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आज जहाँ से पकड़ा गया है आतंकी मोहम्मद शेख, वहीं के रहने वाले थे बाटला हाउस एनकाउंटर में ढेर हुए आतंकी: ‘आतंक की नर्सरी’ है संजरपुर, क्या आजमगढ़ में सपा की मजबूती से मिलता है खाद-पानी?

उत्तर प्रदेश का आजमगढ़ जिला खासतौर पर इसका संजरपुर और सरायमीर इलाका दशकों से सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर रहा है। अभी उत्तर प्रदेश आतंकवाद निरोधक दस्ते (UP-ATS) द्वारा खुदादादपुर (संजरपुर) से 22 वर्षीय संदिग्ध आतंकी मोहम्मद शेख की गिरफ्तारी ने एक बार फिर इस शांत दिख रहे इलाके के नीचे सुलग रही खतरनाक साजिशों को सतह पर ला दिया है।

मोहम्मद शेख की गिरफ्तारी महज एक अपराधी की धरपकड़ नहीं है, बल्कि यह उस खूंखार आतंकी सिंडीकेट के पुनर्जीवित होने का संकेत है जो सीमा पार बैठी पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) और अंतरराष्ट्रीय गैंगस्टरों के इशारे पर भारत को दहलाने की फिराक में है।

इस स्पेशल रिपोर्ट में हम आजमगढ़ के संजरपुर के आतंकी इतिहास, इसके सियासी कनेक्शन, स्लीपिंग मॉड्यूल्स की कार्यप्रणाली और राजनीतिक बदलावों के साथ इसके उतार-चढ़ाव के हर पहलू के बारे में बता रहे हैं

मोहम्मद शेख की गिरफ्तारी से बड़ी आतंकी साजिश का पर्दाफाश

उत्तर प्रदेश एटीएस को खुफिया तंत्र से लगातार इनपुट मिल रहे थे कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई और सीमा पार बैठे भारत विरोधी तत्व सोशल मीडिया के जरिए देश के युवाओं को कट्टरपंथी बनाने की मुहिम चला रहे हैं। इसी निगरानी के दौरान एटीएस ने आजमगढ़ के सरायमीर थाना क्षेत्र के संजरपुर के पास स्थित खुदादादपुर गाँव में रहने वाले मोहम्मद शेख पुत्र रेहान अहमद को दबोचा। करीब 22 साल का यह युवक पहली नजर में एक सामान्य ग्रामीण लग सकता है, लेकिन इसके मोबाइल और डिजिटल फुटप्रिंट्स ने सुरक्षा एजेंसियों के होश उड़ा दिए।

मोहम्मद शेख के पास से एक अत्याधुनिक 9 एमएम की पिस्टल और चार जिंदा कारतूस बरामद किए गए। जाँच में सामने आया कि शेख पूरी तरह से जिहादी मानसिकता की गिरफ्त में आ चुका था। वह व्हाट्सएप और अन्य सुरक्षित मैसेंजर ऐप्स के जरिए पाकिस्तान और दुबई के कई संदिग्ध नंबरों के संपर्क में था। यह नंबर किसी और के नहीं, बल्कि कुख्यात पाकिस्तानी गैंगस्टर शहजाद भट्टी और उसके गुर्गों अजमल गुर्जर और रजा पाकिस्तानी के थे।

मोहम्मद शेख को पाकिस्तानी आकाओं द्वारा भारतीय जनता पार्टी (BJP) की एक प्रमुख महिला नेता की रेकी करने, उन्हें धमकाने और अंततः उनकी हत्या करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इस टारगेट किलिंग को अंजाम देने के बाद शेख को पाकिस्तान या दुबई सुरक्षित निकालने और उसे एक बड़े अंतरराष्ट्रीय आतंकी मिशन में शामिल करने का वादा किया गया था।

मोहम्मद शेख स्थानीय स्तर पर अन्य युवाओं को भी मोटी रकम का लालच देकर और मजहबी भावनाएँ भड़काकर इस नेटवर्क से जोड़ने का प्रयास कर रहा था। समय रहते हुई इस गिरफ्तारी ने उत्तर प्रदेश को एक बड़े सांप्रदायिक तनाव और राजनीतिक हत्या की आग में झुलसने से बचा लिया।

संजरपुर क्यों कहा जाता है ‘आतंक की नर्सरी’?

आजमगढ़ का संजरपुर गाँव कोई पहली बार चर्चा में नहीं आया है। देश में जब भी कोई बड़ा बम धमाका या आतंकी गतिविधि हुई, सुरक्षा एजेंसियों के कदम घूम-फिरकर संजरपुर की गलियों में ही पहुँचे। इस गाँव को ‘आतंक की नर्सरी’ का तमगा मिलने के पीछे एक लंबा और खौफनाक इतिहास है। संजरपुर और उसके आसपास के इलाकों का नाम देश के सबसे खतरनाक आतंकी संगठन ‘इंडियन मुजाहिद्दीन’ (IM) के जन्म और उसके विस्तार से गहराई से जुड़ा हुआ है।

बात चाहे साल 2007 के उत्तर प्रदेश की अदालतों में हुए धमाकों की हो, या 2008 के जयपुर, अहमदाबाद और दिल्ली के सिलसिलेवार बम ब्लास्ट की, इन सभी के मास्टरमाइंड और शूटर इसी संजरपुर और सरायमीर इलाके से निकले थे। इंडियन मुजाहिद्दीन का सह-संस्थापक यासीन भटकल जब देश में नेटवर्क खड़ा कर रहा था, तब उसे सबसे सुरक्षित पनाहगाह और सबसे मुफीद लड़ाके इसी संजरपुर से मिले थे।

इस गाँव के युवाओं का ब्रेनवॉश इस कदर किया गया था कि वे देश के भीतर ही देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने को तैयार हो गए। संजरपुर की इसी कड़वी हकीकत के कारण राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) और उत्तर प्रदेश एटीएस को इस इलाके पर चौबीसों घंटे पैनी नजर रखनी पड़ती है। यहाँ के कई परिवार ऐसे हैं जिनके बेटे या तो देश की विभिन्न जेलों में आतंकी गतिविधियों के आरोप में बंद हैं या फिर वे फरार होकर पाकिस्तान, दुबई और सीरिया जैसे देशों में बैठकर भारत के खिलाफ साजिशें रच रहे हैं।

बटला हाउस एनकाउंटर और संजरपुर के मोस्ट वांटेड आतंकी

संजरपुर का नाम वैश्विक पटल पर सबसे ज्यादा तब गूँजा जब 19 सितंबर 2008 को दिल्ली के जामिया नगर इलाके में कुख्यात ‘बटला हाउस एनकाउंटर‘ हुआ। दिल्ली सीरियल ब्लास्ट के बाद जब दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने आतंकियों के ठिकाने पर छापा मारा, तो वहाँ मौजूद आतंकियों का संबंध सीधे आजमगढ़ के संजरपुर से निकला।

इस मुठभेड़ में संजरपुर का रहने वाला आतंकी आतिफ अमीन और साजिद मारे गए थे, जबकि मोहम्मद सैफ नाम का आतंकी मौके से पकड़ा गया था। इस एनकाउंटर में दिल्ली पुलिस के जांबाज इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा वीरगति को प्राप्त हुए थे।

बटला हाउस एनकाउंटर के बाद संजरपुर के कई अन्य आतंकी देश छोड़कर फरार हो गए। राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने इस इलाके के छह सबसे खतरनाक फरार आतंकियों पर 10-10 लाख रुपए का इनाम घोषित कर रखा है। इन आतंकियों की प्रोफाइल भी जानना जरूरी है-

  • डॉक्टर शाहनवाज: संजरपुर का रहने वाला यह आतंकी पेशे से डॉक्टर था, लेकिन इसका दिमाग बम बनाने और युवाओं को कट्टरपंथी बनाने में चलता था। यह देश के कई शहरों में हुए धमाकों का मुख्य साजिशकर्ता रहा है।
  • शादाब उर्फ बड़ा साजिद उर्फ जुनैद चिकना: बटला हाउस एनकाउंटर के दौरान यह मौके से भागने में सफल रहा था। बाद में इसके पाकिस्तान और वहां से सीरिया जाकर वैश्विक आतंकी संगठन आईएसआईएस (ISIS) में शामिल होने की पुष्टि हुई।
  • अबू राशिद: इंडियन मुजाहिद्दीन का यह खतरनाक कमांडर भी बटला हाउस के बाद से फरार है और इसके भी आईएसआईएस के साथ जुड़कर इंटरनेट के जरिए भारतीय युवाओं को भर्ती करने के इनपुट मिले हैं।
  • राशिद उर्फ सुल्तान, आसिफ और आफताब: ये तीनों भी संजरपुर और सरायमीर इलाके के रहने वाले हैं और देश के विभिन्न हिस्सों में हुए धमाकों में शामिल रहे हैं।

लंबे समय तक स्थानीय पुलिस के पास इन आतंकियों के पुख्ता डोजियर या तस्वीरें नहीं थीं, जिसका फायदा उठाकर इनके नेटवर्क चोरी-छिपे काम करते रहे। साल 2018 में उत्तर प्रदेश पुलिस ने एक बड़ा कदम उठाते हुए सरायमीर थाने में इन सभी छह फरार आतंकियों की हिस्ट्रीशीट खोली।

डॉक्टर शाहनवाज (46ए), बड़ा साजिद (37ए), अबू राशिद (70ए), राशिद (26ए), आसिफ (20ए) और आफताब (11ए) की हिस्ट्रीशीट खुलने के बाद स्थानीय स्तर पर इनके रिश्तेदारों और मददगारों पर कानूनी शिकंजा कसा गया, जिससे इनका घरेलू सपोर्ट सिस्टम ध्वस्त हो गया था।

आईएसआईएस (ISIS) के वीडियो से सामने आया आजमगढ़ का वैश्विक कनेक्शन

आजमगढ़ के आतंकियों के तार केवल भारत या पाकिस्तान तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि इन्होंने वैश्विक जिहाद में भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। वर्ष 2016 में दुनिया के सबसे बर्बर आतंकी संगठन आईएसआईएस (ISIS) ने एक प्रोपेगैंडा वीडियो जारी किया था, जिसने भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को हिलाकर रख दिया था। इस वीडियो में सीरिया और इराक के युद्धक्षेत्र में कुछ भारतीय आतंकी हथियार लहराते हुए भारत के खिलाफ जंग का एलान कर रहे थे और बाबरी मस्जिद, मुजफ्फरनगर दंगों तथा गोधरा का बदला लेने की बात कह रहे थे।

इस वीडियो में दिख रहे आतंकियों में से दो प्रमुख चेहरों की पहचान आजमगढ़ के संजरपुर निवासी बड़ा साजिद और अबू राशिद के रूप में हुई। वीडियो सामने आने के बाद संजरपुर में हड़कंप मच गया था। हालाँकि उनके परिजनों ने हमेशा की तरह यह दावा किया कि 2008 के बाद से उनका अपने बेटों से कोई संपर्क नहीं है, लेकिन खुफिया एजेंसियों के पास इस बात के पक्के सबूत थे कि ये फरार आतंकी इंटरनेट और डार्क वेब के जरिए संजरपुर और आजमगढ़ के स्थानीय स्लीपर सेल्स के संपर्क में बने हुए थे और वहाँ से नई भर्तियाँ करने की कोशिश कर रहे थे।

लश्कर का ‘शेख अब्दुल नईम’ कनेक्शन और पूर्वांचल में स्लीपिंग मॉड्यूल्स

आजमगढ़ का यह आतंकी सिंडीकेट कितना गहरा है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) भी इस नर्सरी का इस्तेमाल करता रहा है। साल 2017 में लखनऊ से लश्कर के एक बड़े आतंकी शेख अब्दुल नईम को गिरफ्तार किया गया था। नईम साल 2014 में मुंबई पुलिस की हिरासत से फरार हो गया था और वह हैदराबाद बम धमाकों का मुख्य आरोपित था।

गिरफ्तारी से पहले नईम ने उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र, विशेष रूप से आजमगढ़, जौनपुर और वाराणसी का सघन दौरा किया था। जाँच में सामने आया कि नईम आजमगढ़ के ही तीन फरार आतंकियों का बेहद करीबी था। उन्हीं पुराने संपर्कों का इस्तेमाल करके नईम आजमगढ़ और बनारस के निष्क्रिय हो चुके स्लीपिंग मॉड्यूल्स को नए सिरे से खड़ा करने की कोशिश कर रहा था।

नईम ने वाराणसी के प्रसिद्ध अस्सी घाट और दशाश्वमेध घाट के पास स्थित होटलों और धर्मशालाओं में हिंदू नाम और फर्जी पहचान पत्रों के आधार पर हफ्तों तक पनाह ली थी। उसने उन क्षेत्रों की टोह ली थी जहां इजरायली और अमेरिकी पर्यटक बड़ी संख्या में आते हैं। उसने गोरखपुर के रास्ते नेपाल सीमा तक जाकर पूरे रूट की वीडियो और तस्वीरें अपने पाकिस्तानी आकाओं को भेजी थीं। इस पूरी साजिश का केंद्र बिंदु भी आजमगढ़ का वही आतंकी नेटवर्क था, जो नईम को स्थानीय स्तर पर रसद, छिपने की जगह और पहचान पत्र मुहैया करा रहा था।

अंडरवर्ल्ड और आतंकवाद का कॉकटेल, अबू सलेम की विरासत

आजमगढ़ का इतिहास केवल वैचारिक आतंकवाद से ही नहीं, बल्कि अंडरवर्ल्ड के उस खूंखार नेटवर्क से भी जुड़ा है जिसने देश की आर्थिक राजधानी मुंबई को लहूलुहान किया था। मुंबई बम धमाकों का मुख्य आरोपित और अंडरवर्ल्ड डॉन अबू सलेम भी इसी आजमगढ़ के सरायमीर का रहने वाला है। अबू सलेम ने सरायमीर से निकलकर मुंबई के डी-कंपनी (D-Company) में अपनी पैठ बनाई और जबरन वसूली, हत्याओं तथा हथियारों की तस्करी का एक बड़ा साम्राज्य खड़ा किया।

साल 1993 के मुंबई सीरियल ब्लास्ट में हथियारों को मँगाने और उन्हें ठिकाने लगाने में अबू सलेम की मुख्य भूमिका थी। सलेम ने आजमगढ़ के अपने पुराने संपर्कों का इस्तेमाल करके कई स्थानीय युवकों को मुंबई और खाड़ी देशों में काम दिलाया और धीरे-धीरे उन्हें जरायम की दुनिया में धकेल दिया। आजमगढ़ में अपराध और आतंकवाद का यह कॉकटेल दशकों पुराना है, जहाँ अंडरवर्ल्ड के शूटर और हथियारों के तस्कर आसानी से वैचारिक आतंकवादियों के स्लीपर सेल में तब्दील हो जाते हैं।

क्या जब-जब सपा मजबूत हुई, तब-तब पनपा सिंडीकेट?

आजमगढ़ में आतंकवाद और संगठित अपराध के इस कदर फलने-फूलने के पीछे सबसे बड़ा कारण इस क्षेत्र को मिला राजनीतिक संरक्षण और तुष्टिकरण की राजनीति रही है। यदि अतीत के पन्नों को पलटकर तथ्यों का विश्लेषण किया जाए, तो यह साफ दिखाई देता है कि जब-जब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) सत्ता में रही या राजनीतिक रूप से मजबूत हुई, तब-तब इस इलाके के गैंगस्टरों और संदिग्ध आतंकियों के हौसले बुलंद हुए।

इसके कई ठोस और ऐतिहासिक तथ्य मौजूद हैं-

  • बटला हाउस के बाद राजनीतिक हमदर्दी: जब 2008 में बटला हाउस एनकाउंटर हुआ, तो समाजवादी पार्टी और कॉन्ग्रेस के कई बड़े नेताओं ने वोट बैंक की राजनीति के चलते इस एनकाउंटर पर ही सवाल खड़े कर दिए थे। संजरपुर के मारे गए और पकड़े गए आतंकियों को ‘मासूम छात्र’ बताकर पेश किया गया। नेताओं का एक पूरा हुजूम संजरपुर के उन परिवारों से मिलने पहुँचा जिनके तार आतंकियों से जुड़े थे, जिससे स्थानीय स्तर पर कानून व्यवस्था और सुरक्षा एजेंसियों का मनोबल कमजोर हुआ।
  • आतंकी मुकदमों की वापसी का प्रयास: साल 2012 में जब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी, तो सरकार के एजेंडे में सबसे ऊपर देश के विभिन्न बम धमाकों में पकड़े गए आजमगढ़ और अन्य जिलों के संदिग्ध आतंकियों के मुकदमों को वापस लेने का फैसला शामिल था। हालाँकि बाद में माननीय उच्च न्यायालय ने इस असंवैधानिक कदम पर रोक लगा दी, लेकिन इस राजनीतिक प्रयास ने यह संदेश दे दिया था कि सत्ता में बैठे लोग इन तत्वों के प्रति नरम रुख रखते हैं।
  • गैंगस्टरों को राजनीतिक मुख्यधारा में लाना: आजमगढ़ और आसपास के जिलों में मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद जैसे माफियाओं को राजनीतिक संरक्षण देना और उन्हें माननीय बनाना इसी राजनीति का हिस्सा रहा। जब सत्ता का हाथ इन अपराधियों के सिर पर होता था, तो स्थानीय पुलिस और खुफिया इकाइयाँ संजरपुर जैसे संवेदनशील इलाकों में हाथ डालने से कतराती थीं, जिसके कारण स्लीपर सेल बिना किसी डर के अपनी जड़ें मजबूत करते रहे।

सत्ता परिवर्तन और ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति का असर

साल 2017 में उत्तर प्रदेश की सत्ता में बड़ा बदलाव हुआ। नई सरकार के आते ही अपराधियों और आतंकवादियों के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ (Zero Tolerance) की नीति लागू की गई। पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को पूरी छूट दी गई कि वे बिना किसी राजनीतिक दबाव के राष्ट्रविरोधी तत्वों पर कार्रवाई करें।

इस नीति का असर आजमगढ़ पर भी साफ तौर पर देखने को मिला-

  • आतंकी नेटवर्क का ध्वस्त होना: एटीएस और एनआईए ने संजरपुर, सरायमीर और खुदादादपुर जैसे इलाकों में लगातार छापेमारी करके फंडिंग के रास्तों को ब्लॉक कर दिया। पुराने स्लीपर सेल्स के मददगारों को जेल भेजा गया।
  • हिस्ट्रीशीट और कुर्की की कार्रवाई: जैसा कि पहले बताया गया, 2018 में छह बड़े इनामी आतंकियों की हिस्ट्रीशीट खोलकर बीट स्तर पर निगरानी शुरू की गई। माफियाओं और आतंकियों की संपत्तियों को कुर्क किया गया और उन पर बुलडोजर चलाए गए।
  • भय का माहौल खत्म होना: राजनीतिक संरक्षण खत्म होने से अपराधियों में खौफ पैदा हुआ और आजमगढ़ का यह आतंकी सिंडीकेट पूरी तरह से कमजोर, पंगु और भूमिगत हो गया था। कई सालों तक इस इलाके से किसी बड़ी राष्ट्रविरोधी गतिविधि की खबर सामने नहीं आई।

साल 2024 का राजनीतिक मोड़ और संजरपुर में जिहादी मानसिकता का पुनरुत्थान

सुरक्षा बलों की लगातार सख्ती के बावजूद, यह मानसिकता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी, बल्कि केवल एक अनुकूल राजनीतिक अवसर के इंतजार में शांत बैठी थी। साल 2024 के लोकसभा चुनाव में आजमगढ़ संसदीय सीट पर एक बार फिर बड़ा राजनीतिक उलटफेर हुआ। इस चुनाव में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी धर्मेंद्र यादव ने जीत हासिल की और आजमगढ़ की सीट पर फिर से सपाई परचम लहराया।

राजनीतिक विश्लेषकों और खुफिया इनपुट्स के अनुसार, इस चुनावी नतीजे के बाद से ही संजरपुर और उसके आसपास के इलाकों में सक्रिय रेडिकल तत्वों और जिहादी मानसिकता के लोगों को यह लगने लगा है कि उनके पुराने दिन और पुराना राजनीतिक संरक्षण वापस लौट सकता है। धर्मेंद्र यादव की इस जीत के बाद से ही इस इलाके के स्लीपिंग मॉड्यूल्स के भीतर एक नई हलचल देखी गई। सोशल मीडिया पर भारत विरोधी प्रोपेगैंडा अचानक तेज हो गया और युवाओं को दोबारा लामबंद करने की कोशिशें शुरू हो गईं।

मोहम्मद शेख की हालिया गिरफ्तारी इसी राजनीतिक बदलाव और उसके बाद पैदा हुई जिहादी मानसिकता के पुनरुत्थान का सीधा परिणाम है। सीमा पार बैठे पाकिस्तानी आकाओं और गैंगस्टर शहजाद भट्टी ने भाँप लिया था कि आजमगढ़ में राजनीतिक माहौल बदलते ही स्लीपर सेल्स को फिर से सक्रिय किया जा सकता है। इसी का फायदा उठाकर उसने मोहम्मद शेख जैसे 22 साल के युवक को हथियार मुहैया कराए और उसे भाजपा की महिला नेता की हत्या जैसे सनसनीखेज मिशन पर लगा दिया, ताकि राज्य में एक बार फिर से अशांति और सांप्रदायिक तनाव फैलाया जा सके।

सुरक्षा एजेंसियों के सामने बड़ी चुनौती

उत्तर प्रदेश एटीएस की इस मुस्तैद और त्वरित कार्रवाई ने यह साबित कर दिया है कि भले ही आजमगढ़ में आतंकी नर्सरी को जीवित करने के प्रयास किए जा रहे हों, लेकिन देश की सुरक्षा एजेंसियाँ पूरी तरह अलर्ट पर हैं। मोहम्मद शेख की गिरफ्तारी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आतंकवाद का खतरा कभी पूरी तरह खत्म नहीं होता; यह केवल रूप बदलता है और अनुकूल राजनीतिक व सामाजिक माहौल मिलते ही दोबारा फन उठाने लगता है।

आजमगढ़ और संजरपुर के इस पूरे बैकग्राउंड से यह साफ है कि जब तक इस इलाके के रेडिकल तत्वों को राजनीतिक और सामाजिक रूप से अलग-थलग नहीं किया जाएगा, तब तक सीमा पार बैठे आईएसआई जैसे संगठन यहाँ के युवाओं का इस्तेमाल स्लीपर सेल के रूप में करते रहेंगे।

सुरक्षा एजेंसियों के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती मोहम्मद शेख के पूरे डिजिटल नेटवर्क को खंगालना, उसके अन्य स्थानीय सहयोगियों की पहचान करना और संजरपुर की इस ‘आतंकी नर्सरी’ को जड़ से उखाड़ फेंकना है, ताकि देश की अखंडता और सुरक्षा पर आँच न आने पाए।

अरे लावण्या नारायण… तुर्की-पाक खिलाड़ी खेल में मजहब लाएँ तो ‘माशाल्लाह’ और IPL में शिव तांडव गूँजे तो पेट में चुभन? बंद करो ये ‘Keep Religion Out of Sport’ का पाखंड

भारतीय मीडिया में खुद को सेक्युलर और निष्पक्ष कहने वाले पत्रकारों का पाखंड किसी ना किसी रूप में सामने आ ही जाता है। ‘The Hindu’ और ‘स्पोर्ट्सस्टारवेब’ की डिप्टी टीम लीड लावण्या नारायण ने खेल में धर्म को लेकर ऐसा दोहरा मापदंड दिखाया है कि सोशल मीडिया पर लोग उन्हें जमकर लताड़ रहे हैं।

एक तरफ जहाँ IPL के फाइनल मैच में शिव तांडव स्तोत्रम बजने पर लावण्या को खेल में धर्म नजर आने लगता है, वहीं दूसरी तरफ विदेशी मुस्लिम खिलाड़ियों के मैदान पर नमाज पढ़ने और रोजा खोलने पर उनका ‘माशाल्लाह’ प्रेम हिलोरे मारने लगता है।

IPL फाइनल में जागा ‘सेक्युलर’ ज्ञान

रविवार (31 मई 2026) को संपन्न हुए IPL के फाइनल मुकाबले में मशहूर गायक कैलाश खेर ने अपनी दमदार आवाज में भगवान शिव का भजन और शिव तांडव स्तोत्रम गाया। पूरा स्टेडियम भक्ति और उत्साह के माहौल में झूम उठा। लेकिन यह नजारा ‘The Hindu’ की पत्रकार लावण्या नारायण को हजम नहीं हुआ।

लावण्या नारायण ने तुरंत सोशल मीडिया पर अपना सेक्युलर ज्ञान बाँटते हुए लिख दिया कि खेलों से धर्म को दूर रखा जाना चाहिए। लावण्या के मुताबिक एक हिंदू बहुल देश के सबसे बड़े क्रिकेट त्योहार में हिंदू संस्कृति की झलक दिखना खेल की भावना के खिलाफ है। उनके इस ट्वीट के बाद सोशल मीडिया पर नेटीजन्स का गुस्सा भड़क गया।

तुर्की और पाकिस्तान के खिलाड़ियों पर ‘माशाल्लाह’ की बौछार

लावण्या नारायण के इस ज्ञान के बाद जब जागरूक सोशल मीडिया नेटीजन्स ने उनके पुराने ट्वीट्स खंगालने शुरू किए, तो उनके दोगलेपन की ऐसी परतें खुलीं कि लोग हैरान रह गए। लावण्या का एक पुराना ट्वीट सामने आया है, जो उन्होंने 17 अप्रैल 2021 को किया था। इस ट्वीट में उन्होंने तुर्की की एक फुटबॉल टीम का Video शेयर करते हुए बड़े चाव से ‘माशाल्लाह’ लिखा था।

उस मैच के बीच में मुस्लिम खिलाड़ी अपना रोजा खोल रहे थे। खेल के बीच में इस्लाम के इस प्रदर्शन पर लावण्या को असीम आनंद मिल रहा था और तब उन्हें खेल के बीच में मजहब के घुसने से कोई दिक्कत नहीं थी।

पाकिस्तानी क्रिकेटरों के लिए उमड़ा ‘भाईचारा’

इतना ही नहीं, लावण्या का पाकिस्तानी प्रेम भी उनके सोशल मीडिया हैंडल पर साफ दिखाई देता है। वे पाकिस्तानी क्रिकेटरों और वहाँ के एंकरों को बेहद चाव से ईद की मुबारकबाद देती हैं। उनके एक ट्वीट में वे तारिक लस्कर को टैग करते हुए जैनब अब्बास, इमाम-उल-हक, डायना बेग और आलिया रियाज जैसे पाकिस्तानी चेहरों के साथ ईद का जश्न मनाती दिखती हैं।

इसके अलावा वे न्यूयॉर्क के ब्रोंक्स में हिंदू विरोधी बयानबाजी करने वाला मेयर जोहरान ममदानी जब ब्रॉन्क्स के मैकॉम्स डैम पार्क में ईद-अल-अजहा की नमाज के लिए पहुँचता है, तो मैडम लावण्या उस Video को बड़े उत्साह के साथ रीट्वीट करती हैं।

यानी जब बात इस्लाम और मुस्लिम खिलाड़ियों की हो, तो लावण्या के लिए वह खेल की खूबसूरती बन जाता है, लेकिन जैसे ही भारत के मैदान पर शिव का नाम गूंजता है, तो उनका सेक्युलरिज्म खतरे में आ जाता है।

सोशल मीडिया पर जमकर हो रही थू-थू

लावण्या नारायण के इस खुले पाखंड के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर नेटीजन्स उन्हें ‘दक्षिण दिल्ली की फर्जी बुद्धिजीवी’ बताकर ट्रोल कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि यह महिला खुद हिंदू नाम रखती है, भारत के प्रतिष्ठित अखबार में काम करती है, लेकिन इसकी नफरत सिर्फ सनातन धर्म के लिए है।

नेटीजन्स लिख रहे हैं कि अपनी रोजी-रोटी भारत में हिंदू नाम से कमाने वाले ये लोग असल में मानसिक रूप से गुलाम हैं। नेटीजन्स लावण्या की प्रोफाइल शेयर करके लिख रहे हैं कि खुद को इस ग्रह का सबसे चालाक इंसान समझने वाले ये लोग असल में वैचारिक रूप से गटर के कीड़े जैसी सोच रखते हैं, जिन्हें बहुसंख्यक समाज की आस्था से चिढ़ है।

यह सेक्युलरिज्म नहीं, मानसिक दिवालियापन है

लावण्या नारायण का यह रवैया कोई इकलौता मामला नहीं है, बल्कि यह हमारे देश के एक खास तबके की पुरानी बीमारी है। खेल में धर्म को दूर रखने की वकालत सिर्फ तब क्यों याद आती है जब सामने हिंदू प्रतीक होते हैं? जब मोहम्मद रिजवान बीच मैदान पर नमाज पढ़ते हैं या तुर्की के खिलाड़ी खेल रोककर रोजा खोलते हैं, तब लावण्या जैसी कथित बुद्धिजीवियों को उसमें ‘खूबसूरती’ नजर आती है। लेकिन भारत के ही एक टूर्नामेंट में जब भगवान शिव की स्तुति होती है, तो इन्हें मिर्ची लग जाती है।

यह सीधे तौर पर सनातन धर्म के प्रति हीनभावना और विदेशी एजेंडे के सामने घुटने टेकने की मानसिकता है। खुद को सबसे समझदार समझने वाले इन एजेंडाधारियों को यह समझ लेना चाहिए कि अब देश का युवा जाग चुका है। वह आपके इस सिलेक्टिव सेक्युलरिज्म और दोगलेपन को न सिर्फ पहचानता है, बल्कि बीच चौराहे पर आपको बेनकाब करना भी जानता है। लावण्या नारायण जी, खेल से धर्म को दूर रखने की सलाह देने से पहले जरा अपने ‘माशाल्लाह’ वाले चश्मे को साफ कर लीजिए, क्योंकि आपका दोहरा चेहरा अब पूरी तरह बेनकाब हो चुका है।

सुनो आरफा, हैंडसम नहीं होते तुम्हारे (मुस्लिम) मर्द, नीच-गलीच होते हैं: वामपंथन निवेदिता मेनन नहीं बताएगी लव जिहादियों की जो मक्कारी, वो हमसे सुनो

एक किस्सा सुनाती हूँ। एक गाँव में अलग-अलग मोहल्ले की दो सहेलियाँ मिलती हैं। एक आरफा खानुम शेरवानी और दूसरी निवेदिता मेनन। दोनों कैमरे के सामने बैठकर चुगली करने लगती हैं। इनमें से एक आरफा, अपनी दोस्त निवेदिता मेनन से बातें उगलवा रही है, जबकि दूसरी निवेदिता ठीक वही बातें उगल रही हैं जो आरफा सुनना और कहलवाना चाहती हैं। चुगली करने का यही सही तरीका भी है। उन्हें यह भी मालूम है कि उनकी यह चुगली गाँव भर तक पहुँच जाएगी। और हुआ भी कुछ ऐसा ही, क्योंकि चुगली का टॉपिक ही ऐसा चुना गया था- लव जिहाद और हिंदू-विरोधी बातें।

दोनों सखियों की यह चुगली तीन महीने बाद सोशल मीडिया पर वायरल कंटेन्ट बनी। ‘एक्स’ से लेकर फेसबुक और यूट्यूब के कानों तक इनकी बातें पहुँची। और हर जगह इनकी चुगली करने की आदत पर भद्द पिटी। तो वो चुगली है कुछ ऐसी ही कि सुनना भी जरूरी है। तो चुगली के 2.50 मिनट में हुई तीखी बातें आप भी सुनिए:

शुरुआत आरफा करती हैं क्योंकि अपने नैरेटिव की बातें उगलवानी उन्हीं को हैं। आरफा पूछती हैं- लड़कियों को मुस्लिम लड़के ही क्यों पसंद आते हैं?

बस… यही सवाल चुगलीखोर दोस्त निवेदिता पुछवाने का इंतजार भी कर रही थी। उसने अपना जवाब एक सुर में खिलखिलाते हुए दिया, “पता नहीं… इनको (हिंदुओं) कहते शर्म नहीं आती। हिंदू मर्द जाकर ले आएँ मुस्लिम औरतों को हमारे समुदाय में। ले आए बहू बनाकर, क्यों नहीं होता है आपसे? ये कहने में उन्हें शम महसूस नहीं होती? कि हमसे नहीं होता वो करते हैं, वो हमारी लड़कियों को छीनते हैं। हमेशा लगता है कि ‘लव जिहाद’ एक बेबसी प्रकट करने जैसा है कि हमसे नहीं होता और ये लोग कर रहे हैं। होंगे फिर मुस्लिम मर्द इतने हसीन।”

इतने में आरफा उत्सुकता से पूछती हैं,क्या मुस्लिम मर्द इतने आकर्षक होते हैं, क्या इतने हैंडसम होते हैं?”

अब निवेदिता बिल्कुल ‘नंगी मानसिकता’ के साथ बोलती हैं, “हाँ, होंगे। ‘हिंदू राष्ट्र’ तो हिंदुओं में डर पैदा करता है, तब जाकर हिंदू खतरे में है वाला नारा उठता है।”

हर जगह मोदी सरकार को घसीटने वाली आरफा फिर बोल पड़ती हैं, फिर ये लोग(हिंदू) मोदी जी को वोट करते हैं?”

निवेदिता भी चुगली को एक कदम आगे ले जाते हुए कहती हैं, “मैं नहीं मानती कि वोट से कोई सरकार टिकी हुई है, और कई सालों से नहीं टिकी है।”

आगे आरफा अपनी खयाली दुनिया में पकाए गए पुलाव को परोसते हुए पूछती हैं, मुस्लिम लड़के सुरमा लगाकर बाइक पर आता है और हिंदू लड़कियों का दिल चुराके ले जाता है। लेकिन हिंदू लड़के ऐसा क्यों नहीं कर पा रहे हैं… क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि मुस्लिम लड़के धर्म परिवर्तन का एक नेटवर्क चलाते है, जो हिंदू लड़के नहीं कर रहे हैं।”

इस बार निवेदिता ने आरफा की मानसिकता को भी भाँप लिया है और उसी हिसाब से अपना ‘फेमिनिस्ट कार्ड’ बीच में घुसाकर पूरा जवाब देती हैं, “ये लोग सिर्फ मुस्लिमों से नफरत नहीं करते बल्कि महिलाओं से भी नफरत करते हैं, जो पितृसत्तात्मक समाज की माँ, बहने औऱ बीवियाँ नहीं बनना चाहतीं। आजाद खयाल वाली महिलाएँ। तो उनको लगता है कि जो औरतें इस लव जिहाद में फँसती हैं उनका कोई दिमाग नहीं है, वो बिल्कुल मुर्गी बनकर किसी के पीछे चली जाती हैं… मतलब कोई भी सुरमा लगाकर आया और आप उनके पीछे चली गईं..”

आगे कहती हैं, “मान लेते हैं कि लव जिहाद साजिश है धर्म परिवर्तन के लिए और मुस्लिम की तादाद बढ़ाने के लिए। लव जिहाद बोलने वालों की नजर में हिंदू महिलाएँ बुद्धु हैं जो वो ये कर रही हैं। तो आपके घर में ही कुछ समस्या है न। लव जिहाद से औरतों पर काबू रख रहे हैं।”

अब इस चुगली के पीछे का पूरा एजेंडा भी समझ लीजिए। यहाँ दोनों सहेलियाँ निवेदिता और आरफा खानुम ‘लव जिहाद’ पर चुगली कर रही हैं। यहाँ निवेदिता ‘लव जिहाद’ को हिंदुओं की बेबसी बताकर मुस्लिमों को हरी झंडी दे रही हैं और आरफा खानुम इस हरी झंडी का जश्न मनाते हुए अपने मुस्लिम भाई-बहनों की तारीफ में मग्न नजर आती हैं।

यह भी जान लेना चाहिए कि पहली सहेली आरफा खानुम शेरवानी, खुद को एक लिबरल-प्रोग्रेसिव महिला के तौर पर पेश करते हुए ‘एकतरफा’ मुस्लिमों के हक की लड़ाई लड़ती है। और दूसरी सहेली निवेदिता की पहचान ‘लाल सलाम’ वाली जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की प्रोफेसर के तौर पर है और उसके देश-विरोधी किस्से इतने मशहूर हैं कि इन्हें फिल्मों में जगह देनी पड़ गई।

यहाँ बार-बार आरफा खानुम का यह पूछना कि ‘लड़कियों को मुस्लिम लड़के ही क्यों पसंद आते हैं?’ कोई साधारण सवाल नहीं है। इस सवाल से वे हिंदुओं को गलत ठहराने के लिए यह बताने की कोशिश कर रही हैं कि लव जिहाद की पीड़ित हिंदू महिलाएँ खुद मुस्लिम लड़कों की खूबसूरती देखकर उनके पास आती हैं। वहीं फेमिनिज्म के राग अलापने के लिए वह निवेदिता के मुँह से ‘आजाद खयाल’ वाली महिलाओं को हिंदुओं का विरोधी बताने वाली बात सुनना चाहती हैं।

लेकिन आरफा सिर्फ तब तक इन बेतुकी बातों पर टिकी रहती हैं जब तक इनकी हकीकत सामने नहीं आ जाती है। जब TCS नासिक में धर्मांतरण कांड जैसे मामले सामने आते हैं तो आरफा इन्हें मुस्लिमों के प्रति हमला बताती हैं और कहती हैं कि अब पढ़े-लिखे मुस्लिमों को ‘बहुसंख्यकों के सिस्टम’ ने निशाना बना लिया है। भूल जाती हैं वो अपने उन ‘आकर्षक’ और ‘हैंडसम’ भाइजानों की हिंसा, जो हर त्यौहार पर बन-ठनकर निकलते और हिंदुओं को चाकूबाजी और पत्थरबाजी का शिकार बनाते हैं।

यह भी याद नहीं रखती कि आतंकी हमले में इन ‘पढ़े-लिखे और खूबसूरत’ भाईजान के जब नाम सामने आते हैं, तो इनकी जिहादी मानसिकता भी सबके सामने आ जाती है। तब साफ हो जाता है कि कैसे मजहब के नाम पर ये आतंकी बने। तब आप आरफा ही हैं, जो आज ‘लव जिहाद’ को बेबसी बताने पर खिलखिला रही हैं, तब आपके भाईजानों पर सवाल किए जाते हैं तो आपके कान खराब हो जाते हैं।

बात अगर दूसरी सहेली निवेदिता की करें तो देश-विरोधी किस्सों के अलावा ‘प्रोफेसर’ के तौर पर उनके पास कोई अन्य उपलब्धियाँ नजर नहीं आती हैं। चाहे भारतीय सेना को बदनाम करने की बात हो तो निवेदिता आगे रहेंगी, जिनके लिए निवेदिता का कहना है कि ये सिर्फ ‘रोटी’ के लिए काम करते हैं और देश सेवा से इनका कोई मतलब नहीं है। जब अप्रैल 2010 में कम्युनिस्टों द्वारा 76 CRPF जवानों के बलिदान का जश्न JNU में मनाया गया था तब भी निवेदिता का नाम सबसे ऊपर था।

चलिए ‘देश सेवा’ में दिए निवेदिता के योगदान को भी जान लेते हैं। इन्होंने पाकिस्तान की राह पर चलते हुए मार्च 2016 में कहा कि भारत गैर-कानूनी ढंग से कश्मीर पर कब्जा कर रहा है और यह कभी भी भारत का अभिन्न अंग नहीं रहा। ‘देशप्रेम’ इतना भरा है कि निवेदिता भारत के नक्शे को ही नहीं मानती हैं, इसीलिए वह अपने आसपास उल्टा नक्शा देखना पसंद करती हैं। उनका तर्क यह है कि उन्हें इस नक्शे में भारत माता नहीं दिखता।

और JNU के छात्र-छात्राओं के आए दिन देश-विरोधी गतिविधियाँ सामने आने में भी इनकी भूमिका है। ये ‘द कश्मीर फाइल्स’ में राधिका मेनन के किरदार के रूप में दिखाई गईं निवेदिता मेनन को देखकर सभी जान गए हैं। यह भी किसी से नहीं छिपा कि JNU में निवेदिता जैसे प्रोफेसर ही यूनिवर्सिटी के छात्र-छात्राओं को शराब और पार्टियों का लालच देकर देश-विरोधी प्रोपेगेंडा आगे बढ़ाने का काम सौंपते हैं।

‘हैंडसम’ लव जिहादियों की मक्कारी

तो अब यह तो सामने आ ही गया है कि इन दो सहेलियों की चुगली करने के पीछे क्या मंशा है और कैसे यह पूरे गाँव में फैलाने के एजेंडे से की गई है? लेकिन जो यह कह रही हैं कि ‘हिंदुओं से नहीं होता है।’ यह बात सही है, हिंदू नहीं कर सकते जो मुस्लिम संगठित गिरोह बनाकर ‘लव जिहाद‘ में हिंदू लड़कियों को फँसाते हैं, हिंदू किसी भी अपना धर्म नहीं थोप सकते, न ही जबरन गोमांस खिला सकते और न खाओ तो रेप और शारीरिक शोषण जैसी हैवानियत नहीं कर सकते।

और जहाँ तक बात है कि हिंदू महिलाओं के ‘बुद्धु’ कहने और समाज में उन पर काबू करने की है तो यह कोई ‘फेमिनिज्म’ विचार नहीं है। किसी के भावनाओं से खेलने वाले आपके (मुस्लिम) मर्द इस गेम को ज्यादा सही तरीके से खेल पाते हैं, क्योंकि धर्म पर वार झूठ और मक्कारी से किसी की भावनाओं के साथ खेलना हिंदुओं से नहीं हो पाता है। तुम्हारे (मुस्लिम) ‘मर्द’ ‘हैंडसम’ और ‘खूबसूरती’ नहीं है आरफा और निवेदिता, वे महिलाओं को सुरमा लगाकर नहीं फँसाते बल्कि माथे पर टीका और हाथ में कलावा पहनकर आते हैं।

‘सनातन ने बचाई जनजातियों की पहचान, ईसाई मिशनरी मिटा रहे अस्तित्व’: झारखंड में धर्मांतरण से बदली डेमोग्राफी, पूर्व CM ने पूछा- हम प्रकृति पूजक तो क्यों बने 5000 चर्च?

झारखंड में धर्मांतरण की वजह से डेमोग्राफी तेजी से बदल रही है, खासकर सीमावर्ती इलाकों में। पूर्व सीएम चंपई सोरेन ने जनजातीय क्षेत्रों में ईसाइयत के फैलने और जनजातियों की संस्कृति, जीवन शैली नष्ट होने को लेकर चिंता जताई है। इसके बाद एक बार फिर जनजातीय परंपरा और उसपर ईसाई मिशनरी और घुसपैठियों के बढ़ते प्रभाव पर बहस हो रही है।

चंपई सोरेन का कहना है कि अगर सरकार ने जनजातियों के लिए आरक्षण जैसी सुविधाएँ दी हैं, तो ईसाई बनने वाले इसका लाभ कैसे उठा सकते हैं, क्योंकि धर्मांतरण के बाद ही वे अल्पसंख्यक बन जाते हैं। अल्पसंख्यकों के लिए अलग व्यवस्था और सुविधाएँ संविधान और सरकार ने दे रखी है। यही बात इस्लाम कबूलने वालों के साथ भी लागू है।

चंपई सोरेन ने अपनी बात को ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ देते हुए समझाया कि झारखंड में हजारों सालों से प्रकृति पूजक जनजातियों और सनातनियों के बीच एक बेहद गहरा, आत्मीय और सह-अस्तित्व का संबंध रहा है। दोनों समुदाय सदियों से एक ही गाँव, एक ही परिवेश में भाईचारे के साथ रहते आए हैं। उनके बीच कभी भी धर्म या पूजा पद्धति को लेकर कोई दीवार खड़ी नहीं हुई। सनातन धर्म ने कभी भी जनजातियों की पहचान को मिटाने की कोशिश नहीं की।

यही वजह है कि जनजातियों की मूल संस्कृति, पूजा पद्धति और बाकी खासियत बनी रही। अगर सनातनियों ने धर्मांतरण कराया होता तो जनजातीय समुदाय की संस्कृति कब का नष्ट हो जाती। इसी वजह से जनजातीय समाज को कभी भी हिंदू मंदिरों या सनातन परंपराओं से कोई आपत्ति या असुरक्षा की भावना नहीं हुई।

इस रिश्ते की खूबसूरती यह है कि सनातनी समाज के लोग जनजातीय लोगों के पवित्र स्थलों जैसे जाहेरस्थान, सरना स्थल, देशाउली और मांझी थान पर पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ जाते हैं और वहाँ के रीति-रिवाजों का सम्मान करते हैं। इसी तरह रांची के पास स्थित प्रसिद्ध दिउड़ी मंदिर और रंकिणी मंदिर जैसे अनगिनत ऐतिहासिक धार्मिक स्थल इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

इन मंदिरों में जनजातीय समाज के लोग न केवल सिर झुकाते हैं, बल्कि सबसे बड़ी बात यह है कि इन मंदिरों के मुख्य पुजारी भी स्वयं जनजातीय समुदाय यानी आदिवासी पाहन या मुंडा से ही आते हैं। दोनों समुदाय एक-दूसरे के पर्व-त्योहारों में खुलकर शामिल होते हैं। जब आदिवासी भाई करमा या सरहुल मनाते हैं, तो सनातनी समाज उनके साथ झूमता है और जब सनातनी कोई उत्सव मनाते हैं, तो जनजातीय समाज उसका सहर्ष हिस्सा बनता है।

जनजातीय समुदाय झारखंड में मात्र 26 फीसदी

झारखंड में डेमोग्राफी का संकट कोई काल्पनिक डर नहीं है, बल्कि सरकारी आँकड़े इस बात की गवाही दे रहे हैं कि राज्य में आदिवासियों का प्रतिशत लगातार घट रहा है, जबकि धर्मांतरित ईसाइयों और विशेषकर सीमावर्ती इलाकों में घुसपैठियों की आबादी अप्रत्याशित रूप से बढ़ रही है। साल 2011 की जनगणना के मुताबिक झारखंड में जनजातियों की कुल संख्या लगभग 86.45 लाख है, जो राज्य की कुल आबादी का करीब 26.2% है।

वहीं पूरे देश की बात की जाए तो जनजातीय समुदाय की कुल जनसंख्या मात्र 10.45 करोड़ के आसपास है, जो देश की कुल आबादी का लगभग 8.6% है। झारखंड में कुल 32 जनजातियाँ हैं, जिनमें संथाल उरांव, मुंडा , कोल, माहली, हो प्रमुख हैं। संथाल यहाँ की सबसे बड़ी जनजाति हैं। संथाल परगना में इनकी आबादी सर्वाधिक है।

आजादी के समय और उसके बाद के दशकों के आँकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन करें, तो पता चलता है कि झारखंड के गठन के समय जनजातीय लोगों की आबादी का जो अनुपात था, वह अब घटकर मात्र 26 फीसदी के आसपास सिमट गया है। इसके विपरीत ईसाई और मुस्लिम आबादी के विकास की दर सामान्य से कहीं अधिक रही है। अगर धर्मांतरण और घुसपैठ की रफ्तार यही रही, तो आने वाले कुछ दशकों में जनजातीय समाज अपनी ही गृह-भूमि पर अल्पसंख्यक बन जाएगा।

धर्मांतरण करा कर नष्ट किया जा रहा जनजातीय जीवन शैली

जनजातीय लोगों की जन्म से लेकर विवाह और मृत्यु तक जीवनशैली खास तरह की होती है। जन्म, नामकरण, विवाह और दूसरे अहम पड़ावों पर सामाजिक प्रक्रियाएँ मांझी परगना, नायके, पाहन, मानकी, मुंडा, पड़हा राजा आदि पूरी करवाते हैं। इन मौकों पर जाहेरस्थान, सरना स्थल, देशाउली, मांझी थान जाकर मरांग बुरु, सिंगबोगा की पूजा की जाती है। हजारों सालों से ये चलता आ रहा है।

सनातन धर्म ने कभी भी इसमें हस्तक्षेप नहीं किया। अगर ऐसा होता तो जनजातीय परंपरा मिट चुकी होती। उनकी संस्कृति उजड़ गई होती। लेकिन 18वीं शताब्दी में आए मिशनरियों ने इसे काफी हद तक बदल दिया। धर्मांतरण की वजह से इन स्थानों पर जनजातीय आस्था कम हो गई है। गाँवों में नए-नए चर्च उग आए हैं। इसमें प्रार्थना होती है और भोले भाले जनजातीय लोगों को वहाँ बहला-फूसला कर धर्मांतरण कराया जाता है। आज जिस रफ्तार से इन क्षेत्रों में धर्मातरण कराया जा रहा है। अगर ये नहीं रुकी तो जनजातीय संस्कृति खत्म हो जाएगी।

हजारों सालों से जनजातीय- सनातन का रिश्ता आपसी मदद सहयोग और सह-अस्तित्व का रहा है। सनातनियों ने कभी भी लालच देकर या साजिश कर जनजातीय लोगों को धर्मांतरण के लिए मजबूर नहीं किया। ये खुद को जनजातीय नहीं बताते हैं और न ही आरक्षण समेत दूसरे सरकारी लाभ छीनने की कोशिश करते हैं। इनलोगों ने कभी भी जनजातीय अधिकार नहीं छीने। जल-जंगल-जमीन पर जनजातीय लोगों का ही वर्चस्व रहा।

मिशनरियों ने आस्था पर पहुँचाई चोट

ईसाई और जनजातीय संस्कृति में कोई समानता नहीं है। 1845 में मिशनरियों ने जनजातीय क्षेत्रों में ईसाइयत का प्रचार शुरू किया। इन 180 सालों में इनलोगों ने इनकी परंपरा और धार्मिक आस्था पर चोट किया। इनके अस्तित्व को मिटाने की कोशिश की। यही वजह है कि झारखंड के कई हिस्सों में जाहेरस्थानों और सरना स्थलों पर ताला लग गया है। वहाँ धर्मांतरण की वजह से कोई पूजा करने नहीं जाता। यहाँ की जीवनशैली, रीति रिवाज, भाषा, संस्कृति जनजातीय पहचान सबकुछ बदल गया है।

कई अफ्रीकी देशों और लैटिन अमेरिकी देशों और आइलैंड में जनजातीय समुदाय की परंपरा और संस्कृति पूरी तरह बदल गई है। चाहे केन्या की संबुरु जनजाति हो या ब्राजील की वाई-वाई जनजाति, अयोरओ जनजाति सब अपनी सभ्यता-संस्कृति भूल चुके हैं और ईसाइयत के रंग में रंग गए हैं। मिशनरी भारत में भी यही करना चाहते हैं। धर्मांतरण कर पूरी जीवन शैली बदलना चाहते हैं।

ईसाईयों को अल्पसंख्यक का दर्जा भारत के संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत दिया गया है। उसके मुताबिक ये अपनी शिक्षण संस्थानों पर माइनॉरिटी संस्थान लिखते भी हैं। लेकिन जैसे ही फायदा लेने का वक्त आता है, ये खुद को जनजातीय कहने लगते हैं। जनजातीय आरक्षण का लाभ लेकर नौकरी खाते हैं। उनकी दूसरी सुविधाओं का सुख भोगते हैं।

सबसे बड़ी बात है कि जनजातीय आरक्षित सीटों पर चुनाव भी लड़ते हैं। इस पर रोक लगाना जरूरी है। अगर किसी ने अपनी इच्छा से धर्मांतरण किया है, तो उसके ये पता होना चाहिए कि वे अब जनजातीय सुविधाओं का लाभ नहीं उठा सकते। उनकी कटैगरी ‘अल्पसंख्यक’ की है।

चर्च और मस्जिदों के निर्माण के लिए जमीन कैसे मिली

धर्मांतरण समाज के अस्तित्व से जुड़ा एक सामाजिक मुद्दा है। इसका राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन हकीकत है कि वोटबैंक की राजनीति करने वाली पार्टियाँ इन्हें ऐसे ही चश्मे से देखती हैं और धर्मांतरण का विरोध नहीं करती। झारखंड का जनजातीय समुदाय बिरसा मुंडा, सिद्धू कान्हू, पोटो हो, वीर टाना भगग और वीर तेलंगा खड़िया जैसे महापुरुषों के दिखाए गए राह पर चलते हुए अगर अपनी पहचान नहीं बचा पाता है तो उसका अस्तित्व भी मिट जाएगा।

झारखंड में हजारों चर्च और मस्जिद बन गए हैं। जनजातीय समुदाय से जुड़ी सीएनटी-एसपीटी एक्ट के तहत जनजातीय लोगों की जमीन किसी को भी ट्रांसफर नहीं किया सकता। ऐसे में इनके गाँवों में चर्च और मस्जिद कैसे बन गए? आखिर इन्हें जमीन किसने दिए।

चंपई सोरेन का यह सवाल सीधे तौर पर शासन और प्रशासन को कटघरे में खड़ा करता है कि जब कानूनन जमीन का ट्रांसफर हो ही नहीं सकता, तो झारखंड के आदिवासी गाँवों में हजारों की संख्या में भव्य चर्च और विशाल मस्जिदें कैसे बन गईं? आखिर इन अल्पसंख्यक मजदही स्थलों के निर्माण के लिए जमीन किसने उपलब्ध कराई? यह विशुद्ध रूप से अल्पसंख्यक संस्थान हैं, जिनका आदिवासियों की मूल संस्कृति से कोई लेना-देना नहीं है। ऐसे में जनजातीय समुदाय की सुरक्षित जमीन इन संस्थाओं के पास कैसे स्थानांतरित हो गई?

चंपई सोरेन ने माँग की है कि इस पूरे भू-घोटाले और जमीनों के अवैध हस्तांतरण की एक उच्च स्तरीय, निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए ताकि यह साफ हो सके कि इसके पीछे कौन सा बड़ा सिंडिकेट और प्रशासनिक मिलीभगत काम कर रही है।

1845 में झारखंड में आया ईसाई मिशनरी

झारखंड में ईसाई मिशनरियों का आगमन 1845 में हुआ था। रेवरेंड फादर गोस्नर के नेतृत्व में जर्मनी से चार मिशनरी रांची पहुँचे। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और समाज-कल्याण का झाँसा देकर क्षेत्र में ईसाइयत का प्रचार-प्रसार शुरू किया। मुंडा, उरांव और दूसरे संथान जनजातियों को इनलोगों ने टारगेट किया।

इसके बाद एंग्लिकन SPG मिशनरी 1869 में छोटानागपुर में घुसा। इसके अलावा कैथोलिक (जेसुइट) मिशनरी 1868 में इन क्षेत्रों में आया। 1885 में फादर कॉन्स्टेंट लिवेन्स के आगमन के बाद धर्मांतरण में तेजी आई। 1873 में खुंटपानी में 6 मुंडा परिवारों के 28 लोगों का कोलकाता से आए आर्क बिशप स्टांइस ने बपतिस्मा कराया था। खुंटपानी झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिला का हिस्सा है।

यहाँ एक शिलापट्ट भी है, जिस पर उन लोगों के नाम दर्ज हैं जो पहली बार ईसाई बने। इसकी स्मृति में हर साल 8 नवंबर को यहाँ एक ‘तीर्थ मेला’ लगता है। इसमें झारखंड और आसपास के प्रदेशों के ईसाई धर्मांतरित लोगों का जमावड़ा ही नहीं लगता, बल्कि अच्छी-खासी संख्या में विदेशों से भी रोमन कैथोलिक धर्मावलंबी आते हैं।

झारखंड की तरह छत्तीसगढ़ भी बना धर्मांतरण का अड्डा

खुंटपानी की तरह ही मदकू द्वीप पर भी ईसाइयत का मेला लगता है। छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले का यह द्वीप शिवनाथ नदी की जलधारा से घिरा है। इसी द्वीप पर माण्डूक्य ऋषि ने ‘मुण्डकोपनिषद्’ की रचना की जिससे ‘सत्यमेव जयते’ निकला। हर साल फरवरी में इस द्वीप पर सबसे बड़ा जमावड़ा लगता है। यह जमावड़ा सप्ताह भर चलने वाले ‘मसीही मेला’ को लेकर लगता है। यह मेला साल 1909 से लग रहा है।

छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के खड़कोना गाँव में भी एक शिलापट्ट लगी हुई है, जिस पर 56 लोगों के नाम हैं। 21 नवंबर 1906 को बपतिस्मा हुआ था। इस गाँव में धर्मांतरित लोगों का सालाना कार्यक्रम होता है। अब ये हाल है कि जिले का हर चौथा व्यक्ति ईसाई है। डेमोग्राफी काफी बदल चुका है। इस क्षेत्र में राजपरिवार दिलीप सिंह जूदेव के परिवार का काफी असर है इसके बावजूद धर्मांतरण काफी तेजी से हुआ है। राज परिवार के विरोध और घर-वापसी अभियानों के बावजूद मिशनरियों ने पैसे और रसूख के बल पर यहाँ की पूरी डेमोग्राफी बदल कर रख दी है।

आपदा में भी अवसर तलाश लेते हैं ईसाई मिशनरी

बाइबिल का हर भाषा में अनुवाद करने वाली अनफोल्डिंग वर्ल्ड नाम की मिशनरी के सीईओ डेविड रीव्स ने 2021 में कुछ चौंकाने वाले खुलासे किए थे। उन्होंने बताया था कि कोरोना काल में करीब 1 लाख लोगों को ईसाई बनाया गया। हर चर्च को 10 गाँवों में प्रार्थना आयोजित करने की जिम्मेदारी दी गई थी। महामारी के दौरान जब लोगों का मिलना-जुलना नहीं था तो फोन और व्हाट्सएप्प से उन तक प्रार्थनाएँ पहुँचाई गईं।

रीव्स के अनुसार भारत में 25 साल में जितने चर्च बने थे, उतने अकेले कोरोना काल में बनाए गए। भाजयुमो से जुड़े अभिषेक गुप्ता ने ऑपइंडिया को बताया था, “ईसाई मिशनरी इसी तरह लैंड जिहाद करती है। जहाँ खाली जगह दिखी ये क्रॉस गाड़ देते हैं। चर्च बना लेते हैं। कुछ समय बाद प्रशासनिक मिलीभगत से वहाँ जाने का रास्ता तैयार हो जाता है और फिर प्रार्थना होने लगती है। बाद में आप जितना विरोध कर लें प्रशासन कब्जा नहीं हटाता।”

अमेरिका का एक और संगठन जोशुआ प्रोजेक्ट की शुरुआत 1995 में हुई थी। एक रिपोर्ट के अनुसार यह संगठन मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा जैसे राज्यों में जनजातीय लोगों को धर्मांतरित कर उनकी जमीन पर चर्च बना रहा है। 2011-12 में इन चारों राज्यों में लगभग 12,000 चर्च थे जो अब बढ़कर 25,000 को पार कर चुके हैं। यह सब उन इलाकों में हो रहा है जहाँ बाहरी व्यक्ति जमीन तक नहीं ले सकते, लेकिन मिशनरियाँ लगातार अपना प्रभाव बढ़ा रही हैं।

जोशुआ प्रोजेक्ट केवल जनजातीय समूह तक ही नहीं सिमटा हुआ है। भारत की अलग-अलग जातियों और जनजातीय समूहों के आँकड़े इकट्ठा किए हैं। जोशुआ प्रोजेक्ट के पास देश की 2272 जातियों-जनजातियों के आँकड़े हैं। जोशुआ प्रोजेक्ट बताता है कि वह इनमें से अभी 2041 जातियों तक नहीं पहुँच सका है। वहीं 103 जातियों में ईसाइयत का प्रभाव डालने में यह सफल रहा है। इनमें एक छोटी संख्या में लोग ईसाइयत को मानने लगे हैं। वहीं 128 जाति समूह ऐसे हैं, जिनमें बड़े पैमाने पर ईसाइयत की घुसपैठ हो गई है।

जोशुआ प्रोजेक्ट का डाटा बताता है कि उसने कई जातियों में 10%-100% तक ईसाइयत में धर्मांतरण करवाया है। जिन जातियों में बड़ी संख्या में ईसाइयत में धर्मांतरण हुआ है, उनको अलग नाम दे दिया गया है। तेलंगाना के मडिगा और माला समुदाय में 21000 की आबादी को ईसाइयत में बदल कर उसे ‘आदि क्रिश्चियन’ का नाम दिया गया है। बोडो समुदाय की 15.7 लाख आबादी में से लगभग 1.5 लाख आबादी को ईसाइयत में लाया गया गया है।

ईसाई मिशनरियाँ भारत के झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में भी ठीक इसी भयावह पैटर्न को दोहराना चाहती हैं। धर्मांतरण के कारण आज झारखंड के कई गाँवों में सदियों पुराने जाहेरस्थानों और सरना स्थलों पर सन्नाटा पसर गया है, कई जगहों पर तो ताले लग चुके हैं क्योंकि वहाँ अब पूजा करने वाला कोई बचा ही नहीं है। जनजातीय लोगों की पारंपरिक जीवनशैली, उनकी अनूठी भाषा, लोकगीत, रीति-रिवाज और उनकी मूल पहचान को ईसाइयत के चर्च तंत्र ने पूरी तरह निगल लिया है।

पहले ईसाई धर्मांतरण, अब मुस्लिमों की घुसपैठ

ईसाई मिशनरियों के धर्मांतरण से सर्वाधिक प्रभावित इलाकों में झारखंड का संथाल परगना है। इतना प्रभावित कि इस क्षेत्र में ST से ईसाई बने लोगों का जन प्रतिनिधि चुना जाना सामान्य सी बात है।

संथाल परगना इस समय बांग्लादेशी-रोहिंग्या मुस्लिमों की घुसपैठ से डेमोग्राफी बदलाव को लेकर चर्चित है। इस क्षेत्र से सरना (जनजातीय समाज का धार्मिक स्थल) विलुप्त हो रहे हैं, मस्जिद-मजार उग रहे हैं। जनजातीय समाज अपनी जमीन-रोजगार से लेकर बेटी तक गँवा रहे हैं।

घुसपैठिए पहले गाँव में आते हैं। किसी तरह रहना शुरू करते हैं। किसी जनजातीय महिला को प्रेमजाल में फँसा कर निकाह करते हैं और फिर उसकी संपत्ति पर कब्जा कर लेते हैं। हर गाँव में इनकी संख्या तेजी से बढ़ रही है और बढ़ रहा है मस्जिदों-मदरसों की संख्या। ईसाइयत से प्रभावित झारखंड में अब इस्लाम का जनजातीय क्षेत्रों में भी तेजी से फैलाव हो रहा है।

केंद्र सरकार ने जनजातीय समुदाय की विशिष्ट संस्कृति, उनकी अनोखी परंपराओं और उनके व्यक्तिगत कानूनों को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए उन्हें समान नागरिक संहिता (UCC) के दायरे से बाहर रखने का निर्णय लिया है। जब असम में इसे लागू किया गया, तो वहाँ भी जनजातीय समुदायों को विशेष छूट दी गई। सरकार का यह कदम यह दिखाता है कि देश के कानून निर्माता भी आदिवासियों की विशिष्ट जीवनशैली को संरक्षित करना चाहते हैं।

लेकिन चंपई सोरेन का कहना है कि एक तरफ तो सरकारें कानून बनाकर आदिवासियों को संरक्षित कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ जमीन पर पैठ बनाकर जिस तरह से मिशनरियों और घुसपैठियों द्वारा आदिवासियों का धड़ल्ले से धर्मांतरण कराया जा रहा है, उससे कानून का मूल उद्देश्य ही समाप्त हो रहा है। अगर यह धर्मांतरण नहीं रुका, तो वह दिन दूर नहीं जब कागजों पर तो कानून रहेगा, लेकिन जमीन पर अपनी विशिष्टता बचाने वाला कोई मूल आदिवासी बचेगा ही नहीं।

झारखंडी अस्मिता का सबसे बड़ा सवाल

यह मुद्दा किसी दलगत राजनीति या वोटबैंक का नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर ‘झारखंडी अस्मिता’ और इस वीर भूमि के महान स्वतंत्रता सेनानियों भगवान बिरसा मुंडा, सिद्धू-कान्हू, पोटो हो, वीर टाना भगत और वीर तेलंगा खड़िया की विरासत को बचाने का है।

यदि आज का जनजातीय समाज इन महापुरुषों के दिखाए रास्ते पर चलते हुए अपनी मूल पहचान, अपनी सरना संस्कृति और अपनी प्रकृति पूजक जीवनशैली को नहीं बचा पाता है, तो आने वाले समय में झारखंड से आदिवासियों का नामोनिशान और उनका गौरवशाली अस्तित्व हमेशा के लिए मिट जाएगा। पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन ने इसी संजीदगी और दूरदर्शिता के साथ इस मुद्दे को उठाकर पूरे देश का ध्यान झारखंड के इस गंभीर संकट की ओर खींचा है।

प्राइवेट पार्ट में बोतल घुसाते, चेहरे को सिगरेट से दागते और क्रॉस देखकर करते दरिंदगी: ब्रिटिश सांसद ने ‘मुस्लिम गैंग’ की करतूतें दिलाई याद, बताया- ईद पर कैसे बढ़ते थे अत्याचार

ब्रिटेन की संसद में हाल ही में ग्रूमिंग गैंग स्कैंडल को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई। ग्रेट यारमाउथ से सांसद रुपर्ट लोव ने संसद में कई पीड़ित महिलाओं और लड़कियों की गवाहियाँ पढ़कर सुनाईं। इन गवाहियों में टूटी बोतलों के टुकड़ों से रेप, पुलिस ऑफिसर द्वारा रेप, नस्लीय आधार पर ब्रिटिश लड़कियों को निशाना बनाने जैसी बेहद दर्दनाक घटनाएँ सामने आई हैं।

संसद में बोलते हुए लोव ने कहा कि कई पीड़िताओं ने वर्षों तक अत्याचार झेला, लेकिन उनकी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया गया। उन्होंने कहा कि यह केवल कुछ अलग-अलग घटनाएँ नहीं थीं, बल्कि एक ऐसा संगठित अपराध था जिसे रोकने में कई संस्थाएँ नाकाम रहीं। सांसद लोव ने इन ग्रूमिंग गैंग के मामलों में स्वतंत्र रूप से जाँच की। जाँच में पता लगा कि इन बाल यौन शोषण के मामलों में स्थानीय क्षेत्रों से ज्यादा सबूत मिले हैं।

ग्रूमिंग गैंग में ‘मुस्लिम’ एंगल

लोव ने एक महिला की गवाही का जिक्र किया, जिसके अब्बा इमाम थे। उस महिला ने बताया कि कई वर्षों तक उसके साथ 600 से 700 अलग-अलग पुरुषों ने रेप किया। एक बच्ची ने बताया कि उसके चेहरे को सिगरेट से दागा गया।

तो एक अन्य पीड़िता ने बताया कि जब वह 12 से 13 साल की थी तब उसके प्राइवेट पार्ट में शराब की बोतल डाल कर फोड़ दी गई। एक ने गवाही दी कि ग्रूमिंग गैंग करने वाले नस्लीय टिप्पणियाँ भी करते थें और कहते थे- “गोरी लड़कियों के संस्कार मुस्लिम लड़कियों से कम होते हैं।”

एक पीड़िता ने बताया कि इस्लाम में त्यौहारों के समय उनके साथ अत्याचार बढ़ जाता था। खासकर, ईद के आसपास ज्यादा पार्टियाँ होती थीं तो उन्हें निशाना बनाया जाता था, जिनमें पार्टी में शामिल होने वाले अन्य लोग भी उनके साथ दुष्कर्म करते थे।

धर्म और नस्लीय भेदभाव के आधार पर बनाया निशाना

कई पीड़िताओं ने शारीरिक हिंसा के साथ-साथ मानसिक शोषण का भी जिक्र किया। एक पीड़िता ने बताया कि उसे ईसाई होने के नाते निशाना बनाया गया। पीड़िता ने बताया कि शोषण करते समय वे लोग क्रॉस देखते और कहते थे, “अब तुम्हारा ईश्वर कहाँ है? क्या तुम्हारे ईश्वर ने तुम्हे त्याग दिया है?”

ग्रूमिंग गैंग ने अधिकतर ब्रिटिश मूल की गोरी लड़कियों को निशाना बनाया। पीड़िताओं ने बताया कि नस्लीय भेदभाव किया गया। उसने कहा, “मेरे साथ जितनी भी लड़िकयाँ थीं वे लगभग सभी श्वेत (ब्रिटिश मूल) थीं।” ऐसे ही एक अन्य पीड़िता ने कहा कि उसने 15 से 20 लड़कियों को कुत्तों के पिंजरों में बंद देखा था, जो सभी ब्रिटिश मूल की थीं।

इतना ही नहीं इन मामलों में पुलिस ऑफिसर की भी संलिप्तता सामने आई। एक पीड़िता ने बताया कि देश की अलग-अलग जगहों पर उसके साथ कई पुलिस ऑफिसर ने रेप किया।

दशकों से ब्रिटेन में खतरा है ग्रूमिंग गैंग स्कैंडल

ब्रिटेन में फिर से चर्चा में आए ग्रूमिंग गैंग स्कैंडल दशकों पुराना है। पिछले 20 सालों से बाल यौन शोषण के मामले सामने आते रहे हैं। इन मामलों में देश के रॉदरहैम के अलावा रोचडेल, ओल्डहम और टेलफोर्ड जैसे कई शहरों और कस्बों में संगठित समूह नाबालिग लड़कियों को बहला-फुसलाकर रेप और शारीरिक शोषण जैसी घिनौनी घटनाओं का खुलासा हुआ। पुलिस की जाँच में कई मामलों में मानव तस्करी और अन्य गंभीर अपराधों के आरोप भी सामने आए।

2002 के आसपास पहली बार ऐसे मामले उजागर हुए थे, जहाँ पाकिस्तानी मूल के पुरुषों पर इन नाबालिगों के शोषण के आरोप लगे थे। 2010 में यह ग्रूमिंग गैंग स्कैंडर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना, जब ब्रिटिश अखबार ‘द टाइम्स’ ने जाँच के बाद अपनी रिपोर्ट में इन बाल यौन शोषण के मामलों का खुलासा किया। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि अधिकतर आरोपित ब्रिटिश या पाकिस्तानी थे और वे कमजोर एवं असुरक्षित परिस्थितियों में रहने वाली लड़िकयों को अपना शिकार बना रहे थे।

बाद में ब्रिटेन सरकार की जाँच और रिपोर्ट्स में सामने आया कि स्थानीय प्रशासन, पुलिस और दूसरी सरकारी एजेंसियाँ समय पर कार्रवाई नहीं कर सकीं। कहीं न कहीं अधिकारियों की लापरवाही, पीड़ितों को ही जिम्मेदार ठहराने की सोच और कमजोर जाँच के कारण ये अपराध लंबे समय तक चलते रहे। इसी वजह से बड़ी संख्या में लड़कियाँ इसका शिकार बनीं।

लिपुलेख-कालापानी पर शेखी बघार अपने ही देश में घिरे बालेन शाह, सुगौली संधि से ब्रिटेन का भी कनेक्शन: जानिए भारत-नेपाल सीमा विवाद के बारे में सब कुछ

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह का भारत के साथ सीमा विवाद के मुद्दे पर दिया गया बयान नेपाल की राजनीति से लेकर भारत-नेपाल संबंधों तक चर्चा का विषय बन गया है। संसद में सीमा विवाद से जुड़े सवाल का जवाब देते हुए बालेन शाह ने कहा कि नेपाल केवल भारत और चीन से ही नहीं, बल्कि ब्रिटेन (UK) से भी बातचीत कर रहा है।

उन्होंने यह भी कहा कि कई जगहों पर भारत ने नेपाल और नेपाल ने भी भारतीय भूमि पर कब्जा किया हुआ है। पीएम बालेन शाह के इस बयान पर उनके ही सांसदों ने तर्क दिया कि भारत और नेपाल की खुली सीमा वाले क्षेत्रों में दोनों देशों के नागरिकों द्वारा भूमि का उपयोग और किसी राज्य द्वारा दूसरे देश की जमीन पर कब्जा करने में बड़ा अंतर है।

दशकों पुरानी खुली सीमा व्यवस्था के कारण सीमा के दोनों ओर रहने वाले लोग खेती, व्यापार और आवागमन के लिए एक-दूसरे की जमीन का उपयोग करते रहे हैं। इसलिए इसे अतिक्रमण या कब्जा कहना उचित नहीं है।

इसके बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय की ओर कहा गया कि प्रधानमंत्री बालेन ‘क्रॉस-बॉर्डर होल्डिंग’ यानी सीमा पार जमीन पर स्वामित्व शब्द का इस्तेमाल करना चाहते थे, लेकिन उनकी ओर से गलती से ‘क्रॉस-बॉर्डर ऑक्युपेशन’ यानी सीमा पार कब्जा शब्द इस्तेमाल हो गया।

हालाँकि बालेन शाह के बयान का सबसे चर्चित हिस्सा ब्रिटेन के सामने उनका हाथ फैलाकर मदद माँगना था। सवाल उठने लगा कि आखिर भारत-नेपाल सीमा विवाद में ब्रिटेन का नाम क्यों आया और नेपाल इस मुद्दे को ब्रिटेन से क्यों जोड़ रहा है। इस सवाल का जवाब सीधे तौर पर 210 साल पुरानी सुगौली संधि और लिपुलेख-कालापानी विवाद से जुड़ा हुआ है।

ब्रिटेन का जिक्र क्यों आया?

नेपाल का तर्क है कि सीमा विवाद की शुरुआत ब्रिटिश शासन काल में हुई थी। सुगौली संधि नेपाल और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुई थी। इसलिए नेपाल के कुछ नीति-निर्माताओं और विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रिटेन के अभिलेखागार में ऐसे दस्तावेज, नक्शे और रिकॉर्ड हो सकते हैं जो सीमा विवाद की ऐतिहासिक स्थिति को स्पष्ट कर सकें।

इसी के तहत बालेन शाह के मुख्य सलाहकार कुमार ब्यंजनकर ने ब्रिटिश राजदूत रॉब फेन के साथ इस बात पर चर्चा की थी कि यूनाइटेड किंगडम इस विवाद को सुलझाने में कैसे मदद कर सकता है। हालाँकि उपलब्ध जानकारी के अनुसार, ब्रिटेन ने इस मुद्दे को भारत और नेपाल के बीच का द्विपक्षीय मामला माना है और किसी तरह की मध्यस्थता में रुचि नहीं दिखाई है।

आलोचकों का कहना है कि भारत लगातार यह रुख रखता आया है कि सीमा विवादों का समाधान द्विपक्षीय बातचीत से होना चाहिए और किसी तीसरे पक्ष की भूमिका स्वीकार्य नहीं है। ऐसे में ब्रिटेन का नाम लेने से विवाद को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप देने की कोशिश के रूप में देखा गया।

आखिर क्या है लिपुलेख दर्रा? भारत के पास मौजूद हैं ऐतिहासिक साक्ष्य

लिपुलेख दर्रा हिमालय की ऊँची पर्वत श्रृंखलाओं में स्थित एक महत्वपूर्ण दर्रा है। यह भारत, नेपाल और चीन (तिब्बत) के त्रि-जंक्शन क्षेत्र के करीब स्थित है। भारतीय पक्ष से यह उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में पड़ता है और तिब्बत के पुरांग (तकलाकोट) क्षेत्र को जोड़ता है।

भौगोलिक और सामरिक दृष्टि से यह दर्रा बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। सदियों से यह भारत और तिब्बत के बीच व्यापारिक संपर्क का रास्ता रहा है। इसके अलावा कैलास मानसरोवर यात्रा के लिए भी यह एक प्रमुख मार्ग है। भारत और चीन के बीच होने वाली कैलास मानसरोवर यात्रा के दो प्रमुख मार्गों में से एक लिपुलेख होकर गुजरता है।

हाल ही में भारत और चीन ने 2026 से कैलास मानसरोवर यात्रा फिर शुरू करने का फैसला किया है। इसी घोषणा के बाद लिपुलेख एक बार फिर चर्चा में आ गया, क्योंकि नेपाल ने इस मार्ग के उपयोग पर आपत्ति जताई और कहा कि विवादित क्षेत्र से जुड़े मामलों पर उससे कोई परामर्श नहीं किया गया।

बालेन शाह सरकार ने दावा किया कि लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा का क्षेत्र उसका अभिन्न हिस्सा है, इसीलिए वहाँ से गुजरना नेपाल के कानून के खिलाफ है।

नेपाल के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर भारत और चीन को इस स्थिति से अवगत कराया। बयान में कहा गया कि नेपाल सरकार अपने इस रुख पर पूरी तरह से कायम है कि महाकाली नदी के पूर्व में स्थित लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी 1816 की सुगौली संधि के आधार पर उसके अविभाज्य क्षेत्र हैं।

नेपाल के इस दावे को लेकर भारत ने कड़ा रुख अपनाया और विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “इस मामले में भारत का रुख हमेशा स्पष्ट और एक जैसा रहा है। लिपुलेख दर्रा 1954 से कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए पारंपरिक मार्ग रहा है और इस रास्ते से यात्रा दशकों से जारी है। यह कोई नई बात नहीं है।”

उन्होंने यह भी कहा, “जहाँ तक क्षेत्रीय दावों का सवाल है, भारत लगातार यह कहता रहा है कि ऐसे दावे न तो उचित हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित हैं। इस तरह के एकतरफा दावों का विस्तार स्वीकार्य नहीं है। भारत नेपाल के साथ द्विपक्षीय संबंधों से जुड़े सभी मुद्दों पर रचनात्मक बातचीत के लिए तैयार है।”

लिपुलेख विवाद की जड़ क्या है और क्या दावा करता है नेपाल?

भारत और नेपाल के बीच वास्तविक विवाद केवल लिपुलेख दर्रे तक सीमित नहीं है। इसके साथ कालापानी और लिम्पियाधुरा क्षेत्र भी जुड़े हुए हैं। कुल मिलाकर लगभग 372 वर्ग किलोमीटर का इलाका दोनों देशों के बीच विवाद का विषय बना हुआ है।

इस पूरे विवाद की जड़ काली नदी (महाकाली नदी) के उद्गम स्थल को लेकर है। 1816 की सुगौली संधि के अनुसार, काली नदी को नेपाल और ब्रिटिश भारत के बीच प्राकृतिक सीमा माना गया था। लेकिन समस्या यह है कि दोनों देश काली नदी के वास्तविक उद्गम को अलग-अलग स्थान मानते हैं।

नेपाल बिना किसी साक्ष्य के दावा करता है कि काली नदी का मूल स्रोत लिम्पियाधुरा क्षेत्र में है और कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा नेपाल के क्षेत्र में आते हैं।

वहीं भारत ने हमेशा इस दावे का खंडन किया है। भारत का कहना है कि नदी का वास्तविक स्रोत नेपाल द्वारा बताए गए स्थान से नीचे स्थित है। भारत के अनुसार, सीमा निर्धारण उसी आधार पर होना चाहिए, जिसके चलते कालापानी, लिपुलेख और आसपास का क्षेत्र उत्तराखंड का हिस्सा बनता है।

भारत का यह भी कहना है कि नेपाल के दावे ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित नहीं हैं और वह बातचीत के माध्यम से समाधान चाहता है, जबकि इस क्षेत्र पर नियंत्रण भारत के पास बना हुआ है। रणनीतिक दृष्टि से लिपुलेख दर्रा बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत और चीन को जोड़ने वाला मार्ग है, जो दोनों देशों की संवेदनशील हिमालयी सीमा के पास स्थित है।

सुगौली संधि क्या थी?

लिपुलेख विवाद को समझने के लिए सुगौली संधि को समझना बेहद जरूरी है। 18वीं और 19वीं शताब्दी में गोरखा साम्राज्य तेजी से विस्तार कर रहा था। नेपाल ने कुमाऊं, गढ़वाल और तराई के कई क्षेत्रों तक अपना प्रभाव बढ़ा लिया था। इस विस्तार के कारण नेपाल और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच संघर्ष शुरू हुआ।

1814 से 1816 के बीच एंग्लो-नेपाल युद्ध लड़ा गया। युद्ध में नेपाल को नुकसान उठाना पड़ा और अंततः उसे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ समझौता करना पड़ा। 2 दिसंबर 1815 को सुगौली संधि पर हस्ताक्षर हुए और 4 मार्च 1816 से यह प्रभावी हो गई। इस संधि के तहत नेपाल ने अपने कई क्षेत्रों पर दावा छोड़ दिया।

साथ ही यह तय किया गया कि काली नदी दोनों पक्षों के बीच सीमा का काम करेगी। नेपाल आज भी अपने दावों के समर्थन में इसी संधि और ब्रिटिश काल के कई पुराने नक्शों का हवाला देता है। नेपाल का तर्क है कि यदि मूल संधि और शुरुआती नक्शों को आधार बनाया जाए तो कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख उसके हिस्से में आते हैं।

2020 में क्यों बढ़ा था विवाद और क्या है भारत का पक्ष?

लिपुलेख विवाद 2020 में भी सुर्खियों में आया था। भारत ने उत्तराखंड के धारचूला से लिपुलेख दर्रे तक जाने वाली सड़क का उद्घाटन किया था। इस सड़क का उद्देश्य कैलास मानसरोवर यात्रियों और सीमावर्ती इलाकों तक पहुँच आसान बनाना था। नेपाल ने इस पर कड़ा विरोध जताया और कहा कि सड़क विवादित क्षेत्र से होकर गुजरती है।

इसके जवाब में नेपाल ने नया राजनीतिक नक्शा जारी किया, जिसमें कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख को अपने क्षेत्र का हिस्सा दिखाया गया। बाद में नेपाल ने इस नक्शे को संवैधानिक मान्यता भी दे दी। भारत ने नेपाल की इस कार्रवाई को एकतरफा कदम बताते हुए खारिज कर दिया और कहा कि सीमा विवाद का समाधान बातचीत के जरिए होना चाहिए।

भारत का कहना है कि कालापानी और लिपुलेख क्षेत्र लंबे समय से उसके प्रशासनिक नियंत्रण में रहे हैं। स्वतंत्रता के बाद भारत ने ब्रिटिश भारत की प्रशासनिक सीमाएँ विरासत में प्राप्त कीं और उसी आधार पर इन क्षेत्रों का प्रबंधन किया जाता रहा है। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद इस क्षेत्र का सामरिक महत्व और बढ़ गया।

भारत ने यहाँ अपनी सुरक्षा और प्रशासनिक मौजूदगी मजबूत की। भारत का यह भी तर्क है कि कैलास मानसरोवर यात्रा के लिए लिपुलेख मार्ग का उपयोग दशकों से किया जाता रहा है और यह क्षेत्र हमेशा से भारतीय प्रशासन के अधीन रहा है। भारत और नेपाल के बीच करीब 1,751 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है।

दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक और पारिवारिक संबंध बेहद गहरे हैं। यही कारण है कि सीमा से जुड़े अधिकांश मुद्दों का समाधान बातचीत के जरिए किया जाता रहा है, लेकिन नेपाल ने एक बार फिर बिना सबूतों के दावा तो ठोका ही साथ ही द्विपक्षीय वार्ता के बजाय तीसरे देश को भी बेवजह शामिल करने की कोशिश की।

गाँव में रात 10 बजे घूम रहा था आसिफ, टोकने पर सुबह साथियों के साथ किया हिंदुओं पर हमला: धनराज मौर्या की मौत, वारिस-साजिद-सलीम समेत 6 गिरफ्तार, बलरामपुर का मामला

उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले से एक ऐसी हृदयविदारक और कानून-व्यवस्था को चुनौती देने वाली घटना सामने आई है, जिसने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया है। गैंड़ास बुजुर्ग थाना क्षेत्र के पिपराराम गाँव में महज एक सामान्य पूछताछ और टोकने की बात पर शुरू हुआ विवाद अगले दिन तड़के एक सोची-समझी हिंसक वारदात में बदल गया। रात में 10 बजे के बाद गाँव में संदिग्ध परिस्थितियों में घूम रहे आसिफ को जब स्थानीय निवासी ने सुरक्षा के लिहाज से रोका, तो उसने इसे अपना अपमान मान लिया। अगले दिन सुबह वह अपने पूरे कुनबे और धारदार हथियारों के साथ आया और एक हिंदू परिवार पर जानलेवा हमला बोल दिया।

इस बर्बर और अमानवीय हमले में गंभीर रूप से घायल हुए धनराज मौर्य ने आखिरकार लखनऊ के अस्पताल में दम तोड़ दिया।

क्या था पूरा मामला, जिसमें आसिफ ने बनाया हिंदू परिवार को खत्म करने का प्लान

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस घटना की शुरुआत 26 मई 2026 की रात करीब 10 बजे हुई थी। ग्रामीण परिवेश में रात के समय सुरक्षा को लेकर अमूमन लोग सतर्क रहते हैं। इसी सतर्कता के तहत, पिपराराम गाँव के निवासी राजू मौर्य ने गाँव की गलियों में देर रात संदिग्ध परिस्थितियों में घूम रहे मोहम्मद आसिफ खान को देखा। इतनी रात गए किसी बाहरी या संदिग्ध गतिविधि को देखकर राजू मौर्य ने आसिफ को रोक लिया और वहाँ घूमने की वजह पूछी।

एक जिम्मेदार नागरिक और ग्रामीण होने के नाते राजू मौर्य की यह पूछताछ बेहद सामान्य और सुरक्षा के दृष्टिकोण से आवश्यक थी। लेकिन अहंकार और आपराधिक प्रवृत्ति से ग्रस्त मोहम्मद आसिफ खान को यह बात नागवार गुजरी। उसने इस सामान्य टोकने को अपनी झूठी शान के खिलाफ माना। मौके पर ही आसिफ ने राजू मौर्य के साथ तीखी बहस शुरू कर दी और गाली-गलौज पर उतर आया। ग्रामीणों के हस्तक्षेप के बाद उस वक्त तो मामला शांत हो गया, लेकिन आसिफ वहां से जाते-जाते राजू मौर्य को ‘सुबह देख लेने’ और अंजाम भुगतने की खुली धमकी देकर गया।

सोची-समझी साजिश के तहत सुबह के समय मुस्लिमों के गुट ने किया हमला

आसिफ रात की बात को भूला नहीं था, बल्कि वह रातभर अपने साथियों के साथ मिलकर एक खूनी साजिश को अंजाम देने की योजना बना रहा था। अगले दिन यानी 27 मई की सुबह-सुबह, जब पूरा गांव अभी ठीक से जागा भी नहीं था, मोहम्मद आसिफ खान ने अपने पिता वारिस अली और अपने अन्य भाइयों व साथियों साजिद खान, सलीम उर्फ सालिम अली, माजिद अली, आकिब और वाजिद को इकट्ठा किया।

यह कोई अचानक हुआ झगड़ा नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी और योजनाबद्ध हत्या की कोशिश थी। आरोपित अपने घरों से लाठी, डंडे, लोहे की रॉड और धारदार हथियारों से लैस होकर आए थे। उनका एकमात्र मकसद राजू मौर्य और उनके परिवार को सबक सिखाना और अपनी दबंगई कायम करना था।

आरोपितों ने बिना किसी हिचकिचाहट के राजू मौर्य के घर पर धावा बोल दिया। घर के बाहर पहुँचते ही उन्होंने गाली-गलौज शुरू कर दी और जैसे ही राजू मौर्य बाहर आया, इन सभी दरिंदों ने उस पर बेरहमी से हमला कर दिया।

बीच-बचाव करने आए पूरे परिवार को बनाया निशाना

राजू मौर्य की चीख-पुकार सुनकर उनके परिवार के लोग उन्हें बचाने के लिए दौड़े। हमलावरों की क्रूरता का आलम यह था कि उन्होंने बीच-बचाव करने आए बुजुर्गों, महिलाओं और युवाओं में से किसी को नहीं बख्शा। हमलावर इस कदर अंधाधुंध वार कर रहे थे कि जो भी सामने आया, उसे लहूलुहान करते गए। इस अमानवीय हमले में धनराज मौर्य (जिन्होंने अपने भाई को बचाने का प्रयास किया) के सिर पर लोहे की रॉड और लाठियों से कई घातक वार किए गए।

इसके साथ ही मीना देवी (महिला होने के बावजूद अपराधियों ने उन पर जरा भी रहम नहीं खाया और उन्हें गंभीर रूप से पीटकर मरणासन्न कर दिया), हीरालाल मौर्य, सोहनलाल मौर्य और आकाश मौर्य को भी बुरी तरह पीटा गया, जिससे वे सभी गंभीर रूप से घायल होकर जमीन पर गिर पड़े।

FIR की कॉपी

पूरे घर में खून बिखर गया और चीख-पुकार मच गई। जब ग्रामीणों की भीड़ जुटने लगी, तो आरोपित जान से मारने की धमकी देते हुए मौके से फरार हो गए। अपराधियों का यह कृत्य उनकी अत्यंत हिंसक और समाज-विरोधी मानसिकता को उजागर करता है।

अस्पताल में जिंदगी की जंग और धनराज मौर्य का दुःखद अंत

घटना के तुरंत बाद सभी घायलों को आनन-फानन में स्थानीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) ले जाया गया। प्राथमिक उपचार के बाद अन्य घायलों की स्थिति में थोड़ा सुधार हुआ, लेकिन धनराज मौर्य की हालत अत्यंत नाजुक बनी हुई थी। उनके सिर में गंभीर चोटें आई थीं और अंदरूनी रक्तस्राव हो रहा था। जिला अस्पताल के डॉक्टरों ने उनकी गंभीर स्थिति को देखते हुए उन्हें तत्काल लखनऊ के उच्च चिकित्सा संस्थान (ट्रॉमा सेंटर) के लिए रेफर कर दिया।

शनिवार (30 मई 2026) को लखनऊ में कई दिनों तक जिंदगी और मौत के बीच जूझने के बाद आखिरकार धनराज मौर्य ने दम तोड़ दिया। डॉक्टरों के तमाम प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। जैसे ही धनराज की मौत की खबर पिपराराम गाँव पहुँची, पूरे इलाके में शोक की लहर दौड़ गई और ग्रामीणों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। वहीं दूसरी ओर घायल महिला मीना देवी की स्थिति भी अभी पूरी तरह खतरे से बाहर नहीं है और उनका इलाज अस्पताल में जारी है। धनराज की मौत के बाद पुलिस को मजबूरन दर्ज प्राथमिकी में हत्या की संगीन धाराएँ बढ़ानी पड़ीं।

शव पहुँचते ही भड़का जन-आक्रोश, बस्ती-बलरामपुर मार्ग पर किया चक्काजाम

रविवार (31 मई 2026) सुबह जब धनराज मौर्य का शव पोस्टमार्टम के बाद एम्बुलेंस से पिपराराम गाँव पहुँचा, तो परिजनों के सब्र का बाँध टूट गया। मृतक के रोते-बिलखते बूढ़े माता-पिता, पत्नी और मासूम बच्चों को देखकर पूरे गाँव का कलेजा मुंह को आ गया। अपराधियों की इस घिनौनी हरकत के खिलाफ ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा। सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण और पीड़ित परिवार के सदस्य शव को लेकर बलरामपुर-बस्ती मार्ग पर उतर आए। उन्होंने मुख्य सड़क के बीचों-बीच शव को रखकर चक्काजाम कर दिया।

ग्रामीणों का साफ कहना था कि क्षेत्र में इन दबंगों का हौसला इतना बढ़ गया है कि अब लोग अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं हैं।

इस चक्काजाम के कारण उत्तर प्रदेश के इस व्यस्ततम मार्ग पर दोनों तरफ वाहनों की कई किलोमीटर लंबी कतारें लग गईं। भीषण गर्मी में यात्री परेशान होते रहे, लेकिन ग्रामीणों का रुख स्पष्ट था कि जब तक न्याय का ठोस और लिखित आश्वासन नहीं मिलता, तब तक अंतिम संस्कार नहीं किया जाएगा।

अपराधियों को जानिए, जिन्होंने दिनदहाड़े बहाया खून

पुलिस रिकॉर्ड और दर्ज एफआईआर के अनुसार, इस खूनी खेल में एक ही परिवार के कई लोग और उनके साथी शामिल थे। अब्बू वारिस अली ने अपने बेटों को सही रास्ता दिखाने के बजाय खुद इस जघन्य अपराध में उनका साथ दिया, जो यह साबित करता है कि पूरा परिवार ही आपराधिक मानसिकता से ग्रस्त है।

इस मामले में मुख्य आरोपित मोहम्मद आसिफ खान को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। उसके साथ ही आसिफ के अब्बू वारिस अली, उसके साथी साजिद खान, सलीम उर्फ सालिम अली, माजिद अली और आकिब को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। वहीं वाजिद नाम का अपराधी अब तक फरार है। पुलिस उसकी तलाश कर रही है।

FIR में दर्ज हत्यारोपितों के नाम

प्रशासनिक मुस्तैदी और राजनीतिक हस्तक्षेप से खुला जाम

मामले की संवेदनशीलता और दो अलग-अलग समुदायों से जुड़े होने के कारण जिला प्रशासन में हड़कंप मच गया था। किसी भी अप्रिय स्थिति या सांप्रदायिक तनाव को रोकने के लिए क्षेत्राधिकारी (सीओ) उतरौला राघवेंद्र प्रताप सिंह, उपजिलाधिकारी (एसडीएम) उतरौला मनोज कुमार सरोज, गैंड़ास बुजुर्ग के प्रभारी निरीक्षक राजीव कुमार मिश्र और उतरौला के प्रभारी निरीक्षक अवधेश राज सिंह भारी पुलिस बल और पीएसी (PAC) के साथ मौके पर पहुँचे।

अधिकारियों ने कई दौर की वार्ता की, ग्रामीणों को कानून का हवाला दिया और आश्वासन दिया कि किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन ग्रामीण इस बात पर अड़े थे कि पूर्व में भी ऐसी घटनाओं में ढीली कार्रवाई होती रही है, इसलिए उन्हें उच्च स्तरीय ठोस आश्वासन चाहिए।

जब प्रशासनिक स्तर पर गतिरोध नहीं टूटा, तो क्षेत्रीय भाजपा विधायक राम प्रताप वर्मा अपने सहयोगियों (विधानसभा संयोजक सुधीर श्रीवास्तव, चेयरमैन प्रतिनिधि अनूप चंद गुप्त, विकास गुप्त, महेंद्र प्रताप सिंह, आयुष जायसवाल और राम गोपाल चौधरी) के साथ प्रदर्शन स्थल पर पहुंचे।

विधायक राम प्रताप वर्मा ने सीधे पीड़ित परिवार के बीच बैठकर उनका दर्द साझा किया। उन्होंने तात्कालिक राहत के रूप में 2 लाख रुपये की आर्थिक सहायता की तत्काल घोषणा की। साथ ही उन्होंने वादा किया कि शासन स्तर (मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष) से अतिरिक्त वित्तीय मदद और परिवार के एक सदस्य के पुनर्वास के लिए वे स्वयं पैरवी करेंगे। उन्होंने पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया कि अपराधियों पर ऐसी कार्रवाई की जाए जो एक मिसाल बने।

विधायक के इस ठोस आश्वासन और कठोरतम कानूनी कार्रवाई के वादे के बाद, ग्रामीण और परिजन शांत हुए। करीब दो से तीन घंटे के बाद मार्ग से जाम हटाया गया और परिजन शव को अंतिम संस्कार के लिए ले जाने को राजी हुए। कड़ी सुरक्षा के बीच धनराज मौर्य का अंतिम संस्कार संपन्न कराया गया।

समाज में ऐसे अपराधियों के लिए कोई जगह नहीं

इस पूरे मामले में सीओ राघवेंद्र प्रताप सिंह ने मीडिया से बताया कि कुल 7 नामजद आरोपितों में से 6 को गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है और फरार वाजिद की गिरफ्तारी के लिए पुलिस की तीन विशेष टीमें लगातार दबिश दे रही हैं। पुलिस ने यह भी स्पष्ट किया है कि चार्जशीट दाखिल करने की प्रक्रिया को फास्ट-ट्रैक पर रखा जाएगा और आरोपितों पर गैंगस्टर एक्ट के तहत भी कार्रवाई की जाएगी।

जब ‘दरबारी’ ने गाँधी परिवार की क्षमताओं पर उठाए सवाल तो कॉन्ग्रेस के ‘चारण-भाट’ ने फटाफट कैंसिल किया रामचंद गुहा का ‘इतिहासकार’ वाला लाइसेंस, जानिए वे तथ्य जो हुए अपच

कॉन्ग्रेस के ‘दरबारी’ और कथित इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने हाल ही में लेख लिखा है। मूलरूप से ‘द टेलीग्राफ’ के लिए लिखे गए इस लेख को ‘स्क्रॉल’ ने भी छापा है। लेख में उन्होंने एक बड़ी बात कही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सत्ता को मजबूत करने में गाँधी परिवार का भी हाथ है। गुहा का कहना है कि ‘परिवारवाद’ के कारण राहुल गाँधी ने कभी कोई असली काम नहीं किया, इसके चलते लगातार कॉन्ग्रेस के विधायक घटते गए। गुहा ने कहा कि इसके बावजूद राहुल गाँधी जमीनी स्तर पर पार्टी को मजबूत करने या शासन की विफलताओं पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय प्रधानमंत्री पर व्यक्तिगत रूप से हमला करते रहे।

स्क्रॉल ने इस लेख को “गाँधी परिवार ने मोदी को सत्ता मजबूत करने में कैसे मदद की” शीर्षक से छापा है। वहीं ‘द टेलीग्राफ’ ने इसे “मोदी के समर्थक” नाम दिया है। इस लेख में प्रियंका गाँधी के वायनाड से चुनाव लड़ने को गुहा ने गलत फैसला बताया गया। संविधान की 75वीं वर्षगाँठ पर प्रियंका को मुख्य वक्ता बनाने को भी गुहा ने अजीब बताया क्योंकि उनकी दादी इंदिरा गाँधी ने ही आपातकाल लगातकर संविधान को नुकसान पहुँचाया था।

गुहा ने पीएम मोदी को का मानना है कि इसमें कोई शक नहीं है कि मई 2014 से ‘गणतंत्र के पतन’ के मुख्य सूत्रधार नरेंद्र मोदी, अमित शाह और उनकी पार्टी भाजपा है। गुहा ने साथ में यह भी कहा कि इसमें गाँधी परिवार ने जाने-अनजाने उनकी मदद ही की है। वे 2029 की भविष्यवाणी करते हुए कहते हैं कि पीएम मोदी की अजेय छवि टूट सकती है लेकिन साथ में यह भी कहा कि उस वक्त जो नेता इस नाराजगी को राजनीतिक चुनौती में बदलेंगे, वो राहुल या प्रियंका गाँधी नहीं होंगे।

गुहा जो कह रहे हैं वो न तो भाजपा की तारीफ है न ही कोई एकतरफा बात। वो मानते हैं कि भाजपा की सत्ता को आगे बढ़ाने मोदी फैक्टर है और शाह की रणनीति है। साथ में तथ्यों के साथ में इसका श्रेय कॉन्ग्रेस को देने के पीछे भी वजह सामने रखी। यानी गुहा ने जो कहा वो तथ्यात्मक रूप से गलत नहीं है, बस कॉन्ग्रेसी इसे पचा नहीं पा रहे हैं। और जैसे ही उन्होंने गाँधी परिवार की आलोचना की, कॉन्ग्रेस समर्थक उनके इतिहासकार होने पर ही सवाल उठाने लगे।

रामचंद्र गुहा के लेख से कॉन्ग्रेसियों को लगी मिर्ची

कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम ने रामचंद्र गुहा के इस लेख की खूब आलोचना की। कॉन्ग्रेसी रामचंद्र गुहा के ‘इतिहासकार’ वाला लाइसेंस रद्द करने में जुट गए। किसी ने लेख को ‘बौद्धिक बेईमानी’ बताया और कहा कि यह विश्लेषण भाजपा के लिए ही काम करता है। किसी ने सीधा सवाल पूछा कि दूसरों को दोष देने से पहले बताइए कि आपने खुद मोदी को कमजोर करने के लिए क्या किया? एक ने तो गुहा को सीधे ‘फ्रॉड’ तक बुला दिया।

पेशे से पत्रकार और कॉन्ग्रेस के चाटूकार औनिंद्यो चक्रवर्ती ने कहा कि गुहा हमेशा से मोदी सरकार के आलोचक रहे हैं, इसलिए गाँधी परिवार की आलोचना करने से वो भाजपा समर्थक नहीं हो जाते। साथ में गुहा पर सवाल उठाया कि सिर्फ आर्काइव किताबें लिखने से कोई इतिहासकार नहीं बन जाता।

राजेश ग्रीगलानी, जो खुद कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता हैं, उन्होंने गुहा के लेख को ‘बौद्धिक बेईमानी’ बताया। उन्होंनेराहुल गाँधी की तरफ लेते हुए कहा कि संसद में अडानी, NEET और संस्थाओं पर कब्जे जैसे मुद्दे लगातार उठा रहे हैं और 2024 में भाजपा का बहुमत तोड़ना उनकी रणनीति का नतीजा है। वो कहते हैं कि गुहा का ‘दोनों तरफ गलती है’ वाला रुख खतरनाक है और यह विपक्षी कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ता है।

शिवानी वर्मा ने तंज कसा कि गुहा सालों से राहुल गाँधी पर कॉलम पर कॉलम लिखते आ रहे हैं, अगर राहुल इतने ही अप्रासंगिक हैं तो वो उनके बारे में लिखना बंद क्यों नहीं कर पाते। वो नाम चॉमस्की का हवाला देते हुए कहती हैं कि सबसे खतरनाक बुद्धिजीवी वो होता है जो बिना पैसे लिए भी बारीक विश्लेषण के जरिए सत्ता के लिए सुविधाजनक निष्कर्ष पर पहुँचता है।

कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम से जुड़ा ‘एक्स’ हैंडल Rofl Democrazy का कहना है कि गुहा ने जानबूझकर यह नजरअंदाज किया कि मुसलमानों के खिलाफ नफरत में अँधे हो चुके बहुसंख्यक वोटरों ने मोदी को मजबूत किया है। वो राहुल को अकेला लड़ने वाला बताते हैं और कहते हैं कि उदारवादियों पर भरोसा नहीं करना चाहिए।

सौरभ ने गुहा से सीधा सवाल पूछा कि चलो मान लिया गाँधी परिवार ने मोदी को मजबूत किया, लेकिन आपने मोदी को कमजोर करने के लिए क्या किया? भाजपा जब नेहरू-गाँधी पर झूठ फैला रही थी तब इतिहासकार के तौर पर आप कहाँ थे?

जवाहरलाल नेहूर के करीबी वीके कृष्ण मेनन के पैरॉडी ‘एक्स’ अकाउंट ने गुहा को ‘फ्रॉड’ करार दिया और कहा कि एक सच्चे इतिहासकार को राजनीतिक टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। आगे कहा कि गाँधी परिवार को नीचा दिखाने के लिए गुहा ने नेहरू के बारे में भाजपा के झूठ को भी आगे बढ़ाया है।

कैसे रामचंद्र गुहा ने कॉन्ग्रेस को बताया ‘पारिवारिक फर्म’?

गुहा लिखते हैं कि भारत जोड़ो यात्रा के बाद लगा था कि कॉन्ग्रेस बदल रही है, लेकिन 2024 के चुनाव खत्म होते ही पार्टी फिर ‘पारिवारिक फर्म’ बन गई। राहुल के वायनाड छोड़ते ही वहाँ प्रियंका गाँधी को बिठा दिया गया और दावा किया गया कि राहुल उत्तर भारत और प्रियंका दक्षिण का प्रतिनिधित्व करती हैं। गुहा यह भी आपत्ति जताते हैं कि संविधान की 75वीं वर्षगाँठ पर कॉन्ग्रेस ने प्रियंका को मुख्य वक्ता बनाया, जबकि उनकी दादी इंदिरा गाँधी ने ही आपातकाल लगाकार उसी संविधान को सबसे बड़ा नुकसान पहुँचाया था।

(स्क्रीनशॉट साभार: The Telegraph)

गुहा आँकड़े देते हुए बताते हैं कि 2008 से जब से राहुल ने कमान संभाली है तब से देशभर में कॉन्ग्रेस के विधायकों की संख्या 1,204 से घटकर 676 रह गई है। प्रियंका के बारे में भी गुहा लिखते हैं कि 2022 यूपी विधानसभा चुनाव में उनकी अगुवाई में कॉन्ग्रेस को महज 2.27% वोट मिले। फिर भी 99 सीटें आते ही चापलूसों और दिल्ली के कुछ हिंदू-विरोधी पत्रकारों ने राहुल को ‘भविष्य का प्रधानमंत्री’ घोषित कर दिया, नतीजा यह हुआ कि आज कॉन्ग्रेस ज्यादातर हिस्सों में धीरे-धीरे जमीन खो रही है जबकि गुजरात, मध्य प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों में भाजपा ‘शासन की स्वाभाविक पार्टी’ बन चुकी है।

(स्क्रीनशॉट साभार: The Telegraph)

राहुल में क्या कमी देखते हैं गुहा?

गुहा लिखते हैं कि राहुल गाँधी व्यक्तिगत रूप से अच्छे इंसान हैं लेकिन 55 साल की उम्र में भी वो अपनी माँ सोनिया गाँधी की इच्छा के साधन हैं। उन्होंने UPA के 10 साल में मंत्री बनने से मना कर दिया, कभी कोई असली काम नहीं किया तो फिर इतने बड़े और विविध देश के प्रधानमंत्री के तौर पर भरोसा कैसे बनेगा।

गुहा यह भी लिखते हैं कि राहुल किसी मुद्दे पर टिककर काम नहीं करते, कभी चुनाव आयोग के पक्षपात पर प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे तो अगले ही दिन यूरोप या लैटिन अमेरिका की यात्रा पर निकल जाएँगे। सिर्फ भारत जोड़ो यात्रा के कुछ महीनों में ही उन्होंने भाजपा नेताओं जैसा फोकस्ड काम दिखाया, बाकी उनकी राजनीति ज्यादातर ट्विटर (एक्स) तक सिमटी रहती है जो 24 घंटे में भुला दी जाती है।

गुहा आगे लिखते हैं कि 2019 में ‘चौकीदार चोर है’ वाला अभियान बुरी तरह फेल हुआ, लेकिन राहुल ने उससे कोई सबक नहीं लिया और आज भी मोदी पर निजी हमले जारी हैं। गुहा यह भी लिखते हैं कि मोदी, शाह और भाजपा गणतंत्र के मुख्य दुश्मन हैं, लेकिन गांधी परिवार जाने-अनजाने उनका साथ देने वाला बन गया है।

अंत में गुहा हंगरी का उदाहरण देते हैं जहाँ एक बिल्कुल नए और साफ चेहरे ने गाँव-गाँव घूमकर वहाँ के ताकतवर नेता को चुनौती दी और साफ तौर पर कहते हैं कि 2029 में जब मोदी के खिलाफ नाराजगी राजनीतिक चुनौती बनेगी, तो उसे आगे ले जाने वाला नेता राहुल या प्रियंका गाँधी नहीं होंगे।

कौन है रामचंद्र गुहा और उनसे जुड़े विवाद?

रामचंद्र गुहा का जन्म 1958 में देहरादून में हुआ। दून स्कूल से प्रारंभिक पढ़ाई पूरी करने के बाद दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से अर्थशास्त्र में डिग्री ली। फिर समाजशास्त्र में डॉक्टरेट किया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, गुहा येल, स्टैनफोर्ड और कैलिफोर्निया के विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर रहे हैं। महात्मा गाँधी की जीवनी और भारत के इतिहास पर कई किताबें भी लिखी हैं। खुद को इतिहासकार कहते हैं, हालाँकि इतिहास में उनका कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं है। वामपंथी मीडिया द टेलीग्राफ, द वायर जैसे पोर्टल में नियमित कॉलम लिखते हैं।

लेकिन इनका एक और चेहरा भी है। साल 2018 की बात करें जब गुहा गोवा गए और वहाँ से एक ट्वीट किया। लिखा कि ‘चूँकि यह भाजपा शासित राज्य है, इसीलिए मैंने बीफ खाकर जश्न मनाया’ यानी खाने को भी राजनीति बना दिया। जब बवाल मचा तो माफी माँग ली और कहा कि ट्वीट गैरजरूरी था। लेकिन मकसद साफ था, किसी भी बहाने भाजपा को घेरना।

फिर 2019 में देश में CAA के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे थे। गुहा बेंगलुरु की सड़कों पर उतर आए, प्रदर्शन में शामिल हुए और हिरासत में लिए गए। यानी सिर्फ लिखना नहीं, सड़क पर भी उतरते हैं, जब मुद्दा मोदी सरकार के खिलाफ हो।

फिर एक विवाद और। इन्होंने ट्वीट किया, “गुजरात के पास सिर्फ पैसा है, संस्कृति नहीं। बंगाल के पास संस्कृति है।” तब बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार थी। यानी प्रधानमंत्री के गृह राज्य की संस्कृति पर सीधा हमला किया गया। इस पर भी लताड़े गए और जवाब मिला कि गरबा, सोमनाथ, नरसिंह मेहता, सरदार पटेल, महात्मा गाँधी, ये सब गुजरात की संस्कृति नहीं है तो क्या है?

2022 में गुजरात दंगों की 20वीं बरसी पर स्क्रॉल के लिए एक लेख लिखा। इसमें 2002 के दंगों को ‘Pogrom’ यानी एक समुदाय के खिलाफ सुनियोजित हमला बताया। लेकिन उसी लेख में गोधरा में जिंदा जलाए गए 59 कारसेवकों का जिक्र तक नहीं था। और इसके साथ ही कॉन्ग्रेस की तारीफ करते हुए लिखा कि मोदी ने गुजरात दंगों पर माफी नहीं माँगी, यह जानते हुए भी कि नानावती आयोग मोदी को क्लीन चिट दे चुका था।

और केदारनाथ में जब पीएम मोदी ने आदि शंकराचार्य की प्रतिमा का अनावरण किया तो उस पर भी आपत्ति जताने वालों में गुहा शामिल थे।

तो यह है असली तस्वीर। हिंदू आस्था हो, भाजपा शासित राज्य हो, मोदी सरकार का कोई भी फैसला हो, गुहा निशाना साधने का कोई मौका नहीं छोड़ते। और बीच-बीच में कॉन्ग्रेस पर भी कुछ लिख देते हैं ताकि निष्पक्ष दिखें। अब जब इन्होंने गाँधी परिवार की आलोचना की है तो वही कॉन्ग्रेस इनके इतिहासकार होने पर सवाल उठा रही है। यानी जब तक काम का था, बुद्धिजीवी थे। जैसे ही गाँधी परिवार पर लिखा, फ्रॉड हो गए।

देशभर से गिरफ्तार हुए 9 आतंकी, चर्चा में आया मुन्ना झिंगाड़ा: जानिए डी कंपनी से उसका क्या है कनेक्शन, पाकिस्तान से कैसे रची जा रही भारत विरोधी साजिशें

कभी मुंबई अंडरवर्ल्ड का सबसे खतरनाक शार्पशूटर और दाऊद इब्राहिम के सबसे करीबियों में एक मुन्ना झिंगाडा एक बार फिर एक्टिव है। ISI और दाऊद इब्राहिम की आतंकी साजिश में मुन्ना झिंगाडा का नाम आने के बाद भारतीय सुरक्षा एजेंसियाँ ​​अलर्ट हो गई हैं। हाल ही में 9 आतंकवादियों की गिरफ्तारी के बाद से वह एक बार फिर चर्चा में है। वह पाकिस्तान में बैठकर भारत में आईएसआई के आतंकी हमलों के नेटवर्क को हैंडल कर रहा था।

झिंगाड़ा के मॉड्यूल का पता चलते ही ये बात भी सामने आ गई है कि दाऊद इब्राहिम के आपराधिक गिरोह और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के बीच पुराना गठजोड़ एक बार फिर भारत के खिलाफ साजिश रच रहा है। लंबे समय से चले आ रहे इस गठजोड़ ने ही मुंबई समेत देश के कई हिस्सों को दहलाया था। अधिकारियों ने कहा कि यह दाऊद इब्राहिम द्वारा सिकुड़ते डी-कंपनी नेटवर्क में अपनी प्रासंगिकता को पुनः स्थापित करने के प्रयासों का संकेत देता है।

मुंबई के जोगेश्वरी की गलियों से शुरू हुआ मुन्ना का सफर अब पाकिस्तान से भारत पर हमला करने के मंसूबे तक पहुँच गया है।

कौन है मुन्ना झिंगाड़ा?

मुन्ना झिंगाडा उर्फ सैयद मुदस्सर हुसैन उर्फ सैयद मुजक्किर हुसैन अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम और उसकी डी-कंपनी का एक कुख्यात शार्प शूटर है। वह मुंबई के जोगेश्वरी का रहने वाला है। 90 के दशक में वह दाऊद इब्राहिम और छोटा शकील के गैंग में एक खतरनाक शूटर के तौर पर जाना जाता था। दाऊद को उसके अचूक निशाने पर इतना भरोसा था कि गैंग के सबसे मुश्किल काम भी मुन्ना को सौंपे जाते थे। उसपर मर्डर, एक्सटॉर्शन और गैंग वॉर से जुड़े 70 से ज्यादा केस दर्ज हैं।

झिंगाड़ा का आपराधिक इतिहास दाऊद इब्राहिम और उसके पूर्व सहयोगी छोटा राजन के बीच हुए गैंगवार से भी जुड़ा हुआ है।

थाईलैंड में छोटा राजन पर हमला किया

2000 में बैंकॉक में छोटा राजन की हत्या करने की कोशिश की गई थी। उस वक्त झिंगाड़ा काफी सुर्खियों में आया था। दाऊद के खासमखास छोटा शकील के निर्देशों पर कार्रवाई करते हुए झिंगाड़ा अपने गिरोह के कुछ शूटरों के साथ थाईलैंड गया और राजन पर जानलेवा हमला किया। राजन बुरी तरह घायल हुआ, लेकिन उसकी जान बच गई, लेकिन उसका करीबी रोहित वर्मा इस हमले में मारा गया।

इस हमले के कारण छोटा राजन को लगभग दो साल तक छिपकर रहना पड़ा। इस दौरान अंडरवर्ल्ड के गुटों के बीच काफी खूनखराबा हुआ।

थाईलेंड में झिंगाड़ा को वहाँ की पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और रोहित वर्मा की हत्या के आरोप में उसे 10 साल जेल की सजा सुनाई। जब थाई पुलिस ने मुन्ना झिंगाड़ा को गिरफ्तार किया, तो उसके पास से ‘मोहम्मद सलीम’ के नाम का एक पाकिस्तानी पासपोर्ट भी मिला था।

इसके बाद उसकी राष्ट्रीयता और निर्वासन को लेकर लगभग दो दशकों तक भारत और पाकिस्तान के बीच थाईलेंड की कोर्ट में लड़ाई चली। झिंगाड़ा ने मोहम्मद सलीम नाम से पाकिस्तानी पासपोर्ट पर थाईलैंड में प्रवेश किया था, इसलिए पाकिस्तान का दावा था कि वह पाकिस्तानी नागरिक है, जबकि भारत का कहना था कि वह मुंबई के जोगेश्वरी में पैदा हुआ भारतीय नागरिक है।

हालाँकि थाई कोर्ट ने शुरू में भारत के प्रत्यर्पण करने की माँग के पक्ष में फैसला सुनाया था, लेकिन बाद में कानूनी कार्यवाही के बाद 2019 में थाईलैंड ने झिंगाडा को पाकिस्तान को सौंप दिया। इससे झिंगाड़ा को भारत लाने के प्रयासों को बड़ा झटका लगा।

कराची से नए हमले की प्लानिंग बना रहा झिंगाड़ा

2019 में बैंकॉक जेल से रिहा होने के बाद आईएसआई मुन्ना को सीधे कराची ले गई। वहाँ पहुँच कर वह फिर से दाऊद के नेटवर्क में शामिल हो गया। दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए 9 आतंकवादियों की जांच में यह बात सामने आई है कि मुन्ना झिंगाडा अब पाकिस्तान में बैठकर भारत विरोधी गतिविधियों को कोऑर्डिनेट कर रहा है। मुन्ना और उसके साथियों को दिल्ली, मुंबई और दूसरे बड़े शहरों में हमला करने का काम सौंपा है।

मुंबई धमाकों के बाद दाऊद गैंग जिस तरह से आतंकी कार्रवाईयों को अंजाम देता रहा है, उसमें मुन्ना झिंगाडा का रोल अहम है। सिर्फ गैंगस्टर के तौर पर जाना जाने वाला मुन्ना अब ISI के कहने पर सीधे आतंकवादी मॉड्यूल संभाल रहा है। मुन्ना झिंगाडा नाम एक बार फिर भारत की सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है, सुरक्षा एजेंसियां ​​अब उसके नेटवर्क की जाँच कर रही हैं।

9 आतंकियों की हुई थी गिरफ्तारी

जिन 9 आतंकियों को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया है। उससे पूछताछ और प्रारंभिक जाँच में सामने आया है कि ये लोग देश की राजधानी समेत अन्य प्रमुख शहरों में संवेदनशील ठिकानों को निशाना बनाने की तैयारी कर रहे थे। स्पेशल सेल के अनुसार, गिरफ्तार आरोपितों के संपर्क विदेशी हैंडलरों से थे, जो उन्हें एन्क्रिप्टेड ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया के माध्यम से निर्देश दे रहे थे।

जाँच एजेंसियों का कहना है कि गिरफ्तार आतंकियों को महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की रेकी करने, स्थानीय स्तर पर नेटवर्क तैयार करने और संभावित हमलों की योजना बनाने का जिम्मा सौंपा गया था।

पुलिस ने आरोपितों के कब्जे से हथियारों, ग्रेनेड और विस्फोटक सामग्री का बड़ा जखीरा बरामद किया है। बरामद सामग्री की जाँच की जा रही है, ताकि उसके स्रोत और संभावित उपयोग का पता लगाया जा सके। जाँच में यह भी सामने आया है कि आरोपित देश के रणनीतिक महत्व वाले स्थानों, जैसे ऊर्जा प्रतिष्ठान, हवाई अड्डे और रेलवे स्टेशन को निशाना बना सकते थे।

दिल्ली पुलिस का कहना है कि हाल के वर्षों में विदेशों में बैठे आतंकी संचालक भारत में भर्ती, कट्टरपंथी फैलाने और स्लीपर सेल सक्रिय करने के लिए डिजिटल माध्यमों का अधिक उपयोग कर रहे हैं।

गाँव की बिजली काटकर इस्लामी भीड़ ने हिंदू परिवारों पर किया हमला, पुलिस पर भी पत्थर बरसाए: गुजरात के कच्छ का मामला, 23 के खिलाफ FIR

गुजरात के कच्छ जिले के माधापार पुलिस स्टेशन के रायधनपार गाँव में पड़ोसी गाँव के कुछ लोगों ने मामूली कहासुनी के बाद हिंदू समुदाय के लोगों पर हमला कर दिया। यह घटना 30 मई 2026 की रात को हुई। शिकायत के मुताबिक, हमलावरों ने पहले गाँव की बिजली बंद कर दी और फिर पहले से प्लान बनाकर हमला किया। इस हिंसा में कई हिंदू युवक और पुलिसवाले घायल हो गए।

स्थानीय हिंदू युवक दर्शन बरडिया की शिकायत के आधार पर माधापार पुलिस ने 23 नामजद लोगों और कई अज्ञात लोगों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं के तहत FIR दर्ज की है।

क्या है मामला

FIR और शिकायतकर्ता दर्शन बरडिया ने ऑपइंडिया को बताया कि घटना 30 मई की रात करीब 10:30 बजे शुरू हुई, जब वह और उसके दोस्त गाँव के बाहरी इलाके में बैठे थे। पड़ोस के वरनोरा गाँव के मुस्लिम युवकों का एक ग्रुप उनके गाँव पहुँचे। इनमें सलीम, अबू सुफियान, साहिल, अब्बास, समीर और अन्य शामिल थे। उन्होंने गाली-गलौज देते हुए धमकी की और कहा, “तुम हमें क्यों घूर रहे हो? अगर तुमने दोबारा देखा, तो हम तुम्हें पीटेंगे।”

यह बहस जल्द ही हाथापाई में बदल गई। इस दौरान, रजाक सिद्दीकी नाम का एक आदमी बोलेरो पिकअप गाड़ी में आया और हिंदू युवकों के साथ लड़ाई में शामिल हो गया। फिर वह चला गया। वह यह दिखाने की कोशिश कर रहा था कि मामला खत्म हो गया है। हालाँकि यह एक बड़ी घटना की शुरुआत थी।

जब गाँव वाले झड़प के जवाब में इकट्ठा हुए, तो रजाक फिरोज रजक मेमन, शोएब सिद्दीकी मोखा, अमन करीम मेमन, अकरम जुसब मेमन, माजिद इब्राहिम केवरा और दूसरे लोगों के साथ वापस आ गया। बताया जाता है कि उन्होंने इकट्ठा हुए गाँव वालों की तरफ तेज रफ्तार में बोलेरो चलाई, ताकि उन्हें कुचल सकें। हालाँकि गाँव वाले किसी तरह हट गए, लेकिन गाड़ी एक खड़ी मोटरसाइकिल से टकरा गई। FIR में इसे हत्या की कोशिश के तौर पर दर्ज किया गया है।

मुस्लिम युवकों ने हथियारों से हमला किया

इस दौरान आरोपितों ने और लोगों को बुलाया। जल्द ही वर्नोरा गाँव से बड़ी संख्या में मुस्लिम मोटरसाइकिल और दूसरी गाड़ियों पर लाठी, पाइप, पत्थर और दूसरे हथियारों से लैस होकर आ गए। हनीफ, उमर, रेहान, दाऊद, एजाज, आफताब, अल्ताफ और दूसरे लोगों को लेकर एक और बोलेरो भी मौके पर पहुँच गई।

शिकायत के मुताबिक, भीड़ ने पहले बिजली के खंभे पर तारों से छेड़छाड़ करके पूरे गाँव की बिजली काट दी। फिर उन्होंने गांव के एंट्री गेट पर जमा हिंदू गाँववालों और रिहायशी इलाकों के घरों पर पत्थर फेंकना शुरू कर दिया। पत्थरबाजी से दहशत फैल गई, जिससे कई लोगों को अपने घरों के अंदर छिपना पड़ा।

दर्शन बरदिया और राजेश चावड़ा समेत कई हिंदू नौजवान घायल हो गए। राजेश चावड़ा की बाईं आँख के पास गंभीर चोटें आई। कम से कम एक नौजवान गंभीर रूप से घायल हो गया, जबकि तीन से चार अन्य को मामूली चोटें आईं। इतना ही नहीं, पुलिस की गाड़ियों पर भी हमला किया गया।

जब माधापार पुलिस स्टेशन और लोकल क्राइम ब्रांच (LCB) की पुलिस टीमें मौके पर पहुंची, तो भीड़ ने उनकी गाड़ियों को भी निशाना बनाया। पथराव में एक LCB गाड़ी समेत दो से तीन पुलिस गाड़ियाँ डैमेज हो गईं। एक पुलिसवाला भी घायल हो गया।

हिंदू संगठन ने सोची समझी साजिश करार दिया

हिंदू युवा संगठन के नेता रघुवीर सिंह जडेजा ने इस हमले को ‘जिहादी सोच’ का परिणाम बताया। उन्होंने कहा कि इसके लिए पहले से योजनाबद्ध तरीके से साज़श रची गई। ऑपइंडिया से बात करते हुए, उन्होंने दावा किया कि ऐसा बहुत कम होता है कि किसी पूरे हिंदू गाँव को इस तरह से टारगेट किया जाए और हमले से पहले बिजली और CCTV कथित तौर पर बंद कर दिए गए हों।

उन्होंने कहा कि साजिश के तहत भीड़ हथियारों से लैस होकर आई थी। वे चेन लेकर आए थे जिन्हें उन्होंने बिजली के खंभों पर तारों पर लगाकर शॉर्ट सर्किट करके पूरे गाँव की बिजली बंद कर दी थी। रघुवीर सिंह ने आगे कहा कि देश के दूसरे हिस्सों में हिंदू समुदाय को भी इस घटना से सीखना होगा। उन्होंने कहा कि जिला पुलिस प्रमुख की मौजूदगी में मुस्लिम भीड़ ने पथराव किया, जिसमें एक पुलिसकर्मी भी घायल हो गया।

उन्होंने वर्नोरा गाँव की तलाशी लेने की माँग की। इसे ‘जिहादी का केंद्र’ कहा और इलाके से गोहत्या और गैर-कानूनी बीफ के व्यापार के पिछले मामलों का हवाला दिया। उन्होंने मुस्लिम बहुल गाँव की पूरी जाँच की माँग की है।

पुलिस ने की कार्रवाई

कच्छ पश्चिम के पुलिस अधीक्षक विकास सुंडा ने कहा कि पुलिस ने तेजी से कार्रवाई की और उसी रात लगभग 23 लोगों को हिरासत में लिया। 23 नामजद आरोपितों और 5-7 अज्ञात लोगों के खिलाफ BNS की संबंधित धाराओं, 109(1), 115(2), 118(1), 125(F), 125(B), 189(2), 190, 191(2), 191(3), 351(3), 296(B), और गुजरात पुलिस एक्ट की धारा 135 के तहत FIR दर्ज की गई है। आरोपों में हत्या की कोशिश, गैर-कानूनी तरीके से जमा होना, जानलेवा हथियारों के साथ दंगा करना और लापरवाही से गाड़ी चलाकर जान को खतरे में डालना शामिल है।

नामजद आरोपियों में जिनके नाम हैं, उनमें सलीम ममद मोखा, अबू सुफियान मोखा, साहिल सिद्दीकी मोखा, अब्बास ममद मोखा, समीर अब्दुल मेमन, रजाक सिद्दीकी मेर, फिरोज रजाक मेमन, शोएब सिद्दीकी मोखा, अमन करीम मेमन, अकरम जुसब मेमन, मजीद इब्राहिम केवरा, हनीफ रमजू केवरा, हनीफ अजीज मेमन, उमर अजीज मेमन, रेहान हनीफ खलीफा, इब्राहिम ममद मेमन, दाऊद इब्राहिम केवरा, एजाज उमर मेर, समीर अजीज मेमन, आफताब हनीफ केवरा, आजाद ममद केवरा, अल्ताफ लतीफ केवरा, और ममद लाखा मोखा शामिल हैं।

पुलिस ने वरनोरा गाँव में गैर-कानूनी बिजली कनेक्शन के खिलाफ भी कार्रवाई शुरू की है। इलाके में गैर-कानूनी कंस्ट्रक्शन के खिलाफ जल्द ही बुलडोजर एक्शन देखने में आ सकता है। इलाके में अभी हालात काबू में हैं और भारी पुलिस बल तैनात है। पूरे मामले की जाँच जारी है।

(ये खबर मूल रूप से गुजराती में बनी है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)