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जहाँ फाँसी पर चढ़े थे काकोरी कांड के सेनानी ठाकुर रोशन सिंह, वहाँ 60 साल से चल रहा ‘नेहरू’ अस्पताल: अब नाम बदलने के लिए अनिश्चितकालीन धरना शुरू

2024 में योगी आदित्यनाथ सरकार ने SRN अस्पताल परिसर के मुख्य द्वार के पास जहाँ रोशन सिंह को फाँसी दी गई थी, उनकी प्रतिमा स्थापित करवाई। उसके बाद अब महुआ डाबर संग्रहालय परिवार ने इस अस्पताल का नाम बदलकर ठाकुर रोशन सिंह के नाम पर करने की माँग उठाई है।

19 दिसंबर 1927 की वह सुबह इलाहाबाद (अब प्रयागराज) की साउथ मलाका जेल के लिए एक भारी सुबह थी। फाँसी घर में एक क्रांतिकारी को तख्ते की ओर ले जाया जा रहा था, नाम था ठाकुर रोशन सिंह।

उनका ‘जुर्म’ बस इतना था कि उन्होंने अंग्रेज हुकूमत के खजाने को लूटकर आज़ादी की लड़ाई के लिए हथियार और संसाधन जुटाने की हिम्मत दिखाई थी, यही था मशहूर काकोरी काण्ड। पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ और शचीन्द्रनाथ बख्शी के साथ मिलकर अंग्रेजों की नींद उड़ा देने वाले रोशन सिंह को इसी जेल में फाँसी की सजा सुनाई गई थी और उसी जेल की चारदीवारी में उनकी जिंदगी का आखिरी अध्याय पूरा हुआ।

जब उनका पार्थिव शरीर बाहर लाया गया, तो जेल के फाटक पर हजारों लोग जुट आए थे। वह भीड़ उस दौर की जनभावना की एक जीती-जागती मिसाल थी। मगर आजाद भारत में इस जगह को याद रखना तो दूर, इसका इतिहास ही धीरे-धीरे गुमनामी में धकेल दिया गया।

ब्रिटिश काल के बाद साउथ मलाका जेल को नैनी में स्थापित कर दिया गया। वर्षों तक इस जगह को बिसारने के बाद जेल को अस्पताल में बदल दिया गया और नाम रखा गया- स्वरूप रानी नेहरू अस्पताल। इसके बाद तो जैसे लोगों को रोशन सिंह की सुध ही नहीं रही।

अब महुआ डाबर संग्रहालय परिवार के प्रमुख शाह आलम खान ने इस अस्पताल का नाम बदलकर ठाकुर रोशन सिंह के नाम पर करने की माँग उठाई है। इसे लेकर अनिश्चितकालीन धरना भी शुरू कर दिया गया है।

गांधी के असहयोग आंदोलन वापस लेने पर दुखी थे रोशन सिंह

रोशन सिंह का जन्म 22 जनवरी 1892 को शाहजहाँपुर जिले के नबादा गाँव में हुआ था। पिता का नाम था ठाकुर जंगी सिंह और माता थीं कौशल्या देवी। बचपन से ही उनका स्वभाव निडर और तेज-तर्रार रहा।

1922 में चौरी चौरा काण्ड के बाद जब महात्मा गाँधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। इससे देशभर के अनगिनत युवाओं की तरह रोशन सिंह भी बहुत दुखी हुए और क्रांति की राह पकड़ ली।

बरेली गोलीकांड में जेल गए रोशन सिंह

असहयोग आंदोलन में उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर और बरेली जिले के ग्रामीण क्षेत्र में इनका अद्भुत योगदान रहा। बरेली में ठाकुर रोशन सिंह ने एक पुलिस वाले की रायफल छीनकर जबर्दस्त फायरिंग शुरू कर दी थी जिसके कारण हमलावर पुलिस को उल्टे पाँव भागना पड़ा। मुकदमा चला और ठाकुर को सेंट्रल जेल बरेली में दो साल की सजा़ काटनी पड़ी।

बरेली में हुए एक गोली-काण्ड में सजा काटने के बाद वे हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) से जुड़ गए। उनके रौबीले व्यक्तित्व और निशानेबाजी में महारत को देखते हुए राम प्रसाद बिस्मिल ने उन्हें संगठन के साथियों को हथियार चलाना सिखाने की जिम्मेदारी सौंपी।

काकोरी कांड नहीं था असल फाँसी की वजह

1922 में गया कॉन्ग्रेस अधिवेशन के दौरान कॉन्ग्रेस के भीतर विचारों का मतभेद सामने आया। इसके बाद मोतीलाल नेहरू और चितरंजन दास ने मिलकर स्वराज पार्टी बना ली।

उस समय कॉन्ग्रेस के इन नेताओं के पास आर्थिक संसाधनों की कमी नहीं थी, लेकिन दूसरी ओर क्रांतिकारी संगठन के पास मजबूत विचारधारा, संविधान और जोशीले युवाओं की बड़ी टोली तो थी, पर सबसे बड़ी कमी पैसों की थी।

इसी आर्थिक संकट से निपटने के लिए क्रांतिकारियों ने आयरलैंड के स्वतंत्रता सेनानियों की रणनीति अपनाई। उन्होंने धन जुटाने के लिए डकैती करने का फैसला किया, जिसे संगठन की भाषा में ‘एक्शन’ कहा जाता था।

इस योजना के तहत पहला एक्शन 25 दिसंबर 1924 को पीलीभीत जिले की बिसलपुर तहसील के बमरौली गाँव में किया गया। निशाना बने बलदेव प्रसाद, जो शक्कर कारोबारी और सूद पर पैसे उधार देने का काम करते थे।

इस डकैती में क्रांतिकारियों को करीब ₹4,000 और कुछ सोने-चाँदी के जेवर मिले। हालांकि, इस दौरान मोहनलाल पहलवान नाम के व्यक्ति ने उनका विरोध किया। जवाब में ठाकुर रोशन सिंह ने गोली चलाई, जिससे मोहनलाल की मौके पर ही मौत हो गई। बाद में यही घटना ठाकुर रोशन सिंह को फाँसी की सजा मिलने की सबसे बड़ी वजह बनी।

काकोरी काण्ड में रोशन सिंह खुद मौजूद नहीं थे, फिर भी अंग्रेज सरकार ने संगठन में उनकी भूमिका और प्रभाव को देखते हुए उन्हें बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ और राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी के साथ फाँसी की सजा दी।

रोशन सिंह ने फाँसी से पहले लिखा भावुक पत्र

6 दिसंबर 1927 को इलाहाबाद की मलाका (नैनी) जेल की काल-कोठरी से ठाकुर रोशन सिंह ने अपने एक मित्र को पत्र लिखा। उन्होंने लिखा कि उन्हें उम्मीद है कि इसी सप्ताह फाँसी हो जाएगी और उनके लिए कोई दुःख न करे।

उनका मानना था कि जन्म लेने वाले हर व्यक्ति को एक दिन मरना ही है, इसलिए इंसान को ऐसा जीवन जीना चाहिए कि अंत समय में उसे कोई पछतावा न हो और भगवान का स्मरण बना रहे।

उन्होंने यह भी लिखा कि पिछले दो वर्षों से परिवार से दूर रहने के दौरान उन्हें ईश्वर की भक्ति करने का भरपूर अवसर मिला। उन्होंने अपने पत्र में धर्म के लिए प्राण देने वालों की तुलना तपस्या करने वाले ऋषि-मुनियों से करते हुए लिखा कि शास्त्रों में ऐसे बलिदान को सर्वोच्च माना गया है। पत्र के अंत में उन्होंने अपना प्रसिद्ध शेर लिखा:

‘ज़िंदगी ज़िंदा-दिली को जान ऐ रोशन!

वरना कितने ही यहां रोज़ फ़ना होते हैं।‘

जब क्रांतिकारियों की चीखों से गूँजती थी जेल

साउथ मलाका जेल कोई साधारण जेल नहीं थी। काकोरी काण्ड से जुड़े कई क्रांतिकारियों को यहीं रखा गया था, यहीं पूछताछ के नाम पर उनका उत्पीड़न किया जाता था। अंग्रेज हुकूमत के लिए यह जेल क्रांतिकारियों को ‘सबक सिखाने’ का एक हथियार भर थी।

आजादी के बाद जैसे-जैसे प्रशासनिक जरूरतें बदलती गईं, इस जेल को नैनी शिफ्ट कर दिया गया। इसके बाद साउथ मलाका जेल की जगह बरसों तक वीरान पड़ी रही। वह जमीन, जिसने एक क्रांतिकारी की आखिरी साँसें देखी थीं, धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों से मिटती चली गई।

कॉन्ग्रेस सरकार ने बनाया अस्पताल, नाम रखा गया नेहरू की माँ के नाम पर

आज़ादी के बाद, प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के और कॉन्ग्रेस सरकार के दौर में, 1961 में इसी साउथ मलाका जेल परिसर की जमीन पर मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज खड़ा किया गया। इसका उद्घाटन तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के हाथों हुआ।

सवाल यह उठता है कि जिस ज़मीन पर एक क्रांतिकारी को फाँसी दी गई हो, उसका नाम आखिर किसके नाम पर रखा जाए? जवाब मिला नेहरू परिवार से जुड़े नाम में।

1963 में जब मेडिकल कॉलेज पूर्व गवर्नर हाउस की इमारत में शिफ्ट हुआ, तो यही जेल परिसर पूरी तरह अस्पताल में बदल दिया गया और इसका नाम रखा गया ‘स्वरूप रानी नेहरू चिकित्सालय’।

नाम सोचते वक्त रोशन सिंह और उनकी शहादत का जिक्र तक नहीं हुआ, जिस मिट्टी पर उनका खून बहा था, वहाँ उनका नाम दर्ज करने की जरूरत तक महसूस नहीं की गई। इसके बाद पूरे छह दशक तक हालात वैसे ही बने रहे- न कोई स्मारक, न कोई पहचान, बस एक ‘नेहरू’ नाम जो पूरे किस्से पर भारी पड़ता रहा। 2024 में योगी सरकार ने आकर तस्वीर बदली।

योगी सरकार में मिली पहली पहचान

2024 में योगी आदित्यनाथ सरकार ने उसी अस्पताल परिसर के मुख्य द्वार के पास जहाँ रोशन सिंह को फाँसी दी गई थी, उनकी प्रतिमा स्थापित करवाई। यह फैसला ऐसे समय आया जब देश ‘आज़ादी का अमृत महोत्सव’ मना रहा था और सरकार गुमनाम और उपेक्षित स्वतंत्रता सेनानियों को सामने लाने की मुहिम चला रही थी।

2026 में काकोरी ट्रेन एक्शन (9 अगस्त 1925) की शताब्दी वर्षगाँठ भी है, जिसे देखते हुए काकोरी से जुड़े शहीदों को सम्मान देने पर जोर बढ़ गया था। दशकों बाद पहली बार सरकारी स्तर पर उस बलिदान को औपचारिक पहचान मिली, जिसे कॉन्ग्रेस के शासनकाल में जानबूझकर भुला दिया गया था।

अब उठी अस्पताल का नाम बदलने की माँग, आखिर क्यों?

स्मारक बनने के बाद अब यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि जब पूरा परिसर ही रोशन सिंह की शहादत की धरती है, तो अस्पताल का नाम आज भी नेहरू परिवार के नाम पर क्यों टिका हुआ है?

इस माँग को उठाने वालों में सबसे मुखर आवाज़ हैं बस्ती के महुआ डाबर क्षेत्र के शाह आलम खान, जो 1857 की क्रांति के उस दौर से जुड़े परिवार से आते हैं, जब 10 जून 1857 को मनोरमा नदी पार कर रहे अंग्रेज अफसरों पर महुआ डाबर, अमिलहा, मुहम्मदपुर और नकहा गाँवों के वीरों ने धावा बोल दिया था।

इस हमले के प्रमुख नायकों में क्रांतिवीर पिरई खान भी शामिल थे, जिन्होंने अपने साथियों गुलाब खाँ, अमीर खाँ, वज़ीर खाँ, जफर अली के साथ मिलकर अंग्रेज अफसरों को घेरकर मार गिराया था।

इस हमले से बौखलाई अंग्रेज हुकूमत ने बदला लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी और 20 जून 1857 को बस्ती में मार्शल लॉ लगा दिया गया। 3 जुलाई को महुआ डाबर गाँव को चारों ओर से घेरकर जला दिया गया, गाँव को ‘गैरचिरागी’ घोषित कर संपत्ति जब्त कर ली गई।

कई लोगों के सिर कलम किए गए और 18 फरवरी 1858 को गाँव के कई क्रांतिकारियों को सरेआम फाँसी पर लटका दिया गया। शाह आलम खान उसी बलिदानी विरासत के वशंज है। पिछले करीब ढाई दशकों से वे 1857 और काकोरी जैसे आंदोलनों से जुड़े गुमनाम क्रांतिकारियों का इतिहास खोजने, दस्तावेज़ जुटाने और नई पीढ़ी तक पहुँचाने के काम में लगे हैं।

इसी मकसद से उन्होंने महुआ डाबर संग्रहालय की स्थापना की, जहाँ स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े दुर्लभ दस्तावेज़ों और तस्वीरों को सहेजा गया है। वे समय-समय पर चौरी चौरा विद्रोह और काकोरी ट्रेन एक्शन जैसी ऐतिहासिक घटनाओं पर प्रदर्शनियाँ भी आयोजित करते रहे हैं, और लगातार यह माँग उठाते रहे हैं कि क्रांतिकारियों के परिवारों को उनका हक और सम्मान मिले।

अब उन्हीं की अगुवाई में महुआ डाबर संग्रहालय परिवार के बैनर तले एसआरएन अस्पताल परिसर में अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया गया है, जिसकी माँग है कि अस्पताल का नाम बदलकर ‘अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह चिकित्सालय’ रखा जाए। उनका तर्क सीधा-सा है- जिस ज़मीन ने एक क्रांतिकारी की शहादत देखी, उस ज़मीन पर आज भी उसका नाम गायब है, जबकि एक राजनीतिक परिवार का नाम पीढ़ियों से चस्पा है।

पुरानी सरकारों की चुप्पी पर सवाल

यहाँ सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि जब यह तथ्य किसी से छिपा नहीं था कि यह जगह काकोरी के शहीद की फाँसी-स्थली है, तो दशकों तक सत्ता में रही कॉन्ग्रेस समेत बाद की सरकारों ने कभी इस दिशा में कदम क्यों नहीं उठाया?

क्या यह महज संयोग था, या फिर एक सोची-समझी कोशिश कि क्रांतिकारियों के बलिदान की जगह हर बार एक ही परिवार की विरासत को आगे बढ़ाया जाए? अब जब योगी सरकार ने स्मारक बनवाकर पहला कदम उठा दिया है, स्थानीय स्तर पर यह माँग जोर पकड़ रही है कि सम्मान अधूरा न रह जाए और अस्पताल का नाम भी बदला जाए।

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