रात भी शायद वैसी ही हो..

गत विजेता, अल्बीसेलेस्त, के कोच लियोनेल स्कालोनी जरूर काफी चिंताओं से घिरे हुए हैं। उनकी परेशानी का कारण है कि वह अपने अनुभवी खिलाड़ियों के साथ आगे बढ़ें या फिर अपनी टीम की कमजोरियों को ध्यान में रखते हुए बेंच पर मौजूद खुद को साबित करने के लिए भूखे युवा खिलाड़ियों जैसे वैलेंटीन बार्को, नीको पाज़ व सीमिओनी को मैदान पर उतारें।

ख़बरें हैं कि प्रैक्टिस सत्र में उन्होंने सीमिओनी व एज़ेक्विल पालासियोस का काफी पसीना बहाया। हो सकता है कि यह दोनों ही खिलाड़ी प्लेइंग इलेवन का हिस्सा हों। कुछ हद तक जरूरी भी है कि कोच स्कालोनी अपनी प्लेइंग इलेवन में परिवर्तन करें क्योंकि न सिर्फ फॉर्वर्ड लाइन बेअसर रही है बल्कि मिडफील्ड में, पिछले विश्व कप के सितारे, एंजो फर्नानदेज़, मैक एलिस्टर व रोड्रिगो डि पॉल भी पूरे टूर्नामेंट में फॉर्म में नहीं रहे हैं। तमाम खिलाड़ियों पर थकान का असर साफ-साफ दिखाई देता है। वहीं युवा वैलेंटीन बार्को, नीको पाज़ व सीमिओनी अपनी बारी के इंतजार में बेंच पर बैठे ही रहे हैं।

अर्जेंटीना को अगर आज रात यह सेमीफाइनल जीतना है तो कुछ अलग करना ही होगा। निश्चित तौर पर ज्यूड बेलिंघम व हैरी केन की शानदार फॉर्म इंग्लैंड को इस मैच में एक अलग एज प्रदान करती दिखती है। अपनी रणनीतियों के लिए मशहूर, इंग्लिश कोच, थॉमस टुकेल जरूर कोशिश करेंगे कि दो से तीन खिलाड़ियों को मेसी को मैन-मार्क करने के लिए रखा जाए व गेंद को मेसी तक पहुंचने ही न दिया जाए। ऐसे में कोई खिलाड़ी होना चाहिए जो मिडफील्ड व डिफेंसिव लाइन में बनने वाली खाली जगहों का फायदा उठाकर इंग्लैंड को चोट पहुंचा सके। हूलियन अल्वारेज़ व लाउतारो मार्टिनेज को आज अपना सबकुछ झोंक देना होगा।

इंग्लैंड व अर्जेंटीना के मध्य एक बेहद पुरानी प्रतिद्वंद्विता है। कभी माराडोना का ‘हैंड ऑफ गॉड’ रहा हो या बेइंतहा गरमागरम माहौल में डेविड बेखम को मिला रेड कार्ड- इन दोनों ही टीमों के बीच खेले गए मैच कभी भी कोई शांतिपूर्ण मुकाबले नहीं रहे। एकबार तो 1966 विश्व कप के दौरान दोनों ही टीमों की भिड़ंत में इतने फाउल हुए कि दो बेहद घातक फाउल करने पर जब अर्जेंटीनी कप्तान को रेफरी द्वारा मैदान छोड़ने का निर्देश दिया गया तो उन्होंने बाहर जाने से इंकार कर दिया था। फिर, दो पुलिसकर्मी उन्हें मैदान से बाहर ले गए थे। फलस्वरूप, फीफा को फुटबॉल में येलो व रेड कार्ड की परंपरा शुरू करनी पड़ी थी।

परन्तु, अपने इतने बड़े करियर में आज रात पहली दफा मेसी इंग्लैंड के विरुद्ध मैदान में उतरेंगे। हाल के वर्षों में यह इंग्लैंड व अर्जेंटीना की पहली टक्कर होगी। देखना होगा कि टूर्नामेंट के दूसरे सेमीफाइनल में कौन सी टीम जीत दर्ज कर ट्रॉफी जीतने के लिए स्पेन से फाइनल में भिड़ने की हकदार बनती है।

अंकित शर्मा की हत्या में ताहिर हुसैन समेत 6 दोषी करार: पढ़ें- दिल्ली के हिंदू-विरोधी दंगों का वह खूनी सच, जिसे बाकी मीडिया ने दबाया और ऑपइंडिया लगातार सामने लाता रहा

ऑपइंडिया पहला ऐसा संस्थान था जिसने 2020 की शुरुआत में CAA विरोधी प्रदर्शनों के दौरान हुई भीड़ की हिंसा को ‘हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगे’ कहा था।

छह सालों तक ऑपइंडिया ने अपनी ग्राउंड रिपोर्ट्स, विश्लेषण और घटनाक्रम व इसके इस्लामी योजनाकारों की जाँच के माध्यम से यह साबित किया कि जिसे मुख्यधारा का मीडिया ‘CAA-विरोधी हिंसा’ कह रहा था और वामपंथी प्रचारक ‘मुस्लिम-विरोधी दंगे’ व ‘राज्य-प्रायोजित साजिश’ बता रहे थे।

वह वास्तव में हिंदुओं के खिलाफ एक सुनियोजित इस्लामी नरसंहार  था। अंकित शर्मा हत्याकांड में आम आदमी पार्टी (AAP) के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन की दोषसिद्धि के साथ ही, ऑपइंडिया का यह रुख सही साबित हुआ है।

IB कर्मी अंकित शर्मा की हत्या से ताहिर को सजा मिलने तक: 6 साल बाद न्याय पर भरोसा फिर से जगा

नई दिल्ली की कड़कड़डूमा अदालत ने खुफिया ब्यूरो (IB) के कर्मी अंकित शर्मा की हत्या के मामले में 13 जुलाई 2026 को आम आदमी पार्टी (AAP) के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन को दोषी ठहराया।

हुसैन जिसने पहले स्वीकार किया था कि वह ‘हिंदुओं को सबक सिखाना’ चाहता था, उसको IPC की धारा 188 (लोक व्यवस्था की अवज्ञा), 153A (समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना), 147, 148, 149 (दंगा और गैरकानूनी सभा), 365 (अपहरण/व्यहरण), और 302 (हत्या) के तहत अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया है। ताहिर हुसैन के साथ ही पाँच अन्य जिहादियों को भी दोषी ठहराया गया है।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रवीण सिंह ने पर्याप्त सबूत न होने के कारण हुसैन को IPC की धारा 120B और 129 (अपराधिक साजिश) के तहत आरोपों से बरी कर दिया।

25 फरवरी 2020 को, उत्तर-पूर्वी दिल्ली के हिंदू-विरोधी दंगों के दौरान 26 वर्षीय खुफिया ब्यूरो के कर्मचारी अंकित शर्मा की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के खिलाफ प्रदर्शनों के बाद इलाके में भड़की सांप्रदायिक हिंसा के बीच शर्मा लापता हो गए थे।

उनका शव अगले दिन चांद बाग इलाके के एक नाले से बरामद किया गया था, जिस पर कम से कम 51 से 52 बार चाकू घोंपे जाने के निशान थे। एक दिन बाद, मृतक अंकित शर्मा के पिता रविंदर कुमार ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जिसमें आरोप लगाया गया कि चांद बाग पुलिया, मुख्य करावल नगर रोड पर CAA-विरोधी प्रदर्शनों के दौरान पथराव, ईंट-रोड़ेबाजी, आगजनी, गोलीबारी और तोड़फोड़ की घटनाएँ हुई थीं।

उन्होंने आरोप लगाया था कि तत्कालीन आप (AAP) नेता ताहिर हुसैन का कार्यालय उसी इलाके में स्थित था और वहाँ कई गुंडे छिपे हुए थे। मुस्लिम भीड़ ने ताहिर हुसैन के कार्यालय की छत से पथराव किया, पेट्रोल बम फेंके थे तथा गोलियाँ चलाई थीं और उसने जनता के बीच डर का माहौल पैदा कर दिया था। 25 फरवरी को अंकित शर्मा कार्यालय से वापस आने के बाद घर का कुछ सामान खरीदने बाहर गए थे और वापस नहीं लौटे।

रविंदर कुमार ने अगले दिन गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई। फिर उन्हें पता चला कि एक व्यक्ति की हत्या करने के बाद उसे चांद बाग पुलिया की मस्जिद से खजूरी खास नाले में फेंक दिया गया था। इसके बाद अंकित शर्मा का शव खजूरी खास नाले से बरामद किया गया। उनके अंडरवियर को छोड़कर बाकी सारे कपड़े गायब थे।

अंकित शर्मा के सिर, चेहरे, छाती, पीठ और कमर पर धारदार हथियारों के गहरे जख्म थे। उनकी पहचान छिपाने के लिए उनके चेहरे और शरीर के अन्य हिस्सों को तेजाब से जला दिया गया था। अपनी चार्जशीट में दिल्ली पुलिस ने एक गहरी साजिश का आरोप लगाया था और कहा था कि अंकित शर्मा को विशेष रूप से ताहिर हुसैन के नेतृत्व वाली भीड़ द्वारा निशाना बनाया गया था।

अंततः दिल्ली की अदालत ने ताहिर हुसैन और उसके जिहादी सहयोगियों को अंकित शर्मा की इस भयानक हत्या के लिए दोषी ठहराया है। दोषियों को सजा सुनाया जाना अभी बाकी है।

इस्लामो-लेफ्टिस्ट्स ने ताहिर हुसैन को सिर्फ उसकी मुस्लिम पहचान की वजह से विक्टिम बनाया: विक्टिम होने का मोनोपॉली

ताहिर हुसैन की दोषसिद्धि न केवल अंकित शर्मा के लिए न्याय सुनिश्चित करने के बारे में है बल्कि यह उस बात की भी पुष्टि करती है जो ऑपइंडिया सालों से कहता आ रहा है, कि 2020 के दिल्ली दंगे कोई अचानक भड़की हिंसा नहीं थे बल्कि यह इस्लामी-वामपंथियों द्वारा रची गई एक सुनियोजित साजिश का परिणाम थे।

उमर खालिद, शर्जील इमाम से लेकर अब दोषी ठहराए जा चुके ताहिर हुसैन तक, भारतीय और विदेशी इस्लामी-वामपंथी मीडिया ने हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगों के आरोपित मुस्लिमों को पीड़ितों के रूप में दिखाया और विपरीत सबूतों के बावजूद वे आज तक उन्हें हीरो बनाने में लगे हुए हैं।

अंकित शर्मा की हत्या के कुछ दिनों बाद, कुख्यात हिंदू-द्वेषियों प्रतीक सिन्हा और मोहम्मद जुबैर द्वारा सह-स्थापित वामपंथी प्रचार साइट ऑल्टन्यूज ने ताहिर हुसैन को क्लीन चिट दे दी थी।

यह तब किया गया, जब दंगों के बाद ताहिर की इमारत से पत्थर, पेट्रोल बम, एसिड पैकेट और पेट्रोल बम फेंकने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले देशी गुलेल आदि बरामद किए गए थे और ऐसे वीडियो सामने आए थे जिनमें सैकड़ों लोग इमारत की छत से पत्थर और पेट्रोल बम फेंक रहे थे और ताहिर खुद उन हमलों की निगरानी कर रहा था।

अब प्रतिबंधित हो चुके इस्लामी आतंकवादी संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) ने ताहिर हुसैन को अपना समर्थन दिया था और यहाँ तक दावा किया था कि वह ‘घिनौनी राजनीति’ का शिकार हुआ है। PFI, जो 2047 तक भारत को एक इस्लामी राष्ट्र बनाना चाहता था, उसने दिल्ली दंगों के लिए सीधे तौर पर मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहराया था।

इंटरनेट पर कट्टर इस्लामवादियों ने ताहिर हुसैन का बचाव किया था और दावा किया था कि ताहिर हुसैन की छत पर पाए गए पेट्रोल बम और पत्थर आत्मरक्षा के लिए थे।

बॉलीवुड गीतकार जावेद अख्तर, निर्देशक अनुराग कश्यप, मनोरंजनकर्ता स्वरा भास्कर, गायक विशाल ददलानी और राना अय्यूब व साक्षी जोशी जैसी कई इस्लामी-वामपंथी पत्रकारों ने ताहिर हुसैन का समर्थन किया और उसे एक ऐसे पीड़ित के रूप में पेश किया जिसे उसकी मुस्लिम पहचान के कारण ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ मोदी सरकार द्वारा जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा था।

‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’  ने तो यहाँ तक किया कि अंकित शर्मा के भाई के नाम पर झूठा दावा मढ़ दिया कि ‘जय श्री राम’ के नारे लगाने वाली भीड़ ने उनकी हत्या की थी। ताहिर हुसैन के नेतृत्व वाली मुस्लिम भीड़ द्वारा अंकित शर्मा की हिंदू-घृणा से प्रेरित हत्या को छिपाने के उनके इस प्रयास की पोल खोलते हुए, अंकित के भाई को एक बयान जारी करना पड़ा था और कहना पड़ा था कि WSJ झूठ बोल रहा था।

जमात-ए-इस्लामी ने हुसैन को ‘बेगुनाह‘ घोषित किया, दावा किया कि उसे फंसाया जा रहा है और उसके कामों को आत्मरक्षा बताया। उन्होंने हुसैन के आत्मसमर्पण को इस बात के ‘सबूत’ के रूप में पेश किया कि वह दोषी नहीं हो सकता।

इसी तरह AAP विधायक अमानतुल्ला खान ने दावा किया कि हुसैन को केवल इसलिए जेल में डाला गया क्योंकि वह मुस्लिम था। खान ने यह भी सुझाव दिया था कि सरकार किसी न किसी तरह ऐसे झूठे सबूत तैयार करेगी जिससे यह लगे कि दिल्ली हिंसा की साजिश हुसैन ने रची थी।

नवंबर 2020 में, ‘द वायर’ ने हुसैन को उन कार्यकर्ताओं, विद्वानों और लेखकों में शामिल किया जिन्हें न्यायपालिका के भरोसे छोड़ दिया गया था। इस इस्लामी-वामपंथी मुख पत्र ने दंगे और हत्या के आरोपित ताहिर हुसैन को राजनीतिक दोषारोपण के खेल के एक पीड़ित के रूप में दिखाया।

ऑपइंडिया ने उस समय भी इस बात को रेखांकित किया था कि कैसे ‘द वायर‘ ने ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ की उस मनगढ़ंत कहानी का इस्तेमाल किया था, जिसमें उन्होंने अंकित शर्मा के भाई के हवाले से यह दावा किया था कि उनकी हत्या ‘हिंदू दंगाइयों’ द्वारा की गई थी।

ग्राउंड रिपोर्ट, सबूतों का एनालिसिस, चार्जशीट का एनालिसिस और भी बहुत कुछ: कैसे ऑपइंडिया ने दिल्ली एंटी-हिंदू दंगों की कवरेज में ऐसी कहानियाँ बताईं जिन्हें किसी और ने दबाने की कोशिश की

24 और 25 फरवरी 2020 को उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगे हुए थे। यह हिंसा CAA-विरोधी प्रदर्शनों के बीच भड़की थी। जल्द ही यह कई इलाकों में फैल गई। इसमें 53 लोगों की जान चली गई और सैकड़ों लोग घायल हो गए।

मृतकों में हेड कांस्टेबल रतन लाल, IB के कर्मी अंकित शर्मा, दिलबर नेगी, राहुल सोलंकी, विनोद कुमार और कई अन्य शामिल थे। हिंसा के दौरान 1500 से अधिक सार्वजनिक और निजी संपत्तियों को नुकसान पहुँचाया गया था। घरों, दुकानों, वाहनों, धार्मिक स्थलों और सार्वजनिक बुनियादी ढाँचे पर हमले किए गए थे।

इन दंगों के कारण उत्तर-पूर्वी दिल्ली का एक बड़ा हिस्सा दिनों तक डर के साए में रहा, जिसके बाद स्थिति सामान्य हो सकी। दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने हिंसा के पीछे की बड़ी साजिश की जाँच के लिए प्राथमिकी (FIR) संख्या 52/2020 दर्ज की थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, ये दंगे अचानक नहीं भड़के थे, बल्कि CAA और NRC के खिलाफ प्रदर्शनों की आड़ में रची गई एक गहरी साजिश का हिस्सा थे।

इस FIR में उमर खालिद, शर्जील इमाम, ताहिर हुसैन, खालिद सैफी, इशरत जहाँ, गुलफिशा फातिमा, नताशा नरवाल, देवांगना कलिता, अतहर खान, सफूरा जरगर और अन्य को नामजद किया गया था।

जब इस्लामी-वामपंथी ‘इस्लामोफोबिया’ का हवाला देने, वीडियो साक्ष्यों पर विवाद खड़ा करने, पुलिस की कार्रवाई को सांप्रदायिक रंग देने और गवाहों व जाँचकर्ताओं को जो मिला उसे कमतर आंकने की अपनी सामान्य रणनीति के माध्यम से ताहिर हुसैन के हिंदू-विरोधी अपराधों पर पर्दा डालते हुए अपना पीड़ित होने का दुष्प्रचार फैला रहे थे।

तब ऑपइंडिया ने अंकित शर्मा की हत्या के पीछे की जिहादी सच्चाई और उस व्यापक इस्लामी साजिश को सामने लाने का काम किया, जो खुद ताहिर हुसैन के शब्दों में ‘हिंदुओं को सबक सिखाना’ था।

ऑपइंडिया ने अंकित शर्मा के भाई का इंटरव्यू लिया

ऑपइंडिया ने अंकित शर्मा के भाई अंकुर शर्मा का 27 फरवरी 2020 को एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू प्रकाशित किया था। ऑपइंडिया की एडिटर-इन-चीफ नूपुर जे शर्मा के साथ हुई इस बातचीत में अंकुर ने विस्तार से बताया था कि कैसे अंकित चांद बाग, मूँगा नगर इलाके में हिंसा को शांत कराने के लिए अपने घर से निकले थे।

अंकित ने अपने परिवार से कहा था कि हिंदू और मुस्लिम दोनों ही उन्हें जानते हैं और उनकी बात मानेंगे। अंकित ने अपनी IB अधिकारी की पहचान पर जोर दिया था, क्योंकि उनका मानना था कि इससे लोग उन पर बेहतर तरीके से भरोसा कर पाएँगे।

अंकुर ने ऑपइंडिया को बताया, “उसने कहा मैं इन लोगों को जानता हूँ, ये मेरी बात सुन लेंगे।” जहाँ हिंदुओं ने उनकी बात मानी और वे पीछे हट गए, वहीं मुस्लिम भीड़ यह जानकर और भड़क गई कि शर्मा एक IB अधिकारी थे, उन्होंने तुरंत उन्हें दबोच लिया और खींचते हुए ताहिर हुसैन के 4-मंजिला मकान की तरफ ले गए। इस पूरे समय के दौरान, पत्थर, पेट्रोल बम और गोलियाँ बरस रही थीं।

अंकुर ने कहा, “दीदी, ताहिर हुसैन ने ही उसे (अंकित शर्मा) को मारा है। वह यहाँ के दंगों का सरगना है। वह दंगे करवा रहा है। वह उन मुसलमानों को निर्देश दे रहा था जिन्होंने उसे घर के अंदर खींचा। अरविंद केजरीवाल मेरे भाई को एक दंगाई के रूप में दिखा देंगे। वह कोई दंगाई नहीं था।

वह एक सरकारी अधिकारी था जो वहाँ लोगों को लड़ाई रोकने के लिए समझाने गया था। वह दोनों पक्षों के लोगों को जानता था,” अंकुर ने यह भी अनुरोध किया कि अंकित शर्मा को शहीद का दर्जा दिलाने के लिए एक अभियान चलाया जाना चाहिए।

एक ऐसे समय में जब विदेशी और भारतीय वामपंथी मीडिया हिंदुओं को दिल्ली दंगों के मुख्य योजनाकार के रूप में दिखने की कोशिश की और ताहिर हुसैन को बिल्कुल पाक-साफ दिखाने के लिए दिन-रात काम कर रहा था, अंकित शर्मा के भाई के साथ ऑपइंडिया के एक इंटरव्यू ने तत्कालीन AAP पार्षद के असली जिहादी चेहरे को बेनकाब कर दिया था।

ऑपइंडिया ने उस लड़के से बात की जिसने मुस्लिम भीड़ को अंकित शर्मा को ताहिर हुसैन की बिल्डिंग के अंदर घसीटते हुए देखा था

ऑपइंडिया के एक रिपोर्टर ने 28 फरवरी 2020 को एक हिंदू नाबालिग लड़के से बात की थी जो एक हिंसक मुस्लिम भीड़ के हाथों दर्दनाक मौत से चमत्कारिक रूप से बचने में सफल रहा था।

खुद को सुरक्षित बचाने में सफल रहे इस नाबालिग लड़के ने अब निष्कासित हो चुके AAP नेता ताहिर हुसैन की इमारत के भीतर पनाह लिए हुए मुस्लिम भीड़ द्वारा मचाई गई तबाही के बारे में रोंगटे खड़े कर देने वाले बाते बताई।

लड़के ने कांपती आवाज में उन तीन लोगों (जिनमें अंकित शर्मा भी शामिल थे) का जिक्र करते हुए कहा, जिन्हें हत्यारी भीड़ द्वारा ताहिर हुसैन की इमारत के अंदर खींचा गया था, “वे हमें इमारत के अंदर खींच रहे थे। मैं किसी तरह उनकी पकड़ से छूटा और खुद को बाहर निकाला। लेकिन जब मैंने पीछे मुड़कर देखा, तो वे तीनों गायब थे।”

लड़के ने यह भी खुलासा किया कि मुस्लिम भीड़ ने चांद बाग में एक शिव मंदिर पर भी हमला किया था।

दिल्ली दंगों के विकिपीडिया पेज पर इस्लामो-लेफ्टिस्ट नैरेटिव के दखल की जाँच

मार्च 2020 की शुरुआत में, ऑपइंडिया ने एक खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें इस बात को रेखांकित किया गया था कि कैसे ‘2020 दिल्ली दंगे’ या ‘उत्तर पूर्वी दिल्ली दंगे‘ शीर्षक से एक विकिपीडिया लेख 25 फरवरी को एक वरिष्ठ विकिपीडिया संपादक द्वारा बनाया गया था, जो ‘DBigXray‘ यूजरनेम का उपयोग करता है।

इस पेज ने मुस्लिम पीड़ित होने के एकतरफा हौवे को बढ़ावा दिया। हालाँकि इस पेज में अब सालों के दौरान कई बदलाव हुए हैं, लेकिन शुरुआत में इसमें दंगों की छवि के बजाय भाजपा नेता कपिल मिश्रा की तस्वीर लगाई गई थी।

लेख में कपिल मिश्रा को ‘उकसावे’ शीर्षक से एक अलग खंड दिया गया है, जहाँ उन पर दंगे भड़काने का आरोप लगाया गया है। इस पेज ने या तो इस्लामी दंगाइयों की भूमिका को कमतर आंका या फिर महत्वपूर्ण जानकारियों को छिपा लिया।

इस लेख में अशोक नगर में एक मस्जिद पर हुए हमले और भीड़ द्वारा ‘जय श्री राम’ व ‘हिंदुओं का हिंदुस्तान’ के नारे लगाने का उल्लेख तो किया गया था, लेकिन मुस्लिमों और CAA-विरोधी भीड़ द्वारा किए गए किसी भी हमले का कोई संदर्भ नहीं दिया गया।

दूसरी ओर जबकि ऐसे वीडियो मौजूद हैं जिनमें भीड़ को ‘नारा-ए-तकबीर’ और ‘अल्लाहू अकबर’ के नारे लगाते हुए दिखाया गया है, उन्हें इस पेज पर कोई जगह नहीं मिली।

ऑपइंडिया की जाँच ने पुष्टि की कि दिल्ली दंगे के पेज पर इस तरह के पक्षपातपूर्ण संपादन करने वाला संपादक DBigXray, दरअसल दीपेश राज नाम का व्यक्ति था। लेख में अशोक नगर में एक मस्जिद पर हुए हमले और भीड़ द्वारा ‘जय श्री राम’ व ‘हिंदुओं का हिंदुस्तान’ के नारे लगाने का उल्लेख तो किया गया था, लेकिन मुस्लिमों और CAA-विरोधी भीड़ द्वारा किए गए किसी भी हमले का बिल्कुल कोई संदर्भ नहीं है।

दूसरी ओर जबकि ऐसे वीडियो मौजूद हैं जिनमें भीड़ को ‘नारा-ए-तकबीर’ और ‘अल्लाहू अकबर’ के नारे लगाते हुए दिखाया गया है, उन्हें इस पेज पर कोई जगह नहीं मिली।

20 साल के दिलबर सिंह नेगी के दुखी परिवार से मुलाकात

जब दिल्ली में हिंसा भड़की, तो 24 फरवरी की शाम को 20 साल के दिलबर सिंह नेगी को इस्लामी दंगाइयों ने एक तलवार से उनके हाथ-पैर बेरहमी से काटने के बाद जिंदा जला दिया था। खून की प्यासी भीड़ द्वारा उनके शरीर के बाकी हिस्से को मांस के टुकड़े की तरह आग में फेंक दिया गया था।

दिल्ली के हिंदू-विरोधी दंगों, जहाँ एक मुस्लिम भीड़ द्वारा उनकी हत्या कर दी गई थी, उसके ठीक बाद जुलाई 2020 में ऑपइंडिया ने उनके परिवार से मुलाकात की थी। दिलबर के छोटे भाई, देवेंद्र ने बताया कि उन्होंने समय के साथ समझौता कर लिया है, लेकिन उनके माता-पिता अभी भी यह स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं कि दिलबर कभी घर नहीं लौटेगा।

हर त्योहार से पहले जब बेटे घर लौटते हैं, तो उनकी आँखें इस उम्मीद में चमकने लगती हैं कि दिलबर भी वापस आएगा। वे ‘थौलू-त्यार’ त्योहार के दौरान अपने बेटे को फिर से देखने की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन उनकी उम्मीदें तब टूट गईं जब उनका पार्थिव शरीर घर आया।

मुस्लिम भीड़ ने जानबूझकर हिंदू दुकानों को निशाना बनाया

दंगों के बाद 27 फरवरी 2020 को ऑपइण्डिया ने दिल्ली के चांद बाग इलाके का दौरा किया था, जो देश की राजधानी के कई अन्य इलाकों की तरह ही सुलग रहा था।

क्योंकि इस्लामवादी वहाँ बेकाबू होकर उत्पाद मचा रहे थे और पथराव, आगजनी व तोड़फोड़ का सहारा ले रहे थे, जिससे बाद में मचे इस कोहराम में करोड़ों रुपए की सार्वजनिक संपत्तियों को नष्ट कर दिया गया और पुलिसकर्मियों व नागरिकों को चोटें आईं।

स्थानीय लोगों ने बताया कि मुस्लिम दंगाइयों ने यह तय करने से पहले कि किस दुकान को जलाना है और किसे छोड़ना है, दुकानों के नाम वाले साइनबोर्ड पढ़े थे। जहाँ हिंदुओं की दुकानों को बर्बाद कर दिया गया, लूटा गया और जला दिया गया, वहीं मुस्लिमों की दुकानों को अछूता छोड़ दिया गया। इसका सीधा सा मतलब यह था कि इन मुस्लिम दंगाइयों ने पहले से ही चांद बाग में रहने वाले हिंदुओं के बारे में विस्तृत जानकारी जुटा ली थी।

ताहिर हुसैन की बिल्डिंग में हिंदुओं को निशाना बनाने के लिए करीब 3,000 जिहादी दंगाई, पेट्रोल बम और दूसरे हथियार रखे गए थे

मुसलमानों की एक भीड़, जिसमें अधिकांश युवा थे, दिल्ली के मुस्तफाबाद की तरफ से आगे बढ़ी। वे सभी चांद बाग के पुल पर इकट्ठा हुए। वहाँ से वे आम आदमी पार्टी के पार्षद ताहिर हुसैन की इमारत पर पहुँचे।

वे छत पर चले गए, जहाँ से उन्होंने पत्थर और पेट्रोल बम फेंकना शुरू कर दिया। 26-27 फरवरी 2020 की हमारी ग्राउंड रिपोर्टिंग में, हमें बताया गया था कि ताहिर हुसैन की इमारत में 3000 से अधिक मुस्लिम दंगाई मौजूद थे।

यहाँ यह नोट करना बेहद जरूरी हो जाता है कि ताहिर हुसैन वही AAP नेता है जिसकी छत से न केवल पेट्रोल बम, बल्कि ईंटों के टुकड़ों से भरी बोरियाँ, पत्थर, एसिड पैकेट और यहाँ तक कि पत्थरों व पेट्रोल बमों को फेंकने के लिए बड़े गुलेल भी बरामद किए गए थे।

इसके अलावा, यह बात सामने आई है कि मारे गए IB अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या से पहले उन्हें ताहिर हुसैन के घर के भीतर खींचा गया था, और उनका शव हुसैन के घर के पीछे एक नाले में मिला था।

उस समय, स्थानीय लोगों ने ऑपइण्डिया के सामने यह खुलासा किया था कि कैसे IB अधिकारी अंकित शर्मा को इस्लामवादियों द्वारा खींचकर ताहिर हुसैन की इमारत के अंदर ले जाया गया था।

जब इस्लामो-लेफ्टिस्ट मीडिया और नेता दिल्ली दंगों के लिए हिंदुओं को विलेन बता रहे थे, तब ऑपइंडिया ने दिखाया कि कैसे एक इस्लामी भीड़ ने शिव मंदिर पर ज़बरदस्ती कब्जा कर लिया

जबकि इस्लामी-वामपंथी गुट ने 2020 के दिल्ली दंगों के सूत्रधार और खलनायक के रूप में हिंदुओं को और पीड़ितों के रूप में मुस्लिमों को चित्रित करने के लिए आधे-अधूरे सच और अपनी उपजाऊ कल्पना का सहारा लिया।

वहीं ऑपइंडिया ने इस बात के रोंगटे खड़े कर देने वाले विवरण सामने रखे कि कैसे उन्मादी इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा हिंदू घरों, दुकानों और पूजा स्थलों पर हमले किए जा रहे थे, उन्हें आग के हवाले किया जा रहा था और तोड़फोड़ की जा रही थी, जिन्होंने देश की राजधानी में CAA-विरोधी प्रदर्शनों को हिंदू-विरोधी दंगों में बदल दिया था।

कई हिंदुओं की जान लेने के अलावा, इस्लामी दंगाइयों ने हिंदुओं के दुकानों और कई मंदिरों में भी तोड़फोड़ की और उन्हें आग लगा दी। दिल्ली के चांद बाग इलाके में स्थित ऐसा ही एक शिव मंदिर, जिसका ऑपइंडिया ने दौरा किया था, वह भी इन दंगों का गवाह था।

मुसलमानों को दंगों के लिए तैयार किया गया था, महिलाओं और बच्चों को हिंदुओं पर हमला करने के लिए हथियारबंद किया गया था: चश्मदीद ने ऑपइंडिया को बताया

2020 के दिल्ली हिंदू-विरोधी दंगों के कुछ ही घंटों बाद ऑपइंडिया ने जिन भी चश्मदीदों से संपर्क किया, उनमें से अधिकांश ने यह खुलासा किया कि इस्लामवादी सीएए-विरोधी प्रदर्शन के बहाने काफी समय से इन हिंदू-विरोधी दंगों की तैयारी कर रहे थे।

सोनिया विहार में किराए के मकान में रहने वाली एक हिंदू महिला ने नाम न छापने की शर्त पर ऑपइंडिया को बताया, “सभी इस्लामी दंगाइयों ने पहले से ही अपने-अपने घरों के भीतर ईंटें और पत्थर जमा कर रखे थे। वे लगातार वहाँ से ईंट-पत्थर बाहर निकाल कर ला रहे थे। यह सब देखकर मैं इतनी डर गई थी कि पूरी रात सो भी नहीं सकी। हम जिस इलाके में रहते हैं, वह मुख्य रूप से मुस्लिमों का है और हमारी ही एकमात्र ऐसी बस्ती है जहाँ हिंदू रहते हैं।”

शिव विहार ग्राउंड रिपोर्ट: ऑपइंडिया ने बताया कि कैसे मुस्लिमों का राजधानी स्कूल जिहादी दंगाइयों का गढ़ बन गया

जब दिल्ली में दंगे भड़क रहे थे, ऑपइंडिया  ने कई ऐसी ग्राउंड रिपोर्ट्स प्रकाशित कीं, जिन्होंने हिंदुओं के खिलाफ इस्लामी आक्रामकता को दिखाया। ऐसी ही एक रिपोर्ट उत्तर-पूर्वी दिल्ली के करावल नगर में स्थित शिव विहार से थी, जहाँ हिंदुओं के खिलाफ मुस्लिमों द्वारा बड़े पैमाने पर दंगे देखे गए।

शिव विहार में दो स्कूल हैं। एक है राजधानी पब्लिक स्कूल और दूसरा है DRP पब्लिक स्कूल। जहाँ राजधानी स्कूल एक मुस्लिम का है, वहीं DRP स्कूल के मालिक एक शर्मा जी हैं।

हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगों के दौरान, इनमें से एक स्कूल पूरी तरह तबाह हो गया और दूसरे को हिंसा फैलाने का अड्डा बना दिया गया। यह अनुमान लगाने के लिए बहुत ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत नहीं है कि किस स्कूल का क्या हश्र हुआ।

राजधानी स्कूल, जो एक मुस्लिम के स्वामित्व में है, उसे एक किले में तब्दील कर दिया गया था, जहाँ से इस्लामवादियों ने इलाके में हमले शुरू किए। उस स्कूल में दंगाइयों को सुरक्षा और पनाह दी गई थी।

इसी स्कूल से पत्थर बरसाए गए, गोलियाँ चलाई गईं और पेट्रोल बम फेंके गए। इस स्कूल की छत पर हमारे रिपोर्टर को कई ऐसे बड़े गुलेल मिले जिनका इस्तेमाल भारी पत्थर और पेट्रोल बम फेंकने के लिए किया गया था।

जब ऑपइंडिया के रिपोर्टर राजधानी स्कूल की छत पर पहुँचे, तो यह साफ जाहिर था कि दंगों के लिए जो सामग्रियाँ वहाँ जमा की गई थीं, उन्हें एक या दो दिन में इकट्ठा नहीं किया जा सकता था।

मीडिया ने राजधानी स्कूल में हुई तोड़फोड़ पर बड़े पैमाने पर ध्यान केंद्रित किया, शायद इसलिए क्योंकि वह स्कूल एक मुस्लिम का है, लेकिन उन्होंने यह उजागर नहीं किया कि वह तोड़फोड़ वास्तव में इस्लामवादियों द्वारा किया गया महज एक नाटक था। हकीकत यह है कि राजधानी स्कूल में मामूली तोड़फोड़ हुई थी जबकि DRP स्कूल को पूरी तरह से खाक कर दिया गया था।

मुस्लिम दंगाइयों ने एक तरफ हिंदुओं से नफरत की वजह से हिंदुओं पर हमला किया, और खुद को पीड़ित बताने के लिए अपनी दुकानों में तोड़फोड़ की

दिल्ली में हुई हिंसा के एक हफ्ते बाद, हमने बृजपुरी में दंगा पीड़ितों से मुलाकात की थी। इस दौरान, हमें एक चौंकाने वाली जानकारी मिली। यह जानकारी उस व्यक्ति से मिली जो हीरो शोरूम के पास दुकान चलाता है और दिन में 12 घंटे दुकान पर ही रहता है व आसपास की हर गतिविधि पर नजर रखता है।

चश्मदीद के अनुसार, “मुस्लिम महिलाओं ने रविवार को CAA विरोध के नाम पर प्रदर्शन शुरू किया था। इसके बाद सबने तैयारियाँ शुरू कर दीं। सोमवार को चांद बाग से हिंसा भड़क उठी। मुस्लिम पहले हिंदुओं की दुकानों को लूट रहे थे और फिर उन्हें आग के हवाले कर रहे थे।”

बृजपुरी में रहने वाले चश्मदीदों ने आगे बताया, “इतना ही नहीं, इन लोगों (मुस्लिमों) को सब पता था कि आगे क्या होने वाला है। इलाके में इकलौता मुस्लिम बाइक शोरूम, जहाँ बिक्री के लिए सैकड़ों बाइकें खड़ी रहती थीं, उसने 26 फरवरी की सुबह 5 बजे इलाके में हिंसा भड़कने से ठीक पहले अपनी सभी बाइकों को शोरूम से निकालकर किसी सुरक्षित जगह पर पहुँचा दिया था। इसके बाद, दंगाइयों ने खुद को पीड़ित दिखाने के लिए पहले शोरूम में तोड़फोड़ की और फिर शोरूम से काउंटर को बाहर निकालकर उसमें आग लगा दी।”

ऑपइंडिया ने दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगों में मारे गए एक दलित हिंदू के भाई से बात की

दिनेश कुमार खटीक उन लोगों में से एक थे जो दिल्ली के हिंदू-विरोधी दंगों में मारे गए थे। ऑपइंडिया ने दिनेश कुमार खटीक के भाई सुरेश से बातचीत की थी और उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि उनके भाई की जान जिहाद ने ली है।  

इस्लामी कट्टरपंथियों का जिहाद। उन्होंने कहा कि पूरे मुस्तफाबाद ने मिलकर उनके भाई की हत्या की है। मुस्तफाबाद से उनका तात्पर्य एक मुस्लिम बहुल इलाके से था। इस प्रकार इस भीषण हत्याकांड को अंजाम दिया गया था।

चांद बाग की महिलाओं ने ऑपइंडिया को बताया कि ‘दंगाइयों ने हमारी लड़कियों के कपड़े उतार दिए, उन्हें नंगा करके वापस भेज दिया’

साल 2020 में, ऑपइंडिया ने कई हिंदू पीड़ितों से बातचीत की थी, जिनमें से कुछ ने हमें बताया था कि कैसे दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों में कोहराम मचाने वाले इस्लामवादियों ने हिंदू महिलाओं और लड़कियों के साथ बदसलूकी की थी।

एक महिला ने नाम न छापने की शर्त पर ऑपइंडिया को बताया, “हम तीन दिनों में पहली बार अपने घरों से बाहर निकले हैं। इन लोगों (इलाके के मुस्लिमों) ने हमारे साथ जो कुछ भी किया, उसके बारे में तो बताया जा रहा है, लेकिन इन्होंने ट्यूशन से लौट रही हमारी बेटियों तक को नहीं छोड़ा। उन्होंने उनके कपड़े उतार दिए और उन्हें हमारे पास निर्वस्त्र भेज दिया। हमारी बेटियों के सामने, दंगाइयों ने अपने खुद के कपड़े उतारे और अश्लील इशारे किए। हम अपने पड़ोसियों को मारने के बारे में सपने में भी नहीं सोच सकते, लेकिन उनकी तैयारी से यह साफ जाहिर है कि वे उस दिन हम सभी को खत्म कर देना चाहते थे।”

ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट में बताया गया है कि दिल्ली दंगों के बाद हिंदुओं को कैसे अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है

दिल्ली दंगों पर अपनी व्यापक रिपोर्टिंग में, ऑपइंडिया ने दिसंबर 2019 से हिंदुओं पर हुए अत्याचारों की भयावहता को उजागर किया है, जो अंततः फरवरी 2020 में दिल्ली में हुए भीषण दंगों के रूप में सामने आई।

अगस्त 2020 में, ऑपइंडिया की एक ग्राउंड रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ था कि कैसे मौजपुर के तीन मुस्लिम बहुल इलाकों सुभाष मोहल्ला, मधुबन मोहल्ला और मोहनपुरी क्षेत्र की तीन गलियों में केंद्रित लगभग 150-200 हिंदू परिवारों ने अपने घरों के बाहर ‘ मुस्लिमों के डर से यह मकान बिकाऊ है’ के पोस्टर लगा दिए थे, क्योंकि उन्हें इलाके के मुस्लिम निवासियों द्वारा डराया-धमकाया जा रहा था।

हिंदू पीड़ित हमारे संवाददाता को मौजपुर के मोहनपुरी इलाके की उन गलियों और कूचों में ले गए, जो मुस्लिम अतिक्रमण से सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में से एक थे। लगभग उन सभी हिंदू दुकानों और मकानों पर, जिन पर महीनों पहले हमला किया गया था, लूटा गया था या जिन्हें जला दिया गया था, उनकी दीवारों पर पोस्टर लगे थे जिन पर लिखा था ‘यह मकान बिकाऊ है।’

ऑपइंडिया ने 2020 के दिल्ली दंगों के पीछे इस्लामी साजिश के बड़े लिंक का पर्दाफाश किया

ऑपइंडिया निर्विवाद रूप से पहला ऐसा संस्थान था जिसने उमर खालिद, खालिद सैफी, ताहिर हुसैन, शरजील इमाम, योगेंद्र यादव से जुड़े संबंधों और चक्का जाम व अन्य साजिशी विवरणों को लेकर बदनाम वकील प्रशांत भूषण द्वारा आयोजित की गईं शुरुआती बैठकों के बारे में विस्तार से रिपोर्ट की थी।

ऑपइंडिया ने भारतीय और विदेशी मीडिया द्वारा ‘ब्राउन सिपाहियों’ (गुलाम मानसिकता वाले भारतीयों) का इस्तेमाल करके हिंदू-विरोधी दंगों के जिहादी दंगाइयों और साजिशकर्ताओं को ‘असंतोष के नायक’, ‘लोकतंत्र के योद्धा’, ‘धर्मनिरपेक्षता के रक्षक’ आदि के रूप में चित्रित करने के प्रयासों का लगातार मुकाबला किया।

द गार्जियन, द न्यूयॉर्क टाइम्स, द वाशिंगटन पोस्ट से लेकर द वायर, स्क्रॉल और अन्य भारतीय वामपंथी अखबारों तक, ये समय-समय पर आरोपी दंगाइयों, विशेष रूप से उमर खालिद और शरजील इमाम का मानवीकरण करने वाले लेख प्रकाशित करते रहते हैं। ऑपइंडिया इस हिंदू-विरोधी वैश्विक इस्लामी-वामपंथी दुष्प्रचार कारखाने का मुकाबला करने में सबसे आगे रहा है।

ताहिर हुसैन दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगों का मुख्य भड़काने वाला था, उसने अपनी इस्लामिस्ट कट्टरता वाली भूमिका कबूल की, और फिर भी उसे अपने ही धर्म के लोगों से इनाम मिला

दिल्ली पुलिस की चार्जशीट के अनुसार, ताहिर हुसैन ने 8 जनवरी को शाहीन बाग में एक बैठक के दौरान उमर खालिद और खालिद सैफी के साथ दंगों की योजना बनाई थी। फर्जी (शेल) कंपनियों से हुए कई लेन-देन संदिग्ध पाए गए थे।

चार्जशीट में ताहिर हुसैन के खाते से हुए ऐसे कई लेन-देनों का विवरण दिया गया है जो दर्शाते हैं कि उसे दंगों को आयोजित करने के लिए पैसे मिलने शुरू हो गए थे। इनमें से कुछ पैसे फर्जी कंपनियों के माध्यम से भी भेजे गए थे। पुलिस ने यह भी आरोप लगाया कि उमर खालिद ने ताहिर हुसैन को आश्वासन दिया था कि वित्तीय रूप से, इस्लामी संगठन PFI (पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया) दंगों के आयोजन में मदद के लिए तैयार है।

हुसैन ने दिल्ली दंगों के भड़कने से ठीक कुछ दिन पहले पुलिस के पास जमा अपनी 100 कारतूसों वाली लाइसेंसी पिस्तौल वापस छुड़वा ली थी। गिरफ्तारी के बाद वह बचे हुए 14 जिंदा कारतूसों और 22 खाली/चले हुए कारतूसों के बारे में संतोषजनक जवाब देने में विफल रहा।

ताहिर हुसैन ने यह सुनिश्चित करने के लिए कि दंगों में उसकी संलिप्तता का पता न चले, झांसा देने के रूप में कई PCR कॉल किए। उसने यह सुनिश्चित किया कि CCTV कैमरे बंद कर दिए जाएँ ताकि सबूत रिकॉर्ड न हो सकें।

उदाहरण के लिए, चार्जशीट संख्या 114/20 में हिंदुओं की दुकानों को जलाने और हिंदुओं पर हमला करने के लिए मुस्लिम भीड़ को भड़काने में उसकी भूमिका स्पष्ट रूप से सिद्ध होती है।

ताहिर हुसैन द्वारा 5 मई 2020 को हस्ताक्षरित प्रकटीकरण बयानों में से एक में, वह खुलासा करता है कि कैसे उसने ‘काफिरों को सबक सिखाने’ के लिए दंगों की योजना बनाई थी।

ताहिर हुसैन ने कबूल किया कि नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों के दौरान, उसे सूचना मिली थी कि सीएए के समर्थन में कुछ रैलियाँ आयोजित करने की योजना बनाई गई है। यह जानकारी मिलने के बाद, उसने दूसरों के साथ मुलाकात की और उन्हें सबक सिखाने की साजिश रची।

इसके अलावा, ताहिर हुसैन ने खुलासे में कबूल किया कि अपनी रची गई इस साजिश के अनुसार, उसने दंगों के लॉन्चपैड के रूप में अपने खुद के घर को चुना क्योंकि वह उस इलाके में एक ऊँची इमारत थी।

हुसैन ने यह भी स्वीकार किया कि दंगों के दौरान वह अपने भाइयों शाह आलम, अरशद, आबिद, शाहिद, इरशाद और कई अन्य लोगों के साथ अपने आवास पर मौजूद था। उसने यह भी स्वीकार किया कि 24 फरवरी 2020 की दोपहर को उसकी भीड़ ने ‘अल्लाह हू अकबर’ और ‘मारो मारो काफिरों को मारो’ के नारे लगाने शुरू कर दिए थे और उसने विशेष रूप से हिंदू घरों को निशाना बनाने के लिए उनकी निगरानी की थी।

ताहिर हुसैन की हिंदू-नफरत और हिंदुओं के खिलाफ हिंसा भड़काने में स्पष्ट भूमिका और IB अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या के नग्न सच के बावजूद, ताहिर हुसैन को अपने सह-धर्मियों और वैचारिक रूप से अधीन रहने वाले मीडिया से समर्थन मिला।

हिंदुओं को मारने की साजिश का नेतृत्व करने के लिए अपने सर्वोच्च पुरस्कार को प्राप्त करते हुए, ताहिर हुसैन को पिछले साल असदुद्दीन ओवैसी की मुस्लिम पार्टी AIMIM द्वारा मुस्तफाबाद विधानसभा क्षेत्र से टिकट दिया गया था।

हुसैन को केवल अपनी एक झलक पाने के लिए भारी संख्या में उमड़े मुसलमानों के बारे में डींगें हांकते हुए देखा गया था, जिसमें कुछ लोग तो यह भी कह रहे थे कि अल्लाह ने ताहिर हुसैन को ‘बड़ी कामयाबी’ दी है।

निश्चिंत रहें, अंकित शर्मा हत्याकांड में दोषी ठहराए जाने के बावजूद, ताहिर हुसैन के सह-धर्मियों के लिए वह अपनी मुस्लिम पहचान के कारण हिंदुत्व सरकार द्वारा ‘फंसाया गया’ एक निर्दोष व्यक्ति ही बना हुआ है।

ऐसा इसलिए है क्योंकि पीड़ित होने (विक्टिमहुड) पर मुस्लिमों का एकाधिकार है। हालाँकि ऑपइंडिया ने यह सुनिश्चित करने में अपनी विनम्र भूमिका निभाई कि मुस्लिम विक्टिमहुड का दुष्प्रचार सच को मिटा न सके, और उम्मीद करता है कि हिंदुओं को अपनी ही मातृभूमि में न्याय से वंचित नहीं होना पड़ेगा।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)