पहले PAK को दिए हथियार, अब कर रहा भारत-पाक के बीच सीजफायर कराने का दावा: ट्रंप की राह चलने की कोशिश कर रहे चीन को भारतीय अधिकारियों का कड़ा जवाब

चीन ने एक हैरान करने वाला दावा किया है कि इस साल मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच जो युद्ध हुआ था, उसे खत्म कराने में चीन ने ‘बिचौलिए’ (मध्यस्थ) की भूमिका निभाई थी। चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने इसे अपनी कूटनीतिक जीत बताया है। वहीं दूसरी ओर, भारत ने इस दावे को पूरी तरह बकवास करार दिया है। भारत का साफ कहना है कि पाकिस्तान के साथ विवाद सुलझाने के लिए किसी तीसरे देश की जरूरत नहीं थी और यह मामला दोनों देशों की सेनाओं ने आपस में बात करके सुलझाया था।

चीन का दावा: हमने सुलझाया झगड़ा

बीजिंग में एक कार्यक्रम के दौरान चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने दुनिया भर के संघर्षों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि चीन ने शांति बनाए रखने के लिए कई देशों के बीच बीच-बचाव किया है, जिनमें भारत और पाकिस्तान का नाम भी शामिल है। चीन का कहना है कि उन्होंने म्यांमार, ईरान और फिलिस्तीन-इजरायल जैसे बड़े मुद्दों के साथ-साथ भारत-पाक तनाव को कम करने में भी मदद की है।

भारत का स्टैंड: चीन की कोई भूमिका नहीं

भारतीय अधिकारियों और जानकारों ने चीन के इन दावों को ‘अजीब’ और सच्चाई से दूर बताया है। भारत का कहना है कि 7 मई को पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में भारत ने जो सैन्य कार्रवाई की थी, उसके बाद 10 मई को युद्धविराम (सीजफायर) हुआ था।

यह समझौता दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों (DGMOs) के बीच सीधी बातचीत के जरिए हुआ था, न कि चीन की मदद से। भारत हमेशा से कहता आया है कि पाकिस्तान के साथ उसके मुद्दों में किसी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप की कोई जगह नहीं है।

चीन और पाकिस्तान की ‘जुगलबंदी’

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सच तो यह है कि मई के संघर्ष के दौरान चीन ने पाकिस्तान को पीछे से मदद दी थी। पाकिस्तान के पास जितने भी सैन्य हथियार हैं, उनमें से 81% से ज्यादा चीन से आते हैं। भारत का मानना है कि चीन ने इस संघर्ष का इस्तेमाल अपने हथियारों और सर्विलांस सिस्टम (निगरानी प्रणाली) को टेस्ट करने के लिए किया था, न कि शांति स्थापित करने के लिए।

ट्रंप जैसा ही हाल?

भारतीय जानकारों का कहना है कि चीन शायद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रास्ते पर चल रहा है। ट्रंप ने भी कई बार दावा किया था कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच समझौता कराया है, जिसे भारत ने हर बार सिरे से खारिज कर दिया था। अब चीन भी वैसा ही क्रेडिट लेने की कोशिश कर रहा है, जिसका जमीन पर कोई आधार नहीं है।