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हमें पितृसत्ता की अधूरी कहानी क्यों सुनाई गई? Patriarchy? Think Again

हमें इंसानी इतिहास की एक बहुत साफ-सुथरी और सुविधाजनक कहानी सुनाई गई है। आज की एक सोच के मुताबिक, अतीत की पूरी कहानी पुरुषों के दबदबे और महिलाओं को दबाकर रखने की रही है, मानो पुरुषों ने मिलकर एक सोची-समझी व्यवस्था बनाई हो, जिसका मकसद महिलाओं को हमेशा नीचे रखना था। 

यानी, एक्टिविस्टों के हिसाब से देखें, तो अतीत कुछ और नहीं बल्कि पुरुषों की दादागिरी का एक लंबा रिकॉर्ड भर है, एक सोची-समझी, ऑर्गेनाइज्ड साजिश, ताकि महिलाओं को दबाकर रखा जा सके। यह कहानी राजनीतिक बहस के लिए काफी आसान और असरदार हो सकती है। लेकिन जैसे ही हम अपने पूर्वजों की असली जिंदगी और उनकी चुनौतियों को समझने की कोशिश करते हैं, यह तस्वीर इतनी सीधी नहीं रह जाती।

इंसान ने अपने इतिहास का करीब 99 प्रतिशत हिस्सा ऐसी दुनिया में बिताया, जहाँ आज जैसी सुविधाएँ नहीं थीं। न आधुनिक दवाइयाँ थीं, न मशीनें, न सुरक्षित घर और न ही हर वक्त उपलब्ध खाना। भूख, बीमारी, जंगली जानवर, हिंसा और मौसम जैसी चुनौतियों के बीच इंसान को हर दिन सिर्फ एक चीज के लिए संघर्ष करना पड़ता था, ज़िंदा रहने के लिए।

ऐसे में पुराने समाजों में पुरुषों और महिलाओं की अलग-अलग भूमिकाएँ सिर्फ मनमाने नियम नहीं थीं। वे उस समय की जरूरतों और परिस्थितियों से धीरे-धीरे विकसित हुई थीं। जो व्यवस्था उस कठिन दुनिया में परिवार और समुदाय को जिंदा रखने में मदद करती थी, वही आगे चलकर समाज की सामान्य व्यवस्था बनती गई।

यानी, इन भूमिकाओं को सिर्फ किसी साजिश या महिलाओं को दबाने की योजना के तौर पर देखना पूरी कहानी नहीं बताता। इनके पीछे इंसानी समाज के सामने खड़ी एक बहुत बुनियादी चुनौती भी थी, मुश्किल से मुश्किल हालात में कैसे जिंदा रहा जाए और अगली पीढ़ी को कैसे बचाया जाए।

सबसे पहले सवाल था, ज़िंदा कैसे रहें?

इंसानी इतिहास के एक बहुत बड़े हिस्से में, हमारी प्रजाति फूड चेन के शीर्ष पर नहीं थी। हम ज़ीरो-सम गेम के बेहद कमज़ोर खिलाड़ी थे। ज़िंदगी छोटी, दर्दनाक और अनिश्चित थी। हमारे पूर्वजों के सिर पर हमेशा बड़े शिकारियों, संसाधनों की कमी, भयानक मौसम और इलाके पर कब्ज़े के लिए कबीलों के बीच होने वाली जंग का खतरा मंडराता रहता था।

ऐसे माहौल में किसी भी समाज के सामने सबसे पहली चुनौती थी, ज़िंदा रहना। भूख, बीमारी, हिंसा और बाहरी खतरों के बीच समाज के लिए यह जरूरी था कि हर जरूरी काम किसी न किसी तरह पूरा हो। कामयाबी का इकलौता पैमाना यही था कि आप अपनी नस्ल को आगे बढ़ते रहें।

इसलिए पुरुषों और महिलाओं से अलग-अलग तरह की जिम्मेदारियाँ निभाने की उम्मीद की जाती थी। यह काम का बँटवारा सिर्फ किसी पर अधिकार जमाने के लिए नहीं था, बल्कि उस समय की जरूरतों से पैदा हुआ था। कौन शिकार करेगा, कौन बच्चों की देखभाल करेगा, कौन बस्ती की सुरक्षा करेगा और कौन रोजमर्रा के संसाधनों को संभालेगा, इन सब कामों का बँटवारा समाज की जरूरत और उस समय की परिस्थितियों के हिसाब से होता गया।

एवोल्यूशनरी ट्रेड-ऑफ और काम का बंटवारा

मानव इतिहास और इंसानी व्यवहार को समझने वाली रिसर्च हमें बताती है कि समाज में पुरुषों और महिलाओं के बीच काम का बँटवारा आखिर क्यों हुआ। इसकी एक बड़ी वजह थी दोनों के शरीर और शारीरिक क्षमताओं में मौजूद प्राकृतिक अंतर। समय के साथ समाज की अलग-अलग भूमिकाएँ इन्हीं प्राकृतिक अंतर और उस समय की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित होती गईं। सेक्सुअल डाइमॉर्फिज्म; यानी, महिला और पुरुष के बीच का शारीरिक अंतर, वह बुनियादी ढांचा था जिस पर ये रोल टिके थे।

औसतन पुरुषों का शरीर इस तरह बना है कि वे ज्यादा भारी वजन उठा सकें, ज्यादा शारीरिक ताकत लगा सकें और खतरनाक परिस्थितियों का सामना कर सकें। हजारों सालों तक इंसानी समाज में इन्हीं क्षमताओं का इस्तेमाल शिकार करने, खाना जुटाने और अपने परिवार या समूह की सुरक्षा करने में होता रहा। इंसानी इतिहास,एवोल्यूशनरी साइकोलॉजी  पर हुई रिसर्च; जैसे मार्टिन डैली और मार्गो विल्सन का काम, यह दिखाता है कि पुरुष आम तौर पर ऐसे कामों में ज्यादा शामिल रहे हैं जिनमें शारीरिक खतरा ज्यादा था। बड़े और खतरनाक जानवरों का शिकार करना हो या किसी बाहरी खतरे से अपने समूह की रक्षा करनी हो, इन कामों में शारीरिक ताकत और जोखिम उठाने की क्षमता बेहद काम आती थी। 

माहौल के इस दबाव का सीधा और लॉजिकल जवाब था, स्पेशलाइजेशन (विशेषज्ञता) का मॉडल। आबादी के एक हिस्से ने शिकार, लड़ाई, कंस्ट्रक्शन और पहरेदारी के जरिए बाहर की खतरनाक दुनिया का सामना करने की ज़िम्मेदारी ली। वहीं दूसरे हिस्से ने बच्चों को पालने, बस्ती के अंदर के संसाधनों को संभालने और कल्चर को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने जैसे बेहद ज़रूरी कामों पर ध्यान दिया।

डेमोग्राफिक ज़रूरत: “बायोलॉजिकल बॉटलनेक” और जंग

काम के इस बँटवारे को समझने के लिए एक और जरूरी बात समझनी होगी, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है, बायोलॉजिकल बॉटलनेक।

सीधे शब्दों में कहें तो, इंसानों की आबादी बढ़ने की रफ्तार इस बात पर भी निर्भर करती है कि कितनी महिलाएँ एक समय में बच्चे पैदा कर सकती हैं। यही प्राकृतिक सीमा समाज की संरचना और पुरुषों-महिलाओं की भूमिकाओं को समझने में अहम भूमिका निभाती है।

किसी भी आबादी के बच्चे पैदा करने की क्षमता बुनियादी तौर पर महिलाओं की संख्या से तय होती है। एक अकेला पुरुष कई महिलाओं को प्रेग्नेंट कर सकता है, लेकिन एक महिला अपने पूरे जीवनकाल में सीमित संख्या में ही बच्चों को जन्म दे सकती है। इसलिए, महिलाओं की संख्या का कम होना या खत्म होना, पुरुषों के नुकसान की तुलना में किसी आबादी के वजूद के लिए बहुत ज्यादा अचानक और जानलेवा झटका होता है।

इसी जनसंख्या से जुड़ी कमजोरी की वजह से इतिहास में युद्धों के दौरान महिलाओं को अक्सर निशाना बनाया गया। सदियों से चले आ रहे संघर्षों में, चाहे वे इस्लाम के शुरुआती विस्तार के दौर के युद्ध हों, मध्यकालीन धार्मिक संघर्ष हों या आज के समय में 7 अक्टूबर को इज़रायल पर हुआ हमला, महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा और दूसरी तरह की क्रूरता के मामले सामने आते रहे हैं।

यह हिंसा कई बार सिर्फ लोगों को डराने या तत्काल नुकसान पहुँचाने तक सीमित नहीं रही। महिलाओं पर हमला किसी समुदाय के परिवार, आने वाली पीढ़ी और सामाजिक ढाँचे को कमजोर करने का एक तरीका भी बन सकता था। यानी निशाना सिर्फ आज के लोगों पर नहीं, बल्कि उस समुदाय के भविष्य पर भी पड़ता था।

नतीजा यह हुआ कि पुराने समय में समाज ने अपनी सुरक्षा के लिए कुछ सख्त नियम और व्यवस्थाएँ बनाई थीं। इन्हें सिर्फ लोगों को दबाने या नियंत्रित करने के तरीके के तौर पर देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता। उस दौर में इनका एक मकसद परिवार, समुदाय और आने वाली पीढ़ी को बाहरी खतरों से बचाना भी था।

इसी व्यवस्था में पुरुषों से ज्यादा जोखिम उठाने की उम्मीद की जाती थी। युद्ध हो, शिकार हो या किसी खतरे का सामना करना, पुरुषों को अक्सर आगे भेजा जाता था। इसकी एक वजह यह भी थी कि एक समुदाय के भविष्य के लिए महिलाओं की संख्या और उनकी सुरक्षा का बहुत महत्व था।

सरल शब्दों में कहें तो, पुराने समाजों में पुरुषों से यह अपेक्षा की जाती थी कि वे बाहर के खतरे का सामना करें, ताकि परिवार और समुदाय का बाकी हिस्सा सुरक्षित रह सके।

‘मोनोलिथिक्स पैट्रियार्की’: क्या हर समाज में पितृसत्ता एक जैसी थी?

लेकिन यह मान लेना भी सही नहीं होगा कि हर दौर में और हर समाज में पुरुषों का दबदबा एक जैसा ही रहा है। अलग-अलग जगहों और अलग-अलग समय के समाजों को देखें, तो पुरुषों और महिलाओं की भूमिकाएँ काफी अलग रही हैं। कहीं पुरुषों की भूमिका ज्यादा प्रभावशाली रही, तो कहीं महिलाओं की। यानी दुनिया के हर समाज में जेंडर रोल एक ही तरह के नहीं थे।

वाइकिंग्स का उदाहरण लीजिए। वैसे तो वे अपनी युद्ध कला के लिए जाने जाते हैं, लेकिन प्रॉपर्टी के मालिकाना हक और तलाक के मामले में उनका लीगल और सोशल सिस्टम काफी बराबरी वाला और समतावादी था। महिलाएं खेतों और संपत्तियों को संभालती थीं, उनके पास आर्थिक ताकत थी, और वे वैसी लाचार नहीं थीं जैसा कि आज की फिल्मों या कहानियों में दिखाया जाता है। 

इसी तरह, भारत की शुरुआती वैदिक सभ्यता में महिलाओं का समाज में बहुत सम्मानजनक स्थान था, जहाँ उन्हें शिक्षा और धार्मिक अनुष्ठानों का पूरा अधिकार था। वैदिक साहित्य में गार्गी और मैत्रेयी जैसी महिलाओं के उदाहरण मिलते हैं, जो दार्शनिक चर्चाओं और बौद्धिक विमर्श में सक्रिय थीं।

कई समाजों में उनकी व्यवस्था वहाँ की परिस्थितियों के हिसाब से बनी थी, जैसे लगातार होने वाले युद्ध या ऐसा खेती का काम जिसमें बहुत ज्यादा शारीरिक मेहनत की जरूरत होती थी।

इसलिए पुराने समाजों को सिर्फ आज की जेंडर पॉलिटिक्स के नजरिए से देखना सही नहीं होगा। उस समय की परिस्थितियाँ आज से बहुत अलग थीं, और उन्हें समझने के लिए उस दौर की जरूरतों और हालात को भी ध्यान में रखना होगा।

अतीत की विरासत को नए नजरिए से समझना

इंसानी इतिहास के इतने लंबे सफर में बने ये जेंडर रोल किसी को गुलाम बनाने के लिए रातों-रात तैयार की गई कोई साजिश नहीं थे। वे उस दौर की जरूरतों और हालात से पैदा हुए थे। पुरुषों और महिलाओं ने अलग-अलग तरह के जोखिम और जिम्मेदारियाँ उठाईं, लेकिन दोनों की भूमिका इंसानी समाज को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी थी।

इसलिए पुराने समाजों को सिर्फ उत्पीड़न की एक कहानी के रूप में देखना शायद अधूरी तस्वीर होगी। हमारे पूर्वजों के सामने आज की दुनिया से बिल्कुल अलग चुनौतियाँ थीं, भूख, बीमारी, हिंसा, युद्ध और जीवित रहने की लगातार लड़ाई।

आज हम जिस सुरक्षित और सुविधाजनक दुनिया में रहते हैं, वह अचानक नहीं बनी। इसके पीछे पीढ़ियों की मेहनत, संघर्ष और त्याग है। और इतिहास में इस कीमत का एक बड़ा हिस्सा उन पुरुषों ने भी चुकाया, जो शिकार, युद्ध, भारी मेहनत और दूसरे खतरनाक कामों में सबसे आगे रहे।

इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आज भी हमें वही पुराने जेंडर रोल अपनाकर चलना चाहिए। पिछले कुछ सौ सालों में टेक्नोलॉजी, खेती और समाज में इतना बड़ा बदलाव आया है कि पुराने समय में काम बाँटने की जो जरूरत थी, वह आज पहले जैसी नहीं रही।

आज हमारे पास मशीनें, आधुनिक तकनीक और दूसरी सुविधाएँ हैं, जिनकी वजह से किसी काम के लिए सिर्फ पुरुष या महिला होना जरूरी नहीं रह गया है। अब समाज में यह ज्यादा मायने रखता है कि किसी इंसान में उस काम को करने की योग्यता और क्षमता है या नहीं। 

लेकिन इतिहास को ईमानदारी से समझने के लिए यह जानना भी जरूरी है कि पुराने समय में समाज ऐसे क्यों बने थे। इंसानियत की कहानी सिर्फ अत्याचार और शोषण की कहानी नहीं है। यह उन लोगों की कहानी भी है, जिन्होंने बेहद मुश्किल हालात में जिंदा रहने और अपनी अगली पीढ़ी को बचाने के लिए मिलकर संघर्ष किया।

इसका अर्थ यह नहीं कि महिलाओं ने कम कठिनाई झेली। अलग-अलग समाजों में दोनों ने ही अलग-अलग तरह के जोखिम और बोझ उठाए। इस संघर्ष में पुरुषों और महिलाओं ने हमेशा एक जैसे काम नहीं किए, लेकिन उनकी जिम्मेदारियाँ कई जगह एक-दूसरे की पूरक थीं। अपने अतीत को सही तरीके से समझना इसलिए जरूरी है, क्योंकि तभी हम यह तय कर सकते हैं कि अतीत से क्या सीखना है और भविष्य में क्या बदलना है।

संभल की डेमोग्राफी: हिंदू 13 हजार से हुए 47 हजार, मुस्लिम 23 हजार से हो गए 1 लाख 71 हजार – मुस्लिम भीड़ की दंगाई मानसिकता का यह है गणित

भगवान कल्कि के मंदिर को ध्वस्त कर उसके अवशेषों पर ही संभल में शाही जामा मस्जिद बना दी गई। यह किया गया 1526 में। इतिहास और हिंदु-स्मृति में लेकिन सब दर्ज रहा। 498 साल बाद 2024 में न्यायिक प्रक्रिया के तहत हिंदुओं ने मस्जिद के सर्वेक्षण की याचिका दायर की। कोर्ट ने सर्वे का ऑर्डर भी दे दिया। सर्वे करने लेकिन जब सरकारी टीम पहुँचती है तो वहाँ मुस्लिम भीड़ दंगा करती है। आखिर पुलिस-प्रशासन पर हमला करने की हिम्मत आई कहाँ से भीड़ को? इस सवाल का जवाब संभल दंगों की जाँच करने वाली आयोग की रिपोर्ट में स्पष्ट है – संभल की बदलती जनसांख्यिकी मतलब डेमोग्राफी।

रिपोर्ट में 2011 की जनगणना के अनुसार संभल शहर की डेमोग्राफी 77.67% मुस्लिम आबादी जबकि हिंदू आबादी सिर्फ 22% वाली बताई गई है। इससे ज्यादा चौंकाने वाला संभल के पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार और अपर पुलिस अधीक्षक श्रीश्चंद का वो बयान है, जहाँ वो वर्तमान में 80% मुस्लिम जबकि सिर्फ 20% हिंदुओं के होने की बात कह रहे हैं। मतलब संभल में हिंदू कम से कम होते जा रहे हैं, यह सरकारी आँकड़ा है।

क्या संभल का इतिहास हमेशा से मुस्लिम बाहुल्य ही रहा है? आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इस पर भी विस्तार से बताया है। ‘संभल में हिंसा का इतिहास और शाही जामा मस्जिद का इतिहास’ रिपोर्ट के अध्याय-3 का शीर्षक ही यही है। जिस संभल में भगवान कल्कि का मंदिर हुआ करता था, वो संभल आखिर मुस्लिम-बहुल कैसे हुआ? मुस्लिम-बहुल होने के कारण वहाँ क्या-क्या सामाजिक बदलाव देखने को मिले, आयोग की रिपोर्ट इन परतों को भी खोलती है।

संभल जो कभी था शंभाला: महाभारत और पुराणों में है जिसका उल्लेख

संभल का पौराणिक नाम शंभाला है। इसका जिक्र महाभारत, स्कंद पुराण, भविष्य पुराण, कल्कि पुराण में विष्णु के दसवें और अंतिम अवतार भगवान कल्कि के जन्मस्थान के रूप में उल्लेखित है। यही कारण है कि यहाँ ‘श्री कल्कि विष्णु मंदिर’ भी है। हिंदू धर्म ग्रंथों के अलावे तिब्बती बौद्ध पौराणिक कथाओं में भी शंभाला को हिमालय के पार एक पौराणिक साम्राज्य और शुद्ध भूमि के रूप में वर्णित किया गया है।

सरकारी आँकड़ों की बात करें तो 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व के दौरान संभल पर पाँचाल शासकों का राज था। बाद में यह मौर्य सम्राट अशोक के साम्राज्य का हिस्सा बना। किंवदंती यह भी है कि 12वीं सदी के दौरान दिल्ली के अंतिम हिंदू शासक पृथ्वीराज चौहान ने संभल में गाजी सैय्यद सालार मसूद (गजनी साम्राज्य का शासक महमूद गजनी का भांजा) के खिलाफ दो युद्ध लड़े थे।

13वीं और 14वीं शताब्दी में संभल दिल्ली सल्तनत का हिस्सा बना। इस दौरान यह पहले कुतुब-उद-दीन ऐबक और बाद में फिरोज शाह तुगलक के अधीन रहा। 14वीं सदी की बात करें तो मोरक्कन यात्री व दिल्ली के काजी इब्न बतूता ने भी अपने यात्रा वृत्तांत ‘रिहला’ में संभल का जिक्र किया है। इब्न बतूता के अनुसार चीन के युआन सम्राट तोगोन तेमुर ने दिल्ली के सुल्तान मोहम्मद बिन तुगलक को एक राजदूत भेजा था, जिसमें संभल में एक बौद्ध मंदिर के पुनर्निर्माण की अनुमति माँगी गई थी। कारण था – तिब्बत से उस समय भारी संख्या में आने वाले तीर्थयात्री। मतलब संभल पर मुस्लिम आक्रांताओ का शासन जरूर हो गया था लेकिन पौराणिक-सामाजिक-धार्मिक मान्यताएँ न सिर्फ देश बल्कि विदेशियों तक की स्मृति से लोप नहीं हुई थी, यह आसानी से समझा जा सकता है।

संभल का क्या महत्व था, इसे ऐसे समझें। 15वीं शताब्दी में लोदी साम्राज्य के दूसरे शासक सिकंदर लोदी ने संभल को अपने साम्राज्य की राजधानियों में से एक घोषित किया था। यह चार वर्षों तक इसी तरह बना रहा। इसके बाद यहाँ मुगलों का राज हुआ। मुगल शासक बाबर ने अपने साम्राज्य के शुरुआती दिनों में इसी संभल में अपनी अस्थायी राजधानी स्थापित की थी। संभल में पहली बाबरी मस्जिद का निर्माण भी करवाया था। संभल का तब इतना महत्व हुआ करता था कि उसने अपने बेटे हुमायूँ को यहाँ का गवर्नर बनाया था। हुमायूँ जब राजा बना तो यह अकबर को सौंपा गया। कहा जाता है कि संभल अकबर के शासन-काल में फला-फूला। इसके बाद जब शाहजहाँ को यहाँ का प्रभारी बनाया गया, उसके बाद से इसकी लोकप्रियता और महत्व धीरे-धीरे खत्म होता गया।

संभल की जनसंख्या: 1881 से लेकर अब तक

साल 1881 में अंग्रेजों ने पहली बार भारत की जनगणना की। तब संभल की कुल जनसंख्या 35196 थी। 1891 में यह बढ़ कर 37226 हुई।

भारत की सबसे पहली और दूसरी जनगणना में संभल की आबादी, स्रोत साभार: North-Western Provinces and Oudh, Imperial Tables, Part II, Vol-XVII, Uttar Pradesh – Census 1891

जनसांख्यिकी मतलब डेमोग्राफी की बात करें तो इसका डेटा साल 1891 से ही उपलब्ध है। 1881 के उपलब्ध रिकॉर्ड से संभल का सिर्फ कुल आबादी का डेटा प्राप्त हुआ है। जबकि 1891 और उसके बाद जितनी बार भी जनगणना की गई, धार्मिक-मजहबी आबादी का डेटा भी संलग्न है।

1891 की जनगणना के अनुसार संभल की डेमोग्राफी, स्रोत साभार: North-Western Provinces and Oudh, Imperial Tables, Part II, Vol-XVII, Uttar Pradesh – Census 1891

1891 में संभल (वर्तमान का नगर पालिका परिषद) में रह रहे कुल 37226 लोगों में 13291 हिंदू थे, जबकि 23476 मुसलमान। मतलब कुल आबादी का 35.7 प्रतिशत हिंदू और 63.1 प्रतिशत मुस्लिम।

नीचे आप 1891 से लेकर 2011 तक हुए हर जनगणना को देख सकते हैं। जब आप आबादी में बढ़ोतरी का प्रतिशत देखेंगे तो चौंक जाएँगे। 120 वर्षों में संभल की कुल आबादी में 493.17 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इस दौरान मुस्लिम आबादी बढ़ी है 632.1 प्रतिशत। जबकि हिंदुओं की जनसंख्या में बढ़ोतरी हुई सिर्फ 260 प्रतिशत। मतलब शहर की आबादी में बढ़ोतरी दर से लगभग आधी दर पर हिंदुओं की जनसंख्या संभल में बढ़ी है। यह चिंताजनक स्थिति है।

घटते गए हिंदू, फैलता गया मुसलमान: स्रोत साभार – 1891 से 2011 तक की गई जनगणना का सरकारी आँकड़ा, ग्राफिक्स साभार – Gemini AI

कोरोना काल के दौरान 2021 की जनगणना नहीं हो सकी। लेकिन संभल दंगों की जाँच के लिए बने आयोग के समक्ष वहाँ के पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार और अपर पुलिस अधीक्षक श्रीश्चंद का बयान हिंदुओं की संख्या में हो रही कमी की ओर इशारा करती है। उनके अनुसार 2011 में लगभग 22% हिंदुओं की तुलना में वर्तमान में लगभग 20% हिंदू ही बचे हैं संभल शहर में।

आजाद भारत में क्यों नहीं फले-फूले संभल के हिंदू

इस्लामी आक्रांताओं और अंग्रेजों की गुलामी के दौर में संभल के हिंदू अगर उपेक्षा के शिकार हुए तो क्या आजादी के बाद क्या हालात में सुधार हुआ?

1891 में संभल में हिंदू-मुस्लिम आबादी का अंतर सिर्फ 10000 के लगभग था। डाटा से यह स्पष्ट है कि संभल तब भी मुस्लिम-बहुल था लेकिन जनसंख्या का अंतर बहुत कम था। संभव है कि पृथ्वीराज चौहान की सत्ता जाने के बाद इस्लामी आक्रांताओं ने हिंदू-घृणा के कारण इस पौराणिक शहर के धार्मिक स्थलों को बर्बाद करने के साथ-साथ यहाँ के कुछ लोगों को इस्लाम में धर्मांतरित भी किया होगा, कुछ बाहरी मुस्लिमों को बसाया भी होगा, बदलती परिस्थितियों को देखते हुए कुछ हिंदू पलायन भी कर गए होंगे। 12वीं सदी से लेकर 1890 तक संभल जैसे प्रमुख हिंदू नगर का मुस्लिम-बहुल हो जाने के ये कुछ चंद कारक हो सकते हैं। लेकिन आजाद भारत (ऊपर के डाटा चित्र में, 1951 से 2011 के आँकड़ों पर नजर डालिए) में ऐसी परिस्थितियाँ क्यों बनीं कि यहाँ हिंदू 16920 से बढ़ कर 47846 पर ही सिमट गए, जबकि इसी समय-काल में मुस्लिमों की संख्या 43910 से 171857 हो गई?

इस सवाल का जवाब है – सांप्रदायिक दंगा। एक दंगे के बाद दूसरा, दूसरे के बाद तीसरा… संभल में आजादी से कुछ साल पहले से यह जो चक्र चला, उसकी जड़ों में मट्ठा डालने की आजादी के बाद भी न तो राजनीतिक मंशा कभी किसी की रही, न ही प्रशासनिक स्तर पर कभी प्रयास किया गया।

24 नवंबर 2024 की घटना संभल में दंगा का कोई अकेला मामला नहीं थी। शहर का एक लंबा और अशांत इतिहास है, जिसमें बार-बार सांप्रदायिक अशांति की घटनाएँ हुई हैं। संभल दंगों की जाँच के लिए बने आयोग ने यहाँ बार-बार होने वाली हिंसक घटनाओं का अध्ययन किया, जिनमें से अधिकांश हिंदुओं और मुसलमानों के बीच झड़पों से संबंधित हैं। इसके लिए आयोग ने विभिन्न स्रोतों से उपलब्ध सामग्री का अध्ययन किया। आयोग ने यह पाया कि 16वीं शताब्दी की शुरुआत में हरि मंदिर को ध्वस्त कर उसके ऊपर ही शाही जामा मस्जिद मुगल शासक बाबर द्वारा बनाया गया, जो यहाँ दो संप्रदायों के बीच विवाद का मूल है। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में 1936 से लेकर 2024 तक के सभी दंगों का वर्णन किया है। एक दंगा हालाँकि 1924 में भी हुआ था, जिसका जिक्र जवाहरलाल नेहरू ने खुद अपनी रिपोर्ट में की है, नीचे वो भी शामिल किया जा रहा है। ज्ञात और दर्ज स्रोतों के आधार पर कुल 16 दंगों का जिक्र नीचे है।

संभल में सांप्रदायिक दंगे: 1924 से 2024 तक – 100 वर्षों का इतिहास

“मुहर्रम महीने के 9वें दिन (11 अगस्त 1924, इस दिन श्रावण मास का आखिरी सोमवार भी था) संभल में दो हिंदू मंदिर तोड़ दिए गए। वहाँ स्थापित मूर्तियों को विखंडित कर दिया गया था। कई हिंदुओं को बुरी तरह मारा गया। जबकि मुहम्मडनों के साइड कोई क्षति या चोट के निशान नहीं देखे गए। यह इसलिए हुआ क्योंकि मुहम्मडन जहाँ से ताजिया लेकर जा रहे थे, वहाँ भगवान शिव के सूरजकुंड मंदिर में भजन-कीर्तन चल रहा था। उन्होंने मंदिर से आ रहे संगीत पर आपत्ति जताने के बाद मंदिर तोड़ा, मूर्ति विखंडित की, भक्तों को बहुत मारा। इसके बाद यहाँ से कुछ दूरी पर स्थित ठाकुरद्वारा मंदिर को भी इस्लामी भीड़ ने तोड़ डाला। हिंदू पीड़ितों ने यह भी बताया कि मंदिर निर्माण के लिए एक साधु को कुल 1305 रुपए दान-दक्षिणा में मिले थे। मुस्लिम दंगाइयों ने पहले उन साधु को नंगा किया, फिर उनको मिला दान भी छीन लिया।”

यह रिपोर्ट खुद जवाहरलाल नेहरू ने लिखी है, वो भी संभल में 3 दिन रह कर, हिंदू-मुस्लिम पक्षों से आमने-सामने बातचीत करके।

एसपी संभल ने आयोग के समक्ष बताया कि उनके कार्यालय में उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार संभल में इस दौरान सांप्रदायिक हिंसा की कुछ घटनाएँ हुई थीं। हालाँकि तारीख और स्थान का विवरण (संभवतः पुराने रिकॉर्ड के कारण) वो आयोग को उपलब्ध नहीं करा सके।

विभाजन के समय हुए सांप्रदायिक दंगों से संभल भी अछूता नहीं था। दंगाई मुस्लिमों से बचने के लिए हातिमसराय और आसपास के क्षेत्रों के लोग संभल पुलिस स्टेशन में शरण लिए थे। दंगे शांत होने के बाद जगदीश शरण नाम के व्यक्ति के साथ 20-25 अन्य लोग पुलिस स्टेशन से पुलिस एस्कॉर्ट के साथ अपने-अपने घरों की ओर लौट रहे थे। जब इनके घर केवल 50 मीटर दूर रह गए थे, तो इन्होंने खुद का सुरक्षित मान कर पुलिसकर्मियों को वापस लौटने के लिए कह दिया। पुलिस वालों के वापस मुड़ते ही हिलाली सराय में कुरैशी वाली गली में इन लोगों पर दंगाई मुसलमानों ने हमला कर दिया। अन्य लोग भागने में सफल रहे, लेकिन जगदीश शरण को पकड़ लिया गया और मार डाला गया।

यह दंगा बड़े नवाब महमूद हसन खान (वर्तमान विधायक इकबाल महमूद का अब्बा) द्वारा भड़काया गया था। दंगों की शुरुआत बड़े नवाब ने ही गोलीबारी करके शुरू की थी। इसमें छह हिंदुओं की मृत्यु हुई थी। हिंदुओं को और ज्यादा क्षति पहुँचाने के लिए नवाब महमूद ने अनवर मिस्त्री से एक अस्थायी तोप बनवाई थी। हालात इतने खराब थे कि दंगों के बाद 20 दिनों से अधिक समय तक कर्फ्यू लगाना पड़ा था।

1958 में हिंद इंटर कॉलेज में हिंदू और मुस्लिम छात्रों के बीच हिंसक झड़प हुई। ‘बेरा के कारखाना’ से आए मुस्लिम लड़कों ने लोहे के पंजों सहित हथियारों से हमला किया, जिसमें 10-12 हिंदू छात्र घायल हो गए। इसके बाद 2 दिन का कर्फ्यू लगाया गया।

संभल लोकसभा क्षेत्र में उपचुनाव होना था। इस दौरान प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और जेपी कृपलानी ने भी प्रचार किया। देखते-देखते सांप्रदायिक तनाव भड़क उठा। इसी बीच पूर्व जनसंघ विधायक महेश गुप्ता को रुक्नुद्दीन सराय में दंगाई मुसलमानों ने चाकू मार दिया।

इसकी शुरुआत होती है 29 फरवरी को एक मौलवी की हत्या से। अफवाह फैलाया जाता है कि हत्या राजकुमार सैनी नाम के एक हिंदू ने की। जबकि जाँच से पता चल गया था कि मस्जिद समिति के भीतर विवाद के कारण मौलवी की हत्या एक अन्य मुस्लिम ने की थी। इसके बावजूद मंजर शफी और अताउल्लाह ततारी के नेतृत्व में मुस्लिम भीड़ ने सूरजकुंड मंदिर और मानस मंदिर सहित हिंदू धार्मिक स्थलों पर हमला कर दिया। इस दौरान 2 लोगों की हत्या कर दी गईः सुखा सिंह के बेटे हरिसिंह की और रामेश्वर प्रसाद के बेटे राकेश वैश्य की।

इसके बाद 24 अप्रैल को कल्लू के घर में विस्फोट होता है। उसका बेटा सलाम इसमें घायल होता है और अगले दिन उसकी मौत हो जाती है। बिना यह जाने कि विस्फोट क्यों हुआ, मुस्लिम भीड़ दंगा शुरू कर देती है। इसमें बुजुर्ग हिंदू कमता प्रसाद की चाकू मारकर हत्या कर दी जाती है। जयचंद रस्तोगी की हत्या गोली मार कर की जाती है। इसी अशांति के दौरान संभल शहर के बाहर भी एक हिंदू की हत्या कर दी गई।

पुलिस ने क्या किया? संतुलन बनाया? कैसे? लगभग 20-22 दोषी मुसलमानों को गिरफ्तार किया। लेकिन इससे संतुलन नहीं बनता। इसलिए इतने ही निर्दोष हिंदुओं को भी गिरफ्तार किया गया। ‘निर्दोष हिंदुओं की गिरफ्तारी’ – चौंकना नहीं है, यह सब आयोग की रिपोर्ट में दर्ज है।

1978 में संभल में हुआ दंगा वहाँ के हिंदुओं के लिए सबसे विनाशकारी दंगा था। आयोग की रिपोर्ट के अनुसार इस दंगे में 183 से ज्यादा हिंदुओं की हत्या की गई थी। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार 184 लोगों की हत्या की गई थी। इस दंगे की भयावहता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि मुरारी लाल की फड़ (कोठी/दूकान का वह भाग, जहाँ बैठ चीजें खरीदी-बेची जाती हैं) पर 24 हिंदुओं को जिंदा जला दिया गया था। दंगों के बाद सैकड़ों हिंदू घर-कारोबार छोड़कर पलायन कर गए थे।

25 मार्च 1978 को होली थी। लेकिन संभल में यह मनाई गई थी तनाव के बीच। क्योंकि होलिका दहन जिस स्थान पर होनी थी, वहाँ एक मुस्लिम दुकानदार ने लकड़ी का स्टॉल लगा दिया था। जबकि एक अन्य स्थान पर मंच बना दिया गया था। प्रशासन ने लकड़ी का स्टॉल और मंच तो समय रहते हटा दिया लेकिन होली तनाव में ही गुजरी। यह तनाव दंगों में बदल गया 29 मार्च को।

इस दंगे की साजिश रची थी मंजर शफी (1976 में हुए दंगों में भी इसका हाथ) और उसके गुर्गों ने। मंजर शफी अलीगढ़ में छात्र नेता था और इमरजेंसी के बाद 1977 में मुस्लिम लीग से चुनाव भी लड़ा था। इसे भीड़ जुटाना अच्छे तरीके से आता था। भीड़ को कैसे हमलावर बनाना है, 1976 के दंगों में यह अपना ‘कौशल’ दिखा चुका था। 29 मार्च 1978 को मंजर शफी ने कुछ चंद जुमले गढ़े, फिर उसे अफवाहों की तरह फैलाया:
(i) मंजर शफी मारा गया
(ii) मस्जिद तोड़ दी गई
(iii) पेश इमाम को जला दिया गया
(iv) कोतवाली के पास बनी मस्जिद ध्वस्त कर दी
(v) लूटपाट-कत्लेआम मचा है

नतीजा क्या हुआ? पूरे संभल में मुस्लिम भीड़ दंगाई बन कर घूमने लगी। कहीं एक साथ 24 हिंदुओं (कुछ मीडिया रिपोर्ट में 25 हिंदुओं को जलाए जाने की बात) को गन्ने की खोई और टायर का ढेर लगाकर जिंदा जला दिया गया। यह हुआ था मुरारी लाल की फड़ पर। क्योंकि दंगे भड़कने के बाद बनवारी लाल गोयल ने कई हिंदू दुकानदारों को अपने साले मुरारी लाल की कोठी में छिप जाने को कहा था। लेकिन मुस्लिम आढ़तियों ने इसकी सूचना दंगाइयों को दे दी। इसके बाद मुस्लिम दंगाइयों की भीड़ ने ट्रैक्टर लगाकर मुरारी लाल की कोठी का गेट तोड़ दिया। यहाँ छिपे 24 हिंदुओं को जिंदा जला दिया।

अगर वहाँ मौजूद रसोईया हरिद्वारी लाल खुद को एक ड्रम में बंद नहीं करता, एक छोटे से छेद से पूरी घटनाक्रम नहीं देखता, और सबसे बड़ी बात… जिंदा बचकर वापस नहीं आता तो यह दर्दनाक कहानी सरकारी फाइलों में दब जाती, शायद सिंपल आगजनी बता दी जाती।

यहाँ जिनको जिंदा जलाया गया था, उनमें से बहुतों की अस्थियाँ तक उनके परिवार वालों को नसीब हो सकी थी, उन्हें सांकेतिक रूप (घास-फूस पर आटा लपेट पुतला बना कर) से उनका अंतिम संस्कार करना पड़ा था।

सबसे बुरा हुआ था बनवारी लाल के साथ। दंगों के बावजूद वो प्रभावित इलाके में चले गए। उनकी पत्नी और बेटे ने उन्हें रोका भी। लेकिन वे यह कहते हुए गए:

“सारे मुस्लिम मेरे मित्र और भाई जैसे हैं। सब मेरे साथ काम करते हैं। मुझे कुछ नहीं होगा।”

बनवारी लाल गोयल को लेकिन मुस्लिम दंगाइयों ने पकड़ लिया। उनसे कहा कि तुम इन पैरों से पैसे लेने आए हो और उनके पैर काट दिए। फिर कहा कि तुम इन हाथों से पैसे लेने आए हो और हाथ भी काट दिए। इसके बाद गर्दन काट कर उनकी हत्या कर दी गई। इस दौरान मुस्लिम दंगाइयों के सामने बनवारी लाल गिड़गिड़ाते रहे कि मुझे काटो मत, गोली मार दो। पर किसी ने नहीं सुनी।

दंगाई भीड़ से जो हिंदू जान बचा कर आस-पास के गाँवों-जंगलों की ओर भाग रहे थे, ऐसे 160 लोगों की हत्या कर दी गई। दंगों के खत्म होने के कई दिनों बाद तक लाशें मिलती रही थीं।

1978 दंगों से पहले तक संभल के हिंदू कथित शाही जामा मस्जिद (जो हिंदुओं के लिए हरिहर मंदिर है) के अंदर जाते थे। PAC की निगरानी में परिसर के अंदर बने हवन कुंड के पास बैठ कर भजन-कीर्तन करते थे। 1978 के दंगों की आड़ में शफीकुर रहमान बर्क ने स्थानीय हिंदुओं से इनका यह हक भी छीन लिया। हवन कुंड को मुस्लिमों के पैर-हाथ धोने, कुल्ला करने (वजू करने की जगह) की जगह में तब्दील कर दिया।

यह दंगा इतना व्यापक था, पुलिस-प्रशासन इतनी लाचार थी इसे कंट्रोल करने में कि 29 मार्च से 20 मई तक संभल के नगर क्षेत्रों में कर्फ्यू लगा रहा था। 169 FIR किए गए, इनमें से 3 मुकदमे पुलिस ने दर्ज करवाए थे, जबकि बाकि संभल के दोनों संप्रदाय के व्यक्तियों द्वारा पंजीकृत कराए गए थे।

मुलायम सिंह यादव कनेक्शन भी
1993-94 की बात है। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी। 23 दिसंबर 1993 को शासन (मतलब यूपी सरकार, मुलायम सिंह यादव की सरकार) द्वारा मुरादाबाद के डीएम को लिखा गया एक पत्र सामने आया। इसमें संभल में 1978 में हुए दंगों से संबंधित मुकदमे वापस लेने की बिंदुवार जानकारी दी गई थी।

इसी पत्र के आधार पर 5 जनवरी, 1994 को तत्कालीन जिला शासकीय अधिवक्ता ने कोर्ट में शासन के मुकदमे वापस लेने का पत्र दिया था। विभिन्न अदालतों में विचाराधीन 1978 दंगे के 16 में से आठ मुकदमों को तत्कालीन मुलायम सरकार ने वापस लिया था।

सुअर एक जानवर है। उसके पास इंसानी दिमाग नहीं। निश्चित तौर पर वो ईंट-सीमेंट की बनी मस्जिद और घर में फर्क नहीं कर पाता होगा। बेचारा बेजुबान सुअर बिना किसी साजिश या षड्यंत्र के मुरादाबाद में एक ईदगाह में चला गया। इस कारण से वहाँ दंगा भड़क गया। इसकी लपटें संभल तक भी पहुँचीं। यहाँ भी दंगे हुए। प्रजापति समुदाय के एक व्यक्ति की हत्या भी हुई। ध्यान यह दीजिए कि हत्या किसकी हुई? प्रजापति समुदाय के एक व्यक्ति की – मतलब हिंदू की।

पुलिस ने क्या किया? 1976 वाला फॉर्मूला अपनाया। संतुलन बनाने का। कैसे? तस्दीक इलाही को गिरफ्तार किया। लेकिन इससे संतुलन नहीं बनता। संतुलन बनाते हुए विजय त्यागी नामक व्यक्ति को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत भी गिरफ्तार किया गया। तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट का यह आधिकारिक बयान था, जो आयोग की रिपोर्ट में दर्ज है।

बाबरी ढाँचे (मस्जिद) का ताला खोला गया वर्ष 1982 में। संभल के मुसलमानों को यह रास नहीं आया। विरोध के लिए चुना गया शुक्रवार मतलब जुमे की नमाज का दिन। 10-15 हजार मुसलमानों ने इस दिन जामा मस्जिद में काली पट्टियाँ बाँध कर नमाज अदा की। उसके बाद यह नमाजी भीड़ टंडन तिराहा तक आई। नमाजियों की इतनी बड़ी संख्या के कारण, हिंदुओं ने अपनी दुकानें बंद रखीं थीं और भय का माहौल था।

इसी दौरान दीपासराय के एक मुस्लिम ने पैसे के लेन-देन को लेकर हरिशंकर रस्तोगी की गोली मारकर हत्या कर दी। हिंदुओं ने हत्यारे की गिरफ्तारी के लिए विरोध-प्रदर्शन किए। स्थिति तनावपूर्ण हो गई थी। हिंदुओं के दबाव के कारण शफीकुर रहमान बर्क ने हत्यारे का आत्मसमर्पण तो करवाया, लेकिन बाद में हत्यारा बरी हो गया।

इसकी शुरुआत होती है 14 फरवरी 1986 से, मतलब जुमे की नमाज से। श्री राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन के विरोध में मुस्लिमों ने भारी संख्या में विवादित जामा मस्जिद में सामूहिक नमाज अदा की। इसी दौरान एक समाचार छपा। इसमें खबर थी कि कुंभ मेले के लिए हरिद्वार जा रहे नागा साधु महाशिवरात्रि के दिन संभल आएँगे और हरिहर मंदिर में जल चढ़ाएँगे। इस खबर ने संभल में तनाव बढ़ा दिया।

इसके बाद 8 मार्च 1986 को जब शिवरात्रि का जुलूस निकाला जा रहा था, किसी ने यह अफवाह फैला दी कि हरिहर मंदिर (विवादित जामा मस्जिद) में जल चढ़ाया जा रहा है। इसी अफवाह का फायदा उठाकर, ट्यूबवेल ऑपरेटर रहीसुर्रहमान ने मेन्था व्यापारी प्रदीप रस्तोगी की गोली मार कर हत्या कर दी। रास्ते में एक अन्य हिंदू की भी हत्या की गई।

सबसे बड़ा दुस्साहस (पुलिस-प्रशासन को डायरेक्ट चुनौती) दिखाया गया भगवत शरण रस्तोगी की हत्या के बाद। हुआ यह कि टंडन तिराहा के पास खेरू हलवाई की दुकान से चीनी खरीदने गए भगवत शरण रस्तोगी को दुकान के अंदर खींचकर मार डाला गया। लेकिन उनका शव यहाँ से बरामद नहीं हुआ। यह बरामद हुआ नई सराय पुलिस स्टेशन नखासा के अंदर से। भगवत शरण रस्तोगी की लाश को एक बोरे में बाँध कर वहाँ रखा गया था।

इसके बाद मनोकामना मंदिर के पास एक अन्य हिंदू की हत्या की गई। इस दौरान दंगों के बीच में असंख्य दुकानों को लूटा गया और जलाया गया।

8 मार्च 1986 से 6 जून 1986 के बीच मुस्लिम दंगाइयों ने धर्म के आधार पर कुल 7 हिंदुओं की हत्या की:
(i) प्रदीप रस्तोगी
(ii) भगवत शरण रस्तोगी
(iii) सीताराम (मोतीराम के पुत्र)
(iv) ओमिशंकर (छेदलाल के पुत्र)
(v) मास्टर कृपाल सिंह
(vi) एक अन्य हिंदू (शिवरात्रि के जुलूस वाले दिन रास्ते में हत्या)
(vii) एक अन्य हिंदू (मनोकामना मंदिर के पास हत्या)

3 महीने तक चले इन दंगों के संबंध में 50 लोगों को गिरफ्तार किया गया और 250 लोगों को निवारक कार्रवाई के तहत गिरफ्तार किया गया। इसके अलावा, विजय प्रकाश त्यागी, रहीसुर्रहमान और तस्दीक इलाही के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत कार्रवाई की गई और उन्हें हिरासत में लिया गया। 1976 और 1980 की तरह ही ‘संतुलन बनाने वाले फॉर्मूला’ के तहत ही विजय प्रकाश त्यागी को हिरासत लिया गया होगा, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में हालाँकि इस पर कोई टिप्पणी नहीं की है।

भारतीय जनता पार्टी के नेता लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया गया था। इसी दौरान श्री राम जन्मभूमि आंदोलन के समर्थन में पूर्व विधायक महेश कुमार गुप्ता के नेतृत्व में भाजपा कार्यकर्ताओं ने एक जुलूस निकाला। इसके विरोध में 2 नवंबर 1990 (शुक्रवार, जुमे के ही दिन) को, नखासा क्रॉसिंग पर बड़ी संख्या में सशस्त्र मुस्लिम भीड़ एकत्र हो गई, जबकि धारा 144 लागू थी। भीड़ “नारा-ए-तकबीर”, “अल्लाह हू अकबर” और “हिंदुओं को मारो” जैसे नारे लगा रही थी।

पुलिस उस भीड़ को काबू नहीं कर पाई। हिंसा भड़क उठी। भीड़ ने पुलिस पर पथराव किया, जिसमें दो सिपाही घायल हो गए। इसके बाद पुलिस को आत्मरक्षा में गोली चलानी पड़ी। 9 नवंबर 1990 को अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि में नींव स्थापना का समारोह हुआ। संभल में इसके बाद सांप्रदायिक विभाजन और बढ़ गया।

6 दिसंबर 1992 बाबरी ढाँचे (मस्जिद) को गिरा दिया गया। संभल के मुस्लिम इससे भड़क उठे। बदला लेने के लिए लगभग 20000 मुसलमान नखासा तिराहा और छग्गल की कोठी पर एकत्र हो गए।

7 दिसंबर को इस मुस्लिम भीड़ ने पक्का बाग पुलिस चौकी पर हमला बोल दिया। इनका आरोप था कि पुलिस हिंदुओं का समर्थन कर रही है। मुस्लिम भीड़ ने पथराव किया, गोलीबारी भी की। इसमें पीएसी के 4 सिपाही घायल हो गए। तब जाकर इंस्पेक्टर अरविंद कुमार ने आत्मरक्षा में गोली चलाई और भीड़ तितर-बितर हो गई।

8 दिसंबर को लेकिन मुस्लिम दंगाई शांत नहीं बैठे। फिर से हिंसा शुरू की। चौधरी सराय के पास 2 हिंदुओं की हत्या इन लोगों ने कर दी।

22 दिसंबर को हयातनगर में 3 अन्य हिंदू पीड़ितों के शव बरामद हुए। मतलब 8 से 22 दिसंबर तक संभल शांत था, ऐसा नहीं है। मुस्लिम भीड़ हिंसा की ताक में थी, बाबरी ढाँचे (मस्जिद) को गिराए जाने के जवाबी फिराक में तैयार बैठी थी।

2 मार्च 1995 को संभल में फिर से दंगा भड़क उठा। रुक्नुद्दीन सराय या मंडीसराय में बाहर से आए 2 हिंदुओं की हत्या कर दी गई। पुलिस-प्रशासन को व्यवस्था बहाल करने के लिए 8 दिनों का कर्फ्यू लगाना पड़ा था।

नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के खिलाफ वर्ष 2019 में संभल में विरोध प्रदर्शन शुरू हुए। सरायतरिन और दीपा सराय जैसे इलाकों से हजारों की संख्या में मुस्लिम भीड़ नगर पालिका मैदान में एकत्रित हुई। यह शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन नहीं था, यह आए थे अपने स्ट्रीट-पावर को दिखाने।

भीड़ ने पथराव शुरू कर दिया। देखते-देखते रोडवेज की 2 बसों को आग लगा दी। कुछ देर में गोलीबारी भी शुरू कर दी। इस बार हालाँकि हिंसा में 2 मुस्लिमों की ही मृत्यु हुई।

इसके बाद शफीकुर रहमान बर्क के नेतृत्व में मुस्लिम महिलाओं (एकदम दिल्ली के शाहीन बाग की तर्ज पर) ने पक्का बाग, थाना नखासा में दो महीने तक धरना दिया। इसको बड़ा मुद्दा बनाने के लिए इसमें संभल के बाहर से विभिन्न मुस्लिम नेताओं और संगठनों ने भाग लिया। तब तक हालाँकि COVID-19 महामारी आ चुकी थी। इसके कारण राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन लागू हुआ। तब जाकर यह विरोध-प्रदर्शन समाप्त हुआ।

विवादित शाही जामा मस्जिद के भीतर हरिहर मंदिर के अवशेष हैं या नहीं? इसके संबंध में संभल न्यायालय में एक याचिका डाली गई। कोर्ट ने सुनवाई के बाद सर्वे का आदेश दे दिया। लेकिन यह समाजवादी पार्टी के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और संभल के विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल को रास नहीं आया। उन्होंने अपने-अपने समर्थकों को जमा किया, उन्हें भड़काया।

19 नवंबर 2024 को मस्जिद के भीतर जब सर्वे करने सरकारी टीम पहुँची तो इन लोगों ने वहाँ स्थानीय मुस्लिमों को फिर से भड़काया। धमकी देते हुए सरकारी कार्य में बाधा पहुँचाई और अंततः उस दिन सर्वे पूरा होने नहीं दिया। 22 नवंबर को शुक्रवार यानी जुमे के दिन औसतन भीड़ से कहीं ज्यादा नमाजियों की भीड़ शाही जामा मस्जिद में नमाज के लिए पहुँचती है। यह स्वाभाविक नहीं था, बल्कि सोशल मीडिया और वॉट्सऐप के जरिए इस भीड़ को साजिशन बुलाया गया था। नमाज के बाद सांसद जिया-उर-रहमान बर्क ने मस्जिद की सीढ़ियों पर खड़े होकर भड़काऊ भाषण भी दिया।

अंततः जब 24 नवंबर 2024 को मस्जिद के शेष सर्वे के लिए सरकारी टीम फिर से आती है, तो इन लोगों पर जानलेवा हमला किया जाता है। पत्थरबाजी-गोलीबारी की जाती है। इस दंगे में पुलिस अधिकार कई सहित पुलिसकर्मी घायल होते हैं। मुस्लिमों की आपसी रंजिश के कारण हालाँकि इस फसाद में मौत 4 मुस्लिमों की ही होती है।

‘आजाद भारत में क्यों नहीं फले-फूले संभल के हिंदू’ – अगर हम वापस इस सवाल पर आते हैं तो ऊपर दर्ज 16 दंगे इसका एक प्रमुख कारक दिखते हैं। समय-दर-समय कोई भी समाज हमेशा डर और खौफ के साये में जी नहीं सकता। संभल के हिंदुओं का पलायन आजादी के बाद भी नहीं रुका, क्योंकि दंगों को रोकने या दंगाइयों पर अंकुश लगाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ-साथ प्रशासनिक मनोबल भी न के बराबर था।

2017 के बाद हालाँकि वातावरण बदल गया उत्तर प्रदेश शासन का। तभी 2019 और 2024 के दंगों का विवरण उसके पहले हुए बाकी के अन्य 14 दंगों से अलग पढ़ने को मिलेगा। इतना ही नहीं, योगी सरकार ने संभल में ऐसे हिंदुओं को वापस लाने के लिए भी पहल शुरू कर दी है, जो दंगों के भय से पलायन कर गए थे, जिनकी जमीनें मुस्लिमों ने कब्जा कर रखी थीं। इन हिंदुओं को फिर से उनकी जमीनों का मालिकाना हक दिलाया गया है।

हिंदुओं का पलायन, मुस्लिम आबादी बढ़ी: संभल में आतंकी पैठ का कारण

सरकारी आँकड़े मतलब जनगणना से यह तो स्पष्ट हो गया कि संभल में मुस्लिमों की आबादी हिंदुओं की तुलना में हद से ज्यादा बढ़ी है। हिंदू आबादी क्यों नहीं बढ़ी, क्यों इनका समय-समय पर पलायन हुआ – यह 1924 से लेकर 2024 तक हुए दंगों से परिलक्षित है। लेकिन इस डेमोग्राफी चेंज के कारण संभल में एक और बदलाव हुआ – आतंकी संगठनों की पैठ यहाँ आसान हुई। कैसे? आयोग की रिपोर्ट में इसका भी जिक्र है। पुलिस अधिकारियों ने रिकॉर्ड के साथ इस संबंध में अपने-अपने बयान दर्ज करवाए हैं।

2024 में हुए संभल दंगों की जाँच वाले आयोग को बयान देते हुए तब के पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार बताया कि सांप्रदायिक दंगों के लंबे इतिहास के कारण संभल शहर में हिंदू आबादी लगातार घटी है और अब यह लगभग 20 प्रतिशत से कम रह गई है। इसके कारण मुस्लिमों में न सिर्फ मजहबी उग्रवाद बढ़ा बल्कि मजहबी उग्रवाद को बढ़ावा देने और उकसाने वाले तत्वों को बल भी मिला। इसी कारण से यहाँ आतंकवादी संगठनों ने पैठ जमाई। इनमें प्रमुख हैं:

(i) अल-कायदा (इन द इंडियन सबकॉन्टिनेंट – AQIS: Al-Qaeda in the Indian Subcontinent)
(ii) हरकत-उल-मुजाहिदीन
(iii) एसोसिएशन ऑफ अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (SAMU ISIS: Students of Aligarh Muslim University connection with ISIS)
(iv) प्रतिबंधित संगठन सिमी

उपरोक्त सभी संगठनों के संभल जिले में सक्रिय होने की जानकारी सामने आई है, यह संभल के तात्कालिक एसपी कृष्ण कुमार का बयान है। इनके अलावा श्रीश्चंद [संभल जिला (उत्तरी) में तब पदस्थापित रहे अपर पुलिस अधीक्षक] ने भी इन संगठनों के संभल से ऑपरेट करने का बयान दर्ज करवाया है। संभल के अत्यधिक संवेदनशील नखासा पुलिस स्टेशन में तैनात सब-इंस्पेक्टर मोहम्मद शाह फैसल का बयान इनमें सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि वो खास उसी इलाके की बात कर रहे हैं, जहाँ पर से इन आतंकी संगठनों के गुर्गे ऑपरेट करते हैं। सब-इंस्पेक्टर शाह फैसल ने आयोग को बताया:

“मैं नखासा पुलिस स्टेशन में दीपासराय चौकी इंचार्ज के रूप में तैनात हूँ। यह चौकी राजनीतिक, सांप्रदायिक और आपराधिक दृष्टिकोण से अत्यधिक संवेदनशील है। चौकी क्षेत्र में अल-कायदा और ISIS जैसे आतंकवादी संगठनों के सदस्य रहते हैं। वर्ष 1976 की घटना (दंगे) के बाद से संभल क्षेत्र लगातार तनावपूर्ण रहा है।”

अब ऐसा सवाल कोई कर सकता है, और यह सवाल जायज भी है कि क्या सिर्फ पुलिस वालों के बयान के आधार पर ही यह मान लिया जाए कि सच में संभल शहर में अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठनों ने अपनी पैठ बना ली है? क्या सच में यहाँ अल-कायदा और ISIS जैसे आतंकी संगठनों के सदस्य रहते हैं?

इस सवाल का जवाब है – 2024 में संभल में हुए दंगों से बरामद हथियार। एक-एक हथियार की छानबीन की गई। सबको रिकॉर्ड में दर्ज किया गया। फिर आयोग के सामने भी इनसे संबंधित बयान दर्ज किए गए। संभल में रहने वाला एक आम मुस्लिम के पास (अगर वो मजहबी तौर पर भड़का दिया गया हो तो) दंगा के समय चाकू मिल सकता है, देसी गोली-कट्टा-बम आदि-इत्यादि मिल सकते हैं – इसकी संभावना है। लेकिन मिले क्या-क्या हैं, जरा इसकी लिस्ट देखिए:

(i) 9 एमएम कारतूस, जिस पर POF मतलब पाकिस्तान ऑर्डनेंस फैक्ट्री का चिह्न बना था
(ii) 12-बोर कारतूस, जिस पर लिखा था – Made in USA

संभल से कोई आम मुस्लिम नागरिक अमेरिका या पाकिस्तान जाकर तो लाया नहीं होगा इन हथियारों को। आया होगा आतंकी रास्ते से ही। लाया या मँगवाया गया तो कहीं न कहीं रखा भी गया होगा। आखिर कहाँ? उन्हीं विदेशी आतंकी संगठनों के गुर्गों के यहाँ, जिसकी बात संभल एसपी कृष्ण कुमार से लेकर चौकी इंचार्ज सब-इंस्पेक्टर शाह फैसल तक कर चुके हैं।

जिस शाही जामा मस्जिद के लिए मजहबी सनक, आखिर क्या है उसका इतिहास

2024 में संभल में हुए दंगे की जाँच करने वाली आयोग ने अपनी रिपोर्ट में यह भी दर्ज किया है कि 16वीं शताब्दी की शुरुआत में हरि मंदिर को ध्वस्त कर उसके ऊपर ही शाही जामा मस्जिद मुगल शासक बाबर द्वारा बनाया गया। आयोग के अनुसार दोनों संप्रदायों (हिंदू-मुस्लिम) के बीच विवाद का मूल यही है।

अगर यह विवाद का मूल है, तो समाधान भी इसी से निकलेगा। और समाधान है इतिहास को खँगालना। विवादित जामा मस्जिद के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को जानने के लिए आयोग ने मुरादाबाद के गजेटियर और इस संबंध में उपलब्ध विभिन्न रिकॉर्ड्स का अध्ययन भी किया।

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि इतिहासकारों के अनुसार संभल प्राचीन काल में हिंदुओं के लिए पवित्र स्थान माना जाता था। यहाँ स्थित पुराने शहर के केंद्र में कोट के नाम से प्रसिद्ध बड़े टीले पर भगवान विष्णु का एक प्रसिद्ध मंदिर (हरि मंदिर) था। विभिन्न समय-काल और विभिन्न स्वरूपों में इसके निर्माण का श्रेय पृथ्वी राज, राजा जगत सिंह और राजा विक्रम सेन के परपोते नाहर सिंह को दिया जाता है।

आयोग ने स्पष्ट लिखा है कि यह मंदिर अब मौजूद नहीं है और इसकी जगह एक बहुत ही प्रभावशाली मस्जिद ने ले ली है, जो आसपास के परिदृश्य में मीलों तक एक प्रमुख विशेषता बन गई है। इस मस्जिद की स्थलाकृति का जिक्र करते हुए लिखा गया है कि यह भवन मुख्य रूप से पत्थर का है। केंद्रीय गुंबद, बाहरी दीवारें, पोर्च और विशाल आंगन के फर्श के लिए पत्थर का ही उपयोग किया गया है।

ब्रिटिश काल में इस विवादित मस्जिद को लेकर पुरातत्वविदों की क्या राय थी, आयोग ने इसे भी दर्ज किया है। ऐसा इसलिए क्योंकि हरि मंदिर-जामा मस्जिद को लेकर तब भी मुकदमेबाजी हुई थी। इसी सिलसिले में साल 1874 में कार्लाइल (Archibald Campbell Carlleyle) नाम के एक पुरातत्वविद ने इस मस्जिद का निरीक्षण किया था।

निरीक्षण के बाद कार्लाइल ने यह निष्कर्ष निकाला था कि मस्जिद का मुख्य गुंबद हिंदू कारीगरी का है, लेकिन उसके साइड से बने स्ट्रक्चर में छोटी मुसलमानी ईंटों का काम है। तब कार्लाइल ने यह भी लिखा था कि मस्जिद का पूरा हिस्सा प्लास्टर से ढका हुआ है, इसलिए उसके अंदर की सामग्री का पता लगाना असंभव है। उन्होंने यह भी नोट किया था कि मस्जिद की दीवारों पर दर्ज पुरानी लिखावटें ऑरिजिनल नहीं हैं बल्कि इसके मूल स्वरूप के साथ छेड़छाड़ कर साजिश के तहत, फर्जीवाड़ा करके बाद में लिखा गया है।

अंत में कार्लाइल ने अपना निष्कर्ष लिखा था कि मंदिर को मस्जिद में परिवर्तित हाल में किया गया है। साथ ही यह भी लिखा था कि मस्जिद का इतिहास जो भी हो, पूर्व में हिंदू अधिग्रहण के कई निशान इस मस्जिद में अभी भी मौजूद हैं।

पुरातत्व विभाग के डायरेक्टर जनरल एलेक्जेंडर कनिंघम ने हालाँकि कार्लाइल के तर्क को खारिज कर दिया था। यह कुछ-कुछ ऐसा ही हुआ कि फील्ड से लाए गए डेटा को एसी कमरे में बैठे-बैठे खारिज करना। वैसे भी टॉप पर बैठा कोई ब्रिटिश अधिकारी यह क्यों चाहता कि किसी मस्जिद के नाम पर हिंदू-मुस्लिम में अगर तनाव हो तो उसका हल खोजा जाए, इससे तो उनकी ‘फूट डालो, शासन करो’ की नीति ही समाप्त हो जाती।

अब जरा नजर डालते हैं इतिहासकारों ने क्या लिखा है संभल जामा मस्जिद को लेकर। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इस संदर्भ को भी डाला है, जो बहुत जरूरी था। रिपोर्ट के अनुसार भारत के जाने-माने इतिहासकारों ने आइन-ए-अकबरी और बाबरनामा किताबों के आधार पर बताया है कि विवादित स्मारक हरिहर मंदिर के खंडहरों पर साल 1526 में बाबर के आदेश पर हिंदूबेग नाम के शख्स ने बनवाया था। यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि बाबरनामा और आइन-ए-अकबरी किसी हिंदू इतिहासकार ने नहीं लिखी थी। बाबरनामा बाबर की आत्मकथा है जिसे खुद बाबर ने लिखा था और आइन-ए-अकबरी के लेखक अबुल फ़ज़ल हैं।

इन इतिहासकारों ने जो इतिहास दर्ज किया है, उससे भी ब्रिटिश पुरातत्वविद कार्लाइल द्वारा दिए गए निष्कर्ष को बल मिलता है कि मंदिर को मस्जिद में परिवर्तित किया गया था।

‘यहाँ मस्जिद थी, है और रहेगी’: संभल दंगे की न्यायिक जाँच आयोग रिपोर्ट में सपा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क का जिक्र 100+ बार, 199 साक्षियों से पूछताछ, खुद के बयान भी विरोधाभासी

“यहाँ मस्जिद थी, है और रहेगी” – यह कहा था समाजवादी पार्टी के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क ने। और यह कहा गया था उत्तर प्रदेश के संभल में जमा हुई मुस्लिम भीड़ के सामने। फिर यही भीड़ 24 नवंबर 2024 को दंगा करती है। भीड़ के निशाने पर होती है संभल की शाही जामा मस्जिद का सर्वे करने गई टीम। इस टीम में पुलिस-प्रशासन-न्यायालय के लोग थे। और इनको यह काम सौंपा था कोर्ट ने। ताकि पता लगाया जा सके कि मस्जिद के भीतर मंदिर के अवशेष हैं या नहीं। लेकिन इस सरकारी काम के आड़े आ गया एक सांसद और भीड़ को उकसाने के लिए दिया गया उसका नारा – “यहाँ मस्जिद थी, है और रहेगी।” अब जब संभल दंगों की न्यायिक जाँच आयोग की रिपोर्ट आई है तो सांसद जिया-उर-रहमान बर्क का इसमें 100 बार से भी अधिक जिक्र (PDF पेज 3 से लेकर PDF पेज 365 तक) किया गया है।

संभल दंगों की जाँच को लेकर न्यायिक जाँच आयोग की रिपोर्ट (हिंदी वाली) कुल 369 PDF पेज की है। 100 से ज्यादा बार सपा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क का नाम इसी रिपोर्ट में दर्ज है। और यह हवा-हवाई नहीं है। सिर्फ पुलिस या प्रशासन के लोगों द्वारा लगाए गए आरोप नहीं हैं। प्रत्यक्षदर्शियों और गवाहों के आधार पर इनका नाम लिखा गया है। वीडियो, ऑडियो, डिजिटल हिस्ट्री, वॉट्सऐप चैट्स, इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट सहित राष्ट्रीय व स्थानीय मीडिया कवरेज जैसे तमाम सबूतों के साथ सांसद महोदय का नाम दर्ज किया गया है।

रिपोर्ट की शुरुआत होती है 3 पन्नों की प्रस्तावना से। प्रस्तावना के पॉइंट 5 में यह स्पष्ट लिख दिया गया है कि कैसे जिया-उर-रहमान बर्क और इनके समर्थकों के कारण 19 नवंबर 2024 को संभल स्थित शाही जामा मस्जिद का सर्वे पूरा नहीं किया जा सका। मतलब यह रिपोर्ट शुरू भी होती है बर्क से और अंत भी इसी नाम के साथ।

24 नवंबर 2024 को दंगा… षड्यंत्र रचा था 19 नवंबर को ही

19 नवंबर 2024 को मंगलवार था। तिथि के साथ-साथ दिन भी जरूरी है, यह थोड़ी देर में स्पष्ट हो जाएगा। मंगलवार को सबको सूचित (संभल स्थित जामा मस्जिद की प्रबंध समिति और उनके अध्यक्ष तक को) करके मस्जिद का सर्वे करने जाती है टीम। साथ में पुलिस-प्रशासन भी, कवरेज के लिए मीडिया भी। इससे पहले कि सर्वे पूरा होता, भारी संख्या में मुस्लिम भीड़ मस्जिद को चारों तरफ से घेर चुकी थी। संभल के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क भी अपने समर्थकों की भीड़ लेकर मस्जिद पहुँच गए थे। माहौल तनावपूर्ण हो गया था। शाम में रोशनी की कमी और अनियंत्रित भीड़ के बढ़ते दबाव के कारण सर्वे उस दिन स्थगित करना पड़ा।

3 दिन के बाद आया 22 नवंबर 2024। दिन शुक्रवार। मतलब जुम्मे की नमाज। मुस्लिमों को तब तक भड़काया जा चुका था। संभल जामा मस्जिद के अंदर और उसके आसपास माहौल तनावपूर्ण था। हर शुक्रवार को जितने नमाजी इस मस्जिद में आते थे, उससे कहीं अधिक और असामान्य भीड़ इस दिन नमाज के लिए जमा थी। इसी भीड़ में संभल के सांसद भी थे, मतलब जिया-उर-रहमान बर्क। इन सबको देखते हुए, कानून और शांति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए बड़ी संख्या में पुलिस बल को तैनात किया गया था। कायदे से होना यह चाहिए था कि एक नेता के तौर पर बर्क को पुलिस-प्रशासन का साथ देना चाहिए था, भीड़ के गुस्से को दूर करने का प्रयास किया जाता… लेकिन किया गया ठीक इसके उल्टा।

नमाज के बाद सपा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क ने मस्जिद से बाहर निकल कर मीडिया से बातचीत की। मस्जिद की सीढ़ियों पर खड़े होकर उन्होंने मीडिया के सवालों का जवाब देने के बहाने मुस्लिम भीड़ को संबोधित करते हुए कहा – “यहाँ मस्जिद थी, है और रहेगी।” इस भड़काऊ भाषण से भीड़ को स्पष्ट दिशा-निर्देश मिल गया – जामा मस्जिद का जब भी शेष सर्वे किया जाएगा, उसके लिए तैयार रहो। ठीक 2 दिन बाद भीड़ ने वैसा ही सुलूक किया, जिस अंदाज में सांसद ने भड़काया था।

23 नवंबर को सपा सांसद की राजनीतिक हार, 24 नवंबर को संभल में दंगा

22 नवंबर के ठीक एक दिन बाद 23 नवंबर 2024 को एक और घटना हुई, जो सपा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क से संबंधित थी। इस घटना का जामा मस्जिद से कोई लेना-देना नहीं था लेकिन इसने बर्क के समर्थकों के लिए आग में घी का काम किया।

सांसद बनने से पहले बर्क कुंदरकी विधानसभा के विधायक थे। यहाँ उपचुनाव करवाना पड़ा था क्योंकि विधायक रहते हुए इन्होंने सांसदी का चुनाव लड़ा था, जीता था। उपचुनाव में भाजपा के उम्मीदवार से समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी बुरी तरह हार गए और यह नतीजा आया था 23 नवंबर 2024 को। मतलब एक दिन पहले सांसद बर्क ने मुस्लिमों का रहनुमा बन कर उनको जामा मस्जिद के सर्वे के खिलाफ भड़काया, दूसरे ही दिन एक तरह से उनको और उनकी समाजवादी पार्टी को राजनीतिक हार का सामना करना पड़ा।

जामा मस्जिद के सर्वेक्षण हेतु नियुक्त कमिश्नर रमेश सिंह राघव ने शेष सर्वे के काम को संपन्न करने के लिए संभल के जिलाधिकारी (डीएम) से 23 नवंबर 2024 को अनुमति माँगी। 4 दिन पहले 19 नवंबर को सर्वे के दौरान जिस तरह की परिस्थितियाँ उत्पन्न हुई थीं, उनको ध्यान में रखते हुए उचित पुलिस व्यवस्था का अनुरोध भी उन्होंने किया। प्रशासन की तरफ से शेष सर्वे की अनुमति मिली, दिन तय हुआ – 24 नवंबर का। इसके बाद 23 नवंबर की रात को ही संभल के एसडीएम/सीओ ने जामा मस्जिद के अध्यक्ष और एडवोकेट जफर अली को इसकी सूचना दे दी थी, ताकि वो मस्जिद प्रबंध समिति के साथ शेष सर्वे के वक्त मौजूद रहें, भीड़ को नियंत्रित करें। संभल के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क को भी सूचित किया गया था, जो उस समय बेंगलुरु में थे। संभल के विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल के साथ-साथ मस्जिद समिति के अन्य सदस्यों को भी रात में ही सूचित कर दिया गया था।

भीड़ नियंत्रण के लिए संवेदनशील स्थानों पर बैरिकेडिंग, पैरा-मिलिट्री कंपनियों की तैनाती, जामा मस्जिद में खुद संभल के डीएम-एसपी की मौजूदगी – मतलब पुलिस-प्रशासन ने भी शेष सर्वे के लिए हर संभव तैयारियाँ की थीं। लेकिन जैसे ही सर्वे शुरू हुआ, मजहबी नारों के साथ मुस्लिम भीड़ ने मस्जिद को घेर लिया। पथराव की शुरुआत के साथ भीड़ धीरे-धीरे और हिंसक होती चली गई। कई वाहनों में दंगाई भीड़ ने आग लगा दी। कुछ जगहों पर पुलिस दल पर हमला किया गया, उनके सरकारी हथियार छीन लिए गए। पत्थरबाजी के कारण कई पुलिस अधिकारी और जवान गंभीर रूप से घायल भी हुए। आत्मरक्षा में पुलिस ने भी लाठीचार्ज किया, आँसू गैस, मिर्च बम और रबड़ की गोलियों का इस्तेमाल किया गया।

इस बीच सर्वे टीम को सर्वेक्षण पूरा करने के बाद जामा मस्जिद से सुरक्षित निकाल कर संभल पुलिस स्टेशन तक हिंदू मोहल्ले के रास्ते बचते-बचाते लाया गया। पुलिस-प्रशासन की मुस्तैदी और पर्याप्त बैरिकेडिंग के कारण दंगाई हिंदू मोहल्ले में प्रवेश नहीं कर पाए। इससे दंगा जामा मस्जिद के आसपास ही सीमित रहा, नियंत्रित कर लिया गया। हालाँकि दंगाइयों ने 4 लोगों (अयान, नईम, बिलाल, मोहम्मद कैफ) को मार डाला। इस दंगे से संबंधित कुल 12 FIR संभल कोतवाली और नखासा पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई है, जसमें 7 पुलिस की और से है, जबकि 5 अन्य निजी व्यक्तियों द्वारा दर्ज करवाई गई है।

जिया-उर-रहमान बर्क के भड़काऊ भाषण/धमकी

1.
“यह मस्जिद है, मस्जिद थी, और मस्जिद रहेगी। कोई भी हमारी मस्जिद हमसे नहीं ले सकता।”

2.
“मस्जिद थी, मस्जिद है, और मस्जिद रहेगी, कयामत तक।”

3.
“जैसे अयोध्या में हमारी मस्जिद छीनी गई, वैसे ही इसे नहीं छीनने देंगे।”

4.
“पुलिस कितने ही ड्रोन तैनात कर ले, मस्जिद थी, है, और रहेगी, और हमें इसे हर हाल में बचाना है।”

5.
“जामा मस्जिद हमारी है, हमारी रहेगी, कोई इसे छीन नहीं सकता, हम इसे बचाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।”

6.
“आप बाहरी लोग, मस्जिद के अंदर कैसे आए? आप संभल का माहौल खराब करना चाहते हैं।”

7.
“जो भी तमाशा करना चाहते हो, 10 मिनट में खत्म करो, वरना स्थिति ऐसी हो जाएगी कि तुम संभाल नहीं पाओगे।”

8.
“हम पुलिस, प्रशासन या सरकार से डरने वाले नहीं हैं। हम इस देश के मालिक हैं, नौकर या गुलाम नहीं।”

9.
“हमारा कर्तव्य है कि हम अपने धर्म का पालन करें और अपने धार्मिक स्थलों की रक्षा करें। जिस तरह से यहाँ संविधान का गला घोंटा जा रहा है, जिस तरह सरकार संविधान को तार-तार कर रही है; हम इस मस्जिद के लिए लड़ने के लिए तैयार हैं। इंशाल्लाह, हम हमेशा जामा मस्जिद की हर तरह से रक्षा करने के लिए मौजूद रहेंगे। हम 1947 से पहले हमारे राज्य और देश में मौजूद धार्मिक स्थलों और मस्जिदों को किसी को लेने नहीं देंगे।”

10.
“बाहरी लोगों ने सर्वे के लिए याचिका दायर की थी और कोर्ट ने आदेश पारित किया था। यह हमारा अधिकार है कि हम कोर्ट के आदेश से संतुष्ट हैं या इसका विरोध करते हैं। लाखों मुस्लिम यहाँ इकट्ठा होना चाहते थे। मैं सर्वे के खिलाफ हूँ। यह मस्जिद थी, मस्जिद है और मस्जिद रहेगी।”

11.
“जिन लोगों ने सर्वे याचिका दायर की, वे शरारती तत्व हैं। मैं कोर्ट के आदेश से संतुष्ट नहीं हूँ। मैं खुलकर पुलिस प्रशासन को बताता हूँ कि भले ही वे यहाँ दस ड्रोन कैमरे लाएँ, यह मस्जिद है, मस्जिद थी और कयामत के दिन तक मस्जिद रहेगी। यह मस्जिद किसी धार्मिक स्थल को तोड़कर नहीं बनाई गई थी। इस्लाम सिखाता है कि किसी मुस्लिम की सहमति के बिना भी उसकी जमीन पर जबरदस्ती धार्मिक स्थान नहीं बनाया जा सकता, किसी अन्य धार्मिक स्थल की तो बात ही छोड़ दें। हम पुलिस प्रशासन या सरकार द्वारा दबाए नहीं जाएँगे। हम इस देश के मालिक हैं, गुलाम या नौकर नहीं। संविधान का गला घोंटा जा रहा है; इसकी पवित्रता को तार-तार किया जा रहा है। हम अपनी जामा मस्जिद को कानूनी रूप से बचाएँगे और इंशा अल्लाह, इसे सुरक्षित रखने के लिए हर जरूरी काम करेंगे। हम सभी हमेशा जामा मस्जिद की रक्षा के लिए हर तरह से प्रतिबद्ध रहे हैं और रहेंगे। यह मस्जिद 1947 से पहले की है और हम इसे किसी को छीनने नहीं देंगे।”

24 नवंबर 2024 को संभल में हुआ दंगा सुनियोजित था। विवादित जामा मस्जिद के सर्वेक्षण को लेकर कोर्ट के आदेश के बावजूद समाजवादी पार्टी के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क ने इसके लिए साजिश रची थी। भड़काऊ भाषण, मजहबी नारों आदि से उन्होंने मुस्लिम समुदाय के लोगों को इसके लिए उकसाया था। इस संदर्भ में तमाम गवाहों और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों के आधार पर उनके खिलाफ FIR भी दर्ज किया गया है:
– अपराध संख्या 335/2024 (थाना: संभल, जिला संभल): स्टेट बनाम जियाउर रहमान बर्क और एक अन्य नामजद, साथ ही 700-800 अज्ञात व्यक्ति
– इस मामले में 23 आरोपितों के खिलाफ चार्ज-शीट नंबर 96/2025 न्यायालय में प्रस्तुत किया जा चुका है, शेष आरोपितों के खिलाफ जाँच जारी है।

सपा सांसद बर्क के विरोधाभासी बयान

संभल दंगों की न्यायिक जाँच आयोग के समक्ष स्थानीय सांसद जिया-उर-रहमान बर्क ने भी अपनी गवाही दी है। पूरी गवाही में उन्होंने खुद को पाक-साफ दिखाने की कोशिश की है। अपने ऊपर लगे किसी भी तरह के आरोपों से इनकार किया है। लेकिन कुछ तथ्य और गवाह ऐसे हैं, जो सांसद द्वारा दी गई गवाही से विरोधाभास रखते हैं।

(i) सांसद बर्क के अनुसार वो 19 नवंबर 2024 को सर्वे के दौरान अकेले जामा मस्जिद में प्रवेश किए, समर्थकों के बिना। पुलिस-प्रशासन से जुड़े 10 लोगों की गवाही इससे विपरीत है। कोर्ट कमिश्नर और उनके कैमरामैन की गवाही में भी यह बात स्पष्ट है कि सांसद भीड़ के साथ मस्जिद में घुसे। वादी पक्ष के अधिवक्ताओं, सरकारी अधिवक्ताओं के साथ-साथ महंत श्री ऋषिराज गिरी ने भी सांसद को भीड़ के साथ मस्जिद में प्रवेश करने की गवाही दी है। सबसे दिलचस्प है जामा मस्जिद प्रबंधन समिति के अध्यक्ष जफर अली की गवाही। इन्होंने भी आयोग को बताया है कि 19 नवंबर को सांसद जिया-उर-रहमान बर्क अपने समर्थकों के साथ मस्जिद में आए।

(ii) सांसद बर्क ने आयोग को बताया कि 19 नवंबर 2024 को उन्होंने मीडिया से बात की, ऐसा उन्हें याद नहीं। जब उन्हें वीडियो रिकॉर्डिंग दिखाई गई, तब उन्होंने इस बात को स्वीकार किया। आश्चर्यजनक यह है कि स्थानीय सांसद के अलावा जितने भी लोगों ने (मस्जिद समिति के लोगों ने भी) आयोग के सामने अपने बयान दर्ज करवाए, सबने बर्क द्वारा मीडिया से बात करने वाली बात बताई – यहाँ तक की जामा मस्जिद प्रबंधन समिति के अध्यक्ष जफर अली ने भी।

(iii) ‘मन्नत’ वॉट्सऐप ग्रुप और ‘संभल सांसद’ वॉट्सऐप ग्रुप में भेजे गए मैसेज (22 नवंबर को जुमे की नमाज के लिए जामा मस्जिद में ज्यादा से ज्यादा लोग पहुँचे, किसी और मस्जिद न जाएँ) के बारे में सांसद बर्क ने कहा कि वो जनप्रतिनिधि हैं, इसलिए ऐसे ग्रुपों को छोड़ नहीं सकते लेकिन ऐसा कोई भी मैसेज उन्होंने पढ़ा नहीं है।

(iv) 22 नवंबर 2024 के बारे में सांसद बर्क ने कहा कि उस दिन जुमे की नमाज के बाद उन्होंने कोई भाषण नहीं दिया था बल्कि वहाँ मौजूद मीडिया के सवालों का सिर्फ जवाब दिया था। अगर ये भाषणबाजी नहीं कर रहे थे, भीड़ को उकसा नहीं रहे थे, तो जामा मस्जिद प्रबंधन समिति के अध्यक्ष जफर अली को अपनी गवाही में यह क्यों कहना पड़ा – “जब सांसद बर्क नमाजियों को संबोधित कर रहे थे, तब उनको चुप करवाने की कोशिश भी की थी। कहा था, “बस, कृपया रूकें।” लेकिन सांसद बर्क ने अनसुना कर दिया, बोलना जारी रखा।”

इसके अलावा मशहूद अली फारूकी, जो जामा मस्जिद प्रबंधन समिति के सदस्य और अधिवक्ता हैं, उन्होंने अपनी गवाही में यह क्यों लिखवाया – “22 नवंबर 2024 को जुमे की नमाज के बाद सांसद बर्क ने मस्जिद की सीढ़ियों पर से मीडिया को संबोधित किया था। मस्जिद की सीढ़ियों से राजनीतिक बयान या प्रेस कॉन्फ्रेंस अनुचित था।”

सांसद बर्क मीडिया द्वारा पूछे गए सवालों का सिर्फ जवाब दे रहे थे, आयोग ने इसके विपक्ष में उन्हें एक वीडियो क्लिप दिखाई। यह वीडियो 22 नवंबर को ही इंडिया टीवी पर प्रसारित की गई थी। इस क्लिप में वहाँ मौजूद मीडिया कोई भी सवाल नहीं कर रही थी, केवल सांसद बोल रहे थे.

(v) 24 नवंबर को जामा मस्जिद का शेष सर्वेक्षण होगा, इसकी जानकारी सांसद बर्क को मस्जिद समिति के अध्यक्ष जफर अली ने फोन पर दी। आयोग के सामने इस बात पर सांसद ने सहमति जताई। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि इसी सांसद बर्क ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक शपथ-पत्र दायर किया था, जिसमें कहा गया था – “24 नवंबर 2024 को जामा मस्जिद का शेष सर्वे होना है, इसकी जानकारी सांसद बर्क को नहीं थी।”

(vi) सांसद बर्क ने जफर अली से 23-24 नवंबर 2024 की रात कई बार बात की, इस तथ्य से सांसद ने इनकार किया। जबकि विरोधाभास यह है कि सांसद बर्क ने 23 नवंबर की रात 11:04 बजे जफर अली को कॉल किया। फिर सांसद बर्क से जफर अली को रात 12:32 बजे और 01:48 बजे कॉल प्राप्त हुई है। इसमें भीड़ एकत्र करने और सर्वेक्षण को हर हाल में रोकने की योजना बनाई गई, किसी भी स्थिति से निपटने की तैयारी की गई। यह सब कुछ CDR में दर्ज है, वॉट्सऐप कॉल इंटरेक्शन भी।

संभल सांसद जिया-उर-रहमान बर्क के खिलाफ गवाही

गवाह नंबर 1 – जिला मजिस्ट्रेट संभल, डॉ राजेंद्र पेंसिया:

सपा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क की संलिप्तता (भीड़ को उकसाना, मस्जिद के भीतर जबरन घुसना और सर्वे करने गई टीम को धमकाना) को लेकर आयोग की रिपोर्ट में सबसे पहली गवाही संभल जिला मजिस्ट्रेट डॉ राजेंद्र पेंसिया की है। इनके अनुसार 19 नवंबर 2024 को सांसद बर्क ने स्थानीय विधायक के बेटे (सुहेल इकबाल) के साथ 200 लोगों की भीड़ का नेतृत्व किया, पुलिस को धक्का देकर जबरन मस्जिद में प्रवेश किया। इन लोगों ने सर्वे को बाधित किया और धमकियाँ भी दीं।

जिले में धारा 163 (BNSS) लागू होने के बावजूद 3 दिन बाद 22 नवंबर को सांसद बर्क ने बिना प्रशासनिक अनुमति के विवादित जामा मस्जिद में भीड़ जमा की, प्रेस कॉन्फ्रेस आयोजित की, कोर्ट के आदेश पर असहमति जताई, विशेष समुदाय (मुस्लिम) को एकजुट होने और जामा मस्जिद की रक्षा के लिए भड़काऊ बयान दिया।

23 नवंबर 2024 को कुंदरकी उप-चुनाव में जब समाजवादी पार्टी का प्रत्याशी हार गया तो सांसद बर्क ने इसके लिए भी पुलिस-प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया, “उत्तर प्रदेश में संविधान की हत्या” जैसे शब्दों की प्रयोग कर अपने समर्थकों को भड़काया, हिंसा के लिए अनुकूल वातावरण बनाया।

गवाह नंबर 2 – अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट संभल, प्रदीप वर्मा:

19 नवंबर की शाम 6:00 बजे के आसपास सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और संभल के विधायक महमूद इकबाल के बेटे सुहेल इकबाल लगभग 200 अन्य व्यक्तियों के साथ जामा मस्जिद के अंदर मौजूद थे। जन प्रतिनिधियों और अन्य उपस्थित व्यक्तियों ने बार-बार सर्वेक्षण प्रक्रिया में बाधा डाली और धमकियाँ दीं। इतने सारे लोगों की उपस्थिति के कारण सर्वेक्षण सुचारू रूप से नहीं हो सका।

गवाह नंबर 3 – उप-जिलाधिकारी संभल, डॉ वंदना मिश्रा:

19 नवंबर की शाम 6:00 बजे के आसपास सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और संभल के विधायक महमूद इकबाल के बेटे सुहेल इकबाल लगभग 200 अन्य व्यक्तियों के साथ जामा मस्जिद के अंदर मौजूद थे। जन प्रतिनिधियों और अन्य उपस्थित व्यक्तियों ने बार-बार सर्वेक्षण प्रक्रिया में बाधा डाली और धमकियाँ दीं। इतने सारे लोगों की उपस्थिति के कारण सर्वेक्षण सुचारू रूप से नहीं हो सका।

22 नवंबर को सांसद बर्क ने बिना प्रशासनिक अनुमति के विवादित जामा मस्जिद में भीड़ जमा की, प्रेस कॉन्फ्रेस आयोजित की, कोर्ट के आदेश पर असहमति जताई। साथ ही विशेष समुदाय (मुस्लिम) को एकजुट होने और जामा मस्जिद की रक्षा के लिए एकत्र होने का भड़काऊ बयान दिया।

यह सब कुछ संभल की उप-जिलाधिकारी डॉ वंदना मिश्रा की आँखों के सामने हुआ क्योंकि उस दिन शुक्रवार की नमाज को शांतिपूर्वक कराने की प्रशासनिक जिम्मेदारी इनको दी गई थी। इनके अनुसार सांसद बर्क ने 22 नवंबर को एक नहीं बल्कि 2 बार प्रेस से बात की – एक बार मस्जिद की सीढ़ियों पर, दूसरी बार अपनी गाड़ी के पास पहुँच कर। इन्होंने मामला अदालत में लंबित होने के कारण सांसद से किसी भी तरह की टिप्पणी नहीं करने का 3 बार अनुरोध भी किया, लेकिन वो नहीं माने।

संभल की उप-जिलाधिकारी वंदना मिश्रा के अनुसार पूरी घटना पूर्व-नियोजित थी। इसका उद्देश्य शहर में भय का माहौल बनाना और सर्वेक्षण टीम को अपना काम पूरा करने से रोकना था। साथ ही भविष्य में भी ऐसी किसी टीम को किसी भी तरह के सर्वेक्षण करने से रोकना था।

गवाह नंबर 4 – अधिशासी अधिकारी, संभल नगर पालिका, मणिभूषण तिवारी:

मणिभूषण तिवारी संभल के जिलाधिकारी द्वारा गठित 3 सदस्यीय समिति में थे। 19 नवंबर को जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान इनकी मौजूदगी में सांसद, विधायक के बेटे (सुहेल इकबाल)ने सर्वेक्षण कार्य में बाधा पहुँचाई। 24 नवंबर के दंगों के बाद की स्थिति (पत्थरबाजी के कारण) ऐसी थी कि नगर पालिका की टीम को मलबा हटाने में 4-5 दिन लग गए। कुल 6 ट्रॉली ईंट-पत्थर-मलबा हटवाया गया।

गवाह नंबर 5 – संभल पुलिस अधीक्षक, कृष्ण कुमार:

19 नवंबर को जामा मस्जिद का सर्वेक्षण करने जब सर्वे टीम पहुँची, तो संभल विधायक के बेटे सुहेल इकबाल अपने 200 समर्थकों के साथ मस्जिद में मौजूद थे। इसके 30 मिनट के बाद सांसद जिया-उर-रहमान बर्क भी अपने समर्थकों के साथ पहुँच गए। उन्हें धारा 163 BNSS के बारे में सूचित किया गया, लेकिन उन्होंने इसे नजरअंदाज कर दिया और 10-15 समर्थकों के साथ जबरन मस्जिद में प्रवेश किया। उन्होंने सर्वे टीम से कहा – “आप बाहरी लोग, मस्जिद के अंदर कैसे आए? आप संभल का माहौल खराब करना चाहते हैं।”

जन प्रतिनिधियों और अन्य उपस्थित व्यक्तियों ने बार-बार सर्वेक्षण प्रक्रिया में बाधा डाली और धमकियाँ दीं। शाम के वक्त अंधेरा होने और बार-बार व्यवधान के कारण सर्वे का काम उस दिन स्थगित कर दिया गया। इसके बाद जिला मजिस्ट्रेट ने पत्रकारों को सर्वेक्षण की जानकारी दी। सांसद बर्क ने भी इस समय मीडिया से बातचीत की। भीड़ एकत्र करके सर्वे को सफलतापूर्वक बाधित करने के बाद सांसद बर्क और मस्जिद समिति का आत्मविश्वास बढ़ा। इसी आत्मविश्वास के कारण इन लोगों ने आगे की साजिश रची।

जिले में धारा 163 BNSS लागू थी। इसके बावजदू 21 नवंबर को ‘संभल सांसद’ के नाम से बने वॉट्सऐप ग्रुप में अब्दुल्ला और कासिफ हुसैन नाम के दो व्यक्तियों ने एक मैसेज भेजा, जिसमें लिखा था – “संभल के सभी लोग शुक्रवार की नमाज शाही जामा मस्जिद में बड़ी संख्या में अदा करें और शाही जामा मस्जिद के पास की मस्जिदों में नहीं। केवल शाही जामा मस्जिद में नमाज अदा करें, और इस संदेश को यथासंभव साझा करें।” इसी तरह का मैसेज ‘मन्नत’ नामक एक वॉट्सऐप ग्रुप के माध्यम से किया गया ताकि शुक्रवार की नमाज के लिए शाही जामा मस्जिद में बड़ी भीड़ एकत्र हो।

22 नवंबर को जामा मस्जिद में भीड़ को सुनियोजित ढंग से एकत्रित किया गया। सांसद बर्क और संभल विधायक का घर जामा मस्जिद से 2 किलोमीटर दूर है, वो आमतौर पर अपने-अपने क्षेत्र की मस्जिदों में नमाज अदा करते हैं लेकिन 22 नवंबर (शुक्रवार) को सांसद बर्क के साथ-साथ संभल विधायक के बेटे सुहेल इकबाल ने अपने क्षेत्र की मस्जिदों में नमाज अदा करने के बजाय जामा मस्जिद आकर नमाज पढ़ी। इतना ही नहीं, सांसद बर्क ने धारा 163 BNSS का उल्लंघन करते हुए मजहबी भावनाओं को भड़का कर भीड़ को उकसाया भी। साथ ही प्रेस कॉन्फ्रेस भी आयोजित की। मीडिया को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा – “यह मस्जिद है, मस्जिद थी, और मस्जिद रहेगी। कोई भी हमारी मस्जिद हमसे नहीं ले सकता।”

इन उकसाने वाले बयानों को समर्थकों ने वॉट्सऐप ग्रुपों और अन्य माध्यमों से प्रसारित किया ताकि लोगों को भड़काया जा सके। ऐसा सुनिश्चित करने के लिए किया गया कि यदि सर्वेक्षण फिर से शुरू हुआ तो इसे किसी भी कीमत पर रोका जाए। राजनीतिक लाभ के इरादे से उन्होंने सार्वजनिक तौर पर न्यायालय के आदेश से असहमति भी व्यक्त की, साथ ही समुदाय विशेष (मुस्लिमों) को इसके लिए उकसाया भी।

प्रेस को संबोधित करते हुए सांसद बर्क ने भड़काऊ भाषण भी दिया। इस भाषण से वहाँ खड़ी भीड़ को यह संदेश गया कि सर्वेक्षण के माध्यम से जामा मस्जिद को हड़पने की कोशिश की जा रही है। इसके फलस्वरूप 24 नवंबर 2024 को सर्वे के दौरान हिंसक घटनाएँ हुईं। 22 नवंबर को सांसद बर्क के कार्यों के संबंध में 23 नवंबर को धारा 168 BNSS के तहत एक नोटिस भी जारी किया गया।

23 नवंबर को कुंदरकी उप-चुनाव के परिणाम घोषित हुए। यहाँ से जिया-उर-रहमान बर्क पहले विधायक थे, जो सीट उनके सांसद बनने के बाद खाली हो गई थी। समाजवादी पार्टी इस सीट पर हार गई, निश्चित ही यह चुनाव परिणाम सांसद बर्क की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं थे। इस बात को लेकर भी उन्होंने पुलिस और प्रशासन को हार के लिए दोषी ठहराया और उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए।

24 नवंबर को जामा मस्जिद का शेष सर्वेक्षण फिर से शुरू किया जाएगा, इसकी सूचना 23 नवंबर की शाम को मस्जिद के अध्यक्ष जफर अली को उनके निवास पर दी गई। इसके बाद जफर अली ने 23 नवंबर की रात 10:01 बजे 38 सेकंड की कॉल के माध्यम से सांसद बर्क को सर्वेक्षण के बारे में सूचित किया, यह जफर अली के CDR में दर्ज है। बाद में रात 11:04 बजे सांसद बर्क ने जफर अली को कॉल-बैक किया, यह भी CDR में दर्ज है। चूँकि सांसद बर्क संभल में मौजूद नहीं थे, ऐसे में उन्होंने जफर अली को भीड़ एकत्र करने की जिम्मेदारी सौंपी, जो अपनी स्थिति के कारण कम समय में बड़ी भीड़ जुटा सकते थे।

सांसद बर्क के निर्देशों का पालन करते हुए जफर अली ने आधी रात को सुहेल इकबाल (जामा मस्जिद इंतजामिया कमेटी के कैशियर और संभल के विधायक के बेटे) के निवास पर अन्य कमेटी सदस्यों के साथ एक बैठक की, जिसमें सर्वेक्षण और सांसद बर्क के निर्देशों के बारे में जानकारी दी गई। इसके बाद सांसद बर्क से जफर अली को 24 नवंबर की रात 12:32 बजे और 01:48 बजे कॉल प्राप्त हुईं, जिनमें भीड़ एकत्र करने और सर्वेक्षण को हर हाल में रोकने की योजना बनाई गई, किसी भी स्थिति से निपटने की तैयारी की गई। वॉट्सऐप कॉल इंटरेक्शन भी CDR में दर्ज है।

“24 नवंबर 2024 को जामा मस्जिद का शेष सर्वे होना है, इसकी जानकारी सांसद बर्क को नहीं थी।” – इलाहाबाद उच्च न्यायालय में सांसद बर्क ने यह जो शपथ-पत्र दायर किया है, वो पूरी तरह से असत्य है। पुलिस पर दबाव डालने, झूठे और गंभीर आरोप लगाते हुए 25 नवंबर को जफर अली ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की। इसमें उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ झूठे साक्ष्य गढ़े गए हैं। जबकि सत्य यह है कि सांसद जिया-उर-रहमान बर्क के साथ मिलकर जफर अली ने सर्वे को रोकने के लिए साजिश रची। इसके संबंध में संभल कोतवाली पुलिस स्टेशन में सांसद बर्क और सुहेल इकबाल के खिलाफ क्राइम नंबर 335/24 दर्ज किया गया है।

गवाह नंबर 6 – श्रीश्चंद, संभल अपर पुलिस अधीक्षक (उत्तरी):

19 नवंबर को सर्वेक्षण के दौरान सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और अन्य राजनीतिक हस्तियों के समर्थकों की भीड़ जामा मस्जिद के अंदर और बाहर एकत्र हुई। इन लोगों ने नारेबाजी और विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया। सर्वे के दौरान व्यवधान किए गए, इसलिए कार्यवाही पूरी नहीं हो सकी।

22 नवंबर को संभल सांसद ने बिना किसी प्रशासनिक अनुमति के (पहले से लागू धारा 163 BNSS का उल्लंघन करते हुए) दोपहर लगभग 1 बजे बड़ी संख्या में अपने समर्थकों के साथ जामा मस्जिद पहुँचे। सामान्य रूप से सांसद जामा मस्जिद में नमाज नहीं अदा करते और अपने क्षेत्र दीपा सराय में नमाज अदा करते हैं। नमाज के बाद उन्होंने जामा मस्जिद के मुख्य गेट की सीढ़ियों पर खड़े होकर प्रेस/मीडिया के व्यक्तियों को संबोधित किया। इस पर प्रशासन के अनुरोध के बावजूद उन्होंने अपना संबोधन जारी रखा, जिसमें उन्होंने कहा – “पुलिस कितने ही ड्रोन तैनात कर ले, मस्जिद थी, है, और रहेगी, और हमें इसे हर हाल में बचाना है।”

सांसद बर्क ने इसके अलावा खुद को सर्वेक्षण का कर्ताधर्ता बताते हुए यह भी घोषणा कर दी कि सर्वे में मस्जिद के अलावा कुछ नहीं मिला है। वहाँ मौजूद अधिकारियों ने सांसद को फिर से अनावश्यक भीड़ जमा करने से बचने का अनुरोध किया क्योंकि धारा 163 BNSS लागू थी, जिसके बाद वे पास के एक मैदान में चले गए और वहाँ जाकर एक और प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की। इस दौरान सांसद ने न्यायालय के आदेश से अपनी असहमति व्यक्त की और एक विशेष समुदाय (मुस्लिमों) को जामा मस्जिद की रक्षा के लिए एकजुट होने के लिए बोला। उन्होंने राजनीतिक लाभ के लिए भीड़ को उकसाया भी। परिणामस्वरूप संभल का माहौल संवेदनशील से अत्यधिक संवेदनशील हो गया। 22 नवंबर को सांसद के कृत्य को ध्यान में रखते हुए 23 नवंबर को धारा 168 BNSS के तहत एक नोटिस जारी किया गया।

23 नवंबर को कुंदरकी विधानसभा का उप-चुनाव का परिणाम घोषित किया गया। इसमें समाजवादी पार्टी ने वह सीट खो दी, जो पहले जिया उर रहमान बर्क के पास थी। उप-चुनाव की हार के जवाब में सांसद बर्क ने पुलिस और प्रशासन को दोष देना और उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाना जारी रखा। प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से उन्होंने “उत्तर प्रदेश में संविधान की हत्या कर दी गई है” जैसे बयानों का उपयोग किया, जिसने जनता को पुलिस और प्रशासन के खिलाफ भड़का कर हिंसा के लिए अनुकूल माहौल बनाया।

23 नवंबर की रात को सांसद बर्क दिल्ली और बाद में बेंगलुरु पहुँचे लेकिन अपने समर्थकों और जामा मस्जिद के अध्यक्ष जफर अली के साथ देर रात तक मोबाइल और वॉट्सऐप के माध्यम से संपर्क में रहे। हालाँकि उच्च न्यायालय (इलाहाबाद) में दायर एक रिट में उन्होंने दावा किया कि उन्हें 24 नवंबर को निर्धारित दूसरे सर्वेक्षण की कोई जानकारी नहीं थी और उन्होंने इस बारे में किसी से चर्चा नहीं की थी। जबकि सत्य यह है कि 23/24 नवंबर की रात को लगभग 12:00 बजे जामा मस्जिद के अध्यक्ष जफर अली के साथ उनकी वॉट्सऐप और नियमित कॉल्स हुई थीं।

स्थानीय नेताओं ने दंगों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जामा मस्जिद में उकसाने वाले भाषणों के माध्यम से दंगाइयों को भड़काया गया। मोबाइल फोन, मैसेज आदि के माध्यम से संदेश फैला कर भीड़ जमा की गई, दंगों के लिए अनुकूल माहौल बनाया गया। स्थानीय खुफिया इकाई (LIU) की जानकारी के अनुसार सांसद बर्क, विधायक इकबाल महमूद और मस्जिद समिति के अधिकारी जफर अली, लड्डन और आपराधिक तत्व इस मामले में सक्रिय रूप से शामिल थे और बाहरी लोगों को आश्रय दे रहे थे। राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कारण सांसद बर्क और विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल ने इस घटना में सक्रिय भूमिका निभाई और लोगों को उकसाया।

LIU की जानकारी से यह भी पता चला कि लोकसभा चुनावों के दौरान दोनों पक्षों (सांसद बर्क और विधायक इकबाल महमूद) ने अपने-अपने विवादों को सुलझा लिया था लेकिन यह स्पष्ट हुआ कि उन्होंने सतही रूप से सुलह की थी। जब जामा मस्जिद के सर्वे का मामला सामने आया तो इन दोनों ने अपने-अपने समूहों/समर्थकों को उकसा कर मुस्लिम हितों के बड़े रक्षक के तौर पर खुद को पेश किया, उनका मसीहा बनने की कोशिश की।

गवाह नंबर 7 – अनुज कुमार चौधरी, संभल सर्किल अधिकारी:

19 नवंबर को सर्वेक्षण लगभग डेढ़ घंटे तक चला। सर्वेक्षण के दौरान जामा मस्जिद परिसर और आसपास के क्षेत्रों में भीड़ एकत्र हो गई थी। भीड़ में सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और अन्य राजनीतिक हस्तियों के समर्थक शामिल थे। इन्होंने सर्वेक्षण के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी। यह पूर्व नियोजित प्रतीत हुआ, जिसमें विघटनकारी तत्व भीड़ को उकसा रहे थे, यह कहते हुए कि सर्वेक्षण टीम मस्जिद से नहीं हटेगी तो भीड़ वापस नहीं होगी। सर्वेक्षण में कई बार व्यवधान हुआ। राजनीतिक हस्तियों के हस्तक्षेप और विरोध के कारण सर्वेक्षण पूरा नहीं हो सका।

22 नवंबर को सांसद बर्क ने जिला प्रशासन की अनुमति के बिना और धारा 163 BNSS का उल्लंघन करते हुए मस्जिद में भीड़ एकत्र की और एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की। इसमें उन्होंने न्यायालय के आदेश से असहमति व्यक्त की। उन्होंने एक विशेष समुदाय (मुस्लिम) को जामा मस्जिद की रक्षा के लिए एकजुट होने का आह्वान यह कहते हुए किया, “मस्जिद थी, मस्जिद है, और मस्जिद रहेगी, कयामत तक।” सांसद बर्क के प्रेस कॉन्फ्रेंस से यह स्पष्ट था कि राजनीतिक लाभ के लिए माहौल को जानबूझ कर अस्थिर बनाया गया। सांसद बर्क, मस्जिद समिति, सुहेल इकबाल और असामाजिक तत्वों द्वारा रची गई साजिश के कारण दंगे हुए।

संभल दंगा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और अन्य लोगों द्वारा 19 नवंबर 2024 के न्यायालय के आदेश से नाराज होकर उकसाया गया था ताकि सर्वेक्षण को पूरा होने से रोका जाए। इसके लिए इन्होंने भीड़ को उकसाया, इसमें इनका राजनीतिक लाभ भी शामिल था। उन्होंने जिला पुलिस और प्रशासन की भूमिका और विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए।

23 नवंबर को कुंदरकी विधानसभा उप-चुनाव के परिणाम घोषित किए गए, जिसमें समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार हार गए। सांसद बर्क और समाजवादी पार्टी के समर्थकों ने हार के लिए पुलिस और प्रशासन को दोषी ठहराया और उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए। चुनावी हार और जामा मस्जिद सर्वेक्षण के चल रहे मुद्दे से नाराज समाजवादी पार्टी के समर्थकों और विघटनकारी तत्वों ने सर्वेक्षण को बाधित करने और इस मुद्दे को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ाने की योजना बनाई और संभल और अन्य क्षेत्रों से एक विशेष समुदाय (मुस्लिमों) के सदस्यों को नियोजित तरीके से आगामी सर्वेक्षण के दौरान जामा मस्जिद में एकत्र होने और अशांति पैदा करने के लिए बुलाया। इसके बाद सांसद बर्क ने पूर्व नियोजित तरीके से क्षेत्र छोड़ दिया।

गवाह नंबर 8 – अनुज कुमार तोमर, प्रभारी (कोतवाली संभल):

19 नवंबर को जामा मस्जिद सर्वेक्षण के दौरान कई व्यवधान हुआ क्योंकि सांसद जिया उर रहमान बर्क और अन्य राजनीतिक हस्तियों के समर्थकों सहित भारी भीड़ मस्जिद के अंदर और बाहर एकत्र हुई और सर्वेक्षण के खिलाफ नारेबाजी की। राजनीतिक हस्तियों की सक्रिय भागीदारी और विरोध के कारण उस दिन सर्वेक्षण पूरा नहीं हो सका।

21 नवंबर को ‘संभल सांसद’ नामक वॉट्सऐप ग्रुप में मैसेज भेजा गया कि शुक्रवार को अधिक से अधिक से लोग जामा मस्जिद में एकत्र हों। जुमे की नमाज के बाद सांसद बर्क ने प्रशासनिक अनुमति के बिना जामा मस्जिद के गेट पर भीड़ एकत्र कर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की। उन्होंने सर्वेक्षण के लिए न्यायालय के आदेश से असहमति व्यक्त करते हुए भाषण दिया, जिसमें मुस्लिम समुदाय को इसके संरक्षण के लिए एकजुट होने का आह्वान किया गया। उन्होंने अपने भाषण में कहा – “जामा मस्जिद हमारी है, हमारी रहेगी, कोई इसे छीन नहीं सकता, हम इसे बचाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।” स्थिति की गंभीरता को देखते हुए 23 नवंबर को सांसद बर्क को धारा 168 BNSS के तहत नोटिस जारी किया गया।

गवाह नंबर 9 – राजीव कुमार मलिक, इंस्पेक्टर-इन-चार्ज (कैला देवी पुलिस स्टेशन, संभल):

19 नवंबर को शाही जामा मस्जिद का सर्वे करने के लिए टीम पहुँची। इंस्पेक्टर राजीव कुमार मलिक की ड्यूटी मस्जिद के पास ढलान वाले बैरियर चौराहे पर कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए नियुक्त की गई थी। मस्जिद में प्रवेश करने से पहले सांसद जिया-उर-रहमान बर्क ने अपनी गाड़ी मस्जिद के पीछे ढलान वाले बैरियर चौराहे की सड़क पर पार्क की। उन्होंने सांसद बर्क को सूचित किया कि कोर्ट के आदेश के तहत सर्वे किया जा रहा है और उनकी उपस्थिति सर्वे के लिए आवश्यक नहीं है लेकिन उन्होंने इसकी परवाह नहीं की।

सांसद बर्क के साथ उनके 25-26 समर्थक भी थे। इन सब ने जबरदस्ती मस्जिद में प्रवेश करने की कोशिश की। जब इंस्पेक्टर ने उन्हें रोकने की कोशिश की, तो इन लोगों ने “अल्लाह-हु-अकबर” और “नारा-ए-तकबीर” जैसे मजहबी नारे लगाने शुरू कर दिए। सांसद ने तब इंस्पेक्टर को यह कहते हुए धमकी दी – “जैसे अयोध्या में हमारी मस्जिद छीनी गई, वैसे ही इसे नहीं छीनने देंगे।”

इसके बाद ये सभी लोग जबरदस्ती शाही जामा मस्जिद में प्रवेश कर गए। उन्होंने सर्वे टीम को सर्वे पूरा करने नहीं दिया। सांसद के विरोध के कारण सर्वे पूरा नहीं हो सका। 24 नवंबर को संभल में हुआ दंगा सांसद बर्क और उनके समर्थकों द्वारा आम लोगों को उकसाने के कारण हुआ। इन लोगों ने दंगों के लिए साजिश रची।

गवाह नंबर 10 – दीपक राठी, सब-इंस्पेक्टर (कोतवाली पुलिस स्टेशन, संभल)

विवादित जामा मस्जिद संभल के इसी कोतवाली पुलिस स्टेशन के अंतर्गत आता है। 19 नवंबर को शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान सांसद जिया उर रहमान बर्क के कारण उत्पन्न व्यवधान और अपर्याप्त प्रकाश के कारण सर्वे कार्यवाही पूरी नहीं हो सकी। सांसद अपने समर्थकों, जिनमें पूर्व जिला अध्यक्ष फिरोज खान, अधिवक्ता जफर अली और कई अन्य शामिल थे, के साथ मस्जिद में मौजूद थे। सांसद ने मस्जिद में अपने समर्थकों को उकसाया और उत्तेजक बयान दिए, जिसके परिणामस्वरूप वहाँ नमाज अदा की गई। सांसद ने जानबूझकर सर्वे में बाधा डाली, जिसके कारण यह पूरा नहीं हो सका।

इसके बाद मस्जिद की सीढ़ियों से उतरते समय मीडियाकर्मियों को संबोधित करते हुए सांसद ने कहा – “बाहरी लोगों ने सर्वे के लिए याचिका दायर की थी और कोर्ट ने आदेश पारित किया था। यह हमारा अधिकार है कि हम कोर्ट के आदेश से संतुष्ट हैं या इसका विरोध करते हैं। लाखों मुस्लिम यहाँ इकट्ठा होना चाहते थे। मैं सर्वे के खिलाफ हूँ। यह मस्जिद थी, मस्जिद है और मस्जिद रहेगी।”

जिले में धारा 163 BNSS लागू होने के बावजूद सांसद बर्क ने 22 नवंबर को शुक्रवार की नमाज के दौरान शाही जामा मस्जिद पर बिना प्रशासनिक अनुमति के भीड़ इकट्ठा की और उत्तेजक बयान दिए। उन्होंने एक विशेष समुदाय (मुस्लिमों को) को एकजुट होने और जामा मस्जिद की रक्षा के लिए बड़ी संख्या में इकट्ठा होने का आह्वान किया, जिसका उद्देश्य संवेदनशील माहौल को भड़काना था। इसके बाद सांसद ने कहा:

“जिन लोगों ने सर्वे याचिका दायर की, वे शरारती तत्व हैं। मैं कोर्ट के आदेश से संतुष्ट नहीं हूँ। मैं खुलकर पुलिस प्रशासन को बताता हूँ कि भले ही वे यहाँ दस ड्रोन कैमरे लाएँ, यह मस्जिद है, मस्जिद थी और कयामत के दिन तक मस्जिद रहेगी। यह मस्जिद किसी धार्मिक स्थल को तोड़कर नहीं बनाई गई थी। इस्लाम सिखाता है कि किसी मुस्लिम की सहमति के बिना भी उसकी जमीन पर जबरदस्ती धार्मिक स्थान नहीं बनाया जा सकता, किसी अन्य धार्मिक स्थल की तो बात ही छोड़ दें। हम पुलिस प्रशासन या सरकार द्वारा दबाए नहीं जाएँगे। हम इस देश के मालिक हैं, गुलाम या नौकर नहीं। संविधान का गला घोंटा जा रहा है; इसकी पवित्रता को तार-तार किया जा रहा है। हम अपनी जामा मस्जिद को कानूनी रूप से बचाएँगे और इंशा अल्लाह, इसे सुरक्षित रखने के लिए हर जरूरी काम करेंगे। हम सभी हमेशा जामा मस्जिद की रक्षा के लिए हर तरह से प्रतिबद्ध रहे हैं और रहेंगे। यह मस्जिद 1947 से पहले की है और हम इसे किसी को छीनने नहीं देंगे।”

जिस कोतवाली पुलिस स्टेशन के अंतर्गत संभल का जामा मस्जिद आता है, उसके सब-इंस्पेक्टर दीपक राठी के अनुसार यह दंगा सांसद के उत्तेजक भाषणों, लोगों के उकसाने के कारण हुई। सर्वे के पहले दिन मतलब 19 नवंबर को भी दीपक राठी ने सांसद के उग्र व्यवहार को अपनी आँखों के सामने देखा, मीडिया से उत्तेजक बातें करते देखा। जुमे की नमाज यानी 22 नवंबर को भी मस्जिद की सीढ़ियों से उनको भाषण देते सुना। सब-इंस्पेक्टर दीपक राठी का मानना है कि सांसद बर्क और सुहेल इकबाल इस दंगे के मास्टरमाइंड थे।

गवाह नंबर 11 – रमेश सिंह राघव, सर्वे कमिश्नर (विवादित जामा मस्जिद का सर्वेक्षण रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए कोर्ट द्वारा नियुक्त)

जामा मस्जिद के सर्वे-निरीक्षण के दौरान स्थानीय सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और वर्तमान विधायक के पुत्र सुहेल इकबाल लगभग 200-300 समर्थकों के साथ पहुँचे और धमकी भरे लहजे में कहा, “जो भी तमाशा करना चाहते हो, दस मिनट में खत्म करो, वरना स्थिति ऐसी हो जाएगी कि तुम संभाल नहीं पाओगे।”

इसके बाद मस्जिद के बाहर जमा भीड़ ने विरोध शुरू कर दिया, मजहबी और उत्तेजक नारे लगाए। इसके अतिरिक्त रोशनी की भी समस्या थी। इसलिए उन्होंने निरीक्षण को स्थगित करना उचित समझा और प्रशासन को लिखित में कारण बताते हुए निरीक्षण कार्यवाही को किसी अन्य दिन के लिए स्थगित कर दिया।

सर्वे कमिश्नर रमेश सिंह राघव की राय में यह घटना स्थानीय सांसद बर्क, स्थानीय विधायक के बेटे सुहेल इकबाल और जामा मस्जिद समिति के अध्यक्ष जफर अली की दुर्भावनापूर्ण मंशा और पूर्व नियोजित साजिश का परिणाम थी।

गवाह नंबर 12 – विष्णु शर्मा, सर्वे कमिश्नर के कैमरामैन

19 नवंबर 2024 और 24 नवंबर 2024 – इन दोनों दिनों में विष्णु शर्मा ने जामा मस्जिद में सर्वेक्षण के दौरान वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी की है। 19 नवंबर को इनके साथ 2/3 सहायक भी थे, जिन्हें मस्जिद समिति के सदस्यों ने अंदर घुसने से रोक दिया। इसलिए इन्होंने वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी अकेले ही की। इनके मस्जिद पहुँचने से पहले ही सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और संभल विधायक के पुत्र सुहेल इकबाल भीड़ के साथ वहाँ मौजूद थे। इनके अनुसार वो ऐसी-ऐसी टिप्पणियाँ कर रहे थे, जिन्हें ये दोहरा भी नहीं सकते।

सर्वे की कार्यवाही लगभग 45 मिनट से 1 घंटे तक चली। यदि सांसद बर्क और सुहेल इकबाल चाहते तो स्थिति नहीं बिगड़ती और सर्वे प्रक्रिया 19 नवंबर को ही पूरी हो सकती थी। हालाँकि उन्होंने माहौल खराब कर दिया और सर्वे में बाधा डाली, जिसके कारण प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। घटनाओं के वीडियो और फोटो कोर्ट कमिश्नर को सौंप दिए गए थे। यदि उन वीडियो और फोटो की समीक्षा की जाए तो मस्जिद के अंदर की स्थिति और माहौल, साथ ही किस तरह की नारेबाजी हो रही थी, कौन क्या कह रहा था, कौन किसे उकसा रहा था, स्पष्ट हो जाएगा। मस्जिद की सीढ़ियों पर नेताओं द्वारा भाषण दिए जा रहे थे, माहौल तनावपूर्ण था। मस्जिद की प्रबंध समिति लाउडस्पीकर के माध्यम से सभी से शांत रहने और सहयोग करने की अपील कर रही थी, लेकिन चुपके से भीड़ को उकसा रही थी।

विष्णु शर्मा ने बताया कि 19 नवंबर की घटनाओं के बारे में वो बहुत कुछ कह सकते हैं, लेकिन अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा की चिंता के कारण वे खुलकर नहीं बोल सकते। इनकी राय में पूरी घटना पूर्व नियोजित थी, जिसमें संभल के बाहर से भी बड़ी संख्या में लोग शामिल थे। इनका मानना है कि मुस्लिम समुदाय को 24 नवंबर के सर्वे के बारे में पहले से सूचित किया गया था। सांसद जिया-उर-रहमान बर्क, सुहेल इकबाल और प्रबंध समिति के सदस्य पूरी घटना के लिए जिम्मेदार थे क्योंकि उन्होंने भीड़ को इकट्ठा किया और उकसाया।

गवाह नंबर 13 – विष्णु शंकर जैन, वादी के अधिवक्ता

19 नवंबर 2024 को शाम 6 बजे जैसे ही सर्वेक्षण की कार्यवाही शुरू हुई, लगभग 200-300 अज्ञात लोग (मुस्लिम समुदाय से) मस्जिद परिसर में प्रवेश कर गए। इसके 15 मिनट बाद परिसर के बाहर एक बड़ी भीड़ जमा हो गई और नारे लगाने लगी (नारा-ए-तकबीर, अल्लाह-हु-अकबर आदि) और कथित मस्जिद में प्रवेश करने लगी। लगभग 6:45-7:00 बजे कथित मस्जिद के अंदर एक हजार लोग मौजूद थे और कई लोग बाहर से मस्जिद को घेरे हुए थे। स्थिति तब और बिगड़ने लगी, जब स्थानीय विधायक (सुहेल इकबाल) का बेटा और क्षेत्र का सांसद (जिया-उर-रहमान बर्क) कथित मस्जिद में प्रवेश कर गए।

सांसद बर्क और स्थानीय विधायक का बेटा इसके बाद सर्वे कर रही टीम को अपनी शर्तें बताने लगे, धमकी देने लगे। उन्होंने नमाज का समय होने का हवाला देकर सर्वे टीम को तुरंत मस्जिद परिसर छोड़ देने का फरमान भी सुना डाला था। धमकी भरे लहजे में यह भी कहा था कि स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाएगी और कोई भी भीड़ को नियंत्रित नहीं कर पाएगा। इसके बाद कोर्ट कमिश्नर ने सर्वे का काम उस दिन के लिए स्थगित कर दिया था।

गवाह नंबर 14 – गोपाल शर्मा, वादी के अधिवक्ता

मस्जिद के सर्वेक्षण के दौरान स्थानीय सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और सुहेल इकबाल (वर्तमान विधायक के पुत्र) लगभग 200-300 समर्थकों के साथ पहुँचे और धमकी भरे लहजे में कहा, “जो कुछ भी करना है, 10 मिनट में खत्म करो, वरना स्थिति ऐसी हो जाएगी कि आप संभाल नहीं पाएँगे।” इसके बाद भीड़ ने मजहबी और उन्मादी नारे लगाने शुरू किए और विरोध प्रदर्शन किया। भीड़, धमकी, शाम का समय और प्रकाश की समस्या के कारण कोर्ट कमिश्नर ने उस दिन के लिए सर्वेक्षण को स्थगित करना उचित समझा और प्रशासन को लिखित में कार्यवाही को किसी अन्य दिन के लिए स्थगित करने के कारणों की सूचना दे दी।

इनके अनुसार यह घटना सांसद बर्क, विधायक के पुत्र सुहेल इकबाल और मस्जिद की पूरी प्रबंधन समिति द्वारा एक सुनियोजित साजिश का परिणाम थी, जिसमें हजारों लोग मस्जिद में प्रवेश करने की कोशिश कर रहे थे ताकि वादियों और उनके अधिवक्ताओं, कोर्ट कमिश्नर को सबक सिखाया जा सके।

गवाह नंबर 15 – महंत श्री ऋषिराज गिरी, महंत कैलादेवी

19 नवंबर 2024 को सर्वेक्षण टीम मस्जिद परिसर में प्रवेश कर गई। लेकिन महंत श्री ऋषिराज गिरी ने गेट के बाहर रहना चुना और जामा मस्जिद परिसर में प्रवेश नहीं किया। इस बीच मुस्लिम समुदाय के कई लोग जामा मस्जिद के पीछे और ढलान वाली सड़क पर इकट्ठा होने लगे। मुस्लिम भीड़ अपमानजनक टिप्पणियाँ कर रही थी, उन्हें धमकी दे रही थी। उस समय सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल अपने समर्थकों के साथ जामा मस्जिद में प्रवेश कर गए। इसके बाद भीड़ की आक्रामकता और विरोध को देखते हुए स्थानीय पुलिस ने उन्हें बाजार मार्ग के माध्यम से संभल कोतवाली तक सुरक्षित पहुँचाया। जैसी भीड़ वहाँ इकट्ठा हुई थी, उसे देख कर यह कहा जा सकता है कि यह घटना एक पूर्व नियोजित साजिश का परिणाम थी।

गवाह नंबर 16 – प्रिंस शर्मा, संभल जिले के जिला सरकारी अधिवक्ता (सिविल)

19 नवंबर 2024 की शाम लगभग 6:00 बजे सभी लोग (सर्वे टीम के लोग) जामा मस्जिद में प्रवेश कर गए और आयोग की कार्यवाही शुरू की। सब कुछ शांतिपूर्ण ढंग से चल रहा था, जब तक कि शाम लगभग 6:30 बजे सांसद जिया-उर-रहमान बर्क लगभग 200-300 समर्थकों के साथ मस्जिद परिसर में प्रवेश नहीं कर गए। मुस्लिम पक्ष के कई लोग भी विवादित संरचना के बाहर इकट्ठा हो गए, जो मजहबी नारे लगा रहे थे, जो मस्जिद परिसर के अंदर सुनाई भी दे रहे थे।

मस्जिद परिसर के अंदर सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और उनके समर्थक इकट्ठा होकर निरीक्षण में बाधा डाल रहे थे। इसके बाद शाम लगभग 7:00 बजे मस्जिद समिति के अध्यक्ष और अधिवक्ता जफर अली ने कोर्ट कमिश्नर को बताया कि अंधेरा हो रहा है और नमाज का समय है, इसलिए आयोग की कार्यवाही जल्दी पूरी की जानी चाहिए। इस कारण, आयोग की कार्यवाही उस दिन के लिए स्थगित कर दी गई।

प्रिंस शर्मा ने बताया कि इस घटना के पूर्व नियोजित न होने का सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि इतनी बड़ी भीड़ का इतनी दूर से और इतनी संख्या में आना संभव नहीं था।

गवाह नंबर 17 – विष्णु कुमार शर्मा, संभल जिला कोर्ट में भारत सरकार के स्थायी अधिवक्ता

19 नवंबर को सर्वेक्षण के दौरान स्थानीय सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और सुहेल इकबाल (वर्तमान विधायक के पुत्र) लगभग 200-300 समर्थकों के साथ मस्जिद परिसर में प्रवेश कर गए और कहा, “जो कुछ भी करना है, 10 मिनट में खत्म करो, वरना स्थिति ऐसी हो जाएगी कि आप संभाल नहीं पाएँगे।” वहाँ खड़ी भीड़ भी सर्वे का विरोध कर रही थी, मजहबी और उन्मादी नारे लगा रही थी। इसके अलावा शाम के समय और प्रकाश की समस्या के कारण, कोर्ट कमिश्नर ने उस दिन के लिए सर्वे को स्थगित करना उचित समझा और प्रशासन को लिखित में कार्यवाही को किसी अन्य दिन के लिए स्थगित करने के कारणों की सूचना दे दी।

24 नवंबर 2024 को जामा मस्जिद के पास सैकड़ों से हजारों लोगों की उपस्थिति जिसमें दूर-दराज से आए लोग भी शामिल थे, यह पुष्टि करता है कि यह घटना पूर्व नियोजित थी। भीड़ को कोर्ट के आदेश में बाधा डालने और उन पर (सर्वे टीम पर) हमला करने के लिए इकट्ठा किया गया था।

गवाह नंबर 18 – कासिम जमाल, जामा मस्जिद प्रबंधन समिति का सदस्य और अधिवक्ता

19 नवंबर 2024 को जामा मस्जिद में हुए सर्वे के दौरान कासिम जमाल वहाँ उपस्थित थे। शाम में लगभग 6-6:15 के बीच जब ये मस्जिद पहुँचे, तो उस समय स्थानीय सांसद (जिया-उर-रहमान बर्क) और संभल विधायक का बेटा सुहेल इकबाल पहले से ही वहाँ मौजूद था।

गवाह नंबर 19 – मशहूद अली फारूकी, जामा मस्जिद प्रबंधन समिति का सदस्य और अधिवक्ता

मशहूद अली फारूकी 19 नवंबर 2024 को जामा मस्जिद में होने वाले सर्वे के लिए शाम में लगभग 6 बजे पहुँचे। इनके पहुँचने से पहले ही वहाँ स्थानीय सांसद (जिया-उर-रहमान बर्क) और संभल विधायक का बेटा सुहेल इकबाल मौजूद था।

22 नवंबर 2024 को जुमे की नमाज के बाद सांसद बर्क ने मस्जिद की सीढ़ियों पर से मीडिया को संबोधित किया था। अपने बयान में मशहूद अली फारूकी ने सहमति जताई कि मस्जिद की सीढ़ियों से राजनीतिक बयान या प्रेस कॉन्फ्रेंस अनुचित था।

गवाह नंबर 20 – जफर अली, जामा मस्जिद प्रबंधन समिति के अध्यक्ष

जफर अली ने बताया कि 19 नवंबर 2024 को सर्वेक्षण के लिए वो जामा मस्जिद शाम के लगभग 6 बजे पहुँचे थे। इनके अनुसार सांसद जिया-उर-रहमान बर्क लगभग 6:30 बजे अपने समर्थकों के साथ मस्जिद पहुँचे। फिर 6:45 बजे उन्होंने संभल विधायक के बेटे सुहेल इकबाल को मस्जिद के अंदर देखा। यह भी बताया कि सांसद के साथ इन्होंने प्रेस के लोगों और इकट्ठा हुई भीड़ को संबोधित भी किया था।

पिछले 7 वर्षों से संभल के जामा मस्जिद समिति के अध्यक्ष रहे जफर अली ने बताया कि 22 नवंबर 2024 को जुमे की नमाज में लगभग 2000 लोग आए थे, जबकि अन्य जुमे के दिन सामान्य तौर पर यह संख्या 1000 के आस-पास रहती थी। जब जफर अली को ‘संभल सांसद’ वॉट्सऐप ग्रुप में ज्यादा से ज्यादा भीड़ जुटाने वाले मैसेज दिखाए गए तो इन्होंने स्वीकार किया कि भेजे गए मैसेज से ऐसा प्रतीत होता है कि नमाज के लिए अधिक से अधिक लोगों को इकट्ठा करने का आह्वान किया गया था।

22 नवंबर 2024 को जुमे की नमाज के बाद सांसद बर्क के साथ जफर अली ने भी वहाँ इकट्ठा नमाजियों को संबोधित किया था, यह खुद स्वीकार किया। इस दौरान घटी एक दिलचस्प बात भी इन्होंने बताई। जब सांसद बर्क नमाजियों को संबोधित कर रहे थे, तब इन्होंने उनको चुप करवाने की कोशिश भी की थी। इन्होंने कहा था, “बस, कृपया रूकें।” लेकिन सांसद बर्क ने इनकी अनसुना कर दिया, बोलना जारी रखा।

जफर अली ने यह भी स्वीकार किया कि 24 नवंबर 2024 को होने वाले शेष सर्वे की सूचना उन्होंने सांसद बर्क को फोन कर दी थी। उन्होंने स्पष्ट बताया कि रात 11:00-11:30 बजे के बीच उन्होंने सांसद के पीआरओ से उनके मोबाइल पर बात की और दूसरी बार उन्होंने डायरेक्ट सांसद बर्क से बात की, उन्हें सूचित किया कि अगले दिन फिर से सर्वेक्षण हो रहा है।

कुल कितने साक्षी, गवाही दर्ज करने की प्रक्रिया क्या

आयोग ने 24 नवंबर 2024 के दंगों से संबंधित 72 अभियुक्तों (जो मुरादाबाद जेल में बंद हैं) के बयान भी दर्ज किए। इनके अलावे संभल में 62 व्यक्तियों के बयानों की दोबारा जाँच भी की गई, इनमें से 28 गवाहों के साक्ष्य फिर से दर्ज किए गए। प्रशासनिक लोगों में दंगों के दौरान घायल हुए पुलिस वाले, वहाँ मौजूद सुरक्षाकर्मी, डीएम/एसपी/एडीएम/अतिरिक्त एसपी/सीओ/एसडीएम, मृतकों का पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टरों तक को बयान दर्ज करने के लिए आयोग ने बुलाया। सर्वे कमिश्नर और उनके साथ गई टीम के हर सदस्य को भी आयोग के सामने अपना-अपना बयान दर्ज करवाना पड़ा। 24 नवंबर के साथ-साथ 19 नवंबर को जामा मस्जिद सर्वे के दौरान जो-जो मीडियाकर्मी वहाँ कवरेज के लिए मौजूद थे, उन सबका भी बयान लिया गया।

जामा मस्जिद प्रबंध समिति के पदाधिकारियों की सूची मँगवा कर उन सबके भी बयान दर्ज करवाए गए। सपा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और संभल के विधायक (ये भी समाजवादी पार्टी के ही) इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल का भी बयान लिया गया। जिन 4 लोगों की हत्या दंगाइयों ने कर दी थी, उनके रिश्तेदारों को भी आयोग ने साक्ष्य दर्ज करने बुलाया। चूँकि इन्होंने FIR भी दर्ज करवाई थी, इसलिए इनके बयान शिकायतकर्ता के तौर पर दर्ज किए गए। इस बात का भी ध्यान रखा गया कि जब ये शिकायतकर्ता अपने बयान दर्ज करवाएँ तो कोई भी पुलिस अधिकारी या अन्य व्यक्ति उनके पास मौजूद न रहे।

पूरी प्रक्रिया में आयोग ने कुल 199 साक्षियों से पूछताछ की। इनमें से 106 साक्षियों के बयान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से दर्ज किए गए। जबकि 84 साक्षियों के बयान संभल में डाक बंगले पर और 8 साक्षियों के बयान लखनऊ में जाँच आयोग के कार्यालय में दर्ज किए गए।

संभल जामा मस्जिद का सर्वे क्यों? सर्वे टीम में कौन-कौन?

संभल जिले के चंदौसी स्थित जिला एवं सत्र न्यायालय है। यहीं पर सीनियर डिवीजन के सिविल जज न्यायालय में 19 नवंबर 2024 को एक याचिका (182/2024) दायर की गई थी। याचिका में बताया गया कि साल 1526 में संभल स्थित शाही जामा मस्जिद उस जगह बनाई गई, जहाँ कभी प्राचीन हरिहर मंदिर (भगवान कल्कि का मंदिर) हुआ करता था। पहले मंदिर को ध्वस्त किया गया, फिर उसके अवशेषों पर ही मस्जिद बना दी गई।

याचिका पर सुनवाई करते हुए सिविल जज ने शाही जामा मस्जिद के सर्वे (फोटो और वीडियोग्राफी दोनों) का आदेश दिया। इसके लिए अधिवक्ता रमेश सिंह राघव को सर्वे कमिश्नर नियुक्त किया गया। मामले की गंभीरता को समझते हुए 19 नवंबर 2024 को ही संभल के जिलाधिकारी ने पुलिस अधीक्षक को पर्याप्त पुलिस बल के साथ जामा मस्जिद जाकर कोर्ट के आदेश पर कार्रवाई के लिए कहा।

पर्याप्त पुलिस बल से साथ सर्वे कमिश्नर रमेश सिंह राघव, याचिकाकर्ता और अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन, गोपाल शर्मा (अधिवक्ता), प्रिंस शर्मा (अधिवक्ता) और जामा मस्जिद समिति के अध्यक्ष एवं अधिवक्ता जफर अली की उपस्थिति में 19 नवंबर 2024 की शाम को संभल की शाही जामा मस्जिद का सर्वे शुरू किया गया। हालाँकि उस दिन सर्वे का काम पूरा नहीं हो सका। इसके पीछे 2 वजहें रहीं: (i) शाम होने के कारण कम रोशनी (ii) सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल द्वारा मुस्लिम भीड़ को भड़काना।

न्यायिक जाँच आयोग का गठन क्यों?

कोर्ट ने मस्जिद के सर्वे का आदेश दिया। पुलिस-प्रशासन मामले की संवेदनशीलता को समझते हुए और कानून एवं शांति व्यवस्था को बनाए रखते हुए सर्वे करने पहुँचती है। लेकिन शिकार होती है हिंसक भीड़ का। 4 लोग मारे जाते हैं, कई घायल होते हैं। और उँगली उठती है उत्तर प्रदेश की पुलिस पर। जबकि हकीकत में पुलिस की तरफ से गोली चलाई भी नहीं गई थी। आत्मरक्षा और भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने सिर्फ आँसू गैस, मिर्च बम, रबर बुलेट आदि ही फायर किए थे।

मस्जिद के सर्वे का विरोध करने वाली भीड़ भी मुस्लिम, मारे गए 4 लोग भी मुस्लिम। ऐसे में उत्तर प्रदेश पुलिस को अपराधी बताने, गोलीबाज बताने का नैरेटिव गढ़ दिया गया। फेक चीजों को वायरल किया गया, सच कहीं दब गया। जबकि घटनास्थल पर तमाम मीडिया चैनल मौजूद थे, लगातार कवरेज किया जा रहा था। इसी सच को बाहर लाने के लिए घटना के 4 दिन बाद 28 नवंबर 2024 को तीन सदस्यीय न्यायिक जाँच आयोग का गठन किया गया। इस आयोग के अध्यक्ष थे इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार अरोड़ा। जबकि दो अन्य सदस्य थे – (i) सेवानिवृत्त आईएएस अमित मोहन प्रसाद (ii) सेवानिवृत्त आईपीएस अरविंद कुमार जैन।

आयोग पर एकतरफा जाँच का आरोप नहीं लगे, इसको सुनिश्चित किया गया। घटना से जुड़े हर छोटे-बड़े पहलू को देखा-परखा गया। प्रत्यक्षदर्शी या गवाह भी विविध हों, इसका भी ख्याल रखा गया। पुलिसकर्मियों, प्रशासनिक अधिकारियों, वादियों, प्रतिवादियों के साथ-साथ उनके अधिवक्ताओं, मीडिया कर्मियों (प्रत्यक्षदर्शी), जामा मस्जिद इंतेजामिया समिति के सदस्यों, अन्य प्रत्यक्षदर्शियों, एफआईआर, मेडिकल रिपोर्ट, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट, फोरेंसिक (एफएसएल) की रिपोर्ट, बैलिस्टिक विशेषज्ञ की रिपोर्ट के साथ-साथ अन्य रिकॉर्डों की भी साक्ष्य सहित सूक्ष्म जाँच की गई। पूरी प्रक्रिया के बाद न्यायिक जाँच आयोग ने अपनी रिपोर्ट बनाई है। न्यायिक प्रक्रिया के तहत इसे कोर्ट में चुनौती दी जाएगी, तारीख-पर-तारीख भी आएँगे… लेकिन देर-सबेर अपराधी सलाखों के पीछे होंगे, यही उम्मीद है।

100 नाराज़ ≠ 100 वोट: भारतीय राजनीति में सिर्फ़ ‘नाराज़गी’ का फ़ैक्टर कभी निर्णायक क्यों नहीं रहा

BJP के लिए सबसे बड़ा ख़तरा क्या है सवर्णों की नाराज़गी, SC/ST Act, आरक्षण की राजनीति या जातीय असंतोष? यदि आपका उत्तर केवल ‘CASTE’ है, तो संभव है कि आप भारतीय चुनावी राजनीति के उस बिंदु को देख ही नहीं रहे, जहाँ से असली कहानी शुरू होती है।

राजनीति को केवल भावनाओं की भाषा में पढ़ना सुविधाजनक है। फलाँ समुदाय नाराज़ है, फलाँ वर्ग क्षुब्ध है, फलाँ जाति को प्रतिनिधित्व नहीं मिला, फलाँ कानून से असंतोष है और फिर मान लिया जाता है कि नाराज़गी अपने आप वोट में बदल जाएगी। मगर चुनावी राजनीति इतनी सरल मशीन नहीं है कि उसमें ‘नाराज़गी’ डालिए और दूसरी तरफ़ सत्ता परिवर्तन की पर्ची निकल आए।

सत्ता का प्रश्न भावनाओं से कम और उन भावनाओं के राजनीतिक संगठन से अधिक तय होता है। यही वह बुनियादी अंतर है जिसे समझे बिना BJP और उसके सामाजिक आधार की वर्तमान राजनीति को समझना कठिन है।

सवर्ण समाज का एक हिस्सा BJP से नाराज़ है। SC/ST Act को लेकर असंतोष है, आरक्षण की राजनीति को लेकर शिकायतें हैं, प्रतिनिधित्व को लेकर प्रश्न हैं, जातीय गणित में लगातार हो रहे बदलावों से बेचैनी है और BJP द्वारा दलित, पिछड़े, अति-पिछड़े तथा आदिवासी समुदायों की ओर बढ़ाए जा रहे राजनीतिक हाथ को लेकर स्वाभाविक रूप से एक वर्ग में यह प्रश्न भी है कि इस बदलते समीकरण में उसका अपना स्थान क्या रह जाएगा।

लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि सवर्ण BJP से नाराज़ हैं या नहीं। असली सवाल यह है कि उस नाराज़गी का राजनीतिक गंतव्य क्या है? यहीं से चुनावी राजनीति का वह अध्याय शुरू होता है जिसे सोशल मीडिया की नाराज़ पोस्टें अक्सर बीच रास्ते में छोड़ देती हैं।

राजनीति में एक पुराना मेकियावेलियन सत्य है; जनता का आपसे नाराज़ होना अपने आप में सत्ता के लिए घातक नहीं है; घातक तब होता है जब वह नाराज़गी संगठित होकर आपको सत्ता से हटाने की क्षमता हासिल कर ले।

लोकतंत्र में हर सत्तारूढ़ दल से लोग नाराज़ रहते हैं। प्रश्न यह नहीं कि नाराज़ कौन है। प्रश्न यह है कि नाराज़ होकर कौन किसके साथ जा रहा है। और BJP की राजनीति को यदि इसी कसौटी पर देखा जाए, तो सवर्ण असंतोष का प्रश्न कुछ अलग रूप में सामने आता है। 

BJP का हिसाब ‘कितने नाराज़ हैं’ का नहीं, ‘किधर जाएँगे’ का है

BJP के लिए सवर्ण अब भी उसके राजनीतिक ढाँचे की एक महत्वपूर्ण और अपेक्षाकृत स्थिर धुरी हैं। इसलिए उसकी रणनीति का अर्थ यह कतई नहीं कि वह सोचती है, ‘सवर्णों को नाराज़ होने दो, वे कहीं नहीं जाएँगे।’

राजनीतिक दल इतने मूर्ख नहीं होते। अधिक यथार्थवादी गणित यह है कि ‘उन्हें इतना नाराज़ मत होने दो कि वे सामूहिक रूप से किसी वैकल्पिक राजनीतिक शक्ति के पीछे खड़े हो जाएँ।’

यही अंतर है असंतोष और राजनीतिक संकट के बीच। किसी समाज में असंतोष बहुत गहरा हो सकता है, लेकिन यदि वह सामाजिक समूहों, उप-जातियों, क्षेत्रों, स्थानीय नेतृत्व और अलग-अलग राजनीतिक प्राथमिकताओं में बँटा हुआ है, तो वह सत्ता परिवर्तन की संगठित शक्ति नहीं बन पाता। भारतीय समाज की जातीय संरचना इस मामले में BJP को एक दिलचस्प राजनीतिक लाभ देती है।

सवर्ण कोई एक राजनीतिक वर्ग नहीं हैं।

ब्राह्मण की राजनीतिक प्राथमिकताएँ हर जगह राजपूत की प्राथमिकताओं से मेल नहीं खातीं। बनिया का आर्थिक हित और राजनीतिक व्यवहार कई बार दूसरे समूहों से अलग हो सकता है। क्षेत्र, स्थानीय उम्मीदवार, परिवार, पंचायत, संसदीय क्षेत्र और राज्य की राजनीति इस समीकरण को और जटिल बना देते हैं। कोई BJP के साथ है, कोई कांग्रेस के साथ, कोई क्षेत्रीय दल के साथ और कोई स्थानीय उम्मीदवार को ही अपनी राजनीति का केंद्र मानता है।

अर्थात जिस असंतोष को सोशल मीडिया पर एक सामूहिक ‘सवर्ण आक्रोश’ के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, ज़मीनी राजनीति में वह आवश्यक नहीं कि एक ही दिशा में बह रहा हो। और यहीं BJP की संरचनात्मक बढ़त दिखाई देती है। उसे यह आवश्यक नहीं कि हर सवर्ण उससे प्रसन्न हो। उसे केवल इतना सुनिश्चित करना है कि सवर्णों की नाराज़गी एक संगठित Anti-BJP electoral bloc में परिवर्तित न हो।

यह चुनावी राजनीति का बड़ा फर्क है।

100 नाराज़ वोट और 100 संगठित वोट, दोनों एक चीज़ नहीं

इसे एक बहुत साधारण उदाहरण से समझिए। मान लीजिए किसी चुनाव क्षेत्र में 100 सवर्ण मतदाता BJP से नाराज़ हैं। उनमें से 30 कांग्रेस की ओर चले जाते हैं, 20 किसी क्षेत्रीय दल की ओर, 10 स्वतंत्र उम्मीदवार के साथ चले जाते हैं, कुछ मतदान ही नहीं करते और शेष अंततः BJP को ही वोट कर देते हैं।

तो BJP के लिए राजनीतिक नुकसान हुआ, लेकिन वह आवश्यक रूप से सत्ता के लिए अस्तित्वगत संकट नहीं बना। लेकिन वही 100 मतदाता यदि किसी एक राजनीतिक विकल्प के पीछे एकजुट हो जाएँ और उनके साथ दूसरे सामाजिक समूहों का असंतोष भी जुड़ जाए, तब परिस्थिति पूरी तरह बदल जाती है।

इसलिए चुनावी राजनीति में नाराज़गी की मात्रा से अधिक महत्वपूर्ण उसकी संगठनात्मक दिशा होती है। और यही वह बात है जिसे अक्सर ‘वोट बैंक’, ‘जातीय ध्रुवीकरण’ और ‘एंटी-इनकम्बेंसी’ जैसे आसान शब्दों के नीचे दबा दिया जाता है। 

BJP का असली भय: असंतोष नहीं, उसका एकजुट होना

यहीं पहुँचकर BJP के सामने वास्तविक चुनौती दिखाई देती है। BJP के लिए सबसे बड़ा खतरा सवर्णों की नाराज़गी नहीं है। खतरा है,  जातीय असंतोष का राजनीतिक Consolidation, विपक्षी मतों का एकीकरण और BJP के पुराने हिंदू सामाजिक गठबंधन का क्षरण।

यह फर्क मामूली नहीं है। यही चुनावी सत्ता की पूरी संरचना बदल सकता है।

2024 के लोकसभा चुनाव ने कम-से-कम इतना संकेत अवश्य दिया कि BJP का ऊपरी जातियों में आधार काफी हद तक उसके साथ बना रहा, लेकिन अनेक क्षेत्रों में SC और कुछ OBC समूहों के राजनीतिक झुकाव में बदलाव ने BJP के पुराने सामाजिक समीकरण को चुनौती दी।

इसका अर्थ यह नहीं कि BJP का सामाजिक आधार ध्वस्त हो गया। बल्कि इससे एक और गंभीर प्रश्न पैदा हुआ कि क्या अलग-अलग जातियों की अलग-अलग नाराज़गियाँ कभी एक साझा राजनीतिक असंतोष में बदल सकती हैं?

क्योंकि सत्ता के लिए खतरा तब पैदा होता है जब अलग-अलग असंतोष एक-दूसरे से जुड़ने लगें। एक जाति आरक्षण को लेकर असंतुष्ट हो, दूसरी प्रतिनिधित्व को लेकर, तीसरी आर्थिक परिस्थितियों को लेकर, चौथी स्थानीय सत्ता-संरचना को लेकर; तो ये अलग-अलग शिकायतें हैं।

लेकिन यदि कोई राजनीतिक शक्ति इन्हें एक साझा कथा, साझा शत्रु और साझा चुनावी विकल्प में बदल दे, तब ये शिकायतें राजनीतिक शक्ति बन जाती हैं। शिकायत स्वयं शक्ति नहीं है; शिकायत का राजनीतिक संगठन उसे शक्ति में बदलता है।

और BJP की रणनीति को समझने की कुंजी यहीं है।

BJP ने अपना सामाजिक गठबंधन बदला है, लेकिन छोड़ा नहीं

BJP एक तरफ़ अपने पारंपरिक सवर्ण आधार को पूरी तरह छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। दूसरी तरफ़ वह लगातार Ambedkar, दलित राजनीति, OBC नेतृत्व, EBC mobilisation और आदिवासी राजनीति की ओर बढ़ रही है। यह कुछ लोगों को विरोधाभास अवश्य प्रतीत हो रहा होगा, लेकिन यह तो BJP की राजनीतिक रणनीति का मूल तत्व है।

पुरानी BJP का सामाजिक समीकरण मोटे तौर पर Upper Caste + Hindutva के फ्रेम में समझा जाता था।

लेकिन आज की BJP का लक्ष्य उससे कहीं बड़ा है।

उसका राजनीतिक प्रोजेक्ट है, Upper Caste + OBC + EBC + Dalit + Tribal + Welfare Beneficiaries + Hindutva

अर्थात एक ऐसा विस्तृत हिंदू चुनावी गठबंधन, जिसमें प्रत्येक सामाजिक समूह को हर नीति से संतुष्ट करना आवश्यक नहीं है। राजनीति में सर्वसम्मति की आवश्यकता नहीं होती। पर्याप्त बहुमत की आवश्यकता होती है।

यही कारण है कि BJP के लिए यह आवश्यक नहीं कि सवर्ण आरक्षण से प्रसन्न हों, दलित हर नीति से प्रसन्न हों, OBC नेतृत्व से हर पिछड़ा समूह प्रसन्न हो या Welfare politics से हर वर्ग समान रूप से संतुष्ट हो। उसके लिए निर्णायक प्रश्न यह है कि क्या इन समूहों में से कोई बड़ा सामाजिक समूह एकजुट होकर विपक्ष के साथ जा रहा है? यदि नहीं, तो असंतोष प्रबंधनीय है। और यदि हाँ, तो वही असंतोष सत्ता के लिए गंभीर संकट बन सकता है।

‘हम BJP से नाराज़ हैं’ और ‘हम BJP को हराएँगे’ में बहुत बड़ा अंतर है

यही वह वाक्य है जिसके बीच भारतीय चुनावी राजनीति का एक बड़ा हिस्सा छिपा हुआ है। ‘हम BJP से नाराज़ हैं।’ और ‘हम BJP को हराने के लिए किसी दूसरे राजनीतिक विकल्प के साथ खड़े हैं।’

इन दोनों वाक्यों को एक समझ लेना राजनीतिक विश्लेषण की सबसे सामान्य भूलों में से एक है। पहला एक भावनात्मक कथन है। दूसरा एक संगठित राजनीतिक निर्णय।

पहले में असंतोष है। दूसरे में राजनीतिक दिशा। पहले में शिकायत है। दूसरे में शक्ति-संचय। और चुनाव अंततः इसी दूसरे प्रश्न पर फैसला करते हैं।

इसीलिए सोशल मीडिया की टाइमलाइन पर दिखाई देने वाला आक्रोश और मतदान केंद्र पर पड़ने वाला वोट कई बार दो बिल्कुल अलग राजनीतिक वास्तविकताएँ होते हैं। सोशल मीडिया पर क्रांति की घोषणा करना और बूथ पर एकजुट होकर वोट डालना, भारतीय लोकतंत्र में अभी तक दो अलग-अलग संस्थाएँ हैं।

तो BJP के सामने असली अस्तित्व का संकट क्या है?

यदि प्रश्न को बिल्कुल साफ़ शब्दों में रखा जाए तो मेरा उत्तर होगा, जाति अपने आप में BJP का Existential threat नहीं है। सवर्णों की नाराज़गी भी अपने आप में Existential threat नहीं है।

असली खतरा तब पैदा होता है जब जातीय असंतोष का राजनीतिक Consolidation + विपक्षी वोट का एकीकरण + BJP के पुराने हिंदू सामाजिक गठबंधन का टूटना, ये सब एक साथ घटित होने लगे।

और यह केवल सैद्धांतिक संभावना नहीं है। भारतीय चुनावों का इतिहास बताता है कि सत्ता परिवर्तन अक्सर किसी एक वर्ग की नाराज़गी से नहीं, बल्कि विभिन्न असंतोषों के एक साझा राजनीतिक गठबंधन में बदल जाने से होता है। 

तीन शर्तें पूरी हुईं तो कहानी बदल सकती है

BJP के लिए वास्तविक ख़तरा तब आकार लेगा जब तीन प्रक्रियाएँ एक साथ चलें।

1. सवर्णों की नाराज़गी वास्तविक वोट के नुकसान में बदल जाए

इसके लिए केवल यह पर्याप्त नहीं कि सवर्ण BJP से शिकायत करें। उन्हें वास्तव में BJP से मतदान स्तर पर दूर जाना होगा।

2. SC, OBC और EBC जैसे समूहों में BJP के विरुद्ध बड़ा राजनीतिक Consolidation हो

अलग-अलग जातियों की अलग-अलग शिकायतें यदि अलग-अलग राजनीतिक दिशाओं में जाती रहेंगी, तो BJP के लिए उनका प्रबंधन अपेक्षाकृत आसान रहेगा।

लेकिन यदि उनमें एक साझा राजनीतिक ध्रुवीकरण पैदा होता है, तो स्थिति गंभीर होगी।

3. विपक्ष उस असंतोष को एक ही राजनीतिक विकल्प के पीछे समेट दे

यही शायद सबसे कठिन शर्त है।

क्योंकि BJP के विरुद्ध असंतोष पैदा करना और उस असंतोष को एक साझा चुनावी विकल्प में बदल देना, दो अलग राजनीतिक कार्य हैं। विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती यही है।

जाति, आरक्षण और SC/ST Act, क्या ये 2029 तय कर देंगे?

SC/ST Act, आरक्षण, Caste census, सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय की राजनीति जैसे मुद्दे निश्चित रूप से सवर्णों में असंतोष पैदा कर सकते हैं। इन प्रश्नों को खारिज करना भी राजनीतिक मूर्खता होगी।

लेकिन यह मान लेना कि यही मुद्दे अकेले 2029 का चुनाव तय कर देंगे, उससे भी बड़ी राजनीतिक भूल होगी। क्योंकि चुनाव किसी एक मुद्दे पर नहीं लड़े जाते। राजनीतिक नेतृत्व का प्रभाव है। हिंदुत्व का प्रभाव है। अर्थव्यवस्था का प्रश्न है।

कल्याणकारी योजनाएँ हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा है। स्थानीय उम्मीदवार है। जातीय प्रतिनिधित्व है। विपक्ष का चेहरा और उसकी विश्वसनीयता है। स्थानीय स्तर की सत्ता-संरचना है। और अंततः Anti-incumbency भी है।

इन सभी का योग मिलकर वोट में बदलता है। राजनीति कोई एक-चर वाला समीकरण नहीं है।

भारतीय चुनाव में ‘एक मुद्दा’ अक्सर केवल सोशल मीडिया का मुद्दा होता है; बूथ पर पहुँचते-पहुँचते वह दर्जनों अन्य हितों, पहचान और राजनीतिक गणित से होकर गुजर चुका होता है। 

BJP की असली चिंता क्या है?

इसलिए यदि BJP की राजनीति को ठंडे दिमाग़ से पढ़ा जाए, तो संभवतः उसकी चिंता यह नहीं है कि ‘क्या हर जाति हमसे खुश है?’

क्योंकि कोई भी सत्तारूढ़ दल हर सामाजिक समूह को हर समय खुश नहीं रख सकता। उसकी वास्तविक चिंता इससे कहीं अधिक ठंडी और व्यावहारिक है, ‘क्या अलग-अलग समूहों की नाराज़गी एक-दूसरे से जुड़कर हमारे खिलाफ़ एक व्यापक चुनावी गठबंधन बना सकती है?’

यदि उत्तर ‘नहीं’ है, तो असंतोष मौजूद रहते हुए भी सत्ता-समीकरण उसके पक्ष में रह सकता है। यदि उत्तर ‘हाँ’ हो जाता है, तब वही छोटी-छोटी दरारें मिलकर दीवार में दरार पैदा कर सकती हैं। और राजनीति में दीवार तब नहीं गिरती जब उसमें एक दरार दिखाई दे।

दीवार तब गिरती है जब अलग-अलग दरारें एक-दूसरे से जुड़ जाती हैं। यही BJP के सामाजिक गठबंधन की असली परीक्षा है। इसलिए सोशल मीडिया पर सवर्णों की नाराज़गी के बढ़ते शोर को देखकर यह निष्कर्ष निकाल लेना कि BJP किसी बड़े संकट में है, शायद जल्दबाज़ी होगी। और इसके उलट यह मान लेना कि सवर्ण हमेशा BJP के साथ रहेंगे, उससे भी बड़ी भूल होगी।

राजनीतिक दलों का भाग्य स्थायी भावनाओं से नहीं, बदलते हितों और बदलते गठबंधनों से तय होता है। आज BJP का आत्मविश्वास संभवतः इसी गणित से निकल रहा है कि उसके विरुद्ध असंतोष मौजूद होने के बावजूद वह असंतोष अभी तक पर्याप्त रूप से एकीकृत राजनीतिक शक्ति में परिवर्तित नहीं हुआ है।

और विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती भी यही है। उसे केवल लोगों को BJP से नाराज़ नहीं करना है। उसे यह सिद्ध करना है कि उस नाराज़गी का एक विश्वसनीय राजनीतिक घर भी है। अंततः चुनाव में प्रश्न यह नहीं होता कि कितने लोग आपसे नाराज़ हैं। प्रश्न यह होता है कि कितने नाराज़ लोग एक ही दिशा में चलने को तैयार हैं।

और शायद BJP आज सबसे अधिक इसी गणित पर भरोसा कर रही है। क्योंकि चुनावी राजनीति में नाराज़ होना आसान है; नाराज़ वोट को एक जगह पहुँचा देना, यही असली राजनीति है। 

12 वर्ष पहले गोरखनाथ पीठ के पीठाधीश्वर, फिर देश के सबसे बड़े सूबे के CM: जनता तक पहुँच और समस्याओं पर तत्काल प्रतिक्रिया – UP में विकास और धार्मिक विरासत साथ-साथ बढ़ा रहे योगी आदित्यनाथ

उत्तर प्रदेश की राजनीति में योगी आदित्यनाथ की कहानी सिर्फ एक मुख्यमंत्री के सत्ता में आने की कहानी नहीं है। यह कहानी एक ऐसी धार्मिक-सामाजिक परंपरा से निकलकर शासन के सबसे बड़े मंच तक पहुँचने की है, जिसने पूर्वी उत्तर प्रदेश में लंबे समय तक शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवा और सामाजिक गतिविधियों के जरिए अपनी मौजूदगी बनाई।

एक तरफ गोरखनाथ मठ की परंपरा थी, दूसरी तरफ राजनीति। एक तरफ भगवा वस्त्र में पीठाधीश्वर की जिम्मेदारी थी, दूसरी तरफ करोड़ों लोगों वाले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी। ऐसे में योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक जीवन को समझने के लिए सिर्फ 19 मार्च 2017 (जिस दिन उन्होंने पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली) से शुरुआत करना पर्याप्त नहीं है।

गोरखपुर में स्थित गोरखनाथ मंदिर

राजनीतिक जीवन में आने पहले भी उनकी प्रशासनिक शैली और राजनीतिक सोच की कई जड़ें गोरखनाथ पीठ में दिखाई देती हैं। वहाँ जनता से सीधा संपर्क, संस्थाओं को चलाना, शिक्षा और स्वास्थ्य के जरिए समाज तक पहुँचना और समस्याओं पर तत्काल प्रतिक्रिया देना उनके सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बन चुका था।

फिर यही अनुभव लखनऊ पहुँचा। फर्क सिर्फ इतना था कि गोरखनाथ में जिम्मेदारी कुछ संस्थाओं और एक बड़े सामाजिक क्षेत्र की थी, जबकि मुख्यमंत्री बनने के बाद पूरा उत्तर प्रदेश ही उनका कार्यक्षेत्र बन गया।

युवावस्था में ही गोरखनाथ पीठ से जुड़े

5 जून 1972 को उत्तराखंड में जन्मे अजय सिंह बिष्ट बाद दीक्षा लेने के बाद योगी आदित्यनाथ के नाम से पहचाने गए। विज्ञान से स्नातक करने वाले अजय सिंह बिष्ट युवावस्था में ही गोरखनाथ पीठ से जुड़े और महंत अवैद्यनाथ के शिष्य बने। 15 फरवरी 1994 को महज 22 वर्ष की उम्र में उन्हें गोरक्षपीठ का उत्तराधिकारी घोषित किया गया।

यह कोई सामान्य धार्मिक पद नहीं था। गोरखनाथ पीठ पूर्वी उत्तर प्रदेश में केवल पूजा-पाठ का केंद्र नहीं रही। समय के साथ यहाँ शिक्षा, चिकित्सा, सामाजिक सेवा और धार्मिक गतिविधियों से जुड़े संस्थान विकसित हुए। महंत दिग्विजयनाथ और बाद में महंत अवैद्यनाथ ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया।

योगी आदित्यनाथ इसी परंपरा के उत्तराधिकारी बने। इसके बाद उनके सामने दो जिम्मेदारियाँ थीं। पहली, अपने गुरु और पीठ की विरासत को आगे बढ़ाना। दूसरी, उस विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाना। उन्होंने इसके लिए सिर्फ धार्मिक आयोजनों का रास्ता नहीं चुना। शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सेवा और संगठनात्मक गतिविधियों का विस्तार भी उनकी सार्वजनिक भूमिका का हिस्सा बना।

सितंबर 2014 में महंत अवैद्यनाथ के ब्रह्मलीन होने के बाद योगी आदित्यनाथ औपचारिक रूप से 12 सितंबर 2014 को गोरक्षपीठाधीश्वर बने। यानी मुख्यमंत्री बनने से लगभग तीन साल पहले ही वह एक बड़े संस्थान के प्रमुख और हजारों लोगों के रोजमर्रा के संपर्क में रहने वाले सार्वजनिक व्यक्तित्व को निभाते आए थे।

पीठ में गुरु गोरक्षनाथ की पूजा अर्चना करते CM योगी

विरासत संभालने का मतलब सिर्फ गद्दी संभालना नहीं था

गोरखनाथ पीठ की विरासत को समझने का एक महत्वपूर्ण पहलू उसका संस्थागत ढाँचा है। गोरखनाथ मंदिर से जुड़े शिक्षा और चिकित्सा संस्थान लंबे समय से संचालित होते रहे हैं। पीठ की गतिविधियों में अस्पताल, स्कूल, कॉलेज और सामाजिक सेवा संस्थाएँ शामिल रही हैं।

योगी आदित्यनाथ के सामने चुनौती यह थी कि इस विरासत को केवल पुरानी परम्पराओं तक सीमित न रखा जाए। उन्होंने संगठनात्मक विस्तार और बड़े सार्वजनिक आयोजनों के माध्यम से इसे पूर्वी उत्तर प्रदेश के बाहर भी व्यापक पहचान दिलाई। इसी दौर में योगी की पहचान एक ऐसे नेता के तौर पर बनी, जो अपने धार्मिक-सांस्कृतिक विचारों को सार्वजनिक जीवन में खुलकर रखते थे।

1998 में वह पहली बार गोरखपुर से लोकसभा सांसद चुने गए। उस समय उनकी उम्र महज 26 वर्ष थी। इसके बाद 1999, 2004, 2009 और 2014 में भी उन्होंने गोरखपुर से लोकसभा चुनाव जीता।

लगातार पाँच बार सांसद रहना केवल चुनाव जीतने का रिकॉर्ड नहीं था बल्कि ऐतिहासिक उपलब्धि थी। इस दौरान उनका गोरखपुर से राजनीतिक और सामाजिक संपर्क लगातार मजबूत होता गया और देश-प्रदेश के स्तर पर भी उनकी राजनीति ऊपर उठती गई। यही वह दौर था, जिसमें एक पीठाधीश्वर धीरे-धीरे राष्ट्रीय राजनीति के खिलाड़ी के रूप में स्थापित हुआ।

गोरक्षनाथ पीठ में आरती करते पीठाधीश्वर CM योगी आदित्यनाथ

गोरखपुर ने योगी को क्या सिखाया?

मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली को समझने के लिए गोरखपुर के अनुभव को देखना जरूरी है। एक धार्मिक संस्था चलाना और सरकार चलाना एक जैसा काम नहीं है लेकिन दोनों जगह एक चीज समान है, वह है लोगों की समस्याओं से सीधा सामना।

गोरखनाथ पीठ के अस्पताल में आने वाला मरीज, स्कूल में पढ़ने वाला छात्र, रोजगार या आर्थिक मदद की उम्मीद लेकर आने वाला व्यक्ति और धार्मिक आयोजन में पहुँचने वाला श्रद्धालु, सभी अलग-अलग तरह की अपेक्षाएँ लेकर आते हैं।

यही प्रत्यक्ष जनसंपर्क योगी के सार्वजनिक जीवन की शैली का हिस्सा बना। एक इंटरव्यू में योगी आदित्यनाथ ने खुद बताया कि मठ का काम सार्वजनिक सेवा से जुड़ा रहा है और वहाँ से उन्हें प्रशासन की सीख मिली।

गोरखपुर में उन्होंने जिन संस्थाओं और परियोजनाओं को आगे बढ़ाया, उनका असर भी धीरे-धीरे दिखाई देने लगा। AIIMS, खाद कारखाना, सड़कें, रामगढ़ ताल का विकास, चिड़ियाघर, मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर और शहर की कनेक्टिविटी जैसी परियोजनाओं ने गोरखपुर की पुरानी पहचान को बदलना शुरू किया।

2017: जब गोरखपुर का सांसद बना उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री

19 मार्च 2017 उत्तर प्रदेश की राजनीति के लिए ऐतिहासिक दिनों में गिना जाएगा। इसी दिन योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। यह अपने आप में असाधारण राजनीतिक घटना थी।

एक ऐसा व्यक्ति, जो राजनीति का पर्याय बन चुके सफेद कपड़ों की जगह भगवा पहनता था, वह देश के सबसे बड़े राज्य की सरकार का मुखिया बन गया। लेकिन योगी के पास एक चीज थी, जो अक्सर राजनीतिक जीवन में वर्षों बाद आती है, वह थी जमीनी संगठन और प्रत्यक्ष जनसंपर्क का लंबा अनुभव।

उनके सामने उत्तर प्रदेश की समस्याओं की लंबी सूची थी। कानून-व्यवस्था की चुनौती, खराब सड़कें, बिजली, किसानों की समस्या, बेरोजगारी, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, शिक्षा की गुणवत्ता, निवेश की कमी और क्षेत्रीय असमानता। सरकार ने शुरुआत में ही कानून-व्यवस्था को प्राथमिकता दी।

योगी सरकार की प्रशासनिक शैली का एक प्रमुख शब्द बना, ‘जीरो टॉलरेंस’। समर्थकों के लिए यह अपराधियों के खिलाफ कड़ा प्रशासन था जबकि आलोचकों ने कई बार सरकार की पुलिस और कानून-व्यवस्था संबंधी नीतियों पर सवाल भी उठाए। लेकिन सरकार ने कानून-व्यवस्था को राजनीतिक एजेंडे के केंद्र में रखा।

‘बीमारू’ की छवि से बाहर निकलने की कोशिश

उत्तर प्रदेश लंबे समय तक देश की आर्थिक क्षमता और वास्तविक विकास के बीच के अंतर का उदाहरण माना जाता रहा। योगी सरकार ने इस तस्वीर को बदलने के लिए सबसे पहले कनेक्टिविटी पर जोर दिया। एक्सप्रेसवे इसका सबसे बड़ा उदाहरण बने।

पूर्वांचल एक्सप्रेसवे ने लखनऊ को पूर्वी उत्तर प्रदेश से जोड़ने का काम किया। बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे ने अपेक्षाकृत पिछड़े क्षेत्र को बेहतर कनेक्टिविटी दी। गंगा एक्सप्रेसवे जैसी परियोजनाओं ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वी हिस्से तक एक लंबा आर्थिक कॉरिडोर बनाने की संभावना पैदा की।

यह सिर्फ सड़क बनाने की कहानी नहीं है। एक अच्छी सड़क के साथ ट्रांसपोर्ट आता है और ट्रांसपोर्ट के साथ बाजार जुड़ते हैं। बाजार जुड़ने पर उद्योगों के लिए जगह बनती है। उद्योग आने पर रोजगार पैदा होता है। यही वजह है कि योगी सरकार एक्सप्रेसवे को केवल यात्रा आसान करने वाली सड़क के तौर पर नहीं, बल्कि औद्योगिक विकास के कॉरिडोर के रूप में प्रस्तुत करती रही है।

एयरपोर्ट के मामले में बदली तस्वीर

2017 के समय उत्तर प्रदेश में सीमित संख्या में ही एयरपोर्ट नियमित हवाई सेवाओं से जुड़े थे। इसके बाद प्रयागराज, कानपुर, बरेली, कुशीनगर, अयोध्या, अलीगढ़, आजमगढ़, श्रावस्ती, चित्रकूट और मुरादाबाद जैसे शहरों तक हवाई कनेक्टिविटी बढ़ी।

आज उत्तर प्रदेश का एयर कनेक्टिविटी नेटवर्क पहले की तुलना में काफी बड़ा है। अयोध्या में अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट और जेवर में नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट जैसी परियोजनाएँ इस बदलाव की बड़ी मिसाल हैं।

जेवर सिर्फ एक एयरपोर्ट नहीं है। इसके आसपास बनने वाले औद्योगिक, लॉजिस्टिक और शहरी ढाँचे को मिलाकर देखा जाए तो यह पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की आर्थिक तस्वीर बदलने की क्षमता रखने वाली परियोजना है। यानी सरकार का मॉडल केवल ‘एयरपोर्ट बनाओ’ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एयरपोर्ट के आसपास आर्थिक गतिविधियों का इकोसिस्टम तैयार करने पर भी जोर रहा।

शहरों में मेट्रो, गाँवों में सड़क और बिजली

योगी सरकार की विकास कहानी का एक बड़ा हिस्सा बड़े शहरों से जुड़ा है लेकिन इसका दूसरा हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों में दिखाई देता है। सड़क निर्माण, बिजली कनेक्शन, आवास, शौचालय, नल से जल और ग्रामीण कनेक्टिविटी जैसी योजनाओं ने गाँवों में बुनियादी सुविधाओं को बढ़ाया।

यहाँ केंद्र और राज्य सरकार की योजनाएँ साथ-साथ काम करती हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना, सौभाग्य, जल जीवन मिशन और उज्ज्वला जैसी केंद्रीय योजनाओं का क्रियान्वयन राज्य मशीनरी के जरिए हुआ।

स्वास्थ्य में सबसे बड़ा बदलाव कहाँ दिखाई देता है?

उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में स्वास्थ्य व्यवस्था को बदलना सबसे कठिन कामों में से एक है। योगी सरकार ने मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ाने, नए संस्थान बनाने और पुराने अस्पतालों के विस्तार पर जोर दिया। गोरखपुर का AIIMS इसका प्रतीक बन गया।

जिस शहर की पहचान कभी जापानी इंसेफेलाइटिस जैसी बीमारी के संकट से होती थी, उसी शहर में आधुनिक चिकित्सा संस्थान का विकसित होना राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण बदलाव था। पूर्वांचल के दूसरे हिस्सों में भी मेडिकल कॉलेजों का विस्तार हुआ। सरकारी आँकड़ों के अनुसार राज्य में मेडिकल कॉलेजों का नेटवर्क पिछले वर्षों में काफी बढ़ा है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव सिर्फ बड़े अस्पताल बनाना नहीं है। मेडिकल शिक्षा के विस्तार का अर्थ डॉक्टरों और विशेषज्ञों की संख्या बढ़ाना भी है। यही कारण है कि मेडिकल कॉलेजों के विस्तार को लंबे समय में उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जा सकता है।

शिक्षा में ‘इमारत’ से आगे की चुनौती

शिक्षा के क्षेत्र में योगी सरकार के सामने दोहरी चुनौती थी। एक तरफ सरकारी स्कूलों का इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारना, दूसरी तरफ शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाना। ऑपरेशन कायाकल्प जैसे कार्यक्रमों के जरिए सरकारी स्कूलों में भवन, शौचालय, फर्नीचर, बिजली, पेयजल और अन्य सुविधाओं पर काम हुआ।

मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना जैसी पहल के जरिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को मुफ्त कोचिंग उपलब्ध कराने की कोशिश की गई। यहाँ सरकार की सोच यह रही कि प्रतिभा केवल बड़े शहरों के महँगे कोचिंग संस्थानों तक सीमित न रहे।

अभी भी शिक्षा की गुणवत्ता, सरकारी स्कूलों में शिक्षक उपलब्धता और उच्च शिक्षा तक पहुँच जैसी चुनौतियाँ पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं लेकिन स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर और संस्थागत विस्तार में बदलाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

निवेश के लिए बदला माहौल

किसी भी राज्य में उद्योग तभी आता है, जब कारोबारी को तीन चीजों पर भरोसा हो। सड़क, बिजली की उपलब्धता, कानून-व्यवस्था ठीक रहेगी या नहीं। योगी सरकार ने इन तीनों को निवेश नीति से जोड़ने की कोशिश की।

इन्वेस्टर्स समिट, नई औद्योगिक नीतियाँ, डिफेंस कॉरिडोर, डेटा सेंटर, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग, फिल्म सिटी और एक्सप्रेसवे आधारित औद्योगिक कॉरिडोर इसी रणनीति का हिस्सा हैं। इससे बड़े पैमाने पर निवेश प्रस्ताव जमीन पर उतरे हैं और हजारों उद्योग स्थापित हुए हैं।

2026 में मुख्यमंत्री ने भी कहा कि राज्य में लगभग ₹15 लाख करोड़ के प्रोजेक्ट ग्राउंडेड हो चुके हैं और करीब ₹6 लाख करोड़ की परियोजनाएँ चल रही हैं। इन आँकड़ों से एक बात जरूर स्पष्ट होती है कि उत्तर प्रदेश ने निवेश आकर्षित करने को अपनी प्रशासनिक प्राथमिकताओं में प्रमुख स्थान दिया है।

कानून-व्यवस्था और प्रशासन: योगी मॉडल की सबसे चर्चित पहचान

योगी सरकार की सबसे ज्यादा चर्चा शायद सड़क या एयरपोर्ट की वजह से नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था की वजह से हुई। सरकार ने अपराधियों और माफिया के खिलाफ सख्त कार्रवाई को अपनी पहचान बनाया।

अवैध संपत्तियों पर कार्रवाई, गैंगस्टर एक्ट का इस्तेमाल और पुलिस को खुली कार्रवाई का संदेश, ये सब योगी सरकार के प्रशासनिक मॉडल का हिस्सा रहे। इस मॉडल पर राजनीतिक विवाद भी हुए। विपक्ष ने कई बार ऐसी कार्रवाइयों को लेकर सवाल उठाए और पुलिस एनकाउंटर तथा प्रशासनिक कार्रवाई की आलोचना की। विपक्ष द्व्रारा यह लेकिन किया गया सिर्फ राजनीति के लिए और सरकार ने समय-समय पर इनको अपनी नीति बता कर स्पष्ट भी किया।

सरकार का तर्क रहा कि अपराध के खिलाफ सख्त रुख ने व्यापारियों, महिलाओं और आम नागरिकों में सुरक्षा की भावना बढ़ाई है। इसका सीधा असर निवेश के माहौल पर पड़ने का दावा भी सरकार करती रही है।

धार्मिक विरासत से शासन तक एक समान सूत्र

अब सवाल आता है कि गोरखनाथ पीठ और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शासन के बीच आखिर संबंध क्या है? जवाब है, ‘संस्था के जरिए सेवा’। गोरखनाथ पीठ में मंदिर के साथ अस्पताल और शिक्षण संस्थान हैं। मुख्यमंत्री के रूप में योगी के सामने पूरा राज्य है, जहाँ सरकार स्कूल, अस्पताल, सड़क, पुलिस, बिजली और पानी के जरिए जनता तक पहुँचती है।

गोरखपुर में एक संस्था के स्तर पर जो मॉडल था, लखनऊ में वही सोच बहुत बड़े पैमाने पर दिखाई देती है। फर्क सिर्फ स्केल का है। मठ में हजारों लोग आते थे, मुख्यमंत्री के तौर पर करोड़ों लोगों की जिम्मेदारी सामने है।

मठ में अस्पताल चलाना एक जिम्मेदारी थी तो मुख्यमंत्री के तौर पर पूरे राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था सुधारना चुनौती है। वहीं, मठ में शिक्षा संस्थानों का संचालन था तो सरकार में लाखों बच्चों की शिक्षा व्यवस्था है। इसीलिए योगी की यात्रा को केवल ‘संत से मुख्यमंत्री’ की यात्रा कहना अधूरा है। यह ‘एक संस्था के प्रशासक से पूरे राज्य के प्रशासक’ बनने की यात्रा भी है।

विरासत का विस्तार धार्मिक सीमाओं से बाहर

योगी आदित्यनाथ की पहचान निश्चित रूप से हिंदुत्व और गोरखनाथ पीठ से जुड़ी रही है। अयोध्या, काशी, मथुरा, धार्मिक पर्यटन और सांस्कृतिक स्थलों के विकास पर उनकी सरकार ने विशेष जोर दिया। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के बाद वहाँ तेजी से विकसित हुआ इंफ्रास्ट्रक्चर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

लेकिन योगी सरकार की प्रशासनिक कहानी सिर्फ धार्मिक परियोजनाओं तक सीमित नहीं है। उसी समय बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे बन रहा है, पूर्वांचल में मेडिकल कॉलेज खुल रहे हैं। जेवर में एयरपोर्ट तैयार हो रहा है तो वहीं नोएडा और लखनऊ में औद्योगिक और शहरी परियोजनाएँ आगे बढ़ रही हैं। यानी उनकी राजनीति का सांस्कृतिक पक्ष जितना स्पष्ट है, प्रशासन का विकास पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है।

2017 से 2026: सबसे बड़ा बदलाव क्या है?

अगर पूरे बदलाव को एक लाइन में समझना हो तो कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश की विकास नीति में ‘घोषणा’ से ‘कनेक्टेड सिस्टम’ की ओर बढ़ने की कोशिश हुई है। एक्सप्रेसवे को उद्योग से जोड़ा गया। एयरपोर्ट को लॉजिस्टिक्स से जोड़ा गया।

शहरों को मेट्रो से जोड़ा गया और मेडिकल कॉलेजों को मेडिकल एजुकेशन से। कानून-व्यवस्था को निवेश से जोड़ा गया तो धार्मिक पर्यटन को इंफ्रास्ट्रक्चर से। यही वह बदलाव है, जो योगी सरकार को केवल सड़क और भवन बनाने वाली सरकार से अलग प्रशासनिक मॉडल के रूप में पेश करता है।

गोरखनाथ से लखनऊ तक की कहानी

इस पूरी यात्रा में एक चीज लगातार दिखाई देती है, वह है संस्थागत कामकाज पर जोर। गोरखनाथ पीठ की विरासत को उन्होंने केवल धार्मिक पहचान के रूप में नहीं संभाला, बल्कि उससे जुड़ी संस्थाओं और सामाजिक पहुँच को विस्तार दिया।

मुख्यमंत्री बनने के बाद उसी अनुभव को बड़े पैमाने पर लागू करने की कोशिश की। यही कारण है कि योगी आदित्यनाथ की कहानी को सिर्फ भगवा वस्त्र से सत्ता तक पहुँचने की कहानी के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है।

यह एक ऐसे व्यक्ति की यात्रा है, जिसने पहले एक पीठ की जिम्मेदारी संभाली, फिर संसद में राजनीतिक पहचान बनाई और अंततः देश के सबसे बड़े राज्य की प्रशासनिक मशीनरी को संभाला। गोरखनाथ में जिम्मेदारी एक संस्था की थी। वहीं लखनऊ में जिम्मेदारी 24 करोड़ से अधिक लोगों की है।

शायद यही योगी आदित्यनाथ की पूरी राजनीतिक यात्रा को समझने की सबसे सरल कुंजी है। पीठाधीश्वर के रूप में उन्होंने एक विरासत को संभाला और बढ़ाया; मुख्यमंत्री के रूप में उसी अनुभव को पूरे उत्तर प्रदेश के पैमाने पर लागू करने की कोशिश की।

इस यात्रा का मूल्यांकन इतिहास अंततः विकास, रोजगार, कानून-व्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य और आम आदमी के जीवन में आए वास्तविक बदलाव से करेगा। हालाँकि इतना जरूर कहा जा सकता है कि 1994 में गोरखनाथ पीठ से शुरू हुई वह यात्रा, आज उत्तर प्रदेश की राजनीति और प्रशासन की सबसे प्रभावशाली कहानियों में शामिल हो चुकी है।

अखिलेश सरकार में हुए 62+ हत्याओं को याद करा रहा ‘न भूले थे, न भूले हैं, न भूलेंगे’ पोस्टर: मुजफ्फरनगर दंगों की बरसी पर छलका पीड़ितों का दर्द

मुजफ्फरनगर दंगों की बरसी पर उत्तर प्रदेश के कई शहरों में ‘न भूले थे, न भूले हैं, न भूलेंगे’ लिखे पोस्टर लगा गए हैं। इन पोस्टर्स ने 2013 की उस भयावह हिंसा की याद फिर ताजा कर दी है। लखनऊ, मुजफ्फरनगर, अलीगढ़, सहारनपुर और शामली समेत कई शहरों में ये पोस्टर नजर आए। ‘न भूले थे, न भूले हैं, न भूलेंगे’ यह सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 2013 में हुई उस हिंसा की याद है, जिसने हजारों परिवारों की जिंदगी बदल दी थी।

मुजफ्फरनगर दंगों को याद करते हुए सबसे पहले तारीखों को समझना जरूरी है। अक्सर 7 सितंबर 2013 को दंगों की शुरुआत के तौर पर याद किया जाता है, लेकिन तनाव और सांप्रदायिक घटनाओं का सिलसिला इससे पहले, 27 अगस्त 2013 को कवाल की घटना से शुरू हो चुका था।

7 सितंबर को नंगला मंदौड़ में बड़ी महापंचायत हुई और उसके बाद हिंसा ने व्यापक रूप ले लिया। 27 अगस्त से 16 सितंबर के बीच मुजफ्फरनगर, शामली, बागपत, मेरठ और सहारनपुर में कुल 128 सांप्रदायिक घटनाएँ दर्ज की गईं, जिनमें 99 अकेले मुजफ्फरनगर में थीं। यानी कहानी किसी एक दिन की नहीं थी। करीब तीन हफ्तों तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश का बड़ा हिस्सा तनाव, हिंसा, आगजनी, पलायन और पुलिस-प्रशासन की चुनौती से गुजरता रहा।

कवाल से शुरू हुआ सिलसिला, दो FIR ने खड़ा किया बड़ा सवाल

27 अगस्त 2013 को जानसठ थाना क्षेत्र के गाँव कवाल में तीन युवकों की मौत हुई। मरने वालों में शाहनवाज पुत्र सलीम और सचिन तथा गौरव शामिल थे। इसी घटना के बाद इलाके में तनाव बढ़ता गया।

इस मामले में उसी दिन दो अलग-अलग FIR दर्ज हुईं। पहली FIR गौरव के पिता रविंद्र कुमार ने करीब 2:45 बजे दर्ज कराई थी। इसमें घटना को मोटरसाइकिल और साइकिल की टक्कर के बाद हुए विवाद और मारपीट से जोड़ा गया था। दूसरी FIR रात करीब 9:30 बजे शाहनवाज के पिता सलीम ने दर्ज कराई।

दोनों FIR में अंतर साफ दिखाई देता है। खास तौर पर छेड़छाड़ का जिक्र दोनों शुरुआती FIR में नहीं था, जबकि बाद की पंचायतों में ‘बहू-बेटी बचाओ’ जैसे नारे इस मामले के साथ जुड़ गए। यहीं से वह कहानी शुरू हुई, जिसने बाद में पूरे इलाके को हिंसा की आग में धकेल दिया।

कवाल की घटना के बाद पुलिस ने कई लोगों को हिरासत में लिया। न्यायमूर्ति विष्णु सहाय आयोग के रिकॉर्ड के मुताबिक ऐसे लोगों की संख्या 14 तक बताई गई, जिन्हें बाद में FIR में नाम न होने या पर्याप्त संदेह नहीं मिलने के आधार पर छोड़ दिया गया। आयोग ने बाद में इस शुरुआती पुलिस कार्रवाई को हिंसा बढ़ने के प्रमुख कारणों में गिना। यहीं से प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठने शुरू हुए।

28 अगस्त से बढ़ता तनाव, 30 अगस्त को बड़ी सभा

28 अगस्त को कवाल से लौटती भीड़ ने गाँव में घरों और दुकानों को नुकसान पहुंचाया। झोपड़ियों और ईंट भट्ठों में आग लगाए जाने की रिपोर्ट भी सामने आई। अगले दिन यानी 29 अगस्त को कवाल और उसके दो किलोमीटर के दायरे में धारा 144 लागू की गई। उसी दिन पथराव हुआ और रैपिड एक्शन फोर्स तैनात की गई लेकिन तनाव यहीं नहीं रुका।

30 अगस्त को मुजफ्फरनगर के शहीद चौक पर नमाज के बाद बड़ी सभा हुई। इस सभा को लेकर कोतवाली मुजफ्फरनगर में FIR दर्ज हुई। इस FIR में बहुजन समाज पार्टी से जुड़े कुछ नेताओं के नाम सामने आए। जाँच में समाने आया कि समाजवादी पार्टी के नेता राशिद सिद्दीकी ने सभा में भीड़ को उकसाने वाला भाषण दिया था। यानी तनाव अब गाँवों से निकलकर राजनीतिक और सार्वजनिक मंचों तक पहुंच चुका था।

31 अगस्त को नंगला मंदौड़ और सिखेड़ा क्षेत्र में एक और बड़ी पंचायत हुई। इसके बाद हिंसा की घटनाएँ बढ़ती गईं। प्रशासन के सामने चुनौती साफ थी लेकिन हालात लगातार नियंत्रण से बाहर होते जा रहे थे।

7 सितंबर की महापंचायत बनी बड़ा मोड़

7 सितंबर 2013 को नंगला मंदौड़ इंटर कॉलेज के मैदान में महापंचायत हुई। सरकारी अनुमान के मुताबिक इसमें करीब 15 से 20 हजार लोग थे, जबकि आयोग और प्रशासनिक आकलन में संख्या लगभग 40 से 45 हजार बताई गई।

महापंचायत में नरेश टिकैत, राकेश टिकैत, संगीत सोम, सुरेश राणा, कुंवर भारतेंदु सिंह, सोहनवीर सिंह, कपिल देव अग्रवाल, साध्वी प्राची समेत कई नेताओं की मौजूदगी रही।  

इस पंचायत के खिलाफ सिखेड़ा थाने में उसी दिन FIR दर्ज की गई। 40 लोगों को नामजद किया गया और सैकड़ों को अज्ञात के रूप में दर्ज किया गया। आयोग ने माना कि महापंचायत को प्रभावी तरीके से नहीं रोका गया। पुलिस अधिकारियों के आकलन और कार्रवाई पर भी सवाल उठाए गए।

गाँव-गाँव में फैल गई हिंसा

महापंचायत से लौटती भीड़ पर जौली नहर पट्टी और पुरबालियान मार्ग पर मुसलमानों ने हमला कर दिया। इस हमले में दोनों पक्षों से कई मौतें हुईं और कई लोग घायल हो गए।

8 सितंबर के बाद हिंसा मुजफ्फरनगर शहर तक सीमित नहीं रही बल्कि शामली और आसपास के ग्रामीण इलाकों तक आग पहुंच गई। इसके बाद मुजफ्फरनगर, शामली और मेरठ में कर्फ्यू लगाया गया। कुटबा-कुटबी, फुगाना, लिसाढ़, लांक, बहावड़ी, कतर और काकड़ा समेत कई गांवों से हमले, आगजनी, लूट और लोगों के पलायन की घटनाएं दर्ज हुईं।

प्रशासन के हाथ पाँव फूले तो सेना ने संभाला मोर्चा

शहर में आगजनी के बाद हालात बिगड़ते चले गए और प्रशासन इसे रोकने में विफल रहा जिसके बाद सेना बुलानी पड़ी। अखबारों की उस समय की रिपोर्टों में सुरक्षा बलों की तैनाती और कई गांवों को सेना द्वारा अपने नियंत्रण में लिए जाने की तस्वीरें भी दर्ज हैं।

9 सितंबर तक सेना ने कई गाँवों में मोर्चा संभाल लिया था। यानी जिस कानून-व्यवस्था को राज्य पुलिस और स्थानीय प्रशासन को संभालना था, वहाँ हालात इतने बिगड़ गए कि सेना की मदद लेनी पड़ी।

मौतों का आंकड़ा बढ़ता गया, परिवार उजड़ते गए

हिंसा के शुरुआती दिनों में सरकारी आंकड़ों में मौतों की संख्या लगातार बदलती रही। अक्टूबर 2013 में अखिलेश यादव सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि 6 अक्टूबर तक 46 मुस्लिम और 16 हिंदू मारे गए थे। मुजफ्फरनगर में 37 मुस्लिम और 15 हिंदू मौतों की जानकारी दी गई थी। 14 अक्टूबर तक कुल मौतों का आंकड़ा 63 पहुंच गया था। बाद के सरकारी और आयोग के आंकड़े 62 से 65 के बीच रहे।

हिंसा के बाद राहत शिविरों की तस्वीर ने त्रासदी की दूसरी परत सामने रखी। बड़ी संख्या में हिंदू परिवार अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए। यानी दंगों की कहानी सिर्फ मारे गए लोगों की संख्या तक सीमित नहीं थी। जिन लोगों ने अपनी दुकानें, घर, खेत और वर्षों की जमा पूंजी छोड़ी, उनके लिए भी 2013 एक ऐसी तारीख बन गई, जो कैलेंडर से मिटने वाली नहीं थी।

अखिलेश सरकार पर क्यों उठे सवाल?

मुजफ्फरनगर हिंसा के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी सरकार लगातार विपक्ष के निशाने पर रही। बीजेपी ने राज्यपाल के हस्तक्षेप की माँग करते हुए सरकार को बर्खास्त करने तक की माँग उठाई। कॉन्ग्रेस ने भी सरकार की कार्यशैली और कथित ढिलाई पर सवाल उठाए। 9 सितंबर के अखबारों में अखिलेश सरकार को उनके मुख्यमंत्री कार्यकाल की सबसे बड़ी चुनौती का सामना करते हुए बताया गया था।

अगले दिनों में अखिलेश यादव की सरकार पर जिम्मेदारी से बचने और हालात का ठीकरा विपक्षी दलों पर फोड़ने के आरोप लगा। आयोग ने मुख्य रूप से गलत आकलन, स्थानीय पुलिस की शिथिलता और प्रशासनिक स्तर पर लिए गए फैसलों को जिम्मेदार माना। डीएम और एसएसपी के तबादले तथा कुछ आरोपितों को हिरासत से छोड़े जाने से जाट समुदाय में पक्षपात का संदेश जाने की बात भी आयोग ने दर्ज की।

जाँच आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि प्रशासन ने हालात को संभालने में गलतियाँ कीं, पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठे और शुरुआती फैसलों ने अविश्वास को बढ़ाया।

उकसाने वाले भाषण और वीडियो ने भी बढ़ाया तनाव

दंगों के दौरान भड़काऊ भाषणों और वीडियो के प्रसार ने हालात को और खराब किया। 1 सितंबर के बाद शहीद चौक और नंगला मंदौड़ की सभाओं में दिए गए भाषणों से हालात बिगड़े जिसे सपा सरकार रोकने में नाकाम साबित हुई। नतीजा ये रहा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश कई दिनों तक जलता रहा। आयोग ने भी इसे तनाव बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण कारण माना।

अखिलेश सरकार के आदेश पर इस मामले में संगीत सोम पर आरोप लगाया गया लेकिन दंगों की जांच के लिए गठित SIT को वीडियो मामले में पर्याप्त सबूत नहीं मिले। विशेष अदालत ने भी इस रिपोर्ट को स्वीकारा।  

13 साल बाद भी खत्म नहीं हुई कानूनी कहानी

मुजफ्फरनगर दंगों के बाद 24 सितंबर 2013 को विशेष जाँच प्रकोष्ठ बनाया गया। सुप्रीम कोर्ट को 2014 में बताया गया कि यह प्रकोष्ठ 566 मामलों की जाँच कर रहा था, इनमें 533 मामले मुजफ्फरनगर से जुड़े थे।

लेकिन मुकदमों की लंबी यात्रा में बड़ी संख्या में आरोपी बरी भी हुए। 2017 से 2019 के बीच जिन 41 मामलों में फैसले आए, उनमें 40 में सभी आरोपी बरी हो गए। गवाहों के मुकरने, अदालत में गवाही के लिए उपस्थित न होने और तलाशी से जुड़े सबूतों पर निर्भरता जैसी वजहें सामने आईं।

कवाल के दोहरे हत्याकांड में 2019 में सात आरोपियों को दोषी ठहराया गया और उम्रकैद की सजा सुनाई गई। यानी 2013 की हिंसा की कानूनी कहानी भी उतनी ही उलझी हुई रही, जितनी उसकी राजनीतिक कहानी।

आज फिर वही सवाल सामने हैं

13 साल बाद जब शहरों की दीवारों पर लिखा है, ‘न भूले थे, न भूले हैं, न भूलेंगे’, तो उसके पीछे सिर्फ पुरानी राजनीतिक लड़ाई नहीं है। यह उन परिवारों की याद भी है जिन्होंने हिंसा देखी, घर छोड़े और राहत शिविरों में दिन काटे।

मुजफ्फरनगर दंगों ने यह सवाल हमेशा के लिए छोड़ दिया कि अगर शुरुआती तनाव के संकेतों को गंभीरता से लिया जाता, अगर कवाल के बाद प्रशासन ज्यादा प्रभावी ढंग से कार्रवाई करता, अगर पुलिस-प्रशासन हालात को समय रहते नियंत्रित कर लेता, तो क्या हिंसा इतनी दूर तक पहुंचती?

हैशटैग लगाओ, दुनिया बदलो… कितना आसान है न? क्या सोशल मीडिया लोकतंत्र को बर्बाद कर रहा है?

सदियों से इंसान एक ही खूबसूरत लेकिन शायद असंभव सपने के पीछे भागता आया है, एक ऐसे समाज का सपना, जहाँ सब कुछ आदर्श हो। प्राचीन दार्शनिकों की कल्पनाओं से लेकर प्रबुद्धता काल के बड़े-बड़े विचारों और बीसवीं सदी के खतरनाक सामाजिक प्रयोगों तक, इंसान बार-बार इस भ्रम में पड़ता रहा है कि समाज से हर तरह का तनाव, संघर्ष और दुख हमेशा के लिए खत्म किया जा सकता है।

आज इसी पुराने सपने को डिजिटल दुनिया ने एक नया ठिकाना दे दिया है।

सोशल मीडिया और उससे जुड़े डिजिटल एक्टिविस्ट सिर्फ दुनिया की कमियाँ नहीं गिनाते। कई बार वे एक ऐसी दुनिया का सपना भी बेचते हैं, जहाँ सब कुछ बिल्कुल सही हो, पूरी तरह न्याय हो, हर किसी के साथ बराबरी हो और हर व्यक्ति नैतिक रूप से सही हो।

लेकिन समस्या ये है कि ऐसी पूर्ण दुनिया कोई भी सरकार नहीं बना सकती। चाहे सरकार कितनी भी अमीर हो, कितनी भी सक्षम हो या कितनी भी दूरदर्शी क्यों न हो। यही आधुनिक Perfectionism यानी पूर्णतावाद असल में खतरनाक हो सकता है। क्योंकि ये धीरे-धीरे लोकतंत्र की नींव को ही कमजोर कर सकता है।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी सच्चाई यही है कि इंसान परफेक्ट नहीं है। इसलिए लोकतंत्र ऐसा सिस्टम है जो लोगों के मतभेदों और कमियों के बावजूद उन्हें साथ लेकर चलने की कोशिश करता है। ये कोई परफेक्ट या तेज़ सिस्टम नहीं है। बल्कि ये जानबूझकर ऐसा बनाया गया है कि बड़े से बड़ा मतभेद भी गृहयुद्ध में न बदले।

लेकिन जब सोशल मीडिया लोगों को ये उम्मीद दिलाने लगे कि हर नीति बिल्कुल सही होनी चाहिए, हर संस्था पूरी तरह ईमानदार होनी चाहिए और हर समस्या का तुरंत समाधान हो जाना चाहिए, तब लोकतंत्र की सामान्य कमियाँ भी लोगों को असहनीय लगने लगती हैं।

फिर सरकार की कोई गलती सिर्फ एक गलती नहीं रह जाती। उसे पूरे सिस्टम के भ्रष्ट होने का सबूत मान लिया जाता है। और फिर मांग उठती है कि पूरे सिस्टम को ही जड़ से बदल दिया जाए। यानी जिस शासन व्यवस्था को इंसान की कमियों और मतभेदों को संभालने के लिए बनाया गया था, उसी के खिलाफ़ अब एक ऐसी ‘पूर्णता’ की उम्मीद को हथियार बनाया जा रहा है, जिसे हासिल करना असल में संभव ही नहीं है।

आज के डिजिटल दौर के इस खतरे को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाकर इतिहास को देखना होगा। हमें समझना होगा कि समय-समय पर बड़ी-बड़ी आदर्शवादी कल्पनाएँ कैसे टूटती रही हैं, पश्चिमी और यूरोपीय सभ्यताओं में बार-बार कौन-सी कमजोरियाँ सामने आती रही हैं, और सबसे जरूरी बात- आज के सोशल मीडिया का पूरा ढांचा किस तरह लोकतंत्र के लिए एक नए तरह का संकट पैदा कर रहा है।

भ्रम की कहानी: काल्पनिक आदर्श समाज बार-बार क्यों असफल हुए?

‘यूटोपिया’ शब्द 1516 में सर थॉमस मोर ने बनाया था। यह ग्रीक भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना था- ‘अच्छी जगह’ और ‘ऐसी जगह जो कहीं है ही नहीं’। यानी मोर अपने समय में ही समझ गए थे कि एक बिल्कुल परफेक्ट समाज, असल में, शायद सिर्फ कल्पना में ही हो सकता है।

लेकिन इसके बावजूद इंसान ने सदियों तक इस कल्पना को हकीकत बनाने की कोशिश की। और जब-जब ऐसा करने की कोशिश हुई, नतीजे अक्सर बेहद विनाशकारी रहे।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण हमें अठारहवीं सदी के आखिर में फ्रांसीसी क्रांति के दौरान देखने को मिलता है। क्रांतिकारी इस विचार से प्रभावित थे कि अगर समाज की पुरानी व्यवस्थाओं को पूरी तरह बदल दिया जाए, तो इंसान और उसका स्वभाव भी बदला जा सकता है। इसलिए उन्होंने सदियों पुरानी परंपराओं, धर्म और संस्थाओं को तेजी से खत्म करने की कोशिश की।

शुरुआत में नारा था- स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व। लेकिन कुछ ही समय में यही क्रांति ‘आतंक के शासन’ में बदल गई। रोबेस्पिएर और उसके साथियों का मानना था कि एक आदर्श गणराज्य बनाने के लिए ‘सद्गुण’ के साथ ‘आतंक’ का इस्तेमाल भी जरूरी है। समस्या यही थी, जब आप एक ऐसा समाज बनाना चाहते हैं जहाँ कोई भ्रष्टाचार या असहमति हो ही नहीं, तो जो भी आपके आदर्श से असहमत होगा, वह आपको दुश्मन नजर आने लगेगा।

और फिर वही हुआ। जिस क्रांति ने एक बेहतर समाज का सपना दिखाया था, उसी ने अपने ही लोगों को गिलोटिन पर चढ़ाना शुरू कर दिया।

यही वह बात थी जिसकी ओर ब्रिटिश विचारक एडमंड बर्क ने इशारा किया था, जब इंसान खुद को ईश्वर की तरह समाज को पूरी तरह गढ़ने वाला समझने लगता है, तो उसके फैसले कई बार राक्षसी रूप ले लेते हैं। उन्नीसवीं सदी में भी ऐसे आदर्श समाज बनाने की कोशिशें जारी रहीं। हालांकि इस बार उनका रूप थोड़ा नरम था।

ब्रिटेन और अमेरिका में रॉबर्ट ओवेन और फ्रांस में चार्ल्स फूरियर जैसे विचारकों ने औद्योगिक क्रांति से पैदा हुई गरीबी और असमानता का समाधान एक नए तरह के समाज में खोजने की कोशिश की। उन्होंने ऐसे समुदाय बनाने की कोशिश की जहाँ प्रतिस्पर्धा, लालच और सामाजिक ऊँच-नीच को खत्म किया जा सके।

रॉबर्ट ओवेन ने अमेरिका के इंडियाना में न्यू हार्मनी नाम की एक ऐसी ही सामुदायिक व्यवस्था बनाई। लेकिन कुछ ही सालों में वह टूट गई। आपसी वैचारिक मतभेद, खराब प्रबंधन और सबसे बड़ी बात, इंसानी स्वभाव का किसी तय खांचे में फिट न होना; इसके पीछे बड़ी वजहें थीं।

चार्ल्स फूरियर ने भी ऐसे सहकारी समुदायों की कल्पना की थी जिन्हें उन्होंने ‘फैलनस्टेरी’ कहा। उनका मानना था कि अगर समाज को सही तरीके से व्यवस्थित कर दिया जाए, तो काम भी इंसान के लिए आनंद का अनुभव बन सकता है। लेकिन ये प्रयोग भी बड़े स्तर पर सफल नहीं हो सके।

इन सभी उदाहरणों में एक बात कॉमन थी। इन विचारों में इंसान को एक जटिल और स्वतंत्र प्राणी मानने के बजाय ऐसी चीज़ समझ लिया गया जिसे किसी भी मनचाहे साँचे में ढाला जा सकता है। और जब असली दुनिया उस कल्पना के मुताबिक नहीं चलती, तो समस्या विचार में नहीं, इंसानों में खोजी जाती है।

फिर दबाव बढ़ाया जाता है। नियम और सख्त किए जाते हैं। विरोध को दबाया जाता है। और आखिरकार आदर्श समाज बनाने की कोशिश, लोगों को मजबूर करने की कोशिश बन जाती है।

बीसवीं सदी में यह प्रवृत्ति अपने सबसे खतरनाक रूप में दिखाई दी। यूरोप के अधिनायकवादी शासन, खासकर सोवियत साम्यवाद और नाज़ीवाद, दोनों ने समाज को एक बिल्कुल नए आदर्श के मुताबिक ढालने का दावा किया।

मार्क्सवाद-लेनिनवाद ने एक ऐसे वर्गहीन और अंततः राज्यहीन समाज का सपना दिखाया जिसमें पुराने ‘बुर्जुआ’ ढाँचे का पूरी तरह अंत हो जाएगा। लेकिन इस सपने को लागू करने की कोशिशों में जबरन सामूहिकीकरण, अकाल, गुलाग और राजनीतिक सफाए जैसी भयावह घटनाएँ हुईं, जिनमें करोड़ों लोगों की जान गई।

दूसरी तरफ नाज़ीवाद ने नस्ल और राष्ट्र के पुनरुत्थान का सपना दिखाया। उसका अंत होलोकॉस्ट के औद्योगिक पैमाने पर किए गए नरसंहार और पूरे यूरोप को तबाह करने वाले युद्ध में हुआ। इतिहास से एक बात बहुत साफ दिखाई देती है- जब कोई समाज पूर्णता हासिल करने के नाम पर इंसानी स्वभाव और उसकी सीमाओं को नज़रअंदाज़ करता है, तो वह अक्सर सुधार के बजाय विनाश की तरफ बढ़ने लगता है।

ये आदर्शवादी प्रयोग सिर्फ संयोग से असफल नहीं हुए। उनके भीतर ही एक बुनियादी समस्या थी, उन्होंने इंसान को वैसा स्वीकार नहीं किया जैसा वह वास्तव में है। इंसान जटिल है। उसमें स्वार्थ भी है और परोपकार भी, अच्छाई भी है और बुराई भी, तर्क भी है और भावनाएँ भी। और शायद इसी वजह से एक परफेक्ट समाज बनाने की कोशिश, बार-बार एक ही गलती करती है, वह इंसान को बदलने से पहले इंसान को समझना भूल जाती है।

यूरोप का अनुभव: उत्थान, पतन और हमेशा टिके रहने का भ्रम

अगर हम यूरोप के इतिहास को देखें, तो आधुनिक ‘आदर्श समाज’ की कल्पनाओं को लेकर सावधान रहने की वजह और साफ दिखाई देती है। यूरोपीय सभ्यता का इतिहास लंबे समय से एक जैसे चक्रों से गुजरता रहा है, बड़े सपने, बड़ी महत्वाकांक्षाएँ, ताकत और विस्तार… और फिर किसी न किसी मोड़ पर भारी गिरावट।

रोमन साम्राज्य हो, पवित्र रोमन साम्राज्य, पुनर्जागरण के दौर के अलग-अलग यूरोपीय राजतंत्र या उन्नीसवीं सदी की साम्राज्यवादी ताकतें, इन सभी को कभी न कभी लगा कि उनकी व्यवस्था लंबे समय तक चलती रहेगी।

लेकिन इतिहास ने बार-बार दिखाया कि कोई भी व्यवस्था हमेशा के लिए नहीं चलती। संस्थाएँ कितनी भी मजबूत और विकसित क्यों न हों, बाहरी संकट, अंदर का भ्रष्टाचार और जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास धीरे-धीरे उन्हें कमजोर कर सकते हैं। बीसवीं सदी में यूरोप ने इसका सबसे भयानक उदाहरण देखा। दो विश्व युद्धों ने यूरोप को बुरी तरह तबाह कर दिया और दुनिया में उसकी पुरानी ताकत और पकड़ लगभग खत्म हो गई। जिस यूरोप को अपनी तकनीकी और सभ्यतागत श्रेष्ठता पर बहुत भरोसा था, वही यूरोप अनजाने में ऐसी तबाही की तरफ बढ़ गया जिसकी कीमत करोड़ों लोगों ने चुकाई।

लेकिन 1945 के बाद यूरोप ने फिर खुद को खड़ा किया। युद्ध के खंडहरों से एक नई व्यवस्था निकली; कल्याणकारी राज्य, मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाएँ और बाद में यूरोपीय संघ जैसी व्यवस्थाएँ।

यह मॉडल पूरी दुनिया के लिए एक उदाहरण बन गया। विचार ये था कि पूंजीवाद से पैदा होने वाली असमानताओं और समस्याओं को सामाजिक सुरक्षा के जरिए कम किया जाए और साथ ही फासीवाद और साम्यवाद जैसी चरम विचारधाराओं को दोबारा मजबूत होने से रोका जाए।

लेकिन आज यूरोप और बड़े पैमाने पर पश्चिमी लोकतांत्रिक दुनिया फिर से कई तरह के दबावों का सामना कर रही है।

अर्थव्यवस्था की धीमी रफ्तार, घटती आबादी, यूरोपीय एकीकरण को लेकर मतभेद और अपनी सभ्यता को लेकर बढ़ता आत्मविश्वास का संकट, इन सबने युद्ध के बाद बनी उस व्यवस्था को फिर सवालों के घेरे में ला दिया है।

यहीं से एक पुराना विचार फिर सुनाई देने लगता है कि यूरोपीय समाज धीरे-धीरे पतन की ओर बढ़ता है।

लेकिन पतन का मतलब हमेशा कोई अचानक आने वाली हॉलीवुड फिल्म जैसी तबाही नहीं होता।

कई बार सभ्यताएँ धीरे-धीरे कमजोर होती हैं। उनका सामाजिक मेल-जोल कम होने लगता है, लोग अलग-अलग वैचारिक खेमों में बंटने लगते हैं और वे साझा कहानियाँ और मूल्य कमजोर पड़ने लगते हैं जो कभी पूरे समाज को एक साथ जोड़ते थे।

आज इन मुश्किलों का सामना करने के लिए व्यावहारिक और धीरे-धीरे होने वाले सुधारों की जरूरत है।

लेकिन इसके बजाय सार्वजनिक बहस में डिजिटल आदर्शवाद का असर बढ़ता जा रहा है।

सोशल मीडिया पर जटिल समस्याओं के आसान समाधान पेश किए जाते हैं।

खरबों डॉलर की अर्थव्यवस्था हो, अलग-अलग विचारों और पहचानों वाला समाज हो या कोई गहरा सामाजिक संकट; इन सबका समाधान कभी-कभी ऐसे बताया जाता है मानो बस कुछ लोगों को ‘गलत’ घोषित कर दो, सही हैशटैग चला दो या अपनी संस्थाओं की नैतिकता पर लगातार सवाल उठाते रहो… और फिर समाज अपने आप एक आदर्श स्थिति में पहुँच जाएगा।

यानी असली दुनिया की जटिल समस्याओं के लिए भी डिजिटल दुनिया एक बेहद सरल जवाब देती है, सही लोगों को दोष दो, सही नारा लगाओ और मान लो कि समस्या हल हो गई।

सोशल मीडिया और नया यूटोपियनवाद

पहले के दौर में जब लोग एक आदर्श समाज बनाने का सपना देखते थे, तो उसके पीछे कोई बड़ा नेता, कोई क्रांतिकारी संगठन या कोई राजनीतिक आंदोलन होता था।

आज ऐसा नहीं है।

आज का नया यूटोपियनवाद सिलिकॉन वैली के सर्वर और सोशल मीडिया के एल्गोरिदम से चलता है और दुनिया भर में फैले डिजिटल एक्टिविस्टों के नेटवर्क के जरिए फैलता है।

सोशल मीडिया का पूरा ढांचा लोकतांत्रिक व्यवस्था के उस तरीके से काफी अलग है, जिसमें धीरे-धीरे बातचीत, समझौते और सहमति से फैसले लिए जाते हैं।

सोशल मीडिया कंपनियों का कारोबार इस बात पर टिका है कि लोग ज्यादा से ज्यादा समय प्लेटफॉर्म पर बिताएँ और ज्यादा से ज्यादा प्रतिक्रिया दें। और लोगों को सबसे ज्यादा प्रतिक्रिया किस चीज़ पर होती है? भावनाओं पर; खासकर गुस्से, नैतिक आक्रोश और किसी मुद्दे पर सामूहिक रूप से भड़कने पर।

इसलिए सोशल मीडिया पर राजनीति भी धीरे-धीरे सरल और ज्यादा आक्रामक होती चली गई है।

जटिल नीतिगत बहसों को अक्सर ‘अच्छाई बनाम बुराई’ की लड़ाई में बदल दिया जाता है। आपको बस ये तय करना होता है कि कौन सही है और कौन गलत।

बीच की कोई जगह नहीं।

इसी माहौल में डिजिटल एक्टिविस्ट खुद को नैतिकता के नए पहरेदार की तरह पेश करने लगते हैं।

वे समाज से ऐसी वैचारिक और नैतिक पूर्णता की उम्मीद करने लगते हैं, जिसे कोई इंसान तो क्या, कोई सरकार भी कभी पूरी तरह हासिल नहीं कर सकती।

X, TikTok और Instagram जैसे प्लेटफॉर्मों पर अक्सर ऐसी मांगें तेजी से फैलती हैं जो बेहद कठोर और चरम (बोलचाल की भाषा में इसे ‘एक्ट्रिमिस्ट’ कहा जाने लगा है) होती हैं।

बारीकियों और संदर्भ की कोई खास जगह नहीं बचती। अगर आप थोड़ा संतुलित रुख अपनाते हैं, तो आपको गलत व्यवस्था का समर्थक मान लिया जाता है। अगर आप समझौता करते हैं, तो आपको अपने ही विचारों से विश्वासघात करने वाला बता दिया जाता है।

अब जरा सोचिए कि इसका असर सरकार और नीतियों पर कैसे पड़ता है।

एक लोकतांत्रिक सरकार के लिए कानून बनाना कोई आसान काम नहीं है। सरकार को अलग-अलग लोगों और समूहों के हितों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। बजट सीमित होता है, संसाधन सीमित होते हैं और हर फैसले के कुछ फायदे तो कुछ नुकसान होते हैं।

मान लीजिए सरकार को परिवहन व्यवस्था सुधारनी है, स्वास्थ्य सेवा बेहतर करनी है या प्रवासन की समस्या संभालनी है। उसे कई अलग-अलग हितों के बीच संतुलन बनाना पड़ेगा। और कई बार उसे ऐसी कमियाँ भी स्वीकार करनी पड़ेंगी जिन्हें तुरंत दूर करना संभव नहीं है।

लेकिन सोशल मीडिया की राजनीति इस पूरी प्रक्रिया को ‘पूर्णता’ के पैमाने पर परखती है।

कोई कानून पूरी तरह आदर्श नहीं है, तो वह भ्रष्टाचार का सबूत है।

किसी सरकारी संस्था में कमी है, तो मान लिया जाता है कि यह जानबूझकर की गई गड़बड़ी है।

किसी नीति में समझौता हुआ है, तो उसे कमजोरी या विश्वासघात समझ लिया जाता है।

और यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण अंतर है।

डिजिटल एक्टिविस्टों को सरकार चलाने की जिम्मेदारी नहीं उठानी पड़ती। उन्हें देश का बजट संतुलित नहीं करना होता, सीमाओं की सुरक्षा नहीं करनी होती, दूसरी सरकारों से बातचीत नहीं करनी होती और न ही हर दिन ऐसे फैसले लेने पड़ते हैं जिनमें किसी न किसी पक्ष को निराश होना ही है।

इसलिए वे वैचारिक रूप से पूरी तरह ‘शुद्ध’ रहने का दावा कर सकते हैं।

यहीं से समस्या शुरू होती है।

जब लोगों को इंटरनेट पर हर मुद्दे का एकदम साफ, नैतिक और आदर्श जवाब दिखाई देता है, तो लोकतंत्र की असली प्रक्रिया, जो धीमी है, उलझी हुई है और जिसमें लगातार समझौते करने पड़ते हैं, बहुत निराशाजनक लगने लगती है।

और यही अंतर धीरे-धीरे बढ़ता जाता है।

इंटरनेट हमें जिस दुनिया की उम्मीद दिखाता है और राजनीति जिस दुनिया में वास्तव में काम करती है, उनके बीच की दूरी जितनी बढ़ती जाती है, लोकतंत्र पर लोगों का भरोसा उतना ही कमजोर होता जाता है।

बारीक समझ का अंत और लोकतंत्र की कमजोरी

लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वह किसी ‘परफेक्ट समाज’ का सपना बेचने के बजाय इस बात को स्वीकार करता है कि इंसान और समाज दोनों अपूर्ण हैं।

दार्शनिक कार्ल पॉपर ने अपनी किताब The Open Society and Its Enemies में इसी तरह के विचारों के खिलाफ तर्क दिया था। वे इस सोच के विरोधी थे कि इतिहास किसी तय दिशा में आगे बढ़ रहा है और हम पूरे समाज को एक झटके में नए सिरे से बना सकते हैं।

इसके बजाय पॉपर ने ‘क्रमिक सामाजिक बदलाव’ (Piecemeal social engineering) की बात की।

मतलब ये कि समाज की किसी खास समस्या; जैसे- गरीबी, बीमारी या अन्याय को पहचानो, उसका धीरे-धीरे समाधान निकालो और फिर देखो कि उस समाधान से कोई नई समस्या तो पैदा नहीं हो गई। अगर हुई है, तो उसे भी धीरे-धीरे ठीक करो।

यही लोकतंत्र की असली ताकत है।

लोकतंत्र इसलिए काम करता है क्योंकि वह धरती पर स्वर्ग बनाने का वादा नहीं करता। वह हमें इससे कहीं ज्यादा व्यावहारिक चीज़ देता है; बिना हिंसा के सरकार बदलने का रास्ता, लोगों के अधिकारों की रक्षा और ऐसा मंच जहाँ अलग-अलग हितों और विचारों के बीच कानून और बातचीत के जरिए रास्ता निकाला जा सके।

लेकिन सोशल मीडिया इस लोकतांत्रिक संस्कृति को कई तरीकों से कमजोर कर रहा है।

1. साझा सच्चाई पर भरोसा कम होना

लोकतंत्र के लिए जरूरी है कि लोग कम से कम कुछ बुनियादी तथ्यों पर सहमत हों। लेकिन सोशल मीडिया के एल्गोरिदम हर व्यक्ति को उसकी पसंद के हिसाब से अलग-अलग जानकारी दिखाते हैं।

नतीजा ये है कि लोग सिर्फ नीतियों पर एक-दूसरे से असहमत नहीं हैं। कई बार दोनों पक्षों के पास दुनिया को देखने के लिए बिल्कुल अलग-अलग ‘तथ्य’ होते हैं।

जब समाज के पास सच को परखने का कोई साझा आधार ही नहीं बचता, तो लोकतांत्रिक बहस धीरे-धीरे विचारों की बहस न रहकर गुटों की लड़ाई बन जाती है।

2. कैंसल करने और डर का माहौल

सोशल मीडिया पर लगातार आलोचना या ‘कैंसल’ होने का डर लोगों को खुलकर बोलने से रोक सकता है।

राजनेता, शिक्षक, पत्रकार और आम लोग भी कई बार सिर्फ इसलिए अपनी बात कहने से बचते हैं कि कहीं सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ अभियान न शुरू हो जाए।

और जब लोग अपनी बात कहने से डरने लगें, तो खुली बहस कैसे होगी?

3. राजनीति का बहुत तेजी से अस्थिर होना

सोशल मीडिया को तेजी चाहिए। नया मुद्दा, नया विवाद, नया ट्रेंड और कुछ ही घंटों में पूरा ध्यान उस पर चला जाता है।

इसका असर राजनीति पर भी पड़ता है। लंबे समय की योजनाओं और मुश्किल समस्याओं पर लगातार काम करने के बजाय सरकारों पर भी हर नए ट्रेंडिंग मुद्दे पर तुरंत प्रतिक्रिया देने का दबाव बढ़ता जाता है।

नतीजा ये होता है कि सरकारें कई बार किसी समस्या को जड़ से हल करने के बजाय एक ट्रेंडिंग मुद्दे से दूसरे ट्रेंडिंग मुद्दे की तरफ भागती रहती हैं।

और जब ये तीनों चीजें एक साथ आती हैं, तो लोकतंत्र का सबसे जरूरी हिस्सा, मध्यमार्ग और संतुलन, कमजोर पड़ने लगता है।

जो लोग बातचीत, समझौते और धीरे-धीरे बदलाव की बात करते हैं, उनकी आवाज़ अक्सर उन ज्यादा उग्र लोगों के बीच दब जाती है जो मानते हैं कि मौजूदा व्यवस्था को पूरी तरह तोड़कर ही एक नई और बेहतर दुनिया बनाई जा सकती है।

यही लोकतंत्र के लिए असली खतरा है; जब सुधार की जगह क्रांति, समझौते की जगह पूर्णता और बातचीत की जगह वैचारिक युद्ध हावी होने लगे।

राजनीतिक यथार्थवाद को फिर से समझना

अगर राहुल गांधी ये चेतावनी दे रहे हैं कि लोकतंत्र खतरे में है, तो उनकी बात को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। सोशल मीडिया जिस तरह आज काम करता है, वह लोकतंत्र की सोच और उसकी संस्थाओं के लिए सचमुच एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

डिजिटल दुनिया लोगों को लगातार एक ऐसी ‘आदर्श व्यवस्था’ की तस्वीर दिखाती रहती है, जो असल जिंदगी में संभव ही नहीं है। इससे लोग अपनी सरकार, संस्थाओं और पूरी राजनीतिक व्यवस्था से हमेशा असंतुष्ट रहने लगते हैं।

राजनीति भी धीरे-धीरे ऐसी हो जाती है जहाँ हर विवाद पर तुरंत प्रतिक्रिया चाहिए, हर समस्या का तुरंत समाधान चाहिए और हर समाधान बस एक नए सोशल मीडिया कैंपेन की दूरी पर दिखाई देने लगता है।

इस डिजिटल दौर में लोकतंत्र को बचाए रखने के लिए हमें अपनी सोच और अपनी संस्थाओं, दोनों में कुछ बदलाव करने होंगे।

सबसे पहले हमें इंटरनेट से पैदा होने वाली इन अवास्तविक उम्मीदों को थोड़ा कम करना होगा और राजनीतिक यथार्थवाद को फिर से समझना होगा।

इसके लिए नागरिकों में जागरूकता जरूरी है। लोगों को ये समझना होगा कि सोशल मीडिया पर दिखने वाला हर आक्रोश स्वाभाविक नहीं होता, कई बार एल्गोरिदम ही उसे बढ़ा रहे होते हैं।

हमें अपने नेताओं से भी ये उम्मीद करनी होगी कि वे हर ट्रेंडिंग मुद्दे के पीछे भागने के बजाय लंबी अवधि की समस्याओं पर ध्यान दें।

और सिर्फ सोशल मीडिया पर बहस करने के बजाय लोगों को स्थानीय समुदायों, सामाजिक संगठनों और लोकतांत्रिक संस्थाओं के वास्तविक काम में भी हिस्सा लेना होगा।

इतिहास हमें एक और महत्वपूर्ण बात सिखाता है।

समाज सिर्फ बाहरी दुश्मनों के हमले से नहीं टूटते। कई बार वे तब भी कमजोर पड़ने लगते हैं जब उनके अपने लोग ही अपनी व्यवस्था पर भरोसा खो देते हैं।

डिजिटल आदर्शवाद हमें एक ऐसी दुनिया का सपना दिखाता है जिसमें सब कुछ परफेक्ट हो। लेकिन इतिहास बार-बार बता चुका है कि ऐसा समाज बनाना लगभग हमेशा एक भ्रम ही साबित हुआ है।

इसलिए आज लोकतंत्र की असली रक्षा इस बात में नहीं है कि हम उसे परफेक्ट बनाने की कोशिश करें।

उसकी असली रक्षा इस बात में है कि हम उसकी कमियों को स्वीकार करें, उसकी गलतियों को सुधारते रहें और फिर भी उस व्यवस्था पर भरोसा बनाए रखें।

क्योंकि एक ऐसा समाज जो स्वतंत्र है, जटिल है और अपनी गलतियों को सुधारने की क्षमता रखता है, वह किसी भी सोशल मीडिया पर दिखाए जाने वाले ‘परफेक्ट समाज’ के सपने से कहीं ज्यादा कीमती है।

बेचे जाने और लीज पर देने का अंतर भूल बैठे हैं अखिलेश यादव, JPNIC ‘बिक गया’ या सिर्फ लीज पर गया? सपा प्रमुख के दावे और CAG की रिपोर्ट के बीच का सच

लखनऊ के गोमतीनगर में खड़ा जयप्रकाश नारायण इंटरनेशनल सेंटर, यानी JPNIC एक बार फिर सुर्खियों में है। करीब एक दशक पहले शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट आज तक ठीक से जनता के काम नहीं आ पाया और अब योगी सरकार ने तय किया है कि इसका बचा-खुचा निर्माण और आगे का संचालन निजी हाथों में सौंप दिया जाए। सरकार की दलील सीधी है, परिसर भी पूरा हो जाएगा, और रखरखाव का बोझ भी खजाने पर नहीं पड़ेगा।

बस यही ऐलान होते ही अखिलेश यादव मैदान में कूद पड़े। उनका कहना है कि योगी सरकार JPNIC को ‘बेच’ रही है, निजीकरण के नाम पर सरकारी संपत्ति ठिकाने लगाई जा रही है।

तो सवाल उठता है कि क्या वाकई JPNIC बिक गया? क्या इसकी मिल्कियत किसी कंपनी के नाम हो गई? जिस प्रोजेक्ट को लेकर आज इतना हंगामा है, उसके निर्माण में खर्च को लेकर खुद CAG ने क्या पाया था? इन सबका जवाब जानने के लिए कहानी को शुरू से पकड़ना होगा।

पहले जानिए, JPNIC है क्या चीज

गोमतीनगर की करीब 18-20 एकड़ ज़मीन पर बना यह एक बड़ा सा बहुउद्देशीय परिसर है, जिसे शुरू से ही एक आधुनिक कन्वेंशन और सांस्कृतिक केंद्र के तौर पर सोचा गया था। नक्शे में एक स्टेट लेवल कन्वेंशन सेंटर, करीब 2,000 लोगों के बैठने लायक हॉल, ऑडिटोरियम, स्पोर्ट्स कोर्ट, ओलंपिक साइज का स्विमिंग पूल, होटल, पार्किंग और जयप्रकाश नारायण से जुड़ा एक म्यूजियम ब्लॉक, सब कुछ शामिल था। मतलब सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि आयोजनों, सम्मेलनों और खेल गतिविधियों के लिए बना एक पूरा कॉम्प्लेक्स।

इसकी नींव 2013 में अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री रहते पड़ी थी। तब लागत आंकी गई थी ₹265.59 करोड़ लेकिन जैसे-जैसे साल बीतते गए, यह आंकड़ा भी बढ़ता गया और नवंबर 2016 आते-आते संशोधित लागत पहुँच गई ₹864.99 करोड़ तक। CAG की ऑडिट रिपोर्ट में भी यही दो आँकड़े दर्ज हैं, शुरुआती 265.59 करोड़ और संशोधित 864.99 करोड़।

यहीं से यह कहानी सिर्फ ‘एक अधूरी इमारत’ की नहीं रह जाती, यह सार्वजनिक पैसे के हिसाब-किताब और जवाबदेही की कहानी बन जाती है।

लखनऊ के गोमती नगर में स्थित जयप्रकाश नारायण इंटरनेशनल सेंटर। फोटो साभार- X

लागत तीन गुने से भी ज्यादा कैसे बढ़ी

निर्माण की जिम्मेदारी लखनऊ विकास प्राधिकरण यानी LDA को दी गई थी। मार्च 2013 में जब लागत ₹265.59 करोड़ तय हुई, उसके कुछ ही महीनों बाद मई 2013 में LDA ने काम एक ठेकेदार को सौंप दिया ₹149.60 करोड़ में जो अनुमानित लागत से करीब 12.35 फीसदी ज्यादा था।

फिर धीरे-धीरे प्रोजेक्ट में बदलाव जुड़ते गए। जैसे, शुरुआती डिज़ाइन में हेलिपैड का कोई ज़िक्र नहीं था। बाद में नेशनल बिल्डिंग कोड की शर्तों के चलते छत पर हेलिपैड जोड़ना पड़ा, और इसके लिए नींव में 600 मिमी की जगह 1,000 मिमी वाले पाइल इस्तेमाल करने पड़े। अब यह बदलाव अपने आप में कोई असामान्य बात नहीं, निर्माण के दौरान ऐसे फेरबदल होते रहते हैं। असली सवाल इस काम पर चुकाई गई दर को लेकर उठा।

और यहीं CAG ने उंगली उठाई

ऑडिट में सामने आया कि 1,000 मिमी पाइल के काम के लिए ठेकेदार को ₹8,773.69 प्रति मीटर की दर से भुगतान हुआ, जबकि CAG के मुताबिक 2013 की लागू दर के हिसाब से यह सिर्फ ₹8,201.40 प्रति मीटर बनती थी। कुल 24,680 मीटर के इस काम पर यह छोटा-सा अंतर जुड़कर करीब ₹1.41 करोड़ का ‘अनुचित लाभ’ ठेकेदार की जेब में गया और उतनी ही रकम का घाटा सरकारी खजाने को हुआ। रिपोर्ट में इसे साफ शब्दों में ‘undue benefit’ कहा गया है।

यह कोई विपक्ष का लगाया आरोप नहीं बल्कि खुद देश के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की ऑडिट रिपोर्ट में दर्ज है।

योगी सरकार ने गड़बड़ियों की जाँच कराई

2017 में सरकार बदली और योगी आदित्यनाथ ने JPNIC के खर्चों पर आई रिपोर्ट के आधार पर जाँच कराई जिससे काम रुक गया। इसके बाद बरसों तक यह विशाल परिसर लगभग सुनसान पड़ा रहा। आखिरकार 2025 में सरकार ने फैसला लिया कि इसे फिर से LDA के जिम्मे किया जाए, ताकि अधूरा काम पूरा हो सके और कोई संचालन मॉडल तय हो।

अब हुआ क्या

अगस्त 2026 में योगी कैबिनेट ने JPNIC को निजी क्षेत्र के जरिए चलवाने के प्रस्ताव पर मुहर लगा दी। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक खुली निविदा प्रक्रिया के बाद वृंदावन बॉटलर्स प्राइवेट लिमिटेड और रॉकवुड होटल्स एंड रिजॉर्ट्स के एक संयुक्त उपक्रम को चुना गया।

अब यहीं पर ध्यान देने वाली बात है कि ‘बेचना’ और ‘लीज पर देकर चलवाना’, दोनों एक चीज नहीं हैं। सरकार ने न तो JPNIC की जमीन बेची है, न ही इसकी सरकारी मिल्कियत किसी कंपनी के नाम की है। जो व्यवस्था बनी है वह लीज और सहभागिता की है और कंपनी को संचालन का अधिकार मिलेगा, मालिकाना हक सरकार के पास ही रहेगा। जैसे कि म्यूजियम ब्लॉक, जो LDA के नियंत्रण में ही रहने वाला है।

तो अखिलेश यादव का यह कहना कि JPNIC ‘बेच दिया गया’ सरासर उनकी सरकार के विरोध और खुद असफल होने की कुंठा का प्रतीक है। यह बिक्री नहीं लंबी अवधि की लीज पर निजी संचालन की व्यवस्था है।

निजी कंपनी को बदले में करना क्या होगा

अब इस फैसले का वह हिस्सा जो अक्सर नारेबाजी में दब जाता है। JPNIC अभी भी पूरी तरह तैयार नहीं है, इसमें इंटीरियर, इलेक्ट्रिकल सिस्टम, फायर सेफ्टी जैसे कई काम बाकी हैं, जिन पर करीब ₹200 से ₹250 करोड़ और खर्च होने का अंदाजा है और यह खर्च सरकार नहीं, निजी ऑपरेटर अपनी जेब से उठाएगा।

इसके अलावा कंपनी को LDA को शुरुआत में ₹10.11 करोड़ का अपफ्रंट प्रीमियम और ₹25 करोड़ रुपये की परफॉर्मेंस गारंटी देनी होगी। संचालन शुरू होते ही हर साल ₹6 करोड़ का भुगतान होगा, जिसमें हर वर्ष 5 फीसदी की बढ़ोतरी भी जुड़ी है।

यानी सालों से अधूरा पड़ा जो परिसर सरकार खुद पूरा नहीं करवा पाई, उसे अब पूरा करने, चलाने और संभालने के लिए निजी पैसा लगाया जा रहा है।

पहले लगे 821.74 करोड़ का क्या होगा

एक और अहम पहलू है जो अक्सर बहस में छूट जाता है। सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि इस प्रोजेक्ट पर अब तक करीब ₹821.74 करोड़ जारी हो चुके हैं। यह रकम सरकार ने LDA को दी थी और अब इसे एक ‘ट्रांसफर्ड लोन’ माना जा रहा है, जिसे LDA को अगले 30 सालों में वापस चुकाना होगा।

मतलब सरकार का मौजूदा मॉडल सिर्फ ‘कंपनी को सौंप दो’ तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें पहले खर्च हो चुके पैसे की वसूली, बाकी निर्माण, आगे के संचालन का खर्च और JPNIC को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाना, ये सारी चीज़ें एक साथ जुड़ी हैं।

अखिलेश को नहीं पता बेच देने और लीज पर देने फर्क

विपक्ष का काम ही है सवाल पूछना और इस मायने में अखिलेश यादव का सरकार पर निशाना साधना कोई अटपटी बात नहीं। लेकिन जब आरोप ‘संपत्ति बेचने’ जैसा गंभीर हो, तो तथ्य और राजनीतिक भाषा में फर्क करना ज़रूरी हो जाता है।

तथ्य यह है कि JPNIC की शुरुआत खुद अखिलेश सरकार के दौर में हुई। तथ्य यह भी है कि इसकी लागत 265 करोड़ से बढ़कर CAG के रिकॉर्ड के मुताबिक 865 करोड़ तक पहुँच गई। तथ्य यह भी कि CAG ने पाइल के काम में दर के हेरफेर से 1.41 करोड़ के नुकसान की आपत्ति दर्ज की।

यह भी सच है कि 2017 के बाद जाँच बैठी, काम बरसों रुका रहा और आखिरकार 2025-26 में सरकार ने इसे LDA के जरिए फिर से पटरी पर लाने और निजी भागीदारी से संचालित करने का रास्ता चुना जिसके एवज में उसे प्रीमियम, गारंटी और नियमित लीज आय मिलेगी।

इन सारी बातों को जोड़कर देखें, तो सीधे ‘JPNIC बेच दिया गया’ कह देना पूरे मामले को बहुत ज्यादा सरल बना देना है।

’97 हजार करोड़’ वाली रिपोर्ट का JPNIC से क्या नाता है

अखिलेश सरकार के दौर के वित्तीय रिकॉर्ड को लेकर 2018 में एक और CAG रिपोर्ट सामने आई थी, जिसका ज़िक्र अक्सर राजनीतिक बहसों में होता है। 2014 से मार्च 2017 के बीच उत्तर प्रदेश के विभिन्न विभागों से जुड़े ₹97,906.27 करोड़ के उपयोगिता प्रमाणपत्र लंबित थे और CAG ने कहा था कि इससे धन के दुरुपयोग का जोखिम पैदा होता है।

असली सवाल बेचने का नहीं, इस्तेमाल में लाने का है

पिछले करीब दस साल से JPNIC उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक अधूरे वादे की तरह खड़ा रहा है और सैकड़ों करोड़ खर्च होने के बावजूद जनता को इसका कोई फायदा नहीं मिला। अब सरकार इसका संचालन मॉडल बदलने जा रही है।

बहस सिर्फ इस एक लाइन पर टिकी है कि ‘JPNIC बेच दिया गया’, तो मौजूदा तथ्यों के आधार पर यह दावा टिकता नहीं दिखता। मामला बिक्री का नहीं, लंबी लीज और निजी भागीदारी से चलाए जाने का है।

इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिस प्रोजेक्ट की लागत 265 करोड़ से बढ़कर 865 करोड़ तक पहुँच गई, जिसके निर्माण में CAG ने ठेकेदार को दिए गए 1.41 करोड़ के अनुचित फायदे पर आपत्ति जताई और जो सालों तक अधूरा पड़ा रहा, उसी को अब पूरा कराने के लिए सरकार निजी पैसे का सहारा ले रही है।

UP में तेजी से बढ़ रही है ‘गो-इकोनॉमी’, दूध के साथ-साथ गोमूत्र भी बन रहा है रोजगार का साधन: शैम्पू, साबुन और ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर सबमें हो रहा इस्तेमाल

गाय, गोबर और गौमूत्र का उपहास उड़ाना हमारे देश में एक आम बात बन चुकी है। जब भी इनकी उपयोगिता पर बात होती है, तो अक्सर इसे गंभीरता से लेने के बजाय इसका मजाक बनाया जाता है। लेकिन जमीनी हकीकत इस संकीर्ण सोच से परे एक बेहद उम्मीद जगाने वाले ‘इकोनॉमिक मॉडल’ को दर्शाती है।

आज उत्तर प्रदेश में देसी गायों के गोबर और गौमूत्र का इस्तेमाल करके करीब 200 तरह के प्रोडक्ट्स तैयार किए जा रहे हैं, जिनकी इंटरनेशनल मार्केट में भारी डिमांड है। इसमें शैम्पू, साबुन और अर्क से लेकर ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर तक शामिल हैं। जिस चीज को बेकार मानकर बहा दिया जाता था, आज वही किसानों के लिए अतिरिक्त नकद आय का एक मजबूत जरिया बन चुकी है।

बाजार में बिकने वाला महंगा ऑर्गेनिक फूड इसी प्राकृतिक खाद और गौमूत्र से बने जैविक पेस्टिसाइड्स के दम पर उगता है, जो मिट्टी को जहर-मुक्त और उपजाऊ बनाने का काम करते हैं।

इसका एक प्रत्यक्ष और सफल मॉडल उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में देखा जा सकता है। वहाँ FPO यानी फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन के ज़रिए 15 गाँवों के स्थानीय संग्रह केंद्रों से रोज 500 लीटर गौमूत्र 10 रुपए प्रति लीटर के हिसाब से खरीदा जा रहा है।

इसके भंडारण के लिए गाँवों में 200 लीटर क्षमता वाले टैंक लगाए गए हैं। इस पूरी व्यवस्था से गाँव की लगभग 300 महिलाएँ जुड़ी हुई हैं, जिन्हें प्रति लीटर 2 रुपए का कमीशन मिलने के साथ-साथ FPO में शेयरहोल्डर भी बनाया गया है।

इस पूरे मॉडल ने किसान के पास मौजूद गाय को एक ‘थ्री-इन-वन’ इकोनॉमिक इंजन में बदल दिया है। किसान को दूध से सीधी कमाई होती है, गोबर से खेत के लिए मुफ्त खाद मिलने के कारण रासायनिक खाद का खर्च शून्य हो जाता है, और गौमूत्र की बिक्री से प्रति लीटर नकद मुनाफा मिलता है।

बुलंदशहर के 15 गाँवों से शुरू हुआ यह प्रयोग अगर पूरे राज्य में लागू होता है, तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था का कायाकल्प कर सकता है। ऐसे में सवाल उन लोगों से है जो गाय, गोबर और गौमूत्र का नाम सुनते ही मजाक बनाने लगते हैं- जब यही व्यवस्था किसान का खर्च घटाकर उसकी आय बढ़ा रही है और रोजगार के नए साधन बना रही है, तो उपहास किस बात का है?

स्पष्ट है कि समस्या गोबर या गौमूत्र में नहीं, बल्कि उस सोच में है जो किसी संसाधन की उपयोगिता समझे बिना उसका मजाक उड़ाने लगती है।

मुस्लिमों को रिझाने में 2017 में औंधे मुँह गिरे थे अखिलेश, आरक्षण का वादा किया लेकिन घोषणापत्र खाली रहा: 2027 के चुनावी रण में क्या फिर से अखिलेश करेंगे मुस्लिम आरक्षण पर बात?

2017 के यूपी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले अखिलेश यादव ने मुस्लिम आरक्षण का वही कार्ड फिर उठाया था, जो समाजवादी पार्टी की राजनीति में बरसों से रचा-बसा रहा है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि इसके बावजूद 2017 में सपा 224 सीटों से लुढ़ककर सिर्फ 47 सीटों पर आ सिमटी थी।

यूपी की राजनीति में चुनाव नजदीक आते ही कुछ पुराने मुद्दे धूल झाड़कर फिर सामने आ जाते हैं और मुस्लिम आरक्षण भी उन्हीं में से एक है। 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा था कि उनकी सरकार मुस्लिमों को आरक्षण देने का वादा तो कर चुकी है, मगर कानूनी अड़चनें आड़े आ रही हैं।

अखिलेश ने संविधान में संशोधन की जरूरत बताकर भरोसा दिलाया था कि मिल-बैठकर कोई रास्ता निकाला जाएगा। साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि सरकारी योजनाओं में मुस्लिम आबादी को 20 फीसदी हिस्सेदारी दी जाएगी। यह कोई अचानक आया बयान नहीं था, इसकी जड़ें सपा की पुरानी चुनावी राजनीति में काफी गहरे तक जमी हैं।

2012 में चला था 18 फीसदी आरक्षण का दांव

इससे पहले 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने मुस्लिमों को आरक्षण देने का वादा किया था। पार्टी के घोषणापत्र में पिछड़े मुस्लिमों के लिए आरक्षण के साथ-साथ मुस्लिम बहुल इलाकों में कॉलेज खोलने और गरीब परिवारों के बच्चों की फीस में राहत देने जैसे वादे भी शामिल थे।

आगे चलकर इस वादे को अक्सर ‘18 फीसदी मुस्लिम आरक्षण’ कहकर ही राजनीतिक बहस में घसीटा जाता रहा। 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले खुद मुलायम सिंह यादव ने भी दोहराया था कि पार्टी मुस्लिमों को उनकी आबादी के हिसाब से आरक्षण देने के अपने वादे पर कायम है। लेकिन इस कहानी का एक दूसरा पहलू भी है, जो अक्सर नजरअंदाज हो जाता है।

आजम खान विधानसभा में अपने वादे से मुकरे

अगस्त 2016 में उसी सपा सरकार में मंत्री रहे आजम खान ने विधानसभा में यह कहकर सबको चौंका दिया था कि पार्टी ने कभी 18 फीसदी आरक्षण का वादा किया ही नहीं था और संविधान बदले बिना ऐसा आरक्षण देना मुमकिन नहीं। यानी खुद सपा के भीतर भी इस वादे की व्याख्या पर एकमत नहीं था।

फिर मई 2016 में अखिलेश यादव ने खुद इस वादे को दोहराया। कानूनी अड़चनों का हवाला देते हुए उन्होंने संविधान संशोधन की जरूरत बताई और कहा कि उनकी पार्टी 20 फीसदी आबादी के हक के लिए लड़ती रहेगी। यहीं से मुस्लिम आरक्षण सिर्फ सामाजिक न्याय का मसला न रहकर, यूपी की चुनावी राजनीति में वोट के गणित का सवाल बन जाता है।

यूपी में मुस्लिम आबादी आखिर कितनी है?

2011 की जनगणना के मुताबिक उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी करीब 3 करोड़ 84 लाख है, यानी कुल आबादी का 19.26 फीसदी। राज्य सरकार के दस्तावेजों में भी यही आँकड़ा दर्ज है, जबकि हिंदू आबादी करीब 79.73 फीसदी बताई जाती है।

इसका मतलब लगभग हर पाँचवाँ शख्स मुस्लिम है। यही वजह है कि यूपी की चुनावी राजनीति में किसी भी बड़ी पार्टी के लिए मुस्लिम मतदाताओं को नजरअंदाज करना आसान नहीं रहा।

समाजवादी पार्टी के लिए तो यह गणित और भी अहम है क्योंकि लंबे अरसे से उसकी राजनीति को MY यानी मुस्लिम-यादव समीकरण से जोड़कर देखा जाता रहा है। 2022 के चुनावी विश्लेषणों में भी मुस्लिम और यादव समुदाय को सपा का पारंपरिक कोर वोटबैंक माना गया था।

लेकिन 2017 में यही कार्ड चला क्यों नहीं?

2012 में सपा ने 403 में से 224 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। मगर 5 साल बाद 2017 में तस्वीर पूरी तरह पलट गई। भाजपा 312 सीटों के साथ बहुमत में आई, जबकि सपा महज 47 सीटों पर सिमट गई। उसका वोट शेयर घटकर 21.82 फीसदी रह गया, यानी कुल मिलाकर 177 सीटों का भारी नुकसान।

2017 में अखिलेश यादव ने पार्टी की छवि विकास, एक्सप्रेसवे, मेट्रो, लैपटॉप और युवा राजनीति से जोड़ने की कोशिश की थी। कांग्रेस के साथ हुए गठबंधन को भी राजनीतिक विश्लेषक अक्सर मुस्लिम वोटों के बिखराव रोकने की रणनीति से जोड़कर देखते रहे। इस गठबंधन के पीछे का मकसद करीब 20 फीसदी मुस्लिम वोट को एकजुट रखना भी था।

हालाँकि 2017 के सपा घोषणापत्र में 2012 जैसी साफ-साफ मुस्लिम आरक्षण की राजनीति उतनी उभरकर सामने नहीं आई थी। अखिलेश के नए घोषणापत्र से मुस्लिम केंद्रित मुद्दे काफी हद तक गायब हो गए थे। जहाँ 2012 में साफ तौर पर 18 फीसदी आरक्षण का वादा था, वहीं 2017 में ऐसे किसी वादे को उतनी तवज्जो नहीं दी गई।

मुलायम से अखिलेश तक, MY राजनीति की विरासत

समाजवादी पार्टी की मुस्लिम राजनीति को ठीक से समझना है तो मुलायम सिंह यादव के दौर तक जाना जरूरी है। 1990 में अयोध्या में कारसेवकों पर हुई पुलिस फायरिंग के वक्त मुलायम सिंह यादव यूपी के मुख्यमंत्री थे। आगे चलकर उन्होंने कई बार इस फैसले का बचाव भी किया। 2013 में उन्होंने कहा था कि गोली चलवाने का उन्हें अफसोस है, लेकिन उस वक्त देश की एकता और मंदिर-मस्जिद विवाद का सवाल इतना बड़ा था कि उनके पास और कोई चारा नहीं बचा था।

2016 में तो उन्होंने इससे भी आगे जाकर कह दिया था कि बाबरी मस्जिद को बचाने के लिए गोली चलाना जरूरी था और इससे ज्यादा जानें भी जातीं तो भी वह पीछे नहीं हटते। बाद की राजनीतिक व्याख्याओं में इस फैसले को अक्सर मुलायम की मुस्लिम राजनीति और MY समीकरण की नींव से जोड़ा गया।

आरक्षण की असली संवैधानिक पेचीदगी क्या है?

अखिलेश यादव ने 2016 में संविधान संशोधन की बात यूँ ही नहीं की थी। दरअसल, भारत का संविधान धर्म को आरक्षण का आधार नहीं मानता। आरक्षण सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन जैसे संवैधानिक आधारों पर ही दिया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के मशहूर इंद्रा साहनी फैसले में आरक्षण की सामान्य सीमा को 50 फीसदी के दायरे में रखने का सिद्धांत भी काफी अहम माना जाता है, और केंद्र सरकार भी संसद में इसी न्यायिक व्यवस्था का हवाला देती रही है।

मतलब मुस्लिम समुदाय के भीतर जो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े समूह हैं, उन्हें OBC व्यवस्था के तहत आरक्षण मिलना एक बात है, जबकि पूरे मुस्लिम समुदाय को सिर्फ धर्म के आधार पर अलग कोटा दे देना बिल्कुल अलग संवैधानिक सवाल है। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में भी मुस्लिम OBC समूहों और अलग-अलग राज्यों की आरक्षण व्यवस्थाओं का जिक्र मिलता है।

दिलचस्प यह भी है कि मार्च 2025 में अखिलेश यादव ने कर्नाटक में मुस्लिम आरक्षण को लेकर छिड़ी बहस के दौरान साफ कह दिया था कि धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं होना चाहिए, बल्कि यह पिछड़ों, दलितों और वंचित वर्गों को मिलना चाहिए। यानी 2016 के अखिलेश और 2025 के अखिलेश के रुख में काफी फर्क नजर आता है।

योगी सरकार में मुसलमानों को क्या मिला?

योगी सरकार के 2026-27 के बजट में अल्पसंख्यक कल्याण के लिए ₹2,058 करोड़ रखे गए हैं। प्रधानमंत्री जन विकास कार्यक्रम के तहत अल्पसंख्यक बहुल 21 जिलों में बहुक्षेत्रीय विकास के लिए ₹500 करोड़ का प्रावधान है, वहीं अल्पसंख्यक छात्रों की पूर्वदशम और दशमोत्तर छात्रवृत्ति के लिए ₹391 करोड़ तय किए गए हैं।

राज्य के अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के तहत छात्रवृत्ति, फीस प्रतिपूर्ति, गरीब अल्पसंख्यक परिवारों की बेटियों की शादी के लिए अनुदान, शिक्षा ऋण, बेरोजगार युवाओं के लिए टर्म लोन के साथ-साथ अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में स्कूल, स्वास्थ्य, पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं जुटाने वाली योजनाएं भी चल रही हैं।

अब निगाहें 2027 पर

उत्तर प्रदेश की मौजूदा 403 सीटों वाली विधानसभा का कार्यकाल 2027 में पूरा होना है और अभी चुनाव की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। ऐसे में 2027 में अखिलेश यादव का मुस्लिमों को आरक्षण का ऊंट किस करवट बैठेगा ये देखना दिलचस्प होगा। उनके हालिया बयानों से तस्वीर थोड़ी ज़्यादा उलझी हुई नजर आती है।

2025 में वह धर्म आधारित आरक्षण से दूरी बना चुके हैं। 2026 में उनकी राजनीति में PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का फॉर्मूला ज़्यादा उभरता दिख रहा है। यानी पुराना MY फॉर्मूला अब PDA के बड़े और व्यापक फ्रेम में पेश किया जा रहा है। लेकिन असली सवाल यही है कि क्या सिर्फ सामाजिक समीकरण और आरक्षण की राजनीति 2027 में काफी होगी?

2017 के नतीजे यह साफ बता चुके हैं कि सिर्फ किसी एक वोटबैंक को साधना सत्ता की गारंटी नहीं देता। 2012 में 224 सीटें जीतने वाली सपा 2017 में 47 सीटों तक सिमट गई थी। 2022 में भी भाजपा ने सरकार बनाई और सपा को विपक्ष में ही बैठना पड़ा।

अब असल सवाल तो यह होगा कि क्या अखिलेश यादव मुस्लिम आरक्षण या PDA जैसे सामाजिक समीकरणों के साथ-साथ रोजगार, कानून-व्यवस्था, निवेश, उद्योग, किसान, महिला सुरक्षा और बुनियादी ढांचे जैसा एक ठोस एजेंडा भी पेश कर पाते हैं जो सिर्फ किसी एक वोटबैंक तक सीमित न रहकर पूरे उत्तर प्रदेश को अपनी बात कह सके।

क्योंकि चुनाव आते-आते पुराना कार्ड फिर से निकाला जा सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि मतदाता हर बार वही खेल उसी तरह खेलें और शायद यही 2017 की सबसे बड़ी सीख थी।