भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का मूल मंत्र और मातृभूमि की भक्ति का सबसे बड़ा प्रतीक ‘वंदे मातरम’ कॉन्ग्रेस ने एक बार फिर से घृणा दिखानी शुरू कर दी है। एक तरफ जहाँ देश इस कालजयी रचना के 150 वर्ष पूरे होने का उत्सव मना रहा है और केंद्र की मोदी सरकार इसे राष्ट्रगान के समकक्ष सम्मान दिलाने तथा लाल किले से लेकर पूरे देश में इसके सभी छंदों के सामूहिक गायन को प्रोत्साहन दे रही है, वहीं दूसरी तरफ कॉन्ग्रेस पार्टी का रुख आज भी वैसा ही है जैसा स्वतंत्रता संग्राम के समय था।
कॉन्ग्रेस का यह चरित्र दशकों बाद भी नहीं बदला है। जब भी वंदे मातरम के पूर्ण रूप से गायन या इसके सम्मान की बात आती है, कॉन्ग्रेस और उसके तुष्टिकरण वाले सहयोगी दल विरोध में खड़े हो जाते हैं। हाल ही में केरल से सामने आए विरोध ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि कॉन्ग्रेस के नेताओं के भीतर राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम को लेकर किस हद तक घृणा भरी हुई है, जहाँ उसके नेता यहाँ तक कहने से नहीं हिचकिचा रहे कि भले ही उन्हें गोली मार दी जाए, लेकिन वे पूरा वंदे मातरम नहीं गाएँगे।
लाल किले से गूँजेगा पूरा ‘वंदे मातरम’, लेकिन केरल में कॉन्ग्रेस का उग्र विरोध
भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त 2026) के ऐतिहासिक अवसर पर एक अभूतपूर्व दृश्य देखने को मिलने जा रहा है। रक्षा मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, इतिहास में पहली बार लाल किले प्राचीर से प्रधानमंत्री के आगमन पर पूरे वंदे मातरम के सभी छंदों का गायन किया जाएगा।
As part of the 80th Independence Day celebrations, for the first time ever, the National Song 'Vande Mataram' would be sung from the ramparts of Red Fort: Defence Ministry pic.twitter.com/tWNYJrdnho
— ANI (@ANI) August 10, 2026
इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस समारोह का मुख्य विषय ‘वंदे मातरम के 150 वर्ष’ और ‘विकसित भारत@2047 के लिए युवा शक्ति’ रखा गया है। इसके तहत गृह मंत्रालय के प्रोटोकॉल और राष्ट्रीय कार्यान्वयन समिति के निर्देशों के तहत देश भर में राष्ट्रीय गीत के सभी 6 छंदों का सामूहिक गायन सुनिश्चित किया जा रहा है।
यहाँ तक कि आमंत्रण पत्रों पर भी इसके पूरे बोल छापे गए हैं ताकि सभी नागरिक साथ में गा सकें। लेकिन एक तरफ जहाँ पूरा देश इस ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बनने के लिए तैयार है, वहीं केरल की UDF समर्थित राजनीति और कॉन्ग्रेस नेताओं ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
केरल के मुख्य सचिव विश्वनाथ सिन्हा द्वारा 6 अगस्त को जारी उस सर्कुलर के बाद विवाद खड़ा हो गया, जिसमें स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रमों में वंदे मातरम को पूरा गाने का प्रशासनिक निर्देश दिया गया था। इस निर्देश के आते ही केरल में सत्ता और विपक्ष दोनों के बीच घबराहट फैल गई।
केरल के स्वास्थ्य मंत्री के मुरलीधरन ने स्पष्ट रूप से कह दिया कि राज्य में सरकारी कार्यक्रमों के दौरान राष्ट्रीय गीत के सभी छंद नहीं गाए जाएँगे और केवल पारंपरिक रूप से चले आ रहे शुरुआती दो छंद ही गाए जाएँगे।
इससे भी आगे बढ़कर कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ सांसद राजमोहन उन्नीथन ने विवादित बयान देते हुए कहा, “हम इस जीवन में वंदे मातरम का पूरा गायन स्वीकार नहीं कर सकते। नरेंद्र मोदी हमें गोली मारने की धमकी दें, तब भी ‘वंदे मातरम’ को पूरा नहीं गाया जाएगा।”
उन्होंने यहाँ तक आरोप लगाया कि राज्यपाल और राजभवन लोकतंत्र को कमजोर करने की राजनीति कर रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने यह उजागर कर दिया है कि कॉन्ग्रेस सरकार और उसके नेताओं के लिए राष्ट्रगीत का पूरा गायन एक प्रशासनिक निर्देश नहीं बल्कि एक ऐसा मुद्दा है, जिसका विरोध करने के लिए वे किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।
क्यों होती है अंतिम छंदों से समस्या? तुष्टिकरण और वोट बैंक का गणित
वंदे मातरम के पूर्ण रूप से गायन का विरोध नया नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक लंबा तुष्टिकरण का इतिहास छिपा हुआ है। वंदे मातरम के शुरुआती दो छंदों में भारत भूमि के प्राकृतिक सौंदर्य- सस्य श्यामलाम्, मलयज शीतलाम्, सुजलाम्, सुफलाम् की वंदना की गई है, जिन पर किसी को आपत्ति नहीं होती।
विरोधियों की समस्या इसके बाद के छंदों से शुरू होती है। बाद के छंदों में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने भारत माता को दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के रूप में चित्रित किया है और माँ दुर्गा की दश प्रहरण धारिणी (दस हाथों में शस्त्र धारण करने वाली) शक्ति के रूप में मातृभूमि का आह्वान किया है।
केरल में कॉन्ग्रेस, CPI(M) और उनके राजनीतिक सहयोगी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग का हमेशा से यह रुख रहा है कि बाद के हिस्सों में हिंदू देवी-देवताओं से जुड़े आह्वान, प्रतीक और धार्मिक चित्र (इमेजरी) शामिल हैं। इनका तर्क रहा है कि एक धर्मनिरपेक्ष राज्य में ऐसे धार्मिक प्रतीकों वाले छंदों को आधिकारिक राष्ट्रीय गायन का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए।
वास्तव में यह विरोध वैचारिक न होकर शुद्ध रूप से वोट बैंक और तुष्टिकरण का गणित है। मुस्लिम कट्टरपंथियों को खुश करने के लिए कॉन्ग्रेस और उसके वामपंथी सहयोगियों ने हमेशा यह नैरेटिव गढ़ा कि बाद की पंक्तियाँ ‘एकेश्वरवाद’ (एक खुदा) के सिद्धांत के खिलाफ हैं।
इसी मुस्लिम लीग और कट्टरपंथी वोट बैंक के दबाव में VD सतीशन के नेतृत्व वाली UDF और कॉन्ग्रेस राजनीति आज भी पस्त नजर आ रही है। CPI(M) और पिनराई विजयन ने भी तुरंत इस पर राजनीति शुरू कर दी और सरकार पर संघ परिवार के राजनीतिक एजेंडे के आगे झुकने का आरोप लगा दिया।
इस तुष्टिकरण की राजनीति का ही नतीजा है कि देश के राष्ट्रीय गीत को काँट-छाँटकर आधा-अधूरा करने की वकालत आज भी कॉन्ग्रेस द्वारा खुलकर की जा रही है।
बंकिमचंद्र का कालजयी सृजन और स्वतंत्रता संग्राम में वंदे मातरम का योगदान
वंदे मातरम केवल एक गीत नहीं है, यह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की प्राणवायु और राष्ट्रभक्ति का वह अमर स्वर है जिसने करोड़ों भारतीयों के दिलों में क्रांति की ज्वाला प्रज्वलित की थी। इस कालजयी रचना की रचना बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 7 नवंबर 1875 को की थी और बाद में इसे उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया था।
इस गीत की रचना का समय वह था जब ब्रिटिश हुकुमत भारत में अपने पैर पसार रही थी और भारतीयों पर ब्रिटिश राष्ट्रगान ‘गॉड सेव द क्वीन’ गाने का दबाव बनाया जा रहा था। बंकिमचंद्र ने ब्रिटिश हुकुमत के इस औपनिवेशिक सांस्कृतिक थोपने के जवाब में अपनी मातृभूमि की संप्रभुता और शक्ति का जयघोष करते हुए वंदे मातरम की रचना की थी।
150 साल पहले रचे गए इस गीत ने देखते ही देखते पूरे देश को एक सूत्र में पिरो दिया। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने स्वयं इसे स्वरबद्ध करके पहली बार गाया था। इसके बाद बंगाल विभाजन (1905) के दौरान यह अंग्रेजों के खिलाफ भारतीय प्रतिरोध का सबसे बड़ा नारा और प्रतीक बन गया।
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान मतंगिनी हाजरा जैसी वीरांगनाओं से लेकर भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जैसे अनगिनत क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश पुलिस की लाठियाँ खाते और फाँसी के फंदे को चूमते समय मुख से वंदे मातरम का ही उद्घोष किया था। यह गीत भारत की राष्ट्रीय एकता, गौरव और औपनिवेशिक दासता के खिलाफ स्वाभिमान का प्रतीक बना।
लेकिन जिस गीत ने भारत माता की स्वतंत्रता के लिए लाखों युवाओं को बलिदान होने की प्रेरणा दी, उसी गीत को आज कॉन्ग्रेस नेताओं द्वारा खारिज किया जा रहा है।
नेहरू और कॉन्ग्रेस की घृणा: कैसे आधा-अधूरा कर दिया गया राष्ट्रगीत
वंदे मातरम को लेकर कॉन्ग्रेस का यह घृणास्पद और समझौतावादी चरित्र नया नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें जवाहरलाल नेहरू और तत्कालीन कॉन्ग्रेस नेतृत्व की ऐतिहासिक भूलों में छिपी हैं। 1937 में जब देश में प्रांतीय चुनाव हुए और कई राज्यों में कॉन्ग्रेस की सरकारें बनीं, तब मुस्लिम लीग और मोहम्मद अली जिन्ना ने वंदे मातरम के गायन पर कड़ा ऐतराज जताया।
जिन्ना का तुष्टिकरण करने और मुस्लिम लीग को मनाने के चक्कर में जवाहरलाल नेहरू और कॉन्ग्रेस नेतृत्व ने राष्ट्रगीत के साथ घोर समझौता कर लिया। 1937 के कोलकाता अधिवेशन में नेहरू की अध्यक्षता में कॉन्ग्रेस ने वंदे मातरम के केवल शुरुआती दो छंदों को ही स्वीकार करने और बाकी छंदों को आधिकारिक कार्यक्रमों से हटाने का प्रस्ताव पारित कर दिया।
तर्क यह दिया गया कि बाद के छंदों में हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख है जिससे गैर-हिंदुओं की भावनाएँ आहत हो सकती हैं। यह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में तुष्टिकरण की राजनीति की सबसे बड़ी शुरुआत थी। आगे चलकर जब संविधान सभा में राष्ट्रगान चुनने की बात आई, तो जवाहरलाल नेहरू ने वंदे मातरम को राष्ट्रगान बनाने से साफ मना कर दिया।
उन्होंने तर्क दिया कि वंदे मातरम की धुन ऐसी नहीं है जिसे बैंड पर बजाया जा सके या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रगान के रूप में प्रस्तुत किया जा सके। जिस गीत ने देश को आजादी की लड़ाई में एकजुट किया था, उसे नेहरू और कॉन्ग्रेस के इस रवैये के कारण मुख्य राष्ट्रगान का दर्जा नहीं मिल सका और उसे काट-छाँटकर केवल दो पंक्तियों तक सीमित कर दिया गया।
डॉ राजेंद्र प्रसाद की सोच और मोदी सरकार की ऐतिहासिक पहल
कॉन्ग्रेस के इस रवैये के विपरीत भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद वंदे मातरम के पूर्ण सम्मान के सबसे बड़े पक्षधर थे। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अंतिम दिन डॉ राजेंद्र प्रसाद ने ऐतिहासिक वक्तव्य देते हुए स्पष्ट रूप से घोषणा की थी कि ‘जन गण मन’ भले ही भारत का राष्ट्रगान (National Anthem) होगा, लेकिन ‘वंदे मातरम’, जिसने स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, को भी ‘जन गण मन’ के बिल्कुल समान दर्जा और सम्मान दिया जाएगा।
लेकिन कॉन्ग्रेस की उत्तरवर्ती सरकारों ने डॉ राजेंद्र प्रसाद की इस भावना और आदेश को ठंडे बस्ते में डाल दिया। दशकों तक वंदे मातरम उपेक्षित रहा और इसके गायन को लेकर विवाद खड़े किए जाते रहे। वर्षों बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने डॉ राजेंद्र प्रसाद की उस सोच को वास्तविक रूप से धरातल पर उतारने का संकल्प लिया है।
मोदी सरकार ने राष्ट्रगीत के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर संसद में इसके इतिहास, महत्व और योगदान पर 10 घंटे की विशेष चर्चा आयोजित करने का निर्णय लिया, जहाँ स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ने इस बहस की शुरुआत की।
यही नहीं केंद्र सरकार संसद में ‘राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026’ (The Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Bill, 2026) लेकर आई, जो राज्यसभा से पारित हो चुका है। इस विधेयक के माध्यम से वंदे मातरम को राष्ट्रगान के समान कानूनी और संवैधानिक दर्जा दिया गया है।
अब वंदे मातरम का अपमान करना या इसके गायन में बाधा डालना एक गंभीर आपराधिक अपराध माना जाएगा, जिसके लिए 3 साल तक की जेल की सजा और जुर्माने का प्रावधान है।
आज भी बेनकाब होता कॉन्ग्रेस का घृणास्पद रवैया
आज जब देश अपनी आजादी की 80वीं वर्षगाँठ और वंदे मातरम के 150 साल का जश्न मना रहा है, तब राष्ट्रवाद और तुष्टिकरण के बीच का अंतर पूरी तरह बेनकाब हो चुका है।
एक तरफ वर्तमान मोदी सरकार राष्ट्रीय प्रतीकों, स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और वंदे मातरम जैसे पवित्र स्तोत्र को उसका खोया हुआ संवैधानिक सम्मान वापस दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है, वहीं दूसरी तरफ कॉन्ग्रेस अपने उसी पुराने तुष्टिकरण के रास्ते पर चल रही है।
केरल में कॉन्ग्रेस सांसद का यह कहना कि ‘गोली मार दो, लेकिन पूरा वंदे मातरम् नहीं गाएँगे’, कोई अनजाने में दिया गया बयान नहीं है। यह कॉन्ग्रेस की उसी दशकों पुरानी मानसिकता का विस्तार है, जहाँ राष्ट्रीय गौरव और राष्ट्रगीत के सम्मान से ऊपर वोट बैंक की राजनीति को रखा जाता है।
जवाहरलाल नेहरू से शुरू हुआ वंदे मातरम के प्रति उपेक्षा और कटौती का सिलसिला आज राहुल गाँधी और उनके सहयोगियों के दौर में भी जारी है। इससे स्पष्ट होता है कि साल बीत गए, दशक बीत गए, सत्ता के समीकरण बदल गए, लेकिन कॉन्ग्रेस का चरित्र नहीं बदला।
जिस राष्ट्रगीत ने स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों की नींव हिला दी थी, उससे आज भी कॉन्ग्रेस को घृणा है। लाल किले से पूरे वंदे मातरम का गूँजना जहाँ 140 करोड़ भारतीयों के स्वाभिमान और राष्ट्रीय पुनर्जागरण का प्रतीक है, वहीं कॉन्ग्रेस का इसका विरोध करना यह सिद्ध करता है कि उसके लिए राष्ट्र हित से बड़ा आज भी तुष्टिकरण का एजेंडा ही है।


