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लाहौर में 79 साल बाद खुला ऐतिहासिक गुरुद्वारा, दिखावे के बीच पाकिस्तान में जमीनी हकीकत जस की तस: समझें ये विरासत संरक्षण के नाम पर सॉफ्ट पावर चमकाने की क्यों है कोशिश

आजकल ऐसा दिखाया जा रहा है कि पाकिस्तान इन दिनों सभ्यतागत चीजों की तरफ बढ़ रहा है। हालाँकि जमीन पर ऐसा कुछ है नहीं लेकिन अपने यहाँ का लेफ्ट लिबरल मीडिया खबरों के जरिए पाकिस्तान को बड़ा ग्लैमराइज कर रहा है कि वो अब सिख विरासतों को संजोने और उनके जीर्णोद्धार का काम कर रहा है।

द वायर की ये खबर आप देखिए। लाहौर में 79 साल बाद खुला पातशाही छेंवी गुरुद्वारा। लाहौर-कसूर रोड पर मौजूद इस गुरुद्वारे का संबंध सिखों के छठे गुरु गुरु हरगोबिंद साहिब जी से है।

इस गुरुद्वारे का निर्माण 1923 में हुआ था। तब ये काफी बड़े क्षेत्र में फैला हुआ था। यहाँ पर लंगर की व्यवस्था होती थी, उस वक्त यहाँ पर एक बड़ा सरोवर भी था और श्रद्धालुओं के ठहरने की व्यवस्था भी थी।

अब पार्टिशन के बाद जो अन्य गुरुद्वारों या मंदिरों के साथ हुआ उसी दर्द से ये गुरुद्वारा भी गुजरा। बँटवारे की हिंसा में ये गुरुद्वारा बुरी तरह प्रभावित हुआ। सिख समुदाय के लोग भी पाकिस्तान से भारत आ गए और गुरुद्वारा वीरान हो गया। इसके सरोवर को मिट्टी से भर दिया गया। जमीन पर कब्जा कर लिया गया और गुरुद्वारे के भीतर एक पीर की मजार तक बना दी गई।

ये सब किसने किया होगा? शायद मुझे ये सब बताने की जरूरत नहीं है, आप खुद इतने समझदार हैं ये समझने के लिए कि पाकिस्तान के मुसलमानों ने ये सब कारनामे किए।

लेकिन ये सब छुप जाएगा उस हेंडिग के पीछे कि पाकिस्तान में गुरुद्वारे का जीर्णोद्धार या 79 साल बाद खुला। दरअसल, इसे पाकिस्तान की छवि सुधार कार्यों में दिखाने की कोशिश की जा रही है और ये ऐसे मौकों पर हो रही है, जब इधर पंजाब में असेंबली इलेक्शन होने हैं। और जब सतलुज फिल्म पर एक तरह की टशन देखने को मिल रही है कि इस फिल्म ने खालिस्तानी नैरेटिव को एकतरफा दिखाया है और सिक्के के दूसरे पहलू को छुआ तक नहीं है और इवन पाकिस्तान ने जो खालिस्तान आंदोलन को उस वक्त फ्यूल दिया, उसकी भी कोई चर्चा इस फिल्म में देखने को नहीं मिलती है।

हैरानी की बात तो ये है कि पाकिस्तान में सतुलज फिल्म के रिलीज की माँगें उठ रही हैं। फिल्म को बिना देखे ही वो इसकी जमकर तारीफ भी कर रहे हैं और अपनी सरकार से माँग कर रहे हैं कि वो सभी सिनेमाघरों में इस फिल्म को रिलीज करें।

ये वही पाकिस्तानी हैं, जो धुरंधर का विरोध कर रहे थे, उसे प्रॉपगेंडा फिल्म बता रहे थे। तब पाकिस्तान में धुरंधर पर आधिकारिक तौर से बैन लगा दिया गया था क्योंकि उसमें पाकिस्तान एक्सपोज हो रहा था और इस फिल्म में चूँकि पाकिस्तान का कहीं कोई निशान नहीं है तो उसे अपने यहाँ रिलीज करने की माँग कर रहे हैं।

ऐसे समय में जब पाकिस्तान में 79 साल बाद एक ऐतिहासिक गुरुद्वारे का जीर्णोद्धार कर उसे खोला गया और दूसरी ओर सतलुज जैसी फिल्म को वहाँ से सार्वजनिक समर्थन मिल रहा है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह सिर्फ अलग-अलग घटनाएँ हैं या फिर पाकिस्तान सिख पहचान और पंजाब से जुड़े मुद्दों को अपनी सॉफ्ट पावर और नैरेटिव बिल्डिंग के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा है और इसे भारत का लेफ्ट लिबरल मीडिया ग्लैमराइज कर रहा है।

जबकि पाकिस्तान का सच तो इससे बिलकुल अलग है। अगर पाकिस्तान को इतनी चिंता होती है या सिख विरासतों को संजोने का उसका सच में मन होता तो वो गुरुद्वारों को क्यों तोड़ता? अभी हाल ही में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में 125 साल पुराने एक ऐतिहासिक गुरुद्वारे का ढहा दिया गया। ये खबर कोई बहुत पुरानी नहीं है पिछले महीने जून की खबर है।

पाकिस्तान में ढहाए गए गुरुद्वारे की तस्वीर, फोटो साभार: ndtvimg

अगर पाकिस्तान वास्तव में सिख विरासत के संरक्षण को लेकर गंभीर है तो एक सवाल उसके अपने इतिहास से भी जुड़ता है। 1947 के बँटवारे के बाद पाकिस्तान में मौजूद सैकड़ों छोटे-बड़े ऐतिहासिक गुरुद्वारे धीरे-धीरे लोगों की यादों से ही गायब हो गए।

आज स्थिति ये है कि अमेरिका में रहने वाले रिसर्चर तरुणजीत सिंह बुटालिया को 1884 और 1947 से पहले पब्लिश्ड गुरमुखी पुस्तकों की मदद से इन भूले-बिसरे गुरुद्वारों की दोबारा खोज करनी पड़ रही है। इन पुस्तकों में पाकिस्तान में मौजूद करीब 250 ऐतिहासिक सिख स्थलों का उल्लेख मिलता है। इनमें से कई गुरुद्वारे खंडहर बन चुके हैं, कई पर मुसलमानों ने कब्जा कर लिया, कुछ स्कूलों या दूसरी इमारतों में बदल गए और कई पूरी तरह मिट चुके हैं। सिर्फ लाहौर जिले में दर्ज 38 ऐतिहासिक सिख स्थलों में से आज केवल 5 ही गुरुद्वारों के रूप में सक्रिय हैं, जबकि बाकी या तो जर्जर हैं, अतिक्रमण का शिकार हैं या उनका अस्तित्व ही समाप्त हो चुका है।

अमेरिका में रहने वाले रिसर्चर तरुणजीत सिंह बुटालिया

ऐसे में अगर आज पाकिस्तान 79 साल बाद किसी एक ऐतिहासिक गुरुद्वारे को बड़े स्तर पर खोलता है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह वास्तव में दशकों से उपेक्षित पूरी विरासत को पुनर्जीवित करने की शुरुआत है या फिर कुछ चुनिंदा प्रतीकों के जरिए अपनी एक नई छवि गढ़ने की कोशिश।

पाकिस्तान वो देश है जहाँ विभाजन के बाद हिंदू और सिख आबादी लगातार घटती गई। यही वो देश है जहाँ दशकों तक हजारों मंदिरों और गुरुद्वारों को ध्वस्त कर दिया गया। यही वो देश है जो भारत में लगातार आतंकी हमले करवाता रहा है, खालिस्तानी आतंकियों और जिहादी संगठनों को अपने देश में सुरक्षित पनाह देता रहा है। लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिज्बुल मुजाहिदीन जैसे जिहादी गिरोहों के नाम पूरी दुनिया में पाकिस्तान के साथ जुड़ते रहे हैं।

अब इसी पाकिस्तान की तरफ से लगातार सिख विरासत को लेकर नई-नई पहलें देखने को मिल रही हैं। पहले करतारपुर कॉरिडोर। फिर ननकाना साहिब के विकास की बातें। अब 79 साल बाद गुरुद्वारा पटशाही छठवीं का दोबारा खुलना। क्या यह सिर्फ धार्मिक संरक्षण है? या सिख समुदाय के बीच अपनी छवि बेहतर बनाने की एक सॉफ्ट पावर रणनीति?

यहीं एक और सवाल खड़ा होता है। क्या पाकिस्तान भारत के आंतरिक मामलों को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा है?

इतिहास बताता है कि पाकिस्तान ने कई बार धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों का इस्तेमाल अपनी विदेश नीति किया है।

अब सवाल उठता है कि क्या पाकिस्तान में बचे हुए मुट्ठीभर हिंदू और सिख पूरी तरह सुरक्षित हैं? क्या जबरन धर्मांतरण के मामलों पर स्थिति बदल गई है? क्या उनकी बेटियों का जबरन मुसलमानों द्वारा उठाया जाना रुक गया है? क्या वहाँ के सभी ऐतिहासिक मंदिर और गुरुद्वारे भी उसी गंभीरता से संरक्षित किए जा रहे हैं?

और सबसे बड़ा सवाल कि क्या पाकिस्तान ने आतंकवाद और कट्टरपंथ की अपनी पुरानी आदत को पूरी तरह छोड़ दिया है?

जब तक इन सवालों के स्पष्ट जवाब नहीं मिलते, तब तक किसी एक गुरुद्वारे के खुलने को पाकिस्तान की नई सोच का प्रमाण मान लेना सबसे बड़ी गलतफहमी होगी।

धार्मिक विरासत का संरक्षण निश्चित रूप से अच्छी बात है। लेकिन किसी भी देश की असली पहचान उसके स्मारकों से नहीं, बल्कि उसके वर्तमान व्यवहार और नीतियों से तय होती है।

पाकिस्तान को अगर सिख सिविलाइजेशन की जरा भी चिंता होती तो वहाँ महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा तीन-तीन बार नहीं टूटती। महाराज रणजीत सिंह जो सिख साम्राज्य के संस्थापक थे, जिनका शासन अफगानिस्तान से लेकर दिल्ली की सीमा तक फैला हुआ था। उस महान शासक की एक कांस्य प्रतिमा लाहौर किले में मौजूद है।

इस पर अब तक तीन बार हमला हो चुका है। 2019 में जैसे ही जम्मू-कश्मीर से धारा 370 का खात्मा हुआ तो उधर पाकिस्तान में महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा तोड़ दी गई। साल 2021 में तो महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा गायब हो गई और केवल घोड़ा शेष रहा।

सवाल ये भी है कि पाकिस्तान के सरकारी दफ्तरों में या फिर नेताओं के ऑफिसों में भगत सिंह की कितनी तस्वीरें हैं? पाकिस्तान के मदरसों या स्कूलों के सिलेबस से भगत सिंह क्यों गायब हैं? अगर आप सिख पहचान को ओन करना चाहते हैं तो ये उस पहचान के एक बड़े नायक हैं जो पाकिस्तान में गायब हैं और केवल ये नहीं ऐसे कई आजादी के नायक हैं जिनका जिक्र तक पाकिस्तान में नहीं होता है लेकिन वहाँ पर जिहादियों की तस्वीरों की भरमार जरूर है।

आपने कितनी बार भगत सिंह की जन्मतिथि या पुण्यतिथि को सेलिब्रेट किया है? कभी नहीं, तो फिर ये सेलेक्टिव ओनरशिप क्यों है? ये समझना हम सबके लिए बहुत जरूरी है ताकि हम पाकिस्तान और अपने यहाँ की वामपंथी मीडिया के झाँसे में ना फँसें।

एमबाप्पे VS यमाल: FIFA World Cup के सेमीफाइनल में मजबूत फ्रेंच अटैक का मुकाबला शानदार स्पेनिश डिफेंस से, लगातार तीसरी बार फाइनल में एंट्री के लिए उतरेंगे ‘लेस ब्लूज’

पिछले दो दशकों तक हमने फुटबॉल में दो बहुत बड़े खिलाड़ियों को खेलते देखा। आठ बार के ‘बैलॉं-दी-ओर’ विजेता लियोनेल आंद्रेस मेस्सी और मिस्टर चैंपियन्स लीग क्रिस्टियानो रोनाल्डो। इन दोनों ही खिलाड़ियों की प्रतिद्वंद्विता ने दो दशक से थोड़ा और ज्यादा समय तक हमें इस खेल से बाँधे रखा। लेकिन अब जब यह दोनों ही खिलाड़ी अपने फुटबॉल करियर का सूर्यास्त देख रहे हैं तो स्वाभाविक है कि फुटबॉल जगत अगली प्रतिद्वंद्विता खोजेगा।

ऐसे में नजर आकर टिकती है फ्रेंच सितारे किलिएन एमबाप्पे और युवा स्पेनिश सनसनी लामीन यमाल पर। दोनों ही दो ऐसे क्लबों के लिए फुटबॉल खेलते हैं जिनकी आपसी रंजिश जगजाहिर है। और हाल के वर्षों में तो यह दोनों ही सितारे अपनी अपनी राष्ट्रीय टीमों के लिए खेलते हुए कई बड़े मंचों पर टकरा भी चुके हैं।

लेकिन मंगलवार (14 जुलाई 206) की रात एकबार फिर टक्कर होगी किलिएन एमबाप्पे और युवा स्पेनिश सनसनी लामीन यमाल की। क्योंकि टक्कर होगी फ्रांस व स्पेन की टीमों की।

डलास स्टेडियम में भारतीय समयानुसार रात 12.30 बजे बेहद घातक फ्रेंच जहाज़ी बेड़ा स्पेनिश बंदरगाहों को जीत कर उन्हें कब्जाने की मंशा से इस जंग में उतरेगा। मौका है फीफा विश्व कप के पहले सेमीफाइनल का। यह निश्चित रूप से एक ब्लॉकबस्टर मैच होने जा रहा है।

अब विश्व कप की ट्रॉफी मात्र दो जीत की दूरी पर है। दोनों ही टीमें मैदान में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देंगी। दोनों ही कैसे भी यह मुकाबला जीतने की मंशा मन में लिए मैदान पर उतरेंगी। फ्रांस 1998 और 2018 में दो बार विश्व कप का खिताब जीत चुका है। वह पिछले संस्करण में भी फाइनल मैच का हिस्सा थे। वहीं 2010 में विश्व कप विजेता रही स्पेन मौजूदा यूरो विजेता है। वह अपनी जर्सी में एक और सितारा जड़ कर सदैव के लिए इतिहास में अमर हो जाने के लिए लालायित है।

मंगलवार की रात फाइनल का टिकट पाने के लिए जबरदस्त अटैकिंग फुटबॉल खेल रही और इस टूर्नामेंट की सबसे संतुलित टीम फ्रांस का सामना होगा उनके हालिया वर्षों के चिर प्रतिद्वंद्वी स्पेन से। स्पेन की रक्षापंक्ति ने पूरे टूर्नामेंट में अबतक मात्र एक गोल खाया है। लेकिन वो गोल दागने के लिए भी संघर्षरत नजर आए हैं। वहीं लेस ब्ल्यूज़ तो बेहद घातक तरीके से मैदान के हर छोर से अटैक करते नजर आए हैं।

डलास स्टेडियम में मजबूत अटैकिंग फोर्स एक बेहद मजबूत रक्षापंक्ति की परीक्षा लेती दिखेगी। कई पुराने हिसाब भी चुकता किए जाने हैं। यह बेहद शानदार मैच रहने वाला है।

फ्रेंच कोच दीदीएर देशां शायद अपनी टीम को 4-2-3-1 की फॉर्मेशन में मैदान पर उतारें। अटैकिंग लाइन में घातक फॉर्म में चल रहे एमबाप्पे, डेंबेले और युवा सनसनी देसिरे दोउ रहेंगे। मिडफील्ड का जिम्मा संभालेंगे अब तक टूर्नामेंट में सबसे ज्यादा असिस्ट दे चुके माइकल ओलीस। उनके संग आद्रियन राबियो और मानू कोने होंगे। रक्षापंक्ति में सलिबा संग उपामेकानो, जूल्स कूंदे और लुका डीने मौजूद रहेंगे। लेस ब्ल्यूज़ की बेंच पर चेर्की, माटेटा, थुर्रम, देसिरे दोऊ जैसे अटैकर्स हैं जो बेंच से आकर भी कुछ ही पलों में मैच का रुख बदलने का माद्दा रखते हैं। यह उन्हें बेहद ही घातक बना देता है।

ऐसा प्रतीत होता है कि यह फ्रेंच टीम विश्व कप का खिताब जीतने के मकसद से ही इस टूर्नामेंट में उतरी है और इनके विजय-रथ को रोकने का दुस्साहस शायद ही कोई टीम कर सकेगी। अभी तक के इनके तमाम मैच तो यही दर्शाते हैं। आप जब उन्हें खेलते हुए देखते हैं तो कुछ भी कमी आपको नजर नहीं आती।

वहीं कोच लुई डे ला फुएन्ते के स्पेन की बात करें तो उनकी फॉरवर्ड लाइन का मिडफील्ड द्वारा प्रदान किए जा रहे मौकों को गोल में न बदल पाना एक बड़ा चिंता का विषय रहा है।

मिडफील्ड में रोड्री के संग फैबियान रुईज़ ऐर दानी ओल्मो मौजूद रहेंगे। आगे अटैकिंग लाइन में सेंट्रल फॉरवर्ड ओयारजाबाल का साथ देने के लिए विंगर्स के रूप में एलेक्स बाएना और लामीन यमाल को मैदान पर उतारा जाना तय है, जबकि नीको, फेरां तोरे, गावी, मिकेल मेरीनो, विक्टर मुनोज़, पेड्री जैसे मजबूत खिलाड़ी बेंच पर मौजूद रहेंगे। चोट से उबर रहे नीको को हमने पुर्तगाल के खिलाफ मैच में कुछ पलों के लिए मैदान पर देखा था। अगर उनको मैच की शुरुआत से मैदान पर उतारा जाता है तो स्पेन की अटैकिंग लाइन को जबरदस्त धार मिल जाएगी।

पाउ कुबार्सी और आयम्रिक लापोर्त के नेतृत्व में स्पेनिश डिफेंस पर बड़ी जिम्मेदारी होगी फ्रेंच अटैक को काबू में रखने की। उन्हें मैच में बने रहने के लिए डेंबेले, एमबाप्पे, देसिरे दोउ और माइकल ओलीस़ की चौकड़ी पर 90 मिनट तक लगाम लगाए रखनी होगी। और इसमें निश्चित ही उन्हें अपने मिडफील्ड का सहयोग भी चाहिए होगा।

अगर फिर एक बार ओयारजाबाल खामोश रह जाते हैं तो कोच लुई डे ला फुएन्ते अपने डैगर मिकेल मेरीनो की ओर एकबार फिर बड़ी उम्मीदों से देख रहे होंगे।

मंगलवार की रात दो अलग विचारधाराओं की भी टक्कर होगी। बेखौफ फ्रेंच अटैक स्पैनिश मिडफील्ड के संपूर्ण नियंत्रण से टकराएगा।

स्पेन अगर अपने मिशन में असफल रहती है तो ‘लेस ब्लूज’ पश्चिमी जर्मनी के पश्चात लगातार तीन बार विश्व कप के फाइनल खेलने वाली पहली टीम बन जाएगी। यह पिछले डेढ़ दशक में वैश्विक मंच पर उनके दबदबे को भी दर्शाता है।

जुलाई माह की इस गर्म रात में आपको बस इतना करना है कि या तो किसी कैफे में या घर पर ही अपना पसंददीदा पेय पदार्थ और पसंदीदा चिप्स लिए इस मैच पर नजरें गड़ाए रखनी हैं और फुटबॉल की खबरों हेतु हमारे साथ बने रहना है।

एक फुटबॉल फैन के लिए ऐसा जादू फिर न जाने कब हो।

सपा कार्यकर्ताओं को राम मंदिर-पौधरोपण का मुद्दा देकर खुद विदेश घूमने निकले अखिलेश जी: क्या UP चुनाव के लिए यही है आपकी राजनीति?

कहते हैं, “नेतृत्व की असली पहचान चुनावी मंच पर नहीं, मुश्किल समय में होती है।” जब जनता सवाल पूछ रही हो, सरकार फैसले ले रही हो और राजनीति अपने सबसे गर्म दौर में हो, तब यह भी देखा जाता है कि नेता मैदान में खड़ा है या हजारों किलोमीटर दूर बैठकर सोशल मीडिया से राजनीति कर रहा है।

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार इस समय राम मंदिर चढ़ावा विवाद पर जाँच कर रही है, पौधरोपण अभियान को लेकर बडे़ स्तर पर सक्रिय है। ऐसे वक्त में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव विदेश दौरे पर हैं। ऑपइंडिया को मिली जानकारी के अनुसार, अखिलेश यादव निजी दौरे पर अमेरिका गए हैं, और वहाँ से लंदन की यात्रा कर वापस भारत लौटेंगे।

ये वही अखिलेश यादव हैं, जो अपनी विदेश यात्रा के ठीक एक दिन पहले अपनी राजनीति चमकाने के लिए मेरठ में दलित छात्रा ललिता गौतम से मिलते हैं। उससे पहले योगी सरकार के पौधरोपण अभियान को ‘भ्रष्टाचार’ बता देते हैं और अपने हिस्से का जनता को बरगलाकर खुद गर्मियों की छुट्टियाँ मनाने विदेश चले जाते हैं।

हजारों किलोमीटर दूर से सोशल मीडिया पर राजनीति कर रहे अखिलेश यादव

दिलचस्प बात यह है कि विदेश जाने से पहले अखिलेश यादव अपनी सोशल मीडिया टीम को ठीक ढंग से समझाकर गए हैं। तभी तो उत्तर प्रदेश से हजारों किलोमीटर दूर पहुँचने के बाद भी अखिलेश यादव के सोशल मीडिया पोस्ट बंद नहीं हो रहे हैं। उनकी टीम योगी सरकार को घेरते हुए हर घंटे पोस्ट शेयर कर रही है।

अखिलेश यादव की ताजा पोस्ट भी योगी सरकार के बड़े पौधरोपण अभियान को निशाना बनाने वाली है। इस पोस्ट में उन्होंने अपना पुराना आरोप दोहराते हुए पूरे अभियान को ‘भ्रष्टारोपण’ अभियान बताया। इसके साथ उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मंच पर पौधरोपण करते हुए एक वीडियो भी साझा किया।

इतना ही नहीं, पर्यावरण संरक्षण और हरियाली बढ़ाने जैसे अभियान पर राजनीतिक हमला करते हुए उन्होंने इसे ‘एनकाउंटर’ तक कह दिया।

पहले भी राजनीति छोड़ विदेश घूमने गए समाजवादी पार्टी के मुखिया

यह पहली बार नहीं है, जब उत्तर प्रदेश की राजनीति छोड़ अचानक अखिलेश यादव विदेश घूमने निकल गए हों। पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई मौके आए, जब प्रदेश की राजनीति गरमाई हुई थी, लेकिन समाजवादी पार्टी के मुखिया विदेश यात्रा पर रहे। पार्टी ने हर बार इन दौरों को निजी बताया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इनकी टाइमिंग पर चर्चा जरूर हुई।

जून 2018 में अखिलेश यादव परिवार के साथ एक विदेशी छुट्टी पर रवाना हुए थे। उस समय समाजवादी पार्टी उपचुनावों में मिली सफलता के बाद विपक्षी दलों को एकजुट करने की कोशिश कर रही थी। वहीं, लखनऊ के सरकारी बंगले को खाली करने और उसमें नुकसान के आरोपों को लेकर भी उनकी राजनीति के केंद्र में चर्चा हो रही थी। ऐसे समय में उनके विदेश जाने को लेकर सवाल भी उठे थे।

और 2020 में जब हाथरस कांड पूरे देश की राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ था। कॉन्ग्रेस से लेकर विपक्षी दलों के नेता लगातार हाथरस पहुँच रहे थे। लेकिन उस समय अखिलेश यादव विदेश में थे।

2025 में संसद के बजट सत्र के आसपास भी अखिलेश यादव परिवार के साथ लंदन टूर पर गए थे। तब तक 2024 लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में मजबूत वापसी कर चुकी थी और अखिलेश यादव राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष के प्रमुख चेहरों में शामिल हो चुके थे। इस समय जब देश में राजनीति करनी चाहिए थी, तब वह जश्न मनाने विदेश में थे।

यानी न तो अखिलेश यादव ने अपनी पार्टी को मजबूत करने पर ध्यान दिया, न प्रदेश में किसी मुद्दे पर सक्रियता से भाग लिया और न ही खुद पर आए आरोपों का जवाब देने की उन्हें फुरसत मिली क्योंकि समाजवादी पार्टी के मुखिया विदेश घूमने में व्यस्त थे।

विदेश रवाना होने से पहले अखिलेश यादव का जनता को बरगलाने का ढोंग

अब बात करें कि 2026 की अमेरिका के लिए विदेश यात्रा रवाना होने से ठीक पहले अखिलेश यादव क्या कर रहे थे? तो अखिलेश लगातार योगी सरकार को अलग-अलग मुद्दों पर घेर रहे थे। इनमें प्रमुख तौर पर राम मंदिर चढ़ावा विवाद को लेकर लगाए गए आरोप हैं, और यह भी सच है कि सबसे पहले इस विवाद को सामने लाने वाली भी समाजवादी पार्टी ही है।

फिलहाल अखिलेश यादव योगी सरकार के पौधरोपण अभियान को निशाना साध रहे हैं, जिसके तहत यूपी सरकार ने 40 करोड़ से ज्यादा पौधरोपण का रिकॉर्ड बना लिया है। लेकिन अखिलेश यादव को इसमें भी ‘भ्रष्टाचार’ नजर आ रहा है।

यह केवल अखिलेश यादव के ताजा आरोप हैं, जिनके माध्यम से वह जनता के मन में योगी सरकार के लिए जहर घोल रहे थे। प्रेस कॉन्फ्रेंस करके लगातार नए-नए आरोप योगी सरकार पर मढ़ रहे थे, जिससे लगने भी लगा था कि अखिलेश यादव को वाकई में उत्तर प्रदेश की राजनीति में दिलचस्पी है। लेकिन इतने में ही वो ट्रिप पर विदेश निकल लिए। अब जनता यह पूछ रही है कि अखिलेश जी ने जो भी मुद्दे उठाए थे, उनका करना क्या है क्योंकि जनता ने तो उन्हें सीरियस ले लिया था। पर कहाँ पता था कि यह सब अखिलेश यादव के जनता को बरगलाने के पैतरें थे।

अखिलेश, तेजस्वी, राहुल… सब विदेश में बैठकर चमका रहे राजनीति

एक तरफ अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावों में सत्ता हथियाने का ख्वाब बुन रहे हैं, दूसरी तरफ हर जरूरी मौकों पर विदेश यात्राएँ पर घूमने निकल पड़ते हैं। उन्होंने राम मंदिर चंदा चोरी के नाम पर हिंदुओं को जगाने का ढोंग कर, दलित छात्रा की हत्या पर अपने मतलब की राजनीति कर और पौधरोपण जैसे पॉजिटिव काम को भ्रष्टाचार बताकर, अपने समर्थकों को झुनझुना थमा दिया है और अब उनके समर्थक पूछ रहे हैं कि इसे बजाना कैसे हैं?

अखिलेश यादव अकेले ऐसे नेता नहीं हैं, जिनकी विदेश यात्रा पर सवाल उठे हों। अलग-अलग समय पर अन्य विपक्षी नेता भी यही करते आए हैं। उदाहऱण के लिए, तेजस्वी यादव, जो फिलहाल यूरोप में है, वहीं बैठकर पटना के बंटी यादव हत्याकांड के पीड़ित परिवार से फोन पर बात कर लेते हैं। राहुल गाँधी भी तीन हफ्ते से यूरोप घूम रहे हैं, जिसके चलते कॉन्ग्रेस के खुद के ‘छात्रों की गूँज’ जैसे कार्यक्रम रद्द हो रहे हैं।

तो इसीलिए यह सोच-विचार करना जरूरी है कि किस नेता को असल में जनता के मुद्दों की फिक्र है और किसे नहीं है। जहाँ एक ओर योगी सरकार राम मंदिर चढ़ावे की निष्पक्ष जाँच कर रही है, ग्लोबल वॉर्मिंग को खत्म करने के लिए पौधरोपण कर रही है लेकिन दूसरी ओर देश का विपक्ष विदेश घूमने में व्यस्त है।

पहले बनी मस्जिद, फिर बढ़ी मुस्लिम आबादी और उसके बाद बदल गया हिंदू बहुल इलाके का नाम: पाटन में ‘झापटपरा’ हो गया ‘इस्लामपुरा’, पढ़ें ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट

गुजरात के पाटन जिले में एक हिंदू इलाके का नाम मुस्लिम आबादी ने ही बदल दिया। जानकारी के मुताबिक, पाटन जिले के हारीज वार्ड नंबर 4 के एक इलाके का नाम झापटपरा था, जिसे बदलकर अब ‘इस्लामपुरा’ कर दिया गया है। यहाँ तक कि स्थानीय लोगों के सरकारी दस्तावेजों में भी अब इलाके का नाम ‘इस्लामपुरा’ लिखा जा रहा है। इलाके में बदलती डेमोग्राफी (जनसांख्यिकी) की चिंता के बीच हाल ही में हिंदू संगठनों ने यह शिकायत उठाते हुए मामलातदार को आवेदन पत्र सौंपा था।

जाँच के लिए ऑपइंडिया जब मौके पर पहुँची, तो इस मामले में और भी जानकारियाँ सामने आईं। यह हकीकत भी बाहर आई कि इलाके में जैसे-जैसे मुस्लिम आबादी बढ़ी और डेमोग्राफी बदली, वैसे-वैसे नाम बदलना शुरू हुआ और सरकारी दस्तावेजों तक नया इस्लामी नाम पहुँच गया। स्थानीय हिंदू अब इस मामले में कार्रवाई की माँग कर रहे हैं। हिंदू संगठनों ने भी जाँच की माँग की है।

झापटपरा में 80 से लेकर 80 साल से रह रहे परिवारों ने ऑपइंडिया को बताया कि इलाके का नाम बरसों से ‘झापटपरा’ ही चला आ रहा है और पुराने दस्तावेजों में भी यही नाम देखने को मिलता है।

एक स्थानीय निवासी ने बताया, “हमारे बाप-दादाओं के समय से झापटपरा नाम चल रहा है। लेकिन अब दस्तावेजों में नाम बदल गया है। कोई नया दस्तावेज बनाने जाए, नया आधार कार्ड बनाए तो अब ‘इस्लामपुरा’ लिखा हुआ आता है। ऐसा क्यों हुआ, यह हमें नहीं पता।”

स्थानीय लोग कह रहे हैं कि उनके इलाके का एक ही नाम है और वह है झापटपरा। इस्लामपुरा नाम पहले कहीं था ही नहीं, लेकिन पिछले 10-12 सालों में जैसे ही मुस्लिम आबादी बढ़ी, वैसे ही यह नया नाम घुसा दिया गया।

मस्जिद बनते ही बढ़ने लगी आबादी, फंडिंग कहाँ से आई?

स्थानीय लोगों के अनुसार, साल 2011 में इलाके में मुस्लिम परिवारों के सिर्फ 20-25 घर थे। ये सभी मजदूरी का काम करते हैं। लेकिन कुछ समय पहले यहाँ एक मस्जिद का निर्माण किया गया। साथ ही एक मदरसा भी बना।

इलाके के हिंदुओं का एक सवाल यह भी है कि जो मस्जिद बनाई गई थी, उसके लिए इतनी फंडिंग कहाँ से आई। क्योंकि मस्जिद के निर्माण तक जितने परिवार रहते थे, उनमें से किसी की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वे लाखों रुपये इकट्ठे करके इतनी बड़ी इमारत बना सकें। स्थानीय लोगों और संगठनों को आशंका है कि मस्जिद निर्माण के लिए बाहर से भी फंडिंग आई हो सकती है।

इस मस्जिद के बनने के बाद धीरे-धीरे मुस्लिम घर बढ़ने लगे और आज लगभग 200 से 300 के करीब मुस्लिम परिवार इस इलाके में रहते हैं।

आबादी जैसे ही बढ़ी, वैसे ही मुस्लिमों ने पहले आपस में इलाके को ‘इस्लामपुरा’ कहना शुरू किया और उसके बाद सरकारी दस्तावेजों में भी यही लिखवाना शुरू कर दिया। इसके बाद स्थानीय हिंदुओं के दस्तावेजों में ही ‘झापटपरा’ की जगह ‘इस्लामपुरा’ ने ले ली। इसके अलावा इलाके की मौजूदा आबादी में से ज्यादातर लोगों के बाहरी राज्यों (गुजरात से बाहर के राज्यों) के होने की जानकारी मिली है।

पुराने दस्तावेजों और पालिका के रिकॉर्ड में चल रहा है ‘झापटपरा’

ऑपइंडिया ने स्थानीय लोगों के पास जाकर जब उनके सरकारी दस्तावेज देखे, तो पता चला कि 70-80 साल के बुजुर्गों के बरसों पहले बने दस्तावेजों में ‘झापटपरा’ लिखा हुआ था और ‘इस्लामपुरा’ का कहीं कोई जिक्र नहीं था। लेकिन बाद में जो दस्तावेज बने या अपडेट हुए, उनमें ‘इस्लामपुरा’ कर दिया गया और ‘झापटपरा’ गायब हो गया। एक नहीं बल्कि कई व्यक्तियों के दस्तावेजों में यही पैटर्न देखने को मिला है।

जबकि नगरपालिका के आधिकारिक दस्तावेजों में कहीं भी ‘इस्लामपुरा’ नहीं लिखा गया है और हर जगह ‘झापटपरा’ नाम ही चल रहा है।

इस दौरान मस्जिद के पास एक मुस्लिम व्यक्ति भी मिला। आबिद नाम का यह शख्स ऑपइंडिया से बातचीत में स्वीकार करता है कि इलाके का नाम झापटपरा है, लेकिन अब यह इस्लामपुरा के रूप में जाना जाता है। हालाँकि साथ ही वह कहता है कि उसे ज्यादा जानकारी नहीं है कि नाम किस तरह बदला, लेकिन इलाके में मुस्लिमों के रहने के कारण इसे ‘इस्लामपुरा’ के तौर पर जाना जाता है।

स्थानीय हिंदुओं का कहना है कि आपस में मुस्लिम चाहे किसी भी नाम से इलाके को पुकारते हों, उससे आधिकारिक तौर पर नाम नहीं बदल जाता और सरकारी दस्तावेजों में उसे नहीं लिखा जा सकता। वहीं एक व्यक्ति ने बताया कि उनके इलाके में पहले मुस्लिमों के कुछ ही घर थे, लेकिन अब वे बढ़ गए हैं। जिसके कारण हिंदू घर बेचकर जा रहे हैं। उन्होंने इलाके में ‘अशांत धारा’ (डिस्टर्बड एरिया एक्ट) लागू करने की भी माँग की।

यहाँ देखें पूरी ग्राउंड रिपोर्ट

साजिश रचने वालों के खिलाफ की जाए कार्रवाई: विश्व हिंदू परिषद

इस पूरे मामले में हिंदू संगठनों ने कानूनी कार्रवाई की माँग की है। हारीज नगर विश्व हिंदू परिषद के मंत्री रवि प्रजापति ने कहा, “हमने एक हफ्ते पहले मामलातदार को आवेदन पत्र सौंपकर इलाके के सभी लोगों के दस्तावेजों में सुधार करके इलाके का नाम फिर से झापटपरा करने की माँग की है। साथ ही जिन अधिकारियों या स्थानीय मुस्लिमों ने साजिश के तहत इलाके का नाम बदलने की कोशिश की है, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। आवेदन पत्र में हमने भी ऐसी ही माँग की है।”

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

FIFA विश्वकप के बीच जानाें ब्राजील के महान फुटबॉलर ‘माने गारिंचा’ की कहानी, जिसने अपंगता को मात दे दुनिया को मुस्कुराना सिखाया: लोगों ने कहा – ‘पीपुल्स जॉय’

मैं कंडोलिया मैदान के पास एक दुकान से चाय लेकर पी रहा था। दुकान के चारों तरफ पाँच-दस मीटर तक अदरक इलायची की महक थी। मेरे सामने इक टूटी हुई कुर्सी पड़ी थी जिसने न जाने कितनी बरसातें और न जाने कितनी बर्फबारी झेली थी। मैं अपनी चाय लिए उस कुर्सी पर जाकर पसर गया। मौसम एकदम साफ था। हाँ, बारिश के बाद ठंड जरूर बड़ गई थी। जब ठंड के मारे सारा बदन काँप रहा हो तो अदरक इलायची की चाय से ज्यादा सुकून कुछ भी नहीं देता।

चारों तरफ खूबसूरत पहाड़ थे। पीछे कंडोलिया मंदिर की तरफ से चिड़ियों और मंदिर की घंटियों का कोरस साफ सुनाई दे रहा था। बगल से ही इक सर्पीली सड़क नीचे मुख्य बाजार की ओर जा रही थी। नीचे मुख्य बाजार की ओर देखने पर, कोटद्वार, श्रीनगर और रुद्रप्रयाग को जाने वाली बसें और मुसाफिर साफ दिख रहे थे।

सुबह के छह बज रहे थे। सब्जी वाले अपने ठेले लगाने लगे थे और घर घर अखबार डालने वाले अपनी एटलस साइकिल ले अपने मिशन पर निकल चुके थे। पिछली रात, यही कोई दो बजे के आसपास, पुलिस कॉलोनी की तरफ बाघ आया था। चाय की दुकान पर सब वही बात कर रहे थे।

“बल भैजी, मैंने तो ये बी सुना की ध्यानी मास्टर ने बाघ को खुला चैलेंज दे दिया की बेट्टे फिर नी आणा तू यहाँ बतारा हूँ हाँ।”

मैदान में अब फुटबॉल खेलने वाले बच्चों का जमावड़ा होने लगा था। कई नन्हें मैसी-नेमार कोच के आने से पहले मैदान में बॉल को लेकर हँसते-खेलते जादुई करतब कर रहे थे। कोच के आते ही उन्हें मैदान के चक्कर लगाने पड़ते हैं और फिर बोरिंग एक्सरसाइज करनी पड़ती है। यह मैं पिछली तीन सुबहों से रोज मुस्कुराते हुए देख रहा हूँ। हालाँकि मैं इस बात से पूर्णतः सहमत हूँ कि कोच साब की बोरिंग एक्सरसाइज से जिसने भी दिल लगा लिया, उसका जीवन संवर जाता है परन्तु मेरा यह भी मानना है कि यह हमारे भीतर छुपा जादू ही है जो हमारे जीवन में रंग भरता है।

हमारा संपूर्ण जीवन भी कंडोलिया मैदान में चल रहे फुटबॉल सा ही तो है। हमारे चारों तरफ नटखट चीड़-देवदार हैं जो हमें अपनी ओर बुला रहे होते हैं। चिड़ियों के मीठे गीत हैं। बर्फ़ से लकदक पहाड़ियाँ हैं, जिनसे कभी भी मन नहीं भरता। पास ही चाय की दुकान पर हैं हर ठंडी सुबह थड़क रहे रोचक किस्से कहानियाँ। लेकिन हम इन सब को पीछे छोड़ एक बोरिंग रुटीन को गले लगा लेते हैं।

मुझे बार बार पौड़ी लौटना बेहद पसंद है। मैं जब भी कभी शहरों की दौड़ भाग में खुद को खोता हुआ पाता हूँ तो पौड़ी का एक चक्कर लगा आता हूँ।

यहाँ आकर ठंडी सुबहों में कंडोलिया मैदान के पास चाय लिए बैठे दूर श्रीनगर-सुमाड़ी की दिशा में दिखते, मफलर पहने, शांत खड़े पहाड़ों और मैदान में खेलते नन्हें बच्चों को घंटो देखते रहता हूँ। ऐसा करते हुए पता ही नहीं चलता कब चेहरे से खो गई मुस्कान, इक रंगीन लिफाफे में, वापस अपने पते पर लौट आती है।

कुछ जगहें और कुछ लोग होते हैं ना, जो आपको कुछ पलों के लिए ही सही, आपकी सारी परेशानियों से दूर ले जाते हैं- कंडोलिया के इस मैदान से कुछ ऐसा ही रिश्ता है मेरा। खैर अब तो बरसों हो गए कंडोलिया का मैदान देखे। मगर क्या आप जानते हैं, कभी ब्राजील की भूमि में एक ऐसा खिलाड़ी भी हुआ था जिसे आम जनमानस ने ‘पीपुल्स जॉय’ कहा था। जब भी वह शख्स मैदान पर उतरता, तमाम लोग अपने दर्द भूल कर कुछ पल मुस्कुराने लगते थे। आज बात करते हैं ‘पीपुल्स जॉय’ की।

28 अक्टूबर, 1933 के दिन ब्राज़ील के रियो डी जनेरियो राज्य के सुदूर दक्षिण में स्थित एक छोटे से गांव पाऊ ग्रान्डे में जन्मा था एक लड़का: मैनुएल फ्रांसिस्को दोस सांतोस ।

बालक मैनुएल का जब जन्म हुआ तो उसकी बाईं टाँग उसकी दाईं टाँग से 6 सेमी बड़ी थी और उसकी बाईं टाँग बाहर की दिशा में तो दाईं टाँग अंदर की दिशा में मुड़ी हुई थी। इसके चलते डॉक्टरों को उस नन्हे बच्चे को पैदा होते ही अपंग घोषित कर देना पड़ा था।

क्यूँकि वह लड़का, जिसे सब माने-माने कहा करते, अपने हमउम्र बच्चों से कद काठी में छोटा था तो उसकी बहन ने उसका नाम गारिंचा (एक नन्हीं सी भूरी चिड़िया) रख दिया। और ऐसे मैनुएल हो गया माने गारिंचा।

गारिंचा सड़कों और गलियों में फुटबॉल खेलता था। वह रियो की सड़कों का राजकुमार था। उसको फुटबॉल का प्रोफेशनल खिलाड़ी कभी नहीं बनना था। वो तो ताउम्र यूँ ही रियो की सड़कों पर ड्रिब्लिंग करते रहना चाहता था।

आपको यह जानकर हैरानी होगी की जब गारिंचा ने अपना बोटाफोगो क्लब से एक खिलाड़ी के तौर पर आधिकारिक करार किया तो उनकी उम्र बीस वर्ष थी और वो न सिर्फ शादीशुदा थे बल्कि उनकी संतानें भी थीं। उन्होंने अपने पहले ही ट्रेनिंग सेशन में उन दिनों ब्राज़ीली डिफेंस की दीवार कहे जाने वाले ‘निल्टन सांतोस’ को अपनी बेमिसाल ड्रिब्लिंग के आगे लाचार कर दिया था। पूरा बोटाफोगो क्लब यह देखकर आश्चर्यचकित था।

वेल्स नैशनल टीम के मशहूर डिफेंडर मेल होपकिंस ने 1958 विश्व कप में ब्राज़ील के खिलाफ हुए मुकाबले के बाद कहा था,”गारिंचा हमारी टीम की डिफेंस के लिए पेले से ज्यादा खतरनाक था। उसका सामना करना किसी चक्रवात के दौरान सड़क पर निकलने जैसा था।”

गारिंचा, जिन्हें फ्रेंच अखबारों ने विश्व द्वारा देखा सबसे खतरनाक राइट विंगर घोषित किया था, ने ब्राज़ीली टीम के साथ लगातार दो विश्व-कप ट्रॉफियाँ जीतीं। 1958 और फिर 1962 के विश्व कप की जीत में गारिंचा की बड़ी भूमिका थी। 1962 के विश्व कप में अपने करिश्माई विज़न और जादुई ड्रिब्लिंग के दम पर सारी दुनिया को अपना दिवाना बना लेने वाले गारिंचा वह पहले खिलाड़ी बने जिन्होंने विश्व कप के एक ही संस्करण में गोल्डन बॉल, गोल्डन बूट और विश्व-कप का खिताब जीता।

जब वह खेल रहे होते थे तो स्टेडियम में मौजूद सभी दर्शकों की नजरें बस उन पर ही बनी रहती थीं। गेंद उनकी किसी माशूका की तरह बस उन्हीं के इर्दगिर्द मंडराती रहती।

वो अपना बॉडी पोस्चर यूँ बना लेते की लगता गेंद को फार-पोस्ट की ओर मारेंगे। विपक्षी डिफेंडर उस दिशा में कूद पड़ता और वो फेंट करके गेंद को नियर-पोस्ट की ओर बढ़ा देते।

विपक्षी टीम के पास उनकी कलाबाजियाँ देखने के अलावा कोई चारा नहीं होता था। उनके अंतिम मैच तक ऐसी कोई टीम नहीं थी जो उनका काट ढूँढ सकी हो। आप गूगल करेंगे तो आपको मालूम पड़ेगा की जबतक गारिंचा प्लेइंग इलेवन में रहे, ब्राज़ील ने सिर्फ एक बार ही कोई मैच हारा। यह ब्राज़ील के लिए उनका आखिरी मैच था। वो दो, तीन खिलाड़ियों नहीं बल्कि अकेले विपक्षियों की पूरी टीम को छका कर गोल स्कोर किया करते। और ऐसा वो लगभग हर मैच में करते। फुटबॉल के प्रशंसकों की एक बड़ी संख्या उन्हें पेले से बढ़कर मानती थी।

दो विश्वयुद्ध देख चुकी मायूस और उदास दुनिया में नन्हें गारिंचा लोगों को खुशियाँ देते थे। गेंद जब जब उनके पास आती, खेल प्रशंसक उत्साह से चीखने लगते। गारिंचा ने उनकी उदास शामों को खुशनुमा गीत दिए। एक अपंग लड़के गारिंचा की मैदान की दाईं फ्लैंक से लगातार विपक्षी खेमे में की गई ट्रेडमार्क घुसपैठों ने एकबार फिर आम नागरिकों को यकीन दिलाया था कि आम जिंदगी में भी चमत्कार होते हैं।

अमूमन जो लोग भूखमरी और गरीबी से जूझ रहे होते थे, वो मैच के बाद खुश होकर गारिंचा के नाम के नारे लगाते हुए घरों को लौटते। कई दफा तो गारिंचा अपनी ट्रेनिंग खत्म होते ही स्टेडियम परिसर की दीवार फांद बाहर चले जाते और सड़कों पर मजदूरों और फैक्ट्री वर्कर्स के संग घंटों लैटिन अमेरिकी संगीत का आनंद लेते और फुटबॉल खेलते रहते।

लोगों ने उन्हें यूँ ही नहीं ‘ऐलेग्रिया दो पोवो’ अर्थात पीपुल्स’ जॉय कहा था। वो वाकई सही मायनों में इस दुनिया में खुशियों का पैगाम लेकर आए थे।

यही इस खेल की खूबसूरती है। यह आम जनमानस की हथेलियों पर खुशियाँ धर देता है और उन्हें कुछ पल अपने तमाम दुख दर्द भूल कर मुस्कुराने की वजहें देता है।

पहले भरत तिवारी, अब बंटी यादव… बिहार पुलिस ये दाग अच्छे नहीं

साल 2026 की शुरुआत में बिहार के पुलिस महानिदेशक (DGP) विनय कुमार ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने बताया कि राज्य में हत्या, डकैती, बैंक लूट, दंगे जैसे बड़े अपराध कम हुए हैं। 2024 के मुकाबले 2025 में हत्या के मामलों में करीब 8.3% की कमी आने की बात कही।

आँकड़ों के अनुसार 2025 में बिहार में हत्या के कुल 2556 मामले दर्ज हुए। यानी, औसतन 7 हत्या रोज हुई। ऐसे में आप पूछ सकते हैं कि फिर भरत तिवारी या बंटी यादव की हत्या पर ही इतनी बात क्यों हो रही?

इसका जवाब आँकड़े नहीं देते। यह बिहार पुलिस के काम करने के तरीके में छिपा है। जब पटना रेलवे स्टेशन जैसी व्यस्त जगह पर किसी व्यक्ति के साथ मारपीट हो, उसका अपहरण कर लिया जाए, CCTV फुटेज में हमलावरों के चेहरे दिखे, फिर भी 5 दिन बाद उस व्यक्ति की मौका-ए-वारदात से 60 किमी दूर आधी गली हुई बॉडी मिले और इस बीच पुलिस केवल ‘तलाश रहे हैं’ जैसा रूटीन जवाब ही देती रही, तो यह आम लोगों के भीतर सुरक्षित होने के विश्वास को गहरे तक हिला देता है। विशेषकर, खतरे का यह संकेत उस राज्य के लिए और भी भयावह है, जिसने करीब ढाई दशक का जंगलराज भोगा हो।

क्या है बंटी यादव का मामला?

33 साल का बंटी यादव पटना के न्यू करबिगहिया इलाके का रहने वाला था। छोटी सी दुकान चलाकर अपने परिवार का गुजारा करता था। 6-7 जुलाई की दरमियानी रात उसे पटना रेलवे स्टेशन के बाहर से अगवा किया गया। उस समय वह एक दुकान में सामान खरीद रहा था। 11 जुलाई को मोकामा से सटे अथमलगोला थाना क्षेत्र के सूर्यपुरा गाँव में एक खेत में उसकी क्षत-विक्षत लाश मिली। पटना रेलवे स्टेशन से यह जगह करीब 60 किलोमीटर दूर है।

बंटी यादव का अपहरण होने से शव मिलने तक क्या-क्या हुआ?

वायरल सीसीटीवी फुटेज में कुछ लोग दुकान में घुसते हैं और पीछे से बंटी का कॉलर पकड़ते हैं। उसके साथ मारपीट करते हैं। उसे घसीटकर ले जाते हैं। इसके बाद उसे जबरन एक ऑटो में बिठाया जाता है। 11 जुलाई को शव मिलने के बाद बाढ़ के अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी रामकृष्णा ने बताया कि हाथ में पहने कड़े से परिजनों ने बंटी यादव की पहचान की। उसको अगवा किए जाने की शिकायत पटना के कोतवाली थाना में दर्ज कराई गई थी। उन्होंने बताया कि चार-पाँच दिन होने के कारण शव डिकम्पोज होना शुरू हो चुका था।

खबरों में पोस्टमार्टम रिपोर्ट के हवाले से बताया गया है कि बंटी के शरीर पर 100 से अधिक चोट के निशान थे। कई हिस्सों पर डंडे और रॉड से पिटाई के कारण काले निशान पड़ गए थे। अपहरण के करीब 14 से 18 घंटे बाद उसकी मौत हुई थी।

यानी, हत्या से पहले उसे करीब 18 घंटे तक टॉर्चर किया गया। मौत होने तक बुरी तरह पीटा गया। आँख-नाक कूच दिया गया। बायाँ हाथ ठीक था। दाहिने हाथ की केवल हड्डियाँ बची थी। दाएँ हाथ पर टैटू था। पहचान न हो सके इसलिए नुकीले चीज से गोदकर उसे हटा दिया गया था। फिर सड़क से सटे सूर्यपुरा गाँव के एक खेत में शव को गाड़ दिया गया।

दैनिक भास्कर ने पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर अजय कुमार सिंह के हवाले से बताया है कि बंटी के शरीर में गोली या छर्रे नहीं मिले हैं। ईंट-पत्थर जैसी भारी चीजों से पीट-पीटकर उसकी हत्या की गई होगी। डॉक्टर सिंह ने यह भी बताया है कि बॉडी गलनी शुरू हो चुकी थी, इसके कारण कुछ चोटें किस तरह के हथियार से आईं हैं, इसकी पुष्टि नहीं की जा सकती।

क्यों की गई बंटी यादव की हत्या?

पीड़ित परिजनों के अनुसार बंटी यादव ने न्यू करबिगहिया इलाके में सेक्स रैकेट चलाने का विरोध किया था। कथित तौर पर यह सेक्स रैकेट रवीश कुमार उर्फ बिसिया चला रहा था। रवीश पर कई मामले दर्ज हैं और कुछ महीने पहले ही वह जेल से बाहर निकला था।

रिपोर्ट के अनुसार अपहरण की घटना से करीब 15 दिन पहले रवीश से बंटी का विवाद हुआ था। इस दौरान रवीश ने उसे धमकी भी दी थी। दावा किया जा रहा है कि इस विवाद के कारण अगवा कर उसे मार डाला गया।

हालाँकि इन दावों में कितनी सत्यता है यह पुलिस की जाँच और अदालत के अंतिम निष्कर्षों के बाद ही सत्यापित हो पाएगा। शव मिलने के बाद डीएसपी रामकृष्णा ने देह व्यापार का विरोध करने के कारण बंटी की हत्या किए जाने के सवाल पर कहा कि दूसरे थाना क्षेत्र से मामला जुड़ा होने के कारण उनके लिए इस पर कमेंट करना उचित नहीं होगा। घटना के सभी पहलुओं की गहन जाँच की जा रही है।

किन लोगों ने की बंटी यादव की हत्या?

अब तक सामने आई जानकारी के अनुसार किचर किन्नर के कहने पर रवीश ने बंटी की हत्या की पूरी प्लानिंग की। किचर के तीन साथियों को 15 जून को गिरफ्तार किया गया था। उसे संदेह था कि बंटी यादव की मुखबिरी पर इनलोगों की गिरफ्तारी हुई। उल्लेखनीय है कि रवीश के सेक्स रैकेट को चलाने में किन्नर सहयोग कर रहे थे।

6 जुलाई की रात बंटी को कॉल कर पटना रेलवे स्टेशन के पास बुलाया गया। बंटी पर हमला करने से पहले रवीश और उसके साथियों ने किचर के घर शराब पार्टी की। इसके बाद ये लोग बंटी के पास पहुँचे और मारपीट करते हुए उसे दुकान से उठा लिया।

7 जुलाई को बंटी के परिजनों ने नामजद एफआईआर करवाई। रितेश, रवीश के भाई बजरंगी और ऑटो ड्राइवर रोहित को गिरफ्तार कर लिया गया है। रवीश, किचर किन्नर, अजीतपाल एवं अन्य फरार हैं। पुलिस इन्हें जल्द गिरफ्तार करने का दावा कर रही है।

पटना में बंटी यादव की हत्या
पटना में बंटी यादव की हत्या

बंटी यादव की लाश कहाँ मिली?

अथमलगोला इलाके के फोरलेन से सटे सूर्यपुरा गाँव के खेत में बंटी यादव की लाश मिली। राम नाम का युवक खेत में भैंस चरा रहा था। उसकी नजर शव पर पड़ी। बॉडी को गड्ढा कर गाड़ दिया गया था। उसके ऊपर बालू और पत्ते डाल दिए गए थे। बारिश होने के कारण बालू और पत्ते हट गए और शव दिखने लगा। राम ने गाँव पहुँच लोगों को इसकी सूचना दी। इसके बाद पुलिस को जानकारी दी गई।

बिहार पुलिस पर क्यों उठ रहे सवाल?

बंटी यादव के परिजनों का कहना है कि अगवा करने की शिकायत के बाद भी पुलिस ने कुछ नहीं किया। दैनिक भास्कर को बंटी के भाई मुकुल ने बताया है कि डेड बॉडी खोजने का काम उनलोगों ने खुद किया। जो लोग अब तक गिरफ्तार हुए हैं, उन्हें भी पकड़कर पुलिस को देने का दावा भी उन्होंने किया। उनका कहना है कि पुलिस केवल इतना कहती रही कि हम तलाश कर रहे हैं, जबकि रवीश और उसके साथियों का आपराधिक रिकॉर्ड रहा है।

  • बंटी का जहाँ से अपहरण हुआ, वहाँ का सीसीटीवी वायरल है। इसमें उसके साथ मारपीट करने वालों का चेहरा भी दिख रहा है। लेकिन इनमें से एक को भी अपहरण की शिकायत मिलने के बाद पुलिस नहीं पकड़ सकी।
  • अपहरण के बाद बंटी को पहले ऑटो में बिठाया गया। फिर भूतनाथ रोड पर दूसरी गाड़ी ​में शिफ्ट किया गया। पुलिस इस गाड़ी की पहचान तक न कर सकी।
  • रवीश के साथ बंटी के विवाद, बंटी को धमकी देने की बात, बंटी के अपहरण के बाद भी पुलिस रवीश का पता नहीं लगा सकी।
  • अपहरण की जगह से करीब 60 किमी दूर बंटी का शव मिला। इस दौरान कई थाना क्षेत्रों और टोल प्लाजा से वह गाड़ी गुजरी जिसमें बंटी को ले जाया गया, पर कहीं कोई कार्रवाई नहीं हुई।

क्यों सामान्य घटना नहीं है अगवा कर बंटी यादव की हत्या करना?

पटना बिहार की राजधानी है। पटना रेलवे स्टेशन देश के बड़े रेलवे स्टेशनों में से एक है। इसके मुख्य द्वार के पास ही महावीर मंदिर है। इसी इलाके से बंटी यादव को अगवा किया गया।

वहीं करबिगहिया इस रेलवे स्टेशन का पिछला भाग है। यहीं से ट्रेनों से उतरने वाले यात्री बस स्टैंड के लिए जाते हैं। यानी यह ऐसा इलाका है, जहाँ हर समय आवाजाही बनी रहती है। जाहिर है यहाँ पुलिस का पूरा तंत्र सक्रिय रहता होगा। ऐसी जगह से किसी को अगवा किया जाए, वह घटना सीसीटीवी में दर्ज हो फिर भी पुलिस कुछ न कर पाए तो यह सामान्य बात नहीं है।

बंटी का शव मिलने के बाद स्थानीय लोगों ने भी यह बात उठाई है। उनका कहना है कि जब यहाँ के लोग सुरक्षित नहीं हैं तो बाहर से आने वाले यात्री कैसे सुरक्षित रह सकते हैं। साथ ही ऐसी जगह पर सेक्स रैकेट का चलना भी पुलिस पर सवाल उठाते हैं। बिहार के चर्चित यूट्यूबर और जनसुराज के नेता मनीष कश्यप भी अपने एक रिपोर्ट में इस इलाके में अवैध धंधों की बात मुखरता से उठाई है।

ऑपइंडिया की बात

बंटी यादव की हत्या और भरत तिवारी का एनकाउंटर, दोनों एक जैसे मामले नहीं हैं। एक में पुलिस अपनी निष्क्रियता से सवालों के घेरे में है तो दूसरे में सरेंडर करने के बावजूद एनकाउंटर करने के आरोपों से घिरी है।

फिर भी दोनों मामले एक ही जैसे खतरे का संकेत देते हैं। यह बताते हैं कि केवल अपराध की संख्या कम होने का नंबर सामने रखकर, पुलिस यह नहीं कह सकती कि उसकी पूरी प्रक्रिया चुस्त-दुरुस्त है। उसे बार-बार यह दिखाना होगा कि कि जब भी कोई नागरिक संकट में होगा तो पुलिस अपराधियों से कहीं अधिक तेजी से काम करेगी। वैसे भी कानून-व्यवस्था का असली पैमाना अपराध का ग्राफ नहीं, नागरिकों के भीतर सुरक्षित होने का विश्वास होता है।

यदि यह विश्वास टूटता है, तो केवल आँकड़ों से लोगों को सुरक्षा का एहसास नहीं दिलाया जा सकता।

महाराष्ट्र सरकार की लाडकी बहिन योजना से 92 लाख लाभार्थी बाहर, eKYC फेल और आय सीमा बनी मुख्य वजह: जानिए हर साल कैसे होगी ₹16500 करोड़ की बचत

महाराष्ट्र सरकार ने अपनी प्रमुख मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहिन योजना के तहत अब तक का सबसे बड़ा लाभार्थी सत्यापन अभियान चलाया है। इस अभियान के बाद सरकार ने योजना से 92 लाख से अधिक लाभार्थियों के नाम हटा दिए हैं, जिससे योजना के कुल लाभार्थियों की संख्या में लगभग 38 प्रतिशत की कमी आ गई है।

यह बड़े पैमाने पर की गई कार्रवाई राज्यभर में चलाए गए सत्यापन अभियान के बाद हुई। जाँच में पता चला कि लाखों लाभार्थियों ने योजना के लिए जरूरी eKYC और अन्य अनिवार्य सत्यापन प्रक्रिया पूरी नहीं की, जबकि कई लोग योजना के तय पात्रता मानकों पर खरे नहीं उतरे। इस पूरी प्रक्रिया का राज्य की वित्तीय स्थिति पर भी बड़ा असर पड़ने वाला है।

इसी बीच भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने अपनी रिपोर्ट में वर्ष 2024-25 के दौरान इस योजना में 3,541 करोड़ रुपए के अतिरिक्त खर्च और वित्तीय प्रबंधन में कई कमियों की ओर ध्यान दिलाया था। वहीं अब 92 लाख से अधिक लाभार्थियों के नाम हटाए जाने के बाद सरकार पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ भी काफी कम होने की उम्मीद है।

अगर हटाए गए सभी लाभार्थियों को हर महीने मिलने वाली 1,500 रुपए की सहायता राशि आगे भी जारी रहती, तो सरकार को हर साल भारी खर्च उठाना पड़ता। लेकिन अब इन लाभार्थियों के हटने से राज्य सरकार की वार्षिक वित्तीय देनदारी में 16,500 करोड़ रुपए से अधिक की कमी आने का अनुमान है।

आइए अब विस्तार से समझते हैं कि यह फैसला क्यों लिया गया, किन कारणों से इतने बड़े पैमाने पर लाभार्थियों के नाम हटाए गए और इसका महाराष्ट्र की आर्थिक स्थिति पर क्या असर पड़ेगा।

क्या है लाडकी बहिन योजना

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले जून 2024 में मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहिन योजना को मंजूरी दी गई थी। महायुति सरकार ने इस योजना को महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत और आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से अपनी प्रमुख कल्याणकारी योजनाओं में शामिल किया था।

इस योजना के तहत ऐसे परिवारों की 21 से 65 वर्ष की पात्र महिलाओं को हर महीने 1,500 रुपए की आर्थिक सहायता सीधे उनके बैंक खाते में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के माध्यम से दी जाती है, जिनकी परिवार की वार्षिक आय 2.5 लाख रुपए से कम है। हालाँकि सरकारी कर्मचारी, आयकरदाता और कुछ अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ लेने वाले लोगों को इस योजना का लाभ नहीं दिया जाता।

योजना शुरू होने के बाद इसमें तेजी से लाभार्थियों की संख्या बढ़ी और इसके लिए बजट तथा अनुपूरक प्रावधानों के जरिए 60,000 करोड़ रुपए से अधिक का प्रावधान किया गया। एक समय इस योजना का लाभ करीब 2.43 करोड़ महिलाओं को मिल रहा था। लेकिन हाल ही में हुए सत्यापन अभियान के बाद लाभार्थियों की संख्या घटकर लगभग 1.5 करोड़ रह गई है।

महाराष्ट्र ने 92 लाख से ज्यादा लाभार्थियों को क्यों हटाया?

यह सत्यापन अभियान सितंबर 2025 में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य अपात्र लाभार्थियों की पहचान करना और यह सुनिश्चित करना था कि योजना का लाभ केवल वास्तविक पात्र महिलाओं को ही मिलता रहे। जाँच में सामने आया कि सबसे ज्यादा नाम किसी धोखाधड़ी के कारण नहीं हटाए गए, बल्कि इसलिए हटाए गए क्योंकि लाभार्थियों ने सरकार द्वारा अनिवार्य की गई इलेक्ट्रॉनिक नो योर कस्टमर (eKYC) प्रक्रिया पूरी नहीं की थी।

आँकड़ों के अनुसार, करीब 62 लाख लाभार्थियों, यानी कुल हटाए गए लोगों में लगभग 67 प्रतिशत, के नाम केवल eKYC पूरा न करने की वजह से सूची से हटा दिए गए।
इसके अलावा कई अन्य लाभार्थी योजना के नियमों के अनुसार अपात्र पाए गए।

करीब 16 लाख महिलाओं के परिवारों की वार्षिक आय योजना में तय 2.5 लाख रुपए की सीमा से अधिक निकली। वहीं सत्यापन के दौरान 4.42 लाख लाभार्थियों ने बताया कि वे स्वयं या उनके परिवार का कोई सदस्य सरकारी कर्मचारी है, जिसके कारण वे योजना के लिए पात्र नहीं थे।

जाँच में यह भी पता चला कि करीब 3.6 लाख महिलाएँ पहले से ही संजय गाँधी निराधार योजना का लाभ ले रही थीं। वहीं लगभग 2.5 लाख मामलों में एक ही परिवार के दो से अधिक सदस्य योजना का लाभ ले रहे थे, जो योजना के नियमों के खिलाफ है।

इसके अलावा करीब 1.8 लाख लाभार्थियों की उम्र 65 वर्ष से अधिक पाई गई, जबकि 1.7 लाख मामलों को जिला स्तर पर किए गए सत्यापन के दौरान संदिग्ध मानते हुए हटाया गया। जाँच में यह भी सामने आया कि करीब 29 हजार पुरुष और लगभग 8 हजार सरकारी कर्मचारी भी गलत तरीके से इस योजना का लाभ ले रहे थे, जबकि वे इसके लिए पात्र नहीं थे।

eKYC की प्रक्रिया इतनी देर से क्यों हुई?

इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए महाराष्ट्र की महिला एवं बाल विकास मंत्री अदिति तटकरे ने कहा कि योजना शुरू होने के तुरंत बाद सरकार eKYC प्रक्रिया शुरू नहीं कर सकी, क्योंकि इसके कुछ ही समय बाद राज्य में विधानसभा चुनाव की घोषणा हो गई थी और आदर्श आचार संहिता लागू हो गई थी।

अदिति तटकरे के अनुसार, योजना जून 2024 में शुरू की गई थी, जबकि इसकी पहली दो किस्तें अगस्त 2024 में एक साथ जारी की गई थीं। लेकिन अनिवार्य सत्यापन शुरू होने से पहले ही राज्य चुनावी प्रक्रिया में चला गया, जिसके कारण eKYC लागू करने में देरी हुई। नई सरकार के गठन के बाद अगस्त 2025 में सरकार ने राज्यभर में eKYC सत्यापन अभियान शुरू किया।

उन्होंने कहा कि लाभार्थियों को कई बार बताया गया था कि यदि वे eKYC पूरा नहीं करेंगे तो उनकी सहायता राशि बंद कर दी जाएगी। सरकार ने उन्हें प्रक्रिया पूरी करने के लिए कई अवसर दिए और इसकी समयसीमा बढ़ाकर 31 दिसंबर 2025 तक कर दी थी। मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार ने किसी भी लाभार्थी का नाम मनमाने तरीके से नहीं हटाया।

उनके अनुसार, जिन लोगों ने योजना में पंजीकरण कराया था और जो पात्र थे, उन्हें अनिवार्य सत्यापन प्रक्रिया पूरी होने तक लगातार योजना का लाभ मिलता रहा।

सरकारी आँकड़ों का उपयोग करके AI से बनाया गया चार्ट

हटाए गए लाभार्थियों को पहले कितना भुगतान हुआ था?

सत्यापन अभियान से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, जिन लाभार्थियों के नाम बाद में योजना से हटाए गए, उन्हें भुगतान बंद होने से पहले कुल मिलाकर लगभग 14,000 करोड़ रुपए की सहायता राशि दी जा चुकी थी। अधिकारियों का अनुमान है कि जिन लाभार्थियों का भुगतान रोका गया, उन्हें औसतन करीब 10 महीने तक योजना का लाभ मिला।

हालाँकि सभी के लिए भुगतान बंद करने की कोई एक तय तारीख नहीं थी। सत्यापन के दौरान अलग-अलग चरणों में लाभार्थियों की जाँच हुई और उनकी पात्रता का पुनर्मूल्यांकन किया गया। इसी वजह से कुछ लोगों को दूसरों की तुलना में अधिक समय तक योजना का लाभ मिलता रहा, जबकि बाद में उन्हें अपात्र पाए जाने पर उनका भुगतान रोक दिया गया।

CAG रिपोर्ट में असल में क्या कहा गया था?

इसी दौरान जब लाभार्थियों का सत्यापन अभियान चल रहा था, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने भी लाडकी बहिन योजना के वित्तीय प्रबंधन को लेकर गंभीर सवाल उठाए। वित्त वर्ष 2024-25 की राज्य वित्त ऑडिट रिपोर्ट में CAG ने बताया कि महिला एवं बाल विकास विभाग ने 29,693.09 करोड़ रुपए के स्वीकृत बजट के मुकाबले 33,237.24 करोड़ रुपए खर्च किए।

इस तरह विभाग ने 3,541.16 करोड़ रुपए का अतिरिक्त व्यय किया। ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया कि इस अतिरिक्त खर्च के लिए कोई स्पष्ट या ठोस कारण नहीं बताया गया। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि जनवरी से मार्च 2025 के बीच 15,586 करोड़ रुपए को वर्चुअल पर्सनल डिपॉजिट अकाउंट (VPDA) में स्थानांतरित कर दिया गया, जबकि उस समय इन पैसों की तत्काल आवश्यकता नहीं थी।

CAG ने इसे गंभीर वित्तीय अनियमितता बताते हुए कहा कि बिना वास्तविक खर्च की जरूरत के सरकारी खजाने से धन निकालकर VPDA में जमा करना उचित वित्तीय प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है। कुल मिलाकर CAG ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि योजना के क्रियान्वयन के दौरान बजट का अनुमान लगाने, खर्च पर नियंत्रण रखने और वित्तीय प्रबंधन में कई महत्वपूर्ण कमियाँ रहीं।

ऑडिट रिपोर्ट में सरकार को सलाह दी गई कि भविष्य में इस तरह की बड़ी डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) योजनाओं के लिए बजट बनाते समय संभावित लाभार्थियों की संख्या का अधिक वास्तविक और सटीक आँकलन किया जाए।

लाभार्थियों के नाम हटाने का मामला CAG की जाँच-पड़ताल से कैसे जुड़ा है?

लाभार्थियों के सत्यापन अभियान और CAG की ऑडिट रिपोर्ट का अक्सर एक साथ जिक्र किया जा रहा है, लेकिन दोनों अलग-अलग मुद्दों से जुड़े हैं। CAG द्वारा बताई गई 3,541 करोड़ रुपए की राशि वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान स्वीकृत बजट से अधिक किए गए खर्च को दर्शाती है।

यह निष्कर्ष योजना के वित्तीय प्रबंधन और बजट के उपयोग से जुड़ा है, न कि इस बात से कि व्यक्तिगत लाभार्थी पात्र थे या नहीं। वहीं 92 लाख से अधिक लाभार्थियों के नाम हटाए जाने का असर सरकार के भविष्य के खर्च पर पड़ेगा। योजना के तहत प्रत्येक लाभार्थी को हर महीने 1,500 रुपए दिए जाते हैं।

ऐसे में 92 लाख लाभार्थियों के हटने से सरकार की सालाना भुगतान देनदारी में लगभग 16,560 करोड़ रुपए की कमी आएगी। सरल शब्दों में कहें तो यदि लाभार्थियों की संख्या आगे भी इसी स्तर पर बनी रहती है, तो इस सत्यापन अभियान के कारण सरकार को हर साल 16,500 करोड़ रुपए से अधिक की बचत हो सकती है।

यही वजह है कि 3,541 करोड़ रुपए और 16,560 करोड़ रुपए के आँकड़ों की सीधे तुलना नहीं की जा सकती। 3,541 करोड़ रुपए वह अतिरिक्त खर्च है, जो पहले ही किया जा चुका था और बाद में लाभार्थियों के नाम हटाने से उसे वापस नहीं पाया जा सकता। दूसरी ओर 16,560 करोड़ रुपए सरकार की संभावित वार्षिक बचत का अनुमान है, क्योंकि अब हटाए गए लाभार्थियों को हर महीने सहायता राशि नहीं देनी पड़ेगी।

हालाँकि लाभार्थियों के इस सत्यापन अभियान से CAG की उस प्रमुख चिंता का कुछ हद तक समाधान जरूर होता है, जिसमें कहा गया था कि भविष्य में ऐसी योजनाओं का बजट वास्तविक पात्र लाभार्थियों की संख्या के आधार पर तैयार किया जाना चाहिए, न कि बढ़ा-चढ़ाकर दर्ज की गई लाभार्थी संख्या के आधार पर।

(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

UP को मिला विकास का एक और हाईवे, लखनऊ-कानपुर के बीच 3D एलिवेटेड तकनीकसे लैस अवध एक्सप्रेस-वे हुआ ऑपरेशनल: जानें लंबाई, स्पीड लिमिट से लेकर सब कुछ

यूपी को एक और सौगात मिल गई है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह,केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मिलकर लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे के रूप में यह सौगात दी है। इसके साथ ही 3 घंटे का सफर अब मात्र 35-40 मिनट में पूरा किया जा सकता है। इस पर अधिकतम 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से गाड़ियाँ दौड़ सकती हैं। 63 किलोमीटर लंबा यह एक्सप्रेस वे ₹4200 करोड़ रुपए की लागत से बनाया गया है।

उद्घाटन के बाद तीनों नेता खुद पहले इस एक्सप्रेस-वे का लुत्फ उठाने के लिए सफर कर लखनऊ पहुँचे। मंगलवार (14 जुलाई 2026) से इसे आम जनता के लिए खोल दिया जाएगा।

एक्सप्रेस वे के हैं कई नाम

लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेस-वे को NE6, अवध एक्सप्रेस वे और डिफेंस कॉरिडोर के नाम से जाना जाता है। इस कॉरिडोर को भारत सरकार के सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने एनएचएआई के साथ मिलकर बनाया है इसलिए इस मार्ग को NE-6 कहा जाता है।

लखनऊ-कानपुर तक का पूरा इलाका अवध के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपरा के अंतर्गत आता है। इसलिए सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने के लिए इसे अवध एक्सप्रेस वे कहा जाता है।

यूपी डिफेंस कॉरिडोर के प्रमुख केन्द्र लखनऊ और कानपुर हैं। इनसे रक्षा उत्पादन, लॉजिस्टिक्स और भारी वाहनों को बगैर किसी रुकावट के आवाजाही हो सकेगी, इसलिए इसे डिफेंस कॉरिडोर भी कहा जाता है। इस एक्सप्रेस वे से रक्षा उद्योग के विकास को नई रफ्तार मिलेगी क्योंकि यह रक्षा सेंटर बन रहे लखनऊ और कानपुर को जोड़ता है।

इतना ही नहीं 63 किलोमीटर के इस आधुनिक ऑटोमेटेड इंटेलिजेंस मशीन गाइडेड कंस्ट्रक्शन तकनीक से बना ये एक्सप्रेस वे पर्यावरण के भी अनुकूल है।

(साभार-x@nitingadkari)

दो पहिया वाहन को गुजरने की अनुमति नहीं

लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेस वे से कोई दुपहिया वाहन नहीं गुजर सकता। इससे सिर्फ कार, वैन और दूसरे चारपहिया वाहन ही गुजर सकते हैं। सुरक्षा के लिए यहाँ 63 हाई रिजॉल्युशन सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं, जिससे 500 मीटर तक छोटी से छोटी चीजें भी साफ दिखाई देती हैं। इनमें से 21 कैमरे वाहनों की गतिविधियों पर नजर रख रहे हैं।

अगर इंटरचेंज करते वक्त नियमों की अनदेखी की गई तो ऑनलाइन चालान कटेगा और बगैर रोके गाड़ियों की नंबर प्लेट देखकर टोल टैक्स ले लिया जाएगा। एक्सप्रेस वे पर 24 घंटे निगरानी करने के लिए दो आधुनिक कंट्रोल रूम 27वें और 35वें किलोमीटर के दौरान बनाए गए हैं। यहाँ पर आपातकालीन सेवाएँ भी उपलब्ध हैं और ट्रैफिक मैनेजमेंट भी यहीं से होता है।

इस मार्ग पर 6 इंटरचेंज दिए गए हैं ताकि अलग अलग जगहों पर गाड़ियाँ प्रवेश कर सके और निकासी हो सके। इस दौरान पूरे 38 अंडरपास, 6 फ्लाई ओवर, 3 बड़े पुल और 28 छोटे-छोटे पुल बनाए गए हैं।

एक्सप्रेस वे पर एआई आधारित निगरानी सिस्टम लगाई गई है जिससे किसी तरह की दुर्घटना या हादसा, असामान्य गतिविधि की सूचना तुरंत कंट्रोल रूम को मिल सकेगी। इससे एम्बुलैंस तुरंत पहुँच जाएगी और बचाव-राहत कार्य आसान होगा।

कितना और कैसे कटेगा टोल टैक्स

लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेस वे के उद्घाटन के बाद 14 जुलाई 2026 से यहाँ टोल टैक्स लगना शुरू हो रहा है। यहाँ कार जीप और एसयूवी के एक तरफ का टोल ₹275 रुपए जबकि 24 घंटे में वापसी पर ₹415 रुपए देने हैं। बड़ी और कमर्शियल गाड़ियों, बसों और ट्रकों को एक तरफ में 935 रुपए देना होगा। छोटे ट्रकों और व्यावसायिक वाहनों को 445 रुपए एक तरफ का टोल टैक्स देना होगा। दोपहिया वाहन तो इस पर जा ही नहीं सकते। टोल टैक्स पूरी तरह डिजिटल तरीके से देना है।

पूरे एक्सप्रेस वे पर कोई टोल प्लाजा वाला सिस्टम नहीं है, जहाँ बेरियर लगे होते हैं और एक-एक गाड़ी को टोल देकर उससे गुजरना पड़ता है, बल्कि इस एक्सप्रेस-वे पर बैरियर फ्री टोल सिस्टम है यानी कहीं रुकने की जरूरत नहीं है खुद-ब-खुद ऑटोमैटिक नंबर प्लेट एएनपीआर कैमरे से फास्टटैग के जरिए टोल कट जा रहे हैं। इससे लंबे कतारों में खड़े होने से मुक्ति मिली है। इंधन और समय की भी बचत हो रही है।

3 डी एलिवेटेड तकनीक वाला कॉरिडोर

63 किलोमीटर एक्सप्रेस वे का 18 किलोमीटर यानी करीब 30 फीसदी हिस्सा एलिवेटेड है। देश में ऐसा पहली बार प्रयोग किया गया है, जिसमें इतना लंबा हिस्सा 6 लेन एलिवेटेड बनाया गया है, यानी ये पूरा हिस्सा सिर्फ एक पिलर पर टिका हुआ है। इससे भीड़भाड़ वाले इलाकों के ट्रैफिक जाम से निजात मिलेगी। अमौसी, एनएच-27 और सरोजिनीनगर जैसे इलाके अक्सर जाम रहते हैं। यह एक्सप्रेस वे इन इलाकों में एलिवेटेड है। इससे बिना सिग्नल और रुकावट के वाहन यहाँ से निकल जाएँगे। इससे रोजाना ऑफिस आने जाने वालों को काफी फायदा होगा।

बगैर ट्रेनों को बाधा पहुँचाए बना खास बोस्टिंग गर्डर

लखनऊ कानपुर एक्सप्रेस वे को आधुनिक इंजीनियरिंग की मिसाल कहा जा रहा है। इसका सिस्टम 3डी ऑटोमेट मशीन गाइडेंस टेक्नोलॉजी पर आधारित है। भारत में इसका इस्तेमाल बृहत पैमाने पर पहली बार किया गया है। इस तकनीक में ग्रेडर और कंक्रीट बिछाने वाली मशीनों को जीपीएस और 3डी डिजिटल मॉडल से जुड़ा होता है। इससे किसी तरह के चूक की आशंका काफी कम हो जाती है। इसकी वजह से सड़क की फिनिशिंग इतनी शानदार और स्मूथ होती है कि गाड़ी में ग्लास में रखा हुआ पानी भी न छलके, हाई स्पीड से झटका लगना तो दूर की बात है।

उन्नाव के पास रेलवे लाइनों को पार करने के लिए एक्सप्रेस वे पर खास बोस्टिंग गर्डर का इस्तेमाल किया गया है। रेलवे ओवरब्रिज ज्यादातर कंक्रीट के पिलर पर बनते हैं, लेकिन यहाँ बेहद कम वक्त पर भारी स्टील गर्डर्स को हवा में असेंबल कर इस ब्रिज को तैयार किया गया है, ये आधुनिक आर्किटेक्चर का बेहतरीन उदाहरण है। इस निर्माणकार्य के दौरान रेलवे यातायात को किसी भी वक्त बाधा नहीं पहुँचाया गया।

लखनऊ आउटर रिंग रोड से कनेक्टिविटी

एक्सप्रेस वे को लखनऊ आउटर रिंग रोड से जोड़ा गया है जिससे कानपुर में बगैर घुसे ही लोग सीधे रायबरेली, सीतापुर, सुल्तानपुर,हरदोई जैसे इलाके तक जा सकेंगे। इससे लखनऊ में भी ट्रैफिक का दबाव कम होगा। इस इलाके में सर्विस रोड भी बनाई गई है ताकि स्थानीय स्तर पर ट्रैफिक जाम न हो।

लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेस वे केवल एक सड़क परियोजना नहीं है, बल्कि ये यूपी के आर्थिक विकास और देश की मजबूती का उदाहरण है। इससे व्यापार और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को बढ़ावा मिलेगा। इस क्षेत्र में आने वाले इलाकों के लोगों की बाजार तक पहुँच बनेगी। रोजगार के अवसर मिलेंगे और तरक्की होगी। आने वाले वर्षों में लखनऊ -कानपुर एक्सप्रेस वे यूपी के इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश को नई दिशा देने वाला है।

राहुल गाँधी के ‘सीक्रेट’ विदेश दौरे पर राजनीतिक घमासान, BJP ने पूछा- कहाँ हैं कॉन्ग्रेस के युवराज?: ‘छात्रों की गूँज’ कई शहरों में रद्द, अब देहरादून में होंगे ‘प्रकट’

राहुल गाँधी एक बार फिर से राजनीतिक हंगामा मचाने सार्वजनिक तौर पर सामने आने वाले हैं। कथित तौर पर वो बीते 20 दिनों से विदेश दौरे पर थे, जिसे सीक्रेट रखा गया था। सीक्रेट इसलिए क्योंकि उनकी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं-नेताओं को ये जानकारी नहीं है कि राहुल गाँधी आखिर हैं कहाँ? बताया जा रहा है कि वो 17 जुलाई 2026 को देहरादून में ‘छात्रों की गूँज’ कार्यक्रम में सार्वजनिक उपस्थिति देंगे। आखिरी बार उन्हें इसी ‘छात्रों की गूँज’ कार्यक्रम के दौरान राजस्थान के कोटा में देखा गया था।

अब कॉन्ग्रेस पार्टी ने ऐलान किया है कि राहुल गाँधी 17 जुलाई 2026 को देहरादून में ‘छात्रों की गूँज‘ कार्यक्रम में शामिल होंगे, जिसकी तैयारी में पूरी पार्टी जुटी हुई है। चूँकि कोटा-प्रयागराज-पटना-दिल्ली की तरह ही देहरादून को भी शैक्षणिक हब माना जाता है, ऐसे में राहुल गाँधी की टारगेट ऑडियंस छात्रों के ही होने की उम्मीद है।

कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा जारी किया गया पोस्टर

राहुल गाँधी की गैरमौजूदगी में रद्द हो चुके हैं कई शहरों के कार्यक्रम

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो राहुल गाँधी के ‘सीक्रेट’ विदेशी दौरे की वजह से ‘छात्रों की गूँज’ कार्यक्रम के कई हिस्सों को रद्द कर दिया गया। पहले की रिपोर्ट्स में कहा जा रहा था कि कॉन्ग्रेस पार्टी कोटा की तर्ज पर ही प्रयागराज, पटना, दिल्ली में कार्यक्रमों का आयोजन करेगी, इसके बाद ही राहुल गाँधी देहरादून जाएँगे। लेकिन राहुल गाँधी के सीक्रेट विदेश दौरे की वजह से पहले तो प्रयागराज का कार्यक्रम बिना किसी हो हल्ले के रद्द हो गया, फिर पटना और दिल्ली का भी।

देश के अलग-अलग शहरों में कार्यक्रमों का आयोजन, लेकिन नहीं मिल रही चर्चा

द प्रिंट की रिपोर्ट के मुताबिक, कॉन्ग्रेस पार्टी की ओर से कार्यक्रमों की लिस्ट जारी की गई थी, जिसमें 10 जुलाई को प्रयागराज (इलाहाबाद), 11 जुलाई को पटना (ये तारीख कई बार बदली, 11 से लेकर 15 तक) और 14 जुलाई को दिल्ली में रैलियाँ होनी थीं। इन सभी के रद्द होने की वजह राहुल गाँधी की अनुपलब्धता बताई गई।

हालाँकि कॉन्ग्रेस पार्टी देश के अलग-अलग राज्यों और शहरों में इस तरह के आयोजन कर रही है, लेकिन राहुल गाँधी की गैर-मौजूदगी की वजह से इन कार्यक्रमों का कोई खास असर पड़ता नहीं दिख रहा है। इसी कड़ी में राँची में मैराथन दौड़ का आयोजन तक किया गया था, लेकिन राष्ट्रीय राजनीतिक चर्चाओं में ये आयोजन कोई खास जगह नहीं बना पाया।

14 जुलाई का कार्यक्रम 9 अगस्त को खिसका?

कॉन्ग्रेस पार्टी से जुड़े एक नेता ने नाम न छापने की शर्त पर ऑपइंडिया को बताया कि राहुल गाँधी की जो रैली 14 जुलाई 2026 को होनी थी, वो अब 9 अगस्त 2026 को हो सकती है। इसके लिए कॉन्ग्रेस पार्टी ने 6 जुलाई 2026 को एक बैठक भी बुलाई थी। इस बैठक को मीडिया में भी जगह मिली।

BJP का सवाल, कहाँ हैं कॉन्ग्रेस के युवराज?

इस बीच भारतीय जनता पार्टी ने कॉन्ग्रेस पार्टी पर जोरदार हमला बोला है। बीजेपी IT सेट के इन्चार्ज अमिल मालवीय ने भी यही सवाल पूछा है। उन्होंने एक्स पर लिखा, “राहुल गाँधी की 22 जून से 13 जुलाई के बीच की विदेश यात्रा पर रहस्य बरकरार है। वो कहाँ गए हैं? वो किससे मिल रहे हैं? उनकी यात्रा और अन्य खर्चों का वहन कौन कर रहा है? देश के विपक्ष के नेता को इस सवाल का जवाब देना चाहिए।”

बताया जा रहा है कि राहुल गाँधी लंदन, जर्मनी या फिनलैंड में हो सकते हैं। ऐसा दावा इंडिया टीवी की रिपोर्ट में किया गया है।

बता दें कि राहुल गाँधी की विदेश यात्राओं पर पहले भी विवाद होते रहे हैं। वो आत्यधिक व्यस्त चुनावी समय में भी पार्टी और देश को छोड़कर विदेश जाते रहे हैं। वो साल 2025 में बिहार चुनाव के समय भी पार्टी को मँझधार में छोड़ विदेश यात्रा पर निकल गए थे।

रेलवे के सैलून कोच में रुद्राभिषेक पर विवाद: ट्रेन बुकिंग की अधूूरी जानकारी ने छेड़ी बहस; पंडित और शास्त्रों से समझिए क्या है ‘मानस पूजा’, जिसमें नहीं होती ‘अग्नि’ की जरूरत

सोशल मीडिया पर एक वीडियो सामने आया है जो भारतीय रेलवे के एक सैलून कोच यानी प्राइवेट कोच का है, जिसमें कुछ लोग पंडित की मौजूदगी में पूजा (रुद्राभिषेक) करते हुए नजर आ रहे हैं। जैसे ही यह वीडियो सामने आया इस्लामी कट्टरपंथियों ने नियमों की दुहाई देनी शुरू कर दी। उनका कहना था कि उनके नमाज पढ़ने पर शोर होने लगता है तो पूजा पे शांति क्यों है?

कुछ लोगों ने इसे रेलवे के नियमों का खुला उल्लंघन बताना शुरू कर दिया, तो कुछ लोगों ने इस पर फायर हैजार्ड यानी चलती ट्रेन में आग लगने के खतरे का एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा कर दिया। देखते ही देखते इंटरनेट पर लोग इस बात को लेकर तरह-तरह के दावे करने लगे और सार्वजनिक कोचों में नमाज पढ़ने से इसकी तुलना की होने लगी।

लेकिन जब इस पूरे मामले की गहराई से पड़ताल की गई और रेलवे से लेकर इस पूजा को कराने वाले पंडित जी तक के पक्ष को समझा गया, तो सच इस पूरे हंगामे और दावों से बिल्कुल अलग निकला। आइए समझते हैं कि ये कौन सी पूजा थी, जिसमें आग का कोई खतरा नहीं हो सकता था और कैसे सार्वजनिक नमाज से इसकी तुलना पूरी तरह गलत साबित होती है।

रेलवे ने दी आधिकारिक सफाई और खारिज किए दावे

ऑल्ट न्यूज के मोहम्मद जुबैर ने सवाल किया कि क्या चलती ट्रेन के अंदर रुद्राभिषेक करने की इजाजत है। पश्चिम रेलवे ने इस पर जवाब देते हुए आधिकारिक तौर पर बताया कि जिस कोच को लेकर इतना बड़ा विवाद खड़ा किया जा रहा है, वह असल में कोई सरकारी विभाग, दफ्तर या किसी अथॉरिटी को अलॉट किया गया सरकारी या VIP सैलून नहीं था।

रेलवे ने स्पष्ट किया कि यह पूरी तरह से एक प्राइवेट कमर्शियल बुकिंग थी। इस सैलून कार को IRCTC के जरिए एक निजी संस्था यानी एक प्राइवेट पार्टी ने 8 जुलाई 2026 को बुक किया था। इस बुकिंग को पूरी तरह कानूनी और नियमों के तहत करने के लिए उस प्राइवेट पार्टी ने कमर्शियल बुकिंग के तौर पर 3 लाख 8 हजार 580 रुपए का एडवांस पेमेंट किया था।

रेलवे ने बताया कि इस सैलून कार को 10 जुलाई 2026 को नई दिल्ली से मुंबई के बीच चलने वाली ट्रेन संख्या 12926 पश्चिम एक्सप्रेस में एकतरफा यात्रा के लिए जोड़ा जाना तय हुआ था। उत्तर रेलवे ने ऑपरेशनल संभावनाओं और व्यवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए ही 10 जुलाई 2026 को इस सैलून के कमर्शियल रन का आधिकारिक नोटिफिकेशन जारी किया था।

रेलवे ने अपने बयान में इस बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया कि यात्रियों की समय-पाबंदी, उनकी सुरक्षा, संरक्षा और सुविधा सुनिश्चित करने की मुख्य जिम्मेदारी बिना किसी समझौते के हमेशा रेलवे की ही होती है और इस पूरी घटना के दौरान रेलवे के किसी भी सुरक्षा मानक का कोई उल्लंघन नहीं हुआ।

रेलवे ने साफ किया कि इस पूरी यात्रा में कोई भी व्यक्ति घायल नहीं हुआ और न ही किसी को कोई असुविधा हुई। जो पुजारी वीडियो में दिखाई दे रहे हैं, वह उसी सैलून कार में अभिषेक कर रहे हैं जिसे पूरी तरह से नियमों के तहत पैसे देकर बुक किया गया था। इसलिए सोशल मीडिया पर किए जा रहे सभी दावों को रेलवे ने सिरे से खारिज कर दिया।

सैलून कोच के नियम

IRCTC के नियमों के अनुसार, रेलवे नियमों के पालन के आधार पर कोई भी आम नागरिक या निजी संस्था IRCTC के जरिए कमर्शियल तौर पर सैलून कार को किराए पर ले सकती है। एक बार जब रेलवे की तरफ से बुकिंग मंजूर हो जाती है, तो किराए पर लेने वाले व्यक्ति को कानूनी कामों के लिए उस सैलून कार का इस्तेमाल करने की पूरी इजाजत होती है।

शर्त यह होती है कि यात्रा के दौरान सभी सुरक्षा जरूरतों, ऑपरेशनल निर्देशों और लागू रेलवे नियमों का सख्ती से पालन करना होगा। अगर आपने FTR यानी फुल टैरिफ रेट सेवा के तहत पूरा सैलून कोच अपने निजी इस्तेमाल के लिए बुक किया है, तो आप वहाँ अपनी आस्था और मर्जी के अनुसार कोई भी धार्मिक अनुष्ठान या पाठ कर सकते हैं।

बस इसमें एक ही मुख्य शर्त होती है कि सार्वजनिक सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए। इसका मतलब यह है कि आपके किसी भी अनुष्ठान या काम के कारण ट्रेन की यात्रा में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए, आपके साथ चलने वाले सह-यात्रियों को किसी प्रकार की असुविधा नहीं होनी चाहिए।

रेलवे के सुरक्षा मानकों जैसे कि आग का खतरा पैदा करने वाली या किसी भी तरह की ज्वलनशील सामग्री के इस्तेमाल से कोई समझौता नहीं होना चाहिए। इसके अलावा बुकिंग के समय किसी भी संभावित नुकसान या पेनल्टी की भरपाई करने के लिए यात्री को एक रिफंडेबल सिक्योरिटी डिपॉजिट और रजिस्ट्रेशन चार्ज भी देना जरूरी होता है, ताकि अगर कोच को कोई नुकसान पहुँचे तो उसकी भरपाई की जा सके।

चलती-फिरती रसोई और सैलून कोच में मिलने वाली घर जैसी सुविधाएँ

IRCTC के मुताबिक यह सैलून कोच सामान्य ट्रेन के डिब्बों जैसा बिल्कुल नहीं होता है। यह लगभग एक चलते-फिरते 1BHK फ्लैट या एक प्राइवेट घर की तरह होता है। इस सैलून कोच के भीतर बकायदा आलीशान बेडरूम होते हैं और साथ में आने वाले अतिरिक्त लोगों को ठहराने के लिए चार से छह एक्स्ट्रा बर्थ या बेड की व्यवस्था होती है।

यात्रियों की यात्रा को पूरी तरह से आरामदायक और सुरक्षित बनाने के लिए रेलवे की तरफ से एक एसी अटेंडेंट और एक जनरल अटेंडेंट भी हमेशा उपलब्ध कराए जाते हैं। इस पूरे प्राइवेट कोच की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि इसके भीतर यात्रा के दौरान ताजा खाना पकाने के लिए एक पूरी रसोईघर यानी किचन की सुविधा दी जाती है।

इस रसोईघर में खाना बनाने और उसे सुरक्षित रखने के लिए जरूरी बर्तन, गर्म पानी का सिंक, रेफ्रिजरेटर और आरओ का शुद्ध पानी जैसी तमाम आधुनिक सुविधाएँ मौजूद होती हैं।हालाँकि इस कोच में किचन होता है, लेकिन सुरक्षा के कड़े नियमों के कारण आम यात्रियों को खुद वहाँ खाना पकाने या आग जलाने की इजाजत नहीं होती है।

IRCTC आवश्यकता पड़ने पर अतिरिक्त शुल्क लेकर खुद अपना रसोइया और खाना पकाने की सामग्री उपलब्ध कराती है, ताकि रेलवे के ट्रेन स्टाफ को अच्छी तरह से पता हो कि चलती ट्रेन में सुरक्षित तरीके से रसोई का संचालन कैसे करना है। इस पूरी व्यवस्था से यह बात साफ हो जाती है कि सैलून कोच कोई पब्लिक स्पेस यानी सार्वजनिक जगह नहीं है।

यह पूरी तरह से प्राइवेट स्पेस है जिसे एक तय समय के लिए यात्री अपना अस्थाई घर बना लेते हैं। ऐसे में जो काम कोई भी व्यक्ति अपने निजी घर के भीतर करने के लिए स्वतंत्र है, वही काम वह नियमों के दायरे में रहकर इस सैलून कोच के भीतर भी कर सकता है।

क्या वाकई था आग का खतरा? पंडित जी ने खुद खोली दावों की पोल

इस पूरे विवाद में जो सबसे बड़ा और मुख्य सवाल लोगों द्वारा उठाया गया, वह था फायर हैजार्ड यानी आग लगने के खतरे का तर्क। लोगों ने यह मान लिया कि चूँकि वीडियो में पूजा होते दिख रही है, तो निश्चित रूप से वहाँ हवन किया गया होगा या फिर दीए जलाए गए होंगे, जिससे चलती ट्रेन में आग लगने का एक बहुत बड़ा खतरा पैदा हो सकता था।

इस पूरे भ्रम को उन पंडित के बयान ने पूरी तरह से खारिज कर दिया, जिन्होंने खुद इस सैलून कोच में पूजा को संपन्न कराया था। पंडित जी ने ऑपइंडिया को बताया कि उन्होंने खुद यह पूजा (रुद्राभिषेक) कराई है और लोगों की यह सोच पूरी तरह से गलत है कि इसमें आग की कोई जरूरत होती है।

पंडित जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह मानस (मानसिक) पूजा थी और पूरी प्रक्रिया में अग्नि यानी आग की मौजूदगी बिल्कुल भी अनिवार्य या आवश्यक नहीं होती है। इस पूजा को करने के लिए किसी भी तरह के हवन की आवश्यकता नहीं होती है और यहाँ तक कि इसके लिए एक छोटा सा दीया जलाना भी जरूरी नहीं होता है।

पंडित जी के पक्ष से यह बात पूरी तरह से साफ हो जाती है कि उस सैलून कोच के भीतर न तो कोई माचिस जलाई गई, न कोई दीया जलाया गया और न ही किसी प्रकार का कोई हवन कुंड तैयार किया गया। वहाँ केवल भगवान शिव की मूर्ति या शिवलिंग पर जल, दूध और अन्य पवित्र सामग्रियों से अभिषेक किया जा रहा था और साथ में मंत्रों का पाठ किया जा रहा था।

जब पूजा में किसी भी स्तर पर आग या किसी ज्वलनशील वस्तु का इस्तेमाल ही नहीं हुआ, तो फिर वहाँ किसी भी प्रकार के फायर हैजार्ड या सुरक्षा नियमों के उल्लंघन का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। यह पूरी तरह से एक सुरक्षित, शांत और जल आधारित धार्मिक अनुष्ठान था जिसे बिना किसी खतरे के संपन्न किया गया।

शास्त्रों में वर्णित पूजा के प्रकार और ‘मानस पूजा’ का गहरा विज्ञान: जहाँ सामग्री नहीं, सिर्फ मन की श्रद्धा ही काफी

सनातन धर्म और हिंदू शास्त्रों में पूजा-पाठ को लेकर बहुत ही गहरा विज्ञान बताया गया है। शास्त्रों में मुख्य रूप से आराधना और उपासना की तीन श्रेणियाँ या प्रकार बताए गए हैं, जिनमें से सबसे उत्तम और प्रभावशाली विधि को मानस पूजा का नाम दिया गया है।

मानस पूजा का सीधा और सरल अर्थ है- मन के द्वारा की जाने वाली पूजा। इस पूजा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें संसार की किसी भी भौतिक वस्तु (जैसे फूल, फल, दीपक, जल या धन) की आवश्यकता नहीं होती। आमतौर पर जब हम पूजा करते हैं, तो हमें कई तरह की सामग्रियों को जुटाना पड़ता है। लेकिन मानस पूजा पूरी तरह से आंतरिक होती है।

इसमें भक्त अपने मन की एकाग्रता और कल्पना शक्ति से भगवान को स्वर्ण सिंहासन पर बैठाता है, मन से ही उन्हें गंगाजल से स्नान कराता है, मन से ही छप्पन भोग लगाता है और मन से ही आरती उतारता है। शास्त्रों के अनुसार, ईश्वर को भौतिक वस्तुओं की भूख नहीं होती, वे केवल भक्त के ‘भाव’ के भूखे होते हैं।

आदि शंकराचार्य द्वारा रचित शिव मानसोपचार पूजा स्रोत के पहले ही श्लोक में वे कहते हैं, “रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं…” इसका अर्थ है, “हे प्रभु! मैंने अपने मन में ही आपके लिए रत्नों का सिंहासन, हिमालय के शीतल जल से स्नान और दिव्य वस्त्रों की कल्पना कर आपको अर्पित किए हैं।”

इस श्लोक में वे बात को पूरी तरह स्पष्ट कर देते हैं, “आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं… यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शंभो तवाराधनम्।”

इसका अर्थ है, “हे शंभो! मेरी आत्मा आप हैं, मेरी बुद्धि माता पार्वती हैं, मेरे प्राण आपके गण हैं, और मेरा यह शरीर ही आपका मंदिर है। अब मैं जो भी कर्म करता हूँ, वह सब आपकी ही पूजा है। यानी यहाँ भक्त का पूरा अस्तित्व ही पूजा बन जाता है, किसी बाहरी सामग्री की कोई जगह नहीं बचती।

श्रीमद्भागवत पुराण के 11वें स्कंध के 27वें अध्याय में भगवान श्री कृष्ण स्वयं उद्धव जी को पूजा के भेदों के बारे में बताते हैं। वहाँ वे स्पष्ट करते हैं कि जो भक्त बाहरी सामग्री जुटाने में असमर्थ हैं, या जो संन्यासी व विरक्त हैं, वे केवल मन के द्वारा मेरी उत्तम आराधना कर सकते हैं।

भगवान के अनुसार, मानसिक रूप से अर्पित की गई सेवा को वे सबसे पहले और सहर्ष स्वीकार करते हैं क्योंकि उसमें दिखावा शून्य होता है। मानस पूजा यह साबित करती है कि भक्ति किसी धन, साधन या परिस्थिति की मोहताज नहीं है। आप जहाँ हैं, जिस अवस्था में हैं, वहीं आंखें बंद करके अपने आराध्य को मन से याद कर सकते हैं।

इसमें न तो कोई खर्च है और न ही कोई शुद्धता-अशुद्धता का बाहरी बंधन, इसमें बस ‘आप’ होते हैं और आपका ‘ईश्वर’। ट्रेन के उस प्राइवेट सैलून कोच में भी इसी तरह बिना किसी भौतिक आग को जलाए, बिना किसी सुरक्षा को खतरे में डाले और बिना किसी सह-यात्री को परेशान किए, बेहद सादगी और शुद्ध भावना के साथ इस अनुष्ठान को पूरा किया गया था।

नमाज से इस पूजा की तुलना क्यों है पूरी तरह गलत?

इस पूरे मामले के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा इसकी तुलना सामान्य डिब्बों के गलियारों या कूपे में नमाज पढ़ने की घटनाओं से की जाने लगी।

लेकिन अगर हम रेलवे के नियमों और व्यवस्था को समझें, तो यह तुलना पूरी तरह से गलत है। इसका सबसे पहला और बड़ा कारण पब्लिक और प्राइवेट स्पेस का बुनियादी अंतर है।

जब कोई यात्री ट्रेन के सामान्य डिब्बों जैसे कि स्लीपर या एसी कोच के गैलरी, कॉरिडोर या रास्ते में नमाज पढ़ता है या कोई अन्य गतिविधि करता है, तो वह एक सार्वजनिक स्थान होता है जहाँ से लगातार दूसरे यात्रियों का आना-जाना लगा रहता है। ऐसी स्थिति में वहाँ से गुजरने वाले सह-यात्रियों का रास्ता रुक जाता है, उन्हें आने-जाने में भारी असुविधा होती है।

इसके बिल्कुल विपरीत, सैलून कोच एक पूरी तरह से बंद, सुरक्षित और निजी तौर पर बुक की गई जगह होती है। उसके भीतर कोई भी बाहरी सह-यात्री मौजूद नहीं होता है और न ही वहाँ किसी आम जनता का आना-जाना होता है। इसलिए सैलून कोच के भीतर की जाने वाली किसी भी गतिविधि से बाहरी यात्री को रत्ती भर भी असुविधा होने का कोई चांस ही नहीं रहता।

दूसरा सबसे महत्वपूर्ण अंतर सुरक्षा नियमों के सख्त पालन का है। रेलवे के नियम यह साफ कहते हैं कि अगर किसी नागरिक ने पूरा सैलून कोच निजी इस्तेमाल के लिए बुक किया है, तो वह वहाँ अपनी धार्मिक आस्था के अनुसार कोई भी अनुष्ठान करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है, बशर्ते वह रेलवे के किसी सुरक्षा कानून को न तोड़े।

चूँकि इस पूरी पूजा के दौरान पंडित जी की देखरेख में किसी भी तरह की आग, दीए या ज्वलनशील पदार्थ का उपयोग किया ही नहीं गया, इसलिए वहाँ सुरक्षा का कोई उल्लंघन हुआ ही नहीं। जब किसी सार्वजनिक व्यवस्था को नुकसान नहीं पहुँचा, किसी यात्री को कोई तकलीफ नहीं हुई तो फिर इस पूरी घटना को किसी भी अन्य नियम-विरुद्ध गतिविधि के बराबर खड़ा करना पूरी तरह से गलत है। इंटरनेट पर होने वाला यह पूरा बवाल असल में आधे-अधूरे तथ्यों, अधूरी धार्मिक समझ और रेलवे के नियमों की अज्ञानता का ही नतीजा है।