Saturday, April 4, 2026
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पवनपुत्र का नाम आते ही क्यों होती है संवाद, संयम और साहस की बात? वाल्मीकि रामायण के प्रसंग से जानिए कैसे हैं रामदूत हनुमान और बचपन में कैसे निगल गए सूर्य

हनुमान जयंती/जन्मोत्सव सनातनियों के लिए केवल एक पर्व नहीं, बल्कि उस अद्वितीय व्यक्तित्व को समझने का अवसर है, जिसमें बल, बुद्धि, विनम्रता और संवाद की असाधारण क्षमता एक साथ समाहित है। पवनपुत्र हनुमान का चरित्र जितनी वीरता से भरा है, उतनी ही गहराई से ज्ञान और संतुलन से भी जुड़ा हुआ है।

वाल्मीकि रामायण में उनका जो चित्रण मिलता है, वह हमें यह समझाता है कि वे केवल बलशाली नहीं, बल्कि अत्यंत सूझबूझ वाले और प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी थे।

जब भगवान राम से पहली भेंट में ही वाणी से जीत लिया मन

वाल्मीकि रामायण के किष्किंधा कांड में सीता हरण के बाद श्रीराम और लक्ष्मण की हनुमान जी से भेंट होती है। जब श्रीराम और लक्ष्मण की पहली मुलाकात हनुमान जी से होती है, तब वे ब्राह्मण के रूप में उनके सामने आते हैं। लेकिन उनके शब्दों की शक्ति ही उनकी असली पहचान बनती है।

उन्होंने इतनी मधुर, सुसंगत और शुद्ध भाषा में संवाद किया कि श्रीराम तुरंत समझ गए कि यह कोई साधारण व्यक्ति नहीं है। श्रीराम ने लक्ष्मण से उनके बारे में कहते हुए जो विश्लेषण किया, वह केवल प्रशंसा नहीं, बल्कि एक गहन अवलोकन था।

उन्होंने यह समझ लिया कि हनुमान जी केवल बोल नहीं रहे, बल्कि हर शब्द सोच-समझकर, संतुलन के साथ और सामने वाले के मन को ध्यान में रखकर कह रहे हैं। उनकी वाणी में कोई अशुद्धि नहीं थी, कोई कटुता नहीं थी और कोई अनावश्यक विस्तार नहीं था।

श्रीराम तो यहाँ तक कहते हैं कि हृदय, कंठ और मूर्धा (मुँह के अंदर का तालु और ऊपर के दाँतों के पीछे सिर की तरफ का भाग जिसे जीभ का अगला भाग ट्, ठ्, ड्, ढ्, और ण वर्ण का उच्चारण करते समय उलटकर छूता है) के सटीक प्रयोग से बोली गई इस वाणी से तलवार उठाए हुए शत्रु का भी हृदय परिवर्तित हो जाए।

यह केवल वाणी की प्रशंसा नहीं, बल्कि उस आत्मिक शक्ति का वर्णन है जो हनुमान जी के भीतर थी। श्रीराम यहाँ सुग्रीव को भाग्यशाली मानते हैं कि उनके पास हनुमान जैसे दूत हैं। इतना ही नहीं हनुमान जी ने उसी वार्ता के दौरान संधि का प्रस्ताव भी रख दिया और वह तुरंत स्वीकार भी हो गया।

यह उनकी बुद्धिमत्ता, समय की समझ और संवाद की दक्षता का सर्वोच्च उदाहरण है।

शब्द, भाव और शरीर, तीनों का अद्भुत संतुलन

हनुमान जी की विशेषता केवल यह नहीं थी कि वे अच्छा बोलते थे, बल्कि यह थी कि उनके शब्द, भाव और शरीर, तीनों में अद्भुत सामंजस्य था। जब वे बोलते थे, तो उनकी भौहें, नेत्र, मुख और ललाट सभी उनके शब्दों के अनुरूप भाव प्रकट करते थे।

उनकी वाणी न बहुत तेज होती थी, न बहुत धीमी, बल्कि इतनी संतुलित और मधुर होती थी कि सुनने वाला सहज ही प्रभावित हो जाता था। वे कहीं रुकते नहीं थे, न ही ऐसा लगता था कि वे कुछ भूल गए हैं। उनके शब्द सीधे और स्पष्ट होते थे, जिनमें कोई बनावट या दिखावा नहीं होता था।

इसी कारण श्रीराम ने उन्हें ‘वाक्यज्ञ’ कहा यानी ऐसा व्यक्ति जो केवल शब्दों का ही नहीं, बल्कि उनके अर्थ, प्रभाव और समय का भी ज्ञान रखता है। सामने वाला क्या बोल रहा है और जवाब में क्या बोलना चाहिए, इसकी उन्हें समझ थी।

श्रीराम कहते हैं कि जिसे ऋग्वेद की शिक्षा नहीं मिली, जिसने यजुर्वेद का अभ्यास नहीं किया और जो सामवेद का विद्वान नहीं, वो इस तरह बातें नहीं कर सकता। अर्थात श्रीराम ने हनुमान जी की बातों से ही अंदाजा लगा लिया कि वो तीनों प्रमुख वेदों के ज्ञाता हैं।

रावण के दरबार में भी अडिग संयम और ज्ञान का परिचय

हनुमान जी का असली तेज तब और भी स्पष्ट होता है जब वे रावण के दरबार में पहुँचते हैं। वहाँ उन्हें अपमानित किया जाता है, बार-बार अपशब्द कहे जाते हैं, लेकिन उनकी वाणी में कोई परिवर्तन नहीं आता। तुलसीदास कृत रामचरितमानस में भी उनके रावण के साथ बहस की चर्चा है, लेकिन वहाँ भी वो रावण को ज्ञान ही दे रहे हैं, उसे समझा रहे हैं।

“उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना॥” – रावण द्वारा हनुमान जी के लिए बार-बार अपशब्दों का प्रयोग किए जाने के बावजूद भी उन्होंने यही समझाया कि तुम्हारे मन में भ्रम है। रावण के दरबार में उन्होंने श्रीराम की महिमा का बखान किया।

उन्होंने उलटी-सीधी बातें नहीं की। “जदपि कही कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी॥” – उन्होंने शत्रु के सामने बंदी बन कर भी दुश्मन के ही हित की बात की।

बाल लीला, ज्ञान और निर्भीक जिज्ञासा

इसके अलावा हनुमान जी की बाल लीला के तौर पर सूर्य को निगलने वाला प्रसंग भी बहुत चर्चित रहता है। सनातन परंपरा में सूर्य को सिर्फ आकाश में चमकने वाला ग्रह नहीं माना गया, बल्कि उसे समस्त ज्ञान और चेतना का प्रतीक कहा गया है।

वेदों में सूर्य को ब्रह्म का नेत्र बताया गया है। अर्थात वह शक्ति जो पूरे ब्रह्मांड को प्रकाशमान करती है। ऐसे में जब बाल रूप में हनुमान जी उदित होते सूर्य को देखकर उसे निगलने के लिए दौड़ पड़ते हैं, तो इसका संकेत यह है कि उनमें ज्ञान को तुरंत प्राप्त कर लेने की तीव्र इच्छा थी।

जैसे किसी साधक को आत्मज्ञान की पहली झलक मिलते ही वह उसे पूर्ण रूप से पाने के लिए आतुर हो उठता है। वेदांत में ब्रह्म को उस प्रकाश के समान बताया गया है, जो सूर्य की तरह उदित होता है। सूर्योदय हमें शांत और सुंदर दिखाई देता है, लेकिन उसके भीतर अपार ऊर्जा और अग्नि छिपी होती है।

ठीक इसी प्रकार ज्ञान भी बाहर से आकर्षक लगता है, परंतु उसकी गहराई अथाह होती है। उसे पाने के लिए धैर्य, साधना और क्रमबद्ध प्रयास आवश्यक होते हैं, कोई भी व्यक्ति एक ही क्षण में पूर्ण ज्ञानी नहीं बन सकता। हनुमान जी की इस यात्रा में वायु देव का विशेष महत्व है। वायु यहाँ केवल हवा नहीं, बल्कि जीवन की वह अदृश्य शक्ति है जो साधक को सहारा देती है।

यह संकेत देता है कि जब कोई व्यक्ति सच्चे उद्देश्य से ज्ञान की ओर बढ़ता है, तो प्रकृति स्वयं उसकी सहायता करती है। हमारी श्वास भी उसी वायु का रूप है, जो शरीर और आत्मा के बीच एक सेतु का काम करती है। इसी कारण हनुमान जी को पवनपुत्र कहा गया है। वे हर परिस्थिति में सुरक्षित रहते हैं, चाहे वह लंका की अग्नि हो या आकाश की ऊँचाइयाँ।

एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि हनुमान जी सूर्य के पास पहुँचकर भी जलते नहीं। इसका अर्थ है कि सच्चा ज्ञान किसी को नुकसान नहीं पहुँचाता, बल्कि उसे शुद्ध करता है। भगवद्गीता में भी कहा गया है कि ज्ञान से बढ़कर कोई पवित्र वस्तु नहीं है। चाहे साधक पूरी तरह तैयार न भी हो, फिर भी सत्य उसे हानि नहीं पहुँचाता बल्कि धीरे-धीरे उसे परिष्कृत करता है।

इसी कथा में राहु का प्रसंग भी आता है, जो सूर्य को ग्रसने आता है लेकिन हनुमान के सामने टिक नहीं पाता। राहु यहाँ माया, भ्रम और भय का प्रतीक है। जब मन में साहस और पवित्रता होती है, तो ये नकारात्मक शक्तियाँ स्वतः दूर हो जाती हैं। जैसे-जैसे ज्ञान बढ़ता है, वैसे-वैसे भ्रम के बादल छँटने लगते हैं। लेकिन यदि मन अस्थिर हो जाए, तो वही माया ज्ञान के मार्ग में बाधा बन सकती है।

इसके बाद इंद्र द्वारा हनुमान जी पर वज्र प्रहार करने की घटना आती है। यह दर्शाती है कि ज्ञान के मार्ग में केवल आकर्षण ही नहीं, परीक्षाएँ भी आती हैं। इंद्र यहाँ व्यवस्था, अनुशासन और दैवी नियमों के प्रतीक हैं। साधक को आगे बढ़ने के लिए इन परीक्षाओं से गुजरना ही पड़ता है। ये कष्ट दंड नहीं, बल्कि व्यक्ति को और मजबूत बनाने का माध्यम होते हैं।

जब हनुमान जी को चोट लगती है, तो वायु देव क्रोधित होकर समस्त संसार से प्राणवायु खींच लेते हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि सृष्टि की हर चीज एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। कोई भी घटना अलग-थलग नहीं होती, हर क्रिया का प्रभाव पूरे ब्रह्मांड पर पड़ता है।

अंततः देवताओं को हनुमान जी की महत्ता स्वीकार करनी पड़ती है और वे उन्हें वरदान देते हैं। यह दर्शाता है कि जो साधक अपने मार्ग पर अडिग रहता है, अंत में वही उच्चतम ज्ञान को प्राप्त करता है।

कभी बॉलीवुड तो कभी लेफ्ट लिबरल गैंग उठाता रहा है सवाल लेकिन आप जानिए भगवान हनुमान के जीवन का सच्चा संदेश

भगवान हनुमान को लेकर कभी लेफ्ट लिबरल गैंग सवाल उठाता है कि उन्होंने सूर्य को फल समझकर कैसे निगल लिया तो कभी आदिपुरुष जैसी फिल्मों में उनकी भूमिका निभा रहे कलाकार को तीखे संवाद दे कर उनके व्यक्तित्व को अलग तरह से पेश कर दिया जाता है। कोशिश यह रहती है कि सनातन देवी-देवताओं का गलत चित्रण कैसे पेश किया जाए।

किसी ऐतिहासिक घटना को अलग-अलग स्तर के लोग अलग-अलग तरीके से समझते हैं, विशेषज्ञ उसे गहराई से अध्ययन करते हैं, विद्यार्थी उसे पुस्तकों से सीखते हैं और बच्चों को वही बात सरल कहानियों में समझाई जाती है। वैसे ही सनातन धर्म की कथाएँ भी अलग-अलग स्तरों पर अर्थ प्रदान करती हैं।

जिस व्यक्ति की समझ जितनी होती है, वह उसी अनुसार इन कथाओं का अर्थ ग्रहण करता है। इस प्रकार हनुमान जी की कथाएँ केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं, बल्कि ज्ञान, साधना, साहस और आत्मविकास की एक गहरी आध्यात्मिक यात्रा का प्रतीक है।

पवनपुत्र हनुमान का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्ची महानता केवल बल में नहीं, बल्कि उस संतुलन में है जहाँ ज्ञान, विनम्रता, संयम और भक्ति एक साथ उपस्थित हों। हनुमान का चरित्र हमें यह समझाता है कि वाणी में मधुरता, व्यवहार में सरलता, विचारों में स्पष्टता और लक्ष्य में दृढ़ता, ये सभी गुण मिलकर ही किसी व्यक्ति को महान बनाते हैं।

वे केवल पूजनीय नहीं हैं, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में अपनाने योग्य एक आदर्श हैं। उनकी कथा हमें यह सिखाती है कि सही शब्द, सही सोच और सही उद्देश्य के साथ कोई भी व्यक्ति अपने जीवन को ऊँचाई तक ले जा सकता है।

15 साल बाद, पहली बार पूरी तरह डिजिटल… 1 अप्रैल से शुरू हुई दुनिया की सबसे बड़ी जनगणना, जातियों की भी होगी सटीक गिनती: पूरी प्रक्रिया के बारे में जानिए

जनगणना 2027 देश की 16वीं और स्वतंत्रता के बाद की 8वीं जनगणना है। 1 अप्रैल 2026 से शुरू हुई ये जनगणना पूरी तरह डिजिटल है। पंद्रह वर्षों के अंतराल के बाद जनगणना करवाई जा रही है, जो देश की पहली पूरी तरह से डिजिटल जनगणना है। इतना ही नहीं, ये दुनिया की पहली इतनी बड़ी डिजिटल जनगणना भी है।

भारत में जनगणना सिर्फ सांख्यिकीय डेटा इकट्ठा करने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह देश की सामाजिक-आर्थिक योजना का एक मजबूत स्तंभ भी है। भारत में व्यवस्थित जनगणना की शुरुआत 1872 में ब्रिटिश काल के दौरान हुई थी। हर दस साल में जनगणना कराने की परंपरा 1881 से लगातार चली आ रही है। इस क्रम में आखिरी जनगणना 2011 में हुई।

यह देश की 15वीं जनगणना थी, जिसने उस समय के डेटा के अनुसार भारत की जनसंख्या और भौगोलिक स्थिति की एक साफ तस्वीर पेश की।

भारत में जनगणना, जनगणना अधिनियम 1948 और 1990 के प्रावधानों के मुताबिक की जाती है। हालाँकि इसमें समय-समय पर संशोधन किए गए हैं। नियमों के अनुसार, 16वीं जनगणना वर्ष 2021 में होनी चाहिए थी। लेकिन, 2020 में दुनिया भर में फैले कोविड-19 महामारी और इसके कारण लगाए गए देशव्यापी लॉकडाउन की वजह से इस प्रक्रिया को अनिश्चित काल के लिए टालना पड़ा। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह पहली बार था जब दस साल के अंतराल पर होने वाली जनगणना में देरी हुई।

जनगणना 2027 में पेपर वर्क के बजाय सारी जानकारी मोबाइल ऐप और ‘सेल्फ़ एन्यूमरेशन’ यानी स्वगणना पोर्टल के जरिए इकट्ठा की जाएगी। यह आधुनिक भारत के डिजिटल बदलाव को दर्शाता है। केंद्र सरकार ने हाउस लिस्टिंग और हाउसिंग जनगणना (HLO) के लिए 33 सवालों की एक सूची जारी की है और पोर्टल पर 33 FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल) भी उपलब्ध कराए हैं।

गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने 16वीं जनगणना के लिए कुल ₹11,718.24 करोड़ के बजट को मंजूरी दी है। इस राशि का उपयोग मुख्य रूप से जनगणना कार्य से जुड़े कर्मचारियों के मानदेय और उनके गहन प्रशिक्षण के लिए किया जाएगा। इसके अलावा चूँकि इस बार जनगणना पहली बार डिजिटल माध्यम से हो रही है, इसलिए बजट में एक मजबूत IT इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने, डेटा सेंटर बनाने और आवश्यक लॉजिस्टिक्स सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए भी पर्याप्त प्रावधान किए गए हैं।

जनगणना की तैयारियाँ पूरी हो चुकी हैं

यह सुनिश्चित करने के लिए कि जनगणना 2027 पूरी तरह से त्रुटिरहित हो, नवंबर 2025 में पूरे देश के 5000 ब्लॉकों में एक पूर्ण ‘प्री-टेस्ट’ (रिहर्सल) आयोजित किया गया था, जिसमें नियुक्ति से लेकर डेटा प्रोसेसिंग तक की सभी डिजिटल प्रक्रियाओं का परीक्षण किया गया। इस गणना में सटीकता सुनिश्चित करने के लिए, देश के सभी 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों के 7092 जिलों, तालुकों और करीब 6.39 लाख गाँवों की प्रशासनिक सीमाओं को 1 जनवरी 2026 से मार्च 2027 तक के लिए ‘सख्त’ कर दिया गया है, ताकि गणना के दौरान कोई भी भौगोलिक बदलाव बाधा न बने।

इस राष्ट्रीय अभियान के लिए एक सुदृढ़ त्रि-स्तरीय प्रशिक्षण ढाँचा तैयार किया गया है, जिसमें 100 राष्ट्रीय प्रशिक्षक और 2000 मास्टर प्रशिक्षक हैं, जिन्होंने 45000 फील्ड प्रशिक्षकों को प्रशिक्षित किया। ये फील्ड प्रशिक्षक पूरे देश में लगभग 31 लाख गणना करने वालों और पर्यवेक्षकों को 80 हजार बैच में बाँट कर प्रशिक्षण दिया। इन प्रशिक्षुओं को सभी प्रशिक्षण सामग्री उनकी क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध कराई गई, ताकि वे बिना किसी परेशानी के समय पर लोगों से सही जानकारी ले सकें। आपको बता दें कि इस बार जनगणना 2 चरणों में आयोजित की जा रही है।

पहला चरण 1 अप्रैल से शुरू

भारत की 16वीं जनगणना का पहला चरण आधिकारिक तौर पर 1 अप्रैल, 2026 से शुरू हो गया है। यह 30 सितंबर 2026 तक जारी रहेगा। भारत के रजिस्ट्रार जनरल (RGI) मृत्युंजय कुमार नारायण के अनुसार, क्षेत्रीय कार्य (फील्ड ऑपरेशन) विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा निर्धारित अलग-अलग कार्यक्रमानुसार संपन्न किया जाएगा। देश के कुछ हिस्सों में यह कार्य अप्रैल में शुरू हो गई है। अन्य हिस्सों में भौगोलिक और प्रशासनिक सुविधा के अनुसार, यह प्रक्रिया जून, जुलाई या अगस्त में पूरी की जाएगी।

जनगणना का पहला चरण यानी ‘हाउस लिस्टिंग और हाउसिंग जनगणना’ (HLO) को अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच पूरा किया जाएगा। हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश अपनी सुविधा के अनुसार, इन छह महीनों में से कोई भी 30 दिन निर्धारित करके पूरा करेगा। इस चरण की खासियत है कि गणना करने वाले व्यक्ति के आपके घर आने से ठीक 15 दिन पहले ‘स्व-गणना’ (self-enumeration) का एक विकल्प दिया जाएगा। इसके जरिए आप ऑनलाइन माध्यम से खुद ही अपनी जानकारी भर सकेंगे।

पहले चरण का मकसद आपके घरों की स्थिति और परिवारों की जीवनशैली के बारे में जानना है। इसमें मुख्य रूप से यह जानकारी इकट्ठा की जाएगी कि घर किस तरह का है, परिवार को पीने का पानी, बिजली और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध हैं या नहीं। घर में टीवी, गाड़ी या इंटरनेट जैसी सुविधा मौजूद है या नहीं। इस प्रक्रिया के लिए पूछे जाने वाले सवालों की एक सूची भी कुछ दिन पहले जारी कर दी गई थी।

जनगणना देश के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग चरणों में शुरू होगा। पहले समूह में अंडमान और निकोबार, दिल्ली (NDMC और छावनी), गोवा, कर्नाटक, लक्षद्वीप, मिजोरम, ओडिशा और सिक्किम शामिल हैं। इन राज्यों के नागरिक 1 अप्रैल से 15 अप्रैल, 2026 तक ऑनलाइन ‘स्व-गणना’ कर सकेंगे, जबकि 16 अप्रैल से 15 मई तक गणना करने वाले घर-घर जाकर घरों की जानकारी दर्ज करेंगे।

दूसरे समूह में मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, चंडीगढ़, छत्तीसगढ़ और हरियाणा जैसे राज्य शामिल हैं। इन राज्यों में स्व-गणना के लिए 16 अप्रैल से 30 अप्रैल, 2026 तक का समय तय किया गया है, जिसके बाद 1 मई से 30 मई तक घरों की सूची बनाने की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। बाकी सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का विस्तृत कार्यक्रम सरकार द्वारा जारी किए गए परिशिष्ट में दिया गया है।

यह प्रक्रिया कैसे पूरी होगी?

जनगणना 2027 भारत की पहली पूरी तरह से डिजिटल जनगणना होगी। इस प्रक्रिया में गणना करने वाले लोग पेन और पेपर के बजाय अपने स्मार्टफोन और एक खास मोबाइल ऐप का इस्तेमाल करेंगे। वे घर-घर जाकर जो जानकारी इकट्ठा करेंगे, उसे सीधे ऐप के जरिए ऑनलाइन जमा करेंगे। इस प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए मोबाइल ऐप और ‘सेल्फ-एन्यूमरेशन’ पोर्टल कुल 19 भाषाओं में उपलब्ध कराए जाएँगे। इनमें गुजराती, हिंदी और अंग्रेजी भी शामिल हैं, ताकि बिना किसी रुकावट के सटीक जानकारी इकट्ठा की जा सके।

इस बार नागरिकों के लिए ‘स्वयं-गणना’ (self-enumeration) की सुविधा एक महत्वपूर्ण पहलू है। लोग ऑनलाइन पोर्टल पर जाकर स्वयं ही अपने परिवारों का विवरण भर सकेंगे। इसके अलावा, इस पूरे अभियान के प्रबंधन के लिए एक अत्याधुनिक केंद्रीय पोर्टल भी बनाया गया है।

यह पोर्टल गणना करने वालों की नियुक्ति, उनके ID कार्ड बनाने, उन्हें काम सौंपने और उनके प्रशिक्षण के प्रबंधन का काम संभालेगा। यह डिजिटल सिस्टम इस बात की भी रियल-टाइम निगरानी करने में मदद करेगा कि गणना का काम किस हद तक पूरा हो चुका है।

प्रशासनिक स्तर पर सटीकता लाने के लिए इस बार ‘वेब मैपिंग एप्लिकेशन’ का इस्तेमाल करके ‘हाउस लिस्टिंग ब्लॉक’ (HLBs) तैयार किए जाएँगे, ताकि जनगणना में कोई भी घर या इलाका छूट न जाए। एक डिजिटल माध्यम होने के नाते, लोगों की निजी जानकारी की सुरक्षा को लेकर भी पूरी सावधानी बरती गई है। डेटा सुरक्षा के लिए बेहद मजबूत प्रोटोकॉल लागू किए गए हैं। इसका मकसद नागरिकों का डेटा पूरी तरह से सुरक्षित और गोपनीय रखना है।

सेल्फ-एन्यूमरेशन (स्वयं-गणना) कैसे किया जा सकता है?

जनगणना 2027 में, नागरिकों को एक विशेष सुविधा दी गई है, जिसके ज़रिए वे गणना करने वाले के उनके घर आने से पहले ही अपनी जानकारी ऑनलाइन भर सकेंगे। इसके लिए उन्हें अपने मोबाइल नंबर का इस्तेमाल करके आधिकारिक SE पोर्टल (se.census.gov.in) पर लॉग इन करना होगा। यह प्रक्रिया अपनी सुविधा के अनुसार, कभी भी और कहीं से भी पूरी की जा सकती है।

पोर्टल पर लॉग इन करने के बाद, व्यक्ति को मैप पर अपने घर की सही जगह बतानी होगी और परिवार की जरूरी जानकारी भरनी होगी। सारी जानकारी भरने के बाद, जब फॉर्म सबमिट किया जाएगा, तो सिस्टम से एक 16-अंकों की ‘सेल्फ-एन्यूमरेशन ID’ (SE ID) बनेगी। यह ID बहुत जरूरी है, क्योंकि जब जनगणना स्टाफ खुद घर आएगा, तो उन्हें बस यही SE ID देनी होगी।

खास बात यह है कि सेल्फ-एन्यूमरेशन नागरिकों को दी गई एक और वैकल्पिक सुविधा है। अगर कोई व्यक्ति ऑनलाइन जानकारी नहीं भर पाता है, तब भी जनगणना करने वाले खुद घर आकर जानकारी इकट्ठा करेंगे, ठीक वैसे ही जैसे पिछली जनगणना में किया था। स्टाफ उन लोगों के घरों पर भी जाएगा, जिन्होंने ऑनलाइन जानकारी भरी है, ताकि उसकी जाँच हो सके। लेकिन उनसे दोबारा सारी जानकारी माँगने के बजाय, डेटा की पुष्टि सिर्फ SE ID के जरिए की जाएगी और उस व्यक्ति को जनगणना में शामिल कर लिया जाएगा।

दूसरा चरण जनगणना का अहम हिस्सा है। इस चरण को‘जनसंख्या जनगणना’ कहा जाता है। यह फरवरी 2027 में होगा। हालाँकि, लद्दाख, जम्मू और कश्मीर, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे बर्फीले प्रदेशों में यह प्रक्रिया सितंबर 2026 में ही पूरी कर ली जाएगी। इस चरण की सबसे बड़ी खासियत यह है कि जनसंख्या जनगणना के साथ-साथ जाति-आधारित जनगणना भी की जाएगी। इससे सामाजिक आँकड़े इकट्ठा करने में मदद मिलेगी।

दूसरे चरण में देश के हर नागरिक के बारे में निजी और पूरी जानकारी जमा की जाएगी। इसमें व्यक्ति की शिक्षा, सामाजिक और आर्थिक स्थिति, रहने की जगह में बदलाव जैसे अहम पहलू शामिल हैं। इस चरण के लिए कौन से सवाल पूछे जाएँगे और इसकी सही तारीखें क्या होंगी, इसकी आधिकारिक घोषणा सरकार जल्द ही करेगी।

पहले चरण में कौन से सवाल (FAQs) पूछे जा रहे हैं?

जनगणना के पहले चरण के दौरान नागरिकों से 33 सवाल पूछे जा रहे हैं। इस सवालों की सूची 30 मार्च 2026 को जारी की गई है। इन 33 सवालों का मकसद नागरिकों के रहन-सहन के स्तर, घर की सुविधाओं, परिवार और तकनीकी उपकरणों के इस्तेमाल के बारे में सही जानकारी इकट्ठा करना है। अब, आइए जानते हैं कि वे 33 सवाल कौन से हैं, जिनका जवाब हर घर में देना होगा।

भवन और आवास का विवरण

  1. भवन संख्या: नगरपालिका, स्थानीय निकाय या जनगणना द्वारा दी गई एक संख्या।
  2. गणना गृह संख्या: घर की विशिष्ट पहचान के लिए एक संख्या।
  3. घर का फर्श : घर के फर्श बनाने में इस्तेमाल होने वाली मुख्य सामग्री (टाइलें, सीमेंट, लकड़ी, आदि)।
  4. दीवार की सामग्री: घर की दीवारें बनाने में इस्तेमाल होने वाली मुख्य सामग्री (ईंट, पत्थर, कंक्रीट, आदि)।
  5. छत की सामग्री: घर की छत किस सामग्री से बनी है (फूस, पाइप, शीट, ईंट आदि)?
  6. घर का उपयोग: घर का उपयोग रहने के लिए, दुकान के लिए या किसी अन्य उद्देश्य के लिए किया जाता है, इसका विवरण।
  7. घर की स्थिति: घर की वर्तमान स्थिति (नया, पुराना या जर्जर)।

परिवार और मुखिया का विवरण:

  1. परिवारों की संख्या: एक घर में रहने वाले परिवारों की संख्या।
  2. व्यक्तियों की कुल संख्या: आमतौर पर घर में रहने वाले सदस्यों की कुल संख्या।
  3. घर के मुखिया का नाम: घर के मुखिया का नाम।
  4. मुखिया का लिंग: क्या मुखिया पुरुष, महिला या ट्रांसजेंडर है?
  5. सामाजिक वर्ग: परिवार के सदस्य अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) या अन्य वर्गों से संबंधित हैं?
  6. स्वामित्व की स्थिति: क्या आवास अपना है या किराए का?

आवास सुविधाएं:

  1. कमरों की संख्या: परिवार के पास रहने के लिए कितने कमरे हैं?
  2. विवाहित जोड़े: घर में रहने वाले विवाहित जोड़ों की संख्या।
  3. पीने के पानी का स्रोत: पानी कहाँ से प्राप्त होता है (नल, हैंडपंप, कुआँ, आदि)?
  4. पानी की उपलब्धता: क्या पीने का पानी घर के परिसर के भीतर उपलब्ध है, या इसे बाहर से लाना पड़ता है?
  5. प्रकाश का स्रोत: घर में प्रकाश का मुख्य स्रोत (बिजली, सौर ऊर्जा, मिट्टी का तेल, आदि)।
    स्वच्छता और खाना पकाने की व्यवस्था: कहाँ और कैसी चुल्हे का इस्तेमाल किया जाता है
  6. शौचालय की सुविधा: क्या घर में शौचालय है या नहीं?
  7. शौचालय का प्रकार: यह किस प्रकार का शौचालय है (फ्लश वाला, इंडियन टॉयलेट या गड्ढे वाला, आदि)?
  8. अपशिष्ट जल का निपटान: जल निकासी या सीवेज प्रणाली का विवरण। 22. नहाने की सुविधाएँ: क्या घर में नहाने के लिए कोई अलग जगह या बाथरूम है या नहीं?
  9. रसोई और गैस कनेक्शन: क्या घर में अलग रसोई और LPG/PNG कनेक्शन की सुविधा है या नहीं?
  10. खाना पकाने का ईंधन: खाना पकाने के लिए मुख्य रूप से किस ईंधन का उपयोग किया जाता है (गैस, लकड़ी, बिजली, आदि)?

संपत्ति और संसाधन:

  1. रेडियो/ट्रांजिस्टर: क्या यह उपकरण घर में उपलब्ध है या नहीं?
  2. टेलीविजन (TV): क्या घर में TV की सुविधा है या नहीं?
  3. इंटरनेट सुविधा: क्या घर में इंटरनेट एक्सेस की सुविधा है या नहीं?
  4. लैपटॉप/कंप्यूटर: क्या घर में कंप्यूटर या लैपटॉप है या नहीं?
  5. फोन सुविधा: लैंडलाइन, मोबाइल या स्मार्टफोन की उपलब्धता।
  6. दो-पहिया वाहन: चाहे वह साइकिल हो, स्कूटर हो या मोटरसाइकिल।
  7. चार-पहिया वाहन: कार, जीप या वैन जैसे वाहन की उपलब्धता।

अन्य विवरण:

  1. मुख्य अनाज: परिवार मुख्य रूप से भोजन में किस अनाज (गेहूँ, चावल, बाजरा, आदि) का उपयोग करता है?
  2. मोबाइल नंबर: भविष्य में संपर्क और सत्यापन के लिए परिवार का मोबाइल नंबर।

वर्तमान गणना पद्धति में बदलाव

पिछली जनगणना और जनगणना 2027 के बीच सबसे बड़ा अंतर इसकी कार्यप्रणाली में है। जहाँ ब्रिटिश काल से लेकर 2011 तक पूरी प्रक्रिया पेन और पेपर से होती थी। वहीं 2027 की जनगणना भारत की पहली ‘पूरी तरह से डिजिटल’ जनगणना होगी। इस बार गणना करने वाले कर्मचारी एक मोबाइल ऐप का उपयोग करेंगे, और नागरिकों को 16 भाषाओं में ‘स्वयं-गणना’ (self-enumeration) की एक नई सुविधा मिलेगी। इससे डेटा प्रोसेसिंग का समय वर्षों से घटकर केवल 6-9 महीने रह जाएगा। तकनीकी स्तर पर GPS टैगिंग और जियोफेंसिंग के माध्यम से प्रत्येक घर की सटीक स्थिति निर्धारित करके ‘रियल-टाइम मॉनिटरिंग’ की जाएगी।

समय और चरणों के मामले में, पिछली जनगणना एक साथ की गई थी, जबकि 2027 में दो स्पष्ट चरण तय किए गए हैं। पहला चरण (अप्रैल-सितंबर 2026) घरों और सुविधाओं की सूची बनाने के लिए होगा, और दूसरा चरण (फरवरी-मार्च 2027) व्यक्तिगत विवरणों के लिए होगा। प्रश्नावली में भी महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। इसमें बैंकिंग से जुड़े सवालों को हटा दिया गया है और डिजिटल युग के अनुसार इंटरनेट, स्मार्टफोन और मोबाइल नंबर जैसी नई जानकारियों को जोड़ा गया है। इस बार प्रवासन (migration) से जुड़े सवालों को भी अधिक विस्तृत रखा गया है।

सामाजिक और प्रशासनिक दृष्टिकोण से एक ऐतिहासिक बदलाव ‘जाति जनगणना’ है; 2011 में केवल SC/ST की गिनती की गई थी, लेकिन 2027 में सभी समुदायों के लिए जाति जनगणना की जाएगी। आजादी के बाद पहली बार सबकी जाति की गणना की जाएगी, चाहे वह किसी जाति का हो। केंद्र सरकार ने इस विशाल डिजिटल बुनियादी ढाँचे के लिए ₹11718 करोड़ का बजट आवंटित किया है। इस राशि का एक बड़ा हिस्सा 31 लाख कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने और एक मजबूत IT बुनियादी ढाँचा तैयार करने के लिए किया जाएगा।

पिछली जनगणना पारंपरिक और अपेक्षाकृत धीमी थी, जबकि 2027 की जनगणना अधिक पारदर्शी तेज और समावेशी होगी। डिजिटल माध्यमों से डेटा सुरक्षा और गोपनीयता के लिए नए प्रोटोकॉल के साथ, यह जनगणना देश की बदलती भौगोलिक और सामाजिक स्थिति की एक सही तस्वीर पेश करेगी। इसके आधार पर आने वाले दशक के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास जैसी कल्याणकारी योजनाओं के नीति निर्माण में काफी मदद मिलेगी।

(मूलरूप से यह लेख गुजराती में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

न हॉर्मुज खुला, न बदली ईरान की सत्ता… कंफ्यूजन में ट्रंप प्रशासन कर रहा कभी वापसी की बात तो कभी युद्ध जारी रखने का दावा: जानिए अमेरिका के सामने क्या हैं चुनौतियाँ?

अमेरिका अब ईरान युद्ध से पीछे हटने को तैयार है। राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि ईरान से समझौता हो या न हो, अमेरिका 2-3 सप्ताह के भीतर अपनी सैन्य कार्रवाई खत्म कर देगा और ईरान युद्ध से बाहर हो जाएगा। अब सवाल ये है कि राष्ट्रपति ट्रंप की ऐसी क्या मजबूरी आ गई जो ईरान को युद्ध में परास्त करने के जिद को छोड़कर बगैर समझौते के युद्ध खत्म करने की बात कह रहे हैं। अब होर्मुज खुलवाने और होर्मुज पर नियंत्रण की बात भी वे भूल चुके हैं।

क्या कहा राष्ट्रपति ट्रंप ने

राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका और ईरान के बीच डील की उम्मीद बनी हुई है। ईरान अगर बातचीत की मेज पर आता भी है तो इससे फर्क नहीं पड़ेगा। ईरान से शर्तों के साथ बातचीत करने का दम भरने वाले राष्ट्रपति ट्रंप को अब कोई फर्क नहीं पड़ता कि ईरान से डील हो या न हो। उन्होंने यह भी कहा है कि होर्मुज खुले या न खुले, ये सिर्फ अमेरिका की जिम्मेदारी नहीं है। दुनिया के दूसरे देश भी आगे आकर इसे खोलने की कोशिश करें।

उन्होंने कहा कि फ्रांस और दूसरे देश अगर तेल चाहते हैं तो होर्मुज स्ट्रेट होकर जा सकता है, अमेरिका का उससे कोई लेना-देना नहीं है।

हालाँकि ईरान की पार्लियामेंट ने यहाँ से गुजरने वाली जहाजों से टोल वसूलने का मन बना लिया है और एक प्रस्ताव पास किया, जिससे ईरान की मोटी कमाई होगी। ईरान ने साफ कहा है कि अमेरिका- इजरायल के तेल- गैस टैंकर यहाँ से नहीं गुजर सकते। ऐसे में अमेरिका के लिए होर्मुज स्ट्रेट पर नियंत्रण करना काफी मुश्किल काम है। युद्ध से निकलने को बेताब अमेरिका इसमें फँसना नहीं चाह रहा है।

ईरान में रिजीम बदलने का दावा किया

राष्ट्रपति ट्रंप ने यह भी दावा किया कि ईरान में ‘सत्ता परिवर्तन हो चुका है’। उनके मुताबिक, ईरान के नए नेता पहले के नेताओं की तुलना में ‘ कम कट्टरपंथी’ और ‘ज्यादा समझदार’ हैं। उन्होंने ईरान को पूरी तरह तबाह करने का दावा भी किया है।

उन्होंने कहा कि ईरान के पास अब कोई एंटी एयरक्राफ्ट नहीं बची है। अब कोई मुकाबला ईरान नहीं कर पा रहा है और कोई हम पर गोली भी नहीं चला रहा है। ईरान के पास कोई सैन्य साजो सामान नहीं है। न ही नौसेना बची है और न ही सामान इसलिए समझौता की गुहार लगा रहे हैं।

कम से कम 6 महीने तक लड़ने में दिक्कत नहीं- ईरान

ईरान ने समझौते के लिए शर्ते रख दी हैं। ईरानी राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने यूरोपियन काउंसिल के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा को फोन कर कहा है कि उनपर भविष्य में इस तरह से हमले नहीं किए जाने की गारंटी चाहिए। ईरान पर आक्रमण तुरंत बंद हो।

दूसरी तरफ ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉप्स ने मिडिल ईस्ट में काम करने वाली अमेरिकी 18 कंपनियों को तुरंत बोरिया बिस्तर समेटने की चेतावनी दी है और कहा है कि युद्ध में अमेरिका को तकनीकी मदद देने की वजह से इन कंपनियों को अब मिडिल ईस्ट छोड़ना पड़ेगा, वरना उनपर हमले होंगे।

ईरान ने कहा है कि कम से कम 6 महीने तक ईरान युद्ध लड़ने के लिए तैयार है। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अल जजीरा को दिए इंटरव्यू में ये बातें कहीं है। उनका कहना है कि ईरान के पास अभी सैन्य साजो सामान से लेकर हर चीज का इतना स्टॉक है कि वह अगले कम से कम 6 महीने तक बगैर दिक्कत के युद्ध लड़ सकता है।

होर्मुज स्ट्रेट बना अमेरिका के लिए मुसीबत

होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से दुनिया पर दबाव बना है। दुनिया की करीब 20 फीसदी तेल-गैस की आवाजाही इस मार्ग से होती है। दुनिया के इस व्यस्ततम मार्ग पर ईरान का कब्जा है। उसने अपने ‘मित्र देशों’ को इससे तेल और गैस से भरी जहाजों को सुरक्षित ले जाने की इजाजत दी है।

अमेरिका की चाह कर भी यहाँ कुछ नहीं चल रही है। पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी नौसेना सभी जहाजों को सुरक्षित निकालने में मदद करेगा, फिर उन्होंने नाटो देशों से इसमें मदद करने की गुहार लगाई।

ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन समेत ज्यादातर नाटो देशों ने मना कर दिया। इसके बाद अमेरिका खुद ये कह रहा है कि ईरान प्रशासन से बात कर कई देश अपना तेल-गैस होर्मुज स्ट्रेट से ले जा रहे हैं और आवाजाही चल रही है। एक तरह से अमेरिका होर्मुज स्ट्रेट खुलवाने के लिए न तो अपनी सेना लगाना चाहता है और न ही मुसीबत मोल लेना चाहता है।

युद्ध में अमेरिका का हो रहा बेहिसाब खर्च

राष्ट्रपति ट्रंप को लगा था कि ईरान युद्ध ज्यादा दिन तक नहीं चलेगा और 2-4 हफ्तों में बम गिरा कर ईरान को काबू में किया जा सकेगा। लेकिन, ऐसा नहीं हुआ और युद्ध लंबा खिंचता जा रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप पर जल्द से जल्द युद्ध खत्म करने का दबाव इसलिए भी है क्योंकि अमेरिकी खजाने पर हर दिन करोड़ों की चोट लग रही है। हर सेकेंड अमेरिका को 10 लाख रुपए खर्च करना पड़ रहा है।

सिप्री की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान पर हमले के लिए हर दिन अमेरिका 8455 करोड़ रुपए खर्च कर रहा है। 28 फरवरी से 31 मार्च तक अमेरिका के 2 लाख 63 हजार करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। इस खर्च को राष्ट्रपति ट्रंप अब खाड़ी देशों से वसूलने का प्लान बना रहे हैं।

राष्ट्रपति ट्रंप ने खाड़ी देश को युद्ध का खर्च उठाने के लिए कहा है।

ट्रंप के करीबी वेंस और रुबियो के बीच मतभेद

व्हाइट हाउस में ईरान युद्ध को लेकर सिरफुटव्वल है। जानकारी के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप की अपनी टीम में ही इस समय दो गुट बन गए हैं और दोनों के बीच जबरदस्त खींचतान चल रही है।

एक गुट उन लोगों का है जो देश की अर्थव्यवस्था और राजनीति को संभालते हैं। इनका कहना है कि अगर यह युद्ध और लंबा खिंचा, तो पेट्रोल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। उन्हें डर है कि अगर आम जनता को महँगा पेट्रोल खरीदना पड़ा, तो वे ट्रंप के खिलाफ हो जाएँगे और उनका समर्थन करना बंद कर देंगे। नवंबर 2026 में होने वाले मध्यावधि चुनाव में इसका असर पड़ेगा। अगर परिणाम राष्ट्रपति ट्रंप के खिलाफ जाते हैं तो वह देश में काफी कमजोर हो जाएँगे।

यही वजह है कि ट्रंप के बेहद करीबी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को युद्ध को लंबा खिंचने को लेकर जमकर लताड़ लगाई है और कहा है कि उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप को बरगलाया और उन्हें ये बताया कि ईरान में सत्ता परिवर्तन आसान है और युद्ध जल्दी ही निपट जाएगा।

व्हाइट हाउस का दूसरा गुट ईरान युद्ध को यूँ ही खत्म करने के पक्ष में नहीं है। उनका मानना है कि अगर अभी हमला रोक दिया गया, तो ईरान इसे अपनी जीत समझेगा और बहुत जल्द परमाणु बम बना लेगा। उन्हें डर है कि अधूरा छोड़ा गया काम आगे चलकर अमेरिकी सैनिकों के लिए और भी बड़ा खतरा बन सकता है। उनका तर्क है कि ईरान को अभी पूरी तरह कमजोर करना जरूरी है।

राष्ट्रपति ट्रंप के करीबी अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का कहना है कि अमेरिका अपने सैन्य लक्ष्यों को हासिल करने में काफी तेजी से आगे बढ़ रहा है और ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ जल्द ही अपने अंजाम तक पहुँचने वाला है।

अमेरिका में बढ़ रही महँगाई और बढ़ रहा विरोध प्रदर्शन

अमेरिका में गैस और तेल की कीमतों में काफी वृद्धि हुई है। इस वजह से महँगाई बढ़ गई है। राष्ट्रपति ट्रंप का कहना है कि वह ईरान युद्ध से बाहर निकलने के बाद जल्द इस पर ध्यान देंगे। वह जल्द ही इस युद्ध से बाहर निकल जाएँगे।

अमेरिका में ईरान युद्ध को लेकर बड़े बड़े शहरों में प्रदर्शन का दौर जारी है। राष्ट्रपति ट्रंप के कथित तानाशाही के खिलाफ ‘नो किंग्स’ प्रदर्शन हो रहे हैं और ट्रंप को राष्ट्रपति पद से हटाने और गिरफ्तार करने तक की माँग की जा रही है। प्रदर्शनकारी ट्रंप की युद्ध नीति, संघीय इमीग्रेशन कानून , फ्यूल की बढ़ती कीमत और देश में बढ़ रही महँगाई को मुद्दा बनाया है।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ट्रंप हम पर एक तानाशाह की तरह राज करना चाहते हैं, लेकिन यह अमेरिका है। यहाँ असली ताकत आम लोगों के हाथों में है, न कि उन लोगों के हाथों में जो खुद को राजा समझना चाहते हैं और न ही उनके अरबपति साथियों के हाथों में है। अमेरिका के न्यूयॉर्क, वॉशिंगटन DC और लॉस एंजिल्स सहित हर बड़े शहर में ट्रंप विरोधी प्रदर्शन हुए हैं।

तेल और गैस की विश्वव्यापी समस्या पैदा होने से अमेरिका पर दबाव पड़ा है। आंतरिक और बाहरी समस्याओं में राष्ट्रपति ट्रंप फँस गए हैं। होर्मुज स्ट्रेट पर कब्जा नहीं कर पाने का एकमात्र रास्ता अमेरिकी सेना का ईरान में जमीनी कार्रवाई से संभव है।

राष्ट्रपति ट्रंप ने पहले ही कहा था कि वह अपनी सेना को ऐसी ‘बेवकूफाना’ जमीनी लड़ाइयों में नहीं झोकना चाहते जहाँ अमेरिकी सैनिकों की जान जाए। लेकिन दूसरी तरफ, तेल की कमी की वजह से जो महँगाई बढ़ रही है, उसे रोकने के लिए उनके पास अब ऑप्शन खत्म होते जा रहे हैं।

अमेरिका ने युद्ध शुरू करने से पहले अपने 4 लक्ष्य बताए थे। ईरान के मिसाइल इंफ्रास्ट्रक्चर को नष्ट करना, ईरानी नौसेना शक्ति को पूरी तरह खत्म करना, ईरान के क्षेत्रीय आतंकवादी नेटवर्क को कमजोर करना और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को हमेशा के लिए समाप्त करना। राष्ट्रपति ट्रंप का दावा है कि उन्होंने ये सभी लक्ष्य हासिल कर लिए हैं। अमेरिका में इसी साल नवंबर में मध्यावधि चुनाव होने वाले हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने जब इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला शुरू किया था तो अमेरिका की बड़ी आबादी इस पक्ष में था कि ईरान को परमाणु शक्ति संपन्न बनने से रोकना जरूरी है। लेकिन अब राष्ट्रपति ट्रंप की लोकप्रियता में लगातार कमी आ रही है।

अमेरिका में लगातार विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं और ट्रंप- वेंस की गिरफ्तारी की माँग उठ रही है। राष्ट्रपति ट्रंप जल्द से जल्द ईरान युद्ध खत्म कर अपना ध्यान अमेरिका के अंदरुनी समस्याओं को खत्म करने पर लगाना चाहते हैं क्योंकि उनके लिए ये चुनाव जीतना बेहद जरूरी हैं। यह संसद में उनकी ताकत और कुर्सी बचाए रखने के लिए आवश्यक है।

कानपुर में किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट का भंडाफोड़, 5 डॉक्टरों समेत 6 गिरफ्तार: पढ़ें- कैसे ₹50000 के विवाद से खुला अंग तस्करी का करोड़ों का नेटवर्क

उत्तर प्रदेश के कानपुर में पुलिस ने 30 मार्च और 31 मार्च की रात के बीच एक बड़े अवैध किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट का भंडाफोड़ किया है। इस रैकेट में कम से कम 6 डॉक्टर और 8 अन्य लोग शामिल थे।

यह पूरा मामला तब सामने आया जब 50,000 रुपए के लेन-देन को लेकर विवाद हुआ। एक ‘डोनर’ (किडनी देने वाले) को उसकी एक किडनी के बदले 10 लाख रुपये देने का वादा किया गया था लेकिन उसे सिर्फ 9.5 लाख रुपए मिले। 50,000 रुपए कम मिलने से नाराज होकर उसने पुलिस से संपर्क किया और पूरे रैकेट की जानकारी दे दी।

पुलिस ने इस मामले में 6 डॉक्टरों डॉ. सुरजीत सिंह आहूजा, डॉ. प्रीति आहूजा, डॉ. रोहित, डॉ. वैभव, डॉ. अनुराग और डॉ. अफजल के अलावा शिवम अग्रवाल, राजेश कुमार, रामप्रकाश कुशवाहा, नरेंद्र सिंह और अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। अब तक कम से कम 6 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। यह FIR सब-इंस्पेक्टर मुकेश कुमार की शिकायत पर दर्ज की गई है। इसमें मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम, 1994 की धाराएँ 18, 19 और 20 तथा भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराएँ 143 और 3(5) लगाई गई हैं।

इस रैकेट में कई अस्पताल शामिल थे जिनमें प्रिया हॉस्पिटल एंड ट्रॉमा सेंटर, आहूजा हॉस्पिटल और मेडलाइफ हॉस्पिटल शामिल हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, डॉ. अफजल, डॉ. रोहित, डॉ. वैभव और डॉ. अनुराग इस रैकेट के मुखिया थे। वहीं, डॉ. सुरजीत और उनकी पत्नी आहूजा हॉस्पिटल के मालिक थे जहाँ ये ऑपरेशन किए जाते थे।

साभार: UP पुलिस

कैसे 50,000 रुपए के विवाद ने खोला राज?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, एक किडनी डोनर ने पुलिस से शिकायत की कि उसे तय रकम से 50,000 रुपए कम दिए गए। इस डोनर की पहचान आयुष के रूप में हुई है जो बिहार के समस्तीपुर का रहने वाला है और मेरठ में रह रहा था। उसने बताया कि आर्थिक तंगी के कारण उसने 10 लाख रुपए में अपनी एक किडनी बेचने के लिए सहमति दी थी।

हालाँकि, उसे सिर्फ 9.5 लाख रुपए मिले। बार-बार पैसे देने में देरी और कम भुगतान से परेशान होकर उसने पुलिस से संपर्क किया जिसके बाद जाँच शुरू हुई और पूरे रैकेट का खुलासा हुआ।

बहला-फुसलाकर ली गई किडनी और मोटे दाम पर बेची

जाँच में पता चला कि कल्याणपुर का एक एंबुलेंस ड्राइवर शिवम अग्रवाल टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं को फँसाता था। वह खुद को मेडिकल मदद दिलाने वाला व्यक्ति बताता था और कहता था कि किसी मरीज के रिश्तेदार को किडनी की जरूरत है।

आयुष के केस में उसकी किडनी मुजफ्फरनगर की एक महिला के परिवार को 60 लाख से 90 लाख रुपये तक में बेची गई जबकि आयुष को इसका बहुत छोटा हिस्सा मिला। एक अन्य मामले में एक महिला छात्रा को करीब 4 लाख रुपए दिए गए जबकि उसकी किडनी 45 से 50 लाख रुपए के बीच बेचे जाने का अनुमान है।

तीन अस्पतालों वाला मॉडल

पुलिस जाँच में सामने आया कि यह रैकेट एक खास रणनीति के तहत काम करता था जिसे ‘तीन अस्पताल मॉडल’ कह सकते हैं। इसमें किडनी निकालने का ऑपरेशन एक अस्पताल में किया जाता था। इसके बाद डोनर और मरीज को थोड़ी देर साथ रखा जाता था और फिर दोनों को अलग-अलग अस्पतालों में भेज दिया जाता था ताकि इलाज का रिकॉर्ड एक ही जगह पर पूरा न मिले।

आयुष को भी ऑपरेशन के बाद एक दूसरे अस्पताल में अलग पहचान के साथ भेजा गया जबकि जिस मरीज को किडनी दी गई थी, उसे कहीं और भेज दिया गया।

FIR में क्या लिखा है?

ऑपइंडिया के पास इस मामले की FIR कॉपी मौजूद है। FIR के अनुसार, पुलिस को मसवानपुर चौराहे के पास चेकिंग के दौरान इस रैकेट की सूचना मिली। सूचना देने वाले ने बताया कि आहूजा अस्पताल में बाहर के डॉक्टर आकर ट्रांसप्लांट करते हैं और लोगों को पैसे का लालच देकर लाया जाता है। उस समय भी एक ऑपरेशन चल रहा था।

पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की और वरिष्ठ अधिकारियों को जानकारी दी। अतिरिक्त पुलिस बल और असिस्टेंट चीफ मेडिकल ऑफिसर डॉक्टर रमित रस्तोगी के नेतृत्व में एक मेडिकल टीम का गठन किया। टीम अस्पताल पहुँची और सबसे पहले शिवम अग्रवाल से पूछताछ की। उसने पहले कुछ भी जानकारी होने से इनकार किया और डॉ. सुरजीत सिंह आहूजा के पास भेज दिया।

साभार: UP पुलिस

जब डॉ. आहूजा और उनकी पत्नी डॉ. प्रीति आहूजा ने पुलिस को देखा तो वे घबरा गए। पहले उन्होंने भी इनकार किया लेकिन जाँच में पाया गया कि अस्पताल के CCTV कैमरे बंद थे। बाद में डॉ. आहूजा ने माना कि जिन दिनों अवैध ट्रांसप्लांट होते थे, उन दिनों कैमरे जानबूझकर बंद कर दिए जाते थे।

FIR के मुताबिक, डॉक्टरों और शिवम ने पैसे के लालच में इस गैरकानूनी काम में शामिल होने की बात स्वीकार की। उन्होंने बताया कि पिछली रात अस्पताल के ऑपरेशन थिएटर में अवैध ट्रांसप्लांट किया गया था। शिवम का काम डोनर और मरीज लाना था। अस्पताल ऑपरेशन थिएटर इस्तेमाल करने के बदले 2,75,000 रुपए नकद लेता था।

ऑपरेशन की टीम में डॉ. रोहित, डॉ. वैभव, डॉ. अनुराग और डॉ. अफजल शामिल थे जो बाहर से आते थे रात में ऑपरेशन करते थे और फिर चले जाते थे। ऑपरेशन के लिए दवाइयाँ और बाकी इंतजाम भी यही टीम करती थी।

जाँच के दौरान ऑपरेशन में इस्तेमाल हुई दवाइयों और उपकरणों के चार डिब्बे बरामद किए गए और सील कर दिए गए। FIR में बताया गया कि किडनी लेने वाली मरीज पारुल तोमर और डोनर आयुष कुमार को अलग-अलग अस्पतालों में पाया गया जहाँ डॉक्टरों ने पुष्टि की कि दोनों की किडनी का ऑपरेशन हुआ था।

FIR में कहा गया है कि अस्पताल में बिना किसी कागजी कार्रवाई के भर्ती किया जाता था। शिवम अग्रवाल ने माना कि वह 2024 से ऐसे कई मामलों में शामिल रहा है। सबूत मिलने और पूछताछ के बाद आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया।

जाँचकर्ताओं का कहना है कि डॉ. अफजल कथित तौर पर डायलिसिस सेंटरों पर मरीजों की पहचान करते थे और उन्हें किडनी ट्रांसप्लांट कराने के लिए राजी करते थे। वहीं, ऑपरेशन करने के लिए लखनऊ और नोएडा जैसे शहरों से सर्जनों की टीम बुलाई जाती थी।

बड़ा नेटवर्क, डॉक्टरों और अस्पतालों की मिलीभगत

जाँच एजेंसियों का मानना है कि यह कोई छोटा मामला नहीं बल्कि एक बड़ा संगठित नेटवर्क है। इसमें दलाल, अस्पताल और डॉक्टर सभी मिलकर काम करते थे। दलाल गरीब लोगों को फँसाते थे, अस्पताल ऑपरेशन की सुविधा देते थे और डॉक्टर बिना जरूरी कागजों के ट्रांसप्लांट करते थे। ऑपरेशन ज्यादातर रात में होते थे और मरीजों को तुरंत अलग-अलग जगह भेज दिया जाता था।

दूसरे राज्यों और विदेशों तक फैले हो सकते हैं तार

पुलिस कमिश्नर रघुवीर लाल के अनुसार, इस रैकेट के तार सिर्फ कानपुर तक सीमित नहीं हो सकते। यह दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों तक फैला हो सकता है और नेपाल तथा दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों से भी इसके संबंध हो सकते हैं। शुरुआती जाँच में पता चला है कि अब तक 40 से 50 अवैध किडनी ट्रांसप्लांट किए जा चुके हैं जिनमें कुछ विदेशी नागरिक भी शामिल हो सकते हैं।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

मजहब देखकर मदद करने तक है जिनकी औकात, वो भारतीय सेना को ‘शराबी-बलात्कारी’ बताकर उठाते हैं सवाल: कौन हैं ये लोग?

भारत में रहकर इस्लामी मुल्कों के लिए अपनी ईमानदारी दिखाना और यहाँ की सरकार व सैनिकों का अपमान करना कट्टरपंथियों के लिए कोई नई बात नहीं है। पिछले 12 सालों में ऐसे कई मामले देखे गए जब ये लोग कैमरे पर देश के खिलाफ स्पष्ट रूप से जहर उगलते कैद हुए। इस बार इन्होंने ये काम ईरान के नाम पर किया है।

हाल में एक वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही है। इसमें बुर्काधारी महिला सैनिकों को ‘शराबी-कबाबी’ कहती नजर आ रही है। उसका कहना है कि वो लोग जो दान कर रहे हैं वह उनके अपने ‘रहबर’ शिया मुल्क ईरान के लिए है। उनके लिए अभी भारतीय सेना या कुछ और बिलकुल जरूरी नहीं है।

यह पहला मौका नहीं है जब ऐसा बयान सामने आया हों। ईरान से जुड़े तनाव या पश्चिम एशिया की घटनाओं के दौरान कई बार ऐसे वीडियो सामने आए हैं, जिनमें शिया समुदाय की भीड़ सड़कों पर उतरकर खुले तौर पर विदेशी ताकतों के समर्थन में नारे लगाती और हल्ला करते हुए दिखी।

लखनऊ में जहाँ बुर्काधारी महिला ने तो यहाँ तक कहा कि खामेनेई के लिए उनकी जान भी हाजिर है वही दिल्ली में प्रदर्शन करते हुए बुर्काधारी महिलाएँ बोलीं कि उनके लिए सबसे जरूरी ईरान ही है।

इस बीच कुछ मुल्ला-मौलाना के बयान भी गौर देने वाले थे। जैसे मौलाना साजिद राशीदी ने कैमरे पर ये कहा था कि अगर कभी ऐसा समय आया कि ईरान और भारत आमने-सामने हुए तो भारत के मुस्लिम ईरान का ही साथ देंगे।

वहीं कट्टरपंथ में सने बच्चे भी ये कहते नजर आए थे कि उन्हें भारत देश की सरकार से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन अगर मौका मिला तो वह ईरान का बदला लेकर इजरायल में घुसकर चाकूबाजी कर सकते हैं।

अभिव्यक्ति के नाम पर जहर उगलने का काम पुराना

लोकतांत्रिक भारत में यह एक बड़ी विडंबना है कि हम इन लोगों के विचारों से अवगत होते हुए भी अक्सर इनका खुलकर विरोध नहीं कर पाते। कारण वो सेकुलरिज्म का बोझ है जिसे ढोने की जिम्मेदारी सिर्फ हिंदुओं को दी गई है। देश का लेफ्ट-लिबरल इसी सहिष्णुता का फायदा उठाता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कभी देश की संप्रभुता-सुरक्षा-सद्भाव को ठेस पहुँचाई जाती है, कभी इसका इस्तेमाल सेना को गाली देने के लिए किया जाता है।

व्यक्तिगत राय और लोकतंत्र की मजबूती की बात करते-करते सेकुलर हिंदुओं को ये समझ नहीं आता कि जो लोग कट्टरपंथ के कारण अपनी मातृभूमि के नहीं हो पा रहे हैं वो उनके कैसे होंगे। क्या ये सोचने वाली बात नहीं है कि आखिर क्यों ईरान को अपना रहबर और देश भर के मुस्लिमों को अपना भाई बताने वाले इस्लामी कट्टरपंथी हिंदुओं को ‘काफिर’ क्यों कहते हैं।

खैर! ईरान से पहले फिलीस्तीन के लिए भी भारत के मुस्लिम ऐसा रोना रो चुके हैं। उस वक्त भी सेकुलर हिंदुओं का काम सिर्फ इनका ‘पिछलग्गू’ बने रहने का था। उन्हें न हमास आतंकियों के बारे में कोई बात करनी थी और न ही 7 अक्तूबर 2023 को क्या हुआ इसकी जानकारी थी। ये लोग उस समय भी घूम-फिराकर ये नैरेटिव आगे बढ़ाते रहे कि इजरायल बेवजह ही फिलीस्तीनियों को निशाना बना रहा है और गाजा के लिए रोना रोने वाले मुस्लिम ही इंसानियत के साथ खड़े हैं।

आपने कभी हमास-इजरायल युद्ध के दौरान में इस्लामी कट्टरपंथी जमात को हमास आतंकियों की हरकत पर बात करते नहीं सुना गया। उन्होंने न उस घटना की निंदा की थी और न ही विरोध।

मजहब देखकर दिखाते हैं मानवता

आज फिर मानवता का हवाला देकर ईरान के लिए भी वैसी सहानुभूति दिखाई जा रही है, लेकिन इन सब घटनाक्रमों के बीच विचार करने वाली बात ये है कि ईरान-फिलीस्तीन के लिए छाती पीटने वालों के मन में कभी भारत के लोगों के लिए ये दर्द नहीं उठा। तमाम मौके थे जब ये लोग मजहब से ऊपर उठकर गैर-मुस्लिमों के लिए इंसानियत दिखा सकते थे लेकिन इन्होंने कभी ऐसा नहीं किया।

चाहे 2001 में गुजरात के भुज में भूकंप की घटना हो या 2015 में नेपाल में भीषण त्रासदी ऐसी घटनाओं में हमेशा देशभर से मदद पहुँचीं लेकिन क्या वो दृश्य आपको देखने को मिले जो ईरान के वक्त कश्मीर में दिखे? क्या आपने जगह-जगह से मुस्लिमों को गैर-मुस्लिमों के लिए जकात काम काम करते देखा?

नहीं, ये कट्टरपंथी जमात मजहब देखकर सबाब का काम करती है और ये भूल जाती है कि जिस सेना को ये लोग ‘शराबी-बलात्कारी’ बताते हैं वही सेना हर मुश्किल घड़ी पर सबसे आगे मदद के लिए रहती है। वो समय चाहे प्राकृतिक आपदा के कारण आया हो या फिर विश्व में अलग-अलग चल रहे युद्ध की वजह से… भारतीय सेना अपने देश के नागरिकों की रक्षा में जान की परवाह किए बिना तैनात रहती है, तभी कश्मीर में कट्टरपंथियों से लेकर केरल के वामपंथी तक सुकून से सो पाते हैं। ।

फर्जी खबरें फैलाने से लेकर काटे-छाँटे गए वीडियो और फर्जी नैरेटिव तक: पढ़ें- भारत में बैन किए गए प्रोपेगेंडा अकाउंट्स की पड़ताल

हाल के दिनों में 4PM, मॉलिटिक्स (Molitics) और नेशनल दस्तक (National Dastak) जैसे कई सोशल मीडिया अकाउंट्स और कंटेंट प्लेटफॉर्म्स पर भारत में रोक लगाई गई है। जैसे ही ये पाबंदी लगी वामपंथियो ने इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बताया और कहा कि विरोध की आवाज दबाई जा रही है। यह दावा सोशल मीडिया पर तेजी से फैल भी गया। हालाँकि, इस तरह के दावे बड़ा सवाल खड़ा करते हैं कि क्या यह कार्रवाई मनमाने तरीके से हुई या इससे पहले ऐसा कंटेंट लगातार आ रहा था जिस पर सवाल उठना जरूरी था?

अगर इन प्लेटफॉर्म्स के कंटेंट को ध्यान से देखें तो मामला इतना सीधा नहीं लगता। कई बार इनके कंटेंट में सनसनीखेज अंदाज, तथ्यों को सुविधा के हिसाब से चुनने और ऐसे दावे देखने को मिलते हैं जो बाद में गलत साबित होते हैं या सही नहीं निकलते। कई बार ऐसी कहानियाँ भी सामने आईं जिन्हें बाद में भ्रामक माना गया और कई बार अनुमानों को ही पूरे भरोसे के साथ पेश किया गया। यह पैटर्न दिखाता है कि यहाँ असर पैदा करने को अक्सर सटीक जानकारी से ज्यादा महत्व दिया जाता है। ऐसे में मामला सिर्फ पाबंदी का नहीं बल्कि डिजिटल जानकारी देने वाले इकोसिस्टम की जवाबदेही का भी बन जाता है।

इकोसिस्टम: प्लेटफॉर्म, चेहरे और नैरेटिव

पहली नजर में 4PM, मॉलिटिक्स और नेशनल दस्तक जैसे प्लेटफॉर्म खुद को अलग आवाज बताते हैं। वे कहते हैं कि वे बेबाक हैं, स्वतंत्र हैं और बिना किसी रोक-टोक के सच दिखाते हैं। उनका कहना होता है कि वे मुख्यधारा की बातों को चुनौती देते हैं और ‘सत्ता के सामने सच बोलते हैं’। लेकिन असल में ये लोग सही जानकारी से ज्यादा ऐसी चीजें दिखाते हैं जो लोगों पर अधिक असर डालें।

इनके कंटेंट में अक्सर नाटकीय तस्वीरें (थंबनेल), आक्रामक और भड़काऊ हेडलाइन होती हैं जो लोगों को किसी भी मुद्दे के लिए भावनात्मक बना दें। मुश्किल मुद्दों को बहुत आसान करके दिखाया जाता है। कई बार अनुमानों को ही सच की तरह बताया जाता है जबकि सही जाँच या पक्के सबूत साफ नहीं होते या होते ही नहीं है।

इससे एक ऐसा माहौल बनता है जहाँ अनुमानों को सच जैसा दिखाया जाता है, छोटी-छोटी घटनाओं को पूरे सिस्टम की बड़ी समस्या की तरह पेश किया जाता है और राय को खबर की तरह बताया जाता है। यह सिर्फ सोच या विचार का फर्क नहीं है क्योंकि हर मीडिया के अपने विचार होते हैं। असली फर्क यह है कि क्या पहले सबूत होते हैं या पहले दावा किया जाता है।

इन प्लेटफॉर्म्स पर बार-बार पक्की जाँच की बजाय बातों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है। इससे उनके काम करने के तरीके और मकसद पर सवाल उठते हैं। यह सिर्फ एक पोस्ट की बात नहीं है बल्कि पूरे एक सिस्टम की बात है। इसी वजह से समझ आता है कि सरकार को इसमें दखल देने की जरूरत क्यों लगी।

पहला चरण: जब दिखाने का तरीका बदलता है सोच

एक मामले में नेशनल दस्तक ने एक पोस्ट में आरोपितों के नाम पूरे नहीं बताए सिर्फ ‘राजपूत’ और ‘राना’ जैसे शब्द इस्तेमाल किए। इससे ऐसा लगा कि आरोपी हिंदू हैं। लेकिन बाद में पूरी जानकारी सामने आई तो पता चला कि असली नाम ‘अजीम राना’ और ‘आजाद राजपूत’ थे। यानी दोनों आरोपित मुस्लिम थे लेकिन पोस्ट में इसे ऐसे दिखाया गया जैसे अपराध हिंदुओं ने किया हो।

इस पोस्ट पर एक कम्युनिटी नोट भी लगा जिसमें कहा गया कि अधूरे नाम जानबूझकर ऐसे इस्तेमाल किए गए जिससे गलत धारणा बने। ऐसे और भी कई मामले हैं जहाँ इन प्लेटफॉर्म्स की बातें बाद में अधूरी, भ्रामक या पूरी जानकारी आने पर गलत साबित हुईं।

एक बड़ा उदाहरण वह था जब दावा किया गया कि भारत के सोने के भंडार (₹1 लाख करोड़ से ज्यादा) का एक बड़ा हिस्सा RBI से ‘गायब’ हो गया है। इसे बहुत डराने वाले तरीके से दिखाया गया जैसे कोई बड़ा घोटाला या गड़बड़ी हुई हो। लेकिन बाद में PIB ने इसकी जाँच कर साफ किया कि यह दावा गलत है और आँकड़ों को गलत तरीके से फैलाया गया था।

फिर भी सच सामने आने के बाद भी यह बात कई जगह फैलती रही और ज्यादातर पोस्ट में सुधार की जानकारी नहीं दी गई। इससे पता चलता है कि इस तरह की बड़ी गलत खबरें, सच सामने आने के बाद भी लोगों की सोच पर असर डालती रहती हैं।

दूसरा चरण: वीडियो और तस्वीरों से अपनी कहानी गढ़ना

एक और तरीका बार-बार दिखता है कि छोटे वीडियो और चुनी हुई तस्वीरें। इन्हें पूरे संदर्भ के बिना दिखाया जाता है। एक मामले में एक वीडियो क्लिप शेयर की गई जिसमें नीतीश कुमार आरती की थाली पकड़े हुए दिख रहे थे। इसके साथ कैप्शन दिया गया- ‘सम्राट चौधरी ने नीतीश कुमार के हाथ से आरती की थाली छीन ली’। वीडियो को अकेले ऐसे दिखाया गया कि एक खास मैसेज जाए। लेकिन पूरी घटना या पूरा वीडियो देखे बिना ऐसी बात सिर्फ अधूरी ही रहती है।

आजकल सोशल मीडिया पर यही आम तरीका बन गया है। छोटे-छोटे वीडियो को उनके असली संदर्भ से अलग करके दिखाया जाता है ताकि वो किसी खास कहानी या सोच के हिसाब से फिट हो जाएँ। ऐसे में जो नहीं दिखाया जाता वो उतना ही जरूरी होता है जितना जो दिखाया जाता है। समस्या सिर्फ एक वीडियो की नहीं है, बल्कि उस पैटर्न की है जिसमें चीजों को पहले से बनी सोच के हिसाब से दिखाया जाता है। जब पूरा संदर्भ नहीं दिया जाता तो लोग अधूरी चीजों को ही पूरी सच्चाई मान लेते हैं। बार-बार ऐसा होने पर लोगों की सोच उसी दिशा में बनने लगती है चाहे पूरी सच्चाई कुछ और ही क्यों न हो।

तीसरा चरण: जब सनसनी ही बन जाए कंटेंट

सिर्फ क्या कहा जा रहा है या क्या दिखाया जा रहा है… ये ही नहीं बल्कि उसे कैसे दिखाया जा रहा है, ये भी बहुत मायने रखता है। Molitics जैसे प्लेटफॉर्म अक्सर ध्यान खींचने वाली भाषा का इस्तेमाल करते हैं। जैसे ‘घपलेबाजी पकड़ी गई’, ‘बड़ा खुलासा’, ‘तहलका मच गया’, ‘मोदी को बड़ा झटका’, ‘नफरती हिंदुत्व’, ‘आतंकी संगठन’। ये शब्द ऐसे अंदाज में लिखे जाते हैं जैसे बात पूरी तरह साबित हो चुकी हो जबकि कई बार मामला उतना साफ नहीं होता।

ये लाइनें ज्यादातर थंबनेल, कैप्शन और वीडियो के टाइटल में होती हैं जिससे देखने वाले को लगे कि मामला बहुत बड़ा और पक्का है, भले ही अंदर पूरा सबूत साफ न हो।

ये तरीका सोच-समझकर अपनाया जाता है। थंबनेल सबसे पहले दिखता है और वही तय करता है कि लोग चीज को कैसे समझेंगे। जब बार-बार ऐसी आक्रामक और नाटकीय भाषा इस्तेमाल होती है तो हर खबर एक बड़े घोटाले या संकट जैसी लगने लगती है। कई बार इनका फोकस खास तरह की सोच पर होता है जहाँ हिंदुत्व को गलत या दबाने वाला दिखाया जाता है और छोटी या कम अहम खबरों को भी बड़ा बनाकर पेश किया जाता है।

कई बार टाइटल या थंबनेल में जो बड़ा दावा किया जाता है, वह अंदर दिए गए सबूतों से मेल नहीं खाता। यानी दिखाने और असली जानकारी में फर्क होता है। जब ऐसा कंटेंट बहुत लोगों तक पहुँचता है तो यह फर्क और भी अहम हो जाता है। समय के साथ, बार-बार ऐसे कंटेंट देखने से लोगों को लगने लगता है कि हर जगह गड़बड़ी ही गड़बड़ी है, भले ही हर मामला सच में इतना बड़ा या साबित न हो।

चौथा चरण: जब कंटेंट आरोप, अनुमान और भड़काऊ बातों तक पहुँचे

सनसनी और आधी-अधूरी जानकारी से आगे बढ़कर मामलों में यह कंटेंट सीधे अनुमानों और गंभीर आरोपों तक पहुँच जाता है, जो कभी-कभी बदनाम करने वाले भी हो सकते हैं।

एक बार ‘Dr Nimo Yadav 2.0’ नाम के अकाउंट (जिसे Prateek Sharma चलाते हैं) से ऐसा कंटेंट पोस्ट किया जिसमें इशारा किया गया कि केंद्रीय मंत्रियों के दफ्तर किसी ऐसे व्यक्ति से जुड़े हो सकते हैं जिस पर आतंकी ट्रेनिंग से जुड़ा होने का आरोप है।

पोस्ट में इसे सवाल के रूप में रखा गया और जाँच की माँग की गई लेकिन ऐसा कोई पक्का सबूत नहीं दिया गया जो इतने गंभीर आरोप को साबित करे। भले ही इसे सवाल की तरह लिखा गया हो लेकिन जब ऐसी बातें बड़ी संख्या में लोगों तक पहुँचती हैं तो वे बिना सबूत के भी लोगों को प्रभावित कर सकती हैं।

एक और मामले में भारतीय सेना के अधिकारियों की तस्वीर के साथ की गई टिप्पणी में मजाक के जरिए उसे मिड-डे मील जैसी नीति से जोड़ दिया गया। हंसी-मजाक और व्यंग्य समाज का हिस्सा हैं लेकिन इस तरह की बातों को कुछ लोग उन संस्थाओं का मजाक उड़ाना मान सकते हैं, जिनका हम सम्मान करते हैं।

इसी तरह, भारत की विदेश नीति और ऊर्जा से जुड़े फैसलों पर भी ऐसे निष्कर्ष दिखाए गए जैसे सब कुछ असफल हो गया हो जबकि असल में मामला इतना सीधा नहीं था। उदाहरण के लिए, कई रिपोर्ट्स में दिखाया गया है कि भारत ने वैश्विक दबाव के बावजूद रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदा जो एक अलग तस्वीर पेश करता है।

कुछ पोस्ट में बिना पक्के सबूत के बड़े-बड़े कूटनीतिक दावे भी किए गए जिससे ऐसी कहानियाँ बनती हैं जो सुनने में सही लगती हैं लेकिन पूरी तरह साबित नहीं होतीं।

इसके अलावा, कुछ मामलों में बेहद भड़काऊ और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल भी किया गया। जैसे एक रिपोर्टिंग के दौरान नेशनल दस्तक के एक रिपोर्टर ने ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ आपत्तिजनक बातें कहीं कि ‘ब्राह्मण कलंक हैं, उन्हें जूतों से मारकर बाहर निकालो’। इस तरह की बातें दिखाती हैं कि सार्वजनिक चर्चा में भाषा का स्तर कितना नीचे जा सकता है और किसी खास समुदाय को निशाना बनाया जा सकता है।

ऐसे प्लेटफॉर्म अक्सर अभिव्यक्ति की आजादी की बात करते हैं लेकिन सवाल यह भी उठता है कि क्या वही आजादी उन समुदायों के लिए भी है जिनके खिलाफ इस तरह की बातें कही जाती हैं। जब इस तरह का कंटेंट बिना रोक-टोक फैलता है तो समाज में दूरी और तनाव बढ़ सकता है।

इन सभी उदाहरणों को मिलाकर देखें, तो एक पैटर्न सामने आता है जहाँ गंभीर आरोप सवाल के रूप में पेश किए जाते हैं, संवेदनशील संस्थाओं पर व्यंग्य का इस्तेमाल किया जाता है और जटिल मामलों को आसान और पक्के निष्कर्ष की तरह दिखाया जाता है। इसका असर यह होता है कि गलत जानकारी फैलती है और लोगों में डर या भ्रम का माहौल बन सकता है।

पाँचवाँ चरण: नैरेटिव को सच बनाकर दिखाना

एक और साफ पैटर्न यह है कि कुछ प्लेटफॉर्म, खासकर 4PM जैसे यूट्यूब चैनल, बार-बार राजनीतिक भविष्यवाणियाँ करते हैं। इनके वीडियो टाइटल, थंबनेल और कंटेंट में अक्सर यह दिखाया जाता है कि जल्द ही बड़ा राजनीतिक उलटफेर होने वाला है। इनके कंटेंट में डर पैदा करने वाला माहौल बनाया जाता है जैसे सरकार गिरने वाली है, कोई बड़ा बदलाव होने वाला है या नेतृत्व बदलने वाला है।

इन दावों को बहुत जल्दबाजी और बिल्कुल सच के रूप में दिखाया जाता है मानो यह कोई अंदर की खबर हो या अभी-अभी होने वाली घटना हो लेकिन समय के साथ देखें तो इनमें से कई बातें सच होती नहीं दिखतीं।

इससे एक पूरा सिस्टम बन जाता है कि पहले थंबनेल में चौंकाने वाली बात दिखाई जाती है, फिर बड़ा दावा किया जाता है, उसे जोर-शोर से फैलाया जाता है और कुछ समय बाद बिना पुराने दावे का हिसाब दिए एक नई भविष्यवाणी शुरू हो जाती है। इससे धीरे-धीरे लोगों को लगता है कि देश में हमेशा कुछ बड़ा गलत होने वाला है जबकि असल में ऐसा जरूरी नहीं होता।

यह समझना जरूरी है कि राजनीति पर राय देना या अनुमान लगाना गलत नहीं है लेकिन फर्क इस बात का है कि उसे कैसे दिखाया जाता है। जब बार-बार अंदाजों को ऐसे पेश किया जाए जैसे वे पक्का सच हों और बाद में उनकी कोई जिम्मेदारी न ली जाए तो इससे उनके काम करने के तरीके और भरोसे पर सवाल उठते हैं। असली समस्या एक गलत भविष्यवाणी नहीं बल्कि बार-बार अनुमानों को सच की तरह दिखाने की आदत है।

सामने आता छिपा हुआ पैटर्न

अलग-अलग देखें तो इन अकाउंट्स (जिन्हें भारत में रोका गया है) की हर बात को सिर्फ राय, एडिटोरियल फैसला या एक गलती माना जा सकता है। लेकिन जब सबको साथ में देखा जाता है तो एक साफ पैटर्न दिखता है। कभी गलत आर्थिक दावे, कभी पहचान को घुमा कर दिखाना, तो कभी वीडियो और तस्वीरों को अलग तरीके से पेश करना है कि इनमें कई चीजें बार-बार दोहराई जाती हैं। कई बार पूरी जानकारी नहीं दी जाती, दावे बिना पक्के सबूत के होते हैं और बातें हाल की सच्चाई से मेल नहीं खातीं।

यह ट्रेंड इस बात से और बढ़ता है कि कंटेंट को कैसे दिखाया और फैलाया जाता है। भड़काऊ हेडलाइन, भावनात्मक तस्वीरें और पक्के अंदाज़ में लिखी गई बातें ये सब मिलकर ऐसा असर देती हैं जैसे सब कुछ पूरी तरह सच हो जबकि असल में बात उतनी साफ नहीं होती।

समय के साथ, बार-बार ऐसी चीजें देखने से लोगों की सोच पर असर पड़ता है। जो बात पहले सिर्फ दावा या अंदाज़ा होती है, वही बार-बार दोहराने से सच जैसी लगने लगती है। एक मशहूर कहावत है कि ‘एक झूठ अगर बार-बार बोला जाए तो वह सच जैसा लगने लगता है’। इन प्लेटफॉर्म्स का पूरा नैरेटिव इसी तरह काम करता दिखता है।

शुरुआत में सरकार की आलोचना होती है जो धीरे-धीरे देश के खिलाफ सोच में बदलती दिखती है और वही उनके कंटेंट में भी नजर आता है। जैसे ऊपर लेयर 4 में देखा गया कि ‘नीमो यादव’ नाम के अकाउंट ने भारतीय सेना का मज़ाक उड़ाय जबकि सेना किसी भी राजनीतिक दल से ऊपर होती है। लेकिन ऐसे अकाउंट किसी सीमा पर जाकर रुकते नहीं हैं। इसलिए चिंता सिर्फ एक-दो पोस्ट की नहीं है बल्कि पूरे उस सिस्टम की है जहाँ कहानी बनाने और लोगों को जोड़ने पर ज्यादा ध्यान होता है जबकि सही जानकारी और पूरा संदर्भ पीछे छूट जाता है।

अभिव्यक्ति और जिम्मेदारी के बीच संतुलन

इन अकाउंट्स पर लगी पाबंदी की चर्चा अक्सर ‘अभिव्यक्ति की आजाादी बनाम सेंसरशिप’ के रूप में होती है लेकिन यह मामला इतना सीधा नहीं है। अभिव्यक्ति की आजादी किसी भी लोकतंत्र की बुनियाद है। सवाल उठाना, आलोचना करना और असहमति जताना बहुत जरूरी है। आज के डिजिटल दौर में जहाँ जानकारी बहुत तेजी से फैलती है, वहाँ नई चुनौतियाँ भी हैं जिससे खासकर तब, जब गलत या भ्रामक जानकारी बहुत बड़े स्तर पर फैल सकती है।

इसलिए असली सवाल विचारों को दबाने का नहीं है बल्कि यह देखने का है कि क्या बार-बार अधूरी जानकारी, बिना सबूत के दावे और पहले से तय कहानी के हिसाब से बनाया गया कंटेंट भरोसेमंद माना जा सकता है। दिल्ली हाईकोर्ट में दी गई जानकारी के अनुसार, सरकार की चिंता भ्रामक जानकारी, बदनाम करने वाले कंटेंट और कानून-व्यवस्था पर उसके असर को लेकर है।

वहीं, दूसरी तरफ प्लेटफॉर्म्स यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या कार्रवाई सही तरीके से और सही सीमा में की गई है। इससे साफ है कि यह मुद्दा आसान नहीं है। लेकिन एक बात साफ है कि जब कंटेंट बार-बार सही जानकारी से ज्यादा असर पैदा करने पर ध्यान देता है, तो उस पर सवाल उठना तय है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ा जा सकता है)

पहले थे ‘बंगाली गौरव’, अब बन गए ‘बाहरी’: लिएंडर पेस के पार्टी छोड़ते ही TMC के बदले सुर, क्या ‘युसूफ पठान’ पर भी पार्टी देगी ज्ञान?

पश्चिम बंगाल की राजनीति में ‘बाहरी और भीतरी’ का पुराना खेल एक बार फिर शुरू हो गया है, लेकिन इस बार दांव उल्टा पड़ता दिख रहा है। जैसे ही महान टेनिस खिलाड़ी और ओलंपिक मेडल विजेता लिएंडर पेस BJP में शामिल हुए, TMC ने उन्हें ‘बाहरी’ (बोहिरगातो) कहना शुरू कर दिया। सोमवार (30 मार्च 2026) को दिल्ली में बीजेपी का दामन थामने वाले पेस का TMC ने सोशल मीडिया पर खूब मजाक उड़ाया।

लेकिन इस हमले से खुद TMC की दोहरी सोच की पोल खुल गई है। जिस पेस को आज TMC ‘बाहरी‘ बता रही है, वे न केवल बंगाल की महान विरासत का हिस्सा हैं, बल्कि कुछ समय पहले तक TMC के खास ‘अपने’ भी थे। जब तक वे TMC में थे तब तक बंगाली और अपने थे, और अब BJP में जाते ही बाहरी और पराए हो गए।

जब TMC में थे तब ‘बंगाली बाबू’, अब भाजपा में ‘बाहरी’?

लिएंडर पेस राजनीति में कोई नए खिलाड़ी नहीं हैं। साल 2021 में खुद ममता बनर्जी ने उन्हें बड़े सम्मान के साथ TMC में शामिल किया था। उस वक्त TMC के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट से बड़े-बड़े ट्वीट करके उनका स्वागत किया गया और उन्हें ‘बंगाल का गौरव’ बताया गया था। यहाँ तक कि गोवा के चुनावों में TMC ने पेस को अपना सबसे बड़ा चेहरा बनाकर उनसे खूब प्रचार भी करवाया।

अब सोशल मीडिया पर लोग TMC के उन्हीं पुराने ट्वीट्स को निकालकर आज के ‘बाहरी’ वाले बयान से तुलना कर रहे हैं। लोग मजे लेते हुए पूछ रहे हैं कि क्या 2021 में लिएंडर पेस ‘पक्के बंगाली’ थे और 2026 में भाजपा चुनते ही अचानक ‘बाहरी’ हो गए? यह साफ दिखाता है कि टीएमसी इस वक्त कितनी घबराई हुई है और उनके पास पेस का कोई ठोस जवाब नहीं है।

यूसुफ पठान और शत्रुघ्न सिन्हा ‘भीतरी’ कैसे?

TMC का ‘बाहरी-बाहरी’ का राग तब पूरी तरह फेल हो जाता है, जब हम उनके अपने नेताओं की लिस्ट देखते हैं। सोशल मीडिया पर लोग पुराने और नए ट्वीट्स शेयर करके TMC से कड़े सवाल पूछ रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि जो पार्टी गुजरात के यूसुफ पठान, बिहार के शत्रुघ्न सिन्हा, कीर्ति आजाद और साकेत गोखले जैसे नेताओं को बाहर से लाकर बंगाल में चुनाव लड़ाती है, वो लिएंडर पेस को ‘बाहरी’ कैसे बोल सकती है?

यूसुफ पठान गुजरात के हैं और शत्रुघ्न सिन्हा बिहार के, उनका बंगाल के जन्म या संस्कृति से कोई पुराना रिश्ता नहीं है, फिर भी TMC उन्हें ‘अपना’ मानती है। यह साफ तौर पर पार्टी का दोहरा चेहरा है, वोट के लिए बाहर के लोग भी ‘अपने’ हो जाते हैं, लेकिन बंगाल की मिट्टी के बेटे ने जैसे ही भाजपा चुनी, उसे ‘पराया’ बना दिया गया। यह दोगलापन अब जनता को अच्छी तरह समझ आ गया है।

बंगाल की मिट्टी और साहित्य से पेस का अटूट नाता

लिएंडर पेस को ‘बाहरी’ कहना असल में बंगाल की संस्कृति और इतिहास का अपमान है। पेस बंगाल के सबसे महान कवियों में से एक, माइकल मधुसूदन दत्त के परिवार से ताल्लुक रखते हैं। लिएंडर पेस की माँ खुद बंगाल की ही रहने वाली थीं और पेस का जन्म भी कोलकाता में ही हुआ था।

अपनी जड़ों पर गर्व करते हुए पेस ने भाजपा मुख्यालय में साफ कहा, “मैं एक शानदार बंगाली विरासत में पैदा हुआ हूँ।” अब जिस इंसान की रगों में बंगाल के इतने बड़े साहित्यकार का खून दौड़ रहा हो, उसे TMC के कुछ लोग ‘बाहरी’ बता रहे हैं। यह दिखाता है कि TMC के पास अब कोई ठोस मुद्दा नहीं बचा है और वे बस राजनीति के लिए किसी का भी अपमान कर रहे हैं।

विकास बनाम विभाजन की राजनीति

लिएंडर पेस ने स्पष्ट किया है कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘खेलो इंडिया’ विजन और खेल शिक्षा के जरिए बंगाल के युवाओं को सशक्त बनाने आए हैं। जहाँ भाजपा पेस के जरिए बंगाल को मॉडर्न स्पोर्ट्स हब बनाने की बात कर रही है, वहीं TMC अभी भी ‘बाहरी-भीतरी’ के पुराने और खोखले मुद्दे में फँसी हुई है।

2026 के चुनाव से पहले पेस का BJP में आना एक बड़ा संदेश है कि अब बंगाल का युवा पहचान की संकुचित राजनीति के बजाय विकास और राष्ट्रीय गौरव को चुन रहा है। TMC का यह दोहरा चेहरा अब उनके लिए ही गले की हड्डी बन गया है।

डेडलाइन से पहले डेड हुआ नक्सलवाद: जानिए कैसे मोदी सरकार के ऑपरेशन्स ने ‘लाल आतंकियों’ पर किया प्रहार, बड़े-बड़े नक्सलियों को ढेर कर जन-जन तक पहुँचाई हर सुविधा

भारत अब नक्सल मुक्त हो गया है। देश के 12 राज्यों में फैला नक्सलवाद को खत्म करने का प्रण मोदी सरकार ने 2014 में लिया था। पिछले 12 साल में बेहतर रणनीति और नक्सलियों के खिलाफ एक के बाद एक ऑपरेशन ने नक्सलवाद को घुटने पर ला दिया। इस दौरान नक्सलियों को आत्मसमर्पण कर देश की मुख्य धारा में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया गया। कई कैडर सुरक्षाबलों के ऑपरेशन में मारे गए।

सीआरपीएफ, कोबरा, राज्यों की पुलिस, डीआरजी के जवान और स्थानीय जनजातीय लोगों की विकास के प्रति जागरुकता ने इस मिशन को अंजाम तक पहुँचाया।

‘सत्ता बंदूक की नली से निकलती है’, नक्सलियों की इस ध्रुव वाक्य ने भारत को करीब 55 सालों तक लहुलुहान कर रखा। 1970 के दशक में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गाँव से इसकी शुरुआत हुई थी। इसने एक साल के अंदर 3620 घटनाओं को अंजाम दिया।

यह वह दौर था जब वामपंथी अतिवादियों ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए जनजातीय समाज के भोले-भाले लोगों का इस्तेमाल किया। जिन हाथों में कलम होनी चाहिए थी, उन हाथों में बंदूकें और हथियार पकड़ा दिए। जिन किशोरों को किताबें देनी चाहिए थी, उन्हें उन्मादी इतिहास की भटकी कहानियों और भारत विरोधी दस्तावेज पकड़ा दिए, जिन आँखों में सुंदर भविष्य के सपने और साहस बोने थे, उनमें अपने ही लोगों के प्रति नफरत के काँटे बो दिए गए। दशकों तक इसकी वजह से हजारों जवान बलिदान हुए।

2014 से प्रधान मंत्री मोदी और गृह मंत्री शाह ने नक्सलवाद के खात्मे की रणनीति बनाई। नक्सल प्रभावित लोगों को उसके गर्त से निकाल कर देश की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए शिक्षा, रोजगार, विकास के संसाधनों से जोड़ना अहम था। दूरदराज के इलाकों में पुलिस चौकी बना कर, सड़कों से जोड़ कर जनजातीय लोगों को मुख्य धारा में जोड़ने के लिए निरंतर सार्थक संवाद किया गया।

गृह मंत्री खुद उन लोगों में विश्वास पैदा करने के लिए उनकी समस्या सुनने कई जगह पहुँचे और उनका समाधान निकाला। देश की सुरक्षा, सद्भावना और समन्वय की भावना को बनाए रखने में उनकी सहभागिता तय की।

नेपाल की सीमा से आंध्रप्रदेश तक नक्सलवाद फैला था

भारत की आतंरिक सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बन वामपंथी उग्रवाद का विस्तार नेपाल की सीमा से दक्षिण भारत के आंध्रप्रदेश तक अपनी जड़ें जमाए हुए था। छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, बिहार में इनकी गतिविधियाँ भारतीय जनमानस को आहत कर रही थीं।

गृह मंत्रालय के आँकड़े के अनुसार, 2004 से 2014 के बीच नक्सली हिंसा की 16,463 घटनाएँ दर्ज की गईं। इस दौरान नक्सल हमलों में 1851 सुरक्षाकर्मियों ने बलिदानी दी, जबकि 4766 आम लोगों की भी जानें गई। 2013 में 126 जिले नक्सलवाद से प्रभावित थे, इनमें 35 सबसे ज्यादा प्रभावित जिला था। लेकिन 2026 तक आते आते इनका खात्मा करीब-करीब हो चुका है।

गृहमंत्री शाह ने संसद में ऐलान किया है कि मात्र एक नक्सली कमांडर मिशिर बेसरा बच गया है, जिससे बातचीत चल रही है। वह करीब 55 साथियों के साथ झारखंड के सारंडा की जंगलों में छिपा हुआ है।

साल 2025 में अब तक 317 नक्सलियों को मार गिराया गया है, 862 को गिरफ्तार किया गया है और 1,973 ने आत्मसमर्पण किया है।अकेले 2024 में 290 नक्सलियों को मार गिराया गया, 1,090 को गिरफ्तार किया गया और 881 ने आत्मसमर्पण किया। कुल 28 शीर्ष नक्सली नेताओं को मार गिराया गया है, जिनमें 2024 में 1 केंद्रीय समिति सदस्य और 2025 में 5 केंद्रीय समिति सदस्य शामिल हैं। प्रमुख सफलताओं में ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट में 27 कट्टर नक्सलियों का मारा जाना, 23 मई 2025 को बीजापुर में 24 का आत्मसमर्पण और अक्टूबर 2025 में छत्तीसगढ़ (197) और महाराष्ट्र (61) में 258 का आत्मसमर्पण शामिल है, जिनमें आत्मसमर्पण करने वालों में 10 वरिष्ठ नक्सली शामिल हैं।

नक्सलियों के गिरफ्त में आई थी इंदिरा गाँधी

गृह मंत्री अमित शाह ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी पर आरोप लगाया कि 1970 से लेकर 1977 तक वह माओवादी विचारधारा की गिरफ्त में आ गई थीं।उन्होंने इसे पाला-पोसा। इसका परिणाम यह हुआ कि नक्सलवाद तेजी से बढ़ा और 12 राज्यों तक फैल गया। दरअसल कॉन्ग्रेस राज में इन इलाकों में कोई विकास कार्य नहीं हुआ। जनजातीय लोगों को अनपढ़ रखने की साजिश रची गई।

देश में आजादी के बाद करीब 60 सालों तक कॉन्ग्रेस सत्ता में थी, लेकिन इन इलाकों में न तो सड़कें पहुँची और न ही विकास हुआ। यहाँ तक कि पुलिस इन इलाकों में जाने से डरती थी, क्योंकि यहाँ जाने का मतलब मौत के मुँह में समाने जैसा था। नतीजा ये था कि नक्सली जनजातीय युवाओं को सरकारी तंत्र के खिलाफ भड़का कर देश विरोधी गतिविधियों में संलिप्त करते रहे। इन इलाकों में कानून का राज नहीं था, नक्सली जो बोलते थे वही कानून था। इस दौरान करीब 20 हजार लोग मारे गए।

2014 के बाद बदल गई रणनीति

2000 के दशक में नक्सलवाद अपने चरण पर था। 2004 में आंध्र प्रदेश के सीएम वाईएसआर ने नक्सलियों से शांति समझौते की कोशिश की, लेकिन विश्वास की कमी की वजह से ये नहीं चला और नक्सली हिंसा ने जोर पकड़ा। 2010 में दंतेवाड़ा वाली घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। इसमें सीआरपीएफ के 76 जवान बलिदान हुए थे। तत्कालीन मनमोहन सरकार ने कार्रवाई की बात भी कही, लेकिन ढिलमुल रवैये की वजह से कोई सार्थक पहल नहीं की जा सकी। नक्सलियों ने 2013 में मध्यप्रदेश कॉन्ग्रेस के बड़े बड़े नेताओं को एक साथ बस्तर जिले की झीरम घाटी में मौत के घाट उतार दिया। इसमें कॉन्ग्रेस के तत्कालीन प्रदेशाध्यक्ष नंद कुमार पटेल, पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा और पूर्व केंद्रीय मंत्री- विद्याचरण शुक्ल भी शामिल थे।

2014 में केन्द्र में आई मोदी सरकार ने एक एकीकृत और सार्थक रणनीति बनाई। पहले जंगलों में बड़े पैमाने पर तलाशी ली जाती थी, जिससे नक्सलियों के लिए सुरक्षाबलों पर हमला करना आसान होता था, लेकिन अब खुफिया जानकारी के आधार पर सटीक स्ट्राइक किया जाने लगा। इसमें ड्रोन और सैटेलाइट मैपिंग जैसे आधुनिक तकनीक की मदद ली गई।

स्थानीय पुलिस और अर्धसैनिक बलों को स्पेशल बटालियन बना कर बेहतरीन तालमेल के साथ ऑपरेशन को अंजाम दिया जाने लगा। इसकी निगरानी सीधे गृह मंत्रालय कर रही थी।

राज्यों को वित्तीय सहायता दी गई

केन्द्र सरकार ने राज्यों को वित्तीय सहायता दी, ताकि खुफिया तंत्र को मजबूत कर नक्सलियों पर लगाम लगाया जा सके। सरकार ने 2022 में स्पेशल इंफ्रास्ट्रक्चर स्कीम के तहत स्पेशल फोर्सेज और स्पेशल इंटेलिजेंस ब्रांच को भी मजबूत किया। पिछले 10 सालों में राज्य पुलिस के लिए नक्सल प्रभावित इलाकों में 586 किलेबंद पुलिस स्टेशन बनाए, जिससे पुलिस की पकड़ मजबूत हुई।

एनआईए ने नक्सलवाद विरोधी एक अलग विंग बनाया। ईडी और राज्य की एजेंसियों ने मिलकर नक्सलियों की करीब 92 करोड़ की संपत्तियाँ जब्त की। लोगों तक पहुँच बनाने के लिए 12000 किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया। इंटरनेट और मोबाइल कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए टावर लगे, ताकि लोगों तक देश दुनिया की जानकारी पहुँच सके। पुलिस तैनात किए गए और चौकियाँ बनाई गई।

आत्मसमर्पण कर मुख्य धारा में शामिल होने का मौका

नक्सली कैडरों और ईनामी नक्सलियों को देश की मुख्य धारा में शामिल करने की पूरी कोशिश की गई। उन्हें हथियार डालने पर 5 लाख रुपए, निचले कैडरों को ढाई लाख रुपए दिए गए। व्यावसायिक परीक्षण के लिए पैसे दिए गए और जमीनें दी गई ताकि ये लोग बस जाए, यानी जीवन को व्यवस्थित करने की पूरी व्यवस्था सरकार ने की। इसका असर जमीन पर दिखाई दिया।

केंद्र सरकार ने नक्सल प्रभावित 48 जिलों में कौशल विकास पहल शुरू की है, जिसके तहत 495 करोड़ रुपए के निवेश से 48 आईटीआई केन्द्र खोले गए।  नक्सल प्रभावित जिलों में 1,804 बैंक शाखाएं, 1,321 एटीएम और 37,850 बैंकिंग संवाददाता स्थापित किए गए।

बड़े-बड़े नक्सली नेता मारे गए

सुरक्षा बलों के सफल ऑपरेशन में बड़े बड़े नक्सली मारे गए। इसका परिणाम यह हुआ कि नक्सलवाद नेताविहीन हो गया। युवाओं को आकर्षित करने की क्षमता विचारधारा में नहीं रही। 2025 में नक्सलियों के एक से बढ़कर एक नेता सुरक्षाबलों के हाथों मारे गए।

सबसे बड़े नेता नम्बाला केशव राव उर्फ बसवराजू छत्तीसगढ़ में मारा गया। संगठन का एकमात्र जनजातीय नक्सली नेता माडवी हिडमा भी नवंबर 2025 में मारा गया। उसने बड़े- बड़े नक्सली घटनाओं को अंजाम दिया था। प्रताप रेड्डी उर्फ चलपति को जनवरी 2025 में छत्तीसगढ़- ओडिशा सीमा पर मार गिराया गया था। इसके अलावा कट्टा रामचंद्र रेड्डी, कदारी सत्यनारायण रेड्डी, गजरला रवि, सहदेव सोरेन, बालकृष्ण, नरसिम्हा और चेलम जैसे केंद्रीय समिति के कई अन्य सदस्य भी हाल के अभियानों में मारे गए हैं।

फरवरी 2026 में हुए एक अन्य एनकाउंटर में प्रभाकर राव, पारकल वीर, स्वामी, पडकाला स्वामी और लोकेटी चंदर राव समेत सात नक्सली नेताओं को मार गिराया गया। पिछले एक साल में 28 नक्सली नेताओं को सुरक्षा बलों ने ढेर कर दिया, जिससे नक्सली आंदोलन दिशाविहीन हुई और इसका अंत हो पाया।

हॉर्मुज के बाद ‘बाब अल-मंदेब स्ट्रेट’ पर संकट: जानें- ऊर्जा और व्यापार के लिए कितना जरूरी है ‘आँसुओं का दरवाजा’ और इसे बंद करना क्यों है मुश्किल?

मिडिल ईस्ट में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चल रही जंग अब केवल मिसाइलों और हवाई हमलों तक सीमित नहीं रहा है। इस युद्ध का असर वैश्विक राजनीति के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर व्यापार, ऊर्जा और समुद्री मार्गों पर भी पड़ रहा है। इस संघर्ष ने दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्ते ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ को लगभग बंद कर दिया है।

ईरान ने जहाँ हॉर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते को बंद कर दिया तो वहीं अब यमन के हूतियों के इस युद्ध में कूदने के चलते अब एक और महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग ‘बाब अल-मंदेब स्ट्रेट’ के बंद होने का खतरा भी मंडरा रहा है। हूतियों ने यहाँ से गुजरने वाले जहाजों पर मिसाइल मारने की चेतावनी दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यहाँ स्थिति बिगड़ती है तो यह वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक और बड़े झटके की ओर धकेल सकता है।

बाब अल-मंदेब: इतिहास से लेकर भूगोल और रणनीतिक महत्व तक

बाब अल-मंदेब स्ट्रेट देखने में छोटा सा समुद्री रास्ता लगता है लेकिन रणनीतिक रूप से इसकी अहमियत बड़ी है। यह एशिया और अफ्रीका के बीच पड़ता है और यमन को जिबूती और इरिट्रिया से अलग करता है। यह रास्ता लाल सागर को अदन की खाड़ी और फिर हिंद महासागर से जोड़ता है। इसलिए यह यूरोप और एशिया के बीच सामान लाने-ले जाने का एक बहुत जरूरी रास्ता है।

यह समुद्री रास्ता लगभग 100 किलोमीटर लंबा है और सबसे संकरी जगह पर करीब 30 किलोमीटर चौड़ा रह जाता है। इसी वजह से यह दुनिया के व्यापार के लिए बहुत संवेदनशील जगह माना जाती है क्योंकि यहाँ अगर कोई दिक्कत हो जाए तो बड़े-बड़े जहाजों की आवाजाही रुक सकती है। इसके बीच में पेरिम नाम का एक द्वीप है जो इसे दो हिस्सों में बाँटता है। एक हिस्सा गहरा और चौड़ा है जहाँ से बड़े अंतरराष्ट्रीय जहाज गुजरते हैं जबकि दूसरा हिस्सा उथला है जिसका इस्तेमाल ज्यादातर स्थानीय नावें करती हैं।

इसका नाम ही ‘आँसुओं का दरवाजा’ भी है और यह नाम यूँ ही नहीं पड़ा है। इसके पीछे पुरानी कहानियाँ और खतरनाक समुद्री हालात जुड़े हुए हैं। पहले के समय में यहाँ कई जहाज हादसों का शिकार हो चुके हैं। एक कहानी यह भी कही जाती है कि बहुत पहले एक भूकंप आया था जिससे एशिया और अफ्रीका अलग हो गए और यह समुद्री रास्ता बन गया।

स्वेज नहर के बाद बढ़ी अहमियत

1869 में स्वेज नहर खुलने के बाद बाब अल-मंदेब की अहमियत बहुत ज्यादा बढ़ गई। पहले जहाजों को यूरोप से एशिया जाने के लिए पूरे अफ्रीका का लंबा चक्कर लगाना पड़ता था लेकिन स्वेज नहर बनने के बाद एक छोटा और सीधा रास्ता मिल गया। इस रास्ते में बाब अल-मंदेब भी आता है और यह इसलिए बहुत जरूरी बन गया।

आज यह समुद्री रास्ता दुनिया के सबसे अहम रास्तों में से एक है। इसी के जरिए कई देशों के बीच सामान आता-जाता है। यहाँ से गुजरने वाले जहाज सिर्फ माल ही नहीं ले जाते बल्कि दुनिया की अर्थव्यवस्था को चलाने में भी बड़ी भूमिका निभाते हैं।

वैश्विक तेल सप्लाई और बाब अल-मंदेब

तेल और ऊर्जा के मामले में बाब अल-मंदेब बहुत ही अहम रास्ता है। 2023 में हर दिन करीब 9.3 मिलियन बैरल तेल और पेट्रोलियम सामान इसी रास्ते से गुजरता था। यह दुनिया के समुद्री रास्तों से होने वाले कुल तेल व्यापार का करीब 12 प्रतिशत है। इससे समझ सकते हो कि यह सिर्फ एक इलाके के लिए नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए कितना जरूरी है।

2024 में हालात अचानक बदल गए। यमन के हूती विद्रोहियों ने यहाँ से गुजरने वाले जहाजों पर हमले शुरू कर दिए। इसके बाद इस रास्ते से गुजरने वाला तेल घटकर लगभग 4.1 मिलियन बैरल प्रति दिन रह गया यानी पहले के मुकाबले लगभग आधा हो गया। इसका असर सिर्फ तेल तक सीमित नहीं रहा बल्कि दुनिया भर में सप्लाई, कीमतों और व्यापार पर भी पड़ा।

इसका असर स्वेज नहर और उससे जुड़ी पाइपलाइन पर भी देखने को मिला और यहाँ तेल का आना-जाना काफी कम हो गया। इससे साफ है कि अगर बाब अल-मंदेब में थोड़ी भी गड़बड़ी होती है तो उसका असर पूरी दुनिया पर पड़ता है।

हॉर्मुज और बाब अल-मंदेब: दोहरे संकट का खतरा

अभी हालात इसलिए ज्यादा गंभीर माने जा रहे हैं क्योंकि परेशानी सिर्फ एक समुद्री रास्ते तक सीमित नहीं है। एक तरफ हॉर्मुज जलडमरूमध्य में पहले से ही तनाव है इस रास्ते से दुनिया का करीब 20 से 25 प्रतिशत तेल गुजरता है। अब बाब अल-मंदेब पर भी खतरा बढ़ता जा रहा है।

अगर ये दोनों रास्ते एक साथ प्रभावित होते हैं तो दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का करीब 30 से 35 प्रतिशत हिस्सा खतरे में आ सकता है। इसका सीधा असर तेल की कीमतों पर पड़ेगा और कई देशों की अर्थव्यवस्था हिल सकती है।

बाब अल-मंदेब में गड़बड़ी का असर शिपिंग पर भी साफ दिखेगा जब जहाज इस रास्ते से नहीं जा पाते तो उन्हें अफ्रीका के चारों ओर लंबा रास्ता लेना पड़ता है। इससे यात्रा का समय 27 दिनों से बढ़कर 40 से 50 दिन तक हो जाता है। जाहिर है कि इससे ईंधन ज्यादा लगता है और खर्च भी बढ़ जाता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस वजह से हर बैरल तेल को ले जाने में करीब 2 डॉलर ज्यादा खर्च आ रहा है। इसके अलावा बड़े तेल टैंकरों का किराया भी बहुत बढ़ गया है जो कुछ मामलों में 7 लाख डॉलर प्रति दिन तक पहुँच चुका है।

भारत पर पड़ सकता है क्या असर?

भारत के लिए यह स्थिति पूरी तरह खराब नहीं है लेकिन चिंता की बात जरूर है। ऐसा इसलिए क्योंकि भारत के तेल आयात का बड़ा हिस्सा बाब अल-मंदेब के रास्ते नहीं आता जिससे इसका सीधा असर थोड़ा कम पड़ता है। हालाँकि, दूसरी तरफ होर्मुज जलडमरूमध्य में पहले से तनाव चल रहा है और इसका असर साफ तौर पर भारत पर भी पड़ रहा है।

सरकार ने पहले ही किसी भी खतरे की स्थिति को सँभालने के लिए तेल खरीदने के स्रोत बढ़ा दिए हैं और रूस से भी आयात में तेजी आने की संभावना है। इससे फिलहाल स्थिति काबू में है लेकिन अगर लंबे समय तक तनाव बना रहा तो असर दिख सकता है। खासकर तब जब तेल और गैस को लाने-ले जाने की लागत बढ़ जाती है।

एक और बड़ी बात यह है कि बाब अल-मंदेब से सिर्फ तेल ही नहीं बल्कि बहुत सारा और सामान भी आता-जाता है। दुनिया के 15 से 20 प्रतिशत कंटेनर इसी रास्ते से गुजरते हैं जिनमें मशीनरी, खाने-पीने का सामान और दूसरी जरूरी चीजें शामिल होती हैं। अगर यह रास्ता प्रभावित होता है तो सामान देर से पहुँचेगा, खर्च बढ़ेगा और इसका असर आम लोगों पर महँगाई के रूप में दिख सकता है।

क्यों मुश्किल है बाब अल-मंदेब को बंद करना?

बाब अल-मंदेब को पूरी तरह बंद करना व्यावहारिक रूप से बेहद कठिन है और इसके पीछे कई भू-राजनीतिक, सैन्य और भौगोलिक कारण एक साथ काम करते हैं। सबसे पहले इसकी संरचना को समझना जरूरी है कि यह कोई संकरा ‘चोक पॉइंट’ नहीं है जहाँ एक-दो जहाज डुबोकर रास्ता रोका जा सके बल्कि लगभग 30 किलोमीटर चौड़ा एक खुला समुद्री मार्ग है जिसमें अलग-अलग चैनल और रास्ते मौजूद हैं, जिससे बड़े-बड़े तेल टैंकर और कंटेनर जहाज कई दिशाओं से गुजर सकते हैं।

इसी वजह से यहाँ ‘डेड-एंड ब्लॉकेज’ बनाना लगभग असंभव हो जाता है जबकि ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ जैसे स्थानों पर अपेक्षाकृत संकरी निकासी होने के कारण नियंत्रण करना सैद्धांतिक रूप से आसान माना जाता है।

दूसरा बड़ा कारण इस क्षेत्र की भारी अंतरराष्ट्रीय सैन्य मौजूदगी है। अफ्रीका के तट पर स्थित जिबूती भले ही छोटा देश है लेकिन यहाँ अमेरिका, फ्रांस, चीन और अन्य देशों के सैन्य अड्डे मौजूद हैं जो इस समुद्री मार्ग को सुरक्षित रखने के लिए हर समय निगरानी और त्वरित कार्रवाई की क्षमता रखते हैं। ऐसे में कोई भी देश या संगठन अगर इसे बलपूर्वक बंद करने की कोशिश करता है, तो वह सीधे वैश्विक सैन्य टकराव को न्योता देगा।

तीसरा पहलू हूती जैसे विद्रोही हैं जो मिसाइल, ड्रोन या समुद्री हमलों के जरिए जहाजों को निशाना बनाकर डर और अनिश्चितता जरूर पैदा कर सकते हैं लेकिन वे भी इस स्ट्रेट को भौतिक रूप से सील नहीं कर सकते क्योंकि इसके लिए लगातार और व्यापक सैन्य नियंत्रण चाहिए होता है जो उनके बस की बात नहीं है।

32 साल पहले कजाकिस्तान में जो क्लिंटन ने किया, क्या ईरान में वही दोहरा पाएँगे ट्रंप?: जानें- ईरान से 450 किलो यूरेनियम छीनना कितना मुश्किल

मिडिल ईस्ट के अखाड़े में एक बार फिर जबरदस्त ‘कुश्ती’ शुरू होने वाली है और इस बार दाँव पर है परमाणु बम का मसाला। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इशारा दे दिया है कि वो ईरान के खजाने से उसका ‘यूरेनियम’ (Enriched Uranium) उड़ाने के लिए एक खतरनाक ‘ग्राउंड ऑपरेशन’ यानी जमीनी धावा बोल सकते हैं। यह कोई छोटा-मोटा मिशन नहीं है, बल्कि इसे दुनिया का सबसे टेढ़ा और जोखिम भरा ऑपरेशन कहा जा रहा है।

अमेरिका का टारगेट है ईरान के पास मौजूद वो 450 किलो यूरेनियम, जिससे चुटकियों में 10 से 11 परमाणु बम तैयार किए जा सकते हैं। आसान भाषा में कहें तो ट्रंप अब ‘मिशन इम्पॉसिबल’ वाले अंदाज में ईरान के घर में घुसकर उसका सबसे खतरनाक सामान जब्त करने के मूड में हैं।

ट्रंप की रणनीति: ‘ऑयल’ और ‘यूरेनियम’ पर कब्जा

सीधे शब्दों में कहें तो ट्रंप अब ‘पहले तेल, फिर खेल’ वाली नीति पर उतर आए हैं। उनका सीधा हिसाब है ‘या तो ईरान शांति से मेज पर आकर बात मान ले, वरना अमेरिका उसके कमाई के सबसे बड़े अड्डे, यानी ‘खार्ग आइलैंड‘ के तेल पर ही कब्जा कर लेगा’। ट्रंप की नजर सिर्फ तेल पर नहीं, बल्कि ईरान की परमाणु ‘तिजोरी’ पर भी है। इसके लिए पेंटागन ने एक ऐसा प्लान तैयार किया है जिसे सुनकर किसी भी फिल्म की स्क्रिप्ट फीकी पड़ जाए। उनके स्पेशल कमांडो सीधे ईरान की सीमा फाँदकर वहाँ रखा परमाणु बारूद (यूरेनियम) उठा लाने की तैयारी में हैं।

जानकारों का मानना है कि ट्रंप फिलहाल अपनी सेना दिखाकर ईरान को डरा रहे हैं ताकि वह घुटने टेक दे। लेकिन अगर ईरान ने प्यार की भाषा नहीं समझी और अपना यूरेनियम नहीं सौंपा, तो अमेरिका ‘छीना-झपटी’ यानी जबरदस्ती कब्जा करने से भी पीछे नहीं हटेगा। इसके लिए खाड़ी के इलाके में अमेरिकी फौजियों का मेला लग गया है। 50,000 जवान पहले से तैनात हैं और खबर है कि 17,000 और ‘मैदानी लड़ाके’ वहाँ लैंड करने वाले हैं। यानी माहौल पूरी तरह गरम है।

पेंटागन की तैयारी: समंदर से आसमान तक घेराबंदी

अब जरा मंजर सोचिए, समंदर के रास्ते लोहे के बड़े-बड़े पहाड़ तैरते हुए ईरान की तरफ बढ़ रहे हैं। अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने पक्का कर दिया है कि USS Tripoli जैसा दैत्यनुमा युद्धपोत मिडिल ईस्ट के पानी में लंगर डाल चुका है। ये कोई मामूली जहाज नहीं है, बल्कि चलता-फिरता फौजी अड्डा है। इसके पीछे-पीछे यूएसएस बॉक्सर, यूएसएस कॉम्स्टॉक और यूएसएस पोर्टलैंड (USS Boxer, USS Comstock, USS Portland) जैसे खूंखार युद्धपोतों की पूरी फौज भी रास्ते में है।

इन जहाजों के पेट में हजारों की संख्या में ‘मरीन कमांडो’, आसमान चीरने वाले ‘फाइटर जेट’ और ऐसी मशीनें भरी हैं जो पलक झपकते ही ईरान के द्वीपों या परमाणु ठिकानों पर ‘आसमानी धावा’ बोल सकती हैं। खास बात ये है कि इन्हें हमला करने के लिए किसी जमीन या बेस की जरूरत नहीं, ये समंदर से ही सीधा ‘एक्शन’ शुरू कर सकते हैं।

जानकारों की मानें तो अमेरिका का इरादा कोई सालों साल चलने वाली महाभारत छेड़ने का नहीं है। उनका गेम प्लान एकदम ‘फटाफट’ वाला है। यानी ‘आओ, मारो और सामान लेकर निकलो’। इसे आप एक बड़े लेवल की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ समझ सकते हैं। इस काम के लिए अमेरिका ने अपनी सबसे घातक ‘82nd एयरबोर्न डिवीजन‘ के 4,000 जांबाज जवानों को ‘रैपिड एंट्री फोर्स’ के तौर पर बिल्कुल रेडी रखा है।

इनका काम होगा बिजली की फुर्ती से दुश्मन के इलाके में घुसना। पुराने नौसेना दिग्गजों का कहना है कि ईरान के टापुओं पर कब्जा करना तो मुमकिन है, लेकिन असली सिरदर्दी ये है कि इस ‘लूट’ को कितनी जल्दी अंजाम दिया जाए। क्योंकि जब तक ये हंगामा चलेगा, दुनिया का सबसे बिजी समुद्री रास्ता ‘होर्मुज’ बंद रहेगा, जिससे पूरी दुनिया के व्यापार का भट्ठा बैठ सकता है। इसलिए अमेरिका की कोशिश है कि काम भी हो जाए और देर भी न लगे।

ईरान का अभेद्य किला: इस्फहान और नतांज की सुरंगें

अब जरा सोचिए, ईरान का यह ‘परमाणु खजाना’ कोई ऐसी वैसी तिजोरी नहीं है जिसे मास्टर-की से खोल लिया जाए। यह तो समझ लीजिए कि पाताल लोक में छिपा कोई खजाना है। दुनिया की नजर रखने वाली संस्था (IAEA) कहती है कि ईरान ने अपना सारा यूरेनियम इस्फहान और नतांज जैसी जगहों पर जमीन के नीचे गहरी सुरंगों और बंकरों में ठूँस रखा है।

इन बंकरों के ऊपर कंक्रीट की इतनी मोटी परतें हैं कि बम भी शरमा जाएँ। अमेरिकी कमांडोज के लिए चुनौती सिर्फ अंदर घुसना नहीं है, बल्कि वहाँ बिछी बिछी ‘मौत की सुरंगों’ (लैंडमाइन्स) और जान देने को तैयार बैठे ईरानी सैनिकों के जबरदस्त घेरे को तोड़ना है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे किसी जलते हुए ज्वालामुखी के अंदर घुसकर हीरा निकालना हो!

ऊपर से मुसीबत ये कि यह यूरेनियम कोई छोटी-मोटी पुड़िया नहीं है। वॉल स्ट्रीट जर्नल की मानें तो यह बारूद 40 से 50 भारी-भरकम सिलेंडरों में भरा है, जो देखने में बिल्कुल गोताखोरों के ‘स्कूबा टैंक’ जैसे लगते हैं। अब इन भारी और रेडियोएक्टिव सिलेंडरों को कंधे पर लादकर तो भागा नहीं जा सकता। इन्हें सुरक्षित निकालने के लिए खास किस्म के ट्रकों का काफिला और एक पूरा तामझाम (लॉजिस्टिक सिस्टम) चाहिए होगा।

सबसे बड़ा सिरदर्द तो ये है कि इन सिलेंडरों को ईरान से बाहर ले जाने के लिए एक पूरे हवाई अड्डे पर कब्जा करना पड़ेगा, जिसमें घंटों नहीं बल्कि कई दिन लग सकते हैं। अब आप ही सोचिए, दुश्मन के घर में बैठकर आराम से ट्रक लोड करना और विमान का इंतजार करना किसी ‘सुसाइड मिशन’ से कम नहीं है। जरा सी चूक हुई नहीं कि पूरा मिशन धुआँ-धुआँ हो सकता है।

32 साल पहले का ‘प्रोजेक्ट सफायर’: जब कजाकिस्तान से निकला था यूरेनियम

ट्रंप के इस ‘सुपरमैन’ वाले प्लान के पीछे असल में 32 साल पुरानी एक फिल्मी कहानी छिपी है, जिसका नाम था ‘प्रोजेक्ट सफायर‘। बात 1994 की है, जब सोवियत संघ (रूस) ताश के पत्तों की तरह बिखर गया था। उस अफरा-तफरी में कजाकिस्तान के एक पुराने, कबाड़ जैसे गोदाम में 600 किलो हाई-क्वालिटी यूरेनियम लावारिस पड़ा मिला। यह कोई मामूली कूड़ा नहीं था, बल्कि इससे 20 परमाणु बम बन सकते थे। डर यह था कि अगर यह किसी आतंकी या स्मगलर के हाथ लग गया, तो दुनिया का नक्शा ही बदल जाएगा।

तभी मैदान में आए तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन। उन्होंने चुपके से एक जासूसी फिल्म जैसा मिशन शुरू किया। 31 लोगों की एक ‘स्पेशल टीम’ बनाई गई, जिसमें फौजी नहीं बल्कि चश्मा लगाने वाले वैज्ञानिक और टेक्नीशियन शामिल थे। ये लोग तीन भीमकाय C-5 Galaxy विमानों में बैठकर कजाकिस्तान के बर्फीले इलाके में उतरे। वहाँ का नजारा ऐसा था कि हड्डियाँ गला देने वाली ठंड, चारों तरफ बर्फ की मोटी चादर और ऊपर से जानलेवा रेडिएशन का खतरा।

इस टीम ने पूरे 4 हफ्तों तक चूहे की तरह छुप-छुपकर काम किया। दिन-रात एक करके उन्होंने उस ‘परमाणु बारूद’ को खास डिब्बों में पैक किया और दुनिया की नजरों से बचाकर अमेरिका के टेनेसी सुरक्षित पहुँचा दिया। जब सारा माल ठिकाने लग गया, तब कहीं जाकर 23 नवंबर 1994 को क्लिंटन ने दुनिया को बताया कि ‘भैया, हमने दुनिया को एक बड़ी तबाही से बचा लिया है।’ आज ट्रंप भी ठीक वैसी ही ‘लूट’ ईरान में करना चाहते हैं, बस फर्क ये है कि वहाँ कोई स्वागत करने के लिए खड़ा नहीं है।

कजाकिस्तान और ईरान: जमीन-आसमान का अंतर

ट्रंप 32 साल पुराने ‘प्रोजेक्ट सफायर’ वाली कामयाबी फिर से दोहराना तो चाहते हैं, लेकिन भाई साहब। कजाकिस्तान और ईरान की कहानी में जमीन-आसमान नहीं, बल्कि पाताल का अंतर है। इसे ऐसे समझिए कि एक तरफ किसी दोस्त के घर जाकर शांति से सामान पैक करना था, और दूसरी तरफ किसी गुस्सैल पहलवान के घर में सेंधमारी करनी है।

सबसे बड़ा पंगा तो ‘दोस्ती और दुश्मनी’ का है। कजाकिस्तान में तो वहाँ की सरकार ने खुद रेड कार्पेट बिछाकर अमेरिकियों को बुलाया था ‘आओ भाई, ये खतरनाक कूड़ा ले जाओ।’ वहाँ कोई गोली चलने का डर नहीं था। लेकिन ईरान? वहाँ तो पहले से ही बम-गोले बरस रहे हैं। यहाँ मिशन का मतलब है ‘हर मोड़ पर गोलियाँ, सिर के ऊपर मंडराती मिसाइलें और चारों तरफ बिछी बारूदी सुरंगे’। ये कोई ‘पिकनिक’ नहीं, बल्कि खूंखार ‘कॉम्बैट ऑपरेशन’ होगा, जहाँ पल-पल पर जान का खतरा है।

ऊपर से ईरान कोई कच्चा खिलाड़ी नहीं है। उसके पास खतरनाक ड्रोन्स, सटीक मिसाइलें और जान देने को तैयार बैठी एक ट्रेंड फौज है। अगर अमेरिका ने ईरान के ‘परमाणु खजाने’ को हाथ भी लगाया, तो तेहरान अपनी मिसाइलों की ऐसी बौछार करेगा कि पूरे मिडिल ईस्ट में आसमान काला पड़ जाएगा। कजाकिस्तान में तो बस ठंड और बर्फ से बचना था, लेकिन ईरान में तो ‘रेडियोएक्टिव’ सिलेंडरों को मलबे और आग के बीच से निकालना होगा। टूटी हुई न्यूक्लियर साइट्स से गैस से भरे टैंकों को ढोना किसी ‘सुसाइड मिशन’ से कम नहीं है। जरा सी गैस लीक हुई या किसी ने माचिस दिखाई, तो लेने के देने पड़ जाएँगे।

ट्रंप का ‘परमाणु जुआ’: जीत मिली तो इतिहास, चूके तो महाविनाश

ईरान से यूरेनियम झपट लेने का यह प्लान सिर्फ फौजियों की बहादुरी का टेस्ट नहीं है, बल्कि ट्रंप के लिए एक बहुत बड़ा ‘सियासी जुआ’ भी है। एक तरफ तो ट्रंप ने सीना ठोककर अपने देश के लोगों से वादा किया है कि वो अमेरिका को मिडिल ईस्ट की किसी भी ‘खूनी जंग’ के दलदल में नहीं फँसाएँगे। लेकिन दूसरी तरफ, ईरान की धरती पर अपने सैनिकों को उतारना सीधा-सीधा उसी दलदल में छलाँग लगाने जैसा है। अब मुसीबत ये है कि बिना जमीन पर पैर रखे यूरेनियम हाथ लगेगा नहीं और पैर रखा तो वादे का क्या होगा? यह तो वही बात हो गई कि ‘सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे’, जो कि इस मामले में लगभग नामुमकिन है।

जरा सोचिए, अगर यह मिशन कामयाब हो गया, तो यह दुनिया के इतिहास का सबसे तगड़ा और जांबाज सैन्य कारनामा माना जाएगा, बिल्कुल किसी ब्लॉकबस्टर फिल्म की तरह। लेकिन अगर कहीं भी एक छोटी सी चूक हो गई, तो अंजाम बहुत डरावना होगा। न केवल भारी संख्या में अमेरिकी जवानों की जान जाएगी, बल्कि पूरा का पूरा इलाका एक ऐसे परमाणु बारूद के ढेर पर बैठ जाएगा जहाँ से वापस लौटने का कोई रास्ता नहीं होगा।

सबसे बड़ा पंगा तो ‘दोस्त और दुश्मन’ का है। 32 साल पहले कजाकिस्तान में अमेरिका को एक मुस्कुराता हुआ ‘दोस्त’ मिला था, जिसने खुद अपनी तिजोरी की चाबियाँ थमा दी थीं। मगर यहाँ ईरान में उसका सामना एक ऐसे ‘जहरीले दुश्मन’ से है जो अपने परमाणु गौरव को बचाने के लिए आखिरी साँस तक लड़ने का दम रखता है। ऐसे में ट्रंप के लिए 1994 वाला इतिहास दोहराना, साल 2026 की कड़वी हकीकत में किसी ‘मिशन इम्पॉसिबल’ से कम नहीं लगता। अब देखना ये है कि ट्रंप इस जुए में बाजी मारते हैं या फिर ये मिशन उनके लिए ही सिरदर्द बन जाता है।