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नदी जोड़ो मेगा प्रोजेक्ट Part II: बुंदेलखंड को केन-बेतवा रिवर लिंक परियोजना की सबसे ज्यादा जरूरत क्यों?

नदी जोड़ो परियोजना Part I में आपने पढ़ा कि भारत के लिए ये मेगा प्रोजेक्ट क्यों जरूरी है। अब Part II में पढ़ें कि इस मेगा प्रोजेक्ट का फ्लैगशिप प्रोजेक्ट यानी केन-बेतवा नदी लिंक प्रोजेक्ट क्या है। क्या यह प्रोजेक्ट वाकई सूखाग्रस्त बुंदेलखंड की तस्वीर और तकदीर बदलने में कामयाब हो पाएगा? पढ़ें सबकुछ विस्तार से…

भारत सरकार ने सोमवार (10 अगस्त 2026) को राज्यसभा में कहा कि भारत के अतिमहत्वाकांक्षी नदी जोड़ो परियोजना में शीर्ष पर केन-बेतवा नदी लिंक प्रोजेक्ट है। फिलहाल इसी को पूरा करने पर भारत सरकार का जोर है। इसके अलावा सभी प्रोजेक्ट्स पर राज्य सरकारें अपने हिसाब से काम कर रही हैं।

वहीं राष्ट्रीय महत्व की एक और परियोजना पोलावरम इरिगेशन प्रोजेक्ट (PIP) को आंध्र प्रदेश सरकार और पोलावरम प्रोजेक्ट अथॉरिटी (PPA) मिलकर पूरा कर रहे हैं। ये गोदावरी और कृष्णा नदी को जोड़ने वाला प्रोजेक्ट है, जो फाइनल स्टेज में है। इस प्रोजेक्ट को अब तक केंद्र सरकार से ₹20,658 करोड़ की मदद मिल चुकी है। राज्यसभा में जल शक्ति मंत्रालय के केंद्रीय राज्यमंत्री राज भूषण चौधरी ने इस बारे में पूछे गए सवाल पर लिखित में जवाब दिया है।

अब आते हैं मूल मुद्दे पर। दरअसल, भारत में नदियों को आपस में जोड़कर राष्ट्रीय जल ग्रिड बनाने के दशकों पुराने सपने को जब धरातल (Ground Level) पर उतारने की ऐतिहासिक शुरुआत हुई, तो इसके लिए जिस पहली परियोजना को चुना गया, वह है- ‘केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट’ (Ken-Betwa Link Project – KBLP)।

देश के पहले ‘रिवर-लिंकिंग मॉडल’ की शुरुआत और केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट

राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी (NWDA) द्वारा चिन्हित की गई 30 अंतर-बेसिन जल स्थानांतरण (Inter-Basin Water Transfer) परियोजनाओं में से केन-बेतवा पहली ऐसी राष्ट्रीय परियोजना बनी, जिस पर केंद्र सरकार, मध्य प्रदेश सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार ने औपचारिक और ऐतिहासिक सहमति जताई। 8 दिसंबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने इस परियोजना के लिए ₹44,605 करोड़ की विशाल धन राशि को मंजूरी दी।

यह महत्वाकांक्षी परियोजना मुख्य रूप से मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैले मध्य भारत के सबसे सूखाग्रस्त, पिछड़े और सामाजिक-आर्थिक रूप से उपेक्षित क्षेत्र बुंदेलखंड (Bundelkhand) की किस्मत और तस्वीर बदलने के इरादे से बनाई गई है।

केन-बेतवा प्रोजेक्ट का आधिकारिक मैप, फोटो साभार: nwda . gov . in

भौगोलिक दृष्टिकोण से देखें तो केन और बेतवा दोनों ही नदियाँ मध्य प्रदेश से निकलती हैं। मध्य प्रदेश के रायसेन जिले से निकलने वाली बेतवा और कटनी जिले से निकलने वाली केन नदी उत्तर पूर्व दिशा की ओर बहते हुए अंततः उत्तर प्रदेश में अलग-अलग स्थानों पर यमुना नदी में जाकर मिल जाती हैं।

केंद्रीय जल आयोग (CWC) और NWDA के गहन हाइड्रोलॉजिकल अध्ययनों (Hydrological Studies) के अनुसार, केन नदी बेसिन में उसकी अपनी कृषि, पेयजल और भविष्य की स्थानीय जरूरतों को पूरा करने के बाद भी मानसूनी बारिश के दौरान भारी मात्रा में जल ‘अधिशेष’ (Surplus) बच जाता है। यह अधिशेष पानी हर साल उफान के रूप में बहकर यमुना में गिरता है और अंततः समुद्र में बेकार चला जाता है।

केन-बेतवा प्रोजेक्ट फैक्ट बॉक्स, डाटा: NWDA (फोटो साभार: AI ChatGPT)

दूसरी ओर बेतवा नदी का बेसिन एक ‘कमी वाला बेसिन’ (Deficit Basin) है। बेतवा नदी के आसपास के इलाकों (विशेषकर ऊपरी और मध्य बेसिन) में कृषि, उद्योगों और पेयजल के लिए पानी की भारी किल्लत बनी रहती है। इसी जल असंतुलन को संतुलित करने के लिए केन नदी के अधिशेष पानी को 221 किलोमीटर लंबी नहर के जरिए मोड़कर बेतवा नदी में पहुँचाने का वैज्ञानिक खाका तैयार किया गया।

दौधन बाँध और 221 किमी लंबी लिंक नहर है परियोजना का केंद्र बिंदु

केन-बेतवा लिंक परियोजना सिविल इंजीनियरिंग और जल प्रबंधन का एक बेहद जटिल, आधुनिक और विशाल ढाँचा है। इस परियोजना की पूरी कार्यप्रणाली मुख्य रूप से दो बड़े इंजीनियरिंग संरचनात्मक घटकों पर टिकी हुई है-

  • दौधन बाँध (Daudhan Dam): परियोजना का मुख्य केंद्र बिंदु और रीढ़ मध्य प्रदेश के छतरपुर और पन्ना जिलों की सीमा पर केन नदी पर बनने वाला दौधन बाँध (Daudhan Dam) है। दौधन बाँध की ऊँचाई लगभग 77 मीटर और लंबाई लगभग 2,031 मीटर प्रस्तावित है।

दौधन बाँध के तहत बनने वाला डैम एक बहुउद्देशीय (Multipurpose) जलाशय होगा, जिसकी कुल जल भंडारण क्षमता लगभग 2,853 लाख घनमीटर (Million Cubic Meters – MCM) होगी। इसका मुख्य कार्य मानसून के दौरान केन नदी के प्रचंड जलप्रवाह को रोकना और उसे साल भर के उपयोग के लिए सुरक्षित रखना है।

केन-बेतना लिंक प्रोजेक्ट के तकनीकी पहलुओं को दर्शाती प्रतीकात्मक तस्वीर, डाटा : NWDA (फोटो साभार: AI ChatGPT)
  • 221 किलोमीटर लंबी मुख्य लिंक नहर (Main Link Canal): दौधन बाँध के जलाशय से एक विशाल, कंक्रीट-लाइन्ड (concrete-lined) मुख्य लिंक नहर निकाली जाएगी। यह नहर लगभग 221 किलोमीटर लंबी होगी, जिसमें से करीब 21 किलोमीटर का हिस्सा उत्तर प्रदेश की सीमा में और बाकी हिस्सा मध्य प्रदेश में होगा।

इंजीनियरिंग चमत्कार के तौर पर नहर के मार्ग में प्राकृतिक ढलान (Gravity Flow) का अधिकतम उपयोग किया गया है। लेकिन जहाँ भौगोलिक बाधाएँ या ऊँचे इलाके आते हैं, वहाँ आधुनिक लिफ्ट पंपिंग स्टेशन (Lift Pumping Stations), भूमिगत सुरंगें (Tunnels) और एक्वाडक्ट्स (Aqueducts) बनाए जा रहे हैं ताकि पानी बिना किसी रुकावट के बेतवा नदी के ऊपरी बेसिन तक पहुँच सके।

नहर के मार्ग में पड़ने वाले स्थानीय तालाबों, चंदेलकालीन बावड़ियों और अन्य छोटी नदियों (जैसे बीना, ओर आदि) को भी इस मुख्य नहर प्रणाली से जोड़ा जाएगा ताकि रास्ते में पड़ने वाले सैकड़ों ग्रामीण इलाकों को सीधे पानी दिया जा सके।

2 चरणों में पूरा होगा केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट

केन-बेतवा परियोजना के विशाल आकार, भारी भरकम बजट और तकनीकी जटिलता को देखते हुए प्रशासनिक सुगमता के लिए इसके क्रियान्वयन को दो प्रमुख चरणों (Phase-I & Phase-II) में विभाजित किया गया है-

केन-बेतना लिंक प्रोजेक्ट फेज-1: पहले चरण का मुख्य ध्यान केन नदी के जल को रोकने और उसे बेतवा तक पहुँचाने के प्राथमिक ढाँचे पर केंद्रित है। इसके तहत मुख्य निर्माण कार्य किए जाएँगे, जिसमें दौधन बाँध का निर्माण, 221 किमी लंबी मुख्य लिंक नहर, लोअर ओर परियोजना (Lower Orr Project), कोठा बैराज (Kotha Barrage) और दो पावर हाउस बनाए जा रहे हैं।

इसके अलावा बिजली उत्पादन के लिए दौधन बाँध स्थल पर दो मुख्य पावर हाउस स्थापित किए जाएँगे, जिनकी कुल क्षमता 103 मेगावाट जलविद्युत (Hydro Power) और 27 मेगावाट सौर ऊर्जा (Solar Power) पैदा करने की होगी।

चरण-1 का प्राथमिक लक्ष्य छतरपुर, पन्ना, टीकमगढ़ और बांदा जैसे सबसे ज्यादा जल-संकटग्रस्त सीमावर्ती जिलों को तत्काल पेयजल और सिंचाई का पानी उपलब्ध कराना है।

केन-बेतना लिंक प्रोजेक्ट के तकनीकी पहलुओं को दर्शाती प्रतीकात्मक तस्वीर, डाटा : NWDA (फोटो साभार: AI ChatGPT)

केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट फेज-2: दूसरे चरण में बेतवा नदी और उसकी सहायक नदियों पर पूरक संरचनाओं (Subsidiary Structures) का निर्माण किया जाना है ताकि स्थानांतरित पानी का कुशल वितरण हो सके। इसके तहत 3 प्रमुख परियोजनाओं का निर्माण शामिल है-

  1. बीना कॉम्प्लेक्स बहुउद्देशीय परियोजना (Bina Complex Multipurpose Project): इसके तहत सागर जिले में बीना और उसकी सहायक नदियों पर बाँध व नहरें बनाई जाएँगी।
  2. कोठा बैराज (Kotha Barrage): विदिशा जिले में बेतवा नदी पर बैराज निर्माण किया जाएगा।
  3. लोअर ओर परियोजना (Lower Orr Project): शिवपुरी और गुना जिलों के लिए ओर नदी पर बाँध बनाए जाएँगे।

चरण-2 का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि केन नदी से लाया गया पानी बेतवा के कैचमेंट एरिया में अंतिम छोर पर स्थित खेत तक पहुँचे और किसी भी स्तर पर पानी का नुकसान न हो।

बुंदेलखंड के जिलों को होने वाले प्रत्यक्ष लाभ बहुत ज्यादा

बुंदेलखंड मध्य भारत का एक ऐसा ऐतिहासिक क्षेत्र है जो पिछले कई दशकों से भीषण सूखे, कुओं और हैंडपंपों के सूखने, गरीबी और बड़े पैमाने पर खेतिहर मजदूरों के पलायन (Migration) के लिए जाना जाता है। बुंदेलखंड क्षेत्र मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कुल 13 जिलों में फैला हुआ है। केन-बेतवा परियोजना को इस पूरे इलाके के लिए एक ‘संजीवनी बूटी’ के रूप में देखा जा रहा है।

मध्य प्रदेश के 10 जिलों छतरपुर, पन्ना, टीकमगढ़, निवाड़ी, दमोह, सागर, दतिया, विदिशा, शिवपुरी और रायसेन में कुल 6.35 लाख हेक्टेयर इलाके की सिंचाई होगी। इसके साथ ही 41 लाख आबादी को पेयजल मिलेगा। भूजल रिचार्ज होने के साथ ही कृषि कार्य में भी स्थायित्व आएगा।

वहीं उत्तर प्रदेश के 4 जिलों बाँदा, महोबा, झांसी और ललितपुर की 2.51 लाख हेक्टेयर भूमि सिंचित होगी। 21 लाख आबादी को हर घर नल से जल मिलेगा। साथ ही बांदा और महोबा जिलों में सूखे का लगभग खात्मा हो जाएगा।

दरअसल, गर्मी के दिनों में इन 13 जिलों में जलस्तर खतरनाक रूप से नीचे चला जाता है। ग्रामीणों को पानी के एक-एक मटके के लिए 3 से 4 किलोमीटर दूर पैदल भटकना पड़ता है। इस परियोजना के पूरा होने से न केवल हर घर को साफ पेयजल मिलेगा, बल्कि मवेशियों के पीने और स्थानीय उद्योगों के लिए भी पानी की निरंतर उपलब्धता बनी रहेगी।

सिंचाई, पेयजल और औद्योगिक जल के वितरण का गणित

NWDA और जल शक्ति मंत्रालय की विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) के अनुसार, केन-बेतवा लिंक परियोजना के सामाजिक-आर्थिक आँकड़े बेहद क्रांतिकारी बदलाव का इशारा करते हैं। जिसमें-

साल भर सिंचाई (Annual Irrigation): परियोजना के पूरी तरह चालू होने पर हर साल कुल 10.62 लाख हेक्टेयर (10,62,000 hectares) कृषि योग्य भूमि में वार्षिक सिंचाई हो सकेगी। इसमें से 6.35 लाख हेक्टेयर क्षेत्र मध्य प्रदेश में सिंचित होगा तो 2.51 लाख हेक्टेयर क्षेत्र उत्तर प्रदेश के सूखाग्रस्त जिलों में सिंचित होगा।। इसके अलावा 1.76 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र को मौजूदा नहर प्रणालियों के सुदृढ़ीकरण से पानी मिलेगा। सिंचाई का यह नियमित साधन बुंदेलखंड के किसानों को मानसून की अनिश्चितता से पूरी तरह आजाद कर देगा, जिससे वे साल में केवल एक फसल के बजाय दो या तीन फसलें (रबी, खरीफ और जायद) उगा सकेंगे।

केन-बेतवा प्रोजेक्ट, प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT)

सुरक्षित पेयजल (Safe Drinking Water): केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट से बुंदेलखंड की लगभग 62 लाख आबादी (41 लाख मध्य प्रदेश में और 21 लाख उत्तर प्रदेश में) को पाइपलाइन और नलों के जरिए 24 घंटे सुरक्षित और साफ पीने का पानी मिलेगा। इससे दूषित जल से होने वाली बीमारियों (Water-Borne Diseases) पर रोक लगेगी और महिलाओं को पानी ढोने की शारीरिक परेशानी से मुक्ति मिलेगी।

औद्योगिक जल आपूर्ति (Industrial Water Supply): उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में बन रहे ‘डिफेंस औद्योगिक कॉरिडोर’ (Defense Industrial Corridor), स्थानीय कृषि प्रसंस्करण इकाइयों (food processing units) और छोटे-मझोले उद्योगों के लिए लगभग 62 MCM पानी विशेष रूप से आवंटित किया गया है। पर्याप्त पानी मिलने से बुंदेलखंड में नए औद्योगिक निवेश का मार्ग प्रशस्त होगा।

जलविद्युत उत्पादन और भूजल रिचार्ज का प्रभाव

स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन (Clean Energy Generation): दौधन बाँध पर स्थापित होने वाले दो पावर स्टेशनों के माध्यम से कुल 103 मेगावाट हाइड्रो पावर (Hydro Power) का उत्पादन किया जाएगा। इसके अलावा जलाशय के सतह और नहर के किनारों पर 27 मेगावाट सौर ऊर्जा (Solar Power) संयंत्र स्थापित किए जाएंगे।

इस तरह कुल 130 मेगावाट स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन होगा। इस बिजली का उपयोग प्राथमिक रूप से परियोजना के अपने लिफ्ट सिंचाई पंपों (Lift Irrigation Pumps) को चलाने में किया जाएगा और बची हुई बिजली स्थानीय ग्रामीण ग्रिड को दी जाएगी, जिससे बिजली संकट दूर होगा।

भूजल रिचार्ज (Groundwater Recharge): बुंदेलखंड का अधिकांश धरातलीय ढाँचा कठोर चट्टानों (Hard Crystalline Rocks) से बना है। यहाँ बारिश का पानी स्वाभाविक रूप से आसानी से जमीन के भीतर नहीं रिस पाता, जिसके कारण लगातार ट्यूबवेलों के इस्तेमाल से भूजल स्तर खतरनाक रूप से गिर चुका था।

जब 221 किलोमीटर लंबी विशाल लिंक नहर और दौधन बाँध का विशाल जलाशय बनेगा, तो आसपास के दर्जनों किलोमीटर के क्षेत्र में निरंतर सीपेज (Seepage) और जल रिसाव होगा। इससे पूरे बुंदेलखंड क्षेत्र का वाटर टेबल (Water Table) कई मीटर ऊपर उठेगा। सूखे पड़े पारंपरिक कुएँ, बावड़ियाँ और बोरवेल खुद ब खुद जीवित हो उठेंगे, जो सूखे के समय सुरक्षा कवच का काम करेंगे।

कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कायापलट से पलायन पर लगेगा स्थाई ब्रेक

बुंदेलखंड की सबसे बड़ी सामाजिक त्रासदी रही है-‘मजबूरी का पलायन’ (Forced Migration)। पानी के अभाव में फसलें जल जाने के कारण हर साल मानसून खत्म होते ही लाखों युवा, छोटे किसान और पूरे के पूरे परिवार दिल्ली, मुंबई, सूरत और अहमदाबाद जैसे महानगरों में दिहाड़ी मजदूरी करने चले जाते थे।

केन-बेतवा परियोजना इस मानवीय और आर्थिक दुष्चक्र को तोड़ने की क्षमता रखती है, इससे होने वाले लाभों में-

  • फसल विविधीकरण (Crop Diversification): अब तक किसान सिर्फ ज्वार, बाजरा या कम पानी वाली तिलहन फसलों तक सीमित थे। सिंचाई का पानी मिलने से वे गेहूँ, चना, सरसों, दलहन के साथ-साथ हरी सब्जियां, फल और नकदी फसलों (Cash Crops) की खेती कर सकेंगे।
  • स्थानीय रोजगार का सृजन: खेतों में साल भर काम रहने से कृषि मजदूरों को गाँव में ही रोजगार मिलेगा। साथ ही डेरी फार्मिंग (Dairy Farming), पशुपालन और मत्स्य पालन (Fisheries) को जबरदस्त बढ़ावा मिलेगा।
  • आर्थिक स्थिरता: कृषि में पैदावार और कमाई निश्चित होने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, जिससे पलायन की दर में भारी कमी आएगी।

पर्यावरणीय प्रभाव और पन्ना टाइगर रिजर्व पर गहरा संकट (जरूरी मुद्दा)

जहाँ एक तरफ केन-बेतवा लिंक विकास और खुशहाली के वादे करती है, वहीं दूसरी तरफ इसका सबसे विवादास्पद, संवेदनशील और चिंताजनक पहलू है – पर्यावरण और वन्यजीवों पर पड़ने वाला विनाशकारी प्रभाव।

पन्ना टाइगर रिजर्व (Panna Tiger Reserve) का डूबना: दौधन बाँध का निर्माण मध्य प्रदेश के विश्वप्रसिद्ध पन्ना टाइगर रिजर्व (PTR) के ठीक पेट यानी उसके कोर एरिया के भीतर हो रहा है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, बाँध बनने की वजह से पन्ना टाइगर रिजर्व की कुल 5,803 हेक्टेयर वन भूमि पूरी तरह से जलमग्न हो जाएगी। इस 5,803 हेक्टेयर में से लगभग 4,141 हेक्टेयर क्षेत्र पन्ना का ‘कोर टाइगर हैबिटैट’ (Core Tiger Habitat) है।

पन्ना वही टाइगर रिजर्व है जिसने 2009 में अपने सभी बाघों को खोने के बाद एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक बाघ पुनरुद्धार कार्यक्रम के जरिए अपनी आबादी दोबारा बसाई थी। बाँध के कारण बाघों के शिकार करने का क्षेत्र और उनके गलियारे (Corridors) हमेशा के लिए दो हिस्सों में बँट जाएँगे।

हालाँकि सरकार और Wildlife Institute of India (WII) का दावा है कि पन्ना के नुकसान की भरपाई के लिए ₹1,000 करोड़ से अधिक की एक विशेष योजना बनाई गई है। इसके तहत आसपास के रानीपुर वन्यजीव अभयारण्य (यूपी) और नौरादेही (एमपी) के जंगलों को पन्ना से जोड़कर एक विशाल ‘ग्रेटर पन्ना लैंडस्केप’ बनाया जा रहा है ताकि बाघ आसानी से विचरण कर सकें।

केवल बाघ ही नहीं, केन नदी का यह क्षेत्र विश्व स्तर पर संकटग्रस्त गिद्धों (Vultures) का सबसे बड़ा प्राकृतिक घोंसला स्थल (Nesting Site) है। बाँध बनने से गिद्धों की दुर्लभ प्रजातियों के चट्टानी आवास पानी में डूब जाएंगे। इसके अलावा केन नदी में पाए जाने वाले घड़ियाल (Gharial Sanctuary) और दुर्लभ जलीय जीवों के प्राकृतिक प्रवाह पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

विशाल जलाशय और नहर निर्माण के लिए पन्ना के घने जंगलों से लगभग 20 लाख से अधिक विशाल और पुराने पेड़ों को काटा जाना तय है, जिसकी भरपाई केवल नए पौधे लगाकर तुरंत नहीं की जा सकती।

केन-बेतवा प्रोजेक्ट के पक्ष में विशेषज्ञों की राय: इस प्रोजेक्ट समर्थकों का तर्क है कि 62 लाख लोगों की प्यास बुझाना और लाखों एकड़ बंजर खेतों को सींचना किसी भी अन्य नुकसान से बड़ा मानवीय धर्म है। बुंदेलखंड को गरीबी से निकालने का कोई और बड़ा विकल्प उपलब्ध नहीं है।

आलोचकों और पर्यावरणविदों का पक्ष: जल विशेषज्ञों का तर्क है कि केन नदी को ‘सरप्लस’ बताना वैज्ञानिक रूप से गलत है। मानसून के दौरान केन का उफान ही बुंदेलखंड के अपने पारितंत्र और यमुना को जीवित रखता है। केन का पानी खींचने से केन नदी खुद आने वाले समय में सूख सकती है।

आलोचकों का मानना है कि अरबों रुपये खर्च करके जंगलों और बाघों के आवास को डुबोने के बजाय, यदि बुंदेलखंड के पारंपरिक चंदेल और बुंदेला कालीन हजारों तालाबों, बावड़ियों, वाटरशेड प्रबंधन (Watershed Management) और चेक डैमों का जीर्णोद्धार किया जाता, तो बेहद कम लागत और बिना किसी पर्यावरणीय नुकसान के बुंदेलखंड का जल संकट हल हो सकता था।

वॉटरमैन ऑफ इंडिया राजेंद्र सिंह ने भी रखा अपना पक्ष: भारत के वॉटरमैन ऑफ इंडिया के नाम से मशहूर राजेंद्र सिंह इस योजना की कड़ी खिलाफत कर रहे हैं। उन्होंने ऑपइंडिया के एसोसिएट ए़़डिटर श्रवण शुक्ल से फोन पर बातचीत में कहा, “नदी जोड़ो योजना भारत को तोड़ने की भयानक योजना है। ये संवैधानिक रूप से भारत की नदियों के तिहरे अधिकार (केंद्र, राज्य और पंचायतों-म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन का हक) को तोड़ने की कोशिश है।”

राजेंद्र सिंह ने दावा किया इस योजना को मनमोहन सिंह सरकार ने मंजूरी दे दी थी, लेकिन हमारे विरोध के बाद और हमारा पक्ष सुनने के बाद मनमोहन-राहुल-सोनिया गाँधी ने इसे रोक दिया था। अब सिर्फ पैसों के बंदरबाँट की वजह से ये योजना चल रही है। उन्होंने दावा किया कि ये योजना कतई सफल नहीं होगी। उन्होंने कहा कि इस योजना का हश्र भी सतलुज ब्यास लिंक की तरह ही होगा, जिसमें आजतक पानी नहीं आया।

राजेंद्र सिंह ने कहा कि इस भयानक प्रोजेक्ट को भारत के लिए उपयोगी नहीं मानना चाहिए। उन्होंने कहा कि मैं इस प्रोजेक्ट के 100 नुकसान गिना सकता हूँ, जबकि सरकार फायदे बताती है कि सूखा खत्म होगा, पानी आ जाएगा। उन्होंने कहा कि जब केन और बेतवा के कैचमेंट में एक बराबर बारिश होती है, तो केन में ज्यादा पानी का दावा कैसे किया जा रहा है। उन्होंने PSI-देहरादून की एक स्टडी रिपोर्ट का भी हवाला दिया, जिसमें केन नदी के पानी को सरप्लस नहीं माना गया है।

दौधन बाँध से विस्थापन का दर्द, मुआवजे का घोटाला और ST लोगों का जनाक्रोश: रिपोर्ट्स

कागजी नक्शों और सरकारी रिपोर्ट्स में ‘विकास की विशाल गंगा’ के रूप में दिखाई देने वाले केन-बेतवा प्रोजेक्ट से जुड़ी कुछ जमीनी समस्याएँ भी मौजूद हैं। जुलाई 2026 की मीडिया रिपोर्ट में सामने आया है कि छतरपुर और पन्ना जिलों के दौधन बाँध के डूब क्षेत्र में आने वाले गाँवों में आज भारी तनाव और अनिश्चितता का माहौल है।

आदिवासियों का बेघर होना और विस्थापन (Displacement Crisis): दौधन बाँध के जलाशय में पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में बसे दौधन, खरयानी, पचमढ़ी, ढोढन, मैनारी और पलकोहा जैसे दर्जनों आदिवासी गाँव पूरी तरह जलमग्न हो जाएँगे। यहाँ पीढ़ियों से रहने वाले गोंड और बैगा आदिवासी अपनी पुश्तैनी जमीनों, जंगलों और सांस्कृतिक पहचान को खोने के मुहाने पर खड़े हैं।

मई 2026 में प्रकाशित ‘द हिंदू’ के ‘फ्रंटलाइन’ की ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, विस्थापित होने वाले ST परिवारों को पन्ना के जंगलों से बाहर निकालकर जिन अनजान और बंजर इलाकों में बसाने की योजना है, वहाँ न तो खेती के लायक जमीन है और न ही आजीविका के साधन। लोगों का कहना है, “जंगल और नदी ही हमारी माँ और आजीविका हैं, हमें मुआवजा नहीं, अपनी जमीन चाहिए।”

मुआवजे का घोटाला और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप (Compensation Scam): दौधन बाँध के डूब क्षेत्र के गाँवों में मुआवजा वितरण को लेकर बड़े पैमाने पर धांधली और भ्रष्टाचार की खबरें राष्ट्रीय सुर्खियों में हैं।

और द न्यू इंडिया एक्सप्रेस की (26 जुलाई 2026) रिपोर्ट्स के मुताबिक, छतरपुर और पन्ना जिला प्रशासन के निचले स्तर के कर्मचारियों और भू-माफियाओं के गठजोड़ ने फर्जी सर्वे रिपोर्ट तैयार की हैं। आरोप हैं कि बाहरी रसूखदार लोगों ने बाँध की घोषणा होते ही ST परिवारों की कीमती जमीनों को कौड़ियों के भाव खरीद लिया और अब वे करोड़ों रुपये का सरकारी मुआवजा हड़प रहे हैं।

दैनिक भास्कर ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि मुआवजा पाने के लिए भी लोगों को रिश्वत देनी पड़ रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, असली विस्थापित ग्रामीणों को पुनर्वास नीति के तहत सही मुआवजा और पारदर्शी पुनर्वास पैकेज (Rehabilitation Package) नहीं मिल पा रहा है। विस्थापित ग्रामीण मुआवजे में धाँधली को लेकर कड़ाके की ठंड और बारिश के बावजूद महीनों से सड़कों पर धरना देने को मजबूर हैं।

इसी सामाजिक असंतोष और विस्थापन के दर्द ने केन-बेतवा प्रोजेक्ट को एक बहुत ही संवेदनशील राजनीतिक और नैतिक मोड़ पर ला खड़ा किया है।

बहरहाल, ऐसे प्रशासनिक और राजनीतिक समस्याओं का हल सरकार को ही ढूँढना होगा, क्योंकि ऐसी छोटी समस्याओं के लिए राष्ट्रीय महत्व के बड़े प्रोजेक्ट्स को रोका नहीं जा सकता। क्योंकि ये प्रोजेक्ट न केवल बुंदेलखंड के लिए जरूरी है, बल्कि इस प्रोजेक्ट का असर देश के दूरगामी भविष्य पर भी पड़ेगा।

केन-बेतवा प्रोजेक्ट साइट, प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT)

प्रोजेक्ट की लागत, समयसीमा और वर्तमान स्थिति (Project Status)

वित्तीय स्वीकृति और लागत (Financial Cost): इस मेगा प्रोजेक्ट के लिए अनुमानित कुल लागत कई बार बढ़ चुकी है। हालाँकि दिसंबर 2021 में केंद्रीय कैबिनेट द्वारा स्वीकृत कुल लागत ₹44,605 करोड़ है। इस कुल लागत में से 90% हिस्सेदारी (लगभग ₹39,317 करोड़) केंद्र सरकार द्वारा अनुदान और ऋण के रूप में दी जा रही है, जबकि केवल 10% लागत मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सरकारें मिलकर वहन करेंगी।

सरकार ने परियोजना को पूरा करने के लिए 8 वर्ष की समयसीमा तय की थी। आधिकारिक लक्ष्य के अनुसार, इसे 2029-2030 तक पूरी तरह से बनाकर चालू करने की योजना है।

वर्तमान स्थिति (Current Ground Status – 2026): केंद्र सरकार ने प्रोजेक्ट को संचालित करने के लिए विशेष प्राधिकरण केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट अथॉरिटी (KBLPA) का गठन किया है।

दौधन बाँध स्थल पर शुरुआती इंफ्रास्ट्रक्चर, अप्रोच रोड और लिंक नहर के लिए भूमि अधिग्रहण (Land Acquisition) की प्रक्रिया जारी है।

डाटा: NWDA, PIB, Govt of India, प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT)

क्या केन-बेतवा मॉडल भारत की दूसरी नदी जोड़ो परियोजनाओं का आधार बन सकता है?

केन-बेतवा लिंक परियोजना केवल बुंदेलखंड के दो जिलों में बनने वाला बाँध या नहर भर नहीं है। यह परियोजना वास्तव में पूरे भारत में प्रस्तावित अन्य 29 अंतर-बेसिन नदी जोड़ो परियोजनाओं के लिए एक ‘नेशनल टेस्ट केस’ (National Test Case) है। पूरी दुनिया और भारत के नीति निर्माता इस बात पर गहराई से नजर गड़ाए हुए हैं कि यह मॉडल धरातल पर कैसा प्रदर्शन करता है। ऐसे में अगर…

केन-बेतवा सफल होता है: अगर यह परियोजना अपने तय समय, स्वीकृत बजट और पर्यावरणीय संतुलन के साथ सफलतापूर्वक पूरी हो जाती है और बुंदेलखंड के 62 लाख लोगों को सूखा व गरीबी से मुक्ति दिलाती है, तो यह साबित हो जाएगा कि भारत में बड़े पैमाने पर अंतर-बेसिन जल स्थानांतरण संभव है। इससे हिमालयी और प्रायद्वीपीय घटक के अन्य 29 प्रस्तावित लिंकों (जैसे मानस-संकोश-तीस्ता या महानदी-गोदावरी) के लिए राजनीतिक, सामाजिक और जनता के बीच सहमति बनाना बेहद आसान हो जाएगा।

अगर केन-बेतवा विफल या विवादित होता है: अगर केन-बेतवा परियोजना अत्यधिक वित्तीय देरी, बजट वृद्धि (cost overrun), मुआवजे के घोटालों, विस्थापित आदिवासियों के भारी असंतोष या पन्ना के पारिस्थितिकी तंत्र की स्थाई तबाही का पर्याय बनती है, तो भविष्य में भारत में किसी भी अन्य दो नदियों को आपस में जोड़ने की राष्ट्रीय योजना पर हमेशा के लिए बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लग जाएगा।

इसलिए केन-बेतवा परियोजना की सफलता या विफलता केवल बुंदेलखंड का भाग्य तय नहीं करेगी, बल्कि यह 21वीं सदी में भारत के पूरे राष्ट्रीय जल प्रबंधन, रिवर-लिंकिंग विजन और पर्यावरण नीति का भविष्य तय करने वाली सबसे महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगी।

(भारत की नदी जोड़ो परियोजना Part III में पढ़िए: भारत की बाकी प्रमुख नदी जोड़ो परियोजनाएँ, हिमालयी और प्रायद्वीपीय (Peninsular) लिंकों का पूरा गहन विश्लेषण, हिमाचल-पंजाब-राजस्थान और जम्मू-कश्मीर से जुड़े आधिकारिक प्रस्ताव। इसके साथ ही जानिए दुनिया भर के सबसे बड़े जल स्थानांतरण प्रयोगों का सच- चीन का South–North Water Transfer Project, अमेरिका का California State Water Project, पाकिस्तान का Indus Basin Irrigation System, स्पेन का Tagus–Segura Transfer और ऑस्ट्रेलिया की Snowy Mountains Scheme।

इन प्रोजेक्ट्स से समझिए भारत के लिए इनसे क्या सबक हैं, क्या हैं पर्यावरणीय चुनौतियाँ, जलवायु परिवर्तन का असर और अंतिम निष्कर्ष कि क्या नदी जोड़ो योजना भारत की जल क्रांति बन सकती है या यह सबसे कठिन और पेचीदा राष्ट्रीय परियोजनाओं में से एक साबित होगी…)

उमर खालिद की ‘कुर्बानी’ का जश्न मनातीं आरफा खानम, ताहिर हुसैन के लिए भी बहाए थे आँसू: अपने ‘पोस्टर बॉय’ के लिए अदालत पर मढ़ा ‘फर्जी’ दोष, जानें- पूरी सच्चाई

‘हमारे लिए वो एक इंस्पिरेशन है, वो एक रेवोल्यूशनरी है, एक बड़ा स्कॉलर है। एक ऐसा इंसान है जिसने अपनी आजादी, अपनी जिंदगी बहुत कुछ कुर्बान किया’… ये बयान है, आरफा खानम शेरवानी का। आपको लगेगा किसी स्वतंत्रता के किसी बड़े नायक की चर्चा हो रही है लेकिन ठहरिए… जहाँ यह भाषणबाजी हो रही थी वो मौका था- उमर खालिद के जन्मदिन का और दिल्ली के प्रेस क्लब में वामपंथियों का मजमा लगा था।

मंगलवार (11 अगस्त 2026) को प्रेस क्लब में उमर खालिद की किताब ‘फ्रैक्चर्ड कम्युनिटीज़: आदिवासी हिस्ट्रीज एंड द पॉलिटिक्स ऑफ पावर’ पर चर्चा हुई, चर्चा क्या, वामपंथियों का प्रोपेगेंडा ही फैलाया जा रहा था। इसमें अपूर्वानंद झा, प्रोफेसर प्रभु महापात्रा, आरफा खानुम शेरवानी और ‘द वायर’ के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन समेत कई वामपंथी मौजूद थे और हर कोई उमर की शान में कसीदे ही पढ़ रहा था।

और सबसे ज्यादा जोश में, जैसा की उम्मीद ही थी, आरफा ही नजर आई। आरफा के भाषण से अगर उमर का नाम हटाकर उसे सुनें तो लगेगा कि किसी बड़े स्वतंत्रता सेनानी को याद किया जा रहा है, किसी क्रांतिकारी का गुणगान किया जा रहा है। लेकिन उमर खालिद कौन? दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगों का आरोपित, उमर खालिद कौन? जो 6 साल से जेल में UAPA के तहत बंद है, उमर खालिद कौन? जिसे पर लगे आरोप इतने गंभीर हैं कि देश की अदालतें जमानत तक देना मुनासिब नहीं समझ रही हैं। वही उमर खालिद, आरफा जैसे इन वामपंथियों का पोस्टर ब्वॉय है।

सिर्फ इतना ही नहीं, यही आरफा उमर को एक त्यौहार की तरह मानाना चाहती है, उसकी ‘शान’ में गजल पढ़ रही है। आरफा अपने भाषण में आगे कहती हैं, “एक तरह से त्यौहार के तौर पर, हर कुछ दिन बाद उमर को मनाने का एक त्यौहार, एक कार्निवल के तौर पर… उमर की आजादी का, उमर की स्कॉलरशिप का, उमर की कुर्बानी का, उमर के जज्बे का, उमर के इंकलाब… का जश्न मनाने के लिए हम सब यहाँ पर मौजूद हैं। ये काम उमर के दोस्त करते हैं, मैं बहुत-बहुत शुक्रिया उमर के दोस्तों का अदा करना चाहती हूँ।”

आरफा ने अमीर कजलबाश की गजल के जो शेर पढ़े, उनका मोटा-मोटी मानी यही है कि अगर आवाज को जबरदस्ती दबाया जाता है, तो वह दबती नहीं है बल्कि एक भयानक तूफान या क्रांति का रूप लेकर वापस आती है। यानी, वही कहानी जो वो उनका वामपंथी ‘ईकोसिस्टम’ वर्षों से गढ़ रहा है।

आरफा ने जो प्रोपेगेंडा किया सो किया, जो रोना रोया सो रोया लेकिन उन्होंने अदालतों को भी नहीं छोड़ा। वो कहती हैं, “अगर उमर गुनहगार है तो उसे फाँसी पर चढ़ा दीजिए। भारत के कानून के तहत उमर के ऊपर जो धाराएँ हैं, उसमें जितनी सबसे सख्त जो सजा हो उमर को वो दीजिए। लेकिन सिर्फ मेरी एक इल्तजा, एक गुजारिश, एक सिर्फ अपील ये होगी हमारे जज साहिबान से कि आप एक बार उसका केस शुरू कर दीजिए। अब तो ये हो गया है कि हमारी जो उच्च अदालतें हैं, वो भी दबाव में काम कर रही हैं।”

उमर को जेल से बाहर निकाले जाने को लेकर आरफा कहती हैं, “एक राजनीतिक फैसला है। अगर ये कानूनी फैसला होता तो हम कहते कि भई 4 वकीलों को बिठा लीजिए और जिरह कर लेते हैं, गवाह-सबूत पेश करते हैं और उसके बाद देख लेते हैं। मैं तो कहती हूँ कि अगर उमर गुनहगार है तो उसे फाँसी पर चढ़ा दीजिए। भारत के कानून के तहत उमर के ऊपर जो धाराएँ हैं उसमें जितनी सबसे सख्त जो सजा हो उमर को वो दीजिए। लेकिन सिर्फ मेरी एक इल्तजा, एक गुजारिश, एक सिर्फ अपील ये होगी हमारे जज साहिबान से कि आप एक बार उसका केस शुरू कर दीजिए।”

सुनने में आपको लगेगा कि भई बात तो सही है लेकिन असली बात वो है जो इसके पीछे छिपी है। ऑपइंडिया ने पहले भी बताया था कि कैसे यह सारा खेल उमर खालिद और उसके वकीलों द्वारा खेला जा रहा है। उमर खालिद मामले में कोर्ट द्वारा देर की ही नहीं जा रही, ये सारा विलंब याचिका डालने और फिर उसे वापस लेने में चक्कर में हो रहा है।

दरअसल, सत्र न्यायालय मे 8 माह के भीतर ही खालिद की याचिका खारिज की थी, फिर हाईकोर्ट ने 6 महीने में। इसके बाद वो जब सुप्रीम कोर्ट गया तो 14 में से 7 बार मामला उसके वकील के कारण स्थगित हुआ। उमर खालिद के मामले में सुनवाई के लिए कपिल सिब्बल ‘फोरम शॉपिंग’ के जरिए अपनी किस्मत आजमा रहे थे। (फोरम शॉपिंग तब होती है जब कोई पक्ष किसी ऐसे न्यायालय या न्याय क्षेत्र को चुनता है जिसके बारे में उन्हें लगता है कि वह उनके पक्ष में फैसले दे सकते हैं।)

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने खुद एक इंटरव्यू में कहा था कि उमर खालिद को जो बेल नहीं मिली है उसकी वजह कोई और नहीं बल्कि खुद उमर खालिद और उनके वकील हैं जिन्होंने कोर्ट में बेल याचिकाएँ लंबित रहने के दौरान ही कम से कम 7 बार मामले में एडजर्न कराया। यानी जिस बात को आरफा अदालत पर डाल कर अपने ‘हीरो’ को बचाने की जुगत लगा रही हैं वो प्रोपेगेंडा पहले ही फेल हो चुका है। अब आगे बढ़ते हैं।

उमर खालिद इन वामपंथियों का अकेला पोस्टर ब्यॉय नहीं है। बस आपको ‘टुकड़े-टुकड़े’ वाली मानसिकता लानी है, देश का विरोध करना है ये आपकी जय-जयकार… या यूँ कहें कि आपको ‘लाल सलाम’ करने लगेंगे। इन्ही आरफा का एक चहेता था- AAP का पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन। वही, ताहिर जिसको दिल्ली दंगों के दौरान IB कर्मी अंकित शर्मा की हत्या के मामले में कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनाई है।

आपको शायद ना याद हो लेकिन यह ताहिर हुसैन भी कभी, आरफा जैसों का पोस्टर ब्वॉय था। आरफा खानम ने ताहिर हुसैन का इंटरव्यू तक किया था। यह तब किया गया जब दिल्ली पुलिस ताहिर हुसैन की तलाश कर रही थी। आरफा ने दंगाई ताहिर को कानून का पालन करने वाला नागरिक दिखाने की कोशिश की। उसने X पर इस इंटरव्यू को शेयर करते हुए लिखा था, “कोर्ट द्वारा आत्मसमर्पण याचिका रद्द कर दी गई है। ताहिर हुसैन को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।” ताहिर हुसैन ने ‘द वायर’ से कहा था, “मुझे अपनी न्यायिक व्यवस्था पर पूरा भरोसा है। कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने जा रहा हूँ।”

इसी ताहिर हुसैन ने न्यायिक हिरासत के दौरान अपना गुनाह कबूला था। उसने खुलासा करते हुए बताया था कि वो CAA के समर्थकों को सबक सिखाना चाहता था। ये बात सिर्फ ताहिर हुसैन और उमर खालिद तक की सीमित नहीं है, ऐसे दर्जनों नाम आपको मिल जाएँगे।

सवाल अब सिर्फ उमर खालिद के जन्मदिन पर हुई बयानबाजी का नहीं है। सवाल उस पूरे वैचारिक कारोबार का है जिसमें अदालत का फैसला आने से पहले ही किसी आरोपित को ‘क्रांतिकारी’ बना दिया जाता है। लोकतंत्र में किसी को कानूनी अधिकार मिलना चाहिए, इस पर शायद ही किसी को आपत्ति हो सकती है। लेकिन कानूनी प्रक्रिया की आड़ में किसी आरोपित का महिमामंडन करना ईमानदार बहस नहीं बल्कि प्रोपेगेंडा का हिस्सा ही होता है।

अदालत पर सवाल उठाना आसान है लेकिन क्या अपनी तरफ की पूरी कहानी भी जनता के सामने रखी जाएगी? क्या यह बताया जाएगा कि मामले की सुनवाई में देरी किन परिस्थितियों में हुई, किस पक्ष की ओर से कितनी बार स्थगन माँगा गया और अदालतों में अब तक क्या-क्या हुआ? या फिर हर बार एक ही सुविधाजनक कहानी सुनाई जाएगी।

इससे भी बड़ा सवाल उस ‘पोस्टर बॉय’ संस्कृति का है, जिसमें राजनीतिक विचारधारा के हिसाब का ‘किरदार’ मिलते ही पूरा इकोसिस्टम उसके लिए शब्दों का ऐसा महल खड़ा कर देता है कि आरोप, मुकदमा और पीड़ितों की चर्चा पीछे छूट जाती है। कभी ‘क्रांतिकारी’, कभी ‘प्रतिरोध की आवाज’, कभी ‘कुर्बानी’… शब्द बदलते रहते हैं लेकिन पैटर्न वही रहता है। किसी के खिलाफ आरोप हैं तो अदालत तय करेगी कि वह दोषी है या नहीं, लेकिन अदालत के फैसले से पहले उसे वैचारिक शहीद बना देना किस तरह का निष्पक्ष विमर्श है?

फर्जी Video, झूठे आरोप, हमले और नफरती बयान… काँवड़ यात्रा को बदनाम करने के लिए वामपंथी-कट्टरपंथी और मीडिया कैसे फैलाते हैं भ्रम, पढ़ें- पूरा विश्लेषण

सावन के पवित्र महीने में काँवड़ यात्रा का समापन हो चुका है। लाखों शिवभक्तों ने कठिन रास्तों को पार करते हुए अपनी आस्था की डुबकी लगाई और जलाभिषेक किया। लेकिन इस पूरी यात्रा के दौरान एक दूसरा पहलू भी देखने को मिला, जो बेहद चिंताजनक था। कुछ कट्टरपंथी ताकतों, वामपंथी विचारकों और पक्षपाती मीडिया ने मिलकर काँवड़ यात्रा और काँवड़ियों को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

कहीं काँवड़ियों पर कातिलाना हमले हुए, तो कहीं सोशल मीडिया पर फर्जी वीडियो फैलाकर उन्हें उपद्रवी साबित करने की कोशिश की गई। इसमें हम जानेंगे कि कैसे इस साल की काँवड़ यात्रा पर सुनियोजित तरीके से हिंदू आस्था के खिलाफ भ्रम और नफरत फैलाई गई।

काँवड़ियों और हिंदुओं पर शारीरिक हमले: ग्वालियर से लखीमपुर तक हिंसा

काँवड़ यात्रा के दौरान देश के कई हिस्सों में शिवभक्तों को सीधे तौर पर निशाना बनाया गया। मध्य प्रदेश के ग्वालियर में रात के उस समय भयानक तनाव फैल गया, जब काँवड़ यात्रा में शामिल होने जा रहे कुछ युवकों पर कथित तौर पर मुस्लिम युवकों ने हमला कर दिया। कार से टक्कर लगने को लेकर उपजा विवाद पल भर में हिंसक झड़प में बदल गया।

मुस्लिम हमलावरों ने तलवारों, हथौड़ों और पत्थरों से काँवड़ियों पर हमला किया। इस बर्बर हमले में विवेक यादव नाम का युवक गंभीर रूप से घायल हो गया, जिसके सिर में 18 टांके लगाने पड़े। घटना के बाद विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने थाने के बाहर विरोध किया और आरोपितों की गिरफ्तारी की माँग की। पुलिस ने इस मामले में अरशद खान, गोलू खान, अकील खान और बंटू खान समेत अन्य के खिलाफ FIR दर्ज की।

इसी तरह उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी के थाना खीरी क्षेत्र में भी काँवड़ियों के जत्थे पर पथराव किया गया। रुखिया गाँव से करीब 40-50 काँवड़िये नहर के पास स्थित मंदिर से जल लेकर जा रहे थे। जब उनका जत्था जुलाहनपुरवा के पास पहुँचा, तो अचानक उन पर पथराव शुरू हो गया, जिससे सड़क पर भगदड़ मच गई।

इस हमले में राजापुर के रहने वाले काँवड़िया विकास के सिर में गंभीर चोटें आईं। पुलिस ने मौके पर पहुँचकर स्थिति संभाली और जाँच में जुटी। हालाँकि पुलिस ने प्रारंभिक जाँच में एक मानसिक रूप से अस्वस्थ नाबालिग का हाथ बताया, लेकिन इस तरह की घटनाएँ यह साबित करने के लिए काफी हैं कि यात्रा के दौरान माहौल बिगाड़ने और हिंदुओं को निशाना बनाने के प्रयास लगातार किए जा रहे थे।

मीडिया और सोशल मीडिया का गंदा खेल: मेरठ की घटना पर फैलाया गया सफेद झूठ

सावन के महीने में वामपंथियों और कट्टरपंथियों की आँखों में काँवड़िए हमेशा से खटकते रहे हैं। वे हरसंभव तरीके से इनकी छवि को धूमिल करने की फिराक में रहते हैं। ऐसा ही एक घिनौना प्रयास मेरठ की घटना को लेकर किया गया। सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल किया गया, जिसमें दावा किया गया कि काँवड़ियों ने पुलिस के साथ मारपीट की है, उनकी वर्दी फाड़ी है और उन्हें पीटकर भगा दिया है।

इस फर्जी नैरेटिव को फैलाने में कई जाने-माने सोशल मीडिया हैंडल और तथाकथित पत्रकारों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। ‘मुस्लिम वॉयस सेल’ के ट्वीट से लेकर पीयूष राय, सचिन गुप्ता और जाकिर त्यागी जैसे लोगों ने इस वीडियो को शेयर किया। यहाँ तक कि चर्चित फैक्टचेकर मोहम्मद जुबैर ने भी इस भ्रामक दावे को रिपोस्ट किया।

जब इस मामले में मेरठ पुलिस का आधिकारिक बयान सामने आया, तो पूरा सच जनता के सामने आ गया। पुलिस ने स्पष्ट किया कि वायरल वीडियो के दावे पूरी तरह झूठे हैं। असलियत यह थी कि 3 अगस्त की रात जब दो अलग-अलग काँवड़ियों के ग्रुप आमने-सामने आए, तो सोनू और गुड्डू नाम के युवकों का दूसरे काँवड़ियों से टकराव हो गया। दौराला पुलिस ने मौके पर पहुँचकर सूझबूझ दिखाई और उन दोनों को अपनी जीप में बैठाकर सुरक्षित करने की कोशिश की।

तभी दूसरा पक्ष उग्र होकर उन्हीं लोगों को गाड़ी से बाहर खींचने की कोशिश करने लगा। पुलिस के साथ कोई मारपीट नहीं हुई थी और न ही किसी की वर्दी फाड़ी गई थी। इसके बावजूद, मेनस्ट्रीम मीडिया के कुछ संस्थानों ने भी बिना पुलिस का पक्ष जाने ‘पुलिसकर्मियों की पिटाई’ की हेडलाइन के साथ सनसनीखेज खबरें चला दीं, जिससे साबित होता है कि मीडिया का एक वर्ग किस हद तक काँवड़ियों के खिलाफ पूर्वाग्रही है।

मुख्यधारा की मीडिया और वामपंथियों का एजेंडा: ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ से लेकर तुष्टिकरण का रोना

सिर्फ सोशल मीडिया ही नहीं, बल्कि बड़े और प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबारों ने भी काँवड़ यात्रा के खिलाफ अपने संपादकीय के जरिए वैचारिक जहर उगला। ‘द इंडियन एक्सप्रेस‘ में छपे एक लेख (शीर्षक: The problem isn’t the kanwar yatra. It’s a patronising state) में काँवड़ यात्रा और इसके भक्तों पर गंभीर कटाक्ष किए गए। इस लेख में तर्क दिया गया कि राज्य सरकारों द्वारा काँवड़ियों का स्वागत करना, उन पर फूलों की वर्षा करना (जैसे प्रयागराज में आईजी और डीएम द्वारा किया गया) या यात्रा मार्ग पर गैर-वेज की दुकानों पर रोक लगाना और दुकानदारों के नाम लिखने के आदेश देना धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ है।

लेख में यहाँ तक कह दिया गया कि सरकारें भक्तों का राजनीतिक इस्तेमाल कर रही हैं और उनकी तुलना जिन्ना या सावरकर की राजनीति से कर डाली। यह नजरिया पूरी तरह से दोहरे मापदंड को दिखाता है। जब अन्य मजहबों के आयोजनों या जुलूसों में प्रशासनिक व्यवस्थाएँ की जाती हैं, तब यही वर्ग मौन रहता है, लेकिन जब हिंदू युवा अपनी आस्था के साथ सड़कों पर निकलते हैं, तो उन्हें ‘असुविधा’ या ‘भीड़ का डर’ कहकर प्रोजेक्ट किया जाने लगता है।

सरकार के अधिकारियों द्वारा काँवड़ियों का स्वागत करना या उनके रास्ते की व्यवस्था संभालना एक जन कल्याणकारी और प्रशासनिक जिम्मेदारी है, जिसे वामपंथी विचारक हमेशा ‘अल्पसंख्यकों के खिलाफ बहिष्कार’ और ‘तुष्टिकरण’ का रंग देने की कोशिश करते हैं। यह सब इस बात का प्रमाण है कि एक खास वैचारिक वर्ग हिंदू आस्था को सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह मिटाना चाहता है।

नफरती बयानों और सोशल मीडिया का जहर

काँवड़ यात्रा को बदनाम करने में मजहबी कट्टरपंथियों ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी ने मर्यादा की सभी हदें पार करते हुए काँवड़ यात्रा पर जाने वाले शिवभक्तों को सीधे तौर पर ‘आतंकवादी’ और नशेड़ी करार दिया। मौलाना साजिद ने अपनी नफरत भरी जुबान से आरोप लगाया कि काँवड़िए सड़कों पर नंगा नाच करते हैं, शराब पीते हैं, एंबुलेंस को रोकते हैं, स्कूल वैन के शीशे तोड़ते हैं और पुलिसवालों को पीटते हैं।

मौलाना साजिद ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर भी अभद्र तंज कसे और काँवड़ यात्रा को रोकने की माँग की। एक तरफ जहाँ मौलाना जैसे लोग हिंदुओं की आस्था को कुचलने वाले बयान देते हैं, वहीं दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर यह दुष्प्रचार किया गया कि काँवड़िए शिवजी का मूल मंत्र छोड़कर मनमाने नारे लगाते हैं।

हद तो तब हो गई जब मुफ्ती शाहनवाज ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट जारी कर खुलेआम जहर उगला। उसने कहा, “हमारे इस्लाम में किसी गैर मुस्लिम की मदद करना, पानी पिलाना या खाना खिलाना हराम है।”

यह बयान इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि कट्टरपंथी किस तरह समाज में नफरत की दीवारें खड़ी करना चाहते हैं। एक तरफ जहाँ हिंदू समाज सहृदयता और सेवा भाव का परिचय देता है, वहीं दूसरी तरफ ऐसे कट्टरपंथी उपदेश देकर दो समुदायों के बीच नफरत का जहर घोलने का काम कर रहे हैं। इन तमाम बयानों और पोस्टों का मकसद सिर्फ और सिर्फ काँवड़ यात्रा को सांप्रदायिक रंग देना और हिंदुओं की आस्था को ठेस पहुँचाना था।

हिंदू त्योहारों पर सुनियोजित तरीके से होता हमला…

इस वर्ष (2026) की काँवड़ यात्रा को लेकर भारत में सनातन धर्म और उसके प्रतीकों को बदनाम करने के लिए किस प्रकार एक सुनियोजित इकोसिस्टम काम कर रहा है। एक तरफ जहाँ भोले-भाले शिवभक्त अपनी कठिन यात्रा पूरी कर रहे थे, वहीं दूसरी तरफ कट्टरपंथी, वामपंथी विचारक, और कुछ बिकाऊ मीडिया संस्थान मिलकर उन पर हमले करवा रहे थे और दूसरी तरफ फर्जी वीडियो के जरिए उन्हें ही उपद्रवी साबित करने में जुटे थे।

मुहर्रम या अन्य जुलूसों के दौरान खुलेआम निकलने वाले हथियारों और हिंसक प्रदर्शनों पर आँखें मूंद लेने वाले लोग, काँवड़ियों के हाथों में एक छोटी सी लाठी या डंडे को भी बहुत बड़ा मुद्दा बना देते हैं। सरकार के कल्याणकारी कार्यों और जनता की आस्था को कुचलने का यह कुचक्र हमेशा से चलता आ रहा है। सनातन धर्म और हिंदू त्योहारों से नफरत करने वाले कट्टरपंथी और वामपंथी ऐसे समय में सुनियोजित तरीके से हमला करते हैं।

साथ सोने को कहता था, गलत इरादे से छूता था: जंतर-मंतर पर बिरयानी वाला जुनैद निकला ‘मोलेस्टर’, जानें ऑपइंडिया से बातचीत में क्या बोलीं CJP वॉलंटियर?

छात्रों को बिरयानी खिलाने वाला मोहम्मद जुनैद असल में ठरकी निकला! ये मैं नहीं कह रही, खुद जंतर-मंतर पर प्रोटेस्ट में शामिल हुईं लड़कियाँ ये कह रही हैं। उन्हीं में एक महिला माहिरा कश्यप ने जुनैद के खिलाफ कानून शिकायत दर्ज कराई है, इन्हें कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने वॉलंटियर बनाया था, और ये प्रदर्शन स्थल पर झाड़ूँ और बाकी साफ-सफाई का जिम्मा संभालती थीं।

माहिरा कश्यप की 4 अगस्त 2026 को दिल्ली के पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने में की गई लिखित शिकायत ने जुनैद का असली चेहरा सबके सामने ला दिया है। ये वही जुनैद है, जिसके चेहरे पर प्रोटेस्ट को सेकुलर बताया जा रहा था, लिबरल-वामपंथी गैंग जुनैद के खाने बाँटने की वीडियोज को खूब सराह रहे थे। लेकिन असल में वह प्रोटेस्ट में किस एजेंडा के साथ गया था, वो माहिरा कश्यप की शिकायत से पता लग गया है।

लिखित शिकायत से खुले प्रोटेस्ट में जुनैद के कारनामे

इंस्टाग्राम पर ठीक-ठाक फॉलोवर्स वालीं माहिरा कश्यप ने 04 अगस्त 2026 को पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस थाने में मोहम्मद जुनैद के खिलाफ लिखित शिकायत की। शिकायत में माहिरा कश्यप बताती हैं कि जंतर-मंतर पर चल रहे प्रदर्शन में वह वॉलंटियर के तौर पर मदद कर रही थीं। इसी दौरान उनकी बातचीत मोहम्मद जुनैद से हुई। शुरुआत में माहिरा ने जुनैद से दोस्ताना तरीके से ही बात की और उस पर भरोसा किया।

माहिरा का कहना है कि कुछ समय बाद उन्होंने नोटिस किया कि जुनैद कई लड़कियों के साथ ठीक तरीके से पेश नहीं आ रहा था। उसके व्यवहार से लड़कियाँ असहज हो रही थीं। माहिरा ने शिकायत में कहा कि उनके साथ भी जुनैद ने इसी तरह का व्यवहार किया, जो उन्हें पसंद नहीं आया। उनका कहना है कि इस तरह के व्यवहार की वजह से जंतर-मंतर पर प्रदर्शन में शामिल महिलाओं के बीच असहज और असुरक्षित माहौल बन रहा था।

माहिरा के मुताबिक, कुछ लड़कियों ने भी जुनैद के व्यवहार को लेकर अपनी परेशानी बताई थी। उन्होंने खुद भी ऐसी चीजें देखी थीं। इसके बाद उन्होंने अभिजीत दिपके से इस बारे में बात की। माहिरा का कहना है कि 11 जुलाई को उन्होंने जुनैद से प्रदर्शन वाली जगह छोड़ने को कहा और उसे वहाँ से हटा दिया, ताकि वहाँ मौजूद महिलाओं के लिए माहौल सुरक्षित रहे।

माहिरा ने पुलिस से यह भी कहा है कि 11 जुलाई की इस घटना की जंतर-मंतर प्रदर्शन स्थल पर लगे सीसीटीवी कैमरों में रिकॉर्डिंग हो सकती है। इसलिए उन्होंने जाँच अधिकारी से संबंधित सीसीटीवी फुटेज निकलवाने और उसे सुरक्षित रखने की माँग की है।

अभिजीत दिपके के बयान दर्ज करने की माँग

शिकायत में माहिरा ने आगे बताया कि सोनम वांगचुक की हिरासत के अगले दिन जुनैद दोबारा प्रदर्शन स्थल पर आया। उसने माहिरा से अपने व्यवहार के लिए माफी माँगी। माहिरा के मुताबिक, बातचीत के दौरान जुनैद ने माना कि उसका व्यवहार गलत था और उसने इसके लिए माफी माँगी। माहिरा का कहना है कि इस बातचीत की एक ऑडियो रिकॉर्डिंग उनके पास है, जिसे वह पुलिस को सबूत के तौर पर देने के लिए तैयार हैं।

इसके बाद माहिरा ने इंस्टाग्राम पर लाइव आकर लोगों को इस पूरे मामले के बारे में बताया। इसी लाइव के दौरान जुनैद का साथी राशिद भी जुड़ा और उसने कहा कि जुनैद अपने व्यवहार के लिए सार्वजनिक तौर पर माफी माँगेगा। हालाँकि, माहिरा का कहना है कि इसके बाद भी जुनैद की तरफ से अभी तक कोई सार्वजनिक माफी नहीं माँगी गई है।

माहिरा ने शिकायत में यह भी बताया कि उन्होंने अभिजीत दिपके को जुनैद के महिलाओं के साथ गंदे व्यवहार के बारे में जानकारी दी थी। उनका कहना है कि वह अकेली महिला नहीं थीं जिसने इस बारे में शिकायत की थी। दूसरी महिलाओं ने भी अभिजीत दिपके और उनकी टीम से संपर्क करके जुनैद के व्यवहार को लेकर अपनी परेशानी बताई थी। इसलिए माहिरा ने पुलिस से अभिजीत दिपके का बयान दर्ज करने की माँग की है, क्योंकि उन्हें इस मामले में हुई दूसरी शिकायतों के बारे में भी जानकारी हो सकती है।

आखिर में माहिरा ने कहा है कि उनकी शिकायत उनके खुद के अनुभव, उनके सामने हुई घटनाओं और उनके पास मौजूद सबूतों पर आधारित है। उन्होंने पुलिस से मामले की निष्पक्ष जाँच करने और मोहम्मद जुनैद के खिलाफ कानून के मुताबिक कार्रवाई करने की माँग की है।

ऑपइंडिया से बातचीत में क्या बोलीं माहिरा कश्यप?

ऑपइंडिया ने इस शिकायत को लेकर माहिरा कश्यप से संपर्क किया। माहिरा ने बताया कि उनकी शिकायत पर पुलिस ने अब तक कोई FIR दर्ज नहीं की है। उन्होंने यह भी दावा किया कि जुनैद इस शिकायत के डर से ही झारखंड के प्रोटेस्ट में पहुँचा है। जुनैद के गंदे व्यवहार के बारे में बताते हुए माहिरा ने कहा कि वह इकलौती लड़की नहीं हैं, जिसके साथ उसने ऐसा व्यवहार किया।

उनके मुताबिक, जुनैद कई लड़कियों से बात करते हुए उन्हें गलत इरादे से छूता था। माहिरा ने कहा, “जुनैद कभी कंधे पर, कभी सिर पर, कभी बालों पर और कभी हाथ पर छूकर लड़कियों से पूछता था कि उनका स्वास्थ्य कैसा है।” माहिरा का कहना है कि उनके साथ भी इसी तरह का व्यवहार किया गया।

माहिरा ने आगे बताया कि जुनैद कुछ लड़कियों को देर रात तक कॉल भी करता था। जुनैद के बारे में एक और गंभीर आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि उसने प्रोटेस्ट में शामिल एक लड़की को अपने साथ सोने का प्रस्ताव तक दिया था। माहिरा का कहना है कि ऐसी घटनाओं की वजह से उन्होंने यह मामला पुलिस के सामने उठाने का फैसला किया, ताकि प्रोटेस्ट में शामिल दूसरी लड़कियों को भी इस तरह के व्यवहार का सामना न करना पड़े।

माहिरा कहती हैं कि वह अब सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि उन दूसरी लड़कियों के लिए भी सामने आई हैं, जिनके साथ जुनैद ने ऐसा गंदा व्यवहार किया। उन्हें उम्मीद है कि अगर वह आज जुनैद के खिलाफ आवाज उठा रही हैं, तो कल दूसरी लड़कियाँ भी हिम्मत जुटाकर सामने आ पाएँगी। माहिरा ने बताया कि वह ऐसी लड़कियों से संपर्क भी कर रही हैं। उनका कहना है कि जुनैद का ‘असली चेहरा’ सामने आना जरूरी है, ताकि दूसरी लड़कियाँ भी उसके खिलाफ अपनी बात रख सकें।

जल सुरक्षा ही भविष्य की सबसे बड़ी नींव, समझिए क्यों जरूरी है भारत में नदियों को आपस में जोड़ना

मानसून के आते ही भारत के मानचित्र पर हर साल दो बेहद अलग और परेशान करने वाली तस्वीरें एक साथ उभरती हैं। एक तरफ असम में ब्रह्मपुत्र, बिहार और उत्तर प्रदेश में कोसी, गंडक और गंगा नदियाँ अपने किनारों को तोड़ती हुई लाखों जिंदगियों को बेघर कर देती हैं, तो दूसरी तरफ महाराष्ट्र का मराठवाड़ा, राजस्थान का थार, गुजरात का कच्छ और मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड पानी की एक-एक बूँद के लिए तरसता दिखाई देता है। जब देश के एक हिस्से में लोग नावों पर राशन का इंतजार कर रहे होते हैं, ठीक उसी वक्त दूसरे हिस्से में पानी के सरकारी टैंकरों के पीछे लंबी कतारें लगी होती हैं।

बाढ़ और सूखे की इसी दोहरी त्रासदी को खत्म करने के लिए भारत सरकार ने ‘राष्ट्रीय जल ग्रिड’ (National Water Grid) यानी ‘नदी जोड़ो परियोजना’ (Interlinking of Rivers – ILR) को 21वीं सदी का सबसे बड़ा ढाँचागत संकल्प बनाया है।

इस विशाल परिकल्पना की पहली व्यावहारिक प्रयोगशाला बनी है-‘केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट’ (Ken-Betwa Link Project – KBLP)। लेकिन जुलाई 2026 की मीडिया रिपोर्ट्स यह साफ बता रही हैं कि कागजी नक्शों पर नदियाँ जोड़ना जितना सीधा नजर आता है, धरातल पर इंसानों, जंगलों और नदियों की प्रकृति को जोड़ना उतना ही मुश्किल काम है।

बीते कुछ समय से बुंदेलखंड के छतरपुर और पन्ना जिलों में बने ‘दौधन बाँध’ (Daudhan Dam) के डूब क्षेत्र को लेकर भड़का जनाक्रोश इस योजना की सबसे कमजोर कड़ी को उजागर करता है। दौधन गाँव के आसपास रहने वाले जनजातीय लोग और स्थानीय ग्रामीण पिछले कई महीनों तक सड़कों पर रहे।

आरोप हैं कि बाँध निर्माण के कारण विस्थापित होने वाले हजारों परिवारों को पुनर्वास (Rehabilitation) और मुआवजे (Compensation) के नाम पर केवल खोखले आश्वासन मिले हैं। स्थानीय स्तर पर मुआवजे के वितरण में भ्रष्टाचार (Compensation Scam) और जमीनों के गलत मूल्यांकन की खबरों ने ग्रामीणों के भीतर भारी असंतोष भर दिया है।

इसके अलावा पन्ना टाइगर रिजर्व (Panna Tiger Reserve) के कोर एरिया में बसे दौधन, खरयानी और पचमढ़ी जैसे गाँवों के जनजातीय लोग अपनी पुश्तैनी जमीन छोड़ने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि जल सुरक्षा का यह पूरा खाका उनके वजूद की कीमत पर तैयार किया जा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स से यह बात सामने आई है कि राहत और पुनर्वास की राजनीति ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना को एक जटिल राजनीतिक और सामाजिक दलदल में धकेल दिया है।

पर्यावरणविदों का तर्क है कि पन्ना के घने जंगलों का डूबना, लाखों पेड़ों की कटाई और बाघों के प्राकृतिक आवास का नष्ट होना एक ऐसी भरपाई है जिसकी कीमत कोई भी नहर चुका नहीं सकती। वहीं दूसरी ओर केंद्र और राज्य सरकारों का दृढ़ विश्वास है कि यदि बुंदेलखंड के 62 लाख से अधिक लोगों को स्थाई पेयजल और सिंचाई का पानी देना है, तो इस तरह के कड़े और बड़े फैसले लेना वक्त की सबसे बड़ी जरूरत है।

यही वह ऐतिहासिक मोड़ है जहाँ भारत की नदी जोड़ो योजना खड़ी है। क्या यह योजना भारत में सूखे और बाढ़ के स्थायी समाधान की जल क्रांति (Water Revolution) बनेगी, या फिर यह सामाजिक विस्थापन, नौकरशाही की लापरवाही और पर्यावरणीय तबाही का नया जरिया बनकर रह जाएगी?

भारत में एक तरफ बाढ़ की समस्या तो दूसरे तरफ सूखे की, नदी जोड़ो परियोजना बदलेगी तस्वीर- प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT)

इस सवाल को गहराई से समझने के लिए हमें सबसे पहले यह जानना होगा कि आखिर भारत को अपनी नदियों को आपस में जोड़ने की जरूरत क्यों पड़ी और इस योजना का ऐतिहासिक ढाँचा किस तरह तैयार हुआ।

आखिर क्यों पड़ी नदियों को जोड़ने की जरूरत?

भारत के भूगोल (Geography) और मौसम की प्रकृति को अगर बारीकी से समझा जाए, तो एक बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि हमारे देश में पानी की कुल मात्रा में कोई प्राकृतिक कमी नहीं है। असली समस्या पानी के प्रबंधन (Water Management) और उसके असमान वितरण की है।

भारत में मानसूनी बारिश की अपनी एक अलग विशिष्टता (Peculiarity) है। पूरे साल में जितनी बारिश होती है, उसका लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा केवल जून से सितंबर के चार महीनों में गिरता है। इसका सीधा मतलब यह है कि साल के 12 महीनों के इस्तेमाल के लिए पानी हमें केवल 100 से 120 दिनों के भीतर ही प्राप्त होता है। जब इतना विशाल जलप्रवाह बहुत छोटे समय में नदियों में उमड़ता है, तो नदी बेसिनों की धारण क्षमता (Carrying Capacity) जवाब दे जाती है।

नदियाँ जब पहाड़ों से मैदानों की ओर आती हैं, तो अपने साथ करोड़ों टन मिट्टी और गाद (silt) बहाकर लाती हैं। यह गाद धीरे-धीरे नदियों की तलहटी में जमा होती जाती है, जिससे नदियों का पेट छिला हो जाता है। ऐसे में जब मानसून के दौरान अचानक अत्यधिक बारिश होती है, तो पानी नदी के पाटों को तोड़कर आसपास के सैकड़ों गाँवों और शहरों को डुबो देता है। बिहार में कोसी नदी को इसीलिए ‘बिहार का शोक’ (Sorrow of Bihar) कहा जाता है, क्योंकि वह हर साल अपना मार्ग बदलकर तबाही मचाती रही है।

दूसरी ओर देश का दूसरा पहलू बिल्कुल उलट है। पश्चिमी भारत का राजस्थान और गुजरात, मध्य और दक्षिणी भारत के पठारी क्षेत्र जैसे महाराष्ट्र का विदर्भ व मराठवाड़ा, कर्नाटक का उत्तरी क्षेत्र, आंध्र प्रदेश का रायलसीमा और मध्य प्रदेश-उत्तर प्रदेश का साझा बुंदेलखंड इलाका वर्षा-छाया क्षेत्र (Rain Shadow Zone) या कम बारिश वाले इलाकों में आते हैं। यहाँ यदि मानसून किसी एक साल थोड़ा भी कमजोर रह जाए या समय पर न पहुँचे, तो भूजल स्तर (Groundwater Level) सैकड़ों फीट नीचे चला जाता है।

कुओं का सूखना, हैंडपंपों का हवा देना, फसलों का जल जाना और मवेशियों का दाने-पानी के अभाव में मर जाना इन इलाकों की रोजमर्रा की नियति बन जाता है। यहाँ का किसान कर्ज के बोझ तले दबकर पलायन (Migration) करने पर मजबूर हो जाता है।

भारत में एक तरफ बाढ़ की समस्या तो दूसरे तरफ सूखे की, प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT)

जब देश का एक हिस्सा पानी की अधिकता से डूब रहा हो और दूसरा हिस्सा बूँद-बूँद को तरस रहा हो, तो यह प्राकृतिक असंतुलन देश के आर्थिक और सामाजिक विकास में सबसे बड़ी रुकावट बनकर सामने आता है। इसी प्राकृतिक विषमता (natural inequality) को संतुलित करने के लिए ‘अधिशेष बेसिन’ (Surplus Basin) से पानी को उठाकर ‘कमी वाले बेसिन’ (Deficit Basin) तक पहुँचाने की सोच ने जन्म लिया।

समुद्र में बह जाता है अरबों घनमीटर मीठा पानी: आँकड़ों में जल बर्बादी

भारत के जल संसाधनों का हाइड्रोलॉजिकल डेटा (Hydrological Data) एक बहुत ही चौंकाने वाली सच्चाई उजागर करता है। केंद्रीय जल आयोग (Central Water Commission – CWC) के आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, भारत में हर साल बारिश और बर्फबारी के रूप में औसतन करीब 4,000 अरब घनमीटर (Billion Cubic Meters – BCM) पानी प्राप्त होता है।

हालाँकि इस 4,000 BCM पानी में से वाष्पीकरण (Evaporation), जमीन में प्राकृतिक रूप से रिसने और दुर्गम भौगोलिक सीमाओं के कारण हम केवल 1,123 BCM पानी का ही उपयोग करने की स्थिति में होते हैं। इस Usable Water (उपयोग योग्य पानी) में से भी लगभग 690 BCM सतही जल (Surface Water) के रूप में उपलब्ध है और 433 BCM भूजल (Groundwater) के रूप में।

मानसूनी नदियों का सबसे बड़ा कड़वा सच यह है कि हर साल लगभग 1,500 से 2,000 अरब घनमीटर मीठा पानी बिना किसी मानवीय, कृषि या औद्योगिक उपयोग के उफनती नदियों के जरिए बहकर समुद्र के खारे पानी में मिल जाता है। जल विशेषज्ञों का मानना है कि समुद्र में मिलने वाला यह पानी बर्बादी नहीं बल्कि नदी के प्राकृतिक पारितंत्र (Estuary Ecosystem) को बनाए रखने के लिए कुछ हद तक जरूरी है, लेकिन इसका एक बड़ा हिस्सा रोककर जरूरतमंद इलाकों में भेजा जा सकता है।

फोटो साभार: AI ChatGPT, डाटा स्रोत: NDWA/भारत सरकार

यदि इस बेकार बह जाने वाले मानसूनी जल का केवल 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा भी सही वैज्ञानिक तकनीकों, जलाशयों (Reservoirs) और लिंक नहरों (Link Canals) के जरिए मोड़ लिया जाए, तो देश में न केवल 3.5 करोड़ हेक्टेयर अतिरिक्त कृषि भूमि को पानी दिया जा सकता है, बल्कि देश के हर शहर और गाँव को 24 घंटे पीने का साफ पानी मुहैया कराया जा सकता है।

क्या भारत में सचमुच पानी की कमी है या समस्या उसके वितरण की है?

नीतिगत और वैज्ञानिक धरातल पर अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि क्या भारत सचमुच एक ऐसा देश बनता जा रहा है जहाँ पानी खत्म हो रहा है? इसका तकनीकी जवाब है-नहीं। भारत में पानी की कुल मात्रा घटी नहीं है, बल्कि हमारी जनसंख्या विस्फोट, शहरीकरण (Urbanization) और जल के कुप्रबंधन (Mismanagement) की वजह से प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता (Per Capita Water Availability) में भारी गिरावट आई है।

साल 1951 में भारत में प्रति व्यक्ति वार्षिक जल उपलब्धता लगभग 5,177 घनमीटर थी। वर्ष 2011 की जनगणना तक यह घटकर 1,545 घनमीटर रह गई और वर्तमान में इसके 1,400 घनमीटर से भी नीचे आने का अनुमान है। अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार, जब किसी देश में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 1,700 घनमीटर से कम हो जाती है, तो उसे ‘वाटर स्ट्रेस्ड’ (Water-Stressed) यानी जल तनावग्रस्त स्थिति माना जाता है। यदि यह आँकड़ा 1,000 घनमीटर से नीचे चला जाए, तो उसे ‘वाटर स्कैर्स’ (Water-Scarce) यानी भीषण जल संकट माना जाता है।

फोटो साभार: AI ChatGPT, डाटा स्रोत: NDWA/भारत सरकार

असली चुनौती प्रति व्यक्ति घटते आँकड़ों से भी ज्यादा स्थानगत (Spatial) और समयगत (Temporal) असंतुलन की है, जिसमें-

मौजूदा जगह का असंतुलन (Spatial Imbalance): ब्रह्मपुत्र और गंगा नदी बेसिन में देश के कुल जल संसाधनों का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा मौजूद है, जबकि उनका भूमि क्षेत्र देश के कुल क्षेत्रफल का केवल एक-तिहाई है। इसके विपरीत, दक्षिण और पश्चिम की नदियाँ (जैसे कृष्णा, कावेरी, साबरमती) देश के बड़े भूभाग को सींचती हैं लेकिन उनमें जल प्रवाह काफी कम है।

भंडारण क्षमता का अभाव (Lack of Water Storage): विकसित देशों की तुलना में भारत अपनी नदियों के पानी को सहेजने यानी स्टोरेज कैपेसिटी (Storage Capacity) के मामले में बहुत पीछे है। अमेरिका अपनी नदियों का प्रति व्यक्ति औसतन 5,960 घनमीटर और ऑस्ट्रेलिया 4,730 घनमीटर पानी बड़े बांधों में स्टोर कर सकता है। इसके मुकाबले भारत की प्रति व्यक्ति जल भंडारण क्षमता केवल 225 घनमीटर के आसपास है।

इसलिए समस्या यह नहीं है कि भारत के पास पानी नहीं है; समस्या यह है कि हमारे पास पानी को सही जगह पर रोकने, उसे जरूरत वाले इलाकों तक भेजने और उसका कुशलतापूर्वक उपयोग करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एकीकृत तंत्र (Integrated Grid) का अभाव रहा है।

आजादी के बाद से कैसे बढ़ा नदी जोड़ने का विचार

नदियों को आपस में जोड़ने की अवधारणा कोई आधुनिक विचार नहीं है। इसका एक लंबा और दिलचस्प इतिहास रहा है जो औपनिवेशिक काल से शुरू होकर आधुनिक भारत तक फैला हुआ है।

सर आर्थर कॉटन की शुरुआती सोच (19वीं सदी): 19वीं सदी के मध्य में प्रसिद्ध ब्रिटिश सिंचाई इंजीनियर सर आर्थर कॉटन (Sir Arthur Cotton) ने सबसे पहले दक्षिण भारत की प्रमुख नदियों को जोड़ने का विचार रखा था। सर आर्थर कॉटन ने ही गोदावरी और कृष्णा नदियों पर एनिकिट (Barrages) का निर्माण कराया था।

उनका प्राथमिक उद्देश्य सिंचाई से ज्यादा नौवहन यानी जलमार्ग (Navigation) विकसित करना था। उस समय भारत में रेलवे नेटवर्क का विकास शुरुआती चरण में था और ईस्ट इंडिया कंपनी के माल को देश के आंतरिक हिस्सों से बंदरगाहों तक ढोने के लिए नदियों को जोड़कर एक जलमार्ग नेटवर्क बनाना सबसे सस्ता विकल्प माना गया था। हालाँकि अंग्रेजों का ध्यान मुख्य रूप से औपनिवेशिक लाभ पर था, इसलिए यह योजना कभी व्यापक रूप से लागू नहीं हो सकी।

आजादी के बाद की विशाल नदी घाटी परियोजनाएँ: 1947 में आजादी के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती देश की विशाल आबादी के लिए खाद्यान्न सुरक्षा (Food Security) सुनिश्चित करना और बार-बार पड़ने वाले अकाल (Famines) से निपटना था। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बहुउद्देशीय बांधों (Multipurpose Dams) को ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ कहा।

1950 और 1960 के दशकों में भाखड़ा-नांगल (सतलुज नदी), हीराकूद (महानदी), दामोदर घाटी परियोजना (DVC) और नागार्जुन सागर जैसी विशाल परियोजनाओं पर काम शुरू हुआ। इन परियोजनाओं ने यह साबित कर दिया कि नदियों पर बड़े बाँध बनाकर बाढ़ नियंत्रण, बिजली उत्पादन और बड़े पैमाने पर नहरों के जरिए सिंचाई संभव है। लेकिन ये सभी परियोजनाएँ एक ही नदी या उसके बेसिन तक सीमित थीं। एक बेसिन से दूसरे बेसिन में बड़े पैमाने पर पानी ले जाने का विचार अभी भी शुरुआती चरण में ही था।

डॉ. KL राव से लेकर Garlands Canal तक: दो ऐतिहासिक प्रयासों के बारे में जानना जरूरी

डॉ. के.एल. राव का ‘नेशनल वाटर ग्रिड’ (1970 का दशक): भारत के महान सिविल इंजीनियर और तत्कालीन केंद्रीय सिंचाई और विद्युत मंत्री डॉ. के.एल. राव (Dr. K.L. Rao) ने वर्ष 1972 में ‘नेशनल वाटर ग्रिड’ (National Water Grid) का एक बेहद साहसी और दूरगामी प्रस्ताव देश के सामने रखा। डॉ. राव को भारतीय जल प्रबंधन का पितामह भी कहा जाता है।

डॉ. के.एल. राव की योजना का सबसे मुख्य आकर्षण था- ‘गंगा-कावेरी लिंक’ (Ganga-Cauvery Link)।

  • डॉ. राव का प्रस्ताव था कि मानसून के दौरान जब गंगा नदी में पटना के पास (सोनभद्र के संगम स्थल के निकट) भारी मात्रा में अतिरिक्त पानी बहता है, तब वहाँ से लगभग 60,000 क्यूसेक पानी को पंपों के जरिए लिफ्ट (Lift) किया जाए।
  • इस पानी को लिफ्ट करके दक्षिण की ओर बढ़ाया जाना था। इसे विंध्याचल और सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं को पार कराते हुए नर्मदा, तापी, गोदावरी, कृष्णा और पेनार नदियों से जोड़ते हुए अंत में तमिलनाडु की कावेरी नदी तक पहुँचाया जाना था।
  • यह नहर लगभग 2,640 किलोमीटर लंबी होनी थी। इसमें पानी को लगभग 550 मीटर (1,800 फीट) की ऊँचाई तक लिफ्ट करने के लिए भारी मात्रा में बिजली की आवश्यकता थी।

योजना क्यों खारिज हुई? केंद्रीय जल आयोग (CWC) और अंतरराष्ट्रीय जल विशेषज्ञों ने जब डॉ. राव की इस योजना का गहन तकनीकी और आर्थिक अध्ययन किया, तो पाया कि-

  • इस योजना में जितनी बिजली पानी को लिफ्ट करने में खर्च होगी (लगभग 5,000 से 7,000 मेगावाट), उतनी बिजली उस समय पूरे देश में आसानी से उपलब्ध नहीं थी।
  • योजना की वित्तीय लागत (financial cost) उस समय के भारत के कुल राष्ट्रीय बजट से भी अधिक बैठती थी।
  • उत्तर भारत से दक्षिण भारत तक पानी ले जाने में रास्ते के राज्यों के बीच गंभीर जल विवाद (water disputes) खड़े होने की पूरी आशंका थी।

इन्हीं कारणों से सरकार ने इसे व्यावहारिक (Feasible) न मानकर ठंडे बस्ते में डाल दिया।

कैप्टन दस्तूर का ‘गारलैंड केनाल सिस्टम’ (1977): डॉ. के.एल. राव के प्रस्ताव के कुछ ही साल बाद 1977 में एक एयरलाइंस पायलट और इंजीनियर कैप्टन दिनशॉ जे. दस्तूर (Captain Dinshaw J. Dastur) ने ‘गारलैंड केनाल सिस्टम‘ (Garland Canal System) का एक और काल्पनिक और जटिल विचार पेश किया।

हिमालयन गारलैंड केनाल (Himalayan Garland Canal): यह नहर हिमालय की तलहटी में रवी नदी से शुरू होकर ब्रह्मपुत्र और उससे आगे तक लगभग 4,200 किलोमीटर लंबी बननी थी।

सेंट्रल एंड साउर्दर्न गारलैंड केनाल (Central and Southern Garland Canal): यह नहर मध्य और दक्षिण भारत के पठार को एक घेरे (garland) की तरह चारों तरफ से लपेटते हुए बनाई जानी थी, जिसकी लंबाई करीब 9,300 किलोमीटर होती।

इन दोनों नहरों को आपस में विशाल पाइपलाइनों के जरिए जोड़ा जाना था और बीच-बीच में सैकड़ों छोटे-बड़े कृत्रिम जलाशय (lakes) बनाकर पूरे देश के पानी को नियंत्रित किया जाना था।

स्रोत: NDWA वेबसाइट

ये योजना क्यों खारिज हुई?: भारत सरकार द्वारा गठित विशेषज्ञ समितियों ने इस योजना का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया और इसे पूरी तरह से ‘काल्पनिक और अव्यावहारिक’ (Unrealistic and Impracticable) करार दिया। विशेषज्ञों का मानना था कि भारत की भौगोलिक संरचना, विभिन्न ऊँचाइयों और भू-गर्भीय चट्टानों के बीच इतनी लंबी समतल नहरें बनाना इंजीनियरिंग के दृष्टिकोण से नामुमकिन है।

हालाँकि डॉ. के.एल. राव और कैप्टन दस्तूर के इन दो प्रस्तावों ने भारत सरकार और नीति निर्माताओं को यह अहसास करा दिया कि इस विषय पर एक वैज्ञानिक, व्यावहारिक और चरणबद्ध (phased approach) राष्ट्रीय नीति की सख्त जरूरत है।

National Perspective Plan (NPP) 1980 की नींव

डॉ. राव और कैप्टन दस्तूर के प्रस्तावों के खारिज होने के बाद भारत सरकार के तत्कालीन सिंचाई मंत्रालय (जो आज जल शक्ति मंत्रालय के नाम से जाना जाता है) ने अगस्त 1980 में एक ऐतिहासिक दस्तावेज तैयार किया। इसे ‘नेशनल पर्सपेक्टिव प्लान फॉर वॉटर रिसोर्सेज डेवलपमेंट’ (National Perspective Plan – NPP) नाम दिया गया।

NPP का मुख्य दर्शन यह था कि नदियों के प्राकृतिक प्रवाह और उनके पारिस्थितिक संतुलन (Ecological Balance) से भारी छेड़छाड़ किए बिना, केवल उसी पानी का अंतर-बेसिन स्थानांतरण (Inter-Basin Transfer) किया जाए जो संबंधित नदी बेसिन की अपनी सभी वर्तमान और भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के बाद ‘अधिशेष’ (Surplus) बचे।

NPP के तहत अंतर-बेसिन जल स्थानांतरण के लिए चार मुख्य सिद्धांत तय किए गए-

बेसिन की प्राथमिक प्राथमिकता: जिस नदी बेसिन से पानी लिया जा रहा है, उसकी पेयजल, कृषि, औद्योगिक और पर्यावरण संबंधी जरूरतों को प्राथमिकता दी जाएगी।

केवल अधिशेष जल का स्थानांतरण: पानी केवल तभी स्थानांतरित किया जाएगा जब गहन हाइड्रोलॉजिकल अध्ययनों से यह साबित हो जाए कि बेसिन में जल वास्तव में सरप्लस है।

ग्रेविटी फ्लो को प्राथमिकता: जहाँ तक संभव हो, पानी को गुरुत्वाकर्षण (Gravity Glow) के जरिए बहाकर ले जाया जाए ताकि लिफ्ट पंपिंग में भारी बिजली और ऊर्जा का खर्च न हो।

सहमति और संतुलन: संबंधित राज्यों के हितों की रक्षा की जाएगी और पर्यावरण को कम से कम नुकसान पहुँचाया जाएगा।

भारत में प्रस्तावित 30 नदी जोड़ो परियोजनाओं के बारे में जानिए

राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी (NWDA) द्वारा तैयार किए गए 30 नदियों को जोड़ने का खाका भारत के भूगोल को हमेशा के लिए बदलने की क्षमता रखता है।

इन 30 प्रस्तावों को दो प्रमुख भागों में बाँटा गया है, जिसमें प्रायद्वीपीय घटक और हिमालयी घटक शामिल हैं। प्रायद्वीपीय घटक के तहत कुल 16 प्रस्तावित लिंक हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य महानदी और गोदावरी के अधिशेष जल को कृष्णा, कावेरी और पम्बा जैसी दक्षिण की कमी वाली नदियों में भेजना तथा मध्य भारत के अंतर-बेसिन जल संकट को दूर करना है। इसमें महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, केन, बेतवा, तापी, नर्मदा और दमनगंगा जैसी मुख्य नदियाँ शामिल हैं।

फोटो साभार: NWDA प्रोजेक्ट फाइल, भारत सरकार

वहीं हिमालयी घटक के तहत कुल 14 प्रस्तावित लिंक हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य नेपाल और पूर्वोत्तर भारत से बहने वाली ब्रह्मपुत्र, कोसी और गंडक जैसी नदियों के विशाल मानसूनी जल को गंगा, यमुना, राजस्थान और पश्चिम भारत तक पहुँचाना है। इसमें ब्रह्मपुत्र, मानस, संकोश, तिस्ता, कोसी, घाघरा, गंडक, गंगा और यमुना जैसी मुख्य नदियाँ शामिल हैं। इन सारे प्रोटेक्ट्स के बारे में रिपोर्ट के तीसरे पार्ट में विस्तार से समझाया गया है।

फोटो साभार: AI ChatGPT, डाटा स्रोत: NDWA/भारत सरकार

सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक हस्तक्षेप से खुला रास्ता

नदी जोड़ो योजना कई दशकों तक राजनीतिक अनिच्छा, अंतर-राज्यीय विवादों और नौकरशाही की फाइलों में दबी रही। लेकिन इस सुस्ती को तोड़ने में भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) ने सबसे निर्णायक भूमिका निभाई।

साल 2002 का आदेश और तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. कलाम की सोच: साल 2002 में सीनियर एडवोकेट रंजीत कुमार द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को कड़ा निर्देश दिया। उसी दौरान भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में नदी जोड़ो परियोजना को ‘भारत के जल संकट और गरीबी उन्मूलन का सबसे सशक्त हथियार’ बताया था।

फोटो साभार: भारत सरकार- NWDA

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह एक टास्क फोर्स (Task Force on Interlinking of Rivers) का गठन करे और वर्ष 2016 तक सभी 30 लिंकों को पूरा करने के लिए एक समयबद्ध (Time-Bound) कार्ययोजना बनाए। इसके बाद तत्कालीन वाजपेयी सरकार ने पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश प्रभु की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय टास्क फोर्स का गठन किया।

साल 2012 के ऐतिहासिक फैसले के बाद ‘विशेष समिति’ का गठन: वर्ष 2012 में (Networking of Rivers Case में) जस्टिस फकीर मोहम्मद इब्राहिम कलीफुल्ला और जस्टिस स्वतंत्र कुमार की पीठ ने अपना ऐतिहासिक निर्णय सुनाया। अदालत ने माना कि जल सुरक्षा देश के जीवन के अधिकार (Right to Life – Article 21) से सीधी जुड़ी हुई है।

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश देते हुए कहा कि केंद्र सरकार तुरंत स्पेशल कमेटी फॉर इंटरलिंकिंग ऑफ रिवर्स (Special Committee for ILR) का गठन करे। केंद्रीय जल शक्ति मंत्री इस समिति के अध्यक्ष होंगे। इसमें राज्यों के सिंचाई/जल संसाधन मंत्री, विभिन्न संबंधित मंत्रालयों (पर्यावरण, वित्त, कानून) के सचिव, NWDA के महानिदेशक और विषय विशेषज्ञ शामिल होंगे।

यह समिति राज्यों के बीच राजनीतिक सहमति बनाने, पर्यावरणीय Clearances (मंजूरियों) में आ रही अड़चनों को दूर करने और परियोजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन की हर महीने निगरानी करने के लिए जिम्मेदार होगी।

सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े और निरंतर रुख का ही नतीजा था कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारों (विशेषकर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश) को बातचीत की मेज पर आना पड़ा। इसी कानूनी दबाव और राजनीतिक इच्छाशक्ति के मिलन से ‘केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट’ का रास्ता साफ हुआ, जो इस पूरी महा-योजना का पहला जमीनी प्रयोग बना।

क्यों 21वीं सदी में पानी ही सबसे बड़ा रणनीतिक संसाधन (Strategic Asset) बनने वाला है?

बीसवीं सदी की वैश्विक भू-राजनीति (Geopolitics) मुख्य रूप से कच्चे तेल (Crude oil) और ऊर्जा संसाधनों पर नियंत्रण को लेकर घूमती रही। खाड़ी युद्धों से लेकर वैश्विक महाशक्तियों के कूटनीतिक गठबंधनों तक, सब कुछ ‘ब्लैक गोल्ड’ यानी तेल के इर्द-गिर्द तय होता था। लेकिन 21वीं सदी में तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। आज विशेषज्ञ एक स्वर में मान रहे हैं कि 21वीं सदी का सबसे बड़ा रणनीतिक संसाधन तेल नहीं, बल्कि ‘ब्लू गोल्ड’ यानी पीने योग्य मीठा पानी (Freshwater) है।

भारत के संदर्भ में जल सुरक्षा (Water Security) का मामला क्यों जीवन-मरण का प्रश्न बन चुका है, इसे कुछ खास बिंदुओं से जरिए समझा जा सकता है-

जलवायु परिवर्तन और अनिश्चित मौसम चक्र (Climate Change Impact): ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालय के ग्लेशियर अभूतपूर्व गति से पिघल रहे हैं। शुरुआती वर्षों में इससे हिमालयी नदियों में विनाशकारी बाढ़ आएगी, और बाद के दशकों में ग्लेशियरों का आकार छोटा होने पर ये बारहमासी नदियाँ मौसमी (Seasonal) नदियों में बदल सकती हैं। दूसरी ओर मानसूनी बारिश का ढर्रा (pattern) बिगड़ चुका है, कम समय में अत्यधिक बारिश (Cloudbursts/Heavy Rainfall Svents) और लंबे समय तक सूखा रहना अब नया सामान्य (New Normal) बन गया है। इस अनिश्चितता से निपटने का एकमात्र तरीका विशाल भंडारण और कुशल जल स्थानांतरण नेटवर्क ही है।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा पर खतरा (Food Security Danger): भारत की 140 करोड़ से अधिक आबादी के पेट भरने के लिए कृषि उत्पादन को निरंतर बढ़ाना अनिवार्य है। भारत की कृषि आज भी 50 प्रतिशत से अधिक मानसूनी बारिश पर निर्भर है। यदि भूजल स्तर इसी तरह गिरता रहा (जिसका भारत दुनिया में सबसे बड़ा उपभोक्ता है), तो देश के अन्न भंडार कहे जाने वाले पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कृषि संकट गहरा जाएगा। नदी जोड़ो योजना के माध्यम से अतिरिक्त 3.5 करोड़ हेक्टेयर जमीन को सुनिश्चित सिंचाई देकर ही भारत अपनी भावी पीढ़ियों के खाद्यान्न की रक्षा कर सकता है।

राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता (National Security & Social Stability): पानी का संकट केवल खेतों तक सीमित नहीं रहता। जब शहरों में नल सूखते हैं (जैसे चेन्नई में ‘डेमो ज़ीरो’ की स्थिति आई थी या बेंगलुरु में हालिया जल संकट), तो सामाजिक अशांति, हिंसा और कानून-व्यवस्था का संकट पैदा होता है। इसके अलावा राज्यों के बीच पानी को लेकर विवाद (जैसे कावेरी विवाद, सतलुज-यमुना लिंक विवाद) देश की आंतरिक एकता और संघीय ढाँचे (Federal Structure) के लिए गंभीर चुनौती बनते हैं। एक पारदर्शी और वैज्ञानिक राष्ट्रीय जल ग्रिड राज्यों के बीच जल-संघर्षों को कम कर सकता है।

औद्योगिक और आर्थिक आत्मनिर्भरता (Economic Growth): भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर और उससे आगे की अर्थव्यवस्था बनाने के लिए विनिर्माण (Manufacturing), ऊर्जा उत्पादन (विशेषकर ग्रीन हाइड्रोजन और सेमीकंडक्टर चिप्स) और शहरीकरण के लिए अरबों गैलन पानी की आवश्यकता होगी। जल उपलब्धता के बिना कोई भी औद्योगिक कॉरिडोर (Industrial Corridor) सफल नहीं हो सकता।

आगे क्या?

नदी जोड़ो योजना की विशाल सैद्धांतिक और कानूनी पृष्ठभूमि को समझने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या यह योजना कागजी नक्शों से बाहर निकलकर धरातल पर वाकई में वैसी ही काम करती है जैसा वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने सोचा था?

इस सवाल का जवाब हमें भारत की सबसे पहली और ऐतिहासिक अंतर-बेसिन जल स्थानांतरण पहल ‘केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट’ (Ken-Betwa Link Project – KBLP) में मिलता है। केन-बेतवा प्रोजेक्ट केवल दो नदियों को जोड़ने की एक इंजीनियरिंग परियोजना नहीं है, बल्कि यह बुंदेलखंड के लाखों प्यासे लोगों की उम्मीदों, पन्ना के घने जंगलों, विस्थापित हो रहे आदिवासियों के दर्द और दौधन बांध के मुआवजे में हो रहे घोटालों की एक बेहद पेचीदा और नाटकीय कहानी है।

Part II में पढ़िए: नदी जोड़ो योजना की इसी दूरदर्शी सोच को धरातल पर उतारने के लिए देश की पहली ऐतिहासिक पहल ‘केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट’ (Ken-Betwa Link Project – KBLP) की शुरुआत हुई। अगले भाग में विस्तार से जानिए कि केन-बेतवा प्रोजेक्ट क्या है, यह तकनीक और इंजीनियरिंग के स्तर पर कैसे काम करेगा, दौधन बाँध निर्माण से प्रभावित पन्ना टाइगर रिजर्व के आदिवासियों और ग्रामीणों के विस्थापन का सच क्या है, मुआवजे के घोटालों की जमीनी हकीकत क्या है और क्या यह प्रोजेक्ट वाकई सूखाग्रस्त बुंदेलखंड की तस्वीर और तकदीर बदलने में कामयाब हो पाएगा…

Part III में पढ़िए: भारत की अन्य प्रमुख नदी जोड़ो परियोजनाएँ, हिमालयी और प्रायद्वीपीय लिंकों का विस्तृत तकनीकी विश्लेषण, हिमाचल-पंजाब-राजस्थान और जम्मू-कश्मीर से जुड़े आधिकारिक प्रस्ताव, दुनिया भर के सबसे बड़े जल स्थानांतरण प्रयोग (जैसे चीन का South–North Water Transfer, अमेरिका का California Water Project, पाकिस्तान का Indus Basin System, स्पेन का Tagus-Segura Transfer और ऑस्ट्रेलिया की Snowy Mountains Scheme) और उनसे भारत के लिए सबक। साथ ही पढ़िए-पर्यावरणीय चुनौतियाँ, विशेषज्ञों का पक्ष-विपक्ष, जलवायु परिवर्तन का असर। इसमें आपको इन सवालों के भी जवाब मिलेंगे कि क्या यह महायोजना भारत की जल क्रांति बनेगी और करोड़ों भारतीयों के जल की जरूरत को पूरा कर पाएगी?

हिमाचल में पेट्रोल-डीजल महँगा, अर्थव्यवस्था का बँटाधार कर कॉन्ग्रेस की सुक्खू सरकार लाई नया Cess: जानें- क्या है ‘विधवा और अनाथ उपकर’

हिमाचल प्रदेश सरकार ने पेट्रोल और हाई स्पीड डीजल पर 60 पैसे प्रति लीटर का नया अनाथ एवं विधवा उपकर (Orphan and Widow Cess) लागू किया है। राज्य कर एवं उत्पाद शुल्क विभाग द्वारा मंगलवार को अधिसूचना जारी करने के बाद यह नया उपकर 11 अगस्त की मध्यरात्रि से लागू हो गया। इससे राज्य में ईंधन की कीमतें बढ़ गई है।

सरकार के मुताबिक, उपकर से एकत्रित राजस्व विधवाओं और अनाथों के लिए बनाए गए कल्याण कोष में जाएगा। 12 अगस्त से बिक्री पर इसका असर दिखने लगा है। राज्य की विपक्षी पार्टी बीजेपी का कहना है कि एक के बाद एक सुक्खू सरकार ने जनता पर बोझ डाल दिए हैं। एक तरफ सुक्खू सरकार ने हजारों करोड़ों का कर्ज ले लिया है, वहीं दूसरी तरफ लगातार नए-नए टैक्स लगाकर जनता की जेब पर डाका डाला जा रहा है।

सरकार ने यह नया उपकर क्यों लगाया?

हिमाचल सरकार ने मार्च 2026 में Himachal Pradesh Value Added Tax (Amendment) Bill, 2026 विधानसभा में पारित कराया था। इसके जरिए वैट एक्ट में नई धारा 6-ए जोड़ी गई। कानून में सरकार को पेट्रोल और हाई स्पीड डीजल पर अधिकतम ₹5 प्रति लीटर तक उपकर लगा कर विधवाओं और अनाथों की देखभाल के लिए कोष बनाना था ताकि इनलोगों को आर्थिक सहायता दी जा सके।

सरकार का तर्क है कि हिमाचल में अनाथ बच्चों और आर्थिक रूप से कमजोर विधवाओं के लिए पहले से कई योजनाएँ चल रही हैं, लेकिन इनके लिए स्थायी और समर्पित रेवेन्यू स्रोत नहीं था। इसलिए अलग ‘वेलफेयर फंड’ बनाने का प्रावधान किया गया।

कानून में साफ लिखा है कि यह अनाथों और विधवाओं के कल्याण पर खर्च होगा। फिलहाल सरकार 60 पैसे प्रति लीटर के हिसाब से उपकर लेगी। आने वाले समय में धीरे धीरे उसे बढ़ाया जा सकता है, क्योंकि विधानसभा ने ₹5 प्रति लीटर तक उपकर लगाने पर सहमति दे दी थी।

सरकार ने 60 पैसे प्रति लीटर की दर निर्धारित की है, यानी 50 लीटर पेट्रोल भराने पर लगभग ₹30 अतिरिक्त टैक्स और 50 लीटर हाई स्पीड डीजल भरवाने पर ₹30 अतिरिक्त पैसे देने पड़ रहे हैं। ये उपकर उन टैक्सों से अलग है जो पहले से ही हिमाचल की जनता से वसूले जा रहे थे। यह पैसा उपभोक्ता को फ्यूल प्राइस के साथ जोड़ कर वसूला जा रहा है।

हिमाचल सरकार को कितना फायदा होगा?

राज्य कोष को इससे फायदा होगा। दरअसल सरकार को प्रति लीटर ₹0.60 मिलेगा। यानी राज्य में एक साल में पेट्रोल और HSD की कुल बिक्री 100 करोड़ लीटर हुई तो इससे राज्य को 100 करोड़ × ₹0.60 = ₹60 करोड़ का सीधा फायदा होगा।

अगर बिक्री 150 करोड़ लीटर हुई तो सरकार को 150 करोड़ × ₹0.60 = ₹90 करोड़ का फायदा होगा। इसी तरह 200 करोड़ लीटर की बिक्री होने पर ₹120 करोड़ का फायदा सीधे सरकार को होगा। अर्थात वास्तविक सरकारी आय राज्य में होने वाली कुल पेट्रोल + HSD बिक्री पर निर्भर करेगी।

डीलरों की चिंता

ये पैसा पेट्रोल पंप के माध्यम से ही लिया जाएगा क्योंकि कानून कहता है कि cess ‘एट द प्वाइंट ऑफ फर्स्ट सेल इन द स्टेट’ लगाया जाएगा। कानून के मुताबिक ऑयल कंपनी से पेट्रोल पंप डीलर और फिर कस्टमर तक जाता है पेट्रोल-डीजल। इसलिए cess डीलर से लिया जाएगा और डीलर आम जनता से वसूलेगा, लेकिन डीलर पर अप्रत्यक्ष रूप से इसका प्रभाव पड़ सकता है।

डीलरों की चिंता है कि हिमाचल से फ्यूल अगर दूसरे राज्यों मसलन पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़ जैसे में सस्ता मिलता है तो सीमावर्ती क्षेत्रों की जनता पड़ोसी राज्यों में जाकर अपना वाहन की टंकी फुल करवाएगी। ऐसे में उन्हें नुकसान उठाना पड़ सकता है।

व्यावसायिक वाहन तो पहले ही दूसरे राज्यों में फ्यूल लेकर आएँगे। इनमें बड़े बड़े ट्रक, टैक्सी और दूसरे कॉमर्शियल वाहन होंगे। ये ही आम तौर पर डीजल खरीदते हैं। ऐसे में डीजल डीलरों की कमाई पर इसका असर पड़ेगा। इसके अलावा चूँकि डीलर को ही ये टैक्स भी जमा करना है तो उनको अपने अकाउंट, बिलिंग और टैक्स से जुड़े मामलों पर ज्यादा ध्यान देना होगा। यही वजह है कि डीलरों ने उपकर की आवश्यकता पर भी सवाल उठाया है और इसके उपयोग के संबंध में अधिक स्पष्टता की माँग की है।

उपभोक्ताओं पर क्या पड़ेगा असर

उपभोक्ता को 60 पैसे प्रति लीटर सीधे जेब से देने के अलावा भी कई मोर्चों पर महँगाई का सामना करना पड़ेगा। राज्य में ट्रांसपोटेशन का खर्चा बढ़ने पर वस्तुओं की कीमत बढ़ जाएगी। माल ढुलाई का खर्च भी तो जनता ही देगी। इतना ही नहीं प्राइवेट गाड़ियों पर लागत बढ़ेगा। व्यावसायिक वाहनों के रेट बढ़ जाएँगे। इससे जनता पर बोझ तो बढ़ेगा ही।

हिमाचल सरकार को इससे क्या रणनीतिक फायदा है?

सरकार को एकमुश्त पैसे फंड के रूप में मिलेंगे। सरकार सामान्य बजट से पैसा निकालने के बजाय एक अलग रिवेन्यू स्ट्रीम बना सकती है। चूँकि पेट्रोल- डीजल की बिक्री साल के बारह महीने, 24 घंटे होती है इसलिए एक अच्छा खासा रेवेन्यू की उम्मीद रहेगी। इन सबमें सबसे अहम है राजनीतिक तौर पर विपक्ष के सवालों का जवाब देना।

दरअसल हिमाचल की कॉन्ग्रेस सरकार गंभीर वित्तीय संकट से जूझ रही है। सरकारी कर्मचारियों को वेतन और पेंशन देने में भी दिक्कतें पेश आ रही है। ऐसे में विधवाओं और अनाथ बच्चों के नाम पर जनता से ही पैसे लेकर सरकार एक ‘इमेज’ बनाने की कोशिश करेगी।

कॉन्ग्रेस के सुक्खू सरकार की माली हालत यह है कि वह चुनावी वादे पूरी करने की स्थिति में नहीं है। मुफ्त बिजली, महिलाओं के लिए मासिक वित्तीय सहायता, पुरानी पेंशन योजना की बहाली, सरकारी नौकरियाँ और कई सब्सिडी आधारित योजनाएँ धरी की धरी रह गई।

राजस्व घाटा अनुदान बंद होने पर सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू ने वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों, मंत्रियों और विधायकों के वेतन में 20 से 50 फीसदी कटौती करने का लिया था। इसका विरोध हुआ तो उन्होने प्रशासनिक और मंत्री-विधायकों के वेतन को बहाल कर दिया।

राज्य के किसान और मजदूर भी सड़कों पर उतर आए हैं। किसानों को बीज-खाद की दिक्कत है, तो मजदूर काम के घंटे बढ़ाने और उसके पैसे नहीं देने पर धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। ऐसे में जनता में विश्वास पैदा करने के लिए सरकार ने नई रणनीति बनाई है।

बीजेपी कर रही है विरोध

लेकिन विपक्ष लगातार जनता पर अतिरिक्त बोझ डालने पर सरकार के कदम का विरोध कर रहा है। मुख्य विपक्षी दल बीजेपी ने विधानसभा में भी इसका विरोध किया था और इसे जनता पर अतिरिक्त बोझ बताया था। बीजेपी की दलील थी कि पहले से महँगे फ्यूल पर एक और उपकर लगा कर क्यों जनता पर महँगाई का बोझ डाला जा रहा है।

विपक्ष के नेता जय राम ठाकुर ने विधवाओं और अनाथों के नाम पर कर लगाकर राजस्व बढ़ाने की सरकार की कोशिश की आलोचना करते हुए तर्क दिया कि ईंधन की कीमतें बढ़ने से हिमाचल प्रदेश में पेट्रोल और डीजल पड़ोसी राज्यों की तुलना में अधिक महँगे हो सकते हैं, जिससे आम लोग बॉर्डर पार कर दूसरे राज्यों से फ्यूल ले सकते हैं। इसका असर राज्य की कमाई पर भी पड़ेगा।

इसके अलावा विपक्ष ने यह सवाल भी उठाया कि अगर सरकार को वेलफेयर स्कीम के लिए पैसा चाहिए तो वह सामान्य बजट से क्यों नहीं देती। विधानसभा में BJP विधायकों ने इस मुद्दे पर विरोध किया था और सदन का वॉकआउट भी किया था।

बीजेपी का कहना है कि जब से सुक्खू सरकार सत्ता में आई है, जनता पर बोझ बढ़ता गया है। पहले डीजल पर वैट बढ़ाकर कीमतें बढ़ाईं और अब फिर से डीजल व पेट्रोल के दाम बढ़ा दिए गए हैं। बिजली-पानी पर दी जाने वाली सब्सिडी बंद कर दी गई। राशन डिपो में मिलने वाली सब्सिडी बंद है। HRTC बसों में किराया बढ़ाया और स्टाम्प ड्यूटी 500% तक बढ़ा दी गई। एक तरफ सुक्खू सरकार ने हजारों करोड़ों का कर्ज ले लिया है, वहीं दूसरी तरफ लगातार नए-नए टैक्स लगाकर जनता की जेब पर डाका डाला जा रहा है।

हिमाचल प्रदेश सरकार कहना है कि केंद्र भी फ्यूल पर बड़े cesses लगाता है, तो राज्य क्यों न लगाए और हिमाचल सरकार ने तो मात्र 60 पैसे से शुरुआत की है। अब भविष्य में ये 60 पैसा बढ़ कर 5 रुपए तक जा सकता है, इस पर तो विधानसभा पहले ही मोहर लगा चुकी है।

‘SIR’ पर प्रकाश राज का फर्जीवाड़ा एक्सपोज: कर्नाटक में अपना वोट कटने का फैला रहे थे भ्रम, चुनाव आयोग ने पोल खोली; पढ़ें सच्चाई

कर्नाटक में चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) अभियान को लेकर भ्रम और डर फैलाने की कोशिश की जा रही है। इसी क्रम में अभिनेता प्रकाश राज ने 11 अगस्त को सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा कर दावा किया कि बेंगलुरु की वोटर लिस्ट से उनका नाम जानबूझकर हटा दिया गया है। खुद को ’65 लाख हटाए गए मतदाताओं’ में से एक बताते हुए उन्होंने इशारों-इशारों में केंद्र सरकार पर राजनीतिक द्वेष के तहत मताधिकार छीनने का आरोप लगाया।

95 सेकंड के वीडियो में प्रकाश राज ने कहा:

“प्यारे दोस्तों, साथियों, मैं आपके साथ एक चुटकुला शेयर करना चाहता हूँ। मैं उन 65 लाख मतदाताओं में से एक हूँ जिनका वोटिंग राइट SIR के बाद बेंगलुरु निर्वाचन क्षेत्र से डिलीट कर दिया गया है। अच्छा मजाक है ना? मैं इसी निर्वाचन क्षेत्र में पैदा हुआ, यहीं पढ़ा-लिखा, थिएटर किया और आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि मैं यहाँ से सांसद का उम्मीदवार भी रहा हूँ।”

प्रकाश राज ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए लिखा कि सत्ता का इस्तेमाल कर मतदाताओं के अधिकार छीने जा रहे हैं। उसने आगे कहा,

“अच्छा, मजाक अच्छा है। गेम ऑन। अब देखता हूँ कि मुझे किस प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा। अपना वोटर आईडी वापस पाने के लिए क्या-क्या कागज दिखाना पड़ेगा? खैर, गेम ऑन। लेकिन एक छोटी सी बात मेरे दोस्त- आप उन कुछ नागरिकों के वोट देने के अधिकार को छीनने के लिए अपनी ताकतों का इस्तेमाल कर सकते हैं जो शायद आपको न चुनें। लेकिन मेरे प्यारे दोस्त, क्या आप हमें सत्ता से नीचे गिराने की हमारी ताकत से रोक सकते हैं? बस पूछ रहा हूँ। बाय।”

इस वीडियो के कैप्शन में प्रकाश राज ने लिखा “फ्रैंड, तुम उन कुछ नागरिकों से वोट देने का अधिकार छीनने का रास्ता चुन सकते हो जो शायद तुम्हें दोबारा तख्त पर न बिठाएँ… लेकिन क्या तुम आखिरकार तुम्हें तख्त से नीचे गिराने की हमारी ताकत से हमें रोक सकते हो? #JustAsking”

चुनाव आयोग और BBMP ने खोली पोल

अपने पोस्ट के जरिए प्रकाश राज ने जमकर प्रोपगेंडा फैलाने का प्रयास किया वहीं बेंगलुरु नागरिक निकाय और अतिरिक्त जिला चुनाव अधिकारी के आधिकारिक बयान ने प्रकाश राज के इन आरोपों की हवा निकाल दी है।

बेंगलुरु सेंट्रल सिटी कॉर्पोरेशन के अपर जिला निर्वाचन अधिकारी (और आयुक्त) जगदीश जी ने जबरन मताधिकार छीने जाने के प्रकाश राज के दावों का खंडन करते हुए एक जवाब जारी किया और बताया कि 16 जून 2026 तक, जब SIR के लिए चुनावी डेटा फ्रीज किया गया था, तब प्रकाश राज का नाम 163-शांतिनगर विधानसभा क्षेत्र में सक्रिय रूप से पंजीकृत था। अधिकारी ने विशिष्ट विवरण देते हुए कहा कि उनका नाम मतदाता सूची में भाग संख्या 1 (Part No. 1) के क्रम संख्या 970 (Serial No. 970) पर पंजीकृत था।

इसके अलावा, पंजीकृत पते (नंबर 266, गार्डन अपार्टमेंट, विथल माल्या रोड) पर बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) द्वारा घर-घर जाकर किए गए सत्यापन में यह बात सामने आई कि प्रकाश राज वहाँ से स्थायी रूप से स्थानांतरित (Shift) हो चुके थे। 2019 के लोकसभा चुनाव में बेंगलुरु सेंट्रल से असफल चुनाव लड़ने वाले यह राजनेता पिछले लगभग चार वर्षों से इस जाँच किए गए पते पर नहीं रह रहे थे।

जगदीश जी ने एक बयान में कहा, “संबंधित पार्टी के बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) द्वारा किए गए घर-घर सत्यापन के दौरान, यह पाया गया कि श्री प्रकाश राज पंजीकृत पते ‘नंबर 266, गार्डन अपार्टमेंट’ से स्थायी रूप से स्थानांतरित हो चुके हैं।”

इन तथ्यों की पुष्टि संपत्ति प्रबंधक (प्रॉपर्टी मैनेजर), पड़ोसियों और वहाँ रह रहे फ्लैट मालिक ने की। सत्यापन के बाद एक पंचनामा या स्थल निरीक्षण रिपोर्ट तैयार की गई।

चूँकि प्रकाश राज स्थायी रूप से कहीं और स्थानांतरित हो गए थे, इसलिए चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों के अनुसार उनका स्टेटस “Shifted” (स्थानांतरित) के रूप में दर्ज किया गया। इस प्रकार, चुनाव आयोग के अधिकारियों ने प्रकाश राज का नाम मतदाता सूची से मनमाने ढंग से या किसी राजनीतिक पूर्वाग्रह के कारण नहीं हटाया।

फोन पर बातचीत और फॉर्म 6 भरने का सुझाव

चुनाव अधिकारियों ने प्रकाश राज से फोन पर बातचीत भी की, जिसमें उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि वे अब उस पुराने पते पर नहीं रहते हैं। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि SIR प्रक्रिया में किसी का नाम मनमाने ढंग से नहीं काटा जाता, बल्कि अनुपस्थित या स्थानांतरित मतदाताओं को नियमानुसार चिन्हित किया जाता है।

प्रकाश राज अपने नए पते के लिए फॉर्म 6 जमा करके अपना मतदाता पहचान पत्र आसानी से अपडेट करा सकते हैं। आयोग के इस जवाब ने साबित कर दिया कि उनका सोशल मीडिया पर किया गया दावा तथ्यात्मक रूप से गलत था।

चार वोटर आईडी कार्ड और अदालती वारंट का मामला

इस पूरे विवाद के बीच प्रकाश राज का स्वयं का ट्रैक रिकॉर्ड भी सवालों के घेरे में है। उन पर कर्नाटक, तमिलनाडु और तेलंगाना में चार अलग-अलग वोटर आईडी कार्ड रखने के आरोप हैं, जो जनप्रतिनिधित्व अधिनियम का उल्लंघन है।

बार-बार समन भेजे जाने के बावजूद अदालत में पेश न होने के कारण बेंगलुरु की एक अदालत उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट भी जारी कर चुकी है। नियम-कायदों का पालन करने के बजाय चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाना केवल इस प्रशासनिक प्रक्रिया को राजनीतिक रंग देने का प्रयास प्रतीत होता है।

महाराष्ट्र में धर्मांतरण के नए कानून के तहत ब्रिटिश नागरिक पर दर्ज हुई FIR, चर्च के कार्यक्रम की आड़ में हिंदुओं को बनाना चाहता था ईसाई: टूरिस्ट वीजा पर आया था भारत

‘महाराष्ट्र धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम 2026’ आधिकारिक रूप से लागू होने के बाद धर्मांतरण को लेकर एक ब्रिटिश नागरिक के खिलाफ एफआईआर दर्ज किया गया है। उस पर पुणे के पेठ में चर्च के कार्यक्रम की आड़ में लोगों को धर्मांतरण के लिए उकसाने का आरोप है। मैनचेस्टर निवासी ब्रिटिश नागरिक OCI कार्डधारक है। पुणे की खड़क पुलिस स्टेशन में इसको लेकर जाँच चल रही है।

पुणे पुलिस के एक अधिकारी ने सोमवार (10 अगस्त 2026) को बताया कि मैनचेस्टर निवासी आरोपी के खिलाफ आव्रजन और विदेशी अधिनियम, 2025 और हाल ही में लागू किया गया महाराष्ट्र धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम, 2026 के संबंधित प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया है।

(FIR की कॉपी)

प्रारंभिक जाँच रिपोर्ट के मुताबिक, आरोपित ने सभा में बोलते समय हिंदू धार्मिक परंपराओं से जुड़े शब्दों, जैसे कि ‘कीर्तन’, ‘संत’ और ‘मोली’ का इस्तेमाल किया। पुलिस का आरोप है कि उसने यीशु के प्रति भक्ति के मार्ग का अनुसरण करने की बात कही और ऐसे बयान दिए जिनसे हिंदू मंदिरों और देवी-देवताओं को लेकर गलत धारणा बने।

पुलिस ने कहा कि ये बयान लोगों को गुमराह करने और उन्हें ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रेरित करने के इरादे से दिए गए थे।

ब्रिटेन के नागरिक ने दावा किया कि यीशु के नाम का जाप करने से बीमारियाँ ठीक हो सकती हैं

पुलिस के अनुसार, आरोपियों ने दावा किया था कि यीशु का नाम लेने से बीमारियाँ ठीक हो सकती हैं और बारिश हो सकती है। जांचकर्ताओं का कहना है कि ऐसे बयान हिंदुओं और अन्य धर्मों के लोगों को ईसाई धर्म की ओर आकर्षित करने के उद्देश्य से दिए गए थे।

खड़क पुलिस स्टेशन के एक अधिकारी ने बताया कि ओसीआई कार्डधारकों को प्रार्थना सभाओं में शामिल होने और धार्मिक कार्यक्रमों में भाग लेने की अनुमति है। लेकिन प्रशासनिक अनुमति के बिना उपदेश नहीं दे सकते, प्रवचन नहीं कर सकते या लोगों को संबोधित नहीं कर सकते।

अधिकारी ने कहा, “हमने उस व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है और आगे की जाँच जारी है।” ब्रिटिश नागरिक पर इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स एक्ट 2025 और महाराष्ट्र फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट 2026 के उल्लंघन का आरोप है।

महाराष्ट्र के नए धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के तहत पहली एफआईआर दर्ज की गई

ब्रिटेन के नागरिक का मामला पुणे पुलिस ने महाराष्ट्र धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम, 2026 के तहत पहली एफआईआर दर्ज करने के कुछ दिनों बाद सामने आया है।

पहला मामला 5 अगस्त को उत्तर प्रदेश के 22 वर्षीय एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज किया गया, जिस पर आरोप है कि उसने रिलेशनशिप में रह रही नाबालिग लड़की को अपना धर्म परिवर्तन करने के लिए उकसाया। चूँकि लड़की नाबालिग है, इसलिए मामला यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम ( पीओसीएसओ ) के तहत भी दर्ज किया गया है।

पुलिस के अनुसार, आरोपित और लड़की उत्तर प्रदेश के एक ही गाँव के रहने वाले थे और बाद में कर्नाटक और फिर पुणे चले गए थे। आरोपी पर नए कानून की धारा 3 और 9(2) के तहत मामला दर्ज किया गया और उसे न्यायिक हिरासत में भेजने से पहले गिरफ्तार कर लिया गया।

धारा 3 के अंतर्गत जबरदस्ती, धोखाधड़ी, प्रलोभन, गलतबयानी, बल प्रयोग, धमकी या अनुचित प्रभाव जैसे साधनों द्वारा धन का रूपांतरण, रूपांतरण का प्रयास या रूपांतरण में सहायता करना निषिद्ध है। धारा 9(2) के अंतर्गत किसी अपराध में नाबालिग के शामिल होने पर सात वर्ष तक की कारावास और 5 लाख रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।

महाराष्ट्र का धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम क्या है?

महाराष्ट्र धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम, 2026 को 1 अगस्त से लागू हो गया है। इसे 31 जुलाई को अधिसूचित किया गया था।

इस कानून में गैर-कानूनी धर्मांतरण, प्रलोभन और दबाव की सीमाओं को काफी विस्तार से बताया गया है। इसमें उपहार, नकद राशि, रोजगार, विवाह का वादा, मुफ्त शिक्षा, बेहतर जीवनशैली देने के वादे को प्रलोभन माना गया है।

इसके अलावा किसी एक धर्म को श्रेष्ठ बताना या दूसरे धर्म की बुराई करना भी इसी श्रेणी में आएगा। शारीरिक हिंसा, डराना-धमकाना, संपत्ति को नुकसान पहुँचाना, ‘ईश्वर के नाखुश होने’ का डर दिखाना या ‘सामाजिक बहिष्कार’ की चेतावनी देते हुए दबाव डालना भी इसी श्रेणी में शामिल है।

साथ ही, शैक्षणिक संस्थानों के जरिए ब्रेनवाशिंग और किसी प्रकार के ‘सामूहिक धर्मांतरण’ को भी गैर-कानूनी माना गया है। इतना ही नहीं यदि कोई विवाह केवल धर्म परिवर्तन के उद्देश्य से किया गया है, तो अदालत उसे अमान्य घोषित कर सकती है।

क्या होगी सजा

इस कानून के तहत दर्ज अपराध गैर-जमानती होंगे और पुलिस को बिना औपचारिक शिकायत के स्वतः संज्ञान लेकर सीधे FIR दर्ज करने व जाँच करने का अधिकार होगा।

सामान्य मामलों में अवैध धर्मांतरण पर अधिकतम 7 साल की जेल और 1 लाख रुपए तक का जुर्माना होगा, जबकि नाबालिगों, महिलाओं, मानसिक अस्वस्थ व्यक्तियों या SC/ST समुदाय के लोगों और सामूहिक धर्मांतरण के मामलों में यह सजा 7 साल की जेल व 5 लाख रुपए तक का जुर्माना तय की गई है।

दोबारा अपराध करने पर सजा बढ़ाकर 10 साल और जुर्माना 7 लाख रुपए तक हो सकता है।

दोषी संस्थाओं का पंजीकरण रद्द करने, अनुदान रोकने और अवैध दस्तावेजों को प्रमाणित या समर्थित करने वाले सहयोगियों को भी दंडित करने का प्रावधान है।

अगर कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से धर्म परिवर्तन करना चाहता है, तो उसे 60 दिन पहले प्रशासन को सूचना देनी होगी। इसके अलावा धर्म परिवर्तन होने के बाद 25 दिनों के भीतर उसे अधिकारियों के पास पंजीकरण कराना होगा। अगर ऐसा नहीं किया गया तो उस धर्म परिवर्तन को अमान्य माना जाएगा।

एयर इंडिया पायलट का दूसरा ड्रग टेस्ट भी निकला पॉजिटिव: फुकेत-दिल्ली फ्लाइट में आखिर क्या हुआ था और अब आगे क्या होगा?

फुकेत से दिल्ली आ रही एयर इंडिया की एक उड़ान में हुई गंभीर घटना की जाँच में एक बड़ा मोड़ आ गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, उड़ान के मुख्य पायलट (पायलट-इन-कमांड) का दूसरा कंफर्मेटरी (पुष्टि करने वाला) ड्रग टेस्ट भी पॉजिटिव पाया गया है। यह नया घटनाक्रम उस हादसे के कुछ दिनों बाद आया है, जब उड़ान के दौरान विमान अचानक ऊँचाई से नीचे गिर गया था, जिससे कई यात्री और क्रू मेंबर घायल हो गए थे और भारत के उड्डयन प्राधिकारियों ने इस पर व्यापक जाँच शुरू कर दी थी।

फ्लाइट के बाद हुए शुरुआती टेस्ट में कैप्टन के सैंपल में नशीले पदार्थों की मौजूदगी का संकेत मिला था। चूँकि प्राथमिक जाँच टेस्ट के बाद प्रयोगशाला में दोबारा पुष्टि की आवश्यकता होती है, इसलिए पायलट के सैंपल की दोबारा जाँच की गई। अब वह दूसरा टेस्ट भी रिपोर्ट के अनुसार पॉजिटिव आया है। इस नई रिपोर्ट ने इस घटना से जुड़ी सुरक्षा और नियमों की चिंताओं को बहुत बढ़ा दिया है।

टेस्ट ने खड़े किए नए सवाल

शुरुआती ड्रग स्क्रीनिंग के बाद ही नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) ने दोनों पायलटों को उड़ान ड्यूटी से हटा दिया था, ताकि मामले की जाँच की जा सके। उस समय अधिकारियों ने स्पष्ट किया था कि किसी भी अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले प्राथमिक रिपोर्ट की पुष्टि के लिए दूसरा टेस्ट करना जरूरी है।

यह दूसरा टेस्ट इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह प्रयोगशाला विश्लेषण के जरिए पहली जाँच के नतीजों की पुष्टि करता है। मंगलवार (11 अगस्त 2026) को प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, पायलट-इन-कमांड का कंफर्मेटरी टेस्ट पॉजिटिव आया है और सैंपल में गांजा (Marijuana) होने की पुष्टि हुई है। हालाँकि, इस टेस्ट के सटीक विवरण और जाँच के आधिकारिक निष्कर्षों का पूरी तरह से खुलासा होना अभी बाकी है।

ड्रग टेस्ट का पॉजिटिव आना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उड़ान के दौरान पायलट नशे में था या उसका मानसिक नियंत्रण प्रभावित था। मेडिकल जाँच में नशीले पदार्थ का मिलना यह बताता है कि व्यक्ति के शरीर में वह substance मौजूद है, जबकि यह तय करने के लिए कि क्या पायलट उड़ान के समय सच में असमर्थ था, एक व्यापक जाँच की आवश्यकता होती है। इसके बावजूद, यह नतीजा एक गंभीर नियम उल्लंघन है, क्योंकि उड़ान दल के सदस्यों पर नशीले पदार्थों के सेवन को लेकर बेहद कड़े नियम लागू होते हैं।

इसलिए, इस घटना ने यह सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या पायलट ने उड्डयन सुरक्षा नियमों का पालन किया था और क्या सैंपल में मिला पदार्थ उसकी उड़ान भरने की क्षमता पर असर डाल सकता था।

पायलट पर लग सकता है उड़ानों से स्थायी प्रतिबंध

शुरुआती रिपोर्ट के बाद ही DGCA ने जाँच पूरी होने तक दोनों पायलटों को रोस्टर से हटा दिया था। अब दूसरे टेस्ट का पॉजिटिव आना मुख्य पायलट के खिलाफ सख्त प्रशासनिक और कानूनी कार्रवाई को और मजबूती देता है।

विमानन सुरक्षा नियमों के अनुसार, प्रतिबंधित नशीले पदार्थों की जाँच में पॉजिटिव पाए जाने वाले पायलटों की उड़ान सेवाएँ निलंबित की जा सकती हैं और उनकी आगे मेडिकल और कानूनी समीक्षा होती है। परिस्थितियों और जाँच के नतीजों के आधार पर, किसी भी पायलट को दोबारा उड़ान की अनुमति देने से पहले नशा-मुक्ति (rehabilitation/de-addiction) प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है।

इसी वजह से, कानूनी और नियमन प्रक्रिया जारी रहने तक कैप्टन के दोबारा विमान उड़ाने की संभावना न के बराबर है। उनके लाइसेंस और नौकरी पर अंतिम फैसला DGCA की जांच रिपोर्ट और नियमों के आधार पर ही किया जाएगा।

एयर इंडिया और उड्डयन अधिकारी जाँच के दायरे में

इस नए खुलासे के बाद एयर इंडिया के सुरक्षा प्रोटोकॉल की समीक्षा और कड़ी कर दी गई है। इस घटना को एक बेहद गंभीर विमानन घटना माना जा रहा है, और एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो (AAIB) को यह जांच सौंप दी गई है कि विमान में असल में क्या हुआ था।

नागरिक उड्डयन मंत्रालय और DGCA ने कहा है कि यात्रियों की सुरक्षा उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। मंत्रालय ने यह भी साफ किया है कि जाँच प्रक्रिया के दौरान सुरक्षा मानकों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

दूसरी ओर, एयर इंडिया भी इस उच्चस्तरीय जांच के दायरे में आ गई है। नागरिक उड्डयन मंत्रालय और DGCA के वरिष्ठ अधिकारियों ने एयर इंडिया के सीईओ (CEO) को बैठकों के लिए तलब किया है। एयर इंडिया ने पहले कहा था कि उसे उड़ान के बाद हुए टेस्ट की जानकारी थी, लेकिन शुरुआत में टेस्ट के नतीजे उसके साथ साझा नहीं किए गए थे।

यह गहन जाँच इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ड्रग-टेस्ट का मामला इस पूरी उड़ान घटना की जांच का केवल एक हिस्सा है।

तकनीकी खराबी के पहलू की भी हो रही है जाँच

हालाँकि पायलट के कंफर्मेटरी टेस्ट ने इस मामले को एक नया मोड़ दिया है, लेकिन जांच अधिकारी यह भी देख रहे हैं कि क्या विमान में आई किसी तकनीकी खराबी के कारण अचानक उसकी ऊंचाई कम हुई थी।

शुरुआती रिपोर्टों में एयरबस विमान के हाइड्रोलिक सिस्टम (Hydraulic System) में कई खराबी आने की बात कही गई है। जांच एजेंसियां यह पता लगा रही हैं कि क्या तकनीकी खराबी ने इस घटना में भूमिका निभाई। यह महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि केवल ड्रग-टेस्ट के नतीजों को प्लेन के इस व्यवहार का एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता। जांचकर्ताओं को एयरक्राफ्ट डेटा, कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर, मेंटेनेंस रिकॉर्ड और अन्य सबूतों के जरिए पूरी घटना के क्रम का सही पता लगाना होगा।

इस जांच में फ्रांस की उड्डयन जांच एजेंसियों और एयरबस के प्रतिनिधियों के भी शामिल होने की उम्मीद है। उनकी मदद से यह तय करने में आसानी होगी कि क्या हाइड्रोलिक समस्या समेत विमान प्रणाली की किसी खराबी से यह हादसा हुआ था।

AAIB की यह जांच अंततः यह स्थापित करेगी कि यह घटना मुख्य रूप से तकनीकी खराबी के कारण हुई, क्रू मेंबर्स की वजह से हुई, मौसम/पर्यावरण के कारणों से हुई, या इन सभी परिस्थितियों का मिला-जुला परिणाम थी।

अचानक गिरा था विमान

गौरतलब है कि कुछ दिन पहले खबर आई थी फुकेत से दिल्ली आ रही एयर इंडिया की फ्लाइट को उड़ान के दौरान एक गंभीर झटके का सामना करना पड़ा था और रिपोर्ट के अनुसार विमान अचानक लगभग 300 फीट नीचे गिर गया था। इस हादसे में कई यात्री और क्रू मेंबर्स घायल हो गए थे, जिसके बाद तुरंत जांच शुरू की गई।

इसके बाद विमान दिल्ली में सुरक्षित उतर गया था। DGCA ने इसे एक गंभीर घटना की श्रेणी में रखा और AAIB को विस्तृत जांच का जिम्मा सौंपा।

फिलहाल यह जाँच दो अलग-अलग दिशाओं में चल रही है: एक ओर जहां फ्लाइट क्रू के आचरण और उनकी फिटनेस की जांच हो रही है, वहीं दूसरी ओर विमान के उपकरणों और अचानक आई गिरावट से जुड़ी परिस्थितियों का अध्ययन किया जा रहा है।

आगे क्या होगा?

DGCA से जल्द ही इस कंफर्मेटरी टेस्ट पर और स्पष्टता देने की उम्मीद है, जिसमें यह बताया जाएगा कि कौन सा पदार्थ कितनी मात्रा में मिला और आगे क्या कानूनी कदम उठाए जाएंगे। अधिकारियों को यह भी तय करना होगा कि इस टेस्ट के नतीजे का उड़ान के दौरान घटी घटना से कोई सीधा संबंध था या नहीं।

इसके साथ ही, जांचकर्ता विमान के तकनीकी सिस्टम, ब्लैक बॉक्स/फ्लाइट-डेटा रिकॉर्डर और अन्य सबूतों की जांच जारी रखेंगे ताकि ऊंचाई में अचानक आई गिरावट का असली कारण पता चल सके। एयरबस और फ्रांस के एविएशन एक्सपर्ट्स इस काम में मदद करेंगे।

फिलहाल, दूसरे टेस्ट में पॉजिटिव आने के कारण मुख्य पायलट गंभीर कानूनी और प्रशासनिक जांच का सामना कर रहे हैं। हालांकि, फुकेत-दिल्ली घटना पर अंतिम फैसला पूरी जांच के नतीजों, तकनीकी साक्ष्यों और पायलट के मेडिकल असेसमेंट के बाद ही आएगा।

नतीजतन, यह मामला एयर इंडिया और भारत के एविएशन रेगुलेटर (DGCA) दोनों की विमानन सुरक्षा व्यवस्था की एक बड़ी परीक्षा बन गया है, जहां अधिकारियों पर यह दबाव है कि वे पूरी घटना की सच्चाई सामने लाएँ और उचित जवाबदेही तय करें।

कब्रें बेचीं, हिंदुओं की संपत्ति वक्फ की और डिलीट कर दीं फाइल्स: UP के शिया वक्फ बोर्ड में ₹1000 करोड़ के घोटाले का दावा, पढ़ें- क्या-क्या लगे आरोप

शिया वक्फ बोर्ड के पूर्व चेयरमैन जितेंद्र नारायण सिंह सेंगर उर्फ सैयद वसीम रिजवी ने वक्फ बोर्ड में करीब 1000 करोड़ के घोटाले का आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को हलफनामा दिया है और इसकी जाँच के लिए एसआईटी गठित करने की माँग की है।

11 अगस्त 2026 को सामने आई शिकायत के मुताबिक, उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड की संपत्तियों में लगभग 1000 करोड़ रुपये की कथित हेराफेरी हुई है। शिकायतकर्ता पूर्व चेयरमैन जितेंद्र नारायण सिंह सेंगर (पूर्व में सैयद वसीम रिजवी) हैं।

आरोपों में संपत्तियों की कथित अवैध बिक्री, वक्फ रिकॉर्ड से संपत्तियों के नाम हटाना, कब्रों तक को पैसे लेकर बेच देना और कुछ गैर-वक्फ और हिंदुओं की संपत्तियों को वक्फ रिकॉर्ड में दर्ज करना शामिल है। शिकायतकर्ता जितेन्द्र नारायण सिंह सेंगर शिया वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष हैं। उन्होंने 1995 के बाद उत्तर प्रदेश में अलग-अलग शिया और सुन्नी वक्फ बोर्डों के कामकाज पर भी सवाल उठाए हैं और कहा है कि इससे सरकारी पैसे का दुरुपयोग हुआ है। उन्होंने पूरा मामले की एसआईटी जाँच कराने की माँग की है।

कहाँ से आया 1000 करोड़ का आँकड़ा

शिकायत में कहा गया कि कथित घोटाला करीब ₹1000 करोड़ का है। इसमें अलग-अलग संपत्तियों की कथित बिक्री, रिकॉर्ड से संपत्तियाँ हटाने और दरगाहों के चंदे में हेराफेरी और दूसरे वित्तीय अनियमितताओं को जोड़ी गई है।

शिकायतकर्ता के मुताबिक, लखनऊ, मेरठ, प्रयागराज, अलीगढ़, झांसी आदि जगहों पर वक्फ बोर्ड की जमीन की कथित अवैध बिक्री के अलावा कब्रों के लिए ₹10 लाख तक लेने का आरोप है। इसके अलावा रिकॉर्ड में हेराफेरी करने और पैसे लेकर कुछ वक्फ संपत्तियों को रिकॉर्ड से हटाने का आरोप भी लगाया गया है। शिकायत में कहा गया है कि करीब 2500 फर्जी वक्फ संपत्ति बनाए गए हैं। ये हिन्दू संपत्तियों को धोखाधड़ी कर हड़प ली गई है। उन्होंने लखनऊ, आगरा और बिजनौर जैसी जगहों में कुछ दरगाहों के चंदे में गड़बड़ी के आरोप भी लगाए हैं।

कब्रें 10-10 लाख रुपए में बेचने का आरोप क्या है?

यह इस नए मामले का सबसे सनसनीखेज आरोप है, कब्रों का कथित तौर पर ₹10 लाख तक में बेचा जाना। पूर्व शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन ने अपने आरोप में कहा है कि कब्रों को 10 लाख रुपए तक में बेचा गया। उन्होंने कहा है कि लखनऊ, प्रयागराज, झाँसी, मेरठ, अलीगढ़ जैसी जगहों पर करोड़ों रुपए की काफी अहम वक्फ संपत्तियों को इन संपत्तियों का प्रबंधन देख रहे बोर्ड के लोगों के माध्यम से बेच दीं।

हलफनामे में कहा गया है कि इन संपत्तियों को वक्फ की आधिकारिक संपत्तियों के रिकॉर्ड से हटा दिया गया और करोड़ों रुपए की हेराफेरी की गई। सेंगर के मुताबिक, वक्फ की सूची से संपत्तियों को हटाने का अधिकार सिर्फ अदालत को है, लेकिन बोर्ड स्तर पर इस तरह की व्यवस्था की गई।

यह आरोप इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें दो बिल्कुल अलग तरह के आरोप एक साथ जुड़े हैं। पहला- जो संपत्ति वक्फ नहीं थी, उसे कथित तौर पर वक्फ में दर्ज किया गया। दूसरा- जो संपत्ति पहले से वक्फ की थी, उसे कथित तौर पर पैसे लेकर रिकॉर्ड से बाहर कर दिया गया। यानी शिकायतकर्ता का आरोप है कि एक तरफ संपत्तियाँ वक्फ में जोड़ी गईं और दूसरी तरफ कुछ वक्फ संपत्तियाँ रिकॉर्ड से हटाई गईं।

वक्फ रिकॉर्ड से संपत्ति हटाने का आरोप बहुत गंभीर है क्योंकि शिकायत में दावा किया गया है कि बोर्ड स्तर पर ही कुछ संपत्तियों को रिकॉर्ड से हटा दिया गया।

शिकायतकर्ता का तर्क है कि किसी संपत्ति के वक्फ के होने या न होने से जुड़े अधिकार और विवाद का निर्धारण निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत कोर्ट में होना चाहिए। बोर्ड अपने स्तर पर मनमाने तरीके से रिकॉर्ड हटाए, तो यह गंभीर प्रशासनिक और कानूनी सवाल पैदा करता है।

दरगाहों के चंदे की चोरी का दावा

हलफनामे में जिन दरगाहों में चंदे की गड़बड़ी की बात कही गई है उसमें लखनऊ की हजरत अब्बास दरगाह, आगरा की मजार शहीद ए सालिस और बिजनौर की जोगीपुरा दहगाह शामिल है। सेंगर ने दावा किया कि वक्फ बोर्ड से जुड़े कुछ लोग मौलवी के साथ मिलकर इन दरगाहों की दान में दी गई रकम की हेराफेरी करते थे।

शिया वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष ने सीएम योगी से कड़ी कार्रवाई की माँग करते हुए जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी एसआईटी गठित करने को कहा है ताकि पूरा मामले की जाँच हो सके और दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।

नवंबर 2024 में बोर्ड की बैठक में अध्यक्ष अली जैदी की अध्यक्षता में भ्रष्टाचार के मामलों में जीरो टॉलरेंस नीति अपनाने और मुतवल्लियों की आय-व्यय संबंधी अनियमितताओं पर कार्रवाई की बात कहते हुए कई फेरबदल किए गए थे

इसके अलावा 2026 में मेरठ की एक अलग वक्फ जमीन को लेकर अली जैदी समेत कई लोगों के खिलाफ FIR की रिपोर्ट भी सामने आई है; लेकिन वह मामला वर्तमान ₹1,000 करोड़ की शिकायत से अलग है।

पहले भी शिया वक्फ बोर्ड पर आरोप लगे हैं

यह पहली बार नहीं है जब उत्तर प्रदेश शिया वक्फ बोर्ड की संपत्तियों की बिक्री और हस्तांतरण को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए हों। 2019 में उत्तर प्रदेश सरकार ने शिया और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की संपत्तियों में कथित अनियमितताओं की CBI जाँच की सिफारिश की थी। इसके बाद 2020 में CBI ने दो एफआईआर दर्ज की थीं।

2020 की सीबीआई जाँच का मामला वर्तमान ₹1,000 करोड़ की शिकायत से अलग, लेकिन पृष्ठभूमि के लिहाज से महत्वपूर्ण है। पहला एफआईआर कानपुर में दर्ज किया गया था। इसमें शिकायतकर्ता तौसीफुल हसन ने आरोप लगाया था कि कानपुर की एक वक्फ संपत्ति के प्रबंधक होने के बावजूद उनके अधिकारों को सीज किया गया और मूल दस्तावेजों के साथ कथित तौर पर हेरफेर हुई।

इस मामले में वसीम रिजवी के साथ विजय कृष्ण सोमानी, नरेश कृष्ण सोमानी, गुलाम रिजवी उर्फ गुलाम सैयदेन रिजवी और वकार रजा के नाम सामने आए थे। CBI ने आपराधिक विश्वासघात, धोखाधड़ी और धमकी जैसी धाराओं में केस दर्ज किया था।

दूसरा एफआईआर प्रयागराज में दर्ज किया गया

दूसरे मामले में सुधांक मिश्रा ने आरोप लगाया था कि प्रयागराज के पुराने जीटी रोड स्थित इमामबाड़े में कथित रूप से अवैध तरीके से दुकानें बनाई गईं। इस मामले में वसीम रिजवी पर आपराधिक अतिक्रमण से जुड़ी धाराओं में केस हुआ था। हालाँकि सीबीआई ने 2023 में वसीम रिजवी समेत तमाम आरोपितों को क्लीन चिट दे दी थी।

बालकगंज कब्रिस्तान का मामला

वक्फ संपत्तियों के कथित फर्जी ट्रांसफर का एक अलग मामला बालकगंज कब्रिस्तान से जुड़ा बताया जाता रहा है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार खुर्शीद आगा नामक व्यक्ति पर आरोप था कि उसने जाली दस्तावेजों के माध्यम से जमीन को शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के बालकगंज कब्रिस्तान और मस्जिद के नाम पर दर्ज कराया और खुद को आजीवन वक्फ बोर्ड से जुड़ा प्रबंधक बना लिया।

इसके बाद 2014 में कथित तौर पर इस जमीन को मॉडर्न को-ऑपरेटिव हाउसिंग कॉलोनी को बेच दिया गया और बाद में यह अंतरिक्ष लेंडमार्क प्राइवेट लिमिटेड तक पहुँच गई।