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हिमाचल में पेट्रोल-डीजल महँगा, अर्थव्यवस्था का बँटाधार कर कॉन्ग्रेस की सुक्खू सरकार लाई नया Cess: जानें- क्या है ‘विधवा और अनाथ उपकर’

हिमाचल प्रदेश सरकार ने पेट्रोल और हाई स्पीड डीजल पर 60 पैसे प्रति लीटर का नया अनाथ एवं विधवा उपकर (Orphan and Widow Cess) लागू किया है। राज्य कर एवं उत्पाद शुल्क विभाग द्वारा मंगलवार को अधिसूचना जारी करने के बाद यह नया उपकर 11 अगस्त की मध्यरात्रि से लागू हो गया। इससे राज्य में ईंधन की कीमतें बढ़ गई है।

सरकार के मुताबिक, उपकर से एकत्रित राजस्व विधवाओं और अनाथों के लिए बनाए गए कल्याण कोष में जाएगा। 12 अगस्त से बिक्री पर इसका असर दिखने लगा है। राज्य की विपक्षी पार्टी बीजेपी का कहना है कि एक के बाद एक सुक्खू सरकार ने जनता पर बोझ डाल दिए हैं। एक तरफ सुक्खू सरकार ने हजारों करोड़ों का कर्ज ले लिया है, वहीं दूसरी तरफ लगातार नए-नए टैक्स लगाकर जनता की जेब पर डाका डाला जा रहा है।

सरकार ने यह नया उपकर क्यों लगाया?

हिमाचल सरकार ने मार्च 2026 में Himachal Pradesh Value Added Tax (Amendment) Bill, 2026 विधानसभा में पारित कराया था। इसके जरिए वैट एक्ट में नई धारा 6-ए जोड़ी गई। कानून में सरकार को पेट्रोल और हाई स्पीड डीजल पर अधिकतम ₹5 प्रति लीटर तक उपकर लगा कर विधवाओं और अनाथों की देखभाल के लिए कोष बनाना था ताकि इनलोगों को आर्थिक सहायता दी जा सके।

सरकार का तर्क है कि हिमाचल में अनाथ बच्चों और आर्थिक रूप से कमजोर विधवाओं के लिए पहले से कई योजनाएँ चल रही हैं, लेकिन इनके लिए स्थायी और समर्पित रेवेन्यू स्रोत नहीं था। इसलिए अलग ‘वेलफेयर फंड’ बनाने का प्रावधान किया गया।

कानून में साफ लिखा है कि यह अनाथों और विधवाओं के कल्याण पर खर्च होगा। फिलहाल सरकार 60 पैसे प्रति लीटर के हिसाब से उपकर लेगी। आने वाले समय में धीरे धीरे उसे बढ़ाया जा सकता है, क्योंकि विधानसभा ने ₹5 प्रति लीटर तक उपकर लगाने पर सहमति दे दी थी।

सरकार ने 60 पैसे प्रति लीटर की दर निर्धारित की है, यानी 50 लीटर पेट्रोल भराने पर लगभग ₹30 अतिरिक्त टैक्स और 50 लीटर हाई स्पीड डीजल भरवाने पर ₹30 अतिरिक्त पैसे देने पड़ रहे हैं। ये उपकर उन टैक्सों से अलग है जो पहले से ही हिमाचल की जनता से वसूले जा रहे थे। यह पैसा उपभोक्ता को फ्यूल प्राइस के साथ जोड़ कर वसूला जा रहा है।

हिमाचल सरकार को कितना फायदा होगा?

राज्य कोष को इससे फायदा होगा। दरअसल सरकार को प्रति लीटर ₹0.60 मिलेगा। यानी राज्य में एक साल में पेट्रोल और HSD की कुल बिक्री 100 करोड़ लीटर हुई तो इससे राज्य को 100 करोड़ × ₹0.60 = ₹60 करोड़ का सीधा फायदा होगा।

अगर बिक्री 150 करोड़ लीटर हुई तो सरकार को 150 करोड़ × ₹0.60 = ₹90 करोड़ का फायदा होगा। इसी तरह 200 करोड़ लीटर की बिक्री होने पर ₹120 करोड़ का फायदा सीधे सरकार को होगा। अर्थात वास्तविक सरकारी आय राज्य में होने वाली कुल पेट्रोल + HSD बिक्री पर निर्भर करेगी।

डीलरों की चिंता

ये पैसा पेट्रोल पंप के माध्यम से ही लिया जाएगा क्योंकि कानून कहता है कि cess ‘एट द प्वाइंट ऑफ फर्स्ट सेल इन द स्टेट’ लगाया जाएगा। कानून के मुताबिक ऑयल कंपनी से पेट्रोल पंप डीलर और फिर कस्टमर तक जाता है पेट्रोल-डीजल। इसलिए cess डीलर से लिया जाएगा और डीलर आम जनता से वसूलेगा, लेकिन डीलर पर अप्रत्यक्ष रूप से इसका प्रभाव पड़ सकता है।

डीलरों की चिंता है कि हिमाचल से फ्यूल अगर दूसरे राज्यों मसलन पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़ जैसे में सस्ता मिलता है तो सीमावर्ती क्षेत्रों की जनता पड़ोसी राज्यों में जाकर अपना वाहन की टंकी फुल करवाएगी। ऐसे में उन्हें नुकसान उठाना पड़ सकता है।

व्यावसायिक वाहन तो पहले ही दूसरे राज्यों में फ्यूल लेकर आएँगे। इनमें बड़े बड़े ट्रक, टैक्सी और दूसरे कॉमर्शियल वाहन होंगे। ये ही आम तौर पर डीजल खरीदते हैं। ऐसे में डीजल डीलरों की कमाई पर इसका असर पड़ेगा। इसके अलावा चूँकि डीलर को ही ये टैक्स भी जमा करना है तो उनको अपने अकाउंट, बिलिंग और टैक्स से जुड़े मामलों पर ज्यादा ध्यान देना होगा। यही वजह है कि डीलरों ने उपकर की आवश्यकता पर भी सवाल उठाया है और इसके उपयोग के संबंध में अधिक स्पष्टता की माँग की है।

उपभोक्ताओं पर क्या पड़ेगा असर

उपभोक्ता को 60 पैसे प्रति लीटर सीधे जेब से देने के अलावा भी कई मोर्चों पर महँगाई का सामना करना पड़ेगा। राज्य में ट्रांसपोटेशन का खर्चा बढ़ने पर वस्तुओं की कीमत बढ़ जाएगी। माल ढुलाई का खर्च भी तो जनता ही देगी। इतना ही नहीं प्राइवेट गाड़ियों पर लागत बढ़ेगा। व्यावसायिक वाहनों के रेट बढ़ जाएँगे। इससे जनता पर बोझ तो बढ़ेगा ही।

हिमाचल सरकार को इससे क्या रणनीतिक फायदा है?

सरकार को एकमुश्त पैसे फंड के रूप में मिलेंगे। सरकार सामान्य बजट से पैसा निकालने के बजाय एक अलग रिवेन्यू स्ट्रीम बना सकती है। चूँकि पेट्रोल- डीजल की बिक्री साल के बारह महीने, 24 घंटे होती है इसलिए एक अच्छा खासा रेवेन्यू की उम्मीद रहेगी। इन सबमें सबसे अहम है राजनीतिक तौर पर विपक्ष के सवालों का जवाब देना।

दरअसल हिमाचल की कॉन्ग्रेस सरकार गंभीर वित्तीय संकट से जूझ रही है। सरकारी कर्मचारियों को वेतन और पेंशन देने में भी दिक्कतें पेश आ रही है। ऐसे में विधवाओं और अनाथ बच्चों के नाम पर जनता से ही पैसे लेकर सरकार एक ‘इमेज’ बनाने की कोशिश करेगी।

कॉन्ग्रेस के सुक्खू सरकार की माली हालत यह है कि वह चुनावी वादे पूरी करने की स्थिति में नहीं है। मुफ्त बिजली, महिलाओं के लिए मासिक वित्तीय सहायता, पुरानी पेंशन योजना की बहाली, सरकारी नौकरियाँ और कई सब्सिडी आधारित योजनाएँ धरी की धरी रह गई।

राजस्व घाटा अनुदान बंद होने पर सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू ने वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों, मंत्रियों और विधायकों के वेतन में 20 से 50 फीसदी कटौती करने का लिया था। इसका विरोध हुआ तो उन्होने प्रशासनिक और मंत्री-विधायकों के वेतन को बहाल कर दिया।

राज्य के किसान और मजदूर भी सड़कों पर उतर आए हैं। किसानों को बीज-खाद की दिक्कत है, तो मजदूर काम के घंटे बढ़ाने और उसके पैसे नहीं देने पर धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। ऐसे में जनता में विश्वास पैदा करने के लिए सरकार ने नई रणनीति बनाई है।

बीजेपी कर रही है विरोध

लेकिन विपक्ष लगातार जनता पर अतिरिक्त बोझ डालने पर सरकार के कदम का विरोध कर रहा है। मुख्य विपक्षी दल बीजेपी ने विधानसभा में भी इसका विरोध किया था और इसे जनता पर अतिरिक्त बोझ बताया था। बीजेपी की दलील थी कि पहले से महँगे फ्यूल पर एक और उपकर लगा कर क्यों जनता पर महँगाई का बोझ डाला जा रहा है।

विपक्ष के नेता जय राम ठाकुर ने विधवाओं और अनाथों के नाम पर कर लगाकर राजस्व बढ़ाने की सरकार की कोशिश की आलोचना करते हुए तर्क दिया कि ईंधन की कीमतें बढ़ने से हिमाचल प्रदेश में पेट्रोल और डीजल पड़ोसी राज्यों की तुलना में अधिक महँगे हो सकते हैं, जिससे आम लोग बॉर्डर पार कर दूसरे राज्यों से फ्यूल ले सकते हैं। इसका असर राज्य की कमाई पर भी पड़ेगा।

इसके अलावा विपक्ष ने यह सवाल भी उठाया कि अगर सरकार को वेलफेयर स्कीम के लिए पैसा चाहिए तो वह सामान्य बजट से क्यों नहीं देती। विधानसभा में BJP विधायकों ने इस मुद्दे पर विरोध किया था और सदन का वॉकआउट भी किया था।

बीजेपी का कहना है कि जब से सुक्खू सरकार सत्ता में आई है, जनता पर बोझ बढ़ता गया है। पहले डीजल पर वैट बढ़ाकर कीमतें बढ़ाईं और अब फिर से डीजल व पेट्रोल के दाम बढ़ा दिए गए हैं। बिजली-पानी पर दी जाने वाली सब्सिडी बंद कर दी गई। राशन डिपो में मिलने वाली सब्सिडी बंद है। HRTC बसों में किराया बढ़ाया और स्टाम्प ड्यूटी 500% तक बढ़ा दी गई। एक तरफ सुक्खू सरकार ने हजारों करोड़ों का कर्ज ले लिया है, वहीं दूसरी तरफ लगातार नए-नए टैक्स लगाकर जनता की जेब पर डाका डाला जा रहा है।

हिमाचल प्रदेश सरकार कहना है कि केंद्र भी फ्यूल पर बड़े cesses लगाता है, तो राज्य क्यों न लगाए और हिमाचल सरकार ने तो मात्र 60 पैसे से शुरुआत की है। अब भविष्य में ये 60 पैसा बढ़ कर 5 रुपए तक जा सकता है, इस पर तो विधानसभा पहले ही मोहर लगा चुकी है।

‘SIR’ पर प्रकाश राज का फर्जीवाड़ा एक्सपोज: कर्नाटक में अपना वोट कटने का फैला रहे थे भ्रम, चुनाव आयोग ने पोल खोली; पढ़ें सच्चाई

कर्नाटक में चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) अभियान को लेकर भ्रम और डर फैलाने की कोशिश की जा रही है। इसी क्रम में अभिनेता प्रकाश राज ने 11 अगस्त को सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा कर दावा किया कि बेंगलुरु की वोटर लिस्ट से उनका नाम जानबूझकर हटा दिया गया है। खुद को ’65 लाख हटाए गए मतदाताओं’ में से एक बताते हुए उन्होंने इशारों-इशारों में केंद्र सरकार पर राजनीतिक द्वेष के तहत मताधिकार छीनने का आरोप लगाया।

95 सेकंड के वीडियो में प्रकाश राज ने कहा:

“प्यारे दोस्तों, साथियों, मैं आपके साथ एक चुटकुला शेयर करना चाहता हूँ। मैं उन 65 लाख मतदाताओं में से एक हूँ जिनका वोटिंग राइट SIR के बाद बेंगलुरु निर्वाचन क्षेत्र से डिलीट कर दिया गया है। अच्छा मजाक है ना? मैं इसी निर्वाचन क्षेत्र में पैदा हुआ, यहीं पढ़ा-लिखा, थिएटर किया और आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि मैं यहाँ से सांसद का उम्मीदवार भी रहा हूँ।”

प्रकाश राज ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए लिखा कि सत्ता का इस्तेमाल कर मतदाताओं के अधिकार छीने जा रहे हैं। उसने आगे कहा,

“अच्छा, मजाक अच्छा है। गेम ऑन। अब देखता हूँ कि मुझे किस प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा। अपना वोटर आईडी वापस पाने के लिए क्या-क्या कागज दिखाना पड़ेगा? खैर, गेम ऑन। लेकिन एक छोटी सी बात मेरे दोस्त- आप उन कुछ नागरिकों के वोट देने के अधिकार को छीनने के लिए अपनी ताकतों का इस्तेमाल कर सकते हैं जो शायद आपको न चुनें। लेकिन मेरे प्यारे दोस्त, क्या आप हमें सत्ता से नीचे गिराने की हमारी ताकत से रोक सकते हैं? बस पूछ रहा हूँ। बाय।”

इस वीडियो के कैप्शन में प्रकाश राज ने लिखा “फ्रैंड, तुम उन कुछ नागरिकों से वोट देने का अधिकार छीनने का रास्ता चुन सकते हो जो शायद तुम्हें दोबारा तख्त पर न बिठाएँ… लेकिन क्या तुम आखिरकार तुम्हें तख्त से नीचे गिराने की हमारी ताकत से हमें रोक सकते हो? #JustAsking”

चुनाव आयोग और BBMP ने खोली पोल

अपने पोस्ट के जरिए प्रकाश राज ने जमकर प्रोपगेंडा फैलाने का प्रयास किया वहीं बेंगलुरु नागरिक निकाय और अतिरिक्त जिला चुनाव अधिकारी के आधिकारिक बयान ने प्रकाश राज के इन आरोपों की हवा निकाल दी है।

बेंगलुरु सेंट्रल सिटी कॉर्पोरेशन के अपर जिला निर्वाचन अधिकारी (और आयुक्त) जगदीश जी ने जबरन मताधिकार छीने जाने के प्रकाश राज के दावों का खंडन करते हुए एक जवाब जारी किया और बताया कि 16 जून 2026 तक, जब SIR के लिए चुनावी डेटा फ्रीज किया गया था, तब प्रकाश राज का नाम 163-शांतिनगर विधानसभा क्षेत्र में सक्रिय रूप से पंजीकृत था। अधिकारी ने विशिष्ट विवरण देते हुए कहा कि उनका नाम मतदाता सूची में भाग संख्या 1 (Part No. 1) के क्रम संख्या 970 (Serial No. 970) पर पंजीकृत था।

इसके अलावा, पंजीकृत पते (नंबर 266, गार्डन अपार्टमेंट, विथल माल्या रोड) पर बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) द्वारा घर-घर जाकर किए गए सत्यापन में यह बात सामने आई कि प्रकाश राज वहाँ से स्थायी रूप से स्थानांतरित (Shift) हो चुके थे। 2019 के लोकसभा चुनाव में बेंगलुरु सेंट्रल से असफल चुनाव लड़ने वाले यह राजनेता पिछले लगभग चार वर्षों से इस जाँच किए गए पते पर नहीं रह रहे थे।

जगदीश जी ने एक बयान में कहा, “संबंधित पार्टी के बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) द्वारा किए गए घर-घर सत्यापन के दौरान, यह पाया गया कि श्री प्रकाश राज पंजीकृत पते ‘नंबर 266, गार्डन अपार्टमेंट’ से स्थायी रूप से स्थानांतरित हो चुके हैं।”

इन तथ्यों की पुष्टि संपत्ति प्रबंधक (प्रॉपर्टी मैनेजर), पड़ोसियों और वहाँ रह रहे फ्लैट मालिक ने की। सत्यापन के बाद एक पंचनामा या स्थल निरीक्षण रिपोर्ट तैयार की गई।

चूँकि प्रकाश राज स्थायी रूप से कहीं और स्थानांतरित हो गए थे, इसलिए चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों के अनुसार उनका स्टेटस “Shifted” (स्थानांतरित) के रूप में दर्ज किया गया। इस प्रकार, चुनाव आयोग के अधिकारियों ने प्रकाश राज का नाम मतदाता सूची से मनमाने ढंग से या किसी राजनीतिक पूर्वाग्रह के कारण नहीं हटाया।

फोन पर बातचीत और फॉर्म 6 भरने का सुझाव

चुनाव अधिकारियों ने प्रकाश राज से फोन पर बातचीत भी की, जिसमें उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि वे अब उस पुराने पते पर नहीं रहते हैं। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि SIR प्रक्रिया में किसी का नाम मनमाने ढंग से नहीं काटा जाता, बल्कि अनुपस्थित या स्थानांतरित मतदाताओं को नियमानुसार चिन्हित किया जाता है।

प्रकाश राज अपने नए पते के लिए फॉर्म 6 जमा करके अपना मतदाता पहचान पत्र आसानी से अपडेट करा सकते हैं। आयोग के इस जवाब ने साबित कर दिया कि उनका सोशल मीडिया पर किया गया दावा तथ्यात्मक रूप से गलत था।

चार वोटर आईडी कार्ड और अदालती वारंट का मामला

इस पूरे विवाद के बीच प्रकाश राज का स्वयं का ट्रैक रिकॉर्ड भी सवालों के घेरे में है। उन पर कर्नाटक, तमिलनाडु और तेलंगाना में चार अलग-अलग वोटर आईडी कार्ड रखने के आरोप हैं, जो जनप्रतिनिधित्व अधिनियम का उल्लंघन है।

बार-बार समन भेजे जाने के बावजूद अदालत में पेश न होने के कारण बेंगलुरु की एक अदालत उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट भी जारी कर चुकी है। नियम-कायदों का पालन करने के बजाय चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाना केवल इस प्रशासनिक प्रक्रिया को राजनीतिक रंग देने का प्रयास प्रतीत होता है।

महाराष्ट्र में धर्मांतरण के नए कानून के तहत ब्रिटिश नागरिक पर दर्ज हुई FIR, चर्च के कार्यक्रम की आड़ में हिंदुओं को बनाना चाहता था ईसाई: टूरिस्ट वीजा पर आया था भारत

‘महाराष्ट्र धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम 2026’ आधिकारिक रूप से लागू होने के बाद धर्मांतरण को लेकर एक ब्रिटिश नागरिक के खिलाफ एफआईआर दर्ज किया गया है। उस पर पुणे के पेठ में चर्च के कार्यक्रम की आड़ में लोगों को धर्मांतरण के लिए उकसाने का आरोप है। मैनचेस्टर निवासी ब्रिटिश नागरिक OCI कार्डधारक है। पुणे की खड़क पुलिस स्टेशन में इसको लेकर जाँच चल रही है।

पुणे पुलिस के एक अधिकारी ने सोमवार (10 अगस्त 2026) को बताया कि मैनचेस्टर निवासी आरोपी के खिलाफ आव्रजन और विदेशी अधिनियम, 2025 और हाल ही में लागू किया गया महाराष्ट्र धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम, 2026 के संबंधित प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया है।

(FIR की कॉपी)

प्रारंभिक जाँच रिपोर्ट के मुताबिक, आरोपित ने सभा में बोलते समय हिंदू धार्मिक परंपराओं से जुड़े शब्दों, जैसे कि ‘कीर्तन’, ‘संत’ और ‘मोली’ का इस्तेमाल किया। पुलिस का आरोप है कि उसने यीशु के प्रति भक्ति के मार्ग का अनुसरण करने की बात कही और ऐसे बयान दिए जिनसे हिंदू मंदिरों और देवी-देवताओं को लेकर गलत धारणा बने।

पुलिस ने कहा कि ये बयान लोगों को गुमराह करने और उन्हें ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रेरित करने के इरादे से दिए गए थे।

ब्रिटेन के नागरिक ने दावा किया कि यीशु के नाम का जाप करने से बीमारियाँ ठीक हो सकती हैं

पुलिस के अनुसार, आरोपियों ने दावा किया था कि यीशु का नाम लेने से बीमारियाँ ठीक हो सकती हैं और बारिश हो सकती है। जांचकर्ताओं का कहना है कि ऐसे बयान हिंदुओं और अन्य धर्मों के लोगों को ईसाई धर्म की ओर आकर्षित करने के उद्देश्य से दिए गए थे।

खड़क पुलिस स्टेशन के एक अधिकारी ने बताया कि ओसीआई कार्डधारकों को प्रार्थना सभाओं में शामिल होने और धार्मिक कार्यक्रमों में भाग लेने की अनुमति है। लेकिन प्रशासनिक अनुमति के बिना उपदेश नहीं दे सकते, प्रवचन नहीं कर सकते या लोगों को संबोधित नहीं कर सकते।

अधिकारी ने कहा, “हमने उस व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है और आगे की जाँच जारी है।” ब्रिटिश नागरिक पर इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स एक्ट 2025 और महाराष्ट्र फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट 2026 के उल्लंघन का आरोप है।

महाराष्ट्र के नए धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के तहत पहली एफआईआर दर्ज की गई

ब्रिटेन के नागरिक का मामला पुणे पुलिस ने महाराष्ट्र धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम, 2026 के तहत पहली एफआईआर दर्ज करने के कुछ दिनों बाद सामने आया है।

पहला मामला 5 अगस्त को उत्तर प्रदेश के 22 वर्षीय एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज किया गया, जिस पर आरोप है कि उसने रिलेशनशिप में रह रही नाबालिग लड़की को अपना धर्म परिवर्तन करने के लिए उकसाया। चूँकि लड़की नाबालिग है, इसलिए मामला यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम ( पीओसीएसओ ) के तहत भी दर्ज किया गया है।

पुलिस के अनुसार, आरोपित और लड़की उत्तर प्रदेश के एक ही गाँव के रहने वाले थे और बाद में कर्नाटक और फिर पुणे चले गए थे। आरोपी पर नए कानून की धारा 3 और 9(2) के तहत मामला दर्ज किया गया और उसे न्यायिक हिरासत में भेजने से पहले गिरफ्तार कर लिया गया।

धारा 3 के अंतर्गत जबरदस्ती, धोखाधड़ी, प्रलोभन, गलतबयानी, बल प्रयोग, धमकी या अनुचित प्रभाव जैसे साधनों द्वारा धन का रूपांतरण, रूपांतरण का प्रयास या रूपांतरण में सहायता करना निषिद्ध है। धारा 9(2) के अंतर्गत किसी अपराध में नाबालिग के शामिल होने पर सात वर्ष तक की कारावास और 5 लाख रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।

महाराष्ट्र का धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम क्या है?

महाराष्ट्र धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम, 2026 को 1 अगस्त से लागू हो गया है। इसे 31 जुलाई को अधिसूचित किया गया था।

इस कानून में गैर-कानूनी धर्मांतरण, प्रलोभन और दबाव की सीमाओं को काफी विस्तार से बताया गया है। इसमें उपहार, नकद राशि, रोजगार, विवाह का वादा, मुफ्त शिक्षा, बेहतर जीवनशैली देने के वादे को प्रलोभन माना गया है।

इसके अलावा किसी एक धर्म को श्रेष्ठ बताना या दूसरे धर्म की बुराई करना भी इसी श्रेणी में आएगा। शारीरिक हिंसा, डराना-धमकाना, संपत्ति को नुकसान पहुँचाना, ‘ईश्वर के नाखुश होने’ का डर दिखाना या ‘सामाजिक बहिष्कार’ की चेतावनी देते हुए दबाव डालना भी इसी श्रेणी में शामिल है।

साथ ही, शैक्षणिक संस्थानों के जरिए ब्रेनवाशिंग और किसी प्रकार के ‘सामूहिक धर्मांतरण’ को भी गैर-कानूनी माना गया है। इतना ही नहीं यदि कोई विवाह केवल धर्म परिवर्तन के उद्देश्य से किया गया है, तो अदालत उसे अमान्य घोषित कर सकती है।

क्या होगी सजा

इस कानून के तहत दर्ज अपराध गैर-जमानती होंगे और पुलिस को बिना औपचारिक शिकायत के स्वतः संज्ञान लेकर सीधे FIR दर्ज करने व जाँच करने का अधिकार होगा।

सामान्य मामलों में अवैध धर्मांतरण पर अधिकतम 7 साल की जेल और 1 लाख रुपए तक का जुर्माना होगा, जबकि नाबालिगों, महिलाओं, मानसिक अस्वस्थ व्यक्तियों या SC/ST समुदाय के लोगों और सामूहिक धर्मांतरण के मामलों में यह सजा 7 साल की जेल व 5 लाख रुपए तक का जुर्माना तय की गई है।

दोबारा अपराध करने पर सजा बढ़ाकर 10 साल और जुर्माना 7 लाख रुपए तक हो सकता है।

दोषी संस्थाओं का पंजीकरण रद्द करने, अनुदान रोकने और अवैध दस्तावेजों को प्रमाणित या समर्थित करने वाले सहयोगियों को भी दंडित करने का प्रावधान है।

अगर कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से धर्म परिवर्तन करना चाहता है, तो उसे 60 दिन पहले प्रशासन को सूचना देनी होगी। इसके अलावा धर्म परिवर्तन होने के बाद 25 दिनों के भीतर उसे अधिकारियों के पास पंजीकरण कराना होगा। अगर ऐसा नहीं किया गया तो उस धर्म परिवर्तन को अमान्य माना जाएगा।

एयर इंडिया पायलट का दूसरा ड्रग टेस्ट भी निकला पॉजिटिव: फुकेत-दिल्ली फ्लाइट में आखिर क्या हुआ था और अब आगे क्या होगा?

फुकेत से दिल्ली आ रही एयर इंडिया की एक उड़ान में हुई गंभीर घटना की जाँच में एक बड़ा मोड़ आ गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, उड़ान के मुख्य पायलट (पायलट-इन-कमांड) का दूसरा कंफर्मेटरी (पुष्टि करने वाला) ड्रग टेस्ट भी पॉजिटिव पाया गया है। यह नया घटनाक्रम उस हादसे के कुछ दिनों बाद आया है, जब उड़ान के दौरान विमान अचानक ऊँचाई से नीचे गिर गया था, जिससे कई यात्री और क्रू मेंबर घायल हो गए थे और भारत के उड्डयन प्राधिकारियों ने इस पर व्यापक जाँच शुरू कर दी थी।

फ्लाइट के बाद हुए शुरुआती टेस्ट में कैप्टन के सैंपल में नशीले पदार्थों की मौजूदगी का संकेत मिला था। चूँकि प्राथमिक जाँच टेस्ट के बाद प्रयोगशाला में दोबारा पुष्टि की आवश्यकता होती है, इसलिए पायलट के सैंपल की दोबारा जाँच की गई। अब वह दूसरा टेस्ट भी रिपोर्ट के अनुसार पॉजिटिव आया है। इस नई रिपोर्ट ने इस घटना से जुड़ी सुरक्षा और नियमों की चिंताओं को बहुत बढ़ा दिया है।

टेस्ट ने खड़े किए नए सवाल

शुरुआती ड्रग स्क्रीनिंग के बाद ही नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) ने दोनों पायलटों को उड़ान ड्यूटी से हटा दिया था, ताकि मामले की जाँच की जा सके। उस समय अधिकारियों ने स्पष्ट किया था कि किसी भी अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले प्राथमिक रिपोर्ट की पुष्टि के लिए दूसरा टेस्ट करना जरूरी है।

यह दूसरा टेस्ट इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह प्रयोगशाला विश्लेषण के जरिए पहली जाँच के नतीजों की पुष्टि करता है। मंगलवार (11 अगस्त 2026) को प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, पायलट-इन-कमांड का कंफर्मेटरी टेस्ट पॉजिटिव आया है और सैंपल में गांजा (Marijuana) होने की पुष्टि हुई है। हालाँकि, इस टेस्ट के सटीक विवरण और जाँच के आधिकारिक निष्कर्षों का पूरी तरह से खुलासा होना अभी बाकी है।

ड्रग टेस्ट का पॉजिटिव आना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उड़ान के दौरान पायलट नशे में था या उसका मानसिक नियंत्रण प्रभावित था। मेडिकल जाँच में नशीले पदार्थ का मिलना यह बताता है कि व्यक्ति के शरीर में वह substance मौजूद है, जबकि यह तय करने के लिए कि क्या पायलट उड़ान के समय सच में असमर्थ था, एक व्यापक जाँच की आवश्यकता होती है। इसके बावजूद, यह नतीजा एक गंभीर नियम उल्लंघन है, क्योंकि उड़ान दल के सदस्यों पर नशीले पदार्थों के सेवन को लेकर बेहद कड़े नियम लागू होते हैं।

इसलिए, इस घटना ने यह सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या पायलट ने उड्डयन सुरक्षा नियमों का पालन किया था और क्या सैंपल में मिला पदार्थ उसकी उड़ान भरने की क्षमता पर असर डाल सकता था।

पायलट पर लग सकता है उड़ानों से स्थायी प्रतिबंध

शुरुआती रिपोर्ट के बाद ही DGCA ने जाँच पूरी होने तक दोनों पायलटों को रोस्टर से हटा दिया था। अब दूसरे टेस्ट का पॉजिटिव आना मुख्य पायलट के खिलाफ सख्त प्रशासनिक और कानूनी कार्रवाई को और मजबूती देता है।

विमानन सुरक्षा नियमों के अनुसार, प्रतिबंधित नशीले पदार्थों की जाँच में पॉजिटिव पाए जाने वाले पायलटों की उड़ान सेवाएँ निलंबित की जा सकती हैं और उनकी आगे मेडिकल और कानूनी समीक्षा होती है। परिस्थितियों और जाँच के नतीजों के आधार पर, किसी भी पायलट को दोबारा उड़ान की अनुमति देने से पहले नशा-मुक्ति (rehabilitation/de-addiction) प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है।

इसी वजह से, कानूनी और नियमन प्रक्रिया जारी रहने तक कैप्टन के दोबारा विमान उड़ाने की संभावना न के बराबर है। उनके लाइसेंस और नौकरी पर अंतिम फैसला DGCA की जांच रिपोर्ट और नियमों के आधार पर ही किया जाएगा।

एयर इंडिया और उड्डयन अधिकारी जाँच के दायरे में

इस नए खुलासे के बाद एयर इंडिया के सुरक्षा प्रोटोकॉल की समीक्षा और कड़ी कर दी गई है। इस घटना को एक बेहद गंभीर विमानन घटना माना जा रहा है, और एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो (AAIB) को यह जांच सौंप दी गई है कि विमान में असल में क्या हुआ था।

नागरिक उड्डयन मंत्रालय और DGCA ने कहा है कि यात्रियों की सुरक्षा उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। मंत्रालय ने यह भी साफ किया है कि जाँच प्रक्रिया के दौरान सुरक्षा मानकों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

दूसरी ओर, एयर इंडिया भी इस उच्चस्तरीय जांच के दायरे में आ गई है। नागरिक उड्डयन मंत्रालय और DGCA के वरिष्ठ अधिकारियों ने एयर इंडिया के सीईओ (CEO) को बैठकों के लिए तलब किया है। एयर इंडिया ने पहले कहा था कि उसे उड़ान के बाद हुए टेस्ट की जानकारी थी, लेकिन शुरुआत में टेस्ट के नतीजे उसके साथ साझा नहीं किए गए थे।

यह गहन जाँच इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ड्रग-टेस्ट का मामला इस पूरी उड़ान घटना की जांच का केवल एक हिस्सा है।

तकनीकी खराबी के पहलू की भी हो रही है जाँच

हालाँकि पायलट के कंफर्मेटरी टेस्ट ने इस मामले को एक नया मोड़ दिया है, लेकिन जांच अधिकारी यह भी देख रहे हैं कि क्या विमान में आई किसी तकनीकी खराबी के कारण अचानक उसकी ऊंचाई कम हुई थी।

शुरुआती रिपोर्टों में एयरबस विमान के हाइड्रोलिक सिस्टम (Hydraulic System) में कई खराबी आने की बात कही गई है। जांच एजेंसियां यह पता लगा रही हैं कि क्या तकनीकी खराबी ने इस घटना में भूमिका निभाई। यह महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि केवल ड्रग-टेस्ट के नतीजों को प्लेन के इस व्यवहार का एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता। जांचकर्ताओं को एयरक्राफ्ट डेटा, कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर, मेंटेनेंस रिकॉर्ड और अन्य सबूतों के जरिए पूरी घटना के क्रम का सही पता लगाना होगा।

इस जांच में फ्रांस की उड्डयन जांच एजेंसियों और एयरबस के प्रतिनिधियों के भी शामिल होने की उम्मीद है। उनकी मदद से यह तय करने में आसानी होगी कि क्या हाइड्रोलिक समस्या समेत विमान प्रणाली की किसी खराबी से यह हादसा हुआ था।

AAIB की यह जांच अंततः यह स्थापित करेगी कि यह घटना मुख्य रूप से तकनीकी खराबी के कारण हुई, क्रू मेंबर्स की वजह से हुई, मौसम/पर्यावरण के कारणों से हुई, या इन सभी परिस्थितियों का मिला-जुला परिणाम थी।

अचानक गिरा था विमान

गौरतलब है कि कुछ दिन पहले खबर आई थी फुकेत से दिल्ली आ रही एयर इंडिया की फ्लाइट को उड़ान के दौरान एक गंभीर झटके का सामना करना पड़ा था और रिपोर्ट के अनुसार विमान अचानक लगभग 300 फीट नीचे गिर गया था। इस हादसे में कई यात्री और क्रू मेंबर्स घायल हो गए थे, जिसके बाद तुरंत जांच शुरू की गई।

इसके बाद विमान दिल्ली में सुरक्षित उतर गया था। DGCA ने इसे एक गंभीर घटना की श्रेणी में रखा और AAIB को विस्तृत जांच का जिम्मा सौंपा।

फिलहाल यह जाँच दो अलग-अलग दिशाओं में चल रही है: एक ओर जहां फ्लाइट क्रू के आचरण और उनकी फिटनेस की जांच हो रही है, वहीं दूसरी ओर विमान के उपकरणों और अचानक आई गिरावट से जुड़ी परिस्थितियों का अध्ययन किया जा रहा है।

आगे क्या होगा?

DGCA से जल्द ही इस कंफर्मेटरी टेस्ट पर और स्पष्टता देने की उम्मीद है, जिसमें यह बताया जाएगा कि कौन सा पदार्थ कितनी मात्रा में मिला और आगे क्या कानूनी कदम उठाए जाएंगे। अधिकारियों को यह भी तय करना होगा कि इस टेस्ट के नतीजे का उड़ान के दौरान घटी घटना से कोई सीधा संबंध था या नहीं।

इसके साथ ही, जांचकर्ता विमान के तकनीकी सिस्टम, ब्लैक बॉक्स/फ्लाइट-डेटा रिकॉर्डर और अन्य सबूतों की जांच जारी रखेंगे ताकि ऊंचाई में अचानक आई गिरावट का असली कारण पता चल सके। एयरबस और फ्रांस के एविएशन एक्सपर्ट्स इस काम में मदद करेंगे।

फिलहाल, दूसरे टेस्ट में पॉजिटिव आने के कारण मुख्य पायलट गंभीर कानूनी और प्रशासनिक जांच का सामना कर रहे हैं। हालांकि, फुकेत-दिल्ली घटना पर अंतिम फैसला पूरी जांच के नतीजों, तकनीकी साक्ष्यों और पायलट के मेडिकल असेसमेंट के बाद ही आएगा।

नतीजतन, यह मामला एयर इंडिया और भारत के एविएशन रेगुलेटर (DGCA) दोनों की विमानन सुरक्षा व्यवस्था की एक बड़ी परीक्षा बन गया है, जहां अधिकारियों पर यह दबाव है कि वे पूरी घटना की सच्चाई सामने लाएँ और उचित जवाबदेही तय करें।

कब्रें बेचीं, हिंदुओं की संपत्ति वक्फ की और डिलीट कर दीं फाइल्स: UP के शिया वक्फ बोर्ड में ₹1000 करोड़ के घोटाले का दावा, पढ़ें- क्या-क्या लगे आरोप

शिया वक्फ बोर्ड के पूर्व चेयरमैन जितेंद्र नारायण सिंह सेंगर उर्फ सैयद वसीम रिजवी ने वक्फ बोर्ड में करीब 1000 करोड़ के घोटाले का आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को हलफनामा दिया है और इसकी जाँच के लिए एसआईटी गठित करने की माँग की है।

11 अगस्त 2026 को सामने आई शिकायत के मुताबिक, उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड की संपत्तियों में लगभग 1000 करोड़ रुपये की कथित हेराफेरी हुई है। शिकायतकर्ता पूर्व चेयरमैन जितेंद्र नारायण सिंह सेंगर (पूर्व में सैयद वसीम रिजवी) हैं।

आरोपों में संपत्तियों की कथित अवैध बिक्री, वक्फ रिकॉर्ड से संपत्तियों के नाम हटाना, कब्रों तक को पैसे लेकर बेच देना और कुछ गैर-वक्फ और हिंदुओं की संपत्तियों को वक्फ रिकॉर्ड में दर्ज करना शामिल है। शिकायतकर्ता जितेन्द्र नारायण सिंह सेंगर शिया वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष हैं। उन्होंने 1995 के बाद उत्तर प्रदेश में अलग-अलग शिया और सुन्नी वक्फ बोर्डों के कामकाज पर भी सवाल उठाए हैं और कहा है कि इससे सरकारी पैसे का दुरुपयोग हुआ है। उन्होंने पूरा मामले की एसआईटी जाँच कराने की माँग की है।

कहाँ से आया 1000 करोड़ का आँकड़ा

शिकायत में कहा गया कि कथित घोटाला करीब ₹1000 करोड़ का है। इसमें अलग-अलग संपत्तियों की कथित बिक्री, रिकॉर्ड से संपत्तियाँ हटाने और दरगाहों के चंदे में हेराफेरी और दूसरे वित्तीय अनियमितताओं को जोड़ी गई है।

शिकायतकर्ता के मुताबिक, लखनऊ, मेरठ, प्रयागराज, अलीगढ़, झांसी आदि जगहों पर वक्फ बोर्ड की जमीन की कथित अवैध बिक्री के अलावा कब्रों के लिए ₹10 लाख तक लेने का आरोप है। इसके अलावा रिकॉर्ड में हेराफेरी करने और पैसे लेकर कुछ वक्फ संपत्तियों को रिकॉर्ड से हटाने का आरोप भी लगाया गया है। शिकायत में कहा गया है कि करीब 2500 फर्जी वक्फ संपत्ति बनाए गए हैं। ये हिन्दू संपत्तियों को धोखाधड़ी कर हड़प ली गई है। उन्होंने लखनऊ, आगरा और बिजनौर जैसी जगहों में कुछ दरगाहों के चंदे में गड़बड़ी के आरोप भी लगाए हैं।

कब्रें 10-10 लाख रुपए में बेचने का आरोप क्या है?

यह इस नए मामले का सबसे सनसनीखेज आरोप है, कब्रों का कथित तौर पर ₹10 लाख तक में बेचा जाना। पूर्व शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन ने अपने आरोप में कहा है कि कब्रों को 10 लाख रुपए तक में बेचा गया। उन्होंने कहा है कि लखनऊ, प्रयागराज, झाँसी, मेरठ, अलीगढ़ जैसी जगहों पर करोड़ों रुपए की काफी अहम वक्फ संपत्तियों को इन संपत्तियों का प्रबंधन देख रहे बोर्ड के लोगों के माध्यम से बेच दीं।

हलफनामे में कहा गया है कि इन संपत्तियों को वक्फ की आधिकारिक संपत्तियों के रिकॉर्ड से हटा दिया गया और करोड़ों रुपए की हेराफेरी की गई। सेंगर के मुताबिक, वक्फ की सूची से संपत्तियों को हटाने का अधिकार सिर्फ अदालत को है, लेकिन बोर्ड स्तर पर इस तरह की व्यवस्था की गई।

यह आरोप इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें दो बिल्कुल अलग तरह के आरोप एक साथ जुड़े हैं। पहला- जो संपत्ति वक्फ नहीं थी, उसे कथित तौर पर वक्फ में दर्ज किया गया। दूसरा- जो संपत्ति पहले से वक्फ की थी, उसे कथित तौर पर पैसे लेकर रिकॉर्ड से बाहर कर दिया गया। यानी शिकायतकर्ता का आरोप है कि एक तरफ संपत्तियाँ वक्फ में जोड़ी गईं और दूसरी तरफ कुछ वक्फ संपत्तियाँ रिकॉर्ड से हटाई गईं।

वक्फ रिकॉर्ड से संपत्ति हटाने का आरोप बहुत गंभीर है क्योंकि शिकायत में दावा किया गया है कि बोर्ड स्तर पर ही कुछ संपत्तियों को रिकॉर्ड से हटा दिया गया।

शिकायतकर्ता का तर्क है कि किसी संपत्ति के वक्फ के होने या न होने से जुड़े अधिकार और विवाद का निर्धारण निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत कोर्ट में होना चाहिए। बोर्ड अपने स्तर पर मनमाने तरीके से रिकॉर्ड हटाए, तो यह गंभीर प्रशासनिक और कानूनी सवाल पैदा करता है।

दरगाहों के चंदे की चोरी का दावा

हलफनामे में जिन दरगाहों में चंदे की गड़बड़ी की बात कही गई है उसमें लखनऊ की हजरत अब्बास दरगाह, आगरा की मजार शहीद ए सालिस और बिजनौर की जोगीपुरा दहगाह शामिल है। सेंगर ने दावा किया कि वक्फ बोर्ड से जुड़े कुछ लोग मौलवी के साथ मिलकर इन दरगाहों की दान में दी गई रकम की हेराफेरी करते थे।

शिया वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष ने सीएम योगी से कड़ी कार्रवाई की माँग करते हुए जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी एसआईटी गठित करने को कहा है ताकि पूरा मामले की जाँच हो सके और दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।

नवंबर 2024 में बोर्ड की बैठक में अध्यक्ष अली जैदी की अध्यक्षता में भ्रष्टाचार के मामलों में जीरो टॉलरेंस नीति अपनाने और मुतवल्लियों की आय-व्यय संबंधी अनियमितताओं पर कार्रवाई की बात कहते हुए कई फेरबदल किए गए थे

इसके अलावा 2026 में मेरठ की एक अलग वक्फ जमीन को लेकर अली जैदी समेत कई लोगों के खिलाफ FIR की रिपोर्ट भी सामने आई है; लेकिन वह मामला वर्तमान ₹1,000 करोड़ की शिकायत से अलग है।

पहले भी शिया वक्फ बोर्ड पर आरोप लगे हैं

यह पहली बार नहीं है जब उत्तर प्रदेश शिया वक्फ बोर्ड की संपत्तियों की बिक्री और हस्तांतरण को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए हों। 2019 में उत्तर प्रदेश सरकार ने शिया और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की संपत्तियों में कथित अनियमितताओं की CBI जाँच की सिफारिश की थी। इसके बाद 2020 में CBI ने दो एफआईआर दर्ज की थीं।

2020 की सीबीआई जाँच का मामला वर्तमान ₹1,000 करोड़ की शिकायत से अलग, लेकिन पृष्ठभूमि के लिहाज से महत्वपूर्ण है। पहला एफआईआर कानपुर में दर्ज किया गया था। इसमें शिकायतकर्ता तौसीफुल हसन ने आरोप लगाया था कि कानपुर की एक वक्फ संपत्ति के प्रबंधक होने के बावजूद उनके अधिकारों को सीज किया गया और मूल दस्तावेजों के साथ कथित तौर पर हेरफेर हुई।

इस मामले में वसीम रिजवी के साथ विजय कृष्ण सोमानी, नरेश कृष्ण सोमानी, गुलाम रिजवी उर्फ गुलाम सैयदेन रिजवी और वकार रजा के नाम सामने आए थे। CBI ने आपराधिक विश्वासघात, धोखाधड़ी और धमकी जैसी धाराओं में केस दर्ज किया था।

दूसरा एफआईआर प्रयागराज में दर्ज किया गया

दूसरे मामले में सुधांक मिश्रा ने आरोप लगाया था कि प्रयागराज के पुराने जीटी रोड स्थित इमामबाड़े में कथित रूप से अवैध तरीके से दुकानें बनाई गईं। इस मामले में वसीम रिजवी पर आपराधिक अतिक्रमण से जुड़ी धाराओं में केस हुआ था। हालाँकि सीबीआई ने 2023 में वसीम रिजवी समेत तमाम आरोपितों को क्लीन चिट दे दी थी।

बालकगंज कब्रिस्तान का मामला

वक्फ संपत्तियों के कथित फर्जी ट्रांसफर का एक अलग मामला बालकगंज कब्रिस्तान से जुड़ा बताया जाता रहा है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार खुर्शीद आगा नामक व्यक्ति पर आरोप था कि उसने जाली दस्तावेजों के माध्यम से जमीन को शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के बालकगंज कब्रिस्तान और मस्जिद के नाम पर दर्ज कराया और खुद को आजीवन वक्फ बोर्ड से जुड़ा प्रबंधक बना लिया।

इसके बाद 2014 में कथित तौर पर इस जमीन को मॉडर्न को-ऑपरेटिव हाउसिंग कॉलोनी को बेच दिया गया और बाद में यह अंतरिक्ष लेंडमार्क प्राइवेट लिमिटेड तक पहुँच गई।

जंतर-मंतर पर ‘बेटी चुप कराओ’, झारखंड में बेटियों का जिक्र तक नहीं: दो प्रदर्शनों में ‘द वायर’ का दो एजेंडा, केंद्र पर सवाल तो सोरेन सरकार पर सूख गई स्याही?

‘द वायर’ (The Wire) की पत्रकारिता हमेशा से उसके खास राजनीतिक एजेंडे और पक्षपातपूर्ण रवैये के लिए जानी जाती रही है। हाल ही में ‘द वायर’ ने देश के दो अलग-अलग राज्यों (दिल्ली और झारखंड) के प्रदर्शनों पर दो अलग-अलग लेख (Article) छापे है, जिसमें दोहरा चरित्र पूरी तरह उजागर होता दिखाई दे रहा है। जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का विरोध प्रदर्शन 20 जुलाई को शुरु हुआ था और 1 हफ्ते में प्रदर्शन बंद हो गया। 2 हफ्ते बाद ‘द वायर’ (The Wire) ने केंद्र सरकार और महिलाओं की स्थिति पर लंबा-चौड़ा ज्ञान परोस दिया है।

वहीं, दूसरी तरफ झारखंड में भी पेपर लीक मामले को लेकर छात्रों का विरोध प्रदर्शन अभी जारी है और इस पर ‘द वायर’ (The Wire) ने हेमंत सोरेन सरकार के खिलाफ हुए प्रदर्शनों में पुलिसिया बर्बरता और महिलाओं के अपमान पर कोई ऐसी बात नहीं छापी, जिससे उनकी गलत छवि लोगों में जाए और बर्बरता पर पूरी तरह चुप्पी साध ली। यह साफ तौर पर दिखाता है कि ‘द वायर’ निष्पक्ष पत्रकारिता करने के बजाय चुनिंदा मुद्दों पर प्रोपेगेंडा फैलाने का काम कर रहा है।

जंतर-मंतर के मामले में ‘महिलाओं’ का सहारा लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा

‘द वायर’ ने 10 अगस्त को दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन को लेकर एक लेख छापा, जिसे बंद हुए लगभग 15 दिन हो चुके है। इस लेख का शीर्षक, “बेटी पढ़ाओ, बेटी चुप कराओ: जंतर-मंतर विरोध प्रदर्शन के बाद महिलाओं को कैसे निशाना बनाया गया” (Beti Padhao, Beti Chup Karao: How Women Were Targeted After the Jantar Mantar Protests) था। इस लेख में दावा किया गया कि प्रदर्शन खत्म होने के बाद महिलाओं और लड़कियों को सोशल मीडिया पर निशाना बनाया जा रहा है।

‘द वायर’ ने लेख में लिखा कि महिलाओं को डॉक्सिंग, धमकियों और पुलिस मामलों का सामना करना पड़ रहा है। ‘द वायर’ ने इसमें केंद्र सरकार को पूरी तरह से जिम्मेदार ठहराया और कहा कि राज्य सरकार और सोशल मीडिया नेटवर्क मिलकर महिलाओं को चुप कराने की कोशिश कर रहे हैं। पोर्टल ने यह साबित करने की कोशिश की कि इस पूरी प्रक्रिया में केवल महिलाओं और लड़कियों को ही निशाना बनाया जा रहा है ताकि वे भविष्य में कभी आवाज न उठाएँ।

झारखंड के प्रदर्शन में महिलाओं और लड़कियों के जिक्र से पूरी तरह परहेज

इसके विपरीत, 10 अगस्त को ही ‘द वायर’ ने झारखंड विधानसभा के बाहर हुए प्रदर्शन पर एक दूसरा लेख छापा जिसका शीर्षक, “झारखंड विधानसभा के बाहर छात्रों का धरना-प्रदर्शन, कांग्रेस ने पुलिस की कार्रवाई की निंदा की, ‘Students Hold Sit-in Protest Outside Jharkhand Assembly, Congress Condemns Police Action’ था।

इस लेख में झारखंड के छात्रों और युवाओं के प्रदर्शन का जिक्र तो किया गया, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इसमें एक बार भी महिलाओं या लड़कियों के शामिल होने का कोई जिक्र नहीं किया गया। जबकि इस आंदोलन में भी भारी संख्या में छात्राएँ और महिलाएँ शामिल थीं। ‘द वायर’ (The Wire) ने इस बात को पूरी तरह से छुपा लिया ताकि वहाँ की राज्य सरकार (कॉन्ग्रेस) पर कोई आंच न आ सके और महिलाओं के नाम पर सहानुभूति बटोरने वाला उनका एजेंडा एक्सपोज न हो जाए।

दो हफ्ते बाद भी ‘जंतर-मंतर’ मुद्दे पर अटकी सुई, जानें लेख में क्या-क्या लिखा

दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन को खत्म हुए दो हफ्ते से ज्यादा का समय बीत चुका है, लेकिन ‘द वायर’ की सुई अभी भी वहीं अटकी हुई है। इस लेख के जरिए उन्होंने यह साबित करने की पूरी कोशिश की कि केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म मिलकर महिलाओं और लड़कियों को जानबूझकर निशाना बना रहे हैं। ‘द वायर’ इस पूरे घटनाक्रम को इस तरह पेश कर रहा है जिससे आम जनता के मन में सरकार और कानून व्यवस्था के प्रति संदेह पैदा हो और एक झूठा डर का माहौल दिखाया जा सके।

‘द वायर’ ने अपने लेख में यह दावा किया है कि जंतर-मंतर का प्रदर्शन 25 जुलाई को खत्म होने के बाद भी महिलाओं के खिलाफ कार्रवाई रुकी नहीं, बल्कि उसका दूसरा चरण शुरू हुआ। लेख में आरोप लगाया गया कि सोशल मीडिया के जरिए महिलाओं और लड़कियों की क्रॉप की गई या एआई (AI) से बनाई गई तस्वीरें शेयर की गईं। इसमें ‘द जयपुर डायलॉग्स’ (The Jaipur Dialogues) जैसे सोशल मीडिया हैंडल्स का नाम घसीटते हुए यह प्रोपेगेंडा फैलाया गया कि वे महिलाओं के घर का पता और कॉलेज सार्वजनिक करने की माँग कर रहे थे।

‘द वायर’ ने महाराष्ट्र साइबर अथॉरिटी के आँकड़ों का हवाला देकर यह दिखाने की कोशिश की कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर महिलाओं को डराने के लिए एक बहुत बड़ा सुनियोजित षड्यंत्र चल रहा है, ताकि महिलाएँ भविष्य में कभी अपनी आवाज न उठा सकें। लेख में आगे दिल्ली पुलिस की कार्रवाई को बेहद नकारात्मक तरीके से पेश किया गया है। ‘द वायर’ ने इस बात का जिक्र किया कि दिल्ली पुलिस ने आपत्तिजनक और भड़काऊ कंटेंट को लेकर एफआईआर दर्ज की और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (X) से उन पोस्ट्स को हटाने की माँग की। लेकिन ‘द वायर’ इसे कानून का पालन करने की बजाय महिलाओं को चुप कराने का हथियार बता रहा है। वे यह नैरेटिव गढ़ रहे हैं कि सरकार और पुलिस मिलकर काम कर रहे हैं ताकि सार्वजनिक जीवन में सवाल पूछने वाले हर व्यक्ति को दबाया जा सके। इस तरह की बातें लिखकर वे लोगों के मन में यह भ्रम पैदा कर रहे हैं कि देश में न्याय व्यवस्था और पुलिस केवल सरकार के इशारे पर काम कर रही है।

15 साल की लड़की के मामले को आधार बनाकर सहानुभूति बटोरने का हथकंडा

‘द वायर’ ने अपने लेख में एक 15 साल की नाबालिग लड़की के मामले को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया है। लेख में बताया गया कि जंतर-मंतर के वायरल वीडियो के बाद उस लड़की के खिलाफ बीएनएस (BNS) की धाराओं के तहत मामला दर्ज हुआ था, जिसे बाद में वापस भी ले लिया गया। लड़की का हाथ जोड़कर माफी माँगने वाला वीडियो सामने आने के बाद ‘द वायर’ ने इसे सामाजिक शर्मिंदगी और ऑनलाइन दबाव का नतीजा बताया।

इसके बहाने उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान को भी बीच में घसीटा जिसमें उन्होंने बेटियों द्वारा अपशब्द कहे जाने को ‘कल्चर शॉक’ कहा था। ‘द वायर’ ने इसमें भी लिंगभेद का मुद्दा उठाकर यह सवाल खड़ा किया कि बेटों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई। लेख में यह तर्क दिया गया है कि अगर कोई पुरुष सार्वजनिक रूप से अपशब्द बोलता है तो उस पर कोई सामाजिक कार्रवाई नहीं होती, लेकिन महिला के ऐसा करने पर पूरा समाज और परिवार उसके खिलाफ हो जाता है।

वे यह भ्रम फैला रहे हैं कि इस तरह की घटनाओं से देश की हर लड़की और महिला के मन में डर पैदा हो रहा है ताकि परिवार उन्हें प्रदर्शनों में जाने से रोक सके। इस तरह वे पूरे मामले को ‘महिलाओं की अभिव्यक्ति की आजादी’ का नाम देकर एकतरफा सहानुभूति बटोरने की कोशिश कर रहे हैं।

‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना को घसीटकर राजनीतिक वार करना

‘द वायर’ का यह लेख केवल प्रदर्शन या पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह केंद्र सरकार की लोकप्रिय योजना ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ पर भी बेबुनियाद सवाल उठाता है। लेख में पुराने संसदीय आँकड़ों का हवाला देकर यह दिखाने की कोशिश की गई है कि योजना का ज्यादातर हिस्सा केवल प्रचार पर खर्च हुआ है।

इसके बाद उन्होंने NEET-UG 2026 में महिलाओं की हिस्सेदारी के आँकड़ों को बीच में लाकर एक अजीबोगरीब वैचारिक सवाल खड़ा किया। लेख में लिखा, “NEET-UG 2026 के लिए रजिस्ट्रेशन कराने वालों में लगभग 58% और क्वालिफ़ाई करने वाले उम्मीदवारों में करीब 59% महिलाएँ थीं, यानी पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के क्वालिफ़ाई करने की दर ज़्यादा रही। जब उनमें से कुछ लोग परीक्षा प्रणाली की माँग करने के लिए सड़कों पर उतरे तो उनकी माँग पर ध्यान देने के बजाय उनके तौर-तरीकों पर सवाल उठाए गए। द वायर ने पूरे लेख में ये कहीं जिक्र नहीं किया है कि महिलाओं-लड़कियों ने किस तरह की भाषा का इस्तेमाल प्रदर्शन में किया था और PM मोदी को अभद्र गाली दी गई थी। ये भी जिक्र नहीं किया कि जो लोग प्रदर्शन के नाम पर हल्ला करने और उत्पात मचाने के लिए आए थे, उन्होंने एक बार में अपना मुद्दा साफ तरह से नहीं रखा, वहाँ का फोकस केवल पुलिस के साथ झड़प करना, फ्री में बर्गर-पिज्जा ठूँसना था।

अब झारखंड वाले लेख को उसी नजर से देखना जरूरी है

दूसरा लेख भी प्रदर्शन पर है। यहाँ छात्र करीब दो सप्ताह से आंदोलन कर रहे थे। 10 अगस्त को वे झारखंड विधानसभा की ओर बढ़े। सरकार ने कड़ी सुरक्षा लगाई थी। निगरानी के लिए ड्रोन लगाए गए थे। छात्र कई बैरिकेड पार करके विधानसभा तक पहुँचे। रिपोर्ट में पानी की बौछार, आँसू गैस और लाठी के इस्तेमाल का जिक्र है। एक प्रदर्शनकारी के घायल होने और अस्पताल पहुँचाए जाने की बात भी है। एक अन्य युवक के सिर में चोट लगने की सूचना दी गई है।

रिपोर्ट में पत्थरबाजी और कई लोगों के घायल होने की खबर भी है। यहाँ पुलिस और छात्रों के बीच पूरे दिन टकराव की बात लिखी गई है। आंदोलन के नेता देवेंद्र नाथ महतो दस दिन से भूख हड़ताल पर थे। विधानसभा की ओर मार्च के बाद उनकी तबीयत बिगड़ी और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। इतनी बातें होने के बावजूद रिपोर्ट का शीर्षक मुख्य रूप से छात्रों के धरने और कॉन्ग्रेस की पुलिस कार्रवाई की निंदा पर केंद्रित है।

झारखंड में पुलिस की कार्रवाई का जिक्र है, लेकिन भाषा का फर्क साफ है

झारखंड वाली रिपोर्ट में पुलिस के बल प्रयोग का जिक्र जरूर है। लेकिन रिपोर्ट में पुलिस का पक्ष भी साथ रखा गया है। राँची पुलिस ने ‘द हिंदू’ से कहा कि भीड़ को हटाने के लिए बल प्रयोग हुआ था। हालाँकि पुलिस ने इसे लाठीचार्ज कहने से इनकार किया। पुलिस अधिकारी ने इसे ‘reactionary’ यानि प्रतिक्रियावादी बताया।

कुछ पुलिस अधिकारियों के हवाले से यह भी बताया गया कि उन्हें प्रदर्शनकारी युवाओं के खिलाफ बल इस्तेमाल नहीं करने के सख्त निर्देश दिए गए थे। यानी यहाँ रिपोर्ट ने पुलिस की सफाई को विस्तार दिया। यह पत्रकारिता के लिहाज से जरूरी भी है। लेकिन सवाल यह है कि दिल्ली वाले लेख में इसी तरह केंद्र या दिल्ली पुलिस का पक्ष कितनी प्रमुखता से रखा गया?

दोनों लेखों को साथ पढ़ने पर यही अंतर दिखाई देता है। दिल्ली वाले लेख में सरकारी कार्रवाई को व्यापक दमन के फ्रेम में रखा गया। झारखंड वाले लेख में पुलिस कार्रवाई के साथ पुलिस का स्पष्टीकरण भी प्रमुखता से आया।

झारखंड में महिलाएँ और लड़कियाँ कहाँ गायब हो गईं?

यह दोनों लेखों के बीच सबसे दिलचस्प अंतर है। पहले लेख की पूरी संरचना महिलाओं और लड़कियों पर आधारित है। शीर्षक में ही ‘Women Were Targeted’ लिखा गया है। लड़की की उम्र, उसके खिलाफ हुई कार्रवाई, सोशल मीडिया पर महिलाओं की तस्वीरें और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दे लेख के केंद्र में हैं।

लेकिन झारखंड वाले प्रदर्शन में भी छात्र आंदोलन कर रहे थे। दिए गए कंटेंट में हजारों छात्रों के प्रदर्शन, पुलिस कार्रवाई, पानी की बौछार, आँसू गैस और लाठीचार्ज की चर्चा है। ऐसे बड़े छात्र आंदोलन में महिलाओं और लड़कियों की मौजूदगी अगर थी, तो उस पहलू को रिपोर्ट में प्रमुखता नहीं मिली।

यही तुलना सवाल खड़ा करती है। अगर महिला प्रदर्शनकारी होना अपने आप में एक महत्वपूर्ण पत्रकारिता का मुद्दा है, तो यह महत्व केवल उस आंदोलन में क्यों दिखाई देता है, जहाँ निशाना केंद्र सरकार पर बनता है?

झारखंड वाले लेख में सरकार का पक्ष ज्यादा जगह पाता है

झारखंड की रिपोर्ट में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का बयान विस्तार से दिया गया है। सोरेन ने छात्रों को भरोसा दिया कि सरकार उनकी चिंताओं पर कार्रवाई करेगी। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में छात्रों को अपनी बात रखने का अधिकार है। साथ ही उन्होंने अपनी प्रशासन और पुलिस की तारीफ करते हुए कहा कि स्थिति को संयम और जिम्मेदारी से संभाला गया।

उन्होंने यह भी कहा कि विपक्ष के कुछ लोग राजनीतिक लाभ के लिए माहौल खराब करने और छात्रों को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं। इसके बाद सरकार की ओर से परीक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, तकनीक आधारित, सुरक्षित और जवाबदेह बनाने की बात भी रिपोर्ट में रखी गई है। इस तरह पाठक को सरकार का बचाव और सरकार की ओर से किए गए प्रस्ताव दोनों मिलते हैं।

दिल्ली वाले लेख में ऐसा संतुलन उतनी प्रमुखता से नहीं दिखाई देता। वहाँ सरकार की भूमिका मुख्य रूप से कार्रवाई करने वाले पक्ष के रूप में सामने आती है।

झारखंड में कॉन्ग्रेस और विपक्ष की प्रतिक्रिया भी विस्तार से आई

झारखंड वाले लेख में कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी का बयान भी दिया गया है। उन्होंने छात्रों के खिलाफ बल प्रयोग को गलत बताया और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार की बात कही। कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियंक खड़गे के बयान का भी जिक्र है। उन्होंने छात्रों के आंदोलन को युवाओं में असंतोष का संकेत बताया और बातचीत की जरूरत पर जोर दिया।

झारखंड की मंत्री दीपिका सिंह का बयान भी शामिल है। उन्होंने कहा कि प्रशासन कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी कदम उठा रहा है और लाठीचार्ज, आँसू गैस या पैलेट गन का इस्तेमाल नहीं होगा। यानी दूसरे लेख में सरकार, विपक्ष, पुलिस और आंदोलनकारी सभी पक्षों को जगह दी गई है।

निष्पक्षता का ढोंग करने वाले ‘द वायर’ का असली एजेंडा

यह साफ तौर पर दिखाई देता है कि ‘द वायर’ की पत्रकारिता में दोहरे मापदंड साफ तौर पर काम कर रहे हैं। जब मामला केंद्र सरकार या भाजपा शासित राज्यों से जुड़ा होता है, तो वे महिलाओं, मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी का हवाला देकर सरकार को घेरने की पूरी कोशिश करते हैं।

लेकिन जब विपक्षी दलों या उनकी पसंद की सरकारों द्वारा जनता और छात्रों पर अत्याचार किए जाते हैं, तो वे सारी बातें छुपा लेते हैं और सरकार के हित में खबरें परोसते हैं। झारखंड के मामले में पुलिस की कमियों को छिपाना और महिलाओं के संघर्ष का जिक्र तक न करना इस बात का पक्का सबूत है कि ‘द वायर’ सिर्फ और सिर्फ एक खास राजनीतिक एजेंडे के तहत काम कर रहा है।

AAP सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की ईमानदारी पर उठाए सवाल: न्यायिक नियुक्तियों पर किए गए हमले का पढ़ें पूरा विश्लेषण

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी (आप) के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने भारतीय न्यायपालिका की निष्पक्षता पर हमला बोला है। 9 अगस्त 2026 को अरविंद केजरीवाल ने दावा किया कि न्यायाधीश उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) में जाने की ‘जल्दबाजी’ में हैं। उन्होंने यह भी कहने की कोशिश की कि कॉलेजियम ऐसे न्यायाधीशों को शामिल कर रहा है, जो ‘सम्राट’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति निष्ठा प्रदर्शित करते हैं।

न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्रा को पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने की सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश का हवाला देते हुए केजरीवाल ने दावा किया कि ‘वरिष्ठता को दरकिनार करके’ न्यायमूर्ति मिश्रा की नियुक्ति उन्हें ‘लेन-देन के प्रति संवेदनशील’ बनाती है।

केवल न्यायमूर्ति मिश्रा ही नहीं, बल्कि पूरी न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए, केजरीवाल ने दावा किया कि न्यायाधीशों को ‘सम्राट के प्रति निष्ठा’ के आधार पर सुप्रीम कोर्ट में प्रमोशन दिया जा रहा है। ‘सवालों’ के रूप में दिए गए आप नेता के बयानों से यह आभास मिलता है कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम से समझौता हो चुका है और वह शीर्ष अदालत में ऐसे न्यायाधीशों को भर रहा है जो वैचारिक रूप से मोदी सरकार के साथ हैं।

केजरीवाल ने लिखा, “ऐसा लगता है कि एससी (सुप्रीम कोर्ट) जाने की बहुत जल्दबाजी है। क्या न्यायाधीशों की वरिष्ठता को दरकिनार करके बिना बारी के सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नति की अनुमति दी जानी चाहिए? यह उन्हें लेन-देन के सौदे के प्रति संवेदनशील बनाता है। किसी न्यायाधीश को सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत करने से पहले क्या जाँचा जाता है? सम्राट के प्रति निष्ठा? क्या लोगों को यह जानने का अधिकार नहीं होना चाहिए? वे युवा पीढ़ी को क्या चेहरा दिखाएँगे?”

अरविंद केजरीवाल ने आगे यह भी कहा कि न्यायाधीशों की अपारदर्शी पदोन्नति की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, विशेष रूप से उन न्यायाधीशों के मामले में जो ‘कार्यपालिका को खुश करने के लिए अपनी हद से बाहर चले जाते हैं।’

केजरीवाल ने आगे कहा, “किसी भी प्रकार की बिना बारी और अपारदर्शी पदोन्नति की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। विशेष रूप से ऐसे मामलों में जहाँ कानून को ताक पर रखकर कार्यपालिका को खुश करने के लिए हद से बाहर जाया जाता है। हमें अदालतों के राजनीतिक इस्तेमाल (वेपनाइजेशन) से सावधान रहना चाहिए। लोकतंत्र के जीवित रहने के लिए अदालतों की निष्पक्षता सबसे महत्वपूर्ण है।”

अरविंद केजरीवाल का बयान न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि तथ्यात्मक रूप से गलत और दोहरे रवैये से भरा हुआ है।

क्या न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्रा को सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत किया गया है, जैसा कि अरविंद केजरीवाल ने आरोप लगाया?

आम आदमी पार्टी के नेता का यह दावा पूरी तरह से बेबुनियाद है कि न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्रा को वरिष्ठता को दरकिनार करके हड़बड़ी में सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत किया गया है। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के स्थायी मुख्य न्यायाधीश के पद के लिए है, न कि सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नति के लिए।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाले सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 6 अगस्त को न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्रा को पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के स्थायी मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने की सिफारिश की थी। न्यायमूर्ति मिश्रा पहले से ही पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के रूप में सेवा दे रहे थे। न्यायमूर्ति मिश्रा की सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नति नहीं हुई है।

न्यायमूर्ति मिश्रा की मूल अदालत इलाहाबाद थी, और उन्हें फरवरी 2014 में अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। इसके बाद फरवरी 2016 में स्थायी किया गया था। न्यायमूर्ति मिश्रा का तबादला पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में हुआ और वे 21 जुलाई 2025 को वहाँ मौजूद हैं। न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्रा वहाँ सबसे वरिष्ठ कनिष्ठ न्यायाधीश (प्युस्ने जज) बने (मुख्य न्यायाधीश के अलावा अन्य न्यायाधीश, जिनकी वरिष्ठता मुख्य न्यायाधीश से कम होती है)। यहाँ वरिष्ठता शुरुआती नियुक्ति की तारीख के आधार पर तय होती है।

पूर्व मुख्य न्यायाधीश शील नागू की सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नति के बाद, न्यायमूर्ति मिश्रा ने अनुच्छेद 223 के तहत जून 2026 के मध्य में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश का पदभार संभाला।

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा न्यायमूर्ति मिश्रा के लिए स्थायी मुख्य न्यायाधीश की सिफारिश इसके लगभग दो महीने बाद आई। अरविंद केजरीवाल ने जिसे न्यायपालिका के खतरनाक ‘हथियार के रूप में इस्तेमाल’ का नाम दिया, वास्तव में वह कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की पुष्टि करने की एक सामान्य प्रक्रिया थी और इस मामले में उच्च न्यायालय के भीतर वरिष्ठता को दरकिनार करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।

अरविंद केजरीवाल द्वारा लगाए गए इस आरोप के विपरीत कि सुप्रीम कोर्ट किसी तरह ‘सम्राट’ के इशारे पर काम कर रहा है, तथ्य बिल्कुल अलग हैं। पहली बात, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम वरिष्ठ सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों का एक स्वतंत्र निकाय है; इसका कार्यपालिका या सत्तारूढ़ दल से कोई लेना-देना नहीं है।

दूसरी बात, अरविंद केजरीवाल ने ऐसा कोई भी साक्ष्य पेश नहीं किया जिससे यह संकेत मिले कि पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्रा की नियुक्ति की सुप्रीम कोर्ट की सिफारिश अखिल भारतीय उच्च न्यायालय वरिष्ठता नियमों के संदर्भ में ‘बिना बारी’ की थी।

निठारी कांड से लेकर अवैध खनन, बुनियादी ढाँचे, सेवा कानून, पर्यावरण आदि से जुड़े मामलों को संभालने तक, न्यायमूर्ति मिश्रा के करियर में भाजपा के प्रति किसी भी तरह के झुकाव, मोदी सरकार के प्रति स्पष्ट निष्ठा या पंजाब में आप सरकार के खिलाफ किसी दुर्भावना का कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड नहीं है।

न तो अरविंद केजरीवाल ने किसी ऐसे फैसले का जिक्र किया है और न ही न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्रा द्वारा दिया गया ऐसा कोई सार्वजनिक फैसला उपलब्ध है जिसमें केजरीवाल, आप या दिल्ली में उनकी पूर्ववर्ती सरकार से जुड़े कथित घोटाले शामिल हों। इसलिए केजरीवाल द्वारा ‘कानून को ताक पर रखने’ या कार्यपालिका के साथ लेन-देन के सौदे के आरोप किसी तथ्यात्मक आधार पर नहीं टिकते और यह केवल राजनीतिक लाभ के लिए एक सामान्य उच्च न्यायालय नियुक्ति को सनसनीखेज बनाने का प्रयास है।

इस बीच, कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रवक्ता सौरव दास, जिन्होंने पहले पूर्व सीजीआई डी.वाई. चंद्रचूड़ के खिलाफ एक अपमानजनक लेख लिखा था, ने अरविंद केजरीवाल के इस काल्पनिक प्रचार को और बढ़ावा दिया।

अरविंद केजरीवाल की तरह सौरव दास ने भी यह स्पष्ट नहीं किया कि पंजाब और हरियाणा न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश को स्थायी रूप से नियुक्त करने की सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए न्यायपालिका के हथियार के रूप में उपयोगी कैसे बन गई।

उन्होंने लिखा, “न्यायपालिका की स्थिति पर एक विपक्षी नेता द्वारा तीखी टिप्पणी। वास्तव में, हमें उस तरीके से बहुत चिंतित होना चाहिए जिस तरह से राजनीतिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए अदालतों को हथियार बनाया जा रहा है। हमारी अदालतों की रक्षा की जानी चाहिए और उन्हें बहुत उच्च निष्पक्षता वाले संस्थान के रूप में रहना चाहिए। युवा पीढ़ी यह सुनिश्चित करेगी कि ऐसा हो। जवाबदेही तय की जाएगी,”

क्या अरविंद केजरीवाल का हमला न्यायमूर्ति शील नागू पर केंद्रित था? यदि हाँ, तो भी आप नेता के आरोप तर्कहीन और दुर्भावना से प्रेरित हैं

दिलचस्प बात यह है कि आप के कुछ समर्थकों ने दावा किया है कि केजरीवाल का पोस्ट न्यायमूर्ति शील नागू के बारे में था, जिन्हें हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत किया गया है। हालाँकि, अगर हम पोस्ट की सामग्री और उसमें उद्धृत सामग्री को देखें, तो यह व्याख्या समयक्रम से मेल नहीं खाती। फिर भी, यदि हम विपक्षी दलों द्वारा उन न्यायाधीशों को बदनाम करने के रिकॉर्ड को देखें, जिन्होंने विशिष्ट मामलों में उनके खिलाफ फैसले दिए हैं, तो यह समझ आता है कि केजरीवाल का हमला न्यायमूर्ति शील नागू की सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नति को लेकर था।

अरविंद केजरीवाल ने सीधे तौर पर ‘बार एंड बेंच’ के एक एक्स पोस्ट को उद्धृत किया था, जिसमें न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्रा को पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश बनाने की सुप्रीम कोर्ट की सिफारिश से जुड़ी रिपोर्ट का लिंक था। यदि केजरीवाल न्यायमूर्ति शील नागू की बात कर रहे थे, तो वे न्यायमूर्ति मिश्रा से जुड़ी समाचार सामग्री को उद्धृत करते हुए यह क्यों लिखते, ‘यह उन्हें लेन-देन के सौदे के प्रति संवेदनशील बनाता है’, जब तक कि केजरीवाल अस्पष्टता के पीछे छिपने की कोशिश न कर रहे हों?

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की बैठक 6 अगस्त 2026 को हुई थी और शीर्ष अदालत के बयान में न्यायमूर्ति शील नागू का कोई उल्लेख नहीं है, न ही अरविंद केजरीवाल द्वारा उद्धृत बार एंड बेंच की रिपोर्ट में।

उल्लेखनीय है कि न्यायमूर्ति शील नागू ने जुलाई 2024 से पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्य किया। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट में उनकी पदोन्नति की सिफारिश की थी। उनकी नियुक्ति को केंद्र सरकार द्वारा 1 जून 2026 को अधिसूचित किया गया था और उन्होंने 2 जून को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में पदभार ग्रहण किया।

न्यायमूर्ति नागू की पदोन्नति से पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के स्थायी मुख्य न्यायाधीश का पद रिक्त हुआ, जिससे न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश बने। स्वाभाविक रूप से कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश को ही स्थायी मुख्य न्यायाधीश के रूप में जिम्मेदारी संभालने की सिफारिश की गई।

सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति शील नागू की पदोन्नति के संबंध में, केजरीवाल के ‘बिना बारी’ और ‘वरिष्ठता को दरकिनार करने’ के दावे—चाहे वे नागू पर ही क्यों न केंद्रित हों—केवल न्यायपालिका के साथ-साथ केंद्र सरकार पर किया गया एक राजनीतिक हमला हैं।

हालाँकि वरिष्ठता को पूरी तरह से नजरअंदाज नहीं किया जाता है, लेकिन यह एकमात्र मानदंड नहीं है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम शीर्ष अदालत में पदोन्नति के लिए न्यायाधीशों की सिफारिश करते समय विचार करता है। कॉलेजियम प्रणाली के तहत, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश अखिल भारतीय वरिष्ठता के यांत्रिक अनुप्रयोग के बजाय योग्यता, समग्र ट्रैक रिकॉर्ड, प्रदर्शन और विभिन्न उच्च न्यायालयों के प्रतिनिधित्व संतुलन के मिश्रण पर विचार करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम समय के साथ-साथ वरिष्ठता के एक अटूट क्रम में न्यायाधीशों का चयन करने के लिए बाध्य नहीं है। जाहिर तौर पर मध्य प्रदेश और पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालयों में न्यायमूर्ति शील नागू का लंबा कार्यकाल और मामलों के निपटारे की दर प्रशासनिक क्षमता और न्यायिक कार्य के मामले में प्रभावशाली मानी गई थी, और कॉलेजियम ने उन्हें शीर्ष अदालत के कार्यभार को संभालने के लिए उपयुक्त पाया होगा।

रिपोर्ट के अनुसार, न्यायमूर्ति नागू ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान 499 से अधिक फैसले लिखे हैं। नागू उस तीन सदस्यीय समिति का भी हिस्सा थे जिसे तत्कालीन सीजेआई संजीव खन्ना ने भ्रष्टाचार के आरोपी इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा की जांच के लिए गठित किया था।

यदि न्यायपालिका के भीतर पदोन्नति के लिए केवल वरिष्ठता ही प्रमुख आधार होता, तो भारतीय संविधान अनुच्छेद 124(3) के तहत प्रतिष्ठित उच्च न्यायालय के वकीलों की सुप्रीम कोर्ट में सीधी पदोन्नति की अनुमति स्पष्ट रूप से नहीं देता। संविधान विविध कानूनी दृष्टिकोणों, बार के अनुभव और विशेष विशेषज्ञता को सीधे वकालत से भी शीर्ष अदालत में शामिल करने का निर्देश देता है।

हालाँकि, यदि अरविंद केजरीवाल का पोस्ट न्यायमूर्ति शील नागू के खिलाफ था, तो वे वरिष्ठता के पीछे छिपते हुए प्रतीत होते हैं।

क्योंकि यदि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को चुनते समय वरिष्ठता मानदंड से हटना केजरीवाल की नाराजगी का कारण होता, तो उन्होंने अधिवक्ता वी. मोहना की सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नति की भी आलोचना की होती। न्यायमूर्ति शील नागू के साथ, अधिवक्ता वी. मोहना को भी 2 जून 2026 को सीधे सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किया गया था।

जाहिर तौर पर, शील नागू आम आदमी पार्टी से जुड़े विभिन्न मामलों का हिस्सा रहे हैं। नवंबर 2025 में, जब पंजाब विश्वविद्यालय सीनेट चुनावों को लेकर विवाद खड़ा हुआ था, तो प्रदर्शनकारियों ने इसे राज्य बनाम केंद्र का मुद्दा बना दिया था, ‘आरएसएस मुर्दाबाद’ के नारे लगाए गए थे, और आप इस आंदोलन का समर्थन करने वाले प्रमुख राजनीतिक दलों में शामिल थी।

उस समय, न्यायमूर्ति शील नागू के नेतृत्व वाली पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय की पीठ ने उस भय फैलाने वाले आख्यान को खारिज कर दिया था, जिसे भाजपा विरोधी राजनीतिक दल और गैर-राजनीतिक तत्व चुनाव के संबंध में फैला रहे थे। अदालत ने शैक्षणिक गतिविधियों को फिर से शुरू करने का आदेश दिया था और कहा था कि चुनाव जल्द से जल्द कराए जाने चाहिए और उस राजनीति से प्रेरित हंगामे की आवश्यकता को खारिज कर दिया था, जिसका इस्तेमाल आप और विभिन्न यूनियनों द्वारा केंद्र सरकार को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा था।

अप्रैल 2026 में, न्यायमूर्ति शील नागू और न्यायमूर्ति संजीव बेरी की खंडपीठ ने आप के पूर्व राज्यसभा सांसद राजिंदर गुप्ता द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई की, जो आप से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल होने वाले सात आप सांसदों में से एक थे।

भाजपा में उनके शामिल होने के बाद, पंजाब में आप सरकार के तहत पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीपीसीबी) ने ट्राइडेंट ग्रुप की धौला इकाई के परिसरों पर छापे मारे थे। ट्राइडेंट ग्रुप के चेयरमैन एमेरिटस राजिंदर गुप्ता हैं। पाला बदलने को लेकर आप सरकार द्वारा राजनीतिक बदले की कार्रवाई का आरोप लगाते हुए ट्राइडेंट ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। गुप्ता की पंजाब पुलिस सुरक्षा कवर को अचानक वापस लेने के संबंध में भी एक अन्य याचिका दायर की गई थी।

इन मामलों में, न्यायमूर्ति शील नागू और न्यायमूर्ति संजीव बेरी की खंडपीठ ने पीपीसीबी को निर्देश दिया कि वह कमियों को सुधारने के लिए 30 दिनों का समय दिए बिना गुप्ता के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई न करे। यह पाया गया कि पीपीसीबी किसी भी पर्यावरणीय खतरे या जहरीले कचरे की उपस्थिति को साबित करने में विफल रहा। इसी तरह, सुरक्षा कवर से जुड़ी याचिका में नागू की अगुआई वाली पीठ ने राज्य सरकार को गुप्ता और उनके परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।

एक अन्य मामला जिसमें आप का सामना अदालत में न्यायमूर्ति शील नागू से हुआ, वह आप के एक और सांसद संदीप पाठक से जुड़ा था, जो भाजपा में शामिल हो गए थे। उन्होंने भी दंडात्मक कार्रवाई से अंतरिम संरक्षण की माँग करते हुए याचिका दायर की थी। इस मामले में पंजाब सरकार ने पहले कहा कि उसके पास प्राथमिकी के संबंध में कोई जानकारी नहीं है, और बाद में आश्वासन दिया कि पाठक के खिलाफ अदालत की अनुमति के बिना कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।

दिलचस्प बात यह है कि अब सीजेपी के सह-संयोजक सौरव दास, जिन्होंने अपनी पिछली कानूनी खोजी रिपोर्टिंग में इन मामलों के संबंध में साजिश के सिद्धांतों को फैलाया था, उन्होंने न्यायमूर्ति शील नागू की निष्पक्षता पर सवाल उठाए थे। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि सोशल मीडिया पर कई लोग मजाक बना रहे हैं कि शायद केजरीवाल का विवादित एक्स पोस्ट सौरव दास द्वारा ही तैयार किया गया था।

हालाँकि अपने इस कथित विश्वास के बावजूद कि न्यायमूर्ति शील नागू की निष्पक्षता ‘सम्राट’ के प्रति समर्पित है, आप या अरविंद केजरीवाल ने खुलकर उनके खिलाफ जाँच की माँग नहीं की है और न ही साजिश के सिद्धांतों से परे पक्षपात के कोई ठोस सबूत पेश किए हैं। यदि ये आरोप नागू के खिलाफ निर्देशित हैं, तो भी ‘कानून को ताक पर रखने’ या कार्यपालिका के साथ लेन-देन के सौदे के दावों का कोई तथ्यात्मक आधार नहीं है।

आप प्रमुख अरविंद केजरीवाल द्वारा न्यायमूर्ति शील नागू पर कथित हमला न्यायिक निष्पक्षता को लेकर नहीं है, बल्कि उन न्यायाधीशों के प्रति उनकी अपनी चिढ़ है, जो आप के प्रति अंधभक्ति के बजाय किसी मामले की योग्यता के आधार पर निर्णय करते हैं।

‘सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम सुचारू रूप से काम कर रहा है’ कहने से लेकर उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठाने तक: आप और अरविंद केजरीवाल का दोहरा रवैया

यह हास्यास्पद है कि अरविंद केजरीवाल अब सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि यह ‘सम्राट’ मोदी के इशारे पर उनके वफादारों को शामिल करने के लिए काम कर रहा है। केजरीवाल और उनकी पार्टी आप ने 2015 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) अधिनियम को रद्द करने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया था।

एनजेएसी अधिनियम 2014 में मोदी सरकार द्वारा कॉलेजियम के स्थान पर एक आयोग बनाने के लिए लाया गया था जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश, दो वरिष्ठ सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश, केंद्रीय कानून मंत्री और प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता तथा सीजेआई वाली एक समिति द्वारा चुने गए दो प्रतिष्ठित व्यक्ति शामिल थे।

यह ढाँचा द्विपक्षीय विधायी समर्थन और राष्ट्रपति की सहमति से लागू किया गया था। इसका उद्देश्य न्यायिक नियुक्तियों में न्यायिक, कार्यकारी और नागरिक दृष्टिकोण को एकीकृत करना था, जो संवैधानिक शासन के बहुलवादी दृष्टिकोण को दर्शाता था। एनजेएसी अधिनियम न्यायिक नियुक्तियों में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के विवादित एकाधिकार को समाप्त करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम था।

हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने 4:1 के बहुमत के फैसले से इसे अमान्य घोषित कर दिया और कॉलेजियम को इस आधार पर बरकरार रखा कि इसकी प्रधानता न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए आवश्यक है, जो संविधान के मूल ढाँचे का एक हिस्सा है।

उस समय, आप ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया था और इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए एक सकारात्मक निर्णय बताया था। आम आदमी पार्टी ने इस फैसले को मोदी सरकार के लिए एक बड़ा झटका करार दिया था।

आप ने अक्टूबर 2015 में एक बयान में कहा था, ” पार्टी का यह स्पष्ट मानना है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए एक पारदर्शी प्रणाली समान रूप से महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, लेकिन कॉलेजियम को अधिक पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिए।”

दिसंबर 2022 में सांसद विकास रंजन भट्टाचार्य ने न्यायिक नियुक्तियों को लेकर एक निजी विधेयक सदन में पेश किया था, तो आम आदमी पार्टी ने उसका विरोध किया था। इतना ही नहीं राष्ट्रीय न्यायिक आयोग विधेयक, 2022 को आम आदमी पार्टी ने एनजेएसी अधिनियम के समान बताया था, जिसे शीर्ष अदालत पहले ही रद्द कर चुकी थी।

तब आप के तत्कालीन राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने कहा था कि ‘कॉलेजियम प्रणाली सुचारू रूप से काम कर रही है।’

उन्होंने कहा, ” कॉलेजियम प्रणाली सुचारू रूप से काम कर रही है, सुधार की गुंजाइश है, लेकिन किसी राजनीतिक हस्तक्षेप की नहीं। मुझे लगता है कि हम एक संवैधानिक असंभवता का प्रयास कर रहे हैं। न्यायाधीशों की नियुक्ति की वर्तमान कॉलेजियम प्रणाली सुचारू रूप से काम कर रही है। सुधार की गुंजाइश हो सकती है, जिसकी तलाश न्यायपालिका के साथ चर्चा और संवाद के बाद की जा सकती है।”

आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल संभवतः अपने व्यक्तिगत दुर्भावना के कारण न्यायिक नियुक्तियों का राजनीतिकरण कर रहे हैं। चाहे इसे न्यायमूर्ति मिश्रा को निशाना बनाने में तथ्यात्मक गलती माना जाए या न्यायमूर्ति शील नागू पर एक परोक्ष हमला। कॉलेजियम प्रणाली पर केजरीवाल का हमला सीधा था और इसका उद्देश्य यह भ्रम फैलाकर जनता में न्यायपालिका के प्रति अविश्वास पैदा करना प्रतीत होता है।

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम का समर्थन करने से लेकर अब उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठाने तक, आप और अरविंद केजरीवाल ने न्यायपालिका के इर्द-गिर्द इस साजिश की थ्योरी को विश्वसनीयता देने के लिए एक अलार्म बजाने वाली कहानी गढ़ी है कि मोदी सरकार किसी तरह न्यायपालिका पर कब्जा कर रही है, जबकि सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वही मोदी सरकार सुप्रीम कोर्ट से एनजेएसी अधिनियम को भी पारित नहीं करा सकी थी।

रिसिन जहर बनाने की साजिश, विदेशी फंडिंग और ISIS हैंडलर से साँठगाँठ: NIA कोर्ट ने सबूत देख खारिज की जिहादी डॉक्टर की बेल याचिका, पढ़ें अदालत ने क्या कहा

गुजरात के अहमदाबाद की एक विशेष NIA अदालत ने 2025 के आईएसआईएस Ricin आतंकी साजिश मामले में मुख्य आरोपित जिहादी डॉ सैयद अहमद मोहिउद्दीन की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी। सैयद अहमद मोहिउद्दीन की ओर से पेश अधिवक्ता- के एम दस्तूर ने दलील दी कि उनका मुवक्किल निर्दोष है और उसे झूठे मामले में फँसाया गया है।

बचाव पक्ष ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से किसी आतंकी संगठन के साथ उसके संबंध स्थापित नहीं होते और न ही यह साबित होता है कि उसका लोगों को नुकसान पहुँचाने का इरादा था।

बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि मोहिउद्दीन को यह जानकारी नहीं थी कि उन बैगों के अंदर क्या था, जिनमें हथियार बरामद किए गए थे और उसे Ricin तैयार करने की प्रक्रिया की भी कोई जानकारी नहीं थी।

अदालत को आरोपित के खिलाफ प्रथम दृष्टया सामग्री मिली

विशेष न्यायाधीश (एनआईए) हेमंग आर रावल ने कहा कि मामले में गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की धारा 16, 17, 18, 18-B और 20, भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 61(2) और आर्म्स एक्ट के तहत गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

अदालत ने कहा कि जाँच में 2025 के आईएसआईएस Ricin आतंकी साजिश मामले के आरोपित जिहादी मोहिउद्दीन के खिलाफ प्रथम दृष्टया सामग्री सामने आई है और मामले में आरोप पत्र दाखिल किया जा चुका है।

अदालत ने कहा कि डॉक्टर मोहिउद्दीन पर बिना आवश्यक अनुमति के हैदराबाद स्थित अपने घर में एक प्रयोगशाला स्थापित करने का आरोप है। जाँचकर्ताओं के अनुसार, वहाँ अरंडी के बीज और रसायनों का इस्तेमाल कर Ricin तैयार किया गया था।

अदालत ने कहा कि मोहिउद्दीन के मेडिकल बैकग्राउंड को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि वह Ricin की प्रकृति से पूरी तरह अनजान था। Ricin एक अत्यधिक जहरीला जैविक विष है, जिसमें बड़े पैमाने पर मौतें करने की क्षमता होती है।

अभियोजन का दावा- डॉक्टर हैंडलर के साथ मिलकर कर रहा था काम

जमानत याचिका का विरोध करते हुए विशेष लोक अभियोजक एम जी कपाड़िया ने अदालत को बताया कि मोहिउद्दीन गंभीर अभियोजन का सामना कर रहा है और वह बिना लाइसेंस के तीन पिस्तौल तथा 30 जिंदा कारतूस लेकर मेहसाणा की ओर यात्रा कर रहा था। अभियोजन ने कहा कि यह तथ्य और अन्य साक्ष्य व्यापक साजिश में उसकी संलिप्तता को दर्शाते हैं।

अभियोजन के अनुसार, मोहिउद्दीन ने अपने हैदराबाद स्थित आवास को अरंडी के बीजों से रिसिन निकालने के लिए एक गुप्त प्रयोगशाला में बदल दिया था।

अभियोजन ने बताया कि उसके मोबाइल फोन में अबू खदीजा नामक एक टेलीग्राम यूजर के साथ बातचीत मिली, जिसे वांछित आरोपित बताया गया है। इन बातचीत में रिसिन तैयार करने के लिए एसीटोन, अरंडी के बीज और हथियार हासिल करने को लेकर चर्चा हुई थी।

गौरतलब है कि रिसिन एक अत्यधिक जहरीला प्रोटीन है, जो अरंडी के पौधे, Ricinus communis, से प्राप्त होता है। रिसिन कोई वायरस या बैक्टीरिया नहीं है, बल्कि यह एक लेक्टिन विष है, जो कोशिकाओं में प्रोटीन के निर्माण को बाधित करता है। इसके सेवन से अंगों का काम करना बंद हो जाने और तेजी से मौत होने की आशंका रहती है।

रिसिन निकालने की प्रक्रिया में अरंडी के बीजों को पीसना, उनका तेल निकालना और फिर बचे हुए पदार्थ को रासायनिक प्रक्रिया से गुजारकर रिसिन-युक्त गूदे को अलग करना शामिल है। हालाँकि यह एक जटिल प्रक्रिया है, लेकिन इसके लिए बुनियादी प्रयोगशाला उपकरण, दस्ताने और एसीटोन जैसे सामान की आवश्यकता होती है।

सरकारी पक्ष ने कोर्ट को आगे बताया कि मोहिउद्दीन एक मजहबी वजह के नाम पर अबू खदीजा की मदद करने के लिए तैयार हुआ था। दोनों टेलीग्राम से संपर्क में आए थे। बाद में उसने अपना काम शुरू करने के लिए लगभग 4 लाख अमेरिकी डॉलर (तकरीबन 3.3 करोड़ रुपये) की माँग भी की थी। अपनी योजना के सिलसिले में वह दिल्ली गया, जहाँ उसने पैसों, फंडिंग और आगे के काम और योजनाओं पर बात की।

इसके अलावा, मोहिउद्दीन ने अबू खदीजा के कहने पर एक कसम ली, उसका वीडियो बनाकर अपने हैंडलर को भेजा। फिर उसने अब्दुल वाजिद और नावेद पामिदी से भी ऐसी ही कसम दिलवाकर अपना गिरोह/नेटवर्क बढ़ाने की कोशिश की। उसने जहर तैयार करने की तस्वीरें और वीडियो भी अबू खदीजा को भेजे थे।

अदालत ने मोहिउद्दीन पर लगे आरोपों को दर्ज किया

अदालत में पेश चार्जशीट के सारांश के अनुसार, मोहिउद्दीन 2025 में टेलीग्राम के माध्यम से अबू खदीजा के संपर्क में आया और उसकी मदद करने के लिए सहमत हुआ। उसने कारोबारी गतिविधियों के लिए करीब 4 लाख अमेरिकी डॉलर की माँग की और अगस्त 2025 में एक सहयोगी से मिलने तथा योजनाओं और फंडिंग पर चर्चा करने के लिए दिल्ली की यात्रा की।

अदालत ने यह भी दर्ज किया कि मोहिउद्दीन सितंबर 2025 में अहमदाबाद गया और मेहसाणा के छत्राल के पास एक पूर्व निर्धारित स्थान से 1.90 लाख रुपए की राशि हासिल की, जिसे आतंकी गतिविधियों से प्राप्त धन बताया गया। बाद में उसने एक शपथ रिकॉर्ड की और उसे अपने हैंडलर के साथ साझा किया। नेटवर्क के विस्तार के प्रयासों के तहत अन्य लोगों को भी इसी तरह की शपथ दिलाई गई।

आरोपपत्र में आगे कहा गया है कि मोहिउद्दीन ने अरंडी के बीज, तेल निकालने वाले उपकरण और एसीटोन जैसे रसायन हासिल किए। अदालत ने अभियोजन के इस पक्ष को दर्ज किया कि इन सामग्रियों का इस्तेमाल उसके हैदराबाद स्थित आवास में बनी प्रयोगशाला में रिसिन तैयार करने के लिए किया गया था।

आरोप पत्र में रिसिन को रासायनिक हथियार सम्मेलन की अनुसूची-I में सूचीबद्ध अत्यधिक जहरीला जैविक विष बताया गया है।

अदालत ने यह भी दर्ज किया कि मोहिउद्दीन ने अतिरिक्त धन और सामग्री हासिल करने की व्यवस्था की थी और नवंबर 2025 में अहमदाबाद जाने की योजना बनाई थी, जहाँ उसे आतंकी वारदात के लिए उन्नत हथियार प्राप्त हुए। इन आरोपों के आधार पर अदालत ने कहा कि आरोप गंभीर हैं और प्रथम दृष्टया मामले में उसकी संलिप्तता दिखाई देती है।

मोहिउद्दीन रिसिन आतंकी साजिश से अवगत था, उसे पता था कि बैग में हथियार थे

अदालत ने ISIS रिसिन आतंकी साजिश के आरोपित सैयद अहमद मोहिउद्दीन के हथियारों के बारे में जानकारी नहीं होने संबंधी बचाव पक्ष की दलील को खारिज कर दिया। अदालत ने तीन पिस्तौल, 30 जिंदा कारतूस, भारतीय और अमेरिकी मुद्रा तथा चार लीटर अरंडी के तेल वाली एक बोतल की बरामदगी का उल्लेख किया।

न्यायाधीश ने कहा कि आरोपपत्र में मौजूद सामग्री से संकेत मिलता है कि मोहिउद्दीन अबू खदीजा के निर्देशों पर काम कर रहा था और हथियार किसी अनुचित उद्देश्य के लिए हासिल किए गए थे।

अदालत ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड से मोहिउद्दीन, अबू खदीजा और अन्य आरोपितों के बीच साजिश के संकेत मिलते हैं।

अदालत ने कहा, “इस प्रकार, आवेदक-आरोपित के खिलाफ लगाए गए आरोप गंभीर प्रकृति के प्रतीत होते हैं और प्रथम दृष्टया संबंधित अपराध में आवेदक-आरोपित की संलिप्तता को दर्शाते हैं।”

विशेष एनआईए अदालत ने आगे इस बात पर जोर दिया कि आरोपित सैयद अहमद मोहिउद्दीन एक डॉक्टर है। इसलिए, यह नहीं कहा जा सकता कि वह अपने द्वारा तैयार किए गए पदार्थ रिसिन से बिल्कुल अनजान था, जो एक जहरीला जैविक विष है और बड़े पैमाने पर लोगों की हत्या करने की क्षमता रखता है। इसके अलावा, सक्षम प्राधिकारी से किसी लाइसेंस/अनुमति के बिना आवेदक-आरोपित के आवास पर प्रयोगशाला का अस्तित्व प्रथमदृष्टया आवेदक-आरोपित की दुर्भावनापूर्ण मंशा को दर्शाता है।

अदालत ने यह भी कहा कि आरोपित जिहादी मोहिउद्दीन ने कथित तौर पर दिल्ली और अहमदाबाद सहित विभिन्न स्थानों की यात्रा की, जहाँ उसने ऑपरेटिव्स से मुलाकात की और छिपाकर रखी गई खेपें हासिल कीं।

इसके अलावा आरोपित से तीन पिस्तौल, 30 जिंदा कारतूस, भारतीय और अमेरिकी मुद्रा तथा चार लीटर अरंडी के तेल वाली एक बोतल की बरामदगी प्रथमदृष्टया “यह दर्शाती है कि आवेदक-आरोपित की मंशा पवित्र या किसी मानवीय उद्देश्य के लिए नहीं थी।”

आरोपपत्र का हवाला देते हुए विशेष एनआईए अदालत ने कहा कि आरोपित डॉ सैयद अहमद मोहिउद्दीन मुख्य वांछित आरोपित के संपर्क में था और उसके निर्देशों के अनुसार काम कर रहा था। इसके परिणामस्वरूप रिसिन तैयार किया गया और हथियारों के रूप में पिस्तौल की खरीद तथा उन्हें अपने कब्जे में रखने की कार्रवाई की गई। इसलिए अदालत ने बचाव पक्ष की इस दलील को खारिज कर दिया कि मोहिउद्दीन को बैग और उनमें मौजूद हथियारों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।

अदालत ने कहा, “आवेदक-आरोपित से हथियारों की बरामदगी प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट करती है कि उक्त हथियार अनुचित उद्देश्य के लिए हासिल किए गए थे। इसलिए आवेदक-आरोपित के अधिवक्ता की यह दलील कि आवेदक-आरोपित को बैग और उसके अंदर मौजूद सामग्री के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, इस अदालत द्वारा स्वीकार किए जाने योग्य नहीं है।”

अदालत ने आगे कहा, “इसके अलावा, आरोपित नंबर 1 के मोबाइल फोन से बरामद वीडियो भी आवेदक-आरोपित की दुर्भावनापूर्ण मंशा को दर्शाता है और यह नहीं बताता कि आवेदक-आरोपित किसी पवित्र मार्ग पर चल रहा था या मानवता की भलाई कर रहा था।”

आरोपों की गंभीरता और UAPA की धारा 43D(5) के तहत लगाए गए प्रतिबंधों को ध्यान में रखते हुए विशेष न्यायाधीश हेमंग आर रावल ने जमानत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने बिना किसी लागत संबंधी आदेश के जमानत याचिका खारिज कर दी।

अदालत ने आदेश दिया, “उपरोक्त तथ्यों और गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम की धारा 43D(5) की कठोरता को ध्यान में रखते हुए, यह अदालत आवेदक-आरोपित के पक्ष में इस अदालत को प्रदत्त विवेकाधीन अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल न करना उचित समझती है। अतः वर्तमान आवेदन को बिना किसी लागत संबंधी आदेश के खारिज किया जाता है।”

मामले की पृष्ठभूमि

बता दें कि यह मामला तब सामने आया जब गुजरात एटीएस ने आईएसआईएस-खुरासान प्रांत (ISKP) से जुड़े नेटवर्क के सिलसिले में तीन लोगों को गिरफ्तार किया। जाँचकर्ताओं के अनुसार, समूह के सदस्यों ने अहमदाबाद, दिल्ली और लखनऊ में भीड़भाड़ वाले बाजारों तथा धार्मिक या संगठनात्मक स्थलों की रेकी की थी और संभावित आतंकी हमले के लिए इस्तेमाल की जा सकने वाली जानकारी जुटाई थी।

चीन में चिकित्सा की पढ़ाई करने वाले तेलंगाना के डॉक्टर मोहिउद्दीन को हथियारों, गोला-बारूद और अरंडी के तेल के साथ गिरफ्तार किया गया था। जाँचकर्ताओं ने कहा कि वह हैदराबाद स्थित अपने आवास पर अरंडी के बीजों से रिसिन तैयार करने की कोशिश कर रहा था। एटीएस ने ISKP से जुड़े एक अफगान हैंडलर के साथ उसकी बातचीत का भी पता लगाया था। इसके बाद जाँच में फंडिंग, अन्य सदस्यों और व्यापक नेटवर्क से संभावित संबंधों की भी पड़ताल की गई।

15 अगस्त से ‘पब्लिसिटी स्टंट’ करने के लिए अभिजीत दीपके फिर तैयार, झारखंड पर बोलते वक्त पड़ गए थे बीमार: समझिए CJP की अवसरवादी राजनीति को

राजनीतिक प्रोपगेंडा फैलाने की दिशा में जब किसी की ‘प्रासंगिकता’ खत्म होने लगती है, तो वह नया पैंतरा आजमाने में कोई कसर नहीं छोड़ता। यही हाल इन दिनों तथाकथित ‘क्रांतिकारी’ और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके का है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर डेढ़ महीने तक चले ‘हाई-प्रोफाइल प्रदर्शन’ के बाद अब दीपके को अचानक 15 अगस्त के मौके पर देश के ग्रामीण स्कूलों और बच्चों की याद आई है।

दीपके ने 10 अगस्त 2026 को एक वीडियो बनाते हुए घोषणा की है कि वे 15 अगस्त से ग्रामीण इलाकों के सरकारी स्कूलों में ‘सोशल ऑडिट’ का एक राष्ट्रव्यापी अभियान चलाएँगे।

पहली नजर में किसी को भी यह ‘छात्र हित’ और ‘सामाजिक सुधार’ की दिशा में उठाया बड़ा कदम लग सकता है। लेकिन, हकीकत में यह केवल अवसरवाद की राजनीति, पब्लिसिटी की भूख और एक सुनियोजित एजेंडा है।

कैसे? आइए बताएँ…

जंतर-मंतर प्रदर्शन और झारखंड में अंतर

पिछले दिनों लगभग डेढ़ महीने जंतर-मंतर पर छात्र हित के नाम पर दीपके के नेतृत्व में एक प्रदर्शन चला। इस दौरान मुद्दा छात्रों को बनाया गया, लेकिन मंच पर विपक्ष के बड़े-बड़े नेता और वामपंथी चेहरों का आना-जाना लगा रहा… ये सब लोग वहाँ कोई छात्रों के लिए नहीं, बल्कि दीपके की सराहना करने पहुँच रहे थे कि उन्होंने एक ऐसा माहौल बनाया है जहाँ न केवल लोग केंद्र सरकार की निंदा कर रहे हैं बल्कि उनके विरुद्ध गाली-गलौच से भी गुरेज नहीं कर रहे।

डेढ़ महीने तक चले इस प्रदर्शन में असली NEET छात्रों के हाथ क्या आया? ये अलग चर्चा का मुद्दा है। लेकिन हाँ! इस बीच अभिजीत दीपके जैसे लोग हीरो जरूर बन गए।

सामान्य छात्र उनसे आगे के लिए भी उम्मीद लगाए बैठा था। यही वजह हुई कि 25 जुलाई से जब झारखंड में पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन ने जोर पकड़ा तो वहाँ के बच्चों को उम्मीद जगी कि सीजेपी वाले यहाँ भी उनके समर्थन में जरूर आएँगे और यहाँ भी सरकार से जवाबदेही माँगने में उनका साथ देंगे। लेकिन हुआ उलटा।

अभिजीत दीपके ने झारखंड जाना तो दूर, शुरुआत में इस प्रदर्शन को लेकर कोई सुध ही नहीं ली। बाद में जब सोशल मीडिया पर थू-थू शुरू हुई तो अचानक कुछ जगह एक वीडियो कॉल की रिकॉर्डिंग वायरल की गई कि हाँ, दीपके ने झारखंड प्रदर्शनकारियों से बात करके साथ देने का आश्वासन दिया है।

बाद में झारखंड में आंदोलन पर बैठे युवा लगातार अभिजीत दीपके से सवाल पूछते रहे- “आप हमारे बीच कब आ रहे हैं? कब हमारे लिए आवाज उठाओगे” मगर दीपके ने सिर्फ यही बहाने लगाए – अभी हम बीमार हैं, मेरी टीम में सब बीमार हैं, मुझे टायफाइड हो गया है आदि-आदि।

जंतर-मंतर प्रोटेस्ट का रूप और झारखंड प्रदर्शन पर दीपके का रवैया देखने वाले लोगों को ज्यादा समझने में देर नहीं लगी कि खेल है क्या।

सबको साफ होने लगा कि जंतर-मंतर पर विपक्ष के हर नेता से मिलकर हाथ मिलाने वाले दीपके का असली मकसद छात्र हित नहीं बल्कि सिर्फ भाजपा विरोध था। क्योंकि अगर ये बात झूठ होती तो झारखंड में विपक्षी गठबंधन को देखते हुए दीपके इस मुद्दे पर फूँक-फूँक कर कदम नहीं रखते।

उन्हें पता था अगर वह वहाँ चले जाएँगे तो एक तो उनके एजेंडे को नुकसान होगा और दूसरा उन्हें वामपंथी इकोसिस्टम से वो ‘माइलेज’ नहीं मिलता जो दिल्ली के जंतर-मंतर पर मिला था।

गिरती साख बचाने में जुटे दीपके

अब झारखंड आंदोलन में अपने दोगलेपन के उजागर होने और अपनी गिरती साख को बचाने के लिए अब दीपके ने 15 अगस्त (स्वतंत्रता दिवस) का मौका चुना है।

वह ग्रामीणों और अभिभावकों से कह रहे हैं कि वे स्कूलों में जाएँ, वीडियो बनाएँ और CJP के लिंक पर फॉर्म भरकर भेजें। यानी सारी मेहनत ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग करे और और सोशल मीडिया पर एक बार फिर से ‘क्रांति’ का क्रेडिट CJP का आईटी सेल ले ले।

जंतर-मंतर पर दिखाई गई आक्रामकता, झारखंड में साधी गई चुप्पी और 15 अगस्त के इस नए शिगूफे को जोड़कर देखें, तो तस्वीर पूरी तरह साफ हो जाती है। दीपके का मकसद छात्रों का हित नहीं, बल्कि सिर्फ एक खास राजनीतिक एजेंडे के तहत ऐसे अभियानों का फायदा उठाना है।

वह छात्रों के असंतोष को भुनाकर अपनी राजनीतिक दुकान चलाना चाहते हैं। ‘स्कूल ऑडिट’ के नाम पर फॉर्म और वीडियो मँगवाने के नाम पर अपने सोशल मीडिया पेज की रीच बढ़ाने और प्रासंगिक बने रहने और क्रांतिकारी दिखन का स्टंट करना चाहते हैं।

दीपके जैसे लोग 5 मिलियन के साथ सोशल इन्फ्लुएंसर भले बन जाएँ, लेकिन जननेता बनने की उनमें क्षमता नहीं है। उनकी छवि का निर्माण सिर्फ पीआर जैसी चीजों के जरिए ही हो सकता है।

‘गोली मार दो, लेकिन पूरा ‘वंदे मातरम’ नहीं गाएँगे’: 76 साल बाद भी नहीं बदला कॉन्ग्रेसियों का चरित्र, इस्लामी कट्टरपंथियों को खुश करने के लिए करते हैं ‘राष्ट्रगीत’ से घृणा

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का मूल मंत्र और मातृभूमि की भक्ति का सबसे बड़ा प्रतीक ‘वंदे मातरम’ कॉन्ग्रेस ने एक बार फिर से घृणा दिखानी शुरू कर दी है। एक तरफ जहाँ देश इस कालजयी रचना के 150 वर्ष पूरे होने का उत्सव मना रहा है और केंद्र की मोदी सरकार इसे राष्ट्रगान के समकक्ष सम्मान दिलाने तथा लाल किले से लेकर पूरे देश में इसके सभी छंदों के सामूहिक गायन को प्रोत्साहन दे रही है, वहीं दूसरी तरफ कॉन्ग्रेस पार्टी का रुख आज भी वैसा ही है जैसा स्वतंत्रता संग्राम के समय था।

कॉन्ग्रेस का यह चरित्र दशकों बाद भी नहीं बदला है। जब भी वंदे मातरम के पूर्ण रूप से गायन या इसके सम्मान की बात आती है, कॉन्ग्रेस और उसके तुष्टिकरण वाले सहयोगी दल विरोध में खड़े हो जाते हैं। हाल ही में केरल से सामने आए विरोध ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि कॉन्ग्रेस के नेताओं के भीतर राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम को लेकर किस हद तक घृणा भरी हुई है, जहाँ उसके नेता यहाँ तक कहने से नहीं हिचकिचा रहे कि भले ही उन्हें गोली मार दी जाए, लेकिन वे पूरा वंदे मातरम नहीं गाएँगे।

लाल किले से गूँजेगा पूरा ‘वंदे मातरम’, लेकिन केरल में कॉन्ग्रेस का उग्र विरोध

भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त 2026) के ऐतिहासिक अवसर पर एक अभूतपूर्व दृश्य देखने को मिलने जा रहा है। रक्षा मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, इतिहास में पहली बार लाल किले प्राचीर से प्रधानमंत्री के आगमन पर पूरे वंदे मातरम के सभी छंदों का गायन किया जाएगा।

इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस समारोह का मुख्य विषय ‘वंदे मातरम के 150 वर्ष’ और ‘विकसित भारत@2047 के लिए युवा शक्ति’ रखा गया है। इसके तहत गृह मंत्रालय के प्रोटोकॉल और राष्ट्रीय कार्यान्वयन समिति के निर्देशों के तहत देश भर में राष्ट्रीय गीत के सभी 6 छंदों का सामूहिक गायन सुनिश्चित किया जा रहा है।

यहाँ तक कि आमंत्रण पत्रों पर भी इसके पूरे बोल छापे गए हैं ताकि सभी नागरिक साथ में गा सकें। लेकिन एक तरफ जहाँ पूरा देश इस ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बनने के लिए तैयार है, वहीं केरल की UDF समर्थित राजनीति और कॉन्ग्रेस नेताओं ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

केरल के मुख्य सचिव विश्वनाथ सिन्हा द्वारा 6 अगस्त को जारी उस सर्कुलर के बाद विवाद खड़ा हो गया, जिसमें स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रमों में वंदे मातरम को पूरा गाने का प्रशासनिक निर्देश दिया गया था। इस निर्देश के आते ही केरल में सत्ता और विपक्ष दोनों के बीच घबराहट फैल गई।

केरल के स्वास्थ्य मंत्री के मुरलीधरन ने स्पष्ट रूप से कह दिया कि राज्य में सरकारी कार्यक्रमों के दौरान राष्ट्रीय गीत के सभी छंद नहीं गाए जाएँगे और केवल पारंपरिक रूप से चले आ रहे शुरुआती दो छंद ही गाए जाएँगे।

इससे भी आगे बढ़कर कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ सांसद राजमोहन उन्नीथन ने विवादित बयान देते हुए कहा, “हम इस जीवन में वंदे मातरम का पूरा गायन स्वीकार नहीं कर सकते। नरेंद्र मोदी हमें गोली मारने की धमकी दें, तब भी ‘वंदे मातरम’ को पूरा नहीं गाया जाएगा।”

उन्होंने यहाँ तक आरोप लगाया कि राज्यपाल और राजभवन लोकतंत्र को कमजोर करने की राजनीति कर रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने यह उजागर कर दिया है कि कॉन्ग्रेस सरकार और उसके नेताओं के लिए राष्ट्रगीत का पूरा गायन एक प्रशासनिक निर्देश नहीं बल्कि एक ऐसा मुद्दा है, जिसका विरोध करने के लिए वे किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।

क्यों होती है अंतिम छंदों से समस्या? तुष्टिकरण और वोट बैंक का गणित

वंदे मातरम के पूर्ण रूप से गायन का विरोध नया नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक लंबा तुष्टिकरण का इतिहास छिपा हुआ है। वंदे मातरम के शुरुआती दो छंदों में भारत भूमि के प्राकृतिक सौंदर्य- सस्य श्यामलाम्, मलयज शीतलाम्, सुजलाम्, सुफलाम् की वंदना की गई है, जिन पर किसी को आपत्ति नहीं होती।

विरोधियों की समस्या इसके बाद के छंदों से शुरू होती है। बाद के छंदों में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने भारत माता को दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के रूप में चित्रित किया है और माँ दुर्गा की दश प्रहरण धारिणी (दस हाथों में शस्त्र धारण करने वाली) शक्ति के रूप में मातृभूमि का आह्वान किया है।

केरल में कॉन्ग्रेस, CPI(M) और उनके राजनीतिक सहयोगी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग का हमेशा से यह रुख रहा है कि बाद के हिस्सों में हिंदू देवी-देवताओं से जुड़े आह्वान, प्रतीक और धार्मिक चित्र (इमेजरी) शामिल हैं। इनका तर्क रहा है कि एक धर्मनिरपेक्ष राज्य में ऐसे धार्मिक प्रतीकों वाले छंदों को आधिकारिक राष्ट्रीय गायन का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए।

वास्तव में यह विरोध वैचारिक न होकर शुद्ध रूप से वोट बैंक और तुष्टिकरण का गणित है। मुस्लिम कट्टरपंथियों को खुश करने के लिए कॉन्ग्रेस और उसके वामपंथी सहयोगियों ने हमेशा यह नैरेटिव गढ़ा कि बाद की पंक्तियाँ ‘एकेश्वरवाद’ (एक खुदा) के सिद्धांत के खिलाफ हैं।

इसी मुस्लिम लीग और कट्टरपंथी वोट बैंक के दबाव में VD सतीशन के नेतृत्व वाली UDF और कॉन्ग्रेस राजनीति आज भी पस्त नजर आ रही है। CPI(M) और पिनराई विजयन ने भी तुरंत इस पर राजनीति शुरू कर दी और सरकार पर संघ परिवार के राजनीतिक एजेंडे के आगे झुकने का आरोप लगा दिया।

इस तुष्टिकरण की राजनीति का ही नतीजा है कि देश के राष्ट्रीय गीत को काँट-छाँटकर आधा-अधूरा करने की वकालत आज भी कॉन्ग्रेस द्वारा खुलकर की जा रही है।

बंकिमचंद्र का कालजयी सृजन और स्वतंत्रता संग्राम में वंदे मातरम का योगदान

वंदे मातरम केवल एक गीत नहीं है, यह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की प्राणवायु और राष्ट्रभक्ति का वह अमर स्वर है जिसने करोड़ों भारतीयों के दिलों में क्रांति की ज्वाला प्रज्वलित की थी। इस कालजयी रचना की रचना बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 7 नवंबर 1875 को की थी और बाद में इसे उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया था।

इस गीत की रचना का समय वह था जब ब्रिटिश हुकुमत भारत में अपने पैर पसार रही थी और भारतीयों पर ब्रिटिश राष्ट्रगान ‘गॉड सेव द क्वीन’ गाने का दबाव बनाया जा रहा था। बंकिमचंद्र ने ब्रिटिश हुकुमत के इस औपनिवेशिक सांस्कृतिक थोपने के जवाब में अपनी मातृभूमि की संप्रभुता और शक्ति का जयघोष करते हुए वंदे मातरम की रचना की थी।

150 साल पहले रचे गए इस गीत ने देखते ही देखते पूरे देश को एक सूत्र में पिरो दिया। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने स्वयं इसे स्वरबद्ध करके पहली बार गाया था। इसके बाद बंगाल विभाजन (1905) के दौरान यह अंग्रेजों के खिलाफ भारतीय प्रतिरोध का सबसे बड़ा नारा और प्रतीक बन गया।

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान मतंगिनी हाजरा जैसी वीरांगनाओं से लेकर भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जैसे अनगिनत क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश पुलिस की लाठियाँ खाते और फाँसी के फंदे को चूमते समय मुख से वंदे मातरम का ही उद्घोष किया था। यह गीत भारत की राष्ट्रीय एकता, गौरव और औपनिवेशिक दासता के खिलाफ स्वाभिमान का प्रतीक बना।

लेकिन जिस गीत ने भारत माता की स्वतंत्रता के लिए लाखों युवाओं को बलिदान होने की प्रेरणा दी, उसी गीत को आज कॉन्ग्रेस नेताओं द्वारा खारिज किया जा रहा है।

नेहरू और कॉन्ग्रेस की घृणा: कैसे आधा-अधूरा कर दिया गया राष्ट्रगीत

वंदे मातरम को लेकर कॉन्ग्रेस का यह घृणास्पद और समझौतावादी चरित्र नया नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें जवाहरलाल नेहरू और तत्कालीन कॉन्ग्रेस नेतृत्व की ऐतिहासिक भूलों में छिपी हैं। 1937 में जब देश में प्रांतीय चुनाव हुए और कई राज्यों में कॉन्ग्रेस की सरकारें बनीं, तब मुस्लिम लीग और मोहम्मद अली जिन्ना ने वंदे मातरम  के गायन पर कड़ा ऐतराज जताया।

जिन्ना का तुष्टिकरण करने और मुस्लिम लीग को मनाने के चक्कर में जवाहरलाल नेहरू और कॉन्ग्रेस नेतृत्व ने राष्ट्रगीत के साथ घोर समझौता कर लिया। 1937 के कोलकाता अधिवेशन में नेहरू की अध्यक्षता में कॉन्ग्रेस ने वंदे मातरम के केवल शुरुआती दो छंदों को ही स्वीकार करने और बाकी छंदों को आधिकारिक कार्यक्रमों से हटाने का प्रस्ताव पारित कर दिया।

तर्क यह दिया गया कि बाद के छंदों में हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख है जिससे गैर-हिंदुओं की भावनाएँ आहत हो सकती हैं। यह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में तुष्टिकरण की राजनीति की सबसे बड़ी शुरुआत थी। आगे चलकर जब संविधान सभा में राष्ट्रगान चुनने की बात आई, तो जवाहरलाल नेहरू ने वंदे मातरम को राष्ट्रगान बनाने से साफ मना कर दिया।

उन्होंने तर्क दिया कि वंदे मातरम की धुन ऐसी नहीं है जिसे बैंड पर बजाया जा सके या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रगान के रूप में प्रस्तुत किया जा सके। जिस गीत ने देश को आजादी की लड़ाई में एकजुट किया था, उसे नेहरू और कॉन्ग्रेस के इस रवैये के कारण मुख्य राष्ट्रगान का दर्जा नहीं मिल सका और उसे काट-छाँटकर केवल दो पंक्तियों तक सीमित कर दिया गया।

डॉ राजेंद्र प्रसाद की सोच और मोदी सरकार की ऐतिहासिक पहल

कॉन्ग्रेस के इस रवैये के विपरीत भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद वंदे मातरम के पूर्ण सम्मान के सबसे बड़े पक्षधर थे। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अंतिम दिन डॉ राजेंद्र प्रसाद ने ऐतिहासिक वक्तव्य देते हुए स्पष्ट रूप से घोषणा की थी कि ‘जन गण मन’ भले ही भारत का राष्ट्रगान (National Anthem) होगा, लेकिन ‘वंदे मातरम’, जिसने स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, को भी ‘जन गण मन’ के बिल्कुल समान दर्जा और सम्मान दिया जाएगा।

लेकिन कॉन्ग्रेस की उत्तरवर्ती सरकारों ने डॉ राजेंद्र प्रसाद की इस भावना और आदेश को ठंडे बस्ते में डाल दिया। दशकों तक वंदे मातरम उपेक्षित रहा और इसके गायन को लेकर विवाद खड़े किए जाते रहे। वर्षों बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने डॉ राजेंद्र प्रसाद की उस सोच को वास्तविक रूप से धरातल पर उतारने का संकल्प लिया है।

मोदी सरकार ने राष्ट्रगीत के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर संसद में इसके इतिहास, महत्व और योगदान पर 10 घंटे की विशेष चर्चा आयोजित करने का निर्णय लिया, जहाँ स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ने इस बहस की शुरुआत की।

यही नहीं केंद्र सरकार संसद में ‘राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026’ (The Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Bill, 2026) लेकर आई, जो राज्यसभा से पारित हो चुका है। इस विधेयक के माध्यम से वंदे मातरम को राष्ट्रगान के समान कानूनी और संवैधानिक दर्जा दिया गया है।

अब वंदे मातरम का अपमान करना या इसके गायन में बाधा डालना एक गंभीर आपराधिक अपराध माना जाएगा, जिसके लिए 3 साल तक की जेल की सजा और जुर्माने का प्रावधान है।

आज भी बेनकाब होता कॉन्ग्रेस का घृणास्पद रवैया

आज जब देश अपनी आजादी की 80वीं वर्षगाँठ और वंदे मातरम के 150 साल का जश्न मना रहा है, तब राष्ट्रवाद और तुष्टिकरण के बीच का अंतर पूरी तरह बेनकाब हो चुका है।

एक तरफ वर्तमान मोदी सरकार राष्ट्रीय प्रतीकों, स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और वंदे मातरम जैसे पवित्र स्तोत्र को उसका खोया हुआ संवैधानिक सम्मान वापस दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है, वहीं दूसरी तरफ कॉन्ग्रेस अपने उसी पुराने तुष्टिकरण के रास्ते पर चल रही है।

केरल में कॉन्ग्रेस सांसद का यह कहना कि ‘गोली मार दो, लेकिन पूरा वंदे मातरम् नहीं गाएँगे’, कोई अनजाने में दिया गया बयान नहीं है। यह कॉन्ग्रेस की उसी दशकों पुरानी मानसिकता का विस्तार है, जहाँ राष्ट्रीय गौरव और राष्ट्रगीत के सम्मान से ऊपर वोट बैंक की राजनीति को रखा जाता है।

जवाहरलाल नेहरू से शुरू हुआ वंदे मातरम के प्रति उपेक्षा और कटौती का सिलसिला आज राहुल गाँधी और उनके सहयोगियों के दौर में भी जारी है। इससे स्पष्ट होता है कि साल बीत गए, दशक बीत गए, सत्ता के समीकरण बदल गए, लेकिन कॉन्ग्रेस का चरित्र नहीं बदला।

जिस राष्ट्रगीत ने स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों की नींव हिला दी थी, उससे आज भी कॉन्ग्रेस को घृणा है। लाल किले से पूरे वंदे मातरम का गूँजना जहाँ 140 करोड़ भारतीयों के स्वाभिमान और राष्ट्रीय पुनर्जागरण का प्रतीक है, वहीं कॉन्ग्रेस का इसका विरोध करना यह सिद्ध करता है कि उसके लिए राष्ट्र हित से बड़ा आज भी तुष्टिकरण का एजेंडा ही है।