भारत और नेपाल के बीच व्यापारिक रिश्तों में पिछले कुछ दिनों से बढ़ा तनाव अब चाय उद्योग तक पहुँच गया है। नेपाल लंबे समय से भारतीय बाजार पर अपने चाय निर्यात के लिए निर्भर रहा है, लेकिन भारत ने अब खाद्य सुरक्षा और गुणवत्ता मानकों को लेकर सख्ती बढ़ाते हुए ऐसा कदम उठाया है, जिसका असर सीधे नेपाल के सबसे अहम निर्यात क्षेत्रों में दिखने लगा।
भारतीय सीमा पर लाखों किलो नेपाली चाय अटकने के बाद नेपाल की फैक्ट्रियाँ बंद होने लगीं, मजदूरों की आजीविका पर संकट आया और आखिरकार सरकार को हस्तक्षेप कर उद्योग दोबारा शुरू कराने की कोशिश करनी पड़ी। नेपाल की बालेन शाह सरकार ने अपनी चाय फैक्ट्रियों को दोबारा खोलने का फैसला किया है।
भारत ने क्यों बढ़ाई सख्ती, क्या है नया नियम?
भारत की फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी (FSSAI) ने 23 जून को HSN कोड 0902 के तहत आने वाली चाय के लिए रिस्क-बेस्ड इंस्पेक्शन सिस्टम लागू किया है। इसके तहत घरेलू खपत के लिए भारत में आने वाली चाय की खेपों में से 20 प्रतिशत को लैब जाँच के लिए चुना जाएगा।
वहीं मीडिया रिपोर्ट् के अनुसार, नेपाल से आने वाली खेपों पर जाँच पहले के मुकाबले ज्यादा सख्ती से की जा रही है। भारत का तर्क है कि बाजार में लंबे समय से यह शिकायतें सामने आ रही थीं कि नेपाल से आने वाली सस्ती चाय को भारत की प्रीमियम दार्जिलिंग चाय के साथ मिलाकर बेचा जा रहा था।
इससे भारतीय ब्रांड की वैश्विक पहचान और गुणवत्ता दोनों पर असर पड़ सकता था। इसके अलावा कुछ उत्पादकों ने नेपाली चाय में कीटनाशकों और रासायनिक अवशेषों को लेकर भी चिंता जताई थी। ऐसे में भारत ने स्पष्ट संकेत दिया कि घरेलू बाजार और निर्यात प्रतिष्ठा से समझौता नहीं किया जाएगा।
संकट में क्यों पहुँच गया नेपाल का चाय उद्योग?
भारत की नई जाँच प्रक्रिया लागू होने के बाद नेपाल से आने वाली कई खेपें सीमा पर रुक गईं। नेपाल में अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त परीक्षण प्रयोगशालाओं की कमी होने के कारण सैंपल जाँच के लिए कोलकाता भेजे जाने लगे और रिपोर्ट आने में कई दिनों का समय लगने लगा।
इसका असर यह हुआ कि लाखों किलो चाय गोदामों और ट्रकों में अटक गई। पूर्वी नेपाल के इलाम और झापा जैसे चाय उत्पादन क्षेत्रों में फैक्ट्रियों ने उत्पादन रोकना शुरू कर दिया। कई प्रोसेसिंग यूनिट बंद हो गईं और हजारों मजदूरों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो गया। चाय पत्ती के दाम भी तेजी से नीचे आए जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा।
अंत में सरकार को उद्योग प्रतिनिधियों के साथ बैठक करनी पड़ी और भरोसा देना पड़ा कि निर्यात में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए राजनयिक और प्रशासनिक स्तर पर तत्काल कदम उठाए जाएँगे। नेपाल के लिए भी यह संकेत है कि अगर निर्यात को स्थिर रखना है तो उत्पादन, परीक्षण और गुणवत्ता नियंत्रण के ढाँचे को अंतरराष्ट्रीय स्तर के अनुरूप बनाना होगा।

