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जूडो में पहली बार गोल्ड, बॉक्सिंग में रिकॉर्ड 7 स्वर्ण और पैरा खिलाड़ियों का धमाका: ग्लासगो में भारत के 39 पदकों की पूरी कहानी

कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत ने शानदार प्रदर्शन के साथ अपना अभियान समाप्त किया। स्कॉटलैंड के ग्लासगो में आयोजित इन खेलों में भारतीय खिलाड़ियों ने कई प्रतियोगिताओं में बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए कुल 39 पदक अपने नाम किए।

एथलेटिक्स, मुक्केबाजी, पैरा स्पोर्ट्स और जूडो समेत कई खेलों में भारत के प्रदर्शन ने यह साबित किया कि देश विभिन्न खेलों में धीरे-धीरे लेकिन लगातार प्रगति कर रहा है।

मेडल टैली में भारत चौथे स्थान पर रहा। भारतीय दल ने कुल 13 स्वर्ण, 17 रजत और 9 कांस्य पदक जीते। प्रतियोगिता के नौवें दिन भारत के खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए अकेले 16 पदक जीते, जिनमें 8 स्वर्ण पदक शामिल थे। इसी दमदार प्रदर्शन की बदौलत भारत ने पदक तालिका में 10वें स्थान से छलांग लगाकर चौथा स्थान हासिल किया।

(फोटो साभार: Chatgpt)

वेटलिफ्टिंग

कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत का पहला स्वर्ण पदक वेटलिफ्टिंग से आया। मीराबाई चानू ने महिलाओं के 48 किलोग्राम वर्ग में लगातार तीसरी बार कॉमनवेल्थ गेम्स का स्वर्ण पदक जीता। उन्होंने कुल 190 किलोग्राम (85 किलोग्राम स्नैच और 105 किलोग्राम क्लीन एंड जर्क) वजन उठाकर गेम्स रिकॉर्ड भी बनाया।

पुरुषों के 60 किलोग्राम वर्ग में ऋषिकांता सिंह ने रजत पदक जीता, जबकि पुरुषों के +110 किलोग्राम वर्ग में लवप्रीत सिंह ने भी रजत पदक हासिल किया।

इसके अलावा वल्लूरी अजय बाबू ने पुरुषों के 79 किलोग्राम वर्ग में रजत पदक जीता। महिलाओं के 53 किलोग्राम वर्ग में ज्ञानेश्वरी यादव ने रजत पदक और महिलाओं के 58 किलोग्राम वर्ग में बिंद्यारानी देवी ने कांस्य पदक अपने नाम किया। इस तरह भारतीय वेटलिफ्टिंग दल ने कुल 8 पदक जीते।

मुक्केबाजी

कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय मुक्केबाजों ने सभी वर्गों में सबसे ज्यादा स्वर्ण पदक जीतकर शानदार प्रदर्शन किया। भारत ने मुक्केबाजी में कुल 10 पदक जीते, जिनमें 7 स्वर्ण और 3 रजत पदक शामिल रहे। यह कॉमनवेल्थ गेम्स के एक ही संस्करण में किसी भी देश का सबसे सफल मुक्केबाजी प्रदर्शन रहा।

साक्षी चौधरी (महिला 51 Kg), प्रीति (महिला 54 Kg), जैस्मीन लांबोरिया (महिला 57 Kg), प्रिया (महिला 60 Kg), अरुंधति चौधरी (महिला 70 Kg), सचिन सिवाच (पुरुष 60 Kg) और अंकुश पंघाल (पुरुष 80 Kg) ने अपने-अपने वर्ग में स्वर्ण पदक जीते। वहीं जादूमणि सिंह (पुरुष 55 Kg), लवलीना बोरगोहेन (महिला 75 Kg) और नरेंद्र बड़वाल (पुरुष 90+ Kg) ने रजत पदक हासिल किए।

पैरा स्पोर्ट्स

कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 के लिए भारत ने 28 सदस्यीय पैरा स्पोर्ट्स दल भेजा था। इस दल ने 3 स्वर्ण, 2 रजत और 2 कांस्य सहित कुल 7 पदक जीतकर अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। वर्ष 2022 में कॉमनवेल्थ गेम्स में पैरा स्पोर्ट्स की शुरुआत के बाद यह इस स्पर्धा में भारत का सबसे सफल प्रदर्शन रहा।

खास बात यह है कि पिछले सभी कॉमनवेल्थ गेम्स संस्करणों में भारत ने कुल मिलाकर जितने 7 पदक जीते थे, उतने ही पदक उसने इस बार अकेले जीत लिए।

पैरा खिलाड़ियों का यह प्रदर्शन भारत के पैरा स्पोर्ट्स के लिए एक महत्वपूर्ण और अभूतपूर्व क्षण रहा। दिलीप गावित (पुरुष 100 मीटर T47), शर्मिला धनखड़ (महिला शॉट पुट F57) और सोमन राणा (पुरुष शॉट पुट F57) ने स्वर्ण पदक जीते। वहीं शुभम जुयाल (पुरुष शॉट पुट F57) और मोहम्मद बासिल (पुरुष 100 मीटर T47) ने रजत पदक अपने नाम किए।

इसके अलावा शिल्पा के शायला (महिला शॉट पुट F57) और झंडू कुमार (पैरा पावरलिफ्टिंग) ने एक-एक कांस्य पदक जीता।

जूडो

कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय जूडो खिलाड़ियों ने इतिहास रचते हुए 2 स्वर्ण पदक जीते। अस्मिता डे ने महिलाओं के 48 किलोग्राम वर्ग में स्वर्ण पदक जीतकर कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय जूडोका बनने का गौरव हासिल किया। इसके बाद हर्ष सिंह ने पुरुषों के 60 किलोग्राम वर्ग में स्वर्ण पदक जीता।

इसके अलावा यामिनी मौर्य ने महिलाओं के 57 किलोग्राम वर्ग में रजत पदक जीता, जबकि उन्नति शर्मा ने महिलाओं के 63 किलोग्राम वर्ग में कांस्य पदक हासिल किया।

एथलेटिक्स और अन्य स्पर्धाएँ

कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 के लिए भारत ने 32 सदस्यीय एथलेटिक्स टीम भेजी थी, जिसमें 22 पुरुष और 10 महिला खिलाड़ी शामिल थे। इसके अलावा 11 सदस्यीय पैरा एथलेटिक्स दल ने भी प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। भारतीय एथलीटों ने कई शानदार प्रदर्शन किए, जिसने खेलों में भारत की लगातार बढ़ती प्रगति को दर्शाया।

ओलंपिक और विश्व चैंपियन नीरज चोपड़ा ने पुरुषों की भाला फेंक स्पर्धा में रजत पदक जीता, जबकि पदार्पण कर रहे यशवीर सिंह ने कांस्य पदक अपने नाम किया। सर्वेश कुशारे ने 2.25 मीटर की छलांग लगाकर पुरुषों की हाई जंप स्पर्धा में रजत पदक जीता और इस स्पर्धा में भारत का पहला कॉमनवेल्थ गेम्स रजत पदक दिलाया।

ट्रैक एंड फील्ड में लंबी दूरी के धावक और एशियाई चैंपियन गुलवीर सिंह ने 10,000 मीटर में रजत पदक जीतने के बाद 5,000 मीटर दौड़ में कांस्य पदक भी हासिल किया। इसके साथ ही वह कॉमनवेल्थ गेम्स के एक ही संस्करण में ट्रैक एंड फील्ड में दो पदक जीतने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी बने।

साथ ही 5,000 मीटर स्पर्धा में पदक जीतने वाले पहले भारतीय भी बने। इसके अलावा मुरली श्रीशंकर (पुरुष लंबी कूद) ने रजत, प्रवीण चित्रावेल (पुरुष ट्रिपल जंप) ने रजत, सेल्वा प्रभु थिरुमारन (पुरुष ट्रिपल जंप) ने कांस्य, सीमा कालीरमना (महिला डिस्कस थ्रो) ने कांस्य और तेजस्विन शंकर (डेकाथलॉन) ने कांस्य पदक जीता।

कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत का सफर

साल 1930 में कॉमनवेल्थ गेम्स की शुरुआत के बाद से भारत ने 1930, 1950, 1962 और 1986 को छोड़कर सभी संस्करणों में हिस्सा लिया है। दिलचस्प बात यह है कि कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत का पहला स्वर्ण पदक महान धावक स्वर्गीय मिल्खा सिंह ने 1958 में कार्डिफ में आयोजित खेलों की 440 गज दौड़ में जीता था।

भारत ने वर्ष 2010 में कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी की थी। इसी संस्करण में भारत पहली और अब तक की एकमात्र बार 100 पदकों का आँकड़ा पार करने में सफल रहा था।

2010 के खेलों में भारत ने कुल 101 पदक जीते थे। हालाँकि इसके बाद भारत उस प्रदर्शन को दोहरा नहीं सका, लेकिन 2002 में मैनचेस्टर में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स में 69 पदकों के साथ अपना दूसरा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया था।

ग्लासगो में कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत का मौजूदा प्रदर्शन वर्ष 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए एक मजबूत खिलाड़ी दल तैयार करने की ठोस नींव बन गया है। वर्ष 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी भारत करेगा।

(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

टोक्यो में महाविनाशकारी भूकंप की चेतावनी, अब दूसरी राजधानी ढूँढ रहा जापान: जानें- कैसे यह बना राजनीतिक विवाद; भारत में दूसरी राजधानी पर कब-कब और क्या हुई चर्चा

अगर राजधानी ही संकट में हो तो सरकार कहाँ से चलेगी? जापान में यह सवाल अब सिर्फ एक काल्पनिक आपदा की चर्चा नहीं रह गया है। भूकंप और सुनामी के लगातार खतरे को देखते हुए नीति-निर्माता इस संभावना पर मंथन कर रहे हैं कि किसी बड़े संकट में टोक्यो के काम करने की स्थिति में न रहने पर देश का प्रशासन कैसे संभाला जाएगा।

प्रधानमंत्री कार्यालय, संसद और प्रमुख मंत्रालयों के साथ आर्थिक गतिविधियों का बड़ा हिस्सा टोक्यो में केंद्रित होने के कारण यह चिंता और गंभीर हो जाती है। इसी के जवाब के तौर पर जापान ने ‘दूसरी राजधानी’ की व्यवस्था की दिशा में बड़ा कदम उठाया है।

जापानी संसद ने हाल ही में एक ऐसा कानून पारित किया है, जिसने देश में ‘दूसरी राजधानी‘ (Secondary Capital) बनाने का रास्ता खोल दिया है।

हालाँकि, इस कानून का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि टोक्यो से राजधानी हटाई जा रही है। सरकार का उद्देश्य केवल इतना है कि यदि भविष्य में कोई ऐसी आपदा आती है, जिससे टोक्यो का प्रशासन ठप पड़ जाए, तो देश की शासन व्यवस्था तुरंत किसी दूसरे शहर से संचालित की जा सके।

सरकार इसे राष्ट्रीय सुरक्षा, आपदा प्रबंधन और प्रशासनिक निरंतरता से जुड़ा एक बड़ा सुधार बता रही है। वहीं विपक्ष का आरोप है कि इस कानून के पीछे राष्ट्रीय हित से ज्यादा राजनीतिक समीकरण काम कर रहे हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर जापान को दूसरी राजधानी की जरूरत क्यों महसूस हुई? यह नया कानून क्या कहता है? कौन-कौन से शहर इसकी दौड़ में शामिल हैं? क्या वास्तव में इससे जापान को फायदा होगा या फिर यह केवल राजनीतिक प्रयोग है? और क्या भारत में भी कभी ऐसी माँग उठी है? इन सभी सवालों के जवाब इस पूरे मामले को समझने के लिए बेहद जरूरी हैं।

आखिर जापान को दूसरी राजधानी की जरूरत क्यों पड़ी और नया कानून क्या कहता है?

जापान भौगोलिक रूप से दुनिया के सबसे संवेदनशील देशों में गिना जाता है। यह चार प्रमुख टेक्टोनिक प्लेटों के मिलन क्षेत्र में स्थित है, जिसकी वजह से यहाँ लगातार भूकंप आते रहते हैं। देश में हर साल करीब 1500 भूकंप दर्ज किए जाते हैं और औसतन हर दिन दो से तीन बार धरती हिलती है।

वैज्ञानिक कई वर्षों से चेतावनी देते रहे हैं कि टोक्यो महानगरीय क्षेत्र या ननकाई ट्रफ में भविष्य में एक बेहद शक्तिशाली भूकंप आने की आशंका बनी हुई है। जापानी सरकार का अनुमान है कि अगले 30 वर्षों में टोक्यो क्षेत्र में 7 या उससे अधिक तीव्रता का भूकंप आने की लगभग 70 प्रतिशत संभावना है।

यदि ऐसा होता है तो केवल इमारतों को नुकसान नहीं पहुँचेगा बल्कि प्रधानमंत्री कार्यालय, संसद, मंत्रालय, वित्तीय संस्थान, संचार नेटवर्क और राष्ट्रीय प्रशासन भी प्रभावित हो सकता है। ऐसी स्थिति में पूरे देश की शासन व्यवस्था बाधित होने का खतरा पैदा हो जाएगा। इसी जोखिम को कम करने के लिए सरकार ने बैकअप राजधानी की अवधारणा पर काम शुरू किया।

इसी दिशा में जापानी संसद के उच्च सदन ने जुलाई 2026 में ‘एक्ट ऑन द प्रमोशन ऑफ मेजर्स टू एंश्योर द कंटिन्यूटी ऑफ नेशनल एंड सोशल फंक्शंस एंड द डेवलपमेंट ऑफ ए सेकेंडरी कैपिटल’ को मंजूरी दी।

यह कानून किसी शहर को तुरंत दूसरी राजधानी घोषित नहीं करता बल्कि एक कानूनी ढाँचा तैयार करता है। इसके तहत जापान के विभिन्न प्रीफेक्चर (राज्य) आवेदन कर सकेंगे और सरकार तय मानकों के आधार पर यह फैसला करेगी कि कौन सी जगह आपातकालीन प्रशासनिक केंद्र बनने के लिए सबसे उपयुक्त है।

यहाँ एक बात समझना भी जरूरी है कि टोक्यो अपनी जगह राजधानी बना रहेगा। दूसरी राजधानी केवल आपातकालीन स्थिति में सरकार के कामकाज को जारी रखने के लिए होगी। यानी किसी बड़े संकट की स्थिति में प्रधानमंत्री कार्यालय, मंत्रालय और अन्य आवश्यक प्रशासनिक संस्थान अस्थायी रूप से वहीं से काम कर सकेंगे।

कौन-सी शर्तें पूरी करनी होंगी और सरकार किस तरह मदद करेगी?

दूसरी राजधानी बनने की इच्छा रखने वाले किसी भी राज्य को केवल आवेदन भर देने से यह दर्जा नहीं मिल जाएगा। इसके लिए सरकार ने कई महत्वपूर्ण मानक तय किए हैं। सबसे पहले उस क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं का खतरा अपेक्षाकृत कम होना चाहिए।

साथ ही वहाँ पर्याप्त जनसंख्या, मजबूत अर्थव्यवस्था, विकसित प्रशासनिक ढाँचा और राष्ट्रीय स्तर के सरकारी कामकाज को संभालने की क्षमता भी होनी चाहिए। बेहतर सड़क, रेल और हवाई संपर्क के अलावा आधुनिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर भी इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा। आवेदन करने से पहले संबंधित राज्य की स्थानीय विधानसभा से अपनी मंजूरी भी लेनी होगी।

यदि किसी क्षेत्र का चयन दूसरी राजधानी के रूप में होता है तो उसके विकास में केंद्र सरकार महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। सरकार वहाँ नए सरकारी कार्यालयों और प्रशासनिक भवनों का निर्माण कराएगी, परिवहन नेटवर्क को मजबूत बनाएगी, डिजिटल सुविधाओं का विस्तार करेगी और निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए टैक्स में रियायत तथा अन्य आर्थिक प्रोत्साहन भी देगी।

इसका उद्देश्य केवल एक बैकअप प्रशासनिक केंद्र बनाना नहीं है, बल्कि ऐसे शहर को आर्थिक और औद्योगिक रूप से भी इतना सक्षम बनाना है कि जरूरत पड़ने पर वह देश के प्रमुख प्रशासनिक कार्यों को बिना किसी बाधा के संभाल सके।

दूसरी राजधानी की दौड़ में कौन-कौन से शहर हैं और ओसाका सबसे आगे क्यों माना जा रहा है?

हालाँकि कानून में किसी भी शहर का नाम तय नहीं किया गया है, लेकिन कई प्रीफेक्चर खुलकर अपनी दावेदारी पेश कर चुके हैं। इनमें सबसे अधिक चर्चा ओसाका की हो रही है।

जापान का दूसरा सबसे बड़ा महानगरीय क्षेत्र होने के साथ-साथ ओसाका लंबे समय से देश की आर्थिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा है। यहाँ का विकसित बुनियादी ढाँचा, मजबूत परिवहन व्यवस्था और प्रशासनिक क्षमता इसे सबसे मजबूत दावेदारों में शामिल करती है।

ओसाका के अलावा आइची राज्य ने भी दूसरी राजधानी बनने की इच्छा जताई है। वहाँ के गवर्नर हिदेआकी ओमुरा का कहना है कि उनका क्षेत्र राष्ट्रीय स्तर की प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ संभालने के लिए पूरी तरह तैयार है। ऑटोमोबाइल कंपनी टोयोटा समेत कई वैश्विक उद्योगों की मौजूदगी आइची की आर्थिक ताकत को और मजबूत बनाती है।

फुकुओका भी इस दौड़ में पीछे नहीं है। स्थानीय प्रशासन का कहना है कि पूरा क्षेत्र मिलकर दूसरी राजधानी की जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार है और इस दिशा में आवश्यक प्रक्रिया शुरू की जाएगी।

होक्काइडो भी खुद को मजबूत दावेदार मानता है। वहाँ के गवर्नर का तर्क है कि साप्पोरो टोक्यो से काफी दूर स्थित है, इसलिए यदि राजधानी क्षेत्र किसी बड़े भूकंप या सुनामी से प्रभावित होता है तो यहाँ उसका असर अपेक्षाकृत कम होगा।

इसके अलावा साप्पोरो में पहले से कई केंद्रीय सरकारी कार्यालय मौजूद हैं, जिससे आपातकालीन स्थिति में प्रशासनिक कामकाज शुरू करना आसान हो सकता है।

हालाँकि राजनीतिक और प्रशासनिक विश्लेषकों का मानना है कि फिलहाल ओसाका सबसे आगे दिखाई देता है। लेकिन इसकी राह पूरी तरह आसान भी नहीं है। कई विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भविष्य में ननकाई ट्रफ में बड़ा भूकंप आता है तो ओसाका का कुछ हिस्सा भी प्रभावित हो सकता है।

ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या जिस शहर पर खुद प्राकृतिक आपदा का जोखिम बना हुआ है, वह पूरे देश के लिए सबसे सुरक्षित बैकअप राजधानी साबित हो पाएगा।

कानून को लेकर क्यों हो रहा है विवाद और संसद में अब तक क्या-क्या हुआ?

सरकार इस कानून को राष्ट्रीय सुरक्षा और आपदा प्रबंधन के लिहाज से एक ऐतिहासिक कदम बता रही है, लेकिन विपक्ष और कई राजनीतिक विश्लेषक इससे पूरी तरह सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि दूसरी राजधानी की अवधारणा जितनी प्रशासनिक दिखाई देती है, उसके पीछे उतनी ही राजनीतिक रणनीति भी छिपी हुई है।

सबसे बड़ा विवाद ओसाका को लेकर है। आलोचकों का आरोप है कि यह कानून कहीं न कहीं ओसाका को बढ़त दिलाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है, क्योंकि यह शहर जापान इनोवेशन पार्टी (JIP) का सबसे मजबूत राजनीतिक गढ़ है।

दरअसल अक्टूबर 2025 में लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (LDP) और जापान इनोवेशन पार्टी के बीच हुए गठबंधन समझौते में दूसरी राजधानी बनाने का वादा भी शामिल था। इसी वजह से विपक्ष का कहना है कि यह केवल राष्ट्रीय आवश्यकता नहीं, बल्कि गठबंधन की राजनीति का भी हिस्सा है।

उनका यह भी आरोप है कि सरकार ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि इस पूरी योजना पर कितना खर्च आएगा, किन सरकारी विभागों को भविष्य में दूसरी राजधानी में स्थानांतरित किया जाएगा और इसका आर्थिक लाभ क्या होगा।

यही कारण रहा कि संसद में यह विधेयक बिना विवाद के पारित नहीं हो सका। निचले सदन में जहाँ सत्तारूढ़ गठबंधन के पास बहुमत था, वहीं ऊपरी सदन में सरकार को कड़ा विरोध झेलना पड़ा।

विपक्षी दलों ने कई दिनों तक विधेयक का विरोध किया और मतदान टालने की कोशिश की। विवाद का एक बड़ा कारण स्थानीय जनमत संग्रह (रेफरेंडम) भी था। विपक्ष चाहता था कि यदि किसी राज्य में दूसरी राजधानी के लिए जनमत संग्रह कराया जाए तो उसे स्थानीय चुनावों के साथ एक ही दिन आयोजित न किया जाए, ताकि चुनावी माहौल जनमत संग्रह के नतीजों को प्रभावित न करे।

लंबी चर्चा और कई दौर की बातचीत के बाद सरकार ने सप्लीमेंट्री रेजोल्यूशन स्वीकार किया, जिसमें कहा गया कि स्थानीय चुनाव और जनमत संग्रह की समय-सीमा को यथासंभव अलग रखा जाएगा।

इसके बाद कुछ विपक्षी दल मतदान के लिए तैयार हुए और आखिरकार यह विधेयक बेहद कम अंतर से पारित हो गया। यही वजह है कि कानून बनने के बावजूद इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस अभी भी खत्म नहीं हुई है।

डिजिटल गवर्नेंस से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा तक, जापान को क्या मिलेगा?

इस कानून का मकसद केवल किसी दूसरे शहर में सरकारी दफ्तर बनाना नहीं है। जापान की सोच इससे कहीं आगे की है। संसद में चर्चा के दौरान यह बात सामने आई कि यदि भविष्य में कोई बड़ा भूकंप, सुनामी या अन्य राष्ट्रीय आपदा आती है तो केवल इमारतों का सुरक्षित होना काफी नहीं होगा।

आज सरकार का अधिकांश काम डिजिटल नेटवर्क, डेटा सेंटर और ऑनलाइन सेवाओं पर निर्भर है। यदि डिजिटल व्यवस्था ठप हो गई तो प्रशासन चलाना बेहद मुश्किल हो जाएगा।

इसी वजह से इस कानून में डिजिटल बिजनेस कंटीन्यूटी प्लानिंग (BCP) को भी अहम स्थान दिया गया है। सरकार को ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिससे राष्ट्रीय स्तर की सभी जरूरी सरकारी सेवाएँ ऑनलाइन माध्यम से भी निर्बाध रूप से संचालित की जा सकें। साथ ही इन व्यवस्थाओं की नियमित समीक्षा कर संसद को प्रगति रिपोर्ट भी देनी होगी।

यदि यह योजना सफल होती है तो इसका सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि किसी भी बड़े संकट की स्थिति में जापान की शासन व्यवस्था पूरी तरह ठप नहीं होगी। प्रधानमंत्री कार्यालय, महत्वपूर्ण मंत्रालय और अन्य आवश्यक संस्थान जरूरत पड़ने पर दूसरी राजधानी से अपना काम जारी रख सकेंगे।

इसके साथ ही सरकार का मानना है कि इससे टोक्यो पर वर्षों से बढ़ रहा आर्थिक और प्रशासनिक दबाव भी कम होगा। आज जापान की बड़ी आबादी, प्रमुख उद्योग, वित्तीय संस्थान और सरकारी कार्यालय टोक्यो में केंद्रित हैं। दूसरी राजधानी विकसित होने से निवेश, उद्योग और रोजगार दूसरे क्षेत्रों तक भी पहुँचेंगे, जिससे क्षेत्रीय विकास को गति मिलने की उम्मीद है।

राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी यह योजना काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यदि भविष्य में किसी प्राकृतिक आपदा, साइबर हमले या अन्य सुरक्षा संकट के कारण टोक्यो प्रभावित होता है तो देश के पास पहले से तैयार एक वैकल्पिक प्रशासनिक केंद्र मौजूद होगा, जहाँ से सरकार बिना किसी रुकावट के काम करती रहेगी।

क्या भारत में भी दूसरी राजधानी की बहस हुई है?

दूसरी राजधानी का विचार केवल जापान तक सीमित नहीं है। भारत में भी इस विषय पर समय-समय पर चर्चा होती रही है। संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर ने 1955 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘थॉट्स ऑन लिंग्विस्टिक स्टेट्स‘ में हैदराबाद को भारत की दूसरी राजधानी बनाने का सुझाव दिया था।

उनका मानना था कि दिल्ली देश के दक्षिणी हिस्से के लोगों के लिए काफी दूर है, जिससे प्रशासनिक पहुँच प्रभावित होती है। उन्होंने यह भी तर्क दिया था कि दिल्ली भौगोलिक रूप से सीमाओं के अपेक्षाकृत करीब है, जबकि हैदराबाद देश के मध्य में स्थित होने के कारण अधिक संतुलित और सुरक्षित विकल्प हो सकता है।

यह बहस बाद के वर्षों में भी समय-समय पर सामने आती रही। वर्ष 2018 में कर्नाटक के तत्कालीन आवास मंत्री एम कृष्णप्पा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर बेंगलुरु को भारत की दूसरी राजधानी बनाने की माँग की थी।

उनका कहना था कि इससे दक्षिण भारत और राष्ट्रीय प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित होगा। हालाँकि केंद्र सरकार की ओर से इस दिशा में कोई औपचारिक कदम नहीं उठाया गया और नई दिल्ली आज भी देश की एकमात्र राजधानी है।

हालाँकि भारत में कुछ विशेषज्ञ यह भी सुझाव देते रहे हैं कि राजधानी बदलने के बजाय संसद के कुछ सत्र दक्षिण भारत में आयोजित किए जा सकते हैं या फिर सुप्रीम कोर्ट की स्थायी क्षेत्रीय पीठें स्थापित की जा सकती हैं, जिससे लोगों की प्रशासन और न्याय तक पहुँच आसान हो सके।

अब आगे क्या होगा?

जापान का यह फैसला पूरी दुनिया में इसलिए चर्चा का विषय बना हुआ है क्योंकि यह केवल राजधानी बदलने की योजना नहीं है, बल्कि भविष्य की आपदाओं के लिए शासन व्यवस्था को तैयार करने की कोशिश है। दुनिया के कई देशों ने पहले से ही प्रशासनिक शक्तियों का बंटवारा अलग-अलग शहरों में किया हुआ है।

दक्षिण अफ्रीका, मलेशिया, श्रीलंका, बोलीविया और नीदरलैंड जैसे देशों में अलग-अलग शहर प्रशासनिक, विधायी और न्यायिक जिम्मेदारियाँ निभाते हैं। जापान भी उसी दिशा में एक नया मॉडल विकसित करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उसकी प्राथमिकता प्राकृतिक आपदाओं के दौरान सरकार की निरंतरता बनाए रखना है।

फिलहाल जापान ने केवल कानूनी ढाँचा तैयार किया है। अभी किसी भी शहर को दूसरी राजधानी घोषित नहीं किया गया है। आने वाले महीनों में इच्छुक राज्य अपने प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास भेजेंगे, जिसके बाद तय मानकों के आधार पर उनका मूल्यांकन किया जाएगा। जिसके बाद अंतिम निर्णय प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार के हाथ में होगा।

4 नदी बेसिन और 60 कुएँ, ‘समुद्र मंथन’ में मोदी सरकार का ₹84,084 करोड़ का दाँव: अब भारत खुद खोजेगा अपना तेल और गैस, कम होगी विदेशी निर्भरता

31 जुलाई 2026 की शाम दिल्ली में कैबिनेट की एक मीटिंग खत्म हुई और उसके बाद जो ऐलान हुआ, उसने भारत की पूरी ऊर्जा कहानी को नई दिशा दे दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने ‘समुद्र मंथन’ नाम की एक बड़ी योजना को मंजूरी दे दी। पूरा नाम है- नेशनल ऑफशोर एक्सप्लोरेशन स्कीम। इसके लिए सरकार ने ₹84,084 करोड़ का बजट रखा है, जो 2030-31 तक खर्च होगा। पेट्रोलियम मंत्रालय ने इसे भारत का अब तक का सबसे बड़ा और सबसे महत्वाकांक्षी समुद्री तेल गैस खोज मिशन बताया है।

कहानी यहीं से शुरू नहीं होती। इसकी नींव करीब साल भर पहले पड़ी थी, जब प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त 2025 को लाल किले से इसी तरह के एक आधुनिक समुद्र मंथन का जिक्र किया था। तब से लेकर अब तक सरकार लगातार नीतियों में बदलाव करती रही, ताकि जब असली योजना आए तो जमीन पहले से तैयार मिले।

भारत को इतनी बड़ी योजना की जरूरत क्यों पड़ी?

भारत आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल खरीदने वाला देश बन चुका है। हर साल भारत करीब 144 अरब डॉलर यानी लगभग ₹13 लाख करोड़ सिर्फ तेल के आयात पर खर्च करता है। यह पैसा हर साल बाहर चला जाता है, जबकि अगर देश के भीतर ही तेल और गैस निकल आए तो यही पैसा देश के विकास में लग सकता है।

पेट्रोलियम मंत्रालय की प्रेस विज्ञप्ति में साफ लिखा है कि हाल के भू राजनीतिक घटनाक्रम ने यह दिखा दिया है कि अपनी ऊर्जा की व्यवस्था खुद अपने हाथ में रखना कितना जरूरी है। समुद्र से जुड़ी जो तेल गैस खोजें होती हैं, उनमें एक अड़चन आती है, वह है समय। किसी भी समुद्री ब्लॉक को खोजने से लेकर वहाँ से तेल गैस निकलना शुरू होने तक 5 से 10 साल तक का वक्त लग जाता है।

इसके अलावा जो पुराने तेल गैस के कुएँ पहले से चल रहे हैं, उनका उत्पादन भी हर साल करीब 6 से 7 प्रतिशत घटता जाता है। यानी अगर नई खोज न हो तो देश का उत्पादन धीरे-धीरे कम ही होता जाएगा। इसी वजह से सरकार ने अब खोज को अपनी सबसे बड़ी प्राथमिकता बना दिया है।

पिछले 10 साल में जमीन कैसे तैयार हुई?

2014 के बाद से मोदी सरकार ने कई ऐसे बदलाव किए जिन्होंने आज की इस बड़ी योजना का रास्ता खोला। सबसे पहला बदलाव था नो गो एरिया को हटाना। पहले भारत के समुद्री क्षेत्र यानी एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन का बड़ा हिस्सा खोज के लिए बंद था। अब उसमें से 99 प्रतिशत से ज्यादा इलाका खोल दिया गया है, जिससे 10 लाख वर्ग किलोमीटर से ज्यादा समुद्री क्षेत्र पहली बार खोज के लिए उपलब्ध हुआ।

दूसरा बड़ा कदम था कॉन्ट्रैक्ट के तरीके को बदलना। पहले प्रोडक्शन शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट का सिस्टम था, जिसमें कंपनियों को उलझन ज्यादा होती थी। अब उसकी जगह रेवेन्यू शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट लाया गया, जो पहले से आसान और साफ सुथरा है। इसके अलावा 2025 में ऑयलफील्ड्स रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट संशोधन कानून पास हुआ, जिसने पूरे सेक्टर के कानूनी ढाँचे को आधुनिक बनाया। साथ ही पेट्रोलियम एंड नेचुरल गैस रूल्स 2025 भी लागू हुए, जिससे कारोबार करना आसान हुआ।

योजना के 4 बड़े हिस्से

समुद्र मंथन योजना को चार मुख्य भागों में बाँटा गया है। पहला मुख्य समुद्र के भीतर का डेटा जुटाना, जिस पर ₹28,534 करोड़ खर्च होंगे। इसमें ₹12,000 करोड़ 2D सिस्मिक डेटा जुटाने पर लगेंगे, ₹12,534 करोड़ 3D सिस्मिट डेटा और अन्य तकनीकों पर खर्च होंगे और ₹4000 करोड़ पुराने डेटा को दोबारा प्रोसेस करने और उसमें AI टूल लगाने पर खर्च होंगे।

दूसरा सबसे बड़ा हिस्सा है- समुद्र में खुदाई और वहाँ से जुड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर, जिस पर ₹55,200 करोड़ खर्च होंगे। इसमें ₹43,200 करोड़ गहरे पानी के 60 खोजी कुएँ खोदने पर लगेंगे। सरकार हर कुएँ की खुदाई की लागत का 50 प्रतिशत तक या फिर ₹675 करोड़, जो भी कम हो, वहन करेगी। ₹10 हजार करोड़ साझा समुद्री इंफ्रास्ट्रक्चर हब बनाने पर खर्च होंगे, ताकि खोजी गई गैस और तेल को जल्दी बाजार तक पहुँचाया जा सके। बाकी ₹2000 करोड़ ऑयल एंड गैस मैन्युफैक्चरिंग एंड सर्विसेज जोन बनाने पर लगेंगे, ताकि इससे जुड़े उपकरण और सेवाएँ देश में ही बनें।

तीसरा हिस्सा है मॉनिटरिंग और सपोर्ट का काम, जिसके लिए ₹300 करोड़ रखे गए हैं। यह पैसा डिजिटल निगरानी, ट्रेनिंग, जागरूकता कार्यक्रम और मीडिया आउटरीच में खर्च होगा।

एक गहरे पानी के खोजी कुएँ की लागत औसतन ₹1,192 से ₹1,430 करोड़ के बीच बैठती है, यानी यह बहुत जोखिम भरा और महँगा काम है। इसीलिए सरकार ने इसमें आधे खर्च की जिम्मेदारी खुद उठाने का फैसला किया, ताकि निजी कंपनियाँ भी इसमें उतरने से न घबराएँ।

किन-किन इलाकों में होगी खुदाई, पूरा भूगोल समझिए

समुद्र मंथन का पैसा हवा में खर्च नहीं होगा। यह पैसा भारत के पूर्वी और पश्चिमी दोनों समुद्री तटों पर मौजूद कुछ खास नदी बेसिनों में खुदाई पर लगेगा। ये वो जगहें हैं जहाँ बड़ी-बड़ी नदियाँ सदियों से समुद्र में मिट्टी और तलछट बहाकर लाती रही हैं और उसी तलछट की मोटी परतों के नीचे तेल और गैस दबा हुआ माना जाता है। इसीलिए सरकार का पूरा फोकस इन चार बड़े इलाकों पर है।

  • कृष्णा गोदावरी बेसिन सबसे आगे है। यह इलाका आंध्र प्रदेश के तट पर है, जहाँ कृष्णा नदी और गोदावरी नदी दोनों बंगाल की खाड़ी में मिलती हैं। इन्हीं दोनों नदियों के नाम पर इसे केजी बेसिन कहा जाता है। यह इलाका पहले से ही भारत का सबसे बड़ा गैस उत्पादन केंद्र है और यहीं रिलायंस व ONGC के मशहूर गहरे पानी के गैस फील्ड भी मौजूद हैं। अब नई सिस्मिक तकनीक से इसी बेसिन के और गहरे हिस्सों में छिपे भंडारों की तलाश की जाएगी, जहाँ अभी तक पुरानी तकनीक की सीमाओं के कारण खुदाई नहीं हो पाई थी।
  • महानदी बेसिन दूसरा बड़ा इलाका है, जो ओडिशा के तट के पास स्थित है। यहाँ महानदी अपने साथ लाई मिट्टी बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इस बेसिन में समुद्र के भीतर करीब 8 किलोमीटर की गहराई तक तेल और गैस के मजबूत भूगर्भीय संकेत मिले हैं, लेकिन अभी तक यहाँ बड़े पैमाने पर खोज नहीं हुई है। सरकार इसे भारत के सबसे संभावित लेकिन अभी तक अनछुए डीप वॉटर इलाकों में गिनती है।
  • बंगाल पूर्णिया बेसिन तीसरा इलाका है, जो पश्चिम बंगाल के तट और उससे सटे समुद्री हिस्से में फैला है। यहाँ समुद्र के नीचे तलछट की परत करीब 10 किलोमीटर तक मोटी है, जो अपने आप में एक बड़ी बात है, क्योंकि जितनी मोटी तलछट परत होगी, उतनी ही ज्यादा संभावना है कि उसके नीचे प्राचीन हाइड्रोकार्बन भंडार दबे हों।
  • कावेरी बेसिन चौथा इलाका है, जो तमिलनाडु के तट से शुरू होकर बंगाल की खाड़ी की तरफ फैलता है। यहाँ कावेरी नदी का मुहाना है और समुद्र के भीतर करीब 8 किलोमीटर गहराई तक कार्बोनेट चट्टानों की परतें मिली हैं, जिनमें जुरासिक युग के पुराने भंडार होने की उम्मीद जताई जा रही है।

इन चार नदी बेसिनों के अलावा अंडमान सागर का इलाका भी अब इस मिशन का अहम हिस्सा बन चुका है। यह क्षेत्र बाकी चारों बेसिनों से अलग है क्योंकि यह किसी बड़ी नदी के मुहाने पर नहीं, बल्कि अंडमान द्वीप समूह के आसपास के गहरे समुद्र में स्थित है, जहाँ की भूगर्भीय बनावट म्यांमार और इंडोनेशिया के तेल गैस क्षेत्रों जैसी मानी जाती है।

इसके अलावा योजना में पश्चिमी तट की मुंबई हाई और गुजरात के तटीय इलाकों को भी नजरअंदाज नहीं किया गया है, जहाँ पहले से चल रहे पुराने कुओं के आसपास भी नई सिस्मिक स्टडी और गहराई की खोज होगी, ताकि पुराने फील्ड के इर्द गिर्द छिपे छोटे भंडारों का भी पता लगाया जा सके।

साथ ही अंडमान का समुद्री क्षेत्र भी अब सुर्खियों में है। यहाँ ऑयल इंडिया लिमिटेड को हाल ही में एक बड़ी सफलता मिली है। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने खुद 5 जून 2026 को इस खोज की घोषणा की कि श्री विजयपुरम-3 नाम के एक खोजी कुएँ में नैचुरल गैस मिली है।

यह कुआँ अंडमान द्वीप समूह के पूर्वी तट से लगभग 15 किलोमीटर दूर और 355 मीटर गहरे समुद्र में खोदा गया था। समुद्र के तल से करीब 1900 मीटर से ज्यादा गहराई पर इओसीन नाम की भूगर्भीय परत में लगातार गैस फ्लेयरिंग दर्ज हुई, जो बताती है कि वहाँ गैस काफी दबाव के साथ मौजूद है।

यह अंडमान क्षेत्र में मिली दूसरी सफलता है। इससे पहले 2025 में श्री विजयपुरम-2 कुएँ में भी गैस मिलने की पुष्टि हो चुकी थी, जिसमें लगभग 87 प्रतिशत शुद्ध मीथेन पाई गई थी। भूवैज्ञानिकों का मानना है कि अंडमान की समुद्री संरचना म्यांमार और इंडोनेशिया के उन इलाकों जैसी ही है, जहाँ पहले से बड़े पैमाने पर तेल गैस निकाला जा रहा है। अगर सब कुछ योजना के अनुसार चला तो इस इलाके से 2030 तक व्यावसायिक उत्पादन शुरू हो सकता है।

राजस्थान में नई खोज

सिर्फ पूर्वी तट ही नहीं, राजस्थान से भी अच्छी खबर आई है। ऑयल इंडिया लिमिटेड को जैसलमेर के डांडेवाला फील्ड में एक नया गैस कुआँ मिला है, जहाँ पहली बार बेहद कम गहराई पर स्थित सानू फॉर्मेशन से गैस निकलनी शुरू हुई है। यह कुआँ सिर्फ 950 मीटर तक ड्रिल किया गया था और शुरुआती परीक्षण में हर दिन करीब 25 हजार स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर गैस निकलती पाई गई। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यहाँ कुल 75 मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर गैस का भंडार मौजूद हो सकता है।

ONGC का सबसे बड़ा दाँव

अंडमान की इस सफलता के बाद ONGC ने भी अपना अब तक का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट शुरू कर दिया है। कंपनी गहरे और अति गहरे पानी में ड्रिलिंग के लिए करीब ₹1.5 लाख करोड़ का निवेश करने जा रही है। इसके लिए वैश्विक टेंडर निकाले जा चुके हैं और मुंबई में हुई प्री बिड मीटिंग में दुनिया की एक दर्जन बड़ी ड्रिलिंग कंपनियों ने हिस्सा लिया। इस काम में ONGC ने ब्राजील की पेट्रोब्रास, फ्रांस की टोटल एनर्जी और अमेरिका की एक्सोनमोबिल (Exxonmobil) जैसी दिग्गज कंपनियों के साथ भी तकनीकी सहयोग किया है।

इस पूरे मिशन में एडवांस्ड सिस्मिक इमेजिंग तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है। सर्वे जहाज समुद्र में कई किलोमीटर लंबी केबल छोड़ते हैं, जो नीचे की ओर ध्वनि तरंगें भेजती हैं। ये तरंगें समुद्र तल और उसके नीचे की चट्टानों से टकराकर वापस लौटती हैं और जहाज पर लगे सेंसर उन्हें रिकॉर्ड करते हैं। इसके बाद सुपरकंप्यूटर की मदद से समुद्र के नीचे की एक साफ तस्वीर तैयार की जाती है, जिससे पता चलता है कि किस जगह तेल गैस फँसा हो सकता है।

सरकार ने इसमें खर्च कम करने के लिए मल्टी क्लाइंट मॉडल भी अपनाया है। इसमें विदेशी जियोफिजिकल कंपनियाँ अपने खर्च और अपने जोखिम पर डेटा जुटाती हैं और बाद में उसे बाकी तेल कंपनियों को बेच देती हैं। इससे सरकार पर शुरुआती बोझ नहीं पड़ता और निजी निवेश भी आसानी से आता है।

लक्ष्य कितना बड़ा है?

पेट्रोलियम मंत्रालय के मुताबिक अगर खोज में सफलता मिलती रही तो भारत का सालाना तेल गैस उत्पादन मौजूदा 62 मिलियन मीट्रिक टन ऑयल इक्विवेलेंट से बढ़कर 80 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुँच सकता है। देश का कुल हाइड्रोकार्बन भंडार भी 1.6 अरब टन से बढ़कर 2.2 अरब टन हो सकता है। इससे हर साल करीब ₹1 लाख करोड़ के तेल आयात में कमी आने की उम्मीद है।

सरकार ने यह भी बताया कि इस योजना से 600 मिलियन मीट्रिक टन ऑयल इक्विवेलेंट से ज्यादा नए भंडार जुड़ सकते हैं और बड़े पैमाने पर रोजगार भी पैदा होगा।

आगे का रास्ता

समुद्र मंथन अब सिर्फ एक नीति नहीं, बल्कि जमीन पर काम करता हुआ मिशन बन चुका है। अंडमान में मिली गैस, राजस्थान में मिला नया भंडार और ONGC का ₹1.5 लाख करोड़ का निवेश यह दिखाते हैं कि सरकार इस बार सिर्फ बात नहीं, ठोस काम कर रही है। अगर अगले पाँच साल में तय की गई 60 खोजी कुओं की खुदाई और बड़े पैमाने पर सिस्मिक सर्वे का काम पूरा होता है, तो भारत आने वाले दशक में अपनी तेल गैस जरूरतों के लिए दूसरे देशों पर उतना निर्भर नहीं रहेगा जितना आज है। यही वह लक्ष्य है, जिसे हासिल करने के लिए ₹84,084 करोड़ की यह पूरी योजना बनाई गई है।

भारत-चीन के बीच सिल्क रूट पर 6 साल बाद शुरू हुआ व्यापार, खुल गया Shipki La पास: क्यों अहम है ये रास्ता और कितने सामानों का होगा लेन-देन? जानिए सबकुछ

भारत और चीन के बीच ऐतिहासिक ‘शिपकी ला’ (Shipki La) दर्रे के जरिए सीमा व्यापार छह साल के लंबे अंतराल के बाद एक बार फिर शुरू हो गया है। इस प्राचीन मार्ग के फिर से खुलने से सदियों पुराने ‘सिल्क रूट’ पर एक बार फिर से व्यापारिक गतिविधियाँ और हलचल लौट आई हैं।

साल 2019 में फैली कोविड-19 महामारी और उसके बाद 2020 में गलवान घाटी में हुए गंभीर सैन्य तनाव के कारण यह व्यापारिक मार्ग पूरी तरह ठप पड़ा हुआ था। अब छह वर्षों बाद द्विपक्षीय सीमा व्यापार की बहाली से हिमाचल प्रदेश के सीमावर्ती जनजातीय क्षेत्रों में स्थानीय अर्थव्यवस्था और आजीविका के नए रास्ते भी खुलते दिख रहे हैं।

हिमालय की दुर्गम ऊँचाइयों पर स्थित यह मार्ग केवल आर्थिक लेन-देन का जरिया नहीं है, बल्कि यह दोनों देशों के बीच सीमावर्ती सुरक्षा, जनसांख्यिकीय महत्व और ऐतिहासिक कूटनीति का भी एक अहम केंद्र बिंदु रहा है।

क्या है सीमा व्यापार का इतिहास?

भारत और चीन के बीच सीमा व्यापार का इतिहास कई शताब्दियों पुराना है और यह प्राचीन ‘सिल्क रूट’ के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में से एक माना जाता रहा है। ऐतिहासिक रूप से, भारत के उत्तरी सीमावर्ती राज्यों जैसे कि हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और सिक्किम के स्थानीय व्यापारी तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के साथ स्वतंत्र और निर्बाध रूप से व्यापार करते आ रहे थे।

स्वतंत्रता के बाद आधुनिक भारत में इस व्यापार को एक औपचारिक और कानूनी स्वरूप देने के लिए वर्ष 1954 में ‘पंचशील समझौता’ किया गया। इस समझौते के तहत तीन प्रमुख सीमावर्ती बिंदुओं- हिमाचल प्रदेश में शिपकी ला, उत्तराखंड में लिपुलेख और सिक्किम में नाथू ला को आधिकारिक सीमा व्यापार केंद्र के रूप में मान्यता दी गई।

इस औपचारिक व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले जनजातीय समुदायों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करना और उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत करना था। हालाँकि यह शुरुआती औपचारिक व्यापार बहुत लंबे समय तक नहीं चल सका।

वर्ष 1962 में भारत और चीन के बीच हुए युद्ध के बाद यह पूरा व्यापारिक ढाँचा अचानक ध्वस्त हो गया। सुरक्षा कारणों से भारत ने अपनी उत्तरी सीमाओं को सील कर दिया और यह व्यापारिक मार्ग अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दिया गया।

इसके बाद दोनों देशों के बीच कूटनीतिक वार्ताओं की प्रक्रिया दोबारा शुरू हुई। 13 दिसंबर 1991 को सीमा व्यापार दोबारा शुरू करने पर समझौता हुआ। लंबे प्रयासों के बाद 1992 में उत्तराखंड के लिपुलेख, 1994 में हिमाचल के शिपकी ला और अंततः 2006 में सिक्किम के नाथू ला दर्रे को फिर से व्यापार के लिए खोल दिया गया।

व्यापार रुकने के मुख्य कारण

वर्ष 2000 के दशक में पुनः शुरू हुआ यह सीमा व्यापार लगभग डेढ़ दशक तक बिना किसी बड़ी रुकावट के मौसमी आधार पर संचालित होता रहा, लेकिन हाल के वर्षों में आई दो बड़ी अंतरराष्ट्रीय घटनाओं ने इस पर एक बार फिर से लंबा ब्रेक लगा दिया।

पहला निलंबन वर्ष 2019 के अंत और 2020 के शुरुआत में आया, जब वैश्विक स्तर पर फैले कोविड-19 संक्रमण को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को कड़ाई से सील कर दिया गया। सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा प्रोटोकॉल के कारण व्यापारिक गतिविधियों को अस्थायी रूप से रोक दिया गया था।

अभी महामारी का प्रभाव कम भी नहीं हुआ था कि मई-जून 2020 में पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में दोनों देशों की सेनाओं के बीच एक भीषण हिंसक सैन्य गतिरोध पैदा हो गया। सीमा पर बढ़ते सैन्य तनाव और गंभीर सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए भारत सरकार और सुरक्षा एजेंसियों ने सीमा व्यापार से जुड़ी सभी गतिविधियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया।

इसके बाद के वर्षों में सीमा पर दोनों ओर से बड़े पैमाने पर सैन्य तैनाती रही, जिसके कारण शिपकी ला सहित अन्य सभी व्यापारिक दर्रों पर ताले लटके रहे। लगभग छह वर्षों के लंबे अंतराल, कूटनीतिक वार्ताओं, प्रशासनिक बैठकों और सीमा सुरक्षा प्रोटोकॉल के पुनर्मूल्यांकन के बाद अब इस व्यापार को पुनः संचालित करने का निर्णय लिया गया है।

आम लोगों के लिए प्रतिबंध का कारण

बहुत से लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि जब यह अंतरराष्ट्रीय सीमा व्यापार मार्ग खोला जाता है, तब भी इस पर आम नागरिकों, बाहरी व्यापारियों या पर्यटकों को आवाजाही और व्यापार की छूट क्यों नहीं दी जाती। दरअसल भारत-चीन सीमा व्यापार का यह मॉडल कोई सामान्य व्यावसायिक या खुला ई-कॉमर्स बाजार नहीं है।

यह एक अत्यधिक संवेदनशील, नियंत्रित और विशेष बार्टर एवं लोकल ट्रेड सिस्टम है। इसके आम लोगों के लिए प्रतिबंधित रहने का सबसे प्राथमिक कारण राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता का मुद्दा है। जिन भौगोलिक स्थानों से यह व्यापार होता है, वे सभी अत्यधिक संवेदनशील और उच्च सुरक्षा वाले सैन्य क्षेत्रों (High Security Military Zones) में स्थित हैं।

यदि इन मार्गों को आम जनता या बाहरी व्यापारियों के लिए अनियंत्रित रूप से खोल दिया जाए, तो इससे सीमावर्ती क्षेत्रों में घुसपैठ, अवैध नेटवर्क, तस्करी और संवेदनशील सैन्य प्रतिष्ठानों की जासूसी जैसे गंभीर सुरक्षा खतरे पैदा हो सकते हैं। इसी वजह से द्विपक्षीय समझौतों के अनुसार यह अधिकार केवल और केवल संबंधित सीमावर्ती जिलों (जैसे हिमाचल का किन्नौर या उत्तराखंड का पिथौरागढ़) के पंजीकृत स्थानीय निवासियों तक ही सीमित रखा जाता है।

इसके लिए स्थानीय प्रशासन, गृह विभाग और पुलिस एजेंसियां व्यापारियों का गहन पृष्ठभूमि और सुरक्षा सत्यापन (Security Verification) करती हैं। इस सत्यापन के बाद ही व्यापारियों को सीमित समय और कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत व्यापारिक पास जारी किए जाते हैं। आम जनता के लिए इन संवेदनशील दर्रों से आवाजाही पूरी तरह से प्रतिबंधित रहती है।

आयात और निर्यात होने वाले सामान

भारत-चीन सीमा व्यापार की एक अन्य बड़ी विशेषता यह है कि इसमें आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, भारी मशीनरी, ऑटोमोबाइल या बड़े औद्योगिक सामानों का आयात-निर्यात नहीं किया जा सकता। विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT), भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय और चीन के समकक्ष प्राधिकरणों द्वारा आपसी सहमति से पूर्व-निर्धारित और अधिसूचित वस्तुओं की एक स्पष्ट सूची तैयार की जाती है, जिसके बाहर किसी भी सामान का लेन-देन कानूनन अपराध माना जाता है।

भारत की ओर से मुख्य रूप से स्थानीय हस्तशिल्प उत्पाद, हथकरघा वस्त्र, पारंपरिक मसाले, गुड़, मेवे, चावल, वनस्पति तेल, चाय, कॉफी, कांसे व तांबे के बर्तन, रेडीमेड कपड़े और स्थानीय पहाड़ी क्षेत्रों में उगने वाली जड़ी-बूटियों का निर्यात तिब्बती स्वायत्त क्षेत्र के बाजारों में किया जाता है।

दूसरी ओर से चीन और तिब्बत के बाजारों से भारत में आने वाले सामानों में मुख्य रूप से पारंपरिक कच्चे माल और स्थानीय तिब्बती उत्पाद ही शामिल होते हैं।

सीमा व्यापार का महत्व

भारत और चीन के बीच इस सीमा व्यापार का दायरा भले ही दोनों देशों के बीच होने वाले अरबों डॉलर के कुल राष्ट्रीय आयात-निर्यात की तुलना में बहुत छोटा दिखता हो, लेकिन इसका सामाजिक, आर्थिक और रणनीतिक मूल्य अत्यधिक महत्वपूर्ण है।

सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह व्यापार हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और सिक्किम के अत्यधिक दुर्गम और दूरदराज के जनजातीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की आजीविका का एक मुख्य मौसमी साधन है। कठोर भौगोलिक परिस्थितियों और सीमित संसाधनों के कारण इन क्षेत्रों में रोजगार के विकल्प बेहद सीमित होते हैं, ऐसे में कुछ महीनों के लिए खुलने वाला यह व्यापार स्थानीय परिवारों को अच्छी आय और संबल प्रदान करता है।

रणनीतिक और सामरिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो भारतीय सीमाओं पर स्थानीय आबादी का बसाव और उनका आर्थिक रूप से मजबूत होना राष्ट्रीय सुरक्षा का एक बेहद मजबूत आधार माना जाता है। भारत सरकार द्वारा सीमावर्ती बुनियादी ढाँचे (Border Infrastructure) को मजबूत करने के साथ-साथ इन पारंपरिक व्यापारिक मार्गों को नियंत्रित तरीके से संचालित करना यह दर्शाता है कि भारत अपनी संप्रभुता और सुरक्षा से समझौता किए बिना स्थानीय निवासियों के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध है।

ढहा एफिल टॉवर, गड्ढे में समाया गीजा पिरामिड और कीव में रूसी टैंक… Google Earth पर AI से बनती रहीं ‘असली जैसी’ इमेज, 24 घंटे में फीचर लेना पड़ा वापस: पूरा मामला समझिए

तकनीक की दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर मची होड़ के बीच दिग्गज टेक कंपनी गूगल को एक बड़ा झटका लगा है। गूगल ने अपने बेहद लोकप्रिय प्लेटफॉर्म गूगल अर्थ पर लॉन्च किए गए एक ‘क्रांतिकारी’ AI इमेज-जेनरेटर फीचर को महज 24 घंटे के भीतर ही पूरी तरह से रोलबैक यानी बंद कर दिया है।

कंपनी को यह कदम तब उठाना पड़ा जब इस टूल का इस्तेमाल कर लोगों ने ऐसी फर्जी और भ्रामक तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर करनी शुरू कर दीं, जो गूगल की नीतियों का खुला उल्लंघन कर रही थीं।

शोधकर्ताओं और पत्रकारों ने चेतावनी दी कि इस टूल के जरिए दुनिया के किसी भी कोने की हूबहू नकली सैटेलाइट तस्वीरें बनाई जा सकती हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी भ्रम और गलत जानकारी फैलने का खतरा पैदा हो गया है।

क्या था यह नया AI फीचर और कैसे काम करता था?

गूगल ने गुरुवार (30 जुलाई 2026) को गूगल अर्थ के वेब वर्जन पर एक नया फीचर पेश किया था, जिसका नाम था- ‘क्रिएट इमेज’। इस टूल को गूगल के सबसे एडवांस इमेज-जेनरेशन मॉडल ‘नैनो बनाना 2’ की ताकत दी गई थी।

यह टूल यूजर को यह सुविधा देता था कि वे गूगल अर्थ पर दुनिया की किसी भी जगह या ऐतिहासिक इमारत पर जूम-इन करें और एक साधारण टेक्स्ट प्रॉम्ट टाइप करें। यह AI मॉडल गूगल अर्थ के असली सैटेलाइट,एरियल और 3D मैपिंग डेटा का इस्तेमाल करके पलक झपकते ही बिल्कुल असली दिखने वाली काल्पनिक तस्वीरें उसके ऊपर फिट कर देता था।

गूगल के प्रोडक्ट मैनेजर ब्रायन होरोविट्ज ने इसे लॉन्च करते समय कहा था, “यह फीचर लोगों की कल्पनाओं को सच करने के लिए बनाया गया है बस गूगल अर्थ पर किसी जगह पर जाएँ, क्रिएट इमेज पर टैप करें और जो देखना चाहते हैं उसे टाइप करें।”

लॉन्च के तुरंत बाद क्यों खड़ा हुआ विवाद?

जैसे ही यह टूल आम जनता के हाथ लगा, वैसे ही ओपन-सोर्स इंटेलिजेंस (OSINT) एक्सपर्ट्स, शोधकर्ताओं और खोजी पत्रकारों ने इसकी कमियों और खतरनाक पहलुओं को खोजना शुरू कर दिया। इस टूल की सबसे बड़ी आलोचना यह थी कि इससे ऐतिहासिक इमारतों और संवेदनशील जगहों को लेकर बिल्कुल असली जैसे नकली दृश्य बनाए जा सकते थे।

एक्सपर्ट्स का कहना है कि सैटेलाइट इमेजरी को अब तक दुनिया में सबसे भरोसेमंद डेटा माना जाता रहा है, क्योंकि इसे सैकड़ों मील ऊपर अंतरिक्ष में मौजूद कैमरों से लिया जाता है और इसे बदलना या फेक बनाना आसान नहीं होता लेकिन गूगल के इस टूल ने एक क्लिक में फर्जी सैटेलाइट तस्वीरें बनाना इतना आसान कर दिया कि कोई भी आम इंसान धोखा खा जाए।

एक्सपर्ट्स ने क्या-क्या फर्जी तस्वीरें बनाकर दिखाईं?

BBC वेरीफाई और प्रमुख ओपन-सोर्स रिसर्चर हेंक वैन एस्स ने इस टूल की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलने के लिए कई टेस्ट किए। उन्होंने ऐसे प्रॉम्ट्स डाले जो बेहद संवेदनशील और खतरनाक थे लेकिन गूगल के AI ने उन्हें बिना किसी रोक-टोक के बना दिया।

अगर हेंक वैन एस्स के टेस्ट की बात करें तो उन्होंने ईरान में एक काल्पनिक न्यूक्लियर प्लांट, अमेरिका-मेक्सिको सीमा पर शरणार्थियों का जमावड़ा, एम्स्टर्डम में एक बड़ा हादसा और गाजा में एक अस्पताल के ठीक बगल में बम गिरने से बना गड्ढा जैसी तस्वीरें आसानी से बना लीं।

वहीं, BBC वेरीफाई की टीम ने अपनी टेस्टिंग में फ्रांस के एफिल टॉवर को ढहते हुए, मिस्र के गीजा पिरामिड को एक बड़े गड्ढे में समाते हुए और यूक्रेन की राजधानी कीव की सड़कों पर रूसी टैंकों को घूमते हुए दिखा दिया।

इसके अलावा अन्य मीडिया टेस्ट के दौरान कुछ पत्रकारों ने ईरान के खार्ग द्वीप पर भीषण आग लगने और अमेरिकी संसद में भयानक बाढ़ आने जैसी तस्वीरें भी जनरेट कर लीं, जो अगर सच होतीं तो दुनिया भर की मीडिया के लिए बहुत बड़ी और संवेदनशील खबर बन जातीं।

एक्सपर्ट हेंक वैन एस्स ने चिंता जताते हुए कहा, “इस टूल में सबसे खतरनाक बात यह थी कि एक मनगढ़ंत और फर्जी तस्वीर को बिल्कुल असली कोऑर्डिनेट्स और असली मैप के ऊपर जोड़ दिया जाता था। जालसाजी को खुद में बहुत ज्यादा असली दिखने की जरूरत नहीं थी क्योंकि उसे उस नक्शे से विश्वसनीयता मिल जा रही थी जिस पर उसे बनाया गया था।”

गूगल ने अपने बचाव में क्या दलील दी और पॉलिसी क्या थी?

विवाद बढ़ने के बाद गूगल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स और मीडिया आउटलेट्स को दिए बयानों में अपनी सफाई पेश की। गूगल ने कहा कि वह मिसइन्फॉर्मेशन को लेकर बेहद गंभीर है।

कंपनी ने बताया कि इस टूल से बनने वाली हर तस्वीर में ‘सिंथआईडी’ डिजिटल वॉटरमार्क लगाया गया था। यह एक अदृश्य मार्कर होता है जो AI द्वारा बनाई गई तस्वीरों में छिप जाता है। अगर किसी यूजर को किसी तस्वीर पर शक हो, तो वह गूगल के जेमिनी चैटबॉट से पूछ सकता है या गूगल लेंस का इस्तेमाल करके यह पता लगा सकता है कि इमेज असली है या AI से बनी है।

साथ ही गूगल ने दावा किया कि उनकी पॉलिसी के तहत हानिकारक विषयों पर इमेज बनाने की मनाही है और वे अपनी सुरक्षा प्रणालियों को लगातार अपडेट कर रहे हैं। इसके अलावा यह तस्वीरें मुख्य गूगल अर्थ एक्सपीरियंस में आम जनता को सीधे नहीं दिखती थीं बल्कि केवल वही यूजर इन्हें देख और डाउनलोड कर सकता था जो इन्हें बना रहा था।

सुरक्षा कवच में चूक, कैसे फेल हो गए गूगल के दावे?

गूगल ने जो सुरक्षा दावे किए थे, जमीनी हकीकत में वे पूरी तरह नाकाम साबित हुए। BBC वेरीफाई की पड़ताल में सामने आया कि गूगल के सुरक्षा नियमों को बहुत आसानी से चकमा दिया जा सकता था।

यूजर द्वारा प्रॉम्ट बदलकर सेफ्टी फीचर्स को बाईपास करना काफी आसान था, जैसे जब टूल से ब्रिटेन की संसद के पास देशद्रोहियों को फांसी देने के लिए मंच बनाने को कहा गया, तो सिस्टम ने इसे रिजेक्ट कर दिया था लेकिन जैसे ही थोड़े घुमावदार और कम स्पष्ट शब्दों का इस्तेमाल किया गया, AI ने तुरंत वैसी ही तस्वीर बनाकर दे दी।

इसी तरह व्हाइट हाउस के लॉन पर ट्रंप लिखने से मना करने वाले टूल ने उसी जगह पर एक कम्युनिटी गार्डन बनाने की इजाजत दे दी। इसके साथ ही वॉटरमार्क और डिटेक्शन की नाकामी भी देखने को मिली।

हालाँकि, गूगल के टूल्स शुरुआती तौर पर वॉटरमार्क पहचान पा रहे थे लेकिन BBC ने पाया कि कुछ तरीकों से इन चेक्स को भी बाईपास किया जा सकता था और जेमिनी को यह झूठ बोलने के लिए मजबूर किया जा सकता था कि ये फर्जी तस्वीरें असली हैं। इसके अलावा बाजार में मौजूद अन्य बाहरी AI डिटेक्टर टूल्स भी इन तस्वीरों को पहचानने में पूरी तरह फेल हो गए।

सैटेलाइट इमेजरी के भरोसे पर क्या असर पड़ेगा?

इस मामले ने पूरी दुनिया के पत्रकारों, फैक्ट-चेकर्स और जियोपॉलिटिकल विश्लेषकों को डरा दिया है। अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट के सैटेलाइट इमेजरी विश्लेषक ब्रैडी एफ्रिक ने बताया कि इस अपडेट ने बहुत ही ठोस दिखने वाली फर्जी सैटेलाइट तस्वीरें बनाना बच्चों का खेल बना दिया, जिससे ये तस्वीरें इंटरनेट पर आग की तरह फैल सकती हैं और जनता को आसानी से गुमराह कर सकती हैं।

बैलिंगकैट के सीनियर रिसर्चर जेक गोडिन ने कहा कि पहले भी युद्ध के दौरान ऐसी फर्जी तस्वीरें सामने आई हैं, जैसे इजरायल-इरान तनाव के समय बहरीन में एक अमेरिकी बेस के तबाह होने की फर्जी तस्वीर ईरानी मीडिया में चलाई गई थी। लेकिन गूगल जैसे बड़े प्लेटफॉर्म द्वारा यह टूल सीधे यूजर्स को दे देने से फर्जी इमेजरी बनाने की प्रक्रिया बहुत तेज हो गई।

इसका सबसे बड़ा नुकसान यह होगा कि आने वाले समय में जब वास्तविक युद्ध क्षेत्रों या मानवाधिकार उल्लंघनों की असली सैटेलाइट तस्वीरें सामने आएँगी, तो दोषी सरकारें और प्रॉपगैंडा चलाने वाले लोग बड़ी आसानी से यह कहकर पल्ला झाड़ लेंगे कि “यह तो AI से बनी नकली तस्वीर है।” इससे भविष्य में सच और झूठ की पहचान करना और भी मुश्किल हो जाएगा।

टेक इंडस्ट्री में मची हड़बड़ी का एक और उदाहरण

गूगल अर्थ का यह मामला कोई अकेला उदाहरण नहीं है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को अपने प्रोडक्ट्स में शामिल करने की अंधी दौड़ में बड़ी-बड़ी टेक कंपनियां लगातार गलतियाँ कर रही हैं और फिर आलोचना होने पर फीचर्स को बंद कर रही हैं।

हाल ही में मेटा कंपनी ने भी अपने एक AI फीचर ‘म्यूज इमेज’ को बंद कर दिया था। इस फीचर के जरिए लोग इंस्टाग्राम के पब्लिक अकाउंट्स की तस्वीरों का इस्तेमाल करके नई AI तस्वीरें बना पा रहे थे, जिसका हॉलीवुड यूनियनों और प्राइवेसी एक्टिविस्ट्स ने कड़ा विरोध किया था।

गूगल ने आखिरकार अपनी गलती मानते हुए एक्स पर लिखा हम जानते हैं कि लोग दुनिया के एक विश्वसनीय नजारे के लिए गूगल अर्थ पर अनोखा भरोसा करते हैं।

हमने देखा कि जियोस्पेशियल प्रोफेशनल्स ने इस फीचर का कई अच्छे कामों के लिए इस्तेमाल किया लेकिन कुछ लोगों ने ऐसी तस्वीरें भी शेयर कीं जो हमारी नीतियों के खिलाफ हैं। इसलिए हम गूगल अर्थ से इस फीचर को फिलहाल हटा रहे हैं। जब तक कि हम इस पर और मजबूत सुरक्षा घेरा लागू नहीं कर देते।

स्पेन-मोरक्को सीमा पर प्रवासियों की भारी घुसपैठ, भू-राजनीतिक दबाव में घिरे स्पेन के PM पेड्रो सांचेज: US के सामने न झुकने की चुका रहे कीमत? समझिए पूरा मामला

स्पेन के स्वायत्त एनक्लेव ‘सेउटा’ में मोरक्को की ओर से हजारों अवैध प्रवासियों (घुसपैठियों) की अचानक घुसपैठ ने एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय और मानवीय संकट खड़ा कर दिया है। महज 80,000 की आबादी वाले सेउटा में कुछ ही दिनों में 60,000 से अधिक घुसपैठिए सीमा पार कर दाखिल हो गए। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए स्पेनिश सेना तैनात की गई है और अधिकतर घुसपैठियों को वापस मोरक्को भेज दिया गया है।

दरअसल, मोरक्को की ओर से स्पेनिश एनक्लेव सेउटा और मेलिला में हजारों प्रवासियों के जबरन घुसने की कोशिशों ने न केवल यूरोपीय संघ की सुरक्षा दीवारों को चुनौती दी है, बल्कि मैड्रिड और रबात के बीच के कूटनीतिक संबंधों में मौजूद दरारों को भी उजागर कर दिया है।

सेउटा पर संकट का दायरा कितना बड़ा है?

सेउटा की कुल आबादी महज 80,000 के आसपास है। ऐसे में दो-तीन दिनों के भीतर ही 60,000 प्रवासियों का आ जाना इस क्षेत्र के ढांचे और संसाधनों के लिए एक गंभीर चुनौती बन गया है। घुसपैठ की चरम सीमा के दौरान हर मिनट करीब 200 घुसपैठिए समुद्र के रास्ते तैरकर या ब्रेकवाटर (समुद्री बाँध) पार करके सेउटा की सीमा में दाखिल हो रहे थे।

स्पेन के गृह मंत्रालय के अनुसार, स्थिति पर काबू पाने के प्रयासों के तहत लगभग 25,000 प्रवासियों को वापस मोरक्को भेज दिया गया है। इससे पहले मई 2021 में भी ऐसा संकट आया था, लेकिन तब प्रवासियों की संख्या 12,000 थी, जबकि इस बार का संकट उससे कई गुना बड़ा है।

इस अचानक बढ़ी घुसपैठ को लेकर मोरक्को के सुरक्षा बलों की भूमिका संदेह के घेरे में है। प्रवासन मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि मोरक्को की पुलिस और सहायक बल सीमाओं पर केवल मूकदर्शक बने रहे। सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि इस घुसपैठियों को बाकायदा सेउटा की सीमा तक मोरक्को प्रशासन छोड़ रही है, जिसमें कुछ लोग जेलों से छोड़े गए कैदी भी हो सकते हैं।

बहरहाल, एएफपी न्यूज एजेंसी की मानें तो स्पेन के सेउटा में 60,000 से अधिक मोरक्कन लोगों ने घुसपैठ की थी, जिनमें से शनिवार रात तक अधिकतर लोगों को वापस मोरक्को भेज दिया गया है।

यह घटना केवल एक सामान्य प्रवासन समस्या नहीं है, बल्कि इसे स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज की सरकार पर राजनीतिक और कूटनीतिक दबाव बनाने के एक बड़े रणनीतिक कदम के रूप में देखा जा रहा है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या मोरक्को अपनी सीमाओं की ढीली निगरानी को एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है और क्या सांचेज प्रशासन अपनी स्वतंत्र विदेश नीति की कीमत चुका रहा है।

सेउटा और मेलिला की स्थिति जानना जरूरी, कैसे मोरक्कन कर रहे हैं घुसपैठ

दरअसल, सीमा सुरक्षा में इस अचानक आई विफलता को समझने के लिए सेउटा और मेलिला की स्थिति को जानना आवश्यक है। ये दोनों शहर उत्तरी अफ्रीका के तट पर स्थित स्पेन के स्वायत्त क्षेत्र हैं, जो सीधे तौर पर मोरक्को से जमीनी सीमा साझा करते हैं। यूरोपीय संघ की मुख्यभूमि पर पहुँचने का यह सबसे सुगम रास्ता होने के कारण, हजारों अफ्रीकी प्रवासी यहाँ शरण लेने की कोशिश करते हैं।

मई 2021 में भी हुआ था ऐसा: आपको ये जानना भी जरूरी है कि मई 2021 में भी कुछ ऐसा ही हुआ था, जब कुछ ही दिनों के भीतर 12000 लोग सिउटा में घुस आए थे। इस बारे में सिउटा और मेलिला के अधिकारियों की रिपोर्ट के बाद हड़कंप मच गया था, जिसके बाद स्पेन सरकार ने कड़ा रुख अपनाया था। तब भी दोनों देशों में काफी तनातनी हुई थी, यानी स्पेन और मोरक्को के बीच।

मोरक्को की भूमिका पर खड़े हो रहे सवाल

इस अचानक बढ़ी घुसपैठ को लेकर मोरक्को के सुरक्षा बलों की भूमिका संदेह के घेरे में है। प्रवासन मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि मोरक्को की पुलिस और सहायक बल सीमाओं पर केवल मूकदर्शक बने रहे। मोरक्को की तरफ से तटीय क्षेत्रों में पुलिस का कड़ा पहरा होने के बावजूद इतनी बड़ी संख्या में लोगों को स्पेनिश सीमा की ओर जाने दिया गया। बिना मोरक्को प्रशासन की ढील के इतनी भारी तादाद में लोगों का सीमा पार करना व्यावहारिक रूप से असंभव है।

अचानक क्यों बढ़ गई घुसपैठ?

विशेषज्ञों के अनुसार इस अभूतपूर्व संकट के कानूनी और राजनीतिक कारण भी हैं। जिसमें स्पेनिश सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला अहम साबित हो रहा है।

स्पेनिश सुप्रीम कोर्ट का फैसला: 8 जुलाई को स्पेन के उच्चतम न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था, जिसके तहत समुद्र के रास्ते आने वाले किसी भी प्रवासी को बिना प्रशासनिक निष्कासन प्रक्रिया (Administrative Expulsion Procedure) शुरू किए तुरंत वापस नहीं भेजा जा सकता। इस फैसले ने प्रवासियों को कानूनी राहत मिलने की उम्मीद जगाई।

स्पेन सरकार द्वारा अवैध रूप से रह रहे लोगों को नियमित (रेगुलराइज) करने के कदमों और भविष्य में अप्रवासन नीति पर और सख्त सरकार आने की आशंकाओं ने भी प्रवासियों को जल्द से जल्द सीमा पार करने के लिए उकसाया।

सांचेत पर सत्ता छोड़ने का दबाव? आखिर कौन सा खेल खेल रहा है मोरक्को?

ऐतिहासिक रूप से मोरक्को अपनी सीमा पुलिस के जरिए इस भीड़ को नियंत्रित रखता है, लेकिन समय-समय पर मोरक्को की सुरक्षा एजेंसियों द्वारा अचानक ढील दे दी जाती है। विश्लेषकों का मानना है कि मोरक्को जब भी स्पेन से किसी नीतिगत मुद्दे पर सहमत नहीं होता, तो वह सीमा नियंत्रण को ढीला कर प्रवासियों की भीड़ को स्पेनिश क्षेत्र में जाने देता है, कई सुरक्षा विशेषज्ञ इसे ‘हाइब्रिड वारफेयर’ या ‘Migration Weaponization’ की रणनीति के रूप में देखते हैं।

कई कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट का सबसे बड़ा कारण मोरक्को की राजनीतिक मंशा है। साल 1956 में आजादी मिलने के बाद से ही मोरक्को स्पेनिश एन्क्लेव सेउटा और मेलिला (Melilla) पर अपना संप्रभुता का दावा ठोकता रहा है, जिसे स्पेन सिरे से खारिज करता आया है। विश्लेषकों का आरोप है कि मोरक्को प्रवासन का इस्तेमाल स्पेन पर दबाव बनाने और इन शहरों के भविष्य पर बातचीत करने के लिए एक ‘कूटनीतिक हथियार’ के रूप में कर रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज हैं। सांचेज पर घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दोहरा दबाव है। विपक्षी दल पीपी (पीपुल्स पार्टी) और वॉक्स उन पर सीमा सुरक्षा में विफलता और कमजोर विदेश नीति का आरोप लगा रहे हैं। विपक्ष का दावा है कि मोरक्को के सामने सांचेज सरकार का नरम रुख ही इस तरह के संकटों को न्योता देता है।

दूसरी ओर सांचेज प्रशासन ने इस संकट को राष्ट्रीय संप्रभुता पर हमला करार दिया है। स्पेनिश सरकार ने सीमा पर सेना की तैनाती बढ़ा दी है और प्रवासियों को वापस भेजने की प्रक्रिया तेज कर दी है। इसके बावजूद मैड्रिड के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा गर्म है कि यह संकट अनायास नहीं आया है, बल्कि इसे सांचेज को एक निश्चित कूटनीतिक रास्ते पर लाने के लिए रचा गया है।

क्या अमेरिका को ‘न’ कहना बना मुसीबत?

अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर एक बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या सांचेज अमेरिका की विदेश नीति से अलग राह चुनने की सजा भुगत रहे हैं। पश्चिमी सहारा के मुद्दे पर वाशिंगटन और रबात के बीच बनी सहमति के विपरीत सांचेज सरकार ने कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका से जुड़े मामलों में एक स्वतंत्र रुख अपनाया है। जब अमेरिका और उसके सहयोगियों ने इस क्षेत्र में अपने रणनीतिक हितों को साधने के लिए दबाव बनाया, तब सांचेज ने बहुपक्षवाद और अंतरराष्ट्रीय कानूनों की वकालत की।

इसके अलावा बीते सालों में स्पेन द्वारा अमेरिका की कुछ रणनीतिक नीतियों से असहमति जताने के बाद यह कूटनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि मोरक्को को वाशिंगटन का मौन समर्थन प्राप्त हो सकता है, जिससे वह स्पेन पर दबाव बनाने का दुस्साहस कर रहा है। वो कौन सी वजहे हैं जिन्हें इनसे जुड़ा माना जा सकता है?

हमास के खिलाफ इजरायल का विरोध: स्पेन ने अपने बंदरगाहों के इस्तेमाल से इजरायल को रोक दिया है। स्पेन का कहना है कि वो किसी भी लड़ाई में इजरायल का साथ नहीं देगा। यही नहीं, स्पेन ने फिलिस्तीन देश को भी मान्यता दे दी है। ऐसे में इजरायल का विरोध एक अहम पहलू है, जिसकी वजह से अमेरिका भी उसके खिलाफ खड़ा हो गया है।

अमेरिकी फाइटर जेट्स को कहा न: इजरायल को मना करने के साथ ही स्पेन ने ईरान के खिलाफ युद्ध में अमेरिका को भी झटका दिया है। नेटो का सदस्य होने के बावजूद स्पेन ने अमेरिकी फाइटर जेट्स को अपने बेस का इस्तेमाल करने से मना कर दिया है। स्पेन का कहना है कि हॉर्मुज की जंग उसकी खुद की नहीं है, इसलिए वो इस युद्ध में अमेरिका की मदद नहीं करेगा, क्योंकि अमेरिका ने ईरान पर हमले से पहले उसके साथ कोई सलाह मशविरा नहीं किया था।

हालाँकि अमेरिका ने यूरोप के साथ एकजुटता प्रदर्शित की है, लेकिन स्पेन सरकार पर सवाल भी उठाए हैं कि ये उसकी विफलता की वजह से हुआ है।

ऐतिहासिक रूप से भी आमने-सामने रहे हैं स्पेन-मोरक्को

पश्चिमी सहारा विवाद (मोरक्को से अलग हुआ हिस्सा) इस पूरे कूटनीतिक संघर्ष की सबसे अहम कड़ी है। मोरक्को इस क्षेत्र पर अपने पूर्ण अधिकार का दावा करता है, जबकि स्पेन ऐतिहासिक रूप से वहाँ के निवासियों के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन करता रहा है। अमेरिका द्वारा पश्चिमी सहारा पर मोरक्को के दावे को मान्यता दिए जाने के बाद मोरक्को चाहता था कि स्पेन और पूरा यूरोपीय संघ भी उसी नक्शेकदम पर चले। जब स्पेन ने तुरंत इस माँग के आगे घुटने नहीं टेके, तो सीमा पर प्रवासियों का संकट गहराने लगा।

सांचेज सरकार को यह भली-भांति एहसास है कि प्रवासियों का यह मुद्दा यूरोपीय संघ के भीतर भी स्पेन की स्थिति को असहज करता है, क्योंकि प्रवासन यूरोपीय राजनीति का सबसे संवेदनशील और विभाजनकारी विषय बन चुका है।

स्पेनिश गृह मंत्रालय और अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों के अनुसार, मोरक्को सीमा पर अचानक हजारों युवाओं और नाबालिगों का जमा होना बिना मोरक्को के सुरक्षा बलों की मौन सहमति या ढील के संभव नहीं है। प्रवासियों की इस भीड़ का इस्तेमाल स्पेन की अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य सेवा और आंतरिक सुरक्षा पर तात्कालिक बोझ डालने के लिए किया गया है।

स्पेन ने यूरोपीय संघ से अपील की है कि वह इसे केवल स्पेन का संकट न मानकर पूरे यूरोप की बाहरी सीमा पर हुआ अतिक्रमण माने। ब्रसेल्स (यूरोपीय संघ का मुख्यालय) ने स्पेन को अपनी सीमा सुरक्षा के लिए पूर्ण सहयोग और अतिरिक्त बजटीय सहायता देने का वादा किया है, लेकिन जमीनी हकीकत बदलने में समय लग रहा है।

इस गंभीर स्थिति पर स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट कहा, “स्पेन अपनी सीमाओं की अखंडता और अपने नागरिकों की सुरक्षा के साथ किसी भी सूरत में समझौता नहीं करेगा। सेउटा और मेलिला केवल स्पेन का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि वे यूरोप की बाहरी सीमाएँ हैं। हम इस मानवीय स्थिति का राजनीतिक इस्तेमाल करने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं करेंगे और अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएँगे।”

इसके साथ ही सांचेत ने उन आलोचकों को भी जवाब दिया, जिसमें स्पेन की तरफ से घुसपैठियों को छूट मिलने की बात कही जाती रही है। सांचेत ने अपने ट्वीट में आँकड़े देते हुए बताया कि 2021 से 2026 के बीच यूरोप में इटली के रास्ते 4,78,600 घुसपैठियों ने घुसपैठ की। बाल्कान इलाकों से 3,40,600 घुसपैठ हुई। ग्रीस से 2,59,800 घुसपैठ तो स्पेन से 2,34,760 लोगों ने घुसपैठ क। वहीं पूरी सीमाओं से 48,000 लोग यूरोप में आए। उन्होंने यूरोप से अपील की कि ये समय बँटने का नहीं है, बल्कि एकजुट होकर मुकाबला करने का है।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच ईयू कमीशन की प्रेसिडेंट उर्जुला वो डेर लेयेन ने भी कई बड़े कदम उठाने की घोषणा की। उन्होंने 2 कमीशन बनाते हुए इस स्थिति से निपटने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने सिउटा के हालात को अनएक्सेप्टेबल करार दिया।

यूरोपीय संघ के कूटनीतिक मामलों के प्रतिनिधियों ने भी इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। यूरोपीय आयोग के वरिष्ठ अधिकारी ने बयान जारी करते हुए कहा, “यूरोपीय संघ स्पेन के साथ पूरी एकजुटता से खड़ा है। स्पेन की सीमाएँ यूरोप की सीमाएँ हैं और हम प्रवासन के मुद्दे को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की किसी भी कोशिश की निंदा करते हैं। मोरक्को को एक जिम्मेदार पड़ोसी की तरह अपनी सीमाओं का प्रबंधन करना होगा और यूरोपीय संघ के साथ हुए सुरक्षा समझौतों का सम्मान करना होगा।”

फिलहाल सेउटा की स्थिति गंभीर बनी हुई है। स्पेनिश विशेषज्ञों का कहना है कि मोरक्को के इस क्षेत्रीय दावे और सीमा पर ढिलाई के रवैये का मुकाबला करने के लिए स्पेन को इसे केवल अपना नहीं, बल्कि पूरे यूरोपीय संघ का मुद्दा बनाना होगा। यूरोपीय संघ के स्तर पर कड़े जवाबी कदम उठाकर ही मोरक्को पर दबाव बनाया जा सकता है और सीमा पर जारी इस मानवीय और सुरक्षा संकट को रोका जा सकता है। अगर सांचेज इस संकट को कूटनीतिक बुद्धिमत्ता से हल नहीं कर पाते हैं, तो इसका असर न केवल स्पेन की आंतरिक राजनीति और उनकी सरकार के भविष्य पर पड़ेगा, बल्कि यह यूरोपीय संघ के उत्तरी अफ्रीका के साथ संबंधों की भावी दिशा भी तय करेगा।

सूखे चावल-रोटी खाकर पेपर लीक के खिलाफ लड़ रहे झारखंड के छात्र, परीक्षा गड़बड़ियों को लेकर हजारों का प्रदर्शन: इन युवाओं से CJP ने क्यों मोड़ा मुँह?

झारखंड में छात्रों का बड़ा आंदोलन देखने को मिल रहा है। राज्य में बार-बार पेपर लीक होने, जिम्मेदारी तय नहीं किए जाने और परीक्षाओं में हो रही देरी के खिलाफ हजारों छात्र सड़कों पर उतर आए हैं। राज्य में बार-बार हो रही अनियमितताओं, खासकर झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) की परीक्षाओं को लेकर छात्रों में लंबे समय से नाराजगी बढ़ रही है।

मौजूदा विरोध प्रदर्शन की शुरुआत इस साल की शुरुआत में हुए JPSC पेपर लीक के बाद हुई। JPSC परीक्षा पेपर लीक मामले में कुल 11 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इस मामले के बाद JPSC के चेयरमैन लालबियाक्तलुआंगा (एल.) खियांग्ते ने इस्तीफा दे दिया था। CID उनसे JPSC परीक्षा में हुई अनियमितताओं को लेकर पूछताछ कर रही है।

मौजूदा विरोध प्रदर्शन 25 जुलाई को राजधानी राँची से शुरू हुआ और जल्द ही राज्य के करीब 24 जिलों तक फैल गया। प्रदर्शन कर रहे छात्रों की माँग है कि जिम्मेदारी तय की जाए, भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी हो और शिक्षा व्यवस्था में बड़े सुधार किए जाएँ। राँची का जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम इस प्रदर्शन का मुख्य केंद्र बना हुआ है।

29 जुलाई को आंदोलन के आयोजकों ने ‘महाआंदोलन’ का ऐलान किया और छात्रों से अपील की कि वे राज्य के हर जिले से राजधानी तक संविधान मार्च निकालें। इस अपील के बाद करीब 5,000 छात्र राँची में सड़कों पर उतरे। छात्रों ने हाथों में भारतीय संविधान की प्रतियाँ और तिरंगा लेकर शांतिपूर्वक मार्च किया। प्रदर्शनकारियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए प्रशासन ने पूरे शहर में सुरक्षा बढ़ा दी है। प्रदर्शन स्थल के आसपास कई जगहों पर बैरिकेड्स भी लगाए गए हैं।

परीक्षाओं में बार-बार हो रही गड़बड़ियों से छात्रों में नाराजगी

झारखंड के छात्र लंबे समय से राज्य में होने वाली कई भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं का सामना कर रहे हैं। इनमें से ज्यादातर छात्र मध्यम वर्ग और निम्न-मध्यम वर्गीय परिवारों से आते हैं। इन परिवारों के लिए सरकारी नौकरी सिर्फ कमाई का जरिया नहीं बल्कि खुद और अपने परिवार की स्थिति बेहतर करने की उम्मीद भी होती है।

हाल के समय में राज्य में JSSC CGL, JPSC संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा, एक्साइज कॉन्स्टेबल भर्ती परीक्षा, JAC कक्षा 10वीं बोर्ड परीक्षा और NEET UG समेत कई परीक्षाओं में अनियमितता, पेपर लीक, सुरक्षा से जुड़ी चिंताएँ और धोखाधड़ी के आरोप सामने आए हैं।

2023 में JSSC CGL परीक्षा को लेकर बड़ा विवाद हुआ था। पेपर लीक होने के बाद इस परीक्षा को रद्द करना पड़ा था। मामला हाई कोर्ट तक पहुँचा, जिसके बाद दोबारा परीक्षा कराई गई। इस मामले में CID जाँच भी शुरू की गई थी।

इसी तरह JAC की कक्षा 10वीं की बोर्ड परीक्षा भी विवादों में आई थी। हिंदी और विज्ञान के पेपर सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद दोनों परीक्षाओं को रद्द कर दोबारा आयोजित किया गया। बाद में NEET UG पेपर लीक मामले की भी जाँच शुरू की गई।

ये उन कई परीक्षाओं में से कुछ उदाहरण हैं जिनमें किसी न किसी तरह की अनियमितता सामने आई। इन परीक्षाओं में शामिल होने वाले छात्रों का अब धैर्य जवाब दे चुका है और वे जिम्मेदारी तय करने के साथ-साथ शिक्षा और भर्ती व्यवस्था में सुधार की माँग कर रहे हैं।

छात्रों के समर्थन में उतरी BJP

झारखंड में प्रदर्शन कर रहे छात्रों के समर्थन में BJP भी सामने आई है। शुक्रवार (31 जुलाई 2026) को पेपर लीक के मुद्दे पर बोलते हुए BJP के प्रदेश अध्यक्ष आदित्य प्रसाद साहू ने राज्य में छात्रों के आंदोलन को लेकर कॉन्ग्रेस पर दोहरे रवैये का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी केंद्र सरकार के खिलाफ छात्रों के प्रदर्शन का खुलकर समर्थन करती है लेकिन झारखंड में इसी तरह के प्रदर्शन को लेकर चुप्पी साधे हुए है।

साहू ने कहा, “जब से कॉन्ग्रेस के समर्थन से झारखंड में सरकार चल रही है, तब से JPSC और JSSC-CGL समेत कई परीक्षाओं से पहले बड़े स्तर पर प्रश्नपत्र लीक हुए हैं। इस बार भी JPSC और JSSC-CGL परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक हुए लेकिन वहाँ की सरकार गहरी नींद में सोई हुई है।”

BJP प्रदेश अध्यक्ष ने कॉन्ग्रेस के समर्थन वाली झारखंड सरकार पर परीक्षा से जुड़े घोटालों में मिलीभगत का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “कॉन्ग्रेस के समर्थन वाली सरकार ऐसे घोटालों में सीधे तौर पर शामिल है और वह युवाओं से रोजगार के अवसर छीन रही है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि कॉन्ग्रेस पार्टी दिल्ली में प्रदर्शन कर रही है लेकिन झारखंड में कॉन्ग्रेस के नेता चुप्पी साधे हुए हैं।”

BJP ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के इस्तीफे की माँग की है। पार्टी का कहना है कि परीक्षाओं में बार-बार हो रही अनियमितताओं पर कार्रवाई करने में हेमंत सोरेन सरकार की विफलता के कारण जनता का उन पर भरोसा कम हुआ है।

CJP और विपक्ष दोनों आंदोलन से गायब

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर NEET पेपर लीक को लेकर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किया था। इस पेपर लीक के बाद धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा था। लेकिन झारखंड में छात्रों के चल रहे आंदोलन से CJP गायब है। झारखंड में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP), ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) और आदिवासी छात्र संघ (ACS) समेत अलग-अलग छात्र संगठनों के सदस्य प्रदर्शन में शामिल हुए हैं लेकिन CJP ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है।

झारखंड में हो रहे प्रदर्शन का एक वीडियो CJP के जंतर-मंतर प्रदर्शन से बिल्कुल अलग तस्वीर दिखाता है। इस वीडियो में प्रदर्शनकारी सिर्फ सादा चावल और रोटी खाते हुए दिखाई दे रहे हैं। प्रदर्शन में शामिल रहते हुए वे पिछले 3 दिनों से यही साधारण खाना खा रहे हैं। इसके उलट, जंतर-मंतर पर हुआ CJP का प्रदर्शन एक तरह से फूड फेस्ट बन गया था। वहाँ अलग-अलग संगठनों और समूहों की ओर से लगातार नाश्ता और खाना परोसा जा रहा था। कुछ लोग तो प्रदर्शन स्थल पर सिर्फ मुफ्त में बाँटी जा रही बिरयानी, पिज्जा और इस तरह के दूसरे खाने को खाने के लिए भी पहुँचे थे।

जंतर-मंतर पर कुछ समूहों ने सामुदायिक रसोई और लंगर लगाए थे जबकि कुछ दूसरे लोग अपने घर का बना हुआ खाना लेकर आए थे। इतना ही नहीं, दिल्ली से बाहर और यहाँ तक कि भारत से बाहर रहने वाले लोगों ने भी फूड डिलीवरी सेवाओं के जरिए प्रदर्शन स्थल पर खाना भिजवाया था। यानी CJP के प्रदर्शन के दौरान खाना भरपूर मात्रा में उपलब्ध था जबकि झारखंड में प्रदर्शन कर रहे छात्र खाने के लिए परेशान हैं और उनके पास खाने के लिए कुछ नहीं है।

NEET पेपर लीक मामले में केंद्र के खिलाफ प्रदर्शन करने के मामले में CJP का रवैया साफ तौर पर पक्षपाती रहा है, उन्होंने झारखंड के उन छात्रों का समर्थन नहीं किया है जो इसी तरह के मुद्दे पर विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं। परीक्षाओं में अनियमितता का मुद्दा पूरे देश में रहा है लेकिन NEET पेपर लीक को लेकर छात्रों के गुस्से के सहारे खुद को छात्रों की पार्टी के तौर पर पेश करने वाली CJP ने झारखंड के छात्रों की परेशानी से पूरी तरह आँखें मूंद ली हैं। वहीं, जिन विपक्षी दलों ने जंतर-मंतर पर CJP के प्रदर्शन का खुलकर समर्थन किया था, वे भी झारखंड की स्थिति पर सुविधाजनक तरीके से चुप्पी साधे हुए हैं।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

CWG 2026 की मेडल टैली में क्यों पिछड़ा भारत, शूटिंग-रेसलिंग जैसे खेलों के हटने से कितने बदले समीकरण: जानिए कैसे बॉक्सर देश को दिला सकते हैं टॉप 5 में जगह

ग्लासगो में आयोजित हो रहे राष्ट्रमंडल खेल 2026 (Commonwealth Games 2026) के इस संस्करण में भारतीय खेल प्रेमियों के लिए शुरुआती चरण थोड़ा चिंताजनक नजर आ रहा है। मेडल टैली में भारत की वर्तमान स्थिति को लेकर खेल गलियारों में गंभीर चर्चा शुरू हो गई है। पारंपरिक रूप से भारत जिन स्पर्धाओं में सबसे अधिक पदक बटोरता रहा है, इस बार उन खेलों की अनुपस्थिति या भारी कटौती ने सीधे तौर पर देश की पदक तालिका को प्रभावित किया है। हालाँकि इन तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भारतीय दल के पास अब भी टॉप 5 में अपनी जगह पक्की करने का एक बेहद सुनहरा मौका बना हुआ है।

भारत के पसंदीदा खेलों के बाहर से पड़ा मुख्य अंतर

दरअसल, इस बार मेडल टैली में भारत के नीचे खिसकने का सबसे बड़ा और प्रमुख कारण कुछ विशेष खेलों का इस आयोजन से बाहर होना है। पिछले कई संस्करणों में भारत की झोली में सबसे अधिक पदक शूटिंग (निशानेबाजी) और कुश्ती जैसे खेलों से आते रहे हैं। लेकिन 2026 के इस संस्करण के संशोधित कार्यक्रम से इन दोनों ही प्रमुख स्पर्धाओं को पूरी तरह हटा दिया गया है।

आँकड़े गवाही देते हैं कि पिछले राष्ट्रमंडल खेलों में भारत ने अकेले शूटिंग और कुश्ती से रिकॉर्ड तोड़ पदक जीते थे। इन खेलों के हटने से भारत के लगभग 25 से 30 पदकों का सीधा नुकसान हुआ है, जिसने पूरी तालिका के गणित को पूरी तरह से बिगाड़ कर रख दिया है।

इस बार क्यों हुआ कम खेलों का आयोजन?

इसकी सबसे बड़ी वजह है ग्लास्गो का राष्ट्रमंडल खेल 2026 (CWG 2026) के लिए मेजबान शहर का चयन एक बहुत बड़े संकट और आखिरी समय के अप्रत्याशित घटनाक्रम का नतीजा। दरअसल, मूल रूप से राष्ट्रमंडल खेल 2026 की मेजबानी ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया (Victoria) राज्य को दी गई थी। लेकिन जुलाई 2023 में विक्टोरिया के तत्कालीन प्रीमियर ने यह कहते हुए अचानक मेजबानी से अपने हाथ खींच लिए कि खेलों के आयोजन का अनुमानित खर्च बेहद ज्यादा बढ़ गया है।

शुरुआत में इसका बजट लगभग $2.6 बिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तय किया गया था, जो बढ़कर $6 से $7 बिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तक पहुँच गया था। इतने बड़े आर्थिक बोझ को उठाने से विक्टोरिया के मना करने के बाद राष्ट्रमंडल खेलों के अस्तित्व पर ही संकट के बादल मंडराने लगे और कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन (CGF) को आपातकालीन स्थिति में नया मेजबान तलाशना पड़ा।

ग्लाग्सो ने बचाया इस बार का राष्ट्रमंडल खेल

खेलों को रद्द होने से बचाने के लिए स्कॉटलैंड के ग्लास्गो (Glasgow) शहर ने बेहद कम समय में एक अनोखा और किफायती प्रस्ताव सामने रखा। जिसमें ग्लास्गो (जिसने 2014 में भी CWG की सफल मेजबानी की थी) ने स्पष्ट किया कि वह खेलों को रद्द होने से बचाने के लिए एक ‘डाउनसाइज्ड’ (किफायती) मॉडल पर काम करेगा। इसके लिए खेलों को केवल लगभग 114 मिलियन पाउंड के सीमित बजट में पूरा करने का खाका तैयार किया गया। इसमें ऑस्ट्रेलिया द्वारा विक्टोरिया अनुबंध तोड़ने के एवज में दिए गए मुआवजे के 100 मिलियन पाउंड शामिल थे, जिससे स्थानीय करदाताओं पर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ा।

ग्लास्गो ने खेलों का दायरा घटाकर केवल 10 मुख्य स्पर्धाओं तक सीमित कर दिया और नए स्टेडियम बनाने के बजाय अपने मौजूदा खेल परिसरों का इस्तेमाल करने का फैसला लिया। इसके बाद सितंबर 2024 में स्कॉटिश सरकार की मंजूरी मिलने के बाद CGF ने आधिकारिक तौर पर ग्लास्गो को CWG 2026 का नया मेजबान घोषित कर दिया।

भारत ने 2010 के आयोजन के लिए खर्च की थी भारी रकम

भारत की मेजबानी में दिल्ली में हुए राष्ट्रमंडल खेलों (CWG 2010) में 21 खेलों की 272 प्रतिस्पर्धाएँ थी। इसमें 4352 खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया था। इन खेलों के आयोजन में भारत सरकार ने जमकर पैसे खर्च किए थे और एक तरह से दिल्ली को नए सिरे से संवारा गया था। खेल आयोजन के लिए निर्माण के साथ ही रोड-फ्लाईओवर, खेल गाँव तक के निर्माण पर जमकर पैसे खर्च किए गए थे।

भारत ने इन मुकाबलों में 38 स्वर्ण समेत 101 मेडल जीते थे और ऑस्ट्रेलिया के बाद दूसरे नंबर पर रहा था। जो अब तक का भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा है। अभी पिछले राष्ट्रमंडल खेलों (बर्मिंघम) में भारत 22 स्वर्ण समेत कुल 61 पदकों के साथ चौथे नंबर पर रहा था।

इसके मुकाबले ग्लास्गो में सिर्फ 10 खेलों में 215 प्रतिस्पर्धाएँ ही हैं। खिलाड़ियों की संख्या भी महज 2729 तक ही सीमित है। ग्लास्गो ने इन गेम्स के लिए कोई अलग तैयारी नहीं की है और न ही किसी तरह का खेल गाँव बनाया है। यूनिवर्सिटी के हॉस्टल्स और होटल्स को अस्थाई तौर पर एथलीटों के लिए उपलब्ध कराया गया है। यही नहीं, भारत के लिए सबसे ज्यादा पदक देने वाले कुश्ती और निशानेबाजी जैसी प्रतिस्पर्धा पूरी तरह से इस बार के CWG से बाहर हैं।

भारतीय दल के वर्तमान हालात और आगामी संभावनाओं पर बात करते हुए भारतीय ओलंपिक संघ (IOA) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अपने बयान में कहा, “हम अच्छी तरह जानते हैं कि शूटिंग और कुश्ती के न होने से हमारे पदकों की संख्या पर असर पड़ा है, लेकिन हमारे खिलाड़ियों का हौसला जरा भी कम नहीं हुआ है। ग्लास्गो का मॉडल अलग है, पर हमारे मुक्केबाज और भारोत्तोलक जिस तरह का प्रदर्शन कर रहे हैं, हमें पूरा यकीन है कि हम अंतिम दिनों में पदक तालिका में एक बड़ी छलांग लगाएँगे और शीर्ष 5 में अपनी जगह पक्की करेंगे।”

CWG 2026 में कैसी है पदक तालिका?

पदक तालिका की मौजूदा स्थिति की बात करें तो ऑस्ट्रेलिया 55 स्वर्ण पदकों के साथ सबसे आगे शीर्ष पर बना हुआ है। 18 स्वर्ण पदकों के साथ ब्रिटेन दूसरे, 17 स्वर्ण के साथ कनाडा तीसरे, मेजबान स्कॉटलैंड 10 स्वर्ण पदकों के साथ चौथे और नाइजीरिया 9 स्वर्ण पदकों के साथ पाँचवें नंबर पर है।

भारत इस समय 5 स्वर्ण, 12 रजत और 6 कांस्य समेत कुल 23 पदकों के साथ 10वें नंबर पर बना हुआ है। भारत से आगे 9वें नंबर पर वेल्स (6 स्वर्ण), 8वें पर मलेशिया (7 स्वर्ण), 7वें पर दक्षिण अफ्रीका (7 स्वर्ण) और 6ठे नंबर पर 7 ही स्वर्ण पदकों के साथ न्यूजीलैंड मौजूद है।

हालाँकि 1 अगस्त का दिन इन राष्ट्रमंडल खेलों में पदक के लिहाज से भारत के लिए सबसे अहम दिन साबित होने जा रहा है। भारत के 10 मुक्केबाज कम से कम रजत पदक पक्का कर चुके हैं और रिंग में उतरेंगे। अब देखना यह होगा कि इन 10 में से कितने खिलाड़ी गोल्ड मेडल में इसे बदलते हैं, जिसकी संभावनाएँ सर्वाधिक नजर आ रही हैं।

क्योंकि ये 10 पदक बॉक्सिंग में हैं और इंडियन बॉक्सर इस समय अपने सर्वश्रेष्ठ फॉर्म में भी हैं और बिना किसी खास चुनौती के फाइनल तक पहुँचने में सफल रहे हैं। यदि इन 10 फाइनल मुकाबलों में से भारत 5 स्वर्ण पदक भी जीतने में कामयाब रहता है, तो CWG 2026 में भारत के स्वर्ण पदकों की संख्या 10 हो जाएगी, जो उसे सीधे तौर पर मेडल टैली में टॉप 4 या टॉप 5 की रेस में ला खड़ा करेगी। मौजूदा समय में भारत ने 5 स्वर्ण, 12 रजत और 6 कांस्य समेत 23 पदक जीते हैं।

भारतीय मुक्केबाजी टीम के मुख्य कोच ने मुक्केबाजों की तैयारी पर अपना पूरा भरोसा जताते हुए अपने बयान में कहा, “हमारे सभी 10 रिंग योद्धा पूरी तरह से शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार हैं। उन्होंने फाइनल तक के सफर में जिस तरह का दबदबा दिखाया है, उससे देश को कई स्वर्ण पदक मिलने तय हैं। यह शनिवार भारतीय खेलों के लिए एक ऐतिहासिक दिन साबित होगा और हम पदक तालिका का पूरा गणित बदल कर रख देंगे।”

टॉप 5 में जगह बनाना लक्ष्य, भविष्य के लिए मिले काफी सबक

बहरहाल, देखा जाए तो राष्ट्रमंडल खेल 2026 का यह डाउनसाइज्ड संस्करण भारतीय खेल प्रशासन के लिए एक बड़ा सबक होने के साथ-साथ हमारी नई खेल प्रतिभाओं को परखने की एक बेहतरीन कसौटी भी साबित हो रहा है। निशानेबाजी और कुश्ती जैसी पारंपरिक स्पर्धाओं की अनुपस्थिति में भी भारतीय एथलीटों ने जिस निडरता और प्रतिबद्धता का परिचय दिया है, वह यह साफ दर्शाता है कि भारतीय खेलों का भविष्य सही दिशा में आगे बढ़ रहा है। प्रतिकूल परिस्थितियों और अंतिम समय में बदले गए नियमों के बावजूद खिलाड़ियों का यह जज्बा साबित करता है कि भारतीय दल केवल परिस्थितियों के भरोसे रहने के बजाय हर चुनौती को अवसर में बदलने का हुनर रखता है।

आने वाले अंतिम मुकाबले और मुक्केबाजी के फाइनल दौर भारतीय प्रशंसकों के उत्साह को चरम पर पहुँचाने वाले हैं। रिंग में हमारे एथलीटों का आक्रामक फॉर्म, युवा खिलाड़ियों की बेफिक्र सोच और जुझारूपन इस बात की गवाही दे रहा है कि भारत इस प्रतियोगिता का समापन शानदार तरीके से करेगा। पूरी उम्मीद है कि भारतीय दल इन बाधाओं को पछाड़ते हुए अंतिम दिनों में पदकों की झड़ी लगाएगा, न केवल मेडल टैली के टॉप 5 में अपनी जगह पक्की करेगा, बल्कि वैश्विक मंच पर तिरंगे का परचम लहराकर देश को एक बार फिर से गौरवान्वित होने का ऐतिहासिक अवसर देगा।

कौन हैं अल्लूरी सीताराम राजू, जिनके नाम पर आंध्र में PM मोदी ने किया एयरपोर्ट का उद्घाटन: अंग्रेजों को हमले की तारीख पहले बताते थे, फिर भी नहीं रोक पाती थी ब्रिटिश फौज

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार (1 अगस्त 2026) को आंध्र प्रदेश के विजयनगरम जिले के भोगपुरम में अनेक महत्वाकांक्षी परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया। इस अवसर पर पीएम मोदी ने भोगपुरम में निर्मित अत्याधुनिक अल्लूरी सीताराम राजू अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के विशाल और आधुनिक पैसेंजर टर्मिनल भवन का औपचारिक उद्घाटन किया।

इसके साथ ही उन्होंने 17,900 करोड़ रुपए से अधिक की विभिन्न विकास परियोजनाओं को राष्ट्र को समर्पित किया। प्रधानमंत्री का यह दौरा केवल एक हवाई अड्डे के उद्घाटन तक सीमित नहीं था, बल्कि यह राज्य में आधुनिक बुनियादी ढाँचे का विस्तार करने की दिशा में उठाया गया दूरगामी कदम है।

इस पूरे आयोजन ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम के महान और अमर जनजातीय नायक अल्लूरी सीताराम राजू के बलिदान को एक राष्ट्रीय स्तर का सम्मान भी प्रदान किया है, जिनके नाम पर इस आधुनिक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का नामकरण किया गया है।

जनसभा को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा, “हमने अयोध्या में एयरपोर्ट का नाम वाल्मीकि के नाम से जोड़ा। हमने पंजाब में संत रविदास जी के नाम से एयरपोर्ट का नाम जोड़ा और केंद्र की NDA सरकार ने ये निर्णय किया है कि इस नए एयरपोर्ट का नाम श्री अल्लूरी सीताराम राजू के नाम पर होगा।”

आंध्र प्रदेश को मिली विकास परियोजनाओं की ऐतिहासिक सौगात

प्रधानमंत्री के इस ऐतिहासिक दौरे से आंध्र प्रदेश के इंफ्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक परिदृश्य को भी मजबूती मिली है। भोगपुरम में ग्रीनफील्ड हवाई अड्डे का उद्घाटन करने के साथ-साथ पीएम ने राज्य में प्रौद्योगिकी और ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ी कई बड़ी परियोजनाओं की आधारशिला रखी और कई पूर्ण हो चुकी परियोजनाओं का लोकार्पण किया।

इनमें सबसे प्रमुख परियोजनाओं में से एक विशाखापत्तनम में 460 करोड़ रुपए से अधिक के भारी निवेश से स्थापित की जा रही राज्य की पहली सेमीकंडक्टर विनिर्माण सुविधा (ASIP Semiconductor Project) की आधारशिला रखना है।

इस अत्याधुनिक संयंत्र का विकास ASIP टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड द्वारा दक्षिण कोरिया की प्रतिष्ठित कंपनी APACT के साथ साझेदारी में किया जा रहा है। भारत सेमीकंडक्टर मिशन के तहत स्वीकृत यह संयंत्र प्रतिवर्ष लगभग 96 मिलियन सेमीकंडक्टर चिप्स का उत्पादन करेगा, जो भारत की इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण आत्मनिर्भरता को बल देगा।

इसके अतिरिक्त प्रधानमंत्री ने कुरनूल-IV नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र के एकीकरण के लिए 4.5 गीगावाट की क्षमता वाली ट्रांसमिशन प्रणाली की आधारशिला रखी, जिसका कार्यान्वयन पावरग्रिड द्वारा लगभग 5,550 करोड़ रुपए के निवेश से किया जा रहा है।

इसके साथ ही लगभग 3,550 करोड़ रुपए की लागत से विकसित कुरनूल पवन व सौर ऊर्जा क्षेत्र तथा 820 करोड़ रुपए से अधिक की लागत से निर्मित अनंतपुरम और कुरनूल सौर ऊर्जा क्षेत्रों के लिए ट्रांसमिशन योजनाओं का भी उद्घाटन किया गया।

ये विशाल ट्रांसमिशन लाइनें आंध्र प्रदेश के दूरदराज क्षेत्रों में उत्पन्न होने वाली विशाल हरित और स्वच्छ बिजली को सीधे राष्ट्रीय ग्रिड से जोड़ेंगी, जिससे देश भर के माँग केंद्रों तक स्वच्छ ऊर्जा पहुँचेगी और भारत के कार्बन उत्सर्जन कम करने के वैश्विक संकल्प को एक नई दिशा और गति मिलेगी।

भोगपुरम हवाई अड्डे की अत्याधुनिक तकनीक और सुविधाएँ

सार्वजनिक-निजी भागीदारी यानी PPP मॉडल के तहत 5,640 करोड़ रुपए से भी अधिक की लागत से बना भोगपुरम का यह नया ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा आधुनिक तकनीक का एक बेहतरीन नमूना है। शुरुआत में इस हवाई अड्डे को हर साल 60 लाख यात्रियों की आवाजाही को आसानी से संभालने के हिसाब से तैयार किया गया है।

भविष्य में जैसे-जैसे यात्रियों की संख्या बढ़ेगी, इसे और बड़ा किया जा सकेगा। इस हवाई अड्डे के पैसेंजर टर्मिनल भवन को इस तरह से बनाया गया है कि यहाँ आने वाले हर यात्री को एक बेहद आसान, तेज और आरामदायक यात्रा का अनुभव मिले।

हवाई अड्डे के काम-काज को बेहतर और तेज बनाने के लिए यहाँ कई आधुनिक डिजिटल तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है। इनमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बिल्डिंग इंफॉर्मेशन मॉडलिंग, एयरसाइड 4.0 तकनीक और एयरपोर्ट प्रेडिक्टिव ऑपरेशंस सेंटर जैसी प्रणालियाँ शामिल हैं।

यात्रियों को लंबी लाइनों से बचाने और उनकी सुरक्षा के लिए चेहरे की पहचान वाली बायोमेट्रिक एंट्री यानी डिजियात्रा सिस्टम, अपने आप बैग संभालने वाला ऑटोमेटेड बैगेज सिस्टम और स्मार्ट मॉनिटरिंग सिस्टम लगाए गए हैं। तकनीक के साथ-साथ यह हवाई अड्डा पर्यावरण का ध्यान रखने में भी बहुत आगे है।

इसे हरित भवन यानी ग्रीन बिल्डिंग के मानकों के अनुसार डिजाइन किया गया है और यह यूएस ग्रीन बिल्डिंग काउंसिल में रजिस्टर्ड है। हवाई अड्डा परिसर की बिजली की जरूरतों को पूरा करने के लिए यहाँ 5 मेगावाट का एक बड़ा सौर ऊर्जा प्लांट लगाया गया है।

इसके अलावा कम बिजली खर्च करने वाले कूलिंग सिस्टम, स्मार्ट लाइटिंग, बारिश के पानी को बचाने का सिस्टम, गंदे पानी को साफ करके दोबारा इस्तेमाल करने की सुविधा और इलेक्ट्रिक गाड़ियों के लिए चार्जिंग स्टेशन बनाए गए हैं, जो इसे देश के सबसे पर्यावरण-अनुकूल हवाई अड्डों में से एक बनाते हैं।

स्थानीय संस्कृति, प्रकृति और वास्तुकला का अनूठा संगम

भोगपुरम में बने अल्लूरी सीताराम राजू अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का डिजाइन सिर्फ काँच और कंक्रीट से बनी कोई साधारण इमारत नहीं है बल्कि इसमें आंध्र प्रदेश की पुरानी संस्कृति, लोक कला और प्रकृति की सुंदर झलक देखने को मिलती है।

इस हवाई अड्डे के पैसेंजर टर्मिनल भवन को इस तरह से बनाया गया है कि यहाँ आते ही लोगों को आंध्र प्रदेश की पहचान और खूबसूरती का अहसास हो जाए। इस इमारत की छत की बनावट आंध्र प्रदेश के तटीय गाँवों में पाई जाने वाली पुरानी गोल झोपड़ियों यानी ‘चुट्टिलू’ की शैली से ली गई है, जो हमारी लोक कला को एक बड़े मंच पर दिखाती है।

इसके अलावा छत का घूमता हुआ और लहरदार डिजाइन पास में मौजूद खूबसूरत अरकु घाटी की पहाड़ियों और हरे-भरे नजारों की याद दिलाता है। इस पूरी इमारत का आकार पानी के ऊपर हवा में छलांग लगाती हुई ‘उड़ती हुई मछली’ यानी फ्लाइंग फिश की सुंदर चाल से प्रेरित है।

आधुनिक तकनीक और अपनी पुरानी संस्कृति के इस अनोखे तालमेल ने भोगपुरम हवाई अड्डे को सिर्फ एक एयरपोर्ट नहीं, बल्कि पूरे आंध्र प्रदेश की कला और पहचान का एक बड़ा और सुंदर प्रतीक बना दिया है, जो यहाँ आने वाले हर यात्री का मन मोह लेता है।

स्वतंत्रता संग्राम के अमर नायक अल्लूरी सीताराम राजू का ऐतिहासिक योगदान

इस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का नामकरण जिस महान विभूति के नाम पर किया गया है, वे भारतीय स्वाधीनता संग्राम के अमर नायक अल्लूरी सीताराम राजू हैं। 4 जुलाई 1897 को जन्मे अल्लूरी सीताराम राजू ने अंग्रेजी हुकूमत के जुल्मों के खिलाफ आंध्र प्रदेश के जंगलों और पहाड़ियों में क्रांति का अलख जगाया था।

जब ब्रिटिश सरकार ने 1882 में ‘मद्रास फॉरेस्ट एक्ट’ लागू करके जनजातीयों के जंगलों में रहने, खेती करने और लघु वन उपज इकट्ठा करने के सदियों पुराने पारंपरिक अधिकारों को छीन लिया, तब अल्लूरी सीताराम राजू जनजातीयों के मसीहा बनकर उभरे।

उन्होंने स्थानीय जनजातियों को संगठित किया और उनके हक की लड़ाई लड़ी। रंपा और मान्यम क्षेत्र के जनजातीय उनसे इतना प्रेम और सम्मान करते थे कि वे उन्हें श्रद्धापूर्वक ‘मान्यम वीरुडु’ यानी ‘जंगलों का नायक’ कहकर पुकारते थे।

रंपा विद्रोह और अंग्रेजों के खिलाफ अनोखा गोरिल्ला युद्ध

वर्ष 1922 से 1924 के बीच लड़ा गया ऐतिहासिक रंपा विद्रोह अल्लूरी सीताराम राजू के नेतृत्व में ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ सशस्त्र क्रांति का एक स्वर्ण अध्याय है। विशाल ब्रिटिश सेना और उनके आधुनिक हथियारों का मुकाबला करने के लिए राजू और उनके जनजातीय साथियों ने आंध्र के घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों का सहारा लेते हुए गोरिल्ला युद्ध नीति अपनाई।

उन्होंने पारंपरिक धनुष-बाण, भालों और सीमित संसाधनों के बल पर अंग्रेजी सेना के पसीने छुड़ा दिए। अल्लूरी सीताराम राजू की एक बेहद अनोखी और साहसी कार्यशैली यह थी कि वे जिस किसी ब्रिटिश पुलिस स्टेशन पर हमला कर हथियार जब्त करने वाले होते थे, वहाँ पहले से एक लिखित पत्र भेजकर हमले की तारीख और समय की अग्रिम चेतावनी देते थे।

इसके बावजूद अंग्रेज अफसर उन्हें रोक पाने में नाकाम रहते थे। लगभग दो वर्षों तक अल्लूरी सीताराम राजू ने मुट्ठी भर जनजातीय वीरों के साथ मिलकर शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य की पुलिस और असम राइफल्स जैसी प्रशिक्षित सैन्य टुकड़ियों को नाकों चने चबवा दिए।

अंततः मई 1924 में एक विश्वासघात के परिणामस्वरूप अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ लिया और 7 मई 1924 को कोय्यूरू के जंगलों में एक पेड़ से बाँधकर बिना किसी मुकदमे के गोली मार दी। मात्र 27 वर्ष की अल्पायु में अल्लूरी सीताराम राजू ने भारत माता की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दे दिया।

भारतीय सिनेमा और ‘RRR’ के माध्यम से अल्लूरी सीताराम राजू को मिली वैश्विक पहचान

भारत के जाने-माने फिल्म निर्देशक एस एस राजामौली द्वारा निर्देशित बहुचर्चित, विश्वविख्यात और ऑस्कर पुरस्कार विजेता फिल्म ‘RRR’ (2022) मुख्य रूप से दो महान भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों- अल्लूरी सीताराम राजू और कोमाराम भीम के जीवन, उनके महान चरित्रों और उनके एक काल्पनिक ऐतिहासिक मिलन की पृष्ठभूमि पर ही रची गई है।

इस भव्य और महाकाव्यीय फिल्म में दक्षिण भारतीय सिनेमा के शीर्ष अभिनेता राम चरण ने अल्लूरी सीताराम राजू की ओजस्वी भूमिका को पर्दे पर जीवंत किया, जबकि अभिनेता जूनियर एनटीआर ने कोमाराम भीम के जुझारू और निष्छल चरित्र को बेहद सशक्त रूप से चित्रित किया।

इस फिल्म ने अल्लूरी सीताराम राजू के असीम त्याग, उनकी बेजोड़ तीरंदाजी व युद्ध कला, उनके महान चरित्र और ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ उनके प्रचंड विद्रोह की भावना को बेहद भव्य और भावनात्मक रूप से पर्दे पर उकेरा।

इस फिल्म के विश्वव्यापी प्रदर्शन और ऐतिहासिक सफलता ने केवल भारत ही नहीं बल्कि अमेरिका, जापान, यूरोप और दुनिया के कोने-कोने में रहने वाले करोड़ों लोगों को अल्लूरी सीताराम राजू और भारत के जनजातीय स्वाधीनता संग्राम के इस महान इतिहास से परिचित कराया है।

नेपाल में इस्लामी कट्टरपंथियों ने काँवड़ियों पर किया हमला, पुलिस फायरिंग में गई 3 की जान: वामी मीडिया ने ‘झड़प’ बता हिंसा पर किया ‘वाइटवॉश’, जानिए कैसे झुकी बालेन सरकार Exclusive

​नेपाल, जिसे कभी दुनिया के शांत और सहिष्णु हिंदू राष्ट्र के रूप में जाना जाता था, आज इस्लामी कट्टरपंथ और जनसांख्यिकीय असंतुलन (डेमोग्राफी चेंज) के भयंकर संकट से जूझ रहा है। इस वर्ष नेपाल में पवित्र सावन मास का शुभारंभ 17 जुलाई 2026 से हुआ। सावन चढ़ते ही नेपाल की तराई से लेकर पहाड़ियों तक ‘बम-बम भोले’ और ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष गूँजने लगे। लाखों सनातनी श्रद्धालु शिवभक्ति के उल्लास में काँवड़ लेकर बाबा भोलेनाथ के जलाभिषेक के लिए निकलने लगे।

लेकिन नेपाल के सुनसरी जिले के कप्तानगंज में काँवड़ियों पर हमले की जो रिपोर्ट्स सामने आई, उसने यह साफ कर दिया कि भारत की तरह नेपाल में भी सनातनी त्योहार और धार्मिक यात्राएँ इस्लामी कट्टरपंथियों की आँखों में खटकने लगी हैं। 26 जुलाई 2026 की रात काँवड़ियों पर हुआ जानलेवा हमला कोई अचानक हुआ हादसा या दो गुटों की मामूली कहासुनी नहीं था, बल्कि यह नेपाल की बदली डेमोग्राफी का नतीजा है।

स्थानीय पत्रकारों के मुताबिक, हिंदुओं की जान जाने के बाद नेपाल के सनातनी समाज ने अपनी चुप्पी तोड़ी। जनकपुर, विराटनगर से लेकर चितवन तक जिस तरह से हिंदू सड़कों पर उतरे और विरोध का परचम लहराया, उससे बालेन सरकार की चूलें हिल गईं। सरकार को न सिर्फ बैकफुट पर आना पड़ा, बल्कि पूरे इलाके में कर्फ्यू लगाना पड़ा।

हालाँकि बताया ये भी जा रहा है कि बाद की हिंसा में भी कम से कम 2 अन्य यानी 4 लोगों की मौत हुई है, लेकिन सरकार की तरफ से 2 ही मौतों की पुष्टि हुई है, क्योंकि समझौते भी 2 ही मृतकों के परिजनों के साथ हुए हैं। इस दौरान 15 साल के गणेश यादव की भी मौत की जानकारी मीडिया में सामने आई है। मीडिया रिपोर्ट्स में ये दावा किया जा रहा है कि ये जानें पुलिस की गोलियों से गई हैं और नेपाल सरकार भी इसी तरह के दावे कर रही है।

इस खास रिपोर्ट में हम बता रहे हैं कि कैसे नेपाल की बदलती डेमोग्राफी, वामपंथी मीडिया और इसके पीछे सक्रिय अंतरराष्ट्रीय साजिशों ने कभी हिंदू राष्ट्र रहे नेपाल में अब हिंदुओं को ही असुरक्षित बना दिया है। इस खास रिपोर्ट के लिए ऑपइंडिया के पत्रकार श्रवण शुक्ल ने नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार आचार्य डिल्ली से भी बातचीत की है।

​जानिए 26 जुलाई की हिंसा की पूरी क्रोनोलॉजी

​नेपाल के सुनसरी जिले में 26 जुलाई की रात जो घिनौना और खूनी खेल खेला गया, उसकी तैयारी कट्टरपंथियों द्वारा पहले ही कर ली गई थी। सोमवार की सुबह सनातनी काँवड़ियों को भगवान शिव का जलाभिषेक करना था।

इसके लिए श्रद्धालु पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ रात करीब 12 बजे ही अपने-अपने घरों से निकलने लगे थे। हाथों में जल, काँवड़, ढोल-डीजे और मुख में भगवान शिव का नाम पूरा माहौल भक्तिमय था।

काँवड़िये अपनी धुन में ‘बम-बम भोले’ की हुंकार भरते हुए शांतिपूर्वक अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे थे। तभी मुस्लिम बाहुल्य इलाके के पास घात लगाकर बैठे इस्लामी कट्टरपंथियों की उग्र भीड़ ने काँवड़ियों के जत्थे को घेर लिया।

कट्टरपंथियों ने यह कुतर्क देते हुए विवाद शुरू किया ‘तुम लोग हमारी तरफ से क्यों गुजर रहे हो? यहाँ DJ और जयकारे क्यों लगा रहे हो?’ इससे पहले कि निर्दोष और निहत्थे काँवड़िये कुछ समझ पाते, उपद्रवियों ने लाठी-डंडों, धारदार हथियारों और पत्थरों से हमला बोल दिया।

इस सुनियोजित हमले का सबसे खतरनाक और रणनीतिक पहलू यह था कि हिंसा शुरू होते ही पूरे इलाके की बिजली काट दी गई। गहरे अंधेरे का फायदा उठाकर इस्लामी भीड़ ने काँवड़ियों को बर्बरता से पीटना और काटना शुरू कर दिया।

हमले के काफी देर बाद पुलिस मौके पर पहुँची, लेकिन तब तक हमलावर अंधेरे में फरार हो चुके थे। नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार आचार्य डिल्ली का स्पष्ट दावा है कि इस खूनी हिंसा में मुस्लिम पक्ष के किसी भी व्यक्ति को खरोंच तक नहीं आई।

हिंसा का शिकार पूरी तरह से सनातनी हिंदू हुए। इस हमले में पटेल और मेहता समुदाय के लोगों को निशाना बनाया गया। इस हमले में दर्जनों काँवड़िये गंभीर रूप से घायल हो गए। यह सीधी और एकतरफा हिंसा थी। इस हमले के बाद पुलिस को मोर्चा संभालना पड़ा, जिसमें पुलिस की गोलीबारी में 2 हिंदुओं की मौत हो गई।

​सनातनी प्रतिरोध से थर्राया नेपाल: सड़कों पर उतरा हिंदू समाज, बैकफुट पर बालेन सरकार

​सुनसरी में सनातनी आस्था पर हुए इस बर्बर हमले के बाद पूरे नेपाल का वातावरण गरमा गया। दशकों से सहने और चुप रहने की नीति पर चल रहे नेपाल के हिंदू समाज का सब्र का बाँध इस बार टूट गया। हिंसा की खबर फैलते ही जनकपुर में हजारों की संख्या में हिंदू सड़कों पर उतर आए।

माता सीता की इस पावन भूमि पर सनातनियों ने अपनी एकजुटता का प्रदर्शन करते हुए विरोध जताया। विराटनगर में हिंदुओं ने विशाल रैलियाँ निकालीं और हत्यारों की तत्काल गिरफ्तारी की माँग की।

चितवन जिले में स्थानीय हिंदू संगठनों और आम जनता ने ऐतिहासिक बंद का आह्वान किया, जिसके चलते पूरा इलाका ठप्प हो गया। व्यापारिक प्रतिष्ठान बंद रहे, सड़कों पर चक्का जाम हो गया और हर तरफ सिर्फ एक ही माँग गूँज रही थी, सनातनियों के कातिलों को फाँसी दो और कट्टरपंथ को संरक्षण देना बंद करो।

नेपाल के इतिहास में यह पहला मौका था जब हिंदुओं ने इस स्तर पर संगठित होकर अपना प्रतिरोध दर्ज कराया। इस अभूतपूर्व जनाक्रोश और सनातनी एकजुटता को देखकर काठमांडू में बैठी बालेन सरकार और प्रशासन का पसीना छूट गया।

बालेन शाह की सरकार जो अब तक इस तरह के मामलों में ढुलमुल रवैया अपनाती रही थी, उसे तुरंत बैकफुट पर आना पड़ा। स्थिति को हाथ से निकलता देख सुनसरी और आसपास के कई संवेदनशील इलाकों में आनन-फानन में अनिश्चितकालीन कर्फ्यू लागू करना पड़ा।

भारी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती की गई। सनातनियों के इस प्रचंड आक्रोश ने बालेन सरकार को यह सख्त संदेश दे दिया कि अब नेपाल का हिंदू अपने खून का हिसाब माँगेगा और चुपचाप जुल्म नहीं सहेगा।

बालेन शाह सरकार ने 7 सूत्रीय समझौते के तहत हिंसा में मारे गए 2 हिंदुओं को शहीद यानी बलिदानी घोषित किया। उनके परिजनों को सरकारी नौकरी के साथ 10-10 लाख नेपाली रुपए का मुआजवा घोषित किया। इसके अलावा साथ ही हिंसा में घायल हुए हिंदुओं को 2-2 लाख रुपए की भी आर्थिक मदद की घोषणा की।

इस मामले में बालेन शाह सरकार की गृह मंत्रालय को सीधा हस्तक्षेप करना पड़ा। गुरुवार (30 जुलाई 2026) की देर रात गृह मंत्री सुदन गुरुङ की मौजूदगी में ओमप्रकाश मेहता और जयप्रकाश मेहता के परिजनों के साथ यह समझौता हुआ।

नेपाल सरकार और मृतकों के परिजनों के बीच लिखित समझौते की कॉपी (फोटो साभार: AAJ TAK)

समझौते का एक अहम बिंदु देवानगंज स्थित मदरसे की जाँच भी है। सरकार ने मदरसे की कानूनी स्थिति की तत्काल जाँच शुरू करने और वहाँ मौजूद किसी भी दोषी व्यक्ति को कानून के दायरे में लाने की प्रतिबद्धता जताई है। इसके साथ ही यह भी तय हुआ कि स्थानीय सरकार के सहयोग से घटना स्थल के आसपास मृतकों की स्मृति में एक स्मारक पार्क बनाया जाएगा।

इस समझौते के बाद शुक्रवार को मारे गए दोनों हिंदुओं के शव परिजनों को सौंपे गए और उनका अंतिम संस्कार हो सका। पर इन मीडिया रिपोर्ट्स में कहीं नहीं बताया गया कि ये हिंसा सांप्रदायिक थी और इस्लामी कट्टरपंथियों के हमलों में हिंदुओं की जान गई, बल्कि कहा गया कि ये हत्याएँ पुलिस ने की।

नेपाली मीडिया का घिनौना चेहरा आया सामने

​नेपाल में जब भी कोई इस्लामी हिंसा होती है, तो उसके पीछे सिर्फ कट्टरपंथियों की ताकत नहीं होती, बल्कि वहाँ के बिके हुए और हिंदू विरोधी मीडिया का एक बहुत बड़ा सुरक्षा कवच होता है।

ऑपइंडिया से बातचीत में वरिष्ठ पत्रकार आचार्य डिल्ली ने नेपाल के मुख्यधारा के मीडिया का ऐसा सच उजागर किया है, जो रोंगटे खड़े कर देने वाला है। आचार्य डिल्ली ने बताया कि नेपाल के लगभग 80 प्रतिशत पत्रकार, संपादक और साहित्यकार वैचारिक रूप से घोर वामपंथी और हिंदू विरोधी हैं।

यह वामपंथी इकोसिस्टम पूरी तरह से इस्लामी कट्टरपंथियों के बचाव में खड़ा रहता है। भारत के लिबरल और वामपंथी मीडिया की तर्ज पर नेपाल का मीडिया भी सनातन धर्म को बदनाम करने के लिए हिंदू आतंकवाद और उग्रवादी हिंदू जैसे मनगढ़ंत और घिनौने शब्दों का इस्तेमाल खुलेआम करता है।

जब सुनसरी में काँवड़ियों पर एकतरफा हमला हुआ, 3 हिंदू मारे गए और बिजली काटकर कत्लेआम किया गया, तब भी नेपाल के इस वामपंथी मीडिया ने हमलावरों का नाम तक छापने से परहेज किया।

स्थानीय मीडिया ने अपनी रिपोर्टिंग में इस जघन्य हत्याकांड को दो समुदायों के बीच मामूली झड़प बताकर पेश किया। यह वामपंथी मीडिया का वह पुराना पैंतरा है, जिसके जरिए इस्लामी हिंसा पर वाइटवॉश पोती जाती है। नेपाल के नेता भी ऐसे ही करते आ रहे हैं।

अपराधियों और जिहादियों के मुस्लिम नामों को छिपा दिया जाता है और पूरी कहानी को ऐसा बना दिया जाता है जैसे गलती हिंदुओं की ही थी जो वे वहाँ से गुजर रहे थे। नेपाल का यह वामपंथी गैंग पत्रकारिता के नाम पर इस्लामी कट्टरपंथ के एजेंडे को खाद-पानी देने का काम कर रहा है।

​नेपाल में मुसलमानों का इतिहास: 1825 से 2017 तक, कैसे चार चरणों में बदली आबादी

​नेपाल में अचानक इस्लामी कट्टरपंथ का यह तूफान कहाँ से आया, इसे समझने के लिए नेपाल में मुस्लिम आबादी के आगमन और उनकी जनसांख्यिकी के इतिहास को समझना बेहद जरूरी है। आचार्य डिल्ली ने ऑपइंडिया के श्रवण शुक्ला को नेपाल में मुसलमानों के बसने की पूरी क्रोनोलॉजी चरणबद्ध तरीके से समझाई।

नेपाल में मुसलमानों का आगमन मुख्यतः चार ऐतिहासिक चरणों में हुआ। पहला चरण 1825 के आसपास का था जब नेपाल का एकीकरण हुआ और उस दौरान वाराणसी से कुछ मुस्लिम कारीगरों व व्यवसायियों को नेपाल लाया गया।

इसी कालखंड में जब तत्कालीन राजा कृष्णा महाराज ने वाराणसी में विवाह किया, तो उनके साथ भी कुछ मुस्लिम सेवक और नागरिक नेपाल आकर बसे, जो उस समय बेहद सीमित और शांत आबादी थी। दूसरा चरण 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय आया जब अंग्रेजों ने लखनऊ पर कब्जा किया और अवध की बेगम हज़रत महल भागकर नेपाल की शरण में गईं।

उनके साथ बड़ी संख्या में उनके समर्थक और मुस्लिम नेपाल की सीमा में दाखिल हुए और तराई के इलाकों में बस गए। तीसरा चरण 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन के समय का था जब सीमावर्ती जिलों के लोग नेपाल में जाकर बस गए।

चौथा और सबसे खतरनाक चरण 2017 के बाद देखा गया जब उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ ने सत्ता संभाली और अपराधियों तथा कट्टरपंथियों पर नकेल कसी गई, जिससे डरकर यूपी के सीमावर्ती जिलों से भागकर सैकड़ों संदिग्ध तत्व नेपाल की खुली सीमा का फायदा उठाकर वहाँ छुप गए। इस चरण की शुरुआत रोहिंग्या की एंट्री से ही शुरू हो गई थी, लेकिन यूपी में योगी सरकार आने के बाद घुसपैठियों का भारत से नेपाल पलायन तेज हो गया और अब पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सत्ता जाने के बाद इस्लामी भीड़ बड़ी-बड़ झुंडों में नेपाल में घुसपैठ करने लगी।

इन चार चरणों के बाद और विशेष रूप से नेपाल में राजशाही के अंत के बाद स्थिति पूरी तरह से बिगड़ गई। लोकतंत्र की आड़ में नेपाल में मुस्लिम आयोग का गठन किया गया और उसे संवैधानिक दर्जा दे दिया गया, जिसके बाद से नेपाल में इस्लामी गतिविधियों और कट्टरपंथ को कानूनी व राजनीतिक ढाल मिल गई।

​बिहार से सटे जिलों में ओवैसी का प्रभाव, रोहिंग्या-बांग्लादेशी घुसपैठ और नकली दस्तावेजों का खेल

​भारत और नेपाल की सीमा खुली होने का सबसे बड़ा खामियाजा आज नेपाल के सीमावर्ती जिलों को भुगतना पड़ रहा है। बिहार से सटे नेपाल के जिलों जैसे सुनसरी, मोरंग, पर्सा, बारा और रौतहट में मुस्लिम आबादी में अप्रत्याशित वृद्धि दर्ज की गई है।

इस इलाके में भारत के कट्टरपंथी नेता असदुद्दीन ओवैसी की विचारधारा का प्रभाव तेजी से बढ़ा है और स्थानीय इस्लामी तत्व उसी आक्रामक राजनीति का अनुसरण कर रहे हैं। इससे भी ज्यादा भयावह बात रोहिंग्याओं और अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों का नेपाल में जमघट है।

आचार्य डिल्ली ने खुलासा किया कि जब से पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के शासन के दौरान जनसांख्यिकी बदली, तब से बांग्लादेशी और रोहिंग्या भारत के रास्ते नेपाल में घुसपैठ कर रहे हैं और वर्ष 2011 के बाद से इनकी संख्या में हजारों का इजाफा हुआ है।

इस पूरे खेल के पीछे भारत और नेपाल के एजेंटों का एक संगठित सिंडिकेट काम कर रहा है, जो फर्जीवाड़ा करके पहले इन घुसपैठियों के भारत के जाली आधार कार्ड और वोटर ID बनाता है, फिर नेपाल की खुली सीमा पार कराकर स्थानीय राजनीतिक आकाओं की मदद से उनके नेपाली नागरिकता के कागजात और पासपोर्ट तक बनवा देता है।

चिंता की बात यह है कि ये रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठिये अब केवल तराई तक सीमित नहीं हैं, बल्कि नेपाल के शांत और संवेदनशील पहाड़ी इलाकों में भी अपनी जगह बना रहे हैं।

​सऊदी-कतर की फंडिंग, 25 मस्जिद-मदरसे और कतरी शेख का राज: सांसद अमरेश सिंह का बड़ा खुलासा

​नेपाल में अचानक उग आई हजारों नई मस्जिदें और आलीशान मदरसे इस बात का सबूत हैं कि यह सब बिना बेहिसाब पैसे के संभव नहीं है। नेपाल में इस कट्टरपंथ के आर्थिक ताने-बाने का पर्दाफाश नेपाल के निर्भीक सांसद डॉ अमरेश कुमार सिंह ने किया था। उन्होंने नेपाल की संसद में पूरे 5 बार इस गंभीर मुद्दे को उठाया है कि कैसे विदेशी पैसा नेपाल की राष्ट्रीय सुरक्षा को खोखला कर रहा है।

वरिष्ठ पत्रकार आचार्य डिल्ली ने बताया, “सांसद अमरेश सिंह ने संसद में कहा था कि जब कतर का एक शेख नेपाल के दौरे पर आया था, तो उसका असली मकसद निवेश नहीं बल्कि सीधे तौर पर 25 नई मस्जिदों और 25 बड़े मदरसों की स्थापना करना था और वह बांग्लादेश के रास्ते नेपाल पहुँचा था। जब कतर के इस गुप्त एजेंडे की जानकारी भारत की खुफिया एजेंसियों को मिली, तो भारत सरकार ने तत्काल इस पर अत्यंत कड़ा ऐतराज जताया, जिसके बाद कतरी शेख को वापस लौटना पड़ा।”

इसके अलावा आचार्य डिल्ली और स्थानीय सूत्रों का कहना है कि सऊदी अरब और कतर जैसे खाड़ी देशों से हर महीने नेपाल के सीमाई इलाकों में बेहिसाब फंडिंग आ रही है, जिसका इस्तेमाल मस्जिद-मदरसे बनाने, स्थानीय गरीब आबादी का धर्मांतरण कराने और सनातनी परंपराओं को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है।

​नेपाल के अस्तित्व पर मँडराता संकट और भारत के लिए चेतावनी

​सुनसरी में सावन के महीने में काँवड़ियों पर हुआ हमला कोई अकेली घटना नहीं है, बल्कि यह उस बड़े चक्रव्यूह की एक कड़ी है जो नेपाल को एक शांत हिंदू बहुल देश से कट्टरपंथी वामपंथी-इस्लामी प्रयोगशाला में बदलने के लिए रचा जा रहा है।

17 जुलाई 2026 से शुरू हुए इस पावन महीने में जब सनातनी अपने ईश्वर की आराधना कर रहे थे, तब उन्हें अपनी जान गँवानी पड़ी। 3 सनातनी भाइयों का बलिदान, वामपंथी मीडिया का पक्षपाती रवैया, रोहिंग्याओं की अनियंत्रित घुसपैठ और खाड़ी देशों की पेट्रो-डॉलर फंडिंग यह बताने के लिए काफी है कि पानी सिर से ऊपर जा चुका है।

हालाँकि इस पूरे काले अध्याय में उम्मीद की एकमात्र किरण नेपाल के सनातनियों का अप्रत्याशित जागरण है। जनकपुर, विराटनगर और चितवन में हिंदुओं ने जिस तरह से अपनी एकजुटता दिखाई और बालेन सरकार को बैकफुट पर धकेला, उसने यह साबित कर दिया है कि नेपाल की आत्मा अभी मरी नहीं है।

नेपाल सरकार को यह समझना होगा कि तुष्टिकरण और वामपंथी दबाव में आकर कट्टरपंथियों को दी जा रही ढील अंततः नेपाल की अपनी संप्रभुता को निगल जाएगी। वहीं भारत के लिए भी यह एक बहुत बड़ा चेतावनी संकेत है कि नेपाल की खुली सीमा का इस्तेमाल करके रचा जा रहा यह डेमोग्राफिक चेंज भारत के सीमावर्ती राज्यों की सुरक्षा के लिए सीधा खतरा है।