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मुस्लिम आरक्षण खत्म करने से हिंदुओं को न्याय तक… जानें- क्या हैं नेपाल में 9 दिन से आमरण अनशन पर बैठे विनय यादव की माँगें और उन्होंने ऑपइंडिया को क्या बताया?

विनय यादव ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा है, "हमने शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया और सरकार को 24 घंटे का अल्टीमेटम दिया और विभिन्न माध्यमों से अपनी माँगें सरकार तक पहुँचाईं। लेकिन जब हमारी माँगों पर कोई ठोस पहल नहीं हुई, तब हमें मजबूर होकर आमरण अनशन शुरू करना पड़ा।"

नेपाल की राजधानी काठमांडू के मैतीघर मंडला में राष्ट्रीय एकता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनय यादव आमरण अनशन पर बैठे हैं। शुक्रवार (7 अगस्त 2026) को उनके अनशन का नौवाँ दिन है। सुनसरी के देवानगंज में ‘हिंदू नरसंहार’ के पीड़ितों को न्याय दिलाने और सरकार के साथ हुए समझौते को लागू कराने की माँग को लेकर उन्होंने अन्न का त्याग कर दिया है।

विनय यादव का संघर्ष केवल एक घटना तक सीमित नहीं है। वह नेपाल में मुस्लिम आरक्षण खत्म करने, मुस्लिम आयोग को भंग करने, अवैध घुसपैठ पर कार्रवाई करने और हिंदू समुदाय के खिलाफ हुई हिंसा के दोषियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई की माँग भी उठा रहे हैं।

देवानगंज में 26 जुलाई 2026 की रात लाउडस्पीकर के इस्तेमाल, डीजे बजाने और कावड़ यात्रा को लेकर हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच हिंसा भड़की थी। इस झड़प और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए की गई पुलिस कार्रवाई में गोलीबारी भी हुआ और इस घटना में 4 लोगों की मौत हो गई।

इसके बाद सरकार ने पीड़ित परिवारों के साथ सात-सूत्रीय समझौता किया। मृतकों को शहीद का दर्जा, परिवारों को 10 लाख नेपाली रुपए की राहत, एक सदस्य को रोजगार, घायलों के मुफ्त इलाज और निष्पक्ष जाँच जैसे भरोसे दिए गए। विनय यादव का कहना है कि इन आश्वासनों को अब कागज से निकालकर जमीन पर उतारने का समय आ गया है।

उनका सवाल सीधा है कि अगर सरकार ने पीड़ित परिवारों से समझौता किया है, तो उसके हर बिंदु पर कार्रवाई कब होगी? अगर हिंसा हुई है, तो दोषियों को कानून के सामने कब लाया जाएगा? और अगर नेपाल में धार्मिक हिंसा रोकनी है, तो ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए स्थायी सुरक्षा व्यवस्था कब तैयार होगी?

आमरण अनशन पर बैठ विनय यादव

ऑपइंडिया से क्या बोले विनय यादव?

इस आंदोलन के केंद्र में सुनसरी की घटना है। राष्ट्रीय एकता दल का कहना है कि हिंसा में मारे गए लोगों के परिवारों को सिर्फ आश्वासन नहीं बल्कि न्याय चाहिए। संगठन ने सरकार से घटना की स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध जाँच कराने की मांग की है।

माँग है कि दोषियों पर बिना किसी राजनीतिक या सामाजिक दबाव के कानून के अनुसार कार्रवाई हो और जाँच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। संगठन का कहना है कि यदि जाँच ही पारदर्शी नहीं होगी तो पीड़ित परिवारों का सरकार और कानून-व्यवस्था पर भरोसा कैसे कायम होगा?

विनय यादव ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा है, “घटना के बाद हमने शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया और सरकार को 24 घंटे का अल्टीमेटम दिया और विभिन्न माध्यमों से अपनी माँगें सरकार तक पहुँचाईं। लेकिन जब हमारी माँगों पर कोई ठोस पहल नहीं हुई, तब हमें मजबूर होकर आमरण अनशन शुरू करना पड़ा।”

उन्होंने आगे कहा, “हमारी मुख्य माँगों में सुनसरी घटना की निष्पक्ष जाँच, दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई, पीड़ित परिवारों को न्याय, मृतकों को शहीद घोषित करना, घायलों का पूर्ण उपचार, सीमावर्ती क्षेत्रों में अवैध गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण तथा हमारे द्वारा उठाए गए अन्य नीतिगत विषयों पर सरकार द्वारा गंभीर पहल शामिल है।”

उनका कहना है कि जब तक सरकार माँगों पर सम्मानजनक, लिखित और कार्यान्वयन योग्य सहमति नहीं देती, तब तक यह आमरण अनशन जारी रहेगा।

सरकार के 7-सूत्रीय समझौते पर भी सवाल

देवानगंज हिंसा के बाद नेपाल सरकार ने पीड़ित परिवारों के साथ सात-सूत्रीय समझौता किया था। राष्ट्रीय एकता दल अब सरकार से इसी समझौते को पूरी तरह और तत्काल लागू करने की मांग कर रहा है।

इसमें मृतकों को शहीद का दर्जा देने की प्रक्रिया पूरी करना, प्रत्येक पीड़ित परिवार को 10 लाख नेपाली रुपए की राहत राशि देना, परिवार के एक योग्य सदस्य को रोजगार उपलब्ध कराना और घायलों का मुफ्त इलाज शामिल है।

राष्ट्रीय एकता दल का माँग पत्र

इसके अलावा घटना की स्मृति में मेमोरियल पार्क बनाने और समझौते में तय अन्य सुविधाओं को भी लागू करने की माँग की गई है। संगठन का कहना है कि राहत की घोषणा कर देना पर्याप्त नहीं है। पीड़ित परिवारों तक सहायता पहुँचे और समझौते के प्रत्येक बिंदु का प्रभाव जमीन पर दिखाई दे, तभी न्याय का भरोसा पैदा होगा।

मुस्लिम आरक्षण और मुस्लिम आयोग की समाप्ति की माँग

राष्ट्रीय एकता दल की सबसे स्पष्ट नीतिगत माँगों में नेपाल में मुस्लिम आरक्षण समाप्त करना और मुस्लिम आयोग को भंग करना शामिल है। विनय यादव ने ऑपइंडिया से कहा, “हमारा मुद्दा किसी धर्म विशेष के नेपाली नागरिकों से नहीं है। हमारी चिंता मुख्य रूप से सीमावर्ती क्षेत्रों से होने वाली अवैध घुसपैठ, अवैध बसावट, नागरिकता के दुरुपयोग तथा गैरकानूनी गतिविधियों को लेकर है।”

मुस्लिम आरक्षण समाप्त करने की माँग को लेकर विनय यादव ने कहा, “हमारा मानना है कि राज्य के सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। इसलिए आरक्षण और विशेष प्रावधानों जैसे विषयों की संविधान, समानता के सिद्धांत और राष्ट्रीय आवश्यकता के आधार पर समीक्षा होनी चाहिए। यह एक नीतिगत विषय है, जिस पर सरकार और संबंधित पक्षों के बीच गंभीर संवाद होना चाहिए।”

अवैध घुसपैठ पर भी सरकार को घेर रहा आंदोलन

राष्ट्रीय एकता दल ने रोहिंग्या और बांग्लादेशी नागरिकों को वापस भेजने की माँग भी उठाई है। आधिकारिक पत्र में संगठन ने अवैध आव्रजन और सीमा पार होने वाली अवैध गतिविधियों को राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में गंभीर मुद्दा बताया है।

इसके साथ ही संगठन ने कथित ‘जिहादी’ गतिविधियों के मामलों में मृत्युदंड का प्रावधान करने वाले कानून की माँग की है। यह माँग भी सरकार के सामने औपचारिक बातचीत के जरिए रखने की बात कही गई है।

इन माँगों पर किसी भी निर्णय को नेपाल के संविधान और कानून की प्रक्रिया से गुजरना होगा लेकिन आंदोलन ने इन्हें अब राष्ट्रीय राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।

नेपाल में मुस्लिम आरक्षण

नेपाल में मुस्लिम आरक्षण को लेकर इन दिनों बहस तेज है लेकिन इसका इतिहास समझने के लिए एक जरूरी तथ्य पहले जानना होगा नेपाल में मुस्लिमों के लिए शुरू से कोई अलग तय प्रतिशत वाला आरक्षण नहीं रहा है। सरकारी नौकरियों में समावेशी आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था की नींव 2007 में पड़ी, जब सिविल सर्विस में खुली प्रतियोगिता से भरी जाने वाली सीटों में से 45% को समावेशी श्रेणियों के लिए रखा गया। इसमें महिलाओं, आदिवासी-जनजाति, मधेसी, दलित, दिव्यांग और पिछड़े क्षेत्रों के लोगों को अलग-अलग हिस्से मिले लेकिन मुस्लिमों के लिए अलग श्रेणी नहीं थी।

बड़ा बदलाव 2015 के नेपाल संविधान से आया। संविधान के अनुच्छेद 42 में आर्थिक, सामाजिक या शैक्षिक रूप से पिछड़े मुस्लिमों को राज्य के निकायों में समानुपातिक समावेशी सिद्धांत के आधार पर भागीदारी का अधिकार दिया गया। यानी मुस्लिम समुदाय को संवैधानिक तौर पर समावेशी प्रतिनिधित्व या आरक्षण का अधिकार मिला।

नेपाल के संविधान (2015) के अनुच्छेद 264 के तहत ‘राष्ट्रीय मुस्लिम आयोग’ की स्थापना की गई। इसे कानूनी जामा पहनाने के लिए संसद ने ‘मुस्लिम आयोग अधिनियम, 2074 (2017)’ पारित किया। इस कानून की प्रस्तावना में लिखा है कि यह आयोग मुस्लिम समुदाय के इतिहास व संस्कृति की पहचान, उनके अधिकारों की रक्षा, और उनके आर्थिक-सामाजिक सशक्तीकरण के लिए सरकार को सुझाव देगा। आयोग के मुताबिक, 2011 की जनगणना में नेपाल की मुस्लिम आबादी करीब 4.4% थी। 2021 में यह बढ़कर 5.09% हो गई थी।

आरक्षण को लेकर बहस आज भी खत्म नहीं हुई है। मार्च 2025 में प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने संसद में कहा था कि थारू और मुस्लिम समुदाय से जुड़ी आरक्षण संबंधी मांगों को संघीय सिविल सेवा कानून के जरिए संबोधित किया जाएगा। यानी आज की असली बहस यह है कि मुस्लिमों के लिए मौजूदा समानुपातिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था पर्याप्त है या सरकारी नौकरियों में अलग और स्पष्ट मुस्लिम कोटा होना चाहिए। इसी व्यवस्था के विरोध में अब नेपाल में मुस्लिम आरक्षण और मुस्लिम आयोग खत्म करने की माँग भी उठ रही है।

सांसद ने सदन में उठाया अनशन का मुद्दा

अब यह आमरण अनशन का मुद्दा नेपाल की संसद तक भी पहुँच चुका है। राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी की सांसद खुशिबू ओली ने प्रतिनिधि सभा में इस मुद्दे को उठाते हुए सरकार से प्रदर्शनकारी पक्षों के साथ तत्काल बातचीत करने की अपील की।

इस बीच नेशनल मधेसी कमीशन के चेयरमैन विनय दत्ता भी मैतीघर मंडला पहुँचे। उन्होंने विनय यादव से मुलाकात की और सुनसरी घटना की निष्पक्ष जाँच तथा दोषियों पर कानूनी कार्रवाई की जरूरत बताई।

नेपाल सरकार की और से अब तक क्या हुआ?

मैतीघर मंडला में 9 दिन से जारी अनशन अब नेपाल सरकार के लिए सीधी चुनौती बन चुका है। एक तरफ देवानगंज हिंसा के पीड़ित परिवारों के लिए किए गए सात-सूत्रीय समझौते को लागू करने का सवाल है, दूसरी तरफ मुस्लिम आरक्षण, मुस्लिम आयोग, अवैध घुसपैठ और धार्मिक हिंसा जैसे मुद्दों पर आंदोलनकारी पक्षों से बातचीत की माँग है। राष्ट्रीय एकता दल ने साफ किया है कि वह केवल आश्वासन से पीछे हटने वाला नहीं है।

विनय यादव ने बताया है कि अब तक सरकार की ओर से कुछ स्तर पर संपर्क हुआ है। जिला प्रशासन के माध्यम से हमारा माँग-पत्र लिया गया है और संवाद की प्रारंभिक प्रक्रिया शुरू हुई है। उन्होंने कहा, “हमने सरकार से स्पष्ट कहा है कि केवल मौखिक आश्वासन पर्याप्त नहीं है।”

यादव का कहना है, “हम चाहते हैं कि सरकार आधिकारिक स्तर पर वार्ता करे, लिखित सहमति दे और उस सहमति को समयबद्ध तरीके से लागू करे। यदि सरकार सकारात्मक पहल करती है, तो हम भी लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से समाधान निकालने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। हमारा आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण है और इसका उद्देश्य केवल न्याय, सुरक्षा तथा हमारी माँगों पर गंभीर सरकारी पहल सुनिश्चित करना है।”

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शिव
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7 वर्षों से खबरों की तलाश में भटकता पत्रकार...

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