11 अगस्त 2026 को सामने आई शिकायत के मुताबिक, उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड की संपत्तियों में लगभग 1000 करोड़ रुपये की कथित हेराफेरी हुई है। शिकायतकर्ता पूर्व चेयरमैन जितेंद्र नारायण सिंह सेंगर (पूर्व में सैयद वसीम रिजवी) हैं।
आरोपों में संपत्तियों की कथित अवैध बिक्री, वक्फ रिकॉर्ड से संपत्तियों के नाम हटाना, कब्रों तक को पैसे लेकर बेच देना और कुछ गैर-वक्फ और हिंदुओं की संपत्तियों को वक्फ रिकॉर्ड में दर्ज करना शामिल है। शिकायतकर्ता जितेन्द्र नारायण सिंह सेंगर शिया वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष हैं। उन्होंने 1995 के बाद उत्तर प्रदेश में अलग-अलग शिया और सुन्नी वक्फ बोर्डों के कामकाज पर भी सवाल उठाए हैं और कहा है कि इससे सरकारी पैसे का दुरुपयोग हुआ है। उन्होंने पूरा मामले की एसआईटी जाँच कराने की माँग की है।
कहाँ से आया 1000 करोड़ का आँकड़ा
शिकायत में कहा गया कि कथित घोटाला करीब ₹1000 करोड़ का है। इसमें अलग-अलग संपत्तियों की कथित बिक्री, रिकॉर्ड से संपत्तियाँ हटाने और दरगाहों के चंदे में हेराफेरी और दूसरे वित्तीय अनियमितताओं को जोड़ी गई है।
शिकायतकर्ता के मुताबिक, लखनऊ, मेरठ, प्रयागराज, अलीगढ़, झांसी आदि जगहों पर वक्फ बोर्ड की जमीन की कथित अवैध बिक्री के अलावा कब्रों के लिए ₹10 लाख तक लेने का आरोप है। इसके अलावा रिकॉर्ड में हेराफेरी करने और पैसे लेकर कुछ वक्फ संपत्तियों को रिकॉर्ड से हटाने का आरोप भी लगाया गया है। शिकायत में कहा गया है कि करीब 2500 फर्जी वक्फ संपत्ति बनाए गए हैं। ये हिन्दू संपत्तियों को धोखाधड़ी कर हड़प ली गई है। उन्होंने लखनऊ, आगरा और बिजनौर जैसी जगहों में कुछ दरगाहों के चंदे में गड़बड़ी के आरोप भी लगाए हैं।
कब्रें 10-10 लाख रुपए में बेचने का आरोप क्या है?
यह इस नए मामले का सबसे सनसनीखेज आरोप है, कब्रों का कथित तौर पर ₹10 लाख तक में बेचा जाना। पूर्व शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन ने अपने आरोप में कहा है कि कब्रों को 10 लाख रुपए तक में बेचा गया। उन्होंने कहा है कि लखनऊ, प्रयागराज, झाँसी, मेरठ, अलीगढ़ जैसी जगहों पर करोड़ों रुपए की काफी अहम वक्फ संपत्तियों को इन संपत्तियों का प्रबंधन देख रहे बोर्ड के लोगों के माध्यम से बेच दीं।
हलफनामे में कहा गया है कि इन संपत्तियों को वक्फ की आधिकारिक संपत्तियों के रिकॉर्ड से हटा दिया गया और करोड़ों रुपए की हेराफेरी की गई। सेंगर के मुताबिक, वक्फ की सूची से संपत्तियों को हटाने का अधिकार सिर्फ अदालत को है, लेकिन बोर्ड स्तर पर इस तरह की व्यवस्था की गई।
यह आरोप इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें दो बिल्कुल अलग तरह के आरोप एक साथ जुड़े हैं। पहला- जो संपत्ति वक्फ नहीं थी, उसे कथित तौर पर वक्फ में दर्ज किया गया। दूसरा- जो संपत्ति पहले से वक्फ की थी, उसे कथित तौर पर पैसे लेकर रिकॉर्ड से बाहर कर दिया गया। यानी शिकायतकर्ता का आरोप है कि एक तरफ संपत्तियाँ वक्फ में जोड़ी गईं और दूसरी तरफ कुछ वक्फ संपत्तियाँ रिकॉर्ड से हटाई गईं।
वक्फ रिकॉर्ड से संपत्ति हटाने का आरोप बहुत गंभीर है क्योंकि शिकायत में दावा किया गया है कि बोर्ड स्तर पर ही कुछ संपत्तियों को रिकॉर्ड से हटा दिया गया।
शिकायतकर्ता का तर्क है कि किसी संपत्ति के वक्फ के होने या न होने से जुड़े अधिकार और विवाद का निर्धारण निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत कोर्ट में होना चाहिए। बोर्ड अपने स्तर पर मनमाने तरीके से रिकॉर्ड हटाए, तो यह गंभीर प्रशासनिक और कानूनी सवाल पैदा करता है।
दरगाहों के चंदे की चोरी का दावा
हलफनामे में जिन दरगाहों में चंदे की गड़बड़ी की बात कही गई है उसमें लखनऊ की हजरत अब्बास दरगाह, आगरा की मजार शहीद ए सालिस और बिजनौर की जोगीपुरा दहगाह शामिल है। सेंगर ने दावा किया कि वक्फ बोर्ड से जुड़े कुछ लोग मौलवी के साथ मिलकर इन दरगाहों की दान में दी गई रकम की हेराफेरी करते थे।
शिया वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष ने सीएम योगी से कड़ी कार्रवाई की माँग करते हुए जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी एसआईटी गठित करने को कहा है ताकि पूरा मामले की जाँच हो सके और दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।
नवंबर 2024 में बोर्ड की बैठक में अध्यक्ष अली जैदी की अध्यक्षता में भ्रष्टाचार के मामलों में जीरो टॉलरेंस नीति अपनाने और मुतवल्लियों की आय-व्यय संबंधी अनियमितताओं पर कार्रवाई की बात कहते हुए कई फेरबदल किए गए थे।
इसके अलावा 2026 में मेरठ की एक अलग वक्फ जमीन को लेकर अली जैदी समेत कई लोगों के खिलाफ FIR की रिपोर्ट भी सामने आई है; लेकिन वह मामला वर्तमान ₹1,000 करोड़ की शिकायत से अलग है।
पहले भी शिया वक्फ बोर्ड पर आरोप लगे हैं
यह पहली बार नहीं है जब उत्तर प्रदेश शिया वक्फ बोर्ड की संपत्तियों की बिक्री और हस्तांतरण को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए हों। 2019 में उत्तर प्रदेश सरकार ने शिया और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की संपत्तियों में कथित अनियमितताओं की CBI जाँच की सिफारिश की थी। इसके बाद 2020 में CBI ने दो एफआईआर दर्ज की थीं।
2020 की सीबीआई जाँच का मामला वर्तमान ₹1,000 करोड़ की शिकायत से अलग, लेकिन पृष्ठभूमि के लिहाज से महत्वपूर्ण है। पहला एफआईआर कानपुर में दर्ज किया गया था। इसमें शिकायतकर्ता तौसीफुल हसन ने आरोप लगाया था कि कानपुर की एक वक्फ संपत्ति के प्रबंधक होने के बावजूद उनके अधिकारों को सीज किया गया और मूल दस्तावेजों के साथ कथित तौर पर हेरफेर हुई।
इस मामले में वसीम रिजवी के साथ विजय कृष्ण सोमानी, नरेश कृष्ण सोमानी, गुलाम रिजवी उर्फ गुलाम सैयदेन रिजवी और वकार रजा के नाम सामने आए थे। CBI ने आपराधिक विश्वासघात, धोखाधड़ी और धमकी जैसी धाराओं में केस दर्ज किया था।
दूसरा एफआईआर प्रयागराज में दर्ज किया गया
दूसरे मामले में सुधांक मिश्रा ने आरोप लगाया था कि प्रयागराज के पुराने जीटी रोड स्थित इमामबाड़े में कथित रूप से अवैध तरीके से दुकानें बनाई गईं। इस मामले में वसीम रिजवी पर आपराधिक अतिक्रमण से जुड़ी धाराओं में केस हुआ था। हालाँकि सीबीआई ने 2023 में वसीम रिजवी समेत तमाम आरोपितों को क्लीन चिट दे दी थी।
बालकगंज कब्रिस्तान का मामला
वक्फ संपत्तियों के कथित फर्जी ट्रांसफर का एक अलग मामला बालकगंज कब्रिस्तान से जुड़ा बताया जाता रहा है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार खुर्शीद आगा नामक व्यक्ति पर आरोप था कि उसने जाली दस्तावेजों के माध्यम से जमीन को शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के बालकगंज कब्रिस्तान और मस्जिद के नाम पर दर्ज कराया और खुद को आजीवन वक्फ बोर्ड से जुड़ा प्रबंधक बना लिया।
इसके बाद 2014 में कथित तौर पर इस जमीन को मॉडर्न को-ऑपरेटिव हाउसिंग कॉलोनी को बेच दिया गया और बाद में यह अंतरिक्ष लेंडमार्क प्राइवेट लिमिटेड तक पहुँच गई।


