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भारत को ‘हजार टुकड़ों में बाँटने’ की रणनीति से शहजाद भट्टी के डिजिटल आतंकवाद तक: पाकिस्तान के ‘स्लीपर सेल’ वाले Proxy War की कहानी

12 अगस्त को देश के 14 राज्यों में पुलिस फोर्सेज एक साथ हरकत में आती हैं। अलग-अलग राज्यों में कार्रवाई होती है, 253 लोगों को हिरासत में लिया जाता है और 80 से ज्यादा FIR दर्ज होती हैं। इस पूरे ऑपरेशन की जानकारी 17 अगस्त को गृह मंत्री अमित शाह देते हैं और दावा करते हैं कि सुरक्षा एजेंसियों ने पाकिस्तान समर्थित ‘शहजाद भट्टी नेटवर्क’ को ध्वस्त कर दिया है।

इस कार्रवाई को सिर्फ 12 अगस्त की एक बड़ी पुलिस कार्रवाई मानना इस पूरी कहानी को छोटा करके देखना होगा। इस ऑपरेशन की तैयारी करीब डेढ़ साल से चल रही थी। जिस नेटवर्क पर शिकंजा कसा गया, उसकी जड़ें कितनी गहरी थीं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसकी कड़ियाँ कश्मीर की वादियों से लेकर मुंबई की उन गलियों तक जाती दिखाई देती हैं, जहाँ से कभी डी-कंपनी जैसी अंडरवर्ल्ड की ताकत का जन्म हुआ था। उत्तर प्रदेश के माफिया अतीक अहमद से लेकर आज सोशल मीडिया और एन्क्रिप्टेड ऐप्स की दुनिया तक इस कहानी के अलग-अलग किरदार सामने आते हैं।

शहजाद भट्टी पर बात करने से पहले यह समझना जरूरी है कि पाकिस्तान के उस आतंक के मॉडल की शुरुआत कहाँ से हुई, जिसने भारत के खिलाफ सीधी जंग के बजाय छद्म युद्ध को अपना हथियार बनाया।

जब पाकिस्तान ने सीधी जंग के बजाय छद्म युद्ध का रास्ता चुना

1947, 1965, 1971 और कारगिल के युद्धों में भारत से मिली शिकस्त के बाद पाकिस्तान की सेना और उसकी खुफिया एजेंसी ISI के सामने एक बात धीरे-धीरे साफ होती गई कि भारत को पारंपरिक युद्ध में हराना आसान नहीं है। इसके बाद भारत के खिलाफ छद्म युद्ध यानी Proxy War की रणनीति को आगे बढ़ाया गया।

पाकिस्तान के सैन्य प्रतिष्ठान ने भारत के भीतर अस्थिरता पैदा करने के लिए आतंकवाद, अलगाववाद और स्थानीय नेटवर्क का इस्तेमाल करना शुरू किया। इसी मॉडल का एक अहम हिस्सा थे- स्लीपर सेल।

जनरल जिया-उल-हक के शासन के दौर में पाकिस्तान की रणनीति और आक्रामक हुई। ‘Bleed India by a thousand cuts’ की सोच के तहत भारत को भीतर से कमजोर करने का मॉडल विकसित किया गया। इसी संदर्भ में K2 रणनीति का भी जिक्र आता है, जिसमें एक K कश्मीर और दूसरा खालिस्तान को दर्शाता था। बाद में ‘ऑपरेशन टुपैक’ के जरिए भारत में असंतोष और उग्रवाद को बढ़ावा देने की रणनीति को जमीन पर उतारने की कोशिश की गई।

पाकिस्तान ने सिर्फ सीमा पार से आतंकवादियों को भारत भेजने पर भरोसा नहीं किया। इसके साथ-साथ भारत के भीतर मौजूद युवाओं को प्रभावित करने, उन्हें कट्टरपंथ की तरफ ले जाने और जरूरत पड़ने पर उन्हें अपने नेटवर्क का हिस्सा बनाने की कोशिश भी की गई। यहीं से भारत में स्लीपर सेल के उस मॉडल को बढ़ावा मिला, जिसकी चुनौती आज भी सुरक्षा एजेंसियों के सामने बनी हुई है।

1993 मुंबई धमाके और डी-कंपनी का आतंकी नेटवर्क

भारत में स्लीपर सेल और स्थानीय आपराधिक नेटवर्क के आतंकवाद से जुड़ने का सबसे खौफनाक चेहरा 12 मार्च 1993 को सामने आया। मुंबई में सिलसिलेवार बम धमाकों ने पूरे देश को हिला दिया। इस हमले में 250 से ज्यादा लोगों की जान गई और सैकड़ों लोग घायल हुए।

इस पूरे मामले में पाकिस्तान की ISI और डी-कंपनी के बीच संबंधों की बात सामने आई। जाँच में यह आरोप सामने आया कि स्थानीय तस्करों और युवाओं को इस नेटवर्क में शामिल किया गया, कुछ लोगों को पाकिस्तान ले जाकर हथियार और विस्फोटकों की ट्रेनिंग दी गई और फिर उन्हें भारत में हमले के लिए तैयार किया गया।

इस घटना ने सुरक्षा एजेंसियों को एक बेहद अहम सबक दिया। खतरा हमेशा सीमा पार से आने वाले किसी आतंकवादी के रूप में दिखाई नहीं देगा। कई बार आतंकवाद के लिए जरूरी लोगों, संसाधनों, हथियारों और लॉजिस्टिक्स का नेटवर्क भारत के भीतर ही तैयार किया जा सकता है। यहीं से ‘स्लीपर सेल’ को समझना जरूरी हो जाता है।

आखिर स्लीपर सेल होता क्या है?

आसान भाषा में समझें तो स्लीपर सेल आतंकियों का ऐसा छिपा हुआ नेटवर्क है, जिसमें शामिल लोग हमेशा हथियार लेकर या किसी आतंकी संगठन के सदस्य के तौर पर सामने नहीं आते। वे आम लोगों की तरह सामान्य जीवन जीते रहते हैं और किसी खास समय या निर्देश का इंतजार करते हैं।

जरूरी नहीं कि स्लीपर सेल में शामिल व्यक्ति खुद किसी हमले को अंजाम दे। उसका काम किसी आतंकी संगठन के लिए ठिकाना उपलब्ध कराना, हथियार या पैसा पहुंचाना, किसी जगह की रेकी करना, नए लोगों को नेटवर्क से जोड़ना या हमलावरों तक जरूरी जानकारी पहुंचाना भी हो सकता है।

सबसे खतरनाक बात यह है कि कई बार नेटवर्क में शामिल किसी व्यक्ति को पूरे नेटवर्क की जानकारी तक नहीं होती। उसे सिर्फ उतना ही काम बताया जाता है, जितना उसके लिए जरूरी है।

यही वजह है कि ऐसे नेटवर्क को पकड़ना सुरक्षा एजेंसियों के लिए बेहद मुश्किल होता है। सीमा पार बैठा हैंडलर खुद भारत में मौजूद नहीं होता। वह भारत में मौजूद छोटे-छोटे स्थानीय संपर्कों के जरिए अपना काम करवाता है। एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति से जुड़ता है, दूसरा तीसरे से और इस तरह एक ऐसा नेटवर्क तैयार होता है जिसकी पूरी तस्वीर जांच एजेंसियों को लंबे समय तक दिखाई नहीं देती।

आतंकवाद की जाँच का सवाल बदला

भारत में जब-जब बड़े आतंकी हमले हुए, जाँच एजेंसियों के सामने सिर्फ यह सवाल नहीं रहा कि आतंकवादी भारत में आया कहाँ से। सवाल धीरे-धीरे बदल गया।

वह भारत पहुँचने के बाद किससे मिला? किसने उसे रास्ता बताया? किसने उसे रहने की जगह दी? पैसा किसने पहुँचाया? हथियार किसने उपलब्ध कराए? किसने रेकी की? और अगर हमलावर वापस चला गया तो उसके पीछे भारत में कौन बचा रह गया? यही वह सोच थी जिसने स्लीपर सेल की जाँच को आतंकवाद विरोधी कार्रवाई का अहम हिस्सा बना दिया।

समय के साथ सुरक्षा एजेंसियों को यह भी समझ आने लगा कि आतंकवाद और स्थानीय अपराध की दुनिया हमेशा एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। जहाँ अपराधियों के पास पैसा, हथियार, स्थानीय संपर्क और लॉजिस्टिक्स होते हैं, वहीं आतंकवादी नेटवर्क को भी इन्हीं चीजों की जरूरत होती है। इसी बिंदु पर आतंकवाद और अंडरवर्ल्ड के रास्ते एक-दूसरे से जुड़ने लगते हैं।

अतीक अहमद तक पहुँची स्लीपर सेल की कहानी

स्लीपर सेल की इस लंबी कहानी की एक कड़ी उत्तर प्रदेश के माफिया अतीक अहमद से भी जुड़ती है। अतीक अहमद पर 100 से ज्यादा आपराधिक मामले दर्ज थे। 2005 में बसपा विधायक राजू पाल की हत्या के मामले में उसे बाद में उम्रकैद की सजा भी सुनाई गई। फरवरी 2023 में गवाह उमेश पाल और दो पुलिसकर्मियों की हत्या के बाद उसका नाम एक बार फिर देशभर में चर्चा में आया।

उमेश पाल हत्याकांड के बाद हुई पूछताछ और सामने आए दस्तावेजों में अतीक अहमद के पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI और लश्कर-ए-तैयबा से संपर्क के दावे सामने आए। उसके रिमांड दस्तावेज में हथियारों की उस सप्लाई चेन का भी जिक्र था, जिसमें पाकिस्तान से ड्रोन के जरिए पंजाब में हथियार गिराए जाने की बात कही गई थी।

इन हथियारों को स्थानीय नेटवर्क के जरिए इकट्ठा किया जाता और फिर अलग-अलग आपराधिक तथा आतंकी नेटवर्क तक पहुंचाया जाता था। आरोपों के मुताबिक कुछ हथियार पैसे के बदले अतीक के नेटवर्क तक भी पहुंचे।

अतीक अहमद की मौत के साथ उसका अध्याय जरूर बंद हो गया, लेकिन जिस गठजोड़ की तस्वीर उसकी पूछताछ और जांच में सामने आई थी, वह खत्म नहीं हुआ। अगले कुछ वर्षों में यही गठजोड़ एक नए और ज्यादा डिजिटल रूप में दिखाई देने लगा। और इस नई कड़ी के केंद्र में एक नाम बार-बार सामने आया- शहजाद भट्टी।

कौन है शहजाद भट्टी और कैसे तैयार हुआ उसका नेटवर्क?

शहजाद भट्टी पाकिस्तान का सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और गैंगस्टर बताया जाता है। आरोप है कि उसने इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल युवाओं तक पहुंच बनाने, उन्हें प्रभावित करने और सीमा पार से आपराधिक तथा आतंकी गतिविधियों के लिए नेटवर्क तैयार करने में किया।

यानी जिस आतंक का पुराना मॉडल हथियारों, तस्करी और आमने-सामने के संपर्क पर टिका था, उसमें अब सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की एक नई परत जुड़ गई थी।

भट्टी पर आरोप है कि उसने भारत में दहशत फैलाने के लिए TTH नाम का एक नया मुखौटा संगठन खड़ा किया। इसका इस्तेमाल कथित तौर पर नार्को-टेररिज्म और हिंसक गतिविधियों को आगे बढ़ाने के लिए किया गया। उसका तरीका भी इसी नए मॉडल को दिखाता है।

शुरुआत में युवाओं को छोटे-छोटे काम दिए जाते। कुछ मामलों में 5,000 से 10,000 रुपये तक देकर सार्वजनिक जगहों की रेकी कराने या पोस्टर लगाने जैसे काम करवाए जाते। धीरे-धीरे यही संपर्क बड़े कामों में बदले जाते और आरोप है कि बाद में कुछ युवाओं को हथियार उपलब्ध कराकर टारगेट किलिंग और ग्रेनेड हमलों जैसी गतिविधियों में धकेला गया।

यानी पहले भरोसा और पैसा, फिर छोटा अपराध और उसके बाद धीरे-धीरे आतंक की दुनिया में प्रवेश।

जालंधर से सिरसा और अंबाला तक धमाकों की कड़ियाँ

शहजाद भट्टी नेटवर्क पर आरोपों की गंभीरता का अंदाजा उन मामलों से लगाया जा सकता है, जिनमें उसका नाम जाँच के दौरान सामने आया। मार्च 2025 में पंजाब के जालंधर में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर रोजर संधू के घर पर ग्रेनेड हमला हुआ। अप्रैल 2026 में एनआईए ने इस मामले में शहजाद भट्टी को फरार आरोपित के रूप में चार्जशीट किया।

इसके बाद हरियाणा के सिरसा महिला पुलिस थाने में नवंबर 2025 में हुए विस्फोट और अंबाला के बलदेव नगर पुलिस स्टेशन में जनवरी 2026 में हुए धमाके की साजिश में भी भट्टी का नाम सामने आया।

सिरसा मामले में मई 2026 में एनआईए ने शहजाद भट्टी समेत 9 आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। इसमें पाकिस्तान स्थित हैंडलर सोहेल अहमद उर्फ सोहेल बलोच का नाम भी शामिल था। आरोप सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं रहे। हिमाचल प्रदेश के नालागढ़ में बब्बर खालसा से जुड़े लोगों के साथ मिलकर ग्रेनेड हमले की साजिश रचने के आरोप भी भट्टी नेटवर्क से जुड़े।

इन घटनाओं को अलग-अलग देखने के बजाय एक साथ देखा जाए तो तस्वीर ज्यादा साफ होती है। एक ऐसा नेटवर्क सामने आता है जिसमें पाकिस्तान में बैठे हैंडलर, सोशल मीडिया संपर्क, स्थानीय अपराधी, छोटे स्तर पर काम करने वाले युवा और हथियारों की सप्लाई सब एक-दूसरे से जुड़ते दिखाई देते हैं।

12 अगस्त की कार्रवाई ने खोली नेटवर्क की परतें

ऐसे नेटवर्क पर शिकंजा कसने की तैयारी लंबे समय से चल रही थी और स्वतंत्रता दिवस से ठीक पहले 12 अगस्त को सुरक्षा एजेंसियों ने एक साथ बड़ी कार्रवाई की।

उत्तर प्रदेश में 62, हरियाणा में 52, दिल्ली में 51, पंजाब में 44 और राजस्थान में 15 संदिग्धों को हिरासत में लिया गया। कुल मिलाकर 14 राज्यों में 253 लोगों को हिरासत में लिए जाने की बात सामने आई। कार्रवाई सिर्फ गिरफ्तारी या हिरासत तक सीमित नहीं थी। जाँच के दौरान जो सामान बरामद हुआ, उसने सुरक्षा एजेंसियों के सामने मौजूद खतरे की गंभीरता को और स्पष्ट किया।

पुलिस और जाँच एजेंसियों को पाकिस्तानी हथियार फैक्ट्री की मुहर वाले ग्रेनेड, IED यानी इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस, पिस्तौल और बड़ी संख्या में जिंदा कारतूस बरामद होने की जानकारी दी गई। इसके अलावा ऐसे हाई-टेक CCTV कैमरे भी बरामद किए गए, जिनका इस्तेमाल कथित तौर पर पुलिस और सुरक्षा प्रतिष्ठानों पर नजर रखने के लिए किया जा रहा था।

यानी नेटवर्क की तैयारी सिर्फ हमला करने तक सीमित नहीं थी। निगरानी, रेकी, हथियार, विस्फोटक और स्थानीय संपर्क हर स्तर पर एक व्यवस्था तैयार किए जाने के संकेत मिले। इस कार्रवाई के बाद UAPA, आर्म्स एक्ट और NDPS एक्ट के तहत 80 से ज्यादा एफआईआर दर्ज की गईं। लेकिन सवाल अब भी बाकी है।

शहजाद भट्टी नेटवर्क खत्म भी तो स्लीपर सेल का क्या?

किसी एक नेटवर्क पर कार्रवाई हो जाना और उस मॉडल का पूरी तरह खत्म हो जाना दो अलग-अलग बातें हैं। जाँच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि ऐसे नेटवर्क में एक व्यक्ति के पकड़े जाने के बाद दूसरा व्यक्ति उसकी जगह ले सकता है। सोशल मीडिया पर एक अकाउंट बंद होने के बाद दूसरा अकाउंट बनाया जा सकता है। एक स्थानीय संपर्क के पकड़े जाने के बाद दूसरा संपर्क तैयार किया जा सकता है।

यही कारण है कि स्लीपर सेल के खिलाफ लड़ाई सिर्फ किसी एक संगठन या व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में जाँच एजेंसियों को आतंकवाद और गैंगस्टर नेटवर्क के बीच बढ़ते गठजोड़ के संकेत भी मिले हैं। 2024 में एनआईए ने अर्श डल्ला और दूसरे आरोपितों से जुड़े टेरर-गैंगस्टर नेक्सस मामले में चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में 30 ठिकानों पर छापेमारी की थी।

इसका मतलब साफ है कि आतंकी नेटवर्क के लिए अपराध की दुनिया अब हमेशा अलग दुनिया नहीं रह गई है। कई मामलों में दोनों के रास्ते एक-दूसरे से जुड़ रहे हैं।

गैंगस्टर नेटवर्क स्थानीय संपर्क और पैसा दे सकता है। आतंकी नेटवर्क हथियार और सीमा पार से हैंडलिंग उपलब्ध करा सकता है। सोशल मीडिया नए लोगों तक पहुंच बनाने का रास्ता दे सकता है और ड्रग्स का नेटवर्क पैसे का इंतजाम कर सकता है। यानी आतंक का मॉडल अब सिर्फ बंदूक और बम तक सीमित नहीं रह गया है।

अब आतंक की भर्ती मोबाइल स्क्रीन से भी हो सकती है

इस बदलते मॉडल का एक और उदाहरण दिल्ली से जुड़े आतंकी मामले में सामने आया, जहाँ उमर नाम के आरोपित पर सोशल मीडिया के जरिए लोगों से संपर्क बनाने और उन्हें जैश-ए-मोहम्मद की विचारधारा से प्रभावित करने का आरोप लगा। जांच में उसके जरिए एक बड़े स्लीपर सेल नेटवर्क को तैयार करने की कोशिश की बात सामने आई।

यही बदलाव सबसे ज्यादा चिंता पैदा करता है। एक समय था जब आतंकवादी नेटवर्क में शामिल होने के लिए किसी व्यक्ति को सीमा पार जाना पड़ता था, किसी संपर्क के जरिए किसी संगठन तक पहुंचना पड़ता था या किसी स्थानीय मॉड्यूल से मिलना पड़ता था। अब मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और एन्क्रिप्टेड ऐप्स उस दूरी को कम कर सकते हैं।

यानी जो खतरा कभी सरहद के उस पार दिखाई देता था, वह अब आपके शहर, आपकी गली और यहां तक कि आपके मोबाइल की स्क्रीन तक पहुँच सकता है। शहजाद भट्टी की कहानी को सिर्फ एक पाकिस्तानी गैंगस्टर की कहानी समझना भी सही नहीं होगा। यह उस बदलते आतंकी मॉडल की कहानी है, जिसमें कई अलग-अलग दुनिया एक-दूसरे से जुड़ रही हैं।

आतंकवाद, हथियार, ड्रग्स, गैंगस्टर नेटवर्क, पैसा, सोशल मीडिया और सीमा पार बैठे हैंडलर जब ये सभी एक ही सिस्टम का हिस्सा बनने लगते हैं तो खतरा सिर्फ किसी एक आतंकी हमले का नहीं रह जाता। यह खतरा देश की सामान्य कानून-व्यवस्था तक पहुँच जाता है।

यही वजह है कि स्लीपर सेल को पकड़ना अब सिर्फ आतंकवाद रोकने की लड़ाई नहीं है। यह उस पूरे नेटवर्क को तोड़ने की लड़ाई है जो अपराध और आतंक के बीच की दूरी को लगातार कम कर रहा है।

शहजाद भट्टी की कहानी इसी बदलते मॉडल की कहानी है। एक ऐसा मॉडल जिसमें अंडरवर्ल्ड की पुरानी लॉजिस्टिक्स, आतंकवाद की सीमा पार फंडिंग, ड्रग्स का पैसा और सोशल मीडिया की नई दुनिया एक-दूसरे से जुड़कर एक नया नेटवर्क तैयार कर रहे हैं। और शायद इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सबक यही है कि आतंक हमेशा बम या ग्रेनेड लेकर नहीं आता। कभी-कभी वह पहले सिर्फ एक फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजता है।

भारतीय परमाणु हथियारों के विरोध से लेकर ‘भगवा आतंकवाद’ के नैरेटिव तक: चिदंबरम के खुद को ‘दिमागी नक्सल’ स्वीकारने पर क्यों हैरान नहीं है कोई

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्वतंत्रता दिवस के भाषण में इस्तेमाल किए गए शब्द ‘दिमागी नक्सल’ से वामपंथी और कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम बिलबिलाया हुआ है। हाल में इसी टिप्पणी को लेकर पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री और वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता पी चिदंबरम ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर खुद को गर्व से ‘दिमागी नक्सल’ घोषित किया। उन्होंने लिखा कि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ होने पर गर्व है।

पीएम मोदी ने अपने संबोधन में ‘दिमागी नक्सल’ और जंगल में बंदूकें थामे ‘सशस्त्र नक्सलियों’ के बीच का फर्क साफ किया था। उन्होंने बताया कि जहाँ हथियारबंद नक्सली छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में हिंसा और खूनी खेल खेलते हैं, वहीं ये ‘दिमागी नक्सल’ सत्ता के गलियारों, वातानुकूलित कमरों और शैक्षणिक संस्थानों में बैठकर उसी जनसंहारी विचारधारा को खाद-पानी देते हैं।

इनका मुख्य मकसद भारत की संप्रभुता को चोट पहुँचाना और लोकतांत्रिक व्यवस्था को ध्वस्त करना है। पीएम मोदी ने देश को इन छद्म-बुद्धिजीवियों से सतर्क रहने की चेतावनी दी, जो युवाओं के मन में जहर घोलकर उन्हें काल्पनिक ‘क्रांति’ का मोहरा बनाते हैं।

हालाँकि, देश के पूर्व गृह मंत्री का खुलकर देशद्रोही और हिंसक नक्सली विचारधारा के पक्ष में खड़े होना बेहद शर्मनाक है, लेकिन कॉन्ग्रेस के इतिहास को देखते हुए इसमें कोई हैरानी नहीं होती।

चिदंबरम की यह स्वीकारोक्ति कोई नई बात नहीं है। साल 2010 में, जब वे देश के गृह मंत्री थे, तब उन्होंने जेएनयू (JNU) के मंच से सरेआम देश विरोधी ताकतों के आगे घुटने टेकने की पेशकश की थी। उन्होंने कहा था कि सरकार नक्सलियों से बिना उनके हथियार डाले भी बातचीत करने को तैयार है। उनका तर्क था कि चूँकि नक्सली ‘सशस्त्र संघर्ष’ में भरोसा रखते हैं, इसलिए सरकार उनसे हथियार छोड़ने को नहीं कहेगी।

चौंकाने वाली बात यह है कि चिदंबरम ने यह बयान दंतेवाड़ा में हुए उस बर्बर माओवादी हमले के ठीक एक महीने बाद दिया था, जिसमें 76 सीआरपीएफ (CRPF) जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे। देश के वीर जवानों की शहादत पर मरहम लगाने के बजाय, कॉन्ग्रेसी गृह मंत्री नक्सलियों को पुचकार रहे थे और जेएनयू के वामपंथी गढ़ में इस बयान पर खूब तालियाँ पीटी गई थीं।

चिदंबरम के कार्यकाल में नक्सलवाद अपने चरम पर था, लेकिन कॉन्ग्रेस सरकार ने न केवल इस खतरे को अनदेखा किया, बल्कि तुष्टिकरण की नीति अपनाकर देश को आग में झोंकने का काम किया। चिदंबरम का नक्सली हमदर्दी का यह पुराना ट्रैक रिकॉर्ड और उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा विरोधी सोच उनके ‘दिमागी नक्सल’ होने के दावे की पूरी तरह पुष्टि करती है।

एक तरफ जहाँ उनका दिल खूनी माओवादियों के लिए पसीजता रहा है, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने और उनकी पार्टी ने सनातन और पूरे हिंदू समाज को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कॉन्ग्रेस के वोटबैंक तुष्टिकरण का सबसे घिनौना चेहरा तब सामने आया जब चिदंबरम, सुशील कुमार शिंदे और दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं ने ‘हिंदू आतंकवाद’ और ‘भगवा आतंकवाद’ जैसी काल्पनिक अवधारणाएँ गढ़ीं।

2008 के मालेगाँव बम विस्फोट मामले में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और सेवारत सैन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित को झूठे मामलों में फँसाकर जेलों में सड़ने के लिए छोड़ दिया गया, ताकि ‘हिंदू आतंक’ का झूठा नैरेटिव खड़ा किया जा सके। हालाँकि, 17 साल की लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद अदालत में कॉन्ग्रेस का यह सफेद झूठ पूरी तरह बेनकाब हो गया और पूरा मामला औंधे मुंह गिर पड़ा।

इतना ही नहीं, चिदंबरम की भारत विरोधी और विकास विरोधी मानसिकता उनके हर फैसले में साफ झलकती है। जब मोदी सरकार ने भ्रष्टाचार और काले धन पर नकेल कसने के लिए डिजिटल पेमेंट और नोटबंदी जैसी क्रांतिकारी नीतियाँ लागू कीं, तो चिदंबरम ने इसका कड़ा विरोध किया और इसे ‘घोटाला’ तक बता डाला। जबकि विभिन्न अध्ययनों और रिपोर्टों ने यह साबित किया कि कैश-आधारित फंडिंग बंद होने से आतंकवाद और नक्सलवाद की रीढ़ की हड्डी टूट गई।

चिदंबरम का भारत की रक्षा तैयारियों और सैन्य मजबूती से भी पुराना बैर रहा है। 1998 में जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने पोखरण-द्वितीय परीक्षण करके भारत को परमाणु शक्ति संपन्न बनाया, तब संसद में चिदंबरम ने इसका पुरजोर विरोध किया था।

उनका बचकाना तर्क था कि भारत को परमाणु हथियार बनाने के बजाय अपनी खोखली ‘नैतिक श्रेष्ठता’ बनाए रखनी चाहिए। भारत के आक्रामक और हिंसक पड़ोसियों को दरकिनार कर देश की सुरक्षा को दांव पर लगाने का तर्क देना यह साबित करता है कि चिदंबरम का दिमाग हमेशा से भारत विरोधी और ‘दिमागी नक्सलवादी’ सोच से ही संचालित होता रहा है।

मैन्युफैक्चरिंग से सॉफ्ट पावर तक… क्या है ‘शक्ति की सप्तधारा’? PM मोदी ने लाल किले से दिया विकसित भारत का नया विजन, जानें- 7 शक्तियों से क्या बदलेगा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 80वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए विकसित भारत के निर्माण के लिए ‘शक्ति की सप्तधारा’ का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि देश अब ‘रिफॉर्म एक्सप्रेस’ पर चल पड़ा है और आने वाले दिनों में ‘नेक्स्ट लेवल रिफॉर्म’ की ओर बढ़ना है। इसके लिए सरकार ही नहीं, बल्कि समाज, उद्योग, उत्पादक और किसान हर किसी को अपनी पारंपरिक व्यवस्थाओं और सोच में बदलाव करना होगा। प्रधानमंत्री ने अगले 5-7 वर्षों में ऐसी उपलब्धियाँ हासिल करने का लक्ष्य रखा है, जो पिछले 5-7 दशकों में नहीं हो सकी थीं।

पीएम मोदी ने इसके लिए देश की सात ऐसी शक्तियों को सामने रखा, जिनके सहारे भारत को नई गति और नई ऊँचाई देने की बात कही। ये सात धाराएँ हैं- मैन्युफैक्चरिंग पावर, कृषि और फूड प्रोडक्शन, टेक्नोलॉजी और इनोवेशन, गतिशक्ति, रक्षा शक्ति, ग्रीन और ब्लू इकॉनमी और भारत की सॉफ्ट पावर।

  1. मैन्युफैक्चरिंग पावर

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत को मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बहुत आगे बढ़ाना होगा। केवल उत्पादन बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि छोटे-छोटे पुर्जों से लेकर बड़े-बड़े प्रोडक्ट तक बनाने होंगे। डिजाइन से लेकर मैन्युफैक्चरिंग तक पूरी वैल्यू चेन भारत में होनी चाहिए और भारत को ग्लोबल सप्लाई चेन का भरोसेमंद केंद्र बनना होगा।

उन्होंने मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में तीन बातों ‘कॉस्ट, क्वालिटी और स्केल’ पर विशेष जोर दिया। भारतीय फैक्ट्रियाँ कॉम्पिटिटिव हों, प्रोडक्ट्स यूजर फ्रेंडली हों और पैकेजिंग दुनिया के लोगों को आकर्षित करने वाली हो। प्रधानमंत्री ने ‘जीरो डिफेक्ट’ और ‘प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग’ को भारत की पहचान बनाने की बात कही।

उन्होंने मैन्युफैक्चरर्स, एंटरप्रेन्योर्स और एमएसएमई से कहा कि ग्लोबल मार्केट में भारत की पहचान विश्वसनीयता और गुणवत्ता के आधार पर होनी चाहिए। इसके लिए क्वालिटी से कोई समझौता नहीं होना चाहिए और हमारा मंत्र होना चाहिए- ‘क्वालिटी, क्वालिटी, क्वालिटी।’ यही भारत की ग्लोबल ब्रांड वैल्यू बनेगी।

  1. कृषि और फूड प्रोडक्शन

PM मोदी ने ‘शक्ति की सप्तधारा’ की दूसरी शक्ति कृषि और फूड प्रोडक्शन को बताया। उन्होंने फूड प्रोसेसिंग को बढ़ाने पर जोर दिया और कहा कि अब दुनिया के बाजार भारतीय किसानों के लिए खुले हैं। एफपीए के कारण बड़ा बाजार मिल रहा है और भारत को वहाँ पहुँचने का प्रयास करना होगा।

प्रधानमंत्री ने खेत से एक्सपोर्ट मार्केट तक जाने की बात कही। उन्होंने कहा कि भारत के पारंपरिक खानपान, मिलेट्स, मसाले, फल और फूल जैसे उत्पादों में वैश्विक ब्रांड बनने की क्षमता है। किसानों को केमिकल फ्री खेती को बल देने की बात कहते हुए उन्होंने कहा कि दुनिया में इसकी माँग और बढ़ने वाली है।

PM मोदी ने कहा कि जब भारत के एग्रो प्रोडक्ट जब ग्लोबल पैरामीटर्स पर खरे उतरेंगे, तो उन्हें दुनिया के बाजारों तक आसानी से पहुँचाया जा सकेगा।

  1. टेक्नोलॉजी और इनोवेशन

तीसरी शक्ति है टेक्नोलॉजी और इनोवेशन। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि आज का समय एआई, क्वांटम, स्पेस, रोबोटिक्स और डेटा सेंटर का है। इमर्जिंग टेक्नोलॉजी लगातार नई चुनौतियाँ दे रही है और एक नया क्षेत्र खुल चुका है।

उन्होंने साफ कहा कि भारत को दुनिया के लिए केवल एक बाजार नहीं बनना है बल्कि इनोवेशन का हब बनना है। यूपीआई और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर का उदाहरण देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत ने अपनी ताकत दुनिया को दिखा दी है।

अब डिजिटल पब्लिक टेक्नोलॉजी को दुनिया के कोने-कोने तक पहुँचाने और नेक्स्ट जनरेशन कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी में भारत को लीड करने का लक्ष्य रखना होगा। प्रधानमंत्री ने ‘मेड इन इंडिया 6G’ को हर कोने तक पहुँचाने की दिशा में तेजी से काम करने की बात कही।

  1. गतिशक्ति

सप्तधारा की चौथी शक्ति है- गतिशक्ति। प्रधानमंत्री ने देश के भीतर सीमलेस और फास्ट कनेक्टिविटी पर जोर दिया। शहरों को हाई स्पीड रेल से जोड़ने, मॉडर्न हाईवे बनाने, इनलैंड वाटर बेस और एयरपोर्ट विकसित करने तथा मल्टीमोडल लॉजिस्टिक की व्यवस्था खड़ी करने की बात उन्होंने कही है।

उन्होंने कहा कि भारत के पोर्ट्स केवल सामान उतारने और चढ़ाने की जगह नहीं होने चाहिए। पोर्ट्स को ‘पोर्ट लेड डेवलपमेंट’ और ग्रोथ की दिशा में आगे बढ़ाना होगा।

  1. रक्षा शक्ति

पाँचवीं शक्ति है- रक्षा शक्ति। PM मोदी ने कहा कि रक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होना अब भारत ने भी अनुभव कर लिया है और दुनिया ने भी इसका महत्व समझ लिया है। जब दुनिया अपनी-अपनी सोच रही है, तब भारत केवल दुनिया के लिए बाजार बनकर नहीं रह सकता।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत को रक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना होगा और नेक्स्ट जनरेशन डिफेंस टेक्नोलॉजी विकसित करके ग्लोबल सप्लायर बनने की दिशा में आगे बढ़ना होगा।

प्रधानमंत्री ने ड्रोन और काउंटर-ड्रोन सिस्टम विकसित करने तथा हाइपरसोनिक डिफेंस टेक्नोलॉजी में नेतृत्व लेने की बात कही। उन्होंने साइबर सुरक्षा को भी रक्षा का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बताया और कहा कि इसमें देश के युवाओं की क्षमता का उपयोग भारत और दुनिया के लिए किया जा सकता है।

  1. ग्रीन और ब्लू इकॉनमी

छठी शक्ति है ग्रीन इकॉनमी और ब्लू इकॉनमी, जो ग्रीन जॉब्स को भी जन्म देती है। प्रधानमंत्री ने ग्रीन हाइड्रोजन, रिन्यूएबल एनर्जी, एनर्जी स्टोरेज, ग्रीन मोबिलिटी और ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग को ग्लोबल स्केल पर आगे बढ़ाने की बात कही।

उन्होंने कहा कि जब दुनिया ग्लोबल वार्मिंग की चर्चा कर रही है, तब भारत समस्याओं का समाधान खोजने का प्रयास कर रहा है। भारत के पास एक बड़े ग्रीन मूवमेंट की ताकत है।

इसके साथ ही भारत के पास ब्लू इकॉनमी के लिए भी बड़ा अवसर है। लंबी कोस्टलाइन, फिशरीज, कोस्टल टूरिज्म और ओशन टेक्नोलॉजी जैसे कई क्षेत्रों में भारत आगे बढ़ सकता है।

  1. भारत की सॉफ्ट पावर

सप्तधारा की सातवीं शक्ति है- भारत की सॉफ्ट पावर। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत की सॉफ्ट पावर की अपनी एक बड़ी ताकत है। योग ने पूरी दुनिया को भारत के साथ जोड़ा है और दुनिया के लिए ऊर्जा तथा भारत के लिए विश्वास का कारण बनता जा रहा है।

भारत के पास आस्था के केंद्र, आयुर्वेद और होलिस्टिक हेल्थ केयर की व्यवस्था है। प्रधानमंत्री ने ‘हील इन इंडिया’ के माध्यम से भी भारत के सामर्थ्य को दुनिया तक ले जाने की बात कही।

इसके साथ ही हैंडीक्राफ्ट, संस्कृति, फिल्में, क्रिएटिव वर्ल्ड, वीएफएक्स, एनिमेशन, गेमिंग और डिजिटल कंटेंट में भारत के लिए बड़ी संभावनाएँ हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि क्रिएटिव वर्ल्ड में भारत अपना रुतबा दिखा सकता है और इसे वैश्विक सामर्थ्य के रूप में विकसित करना होगा।

उन्होंने वर्ल्ड ऑडियो विजुअल एंड एंटरटेनमेंट समिट यानी वेव समिट को भी भारत की क्रिएटिव ताकत से जोड़ते हुए कहा कि दुनिया धीरे-धीरे इसकी राह देख रही है।

भारत की विशाल वन्य संपदा और 100 से अधिक नेशनल पार्कों का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने में भारत अभी पीछे है। सॉफ्ट पावर के माध्यम से दुनिया के पर्यटकों को भारत की ओर आकर्षित करने का अवसर है।

स्पोर्ट्स और कॉन्सर्ट इकॉनमी में भी भारत के लिए बड़ी संभावनाएँ हैं। दुनिया का हर कलाकार कभी न कभी भारत की धरती पर अपना कॉन्सर्ट करना चाहता है। प्रधानमंत्री ने कहा कि इस अवसर को मोबिलाइज करने के लिए व्यवस्थाएँ खड़ी करनी होंगी।

इन सात शक्तियों से क्या बदलेगा?

‘शक्ति की सप्तधारा’ को अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पूरी बात के संदर्भ में समझें तो इसका मतलब सिर्फ सात क्षेत्रों में अलग-अलग काम करना नहीं है। असल विचार देश की अलग-अलग ताकतों को एक साथ जोड़कर विकास की ऐसी रफ्तार तैयार करना है, जिसमें किसान, उद्योग, युवा, तकनीक, रोजगार, सुरक्षा, पर्यावरण और भारत की वैश्विक पहचान सब एक-दूसरे से जुड़े हों।

प्रधानमंत्री ने जिस ‘होलिस्टिक अप्रोच’ की बात की, उसका मतलब यही है कि देश की प्रगति को अलग-अलग खाँचों में नहीं देखा जाए। एक क्षेत्र में आगे बढ़ने का फायदा दूसरे क्षेत्र को भी मिले और सभी शक्तियाँ मिलकर भारत को नई गति दें।

इसका सबसे बड़ा बदलाव यह होगा कि भारत केवल दुनिया का एक बड़ा बाजार बनकर नहीं रहेगा। प्रधानमंत्री की बात में बार-बार यह जोर दिखाई देता है कि भारत को दुनिया के लिए उत्पादन करना है, अपनी पूरी वैल्यू चेन तैयार करनी है, नई तकनीक विकसित करनी है और अपने उत्पादों को वैश्विक स्तर की गुणवत्ता के साथ दुनिया तक पहुँचाना है।

इसे आसान भाषा में समझें तो भारत में चीजें केवल असेंबल न हों बल्कि उनके छोटे-छोटे पुर्जों से लेकर डिजाइन और अंतिम उत्पाद तक की पूरी व्यवस्था भारत में तैयार हो। इससे भारतीय उद्योग की क्षमता बढ़ेगी और वैश्विक सप्लाई चेन में भारत को एक भरोसेमंद केंद्र के रूप में स्थापित करने की कोशिश होगी।

इसी का सीधा संबंध किसानों से भी जुड़ता है। अगर भारत उत्पादन करता है, फूड प्रोसेसिंग बढ़ाता है और बेहतर पैकेजिंग के साथ अपने उत्पादों को दुनिया तक पहुँचाता है तो खेत और वैश्विक बाजार के बीच की दूरी कम होगी।

भारत के मिलेट्स, मसाले, फल, फूल और पारंपरिक खानपान केवल स्थानीय उत्पाद नहीं रहेंगे बल्कि दुनिया के बाजार में भारतीय पहचान के साथ पहुँच सकते हैं। इसके लिए गुणवत्ता और वैश्विक मानकों पर खरा उतरना जरूरी होगा। यानी खेती को केवल उत्पादन से जोड़कर नहीं, बल्कि प्रोसेसिंग और एक्सपोर्ट से जोड़कर देखने की दिशा बनती है।

दूसरी तरफ, तकनीक इस पूरी व्यवस्था को गति देने वाली ताकत बन सकती है। AI, क्वांटम, रोबोटिक्स, स्पेस, डेटा सेंटर और नई कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में भारत अगर सिर्फ तकनीक का उपभोक्ता बनने के बजाय उसे विकसित करने और दुनिया तक पहुँचाने की क्षमता हासिल करता है, तो इसका असर उद्योग, शिक्षा, रक्षा, संचार और रोजगार हर क्षेत्र पर पड़ेगा।

UPI और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर का उदाहरण देकर प्रधानमंत्री ने यही दिखाया कि भारत ऐसी तकनीक बना सकता है जिसे दुनिया अपना सकती है। अब इसी क्षमता को अगली पीढ़ी की तकनीकों में ले जाने की बात है।

इसके साथ मजबूत कनेक्टिविटी जरूरी है। देश में हाई स्पीड रेल, आधुनिक हाईवे, एयरपोर्ट, इनलैंड वाटर और मल्टीमोडल लॉजिस्टिक्स की व्यवस्था मजबूत होगी तो उत्पादन को बाजार तक पहुँचाना आसान होगा।

उद्योगों की लागत कम हो सकती है, सामान तेजी से एक जगह से दूसरी जगह पहुँच सकता है और देश के अलग-अलग हिस्से बेहतर तरीके से आपस में जुड़ सकते हैं। पोर्ट्स को केवल माल चढ़ाने-उतारने की जगह न मानकर उनके आसपास विकास की नई गतिविधियाँ खड़ी करने की बात भी इसी सोच का हिस्सा है।

इस पूरी आर्थिक ताकत के साथ सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है। इसलिए रक्षा में आत्मनिर्भरता को भी इसी बड़ी तस्वीर में रखा गया है। भारत अगर ड्रोन, काउंटर-ड्रोन, हाइपरसोनिक डिफेंस और साइबर सुरक्षा जैसी अगली पीढ़ी की तकनीक खुद विकसित करता है तो इससे केवल देश की सुरक्षा मजबूत नहीं होगी बल्कि भारत के लिए दुनिया को रक्षा तकनीक और उपकरण देने का अवसर भी पैदा होगा। यानी आत्मनिर्भरता का लक्ष्य केवल अपनी जरूरत पूरी करना नहीं, बल्कि भारत को ग्लोबल सप्लायर बनाने तक ले जाना है।

इसी तरह विकास की इस पूरी प्रक्रिया में ऊर्जा और पर्यावरण को पीछे नहीं छोड़ा जाना है। ग्रीन हाइड्रोजन, रिन्यूएबल एनर्जी, एनर्जी स्टोरेज, ग्रीन मोबिलिटी और ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों को आगे बढ़ाने का मतलब भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए अभी से तैयारी करना है। इसके साथ भारत की समुद्री सीमा और समुद्र से जुड़े संसाधनों को ब्लू इकॉनमी के रूप में देखने की बात है। फिशरीज, कोस्टल टूरिज्म और ओशन टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्र आर्थिक गतिविधियों के नए रास्ते खोल सकते हैं।

और फिर आती है भारत की वह ताकत जो केवल फैक्ट्री, मशीन या तकनीक से नहीं बनती और वो है… भारत की सॉफ्ट पावर। योग, आयुर्वेद, आस्था, संस्कृति, हैंडीक्राफ्ट, फिल्में, वीएफएक्स, एनिमेशन, गेमिंग और डिजिटल कंटेंट के जरिए भारत दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बना सकता है। पर्यटन को भी इसी से जोड़कर देखा जा रहा है।

भारत के नेशनल पार्क, वन्य संपदा, संस्कृति और विरासत विदेशी पर्यटकों को आकर्षित कर सकते हैं। इसी तरह कॉन्सर्ट और स्पोर्ट्स जैसे क्षेत्रों में दुनिया के कलाकारों और दर्शकों को भारत तक लाने की संभावनाएँ हैं। इससे केवल भारत की छवि मजबूत नहीं होगी, बल्कि पर्यटन और क्रिएटिव इंडस्ट्री में आर्थिक गतिविधियाँ भी बढ़ेंगी।

इन सभी चीजों को जोड़कर देखें तो प्रधानमंत्री का संदेश यह है कि भारत की अगली विकास यात्रा किसी एक मंत्रालय, किसी एक उद्योग या किसी एक वर्ग के भरोसे पूरी नहीं होगी। एक तरफ किसान उत्पादन करेगा, दूसरी तरफ उद्योग उसे प्रोसेस और पैकेज करेगा, तकनीक गुणवत्ता और उत्पादकता बढ़ाएगी, बेहतर कनेक्टिविटी उसे देश और दुनिया के बाजार तक पहुँचाएगी, आत्मनिर्भर रक्षा भारत की सुरक्षा मजबूत करेगी और ग्रीन एनर्जी भविष्य की अर्थव्यवस्था को टिकाऊ बनाएगी। वहीं भारत की संस्कृति, पर्यटन और क्रिएटिव ताकत दुनिया में भारत के लिए आकर्षण पैदा करेगी।

युवाओं की भूमिका भी इस पूरी तस्वीर के केंद्र में है। प्रधानमंत्री ने शुरुआत में ही कहा कि उनकी शक्ति को राष्ट्र निर्माण में जोड़ा जाएगा। इसका मतलब यह है कि आने वाले समय में रोजगार और अवसर केवल पारंपरिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहने वाले हैं। मैन्युफैक्चरिंग से लेकर एआई, रक्षा तकनीक, साइबर सुरक्षा, ग्रीन एनर्जी, गेमिंग, एनीमेशन और स्पेस जैसे नए क्षेत्रों में युवाओं की क्षमता का इस्तेमाल करने की कोशिश होगी।

इसलिए ‘शक्ति की सप्तधारा’ का असली अर्थ सात अलग-अलग घोषणाओं से कहीं बड़ा है। यह भारत की आर्थिक, तकनीकी, सामरिक, पर्यावरणीय और सांस्कृतिक ताकत को एक साथ इस्तेमाल करने की सोच है जिसमें सरकार, समाज, उद्योग, उत्पादक और किसान सभी को इसमें अपनी भूमिका निभानी है।

अंततः लक्ष्य यही है कि भारत उत्पादन भी करे, दुनिया को तकनीक भी दे, अपने किसानों के उत्पादों को वैश्विक बाजार तक पहुँचाए, अपनी सुरक्षा के लिए आत्मनिर्भर बने, स्वच्छ ऊर्जा और समुद्री अर्थव्यवस्था में आगे बढ़े और अपनी संस्कृति तथा रचनात्मक शक्ति के जरिए दुनिया को आकर्षित करे।

भारत में नदी जोड़ो परियोजना का भविष्य Part III: दुनिया में किन देशों ने सफलतापूर्वक किया रिवर लिंक प्रोजेक्ट का इस्तेमाल

भारत में ‘नदी जोड़ो अभियान’ (Interlinking of Rivers – ILR) की जब भी बात होती है, तो चर्चा का केंद्र अक्सर केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट (Ken-Betwa Link Project – KBLP) ही रहता है, क्योंकि यह धरातल (Ground Level) पर उतरने वाला देश का पहला मॉडल प्रोजेक्ट है। लेकिन राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी (National Water Development Agency – NWDA) की वास्तविक योजना का दायरा सिर्फ मध्य भारत के बुंदेलखंड तक सीमित नहीं है।

NWDA का अंतिम और व्यापक लक्ष्य पूरे देश के हाइड्रोलॉजिकल मानचित्र (Hydrological Map) को पुनर्गठित करना और भारत की तमाम बड़ी-छोटी नदियों को एक साझा ‘राष्ट्रीय जल ग्रिड’ (National Water Grid) के जरिए आपस में जोड़ना है।

इस महा-योजना के तहत संपूर्ण भारत में कुल 30 अंतर-बेसिन जल स्थानांतरण (Inter-basin Water Transfer) लिंक प्रस्तावित किए गए हैं। इन 30 विशाल परियोजनाओं का मूल दर्शन यह है कि मानसून के 100 से 120 दिनों के दौरान जिन नदियों का अरबों-खरबों लीटर मीठा पानी विनाशकारी बाढ़ लाता हुआ उफान के साथ समुद्र में बेकार बह जाता है, उसे रोककर और मोड़कर देश के उन दूर-दराज के इलाकों तक पहुँचाया जाए जो साल के आठ महीने बूँद-बूँद पानी के लिए तरसते हैं।

इस पूरे खाके को भारत की भौगोलिक और भू-गर्भीय बनावट के आधार पर दो स्पष्ट घटकों में विभाजित किया गया है – 1- प्रायद्वीपीय घटक (Peninsular Component – 16 रिवर लिंक प्रोजेक्ट) और 2- हिमालयी घटक (Himalayan Component – 14 रिवर लिंक प्रोजेक्ट)।

भारत के नदी जोड़ो मेगा प्रोजेक्ट की प्रतीकात्मक तस्वीर, डाटा: NWDA (फोटो साभार: AI ChatGPT)

जहाँ एक तरफ चीन का साउथ-नॉर्थ वाटर ट्रांसफर प्रोजेक्ट (South-North Water Transfer Project) और अमेरिका का कैलिफोर्निया स्टेट वाटर प्रोजेक्ट (California State Water Project) यह साबित कर चुके हैं कि बड़े पैमाने पर जल अंतरण से महाद्वीपीय स्तर के जल संकट को खत्म किया जा सकता है, वहीं भारत के सामने भौगोलिक विषमताओं के साथ-साथ राज्यों के आपसी जल विवाद (Inter-State Water Disputes), विशाल जन-विस्थापन और नाजुक पारिस्थितिकी (Fragile Ecology) की अद्वितीय चुनौतियाँ मौजूद हैं।

नदी जोड़ो परियोजना पर आधारित रिपोर्ट के तीसरे और आखिरी हिस्से में हम भारत की बाकी सभी प्रमुख परियोजनाओं, सिंधु जल संधि के बाद उत्तर-पश्चिम भारत में चल रहे आधिकारिक प्रस्तावों, दुनिया के 5 सबसे बड़े वॉटर ट्रांसफर मॉडलों, पर्यावरणीय संकटों और इस अंतिम निष्कर्ष का गहन विश्लेषण करेंगे कि क्या यह योजना भारत की भावी ‘जल क्रांति’ बनेगी या फिर यह देश के इतिहास की सबसे कठिन और संवेदनशील राष्ट्रीय परियोजना साबित होने जा रही है।

नदी जोड़ो परियोजना के प्रायद्वीपीय घटक: 16 प्रस्तावित रिवर लिंक प्रोजेक्ट

भारत की महत्वाकांक्षी नदी जोड़ो परियोजना के प्रायद्वीपीय घटक मुख्य रूप से मध्य और दक्षिण भारत की नदियों तथा पश्चिमी घाट (Western Ghats) से निकलने वाली जलधाराओं पर केंद्रित है। इस घटक के तहत कुल 16 अंतर-बेसिन लिंक प्रस्तावित हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य ओडिशा और आंध्र प्रदेश की महानदी व गोदावरी जैसी विशाल नदियों के मानसूनी ‘अधिशेष’ (Surplus) जल को उठाकर दक्षिण भारत की जल-संकटग्रस्त नदियों कृष्णा, पेनार, कावेरी, वैगई और गुंडार तक पहुँचाना है।

दक्षिण भारत के प्रमुख रिवर लिंक प्रोजेक्ट

इसमें महानदी – गोदावरी – कृष्णा – पेनार – कावेरी – वैगई – गुंडार ग्रिड (दक्षिण भारत की रीढ़) प्रमुख है। यह दक्षिण भारत को एक सूत्र में पिरोने वाला सबसे बड़ा वॉटर ग्रिड है। इसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित लिंक शामिल हैं-

महानदी (मणिभद्र) – गोदावरी (दौलेश्वरम) लिंक: ओडिशा की महानदी में मानसून के दौरान भारी तबाही मचाने वाले पानी को बैराज और 800 किमी से अधिक लंबी नहरों के माध्यम से गोदावरी नदी में स्थानांतरित करना।

गोदावरी (इंचमपल्ली/पोलावरम) – कृष्णा (नागार्जुनसागर/विजयावाड़ा) लिंक: गोदावरी के विशाल जलप्रवाह को आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के रास्ते कृष्णा नदी में डालना।

कृष्णा (अल्मट्टी/श्रीशैलम/नागार्जुनसागर) – पेनार (सोमशिला) लिंक: कृष्णा के पानी को रायलसीमा और कर्नाटक के शुष्क क्षेत्रों से होते हुए पेनार नदी तक ले जाना।

पेनार (सोमशिला) – कावेरी (ग्रैंड एनिकिट) लिंक: आंध्र प्रदेश से पानी को तमिलनाडु के कावेरी बेसिन तक पहुँचाना।

कावेरी (कटालई) – वैगई – गुंडार लिंक: कावेरी के पानी को तमिलनाडु के सबसे दक्षिणी और सूखे जिलों (मदुरै, रामनाथपुरम) तक पहुँचाना।

अगर यह ग्रिड पूरा बन जाता है, तो तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के बीच पिछले सौ सालों से चले आ रहे कावेरी और कृष्णा जल विवादों (Water Disputes) को काफी हद तक कम कर सकता है, क्योंकि दक्षिण के राज्यों को उत्तर की नदियों से अतिरिक्त जल मिलने लगेगा।

मध्य भारत के रिवर लिंक प्रोजेक्ट (Priority Links of Central India)

पारबती – कालीसिंध – चंबल लिंक (Parbati-Kalisindh-Chambal Link): मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र और राजस्थान के हाड़ौती व चंबल क्षेत्र (कोटा, बूंदी, झालावाड़) को सिंचाई और पेयजल आपूर्ति देने के लिए केन-बेतवा के साथ ही इस लिंक को प्राथमिकता में रखा गया है।

दमनगंगा – पिंजाल लिंक (Damanganga-Pinjal Link): गुजरात और महाराष्ट्र की सीमा पर बहने वाली दमनगंगा नदी के पानी को मोड़कर वैतरणा और पिंजाल नदियों के रास्ते मुंबई महानगर (Mumbai Metropolitan Region) तक पहुँचाना। इसका मुख्य उद्देश्य भारत की वित्तीय राजधानी मुंबई की वर्ष 2050 तक की पेयजल मांग को पूरा करना है।

पार – तापी – नर्मदा लिंक (Par-Tapi-Narmada Link): दक्षिण गुजरात के पश्चिमी घाट से निकलने वाली नदियों (पार, तापी) का पानी मोड़कर नर्मदा के मुख्य केनाल नेटवर्क में डालना, जिससे उत्तर गुजरात, सौराष्ट्र और कच्छ के अति-शुष्क इलाकों तक पानी पहुँचाया जा सके। हालाँकि स्थानीय ST समुदायों के कड़े विरोध के कारण वर्तमान में इस पर काम रुका हुआ है।

पश्चिमी घाट की नदियों का पानी पूर्व की ओर मोड़ना (West Flowing Rivers Transfer)

नेत्रावती – हेमावती लिंक: कर्नाटक में पश्चिमी घाट से होकर अरब सागर में गिरने वाली नेत्रावती नदी के पानी को मोड़कर कावेरी की सहायक हेमावती नदी में डालना ताकि बंगलुरु और दक्षिणी कर्नाटक के किसानों को पानी मिल सके।

बेदती – वरदा लिंक: कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ और धारवाड़ जिलों में जल संकट दूर करना।

पम्बा – अचनकोविल – वैप्पार लिंक: केरल की पम्बा और अचनकोविल नदियों का पानी तमिलनाडु के सूखे वैप्पार बेसिन में ले जाना (जिसका केरल सरकार लगातार विरोध कर रही है)।

हिमालयी घटक (Himalayan Component) का विश्लेषण

हिमालयी घटक पूरे अंतर-बेसिन जल स्थानांतरण का सबसे विशाल, तकनीकी रूप से अत्यंत जटिल और इंजीनियरिंग की दृष्टि से चुनौतीपूर्ण हिस्सा है। इसके तहत कुल 14 लिंक प्रस्तावित किए गए हैं। इसका मुख्य हिस्सा नेपाल, भूटान और पूर्वोत्तर भारत (असम, अरुणाचल) से बहकर आने वाली बारहमासी (Perennial) और उफनती नदियों के जल को नियंत्रित करना और उसे देश के पश्चिमी और दक्षिणी हिस्सों तक ले जाना है।

Fact Box, फोटो साभार: AI ChatGPT

मानस – संकोश – तिस्ता – गंगा (M-S-T-G) लिंक

ये प्रोजेक्ट राष्ट्रीय जल ग्रिड की रीढ़ है। यह पूरी नदी जोड़ो योजना का सबसे बड़ा, सबसे महँगा और सबसे दूरगामी प्रस्ताव है।

इस प्रोजेक्ट में भूटान और पूर्वोत्तर भारत की जिन मानस और संकोश नदियों में अत्यधिक पानी उपलब्ध है। उन नदियों के पानी को असम में एक विशाल बैराज बनाकर रोका जाएगा और लगभग 700 किलोमीटर से अधिक लंबी एक ‘सुपर केनाल’ (Super Canal) के जरिए पश्चिम बंगाल की तिस्ता नदी से होते हुए बिहार के पास गंगा नदी (फरक्का बैराज के ऊपर) में डाला जाएगा।

इस एक लिंक से प्रति वर्ष लगभग 43,000 मिलियन घनमीटर (MCM) पानी स्थानांतरित करने की योजना है, जो भारत की कई छोटी नदियों के कुल वार्षिक प्रवाह से भी अधिक है।

यह नहर उत्तर पूर्व भारत को मुख्य भारत से जोड़ने वाले ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ (Chicken’s Neck) से होकर गुजरेगी, जिससे पूर्वोत्तर में नौवहन (Navigation) और सुरक्षा बलों की लॉजिस्टिक्स क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी।

गंगा और उसकी सहायक नदियों का लिंक नेटवर्क

कोसी – घाघरा लिंक (Kosi-Ghaghara Link): नेपाल से निकलकर बिहार में तबाही मचाने वाली ‘बिहार का शोक’ कही जाने वाली कोसी नदी पर विशाल छत्र बाँध बनाकर उसके पानी को उत्तर प्रदेश की घाघरा (सरयू) नदी में ले जाना।

गंडक – गंगा लिंक (Gandak-Ganga Link): गंडक नदी का पानी मोड़कर मध्य गंगा बेसिन को मजबूती देना।

घाघरा – यमुना और शारदा – यमुना लिंक (Ghaghara-Yamuna & Sarda-Yamuna Links): नेपाल-उत्तराखंड सीमा की शारदा (महाकाली) और घाघरा नदियों के पानी को विशाल नहरों के जरिए हरियाणा और दिल्ली के ऊपर यमुना नदी में डालना। इससे यमुना का विलुप्त होता प्रवाह पुनः जीवित होगा और दिल्ली-NCR का पेयजल संकट स्थायी रूप से हल होगा।

उत्तर-पश्चिम भारत का लिंक ग्रिड

यमुना – राजस्थान लिंक: यमुना नदी से पानी निकालकर राजस्थान के चुरू, झुंझुनूं और बीकानेर जिलों तक सिंचाई नहर ले जाना।

राजस्थान – साबरमती लिंक: राजस्थान के पानी को गुजरात की साबरमती नदी तक बढ़ाकर पश्चिमी भारत के पूरे रेगिस्तानी बेल्ट को सींचना।

भारत की नदी जोड़ो परियोजना का विस्तृत अध्ययन चार्ट, डाटा: NWDA (फोटो साभार: AI ChatGPT)

हिमाचल-पंजाब-राजस्थान और जम्मू-कश्मीर से जुड़े आधिकारिक प्रस्ताव (सिंधु जल संधि के संदर्भ में)

उत्तर-पश्चिमी भारत में नदियों का प्रबंधन केवल एक कृषि या पेयजल का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति (International Fiplomacy) का एक अत्यंत संवेदनशील विषय रहा है।

साल 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई ‘सिंधु जल संधि’ (Indus Waters Treaty – IWT) के तहत नदियों का विभाजन किया गया था, जिसमें-

पूर्वी नदियाँ (Eastern Rivers): रावी, व्यास और सतलुज के पूरे पानी पर भारत का पूर्ण और अनन्य (exclusive) अधिकार दिया गया।

पश्चिमी नदियाँ (Western Rivers): सिंधु, झेलम और चेनाब का अधिकांश पानी पाकिस्तान के इस्तेमाल के लिए आवंटित किया गया, हालाँकि भारत को इन पर ‘रन-ऑफ-द-रिवर’ (run-of-the-river) जलविद्युत परियोजनाएँ बनाने का सीमित अधिकार मिला।

पूर्वी नदियों (रावी, व्यास, सतलुज) का पूरा अधिकार भारत के पास होने के बावजूद, दशकों तक पर्याप्त बाँधों, बैराजों और नहर नेटवर्क के अभाव में भारत के हिस्से का औसतन 2 से 3 मिलियन एकड़ फीट (MAF) मीठा पानी बिना इस्तेमाल हुए रावी नदी के जरिए बहकर पाकिस्तान चला जाता था।

बीते कुछ समय में खासकर पहलगाम हमले के बाद भारत सरकार ने एक तरफ ऑपरेशन सिंदूर चलाया, तो दूसरी तरफ सिंधु जल समझौते को होल्ड कर दिया। इसके बाद केंद्र सरकार ने आधिकारिक नीति बनाकर इस एक-एक बूँद पानी को भारत के भीतर ही रोकने और सहेजने के लिए तीन प्रमुख ढाँचागत परियोजनाओं पर काम पूरा किया है-

शाहपुरकंडी बाँध परियोजना (Shahpurkandi Dam Project – Punjab): ये प्रोजेक्ट पंजाब के पठानकोट जिले में रावी नदी पर स्थित है। शाहपुरकंडी बाँध परियोजना मशहूर थेन (रणजीत सागर) बाँध के Downstream में है।

इस बाँध का निर्माण पूरा होने से रावी नदी का वह पानी जो बहकर पाकिस्तान चला जाता था, उसे पूरी तरह रोक लिया गया है। इस सहेजे गए पानी से पंजाब की 32,000 हेक्टेयर के साथ ही जम्मू-कश्मीर के कठुआ और सांबा जिलों की 1,150 हेक्टेयर कृषि भूमि को तत्काल सिंचाई का पानी मिलने लगा है।

उझ बहुउद्देशीय परियोजना (Ujh Multipurpose Project – Jammu & Kashmir): ये परियोजना जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में रावी की प्रमुख सहायक नदी ‘उझ’ पर चल रही है। ₹9,167 करोड़ की अनुमानित लागत वाली इस परियोजना में लगभग 781 MCM पानी का विशाल भंडारण बनाया जा रहा है। इससे जम्मू-कश्मीर के कठुआ, सांबा और जम्मू जिलों की 31,380 हेक्टेयर भूमि सिंचित होगी और 186 मेगावाट जलविद्युत पैदा होगी।

रावी-व्यास-सतलुज लिंक और राजस्थान नहर (Indira Gandhi Canal): रावी और व्यास नदियों से सहेजे गए पानी को हरीके बैराज (Harike Barrage) के जरिए इंदिरा गाँधी नहर (Indira Gandhi Canal) में मोड़ा जा रहा है। इससे राजस्थान के थार रेगिस्तान (जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, श्रीगंगानगर) तक पानी का प्रवाह तेज हुआ है, जिससे भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित बंजर रेगिस्तान का एक बड़ा हिस्सा हरे-भरे खेतों में तब्दील हो चुका है।

इसके अलावा भी भारत सरकार कई अहम प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है। बहरहाल, ये तो रही भारत में स्थित प्रमुख नदी जोड़ो परियोजना से जुड़े प्रोजेक्ट की बात। अब बात करते हैं विदेशों में इस तरह के काम कहाँ और कैसे हो रहे हैं।

दुनिया के 5 सबसे बड़े सफल वॉटर ट्रांसफर मॉडल (Global Case Studies)

अंतर-बेसिन जल स्थानांतरण (Inter-Basin Water Transfer) कोई नया या केवल भारत का अनोखा प्रयोग नहीं है। दुनिया के कई देशों ने अपनी भौगोलिक विषमताओं, सूखे और औद्योगिक जरूरतों से निपटने के लिए विशाल इंजीनियरिंग ढाँचे खड़े किए हैं। हम दुनिया के 5 ऐसे ही प्रोजेक्ट्स के बारे में संक्षेप में बता रहे हैं।

डाटा ओपन सोर्स से, फोटो साभार: AI ChatGPT

भारत के लिए इन वैश्विक उदाहरणों को समझना बेहद जरूरी है-

चीन का South-North Water Transfer Project (Nan Shui Bei Diao): चीन का दक्षिणी हिस्सा (यांग्त्ज़ी नदी बेसिन) पानी से समृद्ध है, जबकि उसका उत्तरी हिस्सा (पीली नदी बेसिन, जहाँ बीजिंग और तियानजिन जैसे औद्योगिक शहर स्थित हैं) भयंकर जल संकट का सामना कर रहा था।

यह दुनिया की इतिहास का सबसे बड़ा जल स्थानांतरण प्रोजेक्ट है। इसमें 3 प्रमुख नहर मार्ग (Eastern, Central, and Western Routes) शामिल हैं, जिनकी कुल लंबाई 4,350 किलोमीटर से अधिक है।

इस परियोजना की लागत 62 अरब डॉलर से अधिक रही है और यह हर साल दक्षिणी नदियों से लगभग 44.8 अरब घनमीटर (BCM) पानी उत्तर की ओर स्थानांतरित करती है। इस प्रोजेक्ट ने चीन की राजधानी बीजिंग की प्यास बुझाई और उत्तर चीन के घटते भूजल स्तर को पूरी तरह रोक दिया।

अमेरिका का California State Water Project (CSWP): दरअसल, अमेरिका का कैलिफोर्निया राज्य दो विरोधाभासी हिस्सों में बँटा है। उत्तरी कैलिफोर्निया में 70% बारिश और बर्फबारी होती है, जबकि 80% पानी की माँग (कृषि और लॉस एंजिल्स जैसे शहर) दक्षिणी कैलिफोर्निया में है।

1960 के दशक में शुरू हुए इस प्रोजेक्ट के तहत 1,129 किलोमीटर लंबा ‘कैलिफोर्निया एक्वाडक्ट’ (California Aqueduct), 34 बड़े बाँध, 20 लिफ्ट पंपिंग स्टेशन और दर्जनों पावर हाउस बनाए गए। इसमें पानी को ‘तहचपी पहाड़ियों’ (Tehachapi Mountains) के ऊपर 593 मीटर की विशाल ऊँचाई तक लिफ्ट किया जाता है।

California State Water Project का ऑफिसियल मैप, साभार: water.ca.gov

इस परियोजना ने दक्षिणी कैलिफोर्निया को दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे समृद्ध फल व सब्जी उत्पादक कृषि बेल्ट बना दिया।

पाकिस्तान का Indus Basin Irrigation System (IBIS): साल 1960 की सिंधु जल संधि के बाद जब पूर्वी नदियाँ भारत को मिल गईं, तो पाकिस्तान के पंजाब और सिंध प्रांतों में सिंचाई व्यवस्था ध्वस्त होने का खतरा पैदा हो गया।

ऐसे में विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय वित्त पोषण की मदद से पाकिस्तान ने ‘इंडस बेसिन प्रोजेक्ट‘ शुरू किया। इसके तहत दुनिया के दो विशाल मिट्टी से भरे बाँध तरबेला बाँध (सिंधु नदी पर) और मंगला बाँध (झेलम नदी पर) बनाए गए।

पाकिस्तान ने सिंधु और झेलम के पानी को पूर्व की ओर बहने वाली चेनाब, रावी और सतलुज के मैदानों तक पहुँचाने के लिए 8 विशाल अंतर-नदी लिंक नहरें (link canals) बनाईं। यह आज दुनिया का सबसे बड़ा एकीकृत नहरी सिंचाई तंत्र है। हालाँकि पाकिस्तान इसे बड़े सिस्टम का सही से उपयोग नहीं कर पाता है और इसके इस्तेमाल में तमाम कमियाँ सामने आई हैं।

स्पेन का Tagus-Segura Water Transfer प्रोजेक्ट: स्पेन का उत्तर-पश्चिमी भाग (तागुस नदी) काफी गीला और पहाड़ी है, जबकि दक्षिण-पूर्वी भाग (सेगुरा नदी बेसिन) अत्यधिक शुष्क और अर्द्ध-रेगिस्तानी है। ऐसे में साल 1979 में पूरी हुई 286 किलोमीटर लंबी इस नहर प्रणाली में पानी को टनल और एक्वाडक्ट्स के जरिए विलिना पर्वत श्रृंखला को पार कराते हुए सेगुरा बेसिन में भेजा गया।

इस प्रोजेक्ट ने स्पेन के दक्षिणी भाग मुर्सिया और अलिकांते को ‘यूरोप का फल और सब्जी का कटोरा’ (Orchard of Europe) बना दिया।

ऑस्ट्रेलिया की Snowy Mountains Scheme: ऑस्ट्रेलिया के बर्फीले पहाड़ों से निकलने वाली ‘स्नोवी नदी’ का मीठा पानी पूर्व की ओर बहकर प्रशांत महासागर में बेकार गिर जाता था, जबकि ऑस्ट्रेलिया का पश्चिमी अंदरूनी इलाका (मरे-डार्लिंग बेसिन) सूखे से त्रस्त रहता था।

ऐसे में साल 1949 से 1974 के बीच बने इस विशाल इंजीनियरिंग चमत्कार में पहाड़ों के आर-पार 145 किलोमीटर लंबी भूमिगत सुरंगें (tunnels), 16 बड़े बाँध और 7 हाइड्रो पावर स्टेशन बनाए गए।

Snowy Mountains Scheme प्रोजेक्ट के आधिकारिक वेबसाइट से फोटो साभार

इसने स्नोवी नदी के पानी को मोड़कर मरे-डार्लिंग बेसिन में भेज दिया, जिससे ऑस्ट्रेलिया में लाखों एकड़ नए गेहूँ और कपास के खेतों को जीवनदान मिला और भारी मात्रा में जलविद्युत पैदा हुई। इसके अलावा भी ऑस्ट्रेलिया के अलग-अलग हिस्सों में कई प्रोजेक्ट चल रहे हैं। इसमें डेन्यूब नदी का प्रोजेक्ट कई देशों में फैला हुआ है।

भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय मॉडलों से क्या सीख है?

दुनिया के इन 5 बड़े जल स्थानांतरण मॉडलों का गहन अध्ययन करने पर भारत के नीति निर्माताओं, जल वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के लिए 5 बेहद स्पष्ट और व्यावहारिक सबक निकलकर सामने आते हैं-

राजनीतिक सहमति और पारदर्शी कानून (Political Consensus): अमेरिका के कैलिफोर्निया और स्पेन के मॉडलों से यह साफ दिखता है कि जब तक पानी देने वाले क्षेत्र (Donor Basin) और पानी लेने वाले क्षेत्र (Recipient Basin) के बीच कानूनी और वित्तीय लाभ का पारदर्शी बँटवारा नहीं होता, तब तक विवाद खत्म नहीं होते। स्पेन में आज भी तागुस और सेगुरा बेसिन के बीच राजनीतिक खींचतान चलती रहती है। भारत को अंतर-राज्यीय जल विवादों को सुलझाने के लिए एक मजबूत, संवैधानिक और सर्वमान्य राष्ट्रीय प्राधिकरण की आवश्यकता है।

दीर्घकालिक वित्तीय और तकनीकी धैर्य (Financial & Engineering Patience): चीन का साउथ-नॉर्थ प्रोजेक्ट हो या ऑस्ट्रेलिया की स्नोवी माउंटेन स्कीम, इन परियोजनाओं को पूरा होने में 20 से 50 साल का लंबा समय लगा। भारत को यह समझना होगा कि 30 लिंकों को एक साथ रातों-रात पूरा नहीं किया जा सकता। इसके लिए चरणबद्ध दृष्टिकोण (Phasing Approach) और लगातार बजट आवंटन की सख्त जरूरत है।

डाउनस्ट्रीम इकोसिस्टम की रक्षा (Ecology First): स्पेन और पाकिस्तान के अनुभवों ने दुनिया को सिखाया कि जब किसी नदी का 50% से अधिक पानी मोड़ा जाता है, तो नदी के निचले हिस्से (Downstream) का इकोसिस्टम मर जाता है, जिससे समुद्री खारापन (Salinity Intrusion) खेतों में घुसने लगता है। भारत को किसी भी नदी से केवल उतना ही ‘सरप्लस’ पानी उठाना चाहिए जिससे नदी का अपना न्यूनतम पर्यावरण प्रवाह (E-Flow / Environmental Flow) कभी बाधित न हो।

आधुनिक लिफ्टिंग और टनल तकनीक (Modern Engineering): अमेरिका ने तहचपी पहाड़ियों के ऊपर पानी लिफ्ट करने के लिए जो विशाल लिफ्ट पंप बनाए, वे इंजीनियरिंग का अद्भुत नमूना हैं। भारत के हिमालयी और प्रायद्वीपीय घटकों में पश्चिमी घाट और विंध्याचल जैसी पर्वत श्रृंखलाएँ आती हैं। भारत को पानी लिफ्ट करने और सुरंगें बनाने के लिए आधुनिक पर्यावरण-अनुकूल टनल बोरिंग मशीनों (TBM) का सहारा लेना होगा।

बहु-उद्देशीय लाभ (Multipurpose Utility): ऑस्ट्रेलिया की योजना केवल सिंचाई के लिए नहीं थी, उसने पूरे देश को सस्ती जलविद्युत (Hydro Electricity) दी, जिससे प्रोजेक्ट की लागत तेजी से वसूल हुई। भारत के सभी 30 लिंकों में जलविद्युत और अंतर्देशीय जलमार्ग (Inland Waterways) को अनिवार्य रूप से जोड़ा जाना चाहिए।

पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और विशेषज्ञों के पक्ष-विपक्ष

नदी जोड़ो योजना भारत के इतिहास की सबसे ज्यादा बहस वाली नीतियों में से एक है। देश के वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री, नौकरशाह और पर्यावरणविद दो स्पष्ट और परस्पर विरोधी धड़ों में बँटे हुए हैं। एक तरफ सरकार का समर्थन है, तो दूसरी तरफ विपक्षी खासकर एनजीओ लॉबी इन प्रोजेक्ट्स में टाँग अड़ाने की लगातार कोशिश कर रही है। हमने अपने 3 भाग के इस खास सीरीज के दूसरे पार्ट में इसके बारे में विस्तार से समझाया भी है।

समर्थकों और नीति निर्माताओं के तर्क (The Pro-Interlinking View)

खाद्य और जल सुरक्षा (Food & Water Security): वर्ष 2050 तक भारत की जनसंख्या लगभग 160 से 170 करोड़ पहुँचने का अनुमान है। इस विशाल आबादी का पेट भरने के लिए भारत को 450 मिलियन टन खाद्यान्न की आवश्यकता होगी। 30 लिंकों से पैदा होने वाली 3.5 करोड़ हेक्टेयर अतिरिक्त सिंचाई क्षमता ही देश को भुखमरी से बचा सकती है।

बाढ़ और सूखे का स्थायी उन्मूलन (Flood & Drought Mitigation): असम, बिहार और पूर्वी यूपी में हर साल बाढ़ से औसतन ₹20,000 करोड़ का ढाँचागत नुकसान होता है। बाढ़ के पानी को रोककर सूखे मराठवाड़ा, बुंदेलखंड और थार में भेजने से एक ही झटके में दोनों राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान हो जाएगा।

हरित ऊर्जा उत्पादन (Clean Energy): प्रस्तावित 30 लिंकों से लगभग 34,000 मेगावाट (34 GW) जलविद्युत पैदा होगी। यह हरित बिजली भारत को अपने कार्बन उत्सर्जन कम करने और थर्मल पावर प्लांटों पर निर्भरता घटाने में मदद करेगी।

सस्ता जलमार्ग (Inland Navigation): लिंक नहरों के बड़े नेटवर्क को राष्ट्रीय जलमार्गों (National Waterways) के रूप में विकसित किया जा सकता है, जिससे ट्रकों और ट्रेनों की तुलना में माल ढुलाई (Freight Transport) 80% सस्ती हो जाएगी।

आलोचकों और पर्यावरणविदों के तर्क (The Anti-Interlinking View)

विशाल वन विनाश और जैव विविधत का नुकसान: केन-बेतवा में पन्ना टाइगर रिजर्व का 5,803 हेक्टेयर जंगल डूब रहा है। यदि सभी 30 लिंक बनते हैं, तो देश के लाखों हेक्टेयर घने जंगल, वन्यजीव अभयारण्य और अति-दुर्लभ जैव विविधता (biodiversity) पानी में समा जाएगी।

लाखों ग्रामीणों का विस्थापन: एक अनुमान के अनुसार, 30 लिंकों के जलाशयों और नहरों के निर्माण से 15 से 20 लाख लोग बेघर होंगे, जिनमें से अधिकांश समाज के सबसे वंचित ST समुदाय हैं। भारत में विस्थापन का इतिहास (जैसे नर्मदा बचाओ आंदोलन) यह दिखाता है कि पुनर्वास नीतियाँ (Rehabilitation Policies) हमेशा कागजों तक सीमित रह जाती हैं।

नदियों के प्राकृतिक चरित्र का विनाश: जल पुरुष राजेंद्र सिंह का मानना है कि ‘नदी केवल पानी का बहता हुआ पाइप नहीं है’। नदी एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र (Living Ecosystem) है। जब हम किसी नदी का पानी खींचते हैं, तो उसके मुहाने (Estuary) पर समुद्र का खारा पानी चढ़ जाता है, जिससे तटीय भूमि बंजर हो जाती है।

ग्लोबल वार्मिंग और मानसून में अनिश्चितता (Climate Change Challenge): जलवायु परिवर्तन के कारण मानसूनी बारिश का पैटर्न बहुत तेजी से बदल रहा है। आज जिस नदी बेसिन को NWDA ‘अधिशेष’ (Surplus) मान रहा है, हो सकता है कि अगले 30 वर्षों में ग्लोबल वार्मिंग और ग्लेशियरों के पिघलने के कारण वह बेसिन खुद ‘कमी वाला’ (Deficit) बन जाए। ऐसे में ₹10 लाख करोड़ से अधिक के ये विशाल कंक्रीट के ढाँचे बेकार साबित हो सकते हैं।

पारंपरिक जल संरक्षण की उपेक्षा: आलोचकों का मानना है कि विशाल बाँधों पर लाखों करोड़ खर्च करने के बजाय यदि भारत अपने 5 लाख से अधिक पारंपरिक तालाबों, बावड़ियों, चेक डैमों और वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) को पुनर्जीवित करे, तो 10% लागत में भारत की प्यास बुझाई जा सकती है।

भविष्य की राह (The Way Forward)

भारत अपनी जल चुनौतियों को अनदेखा नहीं कर सकता, लेकिन वह आँखें मूँदकर विशाल कंक्रीट के विनाशकारी ढाँचे भी नहीं खड़ा कर सकता। भारत को ‘इंजीनियरिंग और पारिस्थिकी’ (Engineering + Ecology) के बीच एक बहुत ही सूक्ष्म और संतुलित मध्यमार्ग अपनाना होगा।

ऑपइंडिया की तरफ से नदी जोड़ो परियोजना के लिए 5 मुख्य रणनीतिक सुझाव

राज्य के भीतर वाले लिंकों को प्राथमिकता (Prioritize Intra-State Links First): अंतर-राज्यीय (Inter-State) विवादों में उलझने के बजाय, सरकार को पहले उन लिंकों पर काम करना चाहिए जो एक ही राज्य की सीमाओं के भीतर आते हैं (जैसे बिहार में कोसी-मेची लिंक या तमिलनाडु में कावेरी-वैगई लिंक)। इनमें न तो कानूनी अड़चनें हैं और न ही अंतर-राज्यीय विवाद। हालाँकि केन-बेतवा प्रोजेक्ट में इस तरह की कोई रुकावट नहीं है और इसे भारत सरकार प्राथमिकता में रखकर पूरा कर रही है।

विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन के साथ एकीकरण: नदी जोड़ो योजना को देश के ‘अमृत सरोवर अभियान’, महात्मा गांधी नरेगा के तहत बनने वाले चेक डैमों और पारंपरिक जोहड़ों-बावड़ियों के पुनरुद्धार के साथ अनिवार्य रूप से जोड़ा जाना चाहिए। बड़े बाँध केवल बैकअप होने चाहिए, पहली सुरक्षा रेखा स्थानीय जल संचयन होना चाहिए।

कृषि में जल-दक्षता (Water Use Efficiency in Agriculture): भारत का 80% से अधिक पानी केवल खेती में खर्च होता है। यदि भारत बाढ़-सिंचाई (Flood Irrigation) को छोड़कर ‘ड्रिप इरिगेशन’ (Drip irrigation) और ‘स्प्रिंकलर’ (Sprinkler) जैसी सूक्ष्म-सिंचाई तकनीकों को अनिवार्य कर दे, तो हम बिना किसी नए बाँध के करोड़ों एकड़ अतिरिक्त भूमि सींच सकते हैं।

स्वतंत्र वैज्ञानिक और सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन: किसी भी लिंक को हरी झंडी देने से पहले आईआईटी (IITs), भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) और स्वतंत्र पर्यावरण संस्थाओं से जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का निष्पक्ष अध्ययन कराया जाना चाहिए। हालाँकि भारत सरकार सभी प्रोजेक्ट्स के लिए ऐसी मूल्कांकन की नीति अपनाती रही है।

पारदर्शी और मानवीय पुनर्वास कानून: दौधन बाँध की तरह परियोजना शुरू होने से पहले विस्थापितों को खेती योग्य भूमि, स्थायी रोजगार और सम्मानजनक नागरिक सुविधाएँ देना अनिवार्य किया जाए। इस दिशा में भी भारत सरकार उल्लेखनीय काम कर रही है।

ओपन सोर्स डाटा पर आधारित तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT)

क्या यह भारत की जल क्रांति बनेगी या सबसे कठिन चुनौती?

21वीं सदी के मध्य में खड़ा भारत आज एक बहुत बड़े ऐतिहासिक और नैतिक चौराहे पर आ चुका है। एक तरफ हमारे सामने 140 करोड़ से अधिक प्यासे नागरिकों की बुनियादी जरूरतें, सुखते हुए कुएँ, दम तोड़ते शहर और मानसून की दया पर टिकी भारत की विशाल ग्रामीण अर्थव्यवस्था है। दूसरी तरफ हमारी जीवनदायिनी नदियाँ, पन्ना जैसे घने जंगल, संकटग्रस्त वन्यजीव और अपनी पुश्तैनी जमीनों से बेघर होते हुए हमारे अपने आदिवासी भाई-बहन हैं।

राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी (NWDA) की यह विशाल ‘नदी जोड़ो योजना’ (Interlinking of Rivers) निस्संदेह स्वतंत्र भारत के इतिहास की सबसे साहसी, सबसे दूरदर्शी और सबसे विशाल इंजीनियरिंग परिकल्पना है। यदि इसे केवल एक ‘कंक्रीट का बाँध और नहर बनाने का प्रोजेक्ट’ मानकर लागू किया गया, तो यह योजना नौकरशाही की लापरवाही, मुआवजे के घोटालों, अंतहीन अंतर-राज्यीय अदालती मुकदमों और भयानक पर्यावरणीय तबाही का नया जरिया बनकर रह जाएगी।

इसके विपरीत यदि भारत सरकार और राज्य सरकारें इसे दलगत राजनीति से ऊपर उठाकर, चीन और अमेरिका के तकनीकी अनुभवों से सबक लेते हुए, कड़े पर्यावरणीय मानकों, आधुनिक तकनीक, पारदर्शी सामाजिक पुनर्वास और मानवीय संवेदनाओं के साथ चरणबद्ध तरीके से लागू करती हैं, तो यह योजना निसंदेह 21वीं सदी में भारत की सबसे बड़ी ‘राष्ट्रीय जल क्रांति’ (National Water Revolution) साबित होगी।

यह परियोजना केवल दो नदियों या दो राज्यों को जोड़ने का काम नहीं करेगी, बल्कि यह भारत के सुनहरे भविष्य, खाद्य सुरक्षा, आर्थिक समृद्धि और राष्ट्र की अखंडता को एक अटूट सूत्र में पिरोने का ऐतिहासिक काम करेगी। फैसला हमारे हाथ में है कि हम इस विशाल इंजीनियरिंग क्षमता का उपयोग कुदरत के साथ संतुलन बनाकर अपनी प्यासी धरती को हरा-भरा करने में कैसे करते हैं।

(नोट: इस सीरीज का Part I पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। Part II के लिए यहाँ क्लिक करें।)

‘मेलोनी समझकर तो नहीं पकड़ा था?’: राहुल गाँधी-संदीप दीक्षित की PM मोदी और इटली की प्रधानमंत्री को लेकर घटिया टिप्पणी, कॉन्ग्रेस का महिला-विरोधी चेहरा फिर उजागर

नई दिल्ली में आयोजित रचनात्मक कॉन्ग्रेस राष्ट्रीय अधिवेशन के दौरान कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी और संदीप दीक्षित ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को लेकर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणियाँ कीं। अधिवेशन में बोलते हुए गाँधी अपने ही अंदाज में प्रधानमंत्री मोदी और भारत की विदेश नीति का मजाक उड़ा रहे थे।

अचानक गाँधी कुछ ज्यादा ही नाटकीय अंदाज में आ गए और मंच पर मौजूद संदीप दीक्षित को आवाज दी। उन्होंने अपनी बाँहें फैलाकर उन्हें गले लगाने का इशारा किया। जैसे ही दीक्षित पीछे मुड़े, गाँधी तेजी से उनकी ओर बढ़े और उन्हें एक अजीब तरीके से गले लगा लिया। गाँधी ऐसा करके प्रधानमंत्री मोदी की नकल करने की कोशिश कर रहे थे, जिन्हें विदेश यात्राओं के दौरान दूसरे देशों के राष्ट्राध्यक्ष अक्सर गले लगाकर स्वागत करते हैं।

गाँधी की इस हरकत को देखकर दर्शक हँसने लगे। इसके बाद गाँधी ने प्रधानमंत्री मोदी का मजाक उड़ाते हुए कहा कि उनके लिए विदेश नीति का मतलब ही लोगों को गले लगाना है। इसी दौरान दीक्षित ने बीच में बोलते हुए एक भद्दी और सेक्सिस्ट टिप्पणी की, “मुझे मेलोनी समझकर तो नहीं पकड़ा था?” इस आपत्तिजनक टिप्पणी के बाद गाँधी और दीक्षित दोनों जोर-जोर से हँसने लगे।

कॉन्ग्रेस नेताओं ने भारत और इटली के बीच के उस गर्मजोशी भरे और मैत्रीपूर्ण रिश्ते को, जो प्रधानमंत्री मोदी और इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी के बीच बातचीत और मुलाकातों में दिखाई देता है, घटिया और सेक्सिस्ट मजाक तक सीमित कर दिया।

अपने ही सेक्सिस्ट बयानों का रिकॉर्ड रखने वाली सुप्रिया श्रीनेत भी साथ हँसीं

मंच पर मौजूद कॉन्ग्रेस नेताओं का यह व्यवहार कॉन्ग्रेस पार्टी में गहराई तक मौजूद सेक्सिज्म का एक उदाहरण था। दर्शकों के बीच बैठी कॉन्ग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत अपने नेता द्वारा एक महिला को लेकर किए गए आपत्तिजनक इशारे पर जोर-जोर से हँस रही थीं।

हालाँकि, श्रीनेत से इस तरह के व्यवहार की उम्मीद कोई हैरानी की बात नहीं थी। वह खुद बीजेपी सांसद कंगना रनौत के खिलाफ सेक्सिस्ट टिप्पणी कर चुकी हैं। एक इंस्टाग्राम पोस्ट में, जिसे बाद में डिलीट कर दिया गया था, कॉन्ग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने कंगना रनौत की एक बेहद भड़काऊ तस्वीर के साथ लिखा था, “क्या भाव चल रहा है मंडी में कोई बताएगा?”

अपने सत्यापित सोशल मीडिया अकाउंट से की गई इस आपत्तिजनक पोस्ट को लेकर भारी विरोध होने के बाद श्रीनेत ने सफाई जारी कर खुद का बचाव किया। अपने स्पष्टीकरण वाले वीडियो में उन्होंने दावा किया कि किसी ऐसे व्यक्ति ने, जिसके पास उनके अकाउंट का एक्सेस था यह पोस्ट की थी। उन्होंने यह भी कहा कि पोस्ट करने वाले व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

महिला राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के प्रति बेहद सेक्सिस्ट और अपमानजनक व्यवहार दिखाने वाली श्रीनेत अकेली कॉन्ग्रेस नेता नहीं थीं। कॉन्ग्रेस के एक अन्य पदाधिकारी एचएस अहीर ने भी कंगना रनौत के खिलाफ अभद्र टिप्पणी की थी। उन्होंने मंडी से उनकी उम्मीदवारी को लेकर ‘मंडी से र**’ जैसी बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी की थी।

कॉन्ग्रेस के भीतर की महिलाओं को भी निशाना बनाते रहे हैं पार्टी के लोग

कॉन्ग्रेस पार्टी के भीतर मौजूद यह बेलगाम सेक्सिज्म केवल पार्टी के बाहर की महिलाओं तक सीमित नहीं रहा है। पार्टी के भीतर की महिलाएँ भी इसका शिकार रही हैं। कॉन्ग्रेस की पूर्व प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी, जो लंबे समय तक पार्टी से जुड़ी रही थीं और पार्टी की एक मजबूत आवाज थीं, भी कॉन्ग्रेस में मौजूद इस सेक्सिज्म का शिकार हुई थीं।

सितंबर 2018 में मथुरा में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कॉन्ग्रेस के कुछ कार्यकर्ताओं ने चतुर्वेदी के साथ बदसलूकी की थी। पार्टी ने शुरुआत में इन कार्यकर्ताओं को निलंबित कर दिया था लेकिन अप्रैल 2019 में उन्हें फिर से पार्टी में बहाल कर दिया गया।

अपनी पार्टी के इस रुख से निराश चतुर्वेदी ने 2019 में कॉन्ग्रेस से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कहा था कि संगठन में उनकी सेवाओं को महत्व नहीं दिया गया और पार्टी में बने रहने का मतलब उनकी गरिमा और आत्मसम्मान से समझौता करना होगा।

प्रियंका चतुर्वेदी का यह मामला भी दिखाता है कि महिलाओं की गरिमा से जुड़े मुद्दे कॉन्ग्रेस के भीतर राजनीतिक हितों के आगे कैसे पीछे हो सकते हैं। जिन कार्यकर्ताओं पर उनके साथ बदसलूकी का आरोप था, उन्हें पहले निलंबित किया गया और बाद में फिर से पार्टी में शामिल कर लिया गया। इससे यह धारणा और मजबूत हुई कि जब पार्टी के हितों की बात आती है तो अनुशासनात्मक कार्रवाई भी कमजोर पड़ सकती है।

आखिरकार चतुर्वेदी ने कॉन्ग्रेस छोड़ दी और इसकी वजह के तौर पर अपनी गरिमा और आत्मसम्मान के खत्म होने की बात कही।

सेक्सिस्ट व्यवहार का एक पैटर्न और कॉन्ग्रेस नेतृत्व की चुप्पी

दिलचस्प बात यह है कि कॉन्ग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व, जिसमें राहुल गाँधी भी शामिल हैं, ने पार्टी के भीतर महिलाओं के खिलाफ हुए सेक्सिस्ट और महिला-विरोधी व्यवहार की निंदा तक नहीं की। ऐसे तत्वों के खिलाफ सख्त रुख अपनाना तो दूर की बात है।

इसलिए इस पूरे मामले को केवल किसी एक व्यक्ति की एक बार की गलती या अलग-थलग घटना कहकर खारिज करना मुश्किल है। राहुल गाँधी और संदीप दीक्षित की सार्वजनिक रूप से की गई घटिया बातचीत से लेकर महिला राजनीतिक विरोधियों और यहाँ तक कि कॉन्ग्रेस की अपनी नेताओं से जुड़े पुराने बयानों और घटनाओं तक, ऐसे बार-बार सामने आए मामले पार्टी के महिलाओं के प्रति रवैये पर असहज सवाल खड़े करते हैं।

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की ओर से लगातार और सख्त प्रतिक्रिया न आने से ऐसे व्यवहार को सामान्य बनाने का खतरा पैदा होता है। यही वह व्यवहार है, जिसका विरोध राजनीतिक पार्टियाँ आम तौर पर करने का दावा करती हैं।

राहुल गाँधी, संदीप दीक्षित और जॉर्जिया मेलोनी से जुड़ा यह ताजा मामला इसलिए एक बड़ा सवाल खड़ा करता है: प्रधानमंत्री मोदी का राजनीतिक विरोध आखिर बार-बार महिलाओं को लेकर व्यक्तिगत, सेक्सिस्ट और अपमानजनक टिप्पणियों तक क्यों पहुँच जाता है?

नदी जोड़ो मेगा प्रोजेक्ट Part II: बुंदेलखंड को केन-बेतवा रिवर लिंक परियोजना की सबसे ज्यादा जरूरत क्यों?

नदी जोड़ो परियोजना Part I में आपने पढ़ा कि भारत के लिए ये मेगा प्रोजेक्ट क्यों जरूरी है। अब Part II में पढ़ें कि इस मेगा प्रोजेक्ट का फ्लैगशिप प्रोजेक्ट यानी केन-बेतवा नदी लिंक प्रोजेक्ट क्या है। क्या यह प्रोजेक्ट वाकई सूखाग्रस्त बुंदेलखंड की तस्वीर और तकदीर बदलने में कामयाब हो पाएगा? पढ़ें सबकुछ विस्तार से…

भारत सरकार ने सोमवार (10 अगस्त 2026) को राज्यसभा में कहा कि भारत के अतिमहत्वाकांक्षी नदी जोड़ो परियोजना में शीर्ष पर केन-बेतवा नदी लिंक प्रोजेक्ट है। फिलहाल इसी को पूरा करने पर भारत सरकार का जोर है। इसके अलावा सभी प्रोजेक्ट्स पर राज्य सरकारें अपने हिसाब से काम कर रही हैं।

वहीं राष्ट्रीय महत्व की एक और परियोजना पोलावरम इरिगेशन प्रोजेक्ट (PIP) को आंध्र प्रदेश सरकार और पोलावरम प्रोजेक्ट अथॉरिटी (PPA) मिलकर पूरा कर रहे हैं। ये गोदावरी और कृष्णा नदी को जोड़ने वाला प्रोजेक्ट है, जो फाइनल स्टेज में है। इस प्रोजेक्ट को अब तक केंद्र सरकार से ₹20,658 करोड़ की मदद मिल चुकी है। राज्यसभा में जल शक्ति मंत्रालय के केंद्रीय राज्यमंत्री राज भूषण चौधरी ने इस बारे में पूछे गए सवाल पर लिखित में जवाब दिया है।

अब आते हैं मूल मुद्दे पर। दरअसल, भारत में नदियों को आपस में जोड़कर राष्ट्रीय जल ग्रिड बनाने के दशकों पुराने सपने को जब धरातल (Ground Level) पर उतारने की ऐतिहासिक शुरुआत हुई, तो इसके लिए जिस पहली परियोजना को चुना गया, वह है- ‘केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट’ (Ken-Betwa Link Project – KBLP)।

देश के पहले ‘रिवर-लिंकिंग मॉडल’ की शुरुआत और केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट

राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी (NWDA) द्वारा चिन्हित की गई 30 अंतर-बेसिन जल स्थानांतरण (Inter-Basin Water Transfer) परियोजनाओं में से केन-बेतवा पहली ऐसी राष्ट्रीय परियोजना बनी, जिस पर केंद्र सरकार, मध्य प्रदेश सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार ने औपचारिक और ऐतिहासिक सहमति जताई। 8 दिसंबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने इस परियोजना के लिए ₹44,605 करोड़ की विशाल धन राशि को मंजूरी दी।

यह महत्वाकांक्षी परियोजना मुख्य रूप से मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैले मध्य भारत के सबसे सूखाग्रस्त, पिछड़े और सामाजिक-आर्थिक रूप से उपेक्षित क्षेत्र बुंदेलखंड (Bundelkhand) की किस्मत और तस्वीर बदलने के इरादे से बनाई गई है।

केन-बेतवा प्रोजेक्ट का आधिकारिक मैप, फोटो साभार: nwda . gov . in

भौगोलिक दृष्टिकोण से देखें तो केन और बेतवा दोनों ही नदियाँ मध्य प्रदेश से निकलती हैं। मध्य प्रदेश के रायसेन जिले से निकलने वाली बेतवा और कटनी जिले से निकलने वाली केन नदी उत्तर पूर्व दिशा की ओर बहते हुए अंततः उत्तर प्रदेश में अलग-अलग स्थानों पर यमुना नदी में जाकर मिल जाती हैं।

केंद्रीय जल आयोग (CWC) और NWDA के गहन हाइड्रोलॉजिकल अध्ययनों (Hydrological Studies) के अनुसार, केन नदी बेसिन में उसकी अपनी कृषि, पेयजल और भविष्य की स्थानीय जरूरतों को पूरा करने के बाद भी मानसूनी बारिश के दौरान भारी मात्रा में जल ‘अधिशेष’ (Surplus) बच जाता है। यह अधिशेष पानी हर साल उफान के रूप में बहकर यमुना में गिरता है और अंततः समुद्र में बेकार चला जाता है।

केन-बेतवा प्रोजेक्ट फैक्ट बॉक्स, डाटा: NWDA (फोटो साभार: AI ChatGPT)

दूसरी ओर बेतवा नदी का बेसिन एक ‘कमी वाला बेसिन’ (Deficit Basin) है। बेतवा नदी के आसपास के इलाकों (विशेषकर ऊपरी और मध्य बेसिन) में कृषि, उद्योगों और पेयजल के लिए पानी की भारी किल्लत बनी रहती है। इसी जल असंतुलन को संतुलित करने के लिए केन नदी के अधिशेष पानी को 221 किलोमीटर लंबी नहर के जरिए मोड़कर बेतवा नदी में पहुँचाने का वैज्ञानिक खाका तैयार किया गया।

दौधन बाँध और 221 किमी लंबी लिंक नहर है परियोजना का केंद्र बिंदु

केन-बेतवा लिंक परियोजना सिविल इंजीनियरिंग और जल प्रबंधन का एक बेहद जटिल, आधुनिक और विशाल ढाँचा है। इस परियोजना की पूरी कार्यप्रणाली मुख्य रूप से दो बड़े इंजीनियरिंग संरचनात्मक घटकों पर टिकी हुई है-

  • दौधन बाँध (Daudhan Dam): परियोजना का मुख्य केंद्र बिंदु और रीढ़ मध्य प्रदेश के छतरपुर और पन्ना जिलों की सीमा पर केन नदी पर बनने वाला दौधन बाँध (Daudhan Dam) है। दौधन बाँध की ऊँचाई लगभग 77 मीटर और लंबाई लगभग 2,031 मीटर प्रस्तावित है।

दौधन बाँध के तहत बनने वाला डैम एक बहुउद्देशीय (Multipurpose) जलाशय होगा, जिसकी कुल जल भंडारण क्षमता लगभग 2,853 लाख घनमीटर (Million Cubic Meters – MCM) होगी। इसका मुख्य कार्य मानसून के दौरान केन नदी के प्रचंड जलप्रवाह को रोकना और उसे साल भर के उपयोग के लिए सुरक्षित रखना है।

केन-बेतना लिंक प्रोजेक्ट के तकनीकी पहलुओं को दर्शाती प्रतीकात्मक तस्वीर, डाटा : NWDA (फोटो साभार: AI ChatGPT)
  • 221 किलोमीटर लंबी मुख्य लिंक नहर (Main Link Canal): दौधन बाँध के जलाशय से एक विशाल, कंक्रीट-लाइन्ड (concrete-lined) मुख्य लिंक नहर निकाली जाएगी। यह नहर लगभग 221 किलोमीटर लंबी होगी, जिसमें से करीब 21 किलोमीटर का हिस्सा उत्तर प्रदेश की सीमा में और बाकी हिस्सा मध्य प्रदेश में होगा।

इंजीनियरिंग चमत्कार के तौर पर नहर के मार्ग में प्राकृतिक ढलान (Gravity Flow) का अधिकतम उपयोग किया गया है। लेकिन जहाँ भौगोलिक बाधाएँ या ऊँचे इलाके आते हैं, वहाँ आधुनिक लिफ्ट पंपिंग स्टेशन (Lift Pumping Stations), भूमिगत सुरंगें (Tunnels) और एक्वाडक्ट्स (Aqueducts) बनाए जा रहे हैं ताकि पानी बिना किसी रुकावट के बेतवा नदी के ऊपरी बेसिन तक पहुँच सके।

नहर के मार्ग में पड़ने वाले स्थानीय तालाबों, चंदेलकालीन बावड़ियों और अन्य छोटी नदियों (जैसे बीना, ओर आदि) को भी इस मुख्य नहर प्रणाली से जोड़ा जाएगा ताकि रास्ते में पड़ने वाले सैकड़ों ग्रामीण इलाकों को सीधे पानी दिया जा सके।

2 चरणों में पूरा होगा केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट

केन-बेतवा परियोजना के विशाल आकार, भारी भरकम बजट और तकनीकी जटिलता को देखते हुए प्रशासनिक सुगमता के लिए इसके क्रियान्वयन को दो प्रमुख चरणों (Phase-I & Phase-II) में विभाजित किया गया है-

केन-बेतना लिंक प्रोजेक्ट फेज-1: पहले चरण का मुख्य ध्यान केन नदी के जल को रोकने और उसे बेतवा तक पहुँचाने के प्राथमिक ढाँचे पर केंद्रित है। इसके तहत मुख्य निर्माण कार्य किए जाएँगे, जिसमें दौधन बाँध का निर्माण, 221 किमी लंबी मुख्य लिंक नहर, लोअर ओर परियोजना (Lower Orr Project), कोठा बैराज (Kotha Barrage) और दो पावर हाउस बनाए जा रहे हैं।

इसके अलावा बिजली उत्पादन के लिए दौधन बाँध स्थल पर दो मुख्य पावर हाउस स्थापित किए जाएँगे, जिनकी कुल क्षमता 103 मेगावाट जलविद्युत (Hydro Power) और 27 मेगावाट सौर ऊर्जा (Solar Power) पैदा करने की होगी।

चरण-1 का प्राथमिक लक्ष्य छतरपुर, पन्ना, टीकमगढ़ और बांदा जैसे सबसे ज्यादा जल-संकटग्रस्त सीमावर्ती जिलों को तत्काल पेयजल और सिंचाई का पानी उपलब्ध कराना है।

केन-बेतना लिंक प्रोजेक्ट के तकनीकी पहलुओं को दर्शाती प्रतीकात्मक तस्वीर, डाटा : NWDA (फोटो साभार: AI ChatGPT)

केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट फेज-2: दूसरे चरण में बेतवा नदी और उसकी सहायक नदियों पर पूरक संरचनाओं (Subsidiary Structures) का निर्माण किया जाना है ताकि स्थानांतरित पानी का कुशल वितरण हो सके। इसके तहत 3 प्रमुख परियोजनाओं का निर्माण शामिल है-

  1. बीना कॉम्प्लेक्स बहुउद्देशीय परियोजना (Bina Complex Multipurpose Project): इसके तहत सागर जिले में बीना और उसकी सहायक नदियों पर बाँध व नहरें बनाई जाएँगी।
  2. कोठा बैराज (Kotha Barrage): विदिशा जिले में बेतवा नदी पर बैराज निर्माण किया जाएगा।
  3. लोअर ओर परियोजना (Lower Orr Project): शिवपुरी और गुना जिलों के लिए ओर नदी पर बाँध बनाए जाएँगे।

चरण-2 का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि केन नदी से लाया गया पानी बेतवा के कैचमेंट एरिया में अंतिम छोर पर स्थित खेत तक पहुँचे और किसी भी स्तर पर पानी का नुकसान न हो।

बुंदेलखंड के जिलों को होने वाले प्रत्यक्ष लाभ बहुत ज्यादा

बुंदेलखंड मध्य भारत का एक ऐसा ऐतिहासिक क्षेत्र है जो पिछले कई दशकों से भीषण सूखे, कुओं और हैंडपंपों के सूखने, गरीबी और बड़े पैमाने पर खेतिहर मजदूरों के पलायन (Migration) के लिए जाना जाता है। बुंदेलखंड क्षेत्र मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कुल 13 जिलों में फैला हुआ है। केन-बेतवा परियोजना को इस पूरे इलाके के लिए एक ‘संजीवनी बूटी’ के रूप में देखा जा रहा है।

मध्य प्रदेश के 10 जिलों छतरपुर, पन्ना, टीकमगढ़, निवाड़ी, दमोह, सागर, दतिया, विदिशा, शिवपुरी और रायसेन में कुल 6.35 लाख हेक्टेयर इलाके की सिंचाई होगी। इसके साथ ही 41 लाख आबादी को पेयजल मिलेगा। भूजल रिचार्ज होने के साथ ही कृषि कार्य में भी स्थायित्व आएगा।

वहीं उत्तर प्रदेश के 4 जिलों बाँदा, महोबा, झांसी और ललितपुर की 2.51 लाख हेक्टेयर भूमि सिंचित होगी। 21 लाख आबादी को हर घर नल से जल मिलेगा। साथ ही बांदा और महोबा जिलों में सूखे का लगभग खात्मा हो जाएगा।

दरअसल, गर्मी के दिनों में इन 13 जिलों में जलस्तर खतरनाक रूप से नीचे चला जाता है। ग्रामीणों को पानी के एक-एक मटके के लिए 3 से 4 किलोमीटर दूर पैदल भटकना पड़ता है। इस परियोजना के पूरा होने से न केवल हर घर को साफ पेयजल मिलेगा, बल्कि मवेशियों के पीने और स्थानीय उद्योगों के लिए भी पानी की निरंतर उपलब्धता बनी रहेगी।

सिंचाई, पेयजल और औद्योगिक जल के वितरण का गणित

NWDA और जल शक्ति मंत्रालय की विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) के अनुसार, केन-बेतवा लिंक परियोजना के सामाजिक-आर्थिक आँकड़े बेहद क्रांतिकारी बदलाव का इशारा करते हैं। जिसमें-

साल भर सिंचाई (Annual Irrigation): परियोजना के पूरी तरह चालू होने पर हर साल कुल 10.62 लाख हेक्टेयर (10,62,000 hectares) कृषि योग्य भूमि में वार्षिक सिंचाई हो सकेगी। इसमें से 6.35 लाख हेक्टेयर क्षेत्र मध्य प्रदेश में सिंचित होगा तो 2.51 लाख हेक्टेयर क्षेत्र उत्तर प्रदेश के सूखाग्रस्त जिलों में सिंचित होगा।। इसके अलावा 1.76 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र को मौजूदा नहर प्रणालियों के सुदृढ़ीकरण से पानी मिलेगा। सिंचाई का यह नियमित साधन बुंदेलखंड के किसानों को मानसून की अनिश्चितता से पूरी तरह आजाद कर देगा, जिससे वे साल में केवल एक फसल के बजाय दो या तीन फसलें (रबी, खरीफ और जायद) उगा सकेंगे।

केन-बेतवा प्रोजेक्ट, प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT)

सुरक्षित पेयजल (Safe Drinking Water): केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट से बुंदेलखंड की लगभग 62 लाख आबादी (41 लाख मध्य प्रदेश में और 21 लाख उत्तर प्रदेश में) को पाइपलाइन और नलों के जरिए 24 घंटे सुरक्षित और साफ पीने का पानी मिलेगा। इससे दूषित जल से होने वाली बीमारियों (Water-Borne Diseases) पर रोक लगेगी और महिलाओं को पानी ढोने की शारीरिक परेशानी से मुक्ति मिलेगी।

औद्योगिक जल आपूर्ति (Industrial Water Supply): उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में बन रहे ‘डिफेंस औद्योगिक कॉरिडोर’ (Defense Industrial Corridor), स्थानीय कृषि प्रसंस्करण इकाइयों (food processing units) और छोटे-मझोले उद्योगों के लिए लगभग 62 MCM पानी विशेष रूप से आवंटित किया गया है। पर्याप्त पानी मिलने से बुंदेलखंड में नए औद्योगिक निवेश का मार्ग प्रशस्त होगा।

जलविद्युत उत्पादन और भूजल रिचार्ज का प्रभाव

स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन (Clean Energy Generation): दौधन बाँध पर स्थापित होने वाले दो पावर स्टेशनों के माध्यम से कुल 103 मेगावाट हाइड्रो पावर (Hydro Power) का उत्पादन किया जाएगा। इसके अलावा जलाशय के सतह और नहर के किनारों पर 27 मेगावाट सौर ऊर्जा (Solar Power) संयंत्र स्थापित किए जाएंगे।

इस तरह कुल 130 मेगावाट स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन होगा। इस बिजली का उपयोग प्राथमिक रूप से परियोजना के अपने लिफ्ट सिंचाई पंपों (Lift Irrigation Pumps) को चलाने में किया जाएगा और बची हुई बिजली स्थानीय ग्रामीण ग्रिड को दी जाएगी, जिससे बिजली संकट दूर होगा।

भूजल रिचार्ज (Groundwater Recharge): बुंदेलखंड का अधिकांश धरातलीय ढाँचा कठोर चट्टानों (Hard Crystalline Rocks) से बना है। यहाँ बारिश का पानी स्वाभाविक रूप से आसानी से जमीन के भीतर नहीं रिस पाता, जिसके कारण लगातार ट्यूबवेलों के इस्तेमाल से भूजल स्तर खतरनाक रूप से गिर चुका था।

जब 221 किलोमीटर लंबी विशाल लिंक नहर और दौधन बाँध का विशाल जलाशय बनेगा, तो आसपास के दर्जनों किलोमीटर के क्षेत्र में निरंतर सीपेज (Seepage) और जल रिसाव होगा। इससे पूरे बुंदेलखंड क्षेत्र का वाटर टेबल (Water Table) कई मीटर ऊपर उठेगा। सूखे पड़े पारंपरिक कुएँ, बावड़ियाँ और बोरवेल खुद ब खुद जीवित हो उठेंगे, जो सूखे के समय सुरक्षा कवच का काम करेंगे।

कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कायापलट से पलायन पर लगेगा स्थाई ब्रेक

बुंदेलखंड की सबसे बड़ी सामाजिक त्रासदी रही है-‘मजबूरी का पलायन’ (Forced Migration)। पानी के अभाव में फसलें जल जाने के कारण हर साल मानसून खत्म होते ही लाखों युवा, छोटे किसान और पूरे के पूरे परिवार दिल्ली, मुंबई, सूरत और अहमदाबाद जैसे महानगरों में दिहाड़ी मजदूरी करने चले जाते थे।

केन-बेतवा परियोजना इस मानवीय और आर्थिक दुष्चक्र को तोड़ने की क्षमता रखती है, इससे होने वाले लाभों में-

  • फसल विविधीकरण (Crop Diversification): अब तक किसान सिर्फ ज्वार, बाजरा या कम पानी वाली तिलहन फसलों तक सीमित थे। सिंचाई का पानी मिलने से वे गेहूँ, चना, सरसों, दलहन के साथ-साथ हरी सब्जियां, फल और नकदी फसलों (Cash Crops) की खेती कर सकेंगे।
  • स्थानीय रोजगार का सृजन: खेतों में साल भर काम रहने से कृषि मजदूरों को गाँव में ही रोजगार मिलेगा। साथ ही डेरी फार्मिंग (Dairy Farming), पशुपालन और मत्स्य पालन (Fisheries) को जबरदस्त बढ़ावा मिलेगा।
  • आर्थिक स्थिरता: कृषि में पैदावार और कमाई निश्चित होने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, जिससे पलायन की दर में भारी कमी आएगी।

पर्यावरणीय प्रभाव और पन्ना टाइगर रिजर्व पर गहरा संकट (जरूरी मुद्दा)

जहाँ एक तरफ केन-बेतवा लिंक विकास और खुशहाली के वादे करती है, वहीं दूसरी तरफ इसका सबसे विवादास्पद, संवेदनशील और चिंताजनक पहलू है – पर्यावरण और वन्यजीवों पर पड़ने वाला विनाशकारी प्रभाव।

पन्ना टाइगर रिजर्व (Panna Tiger Reserve) का डूबना: दौधन बाँध का निर्माण मध्य प्रदेश के विश्वप्रसिद्ध पन्ना टाइगर रिजर्व (PTR) के ठीक पेट यानी उसके कोर एरिया के भीतर हो रहा है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, बाँध बनने की वजह से पन्ना टाइगर रिजर्व की कुल 5,803 हेक्टेयर वन भूमि पूरी तरह से जलमग्न हो जाएगी। इस 5,803 हेक्टेयर में से लगभग 4,141 हेक्टेयर क्षेत्र पन्ना का ‘कोर टाइगर हैबिटैट’ (Core Tiger Habitat) है।

पन्ना वही टाइगर रिजर्व है जिसने 2009 में अपने सभी बाघों को खोने के बाद एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक बाघ पुनरुद्धार कार्यक्रम के जरिए अपनी आबादी दोबारा बसाई थी। बाँध के कारण बाघों के शिकार करने का क्षेत्र और उनके गलियारे (Corridors) हमेशा के लिए दो हिस्सों में बँट जाएँगे।

हालाँकि सरकार और Wildlife Institute of India (WII) का दावा है कि पन्ना के नुकसान की भरपाई के लिए ₹1,000 करोड़ से अधिक की एक विशेष योजना बनाई गई है। इसके तहत आसपास के रानीपुर वन्यजीव अभयारण्य (यूपी) और नौरादेही (एमपी) के जंगलों को पन्ना से जोड़कर एक विशाल ‘ग्रेटर पन्ना लैंडस्केप’ बनाया जा रहा है ताकि बाघ आसानी से विचरण कर सकें।

केवल बाघ ही नहीं, केन नदी का यह क्षेत्र विश्व स्तर पर संकटग्रस्त गिद्धों (Vultures) का सबसे बड़ा प्राकृतिक घोंसला स्थल (Nesting Site) है। बाँध बनने से गिद्धों की दुर्लभ प्रजातियों के चट्टानी आवास पानी में डूब जाएंगे। इसके अलावा केन नदी में पाए जाने वाले घड़ियाल (Gharial Sanctuary) और दुर्लभ जलीय जीवों के प्राकृतिक प्रवाह पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

विशाल जलाशय और नहर निर्माण के लिए पन्ना के घने जंगलों से लगभग 20 लाख से अधिक विशाल और पुराने पेड़ों को काटा जाना तय है, जिसकी भरपाई केवल नए पौधे लगाकर तुरंत नहीं की जा सकती।

केन-बेतवा प्रोजेक्ट के पक्ष में विशेषज्ञों की राय: इस प्रोजेक्ट समर्थकों का तर्क है कि 62 लाख लोगों की प्यास बुझाना और लाखों एकड़ बंजर खेतों को सींचना किसी भी अन्य नुकसान से बड़ा मानवीय धर्म है। बुंदेलखंड को गरीबी से निकालने का कोई और बड़ा विकल्प उपलब्ध नहीं है।

आलोचकों और पर्यावरणविदों का पक्ष: जल विशेषज्ञों का तर्क है कि केन नदी को ‘सरप्लस’ बताना वैज्ञानिक रूप से गलत है। मानसून के दौरान केन का उफान ही बुंदेलखंड के अपने पारितंत्र और यमुना को जीवित रखता है। केन का पानी खींचने से केन नदी खुद आने वाले समय में सूख सकती है।

आलोचकों का मानना है कि अरबों रुपये खर्च करके जंगलों और बाघों के आवास को डुबोने के बजाय, यदि बुंदेलखंड के पारंपरिक चंदेल और बुंदेला कालीन हजारों तालाबों, बावड़ियों, वाटरशेड प्रबंधन (Watershed Management) और चेक डैमों का जीर्णोद्धार किया जाता, तो बेहद कम लागत और बिना किसी पर्यावरणीय नुकसान के बुंदेलखंड का जल संकट हल हो सकता था।

वॉटरमैन ऑफ इंडिया राजेंद्र सिंह ने भी रखा अपना पक्ष: भारत के वॉटरमैन ऑफ इंडिया के नाम से मशहूर राजेंद्र सिंह इस योजना की कड़ी खिलाफत कर रहे हैं। उन्होंने ऑपइंडिया के एसोसिएट ए़़डिटर श्रवण शुक्ल से फोन पर बातचीत में कहा, “नदी जोड़ो योजना भारत को तोड़ने की भयानक योजना है। ये संवैधानिक रूप से भारत की नदियों के तिहरे अधिकार (केंद्र, राज्य और पंचायतों-म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन का हक) को तोड़ने की कोशिश है।”

राजेंद्र सिंह ने दावा किया इस योजना को मनमोहन सिंह सरकार ने मंजूरी दे दी थी, लेकिन हमारे विरोध के बाद और हमारा पक्ष सुनने के बाद मनमोहन-राहुल-सोनिया गाँधी ने इसे रोक दिया था। अब सिर्फ पैसों के बंदरबाँट की वजह से ये योजना चल रही है। उन्होंने दावा किया कि ये योजना कतई सफल नहीं होगी। उन्होंने कहा कि इस योजना का हश्र भी सतलुज ब्यास लिंक की तरह ही होगा, जिसमें आजतक पानी नहीं आया।

राजेंद्र सिंह ने कहा कि इस भयानक प्रोजेक्ट को भारत के लिए उपयोगी नहीं मानना चाहिए। उन्होंने कहा कि मैं इस प्रोजेक्ट के 100 नुकसान गिना सकता हूँ, जबकि सरकार फायदे बताती है कि सूखा खत्म होगा, पानी आ जाएगा। उन्होंने कहा कि जब केन और बेतवा के कैचमेंट में एक बराबर बारिश होती है, तो केन में ज्यादा पानी का दावा कैसे किया जा रहा है। उन्होंने PSI-देहरादून की एक स्टडी रिपोर्ट का भी हवाला दिया, जिसमें केन नदी के पानी को सरप्लस नहीं माना गया है।

दौधन बाँध से विस्थापन का दर्द, मुआवजे का घोटाला और ST लोगों का जनाक्रोश: रिपोर्ट्स

कागजी नक्शों और सरकारी रिपोर्ट्स में ‘विकास की विशाल गंगा’ के रूप में दिखाई देने वाले केन-बेतवा प्रोजेक्ट से जुड़ी कुछ जमीनी समस्याएँ भी मौजूद हैं। जुलाई 2026 की मीडिया रिपोर्ट में सामने आया है कि छतरपुर और पन्ना जिलों के दौधन बाँध के डूब क्षेत्र में आने वाले गाँवों में आज भारी तनाव और अनिश्चितता का माहौल है।

आदिवासियों का बेघर होना और विस्थापन (Displacement Crisis): दौधन बाँध के जलाशय में पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में बसे दौधन, खरयानी, पचमढ़ी, ढोढन, मैनारी और पलकोहा जैसे दर्जनों आदिवासी गाँव पूरी तरह जलमग्न हो जाएँगे। यहाँ पीढ़ियों से रहने वाले गोंड और बैगा आदिवासी अपनी पुश्तैनी जमीनों, जंगलों और सांस्कृतिक पहचान को खोने के मुहाने पर खड़े हैं।

मई 2026 में प्रकाशित ‘द हिंदू’ के ‘फ्रंटलाइन’ की ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, विस्थापित होने वाले ST परिवारों को पन्ना के जंगलों से बाहर निकालकर जिन अनजान और बंजर इलाकों में बसाने की योजना है, वहाँ न तो खेती के लायक जमीन है और न ही आजीविका के साधन। लोगों का कहना है, “जंगल और नदी ही हमारी माँ और आजीविका हैं, हमें मुआवजा नहीं, अपनी जमीन चाहिए।”

मुआवजे का घोटाला और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप (Compensation Scam): दौधन बाँध के डूब क्षेत्र के गाँवों में मुआवजा वितरण को लेकर बड़े पैमाने पर धांधली और भ्रष्टाचार की खबरें राष्ट्रीय सुर्खियों में हैं।

और द न्यू इंडिया एक्सप्रेस की (26 जुलाई 2026) रिपोर्ट्स के मुताबिक, छतरपुर और पन्ना जिला प्रशासन के निचले स्तर के कर्मचारियों और भू-माफियाओं के गठजोड़ ने फर्जी सर्वे रिपोर्ट तैयार की हैं। आरोप हैं कि बाहरी रसूखदार लोगों ने बाँध की घोषणा होते ही ST परिवारों की कीमती जमीनों को कौड़ियों के भाव खरीद लिया और अब वे करोड़ों रुपये का सरकारी मुआवजा हड़प रहे हैं।

दैनिक भास्कर ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि मुआवजा पाने के लिए भी लोगों को रिश्वत देनी पड़ रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, असली विस्थापित ग्रामीणों को पुनर्वास नीति के तहत सही मुआवजा और पारदर्शी पुनर्वास पैकेज (Rehabilitation Package) नहीं मिल पा रहा है। विस्थापित ग्रामीण मुआवजे में धाँधली को लेकर कड़ाके की ठंड और बारिश के बावजूद महीनों से सड़कों पर धरना देने को मजबूर हैं।

इसी सामाजिक असंतोष और विस्थापन के दर्द ने केन-बेतवा प्रोजेक्ट को एक बहुत ही संवेदनशील राजनीतिक और नैतिक मोड़ पर ला खड़ा किया है।

बहरहाल, ऐसे प्रशासनिक और राजनीतिक समस्याओं का हल सरकार को ही ढूँढना होगा, क्योंकि ऐसी छोटी समस्याओं के लिए राष्ट्रीय महत्व के बड़े प्रोजेक्ट्स को रोका नहीं जा सकता। क्योंकि ये प्रोजेक्ट न केवल बुंदेलखंड के लिए जरूरी है, बल्कि इस प्रोजेक्ट का असर देश के दूरगामी भविष्य पर भी पड़ेगा।

केन-बेतवा प्रोजेक्ट साइट, प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT)

प्रोजेक्ट की लागत, समयसीमा और वर्तमान स्थिति (Project Status)

वित्तीय स्वीकृति और लागत (Financial Cost): इस मेगा प्रोजेक्ट के लिए अनुमानित कुल लागत कई बार बढ़ चुकी है। हालाँकि दिसंबर 2021 में केंद्रीय कैबिनेट द्वारा स्वीकृत कुल लागत ₹44,605 करोड़ है। इस कुल लागत में से 90% हिस्सेदारी (लगभग ₹39,317 करोड़) केंद्र सरकार द्वारा अनुदान और ऋण के रूप में दी जा रही है, जबकि केवल 10% लागत मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सरकारें मिलकर वहन करेंगी।

सरकार ने परियोजना को पूरा करने के लिए 8 वर्ष की समयसीमा तय की थी। आधिकारिक लक्ष्य के अनुसार, इसे 2029-2030 तक पूरी तरह से बनाकर चालू करने की योजना है।

वर्तमान स्थिति (Current Ground Status – 2026): केंद्र सरकार ने प्रोजेक्ट को संचालित करने के लिए विशेष प्राधिकरण केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट अथॉरिटी (KBLPA) का गठन किया है।

दौधन बाँध स्थल पर शुरुआती इंफ्रास्ट्रक्चर, अप्रोच रोड और लिंक नहर के लिए भूमि अधिग्रहण (Land Acquisition) की प्रक्रिया जारी है।

डाटा: NWDA, PIB, Govt of India, प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT)

क्या केन-बेतवा मॉडल भारत की दूसरी नदी जोड़ो परियोजनाओं का आधार बन सकता है?

केन-बेतवा लिंक परियोजना केवल बुंदेलखंड के दो जिलों में बनने वाला बाँध या नहर भर नहीं है। यह परियोजना वास्तव में पूरे भारत में प्रस्तावित अन्य 29 अंतर-बेसिन नदी जोड़ो परियोजनाओं के लिए एक ‘नेशनल टेस्ट केस’ (National Test Case) है। पूरी दुनिया और भारत के नीति निर्माता इस बात पर गहराई से नजर गड़ाए हुए हैं कि यह मॉडल धरातल पर कैसा प्रदर्शन करता है। ऐसे में अगर…

केन-बेतवा सफल होता है: अगर यह परियोजना अपने तय समय, स्वीकृत बजट और पर्यावरणीय संतुलन के साथ सफलतापूर्वक पूरी हो जाती है और बुंदेलखंड के 62 लाख लोगों को सूखा व गरीबी से मुक्ति दिलाती है, तो यह साबित हो जाएगा कि भारत में बड़े पैमाने पर अंतर-बेसिन जल स्थानांतरण संभव है। इससे हिमालयी और प्रायद्वीपीय घटक के अन्य 29 प्रस्तावित लिंकों (जैसे मानस-संकोश-तीस्ता या महानदी-गोदावरी) के लिए राजनीतिक, सामाजिक और जनता के बीच सहमति बनाना बेहद आसान हो जाएगा।

अगर केन-बेतवा विफल या विवादित होता है: अगर केन-बेतवा परियोजना अत्यधिक वित्तीय देरी, बजट वृद्धि (cost overrun), मुआवजे के घोटालों, विस्थापित आदिवासियों के भारी असंतोष या पन्ना के पारिस्थितिकी तंत्र की स्थाई तबाही का पर्याय बनती है, तो भविष्य में भारत में किसी भी अन्य दो नदियों को आपस में जोड़ने की राष्ट्रीय योजना पर हमेशा के लिए बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लग जाएगा।

इसलिए केन-बेतवा परियोजना की सफलता या विफलता केवल बुंदेलखंड का भाग्य तय नहीं करेगी, बल्कि यह 21वीं सदी में भारत के पूरे राष्ट्रीय जल प्रबंधन, रिवर-लिंकिंग विजन और पर्यावरण नीति का भविष्य तय करने वाली सबसे महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगी।

(भारत की नदी जोड़ो परियोजना Part III में पढ़िए: भारत की बाकी प्रमुख नदी जोड़ो परियोजनाएँ, हिमालयी और प्रायद्वीपीय (Peninsular) लिंकों का पूरा गहन विश्लेषण, हिमाचल-पंजाब-राजस्थान और जम्मू-कश्मीर से जुड़े आधिकारिक प्रस्ताव। इसके साथ ही जानिए दुनिया भर के सबसे बड़े जल स्थानांतरण प्रयोगों का सच- चीन का South–North Water Transfer Project, अमेरिका का California State Water Project, पाकिस्तान का Indus Basin Irrigation System, स्पेन का Tagus–Segura Transfer और ऑस्ट्रेलिया की Snowy Mountains Scheme।

इन प्रोजेक्ट्स से समझिए भारत के लिए इनसे क्या सबक हैं, क्या हैं पर्यावरणीय चुनौतियाँ, जलवायु परिवर्तन का असर और अंतिम निष्कर्ष कि क्या नदी जोड़ो योजना भारत की जल क्रांति बन सकती है या यह सबसे कठिन और पेचीदा राष्ट्रीय परियोजनाओं में से एक साबित होगी…)

उमर खालिद की ‘कुर्बानी’ का जश्न मनातीं आरफा खानम, ताहिर हुसैन के लिए भी बहाए थे आँसू: अपने ‘पोस्टर बॉय’ के लिए अदालत पर मढ़ा ‘फर्जी’ दोष, जानें- पूरी सच्चाई

‘हमारे लिए वो एक इंस्पिरेशन है, वो एक रेवोल्यूशनरी है, एक बड़ा स्कॉलर है। एक ऐसा इंसान है जिसने अपनी आजादी, अपनी जिंदगी बहुत कुछ कुर्बान किया’… ये बयान है, आरफा खानम शेरवानी का। आपको लगेगा किसी स्वतंत्रता के किसी बड़े नायक की चर्चा हो रही है लेकिन ठहरिए… जहाँ यह भाषणबाजी हो रही थी वो मौका था- उमर खालिद के जन्मदिन का और दिल्ली के प्रेस क्लब में वामपंथियों का मजमा लगा था।

मंगलवार (11 अगस्त 2026) को प्रेस क्लब में उमर खालिद की किताब ‘फ्रैक्चर्ड कम्युनिटीज़: आदिवासी हिस्ट्रीज एंड द पॉलिटिक्स ऑफ पावर’ पर चर्चा हुई, चर्चा क्या, वामपंथियों का प्रोपेगेंडा ही फैलाया जा रहा था। इसमें अपूर्वानंद झा, प्रोफेसर प्रभु महापात्रा, आरफा खानुम शेरवानी और ‘द वायर’ के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन समेत कई वामपंथी मौजूद थे और हर कोई उमर की शान में कसीदे ही पढ़ रहा था।

और सबसे ज्यादा जोश में, जैसा की उम्मीद ही थी, आरफा ही नजर आई। आरफा के भाषण से अगर उमर का नाम हटाकर उसे सुनें तो लगेगा कि किसी बड़े स्वतंत्रता सेनानी को याद किया जा रहा है, किसी क्रांतिकारी का गुणगान किया जा रहा है। लेकिन उमर खालिद कौन? दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगों का आरोपित, उमर खालिद कौन? जो 6 साल से जेल में UAPA के तहत बंद है, उमर खालिद कौन? जिसे पर लगे आरोप इतने गंभीर हैं कि देश की अदालतें जमानत तक देना मुनासिब नहीं समझ रही हैं। वही उमर खालिद, आरफा जैसे इन वामपंथियों का पोस्टर ब्वॉय है।

सिर्फ इतना ही नहीं, यही आरफा उमर को एक त्यौहार की तरह मानाना चाहती है, उसकी ‘शान’ में गजल पढ़ रही है। आरफा अपने भाषण में आगे कहती हैं, “एक तरह से त्यौहार के तौर पर, हर कुछ दिन बाद उमर को मनाने का एक त्यौहार, एक कार्निवल के तौर पर… उमर की आजादी का, उमर की स्कॉलरशिप का, उमर की कुर्बानी का, उमर के जज्बे का, उमर के इंकलाब… का जश्न मनाने के लिए हम सब यहाँ पर मौजूद हैं। ये काम उमर के दोस्त करते हैं, मैं बहुत-बहुत शुक्रिया उमर के दोस्तों का अदा करना चाहती हूँ।”

आरफा ने अमीर कजलबाश की गजल के जो शेर पढ़े, उनका मोटा-मोटी मानी यही है कि अगर आवाज को जबरदस्ती दबाया जाता है, तो वह दबती नहीं है बल्कि एक भयानक तूफान या क्रांति का रूप लेकर वापस आती है। यानी, वही कहानी जो वो उनका वामपंथी ‘ईकोसिस्टम’ वर्षों से गढ़ रहा है।

आरफा ने जो प्रोपेगेंडा किया सो किया, जो रोना रोया सो रोया लेकिन उन्होंने अदालतों को भी नहीं छोड़ा। वो कहती हैं, “अगर उमर गुनहगार है तो उसे फाँसी पर चढ़ा दीजिए। भारत के कानून के तहत उमर के ऊपर जो धाराएँ हैं, उसमें जितनी सबसे सख्त जो सजा हो उमर को वो दीजिए। लेकिन सिर्फ मेरी एक इल्तजा, एक गुजारिश, एक सिर्फ अपील ये होगी हमारे जज साहिबान से कि आप एक बार उसका केस शुरू कर दीजिए। अब तो ये हो गया है कि हमारी जो उच्च अदालतें हैं, वो भी दबाव में काम कर रही हैं।”

उमर को जेल से बाहर निकाले जाने को लेकर आरफा कहती हैं, “एक राजनीतिक फैसला है। अगर ये कानूनी फैसला होता तो हम कहते कि भई 4 वकीलों को बिठा लीजिए और जिरह कर लेते हैं, गवाह-सबूत पेश करते हैं और उसके बाद देख लेते हैं। मैं तो कहती हूँ कि अगर उमर गुनहगार है तो उसे फाँसी पर चढ़ा दीजिए। भारत के कानून के तहत उमर के ऊपर जो धाराएँ हैं उसमें जितनी सबसे सख्त जो सजा हो उमर को वो दीजिए। लेकिन सिर्फ मेरी एक इल्तजा, एक गुजारिश, एक सिर्फ अपील ये होगी हमारे जज साहिबान से कि आप एक बार उसका केस शुरू कर दीजिए।”

सुनने में आपको लगेगा कि भई बात तो सही है लेकिन असली बात वो है जो इसके पीछे छिपी है। ऑपइंडिया ने पहले भी बताया था कि कैसे यह सारा खेल उमर खालिद और उसके वकीलों द्वारा खेला जा रहा है। उमर खालिद मामले में कोर्ट द्वारा देर की ही नहीं जा रही, ये सारा विलंब याचिका डालने और फिर उसे वापस लेने में चक्कर में हो रहा है।

दरअसल, सत्र न्यायालय मे 8 माह के भीतर ही खालिद की याचिका खारिज की थी, फिर हाईकोर्ट ने 6 महीने में। इसके बाद वो जब सुप्रीम कोर्ट गया तो 14 में से 7 बार मामला उसके वकील के कारण स्थगित हुआ। उमर खालिद के मामले में सुनवाई के लिए कपिल सिब्बल ‘फोरम शॉपिंग’ के जरिए अपनी किस्मत आजमा रहे थे। (फोरम शॉपिंग तब होती है जब कोई पक्ष किसी ऐसे न्यायालय या न्याय क्षेत्र को चुनता है जिसके बारे में उन्हें लगता है कि वह उनके पक्ष में फैसले दे सकते हैं।)

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने खुद एक इंटरव्यू में कहा था कि उमर खालिद को जो बेल नहीं मिली है उसकी वजह कोई और नहीं बल्कि खुद उमर खालिद और उनके वकील हैं जिन्होंने कोर्ट में बेल याचिकाएँ लंबित रहने के दौरान ही कम से कम 7 बार मामले में एडजर्न कराया। यानी जिस बात को आरफा अदालत पर डाल कर अपने ‘हीरो’ को बचाने की जुगत लगा रही हैं वो प्रोपेगेंडा पहले ही फेल हो चुका है। अब आगे बढ़ते हैं।

उमर खालिद इन वामपंथियों का अकेला पोस्टर ब्यॉय नहीं है। बस आपको ‘टुकड़े-टुकड़े’ वाली मानसिकता लानी है, देश का विरोध करना है ये आपकी जय-जयकार… या यूँ कहें कि आपको ‘लाल सलाम’ करने लगेंगे। इन्ही आरफा का एक चहेता था- AAP का पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन। वही, ताहिर जिसको दिल्ली दंगों के दौरान IB कर्मी अंकित शर्मा की हत्या के मामले में कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनाई है।

आपको शायद ना याद हो लेकिन यह ताहिर हुसैन भी कभी, आरफा जैसों का पोस्टर ब्वॉय था। आरफा खानम ने ताहिर हुसैन का इंटरव्यू तक किया था। यह तब किया गया जब दिल्ली पुलिस ताहिर हुसैन की तलाश कर रही थी। आरफा ने दंगाई ताहिर को कानून का पालन करने वाला नागरिक दिखाने की कोशिश की। उसने X पर इस इंटरव्यू को शेयर करते हुए लिखा था, “कोर्ट द्वारा आत्मसमर्पण याचिका रद्द कर दी गई है। ताहिर हुसैन को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।” ताहिर हुसैन ने ‘द वायर’ से कहा था, “मुझे अपनी न्यायिक व्यवस्था पर पूरा भरोसा है। कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने जा रहा हूँ।”

इसी ताहिर हुसैन ने न्यायिक हिरासत के दौरान अपना गुनाह कबूला था। उसने खुलासा करते हुए बताया था कि वो CAA के समर्थकों को सबक सिखाना चाहता था। ये बात सिर्फ ताहिर हुसैन और उमर खालिद तक की सीमित नहीं है, ऐसे दर्जनों नाम आपको मिल जाएँगे।

सवाल अब सिर्फ उमर खालिद के जन्मदिन पर हुई बयानबाजी का नहीं है। सवाल उस पूरे वैचारिक कारोबार का है जिसमें अदालत का फैसला आने से पहले ही किसी आरोपित को ‘क्रांतिकारी’ बना दिया जाता है। लोकतंत्र में किसी को कानूनी अधिकार मिलना चाहिए, इस पर शायद ही किसी को आपत्ति हो सकती है। लेकिन कानूनी प्रक्रिया की आड़ में किसी आरोपित का महिमामंडन करना ईमानदार बहस नहीं बल्कि प्रोपेगेंडा का हिस्सा ही होता है।

अदालत पर सवाल उठाना आसान है लेकिन क्या अपनी तरफ की पूरी कहानी भी जनता के सामने रखी जाएगी? क्या यह बताया जाएगा कि मामले की सुनवाई में देरी किन परिस्थितियों में हुई, किस पक्ष की ओर से कितनी बार स्थगन माँगा गया और अदालतों में अब तक क्या-क्या हुआ? या फिर हर बार एक ही सुविधाजनक कहानी सुनाई जाएगी।

इससे भी बड़ा सवाल उस ‘पोस्टर बॉय’ संस्कृति का है, जिसमें राजनीतिक विचारधारा के हिसाब का ‘किरदार’ मिलते ही पूरा इकोसिस्टम उसके लिए शब्दों का ऐसा महल खड़ा कर देता है कि आरोप, मुकदमा और पीड़ितों की चर्चा पीछे छूट जाती है। कभी ‘क्रांतिकारी’, कभी ‘प्रतिरोध की आवाज’, कभी ‘कुर्बानी’… शब्द बदलते रहते हैं लेकिन पैटर्न वही रहता है। किसी के खिलाफ आरोप हैं तो अदालत तय करेगी कि वह दोषी है या नहीं, लेकिन अदालत के फैसले से पहले उसे वैचारिक शहीद बना देना किस तरह का निष्पक्ष विमर्श है?

फर्जी Video, झूठे आरोप, हमले और नफरती बयान… काँवड़ यात्रा को बदनाम करने के लिए वामपंथी-कट्टरपंथी और मीडिया कैसे फैलाते हैं भ्रम, पढ़ें- पूरा विश्लेषण

सावन के पवित्र महीने में काँवड़ यात्रा का समापन हो चुका है। लाखों शिवभक्तों ने कठिन रास्तों को पार करते हुए अपनी आस्था की डुबकी लगाई और जलाभिषेक किया। लेकिन इस पूरी यात्रा के दौरान एक दूसरा पहलू भी देखने को मिला, जो बेहद चिंताजनक था। कुछ कट्टरपंथी ताकतों, वामपंथी विचारकों और पक्षपाती मीडिया ने मिलकर काँवड़ यात्रा और काँवड़ियों को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

कहीं काँवड़ियों पर कातिलाना हमले हुए, तो कहीं सोशल मीडिया पर फर्जी वीडियो फैलाकर उन्हें उपद्रवी साबित करने की कोशिश की गई। इसमें हम जानेंगे कि कैसे इस साल की काँवड़ यात्रा पर सुनियोजित तरीके से हिंदू आस्था के खिलाफ भ्रम और नफरत फैलाई गई।

काँवड़ियों और हिंदुओं पर शारीरिक हमले: ग्वालियर से लखीमपुर तक हिंसा

काँवड़ यात्रा के दौरान देश के कई हिस्सों में शिवभक्तों को सीधे तौर पर निशाना बनाया गया। मध्य प्रदेश के ग्वालियर में रात के उस समय भयानक तनाव फैल गया, जब काँवड़ यात्रा में शामिल होने जा रहे कुछ युवकों पर कथित तौर पर मुस्लिम युवकों ने हमला कर दिया। कार से टक्कर लगने को लेकर उपजा विवाद पल भर में हिंसक झड़प में बदल गया।

मुस्लिम हमलावरों ने तलवारों, हथौड़ों और पत्थरों से काँवड़ियों पर हमला किया। इस बर्बर हमले में विवेक यादव नाम का युवक गंभीर रूप से घायल हो गया, जिसके सिर में 18 टांके लगाने पड़े। घटना के बाद विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने थाने के बाहर विरोध किया और आरोपितों की गिरफ्तारी की माँग की। पुलिस ने इस मामले में अरशद खान, गोलू खान, अकील खान और बंटू खान समेत अन्य के खिलाफ FIR दर्ज की।

इसी तरह उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी के थाना खीरी क्षेत्र में भी काँवड़ियों के जत्थे पर पथराव किया गया। रुखिया गाँव से करीब 40-50 काँवड़िये नहर के पास स्थित मंदिर से जल लेकर जा रहे थे। जब उनका जत्था जुलाहनपुरवा के पास पहुँचा, तो अचानक उन पर पथराव शुरू हो गया, जिससे सड़क पर भगदड़ मच गई।

इस हमले में राजापुर के रहने वाले काँवड़िया विकास के सिर में गंभीर चोटें आईं। पुलिस ने मौके पर पहुँचकर स्थिति संभाली और जाँच में जुटी। हालाँकि पुलिस ने प्रारंभिक जाँच में एक मानसिक रूप से अस्वस्थ नाबालिग का हाथ बताया, लेकिन इस तरह की घटनाएँ यह साबित करने के लिए काफी हैं कि यात्रा के दौरान माहौल बिगाड़ने और हिंदुओं को निशाना बनाने के प्रयास लगातार किए जा रहे थे।

मीडिया और सोशल मीडिया का गंदा खेल: मेरठ की घटना पर फैलाया गया सफेद झूठ

सावन के महीने में वामपंथियों और कट्टरपंथियों की आँखों में काँवड़िए हमेशा से खटकते रहे हैं। वे हरसंभव तरीके से इनकी छवि को धूमिल करने की फिराक में रहते हैं। ऐसा ही एक घिनौना प्रयास मेरठ की घटना को लेकर किया गया। सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल किया गया, जिसमें दावा किया गया कि काँवड़ियों ने पुलिस के साथ मारपीट की है, उनकी वर्दी फाड़ी है और उन्हें पीटकर भगा दिया है।

इस फर्जी नैरेटिव को फैलाने में कई जाने-माने सोशल मीडिया हैंडल और तथाकथित पत्रकारों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। ‘मुस्लिम वॉयस सेल’ के ट्वीट से लेकर पीयूष राय, सचिन गुप्ता और जाकिर त्यागी जैसे लोगों ने इस वीडियो को शेयर किया। यहाँ तक कि चर्चित फैक्टचेकर मोहम्मद जुबैर ने भी इस भ्रामक दावे को रिपोस्ट किया।

जब इस मामले में मेरठ पुलिस का आधिकारिक बयान सामने आया, तो पूरा सच जनता के सामने आ गया। पुलिस ने स्पष्ट किया कि वायरल वीडियो के दावे पूरी तरह झूठे हैं। असलियत यह थी कि 3 अगस्त की रात जब दो अलग-अलग काँवड़ियों के ग्रुप आमने-सामने आए, तो सोनू और गुड्डू नाम के युवकों का दूसरे काँवड़ियों से टकराव हो गया। दौराला पुलिस ने मौके पर पहुँचकर सूझबूझ दिखाई और उन दोनों को अपनी जीप में बैठाकर सुरक्षित करने की कोशिश की।

तभी दूसरा पक्ष उग्र होकर उन्हीं लोगों को गाड़ी से बाहर खींचने की कोशिश करने लगा। पुलिस के साथ कोई मारपीट नहीं हुई थी और न ही किसी की वर्दी फाड़ी गई थी। इसके बावजूद, मेनस्ट्रीम मीडिया के कुछ संस्थानों ने भी बिना पुलिस का पक्ष जाने ‘पुलिसकर्मियों की पिटाई’ की हेडलाइन के साथ सनसनीखेज खबरें चला दीं, जिससे साबित होता है कि मीडिया का एक वर्ग किस हद तक काँवड़ियों के खिलाफ पूर्वाग्रही है।

मुख्यधारा की मीडिया और वामपंथियों का एजेंडा: ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ से लेकर तुष्टिकरण का रोना

सिर्फ सोशल मीडिया ही नहीं, बल्कि बड़े और प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबारों ने भी काँवड़ यात्रा के खिलाफ अपने संपादकीय के जरिए वैचारिक जहर उगला। ‘द इंडियन एक्सप्रेस‘ में छपे एक लेख (शीर्षक: The problem isn’t the kanwar yatra. It’s a patronising state) में काँवड़ यात्रा और इसके भक्तों पर गंभीर कटाक्ष किए गए। इस लेख में तर्क दिया गया कि राज्य सरकारों द्वारा काँवड़ियों का स्वागत करना, उन पर फूलों की वर्षा करना (जैसे प्रयागराज में आईजी और डीएम द्वारा किया गया) या यात्रा मार्ग पर गैर-वेज की दुकानों पर रोक लगाना और दुकानदारों के नाम लिखने के आदेश देना धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ है।

लेख में यहाँ तक कह दिया गया कि सरकारें भक्तों का राजनीतिक इस्तेमाल कर रही हैं और उनकी तुलना जिन्ना या सावरकर की राजनीति से कर डाली। यह नजरिया पूरी तरह से दोहरे मापदंड को दिखाता है। जब अन्य मजहबों के आयोजनों या जुलूसों में प्रशासनिक व्यवस्थाएँ की जाती हैं, तब यही वर्ग मौन रहता है, लेकिन जब हिंदू युवा अपनी आस्था के साथ सड़कों पर निकलते हैं, तो उन्हें ‘असुविधा’ या ‘भीड़ का डर’ कहकर प्रोजेक्ट किया जाने लगता है।

सरकार के अधिकारियों द्वारा काँवड़ियों का स्वागत करना या उनके रास्ते की व्यवस्था संभालना एक जन कल्याणकारी और प्रशासनिक जिम्मेदारी है, जिसे वामपंथी विचारक हमेशा ‘अल्पसंख्यकों के खिलाफ बहिष्कार’ और ‘तुष्टिकरण’ का रंग देने की कोशिश करते हैं। यह सब इस बात का प्रमाण है कि एक खास वैचारिक वर्ग हिंदू आस्था को सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह मिटाना चाहता है।

नफरती बयानों और सोशल मीडिया का जहर

काँवड़ यात्रा को बदनाम करने में मजहबी कट्टरपंथियों ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी ने मर्यादा की सभी हदें पार करते हुए काँवड़ यात्रा पर जाने वाले शिवभक्तों को सीधे तौर पर ‘आतंकवादी’ और नशेड़ी करार दिया। मौलाना साजिद ने अपनी नफरत भरी जुबान से आरोप लगाया कि काँवड़िए सड़कों पर नंगा नाच करते हैं, शराब पीते हैं, एंबुलेंस को रोकते हैं, स्कूल वैन के शीशे तोड़ते हैं और पुलिसवालों को पीटते हैं।

मौलाना साजिद ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर भी अभद्र तंज कसे और काँवड़ यात्रा को रोकने की माँग की। एक तरफ जहाँ मौलाना जैसे लोग हिंदुओं की आस्था को कुचलने वाले बयान देते हैं, वहीं दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर यह दुष्प्रचार किया गया कि काँवड़िए शिवजी का मूल मंत्र छोड़कर मनमाने नारे लगाते हैं।

हद तो तब हो गई जब मुफ्ती शाहनवाज ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट जारी कर खुलेआम जहर उगला। उसने कहा, “हमारे इस्लाम में किसी गैर मुस्लिम की मदद करना, पानी पिलाना या खाना खिलाना हराम है।”

यह बयान इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि कट्टरपंथी किस तरह समाज में नफरत की दीवारें खड़ी करना चाहते हैं। एक तरफ जहाँ हिंदू समाज सहृदयता और सेवा भाव का परिचय देता है, वहीं दूसरी तरफ ऐसे कट्टरपंथी उपदेश देकर दो समुदायों के बीच नफरत का जहर घोलने का काम कर रहे हैं। इन तमाम बयानों और पोस्टों का मकसद सिर्फ और सिर्फ काँवड़ यात्रा को सांप्रदायिक रंग देना और हिंदुओं की आस्था को ठेस पहुँचाना था।

हिंदू त्योहारों पर सुनियोजित तरीके से होता हमला…

इस वर्ष (2026) की काँवड़ यात्रा को लेकर भारत में सनातन धर्म और उसके प्रतीकों को बदनाम करने के लिए किस प्रकार एक सुनियोजित इकोसिस्टम काम कर रहा है। एक तरफ जहाँ भोले-भाले शिवभक्त अपनी कठिन यात्रा पूरी कर रहे थे, वहीं दूसरी तरफ कट्टरपंथी, वामपंथी विचारक, और कुछ बिकाऊ मीडिया संस्थान मिलकर उन पर हमले करवा रहे थे और दूसरी तरफ फर्जी वीडियो के जरिए उन्हें ही उपद्रवी साबित करने में जुटे थे।

मुहर्रम या अन्य जुलूसों के दौरान खुलेआम निकलने वाले हथियारों और हिंसक प्रदर्शनों पर आँखें मूंद लेने वाले लोग, काँवड़ियों के हाथों में एक छोटी सी लाठी या डंडे को भी बहुत बड़ा मुद्दा बना देते हैं। सरकार के कल्याणकारी कार्यों और जनता की आस्था को कुचलने का यह कुचक्र हमेशा से चलता आ रहा है। सनातन धर्म और हिंदू त्योहारों से नफरत करने वाले कट्टरपंथी और वामपंथी ऐसे समय में सुनियोजित तरीके से हमला करते हैं।

साथ सोने को कहता था, गलत इरादे से छूता था: जंतर-मंतर पर बिरयानी वाला जुनैद निकला ‘मोलेस्टर’, जानें ऑपइंडिया से बातचीत में क्या बोलीं CJP वॉलंटियर?

छात्रों को बिरयानी खिलाने वाला मोहम्मद जुनैद असल में ठरकी निकला! ये मैं नहीं कह रही, खुद जंतर-मंतर पर प्रोटेस्ट में शामिल हुईं लड़कियाँ ये कह रही हैं। उन्हीं में एक महिला माहिरा कश्यप ने जुनैद के खिलाफ कानून शिकायत दर्ज कराई है, इन्हें कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने वॉलंटियर बनाया था, और ये प्रदर्शन स्थल पर झाड़ूँ और बाकी साफ-सफाई का जिम्मा संभालती थीं।

माहिरा कश्यप की 4 अगस्त 2026 को दिल्ली के पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने में की गई लिखित शिकायत ने जुनैद का असली चेहरा सबके सामने ला दिया है। ये वही जुनैद है, जिसके चेहरे पर प्रोटेस्ट को सेकुलर बताया जा रहा था, लिबरल-वामपंथी गैंग जुनैद के खाने बाँटने की वीडियोज को खूब सराह रहे थे। लेकिन असल में वह प्रोटेस्ट में किस एजेंडा के साथ गया था, वो माहिरा कश्यप की शिकायत से पता लग गया है।

लिखित शिकायत से खुले प्रोटेस्ट में जुनैद के कारनामे

इंस्टाग्राम पर ठीक-ठाक फॉलोवर्स वालीं माहिरा कश्यप ने 04 अगस्त 2026 को पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस थाने में मोहम्मद जुनैद के खिलाफ लिखित शिकायत की। शिकायत में माहिरा कश्यप बताती हैं कि जंतर-मंतर पर चल रहे प्रदर्शन में वह वॉलंटियर के तौर पर मदद कर रही थीं। इसी दौरान उनकी बातचीत मोहम्मद जुनैद से हुई। शुरुआत में माहिरा ने जुनैद से दोस्ताना तरीके से ही बात की और उस पर भरोसा किया।

माहिरा का कहना है कि कुछ समय बाद उन्होंने नोटिस किया कि जुनैद कई लड़कियों के साथ ठीक तरीके से पेश नहीं आ रहा था। उसके व्यवहार से लड़कियाँ असहज हो रही थीं। माहिरा ने शिकायत में कहा कि उनके साथ भी जुनैद ने इसी तरह का व्यवहार किया, जो उन्हें पसंद नहीं आया। उनका कहना है कि इस तरह के व्यवहार की वजह से जंतर-मंतर पर प्रदर्शन में शामिल महिलाओं के बीच असहज और असुरक्षित माहौल बन रहा था।

माहिरा के मुताबिक, कुछ लड़कियों ने भी जुनैद के व्यवहार को लेकर अपनी परेशानी बताई थी। उन्होंने खुद भी ऐसी चीजें देखी थीं। इसके बाद उन्होंने अभिजीत दिपके से इस बारे में बात की। माहिरा का कहना है कि 11 जुलाई को उन्होंने जुनैद से प्रदर्शन वाली जगह छोड़ने को कहा और उसे वहाँ से हटा दिया, ताकि वहाँ मौजूद महिलाओं के लिए माहौल सुरक्षित रहे।

माहिरा ने पुलिस से यह भी कहा है कि 11 जुलाई की इस घटना की जंतर-मंतर प्रदर्शन स्थल पर लगे सीसीटीवी कैमरों में रिकॉर्डिंग हो सकती है। इसलिए उन्होंने जाँच अधिकारी से संबंधित सीसीटीवी फुटेज निकलवाने और उसे सुरक्षित रखने की माँग की है।

अभिजीत दिपके के बयान दर्ज करने की माँग

शिकायत में माहिरा ने आगे बताया कि सोनम वांगचुक की हिरासत के अगले दिन जुनैद दोबारा प्रदर्शन स्थल पर आया। उसने माहिरा से अपने व्यवहार के लिए माफी माँगी। माहिरा के मुताबिक, बातचीत के दौरान जुनैद ने माना कि उसका व्यवहार गलत था और उसने इसके लिए माफी माँगी। माहिरा का कहना है कि इस बातचीत की एक ऑडियो रिकॉर्डिंग उनके पास है, जिसे वह पुलिस को सबूत के तौर पर देने के लिए तैयार हैं।

इसके बाद माहिरा ने इंस्टाग्राम पर लाइव आकर लोगों को इस पूरे मामले के बारे में बताया। इसी लाइव के दौरान जुनैद का साथी राशिद भी जुड़ा और उसने कहा कि जुनैद अपने व्यवहार के लिए सार्वजनिक तौर पर माफी माँगेगा। हालाँकि, माहिरा का कहना है कि इसके बाद भी जुनैद की तरफ से अभी तक कोई सार्वजनिक माफी नहीं माँगी गई है।

माहिरा ने शिकायत में यह भी बताया कि उन्होंने अभिजीत दिपके को जुनैद के महिलाओं के साथ गंदे व्यवहार के बारे में जानकारी दी थी। उनका कहना है कि वह अकेली महिला नहीं थीं जिसने इस बारे में शिकायत की थी। दूसरी महिलाओं ने भी अभिजीत दिपके और उनकी टीम से संपर्क करके जुनैद के व्यवहार को लेकर अपनी परेशानी बताई थी। इसलिए माहिरा ने पुलिस से अभिजीत दिपके का बयान दर्ज करने की माँग की है, क्योंकि उन्हें इस मामले में हुई दूसरी शिकायतों के बारे में भी जानकारी हो सकती है।

आखिर में माहिरा ने कहा है कि उनकी शिकायत उनके खुद के अनुभव, उनके सामने हुई घटनाओं और उनके पास मौजूद सबूतों पर आधारित है। उन्होंने पुलिस से मामले की निष्पक्ष जाँच करने और मोहम्मद जुनैद के खिलाफ कानून के मुताबिक कार्रवाई करने की माँग की है।

ऑपइंडिया से बातचीत में क्या बोलीं माहिरा कश्यप?

ऑपइंडिया ने इस शिकायत को लेकर माहिरा कश्यप से संपर्क किया। माहिरा ने बताया कि उनकी शिकायत पर पुलिस ने अब तक कोई FIR दर्ज नहीं की है। उन्होंने यह भी दावा किया कि जुनैद इस शिकायत के डर से ही झारखंड के प्रोटेस्ट में पहुँचा है। जुनैद के गंदे व्यवहार के बारे में बताते हुए माहिरा ने कहा कि वह इकलौती लड़की नहीं हैं, जिसके साथ उसने ऐसा व्यवहार किया।

उनके मुताबिक, जुनैद कई लड़कियों से बात करते हुए उन्हें गलत इरादे से छूता था। माहिरा ने कहा, “जुनैद कभी कंधे पर, कभी सिर पर, कभी बालों पर और कभी हाथ पर छूकर लड़कियों से पूछता था कि उनका स्वास्थ्य कैसा है।” माहिरा का कहना है कि उनके साथ भी इसी तरह का व्यवहार किया गया।

माहिरा ने आगे बताया कि जुनैद कुछ लड़कियों को देर रात तक कॉल भी करता था। जुनैद के बारे में एक और गंभीर आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि उसने प्रोटेस्ट में शामिल एक लड़की को अपने साथ सोने का प्रस्ताव तक दिया था। माहिरा का कहना है कि ऐसी घटनाओं की वजह से उन्होंने यह मामला पुलिस के सामने उठाने का फैसला किया, ताकि प्रोटेस्ट में शामिल दूसरी लड़कियों को भी इस तरह के व्यवहार का सामना न करना पड़े।

माहिरा कहती हैं कि वह अब सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि उन दूसरी लड़कियों के लिए भी सामने आई हैं, जिनके साथ जुनैद ने ऐसा गंदा व्यवहार किया। उन्हें उम्मीद है कि अगर वह आज जुनैद के खिलाफ आवाज उठा रही हैं, तो कल दूसरी लड़कियाँ भी हिम्मत जुटाकर सामने आ पाएँगी। माहिरा ने बताया कि वह ऐसी लड़कियों से संपर्क भी कर रही हैं। उनका कहना है कि जुनैद का ‘असली चेहरा’ सामने आना जरूरी है, ताकि दूसरी लड़कियाँ भी उसके खिलाफ अपनी बात रख सकें।

जल सुरक्षा ही भविष्य की सबसे बड़ी नींव, समझिए क्यों जरूरी है भारत में नदियों को आपस में जोड़ना

मानसून के आते ही भारत के मानचित्र पर हर साल दो बेहद अलग और परेशान करने वाली तस्वीरें एक साथ उभरती हैं। एक तरफ असम में ब्रह्मपुत्र, बिहार और उत्तर प्रदेश में कोसी, गंडक और गंगा नदियाँ अपने किनारों को तोड़ती हुई लाखों जिंदगियों को बेघर कर देती हैं, तो दूसरी तरफ महाराष्ट्र का मराठवाड़ा, राजस्थान का थार, गुजरात का कच्छ और मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड पानी की एक-एक बूँद के लिए तरसता दिखाई देता है। जब देश के एक हिस्से में लोग नावों पर राशन का इंतजार कर रहे होते हैं, ठीक उसी वक्त दूसरे हिस्से में पानी के सरकारी टैंकरों के पीछे लंबी कतारें लगी होती हैं।

बाढ़ और सूखे की इसी दोहरी त्रासदी को खत्म करने के लिए भारत सरकार ने ‘राष्ट्रीय जल ग्रिड’ (National Water Grid) यानी ‘नदी जोड़ो परियोजना’ (Interlinking of Rivers – ILR) को 21वीं सदी का सबसे बड़ा ढाँचागत संकल्प बनाया है।

इस विशाल परिकल्पना की पहली व्यावहारिक प्रयोगशाला बनी है-‘केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट’ (Ken-Betwa Link Project – KBLP)। लेकिन जुलाई 2026 की मीडिया रिपोर्ट्स यह साफ बता रही हैं कि कागजी नक्शों पर नदियाँ जोड़ना जितना सीधा नजर आता है, धरातल पर इंसानों, जंगलों और नदियों की प्रकृति को जोड़ना उतना ही मुश्किल काम है।

बीते कुछ समय से बुंदेलखंड के छतरपुर और पन्ना जिलों में बने ‘दौधन बाँध’ (Daudhan Dam) के डूब क्षेत्र को लेकर भड़का जनाक्रोश इस योजना की सबसे कमजोर कड़ी को उजागर करता है। दौधन गाँव के आसपास रहने वाले जनजातीय लोग और स्थानीय ग्रामीण पिछले कई महीनों तक सड़कों पर रहे।

आरोप हैं कि बाँध निर्माण के कारण विस्थापित होने वाले हजारों परिवारों को पुनर्वास (Rehabilitation) और मुआवजे (Compensation) के नाम पर केवल खोखले आश्वासन मिले हैं। स्थानीय स्तर पर मुआवजे के वितरण में भ्रष्टाचार (Compensation Scam) और जमीनों के गलत मूल्यांकन की खबरों ने ग्रामीणों के भीतर भारी असंतोष भर दिया है।

इसके अलावा पन्ना टाइगर रिजर्व (Panna Tiger Reserve) के कोर एरिया में बसे दौधन, खरयानी और पचमढ़ी जैसे गाँवों के जनजातीय लोग अपनी पुश्तैनी जमीन छोड़ने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि जल सुरक्षा का यह पूरा खाका उनके वजूद की कीमत पर तैयार किया जा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स से यह बात सामने आई है कि राहत और पुनर्वास की राजनीति ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना को एक जटिल राजनीतिक और सामाजिक दलदल में धकेल दिया है।

पर्यावरणविदों का तर्क है कि पन्ना के घने जंगलों का डूबना, लाखों पेड़ों की कटाई और बाघों के प्राकृतिक आवास का नष्ट होना एक ऐसी भरपाई है जिसकी कीमत कोई भी नहर चुका नहीं सकती। वहीं दूसरी ओर केंद्र और राज्य सरकारों का दृढ़ विश्वास है कि यदि बुंदेलखंड के 62 लाख से अधिक लोगों को स्थाई पेयजल और सिंचाई का पानी देना है, तो इस तरह के कड़े और बड़े फैसले लेना वक्त की सबसे बड़ी जरूरत है।

यही वह ऐतिहासिक मोड़ है जहाँ भारत की नदी जोड़ो योजना खड़ी है। क्या यह योजना भारत में सूखे और बाढ़ के स्थायी समाधान की जल क्रांति (Water Revolution) बनेगी, या फिर यह सामाजिक विस्थापन, नौकरशाही की लापरवाही और पर्यावरणीय तबाही का नया जरिया बनकर रह जाएगी?

भारत में एक तरफ बाढ़ की समस्या तो दूसरे तरफ सूखे की, नदी जोड़ो परियोजना बदलेगी तस्वीर- प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT)

इस सवाल को गहराई से समझने के लिए हमें सबसे पहले यह जानना होगा कि आखिर भारत को अपनी नदियों को आपस में जोड़ने की जरूरत क्यों पड़ी और इस योजना का ऐतिहासिक ढाँचा किस तरह तैयार हुआ।

आखिर क्यों पड़ी नदियों को जोड़ने की जरूरत?

भारत के भूगोल (Geography) और मौसम की प्रकृति को अगर बारीकी से समझा जाए, तो एक बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि हमारे देश में पानी की कुल मात्रा में कोई प्राकृतिक कमी नहीं है। असली समस्या पानी के प्रबंधन (Water Management) और उसके असमान वितरण की है।

भारत में मानसूनी बारिश की अपनी एक अलग विशिष्टता (Peculiarity) है। पूरे साल में जितनी बारिश होती है, उसका लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा केवल जून से सितंबर के चार महीनों में गिरता है। इसका सीधा मतलब यह है कि साल के 12 महीनों के इस्तेमाल के लिए पानी हमें केवल 100 से 120 दिनों के भीतर ही प्राप्त होता है। जब इतना विशाल जलप्रवाह बहुत छोटे समय में नदियों में उमड़ता है, तो नदी बेसिनों की धारण क्षमता (Carrying Capacity) जवाब दे जाती है।

नदियाँ जब पहाड़ों से मैदानों की ओर आती हैं, तो अपने साथ करोड़ों टन मिट्टी और गाद (silt) बहाकर लाती हैं। यह गाद धीरे-धीरे नदियों की तलहटी में जमा होती जाती है, जिससे नदियों का पेट छिला हो जाता है। ऐसे में जब मानसून के दौरान अचानक अत्यधिक बारिश होती है, तो पानी नदी के पाटों को तोड़कर आसपास के सैकड़ों गाँवों और शहरों को डुबो देता है। बिहार में कोसी नदी को इसीलिए ‘बिहार का शोक’ (Sorrow of Bihar) कहा जाता है, क्योंकि वह हर साल अपना मार्ग बदलकर तबाही मचाती रही है।

दूसरी ओर देश का दूसरा पहलू बिल्कुल उलट है। पश्चिमी भारत का राजस्थान और गुजरात, मध्य और दक्षिणी भारत के पठारी क्षेत्र जैसे महाराष्ट्र का विदर्भ व मराठवाड़ा, कर्नाटक का उत्तरी क्षेत्र, आंध्र प्रदेश का रायलसीमा और मध्य प्रदेश-उत्तर प्रदेश का साझा बुंदेलखंड इलाका वर्षा-छाया क्षेत्र (Rain Shadow Zone) या कम बारिश वाले इलाकों में आते हैं। यहाँ यदि मानसून किसी एक साल थोड़ा भी कमजोर रह जाए या समय पर न पहुँचे, तो भूजल स्तर (Groundwater Level) सैकड़ों फीट नीचे चला जाता है।

कुओं का सूखना, हैंडपंपों का हवा देना, फसलों का जल जाना और मवेशियों का दाने-पानी के अभाव में मर जाना इन इलाकों की रोजमर्रा की नियति बन जाता है। यहाँ का किसान कर्ज के बोझ तले दबकर पलायन (Migration) करने पर मजबूर हो जाता है।

भारत में एक तरफ बाढ़ की समस्या तो दूसरे तरफ सूखे की, प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT)

जब देश का एक हिस्सा पानी की अधिकता से डूब रहा हो और दूसरा हिस्सा बूँद-बूँद को तरस रहा हो, तो यह प्राकृतिक असंतुलन देश के आर्थिक और सामाजिक विकास में सबसे बड़ी रुकावट बनकर सामने आता है। इसी प्राकृतिक विषमता (natural inequality) को संतुलित करने के लिए ‘अधिशेष बेसिन’ (Surplus Basin) से पानी को उठाकर ‘कमी वाले बेसिन’ (Deficit Basin) तक पहुँचाने की सोच ने जन्म लिया।

समुद्र में बह जाता है अरबों घनमीटर मीठा पानी: आँकड़ों में जल बर्बादी

भारत के जल संसाधनों का हाइड्रोलॉजिकल डेटा (Hydrological Data) एक बहुत ही चौंकाने वाली सच्चाई उजागर करता है। केंद्रीय जल आयोग (Central Water Commission – CWC) के आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, भारत में हर साल बारिश और बर्फबारी के रूप में औसतन करीब 4,000 अरब घनमीटर (Billion Cubic Meters – BCM) पानी प्राप्त होता है।

हालाँकि इस 4,000 BCM पानी में से वाष्पीकरण (Evaporation), जमीन में प्राकृतिक रूप से रिसने और दुर्गम भौगोलिक सीमाओं के कारण हम केवल 1,123 BCM पानी का ही उपयोग करने की स्थिति में होते हैं। इस Usable Water (उपयोग योग्य पानी) में से भी लगभग 690 BCM सतही जल (Surface Water) के रूप में उपलब्ध है और 433 BCM भूजल (Groundwater) के रूप में।

मानसूनी नदियों का सबसे बड़ा कड़वा सच यह है कि हर साल लगभग 1,500 से 2,000 अरब घनमीटर मीठा पानी बिना किसी मानवीय, कृषि या औद्योगिक उपयोग के उफनती नदियों के जरिए बहकर समुद्र के खारे पानी में मिल जाता है। जल विशेषज्ञों का मानना है कि समुद्र में मिलने वाला यह पानी बर्बादी नहीं बल्कि नदी के प्राकृतिक पारितंत्र (Estuary Ecosystem) को बनाए रखने के लिए कुछ हद तक जरूरी है, लेकिन इसका एक बड़ा हिस्सा रोककर जरूरतमंद इलाकों में भेजा जा सकता है।

फोटो साभार: AI ChatGPT, डाटा स्रोत: NDWA/भारत सरकार

यदि इस बेकार बह जाने वाले मानसूनी जल का केवल 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा भी सही वैज्ञानिक तकनीकों, जलाशयों (Reservoirs) और लिंक नहरों (Link Canals) के जरिए मोड़ लिया जाए, तो देश में न केवल 3.5 करोड़ हेक्टेयर अतिरिक्त कृषि भूमि को पानी दिया जा सकता है, बल्कि देश के हर शहर और गाँव को 24 घंटे पीने का साफ पानी मुहैया कराया जा सकता है।

क्या भारत में सचमुच पानी की कमी है या समस्या उसके वितरण की है?

नीतिगत और वैज्ञानिक धरातल पर अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि क्या भारत सचमुच एक ऐसा देश बनता जा रहा है जहाँ पानी खत्म हो रहा है? इसका तकनीकी जवाब है-नहीं। भारत में पानी की कुल मात्रा घटी नहीं है, बल्कि हमारी जनसंख्या विस्फोट, शहरीकरण (Urbanization) और जल के कुप्रबंधन (Mismanagement) की वजह से प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता (Per Capita Water Availability) में भारी गिरावट आई है।

साल 1951 में भारत में प्रति व्यक्ति वार्षिक जल उपलब्धता लगभग 5,177 घनमीटर थी। वर्ष 2011 की जनगणना तक यह घटकर 1,545 घनमीटर रह गई और वर्तमान में इसके 1,400 घनमीटर से भी नीचे आने का अनुमान है। अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार, जब किसी देश में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 1,700 घनमीटर से कम हो जाती है, तो उसे ‘वाटर स्ट्रेस्ड’ (Water-Stressed) यानी जल तनावग्रस्त स्थिति माना जाता है। यदि यह आँकड़ा 1,000 घनमीटर से नीचे चला जाए, तो उसे ‘वाटर स्कैर्स’ (Water-Scarce) यानी भीषण जल संकट माना जाता है।

फोटो साभार: AI ChatGPT, डाटा स्रोत: NDWA/भारत सरकार

असली चुनौती प्रति व्यक्ति घटते आँकड़ों से भी ज्यादा स्थानगत (Spatial) और समयगत (Temporal) असंतुलन की है, जिसमें-

मौजूदा जगह का असंतुलन (Spatial Imbalance): ब्रह्मपुत्र और गंगा नदी बेसिन में देश के कुल जल संसाधनों का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा मौजूद है, जबकि उनका भूमि क्षेत्र देश के कुल क्षेत्रफल का केवल एक-तिहाई है। इसके विपरीत, दक्षिण और पश्चिम की नदियाँ (जैसे कृष्णा, कावेरी, साबरमती) देश के बड़े भूभाग को सींचती हैं लेकिन उनमें जल प्रवाह काफी कम है।

भंडारण क्षमता का अभाव (Lack of Water Storage): विकसित देशों की तुलना में भारत अपनी नदियों के पानी को सहेजने यानी स्टोरेज कैपेसिटी (Storage Capacity) के मामले में बहुत पीछे है। अमेरिका अपनी नदियों का प्रति व्यक्ति औसतन 5,960 घनमीटर और ऑस्ट्रेलिया 4,730 घनमीटर पानी बड़े बांधों में स्टोर कर सकता है। इसके मुकाबले भारत की प्रति व्यक्ति जल भंडारण क्षमता केवल 225 घनमीटर के आसपास है।

इसलिए समस्या यह नहीं है कि भारत के पास पानी नहीं है; समस्या यह है कि हमारे पास पानी को सही जगह पर रोकने, उसे जरूरत वाले इलाकों तक भेजने और उसका कुशलतापूर्वक उपयोग करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एकीकृत तंत्र (Integrated Grid) का अभाव रहा है।

आजादी के बाद से कैसे बढ़ा नदी जोड़ने का विचार

नदियों को आपस में जोड़ने की अवधारणा कोई आधुनिक विचार नहीं है। इसका एक लंबा और दिलचस्प इतिहास रहा है जो औपनिवेशिक काल से शुरू होकर आधुनिक भारत तक फैला हुआ है।

सर आर्थर कॉटन की शुरुआती सोच (19वीं सदी): 19वीं सदी के मध्य में प्रसिद्ध ब्रिटिश सिंचाई इंजीनियर सर आर्थर कॉटन (Sir Arthur Cotton) ने सबसे पहले दक्षिण भारत की प्रमुख नदियों को जोड़ने का विचार रखा था। सर आर्थर कॉटन ने ही गोदावरी और कृष्णा नदियों पर एनिकिट (Barrages) का निर्माण कराया था।

उनका प्राथमिक उद्देश्य सिंचाई से ज्यादा नौवहन यानी जलमार्ग (Navigation) विकसित करना था। उस समय भारत में रेलवे नेटवर्क का विकास शुरुआती चरण में था और ईस्ट इंडिया कंपनी के माल को देश के आंतरिक हिस्सों से बंदरगाहों तक ढोने के लिए नदियों को जोड़कर एक जलमार्ग नेटवर्क बनाना सबसे सस्ता विकल्प माना गया था। हालाँकि अंग्रेजों का ध्यान मुख्य रूप से औपनिवेशिक लाभ पर था, इसलिए यह योजना कभी व्यापक रूप से लागू नहीं हो सकी।

आजादी के बाद की विशाल नदी घाटी परियोजनाएँ: 1947 में आजादी के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती देश की विशाल आबादी के लिए खाद्यान्न सुरक्षा (Food Security) सुनिश्चित करना और बार-बार पड़ने वाले अकाल (Famines) से निपटना था। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बहुउद्देशीय बांधों (Multipurpose Dams) को ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ कहा।

1950 और 1960 के दशकों में भाखड़ा-नांगल (सतलुज नदी), हीराकूद (महानदी), दामोदर घाटी परियोजना (DVC) और नागार्जुन सागर जैसी विशाल परियोजनाओं पर काम शुरू हुआ। इन परियोजनाओं ने यह साबित कर दिया कि नदियों पर बड़े बाँध बनाकर बाढ़ नियंत्रण, बिजली उत्पादन और बड़े पैमाने पर नहरों के जरिए सिंचाई संभव है। लेकिन ये सभी परियोजनाएँ एक ही नदी या उसके बेसिन तक सीमित थीं। एक बेसिन से दूसरे बेसिन में बड़े पैमाने पर पानी ले जाने का विचार अभी भी शुरुआती चरण में ही था।

डॉ. KL राव से लेकर Garlands Canal तक: दो ऐतिहासिक प्रयासों के बारे में जानना जरूरी

डॉ. के.एल. राव का ‘नेशनल वाटर ग्रिड’ (1970 का दशक): भारत के महान सिविल इंजीनियर और तत्कालीन केंद्रीय सिंचाई और विद्युत मंत्री डॉ. के.एल. राव (Dr. K.L. Rao) ने वर्ष 1972 में ‘नेशनल वाटर ग्रिड’ (National Water Grid) का एक बेहद साहसी और दूरगामी प्रस्ताव देश के सामने रखा। डॉ. राव को भारतीय जल प्रबंधन का पितामह भी कहा जाता है।

डॉ. के.एल. राव की योजना का सबसे मुख्य आकर्षण था- ‘गंगा-कावेरी लिंक’ (Ganga-Cauvery Link)।

  • डॉ. राव का प्रस्ताव था कि मानसून के दौरान जब गंगा नदी में पटना के पास (सोनभद्र के संगम स्थल के निकट) भारी मात्रा में अतिरिक्त पानी बहता है, तब वहाँ से लगभग 60,000 क्यूसेक पानी को पंपों के जरिए लिफ्ट (Lift) किया जाए।
  • इस पानी को लिफ्ट करके दक्षिण की ओर बढ़ाया जाना था। इसे विंध्याचल और सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं को पार कराते हुए नर्मदा, तापी, गोदावरी, कृष्णा और पेनार नदियों से जोड़ते हुए अंत में तमिलनाडु की कावेरी नदी तक पहुँचाया जाना था।
  • यह नहर लगभग 2,640 किलोमीटर लंबी होनी थी। इसमें पानी को लगभग 550 मीटर (1,800 फीट) की ऊँचाई तक लिफ्ट करने के लिए भारी मात्रा में बिजली की आवश्यकता थी।

योजना क्यों खारिज हुई? केंद्रीय जल आयोग (CWC) और अंतरराष्ट्रीय जल विशेषज्ञों ने जब डॉ. राव की इस योजना का गहन तकनीकी और आर्थिक अध्ययन किया, तो पाया कि-

  • इस योजना में जितनी बिजली पानी को लिफ्ट करने में खर्च होगी (लगभग 5,000 से 7,000 मेगावाट), उतनी बिजली उस समय पूरे देश में आसानी से उपलब्ध नहीं थी।
  • योजना की वित्तीय लागत (financial cost) उस समय के भारत के कुल राष्ट्रीय बजट से भी अधिक बैठती थी।
  • उत्तर भारत से दक्षिण भारत तक पानी ले जाने में रास्ते के राज्यों के बीच गंभीर जल विवाद (water disputes) खड़े होने की पूरी आशंका थी।

इन्हीं कारणों से सरकार ने इसे व्यावहारिक (Feasible) न मानकर ठंडे बस्ते में डाल दिया।

कैप्टन दस्तूर का ‘गारलैंड केनाल सिस्टम’ (1977): डॉ. के.एल. राव के प्रस्ताव के कुछ ही साल बाद 1977 में एक एयरलाइंस पायलट और इंजीनियर कैप्टन दिनशॉ जे. दस्तूर (Captain Dinshaw J. Dastur) ने ‘गारलैंड केनाल सिस्टम‘ (Garland Canal System) का एक और काल्पनिक और जटिल विचार पेश किया।

हिमालयन गारलैंड केनाल (Himalayan Garland Canal): यह नहर हिमालय की तलहटी में रवी नदी से शुरू होकर ब्रह्मपुत्र और उससे आगे तक लगभग 4,200 किलोमीटर लंबी बननी थी।

सेंट्रल एंड साउर्दर्न गारलैंड केनाल (Central and Southern Garland Canal): यह नहर मध्य और दक्षिण भारत के पठार को एक घेरे (garland) की तरह चारों तरफ से लपेटते हुए बनाई जानी थी, जिसकी लंबाई करीब 9,300 किलोमीटर होती।

इन दोनों नहरों को आपस में विशाल पाइपलाइनों के जरिए जोड़ा जाना था और बीच-बीच में सैकड़ों छोटे-बड़े कृत्रिम जलाशय (lakes) बनाकर पूरे देश के पानी को नियंत्रित किया जाना था।

स्रोत: NDWA वेबसाइट

ये योजना क्यों खारिज हुई?: भारत सरकार द्वारा गठित विशेषज्ञ समितियों ने इस योजना का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया और इसे पूरी तरह से ‘काल्पनिक और अव्यावहारिक’ (Unrealistic and Impracticable) करार दिया। विशेषज्ञों का मानना था कि भारत की भौगोलिक संरचना, विभिन्न ऊँचाइयों और भू-गर्भीय चट्टानों के बीच इतनी लंबी समतल नहरें बनाना इंजीनियरिंग के दृष्टिकोण से नामुमकिन है।

हालाँकि डॉ. के.एल. राव और कैप्टन दस्तूर के इन दो प्रस्तावों ने भारत सरकार और नीति निर्माताओं को यह अहसास करा दिया कि इस विषय पर एक वैज्ञानिक, व्यावहारिक और चरणबद्ध (phased approach) राष्ट्रीय नीति की सख्त जरूरत है।

National Perspective Plan (NPP) 1980 की नींव

डॉ. राव और कैप्टन दस्तूर के प्रस्तावों के खारिज होने के बाद भारत सरकार के तत्कालीन सिंचाई मंत्रालय (जो आज जल शक्ति मंत्रालय के नाम से जाना जाता है) ने अगस्त 1980 में एक ऐतिहासिक दस्तावेज तैयार किया। इसे ‘नेशनल पर्सपेक्टिव प्लान फॉर वॉटर रिसोर्सेज डेवलपमेंट’ (National Perspective Plan – NPP) नाम दिया गया।

NPP का मुख्य दर्शन यह था कि नदियों के प्राकृतिक प्रवाह और उनके पारिस्थितिक संतुलन (Ecological Balance) से भारी छेड़छाड़ किए बिना, केवल उसी पानी का अंतर-बेसिन स्थानांतरण (Inter-Basin Transfer) किया जाए जो संबंधित नदी बेसिन की अपनी सभी वर्तमान और भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के बाद ‘अधिशेष’ (Surplus) बचे।

NPP के तहत अंतर-बेसिन जल स्थानांतरण के लिए चार मुख्य सिद्धांत तय किए गए-

बेसिन की प्राथमिक प्राथमिकता: जिस नदी बेसिन से पानी लिया जा रहा है, उसकी पेयजल, कृषि, औद्योगिक और पर्यावरण संबंधी जरूरतों को प्राथमिकता दी जाएगी।

केवल अधिशेष जल का स्थानांतरण: पानी केवल तभी स्थानांतरित किया जाएगा जब गहन हाइड्रोलॉजिकल अध्ययनों से यह साबित हो जाए कि बेसिन में जल वास्तव में सरप्लस है।

ग्रेविटी फ्लो को प्राथमिकता: जहाँ तक संभव हो, पानी को गुरुत्वाकर्षण (Gravity Glow) के जरिए बहाकर ले जाया जाए ताकि लिफ्ट पंपिंग में भारी बिजली और ऊर्जा का खर्च न हो।

सहमति और संतुलन: संबंधित राज्यों के हितों की रक्षा की जाएगी और पर्यावरण को कम से कम नुकसान पहुँचाया जाएगा।

भारत में प्रस्तावित 30 नदी जोड़ो परियोजनाओं के बारे में जानिए

राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी (NWDA) द्वारा तैयार किए गए 30 नदियों को जोड़ने का खाका भारत के भूगोल को हमेशा के लिए बदलने की क्षमता रखता है।

इन 30 प्रस्तावों को दो प्रमुख भागों में बाँटा गया है, जिसमें प्रायद्वीपीय घटक और हिमालयी घटक शामिल हैं। प्रायद्वीपीय घटक के तहत कुल 16 प्रस्तावित लिंक हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य महानदी और गोदावरी के अधिशेष जल को कृष्णा, कावेरी और पम्बा जैसी दक्षिण की कमी वाली नदियों में भेजना तथा मध्य भारत के अंतर-बेसिन जल संकट को दूर करना है। इसमें महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, केन, बेतवा, तापी, नर्मदा और दमनगंगा जैसी मुख्य नदियाँ शामिल हैं।

फोटो साभार: NWDA प्रोजेक्ट फाइल, भारत सरकार

वहीं हिमालयी घटक के तहत कुल 14 प्रस्तावित लिंक हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य नेपाल और पूर्वोत्तर भारत से बहने वाली ब्रह्मपुत्र, कोसी और गंडक जैसी नदियों के विशाल मानसूनी जल को गंगा, यमुना, राजस्थान और पश्चिम भारत तक पहुँचाना है। इसमें ब्रह्मपुत्र, मानस, संकोश, तिस्ता, कोसी, घाघरा, गंडक, गंगा और यमुना जैसी मुख्य नदियाँ शामिल हैं। इन सारे प्रोटेक्ट्स के बारे में रिपोर्ट के तीसरे पार्ट में विस्तार से समझाया गया है।

फोटो साभार: AI ChatGPT, डाटा स्रोत: NDWA/भारत सरकार

सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक हस्तक्षेप से खुला रास्ता

नदी जोड़ो योजना कई दशकों तक राजनीतिक अनिच्छा, अंतर-राज्यीय विवादों और नौकरशाही की फाइलों में दबी रही। लेकिन इस सुस्ती को तोड़ने में भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) ने सबसे निर्णायक भूमिका निभाई।

साल 2002 का आदेश और तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. कलाम की सोच: साल 2002 में सीनियर एडवोकेट रंजीत कुमार द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को कड़ा निर्देश दिया। उसी दौरान भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में नदी जोड़ो परियोजना को ‘भारत के जल संकट और गरीबी उन्मूलन का सबसे सशक्त हथियार’ बताया था।

फोटो साभार: भारत सरकार- NWDA

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह एक टास्क फोर्स (Task Force on Interlinking of Rivers) का गठन करे और वर्ष 2016 तक सभी 30 लिंकों को पूरा करने के लिए एक समयबद्ध (Time-Bound) कार्ययोजना बनाए। इसके बाद तत्कालीन वाजपेयी सरकार ने पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश प्रभु की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय टास्क फोर्स का गठन किया।

साल 2012 के ऐतिहासिक फैसले के बाद ‘विशेष समिति’ का गठन: वर्ष 2012 में (Networking of Rivers Case में) जस्टिस फकीर मोहम्मद इब्राहिम कलीफुल्ला और जस्टिस स्वतंत्र कुमार की पीठ ने अपना ऐतिहासिक निर्णय सुनाया। अदालत ने माना कि जल सुरक्षा देश के जीवन के अधिकार (Right to Life – Article 21) से सीधी जुड़ी हुई है।

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश देते हुए कहा कि केंद्र सरकार तुरंत स्पेशल कमेटी फॉर इंटरलिंकिंग ऑफ रिवर्स (Special Committee for ILR) का गठन करे। केंद्रीय जल शक्ति मंत्री इस समिति के अध्यक्ष होंगे। इसमें राज्यों के सिंचाई/जल संसाधन मंत्री, विभिन्न संबंधित मंत्रालयों (पर्यावरण, वित्त, कानून) के सचिव, NWDA के महानिदेशक और विषय विशेषज्ञ शामिल होंगे।

यह समिति राज्यों के बीच राजनीतिक सहमति बनाने, पर्यावरणीय Clearances (मंजूरियों) में आ रही अड़चनों को दूर करने और परियोजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन की हर महीने निगरानी करने के लिए जिम्मेदार होगी।

सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े और निरंतर रुख का ही नतीजा था कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारों (विशेषकर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश) को बातचीत की मेज पर आना पड़ा। इसी कानूनी दबाव और राजनीतिक इच्छाशक्ति के मिलन से ‘केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट’ का रास्ता साफ हुआ, जो इस पूरी महा-योजना का पहला जमीनी प्रयोग बना।

क्यों 21वीं सदी में पानी ही सबसे बड़ा रणनीतिक संसाधन (Strategic Asset) बनने वाला है?

बीसवीं सदी की वैश्विक भू-राजनीति (Geopolitics) मुख्य रूप से कच्चे तेल (Crude oil) और ऊर्जा संसाधनों पर नियंत्रण को लेकर घूमती रही। खाड़ी युद्धों से लेकर वैश्विक महाशक्तियों के कूटनीतिक गठबंधनों तक, सब कुछ ‘ब्लैक गोल्ड’ यानी तेल के इर्द-गिर्द तय होता था। लेकिन 21वीं सदी में तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। आज विशेषज्ञ एक स्वर में मान रहे हैं कि 21वीं सदी का सबसे बड़ा रणनीतिक संसाधन तेल नहीं, बल्कि ‘ब्लू गोल्ड’ यानी पीने योग्य मीठा पानी (Freshwater) है।

भारत के संदर्भ में जल सुरक्षा (Water Security) का मामला क्यों जीवन-मरण का प्रश्न बन चुका है, इसे कुछ खास बिंदुओं से जरिए समझा जा सकता है-

जलवायु परिवर्तन और अनिश्चित मौसम चक्र (Climate Change Impact): ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालय के ग्लेशियर अभूतपूर्व गति से पिघल रहे हैं। शुरुआती वर्षों में इससे हिमालयी नदियों में विनाशकारी बाढ़ आएगी, और बाद के दशकों में ग्लेशियरों का आकार छोटा होने पर ये बारहमासी नदियाँ मौसमी (Seasonal) नदियों में बदल सकती हैं। दूसरी ओर मानसूनी बारिश का ढर्रा (pattern) बिगड़ चुका है, कम समय में अत्यधिक बारिश (Cloudbursts/Heavy Rainfall Svents) और लंबे समय तक सूखा रहना अब नया सामान्य (New Normal) बन गया है। इस अनिश्चितता से निपटने का एकमात्र तरीका विशाल भंडारण और कुशल जल स्थानांतरण नेटवर्क ही है।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा पर खतरा (Food Security Danger): भारत की 140 करोड़ से अधिक आबादी के पेट भरने के लिए कृषि उत्पादन को निरंतर बढ़ाना अनिवार्य है। भारत की कृषि आज भी 50 प्रतिशत से अधिक मानसूनी बारिश पर निर्भर है। यदि भूजल स्तर इसी तरह गिरता रहा (जिसका भारत दुनिया में सबसे बड़ा उपभोक्ता है), तो देश के अन्न भंडार कहे जाने वाले पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कृषि संकट गहरा जाएगा। नदी जोड़ो योजना के माध्यम से अतिरिक्त 3.5 करोड़ हेक्टेयर जमीन को सुनिश्चित सिंचाई देकर ही भारत अपनी भावी पीढ़ियों के खाद्यान्न की रक्षा कर सकता है।

राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता (National Security & Social Stability): पानी का संकट केवल खेतों तक सीमित नहीं रहता। जब शहरों में नल सूखते हैं (जैसे चेन्नई में ‘डेमो ज़ीरो’ की स्थिति आई थी या बेंगलुरु में हालिया जल संकट), तो सामाजिक अशांति, हिंसा और कानून-व्यवस्था का संकट पैदा होता है। इसके अलावा राज्यों के बीच पानी को लेकर विवाद (जैसे कावेरी विवाद, सतलुज-यमुना लिंक विवाद) देश की आंतरिक एकता और संघीय ढाँचे (Federal Structure) के लिए गंभीर चुनौती बनते हैं। एक पारदर्शी और वैज्ञानिक राष्ट्रीय जल ग्रिड राज्यों के बीच जल-संघर्षों को कम कर सकता है।

औद्योगिक और आर्थिक आत्मनिर्भरता (Economic Growth): भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर और उससे आगे की अर्थव्यवस्था बनाने के लिए विनिर्माण (Manufacturing), ऊर्जा उत्पादन (विशेषकर ग्रीन हाइड्रोजन और सेमीकंडक्टर चिप्स) और शहरीकरण के लिए अरबों गैलन पानी की आवश्यकता होगी। जल उपलब्धता के बिना कोई भी औद्योगिक कॉरिडोर (Industrial Corridor) सफल नहीं हो सकता।

आगे क्या?

नदी जोड़ो योजना की विशाल सैद्धांतिक और कानूनी पृष्ठभूमि को समझने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या यह योजना कागजी नक्शों से बाहर निकलकर धरातल पर वाकई में वैसी ही काम करती है जैसा वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने सोचा था?

इस सवाल का जवाब हमें भारत की सबसे पहली और ऐतिहासिक अंतर-बेसिन जल स्थानांतरण पहल ‘केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट’ (Ken-Betwa Link Project – KBLP) में मिलता है। केन-बेतवा प्रोजेक्ट केवल दो नदियों को जोड़ने की एक इंजीनियरिंग परियोजना नहीं है, बल्कि यह बुंदेलखंड के लाखों प्यासे लोगों की उम्मीदों, पन्ना के घने जंगलों, विस्थापित हो रहे आदिवासियों के दर्द और दौधन बांध के मुआवजे में हो रहे घोटालों की एक बेहद पेचीदा और नाटकीय कहानी है।

Part II में पढ़िए: नदी जोड़ो योजना की इसी दूरदर्शी सोच को धरातल पर उतारने के लिए देश की पहली ऐतिहासिक पहल ‘केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट’ (Ken-Betwa Link Project – KBLP) की शुरुआत हुई। अगले भाग में विस्तार से जानिए कि केन-बेतवा प्रोजेक्ट क्या है, यह तकनीक और इंजीनियरिंग के स्तर पर कैसे काम करेगा, दौधन बाँध निर्माण से प्रभावित पन्ना टाइगर रिजर्व के आदिवासियों और ग्रामीणों के विस्थापन का सच क्या है, मुआवजे के घोटालों की जमीनी हकीकत क्या है और क्या यह प्रोजेक्ट वाकई सूखाग्रस्त बुंदेलखंड की तस्वीर और तकदीर बदलने में कामयाब हो पाएगा…

Part III में पढ़िए: भारत की अन्य प्रमुख नदी जोड़ो परियोजनाएँ, हिमालयी और प्रायद्वीपीय लिंकों का विस्तृत तकनीकी विश्लेषण, हिमाचल-पंजाब-राजस्थान और जम्मू-कश्मीर से जुड़े आधिकारिक प्रस्ताव, दुनिया भर के सबसे बड़े जल स्थानांतरण प्रयोग (जैसे चीन का South–North Water Transfer, अमेरिका का California Water Project, पाकिस्तान का Indus Basin System, स्पेन का Tagus-Segura Transfer और ऑस्ट्रेलिया की Snowy Mountains Scheme) और उनसे भारत के लिए सबक। साथ ही पढ़िए-पर्यावरणीय चुनौतियाँ, विशेषज्ञों का पक्ष-विपक्ष, जलवायु परिवर्तन का असर। इसमें आपको इन सवालों के भी जवाब मिलेंगे कि क्या यह महायोजना भारत की जल क्रांति बनेगी और करोड़ों भारतीयों के जल की जरूरत को पूरा कर पाएगी?