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‘हमारा ताहिर हुसैन बेगुनाह है, अल्लाह जानता है’… अंकित शर्मा के हत्यारे के समर्थन में अब भी खड़े हैं कट्टरपंथी पड़ोसी, पढ़ें- उसके घर पहुँचे ऑपइंडिया को क्या-क्या दिखा?

दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगे के करीब 6 साल बाद IB कर्मी अंकित शर्मा की हत्या के मामले में आम आदमी पार्टी (AAP) के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन समेत 5 लोगों को कोर्ट दोषी करार दिया है। इसके बाद मैं एक बार फिर ताहिर हुसैन की उस बड़ी सी बिल्डिंग के सामने पहुँचा जिस बिल्डिंग से दंगाइयों ने न सिर्फ हिंदुओं को चुन-चुन कर निशाना बनाया था बल्कि आईबी कर्मी अंकित शर्मा को मकान में खींचकर उन पर चाकुओं से ताबड़तोड़ वार करक उनकी हत्या कर दी गई थी। इसके बाद अंकित शर्मा के शव को पास के नाले में फेंक दिया गया था।

घटना के करीब 6 साल बाद ऑपइंडिया की टीम दिल्ली हिंदू विरोधी दंगे के उसी प्रभावित क्षेत्र चांद बाग पहुँची, जहाँ अंकित शर्मा की हत्या के दोषी ताहिर हुसैन का बहुमंजिला मकान बना हुआ है। हमने देखा कि 60 फुटा रोड पर लोगों की आवाजाही सामान्य दिनों की तरह है और बाजार पूरी तरह खुला हुआ है। सड़क के दोनों और नाले का निर्माण कार्य जारी है।

इस बीच राह चलते एक मुस्लिम से हमने कोर्ट के फैसले और दिल्ली दंगों पर बात की तो उन्होंने बताया, “मैंने वह मंजर अपनी आँखों से देखा था बाहर बहुत भीड़ थी जो कि एक-दूसरे पर पत्थरबाजी कर रही थी। मैं गली में दुकान चलाता हूँ।” ताहिर हुसैन को दोषी ठहराए जाने पर वह कहते हैं कि ये कोर्ट का निर्णय है और वह इस पर कुछ नहीं कह सकते।

एक के बाद एक मुस्लिम बोला- ‘ताहिर हुसैन को फँसाया जा रहा’

ताहिर हुसैन के सामने वाली गली में मौजूद एक दुकान पर खड़े हाफिज ने हमारे पूछने पर कहा, “घटना के समय मैं यहाँ मौजूद नहीं था लेकिन मैंने सुना है कि वह (ताहिर हुसैन) बेकसूर हैं। ताहिर हुसैन को राजनीति के तहत फँसाया गया है। शायद वह पार्षद नहीं होते तो ऐसा नहीं होता।”

नाले की समीप मौजूद मस्जिद के सामने खड़े एक मुस्लिम व्यक्ति ने कोर्ट के फैसले पर कहा कि यह कानून के मुताबिक फैसला है तो सही है लेकिन यहाँ के साक्ष्य कोई मान नहीं रहा। उन्होंने कोर्ट के फैसले पर व्यंग्य करते हुए कहा, “यहाँ अगर काला पानी है तो आगे सफेद हो जाएगा और अगर आगे सफेद है आगे चलकर लाल हो जाएगा।” यानी उनका मतलब साफ था कि साक्ष्य बदले जा सकते हैं यहाँ हो कुछ रहा है और और दिखाई कुछ और जा रहा है।

हिंदू आबादी के बीच दर्जी की दुकान चला रहे मोहम्मद हनीफ नाम के एक बुजुर्ग ने कोर्ट के फैसले पर कहा कि इस पर वह कुछ नहीं कह सकते उस समय वह यहाँ नहीं थे लेकिन उनकी दुकान में भी आग लगाई गई थी। उन्होंने आगे कहा, “हमें भी काफी नुकसान हुआ था लेकिन उस समय तो पुलिस की निगरानी में ही ताहिर हुसैन अपने घर से बाहर निकला था।” वह कहते हैं कि ताहिर हुसैन अंकित शर्मा की हत्या का दोषी नहीं है बल्कि वह भीड़ थी जो भी किया था उसने ही किया था।  

ऑपइंडिया की टीम ने ताहिर हुसैन के घर में क्या देखा?

इसके बाद हम ताहिर हुसैन के उस चार मंजिला मकान में पहुँचे जिसकी छत पर चढ़कर सैकड़ों दंगाइयों ने हिंदुओं को निशाना बनाया था। बाहर लगे बड़े से लोहे के गेट पर Show Effect Advertising Work के नाम से दो बोर्ड लगे हुए थे। पूछने पर पता चला कि इस बिल्डिंग में कई छोटी-मोटी फैक्ट्रियाँ चलती हैं साथ ही कई किराएदार भी यहाँ रहते हैं। गेट में प्रवेश करने के बाद हमने छत पर जाने की कोशिश की।

उसी छत पर जहाँ पुलिस को एक बड़ी गुलेल, पेट्रोल बम और बड़ी मात्रा में ईंट-पत्थर बरामद किए थे, लेकिन हमें सीढ़ियों पर चढ़ने से पहले ही इस्लाम नाम के चौकीदार ने रोक लिया और हमें ऊपर जाने से मना कर दिया। कोर्ट के फैसले पर हमारे पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि कोर्ट ने ताहिर हुसैन को गलत दोषी माना है।

इस्लाम ने कहा, “वह (ताहिर) गलत काम नहीं करता। वह तो फैक्ट्री चलता था लकड़ी का काम करता था। पुलिस प्रशासन ने ताहिर को फँसाने के लिए झूठे सबूत इकट्ठा किए। उसे वर्तमान सरकार फँसा रही है। केजरीवाल ने भी ताहिर का साथ नहीं दिया बल्कि उल्टा फँसाया ही। ताहिर को फँसाने के लिए ही यहाँ ईंट-पत्थर, गुलेल, बम सब षड्यंत्र के तहत रखे गए थे। यहाँ कुछ नहीं था भीड़ जबरन इस घर में घुस गई थी और छत पर चढ़ गई थी।”

इस बीच अपनी पत्नी के साथ छत से उतर रहे मुन्ना नाम के व्यक्ति ने बताया कि ताहिर हुसैन हमारा भतीजा है। उन्होंने कहा, “हमारा ताहिर बेगुनाह है। अल्लाह सब जानता है। इसको फँसाया जा रहा है। उसने आज तक किसी के थप्पड़ भी नहीं मारा है।” इसी बात को आगे बढ़ाते हुए मुन्ना की पत्नी ने कहा कि उसने (ताहिर हुसैन) ने पहले कभी किसी मूस्टी (चूहे) को भी नहीं मारा। हमने बचपन से उसे पाला है। उसने हमेशा गरीब बेटियों की शादी कराई है।

आगे भावुक होते हुए मुन्ना की बीबी कहती है कि कल से(कोर्ट का आदेश आने के बाद) पूरा घर हो रहा है। हम किसी से कुछ कह भी नहीं सकते। बस हमारे ताहिर को इंसाफ मिलना चाहिए। हमें नहीं पता कि अंकित शर्मा को किसने मारा है।  

आपको बता दें कि फरवरी 2020 में CAA, NRC के विरोध की आड़ में दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों दिल्ली के मुस्तफाबाद से शुरू होकर शिवपुरी, जाफराबाद, सीलमपुर, चांद बाग आदि दिल्ली की कई इलाकों में फैल गए थे। जिसमें 56 से अधिक लोगों ने अपनी जान गँवाई थी। इस बीच हुई IB कर्मी अंकित शर्मा की हत्या के मामले में करीब 6 वर्ष बाद दिल्ली के कड़कड़डूमा कोर्ट ने 12 आरोपितों में से छह आरोपितों को बरी करते हुए ताहिर हुसैन सहित 5 आरोपितों को दोषी माना है और अब इस मामले में सजा का ऐलान बाकी है।

रूस से ऊर्जा खरीद पर अमेरिकी पाखंड… तेल खरीदने वाले भारत-चीन जैसे देशों पर 100% टैरिफ, गैस खरीदने वाले देशों को छूटे देने का प्रस्ताव

अमेरिका अपनी मौद्रिक नीति और डॉलर के प्रभुत्व के दम पर दूसरे देशों में मुद्रास्फीति का बोझ लगातार बढ़ा रहा है। हालाँकि, अमेरिका को अपनी गलतियों का दोष दूसरों पर डालने की भी पुरानी आदत है। इसी क्रम में अमेरिकी सीनेटरों ने रूस पर प्रतिबंध लगाने वाले एक संशोधित विधेयक को पेश किया है , जिसमें भारत और चीन सहित रूसी तेल के प्रमुख खरीदारों पर 100% टैरिफ लगाने का प्रस्ताव है।

रूस पर प्रतिबंध विधेयक: 500% से 100% तक, हथियार के रूप में टैरिफ का उपयोग

यह विधेक मूल रूप से दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम और डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने एक साल पहले पेश किया था, जिसे दोनों दलों रिपब्लिकन और डेमोक्रेट का समर्थन प्राप्त है।

ग्राहम का शनिवार को अचानक निधन हो गया, जिन्होंने मौत से एक दिन पहले यूक्रेन यात्रा के दौरान घोषणा की थी कि उन्होंने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ विधेयक को आगे बढ़ाने के लिए समझौता कर लिया है।

अमेरिकी सीनेटरों ने 14 जुलाई 2026 को पहले के प्रस्तावों का एक संस्करण पेश किया। सीनेटर जीन शाहीन, रिचर्ड ब्लूमंथल और रोजर विकर सहित अन्य लोगों ने वाशिंगटन में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान इसकी घोषणा की। उन्होंने कहा कि विधेयक को सीनेट का समर्थन प्राप्त है और यह अगस्त 2026 तक पारित हो जाएगा।

ग्राहम ने ‘सैंक्शनिंग रशिया एक्ट ऑफ 2025’ प्रस्ताव में कहा था कि यूएस राष्ट्रपति को उन सभी वस्तुओं और सेवाओं पर टैरिफ कम से कम 500% तक बढ़ाना होगा जो रूस से पेट्रोलियम उत्पादों और यूरेनियम को खरीदने-बेचने में शामिल हैं।”

(2025 का प्रस्ताव)

शुरुआत में रूस पर प्रतिबंध लगाने वाले अधिनियम को ट्रंप प्रशासन ने समर्थन नहीं दिया। इसलिए ये ठंडे बस्ते में चला गया। लेकिन नया संशोधित प्रस्ताव रूसी तेल खरीदारों पर प्रतिबंध की बात करता है। इसमें रूसी तेल खरीदारों के खिलाफ 500 फीसदी के बजाए 100 फीसदी टैरिफ लगाने का प्रस्ताव है। इसका असर चीन, भारत, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान पर पड़ेगा।

रिपोर्टों के अनुसार, पहले के मसौदों में भी इन देशों को टारगेट किया गया था और अब भी किया गया है। हालाँकि टैरिफ में कमी की गई है।

संशोधित विधेयक में रूस के वित्तीय, रक्षा और ऊर्जा क्षेत्रों के बड़े हिस्से, अभिजात्य वर्ग और व्यापारियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव है। इसमें रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को व्यक्तिगत रूप से निशाना साधने वाले प्रावधान भी शामिल हैं।

इसके अलावा, विधेयक में मौजूदा प्रतिबंधों से बचने के लिए रूसी टैंकरों के अवैध बेड़े को रोकने का भी प्रस्ताव है। विधेयक में वीजा प्रतिबंध, संपत्ति जब्त करने और रूसी अधिकारियों, बैंकों और ऊर्जा कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने का भी प्रस्ताव है। रूसी संघ का केंद्रीय बैंक समेत तमाम रूसी वित्तीय संस्थानों पर प्रतिबंध का प्रस्ताव है। रूस की सबसे बड़ी सरकारी ऊर्जा परियोजनाओं पर भी प्रतिबंध अमेरिका लगा देगा। इनमें यामल एलएनजी और आर्कटिक एलएनजी 1, 2 और 3 शामिल हैं।

अमेरिका का मकसद इन संशोधित विधेयक के माध्यम से रूस की आर्थिक ढाँचे को कमजोर करना है। वह रूसी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाले देशों को दंडित करना चाहता है। अमेरिका का मानना है कि रूस इन पैसों का इस्तेमाल यूक्रेन युद्ध में कर रहा है। प्रतिबंध लगने से उसकी युद्ध लड़ने की क्षमता कम होगी। यही वजह है कि प्रस्ताव में रूस की ऊर्जा, रक्षा और वित्तीय व्यवस्था पर भी नए प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं।

हालाँकि संशोधित विधेयक में अमेरिका के राष्ट्रपति को देशहित में निर्णय लेने और प्रतिबंधों को खत्म करने का भी अधिकार है।

विधेयक का सबसे दिलचस्प प्रावधान प्राकृतिक गैस को लेकर है। लिंडसे ग्राहम की रूस जवाबदेही वाले प्रावधान में उन देशों को काफी हद तक छूट दी थी जो रूसी प्राकृतिक गैस का 15% से कम आयात करते हैं या लगातार रूसी गैस के आयात को कम करने की कोशिश कर रहे हैं। दरअसल ये काफी चालाकी से दी गई छूट है। इसे अमेरिका के अधिकांश यूरोपीय सहयोगियों को बचाने के लिए बनाया गया है।

यदि यह विधेयक पारित होकर कानून बन जाता है, तो इससे अमेरिकी प्रशासन को भारत, चीन समेत 5 रूसी तेल खरीदारों पर आर्थिक दबाव डालने के लिए नया बल मिलेगा। हालाँकि ट्रंप प्रशासन के नीतिगत निर्णय लेने में लगातार दिख रहे ढुलमुल रवैये को देखते हुए ये माना जा रहा है कि फिलहाल 100% टैरिफ का नियम लागू नहीं होगा। हालाँकि कानून बनने के बाद अमेरिकी सरकार रूस पर दबाव डालने के लिए अधिकतम टैरिफ लगाना चाहेगी।

भारत के अधिकांश मेनस्ट्रीम मीडिया टैरिफ को 500% से घटाकर 100% करने के प्रस्ताव को ‘राहत’ के रूप में पेश कर रहा है। जबकि चाहे 100%, 500%, 1000% या सिर्फ 10% ही क्यों न हो, रूसी तेल खरीदने के लिए अमेरिका जो टैरिफ लगा रहा है, वह भी भारत समेत कई देशों पर ‘दंड’ के रूप में, तो ये राहत भरा नहीं बल्कि मूर्खतापूर्ण और पाखंड है।

वैसे भी 500% टैरिफ कभी भी व्यावहारिक नहीं हो सकता। कई अमेरिकी सांसदों ने भी इसे अव्यवहारिक माना था। प्रस्तावित टैरिफ को 500% से घटाकर 100% करने के संशोधन ने नए विधेयक को कुछ हद तक व्यावहारिक बना दिया।

इस विधेयक को सीनेट के 80 फीसदी सदस्यों का समर्थन मिल रहा है। इसलिए इस पर जल्द ही मतदान हो सकता है।

गौरतलब है कि यदि नया रूसी प्रतिबंध विधेयक पारित हो जाता है, तो यह अमेरिकी राष्ट्रपति को पांचों देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार देगा। न तो यह खुद ब खुद लागू हो जाएगा और न ही यह अनिवार्य रूप से लागू होगा। दरअसल यह कानून राष्ट्रपति को शुल्क लगाने, छूट देने या पूरी तरह माफ करने का अधिकार देता है। यह व्यावहारिक भी है।

इससे पहले अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति ट्रंप के दुनियाभर के देशों पर टैरिफ लगाने के प्रस्ताव को रद्द कर दिया था। कोर्ट ने 1977 के आपातकालीन स्थितियों में लागू कानूनी शक्तियों का हवाला देते हुए कहा था कि दुनिया भर के लगभग हर व्यापारिक भागीदार पर टैरिफ लगाकर राष्ट्रपति ने अपने अधिकार का उल्लंघन किया है।

भले ही ट्रंप प्रशासन 100% टैरिफ न लगाए लेकिन अगर यह कानून पारित हो जाता है, तो टारगेट देशों के साथ बातचीत करते समय शर्तों को प्रभावित करने और उन पर दबाव डालने का यह एक हथियार बन जाएगा। भारत और अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते के लिए व्यापक बातचीत कर रहे हैं। अमेरिका के 100% टैरिफ लगाने से भारत पर दबाव पड़ेगा कि वह रूस से तेल की खरीद में कमी लाए, ताकि उसे छूट मिले।

हालाँकि, भारत सरकार सामरिक मुद्दों पर स्वायत्तता और किसी भी स्रोत से ऊर्जा खरीदने की स्वतंत्रता के मामले में दृढ़ता से अपने रुख पर कायम है, ऐसे में बहुप्रतीक्षित व्यापार समझौते में एक नया गतिरोध उत्पन्न हो सकता है। जब तक भारत पर टैरिफ का खतरा मंडरा रहा है, तब तक राहत की उम्मीद करना बेमानी है।

भारत से रूसी तेल खरीदने का अनुरोध करने से लेकर ‘दंडित’ करने तक: अमेरिकी पाखंड जगजाहिर

तथ्य यह है कि 2022 में यूक्रेन में युद्ध छिड़ने के बाद भारत रियायती दरों पर रूसी तेल ज्यादा खरीद रहा है। हालाँकि इसमें कमी-ज्यादा होता रहा है। इसकी वजह अमेरिकी धमकियों या दबाव के कारण नहीं था, लेकिन अपनी जरूरत थी। दरअसल भारत ने हाल के वर्षों में अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाई है, और यूरोप ने भी ऐसा ही किया है, जो पहले रूसी ऊर्जा पर बहुत अधिक निर्भर था।

अमेरिकी सीनेटरों ने जानबूझकर प्राकृतिक गैस को विधेयक से बाहर रखा, यह जानते हुए कि कटौती के बावजूद, यूरोपीय संघ रूसी एलएनजी का सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है। यह चयनात्मक टारगेट का स्पष्ट मामला है।

पिछले साल मई में भारत-पाकिस्तान संघर्ष को रोकने में अपनी काल्पनिक भूमिका के लिए भारत का समर्थन हासिल करने में विफल रहने के बाद डोनाल्ड ट्रम्प ने रूस और यूक्रेन के बीच युद्धविराम कराने में अपनी विफलता का गुस्सा भारत पर निकाला।

अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में पदभार संभालने के 24 घंटों के भीतर युद्ध समाप्त करने के वादे के बावजूद रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने में विफल रहने के कारण आलोचना और शर्मिंदगी का सामना करते हुए ट्रम्प ने पहले रेसिपोकल टैरिफ लगाए और भारत पर टैरिफ को दोगुना करके 50% कर दिया। 25% की यह बढ़ोतरी रूसी तेल खरीदने पर लगाए गए दंडात्मक टैरिफ के रूप में थी।

ट्रम्प ने पीटर नवारो, स्कॉट बेसेंट और हावर्ड लटनिक सहित अपने अधिकारियों को भारत और भारतीय रिफाइनरियों पर हमले करने में लगाया और भारत के साथ रूसी ऊर्जा व्यापार को यूक्रेन-रूस से जोड़ने की कोशिश की और इसे ‘युद्ध के वित्तपोषक’ के रूप में चित्रित करने के लिए खुला छोड़ दिया।

यह बेबुनियाद निंदा और टैरिफ संबंधी बयानबाजी ऐसे समय में हुई जब उसी अमेरिका ने भारत से रूसी तेल खरीदने का अनुरोध किया था और यहाँ तक ​​कि इसके लिए तारीफ भी की थी, हालाँकि वो वक्त जो बाइडेन के राष्ट्रपति काल का था। उस वक्त कहा गया कि भारत के रूसी तेल खरीदने से यूरोपीय संघ सहित अंतरराष्ट्रीय बाजारों में आपूर्ति जारी रखने में मदद मिली और वैश्विक ऊर्जा कीमत को नियंत्रित करने में मदद मिली।

तत्कालीन अमेरिकी राजदूत एरिक गार्सेटी ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि अमेरिका चाहता था कि भारत जी7 ने जो अधिकतम मूल्य निर्धारित किया है, उस पर रूसी तेल खरीदे। उन्होंने कहा, “उन्होंने रूसी तेल इसलिए खरीदा क्योंकि हम चाहते थे कि कोई रूसी तेल को निर्धारित मूल्य पर खरीदे… यह कोई उल्लंघन नहीं था… बल्कि यह नीति का ही हिस्सा था क्योंकि… हम तेल की कीमतों में वृद्धि नहीं चाहते थे।”

यानी अमेरिका को वैश्विक स्तर पर तेल की आपूर्ति बनाए रखने के लिए भारत की आवश्यकता थी, तब भारत का रूस से तेल खरीदना उचित और आवश्यक था। लेकिन अब उसे इसकी जरूरत नहीं महसूस नहीं हो रही है। रूस-यूक्रेन के युद्ध के इन 5 सालों में स्थायी युद्धविराम तो दूर, एक युद्धविराम का मौका भी नहीं आया है। इसके बावजूद अमेरिका ने बहुत आसानी से युद्ध के लिए रूस को आर्थिक मदद करने का ठीकरा भारत पर फोड़ दिया।

ऐसा तब है जब अमेरिका खुद लगातार रूस से उर्वरक, यूरेनियम, पैलेडियम और अन्य धातुओं का आयात करता रहा है। उस वक्त ये तर्क दिया जाता है कि ये उत्पाद अमेरिकी उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण हैं और इनकी जगह कोई और उत्पाद नहीं ले सकता। OpIndia ने पहले भी रिपोर्ट किया है कि कैसे वही अमेरिका जिसने भारत पर रूस-यूक्रेन युद्ध से मुनाफाखोरी का आरोप लगाया था, खुद इस लंबे युद्ध का सबसे बड़ा लाभार्थी है।

वास्तव में अमेरिका ने वैकल्पिक रणनीति, जैसे कि गुप्त टैंकर और बेड़ा, अधिक छूट आदि का प्रभावी ढंग से मुकाबला करने में अपनी विफलता का आरोप भारत पर मढ़ दिया।

हालाँकि, भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की बातचीत आगे बढ़ने के साथ ही दोनों देशों के बीच संबंध सुधरने लगे और फरवरी 2026 तक अमेरिका ने अधिकांश भारतीय वस्तुओं पर प्रभावी टैरिफ दरें घटाकर 18% कर दीं और रूसी तेल खरीदने के नाम पर लगा रेसिपोकल 25% टैरिफ हटा दिया।

साथ ही, रिलायंस को वेनेजुएला से सीधे कच्चा तेल खरीदने का लाइसेंस जारी किया और रूसी तेल खरीद पर प्रतिबंधों में छूट की घोषणा भी की। हालाँकि मोदी सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया कि अमेरिका भारत को अनुमति दे या न दे, भारत रूसी तेल खरीदना जारी रखेगा।

हालाँकि, अमेरिकी नीति में यह बदलाव किसी तात्कालिक अंतर्दृष्टि से प्रेरित नहीं था, बल्कि वैश्विक परिस्थितियों में आए परिवर्तनों के कारण हुआ था। जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर हमला किया, तो पश्चिम एशियाई देश ने वैश्विक ऊर्जा संकट के केंद्र माने जाने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकाबंदी कर दी। ऊर्जा की कीमतें बढ़ने लगीं और अमेरिका को ऊर्जा संकट से निपटने की योजना बनाए बिना युद्ध शुरू करने के लिए घरेलू और वैश्विक आलोचना का सामना करना पड़ा।

अगर अमेरिका का नया प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो भारत-अमेरिका संबंधों में पहले से ही मौजूद अविश्वास को बढ़ावा मिलेगा । 100% टैरिफ के प्रस्ताव के साथ अमेरिकी नीति निर्माता एक बार फिर रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के लिए बातचीत में अपनी विफलता का दोष भारत और चीन पर मढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।

चूँकि सीनेटरों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि उन्होंने ट्रंप प्रशासन के साथ इस विधेयक को वैध बनाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए समझौता कर लिया है, इसलिए यदि कॉन्ग्रेस इसे पारित कर देती है, और राष्ट्रपति इस पर साइन कर देते हैं तो ये कानून बन जाएगा। निस्संदेह, ट्रंप रूस और रूसी ऊर्जा के खरीदारों के खिलाफ भू-राजनीतिक हथियार के रूप में टैरिफ का उपयोग करने में खुशी महसूस करेंगे।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

27 साल जेल, टूटा परिवार और अब रिहाई की उम्मीद: दारा सिंह केस के अनसुने पहलू

देश में ईसाई मिशनरियों के नेटवर्क का क्या प्रभाव है ये आप ओडिशा की जेल में बंद रवींद्र पाल उर्फ दारा सिंह के मामले से समझ सकते हैं। साल 1999 से ओडिशा की जेल में बंद दारा सिंह को आखिरकार 2026 में, यानी पूरे 27 साल बाद, अदालत से रिहाई की उम्मीद जगी है।

ओडिशा टीवी की रिपोर्ट के अनुसार दारा सिंह के वकील ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने 15 अगस्त 2026 तक दारा सिंह को रिहा करने का आदेश दिया है।

वहीं सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, “हम इस मामले को 19 अगस्त तक के लिए स्थगित करना उचित समझते हैं। इस बीच, हम उम्मीद करते हैं कि समिति (समय पूर्व रिहाई पर) अपना निर्णय लेगी।”

सुनवाई में सरकारी वकील योगेश्वरन ने अदालत को बताया कि रिहाई की समीक्षा करने वाली समिति को जिला अदालत से कुछ दस्तावेजों की आवश्यकता थी, जिन्हें जल्द ही व्यवस्थित कर समिति के पास भेज दिया जाएगा।

दारा सिंह के बीते 27 साल

60 वर्ष की उम्र में जब दारा सिंह के जेल की सलाखों से बाहर आने की खबर हर ओर है तो ये मालूम हो कि अब उस व्यक्ति के पास अपनी हिंदू पहचान के अलावा कुछ नहीं बचा है।

इन 27 सालों में उन्होंने अपने माता-पिता, बहन सबको खो दिया है। मगर, मेनस्ट्रीम मीडिया को ये चीजें खबर में जोड़ने वाली नहीं लग रहीं। खबरों की हेडलाइन्स में दारा सिंह को इस तरह पेश किया जा रहा है कि पाठक उनकी रिहाई की खबरों पर सवाल उठाने लगें।

रिपोर्ट्स में ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस और उनके परिवार की पीड़ा तो बताई जा रही है, लेकिन दारा सिंह के मानवाधिकारों के हनन पर और उनके जीवन की बर्बादी पर पूरी तरह चुप्पी साध ली गई है।

इस एकतरफा नैरेटिव के उलट, ऑपइंडिया लगातार दारा सिंह के मुद्दे को प्रमुखता से उठाता रहा है। साल 2024 में हमने आपको उनके घर के हालात, परिजनों के इंतजार और प्रशासन की ढिलाई से रूबरू करवाया था।

आज जब ऐसा मौका आया है कि उनके जेल से छूटने की आस जगी है तो ये चर्चा जरूरी है कि आखिर दारा सिंह को इतनी लंबी सजा क्यों भुगतनी पड़ी?

क्यों ईसाई मिशनरियों की नजर में खटके दारा सिंह

दारा सिंह तो उत्तर प्रदेश के ओरैया से निकलकर नोएडा और फिर ओडिशा में बच्चों को हिंदी पढ़ाने आए थे फिर आखिर ऐसा क्या हुआ कि उन्हें 27 साल जेल की कोठरी में रहना पड़ा।

क्या एक स्कूल में हिंदी भाषा पढ़ाते समय धर्म और संस्कृति से जुड़ी बातें करना गुनाह था? क्या बजरंग दल से जुड़कर सनातन धर्म के लिए काम करना अपराध था? क्या जनजातीय समाज को अपने मूल धर्म के प्रति जागरूक करना कोई ऐसा पाप था जिसके लिए 27 साल की सजा दी जाए?

जवाब साफ है- नहीं। ये सब करना कोई गुनाह नहीं था, लेकिन ये सारी चीजें ऐसी जरूर थीं जो उस समय में ओडिशा में फैलते ईसाई मिशनरिययों के मिशन में रोड़ा बनतीं… हो सकता है जनजातीय जागरूक हो जाते तो वो धर्मांतरित नहीं होते और जो होते वो दोबारा सनातन में आ जाते।

यही कारण था कि उस समय हिंदुत्व विचारधारा के बढ़ते प्रभाव को दबाने के लिए हर प्रयास किए गए। लेख लिखकर हिंदूवादी कार्यकर्ताओं को आतंकी बताते हुए कहा गया कि ये लोग ईसाइयों को दोबारा से हिंदू बनाना चाहते हैं!

दारा सिंह ने ईसाई मिशनरियों से लोहा ले लिया था और पूरे रैकेट का अंत करने की लड़ाई लड़ रहे थे। लोगों को जागरूक करना उनका काम था। वहीं दूसरी तरफ ग्राहम स्टेंस का काम था गाँव के गाँवों को ब्रेनवॉश करके ईसाई बनाना।

जब ये दोनों विचारधाराएँ साथ में टकराईं तो लोग समझने लगे कि ईसाई मिशनरियाँ उनके साथ क्या खेल कर रही हैं।

बताया जाता है सनातन के प्रति जागरूकता और ईसाई मिशनरियों के कुत्सित प्रयास ने स्थानीयों के मन में गुस्सा भर दिया। ग्राहम स्टेंस चूकि इलाके में मिशनरी का प्रमुख चेहरा था इसलिए लोग उसके खिलाफ भड़के हुए थे।

नतीजा एक रात जब उसने एक गाँव में अपनी गाड़ी रुकने के लिए लगाई तो वहाँ की भीड़ भड़क उठी। लोग तेजी से मशाल लेकर उसकी ओर बढ़े और स्टेंस पर अपना गुस्सा दिखाने में उन्होंने उसे गाड़ी में ही बच्चों के साथ जला डाला।

कौन था ग्राहम स्टेंस

आप विकीपीडिया जैसे जगहों पर ग्राहम स्टेंस को लेकर सर्च करेंगे ये मिलेगा कि वो भारत में लेप्रोसी से पीड़ित लोगों की सेवा के लिए आया थे। हालाँकि, हकीकत क्या है ये जानने के लिए आपको सालों से गढ़े गए नैरेटिव से ऊपर मामले को समझना होगा।

ग्राहम स्टेंस का असल काम लोगों का ब्रेनवॉश करने से लेकर गाँव के गाँव को ईसाई बनाना था। उसकी पैठ उड़ीसा के मयूरभंज और केयोनझार जैसे इलाकों में मजबूत हो चुकी थी। जिलों में 20 से 25 चर्च बनकर तैयार हो गए थे। जनजातीय उसके इस बहकावे में आ रहे थे कि उनकी बीमारी भगवान का श्राप है और उन्हें ठीक होने के लिए ईसाई बनना होगा। ‘जंगल कैंप’ के नाम पर वह महिलाओं का यौन शोषण करता था। उसका मिशन इतना तीव्र था कि वो एक गाँव को ईसाई बनाकर दूसरे गाँव में ठहरने चला जाता था।

Wikipedia पर मौजूद ग्राहम स्टेंस की जानकारी

22 जुलाई 1999 की रात भी बताते हैं वह इसी मिशन पर था। वह लोगों को ठीक करने की आड़ में अपने मकसद के लिए केओनझार जिले के मनोहरपुर गाँव में गाड़ी लेकर पहुँचा था। लोगों को जरा देर नहीं लगी ये समझने में कि वो किस मकसद से वहाँ आया है और गुस्से में एक भीड़ उसकी गाड़ी के आगे बढ़ी और ग्राहम को गाड़ी में ही 2 बच्चों के साथ खाक कर दिया गया।

क्या कहता है दारा सिंह का पक्ष

आज इस रिपोर्ट को लिखते हुए हम उन हत्याओं को जायज नहीं ठहरा रहे और न ही भीड़ के आक्रोश दिखाने के तरीके को सही कह रहे हैं। लेकिन इस मामले में एक पक्ष ये भी है कि 22 जुलाई 1999 की इस घटना के बाद जब दारा सिंह का नाम इन हत्याओं में आया तो अलग-अलग बातें फैलीं। कुछ ने कहा कि दारा सिंह भीड़ का हिस्सा थे और कुछ ने बताया कि जिस वक्त हत्या को अंजाम दिया गया था उस समय वह उस जगह मौजूद ही नहीं थे।

दारा सिंह के समर्थक तो ये भी कहते हैं कि यह पूरी कवायद उस समय की सरकार और ईसाई मिशनरियों के प्रभाव में की गई थी, ताकि राष्ट्रवादियों और सनातन के लिए काम करने वालों के बीच एक कड़ा संदेश भेजा जा सके- यदि कोई भी ईसाई मिशनरियों के धर्मांतरण के खेल के आड़े आएगा, तो उसका हश्र दारा सिंह जैसा ही होगा।

इस खबर के चलते इतने नैरेटिव गढ़े गए कि दारा सिंह की रिहाई मुश्किल होती गई। जिस पुलिस के आगे उन्होंने खुद सरेंडर किया था उसी के हवाले से खबरें चलीं कि उन्हें तो गिरफ्तार किया गया है।

इसके बाद समय बीता, कोर्ट में सुनवाई चलीं और केस में आरोपित बनाए गए 51 में से 49 को रिहाई मिली लेकिन दारा सिंह और महेंद्र हेम्ब्रम को दोषी मानकर आजीवन कारावास सुनाई गई।

साल 2019 में प्रिया मुंडा जैसे सामाजिक कार्यकर्ता दोबारा एक्टिव हुए। उन्होंने याचिकाएँ लगाईं, रिहाई की माँग की। लेकिन ईसाई मिशनरियों ने उनके रास्ते में भी कम मुश्किलें पैदा नहीं कीं। उन लोगों को भी तमाम केसों का सामना करना पड़ा मगर कोशिश जारी रही।

नतीजा- 2023 में महेंद्र भी रिहा हुए, लेकिन उस वक्त भी दारा सिंह को लेकर कोई सुनवाई नहीं हुई। उनकी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 6 जनवरी 2024 को दोषी दारा सिंह की रिहाई को लेकर दायर याचिका पर ओडिशा सरकार और CBI से जवाब माँगा था। हालाँकि, इस पर कोई निर्णय हुआ है।

ऑपइंडिया की दारा सिंह के भाई से बात

साल 2024 में जब साल 2024 में हमारी टीम दारा सिंह के पैतृक निवास ओरैया पहुँची तो घर में टूटे बर्तन, फूटे शीशे, बरसात का आता पानी ये गवाही दे रहे थे कि उनकी माली स्थिति ठीक नहीं है, पर बावजूद इसके दारा सिंह के परिजनों ने यह दोहराया था कि उनके लिए उनका धर्म ही धरोहर है। 24-25 साल से केस लड़ते हुए उनके घर के गहने और बाकी संपत्ति बिक गई है लेकिन फिर भी वह कानूनी लड़ाई को अंत तक जारी रखेंगे।

दारा सिंह के भाई अरविंद से मिले तो उनकी बातें सुनकर हमें इस मामले में प्रशासनिक क्रूरता का भी पता चला। अरविंद पाल ने हमें कागजी सबूतों के साथ बताया कि यूपी प्रशासन की तरफ से बार-बार दारा सिंह को रिहा करने की रिपोर्ट भेजे जाने के बाद उन्हें नहीं छोड़ा गया। उड़ीसा की तत्कालीन सरकार उनकी हर फाइल को दबाकर बैठी रही। इतना ही नहीं प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा जब इस पत्र पर ओडिशा सरकार से जवाब तलब किया गया तो उधर से बस मामले को टालने जैसे जवाब मिलते रहे।

न उन्हें जब छोड़ा गया जब उनकी बहन खत्म हुई और न ही तब जब उनके माता-पिता को मुखाग्नि देनी थी। उनकी हर अर्जी को बिना किसी ठोस सुनवाई के खारिज कर दिया गया।

दारा सिंह को जेल और स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वती की हत्या: ईसाई मिशनरियों से लड़ने की सजा

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि दारा सिंह का मामला उस दौर में ठंडे बस्ते में रहा जब एक तरफ हमारे देश में आतंकियों के रोना रोया जा रहा था, उनकी फाँसी पर मानवाधिकारों की दुहाई दी जा रही थी। दूसरी तरफ बीवी को गोली मारकर उसे टुकड़ों में काटकर तंदूर में भूनने वाले तत्कालीन कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सुशील कुमार को अच्छे आचरण हाईकोर्ट से रिहाई मिल रही थी लेकिन दारा सिंह के लिए आवाज उठाने वाला कोई नहीं था।

आज 27 साल बाद जब कोर्ट ने उनकी रिहाई की बात उठी है, तो यह मालूम रहे कि ये केवल एक कैदी की रिहाई नहीं है, बल्कि उस दमनकारी तंत्र का पर्दाफाश है जिसने एक व्यक्ति की पूरी जवानी, उसका परिवार और उसका जीवन सिर्फ इसलिए छीन लिया क्योंकि वह मिशनरियों के एजेंडे के खिलाफ खड़ा था।

दुखद यह है कि आज हम महिलाओं का शोषण करने वाले ग्राहम स्टेंस को हीरो बनाकर पढ़ने पर गौर देते हैं, कॉन्ग्रेस द्वारा उनकी बीवी को दिए गए पद्म पुरस्कार को अधिकार समझते हैं, लेकिन हमें दारा सिंह के साथ हुई नाइंसाफी का कुछ नहीं पता होता और न ही हम उन स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वती की हत्या से जुड़ा कुछ जानते हैं, जिन्हें ओडिशा में ही साल 2008 में ईसाई मिशनरी से लड़ने पर जन्माष्टमी के दिन ही मौत के घाट उतार गया था।

सोनम वांगचुक का अनशन हेडलाइन, ग्रामीणों का सत्याग्रह फुटनोट क्यों बन जाता है?

सुप्रीम कोर्ट ने एक टिप्पणी में उन बेरोजगार युवकों को ‘कॉकरोच’ बताया जो सोशल मीडिया को किसी पर भी अटैक करने का हथियार बनाते हैं। खलिहरों की एक जमात ने इसमें वायरल होने का मौका देखा। बीजेपी और नरेंद्र मोदी विरोधी एजेंडा को पुश करने के लिए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) नाम की दुकान खोल ली। सोशल मीडिया में फॉलोअर, लाइक, शेयर, ट्रेंड का धंधा चकाचक चलने के बाद, जब इस दुकान की लॉन्चिंग जमीन पर हुई तो उसे जन समर्थन ही नहीं मिला।

फिर भी दिल्ली के जंतर-मंतर पर उन्होंने एक टेंट गाड़ रखा है। सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk) नाम के एक ‘आंदोलनजीवी’ को अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बिठा रखा है। 17 दिन के अनशन के बाद भी जनसमर्थन नहीं मिलने के बाद, यह नैरेटिव गढ़ने का प्रयास हो रहा है कि केंद्र की मोदी सरकार ही असंवेदनशील है, क्योंकि वांगचुक के समर्थन में सोशल मीडिया पर भारत के विपक्षी नेताओं की छाती में दूध उतर आया है। मीडिया भी इस तमाशे को हाइप देने में अपनी तरफ से कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रही।

अब दिल्ली के जंतर मंतर से सीधे मध्य प्रदेश चलते हैं। यहाँ केन-बेतवा लिंक परियोजना के कथित प्रभावितों का छतरपुर में प्रदर्शन चल रहा है। बारिश से नदी उफान पर है। फिर भी ग्रामीण अपनी माँगों के समर्थन में जल सत्याग्रह कर रहे हैं। कभी चिता पर लेटकर तो कभी सांकेतिक फाँसी के जरिए।

क्या इनके समर्थन में आपने किसी नेता, किसी अभिनेता को देखा-सुना है? क्या सोशल मीडिया पर इनके समर्थन में आपने ट्रेंड या रील की बाढ़ देखी है? क्या मेनस्ट्रीम मीडिया को इनके प्रदर्शन पर चर्चा करते आपने देखा है?

इन सभी सवालों का जवाब है- नहीं। क्या इस उपेक्षा की वजह यह है कि जंतर-मंतर देश की संसद से सटा हुआ है और मध्य प्रदेश का छतरपुर इसी संसद से सैकड़ों किलोमीटर दूर है? या फिर ये सोच कि जंतर-मंतर के तमाशे में नामचीन ​खलिहर शामिल हैं जो टीआरपी और वायरल कंटेंट देते हैं, जबकि छतरपुर के प्रदर्शन में इस देश के वे सामान्य लोग हैं जिन्हें शायद ही पता हो कि टीआरपी और वायरल कंटेंट आखिर किस चिड़िया का नाम है?

मैं यहाँ इस चर्चा में नहीं जाना चाहता कि ये दोनों प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं। इन चिंताओं को दूर करने के लिए सरकार ने क्या प्रयास किए हैं। इसमें भी नहीं जाना चाहता कि इनकी माँगें कितनी जायज है और जो ये माँग रहे हैं क्या वही पूरी समस्या का समाधान है। इस पर गूगल करेंगे तो आपको सारी जानकारी मिल जाएगी।

पर इसमें कोई संदेह नहीं है कि हर आंदोलन/प्रदर्शन/सत्याग्रह/अनशन का एक ही लक्ष्य होता है- सत्ता को झुकाकर समझौते के लिए बाध्य करना। अतीत के आंदोलनों के अनुभव बताते हैं कि सरकार उन प्रदर्शनों के सामने कभी नहीं झुकती, जिसके साथ व्यापक समाज का समर्थन नहीं हो। वह उनके साथ भी समझौता नहीं करती, जिस प्रदर्शन का उद्देश्य किसी परिणाम तक पहुँचने की जगह एक समझौते के बाद दूसरे समझौते के लिए दबाव बनाना हो। साथ ही सीजेपी की शुरुआत से ही यह स्पष्ट है कि आज जिस समझौते के लिए वांगचुक को अनशन पर बिठाया गया है, उसके पीछे कुछ ‘आंदोलनजीवी’ हैं। आज के समय में ऐसा हर गिरोह बेनकाब हो चुका है। किसी के पास भी नैतिक मूल्य नहीं बचा है।

साफ है कि सोनम वांगचुक के अनशन से केवल शशि थरूर, अरविंद केजरीवाल, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी जैसे ​​ही ‘भावुक’ हो पा रहे हैं और सत्ता नहीं झुक रही तो इसका मतलब उसका असंवेदनशील होना नहीं है। तानाशाह होना नहीं है। मक्कार होना नहीं है।

यदि सरकार असंवेदनशील होती तो मध्य प्रदेश की इसी बीजेपी सरकार ने केन-बेतवा लिंक परियोजना के प्रभावितों के लिए 202.5 करोड़ रुपए के अतिरिक्त पुनर्वास पैकेज को मँजूरी नहीं दी होती। स्थानीय विधायक ने कहा है कि इस पैकेज के तहत प्रभावित परिवारों को 12.5 लाख रुपए का पुनर्वास अनुदान एक ही बार में दिया जाएगा।

ऐसे में सवाल सरकार से नहीं, CJP से है। यदि वांगचुक की हालत इतनी बुरी हो चुकी है कि वे मृत्यु के कगार तक पहुँच चुके हैं, फिर भी उनके समर्थन में समाज का वह व्यापक समर्थन क्यों नहीं आ रहा है? जाहिर है वांगचुक और उनके साथियों के लिए संदेश है कि ‘हठ छोड़ो, आत्ममंथन करो’। लेकिन जंतर-मंतर को पिकनिक स्पॉट और मंच को ‘डांस इंडिया डांस’ का स्टेज समझने वाले कॉकरोचों से इसकी उम्मीद बेमानी है।

क्या अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल अपराध है?

सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह सोनम वांगचुक या किसी को भी अपनी माँगों के समर्थन में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल से रोके। अनशन कोई अपराध नहीं है। सरकार की जिम्मेदारी ऐसी स्थिति में तभी बनती है, जब उसे लगे कि किसी व्यक्ति का आमरण अनशन सार्वजनिक व्यवस्था, उसके खुद के जीवन की सुरक्षा या कानून-व्यवस्था पर प्रभाव डाल सकता है।

हमारे संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करता है। अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्ण और बिना हथियार के एकत्र होने का अधिकार देता है। लेकिन अनुच्छेद 19(2) और 19(3) के तहत व्यवस्था, सुरक्षा, नैतिकता आदि के आधार पर सरकार उचित प्रतिबंध अवश्य लगा सकती है।

भूख हड़ताल से कब रोक सकती है पुलिस?

इस मामले में पुलिस की जिम्मेदारी तभी बनती है, जब उसे लगे कि अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल से कानून-व्यवस्था बिगड़ सकती है। हिंसा होने की आशंका है। ट्रैफिक बाधित हो रहा है। सरकारी कामकाज प्रभावित हो रहा है। या फिर अनशनकारी की स्वयं की जान को खतरा है।

ऐसी स्थिति में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के अनुसार मजिस्ट्रेट आदेश जारी कर सकते हैं। धारा 163 (जो पहले CrPC की धारा 144 थी) के तहत कार्रवाई की जा सकती है। राज्यों के पुलिस अधिनियम भी प्रदर्शन की जगह बदलने या अनुमति रद्द करने जैसे अधिकार देते हैं।

क्या आमरण अनशन करने वाले को जबरन अस्पताल ले जा सकते हैं?

यदि डॉक्टर को लगे कि अनशन करने वाले की जान खतरे में है तो उसे जबरन भी अस्पताल ले जाया जा सकता है। अस्पताल में भर्ती कर निगरानी की जा सकती है। कई मामलों में अदालतें कह चुकी हैं कि नागरिक के जीवन की रक्षा करना राज्य का कर्तव्य है।

क्या आमरण अनशन करने वाले को जबर्दस्ती भोजन दे सकते हैं?

अनशन करने वाले व्यक्ति को जबरन खाना खिलाने के प्रावधान को स्पष्ट तौर पर परिभाषित करता कोई कानून नहीं है। पर व्यवहार में ऐसा देखा गया है कि मेडिकल राय, मजिस्ट्रेट के आदेश या अदालती निर्देशों पर यह भी किया जा सकता है।

क्या भूख हड़ताल पर बैठे व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकते हैं?

ऐसे मामलों पर गिरफ्तारी पूरी तरह परिस्थिति पर निर्भर करती है। जैसे- अवैध जमावड़ा, प्रशासनिक ड्यूटी में बाधा, सार्वजनिक रास्ता रोकना, आदेशों की अवहेलना वगैरह।

आमरण अनशन की स्थिति में सरकार आमतौर पर क्या करती है?

ऐसी स्थिति में प्रशासन बातचीत से रास्ता निकालने का प्रयास करता है। मेडिकल टीम अनशन करने वाले की नियमित जाँच करती है। गंभीर स्थिति होने पर अस्पताल ले जाती है।

मणिपुर में इरोम शर्मिला को लंबे समय तक हिरासत में रखकर नाक के माध्यम से पोषण दिया जाता था। कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए शासनकाल में इसी दिल्ली में अन्ना हजारे को अनशन शुरू करने के बाद हिरासत में ले लिया गया था। लेकिन बाद में रिहा कर निर्धारित स्थान पर अनशन की अनुमति दे दी गई थी। ठीक उसी काल खंड में स्वामी रामदेव के आंदोलन पर पुलिस ने कानून-व्यवस्था को आधार बनाकर बल प्रयोग किया था।

कनाडा-यूरोप में भारतीय गैंगस्टरों की दहशत, अमेरिका को शुरू करना पड़ा ‘ऑपरेशन हार्ड बॉल’: कौन हैं FBI का मोस्ट वांटेड नीतीश कौशल, कैसे काम करता है भगवानपुरिया गैंग और क्यों लॉरेंस बिश्नोई-गोल्डी बराड़ का भी आया नाम

अमेरिका की संघीय जाँच एजेंसी (FBI) ने गैंगस्टर नीतीश कौशल को अपनी मोस्ट वांटेड लिस्ट में शामिल कर लिया है। FBI ने नीतीश कौशल पर आरोप लगाया है कि वह एक अंतरराष्ट्रीय आपराधिक संगठन की गतिविधियों में शामिल था। यह संगठन हत्या, अपहरण, मादक पदार्थों की तस्करी, जबरन वसूली, हथियारों की तस्करी, मनी लॉन्ड्रिंग और मानव तस्करी समेत कई अपराधों में शामिल था।

FBI ने अपने बयान में कहा, “यह संगठन जग्गू भगवानपुरिया ऑर्गनाइज्ड क्राइम ग्रुप (Bhagwanpuria OCG) के नाम से जाना जाता है। इसकी शुरुआत भारत के पंजाब राज्य में हुई थी और यह अमेरिका के कैलिफोर्निया के सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट तथा अन्य स्थानों पर सक्रिय था।”

कौन है नीतीश कौशल?

FBI का नीतीश कौशल पर आरोप है कि उसने भगवानपुरिया OCG की ओर से हिंसक घटनाओं को अंजाम दिया। इनमें अपहरण और हमले समेत अन्य हिंसक कृत्य शामिल हैं।

FBI ने आगे बताया, “25 जून 2026 को अमेरिका के कैलिफोर्निया के लॉस एंजिल्स स्थित यूनाइटेड स्टेट्स डिस्ट्रिक्ट कोर्ट, सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट ऑफ कैलिफोर्निया ने कौशल के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया। यह वारंट उसके खिलाफ रैकेटियर इन्फ्लुएंस्ड एंड करप्ट ऑर्गनाइजेशंस कॉन्सपिरेसी यानी संगठित अपराध से जुड़ी साजिश का आरोप लगाए जाने के बाद जारी किया गया है।”

कौन है कुख्यात ड्रग डीलर जग्गू भगवानपुरिया?

FBI ने नीतीश कौशल पर जग्गू भगवानपुरिया गैंग में शामिल होने का आरोप लगाया है। यह गैंग कुख्यात ड्रग तस्कर जग्गू भगवानपुरिया द्वारा चलाया जाता है। जग्गू भगवानपुरिया का असली नाम जगदीप सिंह है। वह पंजाब के बटाला स्थित भगवानपुर गाँव का रहने वाला है। गाँव के नाम के कारण ही वह अपराध की दुनिया में जग्गू भगवानपुरिया के नाम से पहचाना जाने लगा। वह वर्ष 2012 से खुलकर अपराध की दुनिया में सक्रिय हुआ था।

जग्गू के खिलाफ 2012 से अब तक करीब 128 आपराधिक मामले दर्ज बताए जाते हैं। इनमें हाई प्रोफाइल हत्याएँ, अपहरण, जबरन वसूली, हाईवे पर लूट, हथियारों की तस्करी और आर्म्स एक्ट से जुड़े मामले शामिल हैं। उसके खिलाफ एनडीपीएस एक्ट के तहत भी करीब 12 मामले दर्ज हैं।

पुलिस ने जग्गू भगवानपुरिया को वर्ष 2015 में गिरफ्तार कर लिया था। इसके बाद से वह जेल में बंद है। हालाँकि, गिरफ्तारी के बाद भी उसके अपराधों का नेटवर्क पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। बताया जाता है कि वह जेल के भीतर से ही अपने गैंग के सदस्यों को निर्देश देता रहा और आपराधिक गतिविधियों को संचालित करता रहा।

जग्गू भगवानपुरिया गैंग को पंजाब के सबसे सक्रिय आपराधिक गिरोहों में गिना जाता है। कहा जाता है कि उसके गिरोह में 50 से अधिक अपराधी शामिल हैं। इस गैंग का मुख्य काम अपहरण, जबरन वसूली, हाईवे पर लूट, हथियारों की तस्करी और नशीले पदार्थों का कारोबार रहा है।

लॉरेंस बिश्नोई और गोल्डी बराड़ से रहा करीबी रिश्ता

जग्गू भगवानपुरिया का संबंध एक समय लॉरेंस बिश्नोई और कनाडा में बैठे गोल्डी बराड़ से बेहद करीबी था। बताया जाता है कि लॉरेंस बिश्नोई ने अपराध की दुनिया के कई तरीके जग्गू भगवानपुरिया से ही सीखे थे। शुरुआत में तीनों मिलकर पंजाब में अपना आपराधिक नेटवर्क चला रहे थे।

सिद्धू मूसेवाला की हत्या के समय तक भी लॉरेंस बिश्नोई, गोल्डी बराड़ और जग्गू भगवानपुरिया एक साथ बताए जाते थे। मूसेवाला हत्याकांड में जग्गू की भूमिका पर भी संदेह जताया गया था। आशंका व्यक्त की गई कि जग्गू भगवानपुरिया ने लॉरेंस बिश्नोई के कहने पर इस हत्या के लिए शार्प शूटर उपलब्ध कराए थे।

बाद में जग्गू भगवानपुरिया और लॉरेंस बिश्नोई के बीच विवाद शुरू हो गया। बताया जाता है कि जग्गू ने बड़े स्तर पर ड्रग्स का कारोबार शुरू कर दिया था जबकि लॉरेंस गैंग नशीले पदार्थों के कारोबार से दूरी बनाए रखने का दावा करता था।

लॉरेंस बिश्नोई और गोल्डी बराड़ ने कथित तौर पर जग्गू को कई बार ड्रग्स का धंधा छोड़ने के लिए कहा लेकिन वह नहीं माना। जग्गू का गैंग लगातार नशीले पदार्थों की तस्करी करता रहा और धीरे-धीरे उसके पुराने साथी ही उसके दुश्मन बन गए। दोनों गैंग के बीच हथियारों के बँटवारे को लेकर भी विवाद होने लगा। इसके बाद लॉरेंस और जग्गू ने अपने रास्ते अलग कर लिए।

लॉरेंस बिश्नोई और गोल्डी बराड़ ने जग्गू पर यह आरोप भी लगाया कि उसने सिद्धू मूसेवाला की हत्या में शामिल दो शूटरों की जानकारी पंजाब पुलिस को दी थी। इस आरोप ने दोनों गिरोहों के बीच दुश्मनी को और अधिक बढ़ा दिया।

अमेरिकी अभियोजकों के अनुसार, भगवानपुरिया के कथित तौर पर भारत, कनाडा, अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में फैले 1,000 से अधिक सदस्य और सहयोगी हैं। जाँचकर्ताओं का आरोप है कि उनका प्रभाव केवल अंडरवर्ल्ड तक ही सीमित नहीं था। 2019 में उत्तर भारत सर्कल स्टाइल कबड्डी फेडरेशन ने तत्कालीन DGP को पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि उन्होंने विदेशों में होने वाले टूर्नामेंटों के लिए टीम चयन में दखल दिया था।

कैसे बना ग्लोबल नेटवर्क और कैसे करता है भर्ती?

अमेरिकी चार्जशीट के मुताबिक, जग्गू भगवानपुरिया का नेटवर्क भी लॉरेंस बिश्नोई गैंग की तरह पंजाब से विदेश जाने वाले लोगों के रास्ते पर आगे बढ़ा। गैंग के भरोसेमंद सदस्य कनाडा और अमेरिका में जाकर बस गए और वहीं से ड्रग्स की तस्करी, हथियारों की सप्लाई, रंगदारी की रकम जुटाने और अपराध से कमाए पैसे को ठिकाने लगाने का काम करने लगे। इस तरह पंजाब से शुरू हुआ नेटवर्क धीरे-धीरे कई देशों तक फैल गया।

अमेरिका का कैलिफोर्निया इस नेटवर्क का प्रमुख केंद्र बनकर सामने आया। जाँच एजेंसियों का आरोप है कि कोकीन, मेथामफेटामाइन और हेरोइन जैसी ड्रग्स को अमेरिका के अलग-अलग हिस्सों में पहुँचाया जाता था और बाद में कनाडा भेजा जाता था। आरोप है कि गैंग ने वहाँ रियल एस्टेट कारोबारियों, शराब ठेकेदारों, ट्रांसपोर्टरों और स्थानीय व्यापारियों को रंगदारी के लिए निशाना बनाया।

मई 2024 में FBI के सैक्रामेंटो कार्यालय ने पंजाबी समुदाय से रंगदारी और धमकी से जुड़े मामलों की जानकारी देने की अपील भी की थी। इससे पता चलता है कि जाँच एजेंसियों को विदेश में सक्रिय इस नेटवर्क की गतिविधियों की जानकारी मिलने लगी थी।

गैंग आर्थिक रूप से कमजोर, नाराज या अपराध से प्रभावित युवाओं और नाबालिगों को निशाना बनाता था। उन्हें जल्दी पैसा कमाने, समाज में पहचान बनाने और गैंग में ताकतवर स्थान मिलने का लालच दिया जाता था। जो युवा गैंग के प्रति वफादारी साबित करते थे, उन्हें बाद में कनाडा, अमेरिका या ब्रिटेन भेजने का अवसर देने का वादा किया जाता था। विदेश पहुँचने के बाद इन्हीं लोगों को गैंग के अंतरराष्ट्रीय कामों में शामिल कर लिया जाता था।

इंस्टाग्राम इस भर्ती का एक बड़ा माध्यम था। पंजाब पुलिस ने भी पहले बताया था कि भगवानपुरिया से जुड़े एक अंतरराष्ट्रीय मॉड्यूल के तीन सदस्यों को इंस्टाग्राम के जरिए गैंग में शामिल किया गया था। सोशल मीडिया पर गैंग के सदस्यों की तस्वीरें, धमकियाँ, हत्याओं की जिम्मेदारी और अपराधियों का महिमामंडन करने वाली पोस्ट डालकर डर फैलाया जाता था। साथ ही, ऐसी पोस्ट का इस्तेमाल नए युवाओं को आकर्षित करने के लिए भी किया जाता था।

US में भगवानपुरिया नेटवर्क पर आरोप और उसमें शामिल पंजाब पुलिस का कॉन्स्टेबल

अमेरिका के कैलिफोर्निया सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट की संघीय अदालत में दाखिल ग्रैंड जूरी चार्जशीट में जेल में बंद गैंगस्टर जग्गू भगवानपुरिया और उसके सहयोगियों पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। FBI के अनुसार, भगवानपुरिया गैंग ने पंजाब में कुछ पुलिस अधिकारियों के साथ मिलकर वसूली का एक पूरा तरीका तैयार किया था।

गैंग के सदस्य अपने विरोधियों, पुलिस के संभावित मुखबिरों और रंगदारी के लिए चुने गए लोगों की जानकारी भ्रष्ट पुलिसकर्मियों को देते थे। इसके बाद उन लोगों या उनके परिवार के सदस्यों को हत्या जैसे गंभीर मामलों में झूठा फँसाने की धमकी दी जाती थी।

FBI का आरोप है कि पुलिस कार्रवाई और जेल भेजे जाने का डर दिखाने के बाद पीड़ित परिवारों से संपर्क किया जाता था। उनसे कहा जाता था कि पैसे देने पर उनके नाम मुकदमे से हटा दिए जाएँगे। अमेरिकी एजेंसी ने इसे एक-दो घटनाओं के बजाय भगवानपुरिया गैंग की बार-बार अपनाई जाने वाली संगठित रणनीति बताया है।

चार्जशीट में पंजाब पुलिस के इंस्पेक्टर गुरिंदरजीत सिंह नागरा का नाम प्रमुखता से शामिल है। FBI के अनुसार, नागरा भगवानपुरिया गैंग से जुड़े कुछ लोगों के संपर्क में थे। यह मामला 15 जनवरी 2026 को पंजाब के होशियारपुर जिले के मियानी गाँव में हार्डवेयर कारोबारी बलविंदर सिंह की हत्या से जुड़ा है। हत्या के बाद भगवानपुरिया गैंग ने सोशल मीडिया पर इसकी जिम्मेदारी भी ली थी।

चार्जशीट के अनुसार, 13 अप्रैल 2026 से पहले गैंग से जुड़े गुरलाल सिंह ने एक व्यक्ति (चार्जशीट में विक्टिम-2) की जानकारी इंस्पेक्टर नागरा को दी। आरोप है कि इसका उद्देश्य उस व्यक्ति को बलविंदर सिंह की हत्या में झूठा फँसाना था। इसके बाद 13 अप्रैल को इंस्पेक्टर ने विक्टिम-2 के पिता से संपर्क कर उन्हें भी हत्या के मामले में आरोपित बनाने की बात कही। 16 अप्रैल को विक्टिम-2 से कहा गया कि भुगतान नहीं होने पर उसे, उसके पिता और उसकी बहन को हत्या के केस में शामिल कर दिया जाएगा।

24 मई 2026 को पुलिस ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में विक्टिम-2 और उसके पिता पर हत्या की सुपारी देने का आरोप लगाया। अगले दिन इंस्पेक्टर ने कथित रूप से परिवार से कहा कि तय रकम पूरी नहीं दी गई है और गुरलाल उसके साथ है। FBI के मुताबिक, भुगतान मिलने पर तीन आरोपितों में से दो के नाम हत्या केस से हटाने की पेशकश भी की गई।

इसी आधार पर इंस्पेक्टर नागरा पर धमकी, भय और सरकारी पद का इस्तेमाल कर रंगदारी वसूलने की कोशिश का आरोप लगाया गया है। आरोप है कि अप्रैल से जून 2026 के बीच यह दबाव बनाया गया। अमेरिकी चार्जशीट सामने आने के बाद पंजाब पुलिस ने नागरा को टांडा थाने के SHO पद से हटाकर पुलिस लाइंस भेज दिया और विभागीय जाँच के आदेश दिए हैं।

भारतीय गैंगस्टरों का US-कनाडा-यूरोप में नेटवर्क और उन पर अमेरिका में एक्शन

अमेरिका में भारत से जुड़े गैंगस्टर नेटवर्क पर पिछले कुछ समय से कड़ी कार्रवाई चल रही है। अमेरिका के न्याय विभाग के अनुसार, ‘ऑपरेशन हार्ड बॉल’ के तहत कुल 24 आरोपितों को गिरफ्तार किया गया। इनमें 11 कैलिफोर्निया, एक इंडियाना और एक जॉर्जिया से पकड़ा गया। 3 गिरफ्तारियाँ कनाडा और एक स्पेन में हुई जबकि सात आरोपित पहले से हिरासत में थे।

तीन अलग-अलग चार्जशीट में कुल 37 लोगों को आरोपित बनाया गया है। इनमें बंद लॉरेंस बिश्नोई और जग्गू भगवानपुरिया भी शामिल हैं। अमेरिकी एजेंसियों का आरोप है कि दोनों जेल में रहते हुए मोबाइल फोन और इंटरनेट से विदेशों में अपने गिरोह चला रहे थे। कार्रवाई के बाद भी दस आरोपित फरार बताए गए हैं। इनमें सात अमेरिका, दो भारत और एक यूरोप में है।

न्याय विभाग के अनुसार, जाँच के दौरान करीब 1,000 किलोग्राम कोकीन, एक किलोग्राम हेरोइन, 40 हजार डॉलर नकद और 12 हथियार जब्त किए गए। सैक्रामेंटो क्षेत्र में 23 और लॉस एंजिलिस क्षेत्र में 11 ठिकानों पर तलाशी ली गई। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, ये गिरोह हत्या, सुपारी देकर हत्या करवाने, गोलीबारी, अपहरण, रंगदारी, नशीले पदार्थों की तस्करी, हथियारों के अवैध कारोबार और मानव तस्करी में शामिल थे। इनकी गतिविधियों का सबसे अधिक असर विदेशों में रहने वाले भारतीय समुदाय पर पड़ा।

लॉरेंस बिश्नोई गैंग पर हत्या और रंगदारी के आरोप

लॉरेंस बिश्नोई के खिलाफ 9 आरोपों वाली चार्जशीट 1 जुलाई को दाखिल की गई थी। अमेरिकी अभियोजकों का आरोप है कि बिश्नोई ने सोशल मीडिया पर खुद को देशभक्त, राष्ट्रवादी और धार्मिक व्यक्ति के रूप में पेश किया। इसी छवि का इस्तेमाल भारत, अमेरिका और दूसरे देशों में युवाओं को अपने गिरोह से जोड़ने के लिए किया गया।

दूसरी ओर, वह जेल से अवैध मोबाइल फोन के जरिए राजनीतिक हत्याओं, गोलीबारी, अपहरण, रंगदारी, ड्रग तस्करी और मानव तस्करी जैसे अपराधों को निर्देशित करता था। कनाडा ने सितंबर 2025 में बिश्नोई गिरोह को आतंकवादी संगठन घोषित किया था।

अमेरिकी चार्जशीट के अनुसार, गोल्डी बराड़ उत्तरी अमेरिका और रोहित गोदारा यूरोप में बिश्नोई गैंग की गतिविधियाँ संभालता था। उन पर 18 जून 2023 को कनाडा के सरे में खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या का भी आरोप है। अमेरिकी न्याय विभाग ने अपने दस्तावेजों में उसे प्रमुख भारतीय राजनीतिक और धार्मिक व्यक्ति बताया है और उसकी पहचान ‘HSN’ के रूप में दी है।

गैंग पर लॉस एंजिलिस और थाउजेंड ओक्स में लोगों से रंगदारी माँगने के आरोप भी हैं। एक मामले में पाँच मिलियन डॉलर की माँग की गई थी। गिरोह पर ड्रग्स की तस्करी के साथ दूसरे गिरोहों की ड्रग्स लूटने का भी आरोप है। नवंबर 2024 में अमेरिका से कनाडा भेजी जा रही 49 किलोग्राम कोकीन पकड़ी गई थी। मार्च 2024 से जुलाई 2025 के बीच गैंग ने कथित रूप से लॉस एंजिलिस क्षेत्र में दूसरे गिरोहों से करीब 520 किलोग्राम कोकीन लूटी।

भगवानपुरिया गैंग के एक हजार से अधिक सदस्य होने का दावा

जग्गू भगवानपुरिया और उसके साथियों के खिलाफ सात आरोपों वाली चार्जशीट 25 जून को दाखिल की गई। इसमें 17 लोगों को आरोपित बनाया गया है। भगवानपुरिया गैंग के सदस्य अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड तक फैले बताए गए हैं। चार्जशीट का दावा है कि इस गिरोह से दुनिया भर में एक हजार से अधिक और अकेले अमेरिका में सौ से अधिक लोग जुड़े हैं।

रविंदर सिंह ढांडा के खिलाफ तीसरी चार्जशीट

तीसरी चार्जशीट रविंदर सिंह ढांडा और उसके साथियों के खिलाफ है। आरोप है कि यह नेटवर्क अमेरिका से कनाडा तक हर सप्ताह बड़ी मात्रा में कोकीन और मेथामफेटामाइन पहुँचाता था। ड्रग्स को लंबे रास्ते वाले ट्रकों और कभी-कभी खेतों में इस्तेमाल होने वाले वाहनों में छिपाया जाता था।

जुलाई 2023 से नवंबर 2024 के बीच करीब 430.1 किलोग्राम कोकीन भेजने का आरोप है। जाँच में FBI, लॉस एंजिलिस पुलिस, कनाडा की RCMP और अमेरिका-कनाडा सीमा पर तैनात एजेंसियों के साथ स्पेन और दूसरे देशों की एजेंसियाँ भी शामिल रहीं।

अमेरिकी न्याय विभाग ने स्पष्ट किया है कि चार्जशीट में लगाए गए आरोप अभी साबित नहीं हुए हैं। अदालत में दोष सिद्ध होने तक सभी आरोपितों को निर्दोष माना जाएगा। दोषी पाए जाने पर कई आरोपितों को कम से कम दस साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है।

भारत ने क्या कहा?

भारतीय विदेश मंत्रालय ने अमेरिका की इस कार्रवाई पर प्रतिक्रिया दी है। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने मंगलवार (14 जुलाई 2026) को कहा, “हमने अमेरिकी न्याय विभाग की ओर से जारी घोषणाएँ देखी हैं। ये घोषणाएँ कई देशों में सक्रिय अंतरराष्ट्रीय संगठित आपराधिक नेटवर्क के खिलाफ लगाए गए आरोपों और की गई कार्रवाई से संबंधित हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “भारत लगातार यह कहता रहा है कि अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराध, आतंकवाद, नशीले पदार्थों की तस्करी, मानव तस्करी, अवैध हथियारों की तस्करी और इनसे जुड़े आपराधिक नेटवर्क हमारे समाजों के लिए गंभीर खतरा हैं। आतंकवाद और अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराध से निपटने के मामले में भारत और अमेरिका के बीच मजबूत, प्रभावी और लगातार बढ़ता सहयोग है। भारत और अमेरिका, दोनों देशों की एजेंसियाँ पिछले कई वर्षों से एक-दूसरे के साथ मिलकर काम कर रही हैं। यह सहयोग लगातार मजबूत और गहरा होता जा रहा है।”

Exclusive: ‘मैंने PCR को कॉल किया था..’ ताहिर हुसैन की इस दलील को अदालत ने क्यों नहीं माना अंकित शर्मा की हत्या में बेगुनाही का सबूत, फैसले से समझिए पूरी कहानी

26 फरवरी 2020 को एक क्षत-विक्षत शव चांद बाग के नाले से बरामद किया गया। शरीर पर चाकू के कई घाव थे। चेहरे पर तेजाब से हमला किया गया था और हड्डियाँ टूटी हुई थी। सिर, चेहरे, छाती, पीठ और कमर पर चोट के निशान थे। ये शव 26 साल के इंटेलिजेंस अधिकारी अंकित शर्मा का था, जिनकी दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों में ताहिर हुसैन के अगुवाई वाली मुस्लिम भीड़ ने बेरहमी से कत्ल कर दिया था।

भारत में हुए उस बर्बरता के 6 साल बाद 13 जुलाई 2026 को आम आदमी पार्टी का पार्षद रहा ताहिर हुसैन समेत 5 आरोपितों को विभिन्न धाराओं 188, 153ए, 147,148, 365 और 302 के तहत अंकित शर्मा की हत्या का दोषी ठहराया गया।

मृतक अंकित शर्मा के पिता रविंदर कुमार की शिकायत पर यह मामला 26 फरवरी 2020 को दर्ज किया गया था। शिकायत में पिता ने कहा था कि मेन करावल नगर रोड पर चांद बाग पुलिया के पास सीएए विरोधी प्रदर्शन के दौरान पत्थरबाजी, आगजनी, गोलीबारी और तोड़फोड़ की घटनाएँ हुई थीं। उन्होंने यह भी बताया कि इस इलाके में आम आदमी पार्टी के नेता ताहिर हुसैन का कार्यालय है और उनके कार्यालय में कई गुंडे मौजूद थे।

मुस्लिम भीड़ ने ताहिर हुसैन के दफ्तर की छत से पत्थर और पेट्रोल बम फेंके और गोलियाँ चलाईं, जिससे जनता में दहशत का माहौल बन गया। 25 फरवरी को अंकित शर्मा घर नहीं लौटे। अगले दिन पिता रविंदर कुमार ने गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई। कुछ देर बाद उन्हें पता चला कि चांद बाग पुलिया की मस्जिद में एक व्यक्ति की हत्या करके उसे खजूरी खास नाले में फेंक दिया गया था। सूचना के आधार पर अंकित शर्मा का शव खजूरी खास नाले से बुरी हालत में बरामद किया गया। उनके शरीर पर अंडरवियर के अलावा कोई और कपड़े नहीं थे।

हिंदुओं के प्रति ताहिर हुसैन की दुर्भावना को लेकर कोर्ट का बयान

ताहिर हुसैन को दोषी ठहराते हुए अपने फैसले में कोर्ट ने कहा, “अभियोजन पक्ष ने अभियुक्त के खिलाफ धारा 188 आईपीसी, धारा 153ए ( 149 आईपीसी के साथ), धारा 147 ( 149 आईपीसी के साथ), धारा 148 ( 149 आईपीसी के साथ), धारा 365 ( 149 आईपीसी के साथ) और धारा 302 (149 आईपीसी के साथ) के तहत दंडनीय अपराधों के लिए उचित संदेहों से परे यह साबित कर दिया है कि ताहिर हुसैन गैरकानूनी भीड़ का हिस्सा था।”

इस फैसले के कुछ महत्वपूर्ण हिस्से उन बातों की पुष्टि करते हैं, जो OpIndia पिछले 6 वर्षों से रिपोर्ट करता आ रहा है। इससे यह भी साबित होता है कि 2020 में जो कुछ हुआ वह वास्तव में हिंदू विरोधी हिंसा थी।

(कोर्ट के फैसले का अंश)

अदालत ने घोषणा की कि अभियोजन पक्ष ने संदेह से परे यह साबित कर दिया है कि ताहिर हुसैन वास्तव में चांद बाग में हिंदुओं से नफरत करने वाली भीड़ का हिस्सा था। अदालत ने आगे कहा कि ताहिर हुसैन और अन्य मुस्लिम ‘चांद बाग पुलिया में दंगा, लूटपाट, आगजनी करने और हिंदुओं की जान -माल को नुकसान पहुँचाने के मकसद से इकट्ठा हुए थे और इस भीड़ को पता था कि अपने मकसद को पूरा करने के दौरान उनकी मौत भी हो सकती है।

कोर्ट ने आगे कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि हथियारों से लैस और जबरदस्त हिंसा को अंजाम देने वाली मुस्लिम भीड़ ने अंकित शर्मा को घसीटा और उसका अपहरण किया। उसे बेरहमी से पीटा गया और फिर उसकी हत्या कर दी। अदालत ने इस मामले में ताहिर हुसैन के खिलाफ सबूत मिले, जो उस भीड़ का हिस्सा था। इसलिए वह हत्या का दोषी है।

ताहिर हुसैन के ‘पीसीआर कॉल’ को द वायर, ऑल्टन्यूज और दूसरे प्रोपेगेंडा फैलाने वाले मीडिया संस्थान ने भले ही बचाने के लिए इस्तेमाल किया हो, लेकिन इस फैसले ने मुस्लिम भीड़ और ताहिर हुसैन की हिंदुओं के प्रति दुर्भावना को उजागर किया है। इस फैसले का एक और दिलचस्प पहलू था प्रोपेगेंडा लिबरल गैंग के संपादकीय लेख, जो सालों तक दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों में ताहिर हुसैन और अन्य लोगों की भूमिका को छिपाने की कोशिश करते रहे।

चांद बाग नाले से अंकित शर्मा के शव की बरामदगी और ताहिर हुसैन की उसमें संलिप्तता के खुलासे के बाद पूरा वामपंथी-उदारवादी तंत्र उसे बचने का रास्ता ढूँढने लगा। इस मकसद से इस तंत्र ने मिलजुल कर एक मनगढ़ंत वीडियो फैलाना शुरू कर दिया। वीडियो में ताहिर हुसैन गिड़गिड़ाते हुए दावा कर रहा था कि वह हिंसा का असली शिकार है। उसने दावा किया कि पीसीआर (पुलिस नियंत्रण कक्ष) में उसने कई बार फोन करके मदद माँगी थी, क्योंकि दंगाई उसे नुकसान पहुँचाने की कोशिश कर रहे थे।

यह वीडियो विशेष रूप से ‘द वायर’ ने साझा किया, जिसे अरफा खानम शेरवानी अपना घर मानती हैं। इसके बाद इस वीडियो को पूरा लिबरल वामपंथी ग्रुप ने फैलाया। वीडियो के आधार पर ताहिर की भूमिका को छिपाने की कोशिश की गई।

राजदीप सरदेसाई जैसे लोगों ने ताहिर हुसैन को ‘पीड़ित’ माना। उन्होंने अपने एक वीडियो में दावा किया कि ताहिर हुसैन और उसके साथी अपनी इमारत का दरवाजा बंद रखने की कोशिश कर रहे थे। राजदीप ने कहा कि ताहिर और उसके ग्रुप के लोग शायद हिंदू भीड़ को अंदर आने से रोकने की कोशिश कर रहे थे।

राजदीप सरदेसाई के ट्वीट से साफ पता चलता है कि ताहिर हुसैन ने ही इंडिया टुडे जैसी मुख्यधारा वाली मीडिया के साथ-साथ द वायर और ऑल्टन्यूज जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से ‘खुद को बचाने वाली’ कहानी को फैलाया था।

लेकिन तथ्यों की पुष्टि और पूरी कहानी की सच्चाई जानने की इन मीडिया संस्थान ने जहमत नहीं उठाई। ताहिर हुसैन के खिलाफ मौजूद अनेक सबूतों को नजरअंदाज कर दिया। छह साल बाद कोर्ट ने सबूतों के आधार पर ताहिर हुसैन की तमाम कानूनी दांव-पेचों के बावजूद उसे दोषी ठहराया।

ताहिर हुसैन की ‘पीसीआर कॉल’ वाली कहानी को कोर्ट ने कैसे खारिज किया

कोर्ट ने अपने फैसले में ताहिर हुसैन के उस दलील पर भी बात की जिसमें उसने खुद को अपराधी न मान कर हिंसा का पीड़ित बता रहा था और मदद के लिए पुलिस की पीसीआर को कई बार फोन करने का दावा कर रहा था।

गौरतलब है कि आरोपपत्र में ही यह दर्ज है कि ताहिर हुसैन ने पीसीआर को कई बार फोन किया था। कोर्ट के मुताबिक, “आरोपपत्र से यह भी स्पष्ट है कि 25/02/2020 को दोपहर 3:55 से 4:31 बजे के बीच ताहिर हुसैन ने पीसीआर को लगभग छह बार फोन किया था। इससे पहले 24/02/2020 को दोपहर लगभग 3:53 बजे ताहिर हुसैन ने पीसीआर को फोन करके कहा था, ‘कॉलर के घर की छत पर लोग चढ़ गए हैं और पथराव कर रहे हैं।’

शाम 5:57 बजे उसने फिर से पीसीआर को यही जानकारी दी। यह भी तर्क दिया गया है कि अभियोजन पक्ष ने ताहिर हुसैन के मोबाइल फोन की सीडीआर पर भरोसा किया है। इस रिकॉर्ड से पता चलता है कि 25/02/2020 को दोपहर 2:36 से शाम 5:30 बजे तक ताहिर हुसैन लगातार दिल्ली पुलिस के केपी सिंह, आम आदमी पार्टी के कई नेताओं, इंडियन एक्सप्रेस के संवाददाताओं, करावल नगर के निगम परिषद और अन्य व्यक्तियों को फोन कर रहा था।

अगर पुलिस और अदालत ने माना कि ताहिर हुसैन ने वास्तव में पीसीआर को फोन किया था, तो फिर इस तर्क को कोर्ट ने क्यों खारिज किया? दरअसल कोर्ट में कई जगह झूठ का पर्दाफाश हो गया।

अदालत ने गौर किया कि ताहिर हुसैन ने जिन लोगों से संपर्क करने की कोशिश की थी, उन सभी के नाम सीडीआर में दर्ज थे। हालाँकि उनमें से किसी को भी बचाव पक्ष द्वारा पूछताछ के लिए पेश नहीं किया गया। ताहिर हुसैन ने जिन लोगों को कोर्ट में गवाह के तौर पर बुलाया था, उनमें से किसी से भी बचाव पक्ष ने पूछताछ नहीं की।

अब सवाल उठता है कि क्या ताहिर हुसैन ने दंगों के दौरान जिन लोगों को फोन किया था, क्या ये कॉल वास्तव में मदद माँगने के लिए किए गए थे? या फिर ये कॉल जानबूझ कर खुद को बचाने के लिए सबूत के तौर पर पेश करने के लिए किया गया था। क्योंकि ताहिर हुसैन की छत पर दंगाइयों के होने की खबरें पहले ही फैलनी शुरू हो चुकी थीं।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि बचाव पक्ष द्वारा उनमें से किसी की भी जाँच न किए जाने या उन्हें गवाह के रूप में पेश न किए जाने के कारण अदालत यह अनुमान लगाने की स्थिति में नहीं है कि पीसीआर कॉल गंभीरता से किए गए थे।

इसके अलावा कोर्ट ने एक चौंकाने वाला खुलासा भी किया। ताहिर हुसैन ने खुद अपने पीसीआर कॉल के बारे में स्पष्टीकरण देने के लिए गवाही नहीं दी। अगर ताहिर हुसैन गवाही देते तो उन कॉलों का मकसद भी वे कोर्ट को बताते। उन्होंने ऐसा नहीं किया। गवाही के बगैर यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि ताहिर ने मदद माँगने के लिए ही कॉल किए थे या ये उनकी चाल थी।

(फैसले का हिस्सा)

पीसीआर कॉल और दंगे में अपनी भूमिका के बारे में ताहिर हुसैन ने क्या कहा था?

आम आदमी पार्टी के पार्षद ने अपने बयान में स्वीकार किया है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों के दौरान उन्हें यह जानकारी मिली थी कि सीएए के समर्थन में भी कुछ रैलियाँ होने वाली हैं। यह जानकारी मिलने के बाद उन्होंने कई लोगों से मुलाकात की और सरकार को सबक सिखाने की साजिश रची।

ताहिर हुसैन ने अपने बयान में माना है कि उसने दंगों के लिए अपने ही घर को लॉन्चपैड के रूप में चुना, क्योंकि वह इलाके की एक ऊँची इमारत थी। ताहिर हुसैन का कहना है कि उसने अपने घर को लॉन्चपैड के रूप में इसलिए भी चुना क्योंकि उसके घर में पहले से ही निर्माण कार्य चल रहा था और इसलिए दंगों के लिए पत्थर और ईंटें इकट्ठा करने से किसी को शक नहीं होगा।

वह कबूल करता है कि उसने और उसके साथियों ने सीएए का समर्थन करने वालों को सबक सिखाने के लिए काफी पहले से ही पत्थर, ईंटें और गोला-बारूद इकट्ठा करना शुरू कर दिया था। उसने दंगे भड़कने से 2-3 दिन पहले पुलिस स्टेशन से अपनी लाइसेंसी पिस्तौल भी ले आया था। दंगों की तैयारी और हिंदुओं को सबक सिखाने के लिए गोला-बारूद इकट्ठा करते समय ताहिर हुसैन का कहना है कि उसने अपने समर्थकों को ‘हर तरह से और हर परिस्थिति के लिए तैयार रहने’ का निर्देश दिया था।

उसने यह भी सुनिश्चित करने को कहा था कि इलाके में लगे सभी सीसीटीवी कैमरे, चाहे निजी हों या सरकारी, तोड़ दिए जाएँ, ताकि दंगों का कोई सबूत न मिल सके। गौरतलब है कि यह सब दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगे भड़कने से काफी पहले किया गया था।

ताहिर हुसैन ने स्वीकार किया कि वह अपने भाई शाह आलम, अरशद, आबिद, शाहिद, इरशाद और कई अन्य लोगों के साथ अपने आवास पर मौजूद थे। उनका कार्यालय भी उसी इमारत में है जहाँ से दंगे शुरू हुए थे। ताहिर हुसैन ने आगे बताया कि 24 तारीख की दोपहर को उनके अपने लोगों से ‘अल्लाह हू अकबर’ और ‘मारो मारो काफिरों को मारो’ के नारे लगाने शुरू कर दिए।

ताहिर ने आगे बताया कि उसके निर्देश पर उसके समर्थक उसके घर की छत पर पहुँच गए और हिंदुओं और उनकी संपत्तियों को निशाना बनाते हुए पत्थर फेंकने, गोली चलाने और पेट्रोल बम फेंकने लगे। हुसैन ने अपने समर्थकों से कहा था कि चूँकि उसकी इमारत इलाके की एक ऊँची इमारत है, इसलिए हिंदुओं की किसी भी जवाबी कार्रवाई से उन्हें कोई नुकसान नहीं होगा। उसने यह भी बताया कि उसका भाई शाह आलम, गुलफाम और अन्य लोग भी हिंदुओं पर पिस्तौल से गोलियाँ चला रहे थे।

फिर आता है सबसे निर्णायक हिस्सा, जिसका इस्तेमाल द वायर जैसे कई वामपंथी पोर्टलों ने ताहिर हुसैन को बचाने की कोशिश में किया है। एनडीटीवी और द वायर जैसी संस्थान ताहिर हुसैन का बचाव करने में सबसे आगे थी। दोनों पोर्टलों ने दावा किया था कि ताहिर हुसैन के खिलाफ आरोपों पर गंभीर सवाल उठते हैं क्योंकि उन्होंने खुद पीसीआर को कई बार फोन किया था और वे खुद हिंसा के शिकार थे।

‘द वायर’ ने हुसैन का एक ‘एक्सक्लूसिव’ इंटरव्यू प्रसारित किया था, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि वे पीड़ित हैं और उन्हें इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि वे मुसलमान हैं। एनडीटीवी ने पीसीआर को किए गए फोन कॉल्स को सामने रखते हुए दावा किया था कि इन कॉल्स से हुसैन के खिलाफ आरोपों पर सवालिया निशान लग गया है।

जबकि पूरे गिरोह ने ताहिर हुसैन द्वारा फैलाए गए झूठ का इस्तेमाल आईबी कर्मचारी अंकित शर्मा की हत्या और उसके द्वारा भड़काए गए दंगों से उसे बरी करने के लिए किया। ताहिर हुसैन ने अपने बयान में पीसीआर को किए गए अपने फोन के पीछे का कारण बताया।

अपने हस्ताक्षरित बयान में ताहिर हुसैन ने कहा है कि अपनी योजना के अनुसार, उसने अपने मोबाइल फोन से पीसीआर और पुलिस अधिकारियों को कई कॉल किए थे ताकि वह दंगों का कसूरवार ठहराए जाने से बच सके। उसके पास खुद को पाक साफ दिखाने का पुख्ता सबूत हो। उसने कहा कि वह जानता था कि पुलिस बल कितना भी बड़ा क्यों न हो, वे पुलिया पार नहीं कर पाएँगे, क्योंकि वहाँ हजारों मुसलमान जमा थे। इसके अलावा, मुस्लिम भीड़ पुलिस बल पर पत्थर और ईंटें फेंक रही थी ताकि उन्हें खदेड़ दिया जाए। उसने यह भी कहा कि भीड़ पुल के दोनों ओर हिंदू घरों को जला रही थी।

ताहिर हुसैन ने पीसीआर कॉल को लेकर गवाही क्यों नहीं दी?

अदालत के फैसले से यह स्पष्ट है कि ताहिर हुसैन ने अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए केवल पीसीआर कॉल का जिक्र किया। हालाँकि ताहिर के बचाव पक्ष ने उन लोगों से पूछताछ नहीं की, जिन्हें उन्होंने कॉल किया था और न ही गवाही देने के लिए अदालत में पेश किया। अदालत ने सही ही कहा कि यह मानने का कोई सबूत नहीं था कि कॉल गंभीरता से किए गए थे।

अब सवाल यह है कि ताहिर हुसैन ने गवाही देने से इनकार क्यों किया? इसका जवाब सीधा सा है। अगर वह गवाही देते, तो अभियोजन पक्ष उनसे उनके बयान और अन्य सभी सबूतों के बारे में सवाल करता, जिनसे साफ पता चलता है कि पीसीआर कॉल तो सिर्फ एक बहाना था, ताकि बाद में वह खुद को पीड़ित साबित कर सकें। इससे अपराधी के रूप में पहचान उनकी नहीं हो पाएगी।

जिरह से बचने के लिए ताहिर ने गवाही नहीं दी और उम्मीद की कि जज उसकी कानूनी दाँव-पेंच को मान लेंगे। न्यायाधीश ने सही ही इस साजिश को भाँप लिया और पीसीआर कॉल को सीधे तौर पर स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जिससे बचाव पक्ष का वह तर्क पूरी तरह खारिज हो गया।

ताहिर हुसैन को दोषी ठहराया जा चुका है, लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह फैसला निचली अदालत ने सुनाया है। अपील की प्रक्रिया लंबी और जटिल होने की संभावना है, क्योंकि ताहिर हुसैन पहले उच्च न्यायालय और फिर संभवतः सर्वोच्च न्यायालय में इस फैसले को चुनौती देगा। यह भी उल्लेखनीय है कि ताहिर हुसैन दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों के साजिशकर्ताओं में से एक हैं। साजिश के आरोप पत्र संख्या 59/2020 में उनका नाम शरजील इमाम, उमर खालिद और अन्य आरोपियों के साथ शामिल है। इस मामले की सुनवाई अभी जारी है।

(नोट: यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में नुपुर जे शर्मा ने लिखी है। इसका हिन्दी अनुवाद रुपम ने किया है।)

‘सतलुज’ में जसवंत सिंह खालड़ा हैं, लेकिन पंजाब में बस से उतारकर मार डाले गए हिंदू यात्री कहाँ हैं? खालिस्तानी आतंकवाद के नैरेटिव से मिटा दिए गए 1800 पुलिसकर्मियों का कत्ल-पत्रकारों की निर्मम हत्या

दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म ‘सतलुज’ को ओटीटी प्लेटफॉर्म Zee5 पर रिलीज करने और फिर हटाए जाने के बाद पंजाब में आतंकवाद (इंसर्जेंसी) के सबसे भयावह दौर पर एक बार फिर चर्चा शुरू हो गई है। हमेशा की तरह इस बार भी दो तरह के नैरेटिव सामने आए हैं।

पहला वह, जिसमें पंजाब में आतंकवाद के दौरान मारे गए सभी पीड़ितों, चाहे वे सिख हों या हिंदू, की बात होती है। दूसरा वह, जिसमें खालिस्तान समर्थक संगठन और उनके समर्थक इस पूरे दौर को अपने अलगाववादी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। दुर्भाग्य यह है कि अब पहला पक्ष लगातार कमजोर पड़ता जा रहा है।

फिल्म का मूल नाम ‘घल्लूघारा’ था, जिसका अर्थ नरसंहार या जनसंहार होता है। बाद में इसका नाम बदलकर ‘पंजाब 95’ रखा गया और अंततः इसे ‘सतलुज’ नाम से रिलीज किया गया। फिल्म जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और पंजाब में आतंकवाद विरोधी अभियान के दौरान कथित फर्जी मुठभेड़ों, लापता लोगों तथा गुप्त अंतिम संस्कारों की उनकी जाँच पर आधारित है।

भारत में फिल्म हटाए जाने के बाद सिख संगठनों और स्थानीय कार्यकर्ताओं ने गाँवों तथा गुरुद्वारों में इसके सामुदायिक प्रदर्शन शुरू कर दिए। इसे पुलिस की कथित बर्बरता और उस दौर में पीड़ित परिवारों की पीड़ा की दबाई गई कहानी के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। समाचार एजेंसी एसोसिएटिड प्रेस के अनुसार इन प्रदर्शनों ने बुजुर्गों की आँखें नम कर दीं, जबकि युवा पीढ़ी पहली बार उस दौर को समझने की कोशिश कर रही है, जिसके बारे में उन्होंने केवल बिखरी हुई कहानियाँ सुनी थीं।

गौरतलब हो कि अवैध हत्याओं की कहानियों के अगर कहीं सबूत हैं तो उन्हें बताना जरूरी है। खालड़ा का अपहरण और हत्या अपराध था और इस मामले में पुलिसकर्मी दोषी भी दहराया गया। कोई भी इस तरह की घटना को नजरअंदाज करने को नहीं कहता, लेकिन ‘सतलुज’ में ये दिखाया गया है कि कैसे इतिहास की कहानी पूरा सच नहीं बताती।

फिल्म की कहानी क्या छोड़ देती है?

फिल्म पंजाब आतंकवाद की कहानी को लगभग पूरी तरह पुलिस कार्रवाई से जोड़कर दिखाती है। इसमें ऐसा चित्रण किया गया है मानो पुलिस अधिकारियों ने संदिग्ध आतंकवादियों और आम नागरिकों की हत्या की हो, जबकि खालिस्तानी आतंकवाद को बिना उसका नाम लिए प्रतिरोध आंदोलन जैसा रूप दिया गया है। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल थी।

यह वही दौर था जब खालिस्तानी आतंकवादी बसें और ट्रेनें रोकते थे, यात्रियों की पहचान पूछते थे और केवल हिंदू होने के कारण उन्हें गोली मार देते थे। जो सिख नेता शांति की बात करते थे, उनकी हत्या कर दी जाती थी। जो पत्रकार आतंकवादियों की भाषा बोलने से इनकार करते थे, उन्हें मौत के घाट उतार दिया जाता था। सुरक्षित सरकारी परिसरों के भीतर पुलिस अधिकारियों पर बम हमले होते थे। सड़कों पर घात लगाकर पुलिसकर्मियों की हत्या की जाती थी और यहाँ तक कि धार्मिक स्थलों के बाहर भी उन्हें निशाना बनाया जाता था।

इन पीड़ितों की कहानी किसी फिल्म का हिस्सा नहीं बनती। उनके लिए कहीं सामुदायिक प्रदर्शन नहीं होते। उनके अधूरे सपनों पर लंबी बहस नहीं चलती। वे केवल पुराने अखबारों के आँकड़ों में सिमटकर रह गए हैं। यदि आज भी उनका जिक्र होता है तो अखबार के किसी छोटे-से कोने में, जिसे अधिकांश लोग पढ़े बिना आगे बढ़ जाते हैं।

इसी खाली जगह को भरने की कोशिश OpIndia कर रहा है।

इतिहास का वह हिस्सा जो अक्सर छूट जाता है

पंजाब आतंकवाद पर लोकप्रिय चर्चाएँ प्रायः ऑपरेशन ब्लू स्टार से शुरू होती हैं। इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद हुए सिख विरोधी दंगों का जिक्र होता है और फिर पूरा ध्यान पुलिस की आतंकवाद विरोधी कार्रवाई पर केंद्रित हो जाता है।

इन तीनों विषयों की गंभीर समीक्षा होनी चाहिए। इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद सिखों के खिलाफ हुई हिंसा भारतीय लोकतंत्र पर एक कलंक थी। इसी तरह यदि पुलिस द्वारा गैरकानूनी हत्याओं के आरोप लगे हैं तो केवल इसलिए उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि पंजाब आतंकवाद से जूझ रहा था। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब पूरी कहानी यहीं से शुरू कर दी जाती है।

पंजाब में आतंकवाद की शुरुआत पुलिस कार्रवाई से नहीं हुई थी। जब तक सुरक्षा बलों ने व्यापक अभियान शुरू किया, तब तक खालिस्तानी आतंकवाद राज्य को गहरे जख्म दे चुका था।

वह भी एक पंजाब था, जहाँ बसों और ट्रेनों में आतंकवादी यात्रियों की पहचान पूछकर तय करते थे कि कौन जिंदा रहेगा और कौन मारा जाएगा।

वह भी एक पंजाब था, जहाँ बाजारों में हिंदू दुकानदारों को निशाना बनाकर गोलियाँ चलाई जाती थीं।

वह भी एक पंजाब था, जहाँ शांति की कोशिश करने वाले सिख नेताओं को गद्दार घोषित कर मौत के घाट उतार दिया जाता था।

वह भी एक पंजाब था, जहाँ अखबारों के दफ्तर पुलिस सुरक्षा में चलते थे क्योंकि संपादक, संवाददाता, एजेंट, वितरक और यहाँ तक कि अखबार बेचने वाले हॉकर तक आतंकवादियों की हिट लिस्ट में शामिल थे।

और वह भी एक पंजाब था, जहाँ हर सुबह ड्यूटी पर निकलने वाले पुलिसकर्मी के परिवार को यह नहीं पता होता था कि वह शाम तक जीवित लौटेगा या नहीं।

आतंकवाद के शिकार कौन थे?

पंजाब आतंकवाद के पीड़ित केवल हिंदू नहीं थे और केवल सिख भी नहीं थे।

इनमें आम नागरिक थे, नेता थे, पत्रकार थे, पुलिस अधिकारी थे, सरकारी कर्मचारी थे और वे ग्रामीण भी थे जिन पर केवल इतना संदेह था कि उन्होंने सरकार की मदद की है।

इन सभी को जोड़ने वाली एक ही बात थी- या तो उन्हें उनकी पहचान के कारण चुना गया, या वे खालिस्तानी आतंकवाद की राह में बाधा बन गए।

ऑपरेशन ब्लू स्टार से पहले ही शुरू हो चुका था आतंक

आज भी बड़ी संख्या में लोग मानते हैं कि पंजाब में हिंसा की शुरुआत ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ (जिसे स्वर्ण मंदिर में भारतीय सैनिकों द्वारा चलाया गया था) के बाद हुई। जबकि तथ्य इसके बिल्कुल उलट हैं। अलगाववाद का विरोध करने वाले लाला जगत नारायण की 1981 में हत्या कर दी गई थी।

अक्टूबर 1983 में धिलवां के पास आतंकवादियों ने एक बस रोककर छह हिंदू यात्रियों को अलग किया और उन्हें गोली मार दी। अगले ही महीने कपूरथला में इसी तरह एक और बस पर हमला हुआ, जिसमें चार हिंदुओं की हत्या कर दी गई। अप्रैल 1983 में डीआईजी अवतार सिंह अटवाल की स्वर्ण मंदिर के बाहर हत्या कर दी गई। 1984 तक पुलिसकर्मियों और पत्रकारों पर लगातार हमले जारी रहे।

ये घटनाएँ स्पष्ट करती हैं कि ऑपरेशन ब्लू स्टार से पहले ही पंजाब में आतंकवाद पूरी तरह जड़ें जमा चुका था।

हालाँकि यह केवल एक संक्षिप्त झलक है। उस दौर में आतंकवाद जिस भयावह स्तर तक फैल चुका था, उसे कुछ घटनाओं में समेट पाना संभव नहीं।

जब पहचान पूछकर हिंदुओं को मौत के घाट उतारा गया

पंजाब में आतंकवाद के दौरान हुए नरसंहारों की सूची इतनी लंबी है कि उसका हर अध्याय इतिहास में अलग स्थान पाने का हकदार है।

30 नवंबर 1986 को होशियारपुर जिले के खूदा के पास हथियारबंद खालिस्तानी आतंकवादियों ने एक बस रोक दी। उन्होंने यात्रियों की पहचान पूछी और सभी हिंदू यात्रियों को नीचे उतरने का आदेश दिया। जैसे ही वे बस से नीचे उतरे, आतंकवादियों ने उन पर अंधाधुंध गोलियाँ बरसा दीं।

इस हमले में 24 हिंदुओं की मौके पर ही हत्या कर दी गई, जबकि सात अन्य गंभीर रूप से घायल हुए।

Los Angeles Times की रिपोर्ट के अनुसार, आतंकवादियों ने पहले हिंदू यात्रियों को बाकी लोगों से अलग किया और फिर उन्हें निशाना बनाया। अखबार ने इसी वर्ष मुक्तसर के निकट हुई एक और घटना का भी उल्लेख किया, जिसमें पहले सिख यात्रियों को सुरक्षित जाने दिया गया और फिर बस में बचे यात्रियों का सामूहिक नरसंहार कर दिया गया।

ये वे लोग नहीं थे जो आतंकवादियों और सुरक्षा बलों के बीच हुई मुठभेड़ में मारे गए हों। ये किसी गोलीबारी के बीच फंसे निर्दोष नागरिक भी नहीं थे। इन लोगों को केवल उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर चुना गया, अलग किया गया और योजनाबद्ध तरीके से मौत के घाट उतार दिया गया।

आरएसएस शाखा पर हमला और दहशत फैलाने की साजिश

जून 1989 में मोगा के नेहरू पार्क में चल रही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की प्रातः शाखा पर आतंकवादियों ने हमला कर दिया। हथियारबंद हमलावरों ने स्वयंसेवकों पर गोलियाँ बरसाईं। इतना ही नहीं, उन्होंने घटनास्थल पर पहले से बम भी लगा रखे थे। जब पुलिस और राहत दल घायलों की मदद के लिए पहुँचे तो विस्फोट हुए और हताहतों की संख्या और बढ़ गई।

उस समय खालिस्तानी आतंकवादियों की यही कार्यप्रणाली बन चुकी थी। पहले गोलीबारी करना और फिर बचाव कार्य शुरू होने पर बम विस्फोट कर अधिक से अधिक लोगों को निशाना बनाना।

समकालीन रिपोर्टों के अनुसार इस हमले में कम से कम 24 लोगों की मौत हुई। तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री ने इसे सांप्रदायिक तनाव भड़काने की सुनियोजित कोशिश बताया था। वास्तव में ऐसे अधिकांश हमलों का उद्देश्य यही था।

बसों, ट्रेनों, बाजारों और सार्वजनिक स्थलों पर हिंदुओं को निशाना बनाकर खालिस्तानी संगठन पंजाब के हिंदू समाज में भय पैदा करना चाहते थे। साथ ही वे यह भी चाहते थे कि पंजाब के बाहर सिखों के खिलाफ प्रतिशोधात्मक हिंसा भड़के, जिससे सांप्रदायिक विभाजन और गहरा हो तथा अलगाववादी राजनीति को नई ऊर्जा मिले।

इसलिए ये हत्याएँ केवल गुस्से या प्रतिशोध की घटनाएँ नहीं थीं। ये एक सुनियोजित राजनीतिक और जनसांख्यिकीय रणनीति का हिस्सा थीं।

यदि पंजाब में हुए बड़े आतंकी हमलों की सूची देखी जाए तो धिलवां, मुक्तसर, होशियारपुर, लालरू, फतेहाबाद, अबोहर, मोगा और पंजाब की ट्रेनों में हुए नरसंहार कोई अलग-अलग घटनाएँ नहीं थीं। इन सभी में एक समान पैटर्न दिखाई देता है- पहले हिंदू यात्रियों की पहचान करना, फिर उन्हें अलग करना और उसके बाद उनकी हत्या कर देना।

आज जब पंजाब उग्रवाद की कहानी दोबारा सुनाई जाती है तो बस या ट्रेन से नीचे उतारे गए उन हिंदू यात्रियों का जिक्र अक्सर गायब होता है। आतंकवादी को राजनीतिक संदर्भ मिल जाता है, पुलिस को कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है, लेकिन निर्दोष यात्री केवल एक संख्या बनकर रह जाता है।

खालिस्तान का विरोध करने वाले सिख भी आतंकवादियों के निशाने पर थे

खालिस्तानी आतंकवाद कोई हिंदू और सिख के बीच हुआ संघर्ष नहीं था। इसे इस प्रकार प्रस्तुत करना इतिहास के साथ अन्याय होगा।

यदि ऐसा किया जाता है तो उन हजारों सिखों के साथ भी अन्याय होगा जिन्हें केवल इसलिए मार दिया गया क्योंकि उन्होंने अलगाववाद का विरोध किया, सरकार का साथ दिया या आतंकवादियों के आदेश मानने से इनकार कर दिया।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण संत हरचंद सिंह लोंगोवाल हैं। तत्कालीन शिरोमणि अकाली दल अध्यक्ष लोंगोवाल ने 24 जुलाई 1985 को प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ पंजाब समझौते (Punjab Accord) पर हस्ताक्षर किए थे। इसका उद्देश्य राजनीतिक विवादों का समाधान निकालना और पंजाब को सामान्य लोकतांत्रिक व्यवस्था की ओर वापस ले जाना था। लेकिन यह पहल खालिस्तानी आतंकवादियों को स्वीकार नहीं थी।

समझौते के एक महीने से भी कम समय बाद, 20 अगस्त 1985 को शेरपुर स्थित एक गुरुद्वारे में सभा को संबोधित करते समय लोंगोवाल की गोली मारकर हत्या कर दी गई।

आज चार दशक बाद भी पंजाब की विभिन्न राजनीतिक पार्टियाँ उन्हें शांति और सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक नेता के रूप में याद करती हैं।

लोंगोवाल की हत्या ने स्पष्ट कर दिया कि सशस्त्र अलगाववादी आंदोलन किसी भी सिख नेता को नहीं बख्शेगा, चाहे वह सिख हितों की बात ही क्यों न करता हो। यदि उसने आतंकवाद का समर्थन नहीं किया या भारत के भीतर समाधान तलाशने की कोशिश की, तो उसकी हत्या तय थी।

यही खतरा आम सिखों पर भी मंडरा रहा था। जो ग्रामीण पुलिस को सूचना देते थे, उन्हें मार दिया जाता था।जिस परिवार का कोई सदस्य पुलिस में भर्ती हो जाता था, पूरा परिवार आतंकवादियों के निशाने पर आ जाता था। चुनाव लड़ने या लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने वाले राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी जाती थी।जो पत्रकार खालिस्तान का विरोध करते थे या आतंकवादियों के दावों पर सवाल उठाते थे, उन्हें भी मौत के घाट उतार दिया जाता था।

इसलिए यह समझना बेहद आवश्यक है कि खालिस्तानी आतंकवाद की आलोचना करना सिख समुदाय की आलोचना नहीं है।

दरअसल जो लोग ‘सिख’ और ‘खालिस्तानी’ को एक ही मान लेते हैं, वे सबसे पहले उन्हीं सिखों के बलिदान को मिटा देते हैं जिन्हें खालिस्तानी आतंकवादियों ने मार डाला था।

आज भी जब अलग खालिस्तान की माँग उठती है, तब अधिकांश सिख स्वयं को उस विचारधारा का समर्थक नहीं मानते।

पत्रकारों को चुप कराने के लिए चलाई गई खूनी मुहिम

पंजाब में आतंकवाद केवल आम नागरिकों या पुलिस तक सीमित नहीं था। मीडिया भी आतंकवादियों के प्रमुख निशाने पर था। इसकी शुरुआत 1981 में हुई, जब हिंद समाचार समूह के संस्थापक और पंजाब केसरी के संपादक लाला जगत नारायण की हत्या कर दी गई।

वे खालिस्तानी आतंकवाद के सबसे मुखर आलोचकों में थे और लगातार अलगाववाद के खिलाफ लिख रहे थे।उनकी हत्या के बाद भी आतंकवादियों का अभियान नहीं रुका। मई 1984 में उनके पुत्र और उत्तराधिकारी रोमेश चंद्र की भी हत्या कर दी गई। लेकिन यह केवल दो व्यक्तियों तक सीमित नहीं था।

संपादक, संवाददाता, समाचार एजेंट, अखबार वितरक, हॉकर- जो भी स्वतंत्र पत्रकारिता से जुड़ा था, वह आतंकवादियों की हिट लिस्ट में था।

उद्देश्य स्पष्ट था। यदि संपादक की हत्या से अखबार बंद नहीं होता, तो उसके पूरे वितरण तंत्र को आतंकित कर दिया जाए।

पत्रकारों की हत्या किसी एक अखबार या किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं थी। जो सिख लेखक, वामपंथी कार्यकर्ता या बुद्धिजीवी खालिस्तानी आतंकवाद का विरोध करते थे, वे भी आतंकवादियों के निशाने पर थे।

इसका सबसे भयावह उदाहरण ऑल इंडिया रेडियो के स्टेशन निदेशक एम.एल. मंचंदा का है। मई 1992 में उनका अपहरण कर लिया गया। आतंकवादी संगठन बब्बर खालसा ने मांग की कि ऑल इंडिया रेडियो अपने प्रसारणों की भाषा और शब्दावली आतंकवादियों की इच्छा के अनुसार बदले।

जब सरकार ने यह माँग अस्वीकार कर दी, तो मंचंदा का सिर धड़ से अलग कर दिया गया। बाद में उनका शव अलग-अलग हिस्सों में बरामद हुआ। Committee to Protect Journalists के अनुसार यह हत्या प्रसारकों पर आतंकवादियों द्वारा अपनी तथाकथित आचार संहिता थोपने की कोशिश का हिस्सा थी।

यह केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी। यह पूरे मीडिया जगत को संदेश था कि अब आतंकवादी तय करेंगे कि कौन-सी भाषा बोली जाएगी, समाचार कैसे लिखे जाएँगे और कौन-सा राजनीतिक शब्द स्वीकार्य होगा।

पत्रकारों की हत्या यह भी साबित करती है कि खालिस्तानी संगठन केवल राज्य के खिलाफ हथियारबंद संघर्ष नहीं कर रहे थे। वे उन निहत्थे नागरिकों को भी मारने को तैयार थे जो उनकी विचारधारा और प्रचार का विरोध करते थे।

एक पत्रकार के हाथ में बंदूक होना जरूरी नहीं था। उसका एक लेख ही उसे आतंकवादियों का दुश्मन बना देने के लिए पर्याप्त था।

करीब 1,800 पुलिसकर्मियों ने भी दी थी जान

पंजाब उग्रवाद के अंतिम वर्षों में पंजाब पुलिस की कठोर कार्रवाई पर अक्सर लंबी बहस होती है। लेकिन जिन पुलिसकर्मियों ने इस आतंकवाद से लड़ते हुए अपनी जान गंवाई, उनकी कहानी शायद ही कभी उतनी प्रमुखता से सामने आती है।

पंजाब पुलिस के व्यापक रूप से उद्धृत आँकड़ों के अनुसार आतंकवाद के दौर में 1,784 पुलिस अधिकारी और जवान बलिगान हुए।

2016 में पंजाब पुलिस ने इन शहीदों का व्यक्तिगत रिकॉर्ड तैयार करने की पहल शुरू की। हिंदुस्तान टाइम्स से बातचीत में एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्वीकार किया था कि इतने बड़े बलिदान के बावजूद उनकी कहानियों का कोई व्यवस्थित दस्तावेज उपलब्ध नहीं था।

यह संख्या अपने आप में चौंकाने वाली है, लेकिन केवल आँकड़ा देखने से उस दौर की भयावहता का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।

स्वर्ण मंदिर के बाहर डीआईजी की हत्या

25 अप्रैल 1983 को पंजाब पुलिस के डीआईजी अवतार सिंह अटवाल स्वर्ण मंदिर में मत्था टेकने गए थे। जब वे दर्शन कर बाहर निकले, तभी आतंकवादियों ने उन्हें गोली मार दी

समकालीन रिपोर्टों के अनुसार उनका शव लंबे समय तक मंदिर परिसर के बाहर पड़ा रहा, क्योंकि मौजूद लोग भय के कारण उसके पास जाने का साहस नहीं जुटा सके।

उस समय इस घटना को केवल एक हत्या नहीं माना गया था। इसे इस रूप में देखा गया कि राज्य की सत्ता बढ़ते आतंकवाद के सामने असहाय दिखाई देने लगी थी। बाद के वर्षों में कई अधिकारियों ने स्वीकार किया कि इस घटना का पंजाब पुलिस के मनोबल पर गहरा असर पड़ा।

ध्यान देने वाली बात यह है कि अटवाल किसी अभियान का नेतृत्व नहीं कर रहे थे। वे किसी मुठभेड़ में भी शामिल नहीं थे। वे केवल गुरुद्वारे में मत्था टेककर बाहर निकले थे।

पुलिस मुख्यालय भी सुरक्षित नहीं था

जनवरी 1990 में जालंधर स्थित पंजाब आर्म्ड पुलिस (PAP) मुख्यालय में कमांडेंट गोबिंद राम के कार्यालय के भीतर बम विस्फोट हुआ। इस हमले में गोबिंद राम सहित चार पुलिसकर्मी मारे गए।

ऐसी घटनाएँ अपवाद नहीं थीं। कई अधिकारियों की उनके घरों के बाहर हत्या कर दी गई। कई रास्ते में घात लगाकर मारे गए। गश्त के दौरान पुलिस दलों पर हमले हुए। पुलिस चौकियों और थानों को निशाना बनाया गया। वरिष्ठ अधिकारियों के साथ उनके गार्ड और ड्राइवर भी मारे गए।

स्थानीय स्तर पर भर्ती किए गए स्पेशल पुलिस ऑफिसर (SPO) भी इसलिए मारे गए क्योंकि उन्होंने नियमित पुलिस बल की मदद की थी।

आतंकवादी केवल पुलिसकर्मियों तक सीमित नहीं रहे। वे उनके परिवारों को भी धमकाते थे।

संदेश साफ था- यदि कोई पुलिस में शामिल होगा तो मौत केवल उसकी नहीं, उसके पूरे परिवार की भी हो सकती है।

ऐसे माहौल को समझे बिना पंजाब पुलिस की बाद की कार्यप्रणाली का निष्पक्ष मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।

पुलिस की कार्रवाई इतनी कठोर क्यों हुई?

इन तथ्यों का अर्थ यह नहीं है कि पुलिस द्वारा किए गए हर कदम का बचाव किया जाए। यदि किसी निर्दोष व्यक्ति की हत्या हुई, फर्जी मुठभेड़ हुई, गैरकानूनी हिरासत, यातना या गुप्त अंतिम संस्कार हुए, तो उनकी जाँच सबूतों के आधार पर होनी चाहिए।

जसवंत सिंह खालड़ा हत्याकांड में पुलिस अधिकारियों को सजा मिलना भी यही दिखाता है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है।

लेकिन एक दूसरी सच्चाई भी है। पुलिस ने कठोर कार्रवाई अचानक करनी नहीं शुरू की। 1980 के दशक के अंतिम वर्षों और 1990 के दशक की शुरुआत तक पंजाब पुलिस सामान्य कानून-व्यवस्था की चुनौती का सामना नहीं कर रही थी।

उसके अधिकारी व्यवस्थित तरीके से मारे जा रहे थे। मुखबिरों और गवाहों को चुन-चुनकर खत्म किया जा रहा था। आतंकवादियों के पास आधुनिक हथियार, विस्फोटक, सुरक्षित ठिकाने और सीमा पार से समर्थन उपलब्ध था। सरकारी अधिकारियों पर सुरक्षित परिसरों के भीतर भी हमले हो रहे थे।

आतंकवादी यह भी जानते थे कि कुछ प्रतीकात्मक हत्याएँ पूरे राज्य के मनोबल को तोड़ सकती हैं। स्वर्ण मंदिर के बाहर एक डीआईजी की हत्या केवल एक अधिकारी की हत्या नहीं थी। यह हर पुलिसकर्मी के लिए संदेश था कि आतंकवादी वहाँ भी हमला कर सकते हैं, जहाँ राज्य जवाब देने से हिचकिचाता है।

एक पत्रकार की हत्या केवल एक आवाज़ को बंद करना नहीं था। यह पूरे मीडिया जगत को डराने का प्रयास था।

बस से हिंदू यात्रियों को अलग कर गोली मारना केवल कुछ लोगों की हत्या नहीं थी। यह पूरे समाज में भय और सांप्रदायिक तनाव फैलाने की रणनीति थी।

इन्हीं परिस्थितियों में पंजाब पुलिस ने आक्रामक आतंकवाद-रोधी रणनीति अपनाई- खुफिया नेटवर्क मजबूत किए गए, लगातार अभियान चलाए गए और आतंकवादी संगठनों का पीछा तब तक किया गया जब तक उनकी परिचालन क्षमता लगभग समाप्त नहीं हो गई।

इस अभियान ने आतंकवाद को तो तोड़ा, लेकिन इसके साथ-साथ पुलिस पर गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोप भी लगे।

दोनों तथ्य एक साथ सही हो सकते हैं। पुलिस की कार्रवाई कठोर इसलिए हुई क्योंकि वह जिस हिंसा का सामना कर रही थी, लेकिन वह भी असाधारण रूप से क्रूर थी।

इस क्रम को समझाना पुलिस के हर कदम का समर्थन करना नहीं है। लेकिन यदि पहली सच्चाई को पूरी तरह हटा दिया जाए और केवल दूसरी को दोहराया जाए, तो वह इतिहास नहीं, बल्कि पक्षधरता बन जाती है।

कैसे ‘चुनिंदा स्मृति’ इतिहास बदल देती है

सबसे प्रभावी प्रचार हमेशा झूठ गढ़कर नहीं किया जाता। कई बार केवल कुछ घटनाओं को चुन लिया जाता है और बाकी को भुला दिया जाता है।

आतंकवादी को एक बेटे, भाई, श्रद्धालु या अन्याय के शिकार व्यक्ति के रूप में दिखाया जाता है। उसकी शिकायतों को विस्तार से समझाया जाता है। उसके भाषण उद्धृत किए जाते हैं। उसकी तस्वीरें संरक्षित रहती हैं।

लेकिन पीड़ित? उसे केवल इतना कहा जाता है—”24 लोग मारे गए”, “38 लोगों की जान गई” या “15 लोग हताहत हुए।”

यह तरीका केवल खालिस्तानी प्रचार तक सीमित नहीं है। इस्लामी आतंकवाद के कई नैरेटिव में भी यही पैटर्न दिखाई देता है। आतंकवादी के कट्टरपंथी बनने की प्रक्रिया पर लंबी चर्चा होती है। उसकी विचारधारा को ‘गुस्सा’, ‘हाशिए पर धकेले जाने’ या ‘प्रतिरोध’ जैसे शब्दों में प्रस्तुत किया जाता है।

सुरक्षा बलों की प्रतिक्रिया कहानी का केंद्र बन जाती है। जबकि बम धमाकों, गोलीबारी या सांप्रदायिक नरसंहारों में मारे गए निर्दोष लोग केवल शुरुआती पैराग्राफ तक सीमित रह जाते हैं। धीरे-धीरे आतंकवादी की पूरी जीवनी तैयार हो जाती है। लेकिन पीड़ित के हिस्से केवल एक संख्या बचती है।

चुनिंदा इतिहास का एक और तरीका है- राज्य की हर कार्रवाई को सामूहिक उत्पीड़न का प्रमाण मान लेना और आतंकवादी हिंसा को ऐसी प्रतिक्रिया बताना, जिसे ‘संदर्भ’ देकर समझाया जाना चाहिए।

इससे नैतिक क्रम उलट जाता है। आतंक समझने योग्य बन जाता है। जबकि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई ही सबसे बड़ा अपराध दिखाई देने लगती है।

पंजाब का इतिहास इस तरह की एकांगी व्याख्या से कहीं अधिक जटिल है। 1984 के सिख विरोधी दंगों को खालिस्तानी आतंकवाद के आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता। इसी प्रकार पुलिस ज्यादतियों का हवाला देकर खालिस्तानी नरसंहारों को भी नहीं भुलाया जा सकता।

जसवंत सिंह खालरा की हत्या इसलिए उचित नहीं हो जाती कि आतंकवादियों ने पुलिसवालों की हत्या की थी।और पुलिसकर्मियों की शहादत इसलिए महत्वहीन नहीं हो जाती कि कुछ अधिकारियों पर अपराध के आरोप लगे।

ईमानदारी से इतिहास में इन सभी सच्चाइयों के लिए जगह होनी चाहिए।

एक चुनिंदा फिल्म पूरा इतिहास नहीं हो सकती

‘सतलुज’ को अपने दृष्टिकोण से कहानी कहने की पूरी कलात्मक स्वतंत्रता है। यदि उसके निर्माता जसवंत सिंह खालरा, कथित पुलिस अत्याचारों और लापता लोगों के परिवारों पर केंद्रित रहना चाहते हैं, तो यह उनका अधिकार है।

लेकिन कलात्मक स्वतंत्रता किसी अधूरी कहानी को पूरा इतिहास नहीं बना देती। बस से नीचे उतारकर गोली मारा गया हिंदू यात्री भी पंजाब के इतिहास का हिस्सा है। शांति की कोशिश करने वाला वह सिख नेता भी उसी इतिहास का हिस्सा है जिसकी हत्या कर दी गई।

आतंकवाद का विरोध करने वाला वह संपादक भी पंजाब की स्मृति में दर्ज होना चाहिए जिसे इसलिए मार दिया गया क्योंकि उसने कलम नहीं झुकाई। और वह सिपाही भी, जिसका नाम आज केवल किसी पुलिस स्मारक पर दर्ज है।

फिल्म अपना पक्ष चुन सकती है। वह ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ और ‘कहानी कहने की आज़ादी’ का हवाला दे सकती है। लेकिन पत्रकारिता का दायित्व उन चेहरों को भी सामने लाना है, जो उस फ्रेम के बाहर छूट गए।

इसी उद्देश्य से OpIndia आने वाले दिनों में पंजाब आतंकवाद के उन भूले-बिसरे पीड़ितों की कहानियाँ आपके सामने लाएगा, जिनकी स्मृति धीरे-धीरे सार्वजनिक विमर्श से गायब होती जा रही है।

26 साल से जेल में बंद दारा सिंह होंगे रिहा: वकील का दावा, बताया- सुप्रीम कोर्ट ने 15 अगस्त तक जेल से छोड़ने का ओडिशा सरकार को दिया आदेश

ऑस्ट्रेलियाई पादरी ग्राहम स्टेंस हत्याकांड में करीब 26 साल से ओडिशा की जेल में बंद दारा सिंह रिहा होंगे? कई मीडिया रिपोर्टों में इस बात की संभावना जताई गई है। ओडिशा टीवी की रिपोर्ट में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने 15 अगस्त तक दारा सिंह को रिहा करने का आदेश दिया है। यह बात उनके बाद उनके वकील एपी सिंह ने कही है। हालाँकि इस संबंध जारी विस्तृत आदेश के दस्तावेज खबर लिखे जाने तक सार्वजनिक नहीं हुई थी।

इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, “हम इस मामले को 19 अगस्त तक के लिए स्थगित करना उचित समझते हैं। इस बीच, हम उम्मीद करते हैं कि समिति (समय पूर्व रिहाई पर) अपना निर्णय लेगी।” कोर्ट ने ओडिशा सरकार के वकील पीवी योगेश्वरन से दारा सिंह की समय पूर्व रिहाई को लेकर चल रही कार्यवाही की मौजूदा स्थिति के बारे में भी पूछा। मंगलवार (14 जुलाई) को हुई सुनवाई में सरकारी वकील योगेश्वरन ने अदालत को बताया कि रिहाई की समीक्षा करने वाली समिति को जिला अदालत से कुछ दस्तावेजों की आवश्यकता थी, जिन्हें जल्द ही व्यवस्थित कर समिति के पास भेज दिया जाएगा।

यह मामला साल 1999 का है, जब ओडिशा के मनोहरपुर में स्थानीय लोगों को कथित तौर पर ईसाई धर्म में परिवर्तित कराने के आरोप के बीच ऑस्ट्रेलियाई पादरी ग्राहम स्टेंस और उनके दो बेटों की जिंदा जलाकर हत्या कर दी गई थी। इस हत्याकांड में दारा सिंह मुख्य आरोपित थे, जिन्हें साल 2000 में ओडिशा की तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान गिरफ्तार किया गया था। तब से लेकर अब तक वे जेल में ही हैं।

साल 2024 में दारा सिंह के परिवार से ऑपइंडिया की टीम ने मुलाकात की थी। उस समय ऑपइंडिया को पता चला कि दारा सिंह के माता-पिता की मृत्यु के समय भी उन्हें अंतिम संस्कार में शामिल होने की अनुमति नहीं दी गई थी। अब सुप्रीम कोर्ट के इस रुख के बाद उनकी रिहाई की उम्मीदें काफी बढ़ गई हैं।

कैसे रवींद्र पाल बने दारा सिंह

दारा सिंह का मूल नाम रवींद्र कुमार पाल है। रवींद्र पाल के भाई अरविन्द पाल ने ऑपइंडिया को बताया कि उनका परिवार खानदानी तौर पर हिन्दू धर्म को समर्पित है। रवींद्र के पिता भी पूजा-पाठ करके ही अपनी दिनचर्या की शुरुआत करते थे। इंटरमीडियट की पढ़ाई के बाद रवींद्र पाल ने घर की आर्थिक स्थिति को देखते हुए नोएडा में नौकरी शुरू कर दी।

रवींद्र कुमार पाल भी जो काम करते थे, उसको सही समय से अपने अंजाम तक पहुँचाते थे। कर्मठता और लगन को देखते हुए कम्पनी के स्टाफ और अधिकारी रवींद्र कुमार पाल को दारा सिंह नाम से बुलाने लगे थे। उस समय देश में दारा सिंह नाम के एक पहलवान हुआ करते थे। उनकी चर्चा देश-विदेश में थी। इस तरह रवींद्र पाल का नाम दारा सिंह पड़ गया।

नोएडा से शिफ्ट हुए ओडिशा

अरविन्द कुमार पाल हमें आगे बताते हैं कि नोएडा में नौकरी करने के ही दौरान उन्हें ओडिशा का एक साथी मिला। उस साथी से दारा सिंह से इतनी अच्छी दोस्ती हो गई कि दोनों एक-दूसरे के घर आने-जाने लगे। दारा सिंह को ओडिशा पसंद आने लगा और वो कुछ दिनों बाद अपने साथी के साथ नोएडा की नौकरी छोड़ कर ओडिशा में बस गए।

ओडिशा में दारा सिंह ने क्योंझर जिले में प्राइवेट तौर पर बच्चों को पढ़ाने की नौकरी कर ली। वे बच्चों को हिंदी भाषा पढ़ाते थे और साथ ही उन्हें हिन्दू धर्म की अच्छाइयाँ बताते थे। यहाँ बताना जरूरी है कि रवींद्र कुमार पाल उर्फ दारा सिंह मूलत: उत्तर प्रदेश के औरैया के रहने वाले थे। हालाँकि, अब वे ओडिशा को अपनी कर्मभूमि बना लिया था।

ऐसे बजरंग दल से जुड़े दारा सिंह

दारा सिंह के परिजनों ने बताया कि उनके द्वारा स्कूल में की जाने वाली धर्म-चर्चा आसपास के गाँवों में फ़ैल गई। इस चर्चा से प्रभावित होकर कई अभिभावक भी दारा सिंह से हिन्दू धर्म के बारे में बातचीत करने लगे। थोड़े ही दिनों में दारा सिंह की ख्याति पूरे क्योंझर और मयूरभंज आदि जिलों में फ़ैल गई।

‘मुस्लिम होने के कारण फँसा ताहिर हुसैन’ : दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों के बाद बचाव में उतर गया था पूरा वामपंथी गैंग, पूछ रहे थे- अंकित शर्मा की हत्या को क्यों दे रहे हो तवज्जो

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों को 6 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन कुछ परिवारों के जख्म आज भी हरे हैं। उन्हीं में से एक परिवार आईबी अधिकारी अंकित शर्मा का है। 25 फरवरी 2020 को जब पूरा इलाका हिंसा और आगजनी की चपेट में था, तब अंकित शायद यह सोचकर घर से निकले थे कि आसपास के सभी लोग परिचित हैं, तो भला उनके साथ क्या होगा। लेकिन वे इस बात से अनजान थे कि उस उन्मादी इस्लामी कट्टरपंथियों भीड़ के लिए वे कोई पड़ोसी या आईबी अधिकारी नहीं, बल्कि सिर्फ एक हिंदू थे।

घर से निकलने के बाद अंकित शर्मा लापता हुए और अगले दिन उनकी लाश सीधे मस्जिद के पास एक नाले से अत्यंत क्षत-विक्षत स्थिति में बरामद हुई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने पूरी क्रूरता को उजागर कर दिया। मीडिया में छपी उनते हाथ की तस्वीर ने सबको दंग कर दिया। उनके शरीर पर 51 बार चाकुओं से वार किया गया था, उनके अंग छिन्न-भिन्न हो चुके थे और आंतें बाहर आ गई थीं। यह एक ऐसी बर्बरता थी जिसे याद कर आज भी रूह कांप जाती है।

13 जुलाई 2026 को दिल्ली की कड़कड़डूमा अदालत ने जब इस जघन्य हत्याकांड में शामिल आम आदमी पार्टी (AAP) के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन को दोषी ठहराया है, ये माना है कि उस वीभत्सता के पीछे ताहिर हुसैन का ही हाथ था, तो ऐसे में उन वामपंथी-कट्टरपंथी गिद्धों की करतूत को याद करना जरूरी हो जाता है जिन्होंने बर्बर हत्या पर अपना नैरेटिव गढ़ा था और ताहिर हुसैन को बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, उसे मासूम-बेचारा दिखाया था।

ताहिर हुसैन को बचाने में एक्टिव था पूरा इकोसिस्टम

इस कुत्सित प्रयास में केवल सोशल मीडिया के कट्टरपंथी या वामपंथी यूजर्स ही शामिल नहीं थे, बल्कि राजनेता, कलाकार, पत्रकार और नामी मीडिया संस्थान भी संगठित रूप से सक्रिय थे।

अपने आपको पत्रकार कहने वाली राणा अय्यूब ने ताहिर हुसैन की गिरफ्तारी को सांप्रदायिक रंग देते हुए इस तरह पेश किया जैसे देश में मुस्लिमों को निशाना बनाया जा रहा हो और हिंदुओं को छोड़ा जा रहा है।

वहीं वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने बेशर्मी दिखाते हुए इस बात पर आपत्ति जताई थी कि अंकित शर्मा की हत्या को इतना महत्व क्यों दिया जा रहा है।

और, आरफा खानम शेरवानी ने तो दिल्ली पुलिस द्वारा वांछित ताहिर हुसैन का उस समय में इंटरव्यू लेकर उसे एक आरोपित के बजाय ‘पीड़ित’ के रूप में दिखाने का प्रयास किया था।

इसी तरह, AAP नेता अमानतुल्लाह खान जैसे राजनेताओं ने भी ‘मुस्लिम कार्ड’ खेलते हुए दावा किया कि ताहिर को सिर्फ उसके मजहब के कारण फँसाया जा रहा है। खुद ताहिर हुसैन ये बोलता हुआ मिला था कि अगर निष्पक्ष जाँच हुई तो वो निर्दोषी पाया जाएगा लेकिन अगर उसका ‘नाम’ देखा गया तो उसके साथ कुछ भी हो सकता है। ताहिर हुसैन को पीएफआई तक ने समर्थन दिया था।

साक्षी जोशी और विनोद कापरी जैसे लोगों ने तो ताहिर हुसैन द्वारा पुलिस को किए गए फोन कॉल्स को उसकी बेगुनाही का सबसे बड़ा प्रमाण बताया। जबकि पुलिस जाँच में यह तथ्य सामने आया कि वे कॉल्स खुद को कानूनी रूप से बचाने के लिए चली गई एक सोची-समझी चाल थे।

बॉलीवुड फिल्म निर्माता अनुराग कश्यप ने तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया। उन्होंने ताहिर हुसैन, उमर खालिद और खालिद सैफी के बचाव में तर्क दिया कि दंगों की साजिश की तारीखें और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत यात्रा का समय मेल नहीं खाते।

जबकि, बाद में पुलिस जाँच में यह साफ हो गया कि यह साजिश बहुत पहले से और गहराई से रची गई थी।

इसी तरह जावेद अख्तर ने लिखा था, “कई मारे गए, कई सारे घायल हुए, कई घर जला दिए गए, कई दुकानें लूटी गईं। कई लोगों को नुक़सान हुआ लेकिन पुलिस ने केवल एक घर सील किया और उसके मालिक को ढूँढ रही है। संयोगवश उसका नाम ताहिर हुसैन है, दिल्ली पुलिस की कंसिस्टेंसी को सलाम है।”

बॉलीवुड गायक और म्यूजिक कंपोजर विशाल ददलानी ने भी ताहिर हुसैन को बेकसूर बताया। विशाल ने ट्विटर पर लिखा कि दंगो में शामिल कोई शख्स पुलिस को फोन क्यों करेगा।

इस पूरे मामले में डिजिटल और मुख्यधारा के मीडिया के एक वर्ग ने भी ताहिर को निर्दोष दिखाने में अपनी ओर से कसर नहीं छोड़ी थी। बढ़-चढ़कर ताहिर का पक्ष बताने की होड़ लगी थी।

द वायर जैसी प्रोपगेंडा साइट ने ने शुरुआत में ही ताहिर हुसैन के पक्ष को रखने के लिए एक पूरा शो समर्पित कर दिया था, जहाँ उसकी बातों को ही तवज्जो दी गई।

वहीं द लल्लनटॉप ने घटना के एक साल बाद एक- देहली नाम से वीडियो/डॉक्यूमेंट्री जारी की थी। इसमें नजर आई इंडिया टुडे की पत्रकार ने यह नैरेटिव गढ़ने का प्रयास किया गया कि अंकित शर्मा स्वयं भीड़ का हिस्सा थे और मुस्लिम इलाके की तरफ बढ़ रहे थे, जिससे पीड़ित को ही एक तरह से दोषी के रूप में कटघरे में खड़ा कर दिया गया था।

ताहिर को बचाने के लिए वामपंथियों ने नकारे सारे सबूत

गौरतलब हो कि दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों के बाद सबसे हैरानी की बात यह है कि ‘लिबरल और इस्लामी गिरोह’ द्वारा यह पूरा प्रोपेगैंडा तब चलाया जा रहा था, जब ताहिर हुसैन के घर की छत से भारी मात्रा में पत्थर, पेट्रोल बम और तेजाब की बोतलें बरामद हुई थीं, सोशल मीडया पर हर जगह उसके खुद छत पर होने के वीडियो वायरल थे, अंकित के परिजन रो-रोकर ताहिर को मुख्य साजिशकर्ता बता रहे थे, एक के बाद एक इस्लामी कट्टरपंथी गिरफ्तार हो रहे थे, ताहिर अपने कुकर्म स्वीकार रहा था या अदालत ये कह रही थी उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंदुओं पर हुए हमले एक सुनियोजित और गहरी साजिश का हिस्सा थे।

आज जब यह मामला न्याय की दहलीज पर है, ताहिर हुसैन को सजा मिलना शेष है, तब अपराधियों के साथ-साथ उनके इन पैरोकारों के चेहरों को भी याद रखना जरूरी है। यह इतिहास में दर्ज रहेगा कि कैसे एक निर्दोष युवक को 51 बार चाकुओं से गोदे जाने की क्रूरता को भुलाकर, इस वामपंथी गिरोह ने सिर्फ अपने राजनीतिक और वैचारिक एजेंडे के लिए एक दंगाई और हत्यारे के बचाव में एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था।

मोहम्मद अहद से लेकर सद्दाम तक: बिहार में एक्टिव आतंकवाद का ‘स्लीपर सेल’ क्या बताता है?

बिहार में हाल के दिनों में सुरक्षा एजेंसियों की मुस्तैदी से कई ऐसे चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं, जिन्होंने राज्य की सुरक्षा व्यवस्था और खुफिया तंत्र को पूरी तरह अलर्ट पर डाल दिया है। केंद्रीय जाँच एजेंसी (NIA), स्पेशल टास्क फोर्स (STF) और बिहार पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में कटिहार से मोहम्मद अहद नाम के एक संदिग्ध युवक की गिरफ्तारी ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि सीमा पार बैठे भारत विरोधी तत्व लगातार देश को दहलाने की साजिश रच रहे हैं।

मोहम्मद अहद को पाकिस्तानी आतंकी संगठन का एक सक्रिय ‘स्लीपर सेल’ बताया जा रहा है, जो सोशल मीडिया के जरिए सीधे पाकिस्तानी नेटवर्क के संपर्क में था, लेकिन यह कोई इकलौता मामला नहीं है। पिछले कुछ महीनों के भीतर बिहार के अलग-अलग जिलों जैसे मधुबनी, मुंगेर और मुजफ्फरपुर से भी इसी तरह के संदिग्धों को दबोचा गया है।

पुलिस की गिरफ्त में मोहम्मद अहद (फोटो साभार: जागरण)

इन सभी मामलों की कड़ियों को आपस में जोड़ने पर एक बेहद खतरनाक और सुव्यवस्थित पैटर्न उभर कर सामने आता है। ये गिरफ्तारियाँ इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि बिहार आतंकियों के निशाने पर हैं, जहाँ वे स्थानीय युवाओं का ब्रेनवॉश कर एक बड़ा नेटवर्क खड़ा करने की साजिश रच रहे हैं।

गिरफ्तारियों में ‘कॉमन फैक्टर’ और पाकिस्तानी गैंगस्टर्स का कनेक्शन

अगर हम हाल के दिनों में बिहार से हुई तमाम गिरफ्तारियों का बारीकी से विश्लेषण करें, तो इन सब में कुछ बेहद खतरनाक और समान बातें देखने को मिलती हैं। सबसे बड़ी समानता यह है कि इन सभी संदिग्धों के तार सीधे तौर पर सीमा पार यानी पाकिस्तान में बैठे आकाओं से जुड़े हुए हैं।

चाहे वह कटिहार का मोहम्मद अहद हो, मुंगेर का मोहम्मद सद्दाम हो या फिर मुजफ्फरपुर से पकड़ा गया मोहम्मद अली, ये सभी लोग किसी न किसी रूप में पाकिस्तानी नेटवर्क के संपर्क में थे। कटिहार से पकड़े गए अहद के मामले में सुरक्षा एजेंसियों ने खुलासा किया कि वह पाकिस्तानी गैंगस्टर राणा हुसैन और शहजाद भट्टी के नेटवर्क से लगातार संपर्क में था।

मुंगेर से गिरफ्तार मोहम्मद सद्दाम के तार भी ‘राणा भाई’ गैंग से जुड़े पाए गए थे, जो सीमा पार के एक संदिग्ध नेटवर्क का संचालन करता था। यह इस बात का सबूत है कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियाँ और आतंकी संगठन अब वहाँ के स्थानीय गैंगस्टर्स और अपराधियों के नेटवर्क का इस्तेमाल भारत में स्लीपर सेल बनाने और हथियारों की सप्लाई के लिए कर रहे हैं।

दूसरा सबसे बड़ा कॉमन फैक्टर इन सभी का डिजिटल कनेक्शन है। ये सभी संदिग्ध आम तौर पर समाज के बीच बेहद सामान्य जिंदगी जी रहे थे, लेकिन डिजिटल दुनिया में ये देश के खिलाफ एक अघोषित युद्ध लड़ रहे थे। वॉट्सएप, फेसबुक, टेलीग्राम और सिग्नल जैसे प्लेटफॉर्म्स के जरिए इन्हें सीमा पार से निर्देश मिल रहे थे।

इनका मुख्य काम बिहार के अन्य पिछड़े इलाकों के गरीब और कम पढ़े-लिखे युवाओं को ढूँढना, मजहबी आधार पर उनका ब्रेनवॉश करना और उन्हें भारत विरोधी गतिविधियों के लिए भड़काकर एक नया नेटवर्क तैयार करना था।

पिछले कुछ महीनों के प्रमुख मामले: बिहार में आतंकी नेटवर्क की सक्रियता

बिहार में पिछले एक-दो महीनों के भीतर सुरक्षा एजेंसियों ने ताबड़तोड़ कार्रवाइयाँ करते हुए कई बड़े मॉड्यूल का भंडाफोड़ किया है। हाल ही में बिहार ATS और स्थानीय पुलिस ने एक बड़े कट्टरपंथी मॉड्यूल का भंडाफोड़ करते हुए मधुबनी जिले के पंडौल थाना क्षेत्र से 50 साल के मदरसा संचालक मौलाना इजहार-उल-हक को गिरफ्तार किया।

इजहार को एक पाकिस्तानी एजेंट बताया गया है जो बिहार में स्लीपर सेल तैयार करने और कट्टरपंथी मॉड्यूल की फंडिंग का काम संभाल रहा था। उसके पास से कई भड़काऊ वीडियो मिले, जिनमें भारत में शरीयत कानून लागू करने की बातें कही गई थीं। इस मॉड्यूल के तार पाँच राज्यों से जुड़े थे और इजहार की गिरफ्तारी इस सिलसिले में छठी बड़ी कामयाबी थी।

इसी तरह मुंगेर पुलिस ने तारापुर थाना क्षेत्र के मिलिक थानपुर गाँव में देर रात छापेमारी कर मोहम्मद सद्दाम नाम के युवक को गिरफ्तार किया। सद्दाम पिछले दो-तीन साल से मुंबई में रह रहा था और वहीं वह ‘राणा भाई’ नामक पाकिस्तानी नेटवर्क के संपर्क में आया था। मुंबई में जब सुरक्षा एजेंसियों की धर-पकड़ बढ़ी, तो वह भागकर मुंगेर आ गया।

पुलिस ने उसके पास से एक देसी पिस्तौल और मोबाइल बरामद किया है। वह अपने दो अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर किसी बड़ी आतंकी वारदात को अंजाम देने की फिराक में था। इसके अलावा 2 साल पहले गुजरात की सूरत स्पेशल ब्रांच की टीम ने बिहार पुलिस के सहयोग से मुजफ्फरपुर के सकरा थाना क्षेत्र से मोहम्मद अली को गिरफ्तार किया।

मोहम्मद अली पर भाजपा की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा और हिंदू नेता उमेश्वर राणा को जान से मारने की धमकी देने और साजिश रचने का आरोप था। वह नेपाल में बैठकर इंटरनेट के माध्यम से आपत्तिजनक टिप्पणियाँ और साजिशें रचता था। उसका नेटवर्क सूरत के एक मौलाना और पाकिस्तान के कट्टरपंथी सदस्यों से जुड़ा हुआ था।

इसी तरह बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले के बेतिया में पुलिस ने पाकिस्तान से जुड़े संदिग्ध वॉट्सऐप चैट के मामले में 25 वर्षीय खुर्शीद आलम को गिरफ्तार किया था। पुलिस के मुताबिक, आरोपित के मोबाइल फोन में पाकिस्तान के फोन नंबरों के साथ बातचीत और कई क्यूआर कोड मिलने के बाद यह कार्रवाई की गई थी।

बिहार के सीमावर्ती जिले मधुबनी में सुरक्षा एजेंसियों ने अंतरराष्ट्रीय जाली नोट नेटवर्क के शातिर अपराधी अबुल इनाम उर्फ लादेन को गिरफ्तार किया था। अबुल इनाम पर केवल जाली नोट चलाने का ही नहीं, बल्कि एक पाकिस्तानी नागरिक मोहम्मद मस्तान को सुरक्षित नेपाल के रास्ते भगाने का भी गंभीर आरोप था।

पुलिस के मुताबिक, लादेन इस गैंग का मुख्य लोकल ऑपरेटर था। वह सीमा पार से आने वाले संदिग्धों को पनाह और रास्ता मुहैया कराता था। आंध्र प्रदेश और दिल्ली पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में हुए अंतर-राज्यीय ऑपरेशन में 12 आतंकवादियों को गिरफ्तार किया गया था। इनमें बिहार के शादमान दिलकुश, अजमनुल्लाह खान भी शामिल थे।

पुलिस की छानबीन में इनके संबंध अल-कायदा इन इंडियन सबकॉन्टिनेंट (AQIS) और ISIS से जुड़े सामने आए। जाँच में ये भी पता चला है कि ये आतंकी एक गेमिंग ऐप के जरिए विदेशी हैंडलरों के संपर्क में थे और इनके तार ISIS से संबंध रखने वाले Benex Com नामक एक समूह से भी जुड़े थे।

PFI का ‘मिशन 2047’: बिहार से ही खुला था देश को इस्लामिक मुल्क बनाने की साजिश का राज

बिहार का आतंकी कनेक्शन आज का नहीं है, बल्कि देश को हिला देने वाली कई बड़ी साजिशों के तार इसी राज्य से खुले हैं। इसका सबसे बड़ा और पुख्ता सबूत साल 2022 में तब मिला, जब पटना के फुलवारी शरीफ में पुलिस ने एक संदिग्ध नेटवर्क का भंडाफोड़ किया था।

इस छापेमारी के दौरान पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) से जुड़े दो मुख्य आरोपितों, अथर परवेज और मोहम्मद जलालुद्दीन को गिरफ्तार किया गया था। इनके पास से जो दस्तावेज बरामद हुए, उसने पूरे देश के सुरक्षा महकमे को हिलाकर रख दिया।

इस दस्तावेज का नाम ‘India Vision 2047’ था, जिसकी टैगलाइन ‘Towards Rule of Islam in India’ थी। इस गुप्त दस्तावेज में साल 2047 तक, यानी भारत की आजादी के 100 साल पूरे होने तक, भारत को एक पूर्ण इस्लामिक राष्ट्र में बदलने की एक बहुत ही खतरनाक और चरणबद्ध योजना तैयार की गई थी।

इस योजना के पहले चरण में देश के अलग-अलग मुस्लिम संप्रदायों को PFI के झंडे तले इकट्ठा करने और एक ऐसी कट्टरपंथी पहचान बनाने पर जोर था जो राष्ट्रीय पहचान से ऊपर हो। युवाओं को लाठी, रॉड, तलवार और अन्य हथियारों को चलाने का आक्रामक प्रशिक्षण देने की बात कही गई थी।

दूसरे चरण में अपने विरोधियों के मन में डर पैदा करने और अपनी ताकत दिखाने के लिए चुनिंदा हिंसा का सहारा लेने का प्रस्ताव था। जिन कार्यकर्ताओं में ज्यादा आक्रामकता दिखाई दे, उन्हें उन्नत हथियारों और विस्फोटकों का प्रशिक्षण देने की योजना थी।

सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि इस अंतिम हिंसक उद्देश्य को छुपाने के लिए कार्यकर्ताओं को भारतीय संविधान, राष्ट्रीय ध्वज और डॉ बीआर आंबेडकर जैसे प्रतीकों और शब्दों का इस्तेमाल करने का निर्देश दिया गया था ताकि वे कानून की नजरों से बच सकें।

इसके बाद तीसरे चरण में PFI अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के साथ राजनीतिक गठबंधन बनाना चाहता था ताकि बहुसंख्यक समाज को आपस में लड़ाया जा सके। संगठन का लक्ष्य खुद को अल्पसंख्यकों और वंचितों का एकमात्र मसीहा साबित करना था।

इसी चरण में भारी मात्रा में हथियार और विस्फोटक जमा करने और विरोधियों पर सुनियोजित हमले करने की बात भी शामिल थी। चौथे और आखिरी चरण में PFI ने खुद को देश के मुसलमानों का निर्विवाद नेता बनाने और राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता हथियाने की कल्पना की थी।

सत्ता के करीब पहुँचते ही अपने वफादार लोगों को कार्यपालिका, न्यायपालिका, पुलिस और सेना में भर्ती करने की योजना थी। इसके बाद मौजूदा लोकतांत्रिक संविधान को हटाकर देश में इस्लामिक संविधान लागू करने का अंतिम लक्ष्य था।

इसके लिए हर मुस्लिम परिवार से एक सदस्य की भर्ती और एक समर्पित सशस्त्र बल तैयार करने का खाका खींचा गया था, जो जरूरत पड़ने पर तुर्की जैसे विदेशी इस्लामिक मुल्कों की मदद से भारतीय राज्य के साथ अंतिम संघर्ष कर सके।

इस दस्तावेज के सामने आने के बाद ही केंद्र सरकार ने कड़ा रुख अपनाते हुए सितंबर 2022 में गैरकानूनी गतिविधियाँ रोकथाम अधिनियम के तहत PFI और उससे जुड़े 8 अन्य संगठनों पर 5 साल का प्रतिबंध लगा दिया था।

स्लीपर सेल के खुलासों और भंडाफोड़ के पुराने मामले

मध्य प्रदेश से गिरफ्तार इजहार उल हक ने पूछताछ में यह कबूला था कि उनके स्लीपर सेल पूरे देश में शांत बैठे हुए हैं, जो सिर्फ सही समय और ऊपर से मिलने वाले आदेश का इंतजार कर रहे हैं ताकि वे बाहर निकलकर बड़ी तबाही मचा सकें। स्लीपर सेल का यह खतरा कोई नया नहीं है। भारत में पिछले दो दशकों से यह पैटर्न लगातार देखा जा रहा है।

स्लीपर सेल ऐसे प्रशिक्षित आतंकवादी या समर्थक होते हैं जो किसी भी आम नागरिक की तरह समाज में रहते हैं और कोई नौकरी, दुकान या पढ़ाई करते हैं जिससे किसी को शक न हो। वे तब तक कोई संदिग्ध गतिविधि नहीं करते जब तक कि उन्हें आकाओं द्वारा किसी विशेष हमले को अंजाम देने का निर्देश न मिले।

2012 में मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल के समय भी देश के भीतर इंडियन मुजाहिदीन और सिमी जैसे संगठनों के स्लीपर सेल्स का एक बड़ा नेटवर्क सामने आया था।

उस दौरान दिल्ली, मुंबई, जयपुर, अहमदाबाद और बोधगया में हुए सिलसिलेवार धमाकों की जाँच में यह बात साफ हुई थी कि आतंकियों को स्थानीय स्तर पर इन्हीं स्लीपर सेल्स ने लॉजिस्टिक्स, रहने की जगह और रेकी करने में मदद पहुँचाई थी।

उस समय भी बिहार के दरभंगा और समस्तीपुर जैसे जिलों से कई संदिग्धों को गिरफ्तार किया गया था, जिसे सुरक्षा एजेंसियों ने दरभंगा मॉड्यूल का नाम दिया था। इसके बाद साल 2020 के दौरान देश में ISIS के कई डिजिटल मॉड्यूल्स का पता चला।

जाँच में सामने आया कि सीरिया और इराक में बैठे हैंडलर्स भारत के पढ़े-लिखे युवाओं को इंटरनेट के माध्यम से प्रभावित कर रहे थे और इस दौरान भी बिहार और उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में छापेमारी कर ऐसे युवाओं को पकड़ा गया जो ऑनलाइन माध्यमों से कसम लेकर देश में अकेले दम पर हमला करने की फिराक में थे।

वहीं साल 2023 में भी NIA ने देश के कई राज्यों में एक साथ छापेमारी कर अल-कायदा और ISIS से प्रेरित मॉड्यूल्स का भंडाफोड़ किया था। इस दौरान भारी मात्रा में डिजिटल साक्ष्य, प्रतिबंधित साहित्य और हथियार बरामद किए गए थे, जिसमें बिहार से हुई कई गिरफ्तारियों ने यह साबित किया कि स्लीपर सेल्स का जाल समय के साथ और अधिक फैल चुका है।

डिजिटल प्लेटफॉर्म: आतंकियों का नया और सुरक्षित ‘हथियार’

आज के समय में आतंकवादियों को अपना नेटवर्क चलाने के लिए किसी गुप्त जगह पर आमने-सामने मिलने की जरूरत नहीं रह गई है। आधुनिक तकनीक और इंटरनेट ने उनके काम को बेहद आसान और सुरक्षित बना दिया है, यही कारण है कि अब सुरक्षा एजेंसियाँ आतंकवाद के इस नए रूप को डिजिटल जिहाद का नाम दे रही हैं।

टेलीग्राम, सिग्नल, थ्रेमा और वॉट्सएप जैसे एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स इन आतंकियों के सबसे बड़े मददगार बन गए हैं क्योंकि इन ऐप्स पर होने वाली बातचीत को आसानी से ट्रैक नहीं किया जा सकता, जिससे ये कानून और सुरक्षा एजेंसियों की नजरों से बचे रहते हैं। आतंकी इन प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल बहुत ही शातिराना तरीके से करते हैं।

जैसे टेलीग्राम और सिग्नल पर वे सीक्रेट चैट का उपयोग करते हैं, जहाँ संदेश अपने आप नष्ट हो जाते हैं और बिना नंबर दिखाए बड़े-बड़े ग्रुप्स का संचालन किया जाता है। वहीं फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भड़काऊ और प्रोपेगैंडा वीडियो शेयर करके समाज से असंतुष्ट युवाओं की पहचान की जाती है।

इन सब के साथ डार्क वेब और वीपीएन तकनीक का सहारा लेकर वे अपनी पहचान पूरी तरह छुपा लेते हैं और विदेशी आकाओं से बात करने के साथ-साथ क्रिप्टोकरेंसी के जरिए फंड ट्रांसफर का काम भी करते हैं। इन डिजिटल टूल्स की वजह से भारत के भोले-भाले युवाओं को निशाना बनाना बहुत आसान हो गया है।

पाकिस्तानी हैंडलर्स सोशल मीडिया पर लगातार नजर रखते हैं कि कौन से युवा देश की नीतियों या धार्मिक\मजहबी मुद्दों पर ज्यादा आक्रामक या असंतुष्ट हैं और फिर उन्हें निशाना बनाया जाता है। शुरुआत में उन्हें धार्मिक साहित्यों और वीडियो के जरिए जोड़ा जाता है और धीरे-धीरे उनके मन में देश के प्रति नफरत का बीज बो दिया जाता है।

उन्हें यह विश्वास दिलाया जाता है कि उनके साथ अन्याय हो रहा है और इसका एकमात्र उपाय व्यवस्था के खिलाफ खड़ा होना है। जब युवा पूरी तरह उनके मानसिक नियंत्रण में आ जाता है, तब उसे टेलीग्राम या सिग्नल के किसी गुप्त ग्रुप में शामिल कर लिया जाता है, जहाँ उसे हथियार चलाने, प्रोपेगैंडा फैलाने या स्लीपर सेल के रूप में काम करने के निर्देश दिए जाते हैं।

कटिहार के मोहम्मद अहद और मुंगेर के सद्दाम के मोबाइल से मिले पाकिस्तानी नंबर और चैट इसी डिजिटल ब्रेनवाशिंग की कहानी बयां करते हैं। बिहार में लगातार मिल रहे स्लीपर सेल्स के सुराग यह दिखाते हैं कि देश के सामने आंतरिक सुरक्षा की चुनौती कितनी गंभीर है, हालाँकि सुरक्षा एजेंसियाँ एक-एक कर इनका सफाया कर रही हैं।