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फीफा विश्व कप: जर्मनी को इक्वाडोर ने चौंकाया, अमेरिका भी तुर्किये से हारा

“Commitment is an act, not a word.” दार्शनिक जाँ-पॉल सार्त्र का यह कथन केवल जीवन पर ही नहीं, खेल पर भी उतना ही सटीक बैठता है। विश्व कप जैसे मंच पर इरादे नहीं, प्रदर्शन मायने रखता है। बीती रात और आज सुबह खेले गए ग्रुप चरण के मुकाबलों ने एक बार फिर साबित कर दिया कि फुटबॉल में कोई भी टीम केवल नाम के दम पर नहीं जीतती। हर मिनट, हर पास और हर गोल अपनी कहानी लिखता है।

फिलाडेल्फिया में कुराकाओ की टीम का मुकाबला आइवरी कोस्ट से था। कुराकाओ ने शुरुआती बढ़त लेने के कई प्रयास किए, लेकिन उसके सभी हमले नाकाम रहे। कभी आर्सेनल के लिए खेल चुके स्टार खिलाड़ी निकोलास पेपे ने सातवें मिनट में गोल कर अपनी टीम को बढ़त दिलाई और दूसरे हाफ में एक और गोल दागते हुए जीत पर मुहर लगा दी। तीन मैचों में नौ गोल खाने और लगातार दो हार झेलने के बाद कुराकाओ का विश्व कप सफर यहीं समाप्त हो गया।

इसके बाद न्यू जर्सी के स्टेडियम में ग्रुप ई का सबसे बड़ा मुकाबला खेला गया, जहां जर्मनी का सामना इक्वाडोर से था। मैच की शुरुआत तेज रही। युवा फ्लोरियन विर्ट्ज़ ने लीरोए साने को शानदार पास दिया और साने ने उसे गोल में बदलकर जर्मनी को बढ़त दिला दी। इस गोल को लेकर विवाद भी हुआ क्योंकि इक्वाडोर का मानना था कि बिल्ड-अप में फाउल हुआ था, लेकिन VAR ने गोल को बरकरार रखा।

इक्वाडोर ने हालांकि संयम नहीं खोया। सात मिनट बाद ही नील्सन अंगुलो ने गोल कर स्कोर 1-1 कर दिया। दूसरे हाफ में दोनों टीमों के बीच संघर्ष जारी रहा, लेकिन 77वें मिनट में गोंजालो प्लाटा ने शानदार गोल दागकर जर्मनी को स्तब्ध कर दिया। इस ऐतिहासिक जीत के साथ इक्वाडोर ने लगभग दो दशक बाद विश्व कप के नॉकआउट चरण में जगह बनाई। पीली जर्सी पहने समर्थकों का उत्साह देखते ही बन रहा था।

ग्रुप एफ में कन्सास सिटी में नीदरलैंड का सामना ट्यूनीशिया से हुआ। ट्यूनीशिया इस टूर्नामेंट में अब तक संघर्ष करती नजर आई थी और इस मुकाबले में भी शुरुआती दस मिनट के भीतर ही नीदरलैंड ने 2-0 की बढ़त बना ली। ब्रायन ब्रॉबी ने एक बार फिर गोल किया। दूसरे हाफ में मस्तौरी ने ट्यूनीशिया के लिए एक गोल कर उम्मीदें जगाईं, लेकिन हाल ही में टॉटनहैम से जुड़े डिफेंडर वान हेके ने 62वें मिनट में गोल कर नीदरलैंड की 3-1 की जीत सुनिश्चित कर दी। टीम ऑरांजे ने शानदार प्रदर्शन के साथ अगले दौर में अपनी जगह पक्की कर ली।

इसी ग्रुप के दूसरे मुकाबले में डलास में जापान और स्वीडन आमने-सामने थे। जापान ने 3-4-3 जबकि स्वीडन ने 3-4-1-2 फॉर्मेशन के साथ शुरुआत की। दोनों टीमें लगातार आक्रमण करती रहीं।

56वें मिनट में रित्सु दोआन के पास पर दाएज़ेन माएदा ने शानदार फिनिश करते हुए जापान को बढ़त दिलाई। लेकिन यह बढ़त ज्यादा देर कायम नहीं रह सकी। छह मिनट बाद विक्टर ग्योकेरेज़ के पास पर एंथनी इलांगा ने बेहतरीन लेफ्ट फुटेड कर्लर लगाकर स्कोर 1-1 कर दिया। जापान को जीत के कई मौके मिले, लेकिन स्वीडिश गोलकीपर ने शानदार बचाव करते हुए उन्हें गोल से दूर रखा। मुकाबला ड्रॉ पर समाप्त हुआ। जापान एक जीत और दो ड्रॉ के साथ ग्रुप में दूसरे स्थान पर रहते हुए अगले दौर में पहुंच गया, जबकि 48 टीमों वाले इस विश्व कप प्रारूप में सर्वश्रेष्ठ तीसरे स्थान वाली टीमों में शामिल होने के कारण स्वीडन ने भी नॉकआउट चरण का टिकट हासिल कर लिया। अगले दौर में समुराई ब्लूज़ का सामना ब्राज़ील से होगा।

इसके बाद ग्रुप डी के मुकाबले खेले गए। लॉस एंजिलिस में पहले ही अगले दौर में पहुंच चुकी अमेरिकी टीम ने तुर्किये के खिलाफ अपनी शुरुआती एकादश में नौ बदलाव किए। इसके बावजूद तीसरे मिनट में क्रिस्टोफर ट्रस्टी के गोल से अमेरिका ने बढ़त बना ली। हालांकि अर्दा गुलेर ने दसवें मिनट में बराबरी दिलाई और यिल्माज़ ने तुर्किये को आगे कर दिया।

दूसरे हाफ की शुरुआत में सेबास्टियन बेर्हाल्टर ने अमेरिका के लिए स्कोर 2-2 कर दिया। मुकाबला ड्रॉ की ओर बढ़ता दिख रहा था, लेकिन इंजुरी टाइम के 90+8वें मिनट में कान अयहान ने गोल दागकर तुर्किये को 3-2 की यादगार जीत दिला दी।

इसी समय सैन फ्रांसिस्को में ऑस्ट्रेलिया और पैराग्वे के बीच मुकाबला खेला गया। दोनों टीमें पूरे मैच में गोल नहीं कर सकीं और मुकाबला 0-0 से समाप्त हुआ। इस परिणाम के साथ कंगारू टीम ग्रुप डी में दूसरे स्थान पर रहते हुए अगले दौर के लिए क्वालिफाई करने में सफल रही।

अब नजरें अगले मुकाबलों पर हैं। भारतीय समयानुसार आज रात ग्रुप आई में नॉर्वे और फ्रांस आमने-सामने होंगे, जबकि इराक का सामना सेनेगल से होगा। इसके बाद ग्रुप एच में काबो वर्दे और सऊदी अरब के बीच मुकाबला खेला जाएगा, वहीं स्पेन और उरुग्वे की टक्कर भी खास आकर्षण का केंद्र रहेगी। सुबह ग्रुप जी में बेल्जियम, न्यूज़ीलैंड, मिस्र और ईरान की टीमें मैदान पर उतरेंगी, जहां नॉकआउट की आखिरी तस्वीर काफी हद तक साफ होती नजर आएगी।

विश्व कप का ग्रुप चरण अब अपने निर्णायक मोड़ पर है। यहां हर मैच केवल तीन अंकों की लड़ाई नहीं, बल्कि उम्मीदों, दबाव और इतिहास के बीच लिखा जाने वाला एक नया अध्याय है। कुछ टीमें अपने सपनों को आगे बढ़ा रही हैं, तो कुछ का सफर यहीं थम रहा है। यही फुटबॉल की सबसे बड़ी खूबसूरती है, यह आखिरी सीटी बजने तक किसी कहानी का अंत तय नहीं होने देता। अगले मुकाबलों में कौन इतिहास रचेगा और किसका सपना टूटेगा, इसकी कहानी भी हम आपके लिए लेकर आएंगे।

कभी देश का पाँचवाँ सबसे धनी राज्य था पश्चिम बंगाल, अब 19वें नंबर पर फिसला: SBI की रिपोर्ट से जानें- वामपंथी और TMC शासनकाल ने कैसे राज्य को किया बर्बाद

पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली सरकार ने सोमवार (22 जून 2026) को राज्य विधानसभा में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए अपना पूर्ण बजट पेश किया। इस बजट में निवेश, बुनियादी ढाँचे और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कई उपायों की घोषणा की गई।

वहीं गुरुवार (25 जून 2026) को प्रकाशित SBI रिसर्च की विस्तृत विषयगत विश्लेषणात्मक रिपोर्ट के अनुसार, यह बजट निवेश-आधारित विकास और दीर्घकालिक आर्थिक परिवर्तन की दिशा में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत देता है।

SBI की इस रिपोर्ट में केवल नवीनतम बजट के प्रावधानों का ही विश्लेषण नहीं किया गया, बल्कि पश्चिम बंगाल की आर्थिक यात्रा को व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में भी रखा गया।

विश्लेषण में बताया गया कि कभी भारत के सबसे मजबूत आर्थिक प्रदर्शन करने वाले राज्यों में शामिल रहा पश्चिम बंगाल, पिछले कई दशकों में धीरे-धीरे अपनी स्थिति खोता गया और अब उसके सामने राष्ट्रीय औसत के बराबर पहुँचने की चुनौती है।

SBI रिपोर्ट ने पश्चिम बंगाल की अर्थव्यवस्था का इतिहास बताया

SBI रिसर्च रिपोर्ट का सबसे उल्लेखनीय पहलुओं में से एक पश्चिम बंगाल की दीर्घकालिक आर्थिक यात्रा का विश्लेषण है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दशक के शुरुआती वर्षों में पश्चिम बंगाल ने मजबूत आर्थिक वृद्धि दर्ज की थी।

वर्ष 2012-13 में राज्य की नॉमिनल सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) वृद्धि दर 13.6% तक पहुँच गई थी, जो 2013-14 में बढ़कर 14.4% हो गई। हालाँकि देश के अन्य हिस्सों की तरह पश्चिम बंगाल को भी कोविड-19 महामारी के दौरान गंभीर झटका लगा। वर्ष 2020-21 में आर्थिक गतिविधियाँ लगभग ठप हो जाने के कारण राज्य की नाममात्र और वास्तविक दोनों वृद्धि दरें नकारात्मक स्तर पर पहुँच गई थीं।

ग्राफ एसबीआई रिसर्च के माध्यम से

लॉकडाउन की अवधि के बाद राज्य की अर्थव्यवस्था में मजबूत सुधार देखने को मिला। वर्ष 2021-22 में नाममात्र नॉमिनल वृद्धि दर बढ़कर 17.4% हो गई, जबकि वास्तविक वृद्धि दर 11.6% तक पहुँच गई। इसके बाद से आर्थिक वृद्धि स्थिर बनी हुई है।

साल 2025-26 के संशोधित अनुमानों के अनुसार, नॉमिनल वृद्धि दर 9.9% और वास्तविक वृद्धि दर 7.6% रहने का अनुमान है। वहीं वर्ष 2026-27 के बजट अनुमान में नॉमिनल वृद्धि दर 7.9% रहने का अनुमान लगाया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में पश्चिम बंगाल की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से सेवा क्षेत्र पर आधारित है, जिसका ग्रोस वैल्यू ऐडेड-GVA (Gross Value Added-GVA) में 58.3% योगदान है। उद्योग क्षेत्र का योगदान 21.6% है, जबकि कृषि क्षेत्र अभी भी 20.1% की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रखता है।

हालाँकि विश्लेषण का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा प्रति व्यक्ति आय से जुड़ा है। SBI रिसर्च के अनुसार, वित्त वर्ष 1977-78 में पश्चिम बंगाल की प्रति व्यक्ति आय 1266 रुपए थी, जो उस समय राष्ट्रीय औसत 1194 रुपए से अधिक थी। उस समय प्रति व्यक्ति आय के मामले में राज्य देश के सभी राज्यों में पांचवें स्थान पर था।

हालाँकि इसके बाद के दशकों में राज्य की सापेक्ष स्थिति लगातार कमजोर होती गई। वित्त वर्ष 2011-12 तक पश्चिम बंगाल की प्रति व्यक्ति आय 56693 रुपए रह गई और इस आधार पर राज्य भारतीय राज्यों में 21वें स्थान पर पहुँच गया।

इसके बाद राज्य की स्थिति में कुछ सुधार जरूर हुआ। वित्त वर्ष 2024-25 में पश्चिम बंगाल की प्रति व्यक्ति आय बढ़कर लगभग 1.81 लाख रुपए हो गई, जिससे उसकी रैंकिंग सुधरकर 19वें स्थान पर पहुँच गई। इसके बावजूद यह राष्ट्रीय औसत 2.35 लाख रुपए से काफी पीछे है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्तमान में पश्चिम बंगाल की प्रति व्यक्ति आय अखिल भारतीय औसत से लगभग 23% कम है।

वित्त वर्ष 2011-12 से 2024-25 के बीच पश्चिम बंगाल की प्रति व्यक्ति आय में 3.20 गुना वृद्धि हुई, जबकि इसी अवधि में राष्ट्रीय स्तर पर यह वृद्धि 3.28 गुना रही। इससे संकेत मिलता है कि राज्य अब भी देश की समग्र आर्थिक प्रगति की गति से पीछे चल रहा है।

पश्चिम बंगाल ने अपनी आर्थिक बढ़त कैसे खो दी

यह गिरावट कई दशकों में फैले राजनीतिक, औद्योगिक और संरचनात्मक कारकों का संयुक्त परिणाम है। स्वतंत्रता के समय और 1960 के दशक तक पश्चिम बंगाल भारत के इंडस्ट्रियल एंड कमर्शियल सेंटर में से एक था। कोलकाता वित्त, मैन्युफैक्चरिंग, इंजीनियरिंग, चाय और जूट उद्योगों का प्रमुख केंद्र हुआ करता था।

स्थिति में बदलाव 1970 और 1980 के दशक के दौरान शुरू हुआ। राजनीतिक अस्थिरता, श्रमिक अशांति, लगातार हड़तालें, घेराव और बिजली की कमी ने कारोबार के लिए माहौल को लगातार मुस्किल बना दिया। इसके चलते कई बड़े औद्योगिक घरानों ने अपने ऑपरेशन महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु जैसे राज्यों में ट्रांसफर कर दिए।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 1977 में सत्ता में आई वाम मोर्चा (लेफ्ट फ्रंट) सरकार ने ऑपरेशन बर्गा जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से भूमि सुधार और ग्रामीण विकास पर विशेष जोर दिया। हालाँकि इन नीतियों से कृषि उत्पादकता में सुधार हुआ और ग्रामीण आजीविका मजबूत हुई, लेकिन बड़े पैमाने पर औद्योगिकीकरण सीमित ही रहा।

इसके परिणामस्वरूप पश्चिम बंगाल उस मैन्युफैक्चरिंग उछाल का पूरा लाभ नहीं उठा सका, जिसने देश के कई पश्चिमी और दक्षिणी राज्यों की अर्थव्यवस्था को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।

समय के साथ राज्य की अर्थव्यवस्था सेवा क्षेत्र पर अधिक निर्भर होती चली गई। हालाँकि बैंकिंग, रिटेल और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) जैसे क्षेत्रों में वृद्धि हुई, लेकिन यह इतनी नहीं थी कि अन्य राज्यों की तुलना में समान गति से आय बढ़ाने के लिए आवश्यक बड़े पैमाने पर हाई सैलरी वाले रोजगार पैदा किए जा सकें।

केंद्रीय फंड पर बनी हुई है निर्भरता ज्यादा

SBI की रिपोर्ट पश्चिम बंगाल के वित्तीय ढाँचे के एक और महत्वपूर्ण पहलू को भी सामने लाती है, जो केंद्र सरकार से मिलने वाले धन पर राज्य की लंबे समय से चली आ रही निर्भरता है।

विश्लेषण के अनुसार, पश्चिम बंगाल को अपने कुल रेविन्यू  का 50% से अधिक हिस्सा लगातार केंद्र सरकार से करों में हिस्सेदारी और ग्रांट के रूप में मिलता रहा है।

वित्त वर्ष 2026-27 के बजट अनुमानों के अनुसार, केंद्र से प्राप्त करों में राज्य की हिस्सेदारी कुल राजस्व प्राप्तियों का 34% रहने का अनुमान है, जबकि केंद्र सरकार से मिलने वाले अनुदान का योगदान 22% है। इस प्रकार, दोनों को मिलाकर राज्य की कुल राजस्व प्राप्तियों का 56% हिस्सा केंद्र सरकार से आने का अनुमान है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि पश्चिम बंगाल का खुद का कर पिछले कई वर्षों से लगभग स्थिर बना हुआ है। साल 2010-11 में राज्य के अपने कर संग्रह का योगदान कुल राजस्व प्राप्तियों में 45% था। वहीं एक दशक से अधिक समय बाद भी वित्त वर्ष 2026-27 के बजट अनुमानों में यह आंकड़ा घटकर 41% पर ही है।

नॉन टैक्स रेविन्यू के मामले में स्थिति और भी अधिक उल्लेखनीय है। रिव्यू पीरियड के अधिकांश वर्षों में राज्य का स्वयं का गैर-कर राजस्व कुल प्राप्तियों का लगभग 3% ही बना रहा है।

समय के साथ राज्य की कुल राजस्व प्राप्तियों टोटल रेवेन्यू रैपिटस रिसिप्ट में निश्चित रूप से वृद्धि हुई है। यह साल 2010-11 में 47264 करोड़ रुपए से बढ़कर साल 2026-27 में अनुमानित 3.2 लाख करोड़ रुपए तक पहुँचने का अनुमान है। इसके बावजूद, SBI के आंकड़े बताते हैं कि राज्य अब भी अपने रेवेन्यू  बेस का उल्लेखनीय विस्तार करने में संघर्ष कर रहा है और केंद्र सरकार से मिलने वाले वित्तीय हस्तांतरण  पर काफी हद तक निर्भर बना हुआ है।

रिपोर्ट के अनुसार, सालों से केंद्र सरकार से पर्याप्त वित्तीय सहायता मिलने के बावजूद पश्चिम बंगाल अब भी भारी कर्ज के बोझ का सामना कर रहा है।

बजट की भाषा अब कल्याण से विकास की ओर बढ़ती दिखी

SBI अध्ययन के सबसे दिलचस्प हिस्सों में से एक पिछले 16 साल में प्रस्तुत किए गए बजट भाषणों का विषयगत विश्लेषण है। रिपोर्ट के अनुसार, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली TMC सरकार के दौरान पेश किए गए शुरुआती बजटों का मुख्य फोकस कल्याणकारी और पुनर्वितरण आधारित नीतियों पर रहा। कई बजट चक्रों में सामाजिक कल्याण सबसे प्रमुख विषय बना रहा है।

हालाँकि मौजूदा भाजपा सरकार द्वारा प्रस्तुत वर्ष 2026-27 का बजट प्राथमिकताओं में एक उल्लेखनीय बदलाव को दर्शाता है। SBI ने इस बदलाव को पुनर्वितरण से क्षमता निर्माण और दीर्घकालिक आर्थिक विकास लॉंग टर्म इकोनॉमिक डेवलपमेंट की दिशा में संक्रमण बताया है।

इस बदलाव का सबसे स्पष्ट संकेत निवेश पर बढ़ते जोर से मिलता है। वर्ष 2026-27 के बजट भाषण में निवेश विषय का उल्लेख अब तक के सर्वोच्च स्तर 4.5% पर पहुँच गया, जो पिछले कुछ वर्षों के स्तर की तुलना में काफी अधिक है।

SBI रिसर्च के माध्यम

गवर्नेंस और राजकोषीय प्रबंधन फिस्कल मैनेजमेंट भी एक बार फिर बजट की प्रमुख प्राथमिकताओं के रूप में उभरे हैं। बजट विमर्श में इनकी हिस्सेदारी बढ़कर 2.1% हो गई है, जो सार्वजनिक पब्लिक फिनान्स   और प्रशासनिक दक्षता में सुधार पर नए सिरे से दिए जा रहे जोर को दर्शाती है।

रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि कई नए विषय उभरकर सामने आए हैं, जिन्हें पहले के वर्षों में कम महत्व मिला था।

पर्यटन और संस्कृति का उल्लेख रिकॉर्ड स्तर 1% तक पहुँच गया। जलवायु और पर्यावरण का हिस्सा बढ़कर 0.8% हो गया, जो उपलब्ध आंकड़ों की श्रृंखला में सबसे अधिक है। वहीं शिक्षा का हिस्सा भी 0.8% रहा, जबकि स्वास्थ्य का योगदान 0.7% दर्ज किया गया।

टेक्नोलॉजी एण्ड आर्टफिशल इन्टेलिजन्स का उल्लेख बढ़कर 0.6% तक पहुँच गया, जो हाल के वर्षों में लगातार बढ़ते रुझान को दर्शाता है। वहीं आन्ट्रप्रनर्शिप  की हिस्सेदारी 0.4% के उच्च स्तर पर बनी रही।

SBI के अनुसार, ये रुझान एक व्यापक विकासवादी दृष्टिकोण की ओर संकेत करते हैं, जिसका केंद्र आर्थिक क्षमता निर्माण, निवेश सृजन और करियर ओरिएंटेड क्षेत्रों के विकास पर है।

सीरीज में सबसे ज्यादा उम्मीद जगाने वाला बजट

रिपोर्ट में बजट भाषणों का भाषाई विश्लेषण भी किया गया है। इसके लिए सकारात्मक और नकारात्मक शब्दों के संतुलन को मापने हेतु बिंग सेंटिमेंट लेक्सिकॉन का उपयोग किया गया।

विश्लेषण के परिणाम बताते हैं कि वर्ष 2026-27 के बजट में पूरे उपलब्ध डेटा सेट के दौरान सबसे अधिक आशावादी भाषा का प्रयोग किया गया है।

SBI रिसर्च के अनुसार, नवीनतम बजट में साल 2010-11 से ट्रैकिंग शुरू होने के बाद का सबसे अधिक नेट सेंटिमेंट स्कोर दर्ज किया गया है। बजट भाषण में सकारात्मक शब्दों की हिस्सेदारी भी अब तक के सर्वोच्च स्तर पर पहुँच गई, जो विस्तारवादी और अत्यधिक महत्वाकांक्षी दृष्टिकोण को दर्शाती है।

विश्लेषण यह भी दिखाता है कि कोविड-19 महामारी से उत्पन्न व्यवधानों के बाद साल 2021-22 से इस दिशा में स्पष्ट रूप से लगातार बढ़ता हुआ रुझान देखने को मिला है।

ग्राफ SBI रिसर्च के माध्यम से

इस श्रृंखला में सबसे कम सेंटिमेंट स्कोर कोविड-19 महामारी के तुरंत बाद वाले साल 2021-22 में दर्ज किया गया था। इसके बाद से हर साल सेंटिमेंट में लगातार सुधार हुआ और अंततः साल 2026-27 के बजट में अब तक के सबसे अधिक आशावाद को दर्शाने वाला रिकॉर्ड-उच्च स्तर दर्ज किया गया।

SBI के अनुसार, इससे संकेत मिलता है कि नीति-निर्माता अब राज्य के भविष्य को संकट प्रबंधन के बजाय आर्थिक वृद्धि, निवेश और लॉंग टर्म ट्रैन्स्फर्मैशन के इर्द-गिर्द अधिक मजबूती से दिखा रहे हैं।

पिछली रिपोर्ट्स में TMC राज में आर्थिक गिरावट की कही गई थी बात

SBI की यह रिपोर्ट पश्चिम बंगाल के दीर्घकालिक आर्थिक प्रदर्शन को लेकर पहले सामने आ चुके विश्लेषणों की पृष्ठभूमि में भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जिनमें राज्य की अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता जताई गई थी।

इससे पहले ऑपइंडिया ने फिन्स्केप्टिक्स द्वारा प्रकाशित एक वित्तीय रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया था कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली TMC सरकार के शासनकाल के दौरान पश्चिम बंगाल की अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय संरचनात्मक गिरावट देखने को मिली।

उस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि बीच-बीच में आर्थिक वृद्धि के कुछ दौर आने के बावजूद, अन्य प्रतिस्पर्धी राज्यों की तुलना में पश्चिम बंगाल की समग्र आर्थिक स्थिति कमजोर होती गई।

रिपोर्ट में राज्य की औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता में गिरावट, राष्ट्रीय औसत की तुलना में प्रति व्यक्ति आय की धीमी वृद्धि और केंद्र सरकार से मिलने वाले फाइनैन्शल ट्रांसफर पर बढ़ती निर्भरता को प्रमुख कारणों के रूप में रेखांकित किया गया था।

नई SBI रिसर्च रिपोर्ट इन राजनीतिक निष्कर्षों पर कोई टिप्पणी नहीं करती, लेकिन उसका ऐतिहासिक विश्लेषण भी यह दर्ज करता है कि प्रति व्यक्ति आय के आधार पर वित्त वर्ष 1977-78 में देश का पाँचवाँ सबसे समृद्ध राज्य रहा पश्चिम बंगाल आज 19वें स्थान पर पहुँच चुका है।

साथ ही SBI के आकलन के अनुसार साल 2026-27 का बजट निवेश, सुशासन सुधार, प्रौद्योगिकी को अपनाने और आर्थिक क्षमता निर्माण पर अधिक जोर देकर इस आर्थिक दिशा को बदलने का प्रयास करता हुआ दिखाई देता है।

हालाँकि यह बदलाव कई दशकों से चली आ रही इस सापेक्ष गिरावट को वास्तव में पलट पाएगा या नहीं, इसका स्पष्ट उत्तर आने वाले सालों में ही मिलेगा। फिलहाल यह रिपोर्ट एक ऐसे राज्य की विस्तृत तस्वीर पेश करती है, जो कल्याणकारी योजनाओं पर आधारित आर्थिक ढाँचे से आगे बढ़कर विकास और आर्थिक वृद्धि केंद्रित मॉडल की ओर बढ़ने का प्रयास कर रहा है, लेकिन साथ ही अपनी लंबी आर्थिक यात्रा से पैदा हुई चुनौतियों का भी सामना कर रहा है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

हर एक की अपनी कहानी, गवाह मुकर गए और खून किसका था पता नहीं: फिर भी 7 को उम्रकैद, नर्मदापुरम ‘मॉब लिंचिंग’ में जज तबस्सुम के फैसले का ‘पोस्टमॉर्टम’

मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम में एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज तबस्सुम खान द्वारा 12 जून 2026 को ‘मॉब लिंचिंग’ से जुड़े एक मामले में 7 लोगों को उम्रकैद दिए जाने का फैसला चर्चा में है। कहीं इन लोगों को गौ-रक्षक बताया जा रहा है तो कहीं फैसले से जुड़ी अन्य तरह की चर्चाएँ हैं। कई जगह लोग प्रदर्शन कर रहे हैं और ऊपरी अदालत जाने की बात कह रहे हैं।

इन चर्चाओं के बीच हमने जज तबस्सुम खान के उस फैसले को पढ़ने और यह समझने की कोशिश की, कि किस तरह वे उम्रकैद देने के नतीजे तक पहुँची हैं। इस फैसले में कई जगह कई सवाल उठते हैं जिनकी हम बिंदुवार चर्चा करेंगे। इसका मकसद बस यह समझना है कि इस केस में क्या सबूत थे, गवाह थे और कैसे यह नतीजा मिला। सबसे पहले शुरुआत इस केस को समझने से करते हैं।

क्या है पूरा मामला?

यह समझने के लिए अभी हम कोर्ट के फैसले का ही सहारा लेंगे। हालाँकि, आगे इसमें कुछ अलग वर्जन भी मिलेंगे लेकिन अभी शुरुआती मामला कोर्ट ने यही बताया है। यह मामला 3 अगस्त 2022 की रात करीब 12:30 बजे नंदरवाड़ा रोड, ग्राम बराखड़, थाना सिवनीमालवा क्षेत्र में हुई मारपीट और हत्या से जुड़ा था। अभियोजन के अनुसार, फरियादी शेख लाला अपने साथी नजीर अहमद और शेख मुश्ताक के साथ ट्रक MH/MP-40-CD-8751 (कोर्ट ने दो अलग-अलग नंबर लिखे हैं) से जा रहा था।

इससे पहले 2 अगस्त 2022 की शाम करीब 5-6 बजे वे नंदरवाड़ा पहुँचे थे। वहाँ सेट्टी नामक व्यक्ति ने कॉल करके उन्हें माल भरने बुलाया था। आरोप है कि नंदरवाड़ा नहर किनारे खेत के पास से ट्रक में गाय-बैल जैसे जानवर भरवाए गए, जिन्हें महाराष्ट्र के अमरावती ले जाया जा रहा था।

अभियोजन के मुताबिक, जब ट्रक 3 अगस्त 2022 को रात करीब 12:30 बजे बराखड़ गाँव के पास नंदरवाड़ा रोड पर पहुँचा, तब 10-12 गाँव वालों ने रास्ता रोक लिया। इसके बाद शेख लाला, नजीर अहमद और शेख मुश्ताक के साथ लाठी-डंडों से मारपीट की गई। पुलिस मौके पर पहुँची और घायलों को अस्पताल ले गई। मारपीट में आई चोटों के कारण इलाज के दौरान नजीर अहमद की मौत हो गई। शेख लाला की रिपोर्ट पर ग्राम बराखड़ के 10-12 अज्ञात लोगों के खिलाफ धारा 147, 148, 341, 307 और 302 IPC के तहत मामला दर्ज किया गया।

विवेचना थाना प्रभारी निरीक्षक जितेंद्र सिंह यादव द्वारा की गई। घटनास्थल से खून लगी घास, सादी घास, खून लगी मिट्टी, सादी मिट्टी, चप्पलें और लकड़ी के टुकड़े जब्त किए गए। साथ ही, मृतक नजीर अहमद का पोस्टमार्टम कराया गया। इसके अलावा चश्मदीद गवाह यज्ञेश कुमार तिवारी के धारा 164 CrPC के बयान कराए गए जिनमें आकाश सराठे, गौरव यादव, आकाश उर्फ पिन्टोली, राजू उर्फ राजेन्द्र कौशल, चेतन मराठा, देवेंद्र कोरी, संदीप उर्फ राजा, दीपक उर्फ बाबा केवट, भोला बाथव, पवन बाथव, कन्हैया बाथव, प्रकाश कौशल, अज्जू राठौर और बल्लू रघुवंशी के नाम सामने आए।

जाँच के दौरान शेख मुश्ताक और शेख लाला के मरणासन्न कथन भी लिखे गए। तहसीलदार ललित सोनी द्वारा शिनाख्तगी (पहचान) मेमो तैयार किए गए। जब्त सामान FSL जाँच के लिए भोपाल भेजा गया। बाद में दीपक उर्फ बाबा केवट, अजय उर्फ अज्जू राठौर, प्रकाश कौशल, पवन बाथव, अमर उर्फ भोला बाथव, कन्हैया बाथव और बल्लू उर्फ अनुज रघुवंशी के खिलाफ पूरक अभियोग पत्र पेश किया गया।

12 जून 2026 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश तबस्सुम खान ने इन 7 आरोपितों को IPC की धारा 302, 307, 148, 149 के तहत दोषी ठहराया और सभी को उम्रकैद की सजा सुनाई। आरोपितों ने खुद को निर्दोष बताया था और कहा था कि उन्हें झूठा फँसाया गया है।

गाड़ी में गाय या सब्जियाँ?: एक बुनियादी सवाल का नहीं मिला कोई जवाब

इस घटना को लेकर जो थ्योरी सबसे पहले सामने आई वो कथित गो-रक्षा से जुड़ी थी। दावा किया गया कि उन्हें बचाने के लिए लोगों के साथ मारपीट और हत्या तक हुई। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि इस मामले के पीड़ितों ने अपनी गवाही में ट्रक में गाय होने से ही इनकार किया है।

अपने फैसले के पैरा 33 में जज तबस्सुम खान ने लिखा है, “फरियादी शेख लाला व आहत सैय्यद मुश्ताक ने कहा कि …वे लोग बस से अमरावती से सिवनीमालवा सब्जी का ट्रक लेने रात्रि लगभग 11:00 बजे आये थे। वे बस से उतरे तो नजीर सिवनीमालवा के पास एक गाँव ले गया और कहा कि गाँव से ट्रक अमरावती ले जाना है।”

कोर्ट के फैसले का एक हिस्सा

पैरा 34 में जज ने लिखा, “शेख लाला और सैय्यद मुश्ताक को अभियोजन द्वारा सूचक प्रश्न पूछे जाने उन्होंने इन सुझावों से इंकार किया है कि एक ट्रक में जानवरों को लेकर जा रहे थे, तब आरोपितों ने ट्रक पकड़ा था और उनके साथ मारपीट की थी।”

कोर्ट के फैसले का एक हिस्सा

इसके आगे चलने पर पैरा 36 में लिखा है, “निरीक्षक जितेंद्र सिंह यादव ने कहा कि फरियादी ने बताया कि नंदरवाड़ा के सेट्टी नामक व्यक्ति ने मोबाइल फोन करके उसे माल भरने बुलाया था। वह अपने ट्रक को लेकर अपने साथियों नजीर अहमद और शेख मुश्ताक के साथ नंदरवाड़ा पहुँच गया था, जहाँ सेट्टी ने नंदरवाड़ा नहर के किनारे, खेत के पास उसके ट्रक में जानवर, जिसमें गाय ढोर भरवा दिए थे, जिन्हें वह लेकर अमरावती महाराष्ट्र जाने के लिए निकला।”

कोर्ट के फैसले का एक हिस्सा

पैरा 95 में एक बार फिर इस बात का जिक्र आता है। जज ने फैसले में लिखा, “यदि उस ट्रक में जानवरों का परिवहन बिना किसी अनुज्ञप्ति के किया जा रहा था तो ट्रक के वाहन स्वामी व अन्य संबंधित व्यक्तियों के विरूद्ध पृथक से कार्यवाही करने का आधार था।”

कोर्ट के फैसले का एक हिस्सा

हालाँकि, इस पूरे मामले को पढ़ने से यह समझ नहीं आता कि अगर इस कथित ट्रक में जानवर या गाय थीं तो दोनों पीड़ितों ने अदालत में अपनी गवाही क्यों बदली? या इस मामले पर पुलिस ने क्या छानबीन की।

उस रात क्या हुआ था: सबकी अपनी कहानी लेकिन सच क्या?

इस मामले में अभियोजन की कहानी शुरू से अंत तक एक जैसी नहीं रहती। घटना की रात क्या हुआ, ट्रक में क्या सामान था, हमला कहाँ हुआ, हमलावर कितने थे और मारपीट की शुरुआत कैसे हुई जैसे बुनियादी सवालों पर रिकॉर्ड में अलग-अलग बातें सामने आती हैं। कहीं, 10-12 गाँव वालों द्वारा ट्रक रोककर हमला करने की बात है तो कहीं 50-60 से लेकर 100-150 लोगों तक की।

घटना के विवरण भी अलग-अलग हैं। ऐसे में यह सिर्फ मामूली अंतर नहीं बल्कि घटना की मूल संरचना पर ही गंभीर विरोधाभास है। इन्हें अदालत को दोषसिद्धि से पहले बहुत कठोरता से परखना चाहिए था लेकिन अदालत ने क्या किया वो भी समझने की कोशिश करेंगे।

इस घटना का पहला विवरण पैरा 33 में शेख लाला और सैय्यद मुश्ताक की अदालत में दी गई गवाही के रूप में आता है। अदालत में उन्होंने अभियोजन की पुरानी कहानी का समर्थन नहीं किया। उन्होंने कहा कि वे लोग अमरावती से बस से सिवनीमालवा सब्जी का ट्रक लेने रात लगभग 11 बजे आए थे। शेख लाला ने ट्रक चालू किया और सैय्यद मुश्ताक व नजीर अहमद ट्रक में बैठ गए। जब वे रात करीब 11 बजे गाँव से निकले और लगभग 20 मिनट की दूरी पर पहुँचे, तब सामने से एक पिकअप तेज गति से आई और उनके ट्रक से टक्कर होते-होते बची।

ट्रक का संतुलन बिगड़ा लेकिन वह पलटने से बच गया। शेख लाला ने ट्रक रोक दिया, तब पिकअप वाले आए और उनके साथ मारपीट करने लगे। पिकअप में करीब 8-10 लोग बताए गए। उनसे बचने के लिए वे गाँव की तरफ भागे, तो गाँव वाले बाहर आ गए और उन्हें चोर समझ लिया। इसके बाद गाँव वालों ने भी मारपीट शुरू कर दी।

इस संस्करण में गाँव वालों की संख्या लगभग 100-150 बताई गई है। इसमें जानवरों की जगह सब्जी के ट्रक की बात है और चोर समझकर गाँव वालों द्वारा मारपीट की बात आती है। हालाँकि, अगले दोनों संस्करणों में यह कहानी बदल जाती है।

कोर्ट के फैसले का एक हिस्सा

कोर्ट के फैसले में इस मामले का दूसरा विवरण पैरा 36 में देहाती सूचना के रूप में आता है। इसमें IO जितेंद्र सिंह यादव बताते हैं कि शेख लाला ने अस्पताल में क्या सूचना दी थी। इसके मुताबिक, शेख लाला अपने ट्रक और साथियों नजीर अहमद व शेख मुश्ताक के साथ 02/08/2022 की शाम 5-6 बजे नंदरवाड़ा पहुँचा। वहाँ सेट्टी ने नंदरवाड़ा नहर के किनारे खेत के पास ट्रक में जानवर (गाय-ढोर) भरवाए थे। इसके बाद वे जानवरों को लेकर अमरावती (महाराष्ट्र) जाने निकले।

03/08/2022 की रात करीब 12:30 बजे जब ट्रक बराखड़ गाँव के पास नंदरवाड़ा रोड पर पहुँचा, तो वहाँ खड़े 10-12 गाँव वालों ने ट्रक रोक लिया। फिर उन लोगों ने शेख लाला, नजीर अहमद और शेख मुश्ताक को लाठी-डंडों से पीटा। पुलिस मौके पर आई और उन्हें अस्पताल ले गई। मारपीट में आई चोटों के कारण नजीर अहमद की मौत हो गई। इस संस्करण में हमलावर 10-12 अज्ञात गाँव वाले बताए गए हैं और शिकायत बराखड़ गाँव के लोगों के विरुद्ध की गई है।

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तीसरा विवरण पैरा 42 में नायब तहसीलदार के सामने दर्ज बयानों को लेकर आता है। नायब तहसीलदार नीलेश पटेल के अनुसार शेख लाला और सैय्यद मुश्ताक के कथनों में लिखा था कि घटना नंदरवाड़ा गाँव के आगे बायपास के पास रात लगभग 1 बजे हुई। इसमें कहा गया कि 50-60 लोगों ने उन्हें मारा। बयान में यह भी लिखा था कि आयशर ट्रक में लगभग 30 जानवर भरे हुए थे और माल/जानवर देखकर गाँव वालों ने ट्रक रोका और मारना शुरू कर दिया।

इस विवरण में यह नहीं बताया गया कि मारपीट करने वाले कौन लोग थे, वे किस गाँव के थे, उनके नाम क्या थे, किसने कौन-सा हथियार इस्तेमाल किया था या ट्रक के आगे ट्रैक्टर-ट्रॉली या कोई दूसरा वाहन अड़ाकर रास्ता रोका गया था। इसलिए इस संस्करण में भी हमलावर अज्ञात ही रहते हैं, लेकिन संख्या 10-12 से बदलकर 50-60 हो जाती है और स्थान बराखड़ गाँव के पास से बदलकर नंदरवाड़ा गाँव के आगे बायपास के पास बताया जाता है।

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चौथा महत्वपूर्ण संदर्भ पैरा 43 में आता है, जहाँ अदालत खुद इन तीनों विवरणों के बीच अंतर नोट करती है। कोर्ट ने अलग-अलग कहानी बताए जाने का जिक्र किया है। कोर्ट मानती है इनमें अंतर है लेकिन कोर्ट का कहना है कि पीड़ित स्थानीय निवासी नहीं थे इसलिए जिस बराखड़ गाँव के पास घटना हुई उसका नाम ही FIR में पहली बार बताया गया। अदालत ने इसे स्वाभाविक माना है।

कोर्ट के फैसले का एक हिस्सा

वहीं, पैरा 44 में कोर्ट ने माना कि फरियादी शेख लाला और सैय्यद मुश्ताक अपने पहले वाले बयान से पलट गए। कोर्ट ने माना कि उनके पीछे दौड़ने वालों में बच्चे, औरतें और आदमी सभी शामिल थे। गाँव में अंधेरा था, इसलिए वे किसी को ठीक से देख नहीं पाए। उन्होंने यह भी कहा कि मारपीट करने वालों का चेहरा देखकर भी वे उन्हें पहचान नहीं सकते। लेकिन अदालत अभियोजन के कहने पर मानती है कि बाद में इन्हीं घायल लोगों से आरोपितों की शिनाख्त करवाई गई थी और उस शिनाख्त में उन्होंने आरोपितों को पहचान लिया था।

क्या जिनको सजा मिली, वाकई उनकी पहचान हुई थी?

कुछ अन्य विषयों की चर्चा करें उससे पहले अब शिनाख्तगी की ही बात कर लेते हैं। कोर्ट ने बताया कि इन्हीं घायल लोगों ने आरोपितों को पहचान लिया था। लेकिन क्या कहानी वाकई इतनी सीधी है। तो सीधा सा जवाब है नहीं। और यह हम क्यों कह रहे हैं इसे भी कोर्ट के फैसले से समझने की कोशिश करते हैं।

सबसे पहले TIP की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि शुरुआती रिपोर्ट में आरोपित नामजद नहीं थे। पैरा 36 में शेख लाला के कथित बयान के आधार पर लिखा गया कि बराखड़ गाँव के पास 10-12 गाँव वालों ने ट्रक रोका लेकिन इसमें किसी आरोपित का नाम नहीं है। पैरा 14 में भी निरीक्षक जितेंद्र यादव ने स्वीकार किया कि अस्पताल से प्राप्त सूचना में घटना करने वालों के नाम या पहचान का जिक्र नहीं था। पैरा 33 में शेख लाला और सैय्यद मुश्ताक की अदालत वाली गवाही आती है। दोनों ने कहा कि वे आरोपितों को नहीं पहचानते। उन्होंने घटना का अलग विवरण दिया।

दरअसल आरोपितों के नाम और पहचान घटना के चश्मदीद गवाह यज्ञेश तिवारी से आए थे और इसका जिक्र पैरा 3 में है। आगे हम यज्ञेश तिवारी और अन्य गवाहों की स्थिति भी जानने की कोशिश करेंगे कि किस तरह उन्होंने एक कहानी बनाई थी। एक के बाद एक गवाहों ने आरोपितों को पहचानने से इनकार कर दिया। जिससे शिनाख्तगी का महत्व और अधिक बढ़ गया।

अब तक के फैसले के सार से यह समझ आ चुका है कि घटना के तुरंत बाद पीड़ितों द्वारा दिए गए कथित बयान में भी किसी आरोपित की पहचान नहीं है। पैरा 44 शिनाख्तगी से जुड़ा सबसे सीधा और गंभीर विरोधाभास है। इसमें अदालत लिखती है कि शेख लाला और मुश्ताक ने स्वीकार किया…गाँव में अंधेरा था और इसलिए वे किसी को देख नहीं पाए।

उन्होंने यह भी कहा कि मारपीट करने वालों का चेहरा देखकर भी पहचान नहीं सकते। लेकिन इसी के बाद अदालत लिखती है कि अभियोजन के अनुसार इन्हीं पीड़ितों से आरोपितों की शिनाख्तगी करवाई गई थी जिसमें उन्होंने आरोपितों को पहचाना था। यही शिनाख्तगी का सबसे बड़ा विरोधाभास है। जो गवाह कहते हैं कि अंधेरे में किसी का चेहरा नहीं देख पाए और पहचान नहीं सकते, उन्हीं पर अभियोजन शिनाख्तगी आधारित कर रहा है।

कोर्ट के फैसले का एक हिस्सा

पैरा 45 में IO जितेन्द्र सिंह यादव ने बताया कि आरोपितों की शिनाख्तगी के लिए JMFC और तहसील कार्यालय को पत्र भेजे गए और शेख लाला तथा मुश्ताक को शिनाख्तगी में उपस्थित रहने के लिए पत्र भेजे गए। शिनाख्तगी कार्यवाही तहसीलदार ललित सोनी द्वारा कराई गई।

पैरा 46 में तहसीलदार ललित सोनी ने कहा कि वे 19/12/2022 को उपजेल परिसर सिवनीमालवा गए थे। प्रत्येक आरोपितों के साथ मिलते-जुलते हुलिए के 4 अन्य लोगों को मिलाया गया था और शेख लाला तथा मुश्ताक ने हाथ के इशारे से पहचान की थी। लेकिन इसी पैरा में यह भी लिखा है कि शिनाख्तगी कार्रवाई के साक्षी अमन चौरसिया और देवेंद्र कौशल के बयान अभियोजन द्वारा नहीं कराए गए।

पैरा 48 में शेख लाला और मुश्ताक ने न्यायालय में कहा कि पुलिस उन्हें शिनाख्तगी कार्यवाही के लिए जेल लेकर गई थी। जेल में जेलर साहब ने कहा था कि अभिरक्षा में मौजूद आरोपितों की शिनाख्त करो। लेकिन दोनों ने यह भी कहा कि उन्होंने आरोपितों को पहचाना नहीं। उन्होंने शिनाख्तगी पंचनामा पर हस्ताक्षर मान लिए लेकिन अभियोजन के सूचक प्रश्नों पर इंकार किया कि उन्होंने आरोपितों को सही पहचाना था। यह मूल विरोधाभास है। रिपोर्ट कहती है कि पहचान हुई लेकिन पहचान करने वाले दोनों लोग अदालत में कहते हैं पहचान नहीं की।

कोर्ट के फैसले का एक हिस्सा

पैरा 50 में बचाव पक्ष ने कहा कि शिनाख्तगी पंचनामा पर उपजेल अधीक्षक के हस्ताक्षर या सील नहीं है। तहसीलदार ने इसे स्वीकार किया। पैरा 51 में अदालत ने कहा कि तहसीलदार की कार्यवाही अखंडित है लेकिन उसी पैरा में अदालत ने यह भी माना कि स्वयं शिनाख्तकर्ता शेख लाला और मुश्ताक ने कार्यवाही का समर्थन नहीं किया। यही विरोधाभास सबसे निर्णायक है कि प्रक्रिया कराने वाले लोग कहते हैं पहचान हुई लेकिन पहचान करने वाले लोग उसे नकारते हैं।

पैरा 53 में अदालत ने कहा कि फरियादीगण ने TIP का समर्थन नहीं किया, जिससे यह संभावना दिखती है कि वे प्रभावित यानी (Win Over) होकर अदालत में बयान दे रहे हैं। लेकिन इस निष्कर्ष के लिए अदालत ने कोई साक्ष्य नहीं बताया कि उन्हें किसने, कब और कैसे प्रभावित किया। यह एक और महत्वपूर्ण पहलू है क्योंकि अदालत पहचानकर्ताओं की गवाही को इसलिए कम महत्व दे रही है कि वे प्रभावित हो गए होंगे लेकिन यह केवल अनुमान के आधार पर कहा गया है।

कोर्ट के फैसले का एक हिस्सा

पैरा 75 में अदालत फिर कहती है कि तहसीलदार ललित सोनी ने विधिवत शिनाख्तगी कराई और शिनाख्तकर्ताओं ने वर्तमान आरोपितों को सही पहचाना। लेकिन उसी पैरा में अदालत यह भी मानती है कि शिनाख्तकर्ता इस कार्यवाही का समर्थन नहीं करते। अदालत ने तहसीलदार की निष्पक्षता को आधार बनाया कि उसकी आरोपितों से कोई दुश्मनी नहीं थी। लेकिन TIP में असली प्रश्न तहसीलदार की दुश्मनी या निष्पक्षता का नहीं बल्कि यह है कि जिन गवाहों ने कथित रूप से पहचान की, वे अदालत में उस पहचान को स्वीकार करते हैं या नहीं।

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पैरा 56 में अदालत ने कहा कि चश्मदीद गवाहों ने अभियोजन का समर्थन नहीं किया, लेकिन अभियोजन अपना मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्य से भी साबित कर सकता है। यानी कोर्ट भी यह मान चुकी है कि शिनाख्त की कार्रवाई में गड़बड़ी है।

कुल मिलाकर शिनाख्तगी से जुड़ी सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि अभियोजन की पूरी पहचान तीन कमजोर कड़ियों पर खड़ी है। पहली कड़ी यह कि FIR और शुरुआती सूचना में आरोपित अज्ञात थे। दूसरी कड़ी यह कि बाद में जिन लोगों ने पहचान की बताई गई, वही लोग अदालत में कहते हैं कि उन्होंने पहचान नहीं की और अंधेरे में किसी को देख भी नहीं पाए। तीसरी कड़ी यह कि TIP की प्रक्रिया में कई औपचारिक कमियाँ हैं जैसे स्वतंत्र गवाह पेश नहीं हुए, जेल अधीक्षक की सील/हस्ताक्षर नहीं है।

जो गवाह था, असल में वो गवाह नहीं था…

इस मामले में आरोपितों के नाम सबसे पहले सीधे FIR से नहीं आए थे। देहाती सूचना में केवल ’10-12 अज्ञात गाँव वालों’ की बात थी। आरोपितों के नाम आने की मुख्य कड़ी यज्ञेश कुमार तिवारी है।

पैरा 3 में अभियोजन की कहानी के रूप में लिखा गया कि विवेचना के दौरान चश्मदीद साक्षी यज्ञेश कुमार तिवारी के धारा 164 CrPC के न्यायालयीन कथन दर्ज कराए गए और उन्हीं कथनों में 14 लोगों के नाम आए। ये नाम थे- आकाश सराठे, गौरव यादव, आकाश उर्फ पिन्टोली, राजू उर्फ राजेन्द्र कौशल, चेतन मराठा, देवेंद्र कोरी, संदीप उर्फ राजा, दीपक उर्फ बाबा केवट, भोला बाथव, पवन बाथव, कन्हैया बाथव, प्रकाश कौशल, अज्जू राठौर और बल्लू रघुवंशी। यानी अभियोजन के अनुसार अज्ञात भीड़ से नामजद आरोपितों तक पहुँचने का सबसे बड़ा आधार यज्ञेश का कथन था।

कोर्ट के फैसले का एक हिस्सा

पैरा 37 में इसी बात को विस्तार से लिखा गया है। IO जितेंद्र सिंह यादव ने कहा कि उसने यज्ञेश तिवारी, शेख लाला, सैय्यद मुश्ताक, सुयश तिवारी, आयुष उर्फ अवि मिश्रा, अवधेश तिवारी, अजय तिवारी और गब्बू उर्फ अनिरुद्ध के कथन लिए थे। इसी पैरा में अदालत ने लिखा कि घटना 03/08/2022 की थी और उसी दिन यज्ञेश तिवारी के धारा 164 CrPC के बयान भी कराए गए, जिसमें उसने स्वयं को चश्मदीद बताया और 14 आरोपितों द्वारा घटना करना बताया।

हालाँकि, अदालत में आते ही यज्ञेश पूरी तरह पलट गया। उसने कहा कि वह आरोपितों को नहीं जानता, शेख लाला को नहीं जानता, मृतक नजीर को नहीं जानता और मुश्ताक को भी नहीं जानता। उसने कहा कि घटना के समय वह अपने परिवार सहित UP गया हुआ था और वापस आने पर गाँव की चर्चा तथा अखबार से घटना के बारे में पता चला। उसने अभियोजन के इस सुझाव से भी इंकार किया कि घटना के समय वह बराखड़ में था, चिल्लाने की आवाज सुनकर रोड पर पहुँचा था और उसने आरोपितों को लाठी-डंडे लेकर ट्रक रोकते तथा मारपीट करते देखा था।

कोर्ट के फैसले का एक हिस्सा

पैरा 69 में IO ने कहा कि वह बराखड़ खुर्द जाकर पूछताछ कर रहा था, तभी वहाँ चश्मदीद साक्षी यज्ञेश तिवारी मिला और उससे जानकारी ली गई। बचाव पक्ष ने इस पर सवाल उठाया कि यज्ञेश कहाँ मिला, उसके कथन कहाँ लिए गए और घायल गवाहों ने यह क्यों नहीं बताया कि मौके पर कोई चश्मदीद मौजूद था। पैरा 70 में अदालत ने कहा कि घटना रात 12 से 1 बजे के बीच अचानक भीड़ द्वारा की गई थी, इसलिए पीड़ितों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे हर विवरण को दें। लेकिन यह अदालत का स्पष्टीकरण था। यज्ञेश की वास्तविक मौजूदगी पर प्रत्यक्ष समर्थन किसी अन्य गवाह से नहीं मिला।

पैरा 71 में अदालत ने यज्ञेश के पलटने के बावजूद रोजनामचा सान्हा का सहारा लिया। इसमें लिखा गया कि घटना वाले दिन के रोजनामचा सान्हा क्रमांक 30 में यह दर्ज है कि यज्ञेश कुमार तिवारी की निशानदेही पर नक्शा बनाया गया और यज्ञेश के बयानों में आरोपितों के नाम आए। यानी अदालत ने यह माना कि यज्ञेश ने घटना वाले दिन ही नाम बताए थे फिर भले ही बाद में वह अदालत में मुकर गया था।

पैरा 73 में अदालत ने बचाव पक्ष के इस तर्क को देखा कि यज्ञेश ने घटना नहीं देखी और अपने विरोधियों के नाम पुलिस को बता दिए। पैरा 74 में अदालत ने फिर यह स्वीकार किया कि यज्ञेश ने न्यायालय में स्वयं को चश्मदीद मानने से इंकार किया और अभियोजन का समर्थन नहीं किया, इसलिए चश्मदीद साक्ष्य का अभाव है। लेकिन अदालत ने यह भी कहा कि यह महत्वपूर्ण परिस्थिति है कि घटना के तुरंत बाद यज्ञेश के कथन लिए गए और उसके 164 CrPC कथन में सभी आरोपितों के नाम बताए गए थे।

अन्य कथित चश्मदीद गवाहों की बात पैरा 38 में आती है। अवधेश तिवारी, सुयश तिवारी, अजय तिवारी और आयुष मिश्रा ने आरोपितों को पहचानने से इंकार किया और घटना की कोई जानकारी नहीं होना बताया। अनिरुद्ध उर्फ गब्बू तिवारी ने इतना जरूर कहा कि वह आरोपितों को पहचानता है क्योंकि वे सिवनीमालवा के निवासी हैं, लेकिन उसने भी घटना की जानकारी होने से इंकार किया। इन सभी गवाहों ने अभियोजन के सूचक प्रश्नों पर यह मानने से इंकार किया कि उन्होंने आरोपितों को लाठी-डंडे लेकर ट्रक ड्राइवर और उसके साथियों से मारपीट करते देखा था। अदालत ने पैरा 38 के अंत में खुद लिखा कि फरियादी और कथित चश्मदीदों ने अभियोजन का समर्थन नहीं किया।

कोर्ट के फैसले का एक हिस्सा

इस तरह गवाहों की पूरी स्थिति यह बनती है कि FIR में आरोपित अज्ञात थे, नाम यज्ञेश के कथित तत्काल पुलिस/164 बयान और रोजनामचा से आए लेकिन यज्ञेश अदालत में पूरी तरह मुकर गया। घायल गवाह शेख लाला और मुश्ताक ने आरोपितों को पहचानने से पहले ही इंकार कर दिया है। बाकी कथित चश्मदीद गवाहों ने भी अभियोजन का समर्थन नहीं किया। शिनाख्तगी करने वाले गवाहों ने अदालत में शिनाख्त से इंकार किया।

जिस ‘खून लगे डंडे’ के आधार पर दिया फैसला… उस आधार पर भी हैं ये सवाल

इस मामले में अदालत ने कथित प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के मुकर जाने के बाद सबसे ज्यादा भरोसा बरामद डंडों, कपड़ों और उन पर मिले मानव खून पर किया। यही वह मुख्य भौतिक/वैज्ञानिक साक्ष्य है, जिसके सहारे अदालत ने कहा कि आरोपितों की संलिप्तता साबित होती है। लेकिन इस सबूत में कई गंभीर कमजोरियाँ हैं। बरामदगी के पंच गवाह मुकर गए, असली वस्तुएँ अदालत में प्रदर्शित नहीं हो सकीं, FSL ने केवल ‘मानव रक्त’ बताया, यह नहीं बताया कि वह रक्त मृतक नजीर का था या नहीं और ब्लड ग्रुप/DNA की जाँच भी सामने नहीं आई।

पैरा 57 में अभियोजन ने सबसे पहले आरोपितों अमर उर्फ भोला बाथव से बरामदगी की कहानी रखी। IO जितेन्द्र सिंह यादव ने कहा कि 27 नवंबर 2022 को भोला से पूछताछ हुई और उसने बताया कि जिस डंडे से मारपीट की थी, वह घर में छिपाकर रखा है और घटना के समय पहने कपड़े भी घर के पीछे वाले कमरे में रखे हैं। फिर उसके घर गोटियापुरा से काले रंग का लोवर और एक बाँस का डंडा जब्त किया गया।

यहाँ दिक्कत यह है कि घटना 03 अगस्त 2022 की थी और बरामदगी 27 नवंबर 2022 को दिखाई गई यानी करीब चार महीने बाद। इतने लंबे समय बाद कोई आरोपित कथित हत्या का डंडा और कपड़ा अपने घर में सुरक्षित रखे, यह बात अपने आप में सख्त प्रमाण नहीं बनती जब तक उस डंडे और कपड़े को मृतक या घटना से वैज्ञानिक रूप से जोड़ा न जाए।

इसके बाद के पैरा में IO ने कन्हैया बाथव, दीपक उर्फ बाबा केवट, अजय, प्रकाश कौशल, पवन बाथव और बल्लू के घर से भी खून लगे डंडे या कपड़े मिलने की बात दोहराई है। लेकिन सभी कथित बरामदगियाँ कई महीने बाद की है और हर एक कहानी एक जैसी है।

पैरा 66 में यह कमजोरी और गंभीर हो जाती है। अजय पांडे, सुमेर राठौर और विजय केवट ने आरोपितों को पहचानने से इंकार किया। सुमेर राठौर और विजय केवट ने बल्लू उर्फ अनुज के मेमोरेण्डम और जब्ती पत्रक पर हस्ताक्षर स्वीकार किए लेकिन यह मानने से इंकार किया कि मेमोरेण्डम, जब्ती और गिरफ्तारी की कार्रवाई उनके सामने हुई थी। उन्होंने स्वीकार किया कि पुलिस ने उनसे हस्ताक्षर करने को कहा था। इसलिए उन्होंने सिर्फ हस्ताक्षर कर दिए।

अदालत ने खुद लिखा कि पंच गवाहों ने अभियोजन का समर्थन नहीं किया और मेमोरेण्डम, जब्ती तथा गिरफ्तारी के संबंध में केवल विवेचक जितेंद्र सिंह यादव की गवाही उपलब्ध है। यह इस पूरे भौतिक सबूत की सबसे बड़ी कमजोरी है।

कोर्ट के फैसले का एक हिस्सा

पैरा 67 में अदालत ने IO की गवाही को बचाने की कोशिश की। अदालत ने करमजीत सिंह बनाम स्टेट का हवाला देकर कहा कि पुलिस अधिकारी की गवाही को केवल इसलिए संदेह से नहीं देखा जा सकता कि वह पुलिस वाला है। यह सिद्धांत सामान्य रूप से सही है। लेकिन इस केस में समस्या केवल यह नहीं है कि गवाह पुलिस अधिकारी है। समस्या यह है कि प्रत्यक्षदर्शी गवाह मुकर गए, TIP के गवाह मुकर गए, बरामदगी के पंच गवाह मुकर गए और फिर भी बरामदगी को केवल IO के बयान पर स्वीकार किया गया। ऐसे में IO की गवाही को बहुत सावधानी से परखना चाहिए था।

पैरा 76 में अदालत ने फिर लिखा कि जब जब्त संपत्ति अदालत में मँगाई गई तो जानकारी मिली कि वह FSL से वापस प्राप्त नहीं हुई। इसके बावजूद अदालत ने कहा कि IO के कथन अखंडित हैं और उसने संपत्ति FSL भोपाल भेजी थी, जिसका ड्राफ्ट, जमा पावती और FSL रिपोर्ट रिकॉर्ड पर है। यहाँ दिक्कत यह है कि जब वस्तुएँ अदालत में प्रदर्शित ही नहीं हुईं, पंच गवाह बरामदगी से मुकर गए और केवल IO कह रहा है कि वही वस्तुएँ भेजी गईं, तो पूरी चेन का भार एक ही पुलिस अधिकारी पर आ गया।

कोर्ट के फैसले का एक हिस्सा

पैरा 77 में FSL रिपोर्ट का विवरण है। अदालत ने लिखा कि FSL को सीलबंद 14 बंडल/बॉक्स/पैकिट मिले, जिनमें आरोपितों से जब्त लोवर, डंडे, जींस, टी-शर्ट और शर्ट शामिल थे। पैरा 78 में FSL का मुख्य निष्कर्ष है। रिपोर्ट के अनुसार A, B, C, D, E, F, G1, G2, I, K, N1 और N2 पर मानव रक्त पाया गया। यानी भोला के लोवर और डंडे, पवन के लोवर और डंडे, कन्हैया के लोवर और डंडे, दीपक की जींस और टी-शर्ट, प्रकाश की शर्ट, अज्जू का लोवर, बल्लू की टी-शर्ट और लोवर पर मानव रक्त बताया गया। सबसे बड़ी बात यह है कि FSL ने सिर्फ ‘मानव रक्त’ कहा गया। उसने यह नहीं बताया कि यह रक्त नजीर अहमद का था। यह भी नहीं बताया कि यह रक्त शेख लाला या मुश्ताक का था। ब्लड ग्रुप या DNA मिलान का कोई स्पष्ट निष्कर्ष रिकॉर्ड में नहीं है। इसलिए यह वैज्ञानिक रूप से अधूरी कड़ी है।

कोर्ट के फैसले का एक हिस्सा

बचाव पक्ष ने कहा कि जब मृतक का ब्लड ग्रुप जाँचा ही नहीं गया, तो केवल किसी वस्तु पर खून मिलने से मामला सिद्ध नहीं होता। अदालत ने यह तर्क यह कहकर खारिज किया कि वर्तमान मामले में जब्त लाठी, डंडे और कपड़े आरोपितों के घर से मिले हैं और उन पर खून लगा था।

अदालत ने यह भी कहा कि आरोपितों ने यह बचाव नहीं लिया कि कपड़े उनके नहीं थे और यह भी साबित नहीं हुआ कि पुलिस से उनकी कोई पुरानी रंजिश थी। यहाँ अदालत ने फिर भार आरोपितों की तरफ मोड़ दिया, जबकि मूल प्रश्न यह था कि अभियोजन यह साबित करे कि वह रक्त मृतक या घटना से जुड़ा था।

अदालत ने धारा 106 Evidence Act 109 का इस्तेमाल किया। अदालत ने कहा कि जब आरोपितों के घर से जब्त कपड़ों और लाठी-डंडों पर मानव रक्त मिला, तो यह बताने का दायित्व आरोपितों पर था कि वह रक्त कैसे आया। अदालत ने कहा कि आरोपितों ने कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया।

यह निष्कर्ष बहुत विवादास्पद है, क्योंकि धारा 106 तभी लागू होती है जब अभियोजन पहले मूल तथ्य मजबूती से साबित कर दे। यहाँ मूल तथ्य ही विवादित हैं कि बरामदगी के गवाह मुकर गए, वस्तुएँ अदालत में प्रदर्शित नहीं हुईं और FSL ने केवल मानव रक्त बताया, मृतक का रक्त नहीं। ऐसे में केवल ‘स्पष्टीकरण नहीं दिया’ कहकर अभियोजन की कमी पूरी नहीं की जा सकती।

बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि मृतक का ब्लड ग्रुप पता नहीं किया गया और FSL रिपोर्ट में भी परीक्षण किए गए प्रदर्शों के ब्लड ग्रुप का उल्लेख नहीं है, इसलिए मामला सिद्ध नहीं होता। अदालत ने यह तर्क खारिज करते हुए कहा कि आरोपितों के मेमोरेण्डम से घर से बरामदगी हुई, वस्तुओं पर मानव रक्त पाया गया और घटना वाले दिन रोजनामचा में यज्ञेश ने सभी आरोपितों के नाम बताए थे।

यहाँ अदालत ने ब्लड ग्रुप/DNA की कमी को निर्णायक नहीं माना। लेकिन यही अपील का बड़ा बिंदु बनता है कि जब पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर था और प्रत्यक्ष पहचान कमजोर थी तो ऐसे में ब्लड ग्रुप या DNA की अनुपस्थिति को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए था।

बचाव पक्ष ने एक और महत्वपूर्ण बात उठाई कि जब्त हथियारों यानी डंडों के बारे में डॉक्टर से कोई जाँच नहीं कराई गई। यानी डॉक्टर से यह नहीं पूछा गया कि मृतक या घायल गवाहों की चोटें इन्हीं जब्त डंडों से आ सकती थीं या नहीं। अदालत ने माना कि डंडों की जाँच डॉक्टर से नहीं कराई गई लेकिन इसे केवल अनियमितता कहा और बताया कि डॉक्टर ने बताया था कि चोटें सख्त और भोथरी वस्तु से आ सकती थीं।

कोर्ट के फैसले का एक हिस्सा

इस पूरे सबूतों को सरल भाषा में समझें तो अदालत ने कहा कि आरोपितों के घरों से डंडे और कपड़े मिले, उन पर मानव रक्त मिला, इसलिए आरोपितों को बताना चाहिए था कि खून कैसे आया। लेकिन यह चेन अधूरी है। जिन गवाहों के सामने बरामदगी लिखी गई, वे अदालत में मुकर गए।

उन्होंने कहा कि पुलिस ने सिर्फ हस्ताक्षर कराए। FSL ने केवल मानव रक्त बताया, यह नहीं बताया कि वह रक्त मृतक नजीर का था। ब्लड ग्रुप या DNA नहीं मिला। डॉक्टर से यह भी नहीं पूछा गया कि चोटें इन्हीं डंडों से आई थीं। इसलिए यह सबूत संदेह पैदा कर सकता है लेकिन क्या यह दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त आधार बनाता है?

उम्रकैद की सजा देते समय कोर्ट ने माना कि आरोपितों ने भीड़ के रूप में मिलकर मॉब लिंचिंग की थी। कोर्ट के अनुसार, सभी आरोपितों ने विधि-विरुद्ध जमाव बनाया, वे लाठी-डंडों जैसे घातक हथियारों से लैस थे और उन्होंने बलवा करते हुए बहुत बेरहमी से मारपीट की। इसी मारपीट के कारण नजीर अहमद को गंभीर चोटें आईं और बाद में उसकी मृत्यु हो गई। कोर्ट ने यह भी माना कि इसी घटना में शेख लाला और सैय्यद मुश्ताक को भी चोटें आईं। इन्हीं बातों को गंभीर मानते हुए कोर्ट ने आरोपितों को उम्रकैद की सजा देने का आधार बनाया।

कुल मिलाकर इस फैसले को पढ़ने पर सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि जब घटना की शुरुआत से लेकर अंत तक कई अहम बातें साफ नहीं हैं, तो दोषसिद्धि तक पहुँचना कितना सुरक्षित था। शुरुआती रिपोर्ट में आरोपित अज्ञात थे। घटना को लेकर तीन अलग-अलग विवरण सामने आए। कहीं 10-12 लोगों की बात है, कहीं 50-60 लोगों की और अदालत में घायल गवाहों ने 100-150 लोगों तक की बात कही। कहीं ट्रक में गाय-ढोर बताए गए, तो अदालत में वही गवाह सब्जी का ट्रक बताते हैं।

सबसे अहम बात यह है कि जिन लोगों को घटना का चश्मदीद बताया गया, वे अदालत में अभियोजन के साथ खड़े नहीं हुए। यज्ञेश तिवारी (जिसके बयानों से आरोपितों के नाम आए) उसने अदालत में खुद को चश्मदीद मानने से ही इंकार कर दिया। घायल गवाह शेख लाला और सैय्यद मुश्ताक ने भी आरोपितों को पहचानने से इंकार किया। उन्होंने यहाँ तक कहा कि अंधेरा था और वे मारपीट करने वालों का चेहरा देखकर पहचान नहीं सकते।

इसके बाद अदालत ने बरामद डंडों और कपड़ों पर मिले मानव रक्त को अहम आधार माना। लेकिन यहाँ भी बड़ा सवाल बचता है। बरामदगी के पंच गवाह मुकर गए। उन्होंने कहा कि पुलिस ने उनसे केवल हस्ताक्षर कराए थे। FSL ने सिर्फ इतना बताया कि वस्तुओं पर मानव रक्त था। यह नहीं बताया कि वह रक्त मृतक नजीर अहमद का था। न ब्लड ग्रुप मिला, न DNA मिलान हुआ। डॉक्टर से यह भी नहीं पूछा गया कि चोटें इन्हीं डंडों से आई थीं या नहीं।

ऐसे में यह मामला कई गंभीर सवाल छोड़ता है। अदालत ने जिन परिस्थितियों को दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त माना, उन पर ऊपरी अदालत में फिर से गहराई से विचार होना स्वाभाविक है। क्योंकि आपराधिक मुकदमे में संदेह कितना भी मजबूत हो लेकिन वह पक्के सबूत की जगह नहीं ले सकता।

‘The Wire’ ने दिखाई भारतीय सेना के लिए घृणा, अली अहमद ने ‘हिंदी और हिंदुत्व’ के बहाने फैलाया हिंदू विरोधी एजेंडा: आर्मी के ‘हिंदूकरण’ का झूठा नैरेटिव गढ़कर निकाली भड़ास

इस्लामी और वामपंथी सोच के लोग हमेशा से किसी न किसी तरह हिंदुओं का विरोध करते आए हैं, कभी खुलकर तो कभी दबे छिपे तरीके से। ये लोग भारतीय सेना को भी लगातार अपना निशाना बनाते रहते हैं। कश्मीर में जब हमारी सेना आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करती है, तो ये लोग सेना को ही विलेन यानी विद्रोही साबित करने में जुट जाते हैं। ये बिना सोचे-समझे सेना पर यह झूठा आरोप भी लगाते हैं कि सेना हिंदुओं के पक्ष में राजनीति कर रही है।

इनका असली मकसद सिर्फ इसलिए सेना को बदनाम करना है क्योंकि सेना इनके मनमुताबिक बनी नकली धर्मनिरपेक्षता की बातों को नहीं मानती। इसी तरह के एक नए विवाद में ‘The Wire’ नाम की वेबसाइट ने अली अहमद नाम के एक लेखक की बातों को बढ़ावा दिया है। इस लेखक ने भारतीय सेना को चेतावनी देते हुए कहा है कि सेना का हिंदी भाषा और हिंदुत्व की तरफ बढ़ता झुकाव देश के लिए ठीक नहीं है।

सेना में ‘हिंदी और हिंदुत्व’ के बहाने हिंदू नफरत का खेल- The Wire में दावा

‘The Wire’ नाम की वेबसाइट का कहना है कि भारतीय सेना पर हिंदुत्व का असर बढ़ रहा है, इसीलिए वहाँ हिंदी भाषा और हिंदू धर्म को बढ़ावा दिया जा रहा है। लेखक अली अहमद ने अपने लेख में ‘हिंदी और हिंदुत्व’ शब्दों का इस्तेमाल सिर्फ हिंदुओं के प्रति अपनी नफरत निकालने के लिए किया है। 24 जून को छपे उसके लेख की हेडलाइन यानि शीर्षक था कि भारतीय सेना का हिंदी और हिंदुत्व के प्रति नया लगाव गंभीर नतीजे ला सकता है।

‘The Wire’ के इस लेख में दावा किया गया कि सेना अपनी बातचीत और दफ्तरों में जो हिंदी का इस्तेमाल कर रही है, वह सरकार के राजनीतिक कंट्रोल का इशारा है। लेखक अली अहमद के मुताबिक सेना पर जबरन हिंदी थोपकर उसका हिंदूकरण करने की बड़ी साजिश चल रही है। अपनी बात को सही दिखाने के लिए अली अहमद ने सेना के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल हरचरणजीत सिंह पनाग के एक पुराने लेख का सहारा लिया।

पनाग ने लिखा था कि जनता भारतीय सेना पर इसलिए भरोसा करती है क्योंकि वह हमेशा से धर्मनिरपेक्ष रही है और राजनीति से दूर रही है। वैसे तो देश की जनता हमेशा से सेना की इस समझदारी और राजनीति से दूरी की तारीफ करती है, लेकिन सेना की यह खूबी वैसी धर्मनिरपेक्षता बिल्कुल नहीं है जैसी इस्लामी-वामपंथी लोग चाहते हैं। इन हिंदू-विरोधी लोगों की नजर में धर्मनिरपेक्षता का असली मतलब सिर्फ यह है कि सरकारी दफ्तरों या नीतियों में गैर-हिंदू, खासकर मुस्लिम मान्यताओं और परंपराओं को जगह मिले।

अगर सेना या राजनीति में कहीं भी हिंदू धर्म की छोटी सी झलक भी दिख जाए, तो ये लोग तुरंत चिल्लाने लगते हैं कि लोकतंत्र खत्म हो गया और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो रहा है। यहाँ यह जानना बहुत जरूरी है कि HS पनाग वही पूर्व फौजी अफसर हैं जिन्होंने साल 2019 में एक बहुत विवादित बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोबारा चुनाव जीतकर आते हैं, तो सरकार के खिलाफ तख्तापलट कर देना चाहिए।

मोदी और हिंदुत्व के प्रति पनाग की यह नफरत इंटरनेट पर कई बार देखी जा चुकी है। सितंबर 2021 में उन्होंने ‘बीटिंग रिट्रीट’ कार्यक्रम का एक Video पोस्ट किया था, जिसमें सेना का बैंड एक हिंदू आरती की धुन बजा रहा था। पनाग ने इस Video को एक मजाक उड़ाने वाले और झूठे शीर्षक के साथ शेयर किया ताकि लोगों को लगे कि मोदी सरकार सेना के कार्यक्रमों में जबरन हिंदू रीति-रिवाज थोप रही है, जबकि सच्चाई यह है कि सेना में आरती की धुन बजाने की यह परंपरा बहुत पुरानी है।

अब अगर अली अहमद के उसी झूठ पर वापस आएँ जिसे उसने सेना में ‘हिंदी और हिंदुत्व’ का नाम दिया है, तो पहली बात यह है कि सेना की बातचीत, ट्रेनिंग सेंटरों या स्मारकों में हिंदी को अभी जबरन शामिल नहीं किया गया है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 343 के तहत देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिंदी पूरे देश की राजभाषा है, हालांकि इसके साथ सरकारी कामों में अंग्रेजी इस्तेमाल करने की भी पूरी छूट दी गई है।

भारतीय सेना में हिंदी भाषा का इस्तेमाल आजादी के तुरंत बाद से ही शुरू हो गया था। साल 1951 से ही तत्कालीन सरकार ने सेना के तीनों अंगों में देवनागरी लिपि वाली हिंदी का इस्तेमाल अनिवार्य कर दिया था। उस समय देश में हिंदुत्व की विचारधारा वाली सरकार नहीं थी। सैन्य अधिकारियों के लिए हिंदी की परीक्षाएँ पास करना जरूरी था और जवानों को देवनागरी लिपि सिखाई जाती थी।

मार्च 1951 से आर्मी एजुकेशन कोर ने सभी सैन्य कर्मियों और प्रशिक्षकों को हिंदी सिखाने के लिए खास कोर्स शुरू किए थे। साल 1952 में थल सेना, नौसेना और वायुसेना के अधिकारियों के साथ मिलकर एक एक्सपर्ट कमेटी बनाई गई थी ताकि हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में लागू किया जा सके।

भारत जैसे विविधता वाले देश में हिंदी को अपनाना देश के एकीकरण का एक बड़ा हिस्सा था। इसका मकसद अंग्रेजी के उस प्रभाव को खत्म करना था जो ब्रिटिश गुलामी की पहचान था। मौजूदा मोदी सरकार ने सेना से औपनिवेशिक काल की पुरानी परंपराओं को हटाने के लिए कई कदम जरूर उठाए हैं। इसके बावजूद सेना में हिंदी के इस्तेमाल को एक नया राजनीतिक बदलाव बताना बिल्कुल गलत है, जैसा कि अली अहमद और ‘The Wire’ पेश कर रहे हैं।

सेना की कई टुकड़ियों में अलग-अलग राज्यों के सैनिक होते हैं, जिनके बीच आपसी तालमेल और ट्रेनिंग के लिए हिंदी एक संपर्क भाषा का काम करती है। इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि सेना दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं से नफरत करती है या उन पर रोक लगाती है। हिंदी को जोड़ने वाली भाषा के रूप में इस्तेमाल करने की यह नीति दशकों पुरानी है।

यहाँ कुछ सीधे सवाल उठते हैं कि आखिर इस्लामी-वामपंथी लोग सेना में हिंदी के इस्तेमाल का विरोध क्यों करते हैं? अगर हिंदी का प्रसार हो भी रहा है तो इसमें गलत क्या है? क्या हिंदी एक भारतीय भाषा नहीं है जिसे देश के करीब 43 फीसदी लोग बोलते हैं? इन सभी सवालों का जवाब ‘The Wire’ के उस दावे में छिपा है जिसमें उन्होंने हिंदी के प्रसार को हिंदुत्व के एजेंडे और हिंदूकरण से जोड़ दिया है।

इसका सीधा मतलब यह है कि ये इस्लामी-वामपंथी लोग हिंदी को सिर्फ हिंदुओं की भाषा मानते हैं और इसीलिए सेना में इसके इस्तेमाल को हिंदूकरण का नाम देते हैं। यह सच है कि हिंदी की जड़ें संस्कृत में हैं और संस्कृत का जुड़ाव हिंदू धर्म से है, भले ही इतिहास में सभी हिंदू संस्कृत या हिंदी नहीं बोलते थे।

लेखक अली अहमद ने यहाँ भाषा का सांप्रदायिकरण करके देश को बाँटने की पुरानी चाल चली है। ‘हिंदी हिंदुओं की और उर्दू मुसलमानों की भाषा है’ का यह विवाद 19वीं और 20वीं शताब्दी के हिंदी-उर्दू विवाद से जुड़ा है। 19वीं सदी में उत्तर-पश्चिम प्रांतों के मुस्लिम एलीट वर्ग, खासकर सर सैयद अहमद खान ने अदालतों और प्रशासन में हिंदी का विरोध किया था।

सर सैयद अहमद खान वही व्यक्ति हैं जिन्होंने द्वि-राष्ट्र सिद्धांत की नींव रखी, जिसके कारण आगे चलकर धर्म के नाम पर भारत का हिंसक बँटवारा हुआ। उन्होंने फारसी-अरबी लिपि वाली उर्दू को मुस्लिम पहचान और मुस्लिम शासन से जोड़कर बढ़ावा दिया और देवनागरी लिपि में हिंदी के इस्तेमाल को हिंदुओं का प्रयास बताया। इसके जवाब में हिंदुओं ने देवनागरी हिंदी को अपनी मूल और आम लोगों के लिए आसान भाषा के रूप में आगे बढ़ाया।

यह पूरा विवाद साल 1837 में तब शुरू हुआ जब अंग्रेजों ने उत्तर भारत की अदालतों और प्रशासन में फारसी की जगह उर्दू को आधिकारिक भाषा बना दिया। चूंकि मुस्लिम वर्ग उर्दू जानता था, इसलिए यह नीति उनके फायदे में थी। लेकिन हिंदू समुदाय को उर्दू लिपि की जानकारी न होने के कारण नुकसान हो रहा था, जबकि उनकी आबादी ज्यादा थी।

इसके विरोध में वाराणसी और पूरे क्षेत्र के हिंदुओं ने देवनागरी लिपि लागू करने की माँग की। साल 1867 तक आते-आते सैयद अहमद खान इस सोच को बढ़ावा देने लगे कि हिंदू और मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते और मुसलमानों के लिए एक अलग देश होना चाहिए। हालाँकि बाद में साल 1900 में अंग्रेजों ने हिंदी और उर्दू दोनों को कागजों पर बराबर का दर्जा दे दिया, लेकिन यह विवाद कभी सिर्फ भाषा का नहीं था, बल्कि इसके पीछे राजनीतिक और सांप्रदायिक इरादे थे।

धर्मनिरपेक्षता के दोहरे पैमाने और सेना पर झूठे आरोप

उस दौर में मुसलमानों ने प्रशासनिक व्यवस्था में अपना दबदबा बनाए रखने के लिए उर्दू को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया था। वहीं दूसरी तरफ हिंदू सिर्फ उस भाषा को पहचान दिलाना चाहते थे जिसे वे आसानी से पढ़ और लिख सकते थे। महात्मा गाँधी ने दोनों पक्षों को शांत करने के लिए हिंदी और उर्दू को मिलाकर ‘हिंदुस्तानी’ भाषा का एक सेक्युलर विकल्प दिया था, लेकिन इससे भी दोनों पक्षों का विवाद खत्म नहीं हुआ।

आजादी और विभाजन से पहले मुस्लिम नेताओं ने द्वि-राष्ट्र सिद्धांत को आगे बढ़ाने के लिए भाषाओं का सांप्रदायिकरण किया। विभाजन के बाद पाकिस्तान ने मुस्लिम पहचान के रूप में उर्दू को अपनी राष्ट्रीय भाषा चुना, जबकि वहाँ की बड़ी आबादी के हिसाब से पंजाबी को यह दर्जा मिलना चाहिए था। वहीं दूसरी तरफ भारत ने हिंदी को अपनी राजभाषा के रूप में अपनाया।

यह सच है कि हिंदी की जड़ें संस्कृत में हैं और 19वीं सदी में मुसलमानों द्वारा उर्दू को अपनी खास पहचान बनाने के जवाब में हिंदी का उभार हुआ था। इसके बावजूद हिंदी सिर्फ हिंदुओं की या उनके लिए कोई विशेष भाषा नहीं है। उत्तर भारत में एक बहुत बड़ी मुस्लिम आबादी रहती है, जिसमें से पढ़े-लिखे लोग बिना किसी दबाव के उर्दू के साथ-साथ हिंदी भी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं।

इसलिए हिंदी को केवल हिंदुओं की भाषा कहना पूरी तरह गलत है। सेना या किसी भी सरकारी विभाग में हिंदी का इस्तेमाल होना किसी भी तरह से सेना का ‘हिंदूकरण’ नहीं है। ‘The Wire’ को इस बात से भी बड़ी परेशानी है कि थल सेनाध्यक्ष जनरल उपेंद्र द्विवेदी मंदिरों में दर्शन करने क्यों जाते हैं।

लेखक अली अहमद ने लिखा कि जनरल द्विवेदी का मंदिर जाना देश के राजनीतिक बदलाव को जानबूझकर समर्थन देने जैसा है। लेखक ने सवाल उठाया कि क्या उन्होंने यह सब अपने निजी फायदे के लिए किया या फिर सैन्य नेतृत्व को सरकार से ऐसा करने का कोई गुप्त इशारा मिला है। यह देखना काफी हैरान करने वाला है कि यही इस्लामी-वामपंथी गुट तब चुप रहता है जब सेना के अधिकारी कश्मीर में लोगों से जुड़ने के लिए नमाज में शामिल होते हैं।

तब उनके लिए वह नमाज शांति और सद्भाव का प्रतीक बन जाती है, लेकिन जब सेना प्रमुख जगन्नाथ मंदिर जाते हैं, तो उसे सेना का हिंदूकरण और बहुसंख्यकवाद का नाम दे दिया जाता है। अगर देश में सचमुच हिंदुत्व के आधार पर सेना का हिंदूकरण हो रहा होता, तो अली अहमद जैसे मुस्लिम लेखक को वर्तमान सेना प्रमुख की निष्ठा पर सवाल उठाने और उनके धार्मिक अधिकारों पर हमला करने के लिए जेल में डाल दिया जाता।

अपने इस लेख में ‘The Wire’ ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर भी निशाना साधा और यह झूठा दावा किया कि संघ खुद को हिंदू धर्म का पर्याय मानता है। लेखक ने RSS पर विविधता को खत्म करने का आरोप लगाया। इसके साथ ही भाजपा की चुनावी जीत पर दुख जताते हुए लेखक ने रोना रोया कि सेना ने अपनी ताकत और सम्मान को बहुसंख्यक राजनीति के पक्ष में झुका दिया है। लेखक का दावा है कि पहले के धर्मनिरपेक्ष दौर में सेना राजनीति से दूर थी, लेकिन अब एक ही पार्टी के बढ़ते प्रभाव के कारण सेना का राजनीति से अलग रहना बेअसर हो गया है।

सेना के शौर्य और परंपराओं पर वामपंथी एजेंडे का हमला

लेखक अली अहमद ने मौजूदा हिंदू-समर्थक सरकार के प्रति अपनी नफरत के कारण भारतीय सेना की निष्पक्षता और उसके पेशेवर अंदाज पर भी खुलेआम सवाल उठाए हैं। उनके इस पूरे लेख का कुल मिलाकर यही मतलब है कि भारतीय सेना के बड़े अधिकारी अब मंदिरों में जा रहे हैं। उनका दावा है कि सेना में कथित तौर पर हिंदी और हिंदुत्व को बढ़ावा देकर उसके धर्मनिरपेक्ष यानी सेक्युलर स्वरूप को खत्म किया जा रहा है।

असल में भारत एक अनोखा देश है जिसका आधुनिक ढांचा धर्मनिरपेक्ष है। यह धर्मनिरपेक्षता सिर्फ इसलिए बची हुई है क्योंकि यहाँ बहुसंख्यक आबादी हिंदू है और इस देश की आत्मा हिंदू सनातन धर्म से जुड़ी हुई है। हिंदू धर्म को कभी भी देश की राजनीति या सैन्य व्यवस्था से अलग नहीं किया जा सकता। भारतीय सेना विदेशी हमलों और दुश्मनों से देश की रक्षा करते समय किसी नागरिक का धर्म नहीं पूछती, भले ही सामने वाले दुश्मन अक्सर मुस्लिम देश से हों और पीड़ित होने वाले ज्यादातर हिंदू हों।

धर्मनिरपेक्षता का मतलब अपने धर्म को छोड़ देना नहीं होता, बल्कि इसका मतलब यह है कि आपका धार्मिक विश्वास आपके सरकारी काम के बीच में न आए। भारतीय सेना कश्मीर में आम जनता तक पहुँच बनाने के लिए उर्दू और स्थानीय कश्मीरी भाषा का भी इस्तेमाल करती है। तो क्या इसका यह मतलब निकाला जाए कि मोदी सरकार के राज में हमारी सेना का इस्लामीकरण हो रहा है?

सच तो यह है कि भारतीय सेना की कई रेजिमेंटों के युद्धघोष (वार क्राई) और उनके आदर्श वाक्य दशकों पुराने हैं, जो हिंदू देवी-देवताओं और सिख गुरुओं के नाम पर आधारित हैं। इन्हें किसी भी तरह से मौजूदा सरकार का कोई ‘हिंदूकरण एजेंडा’ नहीं कहा जा सकता। भारतीय सेना में सैनिक युद्ध के मैदान में अपना हौसला बढ़ाने के लिए हमेशा से अपने भगवान को याद करते आए हैं। इसके कई बड़े उदाहरण हमारे सामने हैं।

जैसे राजपूताना राइफल्स का युद्धघोष ‘राजा रामचंद्र की जय’ है, तो राजपूत रेजिमेंट ‘बोल बजरंग बली की जय’ का नारा लगाती है। इसी तरह डोगरा रेजिमेंट ‘ज्वला माता की जय’, सिख रेजिमेंट ‘जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’, गढ़वाल राइफल्स ‘बद्री विशाल लाल की जय’, कुमाऊं रेजिमेंट ‘कालिका माता की जय’ और जम्मू-कश्मीर राइफल्स ‘दुर्गा माता की जय’ के नारे के साथ आगे बढ़ती है।

इस सब को देखते हुए अगर आने वाले समय में अली अहमद या ‘The Wire’ इस बात पर भी सवाल उठा दें कि सेना में ‘अल्लाह’ के नाम पर कोई युद्धघोष क्यों नहीं है, तो इसमें कोई हैरानी नहीं होगी। सेना में हिंदू परंपराओं का पालन सैनिक पूरी श्रद्धा के साथ करते हैं। इसका सबसे अच्छा उदाहरण राजस्थान का तनोट माता मंदिर है, जिसकी देखरेख साल 1965 से सीमा सुरक्षा बल (BSF) के जवान कर रहे हैं।

इस मंदिर की कहानी यह है कि भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित होने के बावजूद साल 1965 और 1971 के युद्धों में पाकिस्तान की भारी गोलाबारी से इस मंदिर को कोई नुकसान नहीं हुआ था। मंदिर परिसर में गिरे पाकिस्तानी बम फटे ही नहीं और वे आज भी मंदिर में दर्शन के लिए रखे हुए हैं। हमारे जवान आज भी वहाँ रोज आरती करते हैं।

इसी तरह सिख रेजिमेंट बड़ी धूमधाम से बैसाखी मनाती है जहाँ सैनिक सम्मान के साथ गुरु ग्रंथ साहिब जी को सिर पर रखकर पाठ करते हैं। इसके साथ ही भारतीय सेना के बैंड आज भी ‘अबाइड विद मी’ नाम की पारंपरिक ईसाई प्रार्थना की धुन बजाते हैं, जो दिखाता है कि सेना सभी परंपराओं का सम्मान करती है।

भारतीय सेना में सैनिकों को समय-समय पर आध्यात्मिक मार्गदर्शन देने के लिए हर धर्म के धार्मिक गुरुओं या शिक्षकों की भर्ती की जाती है। इन गुरुओं में पंडित, मौलवी, ग्रंथी, पादरी और बौद्ध भिक्षु सभी शामिल हैं। मौजूदा सरकार या सैन्य नेतृत्व ने इनमें से किसी भी परंपरा पर रोक नहीं लगाई है। ऐसे में लेखक अली अहमद का यह दावा पूरी तरह गलत साबित होता है कि सेना बहुसंख्यक राजनीति के दबाव में आकर हिंदुत्व का एजेंडा चला रही है और अपनी पुरानी परंपराओं को छोड़ रही है।

लेखक अली अहमद जिसे सेना का ‘राजनीतिकरण’ कह रहे हैं, वह असल में भारत के सैन्य नेतृत्व और राजनीतिक नेतृत्व के बीच बढ़ा हुआ बेहतर तालमेल और सहयोग है। यह बदलाव किसी निजी फायदे के लिए नहीं आया है। यह बदलाव भाजपा सरकार के उस मजबूत रुख के कारण आया है जो पिछली कॉन्ग्रेस सरकार से बिल्कुल अलग है।

साल 2008 में मुंबई के 26/11 हमलों में जब पाकिस्तानी आतंकवादियों ने कई भारतीयों को मार डाला था, तब तत्कालीन सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया था। सच तो यह है कि एक राष्ट्रवादी सरकार स्वाभाविक रूप से सेना की जरूरतों और उसकी भावनाओं को बेहतर तरीके से समझती है। वह उन्हें तेजी से पूरा करती है जिससे दोनों के बीच एक बेहतरीन तालमेल बनता है।

इसे राजनीति से प्रेरित नहीं कहा जा सकता। एक मजबूत और जीवित लोकतंत्र में पेशेवर सेना और चुनी हुई सरकार इसी तरह मिलकर काम करती हैं। हालाँकि जो लोग भाषाओं पर धर्म का ठप्पा लगाते हैं और सेना प्रमुख के हिंदू होने पर सवाल उठाते हैं, वे भारतीय सेना की छवि खराब करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे लोग इस बात को पचा नहीं पा रहे हैं कि भारत अब उस पुराने और दिखावे वाले ‘धर्मनिरपेक्षता’ के ढर्रे को छोड़ रहा है। उस पुराने ढर्रे में सिर्फ हिंदू मान्यताओं को दबाया जाता था और दूसरे धर्मों के दिखावे को ही शांति, भाईचारा और देश की असली पहचान मान लिया जाता था।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है, अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

आर्टिकल 370 हटने के समय संभाली J&K में कमान, आतंकी नेटवर्क की तोड़ी कमर: जानिए कौन हैं वो ‘डॉक्टर’ महेश दीक्षित, जिन्हें मोदी सरकार ने बनाया नया IB चीफ

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने देश की सबसे पुरानी और महत्वपूर्ण आंतरिक खुफिया एजेंसी, इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के नए चीफ के रूप में वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी महेश दीक्षित की नियुक्ति की है।

यह महत्वपूर्ण निर्णय प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में आयोजित कैबिनेट की नियुक्ति समिति (ACC) की बैठक में लिया गया। महेश दीक्षित आगामी 1 जुलाई से आधिकारिक तौर पर अपना कार्यभार संभालेंगे।

ACC द्वारा जारी आदेश की प्रति

वह वर्तमान आईबी प्रमुख तपन कुमार डेका का स्थान लेंगे, जो 30 जून को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। सरकारी आदेश के अनुसार, महेश दीक्षित कम से कम अगले दो वर्षों तक इस शीर्ष पद पर बने रहेंगे। ये कार्यकाल सरकार के आदेश से आगे भी बढ़ सकता है।

25 जून को उनकी नियुक्ति के आधिकारिक निर्देश जारी होने के बाद से ही यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर वह कौन हैं, खुफिया अभियानों में उनका क्या योगदान रहा है और क्यों उन्हें इतनी संवेदनशील जिम्मेदारी सौंपी गई है। आइए इन्हीं सवालों का जवाब जानते हैं…

कौन हैं महेश दीक्षित और कैसे रहा उनका सफर

महेश दीक्षित, पहले एक डॉक्टर थे, लेकिन बाद में देशसेवा के लिए उन्होंने पुलिस सेवा का रास्ता चुना। वह 1993 बैच के आंध्र प्रदेश कैडर के एक बेहद सम्मानित और अनुभवी आईपीएस अधिकारी हैं।

उनके पास खुफिया मामलों को बेहद बारीकी से संभालने का, आतंकवाद विरोधी अभियानों को दिशा देने का और आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर सूझ-बूझ से कौशल दिखाने का 3 दशक का लंबा अनुभव है। उन्होंने जमीनी स्तर से लेकर मुख्यालयों तक कई जगह और कई पदों पर अपनी सेवाएँ दी हैं।

दीक्षित के करियर की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक जम्मू-कश्मीर में सब्सिडियरी इंटेलिजेंस ब्यूरो (SIB) के प्रमुख के रूप में उनका कार्यकाल था। साल 2019 के अगस्त माह में जब केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का ऐतिहासिक निर्णय लिया, तब वहाँ की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की स्थिति अत्यंत संवेदनशील थी। उस वक्त में और उससे ठीक पहले, महेश दीक्षित ने खुफिया मोर्चे पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने न केवल घाटी में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए सटीक और समय पर खुफिया जानकारियाँ जुटाईं, बल्कि विभिन्न सुरक्षा बलों के बीच समन्वय स्थापित कर किसी भी अप्रिय स्थिति को टालने में अपना योगदान दिया था।

इसके बाद वर्ष 2023 में श्रीनगर में आयोजित जी-20 (G-20) टूरिज्म वर्किंग ग्रुप की बैठक के दौरान भी सुरक्षा व्यवस्था की पूरी निगरानी महेश दीक्षित के कंधों पर थी। यह चूँकि जम्मू-कश्मीर में होने वाला एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का बड़ा आयोजन था, इसलिए इसमें की गई सुरक्षा व्यवस्था को देखने के बाद दीक्षित के कार्य की काफी सराहना हुई थी।

इसके अलावा बताया ये भी जा रहा है कि कुछ समय पहले उन्होंने ने एक बड़े ‘सफेदपोश’ आतंकवादी नेटवर्क का पर्दाफाश करने में अहम भूमिका निभाई थी, जिसके चलते भी वो काफी चर्चा के केंद्र में थे। उन्होंने यह कार्रवाई श्रीनगर पुलिस से मिली शुरुआती खुफिया जानकारी के आधार पर की गई थी।

जम्मू-कश्मीर के इस चुनौतीपूर्ण अनुभव के बाद, पिछले वर्ष उन्हें नई दिल्ली स्थित आईबी मुख्यालय में ट्रांसफर किया गया था, जहाँ उन्हें स्पेशल डायरेक्टर (विशेष निदेशक) के पद पर पदोन्नत किया गया, तभी से यह तय माना जा रहा था कि वह देश के अगले खुफिया प्रमुख हो सकते हैं।

किसकी जगह नियुक्त होंगे महेश दीक्षित

बता दें कि महेश दीक्षित, जिन तपन कुमार डेका की जगह पद को संभालेंगे वह डेका 1988 बैच के हिमाचल प्रदेश कैडर हैं। उन्होंने जुलाई 2022 से लगातार आईबी का नेतृत्व किया और सरकार ने उनके बेहतरीन ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए उन्हें दो बार सेवा विस्तार भी दिया।

अपने दो साल के कार्यकाल के दौरान डेका ने पूर्वोत्तर में उग्रवाद पर लगाम लगाने, आतंकवाद विरोधी ग्रिड को मजबूत करने और विभिन्न राज्यों की पुलिस व केंद्रीय एजेंसियों के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान को बेहतर बनाने पर विशेष ध्यान दिया। अब इसी दिशा में आगे महेश दीक्षित भी अपने ढंग से काम करेंगे।

IB क्या करती है काम?

गौरतलब है कि इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) भारत की प्रमुख आंतरिक खुफिया एजेंसी है, जो देश की सुरक्षा से जुड़े मामलों पर नजर रखती है। इसकी स्थापना 1887 में ब्रिटिश शासन के वक्त भले हुई थी, लेकिन स्वतंत्रता के बाद इसे भारत की केंद्रीय खुफिया एजेंसी के रूप में विकसित किया गया। आज IB, गृह मंत्रालय के अधीन काम करती है और इसका नेतृत्व डायरेक्टर, इंटेलिजेंस ब्यूरो (DIB) करते हैं।

एजेंसी का मुख्य काम आतंकवाद, अलगाववाद, नक्सलवाद और अन्य सुरक्षा खतरों की जानकारी जुटाना और समय रहते सरकार को सतर्क करना है। इसके अलावा, चुनाव के वक्त, वीआईपी सुरक्षा में, बड़े आयोजनों के दौरान, साइबर सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों पर भी IB लगातार निगरानी रखकर रिपोर्ट देने का काम करती है।

पुणे के महात्मा फुले वाडा में वट पूर्णिमा पूजा को पुरातत्व विभाग की हरी झंडी, हिंदू संगठनों के भारी विरोध के बाद महाराष्ट्र सरकार ने बदला आदेश: जानें क्या है पूरा मामला

महात्मा फुले वाडा वट पूर्णिमा विवाद में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। महाराष्ट्र पुरातत्व विभाग ने नया पत्र जारी करते हुए साफ किया है कि संरक्षित स्मारक घोषित होने से पहले महात्मा फुले वाडा में जो परंपराएँ और धार्मिक रीति-रिवाज प्रचलित थे, उन्हें आगे भी जारी रखा जाएगा।

इस फैसले के साथ ही श्रद्धालुओं के लिए वाडा परिसर में पारंपरिक वट पूर्णिमा पूजा करने का रास्ता साफ हो गया है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब कुछ दिन पहले हिंदू संगठनों ने पहले जारी आदेश का विरोध करते हुए पारंपरिक पूजा जारी रखने की अनुमति देने की माँग की थी और इस संबंध में एक ज्ञापन भी सौंपा था।

23 जून 2026 को सहायक निदेशक (पुरातत्व), पुणे मंडल द्वारा जारी यह नया पत्र खड़क पुलिस स्टेशन, पुणे के वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक को संबोधित है।

इसमें मुंबई स्थित पुरातत्व एवं संग्रहालय निदेशक के निर्देशों का हवाला देते हुए कहा गया है कि महात्मा फुले वाडा को राज्य संरक्षित स्मारक घोषित किए जाने से पहले वहाँ जो परंपराएँ और धार्मिक प्रथाएँ चली आ रही थीं, उन्हें वैसे ही बनाए रखा जाए। साथ ही स्थानीय पुलिस को निर्देश दिया गया है कि वट पूर्णिमा के अवसर पर सालों से चली आ रही परंपरा जारी रहे और कानून-व्यवस्था भी बनी रहे।

यह नया आदेश विभाग के 2 जून को जारी किए गए पुराने आदेश से बिल्कुल अलग है। उस आदेश में पुलिस तैनात करने की बात कही गई थी ताकि वट पूर्णिमा के दिन महात्मा फुले वाडा परिसर में कोई धार्मिक कार्यक्रम आयोजित न हो सके।

उस आदेश ने विवाद खड़ा कर दिया था क्योंकि उसमें महात्मा ज्योतिराव फुले के कर्मकांड विरोधी विचारों का हवाला दिया गया था। इसे विवाहित हिंदू महिलाओं को स्मारक परिसर में बरगद के पेड़ की पारंपरिक पूजा करने से रोकने की कोशिश के रूप में देखा गया था।

हिंदू संगठनों के ज्ञापन के बाद बदला फैसला

यह फैसला उस समय सामने आया जब हिंदू जनजागृति समिति ने महात्मा फुले वाडा में पारंपरिक वट पूर्णिमा पूजा की अनुमति देने की माँग करते हुए एक ज्ञापन सौंपा। यह ज्ञापन श्री हेमंत गोसावी को दिया गया था, जिसमें माँग की गई थी कि महात्मा फुले के वैचारिक दृष्टिकोण का हवाला देकर सालों से चली आ रही हिंदू परंपरा को रोका न जाए।

विवाद तब और बढ़ गया जब हिंदू संगठनों, स्थानीय श्रद्धालुओं और वर्षों से वट पूर्णिमा व्रत करने वाली महिलाओं ने 2 जून के आदेश का विरोध किया। उनका कहना था कि यह पूजा कई सालों से शांतिपूर्ण ढंग से होती रही है और इससे स्मारक को किसी प्रकार का नुकसान होने का कोई प्रमाण नहीं है। उन्होंने इसे हिंदू धार्मिक परंपरा में अनावश्यक हस्तक्षेप बताया।

इस मामले में 2 जून के आदेश के खिलाफ 12 पन्नों की कानूनी आपत्ति याचिका भी दाखिल की गई। याचिका में कहा गया कि विभाग का फैसला किसी संरक्षण संबंधी चिंता या स्मारक को वास्तविक नुकसान के आधार पर नहीं, बल्कि महात्मा फुले की वैचारिक व्याख्या के आधार पर लिया गया।

इसमें यह भी कहा गया कि पुरातत्व विभाग ने प्रभावित महिलाओं को सुने बिना, कोई पूर्व सूचना दिए बिना और किसी पुरातात्विक या संरचनात्मक साक्ष्य के अभाव में यह आदेश जारी कर दिया कि पूजा से स्मारक को नुकसान पहुँचता है।

हिंदू चिंताओं पर संज्ञान लेती दिखी फडणवीस सरकार

इस नए आदेश को महाराष्ट्र की देवेंद्र फडणवीस सरकार द्वारा हिंदू संगठनों की चिंताओं पर संज्ञान लेने के एक और उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है। इसे केवल विभागीय यू-टर्न नहीं बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी इस संकेत के रूप में देखा जा रहा है कि राज्य सरकार हिंदू संगठनों और मंदिरों से जुड़े समूहों द्वारा धार्मिक परंपराओं को लेकर उठाई गई आपत्तियों पर अपने फैसलों में बदलाव करने को तैयार है।

इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए हिंदू जनजागृति समिति के राष्ट्रीय प्रवक्ता रमेश शिंदे ने इस फैसले का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र सरकार ने हिंदुओं की चिंताओं को गंभीरता से लेते हुए महात्मा फुले वाडा में पारंपरिक वट पूर्णिमा पूजा जारी रखने की अनुमति दी है।

उनके अनुसार यह नया आदेश दर्शाता है कि हिंदू संगठनों और श्रद्धालुओं द्वारा लगातार उठाई गई आपत्तियों पर सरकार ने ध्यान दिया है। उन्होंने इसे फडणवीस सरकार द्वारा हिंदू धार्मिक परंपराओं से जुड़े मुद्दों पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देने का एक और उदाहरण बताया।

गौरतलब है कि इसी महीने यह दूसरा मौका है जब हिंदू संगठनों और धार्मिक संस्थाओं के कड़े विरोध के बाद महाराष्ट्र सरकार ने अपने रुख में नरमी दिखाई है या उसे बदला है।

इससे पहले हिंदू संगठनों के विरोध के बाद देवस्थान भूमि कानून का मसौदा भी किया गया था स्थगित

6 जून 2026 को महाराष्ट्र सरकार ने प्रस्तावित महाराष्ट्र देवस्थान इनाम उन्मूलन मसौदा 2026 को फिलहाल स्थगित कर दिया था। यह फैसला राज्यभर के हिंदू संगठनों, मंदिर संस्थाओं, ट्रस्टियों और धार्मिक समूहों के तीखे विरोध के बाद लिया गया।

इस मसौदे को 7 मई को सार्वजनिक किया गया था और सरकार ने 5 जून तक आपत्तियाँ और सुझाव माँगे थे। सरकार का कहना था कि इस कानून का उद्देश्य देवस्थान की भूमि की सुरक्षा करना, अतिक्रमण हटाना और मंदिर संपत्तियों को कानूनी संरक्षण देना है।

हालाँकि इस मसौदे को लेकर महाराष्ट्र मंदिर महासंघ, अष्टविनायक मंदिर समिति, विश्व हिंदू परिषद और अलग-अलग मंदिर ट्रस्टियों समेत कई संस्थाओं ने चिंता जताई थी।

उनका कहना था कि मसौदे के कुछ प्रावधानों से देवस्थान भूमि पर मंदिरों का नियंत्रण कमजोर हो सकता है क्योंकि इससे वहाँ के वर्तमान कब्जाधारियों, खेती करने वालों, पुजारियों, प्रबंधकों और अन्य संबंधित लोगों को अधिकार मिलने की संभावना है।

नागपुर में मीडिया से बातचीत के दौरान राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने घोषणा की थी कि फिलहाल इस मसौदे को स्थगित किया जा रहा है और आपत्तियों पर सुनवाई 15 अगस्त तक जारी रहेगी।

उन्होंने कहा था कि प्रस्तावित कानून को लेकर कई तरह की गलतफहमियाँ पैदा हो गई हैं और उन्हें दूर करने के लिए व्यापक परामर्श प्रक्रिया आवश्यक है। साथ ही उन्होंने दोहराया कि सरकार का उद्देश्य मंदिरों की जमीन की सुरक्षा करना और उन्हें अतिक्रमण मुक्त बनाना है।

मंदिर संगठनों ने इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे अपनी संयुक्त लड़ाई की बड़ी जीत बताया था। महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के राष्ट्रीय संयोजक सुनील घनवट ने इसे मंदिर हितैषी फैसला बताते हुए कहा था कि यह मंदिर ट्रस्टियों और हिंदू संगठनों के सामूहिक प्रयासों की बड़ी सफलता है।

हिंदू संगठनों की आपत्तियों के बाद दूसरी बार बदला गया रुख

इसी पृष्ठभूमि में महात्मा फुले वाडा को लेकर जारी नया आदेश भी हिंदू संगठनों द्वारा महाराष्ट्र सरकार के हिंदू समाज की चिंताओं पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देने के एक और उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।

देवस्थान इनाम कानून के मामले में सरकार ने मंदिर संगठनों और हिंदू कार्यकर्ताओं की आपत्तियों के बाद मसौदा स्थगित कर दिया था। वहीं महात्मा फुले वाडा विवाद में अब पुरातत्व विभाग ने नया आदेश जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि स्मारक में पहले से चली आ रही परंपराएँ और धार्मिक प्रथाएँ जारी रहेंगी।

यह फैसला हिंदू संगठनों और श्रद्धालुओं द्वारा वट पूर्णिमा पूजा पर रोक लगाने के प्रयास का विरोध किए जाने के बाद सामने आया है।

तारातला में गिरे गोदाम ने खोली TMC के भ्रष्टाचार की पोल, CM बोले- तृणमूल के पापों का फल: जानें- कैसे कोलकाता में बने 3000 ‘टाइम बम’

बंगाल के दक्षिणी कोलकाता के तारातला इलाके में एक निर्माणाधीन गोदाम ढहने से अब तक 11 की मौत हो चुकी है, जबकि दर्जनों लोग गंभीर रूप से घायल हैं। मलबे को हटाने और फँसे हुए लोगों को ढूँढने के लिए सेना की एडवांस ‘ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार’ (GPR) प्रणाली, NDRF और स्थानीय प्रशासन युद्ध स्तर पर जुटे हुए हैं।

यह दर्दनाक हादसा कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि राज्य की पूर्व TMC सरकार के कार्यकाल में फले-फूले ‘सिंडिकेट राज’ और भ्रष्टाचार का सीधा नतीजा है। बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इस हादसे को ‘पिछली सरकार के पापों का फल’ करार दिया है।

CM शुभेंदु ने साफ कहा कि पूर्व TMC सरकार के ढीले रवैये, घूसखोरी और बिना किसी जाँच-परख के अवैध नक्शों को पास करने की आदत की वजह से आज फिर मासूमों की जान गई है। इस भीषण हादसे के बाद शुभेंदु सरकार ने कड़ा एक्शन लेते हुए पिछली सरकार के समय स्वीकृत हुए सभी निर्माणाधीन व्यावसायिक और रिहायशी प्रोजेक्ट्स के काम पर 31 जुलाई तक तत्काल रोक लगा दी है।

तारातला का जानलेवा सच: बिना सॉइल टेस्ट के पास हुआ था नक्शा

कोलकाता के तारातला में श्यामा प्रसाद मुखर्जी पोर्ट की पट्टे पर दी गई भूमि पर यह त्रिस्तरीय निर्माणाधीन गोदाम बनाया जा रहा था। जाँच में यह बेहद चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि पिछली TMC सरकार के राज में कोलकाता नगर निगम (KMC) ने 17 जनवरी को बिना किसी सॉइल टेस्ट (मिट्टी की जाँच) या लोड टेस्ट के ही इस डिफेक्टिव स्टील-फ्रेम नक्शे को हरी झंडी दे दी थी। भ्रष्टाचार की बुनियाद पर खड़े इस ढांचे के कमजोर लोहे के बीम भारी-भरकम कंक्रीट का वजन नहीं संभाल पाए और पूरी छत भरभरा कर काम कर रहे मजदूरों पर गिर गई।

इस जानलेवा लापरवाही के मामले में पुलिस ने स्वतः संज्ञान लेते हुए गैर-इरादतन हत्या की धाराओं में प्राथमिकी दर्ज की है। अब तक इस मामले में गोदाम के मालिक शंभूनाथ बेहरा और स्ट्रक्चरल इंजीनियर कमल सामंत सहित गुलजार हुसैन, दिबाकर भंडारी और अब्दुल हमीद जैसे 5 मुख्य आरोपितों को गिरफ्तार किया जा चुका है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने स्पष्ट किया है कि शुरुआती जाँच में ही बिल्डिंग प्लान में गंभीर खामियाँ पाई गई हैं। इसी वजह से 31 जुलाई तक सभी संदिग्ध निर्माण कार्यों को फ्रीज कर उनका कड़ा ‘स्ट्रक्चरल सेफ्टी ऑडिट’ शुरू कर दिया गया है, ताकि 1 अगस्त से केवल वैध परियोजनाओं को ही काम की अनुमति मिले।

TMC नेताओं और प्रमोटरों का गठजोड़: तस्वीरों ने खोला राज

इस हादसे के बाद राजनीतिक गलियारों में तब हड़कंप मच गया जब जाँच के दौरान मलबे में मृत पाए गए मुख्य कॉन्ट्रैक्टर असगर हुसैन की कई तस्वीरें सामने आईं। इन तस्वीरों में असगर हुसैन पूर्व TMC सरकार के कद्दावर मंत्री और कोलकाता के पूर्व मेयर फरहाद हकीम के साथ कई राजनीतिक और निजी कार्यक्रमों में बेहद करीब दिखाई दे रहे हैं। यह तस्वीरें साफ बयां करती हैं कि TMC के शीर्ष नेताओं और अवैध निर्माण करने वाले प्रमोटरों के बीच कितना गहरा और पुराना रिश्ता रहा है।

TMC के इसी कथित ‘कट-मनी’ कल्चर और सिंडिकेट के कारण कोलकाता में नगर निगम के नियमों की सरेआम धज्जियाँ उड़ाई जाती रहीं। स्थानीय प्रमोटर मोटी घूस देकर और स्थानीय राजनीतिक रसूख का इस्तेमाल कर बिना किसी डर के अवैध निर्माण करते थे। जब भी नगर निगम का कोई ईमानदार अधिकारी इन अवैध निर्माणों को रोकने की कोशिश करता, तो उन्हें TMC नेताओं के करीबी गुंडों द्वारा डराया-धमकाया और प्रताड़ित किया जाता था, जिसके कारण प्रशासन पूरी तरह पंगु बन चुका था।

कोलकाता में 3,000 ‘टाइम बम’: रेड जोन में तब्दील हुए कई इलाके

कोलकाता नगर निगम की वॉचलिस्ट के अनुसार, शहर के टेंगरा, तिलजला, गार्डन रीच, तपसिया, इकबालपुर और बड़ाबाजार जैसे घने इलाकों में करीब 3,000 अवैध और खतरनाक निर्माण आज भी ‘टाइम बम’ बनकर खड़े हैं। TMC के शासनकाल में बिल्डरों ने अवैध रूप से भारी मुनाफा कमाने के चक्कर में नियमों को पूरी तरह ताक पर रख दिया। आलम यह है कि महज 2 मंजिल के स्वीकृत नक्शे पर प्रमोटरों ने जबरन 5-5 मंजिलें तान दीं, जिससे ये इमारतें अब खतरनाक तरीके से एक तरफ झुक रही हैं।

शहरी विकास मंत्रालय के ढीले रवैये के कारण कोलकाता के पर्यावरण को भी भारी नुकसान पहुँचाया गया। प्रमोटरों ने TMC नेताओं के संरक्षण में शहर के दर्जनों पुराने तालाबों और जल निकायों (Water Bodies) को मिट्टी और मलबे से पाट दिया और उनके ऊपर कमजोर बुनियाद वाली बहुमंजिला इमारतें खड़ी कर दीं। नियमों के मुताबिक दो मकानों के बीच जरूरी खाली जगह (ओपन स्पेस) छोड़ने के नियम का पालन कहीं नहीं किया गया, जिसके कारण ये बस्तियाँ बेहद असुरक्षित और संकरी हो चुकी हैं।

पुरानी तारीखों का खूनी इतिहास: TMC राज के वो खौफनाक हादसे

यह पहली बार नहीं है जब कोलकाता में TMC समर्थित प्रमोटरों के लालच ने लोगों की जान ली है। इससे पहले 18 मार्च 2024 को कोलकाता के गार्डन रीच इलाके (जो कि तत्कालीन शहरी विकास मंत्री फरहाद हकीम का ही निर्वाचन क्षेत्र था) में एक 5 मंजिला अवैध निर्माणाधीन इमारत ढह गई थी, जिसमें 13 मासूम लोगों की मलबे में दबकर मौत हो गई थी। उस समय भी KMC की जाँच में सामने आया था कि प्रमोटर ने लागत बचाने के लिए 16mm की जगह केवल 10mm के पतले लोहे के रॉड इस्तेमाल किए थे और छत पर 50,000 ईंटें लाद दी थीं, जिसे कमजोर पिलर सह नहीं पाए।

इतना ही नहीं, जनवरी 2025 में टॉलीगंज के नकतला इलाके में एक 4 मंजिला इमारत अचानक एक तरफ झुक गई थी, जिसका निर्माण भी साल 2009-10 में एक तालाब को पाटकर किया गया था। वहीं, 14 मई 2026 को अवैध रूप से बनी तिलजला की एक इमारत में भीषण आग लगने से दो लोगों की मौत हो गई, और उससे पहले 26 जनवरी को आनंदपुर में बिना फायर क्लीयरेंस के चल रहे दो अवैध गोदामों में लगी आग में 27 कर्मचारियों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। TMC राज में हुए ये लगातार हादसे साबित करते हैं कि पैसे के लालच में जनता की सुरक्षा को हमेशा दांव पर लगाया गया।

केंद्र के पैसे का दुरुपयोग

पूर्व TMC सरकार पर न केवल प्रशासनिक ढिलाई बल्कि वित्तीय भ्रष्टाचार के भी गंभीर आरोप हैं। केंद्र सरकार द्वारा राज्य के विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर और जनकल्याणकारी योजनाओं के लिए भेजे जाने वाले करोड़ों रुपए के फंड को TMC सरकार ने अपने निजी राजनीतिक प्रचार और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा दिया। केंद्रीय पैसों का इस्तेमाल विकास कार्यों में करने के बजाय सिंडिकेट राज को मजबूत करने में किया गया, जिससे राज्य की कानून व्यवस्था और बुनियादी ढांचा पूरी तरह चरमरा गया।

पीड़ितों के लिए सहायता राशि और शुभेंदु सरकार का कड़ा संकल्प

इस दर्दनाक हादसे पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु और उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने गहरा शोक व्यक्त करते हुए शोक-संतप्त परिवारों के प्रति अपनी संवेदनाएँ प्रकट की हैं। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने तुरंत एक्शन लेते हुए विधानसभा में मृतकों के परिजनों को राज्य सरकार की ओर से 10-10 लाख रुपए और घायलों को 1-1 लाख रुपए की अनुग्रह राशि देने की घोषणा की है। इसके साथ ही, प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने भी प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (PMNRF) से मृतकों के परिवारों को 2-2 लाख रुपए और घायलों को 50-50 हजार रुपए की सहायता देने का ऐलान किया है।

शुभेंदु सरकार ने साफ कर दिया है कि पिछली सरकार के इस भ्रष्ट तंत्र को अब राज्य में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सरकार ने एक हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त जज की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय कमेटी का गठन कर दिया है, जो पूरे राज्य में समान नागरिक संहिता (UCC) और अवैध निर्माणों पर नकेल कसने के लिए काम करेगी। मुख्यमंत्री ने भरोसा दिलाया है कि 31 जुलाई तक चलने वाले इस सेफ्टी ऑडिट के बाद जितने भी अवैध ढांचे मिलेंगे, उन पर सरकार का सख्त बुलडोजर चलेगा ताकि भविष्य में तारातला और गार्डन रीच जैसे खूनी हादसों को हमेशा के लिए रोका जा सके।

फिर याद आया आपातकाल… 51 साल बाद भी नहीं बदली कॉन्ग्रेस की मानसिकता, हिमाचल में गड़बड़ी पर सवाल पूछे तो ब्लॉक करा दी News4Himalayan की 20 वीडियो: इंस्टा-FB भी बैन

25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने देश पर आपातकाल (Emergency) थोपा था। प्रेस की आजादी पर ताले जड़ दिए गए थे, अखबारों की सुर्खियाँ सत्ता की मंजूरी से तय होती थीं और सरकार से सवाल पूछना अपराध माना जाने लगा था।

आज इमरजेंसी के 51 साल बाद हिमाचल प्रदेश में उठ रहे घटनाक्रम एक बार फिर उसी काले दौर की याद दिला रहे हैं। राज्य की कॉन्ग्रेस सरकार की नीतियों, बढ़ते कर्ज, घोटालों और प्रशासनिक फैसलों पर सवाल उठाने वाले डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म News4Himalayan की 20 से अधिक वीडियो पूरे भारत में ब्लॉक करा दी गईं, इसके बाद उसका फेसबुक पेज और इंस्टाग्राम अकाउंट भी प्रतिबंधित कर दिया गया।

ऐसा भी नहीं है कि चैनल ने कोई छिपी हुई बात बता दी थी, जिन मुद्दों को लेकर आवाज दबाने की कोशिश की गई उनमें से कई मुद्दे तो ऐसे हैं जिन्हें कॉन्ग्रेस पार्टी के अपने नेता पार्टी के भीतर और सार्वजनिक रूप से उठा चुके हैं।

ऐसे में यही सवाल उठता है कि क्या सरकार आरोपों का जवाब देने के बजाय सच दिखाने वालों की आवाज दबाने की कोशिश कर रही है? प्रेस की स्वतंत्रता और लोकतंत्र की दुहाई देने वाली कॉन्ग्रेस पर अब आरोप लग रहे हैं कि सत्ता में आते ही वह वही रास्ता अपना रही है, जिसने 1975 के आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र के सबसे काले अध्यायों में शामिल कर दिया था।

News4Himalayan के शांतनु शुक्ल ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा है कि यह केवल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की कार्रवाई नहीं बल्कि सरकार की आलोचना को रोकने और असहज सवालों को दबाने का सुनियोजित प्रयास है। उन्होंने कहा कि इस रोक को हटवाने के लिए वे हाई कोर्ट का रुख करेंगे।

24 घंटे में 20 से ज्यादा वीडियो हुए ब्लॉक

News4Himalayan के अनुसार, 17 जून 2026 को उसके फेसबुक पेज पर प्रकाशित 20 से अधिक वीडियो भारत में दर्शकों के लिए उपलब्ध नहीं रहे। इन वीडियो में सरकार की नीतियों, प्रशासनिक फैसलों, वित्तीय मामलों, जनहित के मुद्दों और भ्रष्टाचार से जुड़े विषय शामिल थे।

प्लेटफॉर्म का कहना है कि प्रभावित वीडियो में शराब फैक्ट्री से जुड़े घोटाले, हिमाचल पर बढ़ते कर्ज, सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार के बजट, स्मार्ट मीटर विवाद, हाई कोर्ट के फैसलों और कॉन्ग्रेस नेताओं से जुड़े खुलासों पर आधारित रिपोर्टें शामिल थीं।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लगातार कार्रवाई

News4Himalayan का दावा है कि 17 जून 2026 को उसकी 20 से अधिक वीडियो भारत में ब्लॉक किए जाने के बाद कार्रवाई का दायरा लगातार बढ़ता गया। 18 जून को उसका फेसबुक पेज भी भारत में काफी हद तक प्रतिबंधित या अनुपलब्ध हो गया, जिसके कारण भारतीय उपयोगकर्ता पेज और उस पर मौजूद सामग्री तक स्वतंत्र रूप से नहीं पहुँच पा रहे थे।

इसके कुछ ही दिनों बाद, 21 जून को प्लेटफॉर्म का आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट भी प्रतिबंधित कर दिया गया और उसकी पहुँच सीमित कर दी गई। संस्था का कहना है कि फेसबुक और इंस्टाग्राम पर हुई इन कार्रवाइयों से जुड़े स्क्रीनशॉट, प्लेटफॉर्म नोटिस और अन्य रिकॉर्ड उसके पास सुरक्षित मौजूद हैं।

News4Himalayan का आरोप है कि वीडियो ब्लॉक होने से शुरू हुई कार्रवाई बाद में उसके प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स तक पहुँच गई, जिससे उसकी खबरों और जनहित से जुड़े मुद्दों को लोगों तक पहुँचाने की क्षमता गंभीर रूप से प्रभावित हुई।

कार्रवाई पर उठे सवाल

News4Himalayan का आरोप है कि उसकी वीडियो और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर हुई कार्रवाई को लेकर उसे आज तक कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। संस्था का कहना है कि न तो उसे यह बताया गया कि किस कानून के तहत यह कार्रवाई की गई, न यह स्पष्ट किया गया कि किस कंटेंट को आपत्तिजनक माना गया और न ही यह जानकारी दी गई कि रोक लगाने के पीछे किस प्राधिकरण की भूमिका थी।

प्लेटफॉर्म का दावा है कि कार्रवाई से पहले उसे अपना पक्ष रखने या जवाब देने का कोई प्रभावी अवसर भी नहीं दिया गया।

वहीं, News4Himalayan खुद को जनहित के मुद्दों को उठाने वाला स्वतंत्र मीडिया मंच बताता है। उसका कहना है कि वह वर्षों से हिमाचल प्रदेश में बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं, आउटसोर्स कर्मचारियों की समस्याओं, बढ़ते सरकारी कर्ज, बजट के विश्लेषण, नीतिगत फैसलों और अन्य जनसरोकार के विषयों पर रिपोर्टिंग करता रहा है।

संस्था का दावा है कि उसकी पत्रकारिता किसी एक राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष तक सीमित नहीं रही बल्कि उसने समय-समय पर कॉन्ग्रेस  सरकार के साथ-साथ भाजपा नेताओं और विपक्षी दलों से भी सवाल पूछे हैं।

ऐसे में प्लेटफॉर्म का आरोप है कि सरकार से जुड़े मुद्दों पर की गई आलोचनात्मक रिपोर्टिंग के बाद उसके खिलाफ हुई यह कार्रवाई कई गंभीर सवाल खड़े करती है।

News4Himalayan ने कॉन्ग्रेस सांसद राहुल गाँधी को भी निशाने पर लेते हुए सवाल उठाया है कि जो नेता देश और विदेश में प्रेस की स्वतंत्रता की बात करते हैं, क्या वे हिमाचल में मीडिया प्लेटफॉर्म पर हुई इस कार्रवाई पर भी प्रतिक्रिया देंगे। प्लेटफॉर्म ने पूछा कि क्या प्रेस की आजादी का सिद्धांत केवल विपक्ष में रहते हुए ही याद आता है।

पहले भी दर्ज हुईं FIR और शिकायतें

संस्था का दावा है कि यह उसके खिलाफ पहली कार्रवाई नहीं है। उसके अनुसार पहले भी अलग-अलग पुलिस थानों में उसके खिलाफ FIR और शिकायतें दर्ज कराई गईं। इतना ही नहीं, हिमाचल प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष की ओर से उसे विशेषाधिकार हनन (Privilege Motion) का नोटिस भी भेजा गया था।

News4Himalayan का आरोप है कि सरकार और उससे जुड़े लोग आलोचनात्मक पत्रकारिता से असहज हैं और इसी कारण लगातार दबाव बनाया जा रहा है।

प्रेस की आजादी को लेकर सवाल उठाने वाली कॉन्ग्रेस पर खुद गंभीर आरोप

हिमाचल प्रदेश में सामने आए इस पूरे विवाद ने कॉन्ग्रेस को कठघरे में खड़ा कर दिया है। देशभर में प्रेस की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी और लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करने वाली पार्टी पर अब उसी मीडिया की आवाज दबाने के आरोप लग रहे हैं, जो सरकार से सवाल पूछ रहा था।

News4Himalayan का दावा है कि उसकी जिन रिपोर्टों और वीडियो पर कार्रवाई हुई, उनमें सरकार के कर्ज, नीतिगत फैसलों, घोटालों और प्रशासनिक कामकाज से जुड़े ऐसे मुद्दे उठाए गए थे जिन पर सार्वजनिक बहस होना लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है।

यह करवाई वहीं कॉन्ग्रेस कर रही है, जिसने सत्ता में आने के बाद से ही प्रेस को अपने नियंत्रण में रखने की कोशिश की है। अपनी खामियों को छुपाने के लिए यह पार्टी या तो मीडिया को ‘गोदी मीडिया’ कहकर संबोधित करने लगती है या उसकी आम जनता तक पहुँची ही बंद कर देती है और उसके बाद प्रेस की आजादी को लेकर बड़े-बड़े भाषण देती है।

हमास का समर्थन, अल-कायदा का ‘बचाव’… जानें- कौन हैं DSA के चुनाव में ममदानी के समर्थन से जीतने वालीं ‘हिजाबन’ अबर कवास और दारियालिजा?

अमेरिका में इस साल नवंबर में होने वाले जनरल इलेक्शन में अपना उम्मीदवार खड़ा करने के लिए हर पार्टी अपने आंतरिक चुनाव कराती है, जिसे देश में प्राइमरी चुनाव (Primary Election) कहा जाता है। डेमोक्रेटिक पार्टी (DSA) के भीतर भी प्राइमरी चुनाव हुआ और 23 जून 2026 को नतीजे सामने आए। इन नतीजों में चर्चा न्यूयॉर्क से चुने मुस्लिम प्रतिनिधि अबर कवास (Aber Kawas) और दारियालिजा एविला शेवेलियर (Darializa Avila Chevalier) की हो रही है। इन ‘हिजाबन’ को न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी का समर्थन मिला है।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी जोहरान ममदानी के समर्थन से जीते नेताओं पर प्रतिक्रिया साझा की। उन्होंने इस पर मीडिया को घेरते हुए कहा, “मेयर ममदानी ने 3 पक्के वामपंथियों को चुनाव जितवा दिया और इसके लिए बिकाऊ मीडिया (Fake News Media) उनकी जमकर तारीफ कर रहा है। मेयर साहब को बधाई! कल रात मैंने 16-0 का रिकॉर्ड बनाया (यानी जिन 16 लोगों का मैंने समर्थन किया, वे सब जीत गए) और शानदार अमेरिकी देशभक्तों को चुनाव जिताने में मदद की, लेकिन मीडिया ने इस पर एक शब्द भी नहीं बोला।”

उन्होंने अपनी तारीफ में आगे लिखा, “पिछले दो सालों में, मेरे समर्थन से लोगों को प्राइमरी चुनाव में 259 जीत मिली हैं, और लगभग कोई हार नहीं हुई, फिर भी मीडिया इस पर बिल्कुल ध्यान नहीं देता!!! बिकाऊ मीडिया।”

डोनाल्ड ट्रंप जो कह रहे हैं, वह सच है। चर्चा तो हो रही है जोहरान ममदानी का समर्थन मिलने वाले जीते हुए नेताओं की। खासकर अबर कवास और दारियालिजा एविला शेवेलियर की। जहाँ पश्चिमी मीडिया इन नेताओं की जीत पर बड़े-बड़े लेख लिख रही है, वहीं सोशल मीडिया पर इनके पुराने बयान और इनकी पहचान काफी चर्चा में चल रहे हैं। सोशल मीडिया पर अमेरिकी इन दोनों मुस्लिम नेताओं के मुस्लिम-प्रोपेगेंडा, हमास का समर्थन और अमेरिकियों के लिए घृणा वाली सोच को सामने ला रहे हैं।

कौन हैं अबर कवास?

अबर कवास खुद को फिलिस्तीन का निवासी बताती हैं। उनका दावा है कि उनके अम्मी-अब्बा फिलिस्तीन से माइग्रेट होकर अमेरिका आए थे। कवास के अनुसार, उनका जन्म भी न्यूयॉर्क के ब्रूकलिन में ही हुआ है। कवास ने सिटी कॉलेज ऑफ न्यूयॉर्क से ‘इंटरनेशनल स्टडीज’ की पढ़ाई की है। इससे अलग कवास ने अपनी पहचान अमेरिका में सख्त प्रवासन नीतियों और देश में मुस्लिम-विरोधी रवैये के पीड़ित के रूप में बनाई है।

वो दावा करती है कि जब वह किशोरावस्था में थीं, तब उनके पिता को अमेरिका की इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट (ICE) ने हिरासत में ले लिया और देश से डिपोर्ट कर दिया था। अपनी चुनावी अभियान की वेबसाइट में भी उन्होंने यह जानकारी लिखी है।

इसी पहचान के साथ कवास न्यूयॉर्क के डिस्ट्रिक्ट 12 क्विन्य सीट से डेमोक्रेटिक पार्टी के प्राइमरी चुनाव में 58.3 प्रतिशत वोट हासिल कर जीत दर्ज की। कवास ने असेंबली मेंबर स्टीवन रागा को 20 प्रतिशत वोटों के बड़े अंतर से हराया। इस जीत के साथ अब वे नवंबर में होने वाले आम चुनाव में उम्मीदवार बन सकती हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि इस जीत के साथ अबर कवास ने इतिहास रचा है क्योंकि वे न्यूयॉर्क सीनेट के लिए चुनी जाने वाली पहली फिलिस्तीनी मुस्लिम महिला बन गई हैं।

फिलिस्तीन और मुस्लिम-पीड़ित का रोना रोने वाली अबर कवास का बैकग्राउंड निकला ‘आपराधिक’

कवास ने बेशक फिलिस्तीन और अमेरिका में मुस्लिम पीड़ित की रोना रोकर चुनाव लड़ा हो, लेकिन असलियत कुछ और है। मीडिया रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया पर चल रही खबरों में सामने आया कि उनके द्वारा गढ़ी गई इमिग्रेशन के कारण परिवार को डिपोर्ट करने वाली कहानी झूठी है। कवास के परिवार को इसीलिए डिपोर्ट किया गया क्योंकि उनके अब्बा ‘अब्दुलकरीम कवास’ एक दोषी अपराधी थे।

अमेरिकी की एक कोर्ट में इसके सबूत भी हैं, जिसे न्यूयॉर्क पोस्ट ने कवर भी किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, अबर कवास के अब्बा अब्दुलकरीम कवास जॉर्डन के नागरिक थे, जो 1989 में टूरिस्ट वीजा पर अमेरिका आए थे और कभी वापस नहीं गए। यहाँ अब्दुलकरीम का जघन्य अपराधों में नाम सामने आया। 1995 में उन्हें वर्जीनिया की रिचमंड सिटी सर्किट कोर्ट में झूठी गवाही का दोषी पाया गया और इसके 10 साल बाद न्यू जर्सी में प्रॉपर्टी चोरी के आरोप में दोषी पाने के बाद अगस्त 2006 में तीन साल की जेल तक हुई थी।

इसी बीच उनका इमिग्रेशन का मामला भी अदालतों में चलता रहा। एक फेडरल इमिग्रेशन जज ने शुरू में उन्हें 2004 की सुनवाई में उपस्थित न होने पर देश से निकालने का आदेश दिया था। इसके बाद देश में जॉर्ज बुश (George W. Bush) की सरकार के दौरान उन्हें जॉर्डन डिपोर्ट कर दिया गया था। लेकिन अबर कवास अपने चुनावी अभियान के दौरान लगातार ट्रंप प्रशासन की सख्त इमेग्रेशन नीतियों पर इसका ठीकरा फोड़ती रही हैं।

9/11 आतंकी हमलों पर अबर कवास का अमेरिकी-विरोधी बयान

यही नहीं, अबर कवास की सोच भी अमेरिकी-विरोधी है। यह तब और ज्यादा मुखर होकर सामने आया जब अबर कवास ने अमेरिकी के काले पन्नों में दर्ज 9/11 आतंकी हमले पर अपना पक्ष रखा। कवास ने इस आतंकी हमले का जिम्मेदार अमेरिकियों को ही ठहरा दिया और अलकायदा का बचाव किया। कवास के बयान की वीडियो क्लिप भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है।

इस क्लिप में अबर कवास कहती हैं, “पूँजीवाद, नस्लवाद, गोरों को दूसरों से श्रेष्ठ समझना और इस्लामोफोबिया- इन सब चीजों का इस्तेमाल हमेशा से दूसरों की जमीनों पर कब्जा करने और उनके संसाधनों को छीनने के लिए किया गया है। यह बहुत लंबे समय से चला आ रहा है और 9/11 का हमला भी इसी पुरानी सोच और सिलसिले का ही एक हिस्सा था।

कवास आगे कहती हैं, “यह सोचना कि हमें (मुस्लिमों को) एक ऐसे आतंकवादी हमले के लिए माफी माँगनी चाहिए जो सिर्फ चंद लोगों ने किया था जबकि इतिहास में हुए बड़े-बड़े नरसंहारों और गुलामी की प्रथा के लिए कभी किसी ने माफी नहीं माँगी और न ही कोई मुआवजा दिया, यह बात मुझे बहुत गलत और घिनौनी लगती है।”

गौरतलब है कि जिस 9/11 आतंकी हमले की अबर कवास यहाँ बात कर रही हैं, वह आतंकी संगठन अलकायदा ने अंजाम दिया था। इस हमले का मास्टरमाइंड ओसामा बिन लादेन था। उसके नेतृत्व में 11 सितंबर 2001 को अलकायदा के 19 आतंकियों ने अमेरिका के 4 विमानों को हाइजैक किया और उन्हें आत्मघाती बम की तरह इस्तेमाल किया था। इस पूरे हमले में 2,977 मासूम लोगों ने जानें गवाई थीं, जिनमें 90 प्रतिशत अमेरिकन थे।

कौन हैं डारियालिजा अवीला शेवेलियर?

डारियालिजा अवीला शेवेलियर ने भी अपनी पहचान प्रवासी नागरिक के तौर पर मजबूत की है। उनकी चुनावी अभियान की वेबसाइट के अनुसार, वह खुद को अप्रवासन की सख्त नीतियों का पीड़ित होने का दावा करती हैं। उनका डोमिनिकन परिवार है जो फ्लोरिडा से अमेरिका माइग्रेट हुआ था। शेवेलियर बताती हैं कि वह गरीब परिवार से ताल्लुक रखती हैं जहाँ उनके अब्बा ट्रक ड्राइवर और अम्मी एक केस वर्कर हैं, जिसने अपने बचपन का ज्यादा समय वेनेजुएला में अपनी दादा के साथ बिताया है।

कोलंबिया यूनिवर्सिटी से मिडिल ईस्टर्न, साउथ एशियन और अफ्रीकन स्टडीज में ग्रेजुएशन पूरी की है और फिलहाल सिटी यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क (CUNY Graduate Center) से सोशियोलॉजी में पीएचडी की डिग्री पूरी कर रही हैं। कॉलेज के समय से ही शेवेलियर कट्टर वामपंथी आंदोलनों का हिस्सा रही हैं, इस दौरान वह हिजाब भी पहना करती थीं लेकिन प्राइमरी चुनाव में अभियान के दौरान उनका हिजाब गायब दिखा।

शेवेलियर ने फिलिस्तीन समर्थित, ब्लैक लाइव्स मैटर और खासकर अप्रवासन नीतियों के खिलाफ अभियानों का हिस्सा रहकर अपनी पहचान बनाई। इसी पहचान के साथ शेवेलियर ने प्राइमरी चुनाव में 13वें डिस्ट्रिक्ट सीट से जीत हासिल की है। उन्होंने 5 बार के मौजूदा और बेहद शक्तिशाली सांसद एड्रियानो एस्पेलियाट (Adriano Espaillat) को 2,326 वोटो के अंतर से चुनाव में मात दी है।

शेवेलियर के अमेरिकी-विरोधी और प्रो-हमास होने पर सोशल मीडिया पर आलोचना

शेवेलियर को चुनाव में जोहरान ममदानी का समर्थन मिला। इसके बावजूद भी सोशल मीडिया पर अमेरिकन शेवेलियर के खिलाफ बोल रहे हैं, लोग उनके इस्लामी हित और अमेरिकी-विरोधी बयानों और विवादित बैकग्राउंड पर बात कर रहे हैं। यह भी सामने आया है कि शेवेलियर ने अपना इस्लाम में धर्म परिवर्तन कर लिया है। इसके अलावा लोग उनके डोमिनिकन मूल से होने पर भी सवाल उठा रहे हैं, लोगों का कहना हैं कि वह हैतीयन (Haitian) मूल की हैं।

शेवेलियर की सोशल मीडिया हिस्ट्री खंगालकर अमेरिकी बता रहे हैं कि वह अमेरिकन झंडे का इस्तेमाल नैपकिन की तरह करती हैं। इसके अलावा 07 अक्टूबर 2025 को ठीक एक दिन बाद, उन्होंने इजरायली नागरिकों की हत्या का जश्न मनाने वाली एक रैली में भी हिस्सा लिया था। उनके अमेरिकी-विरोधी होने का भी राज खोलते हुए कहा कि वह गोरी महिलाओं को ‘बदसूरत उपनिवेशवादी’ बताती हैं।

इतना ही नहीं अमेरिकन ने बताया कि शेवेलियर कह चुकी हैं कि अपराधियों सहित किसी भी व्यक्ति का निर्वासन (देश से निकालना) उचित नहीं है। वह पुलिस से नफरत करती हैं और उन्हें ‘सूअर’ कहती हैं, अमेरिकी सैनिकों को युद्ध अपराधी बताती हैं और कहती हैं कि अमेरिका एक शर्मनाक देश है। वह सिर्फ़ न्यूयॉर्क से चुनाव लड़ रही हैं क्योंकि उन्हें पता है कि फ्लोरिडा में उनके जीतने की कोई संभावना नहीं है।”

ऐसा ही उनका एक पुराना वीडियो भी सामने आया, जिसमें शेवेलियर कहती दिख रही हैं कि अगर वह कॉन्ग्रेस में पहुँचती हैं तो ‘इंशाल्लाह’ यह पक्का करना चाहेंगी कि ‘सत्ता के गलियारों’ में उनके मुस्लिम मजहब की झलक दिखे।

निष्कर्ष: न्यूयॉर्क में जोहरान ममदानी ने अपने जैसे दो को बनाया अगला प्रतिनिधि

शेवेलियर और कवास के बैकग्राउंड को देखते हुए लगता है कि यह भी जोहरान ममदानी की राह पर ही हैं। इन्होंने भी न्यूयॉर्क में मुस्लिम-पीड़ित पहचान, हमास को समर्थन और अमेरिकी नीतियों की आलोचना करके ही चुनाव जीता है। लगता है कि न्यूयॉर्क को कई जोहरान मिल गए हैं और इनका प्राइमरी चुनाव जीतने यही अंदेशा है कि ऐसे अमेरिकी विरोधी नेता आम चुनाव भी आसानी से जीत जाएँगे, क्योंकि न्यूयॉर्क पहले से ही सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी का गढ़ रहा है।

हालाँकि इससे यह सवाल जरूर खड़ा होता है कि क्या न्यूयॉर्क में सचमुच लोग ट्रंप प्रशासन की नीतियों से परेशान हैं या फिर शहर में मुस्लिमों की आबादी बढ़ रही है। वैसे भी आए दिन सोशल मीडिया पर वीडियोज सामने आते रहते हैं कि जिसमें न्यूयॉर्क की सड़कों पर मुहर्रम के शोक हो रहे हैं, टाइम्स स्क्वायर से अजान की आवाजें आती हैं और इसी न्यूयॉर्क में बैठकर जोहरान ममदानी और उसके जैसे नेता अमेरिका के विरोध में बयान देते हैं और आतंकियों के मरने पर शोक मनाते हैं। क्या ऐसे नेताओं को सत्ता में लाकर अमेरिका इस्लामीकरण की ओर है?

‘भारत में शरिया कानून और बहुविवाह…’ माँग करने वाली सना मलिक कौन? महाराष्ट्र विधानसभा में दिखा नवाब मलिक की बेटी का ‘पाकिस्तान प्रेम’, पढ़ें पूरी प्रोफाइल

महाराष्ट्र विधानसभा के मानसून सत्र में NCP (अजीत पवार गुट) की विधायक सना मलिक के एक बयान पर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। उन्होंने सदन में चर्चा के दौरान भारत में भी कुरान पर आधारित कानून लागू करने की माँग की। सना मलिक ने तीन तलाक और बहुविवाह (पॉलिगेमी) का जिक्र करते हुए पाकिस्तान का उदाहरण दिया।

उन्होंने कहा कि जब पाकिस्तान कुरान के नियमों को अपना कानून बना सकता है, तो भारत को भी ऐसा ही करना चाहिए। उनके इस बयान के बाद बीजेपी विधायकों ने सदन में जमकर हंगामा किया और सोशल मीडिया पर भी इसका विरोध हो रहा है।

कौन हैं सना मलिक? अब्बू का सियासी बैकग्राउंड

सना मलिक महाराष्ट्र की राजनीति में एक नया और चर्चित चेहरा हैं। वह मुंबई के अणुशक्ति नगर विधानसभा क्षेत्र से साल 2024 में पहली बार विधायक चुनी गई हैं। सना मलिक वरिष्ठ नेता और राज्य के पूर्व मंत्री नवाब मलिक की बेटी हैं। नवाब मलिक मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं, जो बाद में मुंबई आकर राजनीति में सक्रिय हुए।

राजनीति में कदम रखने से पहले सना मलिक एक आर्किटेक्ट और वकील के तौर पर काम कर चुकी हैं। साल 2024 के चुनाव में नवाब मलिक ने अपनी सीट से बेटी सना को उम्मीदवार बनाया था। सना अपनी पार्टी में अल्पसंख्यक और मुस्लिम महिलाओं के मुद्दों पर काफी आक्रामक रुख रखती हैं।

विधानसभा में क्यों शुरू हुई बहुविवाह और तीन तलाक पर बहस?

विधानसभा सत्र के दौरान BJP विधायक देवयानी फरांडे ने तीन तलाक कानून को सख्ती से लागू करने का मुद्दा उठाया था। उन्होंने सदन को बताया कि पीड़ित मुस्लिम महिलाओं को आज भी प्रताड़ित किया जा रहा है। देवयानी ने इसके लिए पाकिस्तान का उदाहरण दिया था।

उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में दूसरे निकाह के लिए पहली बीवी की लिखित अनुमति और एक काउंसिल की मंजूरी जरूरी है। इसी सख्त नियम के कारण पाकिस्तान में बहुविवाह की दर सिर्फ एक प्रतिशत है। उन्होंने महाराष्ट्र में भी ऐसे ही कड़े कानून और समान नागरिक संहिता (UCC) लाने की माँग की।

सना मलिक का विवादित तर्क और ‘पाकिस्तानी प्रेम’

BJP विधायक के बयान पर पलटवार करते हुए सना मलिक ने आक्रामक रुख अपना लिया। उन्होंने दलील दी कि बहुविवाह सिर्फ मुस्लिम समाज में नहीं होता, बल्कि हर धर्म में है। सना मलिक ने कहा कि पाकिस्तान ने कुछ नया नहीं किया, उसने सिर्फ कुरान में लिखे मुस्लिम पर्सनल लॉ को ही कानून का रूप दिया है।

सना मलिक ने आगे कहा, “हम इस्लाम में कुरान की शिक्षाओं को मानते हैं। अगर पाकिस्तान इसे लागू कर सकता है, तो भारत को भी कुरान पर आधारित कानून लाना चाहिए, हम इसकी माँग करते हैं।” उनके इस बयान को लोगों ने हिंदुओं और भारतीय व्यवस्था के खिलाफ एक कट्टरपंथी सोच माना।

BJP का करारा पलटवार: ‘देश संविधान से चलेगा, शरिया से नहीं’

सना मलिक के इस बयान पर BJP विधायक अतुल भातखलकर ने सदन में तीखी आपत्ति जताई। उन्होंने दहाड़ते हुए कहा कि यह देश केवल भारत के संविधान से चलता है, किसी मजहबी ग्रंथ या कुरान से नहीं। उन्होंने साफ किया कि सदन में पाकिस्तान और शरिया की वकालत करने की कोई जरूरत नहीं है।

वहीं, महाराष्ट्र के गृह राज्य मंत्री योगेश कदम ने भी सना मलिक को सीधे जवाब दिया। उन्होंने कहा कि कोई भी कानून किसी धर्मग्रंथ के आधार पर नहीं बनता। कानून समाज में हो रहे अन्याय को रोकने के लिए बनता है, किसी धर्म को निशाना बनाने के लिए नहीं।

नितेश राणे की दो टूक: ‘शरिया चाहिए तो पाकिस्तान चले जाओ’

इस विवाद के बाद महाराष्ट्र सरकार में मंत्री और BJP नेता नितेश राणे ने सना मलिक पर बेहद तीखा हमला बोला। नितेश राणे ने कहा कि सना मलिक शायद भूल गई हैं कि वह एक हिंदू बहुसंख्यक देश में बैठी हैं। वह भारत की विधायक हैं, पाकिस्तान की संसद में नहीं बैठी हैं।

नितेश राणे ने साफ कहा कि हमारे देश के संविधान में ही समान नागरिक संहिता (UCC) का जिक्र है। जो लोग संविधान की दुहाई देते हैं, वे ही आज धर्म के नाम पर इसका विरोध कर रहे हैं। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि अगर किसी को भारत का कानून पसंद नहीं है और शरिया कानून ही चाहिए, तो उन्हें अपने पद से इस्तीफा देकर पाकिस्तान चले जाना चाहिए।

चौतरफा घिरने के बाद सना मलिक ने दी सफाई

चारों तरफ से घिरने और सोशल मीडिया पर जमकर ट्रोल होने के बाद सना मलिक ने अपने बयान पर सफाई जारी की है। सना मलिक ने दावा किया कि उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया गया है। सना ने कहा कि वह पाकिस्तान को कोई आदर्श नहीं मानती हैं।

उन्होंने सिर्फ देवयानी फरांडे के पाकिस्तान वाले संदर्भ पर जवाब दिया था। सना ने कहा कि भारतीय मुसलमान होने के नाते उनका पाकिस्तान से कोई लेना-देना नहीं है। भारत का संविधान उन्हें अपने धर्म का पालन करने का अधिकार देता है और उन्होंने केवल मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत बात रखी थी।